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जब स्वघोषित लिबरलों के फ़र्ज़ी नैरेटिव ने हत्याएँ करवाई, मंदिर तुड़वाए, दंगे भड़काए

श्री अमिताभ बच्चन जी का एक गीत बहुत लोकप्रिय हुआ था जिसमें वो जुम्मे के दिन चुम्मा देने के लिए नायिका को याद दिलाते हैं। ये बहुत ही सुंदर अभिव्यक्ति है और जुम्मे को हमेशा के लिए भारतीय जनमानस के भीतर चुम्मे के साथ लॉक कर दिया श्री बच्चन ने। लेकिन कालांतर में जब से लिबरलों के हाथ ट्विटर नामक उस्तरा लगा है, इन लोगों ने जुम्मे के दिन को भारत के अलग-अलग जगहों में हिंसा करने के लिए फर्जी नैरेटिव का अतिप्रज्जवलनशील इंधन देकर भीड़ों को उकसाया है।

चाँदनी चौक इलाके में, हौज काजी नामक जगह है जहाँ हाल ही में दुर्गा मंदिर को तोड़ा गया, मूर्तियाँ उखाड़ी गईं, और कुछ लोगों के अनुसार मूर्ति पर पेशाब भी किया गया। ‘अल्लाहु अकबर’ के नारे लगे और भीड़ ने इन्हीं लिबरलों की फर्जी कहानीकारी को सत्य मान कर मंदिर तबाह कर दिया। बाद में इन्हीं रक्तपिपासु लिबरपंथियों ने यह नैरेटिव बनाया कि वो विवाद तो पार्किंग का था, साम्प्रदायिक नहीं।

स्वराज्य की पत्रकार स्वाति गोयल ने जब लोगों से बातचीत की तो एक जाहिद नाम के व्यक्ति ने जो बात कही वो साबित करती है कि इन लिबरपंथियों ने कितनी जानें कट्टरपंथियों को उकसा कर ले ली हैं। जाहिद ने कहा, “पूरे देश में मुस्लिमों की हर जगह भीड़ हत्या हो रही है और हमारा समुदाय ऐसे ही चुप नहीं बैठेगा।” ये जो मंदिर टूटा, उसके लिए जो भीड़ इकट्ठी हुई, वो किसी पार्किंग विवाद के नाम पर नहीं आई थी, उस गली में यह बात फैलाई गई कि एक मुस्लिम को मार दिया गया है क्योंकि उसने ‘जय श्री राम’ नहीं बोला।

ये शक्ति है नैरेटिव की। जिस प्रभाव की बात करते यह गिरोह और पत्रकारिता का समुदाय विशेष थकता नहीं है कि गौरक्षकों द्वारा छिट-पुट हिंसा की घटनाएँ इसलिए हो रही हैं क्योंकि इन अपराधियों को लगता है कि पावर में उनका अपना आदमी है। अगर यह बात सच भी मान ली जाए, तो क्या यही कपटी विचारक समाज को यह बताएँगे कि उनके द्वारा हर झूठ को, रैंडम अफवाहों को, छिट-पुट आपराधिक घटनाओं को मोमो के स्टॉलों की तरह हर नुक्कड़ पर होता हुआ बता देना क्या हिन्दुओं की हत्या नहीं करवा रहा? क्या ये धूर्त पत्रकार और लिबरल गिरोह हिन्दुओं की भीड़ हत्या का रक्त अपने हाथों पर लेगा या फिर ‘लहू मुँह लग गया’ गा कर एन्ज्वॉय करेगा?

जय श्री राम न कहने पर युवक की पिटाई‘ की खबरें खूब उछाली जा रही हैं। और जैसे-जैसे इन खबरों को ये गिरोह हवा देकर, साम्प्रदायिकता के मामले में संवेदनशील होने का दावा करते हुए शेयर करता है, इन दोगले विचारकों का लक्ष्य संवेदना नहीं, हिंसा होती है कि कहीं कोई ‘शांतिप्रिय’ जुम्मे की नमाज के बाद भीड़ बना कर निकले और किसी पर हमला करे।

क्योंकि आंदोलन तो वही सफल कहे जाते हैं जब दलितों की एक भीड़ इस अफवाह पर इकट्ठा होती है कि मोदी आरक्षण हटा रहा है और आगजनी, हिंसा और तोड़फोड़ के साथ 8 लोग मार दिए जाते हैं। वैसे ही इस नैरेटिव के बल पर सत्ता से दूर बैठा पत्रकार और पद्म पुरस्कारों को अपनी बपौती मानने वाले गैंग के सदस्य, चाहते हैं कि खूब साम्प्रदायिक माहौल हो, तनाव फैले और फिर यही लोग ट्विटर पर भारत की कानून व्यवस्था पर लेक्चर दें।

आप इन चम्पकों की कार्यशैली पर ध्यान दीजिए। एक सामाजिक अपराध कहीं हुआ, ये गिरोह सक्रिय हो जाता है। सबसे पहले यह गिरोह सूक्ष्मदर्शी से देखता है कि शिकार कौन है। अगर मतलब का शिकार, यानी मजहब विशेष से या दलित नहीं है, तो ये गालिब की शायरी से लेकर समुद्र के सामने डूबते सूरज की लालिमा पर कविता से लेकर पाउट वाली सेल्फी और बारिश की बूँदों पर कविताएँ करने लगता है।

अगर शिकार कथित अल्पसंख्यक या दलित है, तो अपराधी के नाम में पहचान ढूँढी जाती है। समुदाय विशेष वाले ने आने ही समुदाय के शख्स को मारा, तो ये मुन्नी बेगम की ग़ज़लें गाने लगते हैं। दलित ने दलित को मारा, तो ये भारतीय नारी किस-किस से, कितनी बार, और कब-कब सेक्स करे, इस चर्चा में लीन हो जाते हैं। अगर मरने वाले का नाम पता हो, लेकिन मारने वाले का नहीं, तो आँख मूँद कर आरएसएस से लेकर मोदी तक को इसकी जिम्मेदारी दे दी जाती है और इन विचारधाराओं के समर्थक इसी में व्यस्त हो जाते हैं कि ‘नहीं, हमने नहीं किया।’ ऐसा इतनी बार हुआ है कि हमें हालिया घटनाओं की लिस्ट बनानी पड़ी, जहाँ हिन्दुओं को हेट क्राइम का भागीदार बना दिया गया, जबकि मसला कुछ और ही था।

उसके बाद आता है वो मसला जब अपराधी सवर्ण हो, हिन्दू हो। ऐसे अपराधों का धर्म या मजहब से कोई मतलब न भी हो, तो भी अपराधी के किसी खास धर्म से होने के कारण ही उसे मजहबी घृणा के अपराध या हेट क्राइम के रूप में दिखाने के लिए ट्वीट पर ट्वीट, लेख पर लेख, और पोस्ट पर पोस्ट इस तरह से किए जाते हैं जैसे दिल्ली के प्रॉप्रटी डीलर ‘रूम ही रूम’ और ‘फ्लोर ही फ्लोर’ का दावा करते रहते हैं। फिर इनका गिरोह संगठित रूप से बताता है कि भारत का शांतिप्रिय डरा हुआ है और उस पर बहुसंख्यक अत्याचार कर रहे हैं।

जुम्मे की नमाज के बाद, झारखंड में कथित तौर पर चोरी करते पकड़े जाने पर तबरेज की भीड़ हत्या के विरोध में सूरत में इस्लामी भीड़ जमा हो जाती है, जिसे प्रशासन ने प्रदर्शन की अनुमति नहीं दी थी। ये भीड़ इसी कथित मॉब लिंचिंग को परम सत्य मान कर पुलिस पर पत्थर फेंकती है, दंगा करती है, उत्पात मचाती है और पाँच पुलिस वालों को घायल करने के साथ आगजनी से वाहनों को नुकसान पहुँचाती है।

मजहब विशेष के दो लड़के, आपस में ही ‘जय श्री राम’ बुलवाने का विडियो बना लेते हैं, और फिर लिबरलों को चरमसुख की सामग्री मिल जाती है। वो ‘आह अल्पसंख्यक, हाय अल्पसंख्यक’ करते हुए बताने लगते हैं कि एक धार्मिक नारे को हथियार बनाया जा रहा है, और देश का शांतिप्रिय डरा हुआ है। अरे भाई, शांतिप्रिय क्या खाक डरेगा! पचास घटनाएँ तो 2016 के बाद से दिन और समय के साथ गिना दूँगा, जहाँ इनके तथाकथित मजहबी उसूलों ने लोगों की जानें ले लीं, दंगे करवाए, हिंसा की और समाज में खौफ का माहौल बनाया।

‘डर का माहौल’ जानना है आपको? कैराना याद है? मेरठ के प्रह्लादनगर की दीवारें देखी हैं? कश्मीर याद है? ‘डर का माहौल’ यह है कि हिन्दू अपनी बेटी को स्कूल नहीं भेज पाता क्योंकि समुदाय विशेष के इलाके में उस बच्ची पर फब्तियाँ कसी जाती हैं। लोग अपने दीवारों पर ‘यह मकान बिकाऊ है’ लिख कर क्यों जा रहे हैं? वो क्या प्रेम का माहौल है कि जुम्मे को आकर कोई चुम्मा दे जाएगा?

