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Video: दिल्ली की खाली सड़क पर खड़ी गाय को दिनदहाड़े कार में भरकर ले गए 3 युवक

दिल्ली के शास्त्री पार्क इलाके से गोवंश को दिनदहाड़े उठाकर ले जाने की एक वीडियो सामने आई है। वीडियो में देख सकते हैं कि सड़क पर शांति से खड़ी एक गाय को जबरदस्ती तीन युवक अपने साथ कार में भरकर ले गए।

‘सुदर्शन न्यूज’ के एडिटर इन चीफ सुरेश चव्हाणके ने इस वीडियो को अपने ट्विटर पर साझा किया है। वह लिखते हैं, “दिल्ली मेवात के रिकॉर्ड तोड़ रही है। शास्त्री पार्क क्षेत्र में गाय को बीच सड़क से उठा कर जबरन कार में डाला जा रहा है।” वह पूछते हैं कि जब विशाल शरीर का गोवंश ऐसे गायब हो रहा तो बहन-बेटियाँ व बच्चे कितने सुरक्षित हैं?”

ये वीडिया किस समय और किस दिन की है ऑपइंडिया इसकी पुष्टि नहीं करता। इससे पहले सुदर्शन न्यूज़ द्वारा ही जनवरी 05, 2021 को यह वीडियो अपने ट्विटर अकाउंट से शेयर किया गया था। मगर, सुरेश चव्हाणके के पोस्ट पर उत्तर पूर्वी दिल्ली पुलिस ने ट्वीट करके जानकारी दी है कि वो इस मामले में एक्शन ले चुके हैं और अपराध में शामिल अभियुक्तों की पहचान और गिरफ्तारी के प्रयास किए जा रहे हैं।

शास्त्री पार्क, उत्तर पूर्वी दिल्ली का एक इलाका है। इसके आस-पास मुस्लिम बहुल आबादी के क्षेत्र हैं। इस इलाके से सामने आई वीडियो में हम देख सकते हैं कि एक खुली सड़क पर दो गाय खड़ी थीं। तभी एक कार वहाँ उन्हें देख कर रुकी और तीन युवकों ने बाहर उतर कर उनमें से छोटी गाय को कार में घुसाया और उसे लेकर वहाँ से फरार हो गए।

दिन-दहाड़े दिल्ली की सड़क पर इस घटना को अंजाम दिया गया। लोग जब विरोध करने वहाँ पहुँचते तब तक कार जा चुकी थी। वीडियो के अंत में कुछ लोगों को शॉल ओढ़े कैमरे में भाग कर सामने आते दिख रहे हैं। लेकिन वह भी कार को रोक पाने में सफल नहीं होते।

बता दें कि दिल्ली में गोवंशों के साथ बर्बरता के मामले पिछले दिनों कुछ ज्यादा खबरों में आए हैं। अभी हाल में दिल्ली के द्वारका सेक्टर-23 स्थित पोचनपुर गाँव में एक नाले से गायों का शव और इनके अवशेष मिले थे। पशु चिकित्सक, फॉरेंसिक और क्राइम टीम ने मौके पर पहुँच कर जाँच भी की थी बाद में मामले में अज्ञात लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज हुआ था और दो पुलिसकर्मियों को लापरवाही के आधार पर सस्पेंड भी कर दिया गया था।

यूपी में टेरर फंडिंग और रोहिग्याओं की तलाश में ATS की छापेमारी: अब्दुल मन्नान सहित आधा दर्जन से ज्यादा संदिग्ध गिरफ्तार

उत्तर प्रदेश में टेरर फंडिंग और रोहिंग्या निवासियों की तलाश में बुधवार को यूपी ATS ने बड़ी कार्रवाई की है। एटीएस ने संदिग्धों की तलाश में संत कबीर नगर स्थित खलीलाबाद, बस्ती और अलीगढ़ समेत कई जिलों में छापेमारी की है। इस दौरान खलीलाबाद से जेई अब्दुल मन्नान सहित करीब आधा दर्जन से ज्यादा संदिग्ध लोगों को ATS ने हिरासत में लिया है।

रिपोर्ट के अनुसार, यूपी आतंकवाद निरोधक दस्ता शाम तक किसी बड़े राज से पर्दाफाश कर सकती है। वहीं इस छापेमारी की भनक एसटीएस ने स्थानीय पुलिस वालों को भी नहीं लगने दी है। यूपी एटीएस अभी पूरे मामले की तफ्तीश में जुटी है।

एनबीटी के रिपोर्ट के अनुसार एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया, “यह छापेमारी अवैध रूप से रह रहे रोहिंग्याओं को लेकर की गई है। हम फाइनेंस एंगल से भी केस को इनवेस्टिगेट कर रहे हैं। यूपी एटीएस लखनऊ में इस संबंध में प्रेस कॉन्फ्रेंस भी करने वाली है।”

इसके अलावा यूपी एटीएस की एक टीम महाराष्ट्र में भी छापेमारी कर रही है, जिसमें उसकी मदद महाराष्ट्र एटीएस कर रही है। वहीं तेलंगाना में हैदराबाद में भी छापेमारी की खबर है। अभी छापेमारी से जुड़ी कोई भी आधिकारिक जानकारी एटीएस की ओर से साझा नहीं की गई है।

