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कुमारास्वामी के इस्तीफे के बाद अब मध्य प्रदेश में उठने लगा ‘धुआँ’?

कुमारास्वामी सरकार के विश्वास मत हारने के बाद राज्य भाजपा की नज़रें सरकार बनाने पर गड़ गईं हैं। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक़ पूर्व मुख्यमंत्री येद्दियुरप्पा साल भर के भीतर दूसरी बार सरकार बनाने का दावे पेश करने के लिए तैयार हैं। इसके पहले वर्तमान विधानसभा के चुनावों के बाद भी वह मुख्यमंत्री बने थे, लेकिन सुप्रीम कोर्ट द्वारा बहुमत साबित करने के लिए महज़ 24 घंटे दिए जाने के बाद उन्हें इस्तीफ़ा देना पड़ा था। भाजपा ने इसे ‘कर्म का खेल’ बताकर बाहर जाती यूपीए सरकार पर तंज भी कसा है।

कई दिनों से चले आ रहे सियासी ड्रामे के पटाक्षेप में हुई यूपीए की इस हार ने एनडीए के लिए रास्ता खोल दिया है। राज्य सरकार गठबंधन के 16 विधायकों के बागी हो बाद से ही डाँवाडोल चल रही थी। इसके पहले कुमारास्वामी लगातार विश्वास मत को टालते चले गए। यहाँ तक आजिज़ आकर उनकी पार्टी के ही विधानसभा अध्यक्ष को भी सत्ता पक्ष को टोकना पड़ गया था

‘यहाँ सात जनम में भी नहीं गिरेगी कॉन्ग्रेस की सरकार’

कर्नाटक के पड़ोसी मध्य प्रदेश में सरकार को किसी भी तरह की आग तो नहीं लगी है, लेकिन कहावत के अनुसार धुआँ तो दिखने लगा है। एक तरफ भाजपा नेता कॉन्ग्रेस सरकार के ‘खुद से पलट जाने’ का दावा कर रहे हैं, दूसरी ओर सत्तारूढ़ कॉन्ग्रेस का दावा है कि प्रदेश में ‘हॉर्स ट्रेडिंग’ के लिए भाजपा को सात जन्म लेने पड़ जाएँगे।

‘कुरान पर हाथ रखकर कह रही हूँ, गर्लफ्रेंड को सुनाने के लिए मुझे देता था जिस्मानी और जहनी दर्द’

पाकिस्तान के जाने माने गायक और अभिनेता मोहसिन अब्बास और उनकी पत्नी फातिमा सोहल के मामले में एक नया मोड़ आया है। दोनों में आरोप-प्रत्यारोप का खेल और गंभीर होता जा रहा है। अभिनेता मोहसिन पर उनकी पत्नी फातिमा ने घरेलू हिंसा का आरोप लगाया था और इसके बारे में फातिमा ने फेसबुक पर एक लंबा चौड़ा पोस्ट लिखकर आपबीती बताई थी। साथ ही, उन्होंने अपनी कुछ तस्वीरें भी शेयर की हैं, जिसमें उनके चेहरे और हाथ पर चोट के निशान नजर आ रहे हैं।

इसके बाद मोहसिन ने कुरान पर हाथ रखकर 50 मिनट की प्रेस कॉन्फ्रेंस की। इस दौरान उन्होंने अपनी पत्नी पर ही कई गंभीर आरोप लगाए। मामला यहीं नहीं रुका, अब उनकी पत्नी ने भी कुरान पर हाथ रखकर पति पर और संगीन आरोप लगाए हैं।

‘मुझे जिस्मानी दर्द देता था’

फातिमा ने अपने अभिनेता पति मोहसिन अब्बास पर कई आरोप लगाए। उन्होंने कुरान हाथ में उठाकर आरोपों को और मजबूती से दोहराया। फातिमा ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कुरान पर हाथ रखकर अपनी आपबीती सुनाई। फातिमा ने पति पर आरोप लगाते हुए कहा कि मोहसिन का अपनी गर्लफ्रेंड से नाजायज संबंध हैं। उन्होंने विवाह के बाद भी संबंध बरकरार रखा है।

रिपोर्ट्स के अनुसार, फातिमा ने कहा- “जिस नाज़िश जहाँगीर को वो अपनी ‘केवल फ्रेंड’ बता रहा है, वो उनकी गर्लफ्रेंड है। उसके साथ मोहसिन का अफेयर है। इतना ही नहीं अपनी गर्लफ्रेंड को सुनाने के लिए वो मुझे हमेशा उससे फोन पर बात करते हुए गंदी-गंदी गालियाँ देता था। कई बार फोन लगाने के बाद वो मुझे जिस्मानी दर्द देता था साथ ही जहनी तौर पर भी दर्द देता था।”

‘कुरान पर हाथ रखकर कह रही हूँ, उसने मुझे बहुत मारा है’

पाकिस्तानी गायक-हीरो ने पत्नी के मारपीट के आरोपों को खारिज किया था। उनका कहना था कि अगर उन्होंने मारपीट की है तो फातिमा को मेडिकल कराना चाहिए। इस पर फातिमा ने कुरान पर हाथ रखकर कहा कि जब अभी वो मीडिया में कई लोगों के सामने मोहसिन से मिलीं तब उन्हें पहली बार डर नहीं लगा, लेकिन वो अब मोहसिन के हिंसक रूप से डरने लगी हैं।

‘मेरे तो पति में कमी है तो कोई दूसरा क्या करेगा?’

