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सेंट्रल विस्टा का राष्ट्रीय महत्व, रोक नहीं लगेगी: याचिका को राजनीति से प्रेरित बता HC ने लगाया ₹1 लाख जुर्माना

दिल्ली हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार की महत्वकांक्षी सेन्ट्रल विस्टा पुनरोद्धार परियोजना पर रोक लगाने से इनकार करते हुए इसके लिए दायर याचिका को खारिज कर दिया है। इस याचिका में कोरोना महामारी के मद्देनजर इस प्रोजेक्ट को रोकने की अपील की गई थी, जिसके तहत नए संसद भवन का निर्माण होना है। हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता पर 1 लाख रुपए का जुर्माना लगाते हुए कहा कि ये ‘राष्ट्रीय महत्व का एक अत्यावश्यक परियोजना है।’

मुख्य न्यायाधीश डीएन पटेल और जस्टिस ज्योति सिंह की पीठ ने कहा कि ये एक राष्ट्रीय महत्व का प्रोजेक्ट है जिसे पृथक कर के नहीं देखा जाना चाहिए, क्योंकि इससे जनता का हित होना है। साथ ही हाईकोर्ट ने इस याचिका को एक वास्तविक जनहित याचिका (PIL) न मानते हुए ‘मोटिवेटेड’ याचिका करार दिया। हाईकोर्ट ने नोट किया कि निर्माण कार्य नवंबर 2021 से पहले पूरा किया जाना है, ऐसे में हर एक क्षण ज़रूरी है।

दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि अगर सभी मजदूरों को साइट के आसपास ही रखा जा रहा है, कोरोना के दिशानिर्देशों का पालन हो रहा है और सभी सुविधाएँ प्रदान की जा रही हैं तो फिर इस परियोजना को रोकने का कोई कारण नहीं बनता है। इस PIL को अन्या मल्होत्रा और सोहैल हाशमी ने दायर किया था। उन्होंने सेन्ट्रल विस्टा के निर्माण कार्य को कोरोना का ‘पोटेंशियल सुपर स्प्रेडर’ बताते हुए इस पर तत्काल रोक लगाने की माँग की थी।

इस याचिका में दावा किया गया था कि सेन्ट्रल विस्टा प्रोजेक्ट को सिर्फ इसीलिए ‘ज़रूरी सेवाओं’ के कैटेगरी में डालने के पीछे कोई तर्क नहीं है क्योंकि कोई ठेका सम्बन्धी किसी अनिवार्य समयसीमा में इसे पूरा करना है। वहीं केंद्र सरकार ने अपना पक्ष रखते हुए स्पष्ट किया कि राजपथ और इंडिया गेट पर अभी निर्माण कार्य चल रहा है, जो संसद भवन या केंद्र सरकार के अधिकारियों/नेताओं के दफ्तरों से जुड़ा कार्य नहीं है।

केंद्र सरकार के अनुसार, ताज़ा निर्माण कार्य जनता के हित में है क्योंकि ये वो पर्यटन स्थलों पर चल रहा है जहाँ जनता रोज आती है। नए शौचालय स्पेस के निर्माण से लेकर पार्किंग और आम आवागमन के लिए सड़क का निर्माण, सभी जनता की सुविधा के लिए किए जा रहे हैं। केंद्र ने ये भी बताया कि याचिका के दावे के विपरीत कंट्रक्शन साइट पर मजदूरों के लिए मेडिकल सुविधाएँ प्रदान की गई हैं।

हाईकोर्ट को ये भी बताया गया कि निर्माण कार्य कोविड-19 के सरकारी व मेडिकल दिशानिर्देशों का पालन करते हुए कराया जा रहा है। केंद्र ने कहा कि सेन्ट्रल विस्टा को हमेशा से रोकने की कोशिश करने वाले लोग ही कपटवेश में कोरोना संक्रमण का बहाना बना कर सामने आए हैं। लुटियंस दिल्ली की तस्वीर बदलने वाले सेन्ट्रल विस्टा प्रोजेक्ट का विरोध कॉन्ग्रेस भी करती आई है। सुप्रीम कोर्ट जनवरी में पहले ही इसे हरी झंडी दिखा चुका है।

इससे पहले कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष ने सेन्ट्रल विस्टा को रुपयों की ‘आपराधिक बर्बादी’ करार दिया था। उन्होंने ऐसा दिखाने का प्रयास किया था जैसे ये प्रोजेक्ट पीएम मोदी का कोई निजी प्रोजेक्ट हो। वहीं दूसरी तरफ महाराष्ट्र के नरीमन प्वाइंट में उद्धव ठाकरे की अगुवाई वाली महाविकास अघाड़ी सरकार (MVA) 900 करोड़ रुपयों की लागत से विधायकों के लिए हॉस्टल बनवा रही है, जिस पर वो चुप्पी साधे हुए हैं।

चारधाम देवस्थानम बोर्ड: उत्तराखंड के मंदिरों के प्रबंधन में आवश्यक है सरकार की भूमिका, जानिए कारण

देशभर में मंदिरों को कम्युनिस्ट सत्ता से आजादी के सिलसिले में गत 13 जुलाई को ही सुप्रीम कोर्ट ने केरल के तिरुवनंतपुरम में ऐतिहासिक श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर के प्रशासन में त्रावणकोर राजपरिवार के अधिकारों को बरकरार रखने का आदेश दिया।

इसके कुछ ही दिन बाद, गत 21 जुलाई को उत्तराखंड हाईकोर्ट से त्रिवेंद्र रावत सरकार के पक्ष में फैसला सुनाते हुए ‘चारधाम देवस्थानम एक्ट’ को चुनौती देने वाली भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी की याचिका को खारिज कर दिया।

सुब्रमण्यम स्वामी ने इस जनहित याचिका में तर्क दिया था कि सरकार और अधिकारियों का काम अर्थव्यवस्था, कानून-व्यवस्था की देखरेख करना है न कि मंदिर चलाने का। स्वामी का कहना था कि मंदिर को भक्त या फिर उनके लोग ही चला सकते हैं, जिस कारण सरकार के एक्ट को निरस्त किया जाना चाहिए।

राज्य सरकार ने इस याचिका के विरुद्ध नैनीताल हाईकोर्ट में अपने पक्ष में कहा कि सरकार ने इस एक्ट को बड़ी पारदर्शिता से बनाया है और इसमें मंदिर में चढ़ने वाले चढ़ावे का पूरा रिकॉर्ड रखा जा रहा है और इससे संविधान के अनुच्छेद 25, 26 और 32 का भी उल्लंघन नहीं होता है। उत्तराखंड सरकार ने याचिका को निराधार बताते हुए इस को खारिज करने की अपील की थी।

इस पर राज्य सरकार का कहना है कि ‘चारधाम देवस्थानम अधिनियम’ चारधाम (गंगोत्री, यमुनोत्री, बदरीनाथ, केदारनाथ) और उनके आसपास के मंदिरों की व्यवस्था में सुधार के लिए है। जिसका मकसद यह है कि यहाँ आने वाले यात्रियों का ठीक से स्वागत हो और उन्हें बेहतर सुविधाएँ मिलें। इसके साथ ही बोर्ड भविष्य की जरूरतों को भी पूरा कर सकेगा।

ऐसे में यह देखा जाना जरूरी है कि क्या केरल जैसे ‘सेक्युलर’ राज्य, जहाँ वामपंथी विचारधारा का वर्चस्व रहा है, और देवभूमि कहा जाने वाला उत्तराखंड राज्य, जहाँ पर लोग धार्मिक पहचान और सांस्कृतिक गौरव को प्राथमिकता देते आए हैं; इन दोनों ही मामलों में मंदिरों को सरकार के हस्तक्षेप से दूर रखने जैसे नजरिए को सिर्फ एक ही दृष्टिकोण से देखा जाना चाहिए?

