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हिन्दुओं को अपने इतिहास का सच नहीं पता चलना चाहिए, ये ‘मॉब’ बनाने की साजिश है: The Print

The Print की पत्रकार और ‘विचार’ खंड की संपादक रमा लक्ष्मी के अनुसार हिन्दुओं के हज़ारों मंदिर इस्लामी आक्रान्ताओं ने तोड़े, और उनके ऊपर अपनी मस्जिदें खड़ी कीं, यह सच, सच होने के बाद भी, बताया जाना गलत है। हिन्दुओं को यह सच बताने, इसके पक्ष में अरुण शौरी की ‘Hindu Temples: What Happened To Them’ जैसी किताबें लिखा जाना गलत है, ‘गुनाहे-अज़ीम’ है। क्यों? क्योंकि इससे 92 की तरह हिन्दू अपने साथ हुए अन्याय का बदला लेने एकजुट हो जाते हैं।

गंदी सोचों का इतिहास जब कभी लिखा जाएगा, तो “मेरे वाले ऊपर वाले के सिवा और किसी की उपासना करने वाले का कत्ल कर दूँगा- वह भी गला धीरे-धीरे रेत कर” वाले मज़हब से भी गंदी, सड़ाँध मारती, बजबजाती विचारधारा पत्रकारिता के समुदाय विशेष की गिनी जाएगी। लिबरल गिरोह के ये पत्रकार अब पूरी तरह गुंडागर्दी और हिन्दुओं का मुँह अपने हाथों से भींच कर दबाने पर उतर आए हैं। अभी तक ये ऐसी किताबों और दस्तावेज़ों को झूठा, मनगढ़ंत बताते थे, कपोल-कल्पनाओं पर आधारित कहते थे, और इनके हिन्दूफ़ोबिक नैरेटिव को काटने वाला हर विवरण भी इनके लिए ‘वर्क ऑफ़ फ़िक्शन’ होता था- जैसे रामायण-महाभारत, जैसे मलिक मुहम्मद जायसी की पद्मावत, जैसे इस्लामी आक्रांताओं के हत्या-बलात्कार-लूट के नंगे नाच को बयाँ करने वाली फ़ारसी इतिहासकार वसफ़ की किताब, जैसे अरुण शौरी की किताब, जैसे सीताराम गोयल-राम स्वरूप-आरसी मजूमदार-कोएंराड एल्स्ट जैसे इतिहासकारों की किताबें।

“बेचारा शांतिप्रिय, दुष्ट हिन्दू” के अपने प्रोपेगंडा को ‘सनातन’ कर देने के लिए इन्होंने इतिहास में झूठ लिखने, और सच बोलने वालों को झूठा बोलने से कोई गुरेज नहीं किया। सावरकर हिन्दू हितों के पैरोकार होने के चलते “वीर” से “हिंसा फ़ैलाने वाला” बन जाते हैं, मुट्ठी-भर सेना के बावजूद अकबर की विशाल सेना को नाकों चने चबवाने की महाराणा प्रताप की उपब्धि को उनकी हार के रूप में प्रचारित किया जाता है, इतिहास की पुनर्विवेचना कर “कश्मीर और पाकिस्तान हिन्दू कट्टरता की गलती थे” की घोषणा से कट्टरपंथ को न केवल क्लीन चिट दे दी जाती है, बल्कि हिन्दू धर्म और इसके धार्मिक पक्ष को पूरी तरह छिन्न-भिन्न कर देने की ज़मीन तैयार की जाती है। अरुण शौरी की किताब भी जब प्रकाशित हुई तो या तो उसे नज़रंदाज़ किया गया, या मानिनी चटर्जी, रिचर्ड ईटन और रोमिला थापर (और इनकी तरह के अन्य) जैसे झूठे और मक्कार लोगों ने “जुलाहे से पार न पाए, गदहे के कान मरोड़े” की तर्ज पर तथ्य को न काट पाने की खीझ में किताब से लेकर लेखक तक पर कीचड़ उछालने, निजी आक्षेप करने और किताब को प्रतिबंधित करने की दबी-छिपी अपील करने जैसे पैंतरे इस्तेमाल करने शुरू कर दिए।

और जब यह झूठ अदालतों में खुलने लगा, अयोध्या में बाबरी मस्जिद के नीचे से हिन्दू मंदिर, और उसे तोड़े जाने के सबूत मिलने लगे, तो यह गिरोह बिलबिला पड़ा है। अब सच बोलने को भी अपराध घोषित करने की तैयारी चल रही है। रमा लक्ष्मी का यह ट्वीट उसी दिशा में माहौल बनाने के लिए उठा कदम है। ‘हिन्दू मॉब’ के डर के बहाने हिन्दुओं के पक्ष में, इस्लाम के ख़िलाफ़ कोई भी बात सार्वजनिक जीवन में बोले जाने को रोक देना- सुनने में आज ऐसा साम्प्रदायिक, अन्यायपूर्ण कानून भले असंभव लग रहा है, लेकिन लिबरलों का यही ध्येय है, और बहुत दूर भी नहीं है।

झूठ की स्वीकारोक्ति पहले भी हो चुकी है- मजबूरी में

मजबूरी में अपने झूठ की स्वीकारोक्ति लिबरल एक-आध बार कर चुके हैं- लेकिन वह भी हिन्दुओं से, हिन्दू धर्म से दुश्मनी की ही नीयत से। कपिल कोमिरेड्डी ने किताब लिखकर माना ज़रूर कि हिन्दुओं पर हुए लगभग एक हज़ार साल के हत्याकांडों को उनके लिबरल गैंग के पत्रकारों ने दबाया-छुपाया-नकारा, लेकिन साथ में जोड़ दिया कि यह सब ‘साम्प्रदायिक सद्भाव’ की “सदिच्छा” और ‘साम्प्रदायिक ताकतों को ताकत न मिले’ के “विभाजन की हिंसा देखने के बाद उपजे” एजेंडे के तहत किया गया। यानि केवल हिन्दुओं की पीठ पर सेक्युलरिज़्म लादने का पैंतरा, वह भी झूठ और फ़रेब के दम पर, नैतिक रूप से अच्छा था- बस उल्टा पड़ गया; “संघियों” ने अंग्रेजी पढ़ना सीख लिया, विश्वविद्यालयों के Humanities विभाग से बाहर धकेले जाने के बाद भी इतिहास का ज्ञान पा लिया, और हमारे प्रोपेगंडा को नंगा करने चले आए। इसलिए मानना पड़ रहा है।

झूठ की मजबूरी में स्वीकारोक्ति, जिसे हिंदी में “थूक के चाटना” कहते हैं, और भी हुई है। एक बार तो रमा लक्ष्मी के बॉस साहब शेखर गुप्ता को ही मानना पड़ा था कि हाँ, उनके पत्रकारिता के समुदाय विशेष ने मोदी सरकार के अच्छे कामों को नकारने, दबाने, छिपाने की कोशिश की थी? “क्यों?” का जवाब उन्होंने तो नहीं दिया, लेकिन उनके मुँह पर उंगली रख लेने से सच छिप नहीं जाएगा- इसीलिए क्योंकि भाजपा ने अपनी छवि ‘हिन्दू पार्टी’ की बना रखी है, भाजपा का चुनाव जीतने को ‘हिन्दुओं की जीत’ मानी गई, इसीलिए इसे रोकने के लिए सच-झूठ को ताक पर रख दिया गया। उसी तरह, जैसे रमा लक्ष्मी के लिए हिन्दुओं के धर्म पर हुए हमले का सबूत लाना इतना बड़ा ‘पाप’ है कि ऐसे ‘पापी’ अरुण शौरी के लिबरलों के चहेते बनने से उन्हें दुःख हो रहा है।

