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गणेश और कार्तिकेय SAME-SEX LOVE से पैदा हुए, RSS गुजरात दंगों के हमलावर: DU के सिलेबस का विरोध

दिल्ली विश्वविद्यालय के इंग्लिश डिपार्टमेंट से संबंधित अध्ययन सामग्री विवादों के घेरे में है। विश्वविद्यालय में गुजरात दंगों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की भूमिका और हिंदू देवताओं से संबंधित विवादित अध्ययन सामग्री को सिलेबस में शामिल करने का विरोध किया जा रहा है। यह विरोध गुरुवार (11 जुलाई) को स्नातक पाठ्यक्रम की समीक्षा के लिए गठित एक स्थायी समिति की बैठक में किया गया।

स्टैंडिंग कमेटी के सदस्य रसल सिंह के अनुसार, गुजरात दंगों की पृष्ठभूमि पर आधारित एक कहानी ‘Manibein alias Bibijaan’ में बजरंग दल और RSS से संबंधित संगठनों को बेहद ख़राब भूमिका में दर्शाया गया है। उन्होंने कहा, “उन्हें (RSS और बजरंग दल) गुजरात दंगों में हमलावर के रूप में दिखाया जा रहा है।”

रसल सिंह ने इस बात पर भी आपत्ति जताई कि हिंदू देवताओं का चित्रण समलैंगिक के रूप में किया जाएगा, ‘जिसके लिए संदर्भ भागवत पुराण, शंकर पुराण, शिव पुराण से दिया जाएगा’।

रसल सिंह ने यह भी कहा कि उन्होंने समिति के समक्ष अपनी आपत्तियाँ रखी हैं। इसके लिए उन्हें सूचित किया गया है कि उनकी असहमति को सोमवार (15 जुलाई) को अकादमिक परिषद की बैठक में इंग्लिश डिपार्टमेंट द्वारा प्रकाश में लाया जाएगा।

उन्होंने च्वाइस बेस्ड करिकुलम सिस्टम में किए गए बदलावों पर भी प्रकाश डाला। इस पर उन्होंने कहा कि सिलेबस को 30% के बजाय पूरी तरह से बदल दिया गया। श्री सिंह ने कहा कि कम्युनिकेशन स्किल्स का पेपर पूरी तरह से साहित्य से भर दिया गया है। इसके अलावा उन्होंने बताया कि ‘इंग्लिश में भारतीय लेखन’ के पेपर की जगह, ‘Litrerature and Caste’ और ‘Interrogating Queerness’ शुरू किए जा रहे थे।

सिंह ने प्राचीन और वैदिक साहित्य में समलैंगिकता के बारे में बात करते हुए ‘Interrogating Queerness’ पर शिक़ायत की। उन्होंने कहा,

“मैंने एक अध्याय पर आपत्ति जताई, जिसमें बताया गया है कि प्राचीन और वैदिक साहित्य में LGBTQ का मूल कैसे पाया जाता है। और उन्होंने एक उदाहरण दिया कि गणेश और कार्तिकेय दोनों Same-Sex Love से पैदा हुए थे। यह आपत्तिजनक है। ऐसी सामग्री दिमाग के लिए ज़हरीली है और हानिकारक व विभाजनकारी है। यह भारतीय राज्य, संस्कृति और लोकाचार के ख़िलाफ़ एक साज़िश है।”

इंग्लिश डिपार्टमेंट के प्रमुख राज कुमार ने रसल सिंह के दावों पर कहा,

“एकैडमिक काउंसिल के सदस्य अनावश्यक रूप से हमारे सिलेबस को साम्प्रदायिक रंग देने की कोशिश कर रहे हैं, बावजूद इसके कि हम उन्हें समझा रहे हैं कि हम अपने सिलेबस में कई दृष्टिकोण दे रहे हैं। कहानी काल्पनिक है और वास्तव में गुजरात दंगों के बारे में नहीं है। लेकिन हमारे छात्रों को सिखाने के लिए कुछ है कि एक इंसान की कोई एक निश्चित पहचान कैसे नहीं हो सकती। इसकी वजह यह है कि कहानी में एक चरित्र है।”

स्कूल ऑफ़ ओपन लर्निंग (SOL) के इंग्लिश डिपार्टमेंट के एक शिक्षक ने टाइम्स ऑफ़ इंडिया को बताया कि यह कहानी लंबे समय से डीयू के पाठ्यक्रम का हिस्सा है। उन्होंने कहा, “यह डीयू के पुराने इंग्लिश पाठ्यक्रम में था और इसलिए SOL में भी हमारे पास है।” लेकिन शिक्षक, जो गुमनाम रहना चाहते थे, उन्होंने इस कहानी की प्रकृति साम्प्रदायिक है पर कोई भी टिप्पणी करने से इनकार कर दिया।


तमिलनाडु में दहशत के ठिकानों पर छापा, NIA ने किया 3 संदिग्ध आतंकियों को किया गिरफ्तार

राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (एनआईए) ने तमिलनाडु में छापा मार कर तीन जिहाद-संदिग्धों को गिरफ्तार किया है। संदिग्धों के पास से 9 मोबाइल फ़ोन, 15 सिम कार्ड, 3 लैपटॉप, 5 हार्ड डिस्क, 7 मेमोरी कार्ड, 3 सीडी/डीवीडी, 2 टैबलेट और 6 पेन ड्राइव बरामद हुए हैं। इसके अलावा, छापेमारी में काफी मात्रा में किताबें, मैगज़ीन, बैनर, पोस्टर, नोट्स इत्यादि भी जब्त किए गए हैं।

दो शहरों में, चार ठिकानों पर छापे

चेन्नै और नागापट्टिनम के दो-दो ठिकानों पर पड़े इस छापे का मकसद कोयम्बटोर में पिछले महीने गिरफ्तार 6 आईएस समर्थकों के गिरोह की पड़ताल था। NIA के मुताबिक, पकड़े गए लोगों में श्री लंका सीरियल बम धमाकों के मास्टरमाइंड माने जा रहे ज़ाहरान हाशिम का फेसबुक फ्रेंड मोहम्मद अज़हरुद्दीन भी था। इन 6 लोगों की गिरफ़्तारी के बाद इनके घरों और कार्यस्थलों पर पड़े छापे में ऐसे दस्तावेज भी बरामद हुए थे, जिनमें दक्षिण भारत, खास कर तमिलनाडु और केरल में आतंकी हमले करने के लिए युवाओं की भर्ती हेतु आईएस की विचारधारा सोशल मीडिया में फैलाने की बात थी।

चेन्नै में छापा, वहादे इस्लामी हिन्द संस्था के मन्नाडी स्थित कार्यालय पर मारा गया। इसके अलावा संस्था के राज्य अध्यक्ष मोहम्मद सईद बुखारी के घर पर भी छपा पड़ा। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, इसके लिए नई दिल्ली से 7 अफसरों की टीम आई थी। इसके अलावा नागापट्टिनम में हसन अली युनुस्मारिकार के अड्डों पर भी NIA, केरल की टीम बुलाए जाने की बात रिपोर्ट में कही गई है।