हालाँकि, मोहसिन ने पत्नी के मारपीट के आरोपों को खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि फातिमा को मैंने मारा है तो उसे मेडिकल कराना चाहिए। इस पर फातिमा ने कहा कि वो अब मोहसिन के हिंसक रूप से डरने लगी हैं।फातिमा ने कहा कि अपना घर बचाने के लिए वह मोहसिन की गर्लफ्रेंड नाज़िश से मिलने गई थी। उन्होंने जहाँगीर से गुजारिश की कि वे उनके घर में परेशानी का सबब ना बनें, फातिमा ने कहा- “लेकिन मेरे तो पति में कमी है तो कोई दूसरा क्या करेगा?”

फातिमा ने कहा कि उन्होंने परेशान होकर यह कदम उठाया है। अब उन्होंने अपने पति की बहुत सारी हिंसा बर्दाश्त कर ली है और अब वे अपने बच्चे को इन सब से बाहर लेकर जाना चाहती हैं।

‘मैं जब अस्पताल में कराह रही थी, तब मेरा पति अपनी गर्लफ्रेंड के साथ सो रहा था’

फातिमा ने अपने फेसबुक पोस्ट में लिखा, “सामाजिक दबाव कहें या फिर मेरा अपना आत्‍मविश्‍वास, मुझे नहीं पता, लेकिन अपने बच्‍चे के लिए मैंने इस शादी को चलाना चाहा। 20 मई 2019 को एक प्‍यारा सा बेटा हुआ, कुछ दिक्‍कतों की वजह से मेरी सर्जरी हुई। जब मैं लाहौर ऑपरेशन थियेटर में थी, मेरे पति अपनी गर्लफ्रेंड नाज़िश जहाँगीर, जो कि एक मॉडल और एक्‍टर हैं, उसके साथ कराची में सो रहे थे।”

मोहसिन और फातिमा की एक पुरानी तस्वीर

अपना दर्द लिखते हुए फातिमा ने कहा, “ये सब करने के बाद मुझे नहीं पता कि मैं अपने बच्चे को कैसे बचाऊँगी, लेकिन मैं जानती हूँ कि अल्लाह मेरे साथ हैं। मैं काफी गालियाँ सुन ली हैं, काफी पीटी जा चुकी हूँ। मैं काफी तलाक की धमकियाँ सुन ली हैं। अब ये सब कुछ बहुत हो गया, मैं सारे सबूत भी यहाँ डाल रही हूँ।” फातिमा ने आखिर में लिखा, “मोहसिन, अब तुमसे मैं कोर्ट में मिलूँगी। सच बोलता है।”

पवन वर्मा जी, टीवी सीरियल से धर्म सीखने वाले आपकी तरह मूर्खतापूर्ण बातें ही करते हैं

मुझे नहीं पता कि जदयू नेता पवन वर्मा अपना धर्म कहाँ से सीख-पढ़ कर आए हैं, लेकिन जिस राम की बात वह आज के अपने टाइम्स ऑफ़ इंडिया वाले ब्लॉग में कर रहे हैं, वह कम-से-कम वो वाले राम तो नहीं हैं जिनके लिए हम “जय श्री राम” और ‘मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम’ का इस्तेमाल करते हैं, और जिन्हें रामायण में “नर व्याघ्र” और “नर शार्दूल“, यानि ‘मनुष्यों में बाघ’, कहा गया है। जिन श्री राम को ‘benevolent’ शब्द की आड़ में आप अपने घर के ‘रामू काका’ जैसा साबित करने की कोशिश कर रहे हैं, वह श्री राम हमारे धर्म के इतिहास में सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर कहे गए हैं- धनुर्धर माने धनुष धारण करके युद्ध करने वाला, आक्रामक, धर्मरक्षा के लिए हिंसा करने से भी न हिचकिचाने वाला। अपनी राजनीति साधने के लिए श्री राम के चरित्र के साथ आपने खिलवाड़ ही किया है।

धर्मोचित ‘आक्रामकता’ राम और रामभक्तों का गुण है

पवन वर्मा कहते हैं कि ‘जय श्री राम’ के नारे में “आजकल” आक्रामकता आ गई है। तो सबसे पहले तो पवन वर्मा जी के लिए यह जान लेना जरूरी है कि यह आक्रामकता आजकल की नहीं, हज़ारों वर्षों से है- बीच में कहीं गुम हो गई थी जो वापस आई है। आक्रामक हो जय श्री राम का घोष करते हुए ही राम के सबसे बड़े भक्त और रुद्र के अंश हनुमान ने लंका को जला दिया था। राम जन्मभूमि पर मंदिर तोड़ कर मस्जिद बनाए जाने के बाद से ही जो भी आंदोलन या संघर्ष राम भक्तों ने मस्जिद हटा कर दोबारा मंदिर बनाने के लिए किए, वह सब भी आक्रामक रूप से ही ‘जय श्री राम’ बोलते हुए हुए हैं।