मंच से भाषण ही नहीं बल्कि कुछ ठोस करने की जरूरत

जब मैं यह लिख रहा हूँ, तो उसी समय खबर आ रही है कि वाराणसी की एक रैली में गृहमंत्री अमित शाह ने इतिहास ही नहीं, इतिहास-लेखन में भी सावरकर के योगदान को याद करते हुए कहा, “अगर सावरकर नहीं होते तो हम 1857 के स्वतंत्रता संग्राम को अंग्रेजों के नजरिए से देख रहे होते। वीर सावरकर ही वह व्यक्ति थे, जिन्होंने 1857 की क्रांति को पहले स्वतंत्रता संग्राम का नाम दिया था।” साथ ही उन्होंने यह भी कहा, “वक्त आ गया है, जब देश के इतिहासकारों को इतिहास नए नजरिए से लिखना चाहिए। उन लोगों के साथ बहस में नहीं पड़ना चाहिए, जिन्होंने पहले इतिहास लिखा है। उन्होंने जो कुछ भी लिखा है, उसे रहने दीजिए। हमें सत्य को खोजना चाहिए और उसे लिखना चाहिए। यह हमारी जिम्मेदारी है कि हम अपना इतिहास लिखें। हम कितने वक्त तक अंग्रेजों पर आरोप लगाते रहेंगे?

अच्छी बात कही, आपने शाह जी। आपसे और आपकी पार्टी से देश को भारी उम्मीदें हैं। सत्ता में यह आपकी दूसरी पारी है। इसलिए आपसे और प्रधानमंत्री मोदी से उम्मीदें और बढ़ जाती हैं कि आखिर वो दिन कब आएगा जब आपकी तरफ से सफ़ेद झूठ परोसती किताबों के पुनर्लेखन के लिए आदेश जारी होंगे? मीनाक्षी जैन, बीबी लाल, केके मोहम्मद, कोएंराड एल्स्ट, डेविड फ्रॉली जैसे हिन्दू और Indic विद्वानों को डीएन झा, रोमिला थापर, इरफ़ान हबीब, आरएस शर्मा की जगह देने की जगह देने की जरूरत है। ताकि इतिहास का वह पहलू भी दुनियाँ के सामने आए जो अभी तक वामपंथी इतिहासकारों ने छिपाया है।

राम मंदिर की जगह स्कूल-अस्पताल बनवाने की बात करने वाले बुद्धिमानों के नाम कुछ बातें

एक ट्वीट पढ़िए। हैंडल वाले का नाम ‘मजहबी’ है, बाबरी मस्जिद को लेकर जज्बाती है और इमोशनल हो कर लिखता है: अयोध्या में पाँच सौ साल पुरानी एक मस्जिद हुआ करती थी। उस मस्जिद को आतंकवादियों ने 6 दिसंबर 1992 को तोड़ दिया। इन आतंकवादियों पर अदालती कार्रवाई होनी चाहिए और सरकारी खर्चे पर वहाँ एक मस्जिद अवश्य ही बननी चाहिए। और हाँ, एक स्मारक भी बनाई जानी चाहिए वहाँ। वही न्याय होगा। हैशटैग रीबिल्ड बाबरी मस्जिद!

आसिफ खान का ट्वीट

जज्बाती आसिफ खान ने बाबरी को तोड़ते हुए लोगों की तस्वीर भी साथ में लगाई। आसिफ खान एक महत्वपूर्ण बात भूल गया कि भारत का इतिहास 500 साल पुराना नहीं है, न ही कोई ‘सरयू घाटी सभ्यता’ सोलहवीं शताब्दी में आई थी। उस पुराने मस्जिद के पहले वहीं और भी पुराना मंदिर था। उस पुराने मंदिर को इस्लामी आतंकियों ने तोड़ा था। इसलिए न्याय की इच्छा करने वाले पहले तो हिन्दुओं के साथ न्याय करें और उन आतंकियों के पूरे खानदान को कोर्ट में ला कर पूछें कि क्या अपने बाप-दादाओं के आतंक के लिए माफी माँगते हो? फिर उनसे उस मंदिर के निर्माण के लिए पैसे लिए जाएँ और वहाँ राम हो।

कल अयोध्या राम मंदिर मामले की सुनवाई खत्म हो गई, हिन्दुओं को लग रहा है कि फैसला उनके पक्ष में आएगा, दूसरे मजहब वाले सोच रहे हैं कि कुछ सेकुलर टाइप बात हो जाएगी। मजहब विशेष के पक्ष की तरफ से बार-बार विचित्र दलीलें भी दी गईं जिसमें वराह की मूर्ति को बच्चों का खिलौना कहने से ले कर दीवारों पर संस्कृत में उकेरे श्लोकों को ‘मस्जिद/दरगाह/ईदगाह बनाने वाले मजदूरों ने लिख दिया होगा’ जैसी बातें शामिल हैं।

फिर सुन्नी वक्फ बोर्ड ने शर्तें रखीं कि वो अपना दावा छोड़ देंगे अगर सरकार अयोध्या के 22 मस्जिदों के रखरखाव की जिम्मेदारी ले, जहाँ मंदिर है या मस्जिद है, उसे उसी सूरत में देखा जाए (यानी उस पर कहीं भी कोई केस न करे), और एक कमिटी बना कर यह देखा जाए कि ASI के नियंत्रण में जो भी धार्मिक/मजहबी स्थल हैं, उनकी स्थिति क्या है।

सुन्नी वक्फ बोर्ड दावा रखे, छोड़े या धरती पर से गायब ही हो जाए, उससे इस केस पर कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। ये कितनी महीन बात है कि जिस अयोध्या में इस्लामी आतंकियों के विध्वंस की इबारत हर तरफ लिखी हुई है, वहाँ के मस्जिदों के रखरखाव का जिम्मा सरकार ले। वही सरकार जो हिन्दुओं के मंदिरों से आने वाली आय और खर्चे पर अपना नियंत्रण रखती है। मतलब, एक तरीके से हिन्दुओं के मंदिरों का खर्चा उन मस्जिदों के रखरखाव के लिए जाए, जो हो सकता है कि किसी मंदिर को ही तोड़ कर बनाई गई हो।

अब बात क्यूट लोगों की

फैसला तो भी आए, क्यूट लोगों ने दो तरह के प्रपंच फैलाने शुरु कर दिए हैं। पत्रकार शिरोमणि फेसबुक पर ज्ञान दे रहे हैं कि टीवी मत देखिए और मंदिर-मस्जिद मत कीजिए, सामाजिक सौहार्द बनाए रखिए। सही बात है, सामाजिक सौहार्द बना रहना चाहिए। इसके लिए उन लोगों को ज्यादा कोशिश करनी चाहिए जो बात-बात पर पत्थर ले कर ऐसे खड़े हो जाते हैं मानो कंगारुओं की तरह थैली के साथ पैदा हुए, और जीवन भर ज्ञान की जगह राह चलते वही पत्थर इकट्ठा किया जो इनकी अक्ल पर पड़े थे।

हिन्दुओं का क्या है, बुनियादी तौर पर सहिष्णु लोग, कभी एक मस्जिद नहीं तोड़ी, न किसी को जबरदस्ती कन्वर्ट किया, न लव-जिहाद टाइप के घटिया खेल खेलते हैं, न ही व्हाट्सएप्प मैसेज पढ़ कर आतंकियों को बचाने पत्थर ले कर पुलिस और सेना की राह में खड़े हो जाते हैं, न ही रात के एक बजे छतों पर बैठ कर मजहबी जुलूसों पर पत्थर बरसाते हैं… ऐसे लोग तो फंडामेंटली सौहार्दप्रेमी हैं। दूसरे पक्ष वालों को पत्रकारश्रेष्ठ के आह्वान पर थैलियों के पत्थर खाली कर के, सामाजिक समरसता और सर्वधर्म समभाव हेतु भव्य मंदिर के निर्माण हेतु गगनभेदी ध्वनि में ‘जय श्री राम’ का उद्घोष करना चाहिए।