NIA ने एक स्टेटमेंट जारी कर बताया कि सईद बुखारी, हसन अली और नागापट्टिनम के ही निवासी मोहम्मद युसफुद्दीन हरीश मोहम्मद के खिलाफ मामला आईपीसी की धाराओं के अलावा UAPA के अंतर्गत भारत सरकार के खिलाफ युद्ध छेड़ने के लिए आतंकवादी गैंग बनाने को लेकर दर्ज किया गया है। इसके साथ ही एनआईए का कहना है कि आरोपित सैयद मोहम्मद बुखारी, हसन अली और मोहम्मद युसुफुद्दीन और उसके सहयोगियों ने बड़े पैमाने पर फंड जुटाया है। ये लोग भारत में आतंकी हमलों को अंजाम देने की तैयारी कर रहे थे। इन आतंकियों का मंसूबा भारत में इस्लामिक राज्य की स्थापना करना है।

गौ तस्करी के आरोपित को पकड़ने गई पुलिस पर फायरिंग, महिलाओं ने की पत्थरबाजी: 7 पुलिसकर्मी घायल

प्रयागराज में गौ तस्करी के आरोपी को गिरफ़्तार करने गई यूपी पुलिस पर गाँव वालों ने हमला कर दिया। हमला भी ऐसा-वैसा नहीं, बाकायदा पुलिस पर फायरिंग। इसके चलते आरोपित भागने में सफल रहा और 7 पुलिस वाले घायल भी हो गए। मामला जनपद के धूमनगंज स्थित मरियाडीह गाँव का है। घायल पुलिसकर्मियों का इलाज कॉल्विन अस्पताल में चल रहा है।

गाँव में पुलिस ने डाला पहरा

हमले के बाद शांति-भंग जैसी किसी घटना से निपटने के लिए भारी मात्रा में पुलिस बल की तैनाती गाँव में कर दी गई है। मीडिया से बात करते हुए एसपी (क्राइम) आशुतोष मिश्र ने कहा कि हमले में शामिल आरोपितों को जल्दी ही हिरासत में ले लिया जाएगा। देर रात तक हमलावरों की तलाश में पुलिस की दबिश पड़ते रहने की बात भी मीडिया रिपोर्टों में सामने आ रही है।

फ़रार आरोपित की सूचना पाकर पहुँची थी पुलिस

आशुतोष मिश्र के मुताबिक नुरैन नामक व्यक्ति गौ तस्करी मामले में फ़रार चल रहा है। शनिवार शाम उसके घर पर होने की सूचना पाकर पहुँची बम्हरौली थाना क्षेत्र के आठ पुलिसकर्मियों की टीम ने उसे धर दबोचा। लेकिन नुरैन को लेकर जब पुलिस जाने लगी तो महिलाओं समेत सैकड़ों की संख्या में इकट्ठा भीड़ ने पुलिस को घेर लिया। अचानक से पुलिस पर लाठी-डंडों और पत्थरों से हमले होने लगे। मौका पाकर कुछ युवक नुरैन को ले भागने में सफल रहे।

पीछा करने वाले चौकी प्रभारी पर फायरिंग

बम्हरौली के चौकी प्रभारी नित्यानंद सिंह ने जब नुरैन का पीछा किया तो उन पर फायरिंग की गई। इसके बाद जान बचाने के लिए पुलिस को पीछे हटना पड़ा। जब इस वारदात की सूचना उच्चाधिकारियों को मिली तो तुरंत हरकत में आए सिविल लाइन्स के सीओ (सर्कल अफसर) 6 थानों का पुलिस बल और पीएसी लेकर खुद मौके पर पहुँचे। पुलिस फ़ोर्स की मौजूदगी देख ग्रामीण तितर-बितर हो गए

पुलिस ने 20 लोगों को नामजद किया है और अन्य अज्ञात आरोपियों का भी जिक्र मामले में है। सभी के खिलाफ हत्या के प्रयास समेत गंभीर धाराओं में मामला दर्ज किया गया है। आपको बता दें कि यह इलाका प्रदेश में कुख्यात बाहुबली अतीक अहमद का गढ़ है। जनपद में सर्वाधिक अपराध वाले इलाके में भी इसकी गिनती होती है।

FB पोस्ट पर बवाल: अंजुमन कमिटी की FIR पर लड़की को जेल, संप्रदाय-विशेष के लोग अब भी बाहर

इन दिनों धर्म और संप्रदाय को लेकर लोगों के बीच काफी रोष का माहौल व्याप्त है। लोग अपनी सोशल मीडिया वॉल पर किसी धर्म को लेकर कुछ भावनाएँ व्यक्त करते हैं तो समुदाय विशेष द्वारा उसे सांप्रदायिक तनाव का कारण करार दिया जाता है। इसे आपसी सौहार्द्र बिगाड़ने की कोशिश बताते हुए उसके खिलाफ कार्रवाई करने की बात कही जाती है। और प्रशासन के लिए डर का माहौल कुछ इस कदर है कि इन मामलों में पुलिस भी बिना जाँच किए त्वरित कार्रवाई करते हुए आरोपित को जेल में डाल देती है। ऐसा ही एक मामला सामने आया है राँची के पिठोरिया से। यहाँ ग्रेजुएशन पार्ट थ्री में पढ़ाई करने वाली एक युवती पर आरोप है कि उसने फेसबुक और व्हाट्सएप के जरिए धर्म-विशेष के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणी की थी। इससे समुदाय विशेष के लोग आहत हो गए।

अंजुमन कमिटी पिठोरिया ने लड़की के पोस्ट को आपत्तिजनक और धार्मिक भावना को आहत करने वाला बताते हुए उसके खिलाफ पिठोरिया थाने में एफआईआर दर्ज करा दिया। इसके बाद पुलिस ने अंजुमन कमिटी की शिकायत पर त्वरित कार्रवाई करते हुए 2 घंटे के भीतर उस युवती को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। जानकारी के मुताबिक, कमिटी द्वारा 4 बजे आवेदन किया गया था और 6 बजे लड़की को थाने ले जाया गया और फिर जेल में डाल दिया गया। इससे आक्रोशित लोगों का कहना है कि युवती को दो घंटे के अंदर जेल भेज दिया गया, जबकि कई गंभीर टिप्पणी करने वाले बाहर हैं।

थानेदार द्वारा बिना जाँच-पड़ताल किए लड़की को जेल भेजने के खिलाफ शनिवार (जुलाई 13, 2019) को जनाक्रोश भड़क गया। लोग लड़की को रिहा करने और थानेदार पर कार्वाई की माँग कर रहे थे। उनका कहना था कि थानेदार ने उचित कार्रवाई न करते हुए अपनी मनमानी की है। लड़की की जल्द से जल्द रिहाई करवाने को लेकर लोग धरने पर बैठ गए और थानेदार विनोद राम के खिलाफ नारेबाजी करने लगे। लड़की के समर्थन में विश्व हिंदू परिषद, आरएसएस, बजरंग दल, हिंदू जागरण मंच के राँची जिला के पदाधिकारी भी थाना पहुँचे। लोगों ने थानेदार पर एकतरफा कार्रवाई करने का आरोप लगाया। उनका कहना था कि अगर जिस धर्म को लेकर लड़की ने टिप्पणी की है, तो उसी धर्म के लोगों ने प्रतिक्रिया में लड़की के धर्म को लेकर भी बेहद आपत्तिजनक टिप्पणी की है। ऐसे में जब मामला दोनों तरफ से था तो फिर कार्रवाई एकतरफा क्यों की गई?