ये लिबरल गिरोह ‘डर का माहौल‘ बोल कर जस्टिफाई करता है। ये बताता है कि अगर कट्टरपंथी बम बाँध कर खुद को उड़ा न दे तो बेचारा क्या करे! ये बताता है कि फलाँ आतंकी का बाप हेडमास्टर था! ये बताता है कि अहमद डार को सेना के अफसर ने उठक-बैठक कराई थी, तो उसने आरडीएक्स से भरी गाड़ी पुलवामा में भिड़ा दी। ये लिबरल हैं हमारे देश के जो न सिर्फ मजहब विशेष के लोगों को भड़काते हैं, बल्कि ये सुनिश्चित करते हैं कि वो अपराध करने के बाद भी सजा न पाए। सजा पाए, तो उसे मानवीय बताने की कोशिश की जाती है।

असली अपराधी तो यही गिरोह है जो संवेदनशीलता की आड़ में दंगाई बना बैठा है। चाहे ‘जय श्री राम’ कहलवाने की घटनाएँ हों, या भीड़ हत्या, जिसका कारण मजहब न रहा हो, ये गिरोह उसमें मजहब डालता है, माहौल बनाता है, उकसाता है, और दंगे कराता है।

हम तो रिपोर्ट करते हैं कि फलाँ इलाके में ये घटना हो गई। जबकि वो घटना सच होती है, फिर भी यह कहा जाता है कि ऑपइंडिया घृणा बाँट रहा है। हम तो नैरेटिव नहीं बनाते, हम तो बस रिपोर्ट करते हैं कि फलाँ आदमी ने फलाँ अपराध किया। ये तो तथ्य हैं। लेकिन लोगों को इससे भी समस्या है कि हम खबरें ही क्यों करते हैं। तो क्या करें, ये बताएँ कि वो नमाज पढ़ रहा है और लोगों से तीन बार गले मिल रहा है? अगर वो एक बच्ची का रेप करेगा तो बिलकुल लिखा जाएगा कि फलाँ आदमी ने रेप किया। अगर मजहब विशेष गाय काटेगा ताकि हर्ष विहार में तनाव फैले, तो बिलकुल लिखा जाएगा कि इमरान ने गाय काटी

लेकिन ये गिरोह चाहता है कि ऐसी रिपोर्ट ही न की जाए। कठुआ वाले रेप पर ये जरूर कहो कि हिन्दुओं ने मंदिर में रेप किया, लेकिन गाजियाबाद में मौलवी मदरसे में रेप करे तो वहाँ ‘समुदाय विशेष’ लिखो, या बेहतर है कि रिपोर्ट ही न करो। क्यों? क्यों रिपोर्ट न करें? क्या हम इंतजार करें कि ये धूर्त लिबरल जो नैरेटिव चलाएगा तब हम भी तख्ती लेकर मोमबत्ती निकाल कर खड़े हो जाएँ?

ये दोगलापन नहीं चलेगा। तुम्हारे नैरेटिव से लोगों की जानें जा रही हैं, मंदिर तोड़े जा रहे हैं, हिन्दुओं को काटा जा रहा है और तुम इस पर अश्लील हँसी हँसते हो। तुम्हारे नैरेटिव से दंगाई सड़कों पर घूमता है क्योंकि सरकारें इस हिंसक भीड़ को पुलिसिया प्रक्रिया से इसलिए मुक्त कर देती हैं ताकि इनका विश्वास जीत सके। हम समझते हैं ये प्रेशर टैक्टिक। हम समझते हैं तुम्हारी ओपिनियन मार्केटिंग। हम समझते हैं तुम्हारा दोगलापन।

यही कारण है कि तुम्हारी हर नैरेटिव पर मुखरता से, बिना लाग लपेट के, रॉ फॉर्म में रिपोर्टिंग की जाएगी। समुदाय विशेष के शब्दों के पीछे की बेहूदगी खत्म होगी और इस भीड़ को लिबरलों के प्रोटेक्शन से मुक्त किया जाएगा।

सत्ता से तो तुम दूर हो चुके हो लेकिन फकफकाना बंद नहीं हुआ है। इसलिए सस्ते इंटरनेट का सहारा लेकर, व्हाट्सएप्प यूनिवर्सिटी के माध्यम से गलत सूचनाओं के द्वारा, भीड़ों को उकसाना जब तक जारी रहेगा, हम तुम्हारी नग्नता लोगों को बताते रहेंगे।

तुम्हारे पिया मिलन की रात तो मोदी के दोबारा चुने जाने पर भी नहीं आ पाई, जब तुमने सोचा था कि मोदी आएगा तो हिन्दू सड़कों पर तलवार लिए दौड़ेंगे, दंगे होंगे। वैसा हुआ नहीं तो पाँच सालों तक तुमने खूब कोशिश की कि दंगें फैलें, गैरभाजपा शासित प्रदेशों में हुई हत्याओं का ठीकरा, दंगों का भार भी मोदी के सर पर फेंका, समुदाय विशेष को बताते रहे कि तुम्हारे समुदाय को सताया जा रहा है, मारा जा रहा है।

तुमने ये सब बस इसलिए किया और आज भी कर रहे हो ताकि एक भयंकर-सी आग फैले और किसी कोने में तुम्हारा पिया मिलन हो सके। वो पिया मिलन तो हो नहीं पा रहा, और तुम्हारे भीतर की फ्रस्ट्रेशन बढ़ती जा रही है। ये अभी और बढ़ेगा क्योंकि तुम्हारे एकाधिकार वाले क्षेत्र में और लोग भी आ गए हैं जिन्हें लिखना भी आता है, बोलना भी आता है, और समुदाय विशेष का खुलकर जिक्र करना भी आता है।

न्यूजलॉन्ड्री की बेशर्मी: दूसरे मजहब को पाक-साफ बताने के लिए हिन्दू युवक के अगवा होने की खबर पर उठाए सवाल

दिल्ली के चाँदनी चौक इलाके के हौज काजी में 30 जून 2019 को जो कुछ हुआ उसने ‘गंगा-जमुनी तहजीब’ के घिनौने चेहरे को बेनकाब कर दिया। इस्लामी भीड़ ने हौज काजी के एक मंदिर में घुसकर न सिर्फ मूर्तियों को तोड़ा बल्कि कथित तौर पर मंदिर में पेशाब की। इस विवाद की शुरुआत पार्किंग को लेकर झगड़े से हुई। स्थानीय हिन्दुओं का कहना है कि जिस हिन्दू व्यक्ति के साथ पार्किंग को लेकर बहस हुई थी उसे पीटा गया और उसके घर की महिलाओं को बाहर खींचकर प्रताड़ित किया गया।

सांप्रदायिक तनाव के बीच एक 17 साल के हिन्दू लड़के के गायब होने की खबर दबा दी गई। घटना के तीन दिन बाद जब 2 जुलाई को मैं इस इलाके में पहुँची तो स्थानीय हिन्दू खौफजदा थे। एक कोने में गायब हुए लड़के की माँ एफआईआर के साथ बेटे का रस्ता ताक रही थी। लड़के के पिता बेटे के नहीं मिलने पर अपनी जान देने की बात कर रहे थे।