इसका जवाब यह है कि वामपंथी सत्ता वाले केरल राज्य के मंदिरों के विपरीत, उत्तराखंड जैसे आपदा से प्रभावित और विषम भौगौलिक परिस्थितियों वाले राज्यों के मंदिरों के रखरखाव और उनके प्रबंधन के लिए सरकार को प्रमुखता से आगे आना चाहिए और यह निहायती आवश्यक भी है। इसके पीछे कई तर्क हैं, जिन पर चर्चा से पहले चारधाम देवस्थानम अधिनियम को समझना आवश्यक है।

चारधाम देवस्थानम एक्ट

पिछले साल नवंबर-दिसंबर में उत्तराखंड सरकार ने बदरीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री समेत प्रदेश के 51 मंदिरों का प्रबंधन हाथ में लेने के लिए चार धाम देवस्थानम एक्ट से एक बोर्ड, चार धाम देवस्थानम बोर्ड बनाया था।

इन मंदिरों में अवस्थापना सुविधाओं का विकास, समुचित यात्रा संचालन एवं प्रबंधन के लिए उत्तराखंड चारधाम देवस्थानम प्रबंधन अधिनियम का गठन किया गया है। बोर्ड के अध्यक्ष मुख्यमंत्री होंगे। संस्कृति मामलों के मंत्री को बोर्ड का उपाध्यक्ष बनाया गया है। मुख्य सचिव, सचिव पर्यटन, सचिव वित्त व संस्कृति विभाग भारत सरकार के संयुक्त सचिव स्तर तक के अधिकारी पदेन सदस्य होंगे।

हाईकोर्ट में इस याचिका की सुनवाई के दौरान सरकार के बचाव में देहरादून की रुलेक संस्था के वकील कार्तिकेय हरि गुप्ता ने कहा कि उत्तराखंड के मंदिरों के प्रबंधन के लिए बना यह पहला एक्ट नहीं है बल्कि ऐसा ही कानून सौ साल पुराना है।

गुप्ता ने कोर्ट को बताया कि वर्ष 1899 में हाईकोर्ट ऑफ कुमाऊं ने ‘स्क्रीम ऑफ़ एडमिनिस्ट्रेशन’ के तहत इसका मैनेजमेंट टिहरी दरबार को दिया था और धार्मिक क्रियाकलाप का अधिकार रावलों व पण्डे-पुरोहितों को दिया गया था।

वर्ष 1933 में मदन मोहन मालवीय ने अपनी किताब में इसका ज़िक्र किया है। साथ ही, मनुस्मृति में भी कहा गया है कि मुख्य पुजारी राजा ही होता है और राजा चाहे तो किसी को भी पूजा का अधिकार दे सकता है।

उत्तर भारत के मंदिरों की आर्थिक स्थिति

यह भी एक वास्तविकता है कि यदि दक्षिण भारत के मंदिरों और उत्तर भारत के मंदिरों की तुलना करें तो उत्तर भारत के मंदिर दक्षिण की तुलना में बेहद कम आर्थिक रूप से सम्पन्न हैं। दक्षिण भारत के मंदिरों की आय का बड़ा प्रतिशत रावल और पुजारियों से लेकर मंदिर सेवकों और अपने अनुष्ठानों के क्रियान्वयन के लिए आत्मनिर्भर हैं।

जबकि, उत्तर भारत के, एक आपदाग्रस्त राज्य उत्तराखंड में यदि बेहद विषम भौगौलिक परिस्थितियों में बसे मंदिरों की वार्षिक सम्पत्ति का अंदाजा लगाएँ तो वह नाममात्र की ही निकलती है। जितने संपन्न यह मंदिर अतीत में थे, उन्होंने आक्रान्ताओं को यहाँ लूट के लिए उकसाया, लेकिन उसके बाद हालात और परिस्थितियाँ एकदम विपरीत हैं।

यह भी एक सत्य है कि अन्य मजहब और धर्मों की तरह ही हिन्दू मंदिरों में चंदे, दान और वित्तीय सहायता का बेहद अभाव देखा जाता है। जहाँ, इसाई मिशनरी विदेशी पैसे का एक बहुत बड़ा और भारी-भरकम हिस्सा सिर्फ उत्तराखंड के ग्रामीण इलाकों के धर्मांतरण मात्र पर फूँक रहे हैं, उसका एक प्रतिशत भी हिन्दू मंदिरों को उनके श्रद्धालुओं के द्वारा प्राप्त नहीं हो पाता है।

क्या ऐसे में यह उम्मीद जताई जा सकती है कि उत्तराखंड के मंदिर अपने सिर्फ स्थानीय समितियों के आधार पर कुम्भ जैसे विशाल मेले और अनुष्ठानों का आयोजन करने में सक्षम हैं? सड़क, इन्फ्रास्ट्रक्चर, बुनियादी सुविधाओं, सरकारी सब्सिडी और आपदा के दौरान क्या स्थानीय लोग और समितियाँ इन चुनौतियों का सामना कर पाने में सक्षम हैं?

यदि आय का विवरण देखें तो मंदिरों की बहुत सी सम्पत्ति गाँव की जमीन के रूप में दर्शाई गई है, जिसकी कीमत आज ना के बराबर है। यदि यही भूमि सरकारी संरक्षण में रहे तो इसका मूल्य स्थानीय लोगों के लिए ही लाभदायक साबित हो सकता है।

यदि केदारनाथ की ही बात करें तो राज्य और केंद्र सरकार ने करोड़ों रुपए इसके पुनर्निर्माण और इन्फ्रास्ट्रक्चर पर निवेश कर चुकी है और स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हर गतिविधि का स्वयं ही जायजा लेते हैं। यह एक तरह से यह उसी परम्परा का अनुसरण है, जिस तरह से पहले राजा ही उत्तराखंड के मंदिरों का ध्यान रखा करते थे और उसके बाद यह दायित्व सरकार के पास आ गया है।

जबकि, इसकी तुलना में आय की यदि बात करें तो पिछले साल श्री बद्रीनाथ धाम मंदिर की वार्षिक आय महज 25 करोड़ रुपए थी और श्री केदारनाथ जी मंदिर की आय 15 करोड़ रुपए! गंगोत्री मंदिर को पुजारियों द्वारा निजी तौर पर प्रबंधित सीईओ ने केवल 1-2 करोड़ रुपए ही आय बताई।

मंदिरों पर किसका स्वामित्व हो?