अंजुमन कमिटी द्वारा थाने में दर्ज की गई शिकायत

मामले की गंभीरता को देखते हुए ग्रामीण एसपी आशुतोष शेखर व एएसपी अमित रेणु भी वहाँ पहुँचे। उन्होंने लोगों को समझाया और आश्वासन दिया कि उनके द्वारा उठाए गए सभी पहलूओं की जाँच होगी औ अगर जाँच के दौरान ये पाया जाता है कि थानेदार विनोद राम दोषी हैं, तो उनके खिलाफ उचित कार्रवाई की जाएगी। साथ ही उन्होंने ये भी कहा कि उस फेसबुक पोस्ट की भी जाँच होगी, जिसको लेकर गिरफ्तारी हुई और उसमें अगर दूसरा पक्ष भी दोषी पाया जाएगा तो उन्हें भी बख्‍शा नहीं जाएगा। वहीं, लड़की की रिहाई को लेकर कहा गया कि उसे सोमवार (जुलाई 15, 2019) को बेल पर रिहा कर दिया जाएगा।

चुनाव से पहले दिल्ली कॉन्ग्रेस में फूट: शीला दीक्षित-पीसी चाको के मतभेद आए सामने

दिल्ली कॉन्ग्रेस की गुटबाजी एक बार फिर से खुलकर सामने आने लगी है। दिल्ली कॉन्ग्रेस में 14 जिला कॉन्ग्रेस कमिटी पर्यवेक्षक और 280 ब्लॉक कॉन्ग्रेस कमिटी पर्यवेक्षकों की नियुक्ति को लेकर रार छिड़ गई है। प्रदेश अध्यक्ष शीला दीक्षित के इस फैसले का विरोध करते हुए दिल्ली के तीन कार्यकारी अध्यक्ष हारुन युसुफ, देवेंद्र यादव और राजेश लिलोथिया ने सीधे राहुल गाँधी को खत लिखकर शिकायत की है। इसके अलावा उन्होंने कॉन्ग्रेस के दिल्ली प्रभारी पीसी चाको और संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल को भी खत लिखा है।

पत्र में तीनों कार्यकारी अध्यक्षों ने लिखा कि शीला दीक्षित ने इन नियुक्तियों को लेकर न तो उनसे कोई सलाह ली और न ही उन्हें सूचित किया गया। शीला दीक्षित ने खुद ही पदाधिकारियों को मनोनीत कर दिया। कार्यकारी अध्यक्षों ने शीला दीक्षित की कार्यशैली पर सवाल उठाते हुए ब्लॉक कमिटी को भंग करने की माँग की। उनका कहना है कि पर्यवेक्षकों की नियुक्ति का फैसला गलत है।

इसके बाद पीसी चाको ने शीला दीक्षित को पत्र लिखकर कहा कि उन्होंने पहले भी उनसे कहा है कि पार्टी संगठन का फैसला वो अकेले नहीं कर सकती हैं, इसलिए शुक्रवार (जुलाई 12, 2019) को जो उन्होंने ब्लॉक पर्यवेक्षकों की नियुक्ति की थी, उसे महासचिव प्रभारी के तौर पर वे (पीसी चाको) अयोग्य करार देते हैं। साथ ही चाको ने अपने पत्र में ये भी लिखा कि शीला दीक्षित जल्द ही संगठन की मीटिंग बुलाकर सबके साथ मिलकर दिल्ली कॉन्ग्रेस के लिए काम करें।

गौरतलब है कि इससे पहले शीला दीक्षित ने दिल्ली के ब्लॉक अध्यक्ष की कमिटी को भंग कर दिया था। उसके बाद भी पीसी चाको और शिला दीक्षित के मतभेद ऐसे ही सामने आए थे और प्रभारी महासचिव ने शीला दीक्षित के फैसले को तब भी अयोग्य करार दिया था। दिल्ली में अगले साल की शुरुआत में चुनाव होने वाले हैं लेकिन कॉन्ग्रेस अभी तक अपने झगड़े निपटाने में असफल रही है।

ता चढ़ि मुल्ला (फर्जी) बाँग दे: ‘जय श्री राम’ न कहने पर मारा, हम अदरक करेंगे, लहसुन करेंगे

चार लौंडे क्रिकेट खेलते हुए भिड़ गए, मार-पीट हुई, एक-दो बूँद खून निकला, बच्चे घर गए। फिर आया लम्पट इमाम जिसने जानबूझकर एक सामान्य झगड़े को सीधा जय श्री राम तक जोड़ दिया और कहा कि उसने पुलिस को सारी बातें बता दी हैं, शिनाख्त दे दी है, चेहरे और नाम दे दिए हैं। आगे इमाम ने फरमाया कि अगर जुमे की नमाज तक ये लोग गिरफ्तार नहीं किए जाएँगे तो वो होगा, जो आज तक न हुआ। जाहिर सी बात है कि इमाम साहब का आशय सड़क पर नमाज पढ़ने का तो बिलकुल नहीं था, उनका आशय दंगा और हिंसा का ही था क्योंकि जिस हिसाब से वो बोल रहे थे, लग रहा था खड़े हो कर सूरज को खींच लेंगे और कहेंगे कि जुमेरात को ही जुमा करो, और इन्हें बता दो कि आखिर वो क्या होने की बात कर रहे हैं!

खबर सुबह आ गई थी, और हमें पूरी तरह से संदेह था कि ये खबर फर्जी साबित होनी है। टाइम्स नाव, क्विंट, फेक्ट चेकर डॉट इन, एनडीटीवी सरीखे सारे मीडिया वालों ने तुरंत ‘मजहबी टोपी’ वाली इमेज लगा कर, कान के नीचे एक लाल जगह को लाल घेरे में घेरा और बताया कि इन्हें तो ‘जय श्री राम’ कहलवाने के कारण पीटा गया। एक चोरकट मीडिया वाले ने तो यह भी गिनाया कि मोदी के शपथ ग्रहण के बाद यह कितने नंबर की घटना हुई है। उसने बाद में फर्जी साबित हुई घटनाओं को नहीं गिनाया क्योंकि वो तो नैरेटिव को सूट नहीं करता ना!

