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व्यंग्य: गेहूँ काटते किसान को फोटो एडिट कर दिखाया बैरिकेड पर, शर्म करो गोदी मीडिया!

गणतंत्र दिवस के मौके पर दिल्ली की सड़कों पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे किसानों के खिलाफ जो साजिश गोदी मीडिया ने रची है, उससे गोदी मीडिया ने अपने नाम को चरितार्थ कर लिया। बाकी कसर खेत में धान और गेहूँ काट रहे किसानों की तस्वीरों को फोटोशॉप के जरिए दंगा वाली जगहों पर लगा देने वाले आईटी सेल ने पूरी कर डाली।

हर 15 अगस्त और 26 जनवरी पर ‘क्या हम वास्तव में आजाद हैं?’ वाला निबंध लिखने वाले लिबरल फेसबुक स्तम्भकार किसानों के लिए नारे लिखते रह गए और गोदी मीडिया किसानों को दंगाई साबित करती रही। ऐसे में, एक NDTV ही था, जो सच्चाई को सामने रखकर तूफानों के बीच अपनी निजी सच्चाई पर अडिग रहा।

ऐसे ही एक ‘अन्नदाता’, जो अपने खेतों में गेहूँ की फसल काट रहा था, उसकी तस्वीर को बैरिकेड्स लाँघते और उजाड़ते लगा दी गई। ध्यान से देखने पर पता चलता है कि चालाकी से गोदी मीडिया ने पीले रंग के गेहूँ की फसल को पीले रंग के बैरिकेड्स में बदल दिया। लेकिन NDTV हमेशा सत्य को बाहर ले आता है।

NDTV ने स्पष्ट कर दिया कि ‘किसान’ का चरित्र एक फोटोशॉप से नहीं बदला जा सकता

ऐसी ही एक तस्वीर हमारे सामने आई है, जिसमें एक पुलिसकर्मी शरबत पिलाने और लंगर खिलाने के बाद ‘अन्नदाताओं’ को धन्यवाद दे रहा है। लेकिन गोदी मीडिया को बागों में मोहब्बत नजर नहीं आई और इसे भी यह कहकर दिखाया गया कि किसान पुलिस वालों पर अत्याचार और बर्बरता कर रहे हैं।

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थके हुए पुलिसकर्मी को किसानों ने शरबत पिलाया तो बदले में पुलिस ने उन्हें धन्यवाद कहा

अब इस किसान को ही देख लीजिए। महीनों की मेहनत के बाद फरसा लेकर अपनी फसल काटने जाता यह किसान उसी तरह खुश हो रहा है, जिस तरह अपने घोड़े को अपने अस्तबल में देखकर बाबा भारती खुश हुए थे। क्या इस किसान की गलती ये है कि वो भारत का पेट भरने के लिए अपनी फसल काटने निकला था और गोदी मीडिया की साजिश का शिकार हो गया? क्या अब अन्नदाता को आतंकी साबित किया जाना ही राष्ट्रवाद कहलाएगा?

एक पुलिसकर्मी को किसानों ने दिल्ली में जबरन बिठाकर उन पर फूल भी बरसाए लेकिन मीडिया को इसमें भी दंगा नजर आया।

अब इसी तस्वीर को अगर देखा जाए तो ये किसान किसी धार्मिक आयोजन में करतब कर रहे थे लेकिन गोदी मीडिया ने उनके पवित्र करतब को सड़क पर एडिट कर के दिखाया और पंजाब में चल रहे नुक्कड़ नाटक को दिल्ली पुलिस के बीच ले आए। जो दृश्य वस्तुतः मनोरंजन के लिए था, उसे चालाकी से हिंसा का बना दिया गया।

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ये किसान सिर्फ अपनी कला ही नहीं दिखा रहे थे, बल्कि पुलिस वालों को गुलदस्ता भी भेंट कर रहे थे –

ट्रैक्टर पर बैठकर अपनी मस्ती में अपने खेत जोत रहे एक किसान को तो बैरिकेड्स तोड़कर चढ़ाई करते हुए इस तरह से दिखाया गया, मानो औरंगजेब अपने हाथी पर बैठकर दिल्ली पर चढ़ाई कर रहा हो। डिजिटल इंडिया प्रोग्राम के तहत क्या यही होना था कि एक ट्रैक्टर से खेत जोत रहे अन्नदाता को फोटोशॉप से औरंगजेब साबित कर दिया जाए?

पूँजीवादी गोदी मीडिया एक घुड़सवार अन्नदाता से सिर्फ इस वजह से नाराज है क्योंकि वह घोड़े पर बैठकर अप्निफस्ल की रेकी कर रहा था। लेकिन सामंतशाही की यह हद है कि उसे भी दंगाई साबित किया जा रहा है। क्या यह साबित करने के लिए काफी नहीं है कि हम आज भी ब्रिटिश शासन जैसे ही किसी दौर में जी रहे हैं, जहाँ किसान घुड़सवारी नहीं कर सकता?

अपनी लाठी से पुलिसकर्मियों की पीठ पर मालिश करते हुए अन्नदाताओं को आप कैसे नजरअंदाज कर सकते हैं? लेकिन यहाँ भी पुलिस की पीठ की मालिश करते किसान को दंगाई बता जा रहा है।

इसा तस्वीर में किसान महिला पुलिस को बुला कर अपना ट्रैक्टर दिखा रहे थे, लेकिन हाथ में डंडा था तो बेचारों को गोदी मीडिया द्वारा गलत तरीके से दिखाया गया। अब इस देश में हाथ में कलम रखने वाले पत्रकार और हाथ में डंडा रखने वाले किसान को आतंकवादी घोषित किया जा रहा है।

प्रदर्शनकारी किसानों ने महिला पुलिस को डंडों से पीटा, देखें दिल दहला देने  वाला वीडियो Protesting farmers beat women police officer with sticks video  goes viral - News Nation

मुंबई कर्नाटक का हिस्सा, महाराष्ट्र से काट कर केंद्र शासित प्रदेश घोषित किया जाए: गरमाई मराठी-कन्नड़ राजनीति

हाल ही में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने कर्नाटक में मराठी भाषी क्षेत्रों के महाराष्ट्र में विलय की बात कह पुरानी राजनीति को नए ढंग से पेश किया। इसके बाद कर्नाटक और महाराष्ट्र सरकार के बीच सीमा विवाद पर बयानबाजी बढ़ती है।

सीएम उद्धव ठाकरे की बयानबाजी के बाद अब कर्नाटक की ओर से जवाब आया है। कर्नाटक के डिप्टी सीएम लक्ष्मण सावदी ने इसका जवाब दिया है। उनका कहना है कि कर्नाटक के लोग चाहते हैं कि मुंबई को कर्नाटक में शामिल कर लिया जाए। 

कर्नाटक के डिप्टी सीएम लक्ष्मण सावदी ने मीडियाकर्मियों से बात करते हुए कहा कि महाराष्ट्र की राजधानी मुंबई को केंद्र शासित प्रदेश घोषित कर देना चाहिए। मुंबई कर्नाटक का हिस्सा है। कर्नाटक के लोगों का मानना है कि मुंबई लंबे समय तक कर्नाटक में रही है, इसलिए मुंबई पर उनका अधिकार है।

