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खेत में काम करने गई 13 साल की दलित लड़की से गैंगरेप: आरोपित रेहान, तस्लीम, दानिश और अब्दुल गिरफ्तार

हापुड़ जिले के गढ़मुक्तेश्वर थाना क्षेत्र में शनिवार को 13 साल की दलित लड़की से गैंगरेप का मामला सामने आया है। घटना के समय लड़की अपनी दादी के साथ खेत में काम कर रही थी। कथिततौर पर उसी दौरान 4 लड़के उसे घसीट कर पास के खेत में ले गए और गैंगरेप किया।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, पड़ोस के गाँव के रहने वाले रेहान, तस्लीम, दानिश और अब्दुल दलित नाबालिग लड़की को पास के खेत में घसीट कर के गए और बेरहमी से उसका सामूहिक बलात्कार किया। इस दौरान लड़की ने अपने बचाव में काफी हाथ पैर मारे, चीखी चिल्लाई। लड़की के शोर मचाते ही चारों युवक वहाँ से भाग निकले। हालाँकि, चीख पुकार सुन घटना स्थल पर पहुँचे पीड़िता के भाई ने चारों आरोपितों को देख लिया और उनके गाँव तक पीछा किया।

रिपोर्ट के अनुसार, नाबालिग पीड़िता को घटनास्थल से बेहोशी की हालत में घर लाया गया। जिसके बाद मेडिकल जाँच में उसके साथ हुए बलात्कार और यौन उत्पीड़न की पुष्टि हुई।

पुलिस को मामले की जानकारी देते हुए परिजनों ने चारों आरोपितों के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई है। पिता की शिकायत के आधार पर पुलिस ने मामले में आईपीसी की धारा 376-डी (सामूहिक बलात्कार), एससी / एसटी और पीओसीएसओ अधिनियम की धाराओं के तहत चार आरोपितों के खिलाफ मामला दर्ज किया। वहीं मामला अनुसूचित जाति (एससी) समुदाय से जुड़ा होने की वजह से परिजनों को पुलिस सुरक्षा भी दी गई है।

वहीं मामले को तुरंत संज्ञान में लेते हुए पुलिस ने चारों आरोपितों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया है। चूँकि, सभी आरोपित मुस्लिम समुदाय से है, इसलिए इलाके में तनावपूर्ण स्थिति बनी हुई है।

मामले की गंभीरता को देखते हुए रविवार की रात एडीएम जयनाथ यादव और एएसपी सर्वेश मिश्रा ने घटना स्थल का निरीक्षण किया और पीड़िता के घर पहुँचकर, परिजनों को सांत्वना देते हुए जल्द न्याय दिलाने का भरोसा दिया। एसएसपी सर्वेश कुमार मिश्रा ने बताया कि आरोपितों ने अपना गुनाह भी कबूल कर लिया है। मामले में जल्द ही चार्जशीट दाखिल करते हुए पीड़िता को न्याय दिलाया जाएगा। पीड़ित परिवार को सरकारी प्रावधानों के अनुसार भी आर्थिक सहायता मुहैया कराई जाएगी।

वहीं गढ़मुक्तेश्वर के भाजपा विधायक कमल मलिक के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल ने भी पीड़ित परिजनों से मिलकर मामले में तेजी से कार्रवाई का आश्वासन दिया है।

‘भले उसमें सूअर का माँस हो, फिर भी कबूल है कोरोना वैक्सीन’: अरब के सर्वोच्च इस्लामी संगठन ने जारी किया फतवा

UAE के फतवा काउंसिल ने कहा है कि मुस्लिमों के लिए कोरोना वैक्सीन लेना हराम नहीं है, भले ही उसमें सूअर का माँस (Pork) ही क्यों न हो। ये संयुक्त अरब अमीरात की सर्वोच्च इस्लामी संगठन है। संस्था ने कहा है कि अगर कोरोना वैक्सीन में पोर्क जेलेटिन हो, फिर भी मुस्लिम इसका प्रयोग कर सकते हैं। अब तक ये बहस चल रही थी कि कोरोना वैक्सीन में पोर्क होने की स्थिति में मुस्लिमों को इसे लेने की अनुमति है या नहीं।

UAE की फतवा काउंसिल के अध्यक्ष शेख अब्दुल्लाह बिन बयाह ने कहा कि आज की तारीख में मनुष्य के शरीर को बचाने की जिम्मेदारी सर्वोपरि है, इसीलिए कोरोना वैक्सीन में सूअर का माँस या उससे जुड़ा कोई कंटेंट होने की स्थिति में भी इसे लिया जा सकता है। उन्होंने कहा कि ये इस्लाम के अंतर्गत आने वाले प्रतिबंधों के तहत नहीं आएगा। इस पर इस्लामी नियम-कायदे लागू नहीं होंगे। अभी मनुष्यता को बचाने की जरूरत है।

फतवा काउंसिल ने आगे कहा कि इस मामले में पोर्क जेलेटिन को दवा के रूप में देखा जाना चाहिए, किसी भोजन के रूप में नहीं। काउंसिल ने कहा कि कोरोना के कई वैक्सीन सामने आए हैं, जो दुनिया पर आई इस आपदा से मनुष्यता को बचाने का प्रयास करेंगे। कहा जा रहा है कि मुस्लिम समाज कहीं कोरोना वैक्सीन लेने से इनकार न कर दे, इसी खतरे के कारण फतवा काउंसिल ने ये व्यवस्था जारी की है।