इससे पहले 29 दिसंबर को एटीएस ने गोरखपुर में गोलघर के बलदेव प्लाजा स्थित नईम एंड संस मोबाइल शाप समेत फर्म की दो दुकानों पर छापा मारा था। इस मामले में भी ATS को टेरर फंडिंग, हवाला और देश विरोधी तत्वों की खुफिया जानकारी मिली थी। करीब आठ घंटे से ज्यादा चली इस जाँच में टीम ने दुकान में लगे कंप्यूटर की हार्ड डिस्क और अन्य दस्तावेज कब्जे में लिया था।

गौरतलब है कि यूपी पुलिस की ATS ने दो संदिग्ध बांग्लादेशी आतंकियों को सहारनपुर से गिरफ्तार किया था। गिरफ्तार संदिग्ध आतंकियों के नाम इकबाल और फारुख था। पुलिस ने दोनों आरोपितों के पास से फर्जी आधार कार्ड, वोटर आईडी कार्ड समेत तमाम अन्य दस्तावेज बरामद किए थे।

‘मनमोहन को PM पद दान में मिला, जबकि मोदी ने हासिल किया, कॉन्ग्रेस खो चुकी है अपना करिश्माई नेतृत्व’: प्रणब मुखर्जी

भारत के पूर्व राष्ट्रपति और कॉन्ग्रेस के कद्दावर नेता रहे प्रणब मुखर्जी का पिछले साल ब्रेन सर्जरी के बाद निधन हो गया था। हालाँकि, आखिरी समय में उन्होंने अपने संस्मरण को पूरा किया था। अब उनकी लिखी किताब ‘द प्रेजिडेंशियल ईयर्स’ के सामने आने के बाद इसके कई पहलुओं पर हर तरफ चर्चा भी शुरू हो गई है।

पूर्व राष्ट्रपति ने यह पुस्तक पिछले साल अपने निधन से पहले लिखी थी। मंगलवार (जनवरी 5, 2021) को यह पुस्तक बाजार में आई। उनकी आत्मकथा ‘The Presidential Years’ (द प्रेसिडेंसियल ईयर्स) के अनुसार, कॉन्ग्रेस का अपना करिश्माई नेतृत्व खत्म होने की पहचान नहीं कर पाना 2014 के लोकसभा में उसकी हार के कारणों में से एक रहा।

पूर्व राष्ट्रपति ने आत्मकथा में उल्लेख किया है कि 2014 के लोकसभा चुनाव की मतगणना वाले दिन उन्होंने अपने सहायक को निर्देश दिया था कि उन्हें हर आधे घंटे पर रुझानों के बारे में सूचित किया जाए। उन्होंने लिखा है, ‘‘नतीजों से इस बात की राहत मिली कि निर्णायक जनादेश आया, लेकिन किसी समय मेरी अपनी पार्टी रही कॉन्ग्रेस के प्रदर्शन से निराशा हुई।’’ 

उन्होंने पुस्तक में लिखा है, ‘‘यह यकीन कर पाना मुश्किल था कि कॉन्ग्रेस सिर्फ 44 सीट जीत सकी। कॉन्ग्रेस एक राष्ट्रीय संस्था है जो लोगों की जिदंगियों से जुड़़ी है। इसका भविष्य हर विचारवान व्यक्ति के लिए हमेशा सोचने का विषय होता है।’’ 

कॉन्ग्रेस की कई सरकारों में केंद्रीय मंत्री रहे मुखर्जी ने 2014 की हार के लिए कई कारणों का उल्लेख किया है। उन्होंने लिखा है, ‘‘मुझे लगता है कि पार्टी अपने करिश्माई नेतृत्व के खत्म होने की पहचान करने में विफल रही। पंडित नेहरू जैसे कद्दावर नेताओं ने यह सुनिश्चित किया कि भारत अपने अस्तित्व को कायम रखे और एक मजबूत एवं स्थिर राष्ट्र के तौर पर विकसित हो। दुखद है कि अब ऐसे अद्भुत नेता नहीं हैं, जिससे औसत लोगों की सरकार बन गई।’’ 

प्रणब मुखर्जी ने अपनी इस किताब में ये खुलासा भी किया है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 8 नवंबर, 2016 को नोटबंदी की घोषणा करने से पहले उनके साथ इस मुद्दे पर कोई चर्चा नहीं की थी, लेकिन इससे उन्हें हैरानी नहीं हुई क्योंकि ऐसी घोषणा के लिए आकस्मिकता जरूरी है।

अपनी पुस्तक में प्रणब मुखर्जी ने लिखा, “मैंने जिन दो पीएम के साथ काम किया, उनके लिए प्रधानमंत्री बनने का मार्ग बहुत अलग था। सोनिया गाँधी द्वारा डॉ सिंह को पद की पेशकश की गई थी। दूसरी ओर, नरेंद्र मोदी 2014 में ऐतिहासिक जीत के लिए भाजपा का नेतृत्व करने के बाद लोकप्रिय पसंद के माध्यम से प्रधानमंत्री बन गए।”

प्रणब मुखर्जी ने लिखा है कि कई नेताओं ने उनसे कहा था कि अगर 2004 में वो प्रधानमंत्री बने होते तो 2014 में इतनी करारी हार नहीं मिलती। प्रणब मुखर्जी ने आगे लिखा है कि उनके राष्ट्रपति बनने के बाद कॉन्ग्रेस ने दिशा खो दी थी और सोनिया गाँधी सही फैसले नहीं कर पा रही थी। मनमोहन सिंह का ज्यादा वक्त अपनी सरकार बचाने में गया जिसका बुरा असर सरकार के कामकाज पर पड़ा।

