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IMA पोंजी स्कैम: 1500 करोड़ रुपए का घोटालेबाज मंसूर खान हुआ गिरफ्तार, ED ने कसा शिकंजा

IMA पोंजी घोटाले के आरोपित आईएमए फाउंडर मंसूर खान को प्रवर्तन निदेशालय ने आज (जुलाई 19, 2019) सुबह दिल्ली एयरपोर्ट से गिरफ्तार कर लिया। जानकारी के अनुसार गिरफ्तारी के बाद ईडी उसे एमटीएनएल बिल्डिंग स्थित अपने कार्यालय लेकर गई है, जहाँ मंसूर से पूछताछ की जा रही है। बता दें कि मंसूर खान पर ईडी के साथ-साथ एसआईटी ने भी लुक-आउट नोटिस जारी किया था। फिलहाल मंसूर ईडी की हिरासत में है।

गौरतलब है कि मंसूर की हिरासत से पहले स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम चीफ़ रविकांत गौड़ा ने कहा था, “अपने सूत्रों के माध्यम से एक एसआईटी ने आईएमए के संस्थापक-मालिक मोहम्मद मंसूर खान का दुबई में पता लगाया। इसके साथ ही उससे यह भी कहा गया है कि वह भारत लौट आए और खुद को कानून के हवाले कर दे। उसके मुताबिक, वह दुबई से दिल्ली आ चुका है। एसआईटी के कई अधिकारी उसे गिरफ्तार करने के लिए दिल्ली में मौजूद हैं।”

बता दें कि पिछले महीने 8 जून को मंसूर खान 1500 करोड़ रुपए की धोखाधड़ी करके दुबई भाग गया था। उसके ख़िलाफ़ निवेशकों ने हजारों शिकायतें दर्ज करवा के दावा किया था कि उसने उन लोगों को हाई रिटर्न का वादा करके ठगा है। मंसूर खान के झाँसे में आने वाले ज्यादातर मुस्लिम निवेशक थे, जिन्हें इस्लामिक बैंकिंग या हलाल निवेश के नाम पर फँसाया गया था।

पढ़ें : इस्लामिक बैंकिंग के नाम पर ₹2000 करोड़ ऐंठने के बाद मंसूर खान करना चाहता है ख़ुदकुशी

सोनभद्र नरसंहार में ग्राम प्रधान सहित 26 गिरफ्तार: रासुका के तहत कार्रवाई, फास्ट ट्रैक कोर्ट में चलेगा मुकदमा

उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जिले में बुधवार (जुलाई 17, 2019) को जमीनी विवाद को लेकर हुए नरसंहार में पुलिस ने मुख्य आरोपित ग्राम प्रधाम यज्ञदत्त, उसके भाई और भतीजों समेत 26 लोगों को गिरफ्तार कर लिया है। जानकारी के मुताबिक मामले में पुलिस ने 28 नामजद और 50 अज्ञात लोगों के ख़िलाफ़ केस दर्ज किया है।

पुलिस जाँच में आरोपितों के पास से 2 बंदूके बरामद हुई हैं। साथ ही पुलिस ने 6 ट्रैक्टर भी कब्जे में लिए हैं। अन्य आरोपितों की गिरफ्तारी के लिए पुलिस द्वारा पाँच टीमें रवाना कर दी गई हैं और एसपी सलमान ताज पाटिल ने बताया है कि वांछित लोगों की तलाश तेज कर दी गई है।

नवभारत टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक ग्रामीण लल्लू सिंह की शिकायत पर पुलिस ने आरोपित ग्राम प्रधान और उनके भाई समेत सभी पर हत्या और एससी/एसटी एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज किया है। फिलहाल, आरोपितों की गिरफ्तारी के लिए पुलिस की टीम संभावित स्थानों पर दबिश दे रही है।

बता दें कि इस मामले में लखनऊ स्थित प्रदेश अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति आयोग ने सभी आरोपितों पर रासुका के तहत कार्रवाई करने को कहा है। आयोग के अध्यक्ष डीजीपी बृजलाल के मुताबिक इस कांड में पुलिस व प्रशासन की लापरवाही सामने आ रही है। उन्होंने परिक्षेत्र के डीआईजी को निर्देश दिए हैं कि इस संबंध में जाँच कर दोषी अधिकारियों व कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई करें।

प्रदेश अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति आयोग के अध्यक्ष के मुताबिक इस घटना में लोकव्यवस्था पूर्ण रूप से भंग हुई है, इसलिए उन्होंने कहा है कि राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (रासुका) के तहत अभियुक्तों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया जाए और जमानत होने की स्थिति में उन्हें रासुका में निरुद्ध किया जाए। साथ ही आयोग ने मामले का मुकदमा फास्ट ट्रैक कोर्ट में चलाए जाने के भी निर्देश दिए हैं। इसके अलावा इस मामले में राजस्व परिषद ने भी जिलाधिकारी से विस्तृत रिपोर्ट तलब की गई है।

पूरा मामला: उत्तर प्रदेश: आदिवासियों की जमीन पर कब्जे के लिए 3 महिलाओं समेत 11 की हत्या

ऋचा भारती पर अभद्र टिप्पणी करने वाले अबु आजमी वसीम खान के ख़िलाफ़ FIR दर्ज, अभी है फरार

सोशल मीडिया पर धार्मिक टिप्पणी को लेकर सुर्खियों में आई ऋचा भारती उर्फ़ ऋचा पटेल के ख़िलाफ़ अभद्र टिप्पणी करने के मामले में अबु आजमी वसीम खान के ख़िलाफ एफआईआर दर्ज कर ली गई है। फिलहाल अबु आजमी वसीम खान फरार है और पुलिस ने उसकी धड़-पकड़ की कोशिशें तेज कर दी हैं। इस बात की पुष्टि स्वंय एसएसपी मुख्यालय-1 से अमित रेणु ने की। बता दें कि इस मामले में हिंदू क्रांति सेना के रवि रंजन, विक्रम सिंह, पंकज सिंह सहित पाँच लोगों ने बुधवार (जुलाई 17,2 019) को पिठोरिया थाना में शिकायत दर्ज की थी।