दो लाख तीन घंटे में मारे

मुझे नहीं पता पवन वर्मा ने कौन सी रामायण पढ़ रखी है, जहाँ राम को मंद-मंद दिखाया गया है। लेकिन जिस रामायण के विषय में मैं जनता हूँ, उसके अरण्यकाण्ड के 37वें सर्ग में तीसरे श्लोक में लिखा है, “रामो विग्रहवान् धर्मस्साधुस्सत्यपराक्रमः।” मेरी संस्कृत सटीक शब्दार्थ बताने लायक अच्छी तो नहीं है, लेकिन इसका भावार्थ है- राम धर्म का विग्रह हैं, सत्यशील हैं, साधु हैं और पराक्रमी हैं। पराक्रमी, पवन वर्मा जी।

मेरी जानकारी के अनुसार यदि रामायण का युद्ध कांड देखा जाए तो उसमें भी श्री राम के आक्रमण का ही वर्णन है। उसमें बताया गया है कि श्री राम गान्धर्वास्त्र का प्रयोग करते हैं, और महज़ तीन घंटे में 10,000 रथों का नाश करने के साथ 18,000 हाथियों, 14,000 घोड़ों और घुड़सवारों और 2,00,000 पैदल राक्षसों का वध महज़ तीन घंटे में कर देते हैं। पवन वर्मा के लिए इतनी आक्रामकता काफी है?

राम दयालु थे लेकिन मूर्ख नहीं

इसमें कोई शक नहीं कि राम का एक पक्ष दया और उदारता का भी था। बिलकुल था। इसीलिए मारीच को एक बार जीवित छोड़ देते हैं क्योंकि उन्हें मारीच में धर्म के कुछ बीज दिखे थे। बाद में मारीच ने सीता के हरण में हिस्सा लेने में अनिच्छा भी जताई। लेकिन जब अंत में उसने अपना राक्षसी, अधर्मी पक्ष ही हावी होने दिया तो राम ने उसे मारने में कोई संकोच नहीं किया।

पवन वर्मा इस चित्र को पहचानते हैं? इसमें राम अपने अस्त्र से समुद्र को सुखा देने के लिए उद्दत हैं, क्योंकि उनके लाख मनुहार करने के उपरांत भी समुद्र रास्ता नहीं दे रहा है।

राजा रवि वर्मा का बनाया हुआ राम-वरुण संवाद का चित्र

राम की क्षमा, उनका शील उनके लिए हैं, जो धर्म के साथ हैं। उनकी शरण में हैं। राम की दया करुणा विभीषण के लिए होती है, हनुमान और लक्ष्मण के लिए होती है। अपने शत्रुओं के लिए, अधर्मियों के प्रति उनका ‘angry god’ के रूप में चित्रण एकदम सटीक है, बिलकुल सही है।

राम-राज्य में आपका क्या होगा?

पवन वर्मा राम की बात करते हुए अपने ब्लॉग में “यहाँ तक कि गाँधी जी…” के सर्टिफिकेट का ज़िक्र करते हैं। पहली बात तो पवन वर्मा को यह पता होनी चाहिए कि मोहनदास करमचंद गाँधी बाकी जो कुछ थे या नहीं थे, कम-से-कम हिन्दुओं के लिए किसी भी तरह का मापदण्ड नहीं ही थे। अतः अगर वो रामराज्य की तारीफ़ की बजाय बुराई में भी दो-चार बातें बोल भी देते तो हिन्दुओं को कोई फर्क न पड़ता।

दूसरी बात कि जिस राम-राज्य का ज्ञान पवन वर्मा बाँच रहे हैं, उन्होंने कभी सोचा है कि उस राम-राज्य में उनकी सरकार, उनकी पार्टी का क्या हाल होता? आज लालू के जंगलराज से उनके राज में बिहार के लोगों के लिए फर्क करना मुश्किल है- राम की ससुराल मिथिला में बाढ़ तब भी वैसी ही थी, अब भी वही है; चमकी बुखार जस-का-तस है; पटना के महात्मा गाँधी सेतु पुल पर लालू-राज में भी नियम था कि सुबह-सुबह जो पुल नहीं पार कर लिया, वह पूरा दिन जाम में फँसा रहेगा, आज भी वही हाल है। राम अगर राजा होते, पवन वर्मा जी, तो आपकी पार्टी और सरकार या तो सूली पर होते या जेल में।

पढ़े-लिखे ‘रामभक्तों’ का रंग देख लिया है

पवन वर्मा ‘आक्रामक’ रामभक्तों को अनपढ़ कह रहे हैं। इससे ज्यादा ‘elitism’ हो नहीं सकता कि इंसान मान ले कि उसकी तरह ‘मि-मि’ मिमियाने वाला शैम्पेन लिबरल ही पढ़ा-लिखा हो सकता है; बाकी प्रचंड, आवेशपूर्ण और भावुक तो जाहिल और अनपढ़ ही होते हैं। लेकिन अगर ऐसा है भी, पवन वर्मा जी, तो भी ठीक है। आपके जैसे ‘पढ़े-लिखे’ का हाल देखकर तो हम रामभक्त अनपढ़ ही भले।

