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AAP की दिल्ली, खालिस्तान… पंजाब का एग्जिट पोल खतरे की घंटी या फिर 2017 की तरह 10 मार्च को बिखर जाएगी झाड़ू

पंजाब में हुए विधानसभा चुनाव के बाद सारे एग्जिट पोल्स इसी तरफ इशारा कर रहे हैं कि राज्य में ‘आम आदमी पार्टी (AAP)’ की सरकार बनेगी। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की पार्टी को 100 सीटें तक मिलते हुए दिखाया गया है। कभी अभिनेता और कॉमेडियन रहे भगवंत मान AAP के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार हैं और पार्टी की सरकार बनने की स्थिति में सीएम वही बनेंगे। पाकिस्तान से लगती सीमा पर स्थित इस राज्य में AAP की सरकार बनना खतरे की घंटी भी है।

पाकिस्तान से सटे पंजाब में हमेशा चुनौती रही हैं अलगाववादी ताकतें

पंजाब राजनीतिक और सामाजिक रूप से काफी संवेदनशील राज्य है। राज्य के 6 जिले फिरोजपुर, तरनतारण, अमृतसर, गुरदासपुर, पठानकोट और फाजिल्का की सीमाएँ पंजाब से लगती हैं। जनवरी 2016 में पठानकोट में हुआ हमला आज भी लोगों के जेहन में ताज़ा हैं, जब इस हमले में 7 जवानों का बलिदान हो गया था। अमृतसर का वाघा भारत-पाकिस्तान सीमा पर स्थित है और यहाँ कई पर्यटक भी आते हैं। सिख समाज के लिए अमृतसर सबसे पवित्र स्थलों में से एक है।

अब आते हैं पंजाब में खालिस्तानी प्रभाव पर। राज्य में 80 के दशक में जब जरनैल सिंह भिंडरवाला का उभार हुआ और उसने स्वर्ण मंदिर को आतंकी गतिविधियों का अड्डा बना दिया, तब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने मंदिर के अंदर ‘ऑपरेशन ब्लू स्टार’ चलाने का निर्णय लिया। इसी हमले के कारण कट्टरपंथी सिख आतंकियों ने इंदिरा गाँधी की जान ले ली। तब सेना प्रमुख रहे जनरल अरुण श्रीशर वैद्य को पुणे में मार डाला गया।

AAP के संस्थापक सदस्य कवि कुमार विश्वास ने ही खोल दी पार्टी की पोल

अब आते हैं AAP के खालिस्तानी कनेक्शन पर। हाल ही में AAP के संस्थापक सदस्य रहे कवि कुमार विश्वास ने पार्टी के खालिस्तानी कनेक्शन के बारे में खुलासा करते हुए सवाल खड़ा किए। स्थिति ऐसी बन आई कि केंद्रीय गृह मंत्रालय (MHA) को उन्हें ‘Y’ श्रेणी की सुरक्षा देनी पड़ी। उनके बयान के बाद पंजाब के मुख्यमंत्री और कॉन्ग्रेस नेता चरणजीत सिंह चन्नी ने भी केंद्र सरकार से इस मामले की जाँच की माँग की। ये एक ऐसा मुद्दा है, जिस पर कोई भी गंभीर नेता चिंतित होगा।

याद कीजिए, पंजाब में हालात आज भी उतने सही नहीं हैं। ऐसा इसीलिए, क्योंकि कैप्टन अमरिंदर सिंह ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने के बाद केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के साथ-साथ राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजीत डोभाल के साथ भी बैठक की थी। उन्होंने कुछ दस्तावेज सौंपे थे। मामले की संवेदनशीलता के कारण इस सम्बन्ध में कुछ बताया नहीं गया। एग्जिट पोल्स के सामने आने के बाद सीएम चन्नी भी अमित शाह से दिल्ली जाकर मिले।

फरवरी 2022 में कुमार विश्वास ने कहा था कि अरविंद केजरीवाल खालिस्तान समर्थक है, वो आदमी सत्ता के लिए किसी भी हद तक जा सकता है। उन्होंने कहा था कि AAP सुप्रीमो हमेशा से खालिस्तान के समर्थक रहे हैं। उनके अनुसार, केजरीवाल ने तो यहाँ तक कहा था कि या तो वो पंजाब के मुख्यमंत्री बनेंगे या फिर एक ‘आज़ाद देश’ के। स्पष्ट है, ये ‘आज़ाद मुल्क’ भारत के पंजाब से कट कर आएगा। इससे पता चलता है कि असली ‘टुकड़े-टुकड़े गिरोह’ कौन है।

एक ऐसे संवेदनशील राज्य, जहाँ की 60% जनसंख्या सिख है – वहाँ एक अलगाववादी विचारधारा वाले दल का सत्ता में आने खतरे से खाली नहीं होगा। कुमार विश्वास दावा कर चुके हैं कि अरविंद केजरीवाल को अलगाववादियों का समर्थन लेने में कोई परहेज नहीं होगा और उनके यहाँ पहले भी इस किस्म के लोग आते-जाते रहते थे। AAP को इसके बाद ऐसी मिर्ची लगी थी कि पार्टी ने हर खबरिया चैनल को उनका वीडियो चलाने पर धमकी दी थी।

इसके बाद हुई रैलियों में अरविंद केजरीवाल ने खुद को ‘स्वीट आतंकवादी’ बताते हुए अपने विकास कार्यों को गिनाना शुरू कर दिया था। इस पर पलटवार करते हुए कुमार विश्वास ने कहा था, “वो यह कह दें कि किसी राज्य में खालिस्तानी को पनपने नहीं दूँगा। इतना कहना में क्या जा रहा है कि मैं खालिस्तान के खिलाफ हूँ। यह वो बोल कर दिखाएँ।” स्पष्ट है, AAP की तरफ से किसी भी नेता ने खालिस्तान के खिलाफ एक भी बयान नहीं दिया।

ये वो समय है, जब ‘किसान आंदोलन’ के कारण पहले से ही पंजाब और दिल्ली में 1 साल से भी अधिक समय तक अशांति का माहौल रहा। कभी इस ‘किसान आंदोलन’ में पाकिस्तानी ख़ुफ़िया एजेंसी ISI के घुसने की खबर आई तो कभी ‘सिख्स फॉर जस्टिस (SFJ)’ के गुरपतवंत सिंह पन्नू ने कई वीडियो जारी कर के कई बार किसानों को भड़काया। कभी उसने पंजाब को काटने की बात की तो कभी लाल किला पर खालिस्तानी झंडा फहराने के लिए करोड़ों रुपए का इनाम रखा।

कुमार विश्वास के आरोप गंभीर थे, जिसके बाद कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी ने भी अरविंद केजरीवाल से जवाब माँगा था कि ये बात झूठ है या फिर सच। सीएम चन्नी ने आरोप लगाया कि SFJ लगातार AAP के साथ संपर्क में है और अलगाववादी संगठन ने इस चुनाव में भी AAP को समर्थन देने के लिए कहा था। उन्होंने कहा था कि देश की अखंडता के साथ किसी को भी खिलवाड़ करने का मौका नहीं दिया जाएगा। इन सबसे स्पष्ट है कि AAP का आना खतरे से खाली नहीं है।

भगवंत मान जैसे नेता का पंजाब का CM बन जाना खतरे से खाली नहीं

एक और बात ये देखिए कि पंजाब में AAP के सीएम उम्मीदवार कभी अभिनेता और कॉमेडियन रहे हैं। उनके पास प्रशासनिक अनुभव न के बराबर है। वो ज़रूर संगरूर से लगातार दूसरी बार सांसद हैं, लेकिन जिस तरह से उनके लड़खड़ाते हुए कई वीडियोज सामने आते हैं और इसे ‘उड़ता पंजाब’ से जोड़ा जाता है, उससे आप समझ सकते हैं कि एक ऐसे नेता जिसे गंभीर न माना जाता हो – उसके सत्ताधीश बनने के बाद कैसी स्थिति उत्पन्न होगी।

इसीलिए, चिंता का विषय ये है कि अरविंद केजरीवाल ही दिल्ली से इस सरकार को रिमोट कंट्रोल से चलाएँगे। 2017 के पंजाब विधानसभा चुनाव में कई एग्जिट पोल्स AAP को बहुमत मिलने का दावा कर रहे थे और पार्टी ने जश्न की तैयारी भी कर ली थी, लेकिन कॉन्ग्रेस की जीत के उसके इरादों पर पानी फेर दिया। क्या इस बार भी ऐसा ही होगा? हमने तमाम ऐसे मौके देखे हैं जब नतीजे एग्जिट पोल्स के एकदम उलट ही आ गए।

वैसे, पंजाब जैसे राज्य में किसी भी दल को पूर्ण बहुमत न मिलना और खंडित जनादेश का आना भी समस्या का विषय है। पंजाब में राजनीतिक स्थिरता चाहिए, चाहे सरकार में कॉन्ग्रेस आए, अकाली दल आए,या फिर कैप्टन अमरिंदर सिंह और भाजपा की जोड़ी (जिसकी संभावना नहीं दिख रही)। लेकिन, अलगाववादियों के बल पर किसी दल का सत्ता में आना पाकिस्तान के लिए ख़ुशी वाली खबर होगी। कॉन्ग्रेस के सिद्धू की भी पाकिस्तान से नजदीकी चर्चा में है। इन चीजों को देखते हुए 10 मार्च का अब सबको इन्तजार है।

जिस ‘किसान आंदोलन’ को अलगाववादियों के समर्थन की बात कही जा रही थी, उसके प्रदर्शनकारियों की खातिरदारी में भी दिल्ली की सरकार ने कोई कसर नहीं छोड़ी थी। सीमा पर बैठ कर लोगों के लिए परेशानी का सबब बने इस किसान आंदोलनकारियों का हालचाल लेने के लिए AAP के नेता समय-समय पर जाते रहते थे और उन्हें बिजली-पानी की सुविधाएँ जनता के टैक्स के पैसों से उपलब्ध कराई गई। स्पष्ट है, इन ‘किसान नेताओं’ से बदले में AAP ने कुछ तो माँगा होगा?

