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‘अवॉर्ड वापसी गैंग’ वालों को पुरस्कार खेती में मिला क्या? – पद्मश्री विजेता और जैविक खेती करने वाले भारत भूषण ने लताड़ा

‘किसान आंदोलन’ के बीच केंद्र सरकार को कृषि कानूनों को लेकर किसानों का समर्थन भी मिल रहा है। जहाँ एक तरफ 20 किसानों के एक प्रतिनिधिमंडल ने केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर से मुलाकात कर के सरकार को अपना समर्थन दिया, वहीं दूसरी तरफ पद्मश्री सम्मान विजेता किसान भारत भूषण त्यागी ने नए ‘अवॉर्ड वापसी गैंग’ को आड़े हाथों लिया। उन्होंने पूछा कि क्या इन लोगों को ये अवॉर्ड खेती में पुरस्कार स्वरूप मिला?

उन्होंने कहा कि महज झूठी ख्याति प्राप्त करने के लिए ऐसा किया जा रहा है। उन्होंने ‘News 18’ के उमेश श्रीवास्तव के साथ बातचीत में कहा कि कृषि कानूनों को हमें द्विपक्षीय रूप में समझना चाहिए। इससे न सिर्फ बिचौलियों की अंधेरगर्दी ख़त्म होगी, बल्कि खेती के कई नए विकल्प भी खुल रहे हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि सरकार की मंशा में कोई खोट नहीं है। उन्होंने मंडियाँ और MSP खत्म होने की चर्चाओं को भी निराधार और अफवाह बताया।

उन्होंने कहा कि ये अफवाह फैलाई जा रही है कि कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग के कारण किसानों की जमीनें कॉर्पोरेट कंपनियाँ हड़प लेंगी। उन्होंने याद दिलाया कि जहाँ सरकार ने MSP पूर्ववत बने रहने की बात कही है, वहीं वास्तु अधिनियम में भण्डारण को संरक्षित करने की बात भी कही गई है। उन्होंने किसानों को समझाया कि कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग में जमीन कोई मुद्दा है ही नहीं। उन्होंने किसानों को सलाह दी कि वो जब सरकार से बातचीत करने जाएँ, तो विरोध वाली मानसिकता न रखें।

उन्होंने समझाया कि विरोध वाली मानसिकता से बातचीत करने से कोई सकारात्मक परिणाम नहीं आते हैं। 2019 में राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद द्वारा पद्मश्री से सम्मानित किसान ने कहा कि मंडियों और बाजारों के जरिए किसानों को जो उचित मूल्य नहीं मिला करता था, उसका समाधान इस कानून में किया गया है। उन्होंने इसे एक सार्थक पहल करार देते हुए कहा कि किसानों को इससे कोई नुकसान नहीं होगा। उन्होंने कहा कि ये गलत भ्रम है।

जैविक खेती को देश-विदेश में पहुँचाने वाले बुजुर्ग किसान भारत भूषण त्यागी बुलंदशहर जनपद की स्याना तहसील क्षेत्र स्थित बीहटा गाँव के निवासी हैं। वो एक प्रगतिशील किसान हैं, जिन्होंने जैविक खेती के लिए कइयों को जागरूक किया है। उनके फार्म पर मंत्री से लेकर प्रशासनिक अधिकारी तक पहुँचते रहते हैं और जैविक खेती के बारे में जानकारी प्राप्त करते हैं। अब उन्होंने कृषि कानूनों का समर्थन किया है।

20 सदस्यीय किसानों के प्रतिनिधिमंडल का सरकार को ज्ञापन

उधर जिन 20 किसानों के प्रतिनिधिमंडल ने सरकार को समर्थन दिया है, उनमें से अधिकतर पंजाब के पड़ोसी राज्य हरियाणा के ही हैं। उन्होंने अपने ज्ञापन में कहा कि हम हरियाणा के 70,0000 PFO से जुड़े और 50,000 प्रगतिशील किसान इस कानून के समर्थन में हैं। उन्होंने सुझाए गए संशोधनों के साथ इन तीनों कानूनों को जारी रखने की अपील की और कहा कि इन्हें वापस न लिया जाए। उन्होंने अपील की कि इस कानून को सरकार दबाव में आकर रद्द न करें।