हालाँकि, संस्था ने ये भी कहा कि अगर किसी के पास के के पास कोई अन्य विकल्प मौजूद है, तो फिर उसे सूअर का माँस वाला कोरोना वैक्सीन लेने से बचने का प्रयास किया जाना चाहिए। लेकिन किसी व्यक्ति के पास कोई अन्य विकल्प न हो तो फिर इस्लाम के नियम-कायदों को किनारे रखा जा सकता है। UAE सरकार ने उम्मीद जताई है कि इसके बाद इसे लेकर फैल रहे भ्रम को दूर किया जा सकेगा और आम राय बनेगी।

वैक्सीन निर्माता कम्पनी फाइजर, मॉडर्न, और एस्ट्राजेनेका के प्रवक्ताओं ने कहा है कि उनके COVID-19 टीकों में सूअर के माँस से बने उत्पादों का इस्तेमाल नहीं किया गया है। लेकिन कई कंपनियाँ ऐसी हैं, जिन्होंने यह स्पष्ट नहीं किया है कि उनके द्वारा विकसित की जा रही वैक्सीन में सूअर के माँस से बने उत्पादों का इस्तेमाल किया गया है या नहीं। ऐसे में इंडोनेशिया जैसे बड़ी मुस्लिम आबादी वाले देशों में चिंता फ़ैल गई है।

उधर हाल ही में एक खबर भी सामने आई थी, जिसमें बताया जा रहा था कि मुस्लिम देश कोरोना वैक्सीन के लिए हलाल सर्टिफिकेट की माँग कर रहे हैं। फाइजर, मॉडर्न और एस्ट्राजेनेका के प्रवक्ताओं ने कहा है कि पोर्क उत्पाद उनके कोरोनावायरस टीकों का एक घटक नहीं हैं। लेकिन ऐसे हालातों में मिलियन डॉलर के व्यवसाय और सीमित आपूर्ति के बीच इंडोनेशिया जैसे कुछ मुस्लिम देशों को ऐसे टीके मिलेंगे, जो अभी तक जिलेटिन मुक्त होने के लिए प्रमाणित नहीं हैं।

‘अंग्रेजों के वफादार सिख किसानों ने ही सिख क्रांतिकारियों को पकड़वाया’: उस वायसराय ने बताया था, जो बोस के हमले में बच निकला

जब यहाँ अंग्रेजों का राज था, तब भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के अगले वर्ष जन्मे लॉर्ड चार्ल्स हार्डिंग को नवंबर 1910 में भारत का गवर्नर जनरल बना कर भेजा गया था और वो अप्रैल 1916 तक इस पद पर रहा। अपना कार्यकाल पूरा कर वो वापस ब्रिटेन के केंट लौटा और वहीं शानों-शौकत की ज़िंदगी व्यतीत करते हुए अगस्त 1944 में 86 वर्ष की आयु में उसकी मृत्यु हुई। लेकिन, अगर रास बिहारी बोस सफल हो जाते तो वो दिसंबर 23, 1912 को ही मारा जाता, लेकिन एक हमले में बच जाने के कारण उसकी उम्र 32 वर्ष और बढ़ गई।

जब वो हाथी से जा रहा था, तब दिल्ली में ठण्ड के मौसम में बोस ने उस पर बम फेंका था। छाता लिए खड़ा उसका नौकर तो मारा गया, लेकिन लॉर्ड हार्डिंग बच निकला। उसके हाथ-पाँव में चोटें आईं और उसका कंधा फट गया। उसकी पत्नी भी इस हमले में बच निकली और हाथी व महावत को भी कुछ नहीं हुआ। इसे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में ‘दिल्ली कांस्पीरेसी केस’ के रूप में भी जाना जाता है।

मई 1916 में जब वो इंग्लैंड पहुँचा था तो न्यूयॉर्क टाइम्स ने उसका इंटरव्यू लिया था, जिसमें उसने भारत में काम करने के दौरान अपने अनुभवों के बारे में बात की थी। इस इंटरव्यू से एक चीज साफ़ है कि जो भी अंग्रेजों का साथ देते थे या उनके कहे अनुसार आंदोलन चलाते थे, उन्हें वो बुद्धिजीवी होने का दर्जा दिया करते थे। रास बिहारी बोस ने ही INA (इंडियन नेशनल आर्मी) की स्थापना की थी और वो ‘ग़दर पार्टी’ में भी सक्रिय थे।

ग़दर की ये योजना तो सफल नहीं हो पाई क्योंकि विश्व युद्ध के समय जब अंग्रेजों के अधिकतर सैनिक देश से बाहर थे, तब भारतीय देशभक्त विभिन्न बटालियनों में शामिल होकर भारत को स्वतंत्र कराएँ, क्योंकि कई क्रांतिकारी गिरफ्तार कर लिए गए थे। लेकिन, रास बिहार बोस ब्रिटिश ख़ुफ़िया एजेंसियों को चकमा देते हुए जापान भागने में कामयाब रहे। बाद में उन्होंने INA की बागडोर महान सुभाष चंद्र बोस को सौंप दी।

लॉर्ड चार्ल्स हार्डिंग मानता था कि भारत में ऐसे लोगों की संख्या कम ही है, जो अंग्रेजों के साथ वफादार नहीं हैं। उसका कहना है कि 30 करोड़ की भारतीय जनसंख्या में कई धर्मों-समुदायं के लोग हैं और वो विभिन्न प्रकार की राजनीतिक शिक्षाओं और विकास का प्रतिनिधित्व करते हैं। क्रांतिकारियों के विषय में उसका कहना था कि ये लोग अराजक तत्व हैं जिनका उद्देश्य नई सत्ता की स्थापना नहीं, बल्कि वर्तमान सत्ता को नुकसान पहुँचाना है।

