Monday, April 6, 2020
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अगर आपको भी लगता है ‘कलाकार’ की कोई सीमा नहीं होती, तो ये आपके लिए है

अक्सर भारतीय मीडिया तंत्र का एक बेहद बड़ा वर्ग ‘सत्संग’ और अपने 'ताकतवर आदर्श लिबरल' होने के नाम पर पाकिस्तानी कलाकारों को भारत में काम करने दिए जाने की वकालत करता नजर आता है।

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आशीष नौटियाल
पहाड़ी By Birth, PUN-डित By choice

आखिरकार पाकिस्तान ने भारतीय वायुसेना के पायलट को भारत को वापस सौंपने की बात कर दी है। मीडिया का ‘क्यूट तंत्र’ पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान को मसीहा साबित करने में जुट चुका है। सागरिका घोष तो जज्बातों में इतना बह गई कि इमरान खान की घोषणा के अगले ही पल ट्वीटकर अपनी वैचारिक विकलांगता का प्रमाण दे डाला, जो यह साबित करता है कि वो किसी लोकतंत्र, सेना या सिपाही की लड़ाई नहीं बल्कि सिर्फ और सिर्फ किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ अपनी विचारधारा को श्रेष्ठ साबित करने की जंग लड़ रही है।

उन्होंने अपने ट्वीट में लिखा है कि आख़िरकार साबित हो गया कि लिबरल्स की देशभक्ति ‘मस्कुलर राष्ट्रवाद’ से ऊपर है। वो ये ट्वीट करने के लिए 2 दिन भी रुक गई यही बड़ी बात मानी जानी चाहिए। उन्हें पढ़ने वालों के लिए ये सुकून देने वाली बात होती अगर वो एक बार भी पाकिस्तान की तरफ से रोजाना दोहराई जाने वाली आतंकवादी घटनाओं के साथ-साथ हाफ़िज़ सईद पर भी कार्रवाई करने की अपील करते।

वहीं NDTV की एक पत्रकार ने आज शाम ही ट्वीट कर जेनेवा संधि पर बात करने वालों का मजाक बनाते हुए लिखा है, “कल से भक्तों को गूगल पर जेनेवा संधि सर्च करते हुए देखकर मजा आ रहा है।”  ऐसे लोग पत्रकारिता में स्थापित होकर बैठे हैं, ये बात सबसे ज्यादा चौंका देने वाली है। इसका सीधा सा जवाब ये हो सकता है कि ‘भक्त’ प्रॉपेगैंडा से ज्यादा अपने सैनिकों की सुरक्षा के लिए चिंतित हैं इसलिए वो हर संभावना के प्रति आशावान हैं।  

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कल पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान के प्रेस में दिए गए ‘शान्ति वार्ता के प्रयास’ के बयान पर तमाम मीडिया गिरोह कल से ही स्खलित हुए जा रहा था। मीडिया गिरोह का नाम लेते ही अगर आपके दिमाग में तुरंत बरखा दत्त, सागरिका घोष जैसे पत्रकारिता के नाम पर कलंकों के नाम स्वतः स्मरण हो आते हैं, तो आप एकदम सही खेल रहे हैं।

ये वही मीडिया का समुदाय विशेष है जो जैश-ए-मोहम्मद द्वारा प्रायोजित फिदायीन हमले में 40 भारतीय सैनिकों की निर्मम हत्या के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर तंज करता है कि आखिर 56 इंच अब क्यों चुप है उसे पाकिस्तान पर करने में क्या समस्या आ रही?