दूसरे तरह के क्यूटाचरण करने वाले वो क्यूट प्राणी हैं जो ऐसा कहते ही नहीं, मानते भी हैं, कि मंदिर-मस्जिद से क्या मिलने वाला है, वहाँ एक स्कूल या अस्पताल बनवाना चाहिए लाखों लोगों का भला होगा। सुनने में बहुत कर्णप्रिय और तार्किक लगता है ये वाक्य। लगता है कि कितनी सही बात कह दी गई है। आश्चर्य होता है कि आज के साम्प्रदायिक दौर में भी ऐसी भावना के साथ, मानवता के लिए सोचने वाले लोग हैं।

क्या सच में ऐसा है? एक समय मैं भी यही सब सोचा करता था। फिर मुझे याद आया कि जिस धर्म के हजारों बड़े मंदिर तोड़ दिए गए, उनकी आस्था पर सिर्फ इस मकसद से हमला किया गया कि ये टूट जाएँ और यह विश्वास करने लगें कि उनका भगवान भी स्वयं के घर की रक्षा नहीं कर पा रहा, और अंततः दूसरे मजहब में मतपरिवर्तन के साथ चले जाएँ, उस धर्म के लोग जब अपनी आस्था को पहचानने को खड़े हुए हैं तो उन्हें स्कूल और हॉस्पिटल की याद दिलाई जा रही है?

हिन्दुओं के लिए मंदिर उनके जीवन का हिस्सा है। स्कूल और कॉलेज की बात करने वालों के नालंदा विश्वविद्यालय की याद दिलाना चाहूँगा। साथ ही यह भी कहूँगा कि जिसने उस विश्वविद्यालय को तोड़ा, उसके वंशजों को, उसके नाम को याद करने वालों को, उस बलात्कारी आतंकवादी बख्तियार खिलजी को महान योद्धा मानने वालों को अपनी जमीन, अपना पैसा और अपना पसीना दे कर हजारों स्कूल और कॉलेज खुलवा कर भारतीय समाज को शिक्षित करने की बात सोचनी चाहिए।

जिन लुटेरों और आतंकियों को कुछ लोग सिर्फ इसलिए महान बताते हैं, और उसे महान लिबरल शासक कहते हैं क्योंकि उसने हिन्दुओं को सताया, उसके मंदिर ध्वस्त किए और लाखों को तलवार की नोक पर इस्लाम कबूल करवाया, उनके वंशजों और मानने वालों के हाथ लाखों हिन्दुओं का रक्त है। इसलिए बेशक स्कूल भी बने और अस्पताल भी, लेकिन वो मजहब विशेष की जमीन पर बने, उसके पैसों से बने। इस पाप का प्रायश्चित वही लोग करें, जिन्होंने हिन्दू आस्था पर आघात किया था।

जहाँ भी मंदिर था वहाँ तो बिना किसी संशय के पहले से बड़ा मंदिर बने ताकि उन इस्लामी बलात्कारी आतंकवादियों और उनकी शैतान औलादों को यह ध्यान में रहे कि मंदिर तोड़ कर तुम उसके भगवान द्वारा स्वयं को न बचा पाने का उपहास तो कर सकते हो, लेकिन काल करवट ले कर दोबारा जब उसी भगवान के अनुयायियों को शक्ति देता है, तो वो वही भगवान है जो अपनी रक्षा को खड़ा होता दिख रहा है।

हिन्दुओं के लिए इस्लामी आतंक बिलकुल नई चीज थी

हिन्दुओं को रौंदा गया क्योंकि वो तैयार नहीं थे। उन्हें यह पता ही नहीं था कि कोई पतित व्यक्ति या मजहबी उन्मादियों का समूह किसी दूसरे की भूमि पर कब्जा करने भी आ सकता था। उन्हें यह बात इसलिए पता नहीं थी क्योंकि उन्होंने कभी इस तरह की बातों पर विचार ही नहीं किया था, उनके सामने यह परिस्थिति कभी आई ही नहीं कि ऐसा करने की ज़रूरत क्या है?

जब आपके पास अपना जीवन जीने के और मानवता की भलाई के लिए कार्य करने के अलावा और कोई उद्देश्य ही न हो, तो फिर आप किसी ऐसी लड़ाई की तैयारी कैसे करेंगे जो आपकी कल्पना या तार्किकता से परे हो। जिस धर्म के लोग अपनी गोष्ठियों का अंत ‘प्राणियों में सद्भावना हो, विश्व का कल्याण हो’ से करते हों, उनके लिए यह सोचना कि किसी दूसरे मजहब के लोगों पर आक्रमण कर के, उनकी आस्था के प्रतीकों को आग लगा कर, उसके ज्ञान के भंडार को तबाह कर के, अपनी सत्ता स्थापित करना स्वभाविक है, समझ से परे है।

इसलिए हिन्दू कभी भी तैयार नहीं था। ऐसे इस्लामी आतंकी दरिंदों के लिए तो बिलकुल नहीं जो सिर्फ लूटने नहीं आते थे, बल्कि बलात्कार करना, मंदिर तोड़ना, गाँवों में आग लगाना उनके लिए आनंद देने वाली बातें थीं। इसलिए शक्ति के प्रदर्शन से एक पूरी पीढ़ी कुचल दी गई, उसका इतिहास मिटा दिया गया। उसके बाद जो इतिहास लिखा गया उसमें हमने प्रेरक कहानी में उस आतंकवादी की कहानी पढ़ी जो सत्रहवीं बार के आक्रमण में सफल होता है। उसके बाद जो इतिहास लिखा गया उसमें उन्मादी मुगल शासकों को उदारवादी बताया गया।

उसके बाद जो इतिहास लिखा गया उसमें यह बताया गया कि भारत की सांस्कृतिक विरासत तो उन्हीं मुगलों की दी गई है। फिर हमें ताजमहल दिखा दिया गया, फिर हमें लाला किला दिखा दिया गया, फिर हमें उनकी कब्रें दिखा दी गईं और कहा गया कि देखो, इनके बापों ने तुम्हें लूटा, बलात्कार भी किया, लेकिन बिरयानी की रेसिपी भी तो दी। फिर एक धोखे से स्कोडा-लहसुन तहजीब का वास्ता दिया जाने लगा कि अल्पसंख्यक हैं, इन्हें इनके हिसाब से चलने दो, बजाने दो लाउडस्पीकर, उन्हीं लाउडस्पीकरों से मजहबी उन्माद का ज़हर भरने दो शुक्रवार की शामों को, थोड़ा सहन करना सीखो, बड़े दिलवाले बनो।

हम सब कुछ बने। हमने बलात्कारी आक्रान्ताओं के नाम उसी जगह शहर बसा दिया जहाँ नालंदा के खंडहर मौजूद हैं। हमने इस्लामी आतंकियों के नाम सड़के बनवा दीं और याद किया कि भारत में तो जो भी व्यवस्था है इन्हीं शासकों ने दी है। हमें कहा गया कि धन्यवाद दो इन्हें कि ये अंग्रेजों की तरह लूट कर कहीं ले नहीं गए, यहीं बसे रहे। कितना क्यूट तर्क है! मैं तुम्हारे घर में घुसूँ, तुम्हारी माँ-बहनों का बलात्कार करूँ, गहने-जेवर लूट लूँ, और उसी मकान के एक कमरे में रहने लगूँ और अपने भोजन के लिए तुम्हीं से बिरयानी बनवाऊँ, और बाद में मेरे समर्थक, तुम्हारे संबंधियों को यह बताते फिरें कि कैसे कृतघ्न लोग हो, तुम्हें बिरयानी बनानी सिखाई, शांति से साथ रहना सिखाया और तुम लोग बस उसके पीछे ही पड़े हो!