अमेरिकी जनता के सामने अंग्रेजों का प्रोपेगंडा फैलाते हुए उसने दावा किया था कि भारतीय क्रांतिकारी संगठनों, जैसे ‘ग़दर पार्टी’ के पीछे जो लोग हैं वो बुद्धिजीवी नहीं हैं। उसे क्रांतिकारियों को अर्द्ध-शिक्षित बताते हुए कहा था कि ‘ग़दर पार्टी’ का खबर विदेश में छपता है और ये गुप्त रूप से सक्रिय है, तो इसका मतलब ये नहीं कि ये अराजक नहीं हैं। उसने अमेरिका और पश्चिमी कनाडा के कुक्न ‘पागल लोगों’ और जर्मनी को इस संगठन के पीछे बताया था।

उसका कहना था कि इसके मुखिया लाला हरदयाल जर्मन वॉर मिनिस्ट्री में कार्यरत थे और उन्हें जापान से भी समर्थन मिला था। उसने दावा किया था कि ये पार्टी प्रभाव और संख्याबल के मामले में छोटी है और इसकी अधिकतर शक्तियाँ बंगाल में ही हैं, जहाँ ये पुलिस-प्रशासन के अधिकारियों की हत्या की फिराक में रहता है। दिल्ली के चाँदनी चौक पर खुद पर हुए हमले के बारे में बताते समय वो मुस्कुराता था।

उसने हँसते हुए कहा था कि अपने पूर्ववर्तियों की तरह भारत का पिछले वायसराय (वो खुद) भी इन ‘षड्यंत्रों’ का भुक्तभोगी रहा है। उसने दावा किया था कि वो 4 वर्षों में उस घटना के दौरान हुए घावों से पूरी तरह उबर चुका है और उसके साथ जो भारतीय नौकर था, वो भी अब ठीक है। उसने ये भी बताया था कि इस मामले में शामिल लोगों को अंग्रेजों की सरकार ने सज़ा-ए-मौत दे दी है। आइए, उनके नाम भी जान लेते हैं।

बसंत कुमार विश्वास, जिन्हें मात्र 20 वर्ष की आयु में ही फाँसी पर चढ़ा दिया गया। भाई बाल मुकुंद, जो 32 वर्ष की उम्र में भारत माता के लिए फाँसी पर झूल गए। इन दोनों के अलावा अमीर चंद और अवध बिहारी को मौत की सज़ा दी गई। लाला हनुमंत सहाय को आजीवन कारावास की सज़ा देकर कालापानी भेज दिया गया। ये हमला तब हुआ था, जब ब्रिटिश इंडिया की राजधानी को कोलकाता से दिल्ली ट्रांसफर किया जा रहा था।

बाद में लॉर्ड चार्ल्स हार्डिंग ने बताया था कि इस हमले में उसे सबसे ज्यादा नुकसान पहुँचा, लेकिन उसकी बीवी को कुछ नहीं हुआ। सिर्फ ‘Picric Acid (C6H3N3O7) के कारण उसकी ड्रेस ख़राब हो गई थी। लेकिन, लॉर्ड हार्डिंग की पीठ, पाँव और सिर में गहरी चोट लगी। उसके कंधे के माँस फट गए। लेकिन, भारत के ‘बुद्धिजीवी नेताओं’ के बारे में उसने जो कहा, वो आज जानने लायक है। आप समझ जाएँगे कि ये नेता कौन थे। उसने कहा:

“जब से प्रथम विश्व युद्ध शुरू हुआ, तभी शिक्षित राजनीतिक वर्ग ने भारत को लेकर जितनी भी राजनैतिक समस्याएँ थीं, उन्हें किनारे रख दिया। वो ब्रिटिश सरकार के क्रियाकलापों में बाधा नहीं पहुँचाना चाहते थे, जो पहले से ही दिक्कतों का सामना कर रही थी। इम्पीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल में भारतीय सदस्यों की संख्या ज्यादा थी, फिर भी हमारी इच्छानुसार बिल पास हुए। उन सदस्यों ने जो स्पीच दिए, उनमें जिम्मेदारी की झलक दिखी। वहाँ स्वतंत्रता चाहते वाले शिक्षित नेता जानते थे कि भारत अकेले खड़ा नहीं हो सकता, इसीलिए वो और उदार हो गए और उन्होंने समझदारी का परिचय दिया।”

भारत की तरफ से प्रथम विश्व युद्ध में न सिर्फ सेना लड़ने गई थी, बल्कि देश के संसाधनों का भी दोहन किया गया व बंदूकों बारूद से लेकर सभी प्रकार की वस्तुएँ यहाँ से भेजी गईं। ये सब संभव कैसे हुआ? इसके जवाब में तब वायसराय रहे लॉर्ड हार्डिंग ने कहा था कि उसने देश भर के नेताओं से बात कर के उन्हें स्थिति के बारे में समझाया, जिसके बाद वो इसके लिए तैयार हो गए। फ्रांस, मिस्र, चीन, मेसोपोटामिया, पूर्वी अफ्रीका और कैमरून में भारत के 3 लाख सैनिक लड़े।

