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सिद्धू की आवाज़ लौटने के साथ ही गायब हो रहा ‘पटियाला पेग’ का स्वाद? पंजाब में फिर कॉन्ग्रेस का सिर-फुटव्वल, 2022 पर नजरें

पटियाला.. इसका नाम लेते ही देश के लोगों के जेहन में ‘पटियाला पेग’ आता है, जिसे यहाँ के महाराजाओं ने लोकप्रिय बनाया था। कैप्टेन अमरिंदर सिंह के दादा भूपिंदर सिंह ने इसे प्रचलित किया था। खुद कैप्टेन ने अपनी आत्मकथा में इसका जिक्र किया है। भूपिंदर सिंह ने अंग्रेजों को एक खास माप का पेग पिलाया, जिससे मदमस्त होकर वो महाराज की टीम से मैच हार गए। आज पटियाला के राजपरिवार के इस ‘पटियाला पेग’ के राजनीतिक स्वाद पर खतरा उत्पन्न हो गया है।

पंजाब में एक बार फिर से मुख्यमंत्री कैप्टेन अमरिंदर सिंह और कॉन्ग्रेस के एक और नेता नवजोत सिंह सिद्धू के बीच सिर-फुटव्वल चालू हो गया है। कभी अधिक बोलने के लिए जाने जाने वाले सिद्धू यूँ तो समय-समय पर राजनीतिक वनवास पर जाते रहते हैं, लेकिन जब भी लौटते हैं तो पंजाब कॉन्ग्रेस में घमासान मच जाता है। कभी कॉन्ग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी के पाँव छू कर उन्हें प्रणाम करने वाले सिद्धू के बारे में कहा जाता है कि उन्हें पार्टी आलाकमान का वरदहस्त प्राप्त है।

पंजाब में कॉन्ग्रेस के दो दर्जन विधायक असंतुष्ट बताए जा रहे हैं और उन सभी को बातचीत के लिए दिल्ली बुलाया गया है। कॉन्ग्रेस ने 3 बड़े नेताओं को इस विवाद को सुलझाने के लिए लगाया है – राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री व पार्टी के पंजाब प्रभारी हरीश रावत और दिल्ली कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष जेपी अग्रवाल। सोमवार (मई 31, 2021) को सोनिया गाँधी ने जिन 25 विधायकों को दिल्ली समन किया है, उनमें कई मंत्री भी हैं।

ये सारा विवाद 2017 में ही शुरू हो गया था, जब मंत्री बनाए जाने के बाद भी सिद्धू खुश नहीं थे और कुछ ही महीनों बाद सिद्धू ने इस्तीफा दे दिया। मंत्री होने के बावजूद सिद्धू कपिल शर्मा के शो में हिस्सा ले रहे थे और मनोरंजन जगत से नाता नहीं तोड़ना चाहते थे। फिर कहा गया कि सिद्धू को वोकल कॉर्ड्स की समस्या के कारण डॉक्टरों ने कम बोलने की सलाह दी है, क्योंकि उनकी आवाज़ जा सकती है। वो काफी दिन वैष्णो देवी में थे। अब उनकी आवाज़ लौट आई है।

उधर प्रशांत किशोर पश्चिम बंगाल में अपना काम कर के पंजाब आए हैं, जहाँ अमरिंदर सिंह ने उन्हें कैबिनेट के रैंक का दर्जा दिया। उन्हें सरकार खजाने से वेतन देने का मामला सुप्रीम कोर्ट जा चुका है। पीके जहाँ भी जाते हैं, वहाँ बगावत का इतिहास रहा है। बंगाल में ही कई TMC नेताओं ने सिर्फ पीके को वजह बता कर इस्तीफा दिया। पंजाब में भी अब सरकारी योजनाओं से लेकर चुनावी रणनीति तक वही तैयार कर रहे हैं कैप्टेन अमरिंदर के लिए। ऐसे में और भी नाराज नेता उनके खिलाफ जा सकते हैं।

पंजाब में भाजपा और अकाली दल अलग हो चुके हैं, ऐसे में कॉन्ग्रेस अपने लिए फिर से मौका तलाश रही है। इसीलिए उसने ‘किसान आंदोलन’ का भरपूर समर्थन भी किया, जो अब पंजाब में उसकी ही सरकार की गले की फाँस बनता जा रहा है। जिस तरह से पार्टी पर दबाव डाल कर 2017 में बीच विधानसभा चुनाव में कैप्टेन अमरिंदर सिंह ने खुद को मुख्यमंत्री प्रत्याशी घोषित करवाया था, अब वो आसार नज़र नहीं आ रहे।

अमरिंदर सिंह की उम्र अब 80 साल होने को आई है। पिछले कुछ हफ़्तों से उनके प्रतिद्वंद्वी सिद्धू ने उन पर हमले तेज़ कर दिए हैं। सुखजिंदर सिंह रंधावा और चरणजीत सिंह चन्नी कह रहे हैं कि 2017 के विधानसभा चुनाव में किए गए वादों को पार्टी ने पूरा नहीं किया। दोनों ही अमरिंदर सरकार में कैबिनेट मंत्री हैं। राज्य में सिखों के धर्म के अपमान की कई घटनाएँ सामने आई है, जिन्हें आधार बना कर हमले किए जा रहे हैं।

बैठकों का दौर लगातार 3 दिन चलेगा। हरीश रावत का कहना है कि पैनल पंजाब कॉन्ग्रेस के सभी 80 विधायकों से एक-एक कर अलग-अलग मुलाकात करेगा। इनमें मुख्यमंत्री भी शामिल हैं। पंजाब के 8 लोकसभा और 3 राज्यसभा सांसदों की राय भी ली जाएगी। पंजाब में कॉन्ग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष सुनील जाखड़ पहले ही दिल्ली पहुँच चुके हैं। वरिष्ठता के आधार पर विधायकों से मुलाकात का क्रम तय किया गया है।

उरमार के विधायक और पार्टी के पछड़ा नेता संगत सिंह गिल्ज़ियान को पहले दिन बैठक के लिए बुलाया गया। उन्होंने 2017 में मंत्री न बनाए जाने के बाद पार्टी के सभी पदों से इस्तीफा दे दिया था। जालंधर कैंट के विधायक प्रगट सिंह तो सिद्धू के मित्र ही हैं और वो आरोप भी लगा चुके हैं कि CM अमरिंदर के राजनीतिक सचिव कैप्टेन संदीप संधू ने उन्हें आवाज़ उठाने पर झूठे मामलों में फँसाने की धमकी दी है।

राज्यसभा सांसद प्रताप सिंह बाजवा पहले से ही सीएम अमरिंदर पर हमलावर रहे हैं। उन्होंने अप्रत्यक्ष रूप से इशारा करते हुए लिखा है कि साहसी बन कर अपना अंतर्मन को जवाब दीजिए, पंजाब की जनता और ईश्वर देख रहा है। उनका इशारा किधर था, समझ जाइए। सिद्धू भी ‘किसान आंदोलन’ का साथ पाने के लिए खूब किसानों की बातें कर रहे हैं और पंजाब सरकार को नसीहतें दे रहे हैं। पटियाला में किसानों से आंदोलन से कैप्टेन पहले ही दबाव में हैं।