इसके कुछ ही दिन बाद जब सेना अपने रौद्र रूप में आकर जवाबी कार्रवाई में इन्हीं आतंकवादियों के अड्डों को तबाह करने की बात कहती है तो पहले यह सबूत माँगता है और उसके बाद दुहाई देता है कि नरेंद्र मोदी का यह हिंसक तरीका सही नहीं है। आतंकवादियों के लिए इनके मन में अचानक से ममता फूट पड़ती है।

फिर 2 दिन बाद अपने 300-400 लाडले आतंकवादियों की मौत से बौखलाया पाकिस्तान अपनी औकात में आकर भारतीय सेना में घुसकर उधम मचाने का प्रयास करता है और दावा करता है कि एक भारतीय पायलट उनकी कैद में है। भारत का यही बिन पेंदी का मीडिया गिरोह एक बार फिर सक्रिय होकर नरेंद्र मोदी को निशाना बनाकर शान्ति और सहिष्णुता की माला जपना शुरू कर देता है। इसके बाद यह मीडिया तंत्र वायुसेना द्वारा की गई एयर स्ट्राइक को ‘नरेंद्र मोदी का अहंकार और चुनाव जीतने की लालसा’ बताता है।  

हक़ीक़त ये है कि समाज और मीडिया अपनी संवेदनशीलता खो चुका है। अपने मुद्दे इस कारण से नहीं चुनता है कि ये वाकई में कहना सही या गलत होगा बल्कि इस वजह से चुनता है कि किस के विरोध में अपने अजेंडा को दिशा देनी है।

अक्सर भारतीय मीडिया तंत्र का एक बेहद बड़ा वर्ग ‘सत्संग’ और अपने ‘ताकतवर आदर्श लिबरल’ होने के नाम पर पाकिस्तानी कलाकारों को भारत में काम करने दिए जाने की वकालत करता नजर आता है। यह मुद्दा कभी राहत फ़तेह अली खान की वजह से गर्माता है तो कभी किसी अन्य पाकिस्तानी कलाकार की वजह से। इन आदर्श लिबरलों का मानना हमेशा यही रहा है कि ‘कला’ की सीमा नहीं होती है।

मजे की बात ये है कि कल भारतीय वायुसेना के पायलेट अभिनन्दन की तस्वीरें मीडिया में आने के बाद से ही, वही पाकिस्तान के भिखारी कलाकार भारतीय सेना पर अभद्र टिप्पणियाँ करते हुए अपनी कुंठा खुलेआम व्यक्त कर रहे हैं। उन्हीं में से एक नाम है वीणा मालिक का जो भारतीय TV सीरियल बिग बॉस में आ चुकी हैं। वो लगातार अपने ट्वीट के जरिए बॉलीवुड से लेकर भारतीय सेना को निशाना बना रही है।

क्या ये सिर्फ एक संयोग है कि वीणा मलिक उन्हीं लोगों का मजाक बनाते देखी गई जिन्हें अक्सर हमारे देश की ‘मीडिया का समुदाय विशेष’ अपना निशाना बनाता है? जैसे कंगना रानौत, अक्षय कुमार और निःसन्देह, भारतीय सेना। वास्तव में यह सिर्फ मामला वीणा मलिक जैसी वाहियात हस्तियों के बारे में नहीं बल्कि इनके उन प्रशंसकों को लेकर है जो इस सबके बावजूद इनके लिए अपने दिल में अलग जगह रखते हैं।

इनकी वकालत करने वाले लोग वही हैं जो अपने सैनिकों की चिंता करने वालों को ‘भक्त’ कहते हैं। सस्ती लोकप्रियता और चर्चा में बने रहने के लिए अक्सर TV कलाकार और मीडिया तंत्र इस तरह की हरकत करता हुआ आए दिन नजर आता है। वरना यह मात्र संयोग तो नहीं हो सकता है कि राजदीप सरदेसाई से लेकर बरखा दत्त और सागरिका घोष हर सुबह उठते ही जनता की गालियाँ सुनकर हैं। स्पष्ट है कि ये लोग सिर्फ चर्चा में बने रहने की लालसा के कारण ऐसा करते हैं, जिनका कि वास्तविक मुद्दे से कोई लेना देना नहीं होता है।

जहाँ तक पाकिस्तान के कलाकारों की है तो ये हम पहले भी बता चुके हैं कि वो रुपए और रोजगार के लिए काफिरों के देश में भी जाकर गा और बजा सकते हैं।

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