इसलिए स्कूल-कॉलेज-अस्पताल नहीं, बनेगा तो मंदिर ही

उसी ऐतिहासिक मजहबी गलती को धार्मिक रूप से सही करना ज़रूरी है। जो स्कूल-अस्पताल का तर्क देते हैं, उनके लिए मेरे पास एक समाधान है। मजहबी भाइयों को नमाज पढ़ने के लिए मस्जिद की ज़रूरत नहीं होती। वो सड़कों पर, पार्कों में, रेलवे ट्रैक से लेकर किसी भी खाली जगह पर अपने पाक इलाके की तरफ सर करते हुए नमाज पढ़ सकते हैं। इसलिए, मानवता की भलाई और सामाजिक सौहार्द के लिए उन्हें नई मस्जिदों की जगह स्कूल और अस्पताल ही बनवाने चाहिए।

हो सके तो पुराने स्थलों को भी उसी हिसाब से मेकओवर कर के स्कूल-कॉलेज आदि बनवा देना चाहिए। लाखों लोगों का भला होगा। लोगों को ज्ञान मिलेगा, बीमारियों से (जिसमें मानसिक बीमारी भी आती है) निजात मिलेगी और वो बाजारों में फटने से, कहीं बम रखने से, किसी आतंकी वारदात को अंजाम देने से बच जाएँगे। इसलिए जिन्हें जिस चीज की ज़रूरत है, उन्हें वह मुहैया कराई जाए।

हिन्दुओं के साथ तो समस्या है कि वो मंदिर में ही पूजा कर सकते हैं। जितना बड़ा मंदिर, उतने ज्यादा लोग एक साथ, मूर्ति को पूजने आते हैं। इससे लाखों नहीं, करोड़ों लोगों का भला होता है। देखिए, हमारी किताबों में लिखा है कि पूजा आदि के लिए मंदिर का होना ज़रूरी है। उसमें जो मूर्ति होती है, उसकी प्राण-प्रतिष्ठा के बाद वो पूरा इलाका ही जाग्रत हो जाता है और उसमें देवी/देवता का अंश प्रकट हो जाता है। इसलिए मंदिर जितने ज़्यादा होंगे, उतने ही ज़्यादा हिन्दुओं का लाभ होगा, वो धार्मिक बनेंगे।

हिन्दुओं के ज्यादा धार्मिक होने से सबको फायदा है क्योंकि हिन्दू कभी भी सामूहिक रूप से धार्मिक हो कर, योजनाबद्ध तरीके से किसी दूसरे मजहब या रिलीजन वालों पर हमला नहीं करता, जमीन नहीं हड़पता, बलात्कार नहीं करता, विश्वविद्यालयों में आग नहीं लगाता। वो धार्मिक होता है तो हर जीव से प्रेम करता है, प्राणियों में सद्भावना देखता है, विश्व के कल्याण की बातें करता है। उसको अपने धर्म के प्रचार द्वारा ‘कन्वर्जन’ जैसी बेहूदगी नहीं करनी होती। कुल मिला कर हिन्दू जब धार्मिक होता है तो वो चिल्ड-आउट रहता है और आदरपूर्वक एक दूसरे को ‘जय श्री राम, ब्रो!’ कह कर आनंद पाता है।

वहीं दूसरे मजहब के लोग जब मजहबी होते हैं, तो उन पर दबाव आता है कि तुमने पाँच काफिरों को अपना बनाया या नहीं, जवान हो गए लेकिन लव जिहाद तो किया ही नहीं, तुमने जन्नत में इंतजार में बैठी 72 हूरों के लिए तो अपने आप को फोड़ा ही नहीं! इतने ज्यादा मजहबी नहीं भी हुए तो भी, आतंकी वारदातों पर मौन सहमति तो देते ही हैं कि हमें क्या, हमारे लोग थोड़े ही मरे हैं। हमारे तो आतंकी भी मरेंगे तो हमारे नेता कह ही देंगे कि हमारे लोग सरकार में होते तो उन्हें फाँसी नहीं होती।

हिन्दुओं को कट्टर बता कर, उन्हें सद्भावविरोधी बताने की साजिशें

यही अंतर है। और ये अंतर बुनियादी है। ये अंतर इतना व्यापक है इसलिए बीच-बीच में इस तरह की बातें होती हैं जिसमें उनके हजारों सालों के आतंक को, लाखों गिराई गई लाशों को, हजारों तबाह किए मंदिरों के अपराध को किसी बिगड़ैल लड़के द्वारा किसी दूसरे को ‘जय श्री राम‘ कहलवाने की बात के बराबर रख दिया जाता है। तब ‘जय श्री राम’ के नारे की भयावहता उस नारे के समकक्ष हो जाती है जो आईसिस के झंडे पर छपा है। आप सोचिए कि हजारों लोगों को जिस संगठन में मजहबी उन्माद के नाम पर मार दिया, उसके अपराध का भार, किसी एक लड़के द्वारा किसी को थप्पड़ मारने के बराबर कर दिया जाता है।

ये अंतर इतना व्यापक और बुनियादी है इसीलिए ‘भगवा आतंक’ जैसे शब्दों की रचना की जाती है ताकि उसे इस्लामी आतंक के समकक्ष रखा जा सके। ताकि कहा जा सके कि हिन्दू भी तो आतंकी हैं। सिर्फ सत्ता में बने रहने के लिए ऐसी बातों को तूल दिया गया कि दूसरे मजहब का सर्वव्याप्त आंतक एक फर्जी आरोप वाले ‘हिन्दू टेरर’ के सामने बौना पड़ जाए।

फिर जब परतें उतरने लगीं, किलों में दरार पड़ने लगे, सत्य सर उठाने लगा तो चोरों को शहीद बताने की मुहिम चली। हर अपराध के पीछे ‘जय श्री राम’ घुसाया जाने लगा, ताकि ‘हिन्दू आतंकी’ की थ्योरी जिंदा रहे। सारी खबरें गलत साबित हुईं, सबने माना कि उन्होंने बस ऐसे ही ‘जय श्री राम’ वाली बात जोड़ दी। लिंच तो हिन्दू भी बहुत हुए, दूसरे मजहब से अधिक हुए, दूसरे मजहब वालों द्वारा हुए, लेकिन उन खबरों को छापा ही नहीं गया। गौरक्षकों की ‘शांतिप्रिय समुदाय’ द्वारा लगातार हत्याएँ होती रहीं, और उल्टे कहा जाता रहा कि गौरक्षक ही आतंकी हैं।

मंदिर हजार साल पहले भी तोड़े गए थे, मंदिर आज भी चाँदनी चौक में तोड़े जाते हैं। तब घोड़े पर बाहर से आए तुर्क और मुगल आतंकी होते थे, अब यहीं बसे वो अल्पसंख्यक होते हैं जो स्कोडा-लहसुन तहजीब का चूरण फाँकते हुए शिवलिंग पर पेशाब करते हैं, विसर्जन के जुलूस पर पत्थर फेंकते हैं, काँवड़ियों पर पत्थर फेंकते हैं, दुर्गा पूजा की मूर्तियों की गर्दन तोड़ते हैं, रामनवमी के जुलूस पर चप्पल फेंकते हैं… कितनी बार, और कितनी घटनाएँ गिनाऊँ इन ‘डरे हुए’ लोगों की ?

