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पायल रोहतगी को मिली जमानत, जल्द होंगी जेल से रिहा: नेहरू-गाँधी परिवार पर विवादित टिप्पणी करने का आरोप

राजस्थान के बूँदी एडीजे कोर्ट ने जेल में बंद अभिनेत्री पायल रोहतगी को बड़ी राहत प्रदान करते हुए उन्हें जमानत दे दी है। कोर्ट ने पायल की जमानत याचिका पर दोनों पक्षों के वकीलों की बहस के बाद रोहतगी द्वारा सोशल मीडिया पर डाले गए नेहरू-गाँधी परिवार के वीडियो को देखा और इसके बाद अपना फैसला सुनाया। कोर्ट ने उन्हें 25-25 हजार रुपए के दो मुचलकों पर जमानत दे दी है।

इससे पहले पायल रोहतगी को कोर्ट ने 24 दिसंबर तक के लिए जेल भेज दिया था। रोहतगी को अब जमानत के बाद जेल से रिहाई मिलेगी। बता दें कि पायल को बूॅंदी पुलिस ने रविवार (दिसंबर 15, 2019) को अहमदाबाद स्थित उनके घर से गिरफ्तार किया था। उन्हें लूट और हत्या समेत अन्य आपराधिक मामलों में आरोपित महिला कैदियों के साथ जेल में रखा गया था। इससे पहले पायल की तरफ से अडिशनल चीफ जुडिशल मैजिस्ट्रेट कोर्ट में जमानत याचिका पेश की गई थी, लेकिन कोर्ट ने तब खारिज कर दी थी।

पायल पर मोतीलाल नेहरू को लेकर सोशल मीडिया में आपत्तिजनक पोस्ट करने का आरोप है। उनकी गिरफ्तारी के बाद उनके समर्थन में सोशल मीडिया में ‘आई स्टैंड विथ पायल रोहतगी’ ट्रेंड करने लगा था। जेल भेजे जाने के बाद एक बार फिर लोग सोशल मीडिया पर उनका समर्थन कर रहे हैं। लोग पूछ रहे हैं कि सावरकर पर अपमानजनक टिप्पणी के लिए महाराष्ट्र सरकार कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गॉंधी को कब गिरफ्तार करेगी?

बता दें कि रविवार को पायल ने ट्वीट किया था, “मुझे राजस्थान पुलिस ने मोतीलाल नेहरू पर एक वीडियो शेयर करने के लिए गिरफ्तार किया है। उस वीडियो को मैंने गूगल से जानकारी लेकर बनाया था। बोलने की आजादी एक मजाक है।” अपने ट्वीट में उन्होंने राजस्थान पुलिस, पीएमओ, होम मिनिस्ट्री के ऑफिशियल ट्विटर अकाउंट को टैग किया था।

पायल की गिरफ्तारी पर पुलिस अधिकारी ने बताया था कि रोहतगी के खिलाफ पुलिस को 10 अक्टूबर 2019 को शिकायत मिली थी। उन पर कॉन्ग्रेस कार्यकर्ता चर्मेश शर्मा ने अपनी शिकायत में आरोप लगाए थे कि अभिनेत्री ने फेसबुक और ट्विटर के माध्यम से नेहरू और उनके परिजनों के खिलाफ विवादास्पद विडियो बनाकर पोस्ट किए हैं। पायल पर हुई इस कार्रवाई के बाद उनके पति संग्राम सिंह ने ट्वीट कर पीएम मोदी से इस मामले में मदद की गुहार लगाई थी।

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कारगिल के ‘शैतान’ परवेज़ मुशर्रफ़ को फाँसी की सजा: इमरजेंसी थोपने के लिए देशद्रोह का था मामला

पेशावर हाई कोर्ट ने गायब चल रहे पूर्व राष्ट्रपति, सैन्य जनरल और मुल्क को कारगिल की शर्मनाक हार में झोंकने वाले पूर्व तानाशाह परवेज़ मुशर्रफ़ को मौत की सज़ा सुनाई है। उन पर 3 नवंबर, 2007 को संविधान को निलंबित कर देश में इमरजेंसी थोपने के मामले में देशद्रोह का मुकदमा चल रहा था।

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार यह पाकिस्तान में पहली बार हो रहा है कि जम्हूरियत और दस्तूर (लोकतंत्र और संविधान) की ‘हत्या’ के आरोप में किसी सैन्य शासक को फाँसी सुनाई जा रही है। गौरतलब है कि पाकिस्तान ने अपने 70 साल के इतिहास में अधिकांश समय सैन्य तख्तापलट और तानाशाही के बीच ही बिताया है।

2013 में दायर इस मुकदमे में उनका केस तीन जजों की पीठ सुन रही थी। बताया जा रहा है कि इस समय वे दुबई में हैं, जहाँ वह 2016 में इलाज के नाम पर गए थे। इसके पहले 2001 से 2008 तक मुशर्रफ़ पाकिस्तान के राष्ट्रपति रह चुके हैं। इसी महीने उन्होंने अस्पताल के बिस्तर से एक वीडियो संदेश जारी कर अपने खिलाफ मुकदमे को बेबुनियाद बताया था।