पंजाब में सत्ताधारी पार्टी के लिए स्थिति इतनी बुरी है कि प्रदेश अध्यक्ष सुनील जाखड़ अभी तक संगठन के पदाधिकारियों की नियुक्ति तक नहीं कर पाए हैं। कॉन्ग्रेस अब भी विवाद को छिपा कर यही कह रही है कि मुख्यमंत्री विचार-विमर्श का विषय नहीं हैं। पहली कोशिश तो यही होगी कि 2022 चुनाव से पहले संगठन का निर्माण हो जाए। ऊपर से कॉन्ग्रेस हिन्दुओं को सिखों, दोनों को ही खुश रखना चाहती है।

दरअसल, सुनील जाखड़ को हटा कर अगर नवजोत सिंह सिद्धू को प्रदेश में पार्टी की कमान दी जाती है तो इससे गलत सन्देश जाएगा कि पार्टी ने जट्ट नेताओं को ही संगठन और सरकार का मुखिया बना रखा है। इसीलिए, उन्हें हटाने की स्थिति में उसी कद का कोई हिन्दू नेता खोजना होगा। स्थानीय भाजपा यूनिट ने दलित सीएम बनाने की बात कह के दबाव डाला है। अकाली दल भी दलित उप-मुख्यमंत्री बनाने की बात कह रहा है।

अब कॉन्ग्रेस इस सोशल इंजीनियरिंग का जवाब दे भी तो कैसे। अगर किसी हिन्दू नेता को अध्यक्ष बनाया जाता है तो विजय इंद्र सिंगला और मनीष तिवारी के लिए दरवाजे खुल सकते हैं। दो कार्यकारी अध्यक्ष बना कर सोशल इंजीनियरिंग की जा सकती है। कृषि क्षेत्र में बड़ी पैठ रखने वाले लाल सिंह प्रदेश में पार्टी के सबसे वरिष्ठ नेताओ में से हैं, लेकिन उनकी उम्र को देखते हुए उन्हें शायद ही जिम्मेदारी दी जाए।

कॉन्ग्रेस को ये डर भी है कि चुनाव परिणाम सामने आने के बाद भाजपा और अकाली दल साथ मिल सकते हैं। जिस तरह से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अक्सर ‘मन की बात’ से लेकर अन्य कार्यक्रमों में सिख गुरुओं के बलिदान और सीखों की बातें करते हैं और कई अवसरों पर गुरूद्वारे जाकर मत्था टेकते हैं, उससे भी कॉन्ग्रेस परेशान हैं। अब देखना ये है कि पटियाला के ‘महाराजा’ के हक़ में फैसला होता है या बड़बोले सिद्धू के।

मुख्य सचिव को भेजने से ममता का इनकार, PM को लिखे पत्र में केंद्र के आदेश को बताया- दुर्भावनापूर्ण

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को 5 पन्नों का पत्र लिखकर राज्य के मुख्य सचिव अलपन बंद्योपाध्याय को कार्यमुक्त कर दिल्ली भेजने से इनकार कर दिया है। अपने पत्र में ममता ने बंद्योपाध्याय को सोमवार ( 31 मई 2021) को सुबह 10 बजे तक नॉर्थ ब्लॉक में रिपोर्ट करने के केंद्र सरकार के आदेश को ‘पूरी तरह से असंवैधानिक’ बताया है। उन्होंने कहा, “मैं भारत सरकार द्वारा हमें भेजे गए एकतरफा आदेश से स्तब्ध हूँ, जिसमें हमें पश्चिम बंगाल के मुख्य सचिव अलपन बंद्योपाध्याय कार्यमुक्त करने के लिए कहा गया है, ताकि वो भारत सरकार की सेवा में शामिल हो सकें।”

अपने पत्र में ममता ने कहा कि केंद्र सरकार ने यह आदेश राज्य सरकार से परामर्श के बिना जारी किया है, जो कि इंडियन एडमिनिस्ट्रेटिव सर्विस रूल-1954 के खिलाफ है। यह दूसरे कानूनों का भी उल्लंघन है। मुख्यमंत्री ने प्रधानमंत्री को लिखे पत्र में कहा कि मुख्य सचिव की राज्य में सेवा को तीन महीने के लिए बढ़ाया गया है। ताकि वह कोरोना की दूसरी लहर और हाल ही समुद्री तूफान से तबाह हो चुके प्रदेश में अपनी सेवाएँ दे सकें।

उन्होंने कहा, “उम्मीद है कि केंद्र सरकार का नया पत्र कलाईकुंडा में प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री के बीच हुई बैठक से जुड़ा न हो। क्योंकि अगर ऐसा है तो यह बहुत ही दु:खद, दुर्भाग्यपूर्ण और जनहित के प्रति अपनी प्राथमिकताओं को त्यागने वाला होगा।”

बैठक में सुवेंदु अधिकारी की मौजूदगी पर ममता नाराज

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने मीटिंग में सुवेंदु अधिकारी को शामिल किए जाने पर नाराजगी व्यक्त करते हुए प्रधानमंत्री पर बैठक के स्ट्रक्चर को बदलने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि वो प्रधानमंत्री से शांति से बात करना चाहती थीं। सीएम ने कहा, “मेरा विचार है (राज्य के मामलों के बारे में मेरे 40 वर्षों की जानकारी के आधार पर) कि सुवेंदु अधिकारी के पास पीएम-सीएम की मीटिंग में बैठने के लिए कोई जगह नहीं थी।”

ममता ने पीएम के साथ बैठक में सुवेंदु अधिकारी की उपस्थिति को पूरी तरह से अस्वीकार्य बताते हुए दावा किया कि इस मुद्दे को सुलझाने के लिए राज्य के मुख्य सचिव ने प्रधानमंत्री के साथ आए अधिकारी को कई मैसेज भेजे थे, लेकिन उनकी ओर से कोई सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं मिली। गौरतलब है कि सुवेंदु अधिकारी बंगाल विधानसभा में विपक्ष के नेता हैं।

ममता का आरोप, पीएम ने ही उन्हें जाने की इजाजत दी

अपने पत्र में ममता बनर्जी ने आरोप लगाया है कि उन्होंने पीएम को रिपोर्ट सौंपने के बाद दीघा जाने की इजाजत ली थी। उन्होंने लिखा है, “अपनी सही आपत्तियों को नजरअंदाज करते हुए मैं अपने मुख्य सचिव के साथ आपको रिपोर्ट देने के लिए मीटिंग में आई। इसके बाद आपने मेरे हाथ से वो रिपोर्ट ले ली और मैंने विशेषरूप से आपसे दीघा जाने की अनुमति माँगी क्योंकि वहाँ चक्रवात आने वाला था और वहीं पर हमारी अगली बैठक होनी थी। इसलिए उसमें शामिल होने वाले इंतजार कर रहे थे। आपने ही हमें वहाँ जाने की अनुमति दी थी।”

केंद्र सरकार पर जल्दबाजी में फैसला लेने का आरोप लगाते हुए ममता ने कहा, “इसे देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि यह दुर्भावनापूर्ण भावना से जल्दबाजी में लिया गया है। इसलिए मैं आपसे अनुरोध करती हूँ कि अपने फैसले पर फिर से विचार कर जनहित में अपने आदेश को वापस लें। पश्चिम बंगाल सरकार अपने सीएस को ऐसे समय में न तो कार्यमुक्त कर सकती है और न ही कर रही है। हमारी समझ के आधार पर और कानूनों पर विचार विमर्श के बाद ही सीएस की सेवा के विस्तार आदेश जारी किया गया था।”