शाम में पता चला कि इमाम साहब बस दंगे कराना चाहते थे क्योंकि ऐसी ही एक अफवाह पर चाँदनी चौक में कट्टरपंथियों की वही भीड़ पत्थरबाजी करते हुए दुर्गा मंदिर और उसकी मूर्तियों को तोड़ा जो हाल ही में बिरयानी बाँटते नजर आ रहे थे। ऐसे दंगाई इमाम को क्या सजा मिली कोई नहीं जानता, न ही किसी को ये जानने में कोई रुचि है।

अब आप सोचिए कि जिन बच्चों के बीच लड़ाई हुई थी, उसमें जो हिन्दू बच्चे थे (जी हाँ, हमारे समय के इमामों ने बच्चों को अब हिन्दू और मुस्लिम में बाँट दिया है, पहले वो बस खेलने वाले बच्चे हुआ करते थे), वो हिन्दू बच्चे घर जाते और उनके इलाके के किसी पुजारी को पता चलता है कि ऐसा हुआ है, और वो कैमरे पर बोलता, “मुस्लिम बच्चों ने हमारे लड़कों को मारा और उनसे जबरन ‘अल्लाहु अकबर’ के नारे लगवाए। हमने पुलिस को नाम और फोटो दे दिए हैं। अगर कल शाम तक भगवान की आरती से पहले वो गिरफ्तार नहीं हुए, तो हम वो करेंगे जो कभी नहीं हुआ।”

तब कहा जाता कि देश का माहौल खराब करने की कोशिश की जा रही है। बच्चों को मजहब के आधार पर चिह्नित करके कट्टर बनाया जा रहा है। ये वही लोग कहते जिनके आवाज निकाल सकने वाले सारे छिद्र बंद हैं क्योंकि सारे छिद्र सेकुलर हो रखे हैं।

ये पहली घटना नहीं है जब ये इमाम, मौलवी और कठमुल्ले मजहब की आड़ में भीड़ को दंगा करने के लिए तैयार करते हैं। लगातार ऐसी घटनाएँ फर्जी साबित होती जा रही हैं। दो मुस्लिम लौंडों ने आपस में ही ‘जय श्री राम’ बोलने की बात पर विडियो बना कर वायरल करने के लिए ऐसी ही बेहूदगी की और बाद में पकड़े गए। ऐसी ही एक घटना सामने आई जब दारू पीकर मारपीट करने वासे आतिब ने ‘जय श्री राम’ वाला विक्टिम कार्ड खेला।

कुछ समय पहले गुड़गाँव में हवा से ‘शान्तिप्रियों’ की टोपी उड़ी और मीडिया नाचने लगा कि उसकी टोपी हिन्दू आदमी ने उतार कर फेंक दी। ये बेशर्म और निकम्मे माडिया वाले माफी भी नहीं माँगते। वस्तुतः ये लोग दंगाई हैं जो अपना काम हर बार कर जाते हैं। इन्हीं के चैनलों के एंकर ‘व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी’ की बातें करते नजर आते हैं, और इन्हीं के चैनलों की फर्जी बातों को आधार बना कर, अफवाह फैलाई जाती है और मंदिर तोड़ा जाता है।

अब तो हर ऐसी घटना पर लगता है कि जरूर फर्जी होगा क्योंकि आपसी रंजिश के नाम की गई हत्या में मणिपुर की खबर में ये लोग तुरंत हिन्दू और गाय घुसा देते हैं, जबकि पता चलता है कि बात कुछ और ही थी। जिस जुनैद की हत्या को लेकर रवीश कुमार आज भी माला फेर लेते हैं, वो सीट के विवाद में मारा गया था। बरकत अली ने शराब पीकर मारपीट की, पुलिस से कहा उसे ‘जय श्री राम’ बोलने कहा गया, टोपी निकाल कर फेंक दी।

हर घटना के केन्द्र में शांतिप्रिय और जय श्री राम। जब लग रहा था कि मोदी के खिलाफ बहत्तर प्रधानमंत्री उम्मीदवार आएँगे, और चोरों की मंडली एक साथ खड़ी हो कर मोदी को हरा देंगे, तो ये सारी बातें आधे साल तक नहीं हुई। मोदी के जीतते ही ऐसी खबरों में अचानक से इजाफा कैसे हो गया? आखिर आधी खबरें झूठी क्यों साबित हो रही हैं? दर्जन भर मंदिर तोड़े गए, मूर्तियाँ विखंडित हुईं, और हर बार आरोपित या तो शांतिप्रिय है, या अज्ञात।

मंदिरों को तोड़ने को लिए भीड़ बुलाने के लिए अफवाह फैलाई जाती है कि ‘अरे हिन्दुओं ने शांतिप्रिय को मार दिया, क्योंकि उसने जय श्री राम नहीं बोला’। फिर अचानक से डरे हुए लोगों के हाथों में पत्थर आ जाते हैं, तलवारें आ जाती हैं और हौज़ काज़ी का दुर्गा मंदिर तोड़ दिया जाता है। उसके बाद उन्हीं हिन्दुओं का, और सारे धर्म पर एक भद्दा सा मजाक फेंका जाता है कि ‘अरे, हम मंदिर बना देंगे’। अरे दंगाइयो! तुम मंदिर क्यों बनाओगे? तुम्हारा तो मजहबी इतिहास रहा है मंदिर और मूर्तियों को तोड़ने का, चौदह सौ साल से यही तो हो रहा है। आज कानून है तो थोड़ा कम करते हो, लेकिन शिवलिंग पर पेशाब करने से लेकर, हनुमान की मूर्ति का सर तोड़ने वाले तुम्हारे ही भाई-बंधु हैं।

ये एक तय तरीके से, सामाजिक सौहार्द बिगाड़ने की राह चलते हुए राजनैतिक परिदृश्य को प्रभावित करने की एक मुहिम है। चूँकि दो बार सत्ता पाने के बावजूद, पहले से ज्यादा संख्याबल के बावजूद, हिन्दू न तो सड़कों पर दौड़ रहा है, न दंगे हो रहे हैं जो कॉन्ग्रेस और कामपंथी वामभक्त सरकारों का सिग्नेचर रहे हैं, तो इनके विचारावलंबियों ने नई तरकीब निकाली: खुद को थप्पड़ मारो और कहो कि हिन्दू ने मारा। फिर क्विंट, स्क्रॉल, एनडीटीवी आदि है ही बताने के लिए कि शांतिप्रिय को हिन्दू ने थप्पड़ मारा क्योंकि वो ‘जय श्री राम’ नहीं बोल रहा था।