डिप्टी सीएम लक्ष्मण सावदी ने उद्धव ठाकरे के बयान का जवाब देते हुए कहा, “हमारी माँग है कि मुंबई को कर्नाटक में शामिल किया जाए। कर्नाटक में शामिल किए जाने तक मुंबई को केंद्र शासित प्रदेश घोषित किया जाना चाहिए।” 

दरअसल हाल ही में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने कर्नाटक में मराठी भाषी क्षेत्रों के विलय के विरोध जैसे अपने पुराने एजेंडे को पुनर्जीवित करने के प्रयासों को हवा दी थी। शिवसेना बेलगाम क्षेत्र को कर्नाटक में शामिल करने के खिलाफ रही है और इसके लिए उसने मराठी को आधार बनाया है।

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने बुधवार (जनवरी 27, 2021) को कहा था कि जब तक सर्वोच्च न्यायालय इस मुद्दे पर अपना अंतिम फैसला नहीं दे देता, तब तक कर्नाटक की राज्य की सीमा पर मराठी भाषी लोगों के वर्चस्व वाले क्षेत्रों को केंद्र शासित प्रदेश घोषित किया जाना चाहिए।

दोनों राज्यों के बीच सीमा विवाद पर एक पुस्तक के लोकार्पण पर बोलते हुए, उद्धव ठाकरे ने कहा था कि हम सभी को कर्नाटक सरकार के अन्याय और अत्याचार का विरोध करने के लिए एक मंच पर आना चाहिए। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री के मुताबिक़ अगर मराठी बोलने वाले लोग कर्नाटक सरकार के खिलाफ आवाज उठाते हैं तो उनके खिलाफ झूठे केस दायर किए जाते हैं, जिसके खिलाफ हमें एकजुट होने की जरूरत है।

उल्लेखनीय है कि बेलगाम क्षेत्र कर्नाटक और महाराष्ट्र की सीमा पर स्थित है, जहाँ मराठी भाषी बहुसंख्यक रहते हैं। महाराष्ट्र कुछ क्षेत्रों पर अपना दावा करता है, जिनमें बेलगाम, करवार और निप्पनी शामिल हैं और ये कर्नाटक का हिस्सा हैं, इन क्षेत्रों में अधिकांश आबादी मराठी भाषी है। दोनों राज्यों के बीच विवाद का मामला कई वर्षों से उच्चतम न्यायालय के समक्ष लंबित है।

इस पर ठाकरे ने कहा, “जब सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई चल रही है, तो कर्नाटक सरकार बेलगाम का नाम बदलकर उसे दूसरी राजधानी घोषित करती है, एक विधानमंडल भवन का निर्माण करती है और वहाँ एक विधायिका सत्र आयोजित करती है। क्या यह अदालत की अवमानना ​​नहीं है?”

श्रीराम मंदिर निर्माण के लिए योगी आदित्यनाथ ने गोरखनाथ मंदिर की ओर से दान किए ₹1 करोड़, 1 लाख

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ (Yogi Adityanath) ने अपने गोरखपुर दौरे के दौरान गोरखनाथ मंदिर (Gorakhnath Temple) की ओर से श्रीराम मंदिर निर्माण के लिए 1 करोड़, 1 लाख रुपए अयोध्या श्रीराम जन्मभूमि निर्माण निधि समर्पण के रूप में दान किए।

बुधवार (जनवरी 27, 2021) सुबह मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने गुरु गोरखनाथ के दर्शन किए और गोरखनाथ मंदिर में श्रीराम जन्मभूमि निधि समर्पण अभियान के सम्बन्ध में उद्योगपतियों के साथ बैठक भी की। इसका उद्देश्य अयोध्या में राम मंदिर के चल रहे निर्माण के लिए धन जुटाना था।

विश्व हिंदू परिषद के केंद्रीय उपाध्यक्ष व श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र न्यास के महामंत्री चंपत राय ने अपने ट्विटर अकाउंट से इसकी जानकारी देते हुए लिखा, “आज गोरखपुर में गोरखनाथ मंदिर का दर्शन किया। इस क्रम में गोरखनाथ मन्दिर के सभागार में माननीय मुख्यमंत्री श्री योगी आदित्यनाथ जी के साथ गोरखपुर महानगर के प्रमुख नागरिकों ने निधि समर्पित की। माननीय मुख्यमंत्री जी ने गोरक्षपीठ की ओर से 1 करोड़ रुपए का समर्पण किया।”

उल्लेखनीय है कि अयोध्या में श्रीराम मंदिर निर्माण कार्य जारी है और इसके लिए श्रीराम जन्मभूमि तीर्थक्षेत्र ट्रस्ट द्वारा देश भर से चंदा इकट्ठा किया जा रहा है। गोरखनाथ मंदिर ट्रस्ट के प्रवक्ता ने कहा कि गोरखपुर मंदिर ट्रस्ट ने 50 लाख रूपए और गोरखनाथ मंदिर द्वारा 51 लाख का दान देवीपाटन में दिया गया है।

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा है कि राज्य सरकार ने देश में एक प्रमुख पर्यटन केंद्र के रूप में अयोध्या शहर के विस्तार और विकास के लिए एक योजना तैयार की है। उन्होंने मंदिर के चल रहे निर्माण के लिए दान देने का भी आह्वान किया।

इस अवसर पर सीएम आदित्यनाथ ने कहा कि गोरखनाथ मंदिर का राम मंदिर आंदोलन से बहुत पुराना नाता है। मंदिर के पूर्व प्रमुख, महंत दिग्विजय नाथ और महंत अवैद्यनाथ ने आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई थी। महंत अवैद्यनाथ राम जन्मभूमि संघर्ष समिति के अध्यक्ष थे और उनके नेतृत्व में मंदिर आंदोलन एक जन आंदोलन में बदल गया।

इस मौके पर शहर के 40 से अधिक व्यापारियों ने श्रीराम जन्मभूमि तीर्थक्षेत्र के महासचिव और विश्व हिंदू परिषद के उपाध्यक्ष चंपत राय को दान चेक सौंपे। चंपत राय ने भी श्रीराम मंदिर के निर्माण के लिए लोगों से दान करने का निवेदन किया। विहिप ने अयोध्या में मंदिर के लिए धन जुटाने के लिए एक राष्ट्रव्यापी अभियान शुरू किया है। राय ने कहा कि मंदिर का निर्माण 36 महीने में पूरा हो जाएगा।

जिस राम मंदिर झाँकी को किसान दंगाइयों ने तोड़ डाला, उसे प्रथम पुरस्कार: 17 राज्यों ने लिया था हिस्सा

26 जनवरी को राजपथ पर झाँकी निकलती है। इस साल भी निकली। कई मायनों में झाँकियों की यह परेड अपने आप में पहली थी। पहली बार राजपथ पर भगवान श्रीराम की झाँकी निकली। पहली बार भव्य राम मंदिर के मॉडल को झाँकी में दर्शाया गया। और पहली बार में ही राम मंदिर के मॉडल वाली झाँकी को पहला स्थान भी मिला।