रॉयटर्स ने पाकिस्तानी कानून अधिकारी सलमान नदीम के हवाले से दावा किया है कि परवेज़ मुशर्रफ़ को पाकिस्तान के संविधान के अनुच्छेद 6 के उल्लंघन का दोषी पाया गया है। उन्होंने 1999 में कारगिल युद्ध के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ का तख्ता-पलट कर सत्ता हासिल की थी।

मुशर्रफ को जिस कानून के तहत मृत्युदण्ड सुनाया गया है, वह 1973 में लागू हुआ था। इसके तहत राष्ट्रद्रोह के मामले में मौत की सज़ा या उम्रकैद ही मिलती है।

क़ानूनी उपायों की बात करें तो मुशर्रफ़ के पास सुप्रीम कोर्ट में इस निर्णय को चुनौती देने का रास्ता खुला है। अगर वहाँ से उन्हें निराशा हाथ लगती है तो वे राष्ट्रपति आरिफ अल्वी के सामने दया याचिका दायर कर सकते हैं।

‘मैं महक केसवानी अब बन गई हूँ महक फातिमा, अपनी मर्जी से अपनाया इस्लाम’ – पाकिस्तान से आया Video

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भारत में नागरिकता संशोधन कानून पर चल रही बहस के बीच पाकिस्तान से खबर आई है कि वहाँ एक बार फिर एक गैर-मुस्लिम लड़की का अपहरण कर उसका धर्म परिवर्तन करवा लिया गया है। लड़की का नाम महस केसवानी है।

बताया जा रहा है कि वो पिछले शुक्रवार यानी 13 दिसंबर से अपने कराची स्थित घर से गायब हुई थी। जिसके बाद सिर्फ़ उसका एक वीडियो आया है। इस वीडियो में महक हिजाब पहनकर बैठी है और अपना नाम महक केसवानी की जगह महक फातिमा बता रही है।

वीडियो में महक को कहते सुना जा सकता है कि वो उसने अपने मर्जी से इस्लाम कुबूल कर लिया है। इसलिए उसका उसके परिवार वालों से निवेदन है कि उसे उसकी मर्जी से जिंदगी जीने दी जाए। जानकारी के अनुसार लड़की का धर्म परिवर्तन मियाँ मिट्ठू से करवाया गया है और उसका अपहरण करने वाले का नाम अहिशर मेमन है।

हालाँकि, बता दें कि 5 दिन पहले गायब हुई लड़की के पिता अमर लाल का कहना है कि शुक्रवार के बाद से उनकी बेटी की उन्हें कोई खबर नहीं है। उनके पास फिरौती की माँग के लिए कोई फोन नहीं आया है और न ही किसी ने उन्हें उसकी शादी या फिर उसके धर्म परिवर्तन के बारे में सूचित किया है।

उल्लेखनीय है कि डिफेंस हाउसिंग सोसाइटी कराची से हिंदू लड़की के अपहरण का ये तीसरा मामला है। इसके अलावा पाकिस्तान में पिछले 7 महीने के अंदर 81 हिंदू लड़कियों के रेप और गायब होने की सूची भी सोशल मीडिया पर तेजी से वायल हो रही है।

लोग इस घटना को नागरिकता संशोधन कानून का विरोध करने वालों के सामने उदाहरण की तरह पेश कर रहे हैं और बता रहे हैं कि ऐसी घटनाओं के कारण ही देश में CAA की आवश्कता है।

बाबर की औलादें आगजनी कर सबूत दे रहे कि ये देश उनका नहीं: पहलवान ने उपद्रवियों को दी धोबी-पछाड़

भारतीय पहलवान योगेश्वर दत्त ने नागरिकता संशोधन क़ानून के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन के नाम पर हिंसा कर रहे उपद्रवियों को ललकारा है। दत्त ने दिल्ली के जामिया नगर और सीलमपुर इलाक़े में हुई हिंसा को लेकर बड़ा बयान दिया है। योगेश्वर दत्त ने कहा कि मेरे देश को मेरा देश कह देने से ये देश आपका नहीं हो जाता। साथ ही उन्होंने हिंसा में व्याप्त उपद्रवियों को धोबी-पछाड़ देते हुए कहा कि भारत में अभी भी बाबर की बची-खुची औलादें हैं, जो तोड़फोड़, हिंसा और आगजनी कर के अपने अस्तित्व का सबूत दे रहे हैं। बकौल दत्त, बाबर की औलादें इस बात का सबूत दे रहे हैं कि ये देश उनका कभी था ही नहीं, और न कभी होगा।

योगेश्वर दत्त ने दंगाइयों को लोकतान्त्रिक विरोध का मतलब समझाते हुए कहा कि प्रदर्शन का मतलब सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाना नहीं होता, देश को नुकसान पहुँचाना नहीं होता। ओलम्पिक मेडलिस्ट योगेश्वर दत्त ने संशोधित नागरिकता क़ानून का समर्थन करते हुए कहा कि जो इस देश के नागरिक हैं, जो इस देश को अपना मानते हैं- उन्हें भला किस बात का डर? भारत सरकार द्वारा पद्मश्री से सम्मानित किए जा चुके पहलवान ने ‘दिल्ली पुलिस ज़िंदाबाद’ के नारे भी लगाए और संशोधित नागरिकता क़ानून का समर्थन करने की बात कही।