इसी इंटरव्यू से खुलासा हुआ था कि मात्र 73,000 अंग्रेजों ने 32 करोड़ की जनसंख्या वाले देश पर कब्ज़ा कर रखा था। एक समय तो ऐसा था, जब यहाँ मात्र 10-15 हजार ब्रिटिश मौजूद थे और वो पूरे देश पर राज कर रहे थे। लॉर्ड हार्डिंग की शब्दों में, ये सब भारत में अंग्रेजों के वफादारों के कारण संभव हुआ। उसका कहना था कि यहाँ के कई ग्रामीण तो क्रांतिकारियों के बारे में पुलिस को गुप्त रूप से सूचना भी दिया करते थे।

इसके लिए उसने एक उदाहरण दिया, जिसका जिक्र आज की तारीख में आवश्यक है। उसने बताया था कि 1914-15 की ठंड के दौरान अमेरिका के पश्चिमी हिस्सों और कनाडा से 7000 सिख पंजाब लौटे और स्वतंत्रता के लिए हर प्रकार की ‘ज्यादती’ शुरू की, लेकिन जब अंग्रेजों की सरकार ने उनका दमन शुरू किया तो उनके सारे प्रयास विफल हो गए। आखिर ये कैसे संभव हुआ? लॉर्ड चार्ल्स हार्डिंग का उत्तर था – सिख किसानों की वजह से।

उसका कहना था, “पंजाब में अनगिनत सिख किसान हैं। उन्होंने उन सिख क्रांतिकारियों को पकड़-पकड़ कर ब्रिटिश सरकार को सौंप दिया। हमें उनके बारे में सूचनाएँ दी।” उसका कहना था कि स्थानीय स्तर पर अंग्रेजों के प्रति जो ‘वफादारी का भाव’ था, उसके कारण ये संभव हो पाया। हालाँकि, इस इंटरव्यू में उसने चीजों को अमेरिका की जनता के सामने भारत के विरुद्ध अंग्रेजी नैरेटिव बनाने के लिए पेश किया था।

31 दिसंबर है लास्ट डेट… RBI, IBPS और SSC में बिना परीक्षा भर्ती, होगा सिर्फ इंटरव्यू: Fact Check

डिजिटल इंडिया की ओर आगे बढ़ते हुए इस समय भारत के सामने कई चुनौतियाँ हैं। साइबर क्राइम को अंजाम देने वाले इस डिजिटलाइजेशन का खूब फायदा उठा रहे हैं। ऑनलाइन फर्जीवाड़ा करने के लिए नए-नए तरीके खोजे जा रहे हैं। हाल का मामला देखें तो ऐसा प्रयास सरकारी नौकरी के नाम पर किया गया है।

दरअसल पिछले दिनों एक खबर सामने आई थी कि एसएससी, आईबीपीएस और आरबीआई में डायरेक्ट साक्षात्कार के जरिए भर्तियाँ होंगी, कोई परीक्षा नहीं ली जाएगी। इसमें आवेदन करने की अंतिम तारीख 31-12-2020 निर्धारित की गई थी। साथ ही कुल वैकेंसी संख्या भी 8,64,383 बताई गई थी। मतलब जो कोई भी सरकारी नौकरी के सपने देखने वाला इस पोस्ट को देखे, आवेदन करने के लिए तैयार हो जाए। 

अब इसी झूठ का पर्दाफाश पीआईबी फैक्ट चेक द्वारा किया गया है। ट्विटर पर पीआईबी ने बताया, “जो वेबसाइट दावा कर रही है कि राष्ट्रीय भर्ती एजेंसी ने विभिन्न पोस्टों के लिए आवेदन आमंत्रित किए हैं, वह वेबसाइट फर्जी है। NRA ने कोई विज्ञापन और नोटिस इन वैकेंसियों की बाबत अभी तक जारी नहीं किए।”

गौरतलब है कि साइबर क्राइम को अंजाम देने के लिए ऐसे फर्जी वेबसाइट का इस्तेमाल अक्सर किया जाता रहा है। कई बार खबरों में हम ऑनलाइन फ्रॉड की खबरें पढ़ते हैं, बावजूद इसके नौकरी, डिस्काउंट आदि का लालच देख कर उनकी ओर आकर्षित हो जाते हैं। ऐसी वेबसाइट्स हमसे हमारी निजी डिटेल्स तो कलेक्ट करती ही हैं, साथ ही भुगतान राशि के नाम पर बैंक डिटेल्स की जानकारी भी ले लेती हैं।

अभी कुछ दिन पहले ही पीएम किसान योजना के नाम पर लोगों को 70000 रुपए का लालच देकर उनसे उनकी डिटेल्स माँगी जा रही थी। इस टेक्स्ट मैसेज का भंडा फोड़ते हुए पीआईबी फैक्ट चेक ने कहा था, “एक टेक्स्ट मैसेज में जो दावा किया जा रहा है कि पीएम पेंशन योजना 2020 के तहत योग्यता कन्फर्म हो गई है। वो पूरी तरह फेक है। केंद्र सरकार द्वारा ऐसी कोई स्कीम नहीं चलाई जा रही।”

कंगना का ऑफिस जिस कमिश्नर के आदेश पर तोड़ा गया, उनको समन… मानवाधिकार आयोग के सामने लगेगी हाजिरी

बॉलीवुड अभिनेत्री कंगना रनौत के ऑफिस मणिकर्णिका फिल्म्स और घर के तोड़-फोड़ केस के सिलसिले में महाराष्ट्र के मानवाधिकार आयोग ने BMC के कमिश्नर इकबाल सिंह चहल को समन भेजा है। चहल को 20 जनवरी से पहले आयोग के सामने हाजिरी देनी होगी और यह बताना होगा कि उन्होंने बांद्रा पाली हिल एरिया में बनी कंगना की प्रॉपर्टी को नष्ट करने का निर्णय क्यों लिया।