ऋचा की सुरक्षा बढ़ाई गई

गौरतलब है कि इस एफआईआर को दर्ज करने के साथ ऋचा भारती की सुरक्षा को भी बढ़ाया गया है। ऋचा और उनके परिवार की सुरक्षा के मद्देनजर उनके घर पर 4 जवानों की तैनाती की गई है। इसके अलावा हिंदू संगठनों से जुड़े लोगों ने भी उनसे मिलकर उन्हें मदद का भरोसा दिलाया है।

मामले में असहयोगात्मक रवैया, ग्रामीणों ने फूँका विधायक का पुतला

स्थानीय कांके विधायक डॉ जीतूचरण राम से अपेक्षित सहयोग नहीं मिलने के कारण यहाँ के ग्रामीण नाराज हैं। खबर के मुताबिक गाँव वालों ने यहाँ आंबेडकर चौक में नाराजगी के चलते उनका पुतला दहन भी किया, साथ ही उनके ख़िलाफ़ नारेबाजी भी की। ग्रामीणों का आरोप है कि पूरे मामले की सूचना देने के बाद भी ऋचा के मामले में विधायक द्वारा कोई मदद नहीं दी गई।

प्रभात खबर के मुताबिक भाजयुमो के मेसरा मंडल अध्यक्ष शिवलाल महतो ने विधायक के असहयोगात्मक रवैये पर बात करते हुए कहा कि विधायक हमेशा जन समस्याओं से दूर रहते हैं, जिसके कारण कार्यकर्ताओं में आक्रोश है। उन्होंने बताया कि ऋचा भारती मामले में सहयोग के लिए कार्यकर्ता उन्हें फोन करते रहे पर विधायक द्वारा कोई रिस्पॉन्स नहीं आया।

आदेश में सुधार, इसलिए मनीष कुमार सिंह के कोर्ट का बहिष्कार वापस

बता दें कि इस मामले में जिला बार एसोसिएशन ने ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट मनीष कुमार सिंह की अदालत का बहिष्कार वापस ले लिया है। खबरों की मानें तो गुरुवार को हुई बैठक के बाद एसोसिएशन के अध्यक्ष शंभू प्रसाद अग्रवाल और महासचिव कुंदन प्रकाशन ने कहा कि मामले में जमानत के आदेश में सुधार किया गया है और कुरान बाँटने की शर्त भी हटा ली गई है, इसलिए शुक्रवार से अधिवक्ता मनीष कुमार सिंह की अदालत में सामान्य रूप से काम करेंगे।

उत्तर प्रदेश: आदिवासियों की जमीन पर कब्जे के लिए 3 महिलाओं समेत 11 की हत्या

उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जिले में बुधवार (जुलाई 17, 2019) को जमीनी विवाद में 3 महिलाओं समेत 11 लोगों की हत्या कर दी गई। घोरावल इलाके के उम्भा गाँव में हुई इस घटना में 17 लोग घायल हुए। 5 की हालत गंभीर है। ज़मीन से जुड़े विवाद को लेकर हुए नरसंहार में ग्राम प्रधान के भतीजे समेत 24 लोग गिरफ्तार किए जा चुके हैं। मुख्य आरोपित प्रधान अभी फरार बताया जा रहा है। वांछितों की धरपकड़ तेज कर दी गई है। 50 अज्ञात के खिलाफ भी अभियान तेज है। नरसंहार में इस्तेमाल किए गए हथियारों को पुलिस ने बरामद कर लिया है।

उभ्भा गाँव का प्रधान यज्ञदत्त गुर्जर कुछ साल पहले एक राजनीतिक पार्टी से जुड़ा हुआ था। गाँव के भाईलाल बताते हैं कि सालों पहले वह अपनी गाड़ी पर बसपा का झंडा लगाकर चलता था। गाँव वालों के अनुसार लगभग 50-60 साल पहले पश्चिमी यूपी से यज्ञदत्त के पूर्वज यहाँ आए। उसके बाद यहीं बस गए। इस गाँव में रहने वाले आदिवासी सौ-डेढ़ सौ साल से यहाँ रह रहे हैं। इस गाँव में गुर्जर के डेढ़ सौ परिवार हैं, जिसमें लगभग छह सौ लोगों की आबादी है। आदिवासियों की आबादी लगभग साढ़े पाँच सौ के आसपास है।

रिपोर्ट्स के अनुसार, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने डीजीपी ओपी सिंह को मामले पर नजर बनाए रखने का निर्देश दिया है। CM आदित्यनाथ ने घटना का संज्ञान लेते हुए मिर्जापुर के मण्डलायुक्त तथा वाराणसी जोन के अपर पुलिस महानिदेशक को घटना के कारणों की संयुक्त रूप से जाँच करने के निर्देश दिए हैं। साथ ही लापरवाही सामने आने पर जिम्मेदारी तय करते हुए 24 घण्टे में रिपोर्ट पेश करने के आदेश दिए हैं।

मुख्यमंत्री आदित्यनाथ ने इस घटना में मारे गए लोगों के परिजन को पाँच-पाँच लाख रुपए की सहायता का एलान किया है। उन्होंने जिलाधिकारी सोनभद्र से पूछा है कि ग्रामवासियों को पट्टे आखिर क्यों मुहैया नहीं कराए गए थे?