कॉमनवैल्थ गोल्ड मेडलिस्ट योगेश्वर दत्त ने जामिया मिलिया यूनिवर्सिटी व उसके छात्रों को भी आड़े हाथों लिया। उन्होंने आरोप लगाया कि जिस यूनिवर्सिटी में मजहब के आधार पर आरक्षण दिया जाता है, वही यूनिवर्सिटी अब सेकुलरिज्म के लिए लड़ने का दावा कर रही है। दत्त ने इसे दोहरा रवैया करार दिया। उन्होंने हिंसक तत्वों के ख़िलाफ़ कार्रवाई के लिए दिल्ली पुलिस की सराहना की। योगेश्वर दत्त ने प्रोपेगंडा पत्रकार बरखा दत्त पर बरसते हुए कहा:

“इन उपद्रवियों ने सरकारी संपत्ति को तहस-नहस कर दिया, ये तुम्हें दिखाई नहीं दिया? ये लोग छात्र नहीं हैं, ये सभी देश के दुश्मन हैं। और हाँ, तुम जैसे नकारात्मक लोग इनका समर्थन कर रहे हैं। जो लोग पाकिस्तान और बांग्लादेश में प्रताड़ित किए जा रहे हैं, वहाँ नरक से भी बदतर जीवन जी रहे थे, उन्हें नागरिकता दी जा रही है। तुम लोग इसका विरोध क्यों कर रहे हो, इसका कोई जवाब है क्या तुम्हारे पास?”

बता दें कि बॉलीवुड के कई सेलेब्रिटी दिल्ली पुलिस की निंदा कर रहे हैं और हिंसक छात्रों के समर्थन में लगे हैं। आयुष्मान खुराना, विक्की कौशल, परिणीति चोपड़ा, कोंकणा सेन शर्मा, जावेद जाफरी, अली फजल, ज़ीशान अयूब, राजकुमार राव, स्वरा भास्कर, अनुराग कश्यप और ऋचा चड्डा जैसे लोगों ने इन छात्रों के समर्थन में ट्वीट किया।

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राजस्थान पुलिस की सुस्ती की भेंट चढ़ा रेप पीड़िता का पिता, घर में घुस तलवार से काटा

राजस्थान के पाली जिले में अपहरण और दुष्कर्म के बाद पीड़िता के पिता की हत्या की खबर सामने आई है। आरोपित ने पीड़िता के पिता की तलवार से काटकर हत्या कर दी। आरोपित ने बीच-बचाव करने आई पीड़िता की माँ और भाई को भी गंभीर रूप से घायल कर दिया। इसके बाद वह भागने की फिराक में था। हालाँकि भागने के दौरान वो घायल हो गया। इसके बाद ग्रामीणों ने उसे पुलिस के हवाले कर दिया।

यह सब कुछ हुआ है राजस्थान पुलिस की लापरवाही की वजह से। अगर राजस्थान पुलिस ने मामले को गंभीरता से लेते हुए सक्रियता दिखाई होती और आरोपितों को गिरफ्तार कर लिया होता तो इसकी नौबत ही नहीं आती। पीड़िता के पिता को जान नहीं गँवानी पड़ती। बता दें कि पीड़िता ने 10 नवंबर को केस दर्ज कराया कि आरोपित धन्नाराम उसे नासिक ले गया और उसका बलात्कार किया।

पीड़िता की शिकायत के आधार पर पुलिस उसे नासिक तो गई, लेकिन आरोपित को गिरफ्तार नहीं किया। इस बीच आरोपित ने नासिक कोर्ट से अंतरिम जमानत ले ली, लेकिन 13 दिसंबर को पाली के एडीजे कोर्ट ने जमानत खारिज कर दी। इसके बाद भी गिरफ्तारी नहीं हुई। इसका फायदा उठाते हुए रविवार (दिसंबर 15, 2019) को आरोपित ने पीड़िता के पिता को मौत के घाट उतार दिया। साथ ही बचाव में आए पीड़िता के माँ और भाई पर भी तलवार से हमला कर दिया। आरोपित ने सादड़ी थाना क्षेत्र के उंदरथल गाँव में वारदात को अंजाम दिया।

जानकारी के मुताबिक आरोपित लगातार पीड़िता पर केस वापस लेने का दबाव बना रहा था और धमकी भी दे रहा था। गाँववालों का आरोप है कि पीड़ित परिवार ने पुलिस को शिकायत भी की थी, लेकिन पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की। पूरे मामले को लेकर पुलिस पर भी सवाल उठ रहे हैं कि केस दर्ज होने के बाद भी आरोपित युवक को क्यों नहीं पकड़ा। सादड़ी के एसपी आनंद शर्मा ने भी इसमें पुलिस द्वारा लापरवाही दिखाने की बात मानी है। उन्होंने कहा कि मामले में सादड़ी थाना प्रभारी राज दीपेंद्र की लापरवाही की वजह से आरोपित गिरफ्तार नहीं किया जा सका। थाना प्रभारी को निलंबित कर विभागीय जाँच के आदेश दिए गए हैं।