बता दें कि इकबाल सिंह के निर्देशों के बाद ही कंगना के दफ्तर पर तोड़फोड़ की कार्रवाई को अंजाम दिया गया था। हालाँकि बाद में कोर्ट के निर्देश पर कार्रवाई को रोकना पड़ा था लेकिन तब तक अभिनेत्री का काफी नुकसान हो चुका था।

गौरतलब है कि पिछले दिनों हाई कोर्ट ने कंगना के बंगले पर मुंबई महानगर पालिका (BMC) की कार्रवाई को अवैध और दुर्भावना से परिपूर्ण माना था। इसके साथ ही बीएमसी का नोटिस रद्द कर दिया था।

हाई कोर्ट ने बीएमसी को कड़ी फटकार लगाते हुए कहा था कि यह बदले की भावना के तहत की गई कार्रवाई थी। बॉम्बे हाईकोर्ट के जज ने टिप्पणी करते हुए कहा था, “कंगना रनौत के मुंबई को पीओके बनाने वाले बयान के अगले दिन एक नेता का बयान आता है और फिर कंगना को नोटिस देकर महज 24 घंटे का समय दिया जाता है। कार्रवाई होने के बाद अखबार में लिखा जाता है कि बदला ले लिया।”

बॉलीवुड एक्ट्रेस कंगना रनौत के मुंबई स्थित ऑफिस में 9 सितंबर को बीएमसी द्वारा 24 घंटे के आनन-फानन में दी गई नोटिस और फिर बदले की भावना से की गई तोड़-फोड़ को लेकर बॉम्बे हाईकोर्ट ने फैसला सुना दिया। कोर्ट ने बहुत सख्त लहजे में यह साफ कहा था कि बीएमसी का एक्शन दुर्भावनापूर्ण रवैये से किया गया है।

वहीं 11 नवंबर 2020 को आरटीआई के माध्यम से खबर सामने आई थी कि बीएमसी उस समय तक इस मामले में वकीलों को 82 लाख रुपए का पेमेंट कर चुकी थी। आरटीआई के माध्यम से मिली जानकारी में बताया गया थी कि बीएमसी ने अदालत की कार्रवाई में तकरीबन 82,50,000 रुपये खर्च किए। आरटीआई कार्यकर्ता शरद यादव ने बीएमसी में आवेदन कर यह जानकारी माँगी थी।

‘गंगूबाई काठियावाड़ी’: जिस महिला पर बना रहे हैं फिल्म, उसके ही परिजनों ने भंसाली और आलिया पर किया मुकदमा

संजय लीला भंसाली की अगली फिल्म ‘गंगूबाई काठियावाड़ी’ विवादों में फँस गई है। इस फिल्म में आलिया भट्ट मुख्य किरदार में हैं। बॉम्बे सिविल कोर्ट में इन दोनों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया है। जिस पर ये फिल्म बन रही है, उसके ही परिवार वालों ने निर्देशक और अभिनेत्री को मुकदमे में घसीटा है। गंगूबाई काठियावाड़ी के परिवार वालों ने फिल्म की कहानी पर आपत्ति जताते हुए इसे बदलने की माँग की है।

ये मुकदमा मंगलवार (दिसंबर 22, 2020) को गंगूबाई के परिजनों ने दर्ज करवाया। कोर्ट ने दोनों फ़िल्मी हस्तियों से कहा है कि वो जनवरी 7, 2021 तक जवाब दें। इस फिल्म को हुसैन जैदी की पुस्तक ‘माफिया क्वींस ऑफ मुंबई’ के आधार पर बनाया जा रहा है। फ़िलहाल फिल्म की शूटिंग भी चल रही है, ऐसे में ये नया विवाद निर्माताओं की परेशानी बढ़ा सकता है। इसके निर्माता भी संजय लीला भंसाली ही हैं।

गंगूबाई काठियावाड़ी 60 के दशक में मुंबई के अपराध जगत में एक बहुत बड़ा नाम थी। कहा जाता है कि उनके पति ने उन्हें मात्र 500 रुपए के लिए बेच डाला था। इसके बाद वो वेश्यावृत्ति में लिप्त हो गई थी। कहा जाता है कि उन्होंने मजबूर लड़कियों के लिए भी काफी अच्छे काम किए थे। फिल्म में उनके किरदार में आलिया भट्ट को रखा गया है। पहली बार गैंगस्टर का किरदार निभा रहीं आलिया की संजय लीला भंसाली के साथ भी ये पहली फिल्म है।

इस फिल्म में अजय देवगन भी मेहमान भूमिका में नजर आएँगे। फिल्म को दो हिस्सों में विभाजित किया गया है, जिसमें से एक हिस्सा विभाजन से पहले का होगा और एक हिस्सा उसके बाद का। इसमें आठवें दशक तक की खाने दिखाई जानी है। ये फिल्म सितम्बर 2020 में ही रिलीज होने वाली थी, लेकिन कोरोना संक्रमण के कारण अब ये 2021 में आएगी। हाल ही में भंसाली के साथ 3 फ़िल्में कर चुकीं दीपिका पादुकोण भी इस फिल्म के सेट पर उनसे मिलने गई थीं।