हमें हमारे मंदिर लौटा दो, पत्थरबाजी बंद करो

स्कूल-अस्पताल हम तब भी बनवाते थे, अब भी बनवा रहे हैं। उसका बजट अलग है। संस्कृति और आस्था का बजट अलग है। वो भी ज़रूरी है, ये भी ज़रूरी है। वो वर्तमान सुधारने के लिए ज़रूरी है, ये भूत में हुई गलतियों को वर्तमान में सुधार कर, भविष्य में सनातन आस्था के दीप को प्रज्ज्वलित रखने के लिए आवश्यक है। किसी की आस्था या धार्मिक विश्वास से किसी को नुकसान न पहुँच रहा हो, तो उसके अस्तित्व में आने या न आने पर चर्चा की गुंजाइश खत्म हो जाती है। यहाँ आस्था पूजा के लिए है, खिलाफत लाने के लिए नहीं कि पूरी धरती एक ही मजहब के नीचे आनी चाहिए, नहीं आई तो रास्ते में आने वाले काफिरों को काटते चलो, ऊपर एक सुइट बुक है।

इसलिए तर्क चाहे कितना भी क्यूट क्यों न लगे, उसे उसके क्यूटत्व पर मत स्वीकारिए। उसके पीछे के विचारों को परखिए। मंदिर से सद्भाव फैलता है, शांति आती है, लोग धार्मिक काम करने को प्रेरित होते हैं। और इस धर्म में कभी भी यह नहीं सिखाया गया कि दस गैर-हिन्दू को हिन्दू बना दो, पूरी धरती पर सनातन धर्म का ही शासन रहे, यहाँ किसी गैर-हिन्दू पर धर्म के नाम पर ट्रक चढ़ा दोगे तो स्वर्ग में अप्सराएँ रोमेंटिक गीत गाएँगी और यू विल हैव अ गुड टाइम देयर! ये हिन्दुओं में नहीं होता।

कोर्ट ने चिदंबरम फिर दिया झटका: अब 24 अक्टूबर तक रहेंगे ED की हिरासत में

राउज़ एवेन्यू कोर्ट में पूर्व गृहमंत्री पी चिदंबरम को एक बार फिर झटका लगा है। दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट ने चिदंबरम को 7 दिनों के लिए ईडी की कस्टडी में भेज दिया है। आईएनएक्स मीडिया केस में पूर्व केंद्रीय मंत्री पी चिदंबरम अब आगामी 24 अक्टूबर तक ईडी की कस्टडी में रहेंगे। इस दौरान पी चिदंबरम को घर से खाना ले जाने की अनुमति मिलेगी, वेस्टर्न टॉयलेट और दवाइयाँ ले जाने की भी इजाजत दे दी गई है।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, इसके पहले INX मीडिया मामले में चिदंबरम को तिहाड़ जेल प्रशासन रॉउज एवेन्यू कोर्ट में पेशी पर लाई थी। कोर्ट में कपिल सिब्बल ने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि पहले सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि कस्टोडियल पूछताछ की ज़रूरत है तब इन्होंने तुरंत 5 सितंबर को कस्टडी क्यों नहीं ली। ईडी ने जब भी चिदंबरम को बुलाया है वो आए हैं। आख़िरी बार चिदंबरम ईडी के सामने 8 फ़रवरी 2019 को पेश हुए थे।

कपिल सिब्बल ने आगे कहा कि, पहले सीबीआई ने गिरफ़्तार किया फिर पुलिस कस्टडी फिर न्यायिक हिरासत इसलिए जब अब 60 दिन पूरे होने वाले हैं तब ईडी कस्टडी माँग रही है। ये सब मिलकर चिदंबरम को जेल में ही रखना चाहते हैं।

रिपोर्ट्स के अनुसार, बता दें कि इसके पहले आज सीबीआई वाले मामले में चिदंबरम की न्यायिक हिरासत खत्म हो रही और सीबीआई ने चिदंबरम की न्यायिक हिरासत 14 दिन बढ़ाने की माँग की है। तो वहीं एक और मामले में ED भी चिदंबरम को हिरासत में लेकर पूछताछ करना चाहती है।

माफिया से मिले कर्नाटक कॉन्ग्रेस महासचिव… वो भी कॉन्ग्रेस मुख्यालय में! सिद्धरामैय्या बोले – कुछ गलत नहीं

कर्नाटक में कॉन्ग्रेस पार्टी को अपने एक नेता का एक हिस्ट्रीशीटर से मिलना भारी पड़ रहा है। यह घटना न सिर्फ हैरान कर देने वाली है बल्कि जो पार्टी खुद भ्रष्टाचार में डूबकर नहाई हो और अब विपक्ष में बैठने के वक़्त आए दिन उसी मुद्दे पर सरकार को घेरने का दावा ठोकती हो, उसके खुद के ही नेता आजकल इन हरकतों से उसे शर्मिंदा करवाने में कायदे से लग गए हैं।

दरअसल कर्नाटक कॉन्ग्रेस पार्टी  के एक नेता केसी वेणुगोपाल जोकि अपने प्रदेश कर्नाटक में अखिल भारतीय कॉन्ग्रेस पार्टी के महासचिव भी हैं, हाल ही में उनका एक वीडियो सामने आया है जिसमें वह एक हिस्ट्रीशीटर यानी अपराधी इश्तियाक अहमद से बात करते देखे जा सकते हैं। बताया जा रहा है कि यह वीडियो कर्नाटक राज्य में उपचुनाव के ठीक पहले सामने आया है या कहें कि कर्नाटक में उपचुनाव से ठीक पहले ही कॉन्ग्रेस पार्टी के नेता वेणुगोपाल एक हिस्ट्रीशीटर उर्फ़ अपराधी इश्तियाक अहमद से मिल रहे हैं। हैरान कर देने वाली बात यह है कि दोनों कॉन्ग्रेस के मुख्यालय में एक दूसरे से मिल रहे थे। यह भी बता दें कि अहमद की बीवी कॉन्ग्रेस पार्टी में शिवाजीनगर इलाके से कर्नाटक कॉन्ग्रेस पार्टी में कॉर्पोरेटर जैसे अहम पद पर काबिज हैं।

बताया जा रहा है कि यह वीडियो पिछले हफ्ते रिकॉर्ड किए गए थे जोकि अब मीडिया में लीक हो गए हैं, जिसके बाद कर्नाटक की कॉन्ग्रेस पार्टी पर सवालों की बौछार हो रही है। मीडिया में लीक हुए कर्नाटक कॉन्ग्रेस के नेता केसी वेणुगोपाल एक बदमाश के साथ दिखाई दे रहे हैं। मज़े की बात यह है कि कॉन्ग्रेसी नेता और एक बदमाश की प्रगाढ़ मित्रता दर्शाता यह वीडियो भी उन्ही की पार्टी के कर्नाटक में बने मुख्यालय का है। इसी वीडियो में कर्नाटक कॉन्ग्रेस पार्टी के ही विधान परिषद सदस्य रिजवान अरशद भी दोनों के साथ खड़े नज़र आ रहे हैं। बता दें कि हाल ही में इश्तियाक अहमद को आईएमए ज्वेलरी की एक पोंज़ी स्कीम में गिरफ्तार किया गया था। पुलिस के मुताबिक इश्तिआक ने आईएमए ज्वेलरी के मैनेजिंग डायरेक्टर मोहम्मद मंसूर खान से दो करोड़ रूपये की फिरौती की मांग की थी।