आपको उत्तर प्रदेश के बागपत स्थित सिसाना गाँव के बारे में भी जानना चाहिए, जहाँ 30 वर्षों से कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग हो रही है। इस गाँव की सफलता की दास्तान इसी से समझ लीजिए कि यहाँ के किसानों को अपनी उगाई सब्जियों के भाव दिल्ली स्थित आजादपुर मंडी से ज्यादा मिलती है, जो देश की शीर्ष मंडी कही जाती है। यहाँ के किसानों ने अपने निजी अनुभव शेयर कर न सिर्फ कृषि कानूनों का समर्थन किया, बल्कि कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग की सफलता की दास्तान भी सुनाई।

जो था इस्लामी आतंक का गढ़, आतंकवाद मुक्त होते ही उस डोडा जिले में लगे ‘भारत माता की जय’ के नारे

जम्मू-कश्मीर में डीडीसी चुनाव के मद्देनजर कुल 8 चरणों में मतदान होना है। कल 5वें चरण की वोटिंग संपन्न हुई है। इस बीच सोशल मीडिया पर एक वीडियो सामने आई है। ये वीडियो डोडा जिले के कारी घाटी की है। इस वीडियो में स्थानीय लोग जोर-जोर से भारत माता की जय के नारे लगाते नजर आ रहे हैं।

इस वीडियो को भाजपा प्रवक्ता सैयद शहनवाज हुसैन ने अपने ट्विटर पर कल शेयर किया है। उन्होंने इसे शेयर करते हुए लिखा,

डोडा जिले की कारा घाटी… यहाँ की आवाम ने पहले आतंक का सिर कुचला और अब उनके दिलों से आ रही है मुल्क से मोहब्बत की गूँज। आप भी सुनिए… कारा घाटी में गूँजती ‘भारत माता की जय’!

वीडियो में हम देख सकते हैं कि घाटी में पहुँचे भाजपा नेता भीड़ के बीच खड़े होकर भारत माता की जय कह रहे हैं और सामने खड़ी भीड़ उनके साथ ‘भारत माता की जय’ दोहरा रही है।

शहनवाज हुसैन घाटी के आवाम को समझाते हैं, “अगर कोई मौलवी साहब आकर आपको कहे कि आपने भारत माता की जय कहा है, अब तुम खारिज हो गए, तो ऐसा नहीं है। अपने मुल्क की तारीफ करने में, अपने मुल्क से मोहब्बत करने में कोई दिक्कत नहीं है।”

इस वीडियो को सोशल मीडिया पर कई लोगों द्वारा सराहा गया है। यूजर्स इस वीडियो को देख कर खुशी व्यक्त कर रहे हैं। वह कहते हैं, “शाहनवाज जी घाटी में जहाँ पहले नौजवानों को भटकाया जा रहा था। आज उनके हाथों में भारत का झंडा और दिल में भारत माता के लिए प्रेम देख कर बहुत खुशी हो रही है।”

एक अन्य यूजर लिखते हैं, “शहनवाज जी क्या बेहतरीन बदलाव हमारे स्वर्ग की घाटी में आ रहा है। यही सत्य और सच्चाई है, जम्मू और कश्मीर के युवाओं को भटकाने और अपने पद के लिए स्वार्थी जेहादी एजेंडा चमकाने वालों ने न जाने कितनों के औलादों की अल्प आयु में जान गवाँ दी। अब जाग रहे हैं। देखिएगा एक दिन यही आवाम उन्हीं को अंजाम देगी।”

उल्लेखनीय है कि इसी साल जून माह में सुरक्षाकर्मियों के प्रयासों से डोडा जिले को आतंकवाद मुक्त किया गया था। डीजीपी दिलबाग सिंह ने इसकी जानकारी देते हुए कहा था, “मसूद के रूप में आखिरी सक्रिय आतंकवादी के मारे जाने के बाद अब डोडा जिला पूरी तरह आतंकवाद मुक्त हो गया है।”

बता दें कि इससे पहले डीडीसी चुनावों के प्रथम चरण के दौरान एक और वीडियो कश्मीर से आई थी। इस वीडियो में घाटी के लोग भाजपा नेता मुख्तार अब्बास नकवी से बात करते नजर आए थे। इस वीडियो में बुजुर्ग व्यक्ति भाजपा नेता से कह रहे थे कि उन्हें कश्मीर में देख कर उन लोगों का दिल खुश हो गया है। यह उनकी खुशकिस्मती है कि वो कश्मीर में आए।