इससे पहले ‘पद्मावती’ के निर्माण के दौरान भी संजय लीला भंसाली विवादों में फँसे थे। तब ‘करणी सेना’ के कार्यकर्ताओं ने उनकी पिटाई भी की थी। सुशांत सिंह राजपूत की कथित आत्महत्या के बाद भी फिल्म निर्माताओं आदित्य चोपड़ा और संजय लीला भंसाली के बयान लिए गए थे। जिसके बाद दोनों के बयान में अंतर देखने को मिला था। संजय लीला भंसाली से मुंबई पुलिस ने पूछताछ भी की थी। तब सुशांत के पिता ने पटना में केस दायर नहीं किया था।

केरल के सिस्टर अभया मर्डर केस में फादर थॉमस और नन सेफी को उम्रकैद: 28 साल बाद CBI कोर्ट ने सुनाई सजा

केरल के चर्चित सिस्टर अभया मर्डर केस में दोषी पाए गए दोनों लोगों को उम्रकैद की सजा सुनाई गई है। केरल के कोट्टयम के सेंट पायस कॉन्वेंट में रहने वालीं सिस्टर अभया की सदिंग्ध परिस्थितियों में मौत के 28 साल बाद तिरुवनंतपुरम की सीबीआई अदालत ने बुधवार (दिसंबर 23, 2020) को एक पादरी फादर थॉमस और नन सिस्टर सेफी को उनकी हत्या का दोषी पाते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई। 

सीबीआई अदालत ने प्रत्येक पर पाँच लाख रुपए का जुर्माना भी लगाया। अदालत ने कैथोलिक चर्च के फादर थॉमस कोट्टूर और सिस्टर सेफी को भारतीय दंड संहिता की धारा 302 (हत्या) एवं 201 (सबूतों के साथ छेड़छाड़ करना) के तहत मंगलवार (दिसंबर 22, 2020) को दोषी पाया था। अदालत ने फादर कोट्टूर को भारतीय दंड संहिता की धारा 449 (अनधिकार प्रवेश) का दोषी भी पाया। फादर कोट्टूर को पूजापुरा की केंद्रीय जेल भेजा गया है जबकि सिस्टर सेफी को यहाँ अत्ताकुलनगारा महिला जेल भेजा गया है।

क्या है सिस्टर अभया का पूरा मामला?

यह मामला 21 वर्षीय अभया की संदिग्ध परिस्थिति में हुई मौत से संबंधित है। उनका शव 27 मार्च 1992 को सेंट पायस के एक कुएँ से मिला था। 27 मार्च 1992 को सेंट पायस कॉन्वेंट (Pious X Convent) के कुएँ में सिस्टर अभया मृत मिली थी। इसी पायस कॉन्वेंट में पढ़ने वाली बिना थॉमस को सिस्टर अभया नाम दिया गया था। शुरुआत में मामले की जाँच स्थानीय पुलिस और राज्य अपराध शाखा ने की थी, जिसमें पहले पूरे मामले को आत्महत्या कहकर फाइल को बंद कर दिया गया। लेकिन मानवाधिकार कार्यकर्ता जोमोन पुथेनपुराकल के संघर्ष और कानूनी लड़ाई के बाद 29 मार्च, 1993 को इस मामले को सीबीआई को सौंप दिया गया।

CBI ने वर्ष 2008 में कोट्टूर, पूथरुकायिल और सेफी को हत्या के आरोप में गिरफ्तार किया था। इस हत्या को आत्महत्या साबित करने के अगले दो दशकों तक इस केस में कोई नई जानकारी नहीं आई। इसके बाद सीधे 27 साल बाद यानी साल 2019 में इस मामले की फिर से सुनवाई शुरू हुई और एक-एक कर गवाह मुकरने लगे। 

इस मामले में अन्य आरोपित फादर जोश पूथरुकायिल को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया गया है। शुरुआत में मामले की जाँच स्थानीय पुलिस और राज्य की अपराध शाखा ने की थी और दोनों ने ही कहा था कि अभया ने खुदकुशी की है। 

सीबीआई ने मामले की जाँच 29 मार्च 1993 को अपने हाथ में ली और तीन क्लोजर रिपोर्ट दायर की थी तथा कहा था कि यह हत्या का मामला है लेकिन अपराधियों का पता नहीं चल सका है। बहरहाल, चार सितंबर 2008 को केरल उच्च न्यायालय ने मामले को लेकर सीबीआई को फटकार लगाई थी और कहा था कि एजेंसी ‘अभी भी राजनीतिक और नौकरशाही की शक्ति रखने वालों की कैदी है’ तथा सीबीआई की दिल्ली इकाई को निर्देश दिया था कि वह जाँच को कोच्चि इकाई को सौंप दे। 

इसके बाद सीबीआई ने फादर कोट्टूर, फादर पूथरुकायिल और नन सेफी को हत्या के आरोप में गिरफ्तार कर लिया। अभियोजन के मुताबिक, कोट्टूर और पूथरुकायिल का कथित रूप से सेफी से अवैध संबंध था। सीबीआई के आरोप पत्र के मुताबिक, 27 मार्च 1992 की रात को अभया ने कोट्टूर और सेफी को कथित रूप से आपत्तिजनक स्थिति में देख लिया जिसके बाद आरोपितों ने अभया पर कुल्हाड़ी से हमला किया और उसे कुएँ में फेंक दिया।

बंगाल चुनाव: लिब्रांडू ब्रीड कर रहा ईंट मारने की बात; लोगों ने सिर पर मारने की दी प्रतिक्रिया