यह आश्चर्यजनक लग सकता है, लेकिन तथ्य दुर्भाग्यपूर्ण हैं। तथ्य यह है कि सरकार के विरोध में याचिकाकर्ताओं में से एक – श्री पाँच मंदिर समिति, गंगोत्री धाम, वास्तव में मुखबा के 5 कुलों की समिति है और वे मंदिर की पूरी आय पर अधिकार का दावा कर रहे हैं। उन्होंने इस मंदिर का निर्माण भी नहीं किया है।

भागीरथ शिला के कारण गंगोत्री धाम की पवित्रता है। वह स्थान, जहाँ राजा भागीरथ ने माँ गंगा को धरती पर लाने के लिए तपस्या की थी। इस मंदिर के प्रथम जीर्णोद्धार का प्रलेखित प्रमाण नेपाली शासन के दौरान मिलता है, जब गढ़वाल के गोरखा सेनापति अमर सिंह थापा ने 18वीं सदी में गंगोत्री मंदिर का निर्माण उसी जगह किया, जहाँ राजा भागीरथ ने तप किया था। मंदिर में प्रबंध के लिए सेनापति थापा ने मुखबा गंगोत्री गाँव से पंडों को भी नियुक्त किया। इसके पहले टकनौर के राजपूत ही गंगोत्री के पुजारी थे।

टिहरी राजपरिवार ने बाद के वर्षों में मंदिर का ध्यान रखा और फिर लकड़ी के मंदिर को फिर से पुनर्निर्मित करने की आवश्यकता पड़ी। तब 20वीं सदी में जयपुर राजपरिवार के सवाई जय सिंह ने इसके निर्माण के लिए 3 लाख रुपए का भुगतान किया था और इसी कारण से वे मंदिर के स्वामित्व का भी दावा करते हैं। एटकिंसन ने ‘दी हिमालयन गजेटियर’ (वोल्युम-3, भाग-1, वर्ष 1882) में लिखा है कि अंग्रेजों के टकनौर शासनकाल में गंगोत्री प्रशासनिक इकाई पट्टी तथा परगने का एक भाग था।

समय के साथ, टिहरी के राजपरिवार द्वारा नियंत्रित क्षेत्र में मंदिर का अधिकार आ गया था, वे अपने तहसीलदारों की एक समिति के माध्यम से मंदिर का प्रबंधन करते थे। स्वतंत्रता के बाद भी इसी प्रणाली को जारी रखा गया था, जब टिहरी राजघरानों की तहसीलदार प्रणाली को सरकार की एसडीएम प्रणाली द्वारा बदल दिया गया था, जो कि वर्ष 2002 तक भी जारी रहा।

वर्ष 2002 में, एसडीएम ने स्थानीय सेमवाल पुजारियों के दबाव में आकर मंदिर के प्रबंधन को जारी रखने में असमर्थता व्यक्त की। तब राज्य नवगठित था और इस पर वांछित ध्यान नहीं दिया गया था। 5 गुटों के सदस्य – मुखबा के पंच भाइयों ने एक समिति गठित की, जिसने मंदिर प्रबंधन पर अधिकार जमा लिया था।

जबकि, यमुनोत्री धाम में प्रणाली 2020 तक वही जारी रही, जो वर्ष 2002 तक गंगोत्री में प्रचलित थी, यानी एसडीएम के साथ मंदिर समिति और खरसाली के उनियाल इसके प्रमुख हिस्सा थे।

गंगोत्री धाम का एक और दिलचस्प पहलू मंदिर प्रबंधन दान की आय के बँटवारे के बारे में है, जो कि मंदिर रखरखाव के लिए प्रदान करने के बाद 5 कुलों के बीच बाँटा जाता है। हर साल प्रति एक सदस्य को मंदिर की आय से कमाई करने का अधिकार दिया जाता है।

आय के वितरण और बँटवारे की प्रणाली इतनी जटिल है कि ऐसे में कुल ही के एक बेटे को जहाँ हर साल हिस्सा मिलता है, वहीं दूसरे के बेटों को 4 साल बाद अपनी बारी का इन्तजार करना होता है। आय के हिस्से में बाँट की यह अनियमित प्रणाली कई बार विरोध और विवाद का कारण बन जाता है।

लेकिन दुर्भाग्य यह है कि राज्य सरकार के चारधाम देवस्थानम एक्ट को गलत बताने वाले लोग मंदिरों की इस कमाई और इनके रखरखाव वाले खर्चे के बीच तुलना कर पाने में असमर्थ नजर आते हैं। ना ही सरकार के खिलाफ याचिका डालने वाले तब यह सवाल स्थानीय मंदिर समितियों के ‘सीईओ-जनों’ से करते हैं, जब वार्षिक आय में फर्जीवाड़ा किया जाता है।

उत्तराखंड सरकार के पास मंदिरों के संरक्षण का विषय विवादित रूप से देखने के बजाए तार्किक रूप से देखा जाना चाहिए। इसमें अर्थव्यवस्था के साथ ही दक्षिणपंथी हिंदूवादी सरकार की मंशा को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।

उत्तराखंड राज्य के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत यह बात कई बार स्पष्ट कर चुके हैं कि राज्य सरकार का प्रमुख लक्ष्य मंदिरों की स्थिति को बेहतर बनाना है, ताकि ज्यादा से ज्यादा निवेश, श्रद्धालु और रोजगार के अवसर खुल सकें। साथ ही, किसी भी बड़े फैसले पर मंदिर के पुजारियों और समिति की राय को सर्वोपरी रखा जाएगा।

अब सवाल यह भी उठता है कि जिस दिन राज्य में कॉन्ग्रेस की सरकार बनेगी, उस दिन मंदिरों की सम्पत्ति क्या उतनी ही सुरक्षित रहेगी जितनी कि दक्षिणपंथी सरकार के दौरान मानी जा रही है? इसका जवाब यह है कि हिन्दू हितों और अधिकारों की रक्षा के बारे में चिंतित लोग क्या कभी कॉन्ग्रेस को सत्ता में आने देना चाहेंगे?

हिन्दू हितों के बारे में कॉन्ग्रेस का परम्परागत इतिहास कोई छुपी हुई बात नहीं है। यह वही राजनीतिक दल है, जो वोट बैंक के लिए गाय/बैल को चुनाव चिन्ह बना लेता है तो कभी वोट बैंक के लिए सड़कों पर गाय को काटने वालों के साथ जश्न भी मनाता है।

व्यक्तिगत तौर पर मेरा मानना है कि उत्तराखंड की जनता वर्ष 2013 की आपदा के उस बुरे अनुभव को शायद कभी भुला सकेंगे, जब जनता त्रासद थी और कॉन्ग्रेस के ही नेता अपनी जनता के बीच होने के बजाए दिल्ली में अपने अन्नदाताओं के पास अपने नम्बर बढ़ाना ज्यादा आवश्यक समझ रहे थे?