वहीं मुख्तार अब्बास नकवी भी उनसे वादा करते दिखे थे कि वह लोग हर कष्ट को दूर करेंगे। वह बताते हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए हिंदू मुस्लिम सिख ईसाई सब बराबर हैं। इसलिए उन्होंने सबका साथ सबका विकास का नारा दिया है। नकवी कहते हैं, जो गलत बातें कर रहे हैं, वह मुल्क के भी दुश्मन हैं और मोदी के भी दुश्मन हैं।

‘दिल्ली में जबरदस्ती मार्केट बंद करवाना चाहते थे AAP के मंडी चेयरमैन आदिल खान… लेकिन सब खुला है, भारत बंद फ्लॉप!’

केंद्र सरकार से अपनी माँग मनवाने के लिए किसानों ने आज (दिसंबर 8, 2020) भारत बंद का आह्वान किया है। इस बंद में उन्हें कई अलग-अलग क्षेत्रों (राजनीतिक दलों) से समर्थन मिल रहा है। लेकिन इस बीच कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो किसानों के साथ खड़े हैं, मगर भारी नुकसान उठाने की स्थिति में नहीं हैं। सब्जी और फल मंडियों के व्यापारी इसी सूची में आते हैं।

महाराष्ट्र के पुणे में तो भारत बंद के बावजूद सब्जी मंडियाँ खुली हैं। एक स्थानीय व्यापारी ने इस पर कहा, “हम किसानों के प्रदर्शन को समर्थन देते हैं, लेकिन हमने बाजार खोले हुए हैं ताकि दूसरे प्रदेशों से आने वाली फसल स्टोर की जा सके और वह खराब न हो। इन्हें हम कल ही बेचेंगे।” 

दिल्ली में भी सब्जी मंडी के व्यापारियों की यही स्थिति है लेकिन यहाँ सुबह तक मंडियों को बंद रखने के लिए AAP नेता द्वारा दबाव बनाया जा रहा था। भाजपा नेता कपिल मिश्रा ने अपने ट्वीट में इसका जिक्र किया। उन्होंने सुबह-सुबह अपने ट्वीट में लिखा, “मेरे पास दिल्ली की फल सब्जी मंडियों के व्यापारियों के फोन आ रहे हैं। व्यापारी मजदूर सब आज मंडियाँ खोलना चाहते हैं। केजरीवाल सरकार के नियुक्त मंडी चैयरमैन जबरदस्ती बंद के निर्देश दे रहे हैं।”

हालाँकि इसके बाद उनका ट्वीट आया, जिसमें उन्होंने फल सब्जी मंडियाँ खुलने की बात कहीं। उन्होंने लिखा, “दिल्ली की फल सब्जी मंडियाँ खुल गई हैं। ओखला, आजादपुर मंडियों में व्यापार जारी है। दिल्ली की सारी मार्केट, बाजार, इंडस्ट्रियल एरिया खुलेंगे- सदर बाजार, चाँदनी चौक, लाजपत नगर, सरोजिनी, गाँधी नगर, नेहरू प्लेस, कनॉट प्लेस, करोलबाग, कमला नगर सब खुलेगा। दिल्ली में बंद फ्लॉप।”

उनके अलावा नीलकांत बक्शी ने भी अपने ट्वीट में आम आदमी पार्टी द्वारा नियुक्त चेयरमैन के दबाव का जिक्र किया। उन्होंने कहा, “ओखला मंडी पूर्ण रूप से खुली है। आम आदमी पार्टी नियुक्त चेयरमैन आदिलजी ने बड़ा जोर लगाया कि यहाँ तो उनकी चल जाएगी लेकिन कुछ ना हुआ, मंडी खुली और माल का भरमार है। ओखला मंडी आभार।”

जानकारी के लिए बता दें कि दिल्ली में  APMC के अध्यक्ष आदिल अहमद खान हैं। इसके अलावा राजीव सिंह मेंबर सेक्रेट्री हैं। इनके अतिरिक्त मार्केटिंग कमेटी में 8 अन्य सदस्य भी नियुक्त किए गए हैं। APMC का उद्देश्य फलों और सब्जियों के विपणन की सुविधा देना है। इसके अलावा किसानों, उत्पादकों/विक्रेताओं व उपभोक्ताओं के फायदे व सुरक्षा के लिए नियमन लागू करना है।