कुल 17 राज्यों और केंद्र शाषित प्रदेशों की अलग-अलग थीम वाली झाँकियों ने 26 जनवरी को राजपथ की परेड में हिस्सा लिया था। इनमें से उत्तर प्रदेश की ओर से आए भव्य राम मंदिर के मॉडल को प्रथम पुरस्कार के लिए चुना गया है।

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह गुरुवार (28 जनवरी 2021) को राजपथ पर शामिल हुए विभिन्न राज्यों की झाँकियों को पुरस्कृत करेंगे। भव्य राम मंदिर के मॉडल थीम पर उत्तर प्रदेश की जो झाँकी थी, उसमें सबसे आगे महर्षि वाल्मिकी को रामायण की रचना करते दिखाया गया था। उनके पीछे राम मंदिर का मॉडल था।

राम मंदिर झाँकी का सम्मान

गणतंत्र दिवस परेड के दौरान जब भव्‍य राम मंदिर वाली झाँकी राजपथ से गुजरी तो मंत्रियों सहित वहाँ मौजूद सभी लोग सम्मान में खड़े हो गए थे। तालियाँ बजा रहे थे, इसका स्‍वागत श्रद्धा से कर रहे थे। इस पूरे थीम में रामायण और दीपोत्‍सव की झलक थी।

राम मंदिर झाँकी का अपमान

गणतंत्र दिवस के मौके पर ‘किसान’ दंगाइयों ने तिरंगा के अपमान के साथ ही राम मंदिर और केदारनाथ मंदिर को निशाना बनाते हुए राम मंदिर की झाँकी के कुछ हिस्सों को तोड़ दिया। दंगाइयों ने अयोध्या श्रीराम मंदिर की झाँकी के लिए बनाए गए राम मंदिर के गुम्बद को निशाना बनाकर उसे तोड़ डाला। दंगाइयों ने सुरक्षाकर्मियों के सामने ही केदारनाथ मंदिर की झाँकी को निशाना बनाया और राम मंदिर की प्रतिमा के ऊपर के गुम्बद को तोड़ दिया।

UP पुलिस ने शांतिपूर्ण तरीके से हटाया ‘किसान’ प्रदर्शनकारियों को, लोग कह रहे – बिजली काट मार-मार कर भगाया

गणतंत्र दिवस के मौके पर दंगाई किसानों द्वारा ट्रैक्टर परेड के नाम पर लाल किला सहित दिल्ली के विभिन्न स्थानों पर हुई हिंसा के बाद उत्तर प्रदेश पुलिस ने बड़ी कार्रवाई की है। उत्तर प्रदेश के बागपत में बुधवार (जनवरी 27, 2021) रात ही प्रशासन ने विरोध कर रहे किसान प्रदर्शकारियों को विरोध स्थल से हटाते हुए धरनास्थल को शांतिपूर्ण तरीके से खाली करवा दिया है।

बागपत के अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट अमित कुमार सिंह ने कहा कि नेशनल हाईवे अथॉरिटी ने पुलिस को पत्र लिखा था कि प्रदर्शन के कारण उनका निर्माण कार्य बाधित हो रहा था, इसीलिए यह एक्शन लिया गया।

ये किसान दिल्ली-सहारनपुर हाईवे पर बीते साल 19 दिसंबर से धरना दे रहे थे। बागपत पुलिस ने अपने ट्विटर अकाउंट से जानकारी देते हुए एक बयान में कहा कि पुलिस को पत्र लिखकर निवेदन किया गया था। जब पुलिस वहाँ पर पहुँची तो वहाँ कुछ वृद्ध लोग थे और एक व्यक्ति की मानसिक हालत ठीक नहीं थी, जिन्हें उनके घर पहुँचा दिया गया और किसी भी तरह का कोई बल प्रयोग नहीं किया गया।

अंधेर में हुई कुटाई- लोगों का दावा

हालाँकि, ट्विटर पर कुछ लोगों का यह भी दावा है कि प्रशासन द्वारा बागपत में धरने पर बैठे किसानों को आधी रात खेदड़ दिया गया। लोगों का दावा है कि पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर लाठी चार्ज किया और उनके टेंट उखाड़ फेंके। ऐसे ही कुछ वीडियो भी सोशल मीडिया पर शेयर किए जा रहे हैं। बताया जा रहा है कि इस दौरान स्ट्रीट लाइट भी बंद थीं।

दीप सिद्धू और गैंगस्टर लक्खा पर FIR दर्ज, नाम उछलते ही गायब हुए पंजाबी अभिनेता सिद्धू

26 जनवरी को दिल्ली के लाल किले में हुई हिंसा के संबंध में पंजाबी अभिनेता दीप सिद्धू (Deep Sidhu) और गैंगस्टर लक्खा सिधाना (Lakha Sidhana) के खिलाफ केस दर्ज कर लिया है। गणतंत्र दिवस के दिन हुए उपद्रव में दोनों की भूमिका को लेकर जाँच भी जारी है।

दिल्ली पुलिस ने बुधवार (जनवरी 27, 2021) शाम प्रेस वार्ता में बताया कि इस मामले में पुलिस ने अब तक 25 से ज्यादा केस दर्ज किए और अब तक 19 आरोपितों को गिरफ्तार कर लिया गया, जबकि 50 लोग हिरासत में हैं।

समाचार पत्र ‘टाइम्स ऑफ़ इंडिया’ की रिपोर्ट के मुताबिक, लाल किले में हुई हिंसा और उपद्रव में नाम उछलने के बाद पंजाबी कलाकार और कार्यकर्ता दीप सिद्धू गायब हो गए हैं। दिल्ली में हुई ट्रैक्टर परेड की घटना के 2 दिन पहले ही दीप सिद्धू और गैंगस्टर लक्खा सिधाना दिल्ली पहुँचे थे और बताया जा रहा है कि सिंघु बॉर्डर पर रेड लाइट पर बैठे किसानों के बीच लक्खा ने भड़काऊ भाषण भी दिया था।

मालवा यूथ फेडरेशन के प्रमुख लक्खा सिधाना, जो गाँवों में सामाजिक कल्याण के काम करने का दावा भी करता है, पर पंजाब में 25 से अधिक आपराधिक मामले दर्ज हैं। इनमें हत्या, लूट, अपहरण, फिरौती जैसे अपराध शामिल हैं। यही नहीं, लक्खा पर आर्म्स एक्ट के मामले भी दर्ज हो चुके हैं और इसके लिए वो कई साल की सजा भी काट चुका है। पंजाब के बठिंडा के सिधाना गाँव के मूल निवासी लखबीर सिंह सिधाना उर्फ ​​लक्खा सिधाना ने सरकार और पुलिस पर ही किसानों के आंदोलन के खिलाफ साजिश रचने का आरोप लगाते हुए दावा किया कि उन्होंने हमेशा शांति का आह्वान किया।