केंद्र ने 29 मई को सीएस अलपन बंद्योपाध्याय को वापस बुला लिया था

गौरतलब है कि केंद्र सरकार ने 29 मई 2021 को एक आदेश जारी कर पश्चिम बंगाल के मुख्य सचिव को दिल्ली वापस बुला लिया था। केंद्र ने राज्य सरकार को उन्हें तत्काल कार्यमुक्त करने को कहा था। सीएम ममता बनर्जी के अनुरोध पर चार दिन पहले ही केंद्र ने अलपन बंद्योपाध्याय को तीन महीने के लिए सेवा का विस्तार दिया था।

इससे पहले भी केंद्र सरकार ने शीर्ष अधिकारियों को केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर वापस बुलाया है। इसी साल 2021 पश्चिम बंगाल चुनाव से ठीक पहले तीन आईपीएस अधिकारियों को वापस बुला लिया गया था। बता दें कि राज्य के मुख्य सचिव अलपन बंद्योपाध्याय मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के बेहद करीबी माने जाते हैं और 1987 कैडर के आईएएस अधिकारी हैं। उन्हें लोक शिकायत और पेंशन मंत्रालय में प्रतिनियुक्त किया गया है।

‘स्वास्थ्य और पर्यावरण को होगा नुकसान’: 5G के खिलाफ HC में जूही चावला, 2 जून को सुनवाई

मोबाइल नेटवर्क सेवा 5G को लेकर भारत में लंबे समय से चर्चा हो रही है। इस सेवा से निकले वाली रेडिएशन को लेकर भी कई तरह की खबरें आ रही हैं। बहुत से लोगों का मानना है कि 5G सेवा से निकलने वाली रेडिएशन काफी खतरनाक है। ऐसे में बॉलीवुड की मशहूर अभिनेत्री जूही चावला ने भारत में 5G सेवा के खिलाफ अदालत का दरवाजा खटखटाया है।

जूही चावला काफी समय से 5G टावरों से निकलने वाले हानिकारक रेडिएशन के खिलाफ लोगों में जागरूक कर रही हैं। उन्होंने भारत में 5G टेक्नोलॉजी को लागू करने के खिलाफ मुंबई हाई कोर्ट में एक याचिका दायर की है। अभिनेत्री ने अपनी इस याचिका में माँग की है कि 5G टेक्नोलॉजी को लागू करने से पहले इससे जुड़े तमाम तरह के अध्ययनों पर गौर किया जाए और फिर उसके बाद ही इस टेक्नोलॉजी को भारत में लागू करने पर विचार किया जाए। मामले की सुनवाई 2 जून को होगी।

जूही चावला के प्रवक्ता ने एक आधिकारिक बयान में कहा कि भारत में 5G टेक्नोलॉजी को लागू किए जाने से पहले RF रेडिएशन से मानव जाति, महिला, पुरुषों, व्यस्कों, बच्चों, शिशुओं, जानवरों, जीव-जंतुओं, वनस्पतियों और पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभावों को लेकर अच्छे से अध्ययन किया जाए और इससे संबंधित किए गए अथवा किए जाने वाले तमाम रिपोर्ट्स को सार्वजनिक किया जाए। प्रवक्ता का कहना है कि इस तरह के अध्ययन से स्पष्ट किया जाना जरूरी है कि क्या 5G टेक्नोलॉजी भारत की मौजूदा और आने वाली पीढ़ी के लिए सुरक्षित या नहीं और इसके बाद ही इसे लागू करने को लेकर विचार किया जाए।

इस पूरे मामले पर बात करते हुए जूही चावला ने कहा, “हम तकनीक को लागू किए जाने के खिलाफ नहीं हैं। इसके उलट हम टेक्नोलॉजी की दुनिया से निकलने वाले नए उत्पादों का भरपूर लुत्फ उठाते हैं जिनमें वायरलेस कम्युनिकेशन भी शामिल है। हालाँकि इस तरह के डिवाइस को इस्तेमाल करने को लेकर हम हमेशा ही असमंजस की स्थिति में रहते हैं, क्योंकि वायरफ्री गैजेट्स और नेटवर्क सेल टावर्स से संबंधित हमारी खुद की रिसर्च और अध्ययन से यह पता चलता है कि इस तरह की रेडिएशन लोगों के स्वास्थ्य और उनकी सुरक्षा के लिए बेहद हानिकारक है।”

उल्लेखनीय है कि इन दिनों, खास कर महामारी के दौरान 5G तकनीक को लेकर काफी षड्यंत्रकारी सिद्धांत फैलाए जा रहे हैं। कई षड्यंत्र सिद्धांतकारों ने विशेषज्ञों द्वारा बार-बार स्पष्टीकरण के बाद भी बीमारी के लिए 5G नेटवर्क को दोषी ठहराया है, जबकि इसका बीमारी से कोई लेना-देना नहीं है।

हाथ में बल्ब-सिर पर इस्लामी टोपी, दावा- कोरोना वैक्सीन लगवाने पर बाँह से पैदा होती है बिजली: जानें वायरल वीडियो की सच्चाई

वैश्विक कोरोना महामारी के दौर में तमाम तरह की अफवाहें सामने आईं हैं। कोई वैक्सीन लगवाने पर मौत का दावा कर रहा तो कोई नपुंसक होने का। इन दावों की पोल खुलने के बाद अब एक वीडियो वायरल हो रहा है। इसमें दावा किया जा रहा है कि कोविड-19 वैक्सीनेशन के बाद टीका लगाए हुए बाँह से बिजली पैदा होती है।

वीडियो में आप देख सकते हैं कि एक शख्स हाथ में बल्ब लिए हुए है और वह कहता है कि हाथ में कहीं भी बल्ब को टच करने से कुछ नहीं हो रहा। लेकिन जिस जगह पर कोरोना की वैक्सीन लगी है, वहाँ टच करने से बल्ब जल उठता है। सोशल मीडिया में यह वीडियो धड़ल्ले से शेयर हो रहा।

क्या है सच?

पीआईबी की फैक्टचेक टीम ने वायरल वीडियो की सच्चाई उजागर की है। पीआईबी का कहना है कि यह दावा फर्जी है कि जिस बाँह में टीका लगाया गया है, वहाँ से बिजली पैदा हो रही है। पीआईबी के मुताबिक, “कोविड-19 टीकों में धातु या माइक्रोचिप नहीं होता है और ना ही वैक्सीन लेने के बाद मानव शरीर में कोई चुंबकीय प्रभाव या विद्युत धारा उत्पन्न होती है।”

पीआईबी ने लोगों से अपील करते हुए कहा है कि कोरोना वैक्सीन पूरी तरह सुरक्षित है। ऐसी फर्जी सूचनाओं पर विश्वास न करें, टीकाकरण जरूर करवाएँ। देश के बड़े-बड़े डॉक्टरों और विशेषज्ञों से लेकर सरकार भी यह कह चुकी है कि कोरोना वैक्सीन पूरी तरह असरदार है, इसके कोई गंभीर साइड-इफेक्ट नहीं हैं। 

देश में अगर टीकाकरण की बात करें तो स्वास्थ्य मंत्रालय के मुताबिक, अब तक लोगों को 21 करोड़ से अधिक कोरोना वैक्सीन की खुराक दी जा चुकी है और यह एक बड़ी उपलब्धि है। हर दिन लाखों लोगों को टीका लगाया जा रहा है। चूँकि हाल के कुछ दिनों में संक्रमण के मामले काफी बढ़ गए थे, लेकिन अब एक बार फिर इसमें कमी देखने को मिल रही है। 