पुलिस सूत्रों की मानें तो इस लेन-देन की जानकारी मोहम्मद मंसूर खान ने अपनी एक डायरी में लिखी हुई है, जिसको पूरे मामले में सबूत के तौर पर आधार मानते हुए पुलिस ने इश्तियाक अहमद को गिरफ्तार किया था। हालाँकि पुलिस की मानें तो अहमद के अपराध की जड़ें 1993 से जुड़ी हुई हैं। साथ ही 50 से ज्यादा मामलों में उसका नाम मिल है और पुलिस का मानना है कि अहमद की उन मामलों में संलिप्तता थी। इश्तियाक को 2018 में शहर के कुछ रेस्टोरेंट्स से भी रंगदारी वसूलने के आरोप में एक बार पुलिस ने गिरफ्तार किया था। एम्बिडैंट पोंज़ी स्कीम की जाँच में पुलिस ने इश्तियाक अहमद की गहन जाँच की थी।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, पिछले सप्ताह इश्तियाक अपनी पत्नी के साथ कॉन्ग्रेस पार्टी के कार्यालय में मौजूद था। इस मामले पर सवाल पूछे जाने पर दिल्ली में शीर्ष नेतृत्व से मुलाक़ात करने पहुँचे कर्नाटक के विपक्षी नेता सिद्धरामैय्या ने कहा कि इसमें कुछ भी गलत नहीं। मीडिया से बातचीत में पूर्व मुख्यमंत्री और राज्य में विपक्ष के नेता सिद्धरामैय्या ने कहा-

“इसमें वेणुगोपाल क्या कर सकते हैं अगर वह व्यक्ति ही खुद उनसे मिलने आता है। इश्तियाक की पत्नी एक कॉर्पोरेटर हैं। अब क्या वेणुगोपाल किसी आने वाले को उनकी गर्दन से पकड़ कर भगा दें। अगर हमने उस व्यक्ति को पार्टी में पद दिया होता तो शायद आपका यह सवाल वाजिब हो सकता था मगर ऐसा कुछ नहीं है। आज जो हुआ, उसमें कुछ भी आपत्तिजनक नहीं है।

डरे हुए पाकिस्तान ने F-16 भेजकर घेर लिया था भारतीय यात्री विमान, बढ़ सकता था तनाव, लेकिन…

काबुल से चलने वाले भारतीय यात्री विमान को पिछले महीने हवाई क्षेत्र में पाकिस्तानी लड़ाकू जेट द्वारा रोक दिया गया था। यह घटना फ़रवरी में बालाकोट हवाई हमले के बाद नई दिल्ली और इस्लामाबाद के बीच बढ़ते तनाव के दौरान हुई। यह घटना 23 सितंबर की है, जब स्पाइसजेट की उड़ान को हवा में ही रोक दिया गया था। इस दौरान पाकिस्तान एयरफ़ोर्स के दो F-16 फाइटर जेट्स ने भारतीय विमान को दोनों ओर से घेर लिया था और पायलट को फ़्लाइट की ऊँचाई कम करने और उड़ान के विवरण के साथ उन्हें रिपोर्ट करने के लिए कहा गया था।

दरअसल, स्पाइसजेट की यह फ़्लाइट SG-21 थी और इसने दिल्ली से काबुल के लिए उड़ान भरी थी। इस फ़्लाइट में 120 यात्री सवार थे। ख़बर के अनुसार, स्पाइसजेट के कैप्टन ने F-16 के पायलट्स को पूरी जानकारी दी।

फ़्लाइट के यात्रियों में से एक ने नाम न छापने की शर्तों पर ANI को बताया कि पाकिस्तानी लड़ाकू पायलट ने हाथ के संकेतों के माध्यम से स्पाइसजेट पायलट को वाणिज्यिक विमान की ऊँचाई कम करने का निर्देश दिया। वहीं, एक अन्य यात्री ने बताया,

“जिस समय पाकिस्तानी F-16 अपनी उड़ान के दौरान उड़ान भर रहे थे, सभी यात्रियों को अपनी खिड़कियां बंद करने और शांति बनाए रखने के लिए कहा गया।”

सूत्रों के हवाले से इंडिया टुडे ने लिखा कि हर फ़्लाइट का एक कोड होता है और स्‍पाइसजेट को ‘SG’ कोड से जाना जाता है। इस वजह से पाकिस्‍तान के ATC को कनफ़्यूज़न हो गया। ATC को स्‍पाइसजेट के ‘IA’ से लगा कि यह इंडियन आर्मी या फिर इंडियन एयरफ़ोर्स का एयरक्राफ़्ट है। इसके बाद जब ATC ने इस बात की जानकारी दी कि IA कोड के साथ भारत से एक एयरक्राफ्ट आ रहा है है तो तुरंत ही पाकिस्‍तान एयरफोर्स ने F-16 जेट को इसे इंटरसेप्‍ट करने के लिए भेज दिया।

जैसे ही कनफ़्यूज़न ख़त्‍म हुआ, पाक फाइटर जेट्स ने स्‍पाइसजेट को अपने एयरस्‍पेस से बाहर तक जाने का रास्‍ता दिया और तब तक उसके साथ रहे जब तक वह अफ़ग़ानिस्‍तान की सीमा में दाखिल नहीं हो गया। DGCA की तरफ़ से इस बात की पुष्टि की गई है। फ़्लाइट काबुल पहुँच गई, लेकिन इसकी वापसी में क़रीब पाँच घंटे की देरी हुई थी। काबुल में पाकिस्‍तान दूतावास के अधिकारियों ने कुछ पेपरवर्क का काम पूरा किया जो इसी घटना से जुड़ा था।

NRC, बैंकिंग-सिस्टम से लेकर सावरकर तक… मनमोहन ने सच बोलकर कॉन्ग्रेस का कर दिया छीछालेदर

विधानसभा चुनाव नजदीक आते ही राजनैतिक गलियारों में बयानबाजी की बयार तेज हो गई है। अभी तक जहाँ एनआरसी लागू करने से लेकर सावरकर को भारत रत्न दिए जाने की बात का कॉन्ग्रेस खुलकर विरोध कर रही थी, वहीं उसी पार्टी के दिग्गज नेता और पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने एक आयोजन में 3 बार पार्टी लीक से हटकर बिलकुल अलग बयान दे डाले।

उन्होंने बताया कि पार्टी ने इंदिरा गाँधी के समय में वीर सावरकर पर पोस्टल स्टैंप जारी किया था। उन्होंने ये भी कहा कि वे NRC के ख़िलाफ नहीं हैं। उन्होंने माना कि उनके कार्यकाल में बैंकिग सिस्टम में गलतियाँ हुईं।

प्राप्त जानकारी के अनुसार पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने मुंबई में आयोजित एक कार्यक्रम में बोलते हुए अर्थव्यवस्था के मुद्दे पर मोदी और राज्य की फडणवीस सरकार को फेल करार दिया। लेकिन इस बीच कई मौक़े आए जब उनकी बातों में विरोधाभास दिखा।

दरअसल, इस दौरान एनआरसी पर अपनी राय रखते हुए बताया कि वे NRC के ख़िलाफ़ नहीं हैं। लेकिन उनका ये भी मानना है कि कानून मुस्लिमों के साथ भेदभाव करता है। इसलिए एनआरसी के संदर्भ में मानवता का पक्ष नहीं भूलना चाहिए।

इसके बाद उन्होंने वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा कॉन्ग्रेस कार्यकाल में बैंकिंग सिस्टम हुई गड़बड़ी पर लगाए आरोपों को स्वीकारा। उन्होंने मान लिया कि कॉन्ग्रेस के कार्यकाल में गलती हुई। उन्होंने कहा कि कॉन्ग्रेस के राज में जो हुआ, वह कमजोरियाँ थीं। लेकिन वर्तमान सरकार को हमारी कमजोरियों से सीखकर अर्थव्यवस्था की समस्याओं से निबटना चाहिए।