यह हिन्दू हितों का स्वर्णिम दौर है। इसी दौर में सदियों से लंबित अयोध्या के राम मंदिर का फैसला और निर्माण कार्य की प्रस्तावना रखी जा रही है। इसी में देश के प्रधानमंत्री खुलकर गंगा आरती करते हैं। केदारनाथ धाम को देशभर का हॉट टॉपिक बना देते हैं।

उन्हें हिन्दुओं की पहचान को स्वीकार्यता देने में कोई संकोच नहीं है और इसे वामपंथी नैरेटिव एवं व्यक्तिगत अहम के वर्चस्व वालों की नजर से देखने के बजाए यह ज्यादा आवश्यक है कि राज्य सरकार इसी एक्ट के अन्तर्गत क्या कुछ कर सकती है।

चार धाम यात्रा के लिए ऑल वेदर रोड के प्रोजेक्ट हों या फिर चार धामों के विकास की योजनाएँ हों, राज्य ने हमेशा ही तमाम परम्परागत तुष्टिकरण के विपरीत ऐतिहासिक फैसले लेने का साहस दिखाया है। इसलिए जनता की भी जिम्मेदारी बनती है कि सरकार को वह करने का अवसर देने में सहयोग करे, जिसके लिए वह प्रतिबद्ध नजर आई है।

नोट- ऑपइंडिया हिन्दू मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से स्वतंत्र रखने की विचारधारा का प्रखर पक्षधर है, लेकिन उत्तराखंड जैसे राज्य के सुदूर क्षेत्रों में स्थित मंदिरों की आर्थिक एवं भौगोलिक स्थिति के साथ ही तमाम तर्कों को देखते हुए उत्तराखंड राज्य सरकार के पक्ष को जानने के लिए हमने इस लेख को प्रकाशित करने का निर्णय लिया है।

‘5 साल की उम्र से ट्रेनिंग, अम्मी-अब्बू ने कहा- गैर मुस्लिमों से नफरत करो’: पुलिस से पाकिस्तानी मूल के पूर्व आतंकी ने की शिकायत

ब्रिटेन में पैदा हुए पाकिस्तानी मूल के पूर्व आतंकवादी ने अपने अम्मी-अब्बू के खिलाफ पुलिस से शिकायत की है। इसमें उन पर बचपन से कट्टरपंथ की ट्रेनिंग देने का आरोप लगाया है। 29 वर्षीय पूर्व आतंकवादी ने खुलासा किया है कि अम्मी-अब्बू ने 5 साल की उम्र से ही उसे इस्लाम के लिए लड़ने और गैर मुस्लिमों से नफरत करने की ट्रेनिंग देनी शुरू कर दी थी। कट्टरपंथी सलाफी/सलफ़ी विचारधारा के तहत उसे ब्रिटेन के खिलाफ जंग के लिए तैयार किया गया।

उसने ये भी दावा किया कि अल कायदा से जुड़े अनवर अल-अवलाकी के स्टडी सेशन में भी भाग ले चुका है। अवलाकी यमन में ड्रोन हमले में मारा जा चुका है। पूर्व आतंकवादी ने अपने माता-पिता को लेकर कहा, “उन्होंने मुझे बताया कि इस्लाम के खिलाफ युद्ध चल रहा है और मुझे इस देश के खिलाफ जंग के लिए तैयार रहना होगा।” पूर्व इस्लामिक चरमपंथी ने खुलासा किया कि लंदन काउंसिल में बड़े होने के दौरान उसके भाई-बहन भी उसकी ही तरह कट्टरपंथी थे।

शोषण का आरोप

पूर्व आतंकी ने अपने माता-पिता पर शारीरिक और मानसिक शोषण का आरोप लगाते हुए दावा किया कि वह बीते पाँच साल से उनके उनके संपर्क में नहीं है। उसने मौजूदा हालात से तंग आने के बाद करीब दो सप्ताह पहले पुलिस में अपने अभिभावकों के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी। इन दो हफ्तों के दौरान पुलिस ने उससे गहनता से पूछताछ की। उसने ये भी बताया कि उसके माता-पिता ने उसे ब्रिटेन, पश्चिमी देशों और गैर मुस्लिमों से नफरत करने की शिक्षा दी।

भेजा जाएगा ‘सेफ हाउस’

ब्रिटेन के एंटी टेररिस्ट स्क्वाड के अधिकारियों ने पूछताछ के बाद पूर्व आतंकी को ‘सेफ हाउस’ में भेजने की तैयारी शुरू कर दी है। डेली मेल के मुताबिक, ब्रिटेन में यह अपनी तरह का पहला मामला है, जब किसी ने अपने ही माता-पिता पर खुद को बचपन में इस्लामिक जिहादी बनाने का आरोप लगाया है। खास बात यह है कि ब्रिटेन में बच्चों को शोषण से बचाने का कानून तो है, लेकिन अपने बच्चों को कट्टरपंथी बनाने के मामले में माता-पिता के खिलाफ केस चलाने कोई कानून नहीं है।

ट्विटर पर FIR का NCPCR ने दिया आदेश, कहा- बच्चों के यौन शोषण कंटेट को लेकर बोला झूठ

राष्ट्रीय बाल संरक्षण अधिकार आयोग (NCPCR) के अध्यक्ष प्रियंक कानूनगो ने माइक्रो ब्लॉगिंग सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्विटर के खिलाफ FIR दायर करने के लिए दिल्ली पुलिस को पत्र लिखा है। ट्विटर पर आरोप है कि उसने आयोग को झूठी जानकारी दी। कानूनगो ने बताया कि ट्विटर पर कुछ ऐसे व्हाट्सएप्प ग्रुप्स के लिंक्स उपलब्ध हैं, जहाँ बच्चों के यौन शोषण (चाइल्ड सेक्सुअल अब्यूज) की सामग्रियाँ भरी पड़ी हैं।

उन्होंने बताया कि इन आपत्तिजनक वीडियो की खरीद-बिक्री भी हो रही है। इसी तरह ‘डार्क वेब’ के टूलकिट भी उस पर उपलब्ध हैं। NCPCR के अध्यक्ष ने उस घटना का भी जिक्र किया, जब AltNews वाले जुबैर ने एक बच्ची की तस्वीर सोशल मीडिया पर वायरल कर दी थी, जिसके बाद लोगों ने उसे बलात्कार की धमकी दी थी। कानूनगो ने कहा कि ट्विटर पर बच्चे असुरक्षित हैं और यहाँ बच्चों का यौन शोषण करने वाले (Pedofile) और इसकी धमकी देने वाले लोग मौजूद हैं।

प्रियंक कानूनगो ने कहा, “ट्विटर पर डार्क वेब और डीप वेब जैसी इंटरनेट की घातक दुनिया में जाने की व्यवस्था उपलब्ध हो, वो जगह बच्चों के लिए सुरक्षित नहीं हो सकती। आयोग ने इस सम्बन्ध में ट्विटर को समन किया था। ट्विटर ने आयोग को गलत जानकारी दी। पॉक्सो एक्ट की धारा-11,15,19 का उल्लंघन किया। IPC की धारा-199 का उल्लंघन किया। इसीलिए हमने दिल्ली पुलिस को इस मामले के बारे में सूचित कर ट्विटर के खिलाफ FIR दर्ज करने को कहा है।”