हालाँकि विशेषज्ञों ने आगाह किया है कि मामले कम हो रहे हैं, लेकिन कोरोना खत्म नहीं हुआ है। लिहाजा सतर्क और सुरक्षित रहने की जरूरत है। साथ ही संक्रमण से बचाव के लिए मास्क जरूर पहनें। रक्षित शारीरिक दूरी बनाए रखें और हाथों को साबुन-पानी से धोते रहें या सैनिटाइजर का इस्तेमाल करें। 

बेटी लिसिप्रिया को बताते हैं ‘पर्यावरणविद्’, उसकी आड़ में ₹19 लाख+ की धोखाधड़ी: पिता कँगुजम कनरजीत गिरफ्तार

बाल ‘पर्यावरणविद्’ लिसिप्रिया कँगुजम के पिता कँगुजम कनरजीत उर्फ ​​डॉ. केके सिंह को दिल्ली पुलिस और मणिपुर पुलिस ने सोमवार (मई 31, 2021) को संयुक्त अभियान में गिरफ्तार किया है। कनरजीत को सोमवार को कोर्ट में पेश किया जाएगा।

कनरजीत पर कई लोगों को धोखा देने का आरोप लगाया गया है। आरोप है कि करनजीत ने 19 लाख से अधिक राशि की धोखाधड़ी की है। 2015 में, उन्हें मणिपुर में धारा 420 (धोखाधड़ी), 324 (हमला) और 406 (आपराधिक विश्वासघात) के तहत गिरफ्तार किया गया था।

रिपोर्टों के अनुसार, उन्होंने पोरोमपत में एक जगह किराए पर ली थी और क्लब 25 के बैनर तले अपनी गुप्त गतिविधियों को अंजाम दिया था। उसने कथित तौर पर असली मालिक की जानकारी के बिना तीन अलग-अलग व्यक्तियों को बेचा था। कनरजीत को बाद में अंतरिम जमानत पर रिहा कर दिया गया और तब से वह फरार है।

कनरजीत ने बेटी लिसिप्रिया कँगुजम को अंतरराष्ट्रीय ख्याति दिलाने के लिए उसकी नकली उपलब्धियों को भी गढ़ा गया था। बाल ‘पर्यावरणविद्’ कँगुजम लगभग हर चीज का विरोध करती है। तकरीबन हर मुद्दे पर विरोध करके ही उसने अपना करियर बनाया है। ट्विटर पर उसका वेरिफाइड हैंडल भी है, हालाँकि, उसके प्रोफाइल को देख कर ऐसा लगता है कि वह इसका इस्तेमाल खुद नहीं करती है।

लिसिप्रिया 8-9 वर्ष की बच्ची है, जिसे उसके अभिभावकों द्वारा ‘पर्यावरणविद्’ के रूप में पेश किया जा रहा है। इस बच्ची के नाम पर ट्विटर हैंडल चलाने वाले उसके अभिभावकों को कई बार झूठ फैलाते हुए पकड़ा गया है। बच्ची ने NEET-JEE के उम्मीदवारों के लिए 3 पेज का खत भी लिखा था। उसका पूरा टाइमलाइन परीक्षा के खिलाफ ट्वीट से भरा हुआ है। यह विश्वास करना काफी मुश्किल है कि 8-9 साल की बच्ची इस तरह का प्रोपेगेंडा चलाने के बारे में सोच सकती है।

अप्रैल 2019 में, लिसिप्रिया ने दावा किया था कि वह ‘आपदा जोखिम न्यूनीकरण’ (‘Disaster Risk Reduction’) के लिए ‘वैश्विक संयुक्त राष्ट्र सत्र’ को संबोधित करने के लिए जिनेवा में संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय जा रही हैं। इसे न्यूज़ बनाकर बड़े पैमाने पर रिपोर्ट किया गया था और लिसीप्रिया को सोशल मीडिया पर ‘भारत को गौरवान्वित करने’ के लिए बधाई दी गई थी। हालाँकि, बाद में यह दावा फर्जी निकला, जब इम्फाल फ्री प्रेस ने न सिर्फ यह खुलासा किया कि संयुक्त राष्ट्र ने उसे आमंत्रित नहीं किया था, बल्कि उनके पिता को भी एक कथित ठग बताया था।

इंफाल फ्री प्रेस की एक जाँच से पता चला है कि लिसिप्रिया का ‘यूएन आमंत्रण’ उसके पिता कँगुजम कनरजीत द्वारा रची गई फर्जी कहानी थी। आईएफपी को समाचार पर संदेह हुआ क्योंकि जब उन्होंने दावों की जाँच की, तो संयुक्त राष्ट्र के कार्यक्रम से पता चला कि प्रतिनिधियों के लिए पंजीकरण जारी था और वक्ताओं के नाम की पुष्टि तब तक नहीं हुई थी। कनरजीत कँगुजम पर आयोजन समितियों के नाम पर धन इकट्ठा करने, भूकंप पीड़ितों के लिए राहत और अन्य तरीकों से धन इकट्ठा करने का आरोप है।

‘मैंने खुद देखा.. उनके हाथ-पाँव बाँध दिए गए थे’: अभिनेत्री ने पिता की मौत के बाद ‘जयपुर गोल्डन हॉस्पिटल’ को भेजा लीगल नोटिस

डेढ़ दर्जन से भी अधिक भोजपुरी फिल्मों में कार्य कर चुकीं अभिनेत्री संभावना सेठ ने अपने पिता की मौत को लेकर दिल्ली के ‘जयपुर गोल्डन हॉस्पिटल’ पर ‘मेडिकल हत्या‘ के आरोप लगाए थे। उनके पिता अपने अंतिम दिनों में यहीं भर्ती थे। उन्होंने अब अस्पताल को लीगल नोटिस भेजा है। संभावना सेठ ने 2008 में आए ‘बिग बॉस 2’ से सुर्खियाँ बटोरी थीं। वो शो में 48 दिनों तक रही थीं। बाद में वो ‘बिग बॉस 8 (2014-15)’ में भी नजर आई थीं।

संभावना सेठ ने अस्पताल पर मेडिकल सेवाओं में खामी, लापरवाही और सही देखभाल में कमी के साथ-साथ संपर्क करने पर जवाब न देने के भी आरोप लगाए हैं। उन्होंने बताया कि उनके पिता अप्रैल 30, 2021 को उक्त अस्पताल में भर्ती कराए गए थे। तब कोविड पाज़िटिव हुए उन्हें 4 दिन हुए थे। वहाँ मेडिकल कर्मचारियों ने ब्लड टेस्ट करने के बाद कुछ दिनों में ठीक हो जाने का आश्वासन दिया। संभावना सेठ का कहना है कि परिवार ये सोच कर निश्चिंत था कि वो कुशल व सुरक्षित हाथों में हैं।

उन्होंने बड़ा खुलासा करते हुए बताया, “अगले ही दिन जब मेरे भाई पिता को देखने गया तो वो ये देख कर स्तब्ध कर गया कि उनके हाथ को बाँध कर रखा गया था। उसने तुरंत हाथ खोले और इस संबंध में जाँच-पड़ताल की। कर्मचारियों ने बताया कि वो सेलाइन सप्लाई को हत्या दे रहे थे, इसीलिए ऐसा किया गया था। 7 मई को मेरे भाई ने डरी हुई आवाज में कॉल कर के बताया कि उनका सैचुरैशन लेवल 90-95 था, लेकिन उन्हें फिर भी ऑक्सिजन सपोर्ट पर रखा गया है।”