पश्चिम बंगाल में आगामी विधानसभा चुनाव से पहले लिबरल गिरोह के मशहूर बुजुर्ग कॉमेडियन अतुल खत्री और शिवसेना नेता प्रीतिश नंदी ट्विटर पर ह्यूमर के नाम पर घृणा फैलाते पाए गए। उनकी ऐसी हरकत को देख यूजर्स ने भी उन दोनों की उम्र का कोई लिहाज नहीं किया और उन्हें उनकी भाषा में ही लताड़ लगाई।

दरअसल, दो दिन पहले अतुल खत्री ने अपने ट्विटर पर लिखा था, “पश्चिम बंगाल के प्यारे लोगों, प्लीज अपने राज्य में एंटर होने जा रहे शक्तिशाली घातक वायरस से अवगत हो जाएँ।” जिस पर प्रीतिश नंदा ने आज टिप्पणी करते हुए लिखा, “बंगाल अपनी वैक्सीन के साथ तैयार है। रबीन्द्र संगीत और ईंट। डबल डोज।”

यहाँ बता दें कि अतुल खत्री ने अपने ट्वीट में बंगाल में वायरस के नाम पर बीजेपी को घेरने का प्रयास किया था और प्रीतिश नंदी ने अभी हाल में भाजपा के काफिले पर हुए हमले का मखौल उड़ाते हुए उसकी तुलना वैक्सीन से की थी।

इसी घटिया तंज के बदले यूजर्स ने इन्हें जम कर लताड़ा। आकाश यादव ने लिखा, “वही ईंट तेरी खोपड़ी खोलने के लिए भी इस्तेमाल हो सकती है गंजे।” ऐसी ही पीसी नाम के ट्विटर यूजर ने ऊपर की तस्वीर वाली बात लिखी।

एक यूजर ने इस बात पर गौर करवाया कि वरिष्ठ लिबरल नंदी बंगाल को हिंसा के लिए भड़का रहे हैं। वहीं दूसरे यूजर ने लिखा कि तो इन लोगों ने राज्य द्वारा स्पॉन्सर हिंसा को अप्रूव कर दिया है, जिसे पश्चिम बंगाल में लोकतंत्र बचाने के नाम पर अंजाम दिया जाता है।

अजीत दत्ता लिखते हैं, “ईंटें! समय बताएगा। बंगाल चुनाव में कई बुद्धिजीवी अपने नक्सल चरित्र के साथ सामने आएँगे, खुद का असली रंग दिखाएँगे।”

गौरतलब है कि बंगाल में 2021 में विधानसभा चुनाव होने वाले है। ऐसे में वहाँ राजनैतिक हिंसा का सिलसिला शुरू हो रखा है। अभी बीते दिनों भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा के काफिले पर ईंट-पत्थर से हमला बोला गया था। उससे पहले सिलीगुड़ी में तेजस्वी सूर्या के मार्च पर हमला हुआ था, उसमें एक भाजपा कार्यकर्ता की जान गई थी। इसके अलावा बंगाल में बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष के काफिले पर भी पत्थरबाजी हुई थी। फिर हाल में बीजेपी नेता कबीस बोल की कार पर भी हमले की घटना सामने आई थी।

दिल्ली: हिन्दू लड़की को साहिब अली ने फँसाया: घर ले जाकर किया रेप, उसके अब्बू पर भी पीड़िता ने लगाया यौन उत्पीड़न का आरोप

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के सरिता विहार इलाके से एक हिंदू लड़की के यौन शोषण की घटना सामने आई है। पीड़िता का आरोप है कि साहिब अली नाम के 20 वर्षीय लड़के ने पहचान छिपा कर उस पर शादी का दबाव बनाया और बाद में उसका रेप किया। इस बाबत उसने सरिता विहार थाने में अपनी शिकायत दर्ज करवाई है। शिकायत में पीड़िता ने साकिब के घरवालों पर भी गंभीर इल्जाम लगाए हैं।

पुलिस के अनुसार 21 दिसंबर को थाने में दायर अपनी शिकायत में पीड़िता ने बताया है कि साहिब उसके घर में किराएदार था और उसने वहाँ अपनी पहचान राहुल बताई हुई थी। दोनों में नजदीकियाँ इसी बीच बढ़ी थीं। पीड़िता कहती है कि दोस्ती होने के बाद राहुल ने उसके सामने शादी का प्रस्ताव रखा और कुछ दिन बाद ही वह उसे अपने माता, पिता, भाई, बहन और जीजा के पास अली विहार अपने घर ले गया। 

वहाँ उसकी इच्छा के विरुद्ध उससे संबंध बनाए गए और धर्म परिवर्तन के लिए भी कहा जाने लगा। पीड़ित हिन्दू लड़की का आरोप है कि साहिब अली उर्फ ​​राहुल के पिता हाजीसुन्नला (Hazisunnala) ने भी उसे अनुचित तरीके से छुआ और उसका यौन उत्पीड़न करने का प्रयास किया।

बता दें कि मामले में शिकायत होने के बाद युवती की मेडिकल जाँच करवा ली गई है। आरोपितों के ख़िलाफ़ आईपीसी की धारा 376,366, 354,406 और 34 के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया गया है। हालाँकि, गिरफ्तारी अभी किसी की नहीं हुई है। 

उल्लेखनीय है कि इससे पहले देश भर के कई राज्यों से ऐसे मामले सामने आ चुके है जब समुदाय विशेष के युवकों ने अपनी पहचान छिपाकर हिंदू लड़कियों पर धर्म परिवर्तन और निकाह का दबाव बनाया हो।