गाँव के लल्लू सिंह की तहरीर पर पुलिस ने मुख्य आरोपित ग्राम प्रधान यज्ञदत्त समेत अन्य के खिलाफ हत्या और एससी-एसटी एक्ट के तहत मुकदमा कायम किया है। आरोपितों की गिरफ्तारी के लिए पुलिस की टीम बनाकर संभावित स्थानों पर दबिश दी जा रही है।

डीजीपी सिंह के अनुसार, ग्राम प्रधान यज्ञवत घुर्तिया ने दो साल पहले एक आईएएस अधिकारी से उम्भा गाँव में 90 बीघा जमीन खरीदी थी। बुधवार सुबह प्रधान घुर्तिया जमीन पर कब्जा करने के लिए कई लोगों को ट्रैक्टर ट्राली से लेकर पहुँचा था। प्रधान ने ट्रैक्टर से जुताई शुरू की तो ग्रामीणों ने इसका विरोध किया।
सोशल मीडिया में लोग पूछ रहे हैं कि जिस जगह आदिवासी कई पीढ़ियों से खेती करते आ रहे हैं वहां की
लगभग सौ बीघा ज़मीन कैसे एक कलेक्टर के नाम ट्रांसफर हो गई?

इसी दौरान प्रधान पक्ष के लोगों ने धारदार हथियारों से ग्रामीणों पर हमला कर दिया। रिपोर्ट्स के अनुसार, प्रधान और उसके लोगों ने गाँव वालों पर अंधाधुंध गोलियाँ बरसानी शुरू कर दीं। इसमें नौ लोगों की मौत हुई। मृतकों में तीन महिलाएँ और 6 पुरुष शामिल हैं। घायलों को रॉबर्ट्सगंज जिला अस्पताल और पीएचसी घोरावल में भर्ती करवाया गया। इस मामले में अब तक पाँच लोगों को गिरफ्तार किया गया है। गाँव में तनाव को देखते हुए भारी संख्या में पुलिस बल तैनात किया गया है। बताया जा रहा है कि 16 जुलाई को 32 ट्रैक्टर-ट्रालियों में भरकर प्रधान समेत 300 लोग ज़मीन पर कब्ज़ा करने पहुँचे थे।

उत्तर प्रदेश में कानून एवं व्यवस्था के प्रभारी पुलिस अधिकारी पीवी रामाशास्त्री ने कहा, “जमीन के इस टुकड़े के लिए इससे पहले भी ग्राम प्रधान और गाँव वालों में विवाद हो चुका था। उस समय पुलिस के दखल से मामला शांत हुआ था।”

उन्होंने कहा, “ग्राम प्रधान का आरोप है कि गाँव वालों ने अवैध तरीके से उसकी जमीन पर कब्जा कर लिया है। पुलिस ने दोनों पक्षों से पीछे हटने को कहा था और जिला प्रशासन ने जमीन को अपने कब्जे में लेने का फैसला किया था, जिसकी प्रक्रिया शुरू की जा चुकी थी।”

मोदी-शाह राष्ट्रवाद की भावना से काम कर रहे हैं: पूर्व कॉन्ग्रेस MLA अल्पेश ठाकोर BJP में शामिल

गुजरात कॉन्ग्रेस के पूर्व विधायक अल्पेश ठाकोर और धवल झाला बृहस्पतिवार (जुलाई 18, 2019) को अपने समर्थकों सहित भाजपा में शामिल हो गए। कॉन्ग्रेस से कई दिनों से नाराज़ चल रहे ठाकोर ने ‘वन्दे मातरम’ और ‘भारत माता की जय’ का नारा लगाते हुए एक कार्यक्रम के दौरान भाजपा की औपचारिक सदस्यता ग्रहण की। अल्पेश ने कॉन्ग्रेस पर हमला बोलते हुए कहा कि वहाँ तो पार्टी अध्यक्ष का पद ही 2 माह से खाली पड़ा है। भाजपा के कार्यकारी अध्यक्ष जेपी नड्डा के गुजरात दौरे से ठीक पहले हुए इस राजनीतिक बदलाव को राज्य के लिए अहम माना जा रहा है।

ठाकोर सेना के अध्यक्ष अल्पेश और पूर्व विधायक धवल सिंह झाला को प्रदेश भाजपा अध्यक्ष जीतूभाई वाघानी ने केसरिया दुप्पट्टा ओढ़ा कर भाजपा की सदस्यता दिलाई। वाघानी ने कहा कि भाजपा विचारधारा वाली पार्टी है और यहाँ जो भी आता है वो पार्टी की विचारधारा अपना लेता है। अल्पेश ठाकोर ने कॉन्ग्रेस छोड़ने व भाजपा में शामिल होने के पीछे के कारणों पर चर्चा करते हुए कहा:

“कॉन्ग्रेस ग़रीब व आदिवासी की सेवा करने की अपनी विचारधारा से भटक कर केवल स्‍वार्थ की राजनीति कर रही है। निर्धन व सामान्‍य लोगों की सेवा करने के लिए सत्‍ता में होना आवश्‍यक है। मैंने कॉन्ग्रेस में रहकर भी ग़रीब व आम लोगों के हितों की बात की, लेकिन वहाँ सुनने वाला कोई नहीं है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व भाजपा अध्‍यक्ष व गृहमंत्री अमित शाह राष्‍ट्रवाद व देश के विकास की भावना से काम कर रहे हैं।”

अल्पेश ठाकोर ने कहा कि मोदी-शाह देश को विकास की नई ऊँचाइयों पर ले जाएँगे। हाल ही में गुजरात में हुए राज्यसभा उपचुनाव में इन दोनों नेताओं ने कॉन्ग्रेस में रहते हुए पार्टी लाइन से इतर जाकर भाजपा उम्मीदवार के पक्ष में मतदान किया था। इसके बाद दोनों ने विधानसभा सदस्यता से इस्तीफा दे दिया था।