उन्होंने ये भी जानकारी दी कि NCPCR ने भारत सरकार के IT मंत्रालय को भी लिखा है कि जब तक ट्विटर बच्चों के लिए सुरक्षित नहीं हो जाता, तब तक बच्चों को इस साइट के एक्सेस से प्रतिबंधित किया जाए। दरअसल, जब ट्विटर को ऐसे मामलों को भारतीय कानून के तहत पुलिस को रिपोर्ट करने को कहा गया तो उसने कहा कि ये अमेरिकी कंपनी का काम है, उनका काम नहीं है। ये बातचीत ‘ट्विटर कम्युनिकेशन इंडिया प्राइवेट लिमिटेड’ से हुई थी।

राजस्थान के 8 जिलों में डस्टिबन में मिले कोरोना के टीके, राज्य में 11.50 लाख डोज बर्बाद: रिपोर्ट

राजस्थान में वैक्सीन की बर्बादी को लेकर चर्चा जोर पकड़ रही है। जहाँ एक तरफ राज्य में अशोक गहलोत के नेतृत्व वाली कॉन्ग्रेस की सरकार कह रही है कि केंद्र सरकार राज्य की ज़रूरत के हिसाब से एक चौथाई कोरोना वैक्सीन भी नहीं दे रही है और टीके की किल्लत के कारण कई सेंटर्स बंद करने पड़े हैं, वहीं दूसरी तरफ केंद्र सरकार द्वारा जारी किए गए आँकड़ों से राज्य की शासन-व्यवस्था की पोल खुल रही है।

केंद्र सरकार रोज इसका हिसाब देती है कि प्रतिदिन कितने राज्यों को कितनी संख्या में वैक्सीन दी जा रही है। केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने वैक्सीन की बर्बादी का आँकड़ा 11.50 लाख दिया है। बता दें कि वैक्सीन के एक वायल में 10 रोज होते हैं और इतने लोग नहीं मिले तो बाकी के बर्बाद हो जाते हैं। ‘दैनिक भास्कर’ की पड़ताल के अनुसार, 8 जिलों के 35 वैक्सीनेशन सेंटरों पर 500 वायल में करीब 2500 से भी ज्यादा डोज तो केवल डस्टबिन में मिले हैं।

मीडिया संस्थान ने अपनी पड़ताल के हिसाब से बताया कि कूड़े के साथ मिले कोरोना वैक्सीन के 500 से अधिक वायल 20-75% तक भरे हुए थे। वहीं आँकड़ों की मानें तो 2021 में 16 जनवरी से लेकर 17 मई तक राज्य में 11.50 लाख से भी अधिक कोविड-19 वैक्सीन की डोज बर्बाद कर दी गई है। हालाँकि, इस पर राज्य सरकार के आँकड़े अलग ही हैं। उसने कहा है कि राजस्थान में महज 2% वैक्सीन ही बर्बाद हुए।

जबकि केंद्र सरकार के आँकड़े कहते हैं कि जहाँ अप्रैल 2021 में राजस्थान में वैक्सीन की बर्बादी का प्रतिशत 7 है। ‘दैनिक भास्कर’ की पड़ताल कह रही है कि राज्य में जिन भी कोविड-19 टीकाकरण केंद्रों पर पड़ताल की गई, वहाँ 25% वैक्सीन बर्बाद हो गए। मीडिया संस्थान ने कहा कि उसके पास ये वायल अभी भी मौजूद हैं और इन्हें राज्य के स्वास्थ्य विभाग को सौंपा जाएगा। स्वास्थ्य विभाग के प्रमुख सचिव अखिल अरोड़ा ने जाँच का आश्वासन दिया है।

सबसे ज्यादा खराब स्थिति तो राजस्थान के चूरू की है। जिले में 39.7% वैक्सीन की डोज बर्बाद कर दी गई। जयपुर प्रथम में 4.67% और द्वितीय में 1.31% वैक्सीन की डोज बर्बाद कर दी गई। हनुमानगढ़ में 24.60 प्रतिशत वैक्सीन खराब कर दी गई। भरतपुर में 17.13%, कोटा में 16.71%, चित्तौरगढ़ में 11.81%, जालौर में 9.63%, सीकर में 8.83%, अलवर में 8.32% और चौलपुर में 7.89% वैक्सीन बर्बाद हो गई।

सिविल डिफेंस की ‘वर्दी’ में फिर गुंडई, अब रेहड़ी वाले को पीटा; दिल्ली पुलिस कर रही तलाश

दिल्ली में सिविल डिफेंस के कर्मियों की गुंडई का एक और मामला सामने आया है। ताजा घटना में इसके दो कर्मियों ने एक रेहड़ी वाले को बुरी तरह पीटा है। सिविल डिफेंस के कर्मचारियों पर विपक्षी दल वसूली का आरोप लगाते रहे हैं। बीजेपी नेता कपिल मिश्रा तो पिछले दिनों इन्हें केजरीवाल के ‘वसूली भाई’ बता चुके हैं।

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार सिविल डिफेंस के लोगों की गुंडागर्दी का एक वीडियो वायरल हुआ है। इसमें सिविल डिफेंस से जुड़े दो लोग फल की रेहड़ी लगाने वाले 28 वर्षीय अंकित की बेरहमी से पिटाई करते देखे जा सकते हैं। दिल्ली पुलिस ने बताया है कि घटना शनिवार (29 मई 2021) की है। वीडियो वायरल होने के बाद पीड़ित अंकित ने रविवार (30 मई 2021) को गोकुलपुरी थाने में शिकायत दर्ज कराई।

अंकित के मुताबिक वह नार्थ-ईस्ट दिल्ली के जौहरीपुर पुल से गुजर रहा था। इसी दौरान रास्ता माँगने को लेकर हुई कहासुनी के बाद सिविल डिफेंस के कर्मियों ने उसके साथ मारपीट की। आरोपितों ने वर्दी पहन रखी थी।

रिपोर्ट के मुताबिक, पीड़ित अंकित दिल्ली के ही शिव विहार का रहने वाला है। वायरल वीडियो में देखा जा सकता है कि मारपीट के दौरान सिविल डिफेंस के स्टाफ के साथ ही दो अन्य लोग भी थे। अंकित को बुरी तरह से चप्पलों से पीटने के बाद आरोपित स्कूटी पर बैठ कर चले जाते हैं। पुलिस ने सिविल डिफेंस कर्मियों के खिलाफ धारा 323, 341 और 34 के तहत एफआईआर दर्ज कर तलाश शुरू कर दी है।

दिल्ली कॉन्ग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अनिल कुमार ने सिविल डिफेंस कर्मियों पर वसूली का आरोप लगाया है। उन्होंने कहा कि कुछ दिन पहले सिविल डिफेंस के स्टाफ नकली चालान करते गिरफ्तार किए गए थे।