अस्पतालों में भी चल रहा जिहाद, अंग प्रत्यारोपण हुआ ‘हराम’: निशाने पर समलैंगिक-यहूदी-महिला, फ्रेंच डॉक्टर का खुलासा

शुक्रवार (4 मार्च, 2022) को, फ्रांसीसी चिकित्सक और चार्ली हेब्दो के पूर्व स्तंभकार पैट्रिक पेलौक्स ने खुलासा किया कि कैसे अस्पतालों में काम कर रहे इस्लामवादी स्वास्थ्य प्रणाली को व्यवस्थित रूप से बर्बाद कर रहे हैं। वे महिलाओं, यहूदी और यहाँ तक की होमोसेक्सुअल के साथ भेदभाव करते हैं। भले ही मैक्रोन सरकार मस्जिदों या रेडिकल इस्लामिस्ट्स पर कार्रवाई कर रही हो लेकिन अब उनके बड़े निशाने पर हॉस्पिटल्स भी हैं। उन्होंने पेरिस स्थित समाचार पत्रिका मैरिएन के साथ एक साक्षात्कार के दौरान यह टिप्पणी की।

पेलौक्स ने इस बारे में फ्रांस सरकार को एक रिपोर्ट सौंपी थी। मैरिएन से बात करते हुए, उन्होंने बताया, “अस्पताल के कर्मचारियों, बाहरी कर्मचारियों या पादरी के प्रति इन कट्टरपंथियों की पहली अभिव्यक्ति यहूदी-विरोधी भावनाओं से पहले भी सेक्सिज्म और होमोफोबिया है।”

फ्रांसीसी डॉक्टर ने जोर देकर कहा, “इस प्रकार की समस्याएँ डॉक्टरों को इलाज करने या कुछ तकनीकों का उपयोग करने से मना कर देती हैं, जो सौभाग्य से अभी भी एक बहुत ही मामूली घटना है। विशेष रूप से, हमारे पास एक डॉक्टर का मामला था जिसने अंग प्रत्यारोपण करने से इनकार कर दिया क्योंकि यह हराम था।

‘नस्लवादी’ (Racist) कहे जाने के डर से इस्लामवादियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं करते अस्पताल

पैट्रिक पेलौक्स ने बताया कि मुस्लिम स्टाफ सदस्य भी अस्पतालों में सक्रिय धर्मांतरण में शामिल हैं। उन्होंने आगे कहा, “हमारी सुनवाई के दौरान, देश के पश्चिम में एक अस्पताल में एक नर्स ने हमें बताया कि उसका एक सहयोगी, एक कट्टरपंथी मुस्लिम, धर्म परिवर्तन कर रहा था और यहाँ तक कि अपने सहयोगियों को परिवर्तित करने की कोशिश कर रहा था। ऐसे में किसी को नहीं पता था कि इसका क्या करना है।”.

चार्ली हेब्दो के पूर्व स्तंभकार ने कहा कि अस्पताल प्रबंधन द्वारा इस्लामिक कट्टरपंथियों के खिलाफ ‘नस्लवादी’ ठहराए जाने के डर से हॉस्पिटल भी कार्रवाई से बचते हैं। उन्होंने चेतावनी दी कि ऐसे मामलों में सावधानी की कमी के कारण खतरनाक और कट्टरपंथी लोगों को अस्पतालों में भर्ती किया जा सकता है।

फ्रांसीसी सरकार को भेजे अपनी रिपोर्ट में, पेलौक्स ने एक सेंट केमिली अस्पताल के उदाहरण दिया, जिस पर फ़्रांसीसी सरकार के आंतरिक मंत्रालय द्वारा पास की एक मस्जिद को बंद किए जाने के बाद नमाज़ के लिए 200 मुस्लिमों की उन्मादी भीड़ ने कब्जा कर लिया था।

अस्पताल इस्लामी समूहों के प्राथमिक लक्ष्य हैं: पैट्रिक पेलौक्स

यह पूछे जाने पर कि क्या अस्पतालों को ‘कट्टरपंथी’ धार्मिक समूहों द्वारा निशाने पर लिया जा रहा है, पैट्रिक पेलौक्स ने बताया कि कैसे कट्टरपंथी इस्लामवादियों से निकटता के कारण फ्रांसीसी सरकार को 2020 में बाराकासिटी के नाम से एक मुस्लिम धर्मार्थ संगठन पर प्रतिबंध लगाना पड़ा।

फ्रांसीसी चिकित्सक ने अंत में यह चेतावनी देते हुए कहा, “यह कभी न भूलें कि सीरिया में दाएश का मुख्य साधन आबादी के लिए मुफ्त स्वास्थ्य सेवा तक पहुँच था। मुफ्त स्वास्थ्य सेवा कोई छोटी बात नहीं है! ज़िनेब एल रहज़ौई, जिन्होंने मुस्लिम ब्रदरहुड के राजनीतिक पत्रों का अनुवाद किया है, ने दिखाया है कि उनका उद्देश्य, विशेष रूप से फ्रांस में, सामाजिक व्यवस्था का उपयोग करना और अस्पतालों पर कब्ज़ा करना था।”

यूक्रेन में सुरक्षित है नवीन का पार्थिव शरीर, बमबारी रुकने का इंतजार: कर्नाटक के CM ने कहा- भारत अवश्य लाया जाएगा शव

रूस-यूक्रेन के बीच चल रही जंग के बीच भारतीय छात्र नवीन कुमार की मौत हो गई थी। उनके परिवार आज भी उनके पार्थिव शरीर का इंतजार कर रहा है। कर्नाटक के रहने वाले नवीन शेखरप्पा ज्ञानगौदर की खारकीव में गोलीबारी में मौत हो गई थी। कर्नाटक के मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई ने कहा है कि नवीन का पार्थिव शरीर अवश्य भारत लाया जाएगा। उन्होंने मंगलवार (8 मार्च 2022) को मीडिया से बात करते हुए कहा, “विदेश मंत्री डॉ. एस जयशंकर ने हमें सूचित किया है कि नवीन का पार्थिव शरीर यूक्रेन के एक शवगृह में रखा गया है। बमबारी रुकने के बाद उनका पार्थिव शरीर भारत लाया जाएगा।”

मुख्यमंत्री बोम्मई ने पिछले दिनों कहा था कि युद्ध ग्रस्त यूक्रेन से नवीन का शव लाना सरकार की प्राथमिकता है। उन्होंने शोक संतप्त परिवार से मुलाकात भी की थी और 25 लाख रुपए का एक चेक सौंपा था। साथ ही पीएचडी कर रहे नवीन के भाई को नौकरी का आश्वासन दिया था।

बता दें कि भारतीय छात्र नवीन शेखरप्पा कर्नाटक के हावेरी जिले के चलगेरी के रहने वाले थे। वह भूख से बेहाल अपने साथियों के लिए खाना लेने निकले थे, इसी दौरान वे गोलीबारी के शिकार हो गए थे। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक नवीन चाहते तो वो यूक्रेन से निकल चुके होते, लेकिन वे वहाँ रुक कर खुद से पहले अपने जूनियर सहयोगियों को निकालना चाहते थे। उन्हें बुधवार (2 मार्च, 2022) को खारकीव से निकलना था, मगर मंगलवार (1 मार्च, 2022) को जब वे खाना लेने निकले तभी गोलीबारी के शिकार हो गए।

नवीन की मौत के बाद उनके पिता शेखरप्पा ज्ञानगौदर ने देश के एजेकुशन सिस्टम पर सवाल उठाए थे। शेखरप्पा ने कहा था कि टॉपर होने के बावजूद नवीन को सरकारी मेडिकल कॉलेज में सीट नहीं मिल सकी। उन्होंने कहा कि यहाँ शिक्षा महँगी है। करोड़ों रुपए चुकाने पड़ते हैं। भारत में जातिवार सीटें आवंटित की जाती हैं। पीयूसी में 97 फीसदी अंक हासिल करने के बावजूद उनका बेटा राज्य में मेडिकल सीट हासिल नहीं कर सका और उसे पढ़ाई के लिए यूक्रेन जाना पड़ा।