बता दें कि पोस्टमाॅर्टम रिपोर्ट के मुताबिक पीड़िता के पिता के सीने में चाकू के दो गहरे घाव हैं। वहीं शरीर पर तलवार से 11 वार हैं। घायल भाई के दोनों हाथों की नस कट गई है, ऊँगलियाँ भी कटी हुई है। उसके शरीर पर कुल 5 वार है। वहीं माँ के सिर, पेट व शरीर पर तलवार के चार वार हैं। पीड़िता ने घटना के बारे में बताते हुए कहा, “धन्नाराम छत के रास्ते घर में घुसा और सीढ़ियाें का दरवाजा खोलते ही मेरे पिता के सीने में चाकू घोंप दिए। फिर तलवार से हमला किया। शोर सुन मेरी माँ और भाई आए तो तलवार से उन दाेनों पर भी हमला कर दिया। मैंने दरवाजे के पीछे छिपकर जान बचाई। वह जोर-जोर से चिल्ला रहा था कि पूरे परिवार को खत्म कर दूँगा।”

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दिल्ली के जामिया मिलिया इस्लामिया के बाद अब सीलमपुर इलाके में नागरिकता कानून के विरोध में हिंसक प्रदर्शन हुआ। प्रदर्शनकारियों ने डीटीसी की बसों में जमकर तोड़फोड़ की। प्रदर्शन के दौरान लोगों ने पुलिस पर जमकर पथराव किया। इसमें कुछ पुलिसकर्मी घायल भी हुए हैं। हालात पर काबू पाने के लिए पुलिस ने आँसू गैस के गोले छोड़े। सीलमपुर से प्रदर्शनकारियों का मार्च शुरू हुआ था जो जाफराबाद इलाके में पहुँचकर हिंसक हो गया।

एहतियात के तौर पर सीलमपुर, जफरबाद, वेलकम, मौजपुर-बाबपुर, गोकुलपुरी समेत कई मेट्रो स्टेशन को बंद कर दिया गया है। इन मेट्रो स्टेशन पर मेट्रो नहीं रूक रही है। सीलमपुर में करीब दो घंटे से बवाल चल रहा है। बवाल की शुरुआत दोपहर 1 बजे से हुई। इस दौरान प्रदर्शनकारी नए नागरिकता कानून को हटाने की माँग कर रहे थे। देखते ही देखते प्रदर्शन ने उग्र रूप से ले लिया। इसके बाद पथराव शुरू हो गया। उग्र भीड़ ने स्कूल बस को भी नहीं छोड़ा।

पथराव के दौरान कई प्रदर्शनकारियों को पुलिस ने हिरासत में ले लिया। इसके साथ ही अतिरिक्त पुलिस फोर्स की तैनाती कर दी गई है। पूरे इलाके पर ड्रोन कैमरे के जरिए नजर रखी जा रही है। इलाके में प्रदर्शन के बाद दिल्ली ट्रैफिक पुलिस ने एडवाइजरी जारी की है। सीलमपुर से जाफराबाद जानेवाली 66 फीट रोड पर आवागमन को पूरी तरह से बंद कर दिया है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, 1 घंटे से ज्यादा वक्त से प्रदर्शनकारी लगातार बवाल कर रहे हैं। स्थिति बिगड़ते देखकर पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को हटाने के लिए आँसू गैस के गोले दागे। 

बता दें कि रविवार को जामिया में भी नागरिकता कानून के विरोध में प्रदर्शन हिंसक हो गया था। इसके बाद पुलिस को भी बल प्रयोग करना पड़ा। दिल्ली पुलिस का आज एक विडियो भी जारी किया गया है। जिसमें पुलिस जामिया प्रदर्शन के दौरान पत्थरबाजी नहीं करने की अपील कर रही है। 

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12 प्रोफेसरों और वैज्ञानिकों को बनाया बंधक: लैब में JNU के छात्रों की गुंडई, फोन व कागजात छीने

वैज्ञानिक आनंद रंगनाथन को जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में उनके अपने ही लैब में घुसने से रोक दिया गया। उन्हें लगातार 2 दिन लैब में नहीं घुसने नहीं दिया गया। जामिया मिलिया इस्लामिया में छात्रों की हिंसा के बाद पुलिस ने कार्रवाई की। इसके बाद जेएनयू में भी छात्रों के कई गुट ने दिल्ली पुलिस पर बर्बर होने का इल्जाम लगाते हुए विरोध-प्रदर्शन किया। सोमवार (दिसंबर 16, 2019) को जब रंगनाथन लैब के पास पहुँचे, वहाँ चीजें अस्त-व्यस्त पड़ी हुई थीं और उन्हें अंदर नहीं जाने दिया गया। जेएनयू में प्रोफेसर के रूप में कार्यरत आनंद रंगनाथन सहित 2 अन्य लोगों को भी लैब में नहीं जाने दिया गया।

इसके अगले दिन मंगलवार को रंगनाथन व उनके साथियों को फिर लैब में घुसने से रोक दिया। रंगनाथन लाख मिन्नतें करते रहे कि विज्ञान विभाग किसी अन्य विभाग की तरह थ्योरेटिकल नहीं है बल्कि यहाँ प्रैक्टिकल होते है, लेकिन छात्र नहीं माने। कई अहम एक्सपेरिमेंट करने होते हैं, इसके लिए महँगे उपकरण मँगाए जाते हैं और इन सभी चीजों के लिए आम नागरिक के टैक्स से मिले रुपयों का इस्तेमाल होता है। सोशल मीडिया पर अपनी आपबीती सुनाते हुए रंगनाथन ने लिखा कि इन हरकतों की वजह से कसी एक व्यक्ति की नहीं बल्कि सबकी हानि होगी।