तथाकथित ‘अनपढ़’ लोगों ने ही राम की ‘धर्म विग्रह’ और ‘मनुष्यों में बाघ‘ की छवि को ज़िंदा रखा है। आपके जैसे पढ़े-लिखों ने तो राम को पहले अवतार से ‘कैलेंडर-आर्ट’ में तब्दील किया, और फिर टीवी पर डालडा की तरह नीरस और अशक्त टीवी किरदार के रूप में विकृत छवि का जमकर प्रचार-प्रसार किया, ताकि हिन्दुओं से एकतरफ़ा हथियार डलवाने वाली गाँधी-छाप अहिंसा को हिन्दुओं में स्वीकृति दिलाई जा सके। तो पवन वर्मा जी, टीवी कम देखिए और ज़रा कभी असली धर्म-शास्त्र पढ़ लिया करिए। राम टीवी से नहीं, शास्त्रों और योगाभ्यास से समझने की चीज़ हैं… आपको अहिंसक, गैर-आक्रामक जय श्री राम।

मंत्री शिष्टाचार के नाते बोलते थे ‘आओ कभी मिलने’, रोज 150 लाेग पहुँचने लगे तो रखा दरबान

उत्तराखंड के लोग आपसी शिष्टाचार और मिलनसार प्रवृत्ति के लिए जाने जाते हैं लेकिन इस बार मामला राष्ट्रीय स्तर पर उछल पड़ा है। कारण बने हैं देश के मानव संसाधन मंत्री रमेश पोखरियाल ‘निशंक’। दरअसल उत्तराखंड के हरिद्वार संसदीय क्षेत्र से सांसद निशंक उनसे मिलने वाले लोगों से इतने परेशान हो गए कि उन्हें निजी चौकीदार रखना पड़ गया।

देहरादून से दिल्ली की दूरी मात्र चार-पाँच घंटों में तय हो जाती है। ऐसे में रमेश पोखरियाल को अपने समर्थकों से ‘मिलने आने’ की बात उन पर भारी पड़ रही है। देहरादून से नजदीक होने के कारण उनसे रोजाना सौ-डेढ़ सौ लोग मिलने पहुँच जाते हैं। मिलनसार स्वभाव हाेने के कारण वह किसी को मना भी नहीं कर पाते हैं, लेकिन इससे उनके काम में व्यवधान पड़ने लगा है। मिलने आने वालों के कारन होने वाले इसी व्यवधान से बचने के लिए उन्हाेंने शास्त्री भवन में अपने ऑफिस के बाहर प्राइवेट गार्ड तैनात कर दिया।

यह गार्ड अंदर जाने वाले लोगों का पूरा परिचय और जानकारी लेता है, इसके बाद मंत्री से मिलने का पास होने पर ही अंदर जाने देता है। जिस व्यक्ति के पास अन्य अधिकारी के नाम का पास होता है, उसे बाहर ही रोक देता है। इस तरह से यह निजी गार्ड जुगाड़ लगाकर मंत्री से मिलने की कोशिश करने वालों को भी बाहर ही रोक देता है।

भास्कर की एक रिपोर्ट के अनुसार, अगर मंत्री किसी प्रशंसक को मजाक में ही सुबह बोलते हैं कि आप दिल्ली आ जाइए चाय पीने, तो लोग शाम तक सच में दिल्ली उनके कार्यालय पहुँच जाते हैं। कई प्रशंसक तो मंत्री से मिलने के लिए पास बनवाने के लिए यह संदेशा भिजवाते हैं कि उन्होंने बचपन में मंत्री के साथ पढ़ाई की है और उनके मित्र हैं, इसलिए मिलना चाहते हैं। कई लोग इसी बहाने जुगाड़ लगाकर पास बनवाने की जुगत में भी रहते हैं।

हालाँकि, मानव संसाधन विकास मंत्री रमेश पोखरियाल के ओएसडी अजय बिष्ट ने बताया कि कई लोग शास्त्री भवन के किसी और ब्लॉक या अधिकारी का पास बनवा लेते हैं और मंत्री से मिलने आ जाते हैं, जिससे काम प्रभावित होता है। सुरक्षा काे ध्यान में रखते हुए निजी गार्ड तैनात किया गया है। शास्त्री भवन की सुरक्षा सीआईएसएफ के पास है। यहाँ विशेष आईडी के साथ ही लोगों काे प्रवेश दिया जाता है।

गिरी कर्नाटक की सरकार, 105 विधायकों ने कुमारास्वामी के खिलाफ किया वोट

आखिरकार विश्वास मत में हार के बाद जदएस-कॉन्ग्रेस की कुमारास्वामी सरकार गिर गई है। कई दिनों से चले आ रहे सियासी ड्रामे के पटाक्षेप में हुई यूपीए की इस हार ने एनडीए के लिए रास्ता खोल दिया है। राज्य सरकार गठबंधन के 16 विधायकों के बागी हो बाद से ही डाँवाडोल चल रही थी।

महबूबा ने कहा काला दिन, भाजपा के लिए लोगों की जीत

105 वोट विश्वास मत के विरुद्ध पड़ने के बाद जहाँ भाजपा ने इसे जनादेश की जीत बताया है, वहीं महबूबा मुफ़्ती ने इसे देश के लोकतंत्र में एक काला दिन करार दिया है। सिद्दारमैया, जो कॉन्ग्रेस की पिछली सरकार के मुख्यमंत्री थे, ने सफ़ाई दी कि चूँकि भाजपा को पिछले विधानसभा चुनाव में स्पष्ट बहुमत नहीं मिला था, इसलिए उनकी पार्टी के जदएस के साथ गठबंधन को जनादेश की भावना के खिलाफ नहीं कहा जा सकता।