संभावना सेठ ने कहा कि उन्हें ये सब सुन कर लगा कि कुछ न कुछ गड़बड़ है और वो अगले ही दिन दिल्ली पहुँचीं। बकौल संभावना, उन्होंने खुद देखा कि उनके पिता के हाथ-पाँव बाँधे गए थे। बताया गया कि वो आक्सिजन सप्लाई न हटाने पाए, इसीलिए ऐसा किया गया। अभिनेत्री का कहना है कि उनके पिता को अटेन्ड करने के लिए कोई कर्मचारी भी नहीं था। उन्होंने वीडियो शूट किया लेकिन आरोप है कि कर्मचारियों ने धक्का-मुक्की कर के उसे डिलीट करवा दिया।

40 वर्षीय अभिनेत्री ने बताया, “काफी कोशिश के बाद भी मैं सीनियर डॉक्टर से नहीं मिल सकी। फिर एक डॉक्टर ने बताया कि मेरे पिता की स्थिति में सुधार हो रहा है। इसके कुछ ही देर बाद उसने बताया कि मेरे पिता को कार्डियक अरेस्ट आया है और वो लोग उन्हें बचाने की पूरी कोशिश कर रहे हैं। मेरी मिन्नतों के बावजूद मुझे उन्हें देखने नहीं दिया गया। फिर बताया गया कि उनकी मौत हो गई है। मुझे लगा उन्हें पहले से पता था कि वो मर चुके हैं।”

संभावना सेठ ने इंस्टाग्राम पर अपने पिता को किया याद

संभावना सेठ ने कहा कि वो समझती हैं कि मेडिकल कर्मचारी इस महामारी में काफी काम कर रहे हैं और उनका सम्मान करती हैं, क्योंकि कई बार उन्हें नज़रअंदाज़ किया जाता है। लेकिन, साथ ही उन्होंने ये भी कहा कि उन्हें दिल्ली के ‘जयपुर गोल्डन हॉस्पिटल’ में बुरा अनुभव मिला है। उन्होंने बताया कि उनके पास उनके पिता की मौत को लेकर कुछ सवाल हैं, इसीलिए लीगल नोटिस भेजा गया है। अस्पताल प्रशासन ने इस पर अभी तक कोई बयान नहीं दिया है।

संभावना सेठ ’36 चाइना टाउन’ (2006) में हिमेश रेशमिया के गाने ‘आ आ आशिकी में तेरी’ से चर्चा में आई थीं। उन्होंने पिछले साल इस फिल्म के 14 वर्ष पूरे होने पर निर्देशक अब्बास-मस्तान को धन्यवाद दिया था। भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री के कई बड़े अभिनेताओं के साथ काम कर चुकीं संभावना सेठ ने बॉलीवुड में भी कई आइटम नंबर्स किए हैं। साथ ही उन्होंने कई डांस रियलिटी शो में भी हिस्सा लिया था।

ट्विटर को दिल्ली हाई कोर्ट का नोटिस, कहा- नए IT नियमों का पालन करना ही होगा

दिल्ली हाईकोर्ट ने सोमवार (31 मई 2021) को नए आईटी नियमों का पालन न करने पर सोशल नेटवर्किंग साइट ट्विटर इंडिया और ट्विटर आईएनसी को नोटिस जारी किया है। दिल्ली हाईकोर्ट में अपना पक्ष रखते हुए ट्विटर ने कहा कि हमने केंद्र सरकार की ओर से बनाए गए सभी कानूनों का पालन किया है जबकि केंद्र सरकार ने साफ कहा कि ऐसा नहीं किया गया है।

कोर्ट ने यह आदेश वकील अमित आचार्य की उस याचिका पर दिया है, जिसमें उन्होंने तय समयसीमा में ट्विटर इंडिया और ट्विटर आईएनसी को केंद्र सरकार द्वारा जारी किए गए नए आईटी नियमों 2021 को तत्काल प्रभाव से लागू करने का आदेश देने की माँग की थी।

जस्टिस रेखा पल्ली की एकल न्यायाधीश पीठ ने ट्विटर को नोटिस जारी करते हुए मामले की अगली सुनवाई छह जुलाई तक जवाब देने को कहा है। वहीं, ट्विटर ने कोर्ट को बताया कि उसने नियमों का पालन किया है। किसी भी ट्वीट से संबंधित शिकायत के निवारण के लिए स्थानीय शिकायत अधिकारी नियुक्त किया है। दूसरी ओर केंद्र सरकार ने ट्विटर के इस दावे पर आपत्ति जताई है और नियमों के पालन की पुष्टि नहीं की। इस पर कोर्ट ने कहा कि यदि नए नियमों पर रोक नहीं लगाई गई है तो ट्विटर को इसका (नियमों) पालन करना होगा।

मंत्रालय ने स्‍पष्‍ट तौर पर कहा कि ट्विटर खोखली व आधारहीन बातें करना बंद करे और भारतीय कानून का पालन करे। मंत्रालय ने कहा, “कानून और नीतियाँ बनाना देश का संप्रभु अधिकार है। ट्विटर महज एक सोशल मीडिया प्‍लेटफॉर्म है। लिहाजा, उसे यह बताने का कोई अधिकार नहीं है कि भारत का कानून या नीतियों की रूपरेखा कैसी होनी चाहिए।”

याचिका में कहा गया, ”केंद्र सरकार ने 25 फरवरी 2021 को नए सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यवर्ती दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021 (आईटी नियम, 2021)) को जारी करते हुए ट्विटर सहित सभी सोशल मीडिया नेटवर्कों को 3 माह के भीतर इस पर अमल करने का निर्देश दिया था। 25 मई 2021 को समय सीमा समाप्त होने के बाद भी ट्विटर ने अब तक नए नियमों को लागू नहीं किया है और न ही इसके तहत अपने प्लेटफॉर्म पर ट्वीट के बारे में शिकायतों के निवारण के लिए स्थानीय शिकायत अधिकारी की नियुक्ति किया है।”

नए आईटी नियमों, 2021 के तहत सोशल मीडिया नेटवर्कों को इस बात का पता लगाना होगा कि कोई मैसेज सबसे पहले किसने भेजा। इसके साथ ही किसी पोस्ट, मैसेज के बारे में शिकायतों का निवारण के लिए स्थानीय शिकायत अधिकारी नियुक्त करने को कहा है।

बता दें कि भारत सरकार और ट्विटर के बीच नए आईटी नियमों को लेकर विवाद अभी भी जारी है। हालाँकि, कई सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म भारत सरकार के नियमों का पालन करने के लिए राजी हो गए हैं, लेकिन ट्विटर अभी तक इसे मानने को तैयार नहीं है।

दरअसल, ट्विटर का कहना है कि नए आईटी नियमों में ऐसे तत्व हैं जो स्वतंत्र बातचीत को रोकते हैं। उन्होंने (ट्विटर) इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए खतरा मानते हुए चिंता जताई थी। वहीं, केंद्र सरकार ने गुरुवार (27 मई 2021) को ट्विटर पर कड़ा पलटवार करते हुए कहा था कि अमेरिका स्थित माइक्रोब्लॉगिंग प्लेटफॉर्म भारत में अपनी शर्तों को निर्धारित करने की कोशिश कर रहा है और देश की कानूनी व्यवस्था को भी कमजोर करना चाहता है।