मुस्लिम बहुल आबादी से घिरी उस छोटी सी हिन्दू बस्ती के लोगों के साथ की गई ज्यादतियों का हमने ब्यौरा जुटाया और उस घटना को लेकर दुसरे समुदाय का पक्ष भी जाना।

हालॉंकि, लड़के के गायब होने की खबर को मीडिया में पर्याप्त जगह नहीं दी गई। अब हिन्दुओं के खिलाफ होने वाली ज्या​दतियों की अनदेखी के लिए कुख्यात वेबसाइट न्यूजलॉन्ड्री ने एक रिपोर्ट प्रकाशित कर इसे झूठा साबित करने की कोशिश की है। वेबसाइट की लेख का शीर्षक है, “मुस्लिम भीड़ द्वारा एक लड़के को अगवा करने की खबर फुस्स”। वीना नायर ने यह रिपोर्ट लिखी है। लेख में उन्होंने ऑपइंडिया की रिपोर्ट के मकसद पर सवाल उठाते हुए कहा है कि आखिरकार जब लाल कुँआ में हालात पूरी तरह सामान्य हो चुके थे तो लड़का कैसे ‘अगवा’ किया जा सकता है।


NewsLaundry headline

न्यूजलॉन्ड्री की रिपोर्ट में कहा गया है कि ऑपइंडिया ने लड़के के अगवा होने का दावा किया था और लड़के के घर लौटने के बाद उसके इस दावे की हवा निकल गई है। एक बेहद असंवेदनशील टिप्पणी में न्यूजलॉन्ड्री ने कहा है कि-

पहले यह साफ कर दूँ कि ऑपइंडिया ने अपनी तरफ से कुछ भी ‘दावा’ नहीं किया है। हमने एफआईआर के आधार पर केवल सूचनाएँ दी न कि उसे बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया।


FIR filed by Keshav’s parents

न्यूजलॉन्ड्री का कहना है कि उनका रिपोर्टर 3 जुलाई को हौज काजी गया था। सांप्रदायिक तनाव में हालात करीब-करीब हर घंटे बदलते रहते हैं। ऐसे में न्यूजलॉन्ड्री का यह दावा कि ऑपइंडिया ने लड़के के गायब होने की खबर तब की जब “सब कुछ नियंत्रण में था” बेवकूफाना है। दो जुलाई को जब मैं मौके पर थी, हिन्दुओं और समुदाय विशेष के बीच मार-पीट होते-होते बची थी। जब गायब लड़के का पिता अपना दर्द बता रहा तो वहाँ पर इकट्ठा होकर दुसरे समुदाय ने ‘अल्लाहु अकबर’ के नारे लगाने लगे। इसके जवाब में पहले से ही उत्तेजित और घबराए हिन्दुओं ने भी ‘जय श्री राम’ के नारे लगाए। लाल कुँआ की गली में वाहनों के प्रवेश पर प्रतिबंध था और जगह-जगह बैरीकेड लगे थे। इलाके के बहुसंख्यक मजहब के समूहों में खड़े होकर हालात पर चर्चा के सिवा कोई और बात नहीं कर रहे थे। दूसरी ओर हिन्दू भी उस दुर्गा मंदिर में जिसमें तोड़-फोड़ की गई थी के सामने वाली गली में अपने तरीके से विरोध जता रहे थे।

इसमें कोई दो मत नहीं है कि लड़का गायब था। केशव सक्सेना को सांप्रदायिक हिंसा के तीन दिन बाद तक भी उसके माँ-बाप ने नहीं देखा था। यह लड़का आखिरकार तीन तारीख की शाम को अपने घर पहुँचा, यानी तनाव के चौथे दिन। यदि हौज काजी में हालात सामान्य होने का न्यूजलॉन्ड्री का दावा सही भी है (जैसा है नहीं), तो भी क्या लड़के के गायब होने की खबर को अन्य मीडिया संस्थानों की तरह ऑपइंडिया को भी दबा देनी चाहिए थी?

न्यूजलॉन्ड्री के लेख का मुख्य मकसद हौज काजी की सच्चाई बयाँ करने वाले रिपोर्टों का माखौल उड़ाने के साथ-साथ लड़के के खुद गायब होने की कहानी को हवा देकर उसके माता-पिता के दुखों का बेशर्मी से मजाक उड़ाना भी है। रिपोर्ट में कहा गया है, “एफआईआर के अनुसार भीड़ ने मंदिर में तोड़-फोड़ की और रात के 11.30 बजे लड़के को “अगवा” कर लिया। पुलिस और चश्मदीदों के अनुसार मंदिर में तोड़-फोड़ आधी रात के बाद की गई। लड़के ने खुद कहा है कि वह सुबह के 10.30 बजे अपनी गली से बाहर गया था। किसी मीडिया संस्थान ने इन विसंगतियों पर गौर नहीं किया।”

ऐसे में हर किसी को उस हालात पर गौर करना चाहिए जिसमें एफआईआर दर्ज कराई गई। खून की प्यासी हिंसक इस्लामी भीड़, जिसने मंदिर में तोड़-फोड़ और कथित तौर पर मंदिर में पेशाब की, मूर्तियाँ तोड़ दी। स्थानीय हिन्दुओं का कहना है कि गली का मुख्य दरवाजा समय रहते बंद नहीं किया गया होता तो वे मारे गए होते। ऐसे हालात में एक 17 साल का लड़का गायब हो जाता है। अपने बच्चे के गायब होने का दावा करने वाले माता-पिता को झूठा और ऑपइंडिया जैसे पोर्टल तथ्यों की पड़ताल नहीं करते, यह साबित करने के लिए न्यूजलॉन्ड्री की रिपोर्ट में एफआईआर में दर्ज समय की विसंगतियों का सहारा लिया गया है। ऐसा करके अपरोक्ष तौर पर यह कहने की कोशिश की गई है कि यदि ऑपइंडिया ने “तथ्यों” पर गौर किया होता तो लड़के के गायब होने की ​रिपोर्ट नहीं करता।

अब, यह तर्क दिया जा रहा है कि माँ-बाप को दिनभर केशव सक्सेना की खबर नहीं थी। इसलिए, सामुदायिक तनाव के दौरान जब उन्हें लगाा कि उनका बच्चा गायब है, वे उसके सकुशल होने को लेकर व्याकुल हो गए। एफआईआर में गायब होने का जो समय बताया गया है उससे उनकी यही चिंता झलकती है।

शायद, अपने बच्चे के गायब होने पर चिंतित और नाराज माँ की आड़ लेकर न्यूजलॉन्ड्री यह कहने की कोशिश कर रहा है कि बच्चे के गायब होने के मामले की रिपोर्टिंग होनी ही नहीं चाहिए थी।

जबकि, न्यूजलॉन्ड्री की रिपोर्ट खुद यह बताती है कि उस दिन समुदाय विशेष ने केशव सक्सेना की भी पिटाई की थी। जैसा कि ऑपइंडिया की रिपोर्ट भी बताती है कि लड़के ने बताया कि समुदाय विशेष के कुछ लोगों ने उससे पूछा कि क्या वह दुर्गा मंदिर वाली गली में रहता है और क्या वह हिन्दू है। जब उसने हिन्दू होने की बात बताई तो उसे पीटा गया। न्यूजलॉन्ड्री की रिपोर्ट में भी इसका उल्लेख है कि पार्किंग विवाद के बाद जब भीड़ इकट्ठा होने लगी तो कुछ लड़कों ने (जो शायद मुस्लिम थे) केशव को पीटा। वह उसी वक्त भाग खड़ा हुआ।

न्यूजलॉन्ड्री की रिपोर्ट में जो तथ्य पेश किए गए हैं वे भी बताते हैं कि लड़के का गायब होना हौज काजी में सांप्रदायिक तनाव से जुड़ा हुआ है। माँ ने जब एफआईआर दर्ज कराई तब उनका यह दावा कि सांप्रदायिक तनाव की वजह से उनका बेटा गायब हुआ है, गलत नहीं था। न्यूजलॉन्ड्री को खुद से यह पूछना चाहिए कि खून-खराबे के ऐसे हालात में एक माँ अपने बच्चे के गायब होने का भला और क्या कारण समझ सकती थी। क्या यह कि उसका बच्चा घर से भाग गया है? या यह कि वह अपने दोस्तों के साथ खेल रहा होगा? किसी माँ-बाप के लिए यह सोचना कैसे असामान्य हो सकता कि उनका बच्चा उन्मादी भीड़ के हत्थे चढ़ गया होगा?