इसके साथ ही उन्होंने अपनी पुस्तक में खुलासा किया कि भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू अगर चाहते तो आज नेपाल भी भारत का हिस्सा होता, लेकिन उन्होंने इस ऑफर को ठुकरा दिया। इसमें उन्होंने लिखा है कि अगर तब जवाहरलाल नेहरू की जगह पर इंदिरा गाँधी प्रधानमंत्री होतीं, तो वो इस मौके को नहीं छोड़तीं और इसे लपक लेतीं। उन्होंने याद दिलाया है कि इंदिरा ने सिक्किम के मामले में भी ऐसा ही किया था।

प्रणब मुखर्जी की किताब ‘द प्रेजिडेंशियल ईयर्स’ को लेकर उनके बेटे और बेटी में टकराव देखने को मिला। पूर्व राष्ट्रपति के बेटे-बेटी पिछले महीने ही ट्विटर पर उनकी किताब के प्रकाशन को लेकर आपस में भिड़ गए। अभिजीत मुखर्जी ने कहा कि उनके पिता की किताब को उनकी मर्जी के बिना न छापा जाए। वहीं शर्मिष्ठा मुखर्जी ने कहा कि कोई सस्ती लोकप्रियता के लिए उनके पिता की किताब को छपने से न रोके। ऐसा करना पूर्व राष्ट्रपति का अपमान होगा।

‘कानून रद्द नहीं होगा, चाहें तो सुप्रीम कोर्ट जा सकते हैं’: कृषि मंत्री का किसान नेताओं को दो टूक जवाब

सरकार और किसानों के बीच सातवें दौर की वार्ता भी बेनतीजा रही। अब अगले दौर की बैठक 8 जनवरी को आयोजित होगी। किसानों के कानून रद्द करने की माँग पर सरकार ने एक संयुक्त कमेटी बनाने का प्रस्ताव रखा। लेकिन किसान नेता इस पर राजी नहीं हुए। किसानों की एक ही माँग है कि सरकार एमएसपी पर लिखित में आश्वासन दे और तीनों कानूनों को रद्द करने का वादा करे।

हालाँकि, कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने स्पष्ट कर दिया है कि तीनों कृषि कानूनों को रद्द नहीं किया जाएगा। इसके लिए किसान चाहें तो सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकते हैं। यह बातें किसान मजदूर संघर्ष समिति के सरवन सिंह पंधेर ने कहा, जिन्होंने बैठक में भाग लिया था। उन्होंने कहा, “हम पंजाब के युवाओं से लंबी दौड़ की तैयारी करने का आग्रह करते हैं। हम गणतंत्र दिवस पर एक बड़ा जुलूस निकालेंगे।”

वहीं सुप्रीम कोर्ट ने किसानों के प्रदर्शन और केंद्र सरकार के तीन नए कृषि कानून को चुनौती देने वाली सभी याचिकाओं पर बुधवार (जनवरी 6, 2021) को सुनवाई करते हुए सीजेआई ने कहा कि सभी याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई की जाएगी। सीजेआई ने कहा कि कोर्ट नए कृषि कानून के खिलाफ दाखिल याचिका पर सोमवार (जनवरी 11, 2021) को सुनवाई करेगी। साथ ही उन्होंने कहा कि वो किसानों की समस्याओं को समझते हैं।

बता दें कि केंद्र सरकार के तीन नए कृषि कानून को रद्द करने के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की गई है। कृषि कानूनों के खिलाफ ये याचिका वकील एमएल शर्मा ने दाखिल की है। याचिका में वकील ने केंद्र सरकार की ओर से लाए तीनों कानूनों को खत्म करने की माँग की है। याचिका में कहा गया है कि नए कृषि कानून कॉर्पोरेट के हितों को प्रोमोट करने वाले और किसानों को नुकसान की ओर ले जाने वाले हैं।

गौरतलब है कि पिछले साल केंद्र द्वारा लाए गए तीन नए कृषि कानूनों को वापस लेने की माँग पर अड़े हजारों किसान बीते एक महीने से भी ऊपर वक्त से दिल्ली की सीमाओं पर डटे हैं। यह गतिरोध खत्म करने के लिए केंद्र सरकार किसान संगठनों के साथ कई दौर की वार्ता कर चुकी हैं लेकिन ये सभी बेनतीजा रही हैं। 

सातवें दौर की बैठक के बाद कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने कहा कि किसानों के कानून को वापस लेने की ज़िद पर अड़े रहने के कारण कोई नतीजा नहीं निकल सका। तोमर का कहना था, “हमलोग चाहते थे कि किसान नेता तीनों कृषि कानूनों के एक-एक क्लॉज पर बात करें। हमलोग किसी नतीजे पर नहीं पहुँच सके क्योंकि किसान नेता कानून को वापस लिए जाने की अपनी माँग पर अड़े हुए थे।”

दरअसल, केंद्र सरकार तीन नए कृषि कानून लेकर आई है, जिनमें सरकारी मंडियों के बाहर खरीद, अनुबंध खेती को मंजूरी देने और कई अनाजों और दालों की भंडार सीमा खत्म करने जैसे प्रावधान किए गए हैं। इसको लेकर किसान लगातार आंदोलनरत हैं और इन कानूनों को वापस लेने की माँग कर रहे हैं। किसानों का कहना है कि ये कानून मंडी सिस्टम और पूरी खेती को प्राइवेट हाथों में सौंप देंगे, जिससे किसान को भारी नुकसान उठाना होगा। किसान इन कानूनों को खेती के खिलाफ कह रहे हैं और तीनों कानूनों को वापस नहीं होने तक आंदोलन जारी रखने की बात कह रहे हैं। वहीं सरकार का कहना है कि किसानों को विपक्ष ने भ्रम में डाला है, ये कानून उनके फायदे के लिए हैं।