गौरतलब है कि 7 अप्रैल 2021 को दिल्ली सरकार के सिविल डिफेंस स्टाफ लोगों से चालान को लेकर मारपीट करते दिखे थे। घटना दिल्ली के हौज खास की थी, जहाँ सिविल डिफेंस के लोग ग्रीन लाइट पर चालान के लिए कार के सामने कूद गए। फिर कहासुनी के बाद कार ड्राइवर को बेल्ट से पीट दिया। उस समय भाजपा नेता कपिल मिश्रा ने ट्वीट कर कहा था कि सिविल डिफेंस केजरीवाल के ‘वसूली भाई’ हैं।

‘गलचो#, गंदी नाली के कीड़े’: कॉन्ग्रेस की महिला प्रवक्ता ने लाइव डिबेट में संबित पात्रा को कहे अपशब्द, संजुक्ता बासु ने दी शाबाशी

कॉन्ग्रेस पार्टी की प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत ने एक न्यूज़ चैनल पर लाइव बहस के दौरान असभ्य भाषा का प्रयोग किया। ‘आज तक’ पर पत्रकार अंजना ओम कश्यप के शो ‘टक्कर’ में भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा के साथ उनकी बहस हो रही थी, जिस दौरान ये वाकया हुआ। इस दौरान कॉन्ग्रेस की सुप्रिया श्रीनेत ने संबित पात्रा को कहा, “तुम दो कौड़ी के गंदी नाली के कीड़े हो। नाली के कीड़े! चुप हो जा नाली के कीड़े, ये क्या बोल रहे हो तुम?”

शो की एंकरिंग कर रहीं अंजना ओम कश्यप के टोकने के बावजूद सुप्रिया श्रीनेत ने 2 बार फिर से भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता के लिए ‘नाली के कीड़े’ शब्द का प्रयोग किया। उन्होंने टूलकिट मामले पर बहस के दौरान कहा, “ये साहब (संबित पात्रा) जाँच में सहयोग नहीं करेंगे, क्योंकि इन्हें एक चैनल से दूसरे चैनल कूदना है। अगर ऐसा ही करना है तो जाँच प्रक्रिया का हिस्सा बनिए। जाइए, पुलिस के सवालों का जवाब दीजिए।”

सुप्रिया श्रीनेत ने आगे कहा, “यहाँ पर बैठ कर ‘गलचो#’ करेंगे आपलोग। यहाँ पर बैठ कर ‘गप्पा’ करेंगे।” इस पर संबित पात्रा ने कहा कि वो तो एक चैनल से दूसरे चैनल कूदते हैं, लेकिन क्या वो साँप की तरह रेंगती हैं? उन्होंने पूछा कि क्या आप साँप की तरह रेंग कर आती हैं? इस पर सुप्रिया ने कहा कि वो झूठ नहीं बोलतीं। संबित पात्रा ने कहा, “आप नागिन की तरह रेंग कर मत आया कीजिए।” इस पर दोनों में तीखी बहस हुई।

लिबरल गिरोह की पत्रकार संजुक्ता बासु ने सुप्रिया श्रीनेत के बयान का समर्थन करते हुए कहा, “‘गंदी नाली के कीड़े’ कहना बहुत सही है। सुप्रिया श्रीनेत को और शक्ति मिले। मैं उनके साथ खड़ी हूँ।” संबित पात्रा ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा, “याद रखिए, गाँधी परिवार के लिए अंत में हम सब ‘दो कौड़ी के गंदी नाली के कीड़े’ हैं, जबकि वो शाहजादे-शाहजादी हैं। अब लाइव टीवी डिबेट में यही देखना बाकी था। अब बस माँ-बहन की गालियाँ बाकी रह गई हैं।”

संजुक्ता बासु को जवाब देते हुए संबित पात्रा ने लिखा, “क्या हम छोटे शहरों के लोग ‘नाली के कीड़े’ हैं, जबकि आप इलीट लोग सत्ताधारी हैं? आप जिसे पसंद करती हो उसके साथ खड़ी होइए। मैं सामान्य लोगों के साथ खड़ा हूँ।” भाजपा नेता शलभ मणि त्रिपाठी ने भी कहा कि ‘चाटुकार कॉन्ग्रेसियों’ ने देश की जनता को हमेशा ‘गंदी नाली का कीड़ा’ माना है, जबकि राजा-रानी और शाहजादे-शाहजादी, सब इनकी ही पार्टी में हैं।

सुप्रिया श्रीनेत टाइम्स नेटवर्क के बिजनेस चैनल ‘ET Now’ में एग्जीक्यूटिव एडिटर रह चुकी हैं। इस चैनल के साथ उन्होंने एक दशक तक काम करने के बाद कॉन्ग्रेस ज्वाइन किया था। इससे पहले वो NDTV में अस्सिस्टेंट एडिटर के पद पर थीं। ‘विश्व के इतिहास’ विषय में ‘लेडी श्रीराम कॉलेज’ से मास्टर्स की डिग्री हासिल करने वाली सुप्रिया ‘इंडिया टुडे’ से भी जुड़ी रह चुकी हैं। उनके पिता हर्षवर्धन उत्तर प्रदेश के महराजगंज से 1989 और 2009 में सांसद रहे थे।

बता दें कि पिछले दिनों कॉन्ग्रेस का बताया जाने वाला टूलकिट वायरल हुआ था, जिसमें कुंभ, हिन्दू धर्म और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बदनाम करने के साथ-साथ ईद के महिमामंडन और कोरोना में लाशों की राजनीति का पूरा खाका था। कॉन्ग्रेस के पत्र के बाद ट्विटर ने संबित पात्रा के ट्ववीट को ‘छेड़छाड़ किया हुआ’ कंटेंट करार दिया। दिल्ली पुलिस ने इस पर जाँच शुरू करते हुए कॉन्ग्रेस नेताओं और ट्विटर को नोटिस दिया।

रीवा का देवतालाब मंदिर: महर्षि मार्कण्डेय से जुड़ा वह शिवालय जो एक रात में बना था

ऋषि मर्कण्डु की संतान महर्षि मार्कण्डेय जन्म से ही शिवभक्त थे। उन्होंने भारत भर में कई स्थानों पर भगवान शिव के स्वरूप को स्थापित किया। रीवा जिले के देवतालाब नामक स्थान में पवित्र शिव मंदिर की स्थापना के पीछे महर्षि मार्कण्डेय का ही योगदान माना जाता है। मान्यता है कि रीवा का यह मंदिर मात्र एक रात में बन कर तैयार हुआ था।

मंदिर का इतिहास

महर्षि मार्कण्डेय भारतवर्ष में सनातन और शिव भक्ति के प्रचार-प्रसार के लिए भ्रमण किया करते थे। उनकी इसी यात्रा के मध्य उनका आगमन विंध्य के रेवा क्षेत्र में हुआ जो वर्तमान में रीवा के नाम से जाना जाता है। रीवा में देवतालाब नामक स्थान पर जब महर्षि ने विश्राम के लिए अपना डेरा जमाया तब अनायास ही उनके मन में भगवान शिव के दर्शन की अभिलाषा जाग उठी। महर्षि ठहरे शिव भक्त तो उन्होंने अपने आराध्य से कह दिया कि चाहे जिस रूप में दर्शन मिलें किन्तु दर्शन मिलने तक वे यहीं तप करते रहेंगे।