मुरादाबाद: तमंचा दिखा दलित नाबालिग से रेप करने वाला शुकूर गिरफ्तार, इलाके में पसरा तनाव

मुरदाबाद के कुंदरकी थाना क्षेत्र में दलित नाबालिग से रेप के आरोपित शुकूर को पुलिस ने शनिवार (29 मई 2021) को गिरफ्तार कर लिया। 15 वर्षीय पीड़िता आठवीं कक्षा की छात्रा है। गुरुवार को 25 वर्षीय शुकूर ने तमंचे के बल पर दुष्कर्म किया था। साथ ही विरोध करने पर पीड़िता को जान से मारने की धमकी दी थी।

रिपोर्टों के अनुसार पीड़िता गुरुवार की सुबह शौच के लिए घर से निकली थी। इसी दौरान आरोपित उसे हथियार का भय दिखाकर एक दुकान के भीतर ले गया। जब काफी समय तक पीड़िता घर नहीं लौटी तो परिजनों ने उसकी तलाश शुरू की। इसी दरम्यान उसके चिल्लाने की आवाज एक बंद दुकान के भीतर से आई। परिजनों के पहुँचने पर आरोपित तमंचा दिखाते हुए मौके से फरार हो गया।

रेप की बात सुनते ही मौके पर भारी भीड़ जमा हो गई। दुकान का दरवाजा तोड़ने पर पीड़िता अचेत स्थिति में मिली। उसने अपने साथ दुष्कर्म की जानकारी देते हुए कहा कि मदद के लिए चिल्लाने पर आरोपित ने उसे जान से मारने की धमकी दी थी। पुलिस ने आरोपित के खिलाफ आईपीसी के सेक्शन 376, एससी/एसटी एक्ट और POCSO एक्ट के तहत मामला दर्ज किया है। पीड़िता के पिता मिस्त्री का काम करते हैं।

पीड़िता का बयान दर्ज करने के बाद पुलिस ने आरोपित की तलाश शुरू की। सर्कल ऑफिसर देश दीपक सिंह ने बताया, “लड़की नाबालिग है और एक स्कूल में पढ़ती है। वहीं आरोपित 25 साल का है और फर्नीचर की दुकान चलाता है। पीड़िता के परिवार की मौजूदगी में मौका मुआयना कर सबूत इकट्ठा किए गए।” इस घटना के बाद से इलाके में तनाव पसरा हुआ है। जिसे देखते हुए पुलिस ने मौके पर पहुँच कर कुंदरकी के एसओ ने लोगों को शांत कराया।

भगोड़े मेहुल चोकसी को लेने डोमिनिका पहुँचा भारत का विमान, एंटीगुआ के PM ने कहा – गर्लफ्रेंड के साथ टूर पर गया था

भगोड़े कारोबारी मेहुल चोकसी को गिरफ्तार कर के लाने के लिए भारत ने डोमिनिका विमान भेज दिया है, जहाँ की जेल में उसे फ़िलहाल रखा गया है। अभी तक ये मिस्ट्री बनी हुई है कि आखिर भगोड़ा हीरा कारोबारी एंटीगुआ से डोमिनिका पहुँचा कैसे? एंटीगुआ के प्रधानमंत्री गेस्टन ब्राउन ने कहा कि मेहुल चोकसी अपनी गर्लफ्रेंड के साथ ट्रिप पर डोमिनिका गया था, लेकिन वहाँ धरा गया। अब सामने आया है कि यात्रा के लिए उसने दस्तावेजों की हेराफेरी भी की थी।

‘इंडिया टुडे’ की पड़ताल के अनुसार, गुरजीत भाण्डाल और गुरमीत सिंह नाम के दो व्यक्तियों के यात्रा सम्बन्धी दस्तावेज मिले हैं, जिन्होंने 45 दिनों के भीतर दो बार कैरिबिया का दौरा किया। ये दोनों अप्रैल में ‘हैकशॉ बोट चार्टर्स लिमिटेड’ की सेवाओं का इस्तेमाल करते हुए सेंट लुसिया गए थे और खुद को यूके का नागरिक बताया था। इसके डेढ़ महीने बाद दोनों नाव से डोमिनिका पहुँचे, जहाँ उनमें से एक ने खुद को भारत का नागरिक बताया।

रिकार्ड्स में तो मेहुल चोकसी नाम के किसी शख्स के एंटीगुआ से डोमिनिका जाने के कोई साक्ष्य मौजूद नहीं हैं, ऐसे में एक व्यक्ति को भारतीय दिखाए जाने के पीछे क्या मंशा थी? ‘कोबरा टूर्स’ नाम की ट्रेवल कंपनी भी जाँच के घेरे में है। डोमिनिका का कहना है कि मेहुल चोकसी अवैध रूप से घुसा। वहीं उसका वकील कह रहा है कि उसका अपहरण कर के वहाँ ले जाया गया। वहीं कोबरा टूर्स ने मेहुल चोकसी द्वारा उसकी सेवाएँ लिए जाने से इनकार किया है।

वहीं इन दोनों को सेंट लुसिया ले जाने वाली नाव सेना कंपनी का कहना है कि दोनों ने उस समय भी डोमिनिका में जाने की कोशिश की थी, लेकिन 17 दिन के क्वारंटाइन के नियम के कारण वापस आ गए थे। फिर वो दोनों फ्लाइट के लिए निकल गए थे। अब सवाल ये है कि क्या ये दोनों चोकसी और उसका कोई दोस्त था? फिर गर्लफ्रेंड वाली बात भी इसमें पेंच घुसा रही है क्योंकि दस्तावेज में ये दोनों पुरुष हैं।

डोमिनिका की अदालत इस केस में भारत को भी पक्षकार बनाना चाहती है, इसीलिए भारत ने कुछ अधिकारियों को मेहुल चोकसी से सम्बंधित दस्तावेज और डिटेल्स लेकर वहाँ विमान से भेजा है। प्रत्यर्पण के लिए ज़रूरी इमरजेंसी सर्टिफिकेट भी भेजे गए हैं। वहीं चोकसी की जारी हुई तस्वीरों में ऐसा दिख रहा है जैसे उसकी पिटाई की गई हो। ‘न्यूज़ 18’ के सूत्रों का कहना है कि शारीरिक दुर्व्यवहार के आरोप निराधार हैं, क्योंकि चोकसी खुद इसे मानवाधिकार का मुद्दा बनाना चाहता है।

बुधवार (जून 2, 2021) को इस मामले की सुनवाई होनी है। डोमिनिका हाईकोर्ट ने तब तक मेहुल चोकसी के प्रत्यर्पण पर रोक लगा रखी है। चोकसी और उसका रिश्तेदार नीरव मोदी पंजाब नेशनल बैंक (PNB) का इस्तेमाल कर के 13,500 करोड़ रुपयों की हेराफेरी करने का आरोपित है। नीरव मोदी फ़िलहाल लंदन के जेल में है और उसके प्रत्यर्पण की सुनवाई भी वहाँ की अदालत में चालू है। वहीं चोकसी ने 2018 में भारत छोड़ने से पहले ही एंटीगुआ की नागरिकता ले ली थी।