किसान नेता और कॉन्ग्रेस कर रहे हैं दीप सिद्धू से किनारा

दंगाई किसानों द्वारा गणतंत्र दिवस के मौके पर दिल्ली स्थित लाल क़िले पर किए गए उत्पात के बीच दीप सिद्धू (Deep Siddhu) का नाम चर्चा में बना हुआ है। दरअसल, मंगलवार (जनवरी 26, 2021) के दिन जब लाल किले पर दंगाइयों ने काले-हरे-पीले झंडों को फ़हराया, तब दीप सिद्धू वहाँ मौजूद थे और वीडियो बना रहे थे।

इससे पहले, सिद्धू के किसान आंदोलन के शुरू होने के दौरान सोशल मीडिया पर काफी सक्रिय रहे। दीप सिद्धू को तब लिबरल वर्ग द्वारा भी बड़े स्तर पर सराहा जा रहा था और उन्हें एक नायक की तरह पेश किया जाता रहा। लेकिन गणतंत्र दिवस के मौके पर लाल किले में जो कुछ हुआ, उसके बाद से कॉन्ग्रेस दीप सिद्धू से किनारा करने की कोशिश कर रही है।

वास्तव में, किसान नेताओं से लेकर सोशल मीडिया का लिबरल गिरोह भी इस घटना के लिए अब दीप सिद्धू पर निशाना साधते हुए इस घटना के लिए सिर्फ उन्हें जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। यह सब इसलिए क्योंकि 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान भाजपा की ओर से सनी देओल को लोकसभा हल्का गुरदासपुर से चुनाव मैदान में उतारा गया और तब सनी देओल के चुनाव प्रचार में अहम भूमिका निभाने वाले लोगों में से दीप सिद्धू भी एक थे।

यही वजह है कि दीप सिद्धू का नाम अब विरोधियों द्वारा लगातार सनी देओल के साथ जोड़ा जा रहा है। जब नए कृषि कानूनों का विरोध जोर पकड़ ही रहा था, तब दीप सिद्धू भी इसका हिस्सा बन गए। लेकिन भाजपा नेता सनी देओल ने 6 दिसंबर को ही यह घोषणा कर दी थी कि उनका या उनके परिवार का अब दीप सिद्धू के साथ कोई संबंध नहीं है।

किसान नहीं बल्कि पुलिस हुई थी हिंसक: दिग्विजय सिंह ने दिल्ली पुलिस को ही ठहराया दंगों का दोषी

26 जनवरी, गणतंत्र दिवस के मौके पर किसानों ने ट्रैक्टर परेड के दौरान दिल्ली में खूब बवाल मचाया। सबसे शर्मनाक बात ये थी कि दंगाई किसानों ने लाल किले के प्राचीर पर चढ़कर एक विशेष धार्मिक संगठन का झंडा लगा दिया गया। इस दौरान किसानों और पुलिस के बीच झड़प भी हुई। इस मामले में कॉन्ग्रेस ने भी अब मैदान में कूदते हुए इस पूरी घटना पर दिल्ली पुलिस को ही जिम्मेदार ठहरा दिया है।

कॉन्ग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने आज मीडिया से बात करते हुए कहा कि दिल्ली में किसान उग्र नहीं हुए थे, दिल्ली पुलिस उग्र हुई थी। वरिष्ठ कॉन्ग्रेस नेता ने कहा कि दिल्ली पुलिस ने तय गाजीपुर सीमा बदल दी और वहाँ बैरियर लगा दिए, जिसके परिणामस्वरूप पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़प हुई।

मुंबई आतंकवादी हमले को RSS की साजिश बताने वाले दिग्विजय सिंह ने आरोप लगाया कि पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को हटाने के लिए आँसू गैस और लाठी-डंडे चलाए। उससे विवाद बढ़ा और वही कारण बना। यानी, उनके मुताबिक, इसी वजह से तथाकथित किसान प्रदर्शनकारियों को मुगल स्मारक, लाल किले पर तिरंगें का अपमान करते हुए सिख ध्वज फैलाने पर मजबूर होना पड़ा।

गौरतलब है कि देश की राजधानी में हिंसक विरोध प्रदर्शन, राष्ट्र के खिलाफ विद्रोह का नेतृत्व और बेरहमी से घायल किए गए 300 से अधिक पुलिस कर्मियों को देखते हुए भी कॉन्ग्रेस ने अपनी नीच राजनीति नहीं छोड़ी। दिग्विजय सिंह के अनुसार, 26 जनवरी को हुआ यह दंगा दिल्ली पुलिस की वजह से हुआ, जिसने उनके अनुसार प्रदर्शनकारियों को बैरिकेड्स लगाकर उकसाया और कथित रूप से रैली मार्गों में फेरबदल किया।

हालाँकि, यह पूरी तरह सच नहीं है। दिल्ली पुलिस ने न केवल एक, बल्कि उन सभी चार सीमाओं को भी ब्लॉक कर दिया था, जहाँ प्रदर्शनकारियों ने डेरा डाला था। गणतंत्र दिवस पर हिंसा की आशंका और मध्य दिल्ली क्षेत्र में प्रदर्शनकारियों द्वारा किसी भी प्रकार के हंगामें को रोकने की वजह से दिल्ली पुलिस ने गणतंत्र परेड के समापन तक चार मार्गों को ब्लॉक कर दिया था। दिल्ली पुलिस ने पहले ही इस बात पर जोर देकर कहा था कि गणतंत्र दिवस की परेड के समापन के बाद ही नाकाबंदी खोली जाएगी।

इसके बावजूद तथाकथित किसानों ने अपनी रैली शुरू करने के लिए तय समय सीमा से पहले ही दिल्ली में प्रवेश करने में पूरी ताकत लगा दी थी। जिसके चलते किसानों ने तय समय सीमा 12 बजे से पहले पुलिस बैरियर को जबरन तोड़ना शुरू कर दिया और राष्ट्रीय राजधानी में उन मार्गों से प्रवेश किया जिनकी अनुमति दिल्ली पुलिस द्वारा नहीं दी गई थी।

दिल्ली पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़पों के कई वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुए, जिसमें देखा गया कि गणतंत्र दिवस खत्म होने से पहले ही कैसे प्रदर्शनकारी आईटीओ तक पहुँच गए थे।

वहीं कुछ वीडियो में प्रदर्शनकारी पुलिसकर्मियों के ऊपर तेजी से ट्रैक्टर चलाने की कोशिश करते हुए देखे गए। जब पुलिस ने उन्हें रोकने की कोशिश की, तो उन्होंने तलवार और डंडों से पुलिस कर्मियों पर हमला बोल दिया।

‘टाइम्स नाउ’ द्वारा साझा किए गए एक अन्य वीडियो में एक प्रदर्शनकारी को एक ऑटोमैटिक राइफल लहराते हुए देखा गया, जब पुलिस ने भीड़ को नियंत्रित करने की कोशिश की। हालाँकि वे इस पर नहीं रुके और उन्होंने पुलिसकर्मियों पर हमला जारी रखते हुए गणतंत्र दिवस के ऐतिहासिक अवसर पर राष्ट्रीय ध्वज का अनादर करते हुए कथित खालिस्तानी झंडे को फहराने के लिए लाल किला पहुँच गए।