गृह मंत्रालय ने घटाई कई नेताओं की सुरक्षा: लालू, सतीश चंद्र मिश्रा समेत रूडी भी शामिल

केंद्रीय गृह मंत्रालय ने देश के कई बड़े नेताओं की सुरक्षा व्यवस्था की समीक्षा की है। इसमें कुछ नेताओं की सुरक्षा में कटौती कर दी गई है। जिन नेताओं की सुरक्षा में कटौती की गई है उनमें आरजेडी अध्यक्ष लालू यादव, बीएसपी नेता सतीश चंद्र मिश्रा, बीजेपी नेता संगीत सोम और राजीव प्रताप रूडी शामिल हैं। अब इनकी सुरक्षा व्यवस्था में CRPF के जवान शामिल नहीं होंगे।

ख़बर के अनुसार, केंद्र ने उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री सुरेश राणा, एलपीजे सासंद चिराग पासवान, पूर्व सांसद पप्पू यादव की सुरक्षा में भी कटौती की गई है। गृह मंत्रालय द्वारा बडे़ नेताओं की सुरक्षा में की गई कटौती में सियासत तेज़ होने की संभावना है। विपक्ष के जिन नेताओं की सुरक्षा में कटौती की गई हैं उनके विरोध में आने की संभावना है।

बीजेपी के सांसद और पूर्व केंद्रीय मंत्री राजीव प्रताप रूडी की भी सुरक्षा घटाई गई है। उनकी सुरक्षा में अब CRPF के जवान नहीं शामिल होंगे और वहीं, चिराग पासवान को अब Y श्रेणी की सुरक्षा मिलेगी।

गृह मंत्रालय ने इसके अलावा सेंट्रल लिस्ट से कुछ जाने-माने लोगों के नाम भी हटा लिए हैं। इनमें अखबार ‘पंजाब केसरी’ के संपादक एके मिन्हा और ‘आनंद बाजार पत्रिका’ के संपादक अवीक सरकार शामिल हैं। मिन्हा को दिल्ली के सिवा पूरे देश में CRPF कवर मिला हुआ था, जिसे हटाकर उन्हें Z श्रेणी की सुरक्षा दी जाएगी।

शेख आमेर ने समुदाय में नाम ऊँचा करने के लिए रची थी झूठी ‘जय श्री राम’ की कहानी

महाराष्ट्र के औरंगाबाद शहर में 3 दिनों के अंदर ही ‘जय श्री राम’ के नारे की एक और झूठी घटना सामने आई है। ताजा मामले में, कथित पीड़ित शेख आमेर ने कथित तौर पर एक झूठी और मनगढ़ंत कहानी बताते हुए कहा कि 4 युवकों ने उससे जबरदस्ती ‘जय श्री राम’ बोलने के लिए कहा और उसके मना करने पर उसकी पिटाई की धमकी थी। साथ ही उन लोगों ने उसे वहाँ से जल्दी जाने के लिए कहा। शिकायत दर्ज कराने के एक दिन बाद ही आमेर ने अपना बयान से पलट गया। उसने अपना बयान वापस लेते हुए कहा कि उसने अपने समुदाय के सदस्यों के बीच अपना कद बढ़ाने और उससे झगड़ा करने वाले लोगों को सबक सिखाने के लिए मनगढ़ंत कहानी के आधर पर पुलिस से शिकायत की। जिसके बाद मुस्लिम सुमदाय के लोगों ने जमकर हंगामा किया।

तस्वीर साभार: लोकमत

दरअसल, कटकट गेट निवासी शेख आमेर अपने दोस्त आमेर के साथ जोमैटो कंपनी में डिलीवरी बॉय का काम करता है और दोनों 21 जुलाई की रात तकरीबन साढ़े 10 बजे मोटरसाइकिल से आजाद चौक से बजरंग चौक की तरफ जा रहे थे कि तभी वहाँ के एक निजी दवाखाने के सामने से एक कार अचानक से मुड़ गई। इसी बात को लेकर आमेर और उसके दोस्त की कार में बैठे लोगों से मामूली सा विवाद हो गया। जिसके बाद आमेर ने उन लोगों को सबक सिखाने का सोचा और कुछ ही दिन पहले शहर के हुडको कॉर्नर पर घटा घटना को याद करते हुए उसने जय श्री राम न बोलने पर पिटाई की झूठी कहानी बनाई और पुलिस में शिकायत कर दी।

सकल में प्रकाशित खबर का स्क्रीनशॉट

आमेर की शिकायत पर पुलिस ने जिन चार लोगों को गिरफ्तार किया है, वो इंजीनियरिंग के छात्र हैं। पुलिस ने उनकी कार को भी जब्त कर लिया है और उन पर धारा 153A, धारा 295A और धारा 506 के तहत मामला दर्ज किया गया है। हालाँकि, गिरफ्तार किए गए सभी चार लोगों ने ये स्वीकार किया था कि उनका आमेर और उसके दोस्त के साथ मोड़ पर झगड़ा हुआ था, मगर उन्होंने इस बात से इनकार किया था कि उनलोगों ने उन दोनों से ‘जय श्री राम’ के नारे लगाने के लिए कहा था।