भारत बंद को लेकर इससे पहले आदिल खान ने मीडिया से बात करते हुए कहा था कि आजादपुर मंडी समेत दिल्ली की दूसरी मंडियों के व्यापारियों ने भारत बंद का समर्थन करते हुए मंडी में व्यापार न करने का निर्णय लिया है। मंडी के सभी संगठनों ने निर्णय लिया है कि किसानों के समर्थन के लिए मंडी में अपना व्यापार बंद रखेंगे।

‘नेपाल को फिर हिन्दू राष्ट्र बनाओ’ – काठमांडू में हजारों की संख्या में सड़क पर जनता, वर्तमान व्यवस्था से नाराजगी

नेपाल की जनता एक बार फिर से ‘हिन्दू राष्ट्र’ की माँग लेकर सड़कों पर उतरी है। हजारों लोगों ने राजशाही को वापस लाने के लिए हो रहे आंदोलन में हिस्सा लिया और सड़कों पर उतर कर विरोध प्रदर्शन किया। काठमांडू में नेपाल के राष्ट्रीय झंडे को लेकर लोग सड़कों पर उतरे। इस रैली की योजना पहले से ही तैयार कर ली गई थी और बड़े ही व्यवस्थित ढंग से इस विरोध प्रदर्शन को लोगों ने अंजाम दिया, जिससे वहाँ की सरकार नाराज है।

इस विरोध प्रदर्शन का सबसे बड़ा रूप शनिवार (दिसंबर 5, 2020) को देखने को मिला। लोगों ने कहा कि अब समय आ गया है, जब हिमालय पर स्थित इस भूमि को न सिर्फ पुनः हिन्दू राष्ट्र घोषित किया जाए, बल्कि संवैधानिक राजशाही को भी वापस लाया जाए। उन्होंने वर्तमान सरकार और व्यवस्था को हर प्रकार से विफल करार दिया। जनता का कहना था कि देश के हित में और लोगों की भलाई के लिए ऐसा होना जरूरी है।

पिछले एक महीने से इसी प्रकार का विरोध प्रदर्शन जारी है। इस दौरान जिस व्यक्ति का चित्र इस्तेमाल किया जा रहा है, वो हैं पृथ्वी नारायण शाह। उनकी तस्वीरें लेकर प्रदर्शनकारी निकल रहे हैं। उन्हें आधुनिक संस्थापक और जनक माना जाता है। इससे पहले नवंबर 10 को ‘नेशनलिस्टिक सिविक सोसाइटी’ ने काठमांडू के जमाल में विरोध प्रदर्शन कर के हिन्दू राष्ट्र को पुनः स्थापित करने की माँग की और राजशाही के समर्थन में नारे लगाए।

इसके 2 दिनों बाद ही ‘नेपाल स्कॉलर काउंसिल’ ने विराटनगर में विरोध प्रदर्शन किया और वहाँ भी माँगें यही थीं। शनिवार वाला विरोध प्रदर्शन ‘राष्ट्रीय नागरिक आंदोलन समिति 2077’ के द्वारा ऑर्गेनाइज किया गया था। इसी तरह वर्तमान प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली के गृह शहर झापा में ‘राष्ट्रीय प्रजातांत्रिक पार्टी’ ने विरोध प्रदर्शन की योजना तैयार की है। प्रदर्शनकारियों की समस्या फ़ेडरल डेमोक्रेटिक रिपब्लिकन सिस्टम से है।

2015 में नेपाल का नया संविधान बना था और 2017 में आम चुनाव हुए थे। पीएम ओली भी वर्तमान व्यवस्था पर भरोसा जताते हैं और साथ ही लोकतांत्रिक सिस्टम को मजबूत करने की कोशिश में लगे रहते हैं। नेपाल की सत्ताधारी और विपक्षी पार्टियाँ, दोनों के ही विफल रहने के बाद लोग नाराज हैं और पुराने सिस्टम की ओर की लौटना चाहते हैं। महामारी की आपदा ने इस सोच को और मजबूत किया है। नेपाल में भ्रष्टाचार भी चरम पर है।