बैनर के विवाद में शिवसेना-NCP कार्यकर्ताओं के बीच जमकर चलीं कुर्सियाँ-हाथ-गालियाँ: देखें वीडियो

महाराष्ट्र में ‘औरंगाबाद’ का नाम ‘संभाजी नगर’ करने के मामले में महाविकास आघाड़ी सरकार में पहले ही फूट पड़ती दिखाई दे रही थी और अब खबर है कि मंगलवार (जनवरी 6, 2021) को गठबंधन की दो प्रमुख पार्टियों ( NCP और शिवसेना) के कार्यकर्ता भिवंडी में चुनाव आयुक्त के सामने ही एक दूसरे से भिड़ गए।

दोनों पार्टियों के कार्यकर्ताओं में झगड़ा एक अनाधिकृत बैनर को लेकर उस समय शुरू हुआ जब एनसीपी के जिलाध्यक्ष अपनी ही साथी पार्टी के दावेदार की शिकायत लेकर चुनाव आयुक्त कार्यालय में पहुँच गए और वहाँ आपसी बहस के बाद दोनों पक्षों में जुबानी जंग हाथापाई में बदल गई।

बता दें कि महाराष्ट्र सरकार में दोनों पार्टियाँ भले ही एक गठबंधन का हिस्सा हैं लेकिन भिवंडी नगर निगम को लेकर दोनों में विवाद काफी पुराना है। भिवंडी में जल्द ही ग्राम पंचायत चुनाव होने जा रहे हैं, जिसके सम्बन्ध में मंगलवार को शिवसेना और एनसीपी के उम्मीदवार नामांकन भरने गए थे। एनसीपी अध्यक्ष गुलवी ने इस दौरान चुनाव आयुक्त के कार्यालय में शिवसेना के दावेदार प्रवीण गुलवी के बैनर का विरोध किया। इस घटना की बाद में एक वीडियो भी सामने आई। वीडियो में दोनों पक्ष एक दूसरे को गाली गलौच करते और एक दूसरे पर कुर्सी उठाकर मारते देखे जा सकते हैं।

घटना की बाबत भिवंडी चुनाव आयुक्त डॉ सुनील भालेराओ (Dr Sunil Bhalerao) ने संज्ञान लिया है और दोनों समूहों के ख़िलाफ़ सरकारी काम में बाधा डालने के आरोप में केस दर्ज किया है। इस संबंध में शांतिनगर पुलिस थाने में शिकायत दर्ज हुई है।

उल्लेखनीय है कि पिछले दिनों भी महा विकास आघाडी गठबंधन में गठबंधन के सहयोगियों के बीच टकराव स्पष्ट नजर आया था। यह टकराव कॉन्ग्रेस और शिवसेना के बीच औरंगाबाद का नाम बदलकर ‘संभाजी नगर’ करने के प्रयासों के बीच बढ़ता हुआ देखा गया था।

शिवसेना काफी समय से से औरंगाबाद का नाम बदलकर संभाजी नगर करने की माँग करती रही थी। यह माँग उस वक्त भी की गई थी, जब शिवसेना भाजपा के साथ गठबंधन सरकार का हिस्सा थी। लेकिन कॉन्ग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष और महाराष्ट्र के कैबिनेट मंत्री बालासाहेब थोराट ने औरंगाबाद को संभाजी नगर करने का विरोध किया। इसके ही एक दिन बाद ही, शिवसेना ने अपने मुखपत्र ‘सामना’ के माध्यम से शहर का नाम बदलने के विषय को जोरशोर से उठाया था और कहा था कि नाम बदलने से महाराष्ट्र में महा विकास अघाड़ी सरकार के भविष्य पर कोई असर नहीं पड़ेगा।

लेख में बताया गया था कि कैसे शिवसेना के संस्थापक बाल ठाकरे ने 30 साल पहले इसका नाम संभाजी नगर रखा था और लोगों ने इसे तहे दिल से स्वीकार भी किया था। ‘सामना’ के सम्पादकीय में कहा गया कि नाम को आधिकारिक रूप से लागू करने के लिए बस दस्तावेजों की औपचारिकताओं को छोड़ दिया गया था। आगे कॉन्ग्रेस पार्टी पर कटाक्ष करते हुए इस लेख में कहा गया कि औरंगाबाद का नाम बदलने से देश के धर्मनिरपेक्षता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा और राज्य के अधिकांश कॉन्ग्रेसी शिवसेना द्वारा शहर का नाम बदलने की माँग से सहमत होंगे।

‘लव जिहाद’ के खिलाफ बने कानूनों पर रोक लगाने से SC का इनकार, तीस्ता सीतलवाड़ जैसों ने लगाई थी कई याचिकाएँ

हाल ही में विभिन्न राज्य सरकारों ने ‘लव जिहाद’ के खिलाफ कानून बनाया, ताकि महिलाओं की प्रताड़ना रोकी जा सके। उत्तर प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और असम में ऐसे कानून बने, जबकि कर्नाटक, मध्य प्रदेश और हरियाणा में इसकी तैयारी चल रही है। ये सभी भाजपा शासित राज्य हैं। इन कानूनों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में धड़ल्ले से याचिकाएँ दाखिल की गई हैं, लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने इन कानूनों पर रोक लगाने से इनकार कर दिया है।