हम्पी के पवित्र स्थलों पर तोड़फोड़, पुलिस ने बताया ‘खजाना खोजी’ बदमाशों की करतूत

बदमाशों की नज़र अब ऐसे प्राचीन भारतीय स्थलों पर है, जिनका हिन्दू समाज में ख़ासा महत्व है। कर्नाटक से आई ख़बर के मुताबिक़ हम्पी के नजदीक स्थित नव वृन्दावन में तोड़फोड़ की गई है। कभी हम्पी को विश्व के सबसे सुन्दर और समृद्ध नगरों में से एक गिना जाता था। कोप्पल जिले में ये घटना तुंगभद्रा नदी के किनारे स्थित माधव परंपरा के अनुयायियों द्वारा पूजित पवित्र स्थल पर घटी। गुरुवार की सुबह (जुलाई 18, 2019) की ये तोड़फोड़ आषाढ़ एकादशी जैसे संवेदनशील मौके पर की गई, जब वहाँ कई श्रद्धालु जुटते हैं।

नव वृन्दावन में माधव परंपरा के 9 संतों की समाधियाँ हैं। इस परंपरा के मानने वाले लोग ब्राह्मण हैं, जो तमिलनाडु और कर्नाटक से लेकर गोवा तक बसे हुए हैं। पुलिस का कहना है कि इस क्षेत्र में कुछ ऐसे बदमाश सक्रिय हैं, जो पुराने खजानों की खोज में पुरातन स्थलों को निशाना बनाते हैं।

मौसम की स्थिति को देखते हुए अनेगुंदी से बल्लारी तक सिर्फ़ नाव से ही पहुँचा जा सकता है। चूँकि यह स्थल तुंगभद्रा नदी में स्थित एक द्वीप पर है, यहाँ तक पहुँचने व वापस आने के लिए प्रशासन द्वारा नाव चलाया जाता है। यह सेवा शाम 4 बजते ही समाप्त कर दी जाती है। ऐसे में, पुलिस स्थानीय लोगों से पूछताछ कर ये जानने की कोशिश कर रही है कि क्या उन्होंने संदिग्ध लोगों को देखा था?

पुलिस ने बताया कि बदमाशों ने पवित्र स्थल की खुदाई व तोड़फोड़ से पहले कुछ कर्मकांड किया था, जिससे साफ़ होता है कि यह कृत्य ‘खजाना खोजी’ अपराधियों का ही है। दक्षिण भारत के पराक्रमी राजा कृष्णदेवराय के खजाने की खोज में ऐसी कई वारदातें सामने आई हैं। पाँच महीने पहले भी कुछ बदमाशों ने हम्पी में प्राचीन स्थलों को नुकसान पहुँचाया था।

पटना: समान काम के लिए समान वेतन मॉंग रहे शिक्षकों पर बरसाई लाठियाँ

बिहार में संविदा शिक्षकों का आंदोलन जारी है। समान काम के लिए समान वेतन माँग रहे शिक्षकों पर गुरुवार को राजधानी पटना में पुलिस ने लाठियाँ बरसाई।

विधानसभा के पास प्रदर्शन कर रहे संविदा शिक्षकों को तितर-बितर करने के लिए पुलिस ने न सिर्फ़ आँसू गैस के गोले छोड़े, बल्कि वाटर कैनन का भी इस्तेमाल किया। इसके बाद शिक्षकों पर लाठियाँ भाजी गईं। उनकी जम कर पिटाई की गई।

पुलिस की कार्रवाई में कई शिक्षक घायल हुए। उग्र शिक्षकों ने ट्रैफिक जाम किया। ऐसा पहली बार हैं, जब शिक्षकों के 18 संगठन एक साथ सरकार के ख़िलाफ़ एकजुट हुए हैं। शिक्षकों ने गर्दनीबाग़ क्षेत्र का मेन गेट तोड़ डाला। बिहार में नियमित शिक्षकों को संविदा पर बहाल शिक्षकों से ज्यादा वेतन मिलता है। संविदा पर बहाल शिक्षकों की माँग है कि उन्हें भी उतना ही वेतन मिले, जितना नियमित शिक्षकों को दिया जाता है।

‘समान काम-समान वेतन’ के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने भी इन शिक्षकों के ख़िलाफ़ ही फ़ैसला सुनाया था। बिहार के सभी जिलों से शिक्षक विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लेने के लिए पटना पहुँचे थे।

कर्नाटक: विश्वासमत पर नहीं हुई वोटिंग, सदन में धरने पर बैठे बीजेपी विधायक

कर्नाटक में चल रहे सियासी ड्रामे का खात्मा होता नहीं दिख रहा है। एचडी कुमारस्वामी की अगुआई वाली कॉन्ग्रेस-जदएस सरकार के विश्वासमत प्रस्ताव पर गुरुवार को मतदान के बिना ही विधानसभा अध्यक्ष रमेश कुमार ने सदन की कार्यवाही कल तक के लिए स्थगित कर दी। इसके विरोध में बीजेपी विधायक सदन में ही धरने पर बैठ गए हैं। उन्होंने पूरी रात धरने पर बैठने का ऐलान किया है।

विधायकों के एक वर्ग के बागी होने के कारण 14 महीने पुरानी कॉन्ग्रेस-जदएस सरकार पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। आज सत्ताधारी गठबंधन के 19 विधायक गैरहाजिर रहे। इनमें मुंबई में डटे वे 15 बागी विधायक भी शामिल हैं, जिनके लिए बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि उन्हें सदन की कार्यवाही में भाग लेने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।

बागी विधायकों ने विधानसभा अध्यक्ष पर उनके इस्तीफे जान-बूझकर स्वीकार नहीं करने का आरोप लगाते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। सदन में कॉन्ग्रेस विधायक श्रीमंत पाटिल की गैर हाजिरी को लेकर भी सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी नोंक-झोंक हुई है। सूत्रों के अनुसार पाटिल को मुंबई के एक निजी अस्पताल में इलाज के लिए भर्ती कराया गया है। बुधवार को सीने में दर्द और सांस लेने में शिकायत के बाद वे मुंबई के लिए रवाना हो गए थे। लेकिन, कॉन्ग्रेस ने बेंगलुरू पुलिस को एक पत्र भेज उन्हें अगवा करने का आरोप बीजेपी पर लगाया है।