गौरतलब है कि, औरंगाबाद के मदीना होटल में काम करने वाले इमरान इस्माइल ने शुक्रवार (जुलाई 19, 2019) को 10 लोगों के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी। इसमें उसने कहा था कि गुरुवार की देर रात जब वो घर जा रहा था तो रास्ते में कुछ लोगों ने उसे रोका और ‘जय श्री राम’ बोलने के लिए मजबूर किया। विरोध करने पर उन लोगों ने इमरान की पिटाई की और जबरदस्ती तीन बार ‘जय श्री राम’ बुलवाया।

हालाँकि, जब पुलिस ने इसकी जाँच की तो पता चला कि घटना को अनावश्यक रूप से सांप्रदायिक रंग दिया जा रहा था। पुलिस ने सबूतों का हवाला देते हुए कहा था कि इस्माइल के साथ हाथापाई निजी दुश्मनी की वजह से हुई थी और इमरान को बचाने वाले चश्मदीद (गणेश) ने भी यही बात कही थी। गणेश ने भी कहा था कि इमरान के सााथ मारपीट आपसी दुश्मनी की वजह से हुई थी, न कि जय श्री राम न बोलने की वजह से। इससे पहले कम से कम 8 ऐसी घटनाएँ सामने आई हैं जहाँ समुदाय विशेष के लोगों ने झूठ बोल कर पुलिस से शिकायत की कि उन्हें जबरदस्ती ‘जय श्री राम’ कहने को मजबूर किया गया।

रेलवे के खाने में बार-बार छिपकली: बुजुर्ग करता था फ्री खाने के लिए नाटक

रेलवे के खाने में छिपकली पाए जाने की एक भ्रामक खबर का आखिरकार खंडन हो गया है। सुरेंद्र पाल नाम के एक बुजुर्ग की चालाकी पकड़े जाने के बाद रेलवे के ही एक वरिष्ठ कॉमर्सियल मैनजेर ने इस प्रकार की शिकायतों में एक संदेहास्पद और एक समान प्रक्रिया पाने के बाद सम्बंधित अधिकारियों को भी इस बारे में सतर्क किया है।

बसंत कुमार शर्मा, वरिष्ठ DCM, जबलपुर ने PTI से फोन कॉल पर कहा- “यह वही आदमी है। उसने 14 जुलाई को जबलपुर रेलवे स्टेशन पर समोसा खाने की बात कही थी और बताया था कि उसे इसमें छिपकली मिली। इसके बाद गंटकल रेलवे स्टेशन में बिरयानी में छिपकली मिलने की भी शिकायत की थी। मुझे इस बारे में संदेह हुआ और मैंने वरिष्ठ DCM को इस बारे में सतर्क किया। मैंने उन्हें तस्वीरें भी दिखाई। वो एक 70 साल से भी ज्यादा उम्र का आदमी निकला, जो ऐसा फ्री का खाना खाने के लिए करता था।” उन्होंने यह भी बताया कि सुरेंद्र पाल ऐसा काफी समय से करते आ रहा था।

रिपोर्ट्स के अनुसार, गंटकल स्टेशन पर जब वरिष्ठ अधिकारियों ने पूछताछ की, तो उसने वीडियो बनाते हुए स्वीकार किया कि वो इस ट्रिक के लिए किसी ‘दिमागी बिमारी ठीक करने वाली मछली’ का इस्तेमाल करता था। वीडियो में अधिकारी उसे समझते हुए देखे जा सकते हैं कि रेलवे एक राष्ट्रीय सम्मान का विषय है और जनता से जुड़ी हुई संपत्ति है। अधिकारी उसे रेलवे का नाम ख़राब करने के लिए डाँट भी रहे हैं। साथ ही, सुरेंद्र पाल को हिदायत दी गई कि उसके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की जाएगी यदि वह इस प्रकार की हरकतों को भविष्य में नहीं दोहराएगा।

वीडियो में सुरेंद्र पाल अधिकारियों से कह रहा है, “मैंने गलत काम किया है। मैं बुजुर्ग आदमी हूँ और दिमागी रूप से अस्थिर हूँ, मुझे ब्लड कैंसर है। कृपया मुझे छोड़ दो। पंजाब में एक आयुर्वेदिक दवाई मिलती है। मैंने एक मछली इस्तेमाल की, जो दिमाग की कमजोरी और हड्डियों की बिमारी को ठीक करती है।”

पाल ने बताया कि उसके पिता भी एक वरिष्ठ DCM थे, इस पर अधिकारी उसे समझा रहे हैं कि उसे रेलवे के साथ धोखा नहीं करना चाहिए था क्योंकि यह उसके लिए परिवार जैसा है।

हालाँकि, यह पता नहीं लगाया जा सका कि उसे कैंसर है। अक्टूबर तक रेलवे को यात्रियों द्वारा 7,500 से ज्यादा शिकायतें मिलीं, जो खाने की ख़राब गुणवत्ता को लेकर थीं।