हालाँकि, इन याचिकाओं को सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई हेतु स्वीकार भी कर लिया है। इन याचिकाओं में ‘लव जिहाद’ के खिलाफ बने राज्य सरकारों के कानूनों की संवैधानिक वैधता पर सवाल उठाए गए हैं। याचिकाकर्ताओं ने इस बात का डर जताया है कि अन्य राज्यों में भी इसी तरह के कानून आ रहे हैं, जो ठीक नहीं है। इन कानूनों को धोखे से शादी और जबरन धर्मांतरण को रोकने के लिए लाया गया है, ताकि महिलाएँ इसका शिकार न बनें।

याचिकाकर्ताओं का कहना है कि किसी भी शादी को लेकर ये साबित करना कि ये धर्मांतरण के लिए नहीं किया गया है – कपल्स पर ही इसका सारा दारोमदार थोप दिया गया है, जो आपत्तिजनक है। लेकिन, जब उन्होंने इन कानूनों के लागू होने पर तत्काल प्रभाव से रोक लगाने की माँग की, तो मुख्य न्यायाधीश एसए बोबडे की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि इसके लिए याचिएकाकर्ताओं को उन राज्यों के हाईकोर्ट्स में जाना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वो इन मुद्दों पर चर्चा कर के दलीलें सुनने के पक्ष में है, बजाए कि इसे अभी रोकने के। इस मामले में राज्य सरकारों का पक्ष जानने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (जनवरी 4, 2021) को उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड की सरकारों को नोटिस भी जारी किया। इस पीठ में जस्टिस वी रामासुब्रमण्यम और जस्टिस एएस बोपन्ना भी शामिल थे। विकास ठाकरे और तीस्ता सीतलवाड़ के NGO ने ये याचिकाएँ दायर की हैं।

इन याचिकाकर्ताओं ने अपने वकीलों के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट में आरोप लगाया कि ‘लव जिहाद’ कानून की आड़ में पुलिस ने कई निर्दोष लोगों को उठा लिया है। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने बताया कि इलाहबाद हाईकोर्ट में ऐसी याचिकाओं पर पहले से ही सुनवाई चल रही है। उन्होंने कहा कि जब कई हाईकोर्ट्स में केस पेंडिंग हैं तो सुप्रीम कोर्ट को सुनना चाहिए। CJI ने कहा कि वो देखेंगे कि ये कानून ‘दमनकारी’ (आरोपों के हिसाब से) हैं या नहीं।

हाल ही में उत्तर प्रदेश में लव जिहाद पर बने कानून के खिलाफ 104 रिटायर्ड आईएएस अधिकारियों ने सीएम योगी आदित्यनाथ को चिट्ठी लिखते हुए इसे नफरत की राजनीति का केंद्र बताया था। जिस पर योगी सरकार के मंत्री ने पलटवार करते हुए कहा कि उन अधिकारियों को सेवा के दौरान गलत तरीके से हासिल की गई संपत्ति को खोने का डर सता रहा है। हालाँकि, इससे दोगुने से भी ज्यादा अधिकारियों ने पत्र लिख कर कानून का समर्थन भी किया।

बदायूँ गैंगरेप: प्राइवेट पार्ट में रॉड डाल कर फाड़ी गई महिला की आँत, खून रोकने के लिए ठूँसी गई रुई और कपड़ा

उत्तर प्रदेश के बदायूँ में अधेड़ उम्र की महिला के साथ हुआ दुष्कर्म दिल्ली के निर्भया कांड की याद दिलाने वाला है। पूरा मामला उघैती थाना क्षेत्र का है। वहाँ एक 50 वर्षीय महिला रविवार (जनवरी 3, 2021) को मंदिर जाने के लिए घर से तो जरूर निकली। लेकिन बाद में खून से लथपथ उसकी लाश मिली। पोस्टमार्टम हुआ तो उसके साथ हुई नृशंसता का खुलासा हुआ।

रिपोर्ट के मुताबिक, महिला के साथ केवल गैंगरेप ही नहीं किया गया बल्कि उसके प्राइवेट पार्ट में रॉड डाली गई और उसके भीतर के अंगों (आंँतों) को भी फाड़ दिया गया। दुष्कर्म के दौरान महिला का एक पैर और पसली भी तोड़ी गई। जाँच में पता चला कि महिला के शरीर से सारा खून बह जाने के कारण उसकी मौत हुई।

शव का पोस्टमार्टम करते हुए स्वयं तीन महिला डॉक्टरों का पैनल हैरान हो गया। जाँच में उन्होंने पाया कि वारदात को अंजाम देने वाले आरोपितों ने पहले महिला के प्राइवेट पार्ट में रॉड घुसाई और जब खून तेजी से बहने लगा तो उसे रोकने के लिए उन्होंने गुप्तांग में कपड़े व रुई घुसा दी। घटनास्थल पर महिला के सारे कपड़े खून से सने मिले थे।

महिला के साथ हैवानियत की हद पार करने वालों में एक का नाम महंत बाबा सत्यनारायण है और दूसरा उसका साथी वेदराम व तीसरा सत्यनारायण का ड्राइवर जसपाल है। कथिततौर पर, तीनों ने महिला के साथ पहले बर्बतापूर्वक बलात्कार किया जिसके बाद उसी रात 12 बजे उसकी मौत हो गई। 