उसके बाद, व्हाइट सुप्रीमैसिज्म से जूझता, बुनियादी तौर पर नस्लभेदी, साम्प्रदायिक घृणा से सना हुआ अमेरिका अपने संसद में बार-बार यह ज्ञान देता है कि भारत में शांतिप्रियों को सही तरीके से ट्रीट नहीं किया जा रहा! जहाँ भारतीय संविधान से परे जा कर, मज़हब के आधार पर सरकार छात्रवृतियाँ दे रही है, उनके जीवन को बेहतर बनाने के लिए तलाक़ जैसी कुप्रथाओं पर कानून ला रही है, अपने कोर वोटर का क्रोध झेल कर भी कट्टरपंथियों के लिए हाथ खोले तैयार है, उस पर यह आरोप! भारत के मुस्लिम हर जगह अल्पसंख्यक नहीं हैं। वस्तुतः वो दूसरे सबसे बड़े बहुसंख्यक हैं और कई राज्यों और जिलों में पूर्णरूपेण बहुसंख्यक हैं। लेकिन इन्हें राष्ट्र के स्तर पर अल्पसंख्यक मान कर योजनाएँ बनती हैं।

और ये अल्पसंख्यक क्या करता है? कश्मीर से हिन्दुओं को खदेड़ता है। फिर कैराना में वहाँ के परिवारों का वो हाल करता है कि वो एक के बाद एक पूरा इलाक़ा छोड़ने को मजबूर हो जाते हैं। ये शांतिप्रिय जहाँ बहुसंख्यक होते हैं वहाँ मेरठ के प्रह्लादनगर जैसी स्थिति पैदा होती है जहाँ शांतिप्रिय आबादी हिन्दुओं की बच्चियों को स्कूल और ट्यूशन जाते वक्त छेड़ती है, घरों के आगे गाड़ी लगाती है ताकि विवाद हो और ये अपना शक्ति प्रदर्शन कर सकें। अंततः, वो इलाक़ा भी खाली होने लगता है। ये घटनाएँ इक्की-दुक्की नहीं है, ये कहीं न कहीं होती ही रहती है। बस आप तक पहुँचती नहीं है।

इसीलिए इनकी लॉबी अब थप्पड़ मार कर विडियो बनाती है, उसमें ‘जय श्री राम’ बुलवाती है, और ख़बरें आने लगती हैं कि मोदी के शपथ ग्रहण के बाद कितने लोगों को राम के उद्घोष न करने पर हिन्दुओं ने मारा। कुछ घटनाएँ हुई हैं, सच भी हैं लेकिन वो अभी भी ‘पीटने’ तक ही सीमित हैं, लेकिन बिग बीसी जैसे मीडिया हाउस से लेकर ‘वायर’ तक अब यह प्रपंच बाँच रहा है कि ‘जय श्री राम’ तो हथियार बनता जा रहा है। सबा नकवी जैसे पत्रकार अचानक से ‘जय श्री राम’ मामलों के जानकार बन कर सामने आ रहे हैं और बता रहे हैं कि नारा तो ‘जय सिया राम’ हुआ करता था, ‘जय श्री राम’ तो ये है, और वो है!

मतलब, जिस नारे के नाम पर बम फोड़े जा रहे हैं, लोगों के ऊपर ट्रक चढ़ाया जा रहा है, मास शूटिंग हो रही हो, आत्मघाती हमले हो रहे हैं, उस ‘अल्लाहु अकबर’ नारे की व्याख्या कोई नहीं करता कि इसको चिल्लाते हुए कितने आतंकियों ने कितने बेगुनाहों की जान ली। तुलनात्मक रूप से चार लोगों को पीटना, हजारों लोगों को मौत की नींद सुला देने से ज्यादा खतरनाक है! इसी को विशुद्ध दोगलापन कहते हैं। यही कारण है कि इन लोगों को इनके हर आर्टिकल के नीचे गालियाँ ही पड़ती हैं। इनका सत्य सेलेक्टिव है, बनावटी है, और शाम तक झूठ साबित हो जाने वाला है। लेकिन शाम को ये माफी नहीं माँगते।

आख़िर इन दंगाई इमामों, मीडिया वालों और इन दंगाइयों के हिमायतियों पर कोई सही कार्रवाई क्यों नहीं होती? ये तो सीधे तौर पर देश की बुनियाद पर हमला कर रहे हैं। ये तो कैमरे के सामने टोपी पहन कर उकसाते हैं कि अगर पुलिस ने उनके बताए लोगों को गिरफ़्तार नहीं किया तो वो जुमे के दिन ऐसा करेंगे जो कभी हुआ नहीं! अबे तुम हो क्या? दो कौड़ी के दंगाई इमाम जो काली-पीली टोपी पहन कर अपने मज़हब का नाम लेकर दंगा करने की धमकी देता है? पुलिस अब इनके हिसाब से जाँच करे क्योंकि ये टोपी लगाते हैं? ये और कुछ नहीं है, यही है कि ये जो कहें वही हो वरना झारखंड की घटना पर सूरत के चौराहे पर ये निकल आएँगे और पत्थरबाज़ी से लेकर आगज़नी करते हुए पुलिस पर हमला कर देंगे।

ये सब काम नमाज के बाद होता है। आप ठहर कर सोचिए कि इतना पाक काम करने के बाद ये किस भावना से बाहर निकलते होंगे, कहाँ पड़े पत्थर उठाते होंगे, आग लगाने का सामान जुटाते होंगे और फिर पुलिस पर ही टूट पड़ते होंगे! लोग बताते थकते नहीं कि नमाज पढ़ते वक्त जो शारीरिक कार्य होते हैं, वो कितने वैज्ञानिक होते हैं और ये हिन्दुओं के योग के कितना करीब है। लोग बताते हैं कि इससे मानसिक शांति मिलती है। मैं सारी बातें मानता हूँ लेकिन मेरी समझ में ये नहीं आता कि नमाज पढ़ने के बाद कोई भीड़ पुलिस पर हमला कैसे बोल देती है!

मेरा समझ में ये नहीं आता कि एक इमाम इतना क्रोधित हो कर झूठी बात के आधार पर पुलिस और प्रशासन को धमकी कैसे देता है? मेरी समझ में ये नहीं आता कि ऐसे इमामों को इमाम किस आधार पर बनाया जाता है? ये आदमी इतना गुस्से में क्यों है? ये मज़हबी पद पर बैठा व्यक्ति आतंकियों की भाषा कैसे बोल लेता है और वृहद् समाज इसे स्वीकार कैसे लेता है? इस पर चर्चा क्यों नहीं होती कि ऐसे इमाम आख़िर एक शांतिपूर्ण मज़हब का नाम क्यों खराब कर रहे हैं। मुझे तो निजी तौर पर कई बार इस अतिशांतिप्रिय मज़हब को लेकर आंतरिक दुःख होता है कि ऐसे इमाम और ऐसे बच्चे झूठ बोल कर नाम खराब कर रहे हैं। ऐसा बिलकुल ही निंदनीय है। ऐसे इमामों पर कार्रवाई होनी चाहिए ताकि इस्लाम अपने असली रूप में बचा रहे।