आनंद रंगनाथन को परीक्षाएँ भी लेनी थीं, जो छात्रों की गुंडागर्दी के कारण संभव नहीं हो सकी। इसी तरह प्रोफेसर गोवर्धन दास को एक इंटरनेशनल ग्रांट प्रपोजल पर काम करना था, जो संभव नहीं हो सका। उन्हें एक निश्चित समय सीमा के भीतर अपना काम ख़त्म करना है, लेकिन लैब में तालाबंदी कर छात्र उन्हें परेशान कर रहे हैं। इन दोनों के अलावा वैज्ञानिक शैलजा सिंह भी लैब में नहीं जा सकीं। जेएनयू के छात्रों की गुंडागर्दी से आहत रंगनाथन ने कहा कि पता नहीं इस देश में विज्ञान कैसे आगे बढ़ेगा। इस बारे में एक प्रोफेसर ने बताया:

“मुझे सेमेस्टर एग्जाम लेने थे और मेकशिफ्ट वेन्यू कन्वेंशन सेंटर में 10 से 12 बजे तक का समय निर्धारित किया गया था। परीक्षा के लिए 36 में से मात्र 8 विद्यार्थी पहुँचे। मैं अपने साथियों के साथ एग्जाम हॉल में ही मौजूद था। अचानक से 40 छात्रों की एक भीड़ अंदर घुसी और मुझे गालियाँ बकनी शुरू कर दी। उन्होंने मुझसे मोबाइल छीन लिया। मेरे साथ धक्का-मुक्की की और धमकी दी कि अगर मैंने परीक्षा ली तो अच्छा नहीं होगा। यह सब देख कर मेरे बगल के रूम में मौजूद अन्य प्रोफेसर बीच-बचाव के लिए आए। डीन सहित 12 प्रोफेसरों को 1 घंटे तक बंधक बनाकर रखा गया। परीक्षा लेने वाले कर्मचारियों को छात्रों की भीड़ ने खदेड़ डाला।”

प्रोफेसर ने बताया कि छात्रों ने उन्हें व उनके साथियों को 1 घंटे तक बंधक बनाए जाने के दौरान उनके पास से 8 उत्तर-पुस्तिकाएँ व 1 अटेंडेंस शीट छीन ली। यह सब डीन के सामने ही हुआ। इसके बाद एक छात्र ने प्रोफेसर का मोबाइल फोन लौटाया और उन्हें जाने दिया। प्रोफेसर ने इस घटना को याद करते हुए कहा कि वो काफ़ी असुरक्षित महसूस कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि इस घटना ने उन्हें बुरी तरह डरा दिया है। वे सदमे में हैं। उन्होंने जेएनयू के शिक्षक संगठन से निवेदन किया है कि गुंडागर्दी करने वाले छात्रों के ख़िलाफ़ कार्रवाई की जाए और एफआईआर दर्ज कराई जाए।

वैसे ये पहली बार नहीं है जब आनंद रंगनाथन के साथ ऐसी हरकत की गई हो। इससे पहले जब जेएनयू के छात्र हॉस्टल फी बढ़ाने को लेकर प्रदर्शन कर रहे थे, तब भी उन्हें लैब में जाने से रोक दिया गया था। छात्रों ने उनके सामने तालाबंदी कर हंगामा किया था।

इस दौरान छात्रों ने सिक्योरिटी गार्ड को भी धमकी दी थी। जब गार्ड ने छात्रों के बात करने के रवैए पर ऐतराज जताया तो एक छात्रा ने उसे चुप रहने की हिदायत देते हुए कहा था कि सिक्योरिटी गार्ड बात नहीं करेगा। छात्रों ने लैब के एंट्रेंस पर पोस्टर भी चिपका रखे थे।

JNU के VC पर छात्रों ने फिर किया हमला, सुरक्षाकर्मियों ने मुश्किल से बचाया

JNU केसः केजरीवाल सरकार ने नहीं दी देशद्रोह का केस चलाने की इजाजत, 19 फरवरी को होगी सुनवाई

ब्राह्मणों, भारत छोड़ो: JNU में विरोध के नाम पर घृणास्पद नारे, लोगों ने पूछा- दलित या मुस्लिम लिखा होता तो?

मुस्लिमों इतनी हैसियत भी नहीं कि शहरों को बंद कर सको: लोगों को उकसा रहे युवक का देखें Video

नागरिकता संशोधन कानून के विरोध की आड़ में जगह-जगह पर प्रदर्शन और हिंसा हो रही है। 14 और 15 दिसंबर को भी दिल्ली में जामिया समेत कई जगहों पर आगजनी, भीड़ हिंसा और बर्बरता हुई। प्रदर्शनकारियों ने बसें जला दी। निजी वाहनों को क्षतिग्रस्त कर दिया। अब सोशल मीडिया पर सामने आ रहे कई वीडियो से साफ हो रहा है कि किस तरह कुछ लोगों ने हिंसा भड़काने की साजिश रची।

सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हो रहा है, जिसमें एक शख्स मुस्लिमों को सड़कों पर आने और दिल्ली में चक्का जाम करने के लिए उकसाता हुआ दिखाई दे रहा है। बताया जा रहा है कि ये वीडियो दिल्ली का ही है। वह आदमी कहता है, “हमारी ख्वाहिश और हमारी आरजू ये है कि दिल्ली में चक्का जाम हो। सिर्फ दिल्ली में ही नहीं, पूरे देश में, जहाँ मुस्लिम कर सकता है। मुस्लिम हिन्दुस्तान के 500 शहरों में चक्का जाम कर सकता है। अब उसमें रोड ब्लॉक कौन है? वो भाजपा नहीं है, वो कॉन्ग्रेस नहीं है, वो है जमीयत जमीयत उलेमा-ए-हिंद, वो है जमात-ए-इस्लामी।”

आगे वीडियो में शख्स को कहते हुए सुना जा सकता है, “क्या मुस्लिमों की इतनी हैसियत भी नहीं कि उत्तर भारत के शहरों को बंद किया जा सके। यूपी में शहरी मुस्लिमों की आबादी 30 फीसदी से ऊपर है। क्या आपको शर्म नहीं आती? अरे भाई शर्म करो, आप यूपी में चक्काजाम क्यों नहीं कर सकते? कैसे चल रहा है वह शहर? बिहार का वह इलाका जहाँ से मैं आता हूँ, वहाँ ग्रामीण मुस्लिम आबादी 6% है, जबकि शहरी मुस्लिम आबादी 24% है। हिन्दुस्तान का मुस्लिम शहरी है। वो शहर में रहता है। शहर बंद कीजिए और जो रास्ते में आता है, उसे मना कीजिए, उसे भगाइए।”

यह वीडियो सोशल मीडिया में वायरल हो रहा है। हालाँकि ऑपइंडिया स्वतंत्र रूप से यह सत्यापित नहीं कर सका कि इसे कहाँ पर शूट किया गया है, लेकिन वीडियो को देखकर यह साफ जाहिर हो रहा है कि छात्रों और आम जनता को हिंसक विरोध-प्रदर्शन करने और नुकसान पहुँचाने के लिए उकसाया जा रहा है।

चिलमखोर, दारूबाज, गुंडा… सुनिए किस जुबान में पीएम मोदी और अमित शाह को धमका रहा मुस्लिम युवक

जामिया नगर से गिरफ्तार हुए 10 लोगों का पहले से है आपराधिक रिकॉर्ड, पुलिस ने नहीं चलाई एक भी गोली

जामिया में मिले 750 फ़र्ज़ी आईडी कार्ड: महीनों से रची जा रही थी साज़िश, अचानक नहीं हुई हिंसा

‘जामिया में जो हुआ वो जलियाँवाला बाग़ जैसा’ – हिंदुत्व नहीं छोड़ूँगा वाले उद्धव ठाकरे का सेक्युलर राग

‘पेंडुलम हिंदुत्व’ या ‘पेंडुलम-त्व’ के शिकार उद्धव ठाकरे का पेंडुलम एक बार फिर डोल कर हिंदुत्व से कॉन्ग्रेस-छाप सेक्युलरता के सिरे पर पहुँच गया है। उद्धव ठाकरे ने जामिया में हिंसा के ख़िलाफ़ प्रदर्शन की तुलना जलियाँवाला बाग़ हत्याकांड से कर दी है। 1919 में हुआ यह हत्याकाण्ड जनरल डायर की ब्रिटिश-हिंदुस्तानी फ़ौज द्वारा निहत्थे भारतीयों पर लोहड़ी के दिन किया गया लोमहर्षक अत्याचार था।

गौरतलब है कि नागरिकता विधेयक में संशोधन के खिलाफ चल रहे प्रदर्शन के नाम पर जामिया मिलिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी के छात्रों के हिंसा पर उतर आने पर दिल्ली पुलिस ने उन पर बल प्रयोग किया। इससे बिफरे लिबरल गिरोह ने जहाँ संसद सत्र के अंतिम दिन से लेकर ट्विटर और सड़क तक इस पर बवाल काटने की असफल कोशिश की है, वहीं भारत के मुख्य न्यायाधीश एसए बोबडे ने उनकी हिमायत में दायर की गई याचिका को साफ नकार दिया और कहा कि छात्र होने भर से किसी को हिंसा करने का अधिकार नहीं मिल जाता। साथ ही चेतावनी भी दी कि अगर छात्र अगर इस तरह की हरकत करेंगे तो फिर पुलिस क्या करेगी?

‘सेक्युलर’ कॉन्ग्रेस और एनसीपी के साथ सरकार चला रहे उद्धव ठाकरे लगातार नागरिकता विधेयक पर अपना स्टैंड बदलते आए हैं। लोक सभा में उनकी पार्टी ने बिना कॉन्ग्रेस से कोई सलाह-मशविरा किए विधेयक को समर्थन दे दिया। लेकिन फिर कॉन्ग्रेस के आँख दिखाने पर अपना स्टैंड बदलते हुए ठाकरे राज्य सभा में इसके समर्थन के लिए तीन-पाँच करने लगे। और उस पर भी कोर वोटबैंक की प्रतिक्रिया नकारात्मक होने पर अंततः उनकी पार्टी ने वॉक आउट कर बीच का रास्ता अपनाया- ताकि न ही विधेयक की खुल कर मुख़ालफ़त करनी पड़े, न ही इसके समर्थन से कॉन्ग्रेस का महाराष्ट्र राज्य सरकार को समर्थन छूट जाए।