सोनभद्र: वनभूमि लूट में सपा-कॉन्ग्रेस नेताओं के नाम, सांसद से लेकर पूर्व विधायक तक शामिल

उत्तर प्रदेश के सोनभद्र में हुए हत्याकांड में प्रदेश सरकार की ओर से की जा रही जाँच में चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। जानकारी के मुताबिक इस जाँच में सपा और कॉन्ग्रेस के ऐसे जनप्रतिनिधियों के नामों का खुलासा हुआ है, जिन्होंने गरीबों की जमीन को लूटने का काम किया है और घटना होने पर धरना प्रदर्शन करके राजनीति करने की कोशिश की है। इसके अलावा विवादित जमीनों के मामलों में चल रही जाँच में बसपा के कई नेताओं का नाम उजागर हुआ है।

खबरों की मानें तो सोनभद्र की वह जमीन जिसे लेकर खूनी संघर्ष हुआ, उसमें यूपी के पूर्व राज्यपाल चंद्रशेखकर प्रसाद नारायण के चाचा और कॉन्ग्रेस के राज्यसभा सांसद महेश्वर प्रसाद नारायण का नाम सामने आया है। साथ ही घटना का मुख्य अभियुक्त ग्राम प्रधान समाजवादी पार्टी के पूर्व विधायक रमेश चंद्र दुबे का नजदीकी बताया जा रहा है।

खबरों के मुताबिक वनभूमि की लूट में कई बड़े-बड़े नेताओं के नाम सामने आए हैं। जिनका आगे की जाँच में खुलासा होगा। नवभारत टाइम्स की रिपोर्ट से प्राप्त जानकारी के अनुसार:-

  • रेनुकूट डिवीजन के गाँव जोगेंद्रा में बसपा सरकार के पूर्व मंत्री ने वन विभाग की 250 बीघा जमीन पर कब्जा किया हुआ है।
  • इसी तरह सोनभद्र जिले के गाँव सिलहट में एसपी के पूर्व विधायक ने 56 बीघे जमीन का बैनामा अपने भतीजों के नाम पर करवाया हुआ है।
  • ऐसे ही ओबरा वन प्रभाग के वर्दिया गाँव में एक कानूनगो के बारे में पता चला है कि उसने पहले अपने पिता के नाम जमीन कराई और बाद में उसे बेच दिया।
  • घोरावल रेंज के धोरिया गाँव में भी ऐसे ही एक रसूखदार ने 18 बीघा जमीन 90 हजार रुपए में खरीदी और फिर इसकी आड़ में बाकी जमीन को भी कब्जा लिया।
  • इससे पहले ओबरा वन प्रभाग के बिल्ली मारकुंडी में जंगल विभाग की जमीन पर पेट्रोल पंप बनाने का मामला पहले ही अदालत में विचारधीन है।

गौरतलब है कि उपर्युक्त सभी मामलों के साथ सरकारी कर्मचारियों की मिलीभगत से वन विभाग की जमीन में आबादी दिखाने के बहुत से मामले सामने आए हैं। साथ ही जाँच में ये भी खुलासा हुआ है कि भारतीय वन अधिनियम-1927 की धारा-4 और धारा-20 में विज्ञापित जमीनों को रसूखदारों के कहने पर चकबंदी में शामिल कर लिया जा रहा है, जबकि नियमानुसार ऐसा नहीं हो सकता।

यहाँ जाँच में ये भी पता चला है कि ऐसे मामलों की संख्या भी कम नहीं है जहाँ व्यक्ति या संस्था अदालत से मुकदमा हार गई है लेकिन फिर भी वन विभाग की जमीन पर अपना कब्जा जमाए हुए है।

इतना ही नहीं, खबरों की मानें तो जब से प्रदेश सरकार ने जमीन पर अंसक्रमणीय से संक्रमणीय अधिकार देने का नियम बनाया है, तब से तमाम लोग मोटी रकम लेकर अपनी जमीनें बेचते हैं और फिर जंगल की जमीन को कब्जाने में जुट जाते हैं। इन मामलों में अब तक सपा-बसपा के कई पूर्व मंत्री और विधायकों के नाम सामने आ चुके हैं।

बताया जा रहा है कि प्रदेश सरकार द्वारा गठित की गई जाँच कमिटी इस सप्ताह मुख्यमंत्री को इस मामले में अपनी रिपोर्ट सौंपेगी, जिसके बाद इन कब्जेदारों पर कार्रवाई होना लगभग तय है।

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जिस युद्धकला पर अंग्रेज़ों ने डाली कुदृष्टि, उसे हिन्दुओं ने नृत्य शैली के रूप में बचाया

मराठी में जिसे ‘दंडपट्ट‘ कहते हैं लगभग वैसी ही तलवार को उड़िया में सिर्फ ‘पट्ट’ कहा जाता है। संभवतः आपने इसे किसी संग्रहालय में देखा भी होगा। इसमें कलाई तक ढकने वाली बंधी मुट्ठी के आगे एक धारदार टुकड़ा लगा हुआ दिखता है। देखने में भले ये ऐसा लगता है जैसे इसका इस्तेमाल घोंपने में होता होगा, लेकिन असल में ये छुरे की तरह नहीं बल्कि काटने में इस्तेमाल होने वाली तलवार है। पैदल सैनिकों का सामना बख्तरबंद घुड़सवारों से हो, तो ये तलवार बहुत काम की होती थी। इसके साथ जो दूसरे किस्म की तलवार इस्तेमाल होती थी, उसे खांडा कहा जाता है। मराठा क्षेत्रों में भी ये अक्सर दिख जाएँगी क्योंकि इन इलाकों में जिन फौजों का सामना करना पड़ता था वो अक्सर बख्तरबंद घुड़सवार हमलावर होते थे।