देशभर से आते है पहचान छिपाकर रेप और धर्मांतरण का दबाव बनाने के मामले

हाल के ही मामले देखें तो भी यूपी के हरदोई में एक हिन्दू किशोरी ने दुष्कर्म और जबरन धर्म परिवर्तन कराने का आरोप लगाते हुए FIR दर्ज करवाई थी। किशोरी का आरोप था कि आजाद मोहम्मद नाम के युवक ने पहले उसे प्रेमजाल में फँसाया। फिर दो साल तक शादी के बहाने उसके साथ बार-बार दुष्कर्म किया और वीडियो बना ली। शादी के लिए उसने इस्लाम धर्म कबूलने का जोर डाला। जब उसने इसका विरोध किया तो मोहम्मद ने उसके अश्लील फोटो को वायरल करने की धमकी दी।

दिल्ली की ही यदि बात करें तो यहाँ रोहिणी इलाके में रहने वाले अख्तर ने शिवा बनकर हिंदू युवती को प्रेमजाल में फँसाया। जागरण में उससे मुलाकात की और मंदिर में शादी रचाई। उसके बाद लड़की को डिमांड के नाम पर परेशान करने लगा। जब एक दिन अख्तर की झूठी पहचान उजागर हो गई तो उसने अपने भाइयों अफजल, अरशद और पिता मोहम्मद इदरीश के साथ मिलकर युवती को पीटा। 

एक अन्य मामले में यूपी के बिजनौर में साकिब नाम के युवक ने सोनू बनकर दलित नाबालिक किशोरी को अपने प्रेमजाल में फँसाया, फिर मौका देखते ही उसे भगा ले गया। पुलिस के अनुसार थाना धामपुर के एक गाँव में 14 दिसंबर की रात मुस्लिम धर्म का एक युवक 16 वर्षीय दलित किशोरी को भगा ले गया था। लड़के ने अपना असली नाम छिपाकर सोनू बता रखा था। किशोरी को बाद में उसकी असली पहचान का पता चला।

जींस क्यों नहीं पहनी, मेरे सामने डांस क्यों नहीं की? – अनस ने बीवी मजहबी को दिया तीन तलाक

उत्तर प्रदेश के मेरठ में एक व्यक्ति ने अपनी बीवी को सिर्फ इसीलिए तीन तलाक दे दिया, क्योंकि उसने जींस पहनने और डांस करने से इनकार कर दिया था। मंगलवार (दिसंबर 22, 2020) की रात आरोपित अपने ससुराल भी पहुँच गया और उसने खुद के ऊपर तेल डाल कर आग लगा ली। हालाँकि, परिजनों ने उसे बचाया और फिर पुलिस को उसके अजीबोगरीब हरकतों के बारे में सूचना दी। उसे पुलिस के हवाले कर दिया गया है।

आरोपित अनस हापुड़ के पिलखुवा का निवासी है, जिसका निकाह 8 वर्ष पहले न्यू इस्लामनगर के रहने वाले अमीरूद्दीन की बेटी मजहबी से हुई थी। अनस दिल्ली में रह कर नौकरी करता है। पिछले कुछ महीनों से उसने मजहबी को प्रताड़ित करना शुरू कर दिया था। दोनों के बीच हुए विवाद को सुलझाने के लिए गाँव में पंचायत भी बुलाई गई थी। महिला ने बताया कि उसका शौहर उस पर जींस पहनने, गाना गाने और डांस करने के लिए दबाव बनाता है।

महिला ने पंचायत के समक्ष अपनी बात भी रखी, लेकिन समझौता नहीं हो सका। 2 दिन पहले आरोपित अनस ने अपनी बीवी मजहबी को तीन तलाक दे दिया। अमीरुद्दीन ने बताया कि कुछ दिन पहले अनस अचानक से उनके घर पहुँचा और खुद के ऊपर ही तेल उड़ेल कर आग लगा दी। परिवार के लोगों ने कपड़ा और पानी डाल कर आग बुझाई। हालाँकि, वो मामूली रूप से ही जला था और उसे खास नुकसान नहीं पहुँचा।

पहले तो ग्रामीणों ने अनस की धुनाई की, उसके बाद उसे पुलिस को सौंप दिया। वो खुद को आग लगा कर घर की ओर दौड़ रहा था, तभी ग्रामीणों ने उसे धर लिया। अमीरुद्दीन ने कई आरोप लगा कर पुलिस के समक्ष तहरीर दर्ज कराई है। इंस्पेक्टर प्रशांत कपिल ने बताया कि मामले की जाँच की जा रही है। पीड़ित पक्ष की तरफ से जो शिकायत दी है है, पुलिस उसके आधार पर आगे की कार्रवाई कर रही है।

एक आँकड़े के अनुसार, तीन तलाक के मामले में वर्ष 2019 में जहाँ उत्तर प्रदेश में 710 केस दर्ज किए गए, वहीं 2020 में 724 मामले प्रकाश में आए है। इनमें से अभी तक 2019 के 532 और 2020 में 587 मामले विवेचनाधीन हैं। इनमें से बरेली और मेरठ में ही सबसे ज्यादा मामले दर्ज किए गए हैं। लखनऊ और नोएडा कमिश्नरेट में तीन तलाक के काफी कम मामले दर्ज किए गए। मेरठ में 2019 में 162 तो 2020 में अब तक 214 मामले सामने आए हैं।