कॉन्ग्रेस के दिग्गज नेता मनमोहन सिंह ने मुंबई में आयोजित कार्यक्रम में सावरकर को भारत रत्न देने की माँग उठाने पर अपनी राय रखी। उन्होंने बताया कॉन्ग्रेस सरकार ने सावरकर पर इंदिरा गाँधी के समय पोस्टल स्टैंप जारी किया था। हालाँकि, उन्होंने ये भी साफ किया कि इसके बावजूद वो हिन्दुत्व की उस विचारधारा का समर्थन नहीं करते, जिसके पक्षधर वीर सावरकर थे।

यहाँ वीर सावरकर को भारत रत्न दिलाने की माँग उठने पर बता दें जहाँ कॉन्ग्रेस के प्रवक्ता उन्हें गाँधी जी की मौत के लिए जिम्मेदार बता रहे हैं, वहीं उनकी पार्टी को एक नए आयाम देने वाली इंदिरा गाँधी साल 1980 में उनकी तारीफ कर चुकी हैं।

इस संबंध में कॉन्ग्रेस की पूर्व और शिवसेना की वर्तमान प्रवक्ता प्रियंका चतुर्वेदी इंदिरा गाँधी का एक लेटर ट्वीट कर चुकी हैं। इसमें तात्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी के हस्ताक्षर भी दिख रहे हैं। जिसके में वीर सावरकर की जमकर तारीफ कर रही हैं।

कश्मीर: दो सेब व्यापारियों पर आतंकियों ने बरसाईं गोलियाँ, 1 की मौत, दूसरे की हालत नाजुक

आतंकियों ने कश्मीर के शोपियां में पंजाब के अबोहर ज़िले के दो सेब व्यापारियों को गोली मार दी। इनमें से एक की मौत हो गई जबकि दूसरा गंभीर रूप से घायल है। हमले में मृतक की पहचान चरणजीत सिंह के रूप में हुई है, वहीं घायल की पहचान संजीव कुमार के रूप में की गई है। संजीव को चार गोलियाँ लगी हैं, उन्हें श्रीनगर के एसएमएचएस अस्पताल में भर्ती कराया गया है। वारदात को अंजाम देने के बाद से ही आतंकी फ़रार हैं। 

पुलिस ने बताया कि सेब व्यापारी चरणजीत सिंह और संजीव पर शोपियां ज़िले के ट्रेंज़ में शाम साढ़े सात बजे 3-4 आतंकवादियों ने हमला किया था। दोनों को पुलवामा के ज़िला अस्पताल ले जाया गया, जहाँ सिंह की मौत हो गई, जबकि संजीव की हालत गंभीर थी और वहाँ से उन्हें श्रीनगर के एसएमएचएस अस्पताल में भेज दिया गया।

इससे पहले, छत्तीसगढ़ के ईंट भट्ठा कार्यकर्ता सेठी कुमार सागर की दिन-दहाड़े गोली मारकर हत्या कर दी गई थी, जब वह पुलवामा के नेहामा इलाक़े में अपने कार्यस्थल के पास अपने दोस्त के साथ टहलने गए थे। घटना के बाद सेना ने उस इलाक़े की घेराबंदी की और घटनास्थल के पास आवासीय कॉलोनियों की तलाशी ली।

दक्षिणी कश्मीर में पिछले 48 घंटों में यह तीसरी घटना है, जिनमें आतंकियों ने दहशत फैलाने के मंशा से हमले किए। इन तीन घटनाओं में जम्मू-कश्मीर के बाहर के तीन लोग संदिग्ध आतंकवादियों द्वारा मारे गए। सोमवार (14 अक्टूबर) की रात शोपियां के शिरमाल के सुंधु गाँव में राजस्थान के एक ट्रक चालक शेरी ख़ान की उस समय गोली मारकर हत्या कर दी गई थी, जब वह अपने ट्रक में सेब के डिब्बे लोड कर रहा था।

हत्या से प्रवासी श्रमिकों और ट्रक चालकों में दहशत फैल गई है जो घाटी से सेब की ढुलाई के लिए कश्मीर में बड़ी संख्या में मौजूद हैं। पिछले सप्ताह शनिवार (12 अक्टूबर 2019) को श्रीनगर के हरि सिंह हाई स्ट्रीट इलाक़े में ग्रेनेड हमला किया था, इसमें एक महिला समेत सात लोग घायल हुए थे। इससे पहले, पाँच अक्टूबर अनंतनाग में डीसी कार्यालय के बाहर भी ग्रेनेड से हमला किया गया था, जिसमें 14 लोग घायल हो गए थे। 

श्रीनगर के नवाकदल इलाक़े में 28 सितंबर को ग्रेनेड हमला किया गया था, इसमें सीआरपीएफ की 38वीं बटालियन के जवानों को निशाना बनाया था।

‘सावरकर नहीं होते तो 1857 का स्वतंत्रता संग्राम सिर्फ विद्रोह बनकर रह जाता, सही इतिहास लिखने की जरूरत’

केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने आज (अक्टूबर 17, 2019) 1857 के विद्रोह के ऐतिहासिक होने के पीछे वीर सावरकर को वजह बताया। उन्होंने कहा अगर आज सावरकर नहीं होते तो 1857 का विद्रोह कभी स्वतंत्रता संग्राम में दर्ज नहीं हो पाता।

गौरतलब है कि महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के मद्देनजर भाजपा ने अपने घोषणा पत्र में वादा किया कि वे सावरकर को भारत रत्न देने की माँग करेंगे। जिसके बाद कॉन्ग्रेसी नेताओं ने इस पर सवाल उठाने शुरू कर दिए। जिस पर अमित शाह ने आज वाराणसी की रैली के दौरान खुलकर जवाब दिए।

उन्होंने कहा, “अगर सावरकर नहीं होते तो हम 1857 के स्वतंत्रता संग्राम को अंग्रेजों के नजरिए से देख रहे होते। वीर सावरकर ही वह व्यक्ति थे, जिन्होंने 1857 की क्रांति को पहले स्वतंत्रता संग्राम का नाम दिया था।

केंद्रीय गृहमंत्री ने जनसभा को संबोधित करते हुए कहा, “वक्त आ गया है, जब देश के इतिहासकारों को इतिहास नए नजरिए से लिखना चाहिए। उन लोगों के साथ बहस में नहीं पड़ना चाहिए, जिन्होंने पहले इतिहास लिखा है। उन्होंने जो कुछ भी लिखा है, उसे रहने दीजिए। हमें सत्य को खोजना चाहिए और उसे लिखना चाहिए। यह हमारी जिम्मेदारी है कि हम अपना इतिहास लिखें। हम कितने वक्त तक अंग्रेजों पर आरोप लगाते रहेंगे?