‘राक्षस की बच्ची, बाप को रोक’: यूक्रेन से युद्ध के बीच पुतिन की ‘बेटी’ को पड़ रही गाली, अकाउंट डिलीट कर सोशल मीडिया से की तौबा

यूक्रेन में रूसी सेना की एंट्री होने के बाद जगह-जगह रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को लेकर बातें बन रही हैं। ऐसे में लोग उनकी कथित बेटी को भी भला-बुरा बोलने से पीछे नहीं हट रहे। रिपोर्ट्स सामने आई हैं कि व्लामदिर पुतिन की रूमर्ड बेटी 18 वर्षीय लुइज़ा क्रिवोनोगिखि/लुइजा रोजोवा को सोशल मीडिया पर इतना ट्रोल किया गया कि उन्होंने अपना इंस्टाग्राम अकॉउंट ही डिलीट कर दिया जिस पर उनके 84 हजार फॉलोवर्स थे।

अपने अकॉउंट पर लुइज़ा अपने लैविश जीवन की तस्वीरें साझा किया करती थीं लेकिन जब से यूक्रेन में रूसी सेना गई उसके बाद उन्हें ट्रोल किया जाने लगा। न्यूयॉर्क टाइम्स के अनुसार, उनकी आखिरी फोटो पर कुछ बेहद तंग करने वाले कमेंट थे। लोग उनकी तस्वीर पर पूछ रहे थे, “क्या तुम बंकर में बैठी हो? चूहे की तरह।”

कुछ ने लुइजा की तस्वीरों पर कहा, “राक्षस की बच्ची”, “युद्ध अपराधी।” एक यूजर ने कहा, “ये निष्क्रिय मिलिभगत की दोषी है। यह नाजी काल के अधिकांश जर्मनों जैसी हैं।” कुछ ने लुइजा से कहा कि वो अपने पिता पुतिन को समझाएँ कि वो यूक्रेन में मच रही तबाही को रोकें।

शेयर स्क्रीनशॉट में देख सकते हैं यूजर ने लिखा, “पुतिन मासूम लोगों को यूक्रेन में मार रहा है। जवान रूसी सैनिकों को बिना किसी जानकारी के यूक्रेन भेज दिया गया है। उन्हें नहीं पता किससे लड़ना है किससे नहीं। रूसी अर्थव्यवस्था गिर रही है, कुछ दिन में शून्य हो जाएगी। अगर ये नहीं रुका तो तुम नेटफ्लिक्स, स्पॉटिफाई, सोशल मीडिया, गूगल पे नहीं यूज कर पाओगी। सब रूस को नकार रहे हैं। तुम्हारे पास कुछ नहीं बचेगा। तुम इंस्टा पर हो तो इस ताकत का इस्तेमाल करो। पुतिन जो यूक्रेन में कर रहा है उसकी फोटो-वीडियो देखो। कुछ करो। रूसी राष्ट्र को इस तानाशाह से ऊपर उठना होगा। ”

लुइजा की पुरानी तस्वीरों पर आया कमेंट

अन्य यूजर ने लिखा, “पुतिन की बच्ची! पुतिन बच्चों और परिजनों को मार रहा है।” एक ने कहा, “तुम कम से कम ये तो बता ही सकती हो कि जो तुम्हारा बाप कर रहा है वो सही नहीं है।”

बता दें कि लुइजा, 46 वर्षीय अरबपति ‘स्वेतलाना क्रिवोनोगिखि’ की बेटी हैं, जिन्हें लेकर कहा जाता है कि वो 1990-2000 में पुतिन से जुड़ी थीं और अब बड़े रूसी बैंक की मालिकों में से एक हैं व देश की सबसे धनी महिलाओं में से एक हैं। उन्होंने कभी लुइजा के पिता के नाम पर कोई अलग से खुलासा नहीं किया है लेकिन पुतिन के साथ उनके संबंधों पर चर्चा मीडिया में रही है। साल 2019 में दोनों के अफेयर और लुइजा के बारे में रूसी मीडिया में बात हुई थी जबकि इससे पहले तक पुतिन की दो बेटियाँ मारिया और कैटरिना के बारे में दुनिया जानती है जो कि उनकी पत्नी व पूर्व फ्लाइट अटेंडेंट ल्यूडमिला शक्रेबनेवा से हैं।

जब ट्रेन में बाथरूम के पास सोने को मजबूर थीं महिला क्रिकेटर: डायना एडुल्जी ने बताया कल और आज का फर्क, पहले ही मैच मैं टूट गए थे चार दाँत

भारत की महिला क्रिकेटरों को जो ख्याति, प्रशंसकों का प्रेम, सुविधा आज मिल रही है वह हमेशा से ऐसी नहीं रही। पुरुषों के मुकाबले आज भी उनका भुगतान कमतर ही है। एक वक्त ऐसा भी था जब महिला क्रिकेट को न कोई आर्थिक सहायता थी और न ही बीसीसीआई का सहारा। इस सफर की एक चश्मदीद डायना एडुल्जी भी हैं। भारतीय महिला क्रिकेट टीम की पूर्व कप्तान से विभिन्न मुद्दों पर ऑपइंडिया के लिए जयंती मिश्रा ने विस्तार से बात की।

1956 में पैदा हुईं डायना एडुल्जी ने 1976 से 1993 तक क्रिकेट के मैदान पर अपने हुनर दिखाए। फिर अलग अलग भूमिकाओं में इस खेल को नया रूप प्रदान किया। महिला क्रिकेट को लेकर धारणाएँ बदली। बातचीत के दौरान उन्होंने इस यात्रा के विभिन्न पड़ावों को भी याद किया।

कभी टिकट के पैसे भी खुद देने पड़ते थे

उन्होंने बताया, “इतने सालों में बहुत चीजें बदल गई है। जमीन से आसमान का फर्क़ आ चुका है। हमने जब शुरू किया तो हमारे पास कुछ नहीं था। हम बिना रिजर्वेशन के ट्रेन में जाते थे। डॉर्मेट्री में रहते थे। वेटिंग रूम्स में रूकते थे। ट्रेन में बाथरूम के पास सोते थे। बहुत कष्ट उठाया है। लेकिन हमें मजा भी आता था चाहे वो फील्ड में हो या ऑफ द फील्ड हो। जैसे-जैसे वक्त गुजरा, हम अपने पैसे से इंडिया के लिए खेले। हमें अपने किट, अपने हवाई किराए के पैसे देने पड़ते थे। इन सबकी वजह से ऐसा भी होता था कि जो अच्छी खिलाड़ी थीं वो पैसे की कमी के कारण टीम में नहीं शामिल हो पाती थीं। उस समय स्पॉन्सरशिप का कोई रोल नहीं हुआ करता था।”

सहयोग के लिए करनी पड़ी मिन्नत

अपने क्रिकेट करियर के दौरान ऑस्ट्रेलिया में हुए वर्ल्ड कप को याद करते हुए एडुल्जी ने बताया, “उस समय हर लड़की को 10 हजार रुपए देने थे। हम चार लोग महाराष्ट्र से थे। इनमें तीन बॉम्बे के थे और एक पुणे से थी। तो हमारी बिल्डिंग में एक डेली न्यूज पेपर का एडिटर रहता था। तब मैं उसके पास गई और कहा कि आप हमें थोड़ी पब्लिसिटी दीजिए ताकि कोई हमें स्पॉन्सर करे। मेरी बात सुन उन्होंने हमारी फोटो ली और तस्वीर उस अखबार के फ्रंट पेज पर छपी। तब महाराष्ट्र के सीएम एआर अंतुले थे। हमें शाम को फोन आया कि हम एयरपोर्ट पर आ जाएँ क्योंकि अंतुले साहब को अपने होम डिस्ट्रिक्ट में जाना था। आप चारों को मिलना चाहते हैं। हम वहाँ गए। उनसे मिले। उन्होंने पूछा कि आपको क्या परेशानी है। हमने कहा कि हमें पैसे की समस्या है। उन्होंने फौरन अपने असिस्टेंट से चेक देने को कहा। ऐसे हम लोग वहाँ वर्ल्ड कप गए।”

वह कहती हैं, न्यूजीलैंड और ऑस्ट्रेलिया टूर के समय उन्हें कोई होटल वगैरह की सुविधा नहीं थी। डॉर्मेट्री में रहना पड़ता था। सभी लोग एक साथ नहीं रहते थे। इंडियन फैमिली के साथ दो-दो लोग रहते थे। कई बार परेशानी आती थी। गाड़ी समय पर नहीं आती थी। लेकिन टीम ने जो खेला वो मजे लेके खेला।

एक ट्रॉफी जरूरी है

उन्होंने कहा, “हमने वो नींव डाली जिसके कारण आज भारतीय महिला क्रिकेट टीम को उसका फायदा मिल रहा है। मैं बहुत खुश हुई थी जब सुप्रीम कोर्ट की सीओए की सदस्य बनी तब मैंने महिला क्रिकेट को बढ़ावा दिया और बीसीसीआई की मदद से भी महिला क्रिकेट टीम को बहुत ज्यादा फायदा मिला। 2017 में हम वर्ल्ड कप में 8-9 रन से रह गए थे, तब हमारे पास एक बहुत अच्छा मौका मिला। मुझे लगता है कि आज महिला क्रिकेट जिस स्तर पर है। वहाँ अगर वो एक वर्ल्ड कप ट्रॉफी जीत जाते है जो हमारे लिए ये अच्छा रहेगा और हम बना बनाया रिकॉर्ड भी तोड़ पाएँगे। ताकि दिखा सकें कि हम भी वर्ल्ड कप चैंपियन हैं चाहे वो वर्ल्ड कप 50 ओवरों का हो या फिर 20 ओवरों।”