इस बीच खबर यह भी आ रही है कि शिवसेना ने सभी विपक्षी दलों को झटका देते हुए राष्ट्रपति से मिलने जाने वाले प्रतिनिधिमंडल का हिस्सा बनने से इनकार कर दिया है। मंगलवार (दिसंबर 17, 2019) को शाम साढ़े 4 बजे ‘ऑल पार्टी डेलीगेशन’ की राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद से मुलाक़ात होगी। कॉन्ग्रेस समेत सभी विपक्षी दल राष्ट्रपति के समक्ष सीएए को लेकर अपनी चिंताएँ जाहिर करेंगे।

शिवसेना नेता संजय राउत ने कहा कि उनकी पार्टी के नेतागण फ़िलहाल नागपुर में व्यस्त हैं और इसीलिए राष्ट्रपति से मुलाक़ात का हिस्सा नहीं बनेंगे। उन्होंने पूछा कि आख़िर ये विरोध प्रदर्शन क्यों हो रहे हैं और इसके पीछे कौन लोग हैं? राउत ने कहा कि सीएए लागू होने से पहले से ही तय था कि इस क़ानून को लेकर विरोध प्रदर्शन होगा।

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एक पोस्ट…

“स्टेशन पर ट्रेन जैसे ही रुकी, जुमे की नमाज़ के बाद 700 मुस्लिमों की भीड़ बगल की एक मस्जिद से निकली। असामाजिक तत्वों ने रेलवे लाइन को पूरी तरह ब्लॉक कर दिया। उनके हाथों में कैब और एनआरसी विरोधी पोस्टर्स थे। दंगाइयों में अधिकतर युवा थे, कई तो 7-8 साल के बच्चे भी थे। उनके हाथों में डंडे, पत्थर और रॉड थे। सबसे पहले उन्होंने ‘हमसफ़र एक्सप्रेस’ की खिड़कियों को तोड़ा। इसके बाद हमारे ट्रेन पर पत्थरबाजी शुरू की। दंगाई भीड़ रॉड से खिड़कियों को तोड़ते हुए यात्रियों को डरा-सहमा देख कर ठहाके लगा रही थी।”

ये वकील शंखदीप सोम के शब्द हैं। वे शुक्रवार (दिसंबर 13, 2019) को हावड़ा-चेन्नई एक्सप्रेस में सवार थे। ट्रेन जब पश्चिम बंगाल के उलूबेरिया स्टेशन पर पहुॅंची तो जो कुछ हुआ वह उन्होंने फेसबुक पर लिखा है। इसे आप भक्त की भड़ास समझें इससे पहले बता दूॅं कि ट्रेन पर पत्थरबाजी से चंद घंटे पहले ही सोम ने सोशल मीडिया में पीएम मोदी का मजाक उड़ाते हुए कथित स्टैंड-अप कॉमेडियन कुणाल कमरा का पोस्ट शेयर किया था। दंगाइयों से बचने के कुछ घंटे बाद ही सोम दोबारा से लिबरल भी हो गए।

एक वीडियो…

फरहाद हकीम पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता के मेयर हैं। सत्ताधारी तृणूमल कॉन्ग्रेस के नेता हैं। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के करीबी बताए जाते हैं। मुस्लिम दंगाई भीड़ से सरकारी संपत्ति को नुकसान नहीं पहुॅंचाने की अपील करते हुए उनका एक वीडियो आया है। इसमें वे कहते सुनाई पड़ रहे हैं, “राज्य में NRC और CAA लागू नहीं किया जाएगा। हमें बंगाल के लोगों की सार्वजनिक सम्पत्ति को नुक़सान नहीं पहुँचाना चाहिए। अगर ऐसा किया जाएगा तो फिर वो लोग अमित शाह का समर्थन करना शुरू कर देंगे। अगर उनमें से 70% लोग अमित शाह का समर्थन करते हैं, तो जब बीजेपी यहाँ सत्ता में आ जाएगी तो आप अपना सिर नहीं उठा सकेंगे जैसा वो (बीजेपी) उत्तर प्रदेश में करते हैं।”

एक फैक्टर…

हैदराबाद के सांसद असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम ने 2021 बंगाल विधानसभा चुनाव लड़ने की घोषणा की है। पार्टी प्रवक्ता असीम वक़ार ने पिछले दिनों ममता बनजी को को चेताते हुए कहा था, “ये सही है कि हम संख्या में कम हैं लेकिन लेकिन कोई हमें छूने की भी हिम्मत न करे। हमलोग एटम बम हैं। दीदी (ममता बनर्जी), हमें आपकी दोस्ती भी पसंद है और हम आपकी दुश्मनी का भी स्वागत करते हैं। अब ये आपके ऊपर है कि आप हमें अपना दोस्त समझती हैं या फिर दुश्मन।”

माना जा रहा है कि बंगाल में दंगाइयों से ममता की नरमी का एक कारण यह भी है। ऐसा कर ममता विधानसभा चुनाव से पहले मुस्लिम वोट बैंक को रिझाना चाहती हैं। लेकिन, उनका खेल बिगाड़ने के लिए ओवैसी को पूरे मुस्लिम वोट बैंक की ज़रूरत नहीं है। माना जा रहा है कि यदि वे 5% के आसपास वोट शेयर हासिल करने में कामयाब रहे तो भी भाजपा को बड़ा फायदा मिलेगा।

एक सवाल…

क्या नागरिकता संशोधन कानून यानी CAA और नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजंस यानी NRC का विरोध ममता बनर्जी केवल मुस्लिम वोट बैंक को बचाने के लिए कर रही हैं? बांग्लादे​शी घुसपैठियों को बाहर निकालने के लिए कुछ साल पहले वे संसद में भी आवाज बुलंद कर चुकी हैं। फिर आज उनकी ढाल क्यों बनना चाहती हैं? क्या वह मुस्लिम वोटों में विभाजन से डरी हैं? या इसकी कुछ और भी वजहें हैं?