बता दें कि इस घटना को लेकर महिला के परिजनों ने पुलिस पर आरोप लगाया है कि वह सूचित किए जाने के बावजूद घटनास्थल पर समय से नहीं पहुँचे। और जब पहुँचे तब शव को पोस्टमार्टम के लिए भेजा गया।

मीडिया खबरों के अनुसार, महंत ने महिला के कुएँ में गिरने की कहानी बना कर पहले दोनों आरोपितों को मदद के लिए बुलाने की बात कही और ऐसे जाहिर किया जैसे पता ही नहीं कि हुआ क्या। इसके बाद पुलिस उन्हीं के बयान के आधार पर टालमटोल करने लगी। वहीं इंस्पेक्टर राघवेंद्र प्रताप सिंह ने दावा भी किया कि उन्होंने महिला कांस्टेबल से महिला का शरीर दिखवाया था, लेकिन उसके शरीर पर ऐसा कोई चोट का निशान नहीं मिला था। 

पुलिस की लापरवाही के उजागर होने के बाद एसएचओ को निलंबित कर दिया गया है। वहीं तीनों आरोपितों में दो को पुलिस द्वारा गिरफ्तार किया जा चुका है। बदायूँ के एसएसपी ने बताया कि 50 साल की महिला की मौत के मामले में पुलिस ने आईपीसी की धारा 302 और 376 डी के तहत मामला दर्ज किया है। फरार आरोपित की धड़-पकड़ के लिए लगातार छापेमारी की जा रही है।

टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर के अनुसार, मृतक महिला के पति का कहना है कि घटना वाले दिन देर रात महंत और उसके दो लोग उनकी पत्नी को अपने साथ लेकर आए और उनके सामने उसके कुएँ में गिरने की झूठी कहानी बनाई। पति के मुताबिक, महिला उस समय जिंदा थी, इससे पहले वह तीनों से कुछ पूछ पाते, वह सारे गाड़ी छोड़ कर वहाँ से फरार हो गए।  थोड़ी देर में महिला ने भी दम तोड़ दिया। उसके गुप्तांग समेत शरीर के कई हिस्सों पर कई चोटें थी। महिला के बेटे ने कहा, “हमें पक्का पता था कि पुजारी और उसके साथी झूठ बोल रहे हैं। वह मेरी माँ को अस्पताल नहीं ले गए।”

‘इस्लाम में हॉट मम्मियों का विग पहनना हराम’: अभिनेत्री को ‘ब्लैक विडो’ के कॉस्ट्यूम में देख भड़के इस्लामी कट्टरपंथी

एक मलेशियन अभिनेत्री ने ‘ब्लैक विडो’ के कॉस्ट्यूम में तस्वीरें सोशल मीडिया पर अपलोड कर दी, जिसके बाद इस्लामी कट्टरपंथियों ने उनके खिलाफ बयानबाजी शुरू कर दी है। मलेशिया की रेबेक्का नूर अल इस्लाम (Rebecca Nur Al Islam) ने ‘ब्लैक विडो’ फिल्म की स्टाइल में पोज देते हुए इंस्टाग्राम पर तस्वीरें शेयर की, जिसमें वो लाल रंग की विग पहने हुए दिख रही हैं। इससे पहले वो हर तस्वीर में हिजाब में ही दिखती थीं। कट्टरपथिंयों ने इसे हराम करार दिया।

रेबेक्का नूर अल इस्लाम की इन तस्वीरों को देख कर इस्लामी कट्टरपंथी भड़क गए और उन्होंने विग पहनने को इस्लाम में हराम बताया। उनका कहना है कि हिजाब की जगह इस लाल रंग के विग से भी असली बाल ढके ही हुए हैं, लेकिन फिर भी ये इस्लाम में जायज नहीं है। इसके अलावा उन्होंने एक पार्टी की कुछ तस्वीरें भी शेयर की, जिसमें वो हँसी-खेल में एक गेम खेलती हुई दिख रही हैं, जिससे इस्लामी नाराज दिखे।

असल में उस ‘गेम’ में 34 वर्षीय अभिनेत्री की आँखों पर पट्टी बँधी हुई थी और उन्हें कई पुरुषों को छू कर पहचानना था कि उनमें से उनका पति कौन है। हालाँकि, गौर से देखा जाए तो ‘ब्लैक विडो’ के कॉस्ट्यूम में भी वो काले रंग का हिजाब पहनी हुई हैं और उसके ऊपर से ही उन्होंने विग लगाया था। नूर मोहम्मद नामक यूजर ने सलाह दी कि वो अपना नाम ‘रेबेक्का अल-जाहिल’ रख लें। मुहम्मद फैज नामक फेसबुक यूजर ने भी इसे हराम बताया।

रेबेक्का के ‘गेम’ को लेकर भी नाराज दिखे कई मुस्लिम

रामी जाम्ब नामक व्यक्ति ने उन्हें सलाह दी कि हिजाब पहनना अल्लाह की सलाह है और उन्हें इतनी समझ होनी चाहिए। इंस्टाग्राम पर उनके 7.33 लाख फॉलोवर्स हैं, जिनमें से कई ने उन्हें हिजाब पहनने और विग न पहनने की सलाह दी। एक ने तो यहाँ तक लिख डाला कि ‘इस्लाम में हॉट मम्मियों का विग पहनना हराम है।’ उसने लिखा कि ये कलंक है। मलय भाषा में भी कइयों ने उन्हें इस्लाम के तौर-तरीकों को लेकर ज्ञान दिया।