पुरुष खिलाड़ियों से मिला समर्थन

आमतौर पर भारतीय महिला क्रिकेट टीम को मुहैया कराई जाने वाली सुविधाओं और पुरुष क्रिकेट टीम को मिलने वाली सुविधाओं में फर्क़ पर सवाल होते रहते हैं। इस संबंध में डायना एडुल्जी ने बताया कि महिला क्रिकेट टीम पहले  बीसीसीआई का हिस्सा नहीं थी। वे लोग महिला क्रिकेट एसोसिएशन के अंतर्गत आते थे। इसलिए कभी भी ये तुलना करना ठीक नहीं है कि आखिर जो उन्हें मिला वो भारतीय महिला टीम को क्यों नहीं मिला। पुरुषों से मिलने वाले समर्थन और हिम्मत के कुछ वाकयों को याद करते हुए ऑपइंडिया को बताया, “साल 1986 में जब हम इंगलैंड गए तो पुरुष खिलाड़ी हमारी टीम को चीयर अप करने आते थे। हमे प्रोत्साहित करते थे। ये बहुत अच्छी चीज थी।” उन्होंने अपने खेल पर बात करते हुए बताया कि उन्हें ग्राउंड पर बॉलिंग के लिए जाना जाता था। बकौल डायना, “मैं प्रैक्टिस के दौरान तीन-चार घंटे भी बॉलिंग करती थी वो भी मेन्स टीम के साथ। इस तरह मैंने अपने खेल को बेहतर बनाया था।”

आमतौर पर महिला सशक्तिकरण पर बात करते हुए हम सबसे पहला काम पुरुषों को कोसने का करते हैं या फिर उन्हें मिलने वाली सुविधाओं पर प्रश्न चिह्न लगाकर करते हैं, लेकिन भारतीय महिला क्रिकेट टीम की ये खिलाड़ी न तो पुरुष टीम को मिलने वाली किसी सुविधा से द्वेष रखती हैं और न ही उनसे मिले समर्थन, प्रोत्साहन को नकारती हैं। डायना कहती हैं कि जो सपोर्ट मेन्स टीम की ओर से वीमन्स टीम को मिला, वो वाकई बहुत हिम्मत देने वाला था।

भीड़ का समर्थन मिलता था पर, मीडिया का…

इसके अलावा जो धारणा शुरुआत से चली आई है कि ऑडियंस का झुकाव कहीं न कहीं महिला क्रिकेट टीम की ओर नहीं था और पिछले कुछ सालों में उन्हें पहचान मिली है, तो इस पर डायना बताती हैं कि वो 1976 का दौर था उन लोगों के भारत में पटना जमशेदपुर में मैच हुए तो 25-25 हजार में भीड़ उन लोगों को देखने आई थी। उनके मुताबिक, ग्राउंड पर पहुँचने के बाद उन लोगों को भीड़ का पूरा समर्थन मिलता था, जोश मिलता था। लेकिन वो इस बात को स्वीकारती हैं तब इलेक्ट्रॉनिक मीडिया तो था नहीं और प्रिंट की ओर से उन्हें इतना समर्थन नहीं मिलता था। सिर्फ जहाँ मैच होते थे वहीं पर उनका सपोर्ट मिलता था लेकिन ऑल इंडिया लेवल पर ऐसा कुछ नहीं था। वह कहती हैं, “जैसा आज का माहौल है। वैसा तब नहीं था। लेकिन मैं खुश हूँ कि अब इलेक्ट्रॉनिक मीडिया बहुत मदद कर रही है। वो लाइव मैच दिखाते हैं, लोगों की रूचि बढ़ती है, लगातार वर्ल्ड कप पर कवरेज हो रही है।”

टीम को करना होगा खुद को साबित

पूर्व कप्तान कहती हैं कि बीसीसीआई ने बहुत कुछ किया है महिला क्रिकेट टीम को आगे बढ़ाने के लिए और उन्हें आगे भी बहुत कुछ करना है। लेकिन उससे पहले हमारी टीम को भी बीसीसीआई को कुछ दिलाना चाहिए जैसे वर्ल्ड कप ट्रॉफी। इससे हर चीज सही हो जाएगी। लोगों में जागरूकता आएगी। घरेलू क्रिकेट की तादाद बढ़ जाएगी। कुल मिलाकर अगर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चीजें सहीं हुई तो स्थानीय स्तर पर भी ठीक होता जाएगा।

‘लड़किया क्रिकेट नहीं किचन संभालती हैं’

डायना ने बतौर महिला जो क्रिकेट टीम से जुड़ने के बाद संघर्ष का सामना किया उसमें सामाजिक संघर्ष भी एक बिंदु था। एक ओर उनमें व उनकी साथी खिलाड़ियों में खुद को साबित करने का जोश था। दूसरी ओर उन लोगों को कहा जाता था कि वो लड़की हो खेलना नहीं चाहिए, तुमको किचन में ही रहना चाहिए। डायना बिन किसी का नाम लिए बताती हैं कि ये सब कहने वालों में कुछ नामी खिलाड़ी भी थे जो महिला क्रिकेट टीम पर इस तरह की टिप्पणी करते थे। लेकिन वो साथ में ये भी साफ करती है कि जब इन्हीं पुरुषों में से एक ने महिला टीम का जज्बा देखा, उनकी गंभीरता देखी, उन परिस्थितियों को देखा तो एक कार्यक्रम में उन्होंने सार्वजनिक तौर पर अपने विचारों के लिए डायना के सामने लिए माफी भी माँगी। वह कहती हैं कि ये बातें पुरानी हो गई हैं इसलिए नाम नहीं लेना चाहती। बस लोगों को एहसास हुआ कि उनकी टीम भी कुछ है, उसे भी बढ़ाना चाहिए, इतना काफी है।

रेलवे कर रहा खिलाड़ियों को समर्थन

खेल जगत में महिलाओं के योगदान पर बात करते हुए डायना ने उन तमाम खिलाड़ियों की तारीफ की जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का नाम रौशन करती हैं। डायना ने बताया कि वेस्टर्न रेलवे में स्पोर्ट्स ऑफिसर बनने के बाद उन्होंने कई खिलाड़ियों को नियुक्त किया। सबके अपने-अपने संघर्ष हैं। सिर्फ महिलाओं के ही नहीं पुरुषों के भी। लेकिन एक जुनून है आपको सपना साकार करने में मदद करता है, इसके लिए परिवार का समर्थन और उस संगठन का समर्थन बहुत जरूरी होता है जहाँ आप काम कर रहे हो। रेलवे इस मामले में बहुत साथ देता है। खासकर महिला खिलाड़ियों को। शुरू में कोई संस्थान महिला क्रिकेटरों को नौकरी नहीं देती थी। बाद में ये शुरू हुआ और इसके लिए वो माधवराव सिंधिया को आभार व्यक्त करती हैं जिन्होंने रेलेवे में नौकरी निकाली।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय महिला टीम के स्वरूप में हुए बदलाव पर वह कहती है कि साल 2006 में बीसीसीआई में शामिल होने के बाद महिला क्रिकेट टीम को अधिक सपोर्ट मिलना शुरू हुआ और हर कोई इसमें रूचि ले रहे हैं। आज पूर्व क्रिकेट खिलाड़ी एनसीसी क्लब की हेड हैं। ये एक बहुत बड़ी उपलब्धि है। ये दिखाता है कि वो रास्ते खुले हैं जहाँ पहले केवल पुरुषों को ही जगह मिलती थी।

IPL से मिलेगी महिला टीम को पहचान

दर्शकों को महिला क्रिकेट टीम में रूचि लेनी की बात पूछे जाने पर डायना कहती हैं कि इस काम के लिए आपको ट्रॉफी जीतनी होगी। उन्होंने बताया कि महिला क्रिकेट टीम अपना आईपीएल खेले इस पर भी बीसीसीआई का विचार है। जल्द ही इस पर फैसला भी होगा। पहले इसे लेकर सोचा जा रहा था लेकिन कोविड परिस्थितियों के कारण ये काम रुक गया। उन्होंने महिला क्रिकेट को ख्याति दिलाने के लिए आईपीएल को एक बेहद जरूरी चीज बताया। उन्होंने कहा सिर्फ इंडिया में पहचान बनाने में ही नहीं, ये अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी भारतीय टीम की मदद करेगा।