पर न्यूजलॉन्ड्री की बेशर्मी देखिए, वह केशव की माँ मोना से सवाल कर रहा है कि उसने ऐसा क्यों सोचा कि समुदाय विशेष की भीड़ ने उसके बेटे को अगवा कर लिया। इसके अलावा वह उस वक्त और क्या सोच सकती थी? जरा सोचिए, घर लौटने के बाद केशव के अलग बयान के बावजूद क्या मीडिया का काम अगवा होने की रिपोर्ट करना नहीं है? क्या बच्चे के लौट आने का हवाला देकर मीडिया यह कह सकती है कि गायब होने की एफआईआर का उल्लेख नहीं किया जाना चाहिए था?

यहाँ यह पूछा जाना भी मुनासिब है कि यदि हिन्दुओं की एक भीड़ मस्जिद में तोड़-फोड़ करे और इस दौरान एक मुस्लिम दंपती अपने बच्चे को भीड़ द्वारा अगवा करने का दावा करते हुए एफआईआर दर्ज कराए, तब भी मीडिया उस एफआईआर की रिपोर्टिंग पर इसी तरह शर्मिंदगी महसूस करेगी?

दिलचस्प यह है कि हिन्दू बच्चे के गायब होने की एफआईआर की ऑपइंडिया की रिपोर्ट को नीचा दिखाने की कोशिश कर रही न्यूजलॉन्ड्री को मुस्लिम संगठनों मसलन, ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (एआईएसए), अमन बिरादरी और कारवां-ए-मोहब्ब्त की एफआईआर पर कोई एतराज नहीं है।

न्यूजलॉन्ड्री की रिपोर्ट कहती है:-

नतीजतन, ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (एआईएसए), अमन बिरादरी और कारवां-ए-मोहब्ब्त के प्रतिनिधियों ने हौज काजी थाने में गलत सूचनाएँ फैलाने के लिए मीडिया संस्थानों के खिलाफ शिकायत की। शिकायत में विशेष रूप से ऑर्गेनाइजर की रिपोर्ट का उल्लेख करते हुए यह आरोप लगाया गया है कि वह “हिंदुओं और मुस्लिमों के बीच दुश्मनी और दुर्भावना” को बढ़ावा दे रहा है। शिकायत में टाइम्स नाउ, बिजनेस स्टैंडर्ड और हिन्दुस्तान टाइम्स जैसे संस्थानों का उल्लेख करते हुए कहा गया कि वे मंदिर में तोड़-फोड़ करने के मामले में संलिप्त लोगों की संख्या को “बढ़ा-चढ़ाकर” पेश कर रहे हैं।

दिल्ली पुलिस के डीसीपी (सेंट्रल) मंदीप सिंह रंधावा से शिकायत की गई और उन्होंने सब कुछ नियंत्रण में होने का भरोसा दिलाया। उन्होंने कहा, “मैं इसे सांप्रदायिक नजरिए से नहीं देखता। मेरा काम सच और झूठ का पता लगाना है और हम ऐसा ही करेंगे।”

दिलचस्प यह है कि न्यूजलॉन्ड्री की रिपोर्ट के अनुसार हिन्दू बच्चे के गायब होने की रिपोर्ट उसके माता-पिता द्वारा दर्ज कराना “सांप्रदायिक” है, लेकिन उसी रिपोर्ट में मंदिर में तोड़-फोड़ करने वालों के बारे में बढ़ा-चढ़ाकर तथ्य पेश करने का दावा करने वाली शिकायत “हकीकत”?

मंदिर में तोड़-फोड़ करने वाली मुस्लिम भीड़ और हिन्दुओं के पक्ष की रिपोर्टिंग को “हिन्दुओं और मुस्लिमों के बीच वैर बढ़ाने वाला” बताना बेशर्मी की हद है। जब एक मंदिर में तोड़-फोड़ हुई हो तो हम किस सद्भाव की बात कर रहे हैं? यकीनन, न्यूजलॉन्ड्री को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। जैसा उनकी रिपोर्ट से भी जाहिर है।

क्या न्यूजलॉन्ड्री यह चाहता है कि यह सब देखने के बाद हम भी उसकी तरह चुप रहें? एक गायब बच्चे के माँ-बाप जो कह रहे हैं, उसे अनसुना कर दें? क्या हमें भी अन्य “सेक्युलर” मीडिया हाउसों की तरह आँख मूँद कर उनका दुख-दर्द बयाँ नहीं करना चाहिए? क्या हमें मौके से लौट जाना चाहिए था? क्या उस माँ से यह कहना चाहिए था कि उसकी एफआईआर और अपने बच्चे को तलाशने के उसके प्रयास बेमानी हैं, क्योंकि अब “हालात काबू में” है और उसे इस घटना को भूल जाना चाहिए?

नीचे जो वीडियो हैं उसमें बच्चे के गायब होने से दुखी माँ-बाप का दर्द कैद है। जब यह रिकॉर्ड किया जा रहा था तो कई पत्रकार वहाँ आए और गए। उन्होंने उनसे मुँह फेर लिया और अपने बेटे के लिए परेशान एक माँ-बाप के दर्द को अनसुना कर दिया। सेक्युलर मीडिया चाहती है कि हम भी ऐसा ही करें। वे इसलिए नाराज हैं कि हमने ऐसा नहीं किया। इस घटना को लेकर केशव ने जो बयान दिया है उससे खुद कई सवाल खड़े होते हैं। मसलन, हरिद्वार के रास्ते में किसी स्टेशन पर जब वह रिश्तेदारों को मिला तो क्या संभव है कि उन्होंने उसके माता-पिता को फोन कर सूचना नहीं दी होगी? वह रेलवे स्टेशन पर क्यों था? क्या कुछ ऐसा है जिसे दबाने की कोशिश हो रही है?

पुलिस को ईमानदारी से इस बात की पड़ताल करनी चाहिए कि लड़का दो दिनों तक कहाँ था। लेकिन, लापता लड़के के गायब होने की खबर देने वाली रिपोर्ट को कठघरे में खड़ा करना एक चाल है ताकि हिन्दुओं के खिलाफ होने वाले अपराधों को आवाज नहीं मिल सके। हम इन मंसूबों को पूरा नहीं होने देंगे।

(नूपुर शर्मा के इस मूल लेख का अनुवाद अजीत झा ने किया है)

हिंसक मजहबी भीड़ ने सूरत में किया पुलिस पर पथराव, दंगा और तोडफोड़ के बाद धारा 144 लागू

गुजरात के सूरत शहर में पुलिस को आज आधा दर्जन से अधिक आँसू गैस के गोले दागने पड़े, जब मुस्लिम समुदाय की विशाल भीड़ ने, अधिकारियों द्वारा अनुमति देने से इनकार करने के बावजूद, झारखण्ड के कथित मॉबलिंचिंग की घटना के खिलाफ रैली निकालने की कोशिश की। इस्लामी भीड़ के उग्र प्रदर्शन के दौरान 3 से 4 पुलिस कर्मियों के घायल होने की भी खबर आ रही है। इसके अलावा वाहनों को भी क्षति पहुँचाई गई है।

पुलिस आयुक्त सतीश शर्मा ने कहा कि मुस्लिम समुदाय के एक समूह ने दो दिन पहले इसी मुद्दे पर एक ज्ञापन जिला प्रशासन को सौंपा था और उसके बाद एक अन्य समूह ने चौक बाजार इलाके से अठवा में कलेक्टर कार्यालय तक रैली निकालने की अनुमति माँगी थी।

सतीश शर्मा ने कहा, “उन्हें अनुमति देने से इनकार कर दिया गया क्योंकि यह दिन वर्किंग डे था और जिस मामले पर प्रदर्शन की अनुमति माँगी गई थी, यह मामला भी गुजरात का नहीं था।” इसके बावजूद मुस्लिम समुदाय के लोग रैली निकालने पर अड़े थे। इसलिए उग्र मुस्लिमों की भीड़ को नियंत्रित करने के लिए पुलिस को कम से कम 8 आँसू गैस के गोले दागने पड़े, क्योंकि समुदाय विशेष ने प्रदर्शन के दौरान पथराव और आगजनी करना शुरू कर दिया। जिससे 4 से 5 पुलिस कर्मी घायल हो गए और बस सहित कई वाहनों को भी नुकसान पहुँचाया गया।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, पुलिस आयुक्त ने कहा कि इस संबंध में एक मामला दर्ज किया गया है और इस संबंध में कुछ लोगों को हिरासत में भी लिया गया है। इलाके में धारा 144 लगा दी गई है।