इस पूरे मामले पर भारतीय विदेश मंत्रालय ने अभी तक कोई बयान नहीं दिया है। एंटीगुआ पहले ही डोमिनिका से कह चुका है कि वो मेहुल चोकसी को वापस नहीं लेगा और वो उसे सीधे भारत को प्रत्यर्पित कर सकता है। एंटीगुआ के PM ने कहा कि उनके देश का वो नागरिक था, इसीलिए वहाँ से उसे प्रत्यर्पित नहीं किया जा सकता था। भारत सरकार दोनों ही सरकारों के संपर्क में है। संभावना है कि एंटीगुआ में मेहुल चोकसी की नागरिकता छीन ली जाएगी।

इससे पहले चोकसी के वकील ने कहा था, “मेरे क्लाइंट एक इंसान हैं, कोई मोहरा नहीं हैं कि उन्हें कोई भी अपनी मर्जी से शतरंज के खेल की तरह घुमाते रहे। मेरा स्टैंड सही साबित हुआ है। मैं एंटीगुआ की यूनाइटेड प्रोग्रेसिव पार्टी के बयान की प्रशंसा करता हूँ कि एंटीगुआ को अपने हर नागरिक के अधिकारों की रक्षा करनी चाहिए। मेरे क्लाइंट मेहुल चोकसी एंटीगुआ के नागरिक हैं और एंटीगुआ के संविधान के तहत सभी कानूनी संरक्षण के हकदार भी हैं।”

कश्मीर वाली ‘आग’ में अब लक्षद्वीप को झुलसाने की चाल, क्योंकि नेहरू सब बुझते थे-मोदी को कुछ पता नहीं

अपने देश में किसी और क्षेत्र में काम तेजी से हों या न हों, राजनीति के क्षेत्र में बहुत तेजी से होते हैं। इसी परंपरा की रक्षा के उद्देश्य से केंद्र शासित प्रदेश लक्षद्वीप में प्रस्तावित प्रशासनिक सुधारों पर राजनीतिक गतिविधियाँ तेज हुई। इस बात पर भी किसी को आश्चर्य नहीं कि यह राजनीति मात्र लक्षद्वीप तक सीमित नहीं रही। वह उसके बाहर भी दिखाई दे रही है। दिल्ली से लेकर चेन्नई और कोच्चि से लेकर मैसूर तक, अचानक लोग व्यस्त दिखाई दे रहे हैं।

प्रस्तावित प्रशासनिक सुधारों की व्याख्या राजनीतिक विपक्ष और तथाकथित रूप से उसके अराजनीतिक सहयोगियों की विरोध नीति के अनुसार की जा रही है। सुधारों के विरोध में दिए जा रहे तर्क संस्कृति से लेकर धर्म और कला से लेकर व्यापार तक सब कुछ समेटे हुए हैं। 

भौगोलिक और ऐतिहासिक दृष्टि से लक्षद्वीप एक आम राज्य नहीं है। यही कारण है कि वह केंद्र शासित प्रदेश है। देश की सुरक्षा के दृष्टिकोण से भी उसका एक अलग महत्व है। प्रदेश की प्रशासनिक व्यवस्था के लिए निर्णय करने का संवैधानिक अधिकार केंद्र सरकार के पास है। ऐसे में केंद्र द्वारा नियुक्त प्रशासक यदि प्रशासनिक सुधारों को लेकर नए नियम लागू करना चाहते हैं तो उसके पीछे कारण होंगे। ये नियम दो दिन में नहीं बनाए गए होंगे। कोई नहीं कह सकता कि अचानक एक दिन केंद्र नींद से जागा होगा और दोपहर तक नियम तय कर लिए गए होंगे।

प्रशासनिक सुधारों को लागू करने का सरकार का तरीका संवैधानिक होता है। प्रस्तावों पर बहस होती है। उनके हर पहलू पर विचार होता है। प्रस्तावित विचार और बहस का एक पूरा पेपर ट्रेल होता है और तब जाकर सुधारों को लागू करने के लिए आगे बढ़ाया जाता है। ऐसे में इस तर्क के लिए स्थान नहीं है कि ये सुधार किसी विचारधारा या किसी गुप्त उद्देश्यों को साधने के लिए किए जा रहे हैं।  

ऐसा नहीं है कि प्रस्तावित सुधारों का विरोध करने वाले उन्हें लागू करने की सरकारी प्रक्रिया से अनभिज्ञ है। उन्हें पता है कि केंद्र या राज्य सरकारें जब किसी सुधार को लागू करना चाहती है तो क्या प्रक्रिया अपनाती हैं पर पिछले सात वर्षों में विपक्ष अपने ही इस राजनीतिक दर्शन से निकल नहीं पा रहा है कि केंद्र सरकार जो भी कहेगी, करेगी, करना चाहेगी, विपक्ष को उसे जनता के विरुद्ध उठाया गया कदम ही साबित करना है। इस कोशिश में विपक्ष को यह परवाह नहीं करना है कि उसे तर्क देना पड़ेगा या कुतर्क। उसे तो बस यह कहना है कि नरेंद्र मोदी या अमित शाह जो भी कदम उठाएँगे वे हमेशा संस्कृति, इतिहास, भूगोल, जनता और देश के विरुद्ध होंगे।

लक्षद्वीप के कुल छत्तीस द्वीपों में से केवल दस द्वीप आबाद हैं। जो आबाद हैं यदि वहाँ के लिए सरकार सुधार लाना चाहती है तो क्या समस्या है? सुधार कहाँ नहीं होते? कोई प्रदेश यदि देश का हिस्सा है तो सरकार समय और आवश्यकता के अनुसार उसमें प्रशासनिक सुधार लाएगी। इसमें कौन सा तर्क है कि आप मेरे प्रदेश में सुधार नहीं ला सकते क्योंकि हम नहीं चाहते? सुधारों की बात करें उनमें एक प्रस्ताव है पंचायत चुनाव लड़ने वालों के लिए दो बच्चों का अभिभावक होना अनिवार्य होगा। इसका विरोध किस आधार पर हो रहा है? प्रश्न यह है कि ऐसा प्रस्ताव क्या देश में पहली बार आया है?

प्रश्न यह भी है कि ऐसे नियम देश के अन्य राज्यों में हैं? यदि इसका जवाब हाँ है तो फिर ये नियम लक्षद्वीप में क्यों लागू नहीं किया जा सकता? एक प्रस्ताव है कि बिना लाइसेंस के बीफ का उत्पादन नहीं किया जा सकेगा। इसमें किसी को क्या आपत्ति है? यदि बीफ के उत्पादन को उद्योग का दर्जा दिया जाता है तो प्रश्न यह है कि देश के किस राज्य में उद्योग को लेकर नियम नहीं बने हैं? क्या केवल यह तर्क पर्याप्त है कि मजहबी कारणों से चूँकि बीफ वहाँ का भोजन है, इसलिए ऐसा नियम नहीं लाया जा सकता? इसलिए इस पर प्रतिबन्ध न लगे कि कोई भी कहीं भी बीफ का उत्पादन कर सकता है। 

कानून-व्यवस्था की समस्या से निपटने के लिए यदि प्रशासनिक सुधार किए जाने का प्रस्ताव है तो उसे लेकर आपत्ति क्यों? कानून-व्यवस्था किस सरकार की प्राथमिकता नहीं होती? ऐसे प्रस्ताव का विरोध क्या केवल यह कह कर किया जा सकता है कि हमारे यहाँ के लोग शांतिप्रिय हैं, इसलिए ऐसे सुधार की आवश्यकता नहीं है? हाल की रपटों की मानें तो द्वीप पर ड्रग्स और हथियार बरामद हुए थे। यदि द्वीपों पर सभी शांतिप्रिय ही हैं तो ये ड्रग्स और हथियार शांति के हितार्थ लाए गए होंगे?