लड़कियाँ लें खेल में दिलचस्पी

पाकिस्तान-भारत के पिछले मैच और होने वाले सभी मैचों को लेकर डायना कहती है कि किसी टीम को हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए, हमेशा चौकन्ना रहना ही होगा। भारतीय टीम को जब जब प्रदर्शन का अवसर मिले तो 200 फीसद प्रदर्शन देना चाहिए। उन्होंने बाकी भारतीय लड़कियों के लिए भी कहा कि लड़कियों को अब खुलकर खेल में करियर बनाने के बारे में सोचना चाहिए। अब कोई दिक्कत नहीं है। इसके जरिए जॉब के अवसर भी आपको मिलते हैं। उन्होंने खेल जगत में आगे बढ़ने का मूल मंत्र बताया और कहा कि दृढ़ निश्चय (Determination), लगन (Dedication) और अनुशासन (Discipline)  आगे बढ़ने के लिए बहुत ज्यादा जरूरी है। सिर्फ कुछ पाने की इच्छा मत करो। उस काबिल बनो। आज हर खेल में लड़कियाँ अपना नाम कमा रही हैं। जिस खेल में कभी सोचा भी नहीं होगा वहाँ भी लड़कियाँ कमाल दिखा रही हैं। 

डायना कहती हैं, “हमने अपने संघर्ष से सुनिश्चित किया कि हमारे बाद की टीम इसे न देखें, इसलिए हमने उनके लिए काम किया। मेरी खुद की बहन भी 5 साल क्रिकेट (1976-1981) खेल चुकी है। हम साथ में खेलते थे हमें परिवारा का समर्थन था। लेकिन जो चीज हमने खेलते हुए फेस की उन्हे लेकर तब फैसले लिए जब हम उस पद पर पहुँचे। ये सुनिश्चित किया कि हर खिलाड़ी की जरूरत समय से पूरी हो। आज भी मैं ऐसी किसी भी काम के लिए तत्पर हूँ।” उन्होंने बताया कि उसके स्पोर्ट्स ऑफिसर रहते हुए वेस्टर्न रेलवे स्पोर्ट में सबसे सर्वश्रेष्ठ रहा। उन्हें ये देखकर अच्छा लगता है कि तमाम खिलाड़ी आज भी उन लोगों को सम्मान देते हैं और जब कौन बनेगा करोड़पति जैसे शो में उनका नाम लिया जाता है तो ये बेहद गौरवान्वित करने वाला क्षण होता है।

डायना एडुल्जी का सफर

डायना इडुल्जी का जन्म 26 जनवरी 1956 को बॉम्बे में हुआ था। उन्होंने 1976 में क्रिकेट खेलना शुरू किया। फिर टीम की कप्तान भी बनीं। भारतीय क्रिकेट टीम की खिलाड़ी होने के दौरान उन्हें स्लो लेफ्ट आर्म ऑर्थोडॉक्स बॉलिंग स्टाइल के लिए और राइट हैंड बैटिंग के लिए चलते पहचान मिली। इसके बाद उन्होंने रेलवे में अपना स्पोर्ट्स ऑफिसर का पद संभाला और बाद बीसीसीआई में प्रशासनिक पद भी रहीं। उन्होंने अपना आखिरी एक दिवसीय अंतरराष्ट्रीय मैच 29 जुलाई 1993 में खेला था, जबकि उनका आखिरी टेस्ट ऑस्ट्रेलिया के साथ मेलबर्न में 1991 में हुआ था। भारतीय टीम के लिए 20 टेस्ट और 34 वनडे खेलने वाली डायना एडुल्जी पहले ही मैच में गंभीर चोट लगी थी। उनके आगे के चार दाँत टूट गए थे। लेकिन वे इससे डरी नहीं। चोट से उबरीं और वापस मैदान पर अपने जलवे बिखेरे। वह मैदान पर अपनी चुस्ती और दमखम के लिए भी जानी जाती थीं।

2022 महिला वर्ल्ड कप

आज जब भारतीय क्रिकेट टीम एक बार फिर से वर्ल्ड कप के लिए मैदान में है और जगह जगह उन्हें लेकर चर्चाएँ हो रही हैं। उस समय डायना जैसी तमाम पूर्व खिलाड़ियों के अनुभव, उनके संघर्ष और भी प्रासंगिक हो जाते हैं। डायना की तरह ही तमाम देशवासी भारत की महिला क्रिकेट टीम से ट्रॉफी की उम्मीद लगाए बैठे हैं। इससे पहले साल 2005 और 2017 में भारतीय क्रिकेट टीम फाइनल्स में गई थी। लेकिन बाद में उन्हें बिन ट्रॉफी लौटना पड़ा था। साल 2020 के टी-20 मैच में भी ‘टीम का प्रदर्शन उल्लेखनीय था मगर उस बार फिर ट्रॉफी हाथ नहीं आई। इस बार उम्मीद है कि भारतीय टीम ने पाकिस्तान को पहले मैच में धूल चटा कर सबको चौंकाया वैसे ही वो फाइनल्स जीतकर साबित कर दें कि महिला क्रिकेट टीम को खड़ा करने में जो सफर तय किया गया वो व्यर्थ नहीं है।

विवादों में कपिल शर्मा का कॉमेडी शो, विवेक अग्निहोत्री ने बताया- कश्मीर फाइल्स के प्रमोशन से किया इनकार, क्योंकि नहीं हैं बड़े कमर्शियल स्टार

कपिल शर्मा के कॉमेडी शो को लेकर नया विवाद पैदा हो गया है। विवेक अग्निहोत्री ने बताया है कि बड़े कमर्शियल स्टार नहीं होने की वजह से ‘द कपिल शर्मा शो’ ने ‘द कश्मीर फाइल्स’ का प्रमोशन करने से इनकार कर दिया है। कश्मीरी पंडितों पर बनी अग्निहोत्री की इस फिल्म का ट्रेलर जारी किया जा चुका है। लेकिन कपिल शर्मा के शो में इस फिल्म से जुड़े लोग अब तक नहीं दिखे हैं, जबकि इस टीवी शो को फिल्म प्रमोशन का एक बड़ा मंच माना जाता है। यही कारण है कि हर हफ्ते कपिल शर्मा के शो में बड़े-बड़े एक्टर्स पहुँचते हैं।

दरअसल एक यूजर ने विवेक अग्निहोत्री को टैग करते हुए पूछा, “विवेक सर, इस फिल्म को कपिल शर्मा के शो में प्रमोट करने की जरूरत है। कपिल भाई आपने सबके सहयोग किया है। प्लीज इस फिल्म को भी प्रमोट करें। हम सब मिथुन दा, अनुपम खेर को एक साथ देखना चाहते हैं।”

यूजर के ट्वीट पर विवेक अग्निहोत्री लिखते हैं, “मैं फैसला नहीं ले सकता कि कपिल शर्मा शो में किसे बुलाना चाहिए। ये पूरी तरह कपिल शर्मा और उनके प्रोड्यूसर पर निर्भर करता है। बॉलीवुड की बात करें तो एक बार मिस्टर बच्चन ने गाँधी परिवार के लिए कहा था- वो राजा हैं, हम रंक।”

अपने एक अन्य ट्वीट में अग्निहोत्री ने कहा है, “मैं भी उनका (कपिल शर्मा) फैन हूँ। लेकिन यह फैक्ट है कि उन्होंने हमें उनके शो पर बुलाने से मना कर दिया क्योंकि इसमें कोई बड़ा स्टार नहीं है। बॉलीवुड में नॉन स्टार निर्देशक, लेखक और अच्छे कलाकारों को कोई नहीं पूछता है।”

सच्ची घटना पर आधारित है ये फिल्म

गौरतलब है कि विवेक अग्निहोत्री (Vivek Agnihotri) के निर्देशन में बनी फिल्म ‘द कश्मीर फाइल्स’ चर्चा में बनी हुई है। हाल ही में फिल्म का ट्रेलर लॉन्च हुआ है जिसे काफी पसंद किया जा रहा। इस फिल्म की कहानी 90 के दशक में कश्मीरी पंडितों के पलायन और उनकी निर्मम हत्याओं के बारे में है। फिल्म में मिथुन चक्रवर्ती, दर्शन कुमार, अनुपम खेर, पुनीत इस्सर, मृणाल कुलकर्णी, अतुल श्रीवास्तव और पृथ्वीराज सरनाइक जैसे कलाकारों ने काम किया है। यह 11 मार्च 2022 को सिनेमाघरों में रिलीज होगी।

पिछले दिनों निर्देशक विवेक अग्निहोत्री ने फिल्म समीक्षक अनुपमा चोपड़ा को ‘शूर्पणखा’ बताते हुए फिल्म को नुकसान पहुँचाने की कोशिश का आरोप लगाया था। उन्होंने वीडियो जारी कर चोपड़ा की कारस्तानी के बारे में विस्तार से बताया था। साथ ही उनलोगों के नाम भी बताए थे जो कथित तौर पर बॉलीवुड को चलाते हैं। उसके नियम-कायदे सेट करते हैं। यह फिल्म लगातार कट्टरपंथियों के भी निशाने पर है। बॉम्बे हाई कोर्ट में एक याचिका दायर की गई है, जिसमें इस फिल्म की रिलीज पर रोक लगाने की माँग की गई है।

‘रूसी झंडे के रंग में भारत ने रंग दिया दिल्ली का कुतुब मीनार’: रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच चीन का सरकारी मीडिया फैला रहा झूठ

रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच भारत की छवि को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर धूमिल करने की दिशा में चीन ने नया झूठ फैलाया है। वहाँ के सरकारी मीडिया ग्लोबल टाइम्स ने अपने कल (मार्च 7, 2022) के ट्वीट में बताया कि भारत ने नई दिल्ली की कुतुब मीनार इमारत को रूसी झंडे के रंग में रंगा।

इस ट्वीट के साथ उन्होंने कुतुब मीनार की कुछ तस्वीरें शेयर की। जिसमें कुतुब मीनार को नीले और लाल रंग में देखा जा सकता है। ये तस्वीर चीन के झूठ का हिस्सा है इसका पता साझा की गई तस्वीरों से ही चलता है जिसमें नीले और लाल रंग के अलावा प्रधानमंत्री जन औषधि परियोजना के बारे में लिखा हुआ है।

ग्लोबल टाइम्स द्वारा साझा की गई तस्वीरों में केवल रंग देखकर झूठ फैलाने वाले चीन ने एक भी बार इन फोटो की सच्चाई जानने की कोशिश नहीं की या कह सकते हैं कि जानबूझकर इसे इग्नोर किया। वास्तविकता में ये कुतुब मीनार को प्रधानमंत्री भारतीय जनऔषधि परियोजना थीम के रंग में रंगा गया था वो भी आजादी के अमृत महोत्सव पर। इस थीम के चलते कुतुब मीनार 5-7 मार्च तक रंगा रहना था।

5 मार्च को प्रधानमंत्री भारतीय जनऔषधि परियोजना के ट्विटर हैंडल पर भी यही तस्वीरें देखी जा सकती हैं। इसमें तस्वीरों के साथ लिखा था, “5-7 मार्च 2022 तक कुतुब मीनार आजादी का अमृत महोत्सव और जन औषधि थीम से जगमगा उठा।”

अब इस प्रकार ग्लोबल टाइम्स को खुले तौर पर झूठ फैलाता देख पीआईबी फैक्ट चेक ने तो ग्लोबल टाइम्स की पोल खोली ही, लेकिन साथ में सामान्य भारतीय यूजर भी ग्लोबल टाइम्स के ट्वीट के नीचे असली तस्वीर डालकर फर्जी दावे की पोल खोलते दिखे। भारतीयों ने बताया कि जिसे चीन रूसी झंडा बता रहा है वो वास्तविकता में औषधि दिवस के अवसर पर सजाया गया रंग है।

कहीं मुस्लिम सहेली ने ही करवाया गैंगरेप तो कहीं छोटे से बच्चे ने दी इस्लाम के हिसाब से चलने की सलाह: कश्मीर नरसंहार और ‘मेहमान मुजाहिद’

“हाल ही में मुझे एक महिला के बारे में पता चला। वो किसी फील्ड में गोल्ड मेडलिस्ट थीं। उनके पिता बीएससी थे, उनकी माँ प्रोफेसर थीं। कुल मिलाकर वो कश्मीर के एक पढ़े-लिखे परिवार से थीं। 90 के दशक में इस्लामी कट्टरपंथियों ने पहले उनके माता-पिता को मारा, फिर उनका इतनी बुरी तरह रेप किया कि आज भी वो उस दर्द से नहीं उबर पाई हैं। वो लाइट बंद करके एक ही जगह बैठी रहती हैं। वहीं वह पेशाब करती हैं- टट्टी करती हैं। हमेशा उसी कमरे में अंधेरे में रखती हैं। उनके पास खाने के लिए कुछ नहीं है। बस एक भाई है जो उनका ध्यान रखता है पर उन्हीं की तरह वो भी डिप्रेशन का शिकार है। अगर वो औरत अपने करियर के हिसाब से आगे बढ़ती तो शायद आज किसी बड़े पद पर आसित होती। मगर वो है कहाँ? अंधेरे में! ”

कश्मीरी हिंदू महिलाओं की पीड़ा को बयाँ करने वाला ये वाकया कोई फिल्मी सीन नहीं, बल्कि एक हकीकत है जिसे ऑपइंडिया के साथ द कश्मीर फाइल्स की एक्ट्रेस भाषा सुंबली ने साझा किया है। कश्मीरी पंडितों के साथ 90 के दशक में हुई इस्लामी बर्बरता को जस का तस जनता के सामने पेश करने वाली ‘द कश्मीर फाइल्स’ में भाषा एक विक्टिम के किरदार में तो हैं ही, लेकिन असल जीवन में भी उनकी जड़ें कश्मीर से ही हैं। वह, कश्मीर के मुद्दों पर मुखर होकर हमेशा अपनी बात रखती रहीं। मगर आपको जानकर हैरानी होगी कि कश्मीर से होने के बावजूद उन्होंने कभी उस ओर रुख नहीं किया। ये पूछे जाने पर कि आखिर ऐसा क्यों? भाषा हर बार यही बताती हैं कि वो अपने ही घर एक टूरिस्ट बनकर नहीं जाना चाहती, वो नहीं चाहती कि वो कश्मीर जाकर होटल रुकें जिसके अगल-बगल में उनके उस घर के अवशेष या स्मति चिह्न हों जिसे कट्टरपंथ की आग में जला दिया गया था। 

आपको बता दें कि 90 के दशक में इस्लामी कट्टरपंथ केवल मुस्लिम पुरुषों में नहीं देखने को मिला था बल्कि छोटे बच्चे से लेकर महिलाओं तक में हिंदुओं के लिए नफरत पैदा हो चुकी थी। भाषा हमसे बात करते हुए बालकृष्ण गंजू को याद करती हैं जो अपनी जान बचाने के लिए एक चावल के ड्रम में छिपे थे और उन्हें इस्लामी पूरा घर छानने के बाद भी नहीं ढूँढ पाए थे, लेकिन तभी पड़ोस की मुस्लिम महिला ने उन दरिंदों को ध्यान उस ड्रम पर दिलवाया और बर्बरता से उन्हें उसी ड्रम में भून दिया गया। इसी तरह अपनी माँ के साथ हुई घटना को भाषा साझा करती हैं कि कैसे उनकी माँ को उनके गाँव के छोटे लड़के ने धमकी दी थी कि वो न स्लीवलेस कपड़ों में बाहर जाएँगी और न ही स्कूटी आदि चलाएँगी।

कश्मीर पंडितों के साथ हुई वीभत्सता और मुस्लिम महिलाएँ

अंदाजा लगा सकते हैं कि उस दौर में हिंदुओं से नफरत की कोई सीमा नहीं थी। कश्मीरी पंडित पुरुषों को जहाँ बेरहमी से मारा जा रहा था, वहीं औरतों के रेप हो रहे थे, उन्हें कलमे पढ़वाए जा रहे थे और इन्हें बल देने में जो उन दरिंदों का कंधे से कंधा मिलाकर साथ दे रही थीं वो और कोई नहीं बल्कि मुस्लिम महिलाएँ ही थीं। जिनमें से कुछ मुस्लिम महिलाएँ बाद में जाकर कट्टरपंथियों का शिकार भी हुईं। द डिप्लोमैट में इस संबंध में कुछ दिन पहले एक रिपोर्ट प्रकाशित हुई थी। जिसमें कुछ मुस्लिम महिलाओं की कहानियाँ थीं जो कश्मीर में रेप का शिकार हुईं। किसी ने बताया था कि आतंकियों ने उनका 14 साल की उम्र में रेप किया, तो किसी ने बताया कि 9 साल की उम्र में ही आतंकी उन पर हावी हो गए।

रिपोर्ट में फातिमा नाम की महिला ने तो यहाँ तक बताया कि उसके साथ आतंकियों ने इतने साल रेप किया कि उससे कोई निकाह को तैयार नहीं होता था। बाद में किसी अपाहिज भाई के साथ उसका निकाह हुआ। उसे लगा अब सारी चीजें शांत होंगी। लेकिन नहीं! आतंकी उसके ससुराल भी गए और तब भी रेप किया उसका एक बच्चा हो गया था और दूसरा होने वाला था। इसी तरह अफरोजा ने बताया कि जब वो 12 साल की थी तब कुछ लोग उनके घर खाना खाने, खासर मीट, खाने आते थे और उन लोगों को अंदर रहने को कहा जाता था। एक दिन उनमें से एक आदमी ने उसे बुलाया और जब वो गई तो उसे पकड़ लिया। अफरोजा को नहीं पता था कि क्या हो रहा है पर उसके मुताबिक वो गलत और दर्द देने वाला था।