इस बीच चश्मदीदों ने कहा कि मुस्लिम लोगों की भीड़ ने चौक बाजार इलाके से आज जुमा के दिन रैली शुरू की। जब वे विवेकानंद सर्कल के पास पहुँचे तो पुलिस ने उन्हें रोकने की कोशिश की। लेकिन पहले से तैयार भीड़ हिंसक हो गई और पथराव शुरू कर दिया।

फिलहाल, इलाके में अधिक से अधिक पुलिस बल तैनात कर दिए गए हैं और अब मौजूदा स्थिति तनावपूर्ण लेकिन नियंत्रण में है।

‘द वायर’ की पत्रकार आरफा जैसों की वजह से ही मुस्लिम अभी भी पिछड़े: अभिषेक मनु सिंघवी

बॉलीवुड अभिनेत्री जायरा वसीम ने इस्लाम का हवाला देते हुए बॉलीवुड को अलविदा कह दिया। उनका करियर अभी सिर्फ 5 साल का ही था। धर्म के नाम पर उनके इस तरह फिल्मों को छोड़ने से एक नई बहस ने पैदा हुई है। कॉन्ग्रेस नेता डॉ अभिषेक मनु सिंघवी ने भी बॉलीवुड छोड़ने के लिए ज़ायरा वसीम द्वारा दिए गए कारणों को लेकर निकाह-हलाला की समस्यात्मक इस्लामी प्रथा पर सवाल उठाया था। उन्होंने ट्वीट करते हुए लिखा था, “हलाला जायज और एक्टिंग हराम, क्या ऐसे तरक्की करेगा हिंदुस्तान का मुस्लिम?” अभिषेक मनु सिंघवी के इस ट्वीट पर बहस छिड़ गई।

कॉन्ग्रेस नेता के ट्वीट पर द वायर की पत्रकार आरफा खानम शेरवानी ने ट्वीट करते हुए इसे शर्मनाक बताया था। इस ट्वीट में आरफा ने कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी को टैग करते हुए पूछा था कि क्या उन्होंने सिंघवी के शर्मनाक बयान के लिए मंजूरी दी थी। अब इस मामले में मनु सिंघवी ने आरफा पर आक्षेप करते हुए जवाब दिया है। सिंघवी ने जोर देकर कहा कि उनके जैसे प्रभावशाली लोगों के प्रत्यावर्ती और पुरातन (पुराने)आदर्शों का समर्थन करने की वजह से ही देश में अल्पसंख्यकों की स्थिति पिछड़ी बनी रहेगी।

इससे पहले सिंघवी ने इस्लामिक शरिया कानून द्वारा वैध रूप से प्रचलित निकाह हलाला की इस्लामी प्रथा पर सवाल उठाया था। उन्होंने ये बात जायरा वसीम द्वारा सोशल मीडिया पर अकाउंट पर शेयर किए गए पोस्ट के संदर्भ में कहा था। जिसमें जायरा ने कहा था कि बॉलीवुड में अभिनय ने उन्हें अपने मज़हब इस्लाम से दूर कर दिया है। इसलिए वो अल्लाह और इस्लाम की खातिर बॉलीवुड को अलविदा कह रही हैं।

गौरतलब है कि, आरफा खानम शेरवानी को अक्सर फर्जी समाचारों और प्रोपेगेंडा को शेयर करने और समुदाय विशेष की नकारात्मक बातों को छिपाने की कोशिश करते हुए देखा गया है। इससे पहले उन्होंने सपा नेता आज़म खान की अभिनेत्री और राजनीतिज्ञ जया प्रदा पर शर्मनाक और भद्दी टिप्पणियों का बचाव करने का भी प्रयास किया था।

स्वच्छ भारत, समृद्ध भारत: बजट में मोदी सरकार ने पेश किया दशक का एजेंडा

केन्द्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने गुरुवार को बजट पेश करते हुए कहा कि इस साल देश की अर्थव्यवस्था 3 ट्रिलियन डॉलर की हो रही है। अगले पाँच वर्षों में यह 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्‍यवस्‍था होगी। अब भारत दुनिया में छठी सबसे बड़ी अर्थव्‍यवस्‍था है। पाँच साल पहले भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था 11वें पायदान पर थी। क्रय शक्ति के आधार पर तो भारत अभी से चीन और अमेरिका के बाद तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है।

बजट पेश करते हुए सीतारमण ने सरकार का 10 सूत्रीय दशक का एजेंडा भी सामने रखा। जो हैं-

  • वास्‍तविक और सामाजिक बुनियादी ढाँचा तैयार करना।
  • अर्थव्यवस्था के हर क्षेत्र में डिजिटाइजेशन को बढ़ावा।
  • हरियाली और प्रदूषण मुक्त भारत।
  • एमएसएमई, स्‍टार्ट-अप्‍स, रक्षा निर्माण, वाहनों, इलेक्‍ट्रॉनिक्‍स, कपड़ों, बैटरियों और चिकित्सा उपकरणों के निर्माण सेक्टर में मेक इन इंडिया को विशेष तौर पर प्रोत्साहित करना।
  • जल का प्रबंधन और नदियों की सफाई।
  • ब्लू इकोनॉमी यानी जल आधारित अर्थव्यवस्था को बढ़ाना।
  • अंतरिक्ष के क्षेत्र में दखल बढ़ाना। जिनमें गगनयान, चन्द्रयान और अन्य उपग्रह कार्यक्रम शामिल हैं।
  • खाद्यान्‍नों, दालों, तिलहनों, फलों और सब्जियों के उत्पादन में आत्मनिर्भर बनना।
  • नागरिकों की सुरक्षा पर फोकस। स्वस्थ समाज के लिए महिलाओं और बच्चों में कुपोषण दूर करना।
  • मिनिमम गवनर्मेंट, मैक्सिम गवर्नेंस के मंत्र को जन भागीदारी के साथ बढ़ाना।

उन्होंने बताया कि सरकार की योजना अगले 5 वर्षों में बुनियादी ढाँचे में 100 लाख करोड़ रुपए का निवेश करने की है। क्रेडिट को बढ़ावा देने के लिए सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को 70 हजार करोड़ रुपए उपलब्‍ध कराने का प्रस्‍ताव भी उन्होंने दिया। इसके अलावा अंतिम पाँच वर्षां में खाद्य सुरक्षा बजट को दोगुना करना, 10 हजार करोड़ रुपए के खर्च से इलेक्ट्रिक वाहनों को तेजी से अपनाना, अफ्रीका में 18 नए भारतीय दूतावास मिशन खोलना,‍ विश्‍वस्‍तरीय पर्यटन स्‍थलों में 17 महत्‍वपूर्ण पर्यटन स्‍थलों का विकास और एक, दो, पॉँच, दस तथा बीस रुपए के सिक्कों की नई सीरिज जारी करना इस बजट की अन्य महत्वपूर्ण बातें हैं।

सीतारमण ने कहा कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार का पहला कार्यकाल काम करने वाली सरकार के तौर पर रहा है। इसका लाभ आखिरी छोर तक खड़े व्यक्ति को मिला है। पहले कार्यकाल में रिफॉर्म, परफॉर्म और ट्रॉन्सफॉर्म पर फोकस किया गया। उन्होंने बताया कि अनके कार्यक्रमों में पूर्ववर्ती सरकार की तुलना में इस सरकार ने अभूतपूर्व काम किया है। मसलन, खाद्य सुरक्षा के लिए 2014 से पहले आवंटन 1.2 लाख करोड़ रुपए था, जो 2014 के बाद बढ़कर 1.8 लाख करोड़ रुपए हो चुका है। इसी तरह 2014 से पहले 4000 पेटेंट थे, जिसकी संख्या पिछले साल बढ़कर 13,000 हो गई।