कई दिनों तक महर्षि मार्कण्डेय देवतालाब में तप करते रहे। उनके तप की तीव्रता को देखकर भगवान शिव ने विश्वकर्मा जी को आदेश दिया कि वो उस स्थान पर एक शिव मंदिर का निर्माण करें। भगवान विश्वकर्मा जी ने एक विशालकाय पत्थर से रातों रात उस स्थान पर शिव मंदिर का निर्माण कर दिया। तपस्या में लीन महर्षि मार्कण्डेय को इस पूरी घटना का किंचित मात्र भी आभास नहीं हुआ। मंदिर बन जाने के पश्चात भगवान शिव की मानस प्रेरणा से महर्षि ने अपना तप समाप्त किया। शिव मंदिर देखकर महर्षि अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्होंने वहाँ स्थित कुंड में स्नान कर भगवान शिव की आराधना की। तभी से यह मंदिर पूरे विंध्य प्रदेश में पूज्य है।

विंध्य क्षेत्र में रामेश्वरम के तुल्य है देवतालाब

पूर्वी मध्यप्रदेश में एक मान्यता है कि चार धाम की यात्रा तभी सम्पूर्ण एवं सफल मानी जाती है जब गंगोत्री का जल रामेश्वरम स्थित शिवलिंग के साथ देवतालाब स्थित शिवलिंग पर भी अर्पित किया जाए। इसी कारण तीर्थों की यात्रा पूर्ण करने के पश्चात कई लोग गंगोत्री का जल लेकर देवतालाब आते हैं और अपनी तीर्थ यात्रा को सफल बनाते हैं। इस क्षेत्र में उपस्थित कई पवित्र जल कुंडों के कारण इस क्षेत्र का नाम देवतालाब हुआ। 

मंदिर के विषय में एक और मान्यता है कि यहाँ मुख्य मंदिर के नीचे जमीन के अंदर एक और मंदिर है जहाँ चमत्कारिक मणि मौजूद है। कई दिनों तक मंदिर के नीचे से लगातार साँप बाहर निकलते रहे। श्रद्धालुओं को समस्या होने पर अंततः जमीन के नीचे स्थित इस मंदिर के दरवाजे को हमेशा के लिए बंद करा दिया गया।

कैसे पहुँचे?

सबसे नजदीकी हवाई अड्डा प्रयागराज में है। रीवा की प्रयागराज से दूरी लगभग 125 किमी है। इसके अलावा रीवा, वाराणसी और जबलपुर से भी समान दूरी पर है जहाँ हवाईअड्डे हैं। इन दोनों शहरों की रीवा से दूरी लगभग 250 किमी है। दिल्ली, राजकोट, इंदौर, भोपाल और नागपुर जैसे शहरों से रीवा सीधे रेलमार्ग से जुड़ा हुआ है। देवतालाब मंदिर, रीवा रेलवे स्टेशन से मिर्जापुर मार्ग पर लगभग 60 किमी की दूरी पर स्थित है।

सड़क मार्ग से भी यहाँ पहुँचने में किसी प्रकार की कोई कठिनाई नहीं है। वाराणसी से मिर्जापुर होते हुए जबलपुर जाने वाले यात्रियों के लिए देवतालाब स्थित भगवान शिव के दर्शन सुलभ हो सकते हैं, क्योंकि यह मंदिर मुख्यमार्ग में ही स्थित है।

नूरपुर में बारात का विवाद ‘मकान बिकाऊ है’ तक पहुँचा, यूपी पुलिस ने डर से पलायन के दावों को नकारा

उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ जिले में है नूरपुर गाँव। टप्पल थाना क्षेत्र के अंतर्गत आने वाला यह गाँव मुस्लिम बहुल है। एक रिपोर्ट के मुताबिक गाँव में लगभग 800 मुस्लिम परिवार रहते हैं। हिन्दुओं के 125 परिवार हैं, जिनमें अधिकतर आबादी जाटव समाज (अनुसूचित जाति) की है।

यह​ गाँव दलितों के कुछ घरों पर ‘मकान बिकाऊ है’ लिखे जाने के बाद चर्चा में है। हालाँकि अलीगढ़ पुलिस ने अपने आधिकारिक ट्विटर अकाउंट से खैर के क्षेत्राधिकारी की बाइट ट्वीट की है। इसमें बताया गया है कि पुलिस ने गाँव का दौरा किया है और अब इस तरह की स्थिति नहीं है।

इस पहले पत्रकार केशव मालान ने इस गाँव से एक वीडियो रिकॉर्ड किया था। इसमें उन्होंने बताया था कि नूरपुर में कई ऐसे हिंदुओं के घर हैं जिन पर ‘मकान बिकाऊ है’ लिखा हुआ है। उनके मुताबिक हिंदुओं ने यह सब मजबूरी में लिखा है, क्योंकि मुस्लिम गाँव में उनकी बहन-बेटियों पर भद्दे कमेंट किए जाते हैं। हिंदुओं की बेटियों की बारात को चढ़ने नहीं दिया जाता है।

दरअसल यह पूरा विवाद एक बारात को लेकर ही है। इस संबंध में गाँव के ओमप्रकाश ने पुलिस में तहरीर भी दी है। इसमें उन्होंने कहा है कि 26 मई को उनकी बेटी की बारात निकल रही थी। मुस्लिम समुदाय के कुछ लोगों ने बारात पर पथराव और तोड़फोड़ की। उन्होंने कहा है कि गाँव के ही वकील पुत्र अल्लाराजी के भड़कावे में आकार कलुआ, सरफू, सोहेल और फारुख समेत कुछ लोगों ने गाली दी और बारात को निकलने से मना किया। पथराव किया जिससे गाड़ी के शीशे क्षतिग्रस्त हो गए और कई लोगों को चोटें भी आई।

दूसरे पक्ष की तरफ से भी पुलिस में शिकायत की गई है। इसमें वकील ने ​ओमप्रकाश, बाबूलाल और समाज के अन्य लोगों पर मस्जिद में हो रही नमाज में बाधा पहुँचाने की कोशिश का आरोप लगाया है। उसने कहा है कि हिन्दू समुदाय के लोगों ने मस्जिद के पास तेज आवाज में डीजे और ढोल-नगाड़े बजाकर नमाज को बाधित करने की कोशिश की और मस्जिद के चबूतरे पर चढ़कर हंगामा किया। उसने भी गाली-गलौज और मारपीट का आरोप लगाया है।

सोशल मीडिया में वीडियो सामने आने पर अलीगढ़ पुलिस ने बताया है कि थाना प्रभारी को कड़ी कार्रवाई के लिए सूचित कर दिया गया है।