इससे पहले विश्वासमत के दौरान पूर्व मुख्यमंत्री और कॉन्ग्रेस नेता सिद्धरमैया ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला देते हुए बहुमत परीक्षण टालने की मॉंग की। वहीं, सत्ताधारी दल का संख्या बल कम होने के कारण कुमारस्वामी ने एक पंक्ति का प्रस्ताव पेश किया जिसमें कहा गया था कि सदन ने उनके नेतृत्व वाले मंत्रिमंडल में विश्वास जताया।

जैसे ही प्रस्ताव लाया गया विपक्षी भाजपा नेता बीएस येद्दियुरप्पा खड़े हो गए और उन्होंने कहा कि विश्वास मत की प्रक्रिया एक ही दिन में पूरी होनी चाहिए। भाजपा इस बात को लेकर आशंकित है कि सत्तारूढ़ गठबंधन मतदान होने से पहले संख्या बल को मजबूत करने के अंतिम प्रयास में जितना संभव हो सके उतना समय बिताने के लिए बहस को लंबा खींचने की कोशिश करेगा।

बहस के दौरान ही बीजेपी के एक प्रतिनिधिमंडल ने राज्यपाल वजुभाई वाला से मुलाकात कर मामले में हस्तक्षेप का अनुरोध किया था। इसके बाद राज्यपाल ने स्पीकर को पत्र लिखकर गुरुवार को ही विश्वासमत परीक्षण कराने पर विचार करने को कहा था। इसे लेकर बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष बीएस येदियुरप्पा ने कहा कि चाहे रात के 12 ही क्यों न बज जाएँ, लेकिन विश्वासमत का परीक्षण आज ही होना चाहिए। इन सबके बावजूद स्पीकर रमेश कुमार ने बिना विश्वासमत परीक्षण कराए विधानसभा की कार्यवाही शुक्रवार तक के लिए स्थगित कर दी।

बीजेपी विधायकों ने स्पीकर से राज्यपाल के पत्र का जवाब देने की मॉंग की है। वहीं, कॉन्ग्रेस विधायक एचके पाटिल ने बहस में भाग लेते हुए कहा कि संविधान के मुताबिक राज्यपाल सदन की कार्यवाही में दखल नहीं दे सकते।

BBC और The Print को चाहिए खूब सारा ‘सेक्स’, वामपंथी करेंगे आपस में ही प्रेम

हर गली-मोहल्ले-कस्बे में लगे हाशमी दवाखाना वालों के इश्तिहार देखकर लगता है कि इस देश की सबसे बड़ी समस्या वामपंथ, आतंकवाद या फिर गरीबी नहीं बल्कि मर्दाना कमजोरी है। लेकिन हाशमी दवाखाने के इश्तिहारों को अब गली मोहल्ले से अपना पता बदल लेना चाहिए। अब हाशमी दवाखाने का पता तो छोड़िए, उनका धंधा भी मंदा होने के कगार पर है, क्योंकि BBC जैसा टक्कर का प्रतिद्वंद्वी मैदान में उतर चुका है और वो सुनिश्चित कर रहा है कि देश से मर्दाना कमजोरी को जड़ से मिटा दिया जाए। BBC का छोटा भाई The Print भी कम नहीं है। वो भी अनुसरण करते हुए एक कदम आगे बढ़ चुका है।

इस समस्या (मर्दाना कमजोरी) की जिम्मेदारी BBC ने अपने कन्धों पर ले ली है। हालात ये हैं कि गिरती लोकप्रियता के कारण BBC हाशमी दवाखाना के विज्ञापनों की तरह ही अपने होमपेज पर सेक्स ही सेक्स लिखते हुए घूम रहा है। हाशमी दवाखाना वालों के मार्केट पर इससे जरूर गहरी चोट लग सकती है। BBC और The Print एक दिन में इतनी बार “सेक्स” बेच रहे हैं कि लोगों को यकीन नहीं हो रहा है कि Jio ने वाकई में पॉर्न वेबसाइट्स को बंद कर दिया है क्योंकि उनका मानना है कि BBC और The Print वेबसाइट्स तो आराम से चल जाती हैं।

BBC पर लोग क्या पढ़ने जाते हैं, इस चित्र के माध्यम से समझें –

अंग्रजों द्वारा त्यागी गई शौच से जन्मे इस संस्थान यानी, BBC ने इस दौड़ में देश के युवाओं की मदद भी की है। देश का युवा तड़प रहा था कि सरकार आए दिन अश्लील वेबसाइट्स को ब्लॉक कर दे रही है। इसके बाद सबसे बड़ा कुठाराघात देश के युवा की भावनाओं पर रिलायंस Jio ने ‘गन्दी वेबसाइट्स’ बंद कर के किया। देश के युवा की भावनाओं पर यह दोतरफा हमला इतना मजबूत था कि हर कोई निराश था।

लेकिन पत्रकारिता की परिभाषा रचने वाले BBC ने युवाओं का मान रखा और अपनी वेबसाइट के चप्पे-चप्पे को सेक्स ही सेक्स, भरपूर सेक्स से लबरेज कर दिया। मनोहर कहानियाँ पढ़ने के शौक़ीन लोगों को पहले पता रहता था कि उन्हें इससे सम्बंधित ‘सामग्री’ किस चौराहे, रेलवे स्टेशन और कबाड़ी मार्केट में जाकर खरीदनी है। लेकिन पत्रकारिता के नाम पर भी यही सब धड़ल्ले से कर पाने का हौंसला BBC और The Print ही जुटा पाए हैं।

BBC को अपनी सेक्स ही सेक्स से लबरेज ख़बरों का प्रिंट निकालकर उसे समोसा पैक करने वालों को गिफ्ट कर देना चाहिए क्योंकि “Why should TOI have all the fun” –