गौर करने वाली बात है कि ट्रैक्टर रैली से 1 दिन पहले कथित तौर पर किसानों को बरगलाने और उकसाने वाली वाली कॉन्ग्रेस अब हिंसा के बाद इस पूरी घटना दोष दिल्ली पुलिस के मत्थे मढ़ने पर तुली है। जबकि खुद इस हिंसा में दिल्ली पुलिस तथाकथित किसानों के हाथों बड़े पैमाने पर शिकार हुए है।

उल्लेखनीय है कि कल जैसे ही गणतंत्र दिवस पर दंगाइयों ने राजधानी को घेर लिया, कॉन्ग्रेस पार्टी की खुशी का तो मानो ठिकाना ही न रहा हो। कॉन्ग्रेस ने इस पूरे घटनाक्रम को एक जश्न के तौर पर मनाया।

कल के दंगे को राजनीतिक रंग देते हुए कॉन्ग्रेस पार्टी के आधिकारिक हैंडल ने सोशल मीडिया पर ट्रैक्टर परेड की एक तस्वीर साझा की और कैप्शन दिया कि, “कभी भी एक गणतंत्र की शक्ति को कम मत समझो”। यह उल्लेख करना आवश्यक है कि ट्वीट दोपहर 1:45 बजे किया गया था, जब दिल्ली में भीड़ ने एक हिंसक रूप धारण कर लिया था।

बता दें कि हिंसक प्रदर्शनकारियों की भीड़ ने पुलिस पर लाठी, तलवारों से हमला किया और पुलिसकर्मियों पर पथराव किया। कुछ उपद्रवियों ने पुलिस अधिकारियों को भड़काने का भी प्रयास किया। भीड़ यहीं नहीं रुकी। इसके बाद उन्होंने लाल किले में जाकर अपना सिख ध्वज फहराया।

वहीं इस दौरान कॉन्ग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने मोदी सरकार पर भी हमला बोला क्योंकि उसे इससे चुनावी फायदा मिलने की उम्मीद है। इससे पहले सीएए विरोधी दंगों के दौरान, कॉन्ग्रेस नेताओं ने नागरिकता संशोधन अधिनियम के बारे में प्रचार प्रसार किया था और उसी के संबंध में विरोध प्रदर्शन भी किया था।

‘छात्र’ हैं, ‘महिलाएँ’ हैं, ‘अल्पसंख्यक’ हैं और अब ‘किसान’ हैं: लट्ठ नहीं बजे तो कल और भी आएँगे, हिंसा का नंगा नाच यूँ ही चलता रहेगा

दिल्ली में चल रहा ‘किसान आंदोलन’ मंगलवार (जनवरी 26, 2021) को एक हिंसक विरोध प्रदर्शन में बदल गया और इसकी परिणीति 300 से अधिक पुलिस वालों के जख्मी होने, लाल किला के अतिक्रमण और दिल्ली की सड़कों पर सरेआम अराजकता के रूप में हुई। अब तक हम सब को पता चल चुका है कि क्या हुआ, कैसे हुआ, किसने किया, क्यों किया और कहाँ किया। उनके उद्देश्य किसी से छिपे नहीं।

हम योगेंद्र यादव पर निशाना साध ही रहे हैं। दर्शन पाल, राकेश टिकैत, गुरनाम सिंह चढूनी और हन्नान मोल्लाह की करतूतों को जनता के सामने रख ही रहे हैं। लेकिन, ये सभी आज सब कुछ कर के भी मीडिया में स्वच्छंद विचर रहे हैं और खुलेआम बयान दे रहे हैं तो इसके पीछे दोषी कौन है? इन सभी को आज जब सलाखों के पीछे होना चाहिए, तब ये अराजकतावादी सड़कों पर हैं। आइए, विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के किरदारों को भी देखते हैं।

ऐसे अराजक असामाजिक तत्वों को बर्दाश्त ही क्यों कर रही है मोदी सरकार?

ये आश्चर्य की बात है कि जो चीजें आम जनता को महीनों से पता थी, उसकी सरकार को भनक नहीं लगी होगी। एक से एक तेज़ अधिकारी हैं केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस के पास। जो चीजें पूरे देश को पता थी, उसका आकलन वो क्यों नहीं कर पाए – ये समझ से परे है। जब पंजाब से किसानों का जत्था एक-एक कर हरियाणा होकर दिल्ली पहुँच रहा था, तभी उन्हें रोकना चाहिए था। हरियाणा में भी भाजपा की ही सरकार है।

पहले ही इतने उलटे-सीधे बयान दिए गए कि राज्य में मनोहर लाल खट्टर के नेतृत्व वाली सरकार के सहयोगी और जजपा के मुखिया दुष्यंत चौटाला दबाव में आ गए। उप-मुख्यमंत्री दुष्यंत ने फिर खट्टर को दबाव में डाला। इन दोनों ने दिल्ली में आलाकमान पर दबाव बनाया। अमित शाह से इनकी बैठक हुई। लेकिन, असली गलती यहीं हुई थी कि हरियाणा की दोनों सीमाओं को खुला छोड़ दिया गया। पंजाब से आकर घुसो, दिल्ली को निकल जाओ।

अगर किसी अन्य पार्टी की हरियाणा और केंद्र में सरकार होती तो वो इस आंदोलन को दिल्ली पहुँचने से पहले ही रोक सकती थी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। दिल्ली पुलिस भी केंद्र सरकार के ही अधीन है। ऐसे मामलों से निपटने का अनुभव है। शाहीन बाग़ को हमने हाल ही में झेला। जनता के बर्दाश्त का स्तर जब हदें पार हो जाता है, तब भी सरकार का सख्त नहीं होना सवाल उठाने को विवश कर देता है।

जब लोग देखते हैं कि तबलीगी जमात कोरोना वायरस का सुपर स्प्रेडर बन गया और मुस्लिमों को सरकारी दिशा-निर्देशों के खुलेआम उल्लंघन का प्रवचन देने वाले मौलाना साद इतने महीनों बाद भी खुलेआम मस्जिद में जाकर नमाज पढ़ रहा है, तो वो सोचते हैं तो क्या ये वही भाजपा है जिसे हमने वोट दिया था? खासकर ये सवाल तब और जायज हो जाता है, जब भाजपा के ही प्रवक्ता सारे न्यूज़ चैनलों पर घूम कर उसी व्यक्ति को दोषी बताते हैं लेकिन उस पर कार्रवाई नहीं होती।

ऐसे तत्वों को बर्दाश्त करे सरकार, जनता ऐसा नहीं चाहती। उनकी पोल खोलने के लिए कुछ नया क्या करना है, वो तो पहले से नंगे हैं। शरजील इमाम जब असम को देश से अलग करने की बातें करता है तभी वो नंगा हो चुका है। हम इंतजार नहीं करेंगे न कि वो सचमुच ऐसा कर के दिखाए, फिर हम दुनिया के सामने उसकी पोल खोलें और उस पर कार्रवाई करें। ये एक खतरनाक रास्ता है। इससे दंगाइयों को और बल मिलता है।