मेहमान मुजाहिद कॉन्सेप्ट का शिकार हुईं मुस्लिम महिलाएँ

ऑपइंडिया ने इस संबंध में जब भाषा सुंबली से बात की तो उन्होंने अपनी बात रखते हुए ‘मेहमान मुजाहिद’ कॉन्सेप्ट की चर्चा की। ‘मेहमान मुजाहिद’ की अवधारणा समझाते हुए उन्होंने बताया कि कश्मीर में जिहाद पर निकले मुजाहिदों को मुस्लिम परिवार घर बुला बुलाकर मेहमान नवाजी करते थे। औरतों को लगता था कि जब वे लोग कौम के लिए इतना कर रही हैं तो वो उन्हें खिला-पिलाकर खुश तो कर ही सकती हैं। इसी कॉन्सेप्ट की आड़ में कश्मीर की मुस्लिम महिलाओं के साथ भी ज्यादतियाँ हुई। उन्होंने सामने आई रिपोर्ट्स को लेकर कहा कि अगर ऐसा हो रहा है कि औरतें सामने आ रही हैं तो अच्छी बात है और उन्हें एहसास होने लगा है कि उन्हें कैसे जिहाद के नाम पर तबाह किया जा रहा है।

अपनी बात रखते हुए सुंबली स्पष्ट कहती हैं कि वैसे उन्हें इस मामले में कोई लेना-देना नहीं है। उनके लिए अपने लोग, अपना समुदाय महत्वपूर्ण है जिन्हें तमाम तरह से प्रताड़ित किया था। उनके मुताबिक, ये सब बिलकुल ऐसा है जैसे कश्मीर पंडितों का घर जलाते हुए वो खुद शिकार हो गए।

वह याद दिलाती हैं कि एक वो भी दौर था जब इन्हीं मुस्लिम महिलाओं ने हिंदुओं के ख़िलाफ़ कट्टरपंथियों का साथ दिया। जिसका जिक्र द कश्मीर फाइल्स में भी है और बालकृष्ण गंजू के साथ हुई निर्ममता भी इस बात का प्रमाण है कि कैसे मुस्लिम महिलाओं ने 90 के दशक में हिंदुओं के नरसंहार में अपनी भूमिका निभाई। वो इन्हीं पुरानी बातों को याद करते हुए आज कश्मीर में जिहाद की आड़ में जो मुस्लिम महिलाओं के साथ हो रहा है उस पर कुछ भी कहने से मना कर करती हैं। उनके मुताबिक, अगर हमारा घर जलाते-जलाते उन पर आफत आ गई तो क्या अब इस भी हम लोग ही रोएँ? नहीं। हमारा लेना-देना नहीं है।

शुरुआत में कश्मीर करता था बॉलीवुड को फॉलो, फिर हिंदुओं को हिजाब पहनने को कहा जाने लगा

कश्मीर में पसरे कट्टरपंथ को लेकर भाषा ने कहा कि शुरुआती दौर में कश्मीर ऐसा नहीं था। वहाँ बॉलीवुड का हर फैशन फॉलो करने वाली महिलाएँ थी लेकिन धीरे-धीरे समय बदला और हिंदू लड़कियों को हिजाब पहनाने की बातें होनी लगीं। उनके मुताबिक उनकी माँ यानी डॉ क्षमा कौल के साथ भी ऐसी घटनाएँ घटी थीं जिन्हें एक गाँव के बच्चे ने ही उनके हिसाब से रहने को कह दिया था।

मुहल्ले के बच्चे ने दी धमकी, सहपाठी ने रुलाया: कश्मीर में कट्टरपंथ पर ‘दर्दपुर’ की लेखिका डॉ क्षमा कौल

डॉ क्षमा कौल ‘दर्दपुर’ किताब की लेखिका हैं जो कश्मीर में फैलते कट्टरपंथ की चश्मदीद रही हैं। जब हमने उनसे संपर्क किया और उन अनुभवों को जाना तो उन्होंने 35-40 साल पुराने किस्सों का जिक्र किया। डॉ क्षमा कौल से बात करते लगा कि अभी तक हमने कश्मीर में कट्टरपंथ को सिर्फ 1989-1990 के समय से आँका लेकिन वास्तविकता में इसकी नींव कई साल पहले से पड़नी शुरू हो गई थी।

उन्होंने अपने साथ हुई दो घटनाएँ साझा कीं, जो बताती हैं कि कैसे मुस्लिम परिवार का बच्चा-बच्चा भी हिंदुओं को काफिर की नजर से देखता था। उन्होंने बताया कि 1984 में वो जब वो नौकरी करने लगी थीं तब स्कूटी से अपने काम पर जाया करती थीं। लेकिन एक दिन मोहल्ले के छोटे लड़के ने उन्हें रोका और कहा, “रहना है तो हमारे हिसाब से रहो।” डॉ क्षमा आज उस बच्चे को याद करते हुए कहती हैं कि वो बच्चा बेहद प्यारा था। लेकिन उसने जब कट्टरता आनी शुरू हुई तो उसने मुझे रोककर ये सारी बातें कहीं।

चौथी क्लास की एक घटना को याद करते हुए डॉ क्षमा ने बताया कि वो परीक्षा के बाद स्कूल में दवात भूल गई थीं, जब वो उसे वापस लेने गई तो एक मुस्लिम सहपाठी ने उन्हें रोका और उन्हें कहा कि अगर दवात वापस लेनी है तो रोकर दिखाना होगा। डॉ क्षमा के अनुसार, वह बहुत ज्यादा छोटी थीं जब उनके साथ ये सारी घटनाएँ शुरू हुईं।

स्कूल में चलती थी आतंकवाद की ट्रेनिंग

उनके मुताबिक, उनके घर के पास में एक हाई स्कूल था जहाँ मुस्लिमों को सुबह-सुबह ट्रेनिंग दी जाती थी और ट्रेनिंग के समय वहाँ इतनी भयानक आवाजें आती थीं कि वे लोग डर जाते थे कि आखिर हो क्या रहा है। जब हम लोग पूछते थे कि ये लोग किस चीज की ट्रेनिंग कर रहे हैं तो बताया जाता था कि वो पुलिसमैन हैं और अपनी ट्रेनिंग कर रहे हैं। बाद में पता चला कि ये सब आतंकवाद फैलाने की तैयारी थी।

वह कहती हैं कि 1984-1985 में मुस्लिम कट्टरंपथियों ने जमकर तैयारी की थी और 1986 में पहला हमला किया। फिर 1987 शांत रहे। 1989 में ये निकल कर सामने आए और हिंदुओं को मारना शुरू किया। शुरू में 1-1 को मारा गया फिर धीरे-धीरे 5-6 मारे जाने लगे। बाद में औरतों को निशाना बनाया गया। उसके बाद कश्मीरी पंडित सिर्फ भागते रहे और ये लोग मस्जिद पर लाउडस्पीकर लगाकर बताते रहे कि कश्मीरी पंडित चले जाएँ और औरतों को यही छोड़ दें।

कट्टरपंथ से जूझना कश्मीरी पंडित महिलाओं के जीवन का अंग बन गया था

वह कहती हैं, “कश्मीर में रहकर कट्टरपंथियों को झेलना कश्मीरी पंडित महिलाओं के जीवन का अंग बन गया था। हमारे डीएनए में हो गया था कि हमें ये सब सहना ही सहना है। हमारे दिमागों में भी भर दिया गया कि अगर कोई ऐसे परेशान करे तो रोते हुए घर लौट आना है।” उन्होंने उन घटनाओं को साझा किया जब कश्मीरी पंडित महिलाओं के साथ वीभत्सता की हर सीमा लांघी गई।

वह गिरिजा टीकू की कहानी को साझा करती हैं और कहती है कि वो महिला सिर्फ अपनी तनख्वाह लेने वापस गई थी। लेकिन वहाँ उसकी मुस्लिम सहेली ने ही इंतजाम किया था कि आतंकवादी आएँ, उसकी काफिर सहेली का गैंगरेप करें। आपको हैरानी होगी कि गिरिजा टीकू को मारने वाले उन आतंकियों ने गिरिजा का न केवल रेप किया था बल्कि उसका शरीर आरा मशीन में कटवाया था और दोनों हिस्से अलग-अलग फेंके थे।

ऐसे ही एक नर्स से जुड़ा किस्सा वो बताती है, जिन्होंने इंसानियत दिखाते हुए अपना खून आतंकी क चढ़ाया, लेकिन बाद में क्या हुआ? उनका रेप, उन्हें भी मारा गया और उनकी लाश को उसी अस्पताल के आंगन में फेंका गया जहाँ उन्होंने खून दिया था। इसी तरह एक दंपत्ति को जीप में बाँधकर जमीन से रगड़-रगड़ कर मारा गया। एक डॉ सुंबली थी जिन्हें उनके घर में जला दिया गया। आदि-आदि

द कश्मीर फाइल्स ‘शिकारा’ की तरह नहीं करेगी निराश 

डॉ क्षमा की तरह तमाम कश्मीरी पंडितों के पास अपने-अपने अनुभव हैं जिन्हें उन लोगों ने 32 साल तक समेटे रखा। अब विवेक अग्रनिहोत्री के निर्देशन में बनी ‘द कश्मीर फाइल्स’ आपके सामने इन्हीं कहानियों को विजुअली प्रस्तुत करेगी ताकि दुनिया को भी पता चले कि 32 साल में अपने ही घरों से विस्थापित हुए कश्मीरी पंडितों पर क्या बीती।