इस संबंध में टप्पल थाना के प्रभारी प्रवीण मान ने ऑपइंडिया से बातचीत में मुस्लिमों के डर से हिंदुओं के गाँव से पलायन करने की बात से इनकार किया है। स्थानीय विधायक अनूप प्रधान ने ऑपइंडिया को बताया कि गाँव में हिन्दू और मुस्लिमों के बीच बारात को लेकर विवाद हुआ था, लेकिन यह एक आपसी झगड़ा था। खैर के क्षेत्राधिकारी ने भी अपने बयान में कहा है कि 26 मई को हुई घटना के संदर्भ में कड़ी कार्रवाई करने के निर्देश दिए गए हैं। 

‘IMA राजनीतिक संस्था, इसके कई डॉ. असभ्य, जो आयुर्वेद का सम्मान नहीं करते, केस तो मुझे करना चाहिए’: बाबा रामदेव

कोरोना संकट के बीच पिछले कुछ दिनों से बाबा रामदेव और इंडियन मेडिकल एसोसिशन (IMA) के बीच जबरदस्त जंग छिड़ी हुई है। हाल ही में योग गुरु का एक वीडियो सामने आया था। इसमें उन्होंने कहा था कि एलोपैथिक दवाइयों के कारण लाखों लोगों की मौत हो गई है। न्यूज 18 इंडिया के साथ रविवार (30 मई 2021) को एक्सक्लूसिव इंटरव्यू में बाबा रामदेव ने इस मुद्दे पर बड़ी ही बेबाकी से अपना पक्ष रखा।

रामदेव ने कहा, ”मैं अपने बयान पर माफी माँग चुका हूँ और मैंने एलोपैथी पर दिया बयान वापस भी ले लिया है। मैं सभी स्वास्थ्यकर्मियों का सम्मान करता हूँ। उनको नमन करता हूँ। एक लाइन मेरा बयान निकाल दिया न इससे दिक्कत हो गई। मैंने कोई ऑफिशियल बयान नहीं दिया था। कार्यकर्ताओं के बीच में बैठकर ऐसे ही बोल रहा था, तभी किसी ने इसे फेसबुक पर लाइव कर दिया। मेरी ऐसी कोई मंशा नहीं थी।” उन्होंने कहा कि एलोपैथी से घृणा का कोई सवाल नहीं है। मेरे मन में किसी के लिए दुराग्रह नहीं है और मैं मानता हूँ कि एलोपैथी ने करोड़ों लोगों की जान बचाईं, लेकिन एलोपैथी में कई रोगों की दवाई नहीं है।

उन्होंने IMA पर पलटवार करते हुए कहा कि 90 प्रतिशत लोग योग और प्राणायाम से ठीक हुए हैं। कई बीमारियों का इलाज आयुर्वेद से संभव है, लेकिन हमेशा ही एलोपैथी के सामने आयुर्वेद को नीचा दिखाया जाता है। योग गुरु ने कहा, ”इस संस्था ने मुझ पर मानहानि का मुकदमा किया, लेकिन मुकदमा तो मुझे करना चाहिए क्योंकि आईएमए के डॉक्टर असभ्यता से बात करते हैं।” उन्होंने कहा कि मैं 90 प्रतिशत डॉक्टरों का सम्मान करता हूँ, लेकिन कुछ डॉक्टरों ने लूट मचा रखी है। हालाँकि, मैं इनके जैसा नहीं करूँगा, क्योंकि मेरे मन में किसी के लिए हीन भावना नहीं है।

रामदेव ने आगे कहा, ”मैं ‘पुरुषार्थ’ जो करता हूँ, उससे ‘अर्थ’ आता है, लेकिन वो सारा ‘अर्थ’ ‘परमार्थ’ के लिए है। रामदेव ने कहा कि मैं अभिमान में नहीं जीता हूँ, लेकिन स्वाभिमान जरूरी है।” उन्होंने कहा कि 98 प्रतिशत की बीमारियों का इलाज योग से संभव है। इसे हम अपनी जीवनशैली और बेहतर खान-पान से ठी​क कर सकते हैं। इसमें आपत्ति क्या है।

उन्होंने कहा कि मैंने उनसे (IMA) 25 सवाल पूछे थे, लेकिन अभी त​क एक का भी उत्तर नहीं आया है। आने वाले 25 से 50 सालों तक भी शायद एलोपैथ इसका उत्तर ना दे पाए, क्योंकि इनके पास बीमारियों का कंट्रोल तो है, लेकिन योग और आयुर्वेद की तरह एलोपैथ सिक्योर नहीं है। ऐसे में आपस में सहयोग करके आगे बढ़ना चाहिए। आयुर्वेद को हमेशा नीचा क्यों दिखाया जाता है? एक बार फिर कोरोना महामारी के इलाज में लोगों को दी जा रही दवाओं पर सवाल उठाते हुए रामदेव ने कहा, ”क्या किसी भी कोरोना की दवा का ट्रायल हुआ है? मैं ऐसा इसलिए पूछ रहा हूँ, क्योंकि आयुर्वेदिक दवा कोरोनिल का साइंटिफिक ट्रायल हुआ है।”

बाबा ने कहा कि विश्व में आयुर्वेद में जितने रिसर्च हुए हैं, उसमें 10 फीसदी योगदान पतंजलि का है। मैं ऐसे ही कोई बात नहीं बोलता हूँ। ये आयुर्वेद का सम्मान नहीं करते हैं, लेकिन मैं एलोपैथ का सम्मान करता हूँ। उन्होंने इशारों-इशारों में कहा कि इसके पीछे बड़ी ताकत खड़ी है। ड्रग्स माफिया का भी इसके पीछे हाथ है।

मैंने लाखों लोगों का बीपी, शुगर, थॉयराइड जैसे कई बीमारियों को ठीक किया है। मैं एक सप्ताह से एक महीने के भीतर बड़ी से बड़ी बीमारी को चुनौतीपूर्वक ठीक करता हूँ। मैं डॉक्टरों से आह्वान करता हूँ कि आईएमए के साथ जो भी मेडिकल प्रोफेशन से जुड़े लोग हैं वो मेरे पास आ जाएँ। जिनको भी बीपी, शुगर, थॉयराइड या और कोई बीमारी है मैं उन्हें 7, 10 से 15 दिन में ठीक करके भेज दूँगा। उनसे कोई चार्ज भी नहीं लूँगा।

उन्होंने कहा कि आईएमए के अध्यक्ष और महामंत्री बर्खास्त हों। आईएमए कोई कानूनी संस्था नहीं है और ना ही आईएमए के पास कोई रिसर्च सेंटर है।

बता दें कि रामदेव और इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (IMA) के बीच विवाद अभी थमा भी नहीं है। आवासीय डॉक्टरों के संगठन ने भी बाबा रामदेव के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। फेडरेशन ऑफ रेसीडेंट डॉक्टर एसोसिएशन (FORDA) ने एलोपैथी और आधुनिक चिकित्सा के विषय में बाबा रामदेव द्वारा दिए गए वक्तव्य के खिलाफ 1 जून को राष्ट्रव्यापी ब्लैक डे प्रोटेस्ट करने का निर्णय लिया है।