जो न्यायपालिका का सम्मान नहीं करते, वो भी खुले घूम रहे

सुप्रीम कोर्ट में अधिवक्ताओं की एक बड़ी फ़ौज खड़ी है, जो जामिया, AMU, JNU, CAA विरोधी, कृषि कानून विरोधी और अंततः मोदी सरकार विरोधी सभी गिरोहों का बचाव करने में रमी रहती है। दंगाई तो दंगाई, प्रशांत भूषण सरीखे लोग आधी रात में आतंकी के लिए सुप्रीम कोर्ट खुलवा चुके हैं। ये सड़क पर खुलेआम दंगा करते हैं, क्योंकि इन्हें लगता है न्याय की देवी की आँखों पर बँधी पट्टी के कारण इनकी करतूतें अदालत को नहीं दिखती।

सुप्रीम कोर्ट के CJI बोबडे खुद जामिया वाले मामले में कह चुके हैं कि जब तक पत्थरबाजी और हिंसा ख़त्म नहीं होती, सुनवाई नहीं होगी। किसान आंदोलन के मामले में उन्होंने केंद्र सरकार से पूछा कि वो इन कानूनों पर रोक नहीं लगाती है तो शीर्ष अदालत लगा देगा। ऐसा हुआ भी। लेकिन, कानूनों पर रोक लगने से उनका मनोबल बढ़ा जो सुप्रीम कोर्ट का सम्मान नहीं करते थे। सरकार ने तो सारी फटकार सही और हर निर्णय का सम्मान किया, लेकिन उनका क्या?

अगर सचमुच में किसान संगठनों के मन में न्यायपालिका के प्रति सम्मान होता तो भूपिंदर सिंह मान को सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित की गई कमिटी में से खुद का नाम वापस नहीं लेना पड़ता। अगर ये सुप्रीम कोर्ट की चिंता करते तो ट्रैक्टर रैली शांतिपूर्ण रखने का आश्वासन देकर इस तरह से लाल किले पर चढ़ कर खालिस्तानी झंडा नहीं फहराते और तिरंगे को फेंक कर उसे अपमानित नहीं करते। न्यायपालिका का इन्होंने मजाक बनाया है, क्योंकि इन्हें पता है कि वहाँ इन्हें बचाने वाले लोग बैठे हैं।

इन किसान नेताओं ने सर्वोच्च न्यायालय द्वारा गठित की गई कमिटी के साथ बातचीत करने से ही इनकार कर दिया। जब सरकार के साथ इनकी दर्जन भर दौर की वार्ताएँ फेल हो चुकी है, तो ये समझने वाली बात है कि किसी अन्य कमिटी से ये क्या बात करेंगे। किसान संगठनों ने आरोप लगा दिया कि कमिटी के चारों सदस्य कृषि कानूनों का समर्थन कर चुके हैं। इसीलिए, वो उनसे कोई बातचीत नहीं करेंगे।

दरअसल, राकेश टिकैत ही नहीं बल्कि सभी किसान नेता ऐसे कानून चाहते थे जिससे बिचौलियों का हस्तक्षेप कम हो और किसानों को उत्पाद बेचने के लिए ज्यादा विकल्प मिले। कई राज्यों में, यहाँ तक कि पश्चिम बंगाल में भी, ऐसे कानून पहले से बने हुए हैं। लेकिन अचानक से सब बदल गए और उसी तर्ज पर केंद्र में आया कानून खराब कैसे हो गया? सुप्रीम कोर्ट को ये बताने वाला कोई न था कि ये प्रदर्शन कृषि कानूनों को लेकर है ही नहीं, मोदी का अंध-विरोध ही इसके पीछे है।

क्या ये सचमुच एक किसान आंदोलन है?

दंगाइयों को अब ‘किसान’ कहना भी इस शब्द का अपमान है। जिस तरह से महिला कॉन्स्टेबलों के साथ बदसलूकी का वीडियो सामने आया, उससे लगता नहीं कि ये किसान हैं। एक महिला पत्रकार के साथ बदतमीजी हुई। कोने में घेर कर दिल्ली पुलिस के महिला जवान की पिटाई की गई। एक भी महिलावादी ने आवाज़ नहीं उठाई। फेमिनिस्ट्स चुप हैं। उनके गिरोह के लोग हैं, उनके लिए सब कुछ जायज है।

लाल किला में पुलिसकर्मियों को खदेड़ा गया। उन्हें दीवार फाँद-फाँद कर अपनी जान बचानी पड़ी। कई पुलिसकर्मी ICU में हैं। 300 से अधिक घायल हुए हैं। कइयों का सिर फट गया। अधिकतर के हाथ-पाँव और सिर में ही चोटें आई हैं। तलवारें लहराते हुए उन्हें खदेड़ा गया। जम्मू कश्मीर के आतंकियों जैसी हरकतें कर के ये सरकार और सुप्रीम कोर्ट के लिए किसान कैसे बन जाते हैं, ये समझ से परे है।

क्या आपने कभी किसी किसान को अपनी खेती-बाड़ी और जमीं-जत्था छोड़ कर कहीं और रहते देखा है? ये ऐसे किसान हैं जो गेहूँ के सीजन में महीनों से घर छोड़ कर बाहर हैं। पानी कौन पटा रहा इनके खेतों में? बुआई किसने की? इन्हें अपने फसलों की चिंता नहीं, कैसे किसान हैं ये। सभी किसान नेताओं ने एकमत से धमकाया था कि वो जनवरी 26 को हिंसा करेंगे। मीडिया में ऐसे बयानों का तब तक कोई महत्व नहीं, जब तक वो किसी भाजपा नेता के न हों।

पुलिस की पिटाई कर के उलटा पुलिस को ही दोष दिया जा रहा है। कोरोना के दिशानिर्देशों का उल्लंघन तो शाहीन बाग़ वालों ने भी किया था, 3 महीने से ये ‘किसान’ भी कर रहे। इनके खिलाफ ‘महामारी एक्ट’ के तहत कार्रवाई क्यों नहीं हो रही? बस एक, अगर सरकार एक ऐसा उदाहरण सेट कर दे जहाँ ऐसे करतूतों की उचित सजा मिले तो ये दोबारा निकलने से पहले सोचेंगे। इसके लिए यूपी मॉडल अपनाया जा सकता है।

लाल किला में 250 बच्चे फँसे हुए थे, उन्हें इन प्रदर्शनकारियों से बचा कर दिल्ली पुलिस ने निकाला किसी तरह। गणतंत्र दिवस के कलाकारों के साथ बदसलूकी हुई। उन्हें भी बचाया गया किसी तरह। राम मंदिर और केदारनाथ की झाँकी के लिए बने मॉडल को नुकसान पहुँचाया गया। क्या ये किसानों का कार्य है? आंदोलन के नाम पर देश के एक स्मारक पर चढ़ कर अलगाववादी झंडा फहरा दिया जाएगा? नहीं न।