यह भी पढ़ें: नेहरूघाटी सभ्यता में पला BBC मोदी विरोध में बीमा और इलाज का अंतर भूला

जिस तरह से सूर्यवंशम फिल्म में हीरा ठाकुर की बस की टिकट बेचने के लिए अनुपम खेर और कादर खान ने बस को ‘सुपर डीलक्स’ बस बना कर टिकट बेचा था, उसी तरह से BBC खबर बेचने के लिए सेक्स ही सेक्स बेच रहा है। ख़ास बात ये है कि पत्रकारिता के इस नेहरू-स्तम्भ यानी, BBC का मुकाबला अब मशहूर सॉफ्ट पॉर्न वेबसाइट लाइम्स ग्रुप के साथ नहीं बल्कि हाशमी दवाखाने के साथ है।

‘ट्रैफिक’ के लिए हीरा ठाकुर द्वारा अपनाई गई वह कालजयी तरकीब जिससे BBC को प्रेरणा मिली है –

BBC आज के समय में पत्रकारिता के नाम पर तैमूर के डायपर से लेकर हिटलर के लिंग की नाप-छाप करने वाले लोगों की ही सुपरलेटिव डिग्री से ज्यादा कुछ नहीं है। आखिर क्या कारण है कि अपने अन्न का पहला हिस्सा नेहरू के लिए रखने वाला जर्नलिज़्म का ये नाम आज ‘ट्रैफिक’ और TRP के लिए सेक्स बेचने को मजबूर हो गया है? इससे अच्छा तो रवीश कुमार का प्राइम टाइम शो है, जो सिर्फ पतंजलि के विज्ञापनों पर जिन्दा है। लेकिन मैं यह उम्मीद करते हुए चल रहा हूँ कि जल्द ही NDTV भी TRP के लिए ट्रोल्स की जगह सनी लियोनी पर आधरित ‘विशेष प्रोग्राम’ चलाना शुरू करेगा। क्योंकि देश में डर का माहौल तो वैसे भी है ही।

The Print और सेक्स का रिश्ता बहुत पुराना है –

द प्रिंट नामक कथित न्यूज़ वेबसाइट और सेक्स का सम्बन्ध वैसा ही है जैसे एक वामपंथी का क्रांति से होता है। यानी, अगर शब्दकोष से क्रांति शब्द को हटा दिया जाए तो वह बिना पानी की मछली जैसा विचलित होने लगता है। वो तड़पने लगता है। इसी तरह द प्रिंट लोकसभा चुनाव से पहले भी यह कारनामा करते हुए देखा गया था।
इस बार द प्रिंट ने सोशल मीडिया एप्प के कंधे पर बन्दूक रखकर अपनी मानसिकता का जहर उड़ेला है।

ट्रैफिक और कंटेंट की कमी से जूझ रहे द प्रिंट की रिपोर्ट कहती है कि लोगों की सेक्स लाइफ पर राजनीति का असर देखने को मिल रहा है। लगे हाथ द प्रिंट ने बताया कि दिल्ली के निवासी जो पेशे से वकील हैं, का कहना है कि “I don’t f**k fascists” यानी, “मैं किसी फासिस्ट के साथ संभोग नहीं करूँगा।”

इसके साथ ही द प्रिंट ने एक पूरी रिसर्च बिठाकर अलग-अलग नामों के जरिए लोगों के सेक्स करने की प्राथमिकताओं को ‘Culture’ यानी संस्कृति की कैटेगरी में रखा है। जबकि लोगों की सेक्स की प्राथमिकताएँ उनके लाइफस्टाइल का हिस्सा होती हैं।

इसी लेख में यह भी बताया गया है कि वामपंथियों को फ़ासिस्ट पसंद नहीं हैं, लेकिन यह नहीं लिखा गया है कि क्या फ़ासिस्ट वामपंथियों से सेक्स करने के लिए मरे जा रहे हैं? क्या फासिस्ट हर वामपंथी को ‘कुंडी मत खरकाओ राजा, सीधा अंदर आओ राजा’ के सन्देश देते फिर रहे हैं?

इसी आर्टिकल में द प्रिंट किसी वीर मिश्रा नामक युवक से, जिसे समलैंगिक (Gay) बताया गया है, का भी प्रकरण जोड़ते हुए बताया है कि वीर मिश्रा डेटिंग एप्स पर ‘गौ-रक्षकों’ को देखकर हैरान था। वीर मिश्रा बताता है कि गौ-रक्षकों ने डेटिंग एप्स पर अपने परिचय में अपने गौरक्षक होने की बात लिखी थी। द प्रिंट ने वीर मिश्रा के हवाले से लिखा है कि समलैंगिकों की डेटिंग साइट पर भाजपा समर्थक भी थे।

प्रिंट की इस रिसर्च की पोल इसी बात से खुल जाती है कि LGBTQIA या धारा 377 पर फैसला भाजपा सरकार के कार्यकाल में ही आया है। दूसरी बात, प्रिंट को मिश्रा की बातों पर ही नहीं रुकना चाहिए। अगर ‘रिसर्च’ आर्टिकल लिख रहे हैं तो टिंडर पर शेखर गुप्ता (प्रिंट के फाउंडर) को पेड प्रोफ़ाइल बना कर देखना चाहिए कि वास्तव में ऐसे प्रोफ़ाइलों का प्रतिशत कितना है। सिर्फ किसी XYZ मिश्रा ने कहा और आपने मान लिया यह बात ज्यादा हैरान कर देने वाली है। साथ ही, द प्रिंट को समलैंगिक मिश्रा को यह जरूर याद दिलाना चाहिए कि मन में पूर्वग्रह पालना समलैंगिकों को शोभा नहीं देता क्योंकि उनकी कम्यूनिटी से बेहतर ये बातें कोई नहीं जानता। जिस सरकार ने फ़ैसले को न तो चुनौती दी, न संसद से फ़ैसला पलटा, उन्हें ऐसा कहना कि वो समलैंगिकों को देश से बाहर निकालना चाहते हैं, बेकार का लॉजिक है।