  • बजट पेश करते हुए केन्द्रीय वित्त मंत्री ने कहा कि निवेश को बढ़ावा देने के लिए कम लागत वाली पूँजी आसानी से मुहैया कराने की जरूरत है। सालाना 20 लाख करोड़ रुपए के निवेश की जरूरत का अनुमान लगाया गया है। इसके लिए सरकार ने कई प्रस्ताव दिए हैं। ये हैं-
  • ऋण गांरटी संवर्धन निगम।
  • इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट पर विशेष ध्यान।
  • दीर्घकालिक बॉन्डों को मजबूती देने के लिए योजना।
  • 2018-19 में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में पिछले साल की तुलना में 6 फीसदी का इजाफा दर्ज किया गया। विदेशी निवेश को लुभाने के लिए बजट में कुछ और पहल की गई हैं। मसलन-
  • सरकार विमानन, मीडिया (एनिमेशन, एवीजीसी) और बीमा क्षेत्रों को एफडीआई के लिए और अधिक खोलने के सुझावों पर विचार करेगी।
  • बीमा मध्यस्थता कम्पनियों में 100 प्रतिशत विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (एफडीआई) की अनुमति दी जाएगी।
  • एकल ब्रांड रिटेल में एफडीआई के लिए स्थानीय आपूर्ति नियमों को आसान बनाया जाएगा।

कनेक्टिविटी को अर्थव्यवस्था की धमनी बताते हुए वित्त मंत्री ने कहा कि सरकार ने प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना, औद्योगिक गलियारों, समर्पित माल भाड़ा गलियारों, भारतमाला और सागरमाला परियोजनाओं, जलमार्ग विकास और उड़ान योजनाओं के जरिए संपर्क के सभी माध्यमों को काफी बढ़ावा दिया है। औद्योगिक गलियारों के बनने से उद्योग की संभावना वाले क्षेत्रों में अपेक्षाकृत अधिक निवेश आने से इन्फ्रास्ट्रक्चर का बेहतर विकास होगा, समर्पित माल भाड़ा गलियारों से हमारे रेल नेटवर्क पर बोझ घटेगा, जिससे आम आदमी को लाभ होगा। भारतमाला कार्यक्रम से राष्ट्रीय सड़क गलियारों और राजमार्गों के विकास में मदद मिलेगी, जबकि सागरमाला से बंदरगाहों को जोड़ने और उनके आधुनिकीकरण में मदद मिलेगी।

वित्त मंत्री ने कहा कि दुनिया के तीसरे सबसे बड़े घरेलू उड्डयन बाजार के रूप में अब भारत के लिए विमानन क्षेत्र के वित्त पोषण और जहाजों को पट्टे पर देने की गतिविधियों में शामिल होने का समय आ गया है। देश में रखरखाव और मरम्मत से जुड़े विमानन उद्योग (एमआरओ) के लिए बेहतर कारोबारी माहौल उपलब्ध कराने तथा इसमें आत्मनिर्भरता प्राप्त करने के लिए इंजीनियरिंग के क्षेत्र में भारत की क्षमताओं का लाभ उठाने का प्रस्ताव किया गया है।

उन्होंने कहा कि पारम्‍परिक उद्योगों के उन्‍नयन और पुनर्सजृन निधि योजना का लक्ष्‍य पारम्‍परिक उद्योगों को अधिक से अधिक उत्‍पादक, लाभदायक और निरंतर रोजगार के अवसर सृजित करने के लिए सक्षम बनाने हेतु क्‍लस्‍टर आधारित विकास सुसाध्‍य बनाने के लिए अधिकाधिक सामान्‍य सुविधा केन्‍द्र स्‍थापित करना है। प्रमुख क्षेत्र बांस, शहद और खादी क्‍लस्‍टर है। स्‍फुर्ति के अंतर्गत 2019-20 के दौरान 100 नए क्‍लास्‍टरों की स्‍थापना की जानी है, जिससे 50,000 शिल्‍पकारों को आर्थिक मूल्‍य श्रृंखला में शामिल होने के लिए सम‍र्थ बनाया जाएगा। इसके अतिरिक्‍त ऐसे उद्योगों की प्रौद्योगिकी सुधारने के लिए आजीविका बिजनेस इंक्‍यूबेटर और प्रौद्योगिकी बिजनेस इंक्‍यूबेटर स्‍थापित करने के लिए नवाचार, ग्रामीण उद्योग और उद्यमिता के संवर्धन के लिए योजना को समेकित किया गया है। इस योजना के अंतर्गत कृषि, ग्रामीण उद्योग के क्षेत्रों में 75,000 कुशल उद्यमियों को तैयार करने के लिए 2019-20 में 80 आजीविका बिजनेस इंक्‍यूबेटर और 20 प्रौद्योगिकी बिजनेस इंक्‍यूबेटर स्‍थापित किए जाएँगे।

प्रधानमंत्री ग्रामीण डिजिटल साक्षरता अभियान के तहत अभी तक 2 करोड़ से अधिक ग्रामीणों को डिजिटल रूप से साक्षर बनाया गया है। ग्रामीण-शहरी डिजिटल अंतर को पाटने के लिए भारत नेट देश की प्रत्‍येक पंचायत के स्‍थानीय निकायों में इंटरनेट कनेक्टिविटी लक्षित कर रहा है। इसे पीपीपी मॉडल से तेजी से बढ़ाया जाएगा।

उन्‍होंने कहा कि आदिवासियों के दस्‍तावेजों, लोक गीतों, उनके विकास क्रम के फोटोचित्रों और वीडियों, उत्‍पत्ति स्‍थल, जीवनशैली, वास्‍तुकला, शिक्षा स्‍तर, पारंपरिक कला, लोकनृत्‍य तथा अन्‍य मानव विकास का संग्रह करने के लिए एक डिजिटल संग्रह बनाया गया है। इस संग्रह को और अधिक समृद्ध और सुदृढ़ किया जाएगा।

  • 2014-2019 के दौरान की उपलब्धियाँ-
  • पिछले पाँच वर्षों में भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था में एक ट्रिलियन डॉलर की राशि जुड़ी है।
  • भारत विश्‍व की छठी बड़ी अर्थव्‍यवस्‍था बन चुका है। पाँच वर्ष पहले यह 11वें स्‍थान पर था।
  • क्रय शक्ति की समानता की के दृष्टि से भारत तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्‍यवस्‍था है।
  • 2014-19 के दौरान राजकोषीय अनुशासन को सुदृढ़ बनाया तथा केन्‍द्र-राज्‍य संबंधों को गतिशीलता प्रदान की गई।
  • अप्रत्‍यक्ष करों, दिवाला मामलों तथा रियल इस्‍टेट क्षेत्र में संरचनात्‍मक सुधार किए गए।
  • 2009-14 की तुलना में 2014-19 के बीच खाद्य सुरक्षा पर प्रतिवर्ष औसतन दोगुना खर्च किया गया।
  • 2014 की तुलना में 2017-18 में तिगुने से भी पेटेंट जारी किए गए।
  • नीति आयोग की योजनाओं और समर्थन से न्यू इंडिया के निर्माण की प्रक्रिया जारी है।
  • भविष्‍य के लक्ष्‍य-
  • प्रक्रियाओं को सरल बनाना।
  • निष्‍पादन को प्रोत्‍साहित करना।
  • लालफीताशाही में कमी लाना।
  • प्रौद्योगिकी का बेहतर इस्‍तेमाल करना।
  • शुरू किए गए कार्यक्रमों और सेवाओं को गति प्रदान करना।

लिल्लाह! फेक न्यूज़ मैंने शेयर की, लेकिन घृणा तो मुआ ऑपइंडिया फैला रहा है: सबा नक़वी

हिन्दू विरोधी नैरेटिव बनाने, हिन्दू प्रतीकों को अपमानित करने और हिन्दूफोबिया से ग्रसित मशहूर पार्ट टाइम जर्नलिस्ट सबा नक़वी ने अपनी बौद्धिक क्षमता की नई मिसाल पेश करते हुए सोशल मीडिया को कॉमेडी सर्कस में तब्दील कर दिया है। यह पहली बार नहीं है जब किसी सत्ता विरोधी और कॉन्ग्रेस-वादी, चाहे वो पत्रकार हो, लेखक हो, या फिर सोशल मीडिया पर दिन रात सरकार की नीतियों में ‘मुस्लिम विरोधी नजरिया’ तलाशने वाला कोई कॉन्सपिरेसी थ्योरी एक्टिविस्ट हो, ने अपनी गलती स्वीकार करने की जगह उल्टा अपने पूर्वग्रहों से दूसरों पर कीचड़ उछालने का काम किया हो।