विरोध इस बात का भी हो रहा है कि रिसॉर्ट में शराब की बिक्री का प्रस्ताव वापस लिया जाना चाहिए, क्योंकि वहाँ निषेध है। प्रश्न है है कि जहाँ शराब निषेध है, वहाँ चोरी-छिपे ड्रग्स बिके पर नियम और लाइसेंस के तहत केवल रिसॉर्ट्स में शराब न बिके? पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए ऐसे प्रस्ताव आम हैं पर उनका विरोध यह कहकर किया जाना उचित है कि यह लोगों की मजहबी भावनाओं के विरुद्ध है? 

प्रशासन का एक प्रस्तावित सुधार यह है कि द्वीपों पर निर्माण कार्य अब से नियम के तहत हो। इस प्रस्ताव का यह कहते हुए विरोध किया जा रहा है कि चूँकि निर्माण अब नियम के तहत होगा इसलिए वहाँ बड़े-बड़े प्रोजेक्ट बनेंगे जो द्वीपों की इकोलॉजी के लिए खतरा होंगे। प्रोजेक्ट बड़े हों या छोटे, निर्माण कार्य नियम के तहत होने ही चाहिए। क्या लोगों को कहीं भी किसी भी निर्माण का अधिकार दिया जा सकता है? फिर यह कैसा तर्क है कि इकोलॉजी की चिंता सरकार को नहीं है? इकोलॉजी की चिंता केवल स्थानीय लोगों को ही है? 

वर्तमान में लक्षद्वीप के आबाद दस द्वीप में से एक पर पर्यटन के लिए रिसॉर्ट है। पर क्या इस बात से इनकार किया जा सकता है कि कल जब और द्वीप आबाद होंगे तो एक अर्थव्यवस्था विकसित होगी जिसके लिए अभी से तैयारी की आवश्यकता है? एक आरोप यह लग रहा है कि सरकार इसे मालदीव की तरह विकसित करना चाहती है। प्रश्न यह है कि सरकार यदि मालदीव की तर्ज पर पर्यटन का विकास चाहती भी है तो इसमें बुराई क्या है? कौन सी जिम्मेदार सरकार अपने किसी इलाके का विकास नहीं चाहती?

यदि इकोलॉजी की चिंता सच में है तो क्या उसकी रक्षा के लिए कोई योजना न बने? क्या सुधार की योजनाएँ केवल इसलिए खारिज कर दी जानी चाहिए, क्योंकि ऐसा करने में कुछ स्थानीय या राजनीतिक लोगों के निहित स्वार्थ हैं? 

दरअसल पहले की सरकारों की राजनीति, उनकी निष्क्रियता, कम्युनिकेशन की सुविधाओं का अभाव और कार्यशैली ने दशकों पुराने इस सिद्धांत को जाने-अनजाने पुख्ता कर रखा है कि दिल्ली में बैठे लोगों को भारत के अन्य प्रदेशों, जिलों या शहरों की जानकारी नहीं है। एक समय तक यह बात कुछ हद तक सही भी थी पर क्या यह आज भी कहा जा सकता है? यही बात आज भी कहते हुए लोग यह भूल जाते हैं कि यह उन दिनों की बात है जब दूर के प्रदेशों, खासकर द्वीपों से संवाद बहुत बड़ी समस्या थी। आज ऐसी समस्याएँ न के बराबर हैं। ऐसे में हर बात का विरोध यह कह कर नहीं किया जा सकता। 

जिन बातों को आगे रखकर केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तावित सुधारों का विरोध किया जा रहा है वे छिछली हैं। जिन कारणों के सहारे विरोध किया जा रहा है वे तर्कसंगत नहीं जान पड़ते। कॉलम लिख कर विरोध करने वाले बुद्धिजीवी अपने इस तर्क से आगे नहीं बढ़ पा रहे कि नरेंद्र मोदी और अमित शाह को कुछ पता नहीं। यही कारण है कि वे अपने कॉलम की शुरुआत पंडित नेहरू के 1956 के फैसले से करते हैं। उन्हें यह लगता है कि यदि पंडित नेहरू, उनकी दूरदृष्टि और संस्कृति की उनकी समझ को कॉलम के शुरू में ही बैठा दिया जाए तो यह साबित किया जा सकता है कि मोदी और शाह को संस्कृति की समझ नहीं है। इन बुद्धिजीवियों को लगता है कि बाकी भारत भले ही 2021 हो पर लक्षद्वीप आज भी 1956 में ही है और उसे किसी प्रशासनिक सुधारों की आवश्यकता नहीं है। 

लक्षद्वीप और कश्मीर में समानता आगे रखी जा रही है। बताया जा रहा है कि दोनों प्रदेशों की संस्कृति की समझ केंद्र सरकार को नहीं है। बुद्धिजीवी गण कश्मीर के बारे में भी मान कर चल रहे हैं कि कश्मीर आज भी 1947 में ही है। दरअसल जब ऐसे प्रदेशों की बात होती है तब मजहब को आगे कर दिया जाता है। इसके साथ पिछले पचास साठ-वर्षों के बदलाव से उपजे प्रश्नों के आगे आँखें मूँद ली जाती हैं, क्योंकि प्रश्नों के आगे आँखें मूँद लेना हमारे बुद्धिजीवियों का प्रिय शगल है। दरअसल, दोनों प्रदेशों के बीच समानता है। समानता स्थानीय लोगों की सोच में है। और वह सोच यह है कि हमारे अलावा यहाँ कोई और न रहे। कश्मीर के स्थानीय लोगों ने हिन्दुओं को वहाँ से निकाला और लक्षद्वीप के स्थानीय लोग चाहते हैं कि वहाँ कोई और न आए। दोनों सोच का परिणाम एक ही है।

प्रस्तावित सुधारों को लेकर किए जा रहे विरोध के पीछे कारण एक ही है और वह है कि केंद्र सरकार के हर उस कदम का विरोध किया जाए जिसे वो सुधार मानकर चल रही है। इसमें आश्चर्य नहीं है पर ऐसे विरोध के लिए स्पेस बहुत कम है। इस विरोध के पीछे का दर्शन यह है कि चूँकि संविधान के अनुसार सुधार करने का अधिकार केंद्र सरकार का है इसलिए विरोध यह कह कर किया जाए कि ये प्रस्तावित सुधार दरअसल सुधार नहीं, बल्कि स्थानीय संस्कृति पर हमला है। राज्य के प्रशासक के ऊपर हिंदुत्ववादी होने के आरोप लगाए जा रहे हैं और कहा जा रहा है कि वे हिन्दुत्व के किसी तथाकथित एजेंडा के लिए काम कर रहे हैं। यह बात अलग है कि ये कुतर्क के अलावा और कुछ नहीं है। राजनीतिक विरोध अपनी जगह, पर इससे इनकार करना मुश्किल है कि ये सुधार संविधान की रक्षा के हेतु अनिवार्य हैं और उन्हें लागू करना केंद्र सरकार की जिम्मेदारी है।