किसी भी व्यक्ति की सेक्सुअल प्रीफ्रेंस एकदम निजी मामला होता है। अखबारों के ‘वर-वधू चाहिए’ वाले पन्नों में यह दिख ही जाता है कि किस व्यक्ति को कैसी बहू या पति चाहिए। लेकिन इसके लिए एक पूरा मनगढंत लेख छापकर फर्जी के आँकड़ों को दर्शा कर यह साबित करने का प्रयास करना कि कौन वामपंथियों से और कौन राइट विन्गर्स से सेक्स करना चाहता है, एकदम निम्नस्तरीय पत्रकारिता को ही दर्शाता है।

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हमारी राय :

हमारी राय यह है कि The Print और BBC को कम से कम पत्रकारिता के नाम पर सेक्स की खेती करने से बचना चाहिए। मनगढ़ंत साहित्य लिखने की यदि फिर भी रुचि हो तो, रेलवे स्टेशन के बाहर ऐसा पढ़ने की इच्छा रखने वालों को बहुत सारा सामान बेहद सस्ते दामों पर मिल जाता है। सूर्यवंशम फिल्म में भी हीरा ठाकुर ने कहा था कि जिस बस के टिकट बेचने के लिए वो एक महिला का इस्तेमाल कर रहे हैं, वह बस उसके बाबू जी के नाम पर है। हीरा ठाकुर से प्रेरणा लेते हुए BBC को भी यह स्मरण करना चाहिए कि इस BBC ने नेहरूघाटी सभ्यता का नमक खाया था और उसे इस तरह से सस्ती लोकप्रियता की आँधी में नहीं गँवा दिया जाना चाहिए। रीच आएँगी, जाएँगी लेकिन BBC को हाशमी दवाखाना का विकल्प बनने से बचना चाहिए।

सेक्स, सेक्स , सेक्स और सिर्फ सेक्स का मारक मजा उठाइए BBC पर –

उपरोक्त चित्र में BBC द्वारा पूछे गए सवाल के बाद ही शायद उसने खुद हाशमी दवाखाना बनने का निर्णय लिया है।


FaceApp: Privacy के इस नंगे नाच में 15 करोड़ लोगों के चेहरे व डिटेल्स का कोई माई-बाप नहीं

आजकल आपने फेसऐप का नाम ज़रूर सुना होगा। यह एक ऐसा एप्लीकेशन है, जिसके द्वारा आप अपने चेहरे में मनचाहा बदलाव कर ख़ुद को बदले हुए रूप में देख सकते हैं। आप गंजे होंगे तो कैसे दिखेंगे, आप बूढ़े होंगे तो कैसे दिखेंगे- यह ऐप सब कुछ बताता है। सिनेमा सेलेब्स से लेकर क्रिकेट खिलाड़ियों तक, न सिर्फ़ भारत बल्कि विदेश में भी लोग इस ऐप के दीवाने हो रहे हैं। इस एप्लीकेशन को एक रशियन कम्पनी ने डिजाइन किया है। अंतरराष्ट्रीय न्यूज़ पोर्टल्स में इसे लेकर चिंता ज़ाहिर की जा चुकी है। चिंता का कारण है लोगों की प्राइवेसी। एक ऐसी विदेशी कम्पनी को आपके डिटेल्स मिल रहे हैं, जिसके साथ आपका कोई कागज़ी समझौता नहीं है।

सबसे पहले तथ्य की बात कर लेते हैं। आँकड़ों की मानें तो फेसऐप के पास 15 करोड़ लोगों के चेहरे, नाम व अन्य डिटेल्स हैं। उम्र वाली फ़िल्टर के लिए वायरल हो रहे इस ऐप के यूजर एग्रीमेंट की बात करें तो इसके पास ‘कभी न ख़त्म होने वाला’ और ‘जिसमें बदलाव न हो सके’, ऐसा लाइसेंस है। इस रॉयल्टी-फ्री लाइसेंस के मुताबिक़, यह ऍप्लिकेशन आपके डिटेल्स के साथ कुछ भी कर सकता है, उसका मनचाहा प्रयोग कर सकता है। सबसे बड़ी बात यह कि उससे जो कमाई होगी, आपको उसके रुपए भी नहीं मिलेंगे।

अब आते हैं भारत सरकार के ‘आधार’ की ओर। जब आधार कार्ड को तमाम सरकारी योजनाओं में मैंडेटरी किया गया था ताकि योजना का लाभ सही व्यक्ति तक पहुँचे, तब लोगों ने इसका विरोध शुरू कर दिया था। ‘हम अपने बायोमेट्रिक डिटेल्स किसी को क्यों दें?’, ‘हमारी पुतलियों का विवरण लेकर सरकार न जाने क्या कर दे’, ‘सरकार को हमारे प्राइवेट डिटेल्स में दिलचस्पी है’, ‘हमारे इन डिटेल्स का ग़लत इस्तेमाल हुआ तो?’ जैसे कई सवाल पूछे गए थे। ये सवाल उन देश की सरकार से पूछे जा रहे थे, जो लगभग 130 करोड़ लोगों का प्रतिनिधित्व करते हैं। आधार कार्ड मंत्रियों से लेकर उच्चाधिकारियों तक के बने, लेकिन प्राइवेसी की चिंता कुछेक पत्रकारों व ज़रूरत से ज्यादा जागरूकता दिखाने वाले सेलेब्स को ही हुई।