जिसने हिंदुस्तान को ‘ईसाई राष्ट्र’ बनाने का ख्वाब देखा था, RSS को उससे सीखने की जरुरत नहीं Scroll

आरएसएस पर जो सबसे बड़ा आरोप विरोधियों द्वारा लगता है, और जो उसके समर्थकों की उससे सबसे बड़ी उम्मीद होती है, वह भारत को एक ‘हिन्दू राष्ट्र’ घोषित करने की मंशा का है। यह बात और है कि समर्थकों में ‘हिन्दू राष्ट्र’ का अर्थ महज़ हिंदुत्व/हिन्दू-धर्म को इस देश की प्राकृतिक आस्था और स्वभाव के रूप में स्वीकार करने का है (जोकि स्व-स्पष्ट रूप से है भी), जबकि विरोधी ‘हिन्दू राष्ट्र’ में फ़ासीवाद, मुस्लिमों का सामूहिक हत्याकाण्ड, सड़क पर मार्च करते बजरंग दल और हिन्दू युवा वाहिनी, लोगों के घर पर छापे मार कर उनके फ्रिज में प्याज-लहसुन-बीफ़ की तलाशी लेता उड़न-दस्ता देखते हैं। लेकिन स्क्रॉल वाले इन सब से आगे निकल गए हैं। वे हिन्दू-राष्ट्र के सपने से दूर जाने के लिए आरएसएस-समर्थकों को उस इंसान से ‘सीख लेने’ की सलाह दे रहे हैं, जो “एक मज़हब (ईसाईयत), एक जाति, एक राजवंश” में हिंदुस्तान का कल्याण देखता था। “एक राजवंश” के नीचे पूरे हिंदुस्तान को लाने का ख्वाब पालने वाले इंसान से स्क्रॉल का यह लेख ‘लोकतंत्र’ सीखने की भी हिमायत करता है।

‘एक टाइप का राष्ट्र’ गोम्स का सपना था, गोलवलकर का नहीं

स्क्रॉल पर लेखक पीटर रोनाल्ड डिसूज़ा जिस ‘भद्र पुरुष’ से संघ-समर्थकों को सीखने की नसीहत देते हैं, वह हैं फ्रांसिस्को लुइस गोम्स- हिंदुस्तान में पैदा हुए पुर्तगाली ‘पार्लिआमेंटेरियन’। इनके विपरीत गोलवलकर (संघ के शुरुआती सरसंघचालकों में से एक) को रखकर ज्ञान झाड़ा जाता है कि गोलवलकर की शाखाओं से निकले स्वयंसेवक भला क्या जानें पहाड़ी कला की सूक्ष्म विशिष्टताओं को, संगम तमिल साहित्य के इतिहास को और भक्ति आंदोलन को? भले ही “गोलवलकर की शाखाओं से निकले स्वयंसेवक” को, उनमें से हर एक को, उपरोक्त विषयों की जानकारी न हो, लेकिन न ही वे इनमें से किसी को नीची नज़र से देखते हैं, और न ही इन सभी के उद्गम हिन्दू धर्म से एलर्जी रखते हैं। वहीं इसके उलट महाभारत और शतरंज के हिंदुस्तानी उद्गम पर दावा ठोंक उनकी विरासत के दम पर यूरोप में अपने सुसंस्कृत होने का दावा करने वाले गोम्स ने न ही यूरोप और न ही हिंदुस्तान में हिन्दू धर्म को इनके उद्गम का श्रेय दिया। वह तो हिन्दू धर्म को मिटा कर ईसाईयत को पूरे हिंदुस्तान का एक ही मज़हब बना देने का सपना पालते थे

लोकतंत्र के लिए गोम्स का उद्धरण भी हास्यास्पद

गोवा में भाजपा जो कुछ भी कॉन्ग्रेस विधयकों को अपने पाले में करने के लिए कर रही है, उसके नैतिक या अनैतिक होने पर हर एक की दोराय हो सकती है- भाजपा समर्थकों की भी है। कुछ (लगभग) कॉन्ग्रेस-मुक्त गोवा के लिए खुश हैं, तो कुछ ‘कॉन्ग्रेस-युक्त भाजपा’ को लेकर शंकालु। लेकिन इसमें भाजपा की मुखालफत के लिए संघ और हिंदुत्व से घृणा में अंधे होकर डिसूज़ा गोम्स को उद्धृत करते हैं। क्या उन्हें पता है कि गोम्स न केवल पूरे हिन्दू समाज को ईसाई बना देने का कट्टरपंथी ख्वाब पालते थे, बल्कि लोकतंत्र नहीं, “एक राजवंश” की हिमायत करते थे हिंदुस्तानी समाज के हितों के लिए?

Goa Inquisition पर सन्नाटा

हज़ारों हिन्दुओं को ज़िंदा जला देने और शरीर छेद कर टाँग देने वाला पुर्तगालियों का Goa Inquisition शायद ईसाईयत के इतिहास के सबसे काले अध्यायों में से एक है। लेकिन बहुत ढूँढ़ने पर भी मुझे श्री गोम्स साहब का इसके खिलाफ एक भी लफ्ज़ नहीं मिला- न इसे जिस मज़हब के लिए किया गया उसके ख़िआलफ, न इसे करने वाले पुर्तगाली शासक के खिलाफ, न ही उस ‘संत’ फ्रांसिस ज़ेवियर के ख़िलाफ़, जो इसका मुख्य षड्यंत्रकारी था। निंदा करना तो दूर की बात, गोम्स तो “बिना ज़ोर-ज़बरदस्ती के” समूचे हिंदुस्तान के साथ वही करने की सलाह ब्रिटिशों को देते थे, जो पुर्तगालियों ने गोवा वालों के साथ किया। ऐसे में गोम्स के किसी भी वक्तव्य (जिनमें उपरोक्त समेत दोहरे चरित्र को दर्शाने वाले विरोधाभासी उदाहरणों की कमी नहीं है), किसी भी विचार का क्या ऐतबार?

डिसूज़ा साहब का मज़हब उन्हें इसके लिए अगर नर्क की आग में चिरकाल के लिए जला देने की धमकी न दे तो बेहतर होगा कि वह गोम्स की बजाय गर्ग संहिता, गंगापुत्र भीष्म का “शांति पर्व” और गौरांग महाप्रभु की शिक्षाओं को पढ़ें। भाजपा-संघ को झाड़ने के लिए ज्ञान का ‘कच्चा माल’ वहाँ बेहतर मिल जाएगा!