बता दें कि गृहमंत्री से से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी महाराष्ट्र के अकोला में चुनावी रैली को संबोधित करते हुए सावरकर पर अपना पक्ष साफ बता चुके हैं। जहाँ उन्होंने कहा था, “ये वीर सावरकर के ही संस्कार हैं कि राष्ट्रवाद को हमने राष्ट्र निर्माण के मूल में रखा। वीर सावरकर को आए दिन गालियाँ देने वाले, उनका अपमान करने वाले वही लोग हैं जिन्होंने बाबा साहेब आंबेडकर का कदम-कदम पर अपमान किया। उनको दशकों तक भारत रत्न से वंचित रखा।

‘वीर सावरकर थे भारत के महान सपूत’ – पढ़ें वो खत जिसे इंदिरा गाँधी ने खुद लिखा था

लोक सभा चुनावों के ठीक पहले कॉन्ग्रेस राष्ट्रीय प्रवक्ता का पद छोड़ कर शिव सेना में जाने वालीं प्रियंका चतुर्वेदी ने कॉन्ग्रेस को आईना दिखाते हुए ट्वीट किया है। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी का स्वतंत्रता सेनानी वीर सावरकर को लेकर लिखा गया पत्र ट्वीट करते हुए उन्होंने आज की कॉन्ग्रेस को कम्युनिस्ट और वामपंथी [(Commie/Left)”] करार दिया है।

सावरकर थे ‘remarkable son of India’

प्रियंका द्वारा ट्वीट किए गए पत्र में इंदिरा गाँधी ‘स्वातंत्र्यवीर सावरकर राष्ट्रीय स्मारक’ संस्था के सचिव श्री पंडित बाखले को सावरकर की जन्म शताब्दी को लेकर उनकी योजनाओं के लिए सफलता की कामना की थी। साथ ही उन्होंने न केवल सावरकर को “भारत का विशिष्ट पुत्र” बताया था, बल्कि यह भी कहा था कि उनका ब्रिटिश सरकार से निर्भीक संघर्ष स्वतन्त्रता संग्राम के इतिहास में अपना खुद का महत्वपूर्ण स्थान रखता है।

यह पत्र 20 मई 1980 का है, और इंदिरा गाँधी के हस्ताक्षर पत्र पर साफ़ देखे जा सकते हैं।

कॉन्ग्रेस के लिए असहज स्थिति

इंदिरा गाँधी का यह पत्र कॉन्ग्रेस के लिए असहज स्थिति है, क्योंकि पार्टी पिछले कुछ समय से सावरकर को साम्प्रदायिक और फासीवादी के अतिरिक्त ‘गद्दार’ और ‘कायर’ भी बताने में लगी है। अगस्त में कॉन्ग्रेस के दिल्ली यूनिवर्सिटी के छात्र नेताओं ने सावरकर की प्रतिमा पर कालिख पोतने के अलावा उस पर जूतों की माला पहनाई थी। एनएसयूआई (NSUI) की राष्ट्रीय महासचिव सुरभि द्विवेदी ने ट्विटर पर लिखा था कि सावरकर की प्रतिमा उन स्वतंत्रता सेनानियों की प्रतिमा के साथ नहीं लगाई जानी चाहिए, जिन्होंने देश के लिए अपनी जान दे दी। सुरभि ने लिखा था कि सावरकर अंग्रेजों को क्षमा याचिकाएँ लिखा करते थे।

ऐसे में कॉन्ग्रेस की 1947 के बाद की सबसे बड़ी नेत्रियों में गिनी जाने वाली इंदिरा गाँधी के शब्दों और अपने स्टैंड में साम्य समझा पाना कॉन्ग्रेस के लिए बड़ी चुनौती होगी।

जल्द पता चलेगा कि 1993 के मुंबई विस्फोट के अपराधियों को भागने की अनुमति किसने दी: PM मोदी

नरेंद्र मोदी ने विधानसभा चुनावों से पहले महाराष्ट्र के अकोला में अपनी रैली में प्रफुल्ल पटेल के दाऊद-सहयोगी इक़बाल मिर्ची के साथ कथित लिंक सार्वजनिक होने के बाद विपक्षी दलों पर निशाना साधा। रैली को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि एक समय था जब महाराष्ट्र में आये दिन बम धमाके होते रहते थे। उस समय जिन भी लोगों पर सवाल उठे, धमाकों के वे मास्टरमाइंड बचकर निकल गए और दुश्मन देशों में जाकर बसेरा बना लिया। आज हिन्दुस्तान उन लोगों से पूछता है आख़िर ये कैसे हुआ, देश के इतने बड़े गुनाहगार कैसे भाग गए?

राष्ट्रवादी कॉन्ग्रेस पर हमला जारी रखते हुए पीएम मोदी ने कहा कि जब कोई क्षेत्र विकास के पथ पर बढ़ता है, शहरीकरण तेज़ होता है तो उसे अक्सर बिल्डर माफ़िया की बीमारी भी पकड़ लेती है। 2014 से पहले महाराष्ट्र और मुंबई की स्थिति यही थी। रियल एस्टेट सेक्टर में बिल्डर माफ़िया और अंडरवर्ल्ड का क्या रिश्ता रहा है, कैसे-कैसे काम यहाँ हुए हैं, उसके दाग आज तक कॉन्ग्रेस और NCP के नेताओं पर हैं।

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि महाराष्ट्र को ख़ून के रंग से रंग देने वालों के साथ इन लोगों की डीलिंग चलती थीं। इन्हें पता था कि इनकी पोल खुलने वाली है, इनके कारनामें सामने आएँगे। इसलिए ये डरे हुए थे और इसलिए पिछले कुछ दिनों से इन्होंने जाँच एजेंसियों और केंद्र सरकार को बदनाम करना शुरू कर दिया, लेकिन वक़्त अब बदल चुका है। हर कारनामें का जवाब देश लेकर रहेगा, महाराष्ट्र की जनता लेकर रहेगी।

प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने दाऊद इब्राहिम और उसके सहयोगियों के साथ जुड़ी सम्पतियों पर बड़े पैमाने पर कार्रवाई शुरू की है। मुंबई पुलिस के सूत्रों के अनुसार कई राजनेताओं, कई फ़र्मों और निजी कंपनियों के लिंक उन संपत्तियों के साथ पाए गए।

सूत्रों के अनुसार, ED ने इक़बाल मेमन उर्फ़ मिर्ची नाम के दाऊद के एक प्रमुख सहयोगी की सम्पत्तियों को शून्य कर दिया है। भारत और ब्रिटेन में मिर्ची के व्यापारिक उपक्रमों और सम्पत्तियों पर नज़र रखते हुए, ED को एक ऐसी फ़र्म का पता चला है जिसके तार UPA के पूर्व नागरिक उड्डयन मंत्री प्रफुल्ल पटेल और उनकी पत्नी वर्षा पटेल से जुड़े हुए है।

NCP नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री प्रफुल्ल पटेल के दाऊद इब्राहिम और उसके सहयोगियों के साथ वित्तीय लेन-देन से जुड़े पुख़्ता दस्तावेज़ OpIndia के पास मौजूद हैं। हमारे द्वारा एक्सेस किए गए दस्तावेज़ों जिन पर प्रफुल्ल पटेल के हस्ताक्षर हैं उनसे पता चला है कि उन दस्तावेज़ों का संबंध दाऊद इब्राहिम के प्रमुख इक़बाल मेमन से जुड़ा है।

भारत के सबसे वरिष्ठ राजनेताओं में से एक शरद पवार, जो 1993 के मुंबई बम धमाकों के दौरान महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री थे, उस समय उन्होंने सेक्यूलरिज्म को बढ़ावा देने और दो सम्प्रदायों के बीच सद्भाव बनाए रखने के नाम पर एक ऐसे बम विस्फोट का आविष्कार कर दिया, जो हुआ ही नहीं था। 

मुंबई में हमलों के तुरंत बाद शरद पवार दूरदर्शन स्टूडियो पहुँचे और घोषणा की कि कुल 13 विस्फोट हुए। उन्होंने जिस विस्फोट का अविष्कार किया उसके बारे में उन्होंने बताया कि वो एक मस्जिद में हुआ था। श्रीकृष्ण आयोग के सामने गवाही देते हुए, पवार ने LTTE पर बम विस्फोट का आरोप मढ़ने कोशिश की। जोकि सरासर झूठ था, उन्होंने दावा किया कि ऐसा इसलिए किया गया था, जिससे दोनों मजहबों की झड़पों से बचा जा सके।

बता दें कि हरियाणा और महाराष्ट्र में 21 अक्टूबर को मतदान होगा और 24 अक्टूबर को नतीजे घोषित किए जाएँगे।