इससे पहले साल 2020 में जब कश्मीरी हिंदुओं के नरसंहार को दिखाने के नाम पर शिकारा फिल्म का प्रमोशन हुआ था। उस समय कई लोगों ने इससे कई उम्मीद बाँधीं थी। देश के विभिन्न राज्यों से लेकर विदेशों तक में बैठे कश्मीरी पंडितों में एक आस जगी कि शायद अब उनके साथ हुई निर्ममता का दुनिया को अहसास होगा। लेकिन, फिल्म रिलीज के बाद ये उम्मीद उस समय बुरी तरह धराशायी हुई जब लोगों ने देखा कि कैसे कश्मीरी पंडितों का मखौल एक प्रेम कहानी दिखा कर उड़ाया गया।

फिल्म के बाद प्रीमियर कई लोग गुस्से से चीखते-चिल्लाते दिखाई दिए थे कि उनका नाम इस्तेमाल करके क्या लाया गया है और एक सवाल सबके मन को कचोट रहा था कि क्या बॉलीवुड में पसरा नैरेटिव कभी कश्मीरी पंडितों के साथ हुई बर्बरता को सामने नहीं आने देगा या क्या हर बार कश्मीरी पंडितों को आधार बनाकर भाईचारे की, प्रेम की कहानियाँ रची जाती रहेंगी। कश्मीरी पंडितों के सवाल, उनका दर्द, उनका गु्स्सा सब वाजिब था। उनकी पीड़ा दिखाने के नाम पर जो घिनौना नैरेटिव गढ़ा गया।

वो उसी पर प्रतिक्रिया थी। लेकिन, 2020 की शिकारा और 2022 की द कश्मीर फाइल्स में क्या अंतर है इसका अंदाजा रिलीज से पहले आ रहे उन लोगों के रिएक्शन से लगाया जा सकता है जो फिल्म देखने के बाद उन भयावह पलों को याद कर एक बार फिर फूट-फूटकर रोए और अन्य लोगों से यह फिल्म देखनी की अपील इसलिए की ताकि पूरी दुनिया जाने कश्मीर में 90 का दौर कितना काला और खून से रंगा है जिसके सामने बड़ी-बड़ी प्रेम कहानी कितनी तुच्छ है।

यूपी में CM योगी की वापसी, मणिपुर में भी BJP सरकार, पंजाब में AAP की बड़ी जीत, गोवा-उत्तराखंड में काँटे की टक्कर : EXIT POLLS

पाँचों राज्यों के विधानसभा चुनाव के एग्जिट पोल्स सामने आ गए हैं। जानिए उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, मणिपुर और गोवा में किसको कितनी सीटें मिल रही हैं। जहाँ उत्तर प्रदेश और मणिपुर में भाजपा को स्पष्ट विजेता बताया जा रहा है, गोवा और उत्तराखंड में कॉन्ग्रेस के साथ उसकी काँटे की टक्कर बताई जा रही है। वहीं पंजाब में AAP को लगभग सभी एग्जिट पोल्स ने पूर्ण बहुमत मिलते दिखाया है। आइए, देखते हैं किस राज्य में किस पार्टी को कौन से एग्जिट पोल कितनी सीटें दे रहे हैं।

403 सीटों वाले उत्तर प्रदेश में भाजपा को ‘ABP News-CVoter’ ने 228-244, ‘ETG Research’ ने 230-245, ‘India News’ ने 222-260, ‘India TV -Ground Zero Research’ ने 182-220, ‘India TV-CNX’ ने 240-250, ‘India Today- Axis My India’ ने 288-326, ‘News 24- Todays Chanakya’ ने 294, ‘NewsX-Polstrat’ ने 212-225, ‘Republic-P Marq’ ने 240, ‘Times Now-VETO’ ने 225 और ‘Zee News-DESIGNBOXED’ ने 223-248 सीटें मिलते हुए दिखाया है।

वहीं 117 सीटों वाले पंजाब में ‘ABP News-CVoter’ ने AAP को 51-61, ‘ETG Research’ ने 70-75, ‘India News’ ने 39-43, ‘India TV -Ground Zero Research’ ने 27-37, ‘India Today- Axis My India’ ने 76-90, ‘News 24- Todays Chanakya’ ने 100, ‘NewsX-Polstrat’ ने 56-61, ‘Republic-P Marq’ ने 62-70, ‘Times Now-VETO’ ने 70 और ‘Zee News-DESIGNBOXED’ ने 52-61 सीटें मिलते हुए दिखाया है।

70 विधानसभा सीटों वाले उत्तराखंड में भाजपा को ‘ABP News-CVoter’ ने 26-32, ‘ETG Research’ ने 37-40, ‘India News’ ने 32-41, ‘India TV -Ground Zero Research’ ने 25-29, ‘India TV-CNX’ ने 35-43, ‘India Today- Axis My India’ ने 36-46, ‘News 24- Todays Chanakya’ ने 43, ‘NewsX-Polstrat’ ने 31-33, ‘Republic-P Marq’ ने 35-39, ‘Times Now-VETO’ ने 37 तो ‘Zee News-DESIGNBOXED’ ने 26-30 सीटें दी हैं।

40 सीटों वाले गोवा में भाजपा को ‘ABP Majha-C Voter’ ने 13-17, ‘ETG Research’ ने 17-20, ‘India News’ ने 13-19, ‘India TV -Ground Zero Research’ ने 10-14, ‘India TV-CNX’ ने 16-22, ‘India Today- Axis My India’ ने 16-18, ‘NewsX-Polstrat’ ने 17-19, ‘Republic-P Marq’ ने 13-17, ‘Times Now-VETO’ ने 14 और ‘Zee News-DESIGNBOXED’ ने 13-18 सीटें मिलने का अंदाज़ा लगाया है।

वहीं 60 विधानसभा सीटों वाले उत्तर-पूर्वी राज्य मणिपुर की बात करें तो यहाँ ‘ABP Majha-C Voter’ ने भाजपा को 23-27, ‘India News’ ने 23-28, ‘India TV -Ground Zero Research’ ने 26-31, ‘India Today- Axis My India’ ने 33-43, Republic-P Marq ने 27-31 और ‘Zee News-DESIGNBOXED’ ने 32-38 सीटें दी हैं। अब देखना है कि 10 मार्च को नतीजे आने पर किसके आँकड़े कितने सटीक बैठते हैं।

4 बच्चों के अब्बा मोहम्मद वलि खान ने ‘निशांत’ बन कर नाबालिग हिन्दू लड़की को फाँसा, कई बार किया बलात्कार: वोटर आईडी से खुला राज़

मध्य प्रदेश के भिंड में ‘लव जिहाद’ का मामला सामने आया है। चार बच्चों के अब्बा मोहम्मद वलि खान ने छद्म हिन्दू बन कर अपना नाम ‘निशांत’ रख लिया और एक हिन्दू लड़की को फँसा लिया। उसने एंडोरी थाना क्षेत्र के गाँव की नाबालिग को अपने जाल में फाँसा। उसने पिछले 10 महीनों में शादी का वादा कर के किशोरी के साथ कई बार बलात्कार किया। बाद में जब किशोरी को पता चला कि वो मुस्लिम है तो उसने मिलना-जुलना कम कर दिया।

अब फिर से आरोपित वलि खान पीड़िता से मिलने का दबाव बना रहा था, जिसके बाद थाने में इस सम्बन्ध में शिकायत दर्ज कराई है। पुलिस ने आरोपित के खिलाफ मध्य प्रदेश के नए ‘धार्मिक स्वतंत्रता का अधिनियम 2021’, बलात्कार और ‘यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (POCSO)’ के तहत मामला दर्ज किया है। आरोपित को गिरफ्तार कर के गोहद जेल भेज दिया है। एंडोरी थाना प्रभारी नागेश शर्मा ने बताया कि मोहम्मद वलि खान उर्फ़ बल्लू मौ थाना क्षेत्र का रहने वाला है।

करीब 10 महीने पहले गलती से उसके नंबर पर किशोरी ने मिस्ड कॉल कर दिया था, जिसके बाद उसने पलट कर फोन कॉल किया। उसने खुद का नाम निशांत बताते हुए पीड़िता से जान-पहचान की और बातचीत शुरू की। उसने खुद को अविवाहित बताते हुए पीड़िता को अपने झाँसे में लिया। नाबालिग ने आरोपित से मिलने-जुलना शुरू कर दिया, जिसके बाद उसने रेप किया। एक दिन पीड़िता ने उसकी जेब से उसका वोटर आईडी कार्ड देख लिया, जिसमें उसका असली नाम लिखा था।

आरोपित ने अपना नाम ‘निशांत कुमार’ बताया था, ऐसे में पीड़िता को वो संतोषजनक जवाब नहीं दे सका। इसी दौरान उसे उसके चार बच्चों का अब्बा होने की बात भी पता चली। 4 मार्च, 2022 को वो पीड़िता से मिलने के लिए एंडोरी पहुँच गया। किशोरी की माँ ने आपत्ति जताई तो वो भला-बुरा कहने लगा। आक्रोशित गाँव के लोगों ने उसकी धुनाई भी कर दी। किशोरी ने 100 नंबर पर पुलिस को कॉल कर इसकी जानकारी दी, लेकिन तब तक वो भाग निकला था। हालाँकि, बाद में वो दबोचा गया।