RaGa और धोनी के भक्तों को हुआ एक समान कॉन्स्टिपेशन, हार को चुपचाप गए डकार

एक महान लेखक ने एक बार अपने एक फेसबुक पोस्ट में 3 हैशटैगों के साथ लिखा था- “एक पुराने और बड़े दुःख को भुलाने का सबसे आसान तरीका यह है कि किसी दूसरे बड़े दुःख को अपना लिया जाए।”

देश का कट्टर युवा जागा ही था कि युवराज के राज्याभिषेक में बाधा आ गई। बाधा क्या आई कि युवराज नाराज ही हो गए। फरमान जारी किया गया और गाँव-नगर में ढिंढोरा पिटवाने का राज-आदेश दे दिया गया कि युवराज नाराज हैं और कई दिनों से “कॉन्गलेच के छोना बाबू थाना नहीं था रहे।” तमाम विश्लेषकों के माथे बल पड़ गया। राजनीति के गलियारों में हलचल मच गई।

इस बाबू को थाना थिलाने के प्रयोजन से कॉन्ग्रेस के ‘दद्दावरों’ को मैदान में उतारा गया, क्योंकि उनकी रगों में अभी तक एक गुलाब के फूल वाले समाजवादी नेता का नमक बह रहा था। दद्दावरों को राज धर्म निभाने का वास्ता दिया गया, नेहरूघाटी सभ्यता के दौरान खाई गई अटूट कसम उन्हें आज भी याद थी। दद्दावरों ने दाँतुन के डॉक्टर से हाल ही में लगवाए नए दाँतों का सेट मुँह में डालते हुए कहा – “हाँ हमारी ही गलती थी, आप कहें तो परिवार समेत इस्तीफ़ा आपके चरणों में बिछा दें, लेकिन आप अपना इस्तीफ़ा रोक दीजिए।”

किन्तु, छोना बाबू नहीं डिगे। दल का मनोबल टूटने लगा, दद्दा अपनी टोपी राज दरबार में ही छोड़कर भारी मन से लौटने लगे। इन सब के बीच चुपचाप जो एक घटना दम तोड़ती रही, वो थी समानांतर रूप से डीएम तोड़ती हुई कॉन्ग्रेस की लोकसभा चुनाव में हार की जलालत!

इस इस्तीफे और युवराज को मनाने के खेल से कॉन्ग्रेस को चुनाव की हार का गम भुलाने में बड़ी राहत मिली। इस सारे ‘इस्तीफ़ा प्रकरण’ के बीच कॉन्ग्रेस की हार की घटना का दुःख एक कोने में चुपचाप अपनी मौत मरता रहा। तमाम दिन तैमूर के डायपर बदलने की खबर लिखने वाली गोदी मीडिया ने भी कॉन्ग्रेस की इस हार के दुःख को प्राथमिकता नहीं दी।

एकजुट होकर सबने लोकसभा चुनाव में कॉन्ग्रेस को मिली बड़ी हार के दुःख को युवराज के इस्तीफे के दुःख में तब्दील कर दिया और दिखा दिया कि नेहरू जी के बिस्कुट में वाकई में नमक था। अब पार्टी कार्यकर्ता और तमाम वरिष्ठ-बुजुर्ग नेतृत्व की जान में जान आ चुकी है। सब अपने नकली दाँतों का सेट वापस मुँह में ठूँसकर खूब खिलखिला रहे हैं। इस ख़ुशी के शोर का कारण कॉन्ग्रेस के पार्टी प्रवक्ता बता रहे हैं कि लोकसभा सीट नहीं बचा पाए तो क्या, राहुल गाँधी जी को तो बचा लिया है। ये स्वर सुनते ही स्वर्ग में नेहरू जी की आत्मा फूट-फूटकर मुस्कुराई है।

लेकिन राहुल गाँधी को आखिरकार एक तेज दौरा इस्तीफे का फिर आया और इसमें त्यागपत्र देने से उन्हें कोई नहीं बचा पाया। सबका मनोबल सड़क पर आ गया। अब जनता को इस सदमे से भी जूझना था। बहन प्रियंका के पति और राहुल गाँधी जी के जीजा जी भी आज अश्रुपूरित चिट्ठी लिखकर अपनी अभिव्यक्ति की आजादी का इस्तेमाल कर ही चुके हैं। राहुल गाँधी भी आज घोषणा कर चुके हैं कि वो खड़े रहेंगे।
यकीन ना हो तो अपनी आँखों से देख लो –

यूनेस्को द्वारा प्रमाणित ‘बेस्ट जीजाजी’ ने राहुल को क्या लिखा पत्र में?

क्रिकेट फैंस गहरी साँसें लेकर अपनी जिम्मेदारी पर ही आगे पढ़ें

इसी बीच विश्वविजय पर निकली BCCI की क्रिकेट टीम का कारवाँ भी इंद्रदेव ने सेमीफाइनल मुकाबले में रुकवा दिया। कुछ जानकारों का तो यह भी कहना है कि मोदी जी की सरकार आने के बाद ही भारतीय क्रिकेट टीम सेमीफाइनल मुकाबले में हारी है, वरना जब-जब इस देश में कॉन्ग्रेस का शासन था, तब कभी भारतीय टीम सेमीफाइनल में नहीं हारा करती थी। लेकिन कुछ फैक्ट चेकर्स ने इस दावे में ‘राइट एंगल’ तलाशते हुए पता लगाया कि कॉन्ग्रेस के शासन के दौरान तो अपनी टीम को सीधा बांग्लादेश जैसी अल्पविकसित टीम से हार मिली थी और उसके हाथों भारतीय क्रिकेट टीम को वर्ल्ड कप मुकाबले से बाहर होना पड़ा था। यह वर्तमान हार से कहीं ज्यादा ‘अपमानास्पद’ था।

सेमीफाइनल में मिली हार को पचाने के लिए फेसबुक के कुछ प्रगतिशील लेखक भी आगे आए। उन्होंने इस हार के बाद अपनी दिल की कलम से तुरंत पाकिस्तान पर सर्जिकल स्ट्राइक करते हुए यहाँ तक लिख दिया-

“सुन ले पाकिस्तान! कुछ तो बात है टीम इंडिया के फ़साने में
2 दिन लगते हैं तुम्हारे बाप को हराने में।”

खैर, अब नया चैलेंज वर्ल्ड कप से बाहर होने के गम से भी बाहर निकलने का था। इस बीच व्हाट्सएप्प यूनिवर्सिटी पर एक खबर आग की तरह फैला दी गई- “महेंद्र सिंह धोनी क्रिकेट को कहेंगे अलविदा।”

करुण रस में डूबी हुई इन पंक्तियों को पढ़ते ही कट्टर फैन के कानों से लहू दौड़ने लगा। धोनी फैंस घर से नंगे पाँव निकल पड़े। क्रांति का सैलाब सोशल मीडिया पर जमकर बहा। चारों ओर “नहीं धोनी, नहीं धोनी” की चीत्कार सुनाई देने लगी। हालाँकि, अब तक तो कम से कम धोनी को क्रिकेट से इस्तीफा देने से रोक लिया गया है। क्रिकेट के यूट्यूब पर रन बनाने वाले कुछ विश्लेषकों का तो यहाँ तक भी कहना है कि धोनी के आखिरी ओवरों के स्ट्राइक रेट को ध्यान में रखते हुए उन्हें अपने इस्तीफे पर दोबारा विचार करना चाहिए।