हाल ही में एक टीवी प्रेजेंटर ने बताया था कि एक मौलवी ने कहा था कि भौंहों के साथ कुछ भी छेड़छाड़ करना इस्लाम में महिलाओं के लिए हराम है। इसके बाद टीवी प्रेजेंटर सायरा खान ने बिकनी में अपनी तस्वीर भेजी, जिसमें वो पेट के बल लेटी हुई थीं। उन्होंने ‘Peach’ नामक फल की इमोजी भेजी और मौलवी को लिखा – “ऐ पिछड़े प्रागैतिहासिक डायनासोर, मेरे  (Peach Emoji) को किस कर लो।” इसके बाद एक इंस्टाग्राम यूजर ने उन्हें धमकाया था कि अगर वो अपने जीवन का महत्व समझती हैं तो इस्लाम को इन सबसे दूर रखें।

#करें_योगदान_रामलला_के_धाम: रामभक्तों पर कट्टरपंथियों के पथराव और मजहबी घृणा के बीच जारी है वर्चुअल मुहिम

राम मंदिर निर्माण हेतु समूचे भारत में चंदा इकट्ठा करने के लिए मुहीम चलाई जा रही है। इसका मकसद सिर्फ यही है कि सैंकड़ों लोगों के सपने को आम जनता के योगदान से साकार किया जाए। इसके लिए हर प्रदेश में रामभक्त अपनी रैली करके भक्तिमय माहौल बना रहे हैं। इसी का नतीजा है कि आज सुबह ट्विटर पर हैशटैग #करें_योगदान_रामलला_के_धाम ट्रेंड करने लगा, जिसमें लोगों ने राम मंदिर बनाने के लिए योगदान देने का आह्वान किया।

हैशटैग के साथ हो रहे ट्वीट को देख कर यही लगता है कि राम मंदिर को लेकर देश के कोने कोने में उत्साह है। कहीं वीएचपी द्वारा 4 लाख ग्रामों में जाकर 11 करोड़ परिवारों से योगदान देने की बात बताई जा रही है तो कहीं मंदिर का प्रस्तावित रूप साझा करके अनुरोध किया जा रहा है कि इसके निर्माण में सहयोग की बहुत आवश्यकता है। अब तक इस वर्चुअल मुहीम पर करीब 37 हजार के करीब ट्वीट किए जा चुके हैं और आज सुबह से ये टॉप 10 में ट्रेंड कर रहा है।

मगर, इस माहौल में ये ध्यान देने वाली बात है कि रामभक्तों के लिए घर घर जाकर चंदा देने के लिए लोगों को प्रेरित करना इतना भी आसान कार्य नहीं है। जगह जगह पर कट्टरपंथी ताक लगाए बैठे हैं। अभी पिछले दिनों इंदौर जिले के चाँदन खेड़ी गाँव में 29 दिसंबर 2020 को हिंदूवादी संगठन के लोगों पर पथवराव की घटना सामने आई थी। पूरे हमले में 12 लोग के घायल हुए थे। पड़ताल में पता चला कि मस्जिद के सामने कुछ कार्यकर्ता हनुमान चालीसा का पाठ कर रहे थे और रैली निकालने वाले जय श्रीराम कह रहे थे, जिससे पूरा विवाद पैदा हुआ और बात पत्थरबाजी व तोड़फोड़ तक पहुँच गई। 

इसी प्रकार उज्जैन के बेगमबाग से भी ऐसा ही दृश्य देखने को मिला। वहाँ ‘रामनिधि संग्रहण’ रैली निकालने के दौरान मुस्लिम समुदाय के अराजक तत्वों ने हिन्दू संगठन पर पथराव किया था। इसके बाद दोनों समुदायों के बीच झड़प हुई और इलाके में तनाव व्याप्त हो गया था। वहाँ खड़ी कई गाड़ियों को क्षतिग्रस्त कर दिया गया था। तोड़फोड़ और पथराव की इस घटना में लगभग 10 लोग घायल हुए थे।

बता दें कि एक ओर जहाँ वर्चुअल मुहीम अपने जोरों पर है और दूसरी ओर कट्टरपंथियों’ का चेहरा भी हिंदूवादी संगठनों की रैलियों पर पत्थरबाजी करके सामने आ रहा है, तो ऐसे में ये जानने की आवश्यकता है कि हकीकत में राम मंदिर के लिए लोग कितना बढ़ चढ़ कर योगदान रहे हैं और किस तरह कई मुश्किलें आने के बाद भी रामभक्तों के प्रयास सफल हो रहे हैं।

दो दिन पहले की खबर है कि मात्र 2 दिन में गाजियाबाद से राम मंदिर के लिए लोगों ने 5 करोड़ रुपए का दान दे दिया । एक अकेले रामभक्त ने पूरे 2 करोड़ 51 लाख 1 रुपए दिए हैं। हर प्रसाद नाम के इस भक्त का कहना है कि वह अपनी जवानी से राम मंदिर आंदोलन में जुड़े रहे हैं और अब अपनी आँखों के सामने जब उसको बनता देख रहे हैं तो वह कोई कमी नहीं छोड़ना चाहते। उन्होंने इस पावन कार्य के लिए पर्चियाँ बनवाई हैं, जिसमें कम से कम दान की राशि 10 रुपए रखवाई गई है, वहीं ज्यादा से ज्यादा में दान श्रद्धालु अपनी इच्छानुसार दे सकते हैं।