दंडपट्ट (तस्वीर सौजन्य: विकिपीडिया)

पैदल सैनिकों के लिए इस्तेमाल होने वाले संस्कृत शब्द के मामूली से अपभ्रंश से ‘पाइका’ शब्द बना। ये अखाड़े होते थे जो अभी भी ओडिशा में पाए जाते हैं। कलिंग के काल से ही ओडिशा की सैन्य सुरक्षा का काफी हिस्सा इन्हीं ‘पाइका’ अखाड़ों पर निर्भर था। बंगाल के इस्लामिक शासक भी इन्हीं पाइका अखाड़ों के कारण ओडिशा पर विजय नहीं पा सके थे। ऐसे अखाड़ों का नियंत्रण ‘खंडायत’ के हाथ में होता था। इस शब्द में भी फ़ौरन खांडा यानी दूसरी किस्म की तलवार नजर आ जाएगी। सन 1817 में जगबंधु बिद्याधर मोहपात्रा राय के नेतृत्व में पाइका अखाड़ों ने फिरंगियों के खिलाफ विद्रोह का बिगुल फूँक दिया था। दूसरे कई विद्रोहों की तरह ही ये विद्रोह भी कुचला गया था।

खांडा (तस्वीर सौजन्य: विकिपीडिया)

गजपति वंश के शासन काल में पाइका अखाड़े अपने चरम पर थे। अंग्रेजों का समय आने तक इनकी क्षमता लगातार इस्लामिक आक्रमणों के कारण काफी कम पड़ चुकी होगी। अंग्रेजों के आक्रमण के बाद से जब हिन्दुओं पर शस्त्र रखने और उनके संचालन की शिक्षा-दीक्षा पर पाबन्दी लगी तो अपनी कला को जीवित रखने के लिए इन्होंने एक अनूठा तरीका चुना। तलवार चलाने की कला, नृत्य के रूप में सिखाई जाने लगी। आज जो कलाएँ बिहार में परी-खांडा और ओडिशा में छाऊ नृत्य के नाम से जानी जाती हैं, ये वही तलवारबाजी के करतब होते हैं। छाऊ शब्द भी सेना की छावनी शब्द से ही बना हुआ है। अभी भी पाइका अखाड़े अपनी कला का प्रदर्शन दुर्गा-पूजा या नवरात्रि के अवसर पर करते हैं।

कल (22 जुलाई 2019) जब जगन्नाथ पुरी के एक पुजारी की तस्वीरें इन्टरनेट पर नजर आने लगीं तो कुछ तथाकथित हिन्दुओं की मासूम, अहिंसक, गाँधीवादी, सेक्युलर भावना बड़ी बुरी तरह आहत हो गईं। गोरे साहबों के जाने के बाद आए भूरे साहबों ने भी भारतीय युद्धकलाओं की हत्या करने में उससे ज्यादा तत्परता दिखाई थी, जितनी उनके गोरे साहब दिखा पाते। इस वजह से शारीरिक शौष्ठव, शस्त्र इत्यादि देखकर उनका छाती कूट कुहर्रम मचाना कोई आश्चर्यजनक भी नहीं। अब अगर वापस पट्ट नाम के इस हथियार की ओर आएँ तो ये सबसे भयावह हथियारों में से एक माना जाता था। ऐसा इसलिए था क्योंकि अक्सर योद्धा इसका प्रयोग अपने अंतिम समय में करना शुरू करते थे।

कई बार दो-दो के जोड़ों में योद्धा पट्ट चलाना शुरू करते, कलाई इसके दस्ते को पकड़ने पर मुड़े नहीं इसलिए ये दो लोगों के सम्मिलित नृत्य जैसा कुछ दृश्य होता होगा। ये एक तथ्य है कि मराठा सैनिक गिरते समय इसका इस्तेमाल करते थे ताकि अपने साथ-साथ ज्यादा से ज्यादा मलेच्छ शत्रुओं को भी लिए जाएँ। दो की जोड़ी में अगर पट्ट चलाया जा रहा हो तो अन्दर प्रवेश करके चलाने वालों पर प्रहार करना बहुत मुश्किल होगा। अब पहली किस्म के खड़ग यानी खांडा से तो खंडायत नाम बना था, दूसरे किस्म के लिए पट्टनायक नाम के बारे में सोचिये।

बाकी जब याद आ जाए कि जाने-माने लेखक देवदत्त पट्टनायक के नाम में आपको नायक शब्द का मतलब तो पता है, तब ये सोचिएगा कि भला ये ‘पट्ट’ क्या होता होगा? तब तक पाइका अखाड़ों और पाइका विद्रोह भी पढ़िएगा। हम बताते चलें कि शेखुलरों के लिए ओडिशा का इतिहास हजम करने में दिक्कत होनी तय है!