फैंस, चाहे राहुल गाँधी के हों या फिर धोनी के, हर जगह जीतते नजर आ रहे हैं। ‘वो’ युवराज को कॉन्ग्रेस में बने रहने के लिए मना चुके हैं और ‘ये’ धोनी को जमे रहने के लिए! इस बीच ख़ुशी की एक बात यह है कि इस्तीफे की आड़ में हम लोग 2 बड़ी हारों को चुपके से डकार गए। उस लेखक की कालजयी पंक्तियाँ बरबस याद आ रही हैं जिसने कहा था- “एक पुराने और बड़े दुःख को भुलाने का…”

मुरादाबाद के एक गॉंव में नाइयों की दादागिरी, दलितों की बाल-दाढ़ी बनाने से इनकार

उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद का गॉंव पीपलसना। इस गॉंव के मजहब विशेष के नाइयों ने दलितों की बाल-दाढ़ी बनाने से इनकार कर दिया है। नाइयों का कहना है कि दलितों की बाल-दाढ़ी नहीं बनाने का सिलसिला काफी पहले से चला आ रहा है और आगे भी चलता रहेगा।

समुदाय विशेष के नाइयों ने न केवल खुद दलितों की बाल-दाढ़ी बनाने से मना किया है, बल्कि जो उनकी बाल-दाढ़ी बनाते हैं उनकी दुकान बंद करवा देते हैं। इससे आजिज आकर गांव के दलितों ने भोजपुर थाने में शिकायत दर्ज कराई है। पुलिस ने मामले की जॉंच के लिए टीम का गठन किया है। पुलिस का कहना है कि आरोप सही पाए जाने पर उचित कार्रवाई की जाएगी।

गाँव के दलित समुदाय के बुजुर्गों का कहना है कि यह भेदभाव वे अरसे से झेलते आ रहे हैं। लेकिन, चाहते हैं कि उनकी नई पीढ़ी को इससे आजादी मिले। इसलिए जाति के आधार पर भेदभाव अब खत्म होना चाहिए।

पीड़ितों का आरोप है कि यहाँ लोग पढ़-लिख जरूर गए हैं, लेकिन अपनी पुरानी सोच बदलने को तैयार नहीं हैं।
इंडिया टुडे की खबर के मुताबिक गाँव के कल्लन ने बताया कि वे लोग दलितों से नफरत करते हैं इसलिए अपनी दुकानें बंद कर रखी हैं। वे उन लोगों के बाल नहीं काटते। जिसके कारण उनके घर कोई रिश्तेदारी नहीं करता, कोई लड़की नहीं देता और बेतरतीब बाल-दाढ़ी के कारण उनसे घृणा करते हैं।

आरोपित नाइयों के अनुसार पहले गाँव के दलित बाहर से बाल कटा के आ जाया करते थे, लेकिन अब वे यहाँ बाल कटाने पर अमादा हैं। एक ग्रामीण के मुताबिक नाई समाज का ये मानना है कि अगर वे दलितों के बाल काटेंगे तो उनके यहाँ समुदाय विशेष वाले बाल नहीं कटवाएँगे और अगर वे दलितों के बाल नहीं काटते तो वे प्रशासन से उनकी शिकायत कर देंगे।

इस मामले में स्थानीय निवासी नौशाद ने इंडिया टुडे को बताया कि दलित पहले कभी भी गाँव में नाई की दुकान पर नहीं जाते थे। वे बाल कटाने और दाढ़ी बनवाने के लिए भोजपुर जाया करते थे।

नौशाद के मुताबिक जब पुलिस ने नाइयों को हिरासत में लिया उस समय उन्हें अंदाजा भी नहीं था कि गाँव के दलितों ने उनके ख़िलाफ़ शिकायत की है। उनका कहना है कि उन्होंने अपने 45 साल की उम्र में किसी दलित को गाँव की दुकानों पर बाल कटाते नहीं देखा। उनका कहना है, अगर दलित गाँव की इन दुकानों पर आकर बाल कटाएँगे और दाढ़ी बनवाएँगे तो तौलिए गंदे हो जाएंगे , फिर बाद में उनके मजहब वाले कैसे अपने बाल बनवाएँगे ?

अली अहमद का कहना है कि इस गाँव में 95 प्रतिशत समुदाय विशेष से हैं। आज दलित नाई की दुकान में जाने की माँग कर रहे हैं, कल को शादी-घर बुक करने की माँग करेंगे। ये लोग यहाँ अराजकता पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं। यहाँ दशकों से शांति बनी हुई थी। इस मामले को गलत मकसद से हवा दी जा रही है।

यूनेस्को द्वारा प्रमाणित ‘बेस्ट जीजाजी’ ने राहुल गाँधी को लिखा भावुक पत्र

राहुल गाँधी द्वारा कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष पद से इस्तीफ़ा देने के बाद उनकी बहन के पति रॉबर्ट वाड्रा ने उनके लिए सोशल मीडिया पर एक पोस्ट लिखा है। इस पोस्ट में जमीन घोटाले के आरोपित वाड्रा ने राहुल की तारीफ़ करते हुए उन्हें यूथ आईकन, साहसिक और जमीनी नेता बताया है।

राबर्ट ने अपने फेसबुक पर लिखा, “राहुल, मुझे आपसे सीखने को बहुत कुछ मिला है। हमारे देश में लगभग 65 प्रतिशत युवा (45 साल से कम उम्र के) हैं, जो आपके मार्गदर्शन में विश्वास रखते हैं। आपने अपने बेहद साहसिक और दृसंकल्पित व्यक्तित्व का परिचय दिया है। आपका जमीनी स्तर पर काम करने का और देश की जनता से और करीब से जुड़ने का निश्चय बहुत ही सराहनीय है। आपके इस कदम में मैं आपके साथ हूँ क्योंकि जनसेवा किसी पदवी की महोताज नहीं होती।”

बता दें कि रॉबर्ट वाड्रा से पहले उनकी पत्नी प्रियंका गाँधी ने भी राहुल के इस्तीफ़े पर प्रतिक्रिया देते हुए उनकी तारीफ़ की थी और कहा था,”आपने जो किया है, ऐसा करने का साहस कम ही लोग दिखा पाते हैं, आपके निर्णय के प्रति गहरा सम्मान।”

गौरतलब है कि पिछले दिनों लोकसभा चुनाव में पार्टी को मिली करारी शिकस्त के बाद राहुल गाँधी ने खुद को हार का जिम्मेदार ठहराया था और आहत होकर कॉन्ग्रेस हाईकमान के सामने अपना इस्तीफ़ा पेश किया था। हालाँकि उस समय उनके इस्तीफ़े को स्वीकार नहीं किया गया। लेकिन कुछ दिन बाद 4 जुलाई को उन्होंने ट्विटर के जरिए अपने पद से इस्तीफ़ा देने की जानकारी दी थी और बताया कि वे अब कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष नहीं हैं।