केवल अधिकृत ट्रस्ट को ही दें अपना योगदान

पिछले दिनों राम मंंदिर निर्माण के नाम पर, आस्था के नाम पर कुछ लोग ठगी करने लगे थे। जिसके कारण आपको भी काफी सावधान रहने की जरूरत है, ताकि आपके साथ कोई भी ट्रस्ट या व्यक्ति धार्मिक आस्था के नाम पर पैसे न ऐंंठ सकें। अगर आप अपनी आस्था से दान देना चाहते हैं तो राम मंदिर निर्माण के लिए बनाए गए अधिकृत ट्रस्ट को ही दें। जिसके लिए डीएम ने जिस वेबसाइट के बनने की बात कही है।

कोरोना गाइडलाइंस की अनदेखी.. नाबालिगों को बुलाकर परोसी अश्लीलता: मुनव्वर फारूकी की जमानत याचिका दूसरी बार रद्द

अपने तथाकथित हास्य कार्यक्रमों के जरिए हिन्दू देवी-देवताओं को निशाना बनाने वाले कॉमेडियन मुनव्वर फारूकी (Munawar faruqui) की जमानत याचिका लगातार दूसरी बार खारिज हो गई। इंदौर के सत्र न्यायलय ने उसे मंगलवार (जनवरी 5, 2021) को जमानत देने से इनकार कर दिया। भाजपा के एक स्थानीय विधायक के बटे ने उसके खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी। अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश यतींद्र कुमार गुरु ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद ये आदेश दिया।

मुनव्वर फारूकी गुजरात के जूनागढ़ का रहने वाला है। इंदौर के एक कार्यक्रम में हिन्दू देवी-देवताओं पर अभद्र टिप्पणी करने के कारण लोगों ने उसकी पिटाई कर के साथियों सहित पुलिस को सौंप दिया था। मुनव्वर फारूकी के साथ-साथ उसके साथी नलिन यादव की जमानत याचिका भी ख़ारिज हो गई। उसने ही इस कार्यक्रम का आयोजन किया था। उसके वकील ने मामला राजनीतिक दबाव में दर्ज किए जाने का आरोप लगाया था।

वकील ने कोर्ट में ये भी दावा किया कि इन दोनों के खिलाफ लगाए गए आरोप अस्पष्ट हैं। उसने कहा कि ये दोनों कलाकार हैं और नववर्ष के अवसर पर इंदौर में आयोजित कार्यक्रम में उन्होंने ऐसी कोई भी टिप्पणी नहीं की थी, जिससे किसी की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचे। हालाँकि, अभियोजन पक्ष के वकील विमल मिश्रा ने जमानत याचिका पर आपत्ति जताते हुए कहा कि कार्यक्रम अश्लीलता से भरा था और उसमें नाबालिग लड़के-लड़कियों को भी बुलाया गया था।

उन्होंने कहा कि कोरोना वायरस संक्रमण के आलोक में जारी किए गए दिशानिर्देशों के हिसाब से इस कार्यक्रम के लिए प्रशासन की अनुमति लेना अनिवार्य था, लेकिन ऐसा नहीं किया गया। शहर के एक कैफे में आयोजित इस कार्यक्रम में हिन्दू देवी-देवताओं का मजाक भी बनाया गया। इससे पहले शनिवार को भी इन दोनों की जमानत याचिका ख़ारिज कर दी गई थी। इस मामले में कुल 5 आरोपित हैं।

ये मामला तुकोगंज थाना क्षेत्र का है। स्थानीय भाजपा विधायक के बेटे एकलव्य सिंह गौड़ ने जनवरी 1,2021 की रात को थाने में मुनव्वर फारूकी समेत 5 को आरोपित बनाते हुए मामला दर्ज कराया था। कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित के साथ-साथ गोधरा कांड का मजाक बनाए जाने का भी आरोप है। एकलव्य अपने साथियों के साथ कार्यक्रम में आए थे और उन्होंने पाया कि कॉमेडी के नाम पर आपत्तिजनक सामग्रियाँ परोसी जा रही हैं।

‘लाइव हिंदुस्तान’ की खबर के अनुसार, पुलिस अधिकारियों ने जानकारी दी है कि इस विवादास्पद कार्यक्रम को लेकर 5 आरोपितों के खिलाफ भारतीय दंड विधान (IPC) की धारा 295-ए (किसी वर्ग की धार्मिक भावनाओं को आहत करने के इरादे से जान-बूझकर किए गए विद्वेषपूर्ण कार्य), धारा 298 (धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने के उद्देश्य से जान-बूझकर कहे गए शब्द) और अन्य सम्बंधित प्रावधानों के तहत गिरफ्तार किया गया था।

पिछली बार सुनवाई के दौरान फारुकी के वकील अंशुमन श्रीवास्तव ने अदालत में बहस के दौरान कहा था कि यह मामला पार्टीगत राजनीति से प्रेरित होकर दर्ज कराया गया है। श्रीवास्तव ने कथित कॉमेडियन के पक्ष में पैरवी करते हुए करते हुए मामले में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के संवैधानिक प्रावधानों का हवाला दिया था। वकील अंशुमन श्रीवास्तव मध्य प्रदेश कॉन्ग्रेस कमिटी लीगल सेल के सचिव और राज्य प्रवक्ता हैं।