‘किसानों’ से पहले ‘महिलाएँ, छात्र, बुजुर्ग’ सब दंगा कर चुके हैं

दिसंबर 2019 में जामिया वालों ने दंगा किया। बसें धू-धू कर जलीं। ये मामला भी सुप्रीम कोर्ट तक पहुँचा और इंदिरा जयसिंह जैसे वकीलों ने दंगाइयों को बचाया। अगर यही सब करना है तो कश्मीर के पत्थरबाज भी सही हैं। सरकार ने कोई कार्रवाई नहीं की, जिससे दिल्ली के शाहीन बाग़ में खुलेआम हिन्दू विरोधी प्रतीकों का इस्तेमाल हुआ, देवी-देवताओं का अपमान हुआ और महिलाओं को आगे कर-कर के ये सारा खेल चला।

जनवरी के पहले हफ्ते में वामपंथी छात्रों ने हॉस्टलों में घुस-घुस कर ABVP के छात्रों की पिटाई की, लेकिन मीडिया ने उलटा दोषियों को ही पीड़ित साबित कर दिया। इससे किसी का भी विश्वास डिग सकता है। जो घायल हुए, उनमें कई छात्राएँ भी शामिल हैं। उस मामले में भी कोई कार्रवाई नहीं हुई। अगर दोषी वामपंथी छात्रों में से एकाध को भी कॉलेज से निकाला जाता तो शायद आगे इस तरह की हरकतों से पहले वो 100 बार सोचते।

इसके बाद शाहीन बाग़ में दादियों का खेल चालू हुआ। जिन बुजुर्ग महिलाओं को पता भी नहीं था कि CAA/NRC होता क्या है, उन्हें भी मीडिया चैनलों पर एक्टिविस्ट्स के रूप में लाकर बिठाया जाने लगा। एक महिला के बच्चे की मौत हो गई क्योंकि वो उसे लेकर हर प्रदर्शन में घूम रही थी, तो इसके लिए भी सरकार को दोषी बताया गया। बिलकिस दादी को ‘Times’ मैगजीन तक ने प्रभावशाली महिलाओं में स्थान दे दिया।

जनवरी-फरवरी 2020 में पूरे दो महीने हिन्दू विरोधी दंगा के आरोपितों को सही साबित करने की कोशिश हुई। ताहिर हुसैन के पक्ष में जावेद अख्तर जैसों ने ट्वीट किया। उमर खालिद के बचाव में तो पूरा गैंग उतर आया। कॉन्ग्रेस की पार्षद रहीं इशरत जहाँ का रोल सामने आया। AAP और कॉन्ग्रेस नेताओं के इस दंगे में सामने आने के बावजूद सवाल उनसे नहीं पूछे ही गए। सफूरा जरगर और खालिद सैफी जैसे आरोपित जेल से बाहर आने में कामयाब रहे।

दिक्कत ये है कि अगर ऐसे ही चलता रहा तो कल को हर एक वर्ग को ऐसे ही भड़का कर सड़क पर लाया जाएगा और हिंसा होती रहेगी। कुछ लोग बुद्धिजीवी बन कर इस हिंसा को बढ़ावा देते रहेंगे और बच कर निकलते रहेंगे। उनके खिलाफ कार्रवाई न होने पर जनता को अपने वोट की ताकत का एहसास नहीं होगा। हिन्दू वोट भी दे, सब्सिडी भी छोड़े और सड़क पर आकर लड़ाई भी करे – इतना सब कुछ शायद संभव नहीं!

कल तक क्रांति की बातें कर रहे किसान समर्थक दीप सिद्धू के वीडियो डिलीट कर रही है कॉन्ग्रेस, जानिए वजह

दंगाई किसानों द्वारा गणतंत्र दिवस के मौके पर दिल्ली स्थित लाल क़िले पर किए गए उत्पात के बीच दीप सिद्धू (Deep Siddhu) का नाम चर्चा में बना हुआ है। दरअसल, मंगलवार (जनवरी 26, 2021) के दिन जब लाल किले पर दंगाइयों ने काले-हरे-पीले झंडों को फ़हराया, तब दीप सिद्धू वहाँ मौजूद थे और वीडियो बना रहे थे।

इससे पहले, सिद्धू के किसान आंदोलन के शुरू होने के दौरान सोशल मीडिया पर काफी सक्रिय रहे। दीप सिद्धू को तब लिबरल वर्ग द्वारा भी बड़े स्तर पर सराहा जा रहा था और उन्हें एक नायक की तरह पेश किया जाता रहा। लेकिन गणतंत्र दिवस के मौके पर लाल किले में जो कुछ हुआ, उसके बाद से कॉन्ग्रेस क्यों दीप सिद्धू से किनारा करने की कोशिश कर रही है?

वास्तव में, किसान नेताओं से लेकर सोशल मीडिया का लिबरल गिरोह भी इस घटना के लिए अब दीप सिद्धू पर निशाना साधते हुए कल की घटना के लिए सिर्फ उन्हें जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। यह सब इसलिए क्योंकि 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान भाजपा की ओर से सनी देओल को लोकसभा हल्का गुरदासपुर से चुनाव मैदान में उतारा गया और तब सनी देओल के चुनाव प्रचार में अहम भूमिका निभाने वाले लोगों में से दीप सिद्धू भी एक थे।

यही वजह है कि दीप सिद्धू का नाम अब विरोधियों द्वारा लगातार सनी देओल के साथ जोड़ा जा रहा है। जब नए कृषि कानूनों का विरोध जोर पकड़ ही रहा था, तब दीप सिद्धू भी इसका हिस्सा बन गए। लेकिन भाजपा नेता सनी देओल ने 6 दिसंबर को ही यह घोषणा कर दी थी कि उनका या उनके परिवार का अब दीप सिद्धू के साथ कोई संबंध नहीं है।

दीप सिद्धू को बलि का बकरा बना रहा है लिबरल गिरोह और कॉन्ग्रेस

एक समय किसान विरोध प्रदर्शनों को ‘क्रांति’ बताने वाले दीप सिद्धू को लिबरल गिरोह, कॉन्ग्रेस और किसान नेता भी अब अपनाने से इंकार कर रहे हैं। हंगामे की अगली सुबह से ही सोशल मीडिया दीप सिद्धू को लाल किले के उत्पात का दोषी साबित करते नजर आया। यहाँ तक भी कहा जा रहा है कि गृहमंत्री अमित शाह के इशारों पर उसने भीड़ को भड़काया।

दीप सिद्धू को इसका जिम्मेदार ठहरा रहे लोगों ने महीनों से किसानों को भड़का रहे कॉन्ग्रेसी नेताओं, योगेंद्र यादव जैसे ‘प्रदर्शनकारियों’ और सोशल मीडिया पर जहर बो रहे वैचारिक दंगाइयों को एक किनारे करते हुए इस हंगामे का सारा श्रेय दीप सिद्धू के नाम कर दिया।