दरअसल, सोशल मीडिया पर एक फर्जी खबर वायरल की जा रही थी जिसमें बताया गया कि कानपुर के बाबूपुरवा में बुधवार (जुलाई 3, 2019) रात तीन युवकों ने मिलकर एक ऑटो चालक आतिब को शौचालय में बंधक बनाकर ईंट-पत्थरों से पीट-पीटकर मरणासन्न कर दिया। इस मामले में आतिब ने आरोप लगाया था कि हमलावरों ने ‘जय श्री राम’ का नारा न लगाने पर उसके साथ मारपीट की।

लेकिन जब ऑपइंडिया द्वारा इस खबर का फैक्ट चेक किया गया, तो पता चला कि यहाँ एकदम गलत और झूठी खबर थी, जिसे हिन्दूफोबिया से ग्रसित सबा नक़वी जैसे मनगढंत पत्रकारों द्वारा बड़े स्तर पर वायरल किया गया। साथ ही, तमाम भ्रामक आरोपों और ‘जय श्री राम’ के नारों को ऐसी एकदम काल्पनिक घटनाओं के साथ जोड़कर एक फर्जी ‘डर का माहौल’ तैयार किया गया।

लेकिन इससे भी ज्यादा दुखद ऑपइंडिया द्वारा किए गए इस फैक्ट चेक पर सबा नक़वी की प्रतिक्रिया थी। सबा नक़वी को यह फर्जी खबर ट्ववीट करने पर लोगों द्वारा सच्चाई बताने पर उन्होंने यह तो स्वीकार किया कि उन्होंने हिन्दू-मुस्लिम सांप्रदायिक एंगल होने के कारण यह फर्जी खबर फैलाई, लेकिन इसके साथ ही उन्होंने उनके इस फर्जी खबर का खंडन करने वाले ऑपइंडिया पर विश्वास ना करने की भी सलाह दी। सबा नक़वी एक्सपोज़ भी हुई, लेकिन यह भी लिखा कि ऑपइंडिया ने यह फैक्ट चेक किया है लेकिन यह एक फैक्ट चेकर नहीं बल्कि साम्रदायिक वेबसाइट है।

सबा नक़वी के हास्यास्पद ट्वीट के बाद ट्विटर यूज़र्स ने उन्हें याद दिलाया कि उन्हें सिर्फ ‘कुछ भी कहने के लिए कुछ भी कहने’ वाली आदत से बाज आना चाहिए। और सच्चाई को स्वीकार करना चाहिए। सबा नक़वी को जवाब देते हुए @HittsVora ने लिखा है, “एक तरफ आप झूठी खबर फैलाने वाली फैक्ट्री (कारवाँ डेली) को यह झूठी खबर हटाने के लिए कह रही हैं और दूसरी ओर इस खबर का पर्दाफाश करने वाले ऑपइंडिया को ही झूठा बता रही हैं।”

सबा नक़वी द्वारा खुद एक सांप्रदायिक तनाव पैदा करने वाली फर्जी खबर को फैलाया और बदले में पकड़े जाने पर उन्हीं लोगों पर आरोप लगाया जिनके द्वारा यह सच्चाई सामने लाइ गई। देखा जाए तो इस प्रकार का दोहरापन मात्र सबा नक़वी में ही नहीं बल्कि हर दूसरे नेहरुघाटी सभ्यता में पलने वाले पत्रकार के भीतर पाया जाता है।

खुद ही मज़हबी घृणा की झूठी खबर फैलाने के बाद दूसरों को सांप्रदायिक बताने वाली सबा नक़वी जैसे सस्ती लोकप्रियता के चितेरों की आजकल सोशल मीडिया पर कोई कमी नहीं है। वास्तव में सोशल मीडिया पर इन आदर्श लिबरल्स की फर्जी सेक्युलरिज्म की दुकान कुछ इन वजहों से ही चल रही है। झूठी बातों को चिल्ला-चिल्लाकर सच साबित करना इन मीडिया गिरोहों को बहुत ही अच्छे से आता है और इनके मासूम भक्त ऐसी ही ख़बरों को सच मानकर हिन्दफोबिया से ग्रसित हो जाते हैं।

आजम खान के समधी का होटल हुआ सील, RDA ने की बड़ी कार्रवाई

समाजवादी पार्टी के रामपुर से सांसद आजम खान के समधी पर जिला प्रशासन ने कार्रवाई की है। यहाँ अनुमति से अधिक निर्माण कराने के मामले में आजम खान के समधी का होटल सील कर दिया गया है और साथ ही कंपाउंडिंग का नक्शा भी खारिज कर दिया है।

डायमंड रोड पर स्थित आजम खान के समधी रिजवान मोहम्मद के प्लाजा होटल पर हुई आरडीए की कार्रवाई से इलाके में खलबली मच गई है। रामपुर विकास प्राधिकरण के सचिव ने बताया कि होटल की इमारत को मानचित्र के विपरीत बनाया गया है, साथ ही यहाँ स्वीकृत नक्शे से भी अधिक निर्माण हुआ है, जिसकी जानकारी प्राधिकरण को भी नहीं दी गई।

खबरों के अनुसार आरडीए ने यह एक्शन तस्लीम खान की शिकायत पर लिया है। इस शिकायत के मद्देनजर ही गुरुवार (गुरुवार 4, 2019) को रामपुर विकास प्राधिकरण के सचिव बैजनाथ पुलिस फोर्स के साथ डॉयमंड रोड पहुँचे और जाँच के बाद पाया कि उन्हें सही जानकारी मिली है।

जाँच के बाद होटल के मालिक रिजवान को नोटिस जारी किया गया और कम्पाउंडिंग अर्थात समझौता करने के प्रार्थना पत्र को निरस्त करके, पूरा होटल सील कर दिया गया।

बता दें रिजवान मोहम्मद का यह प्लाजा होटल 1401 वर्ग मीटर में बना हुआ है, जिसका निर्माण सपा के सत्ता में रहने के दौरान हुआ था। होटल का उद्घाटन भी तत्कालीन नगर विकास मंत्री आजम खान द्वारा ही किया गया था।

प्लाजा होटल के मालिक और आजम खान के समधी का इस सीलिंग पर कहना है कि रामपुर में ऐसे अनगिनत होटल और भवन हैं, जो नक्शे के विपरीत हैं, लेकिन उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई। उनका कहना है कि वह कंपाउंड/समझौता कराने के लिए भी तैयार थे, लेकिन ऐसा नहीं किया गया उनके मुताबिक आरडीए की यह कार्रवाई सिर्फ इसलिए की गई, क्योंकि वह आजम खान के समधी हैंं।

आप अकेले नहीं हैं जो महबूबा की बेवफाई पर ग़ालिब बन गए, दुबई के शासक भी लिख रहे हैं मार्मिक नज़्म

पिछले दिनों खबर आई थी कि दुबई के शासक शेख मोहम्मद बिन राशिद अल-मकतूम की छठी पत्नी 45 वर्षीय रानी हया बिंत अल हुसैन अपने बच्चों सहित जर्मनी चली गई हैं। दुबई की रानी हया बिंत हुसैन ने ब्रिटेन में राजनीतिक शरण माँगी है। बताया जा रहा है कि हया ने अब अपने पति से तलाक भी माँगा है।

"मेरी जिंदगी में अब तुम्हारी कोई जगह नहीं,
मुझे परवाह नहीं कि तुम जियो या मरो"

रानी हया को शेख की 6 पत्नियों में सबसे आकर्षक माना जाता है। वह जॉर्डन के पूर्व राजा हुसैन की बेटी हैं और अपने सामाजिक कार्यो के लिए जानी जाती हैं। उन्होंने 2004 में दुबई के शासक और संयुक्त अरब अमीरात के उपराष्ट्रपति और प्रधानमंत्री शेख़ मोहम्मद के साथ अम्मान में एक सादे कार्यक्रम में निकाह किया था। उस समय प्रिंसेज हया की उम्र 30 साल थी, जबकि शेख़ मोहम्मद 53 साल के थे। हया से शादी करने के बाद राशिद ने अपनी दूसरी बीवियों को लगभग छोड़ ही दिया था। वर्तमान में शेख मोहम्मद के अलग-अलग पत्नियों से कुल 23 बच्चे हैं, यानी 2 दर्जन से 1 कम।