आज जब फेसऐप इतना वायरल हो रहा है और लोगों को यह तक नहीं पता कि यह किस देश की कम्पनी है, इसके सर्वर कहाँ-कहाँ हैं, इसका मालिकाना हक़ किन-किन लोगों व कंपनियों के पास है और उनके डिटेल्स को लेकर यूजर एग्रीमेंट में क्या लिखा है- सभी कथित सामाजिक कार्यकर्ता गहरी नींद में हैं और सुसुप्त अवस्था में ध्यानमग्न हैं। जैसे ही सरकार जन-कल्याणकारी योजनाओं में ग़रीबों, मजदूरों व किसानों को लाभ पहुँचाने के लिए आधार के उपयोग पर बात करेगी, ये सभी लग जाएँगे। आधार से देश को करोड़ों की बचत हुई है और योजनाओं का लाभ सही व्यक्ति तक पहुँचा है, केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने हाल में में संसद में अपना आधार कार्ड दिखाते हुए ये बातें समझाई थीं।

फेसऐप का हक़ रखने वाली कम्पनियाँ मेटाडाटा को छाँट कर अलग रख रही हैं। ‘द वर्ज’ के अनुसार, ऐसा कई अन्य सोशल ऐप्स व अन्य ऐप्स भी कर रहे हैं लेकिन फेसऐप का रुख ज्यादा आक्रामक हो सकता है। विशेषज्ञों ने इस ओर ध्यान दिलाया है कि फेसऐप तो डिवाइस में रख कर भी उन फोटोज को फ़िल्टर कर सकता है जिसे यूजर द्वारा चुना गया हो, फिर भी उन फोटोज को सर्वर पर क्यों अपलोड किया जाता है? इसका मतलब है कि कम्पनी उन फोटोज को अपने सर्वर में सुरक्षित रख रही है। फेसऐप का इस बारे में क्या कहना है? कम्पनी का कहना है कि यूजर के निवेदन पर उनसे जुड़ा डाटा हटाया जा सकता है।

कम्पनी का कहना है कि यूजर एक प्रक्रिया के तहत निवेदन कर सकता है कि उससे जुड़े डाटा को हटा दिया जाए। लेकिन साथ ही कम्पनी यह भी कहती है कि अभी टीम ‘ओवरलोडेड’ है। और सबसे बड़ी बात कि साइबर छेड़खानी करने वालों का अड्डा बन चुके रूस के एप्पलीकेशन पर विश्वास करना मुश्किल है क्योंकि अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में जिस तरह से रूसी साइबर माफियाओं, हैकरों द्वारा छेड़खानी की गई, उससे जुड़े कई मुक़दमें यूएसए की अदालतों में चल रहे हैं और वहाँ की जाँच एजेंसियाँ भी सकते में हैं। कम्पनी ने हालाँकि यह भी दावा किया है कि डाटा को रूस नहीं भेजा जा रहा है।

जबकि ‘टर्म्स एंड कंडीशन’ वाले कॉलम को इस तरह की भाषा में लिखा जाता है कि यूजर बिना समाय गँवाए उसे टिक कर के आगे बढ़ जाए। उसमें साफ़-साफ़ लिखा है कि जहाँ कम्पनी की फैसिलिटी हो वहाँ पर डाटा ट्रांसफर किया जा सकता है। कहाँ पर फैसिलिटी है? रूस में? उस सेक्शन में उनका पता भी रूस वाला ही है। एक और बड़ी बात यह भी है कि अधिकतर मामलों में फेसऐप को यूजर सिर्फ़ एक फोटो की जगह पूरी गैलरी एक्सेस करने की अनुमति दे देते हैं। गैलरी में तो आपके और आपके परिजनों व मित्रों के कई फोटोज होते हैं? इससे फ़र्क़ नहीं भी पड़ता तो आपके बैंक डिटेल्स और आईडी कार्ड जैसी चीजों के स्क्रीनशॉट्स भी तो होते हैं।

अंत में, जो बातें ऊपर हिंदी में लिखी हैं, उसे अंग्रेजी में उसके ओरिजिनल शब्दों में देखिए। फेसऐप के टर्म्स में लिखा है:

आपके यूजर कंटेंट को कहीं भी किसी भी रूप में प्रयोग में लाया जा सकता है

इसीलिए जो चीजें भारतीय कंपनियों के मालिकाना हक़ में है, उससे जुड़े विवाद के लिए आप अदालत जा सकते हैं। लेकिन, विदेशी कंपनियों का मालिकाना हक वाले ऐप्स (जिनका सर्वर भी भारत में नहीं है) से जुड़े विवाद में आप कहाँ जाएँगे? अगर भारत में इसे प्रतिबंधित कर दिया जाए, गूगल इसे प्ले स्टोर से हटा डी- फिर भी यह उपलब्ध रहेंगी और लोग इसे डाउनलोड करने में सक्षम रहेंगे। इसीलिए, कम से कम ‘प्राइवेसी’ वाले टर्म्स ज़रूर पढ़ लें। और हाँ, भारत सरकार के ख़िलाफ़ आधार के विरोध में मोर्चा खोलने वाले लोगों से जरूर पूछें कि फेसऐप को लेकर उनकी चिंता क्या है?

बाकी आधार और फेसऐप में अंतर है। आधार जन-कल्याण के लिए हैं, फेसऐप मनोरंजन के लिए। आधार के डाटा की ज़िम्मेदारी भारत सरकार के पास है जबकि फेसऐप का मालिकाना हक़ रूस की एक प्राइवेट कम्पनी के पास। आधार में आप जब चाहें तब अपने विवरण में बदलाव कर सकते हैं (सही बदलाव), फेसऐप में आपका डाटा के एक बार सर्वर पर जाने के बाद आपको पता ही नहीं चलता कि वह डिलीट हुआ भी या नहीं। आधार से सम्बंधित शिकायतों के निवारण के लिए स्थानीय से लेकर उच्च-न्यायिक स्तर तक कई सुविधाएँ हैं, जबकि फेसऐप के स्तर पर कुछ गड़बड़ियाँ होती हैं तो आप शायद ही कुछ कर सकें। जिस मामले में अमेरिका कुछ न कर पाया हो, उस मामले में आप कहाँ हैं- ख़ुद सोचिए।