नेपाल में चीनी घुसपैठ भी बढ़ रहा है। ओली सरकार बार-बार नेपाल के हुमला इलाके में चीनी घुसपैठ से इनकार कर रही है। हाल ही में मुख्य विपक्षी दल नेपाली कॉन्ग्रेस के नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री जीवन बहादुर शाही ने दावा किया था कि उन्हें चीनी अतिक्रमण के पुख्ता सबूत मिले हैं। उन्होंने नेपाल की ओली सरकार को निकम्मा बताते हुए कहा था कि स्थलगत निरीक्षण के बाद हमारा निष्कर्ष है कि हमारी जमीन पर चीन द्वारा अवैध रूप से कब्जा किया गया है और चीन से कूटनीतिक वार्ता का कोई विकल्प नहीं है।

भारत बंद: महाराष्ट्र और ओडिशा में रोकी गई रेल, दिल्ली-UP में पुलिस को सख्ती से निपटने के आदेश

केंद्र सरकार के नए कृषि कानूनों के ख़िलाफ़ प्रदर्शन करने वाले किसानों ने आज (दिसंबर 8, 2020) भारत बंद बुलाया है। ये बंद आज सुबह 11 बजे से दोपहर 3 बजे तक रहेगा। इस बंद को कॉन्ग्रेस, आम आदमी पार्टी, सपा समेत कुल 18 विपक्षी दलों का समर्थन मिला है।

केंद्र सरकार ने इस भारत बंद के मद्देनजर राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के लिए तीन बिंदुओं पर दिशा-निर्देश जारी किए हैं। इनमें सबसे पहले राज्य सरकारों को कड़ी सुरक्षा व्यवस्था करने को कहा गया है। दूसरा, भारत बंद के दौरान कोरोना संबंधी दिशा-निर्देशों की अवहेलना करने के लिए मना किया गया है और तीसरा यह कि यदि कोई गड़बड़ी हो तो उससे सख्ती से निपटने की व्यवस्था करने को कहा गया है।

दिल्ली और यूपी पुलिस ने यह स्पष्ट कहा है कि भारत बंद के दौरान लोगों की आवाजाही रोकने व जबरन दुकानें बंद करवाने वालों के ख़िलाफ़ कड़ी कार्रवाई होगी। अराजक तत्वों के साथ सख्ती से निपटा जाएगा और ऐसी व्यवस्था तैयार होगी कि मारपीट न हो।

दिल्ली पुलिस ने सीमावर्ती इलाकों में पहले से तैनात सुरक्षाकर्मियों के अलावा 100 अतिरिक्त कंपनी पुलिस फोर्स के साथ 100 टीमें बनाई हैं। ये टीमें एसपी स्तर के अफसर के नेतृत्व में विभिन्न इलाकों में गश्त कर रही हैं।

इस भारत बंद में दिल्ली की बात करें तो सिंघु बॉर्डर, गाजीपुर, टिकरी, झरोदा, लामपुर, औचंदी, चिल्ला बॉर्डर और प्याऊ मनियारी, सफियाबाद से आने वाले रास्ते बंद होंगे। आवश्यकता पड़ने पर डीएनडी-कालिंदी कुंज का ट्रैफिक डायवर्ट किया जाएगा। वहीं एंबुलेंस और दमकल विभाग समेत इमरजेंसी सेवाओं में लगे वाहनों को आवाजाही की अनुमति होगी। शादी समारोह में शामिल होने पर भी रोक नहीं है। दवा की दुकानें खुली रहेंगी।

भारतीय किसान यूनियन के प्रवक्ता राकेश टिकैत ने कहा, “हमारा प्रदर्शन बिलकुल शांतिपूर्ण है। अगर कोई हमारी वजह से बंद में दो-तीन घंटे फँस गया तो हम उन्हें पानी और फल देंगे। हमारा अलग हिसाब है।”

उल्लेखनीय है कि एक ओर जहाँ दिल्ली में प्रदर्शन कर रहे किसानों का मकसद अपनी बात को केंद्र सरकार से मनवाना है, वहीं आंध्र प्रदेश और ओडिशा में लेफ्ट पार्टियों ने भारत बंद के नाम पर केंद्र सरकार के ख़िलाफ़ मोर्चा खोल दिया है। आंध्र प्रदेश के विजयवाड़ा में आज लेफ्ट पार्टियाँ प्रोटेस्ट कर रही हैं और ओडिशा में भुवनेश्वर रेलवे स्टेशन पर लेफ्ट पॉलिटिकल पार्टी ने ट्रेड यूनियन और किसान यूनियन के साथ ट्रेन रोक ली हैं।