‘बेवफा’ रानी के गम में शायर बन गए हैं शेख मकतूम

शेख मोहम्मद बिन राशिद अल-मकतूम पत्नी की बेवफाई को लेकर अब सोशल मीडिया पर जमकर कविता और शायरी लिख रहे हैं। जिस तरह की कविताएँ शेख लिख रहे हैं, उनमें शेख के दुख के साथ ही उनका गुस्सा भी साफ देखा जा सकता है। शेख मोहम्मद ने 10 जून को इंस्टाग्राम पर एक पोस्ट डाली थी, जिसमें उन्हें फ़रेब और धोखेबाज़ी पर कविता लिखते हुए देखा गया।

"हमें एक दर्द उठा है जो किसी दवा से कम नहीं हो सकता,
किसी भी हक़ीम के पास इसका इलाज नहीं"

उन्होंने ये कविता अरबी भाषा में लिखी हैं। इस कविता के शीर्षक का अंग्रेजी अनुवाद है- “You Lived and You Died।” कविता में शेख ने पत्नी से मिले धोखे पर गुस्सा जाहिर किया है। उन्होंने लिखा, “बेवफा, तुमने सबसे कीमती भरोसे को तोड़ दिया और तुम्हारा खेल अब सामने आ गया है। तुम्हारे झूठ बोलने के दिन खत्म हो गए हैं और अब ये मायने नहीं रखता है कि हम क्या थे और तुम क्या हो।” 

कविता के अंत में राशिद ने लिखा, “अब मेरी जिंदगी में तुम्हारी कोई जगह नहीं रह गई है, तुम जिसके पास जाना चाहती हो, जाओ। मुझे अब फर्क नहीं पड़ता कि तुम जिंदा हो या मर गई।”

पिछले साल दुबई शेख राशिद की बेटी राजकुमारी शेख लतीफा ने भी दुबई से भागने की असफल कोशिश की थी। लतीफा को समुद्री मार्ग पर भारत ने पकड़ लिया था और उन्हें यूएई को सौंप दिया था। उससे पहले, एक यूट्यूब वीडियो में उसने अपने पिता की आलोचना की थी और बताया था कि उन पर कितनी पाबंदियाँ लगी हुई हैं।

वैसे तो अब ये उम्मीद कम ही है कि प्रिंसेज हया दुबई फिर से वापस लौटेंगी, ऐसे में बिन राशिद अब हया से कानूनी तौर पर तलाक लेने का कदम उठा सकते हैं। शायद अब वह अपनी पत्नी को यूएई वापस लाने के लिए कोई लड़ाई नहीं लड़ेंगे।

इसे इस बात का संकेत भी माना जा रहा है कि क्षेत्र में यूएई की ताकत घटती जा रही है और वह जॉर्डन के साथ रिश्ते में प्रोपेगैंडा वॉर नहीं चाहते हैं, जहाँ हया और उनके परिवार को राष्ट्रीय आइकॉन माना जाता है।

राहुल पर किया भरोसा, उन्होंने कुछ नहीं किया इसलिए MLA पद से दिया इस्तीफा: अल्पेश ठाकोर

गुजरात में राज्यसभा की दो सीटों के लिए उपचुनाव हो रहा है। कॉन्ग्रेस ने व्हिप जारी किया है। इसके बावजूद कॉन्ग्रेस के दो विधायकों ने क्रॉस वोटिंग की है। कॉन्ग्रेस के बागी विधायक अल्पेश ठाकोर और धवन झाला ने भाजपा प्रत्याशी के पक्ष में वोट किए हैं। क्रॉस वोटिंग करने के बाद दोनों विधायकों ने कॉन्ग्रेस विधायक पद से इस्तीफा दे दिया।

अल्पेश ठाकोर ने इस्तीफा देने के बाद कहा, “मैंने राहुल गाँधी पर भरोसा करके कॉन्ग्रेस पार्टी ज्वॉइन किया था, लेकिन दुर्भाग्यवश उन्होंने हमारे लिए कुछ नहीं किया। हमें बार-बार अपमानित किया गया, इसलिए मैंने कॉन्ग्रेस विधायक पद से इस्तीफा दे दिया है।”

वहीं, वोटिंग करने के बाद अल्पेश ठाकोर ने कहा कि उन्होंने अंतर आत्मा की आवाज सुनकर और राष्ट्रीय नेतृत्व को ध्यान में रखकर मतदान किया है। उनका कहना है कि जो पार्टी (कॉन्ग्रेस) जन अधिकार खो चुकी है और जिस पार्टी ने उनके साथ द्रोह किया है, उसे मद्देनजर रखकर उन्होंने वोटिंग किया है।

गुजरात में दो राज्यसभा सीटों पर हो रहे उपचुनाव के लिए भाजपा से विदेश मंत्री एस जयशंकर और ओबीसी नेता जुगलजी ठाकोर मैदान में हैं, जबकि कॉन्ग्रेस की ओर से चंद्रिका चुड़ासमा और गौरव पांड्या उम्मीदवार हैं। बता दें कि, बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह गांधीनगर और केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी के अमेठी सीट से लोकसभा सदस्य चुने जाने के बाद दोनों राज्यसभा सीटें खाली हुई हैं।

गौरतलब है कि, इससे पहले गुजरात कॉन्ग्रेस ने विधानसभा अध्यक्ष से अपील की थी कि अल्पेश ठाकोर ने पार्टी के सभी पद से इस्तीफा दिया है, तो उनका विधायक पद रद्द किया जाए और फिर विधानसभा अध्यक्ष द्वारा कार्रवाई ना होने पर कॉन्ग्रेस ने गुजरात हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। जहाँ गुजरात हाईकोर्ट ने अल्पेश ठाकोर को विधायक पद से हटाने की गुजरात कॉन्ग्रेस की याचिका को खारिज कर दिया था। हाईकोर्ट ने कहा था कि ये पूरा मामला गुजरात विधानसभा के अध्यक्ष को पता है और उनकी जानकारी में है, इसलिए वही इस मामले में फैसला लेंगे।

‘इस बजट से गरीब को बल मिलेगा, युवा को बेहतर कल और मध्यम वर्ग को मिलेगी प्रगति’

संसद में वित्त मंत्री द्वारा आम बजट पेश करने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस पर अपनी प्रतिक्रिया दी है। प्रधानमंत्री ने इस बजट को न्यू इंडिया का बजट बताया है। और साथ ही उन्होंने इसे ग्रीन बजट का नाम दिया है।

उन्होंने भाषण के दौरान कहा, “यह देश को समृद्ध और जन-जन को समर्थ बनाने वाला बजट है। इस बजट से गरीब को बल मिलेगा और युवा को बेहतर कल मिलेगा। इस बजट के माध्यम से मध्यम वर्ग को प्रगति मिलेगी, विकास की रफ्तार को गति मिलेगी। इस बजट से टैक्स व्यवस्था में सरलीकरण होगा, इन्फ्रास्ट्रक्चर का आधुनिकीकरण होगा।”

पीएम मोदी का कहना है कि यह बजट उद्यम और उद्यमों को मजबूत बनाएगा और महिलाओं की भागीदारी को और बढ़ाएगा। यह ग्रीन बजट है, जिसमें पर्यावरण, इलेक्ट्रिक मोबिलिटी और सोलर सेक्टर पर विशेष बल दिया गया है। इस बजट में आर्थिक जगत के रिफॉर्म भी हैं, आम नागरिक के लिए ईज ऑफ लिविंग भी है और साथ ही गाँव और गरीब का कल्याण भी है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मुताबिक आज लोगों के जीवन में नई आकांक्षाएँ और अपेक्षाएँ हैं, यह बजट देश को विश्वास दे रहा है कि इन्हें पूरा किया जा रहा है।

बजट पर प्रतिक्रिया देते हुए प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि पिछले 5 सालों में उनकी सरकार ने गरीब, शोषित और वंचितों को सशक्त बनाने के लिए कई कदम उठाए हैं, और अब अगले 5 साल में यही सशक्तीकरण उन्हें देश के विकास का पावर हाउस बनाएगा।