ठाकुरबाड़ी का जवाब…

कोलकाता से करीब 76 किलोमीटर दूर उत्तर 24 परगना जिले में बांग्लादेश की सीमा से सटे बनगांव स्थित ठाकुरनगर की ठाकुरबाड़ी में इसका जवाब छिपा है। CAA से यहाँ जश्न है और ‘हर-हर मोदी’ की गूँज सुनाई पद रही है।

आखिर यहाँ CAA से इतना हर्षोल्लास क्यों है? दरसअल, ठाकुरबाड़ी में मतुआ समुदाय के लोग रहते हैं। 1971 से लेकर अब तक कोई सरकार उन्हें भारतीय नागरिकता नहीं दिलवा पाई। उनके सिर पर बांग्लादेशी हिंदू शर्णार्थियों का टैग चिपका रहा। CAA ने उनका यह मलाल दूर कर दिया है। रहा।

 उसके पहले मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी वीणापाणि देवी की 100वीं जन्मदिन पर एक कार्यक्रम आयोजित किया था, जहां उन्होंने महारानी से आशीर्वाद लेकर कार्यक्रम की शुरुआत की थी.
मतुआ समुदाय की बड़ी माँ के साथ ममता बनर्जी(साभार: न्यूज18)

बेचैनी की वजह

अब ऐसी स्थिति में जब भाजपा ने ठान लिया है कि वो दूसरे देश के अल्पसंख्यकों को पहचान देंगे, उस समय ममता बनर्जी द्वारा विरोध बताता है कि वो इस कानून के समर्थन में वे कभी नहीं थीं। वे बस इस समुदाय का फायदा उठाकर राज्य में अपनी सरकार खड़ी करना चाहतीं थीं जो उन्होंने किया भी। लेकिन अब उनकी ये नीति नहीं चल पाएगी, क्योंकि सीएए के आने के बाद ठाकुरबाड़ी में नरेंद्र मोदी के नारों ने 2021 के चुनावों की तस्वीर साफ कर दी। इसस पहले बता दें कि परिसीमन के बाद वर्ष 2009 में वजूद में आई इस सीट पर शुरू से ही तृणमूल कांग्रेस का कब्जा रहा है। यहाँ मतुआ समुदाय के वोट निर्णायक हैं। मतुआ समुदाय की कुलमाता कही जाने वाली वीणापाणि देवी का आदेश यहाँ पत्थर की लकीर मानी जाती है। बीते दिनों उनकी मौत के बाद पारिवारिक मतभेद सतह पर आ गए और मतुआ वोट दो हिस्सों में बँट गए।इसका फायदा लोकसभा में भाजपा को हुआ और ठाकुरबाड़ी के शांतनु ठाकुर ने यहाँ से जीत दर्ज कराई। अब फिर वहीं परिस्थितियाँ बनती नजर आ रही हैं।

 21 फरवरी की रात महारानी की तबीयत बिगड़ गई थी. तुरंत उन्हें जवाहरलाल नेहरू मेमोरियल अस्पताल में भर्ती किया गया था. वे फेफड़े में संक्रमण समेत उम्र जनित कई बीमारियों से पीड़ित थीं.

मतुआ समुदाय की बड़ी माँ का आशीर्वाद लेने पहुँचे नरेंद्र मोदी (साभार: न्यूज18)

मतुआ का प्रभाव

मतुआ समुदाय मूल रूप से पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) का है। विभाजन के बाद धार्मिक शोषण से तंग आकर 1950 की शुरुआत में ये लोग यहाँ आए थे। हालाँकि,इस समुदाय को लेकर कोई आधिकारिक आँकड़ा नहीं है, लेकिन इस संप्रदाय के बारे में कहा जाता है कि ये बंगाल में 70 लाख की जनसंख्या के साथ बंगाल का दूसरा सबसे प्रभावशाली अनुसूचि जनजाति समुदाय है। उत्तर व दक्षिण 24 परगना तथा नदिया जिलों की कम से कम 6 संसदीय सीटों पर यह निर्णायक स्थिति में हैं। अनुमान के मुताबिक राज्य के विभिन्न जिलों में इनकी आबादी लगभग 1 करोड़ हैं, जिसके अनुसार 294 विधानसभा में से कम से कम 74 सीटों पर यह निर्णायक भूमिका निभाते हैं। यही वजह है कि मोदी ने फरवरी की अपनी रैली के दौरान वीणापाणि देवी से मुलाकात कर उनका आशीर्वाद लिया था। यह समुदाय पहले लेफ्ट को समर्थन देता था और बाद में वह ममता बनर्जी के समर्थन में आ गया। लेकिन अब पासा फिर पलटने के आसार हैं। माना जाता है कि पिछली बार ममता बनर्जी के सत्ता में आने के पीछे मतुआ समुदाय के वोटर्स का बड़ा हाथ था।

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