इस पर अब दीप सिद्धू ने सवाल किया है कि लाल किले के पास भारी तादाद में लोग पहुँचे तो क्‍या सभी काे मैंने ही भड़काया है? दीप सिद्धू ने इस प्रकरण पर सफाई दी है और लोगों को भड़काने के आरोप को गलत बताया है। सिद्धू ने इंटरनेट मीडिया पर लाइव होकर कहा कि इस घटना के लिए उन्हें विलेन बनाना गलत है।

इस सबके बीच, कॉन्ग्रेस जो दीप सिद्धू को किसान आंदोलन का नायक साबित करने के लिए उसके किसानों के समर्थन में दिए गए बयानों को जमकर अपने आधिकारिक वेब पोर्टल्स पर जगह देती आ रही थी, अब धड़ाधड़ उन्हें डिलीट कर रही है।

ट्विटर पर अनुकर सिंह ने कॉन्ग्रेस का एक ऐसा ही वीडियो शेयर करते हुए लिखा है, “तो कॉन्ग्रेस ने अपने यूट्यूब चैनल से दीप सिद्धू का समर्थन करने वाला वीडियो हटा दिया है।”

इस ट्वीट में अंकुर सिंह ने हटाए गए वीडियो का लिंक भी शेयर किया है, लेकिन यह वीडियो अब कॉन्ग्रेस ने डिलीट कर दिया है। कुछ ट्विटर यूजर्स अब दीप सिद्धू के रोल को लेकर लिबरल्स पर व्यंग्य भी करते नजर आ रहे हैं –

इस वीडियो में दीप सिद्धू किसानों के समर्थन में कह रहे थे, “ये इंकलाब है सर (Ye inquilab hai sir), ये क्रांति है।” दीप सिद्धू का यह वीडियो नवंबर, 2020 का है। तब सिद्धू के सर पर क्रांति सवार थी, लेकिन अब उनका चेहरा लाल किले पर हुए उपद्रव में सबके सामने है तो उसके क्रांतिकारी साथी उससे किनारा कर रहे हैं।

अब सवाल ये है कि क्या एक अकेले लड़के में इतनी पावर है कि वो दस हज़ार से ज़्यादा लोग ले कर लाल किले पर चढ़ जाए? मतलब, हम ही मूर्ख बैठे हैं यहाँ? पुलिस को भी दौड़ा कर दीप सिद्धु ही मार रहा था? ट्रैक्टर से डीटीसी बस को हिलाने वाला भी वही था? क्रेन पर चढ़ने वाला भी वही था? ट्रैक्टर से स्टंट मारने वाला भी वही था? पुलिस पर पत्थरबाजी करने वाला भी वही था? पुलिस पर डंडा और तलवार चलाने वाला भी दीप सिद्धू ही था?

ट्रैक्टर रैली में हिंसा के बाद ट्विटर ने किया 550 अकाउंट्स सस्पेंड, रखी जा रही है सबपर पैनी नजर

राजधानी दिल्ली में गणतंत्र दिवस के मौके पर किसानों द्वारा की गई ट्रैक्टर रैली के दौरान हुई हिंसा के सिलसिले ट्विटर ने बुधवार को 550 अकाउंट्स को सस्पेंड कर दिया है। ट्विटर के प्रवक्ता ने कहा कि हिंसा, दुर्व्यवहार और धमकियों के लिए उसके प्लेटफॉर्म पर कोई जगह नहीं है।

ट्विटर के प्रवक्ता ने कहा है कि सोशल मीडिया पर हिंसा की तस्वीरें शेयर करने वाले और शांति भंग करने वाले मैसेज शेयर करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जा रही है। ऐसे मैसेजों की जाँच की जा रही है जो सोशल मीडिया के नियमों का उल्लंघन करते हैं और समाज में अशांति फैलाने का काम करते हैं। जोकि हमारे नियमों का उल्लंघन हैं।

माइक्रोब्लॉगिंग प्लेटफॉर्म की ओर से कहा गया है कि इसने उन ट्वीट्स पर लेबल लगाए हैं जो मीडिया पॉलिसी का उल्लंघन करते हुए पाए गए। इन अकाउंट्स पर पैनी नजर रखी जा रही है। इसके अलावा यदि किसी को कुछ आपत्तिजनक या भड़काऊ लगता है तो वह उस अकाउंट और ट्वीट के बारे में रिपोर्ट कर सकता है।

ट्विटर के प्रवक्ता ने कहा कि, “हमने हिंसा, दुर्व्यवहार और धमकियों को उकसाने के प्रयासों वाले संवाद से सर्विस को बचाने के लिए सख्त कार्रवाई की है, जो कुछ नियमों को तोड़कर ऑफलाइन नुकसान का जोखिम पैदा कर सकते हैं।”

उन्होंने आगे कहा, “टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करते हुए ट्विटर ने बड़े पैमाने पर काम किया और सैकड़ों अकाउंट्स और ट्वीट्स पर एक्शन लिया, जो ट्विटर नियमों का उल्लंघन कर रहे हैं। स्पैम और प्लैटफॉर्म पर हेरफेर करने में लिप्त 550 अकाउंट्स को सस्पेंड किया गया है।”

गौरतलब है कि किसानों ने 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस के अवसर पर शांतिपूर्ण ट्रैक्टर रैली की अनुमति दिल्ली पुलिस से ली थी, लेकिन शर्तों को नहीं माना गया। किसानों ने दिल्ली की सीमाओं पर बैरिकेड्स को तोड़कर राजधानी में प्रवेश किया और जगह-जगह उपद्रव किया।

राजधानी में हुई हिंसा के बाद एक्शन मोड में आई दिल्ली पुलिस ने 37 नेताओं पर एफआईआर दर्ज की है। इनमें राकेश टिकैत, डाॅ दर्शनपाल, जोगिंदर सिंह, बूटा, बलवीर सिंह राजेवाल और राजेंद्र सिंह के नाम शामिल हैं। समयपुर बादली में दर्ज एफआईआर नंबर 39 में नर्मदा बचाओ आंदोलन की मेधा पाटकर और स्वराज इंडिया के योगेंद्र यादव का नाम भी शामिल है।

बता दें कि हथियार लेकर नहीं चलना, निर्धारित मार्ग का पालन करना और ट्रॉलियों के बिना ट्रैक्टरों के साथ दिल्ली में प्रवेश करना… ये कुछ शर्तें थीं जिस पर सहमति किसान नेताओं और पुलिस के बीच बनी थी लेकिन मंगलवार (जनवरी 26, 2021) को ट्रैक्टर परेड में शामिल कई प्रदर्शनकारियों द्वारा इनका उल्लंघन किया गया। कृषि कानूनों के खिलाफ प्रदर्शनकारियों के मार्च में इस शर्त का भी उल्लंघन किया गया कि एक ट्रैक्टर पर पाँच से अधिक व्यक्ति सवार नहीं होंगे। यह ट्रैक्टर मार्च हिंसक हो गया और इस दौरान प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच कई स्थानों पर झड़प हुई।