महाराष्ट्र में भी स्वाभिमानी सत्कारी संगठन ने भारत बंद रेल रोको अभियान का फैसला किया है।

नमाज पढ़ते मुस्लिम और सुरक्षा में सिखों का घेरा: हाईजैक ‘किसान आंदोलन’ और शाहीन बाग मॉडल

दिल्ली में ‘किसान आंदोलन’ के दौरान कुछ ऐसा ही नज़ारा देखने को मिला, जैसा शाहीन बाग़ में देखने को मिला था। दरअसल, आजकल सारे विरोध प्रदर्शनों में एकाध फंडा ज़रूर अपनाया जाता है, जैसे – ह्यूमन चेन बनाना या फिर मुस्लिमों के साथ किसी दूसरे मजहब की एकता दिखाना। इससे मुस्लिम वर्ग को आरोपों से परे रखने में मदद मिलती है। दिल्ली में भी कुछ मुस्लिम नमाज पढ़ते नजर आए,और सिख घेरा बना कर उनकी ‘सुरक्षा’ कर रहे थे।

नमाज पढ़ते मुस्लिमों और उनके पास खड़े सिख समुदाय के लोगों की तस्वीर और वीडियो को सोशल मीडिया पर राना अयूब जैसे पत्रकारों ने वायरल किया। राना अयूब ने लिखा कि इस वीडियो ने उन्हें भावुक कर दिया है। उन्होंने लिखा कि सिख भाई मुस्लिमों का साथ देते हुए नमाज के वक्त उनके पास खड़े हैं। इससे दो चीजें साबित करने की कोशिश की गईं – एक ये कि सिख और हिन्दू अलग-अलग हैं, दूसरी ये कि मुस्लिम इतने मासूम हैं कि उन्हें सुरक्षा की ज़रूरत पड़ती है।

जैसा कि हमें पता है, दिल्ली के इस ‘किसान आंदोलन’ को खालिस्तानियों ने हाईजैक कर रखा है। एक खालिस्तानी का ये कहते हुए वीडियो भी वायरल हुआ था कि वो न तो ‘जय हिंद’ बोलेगा और न ही ‘भारत माता की जय’, वो तो बस ‘अस्सलाम वालेकुम’ और ‘जो बोले सो निहाल’ बोलेगा। स्थिति स्पष्ट है। जो कुचक्र दलितों के साथ चलाया जाता है कि तुम हिन्दुओं से अलग हो, वैसा ही सिखों के साथ हो रहा है।

गुरु गोविंद सिंह ने अपने चारों बेटों को इस्लामी आक्रांताओं की क्रूरता से लड़ते हुए कुर्बान कर दिया। लेकिन, आज खुद को उनका अनुयायी कहने वाले उसी धरती से घृणा का पाठ पढ़ और पढ़ा रहे हैं, जिसके लिए उनके गुरुओं ने अपना सर्वस्व बलिदान कर दिया था। वो सिर्फ उनके ही गुरु नहीं थे, पूरे भारत के थे। हर विरोध प्रदर्शन की ब्रांडिंग के लिए ये तौर-तरीके आजमाए जाते हैं। इससे आंदोलन की ‘ब्रांड वैल्यू’ बढ़ाने की कोशिश होती है।

सोशल मीडिया पर एक व्यक्ति ने इस्लामी शासन काल की एक तस्वीर शेयर की, जिसमें आक्रांता एक सिख योद्धा के साथ क्रूरता करते हुए उसके शरीर को काट रहे हैं। उसने पूछा कि क्या इससे बेहतर कोई ‘एकजुटता’ हो सकती है? एक व्यक्ति ने पूछा कि मुस्लिम समुदाय के लोग तो बिना सुरक्षा के ही एयरपोर्ट्स से लेकर सड़कों तक पर नमाज पढ़ते हैं, इसमें नया क्या है? फिर उनके ही आंदोलन में ये ‘एकजुटता’ प्रदर्शित करने की ज़रूरत क्यों पड़ गई?

हाल ही में दिल्ली पुलिस ने 5 आतंकियों को गिरफ्तार किया, जिनमें से 2 खालिस्तानी हैं और 3 कश्मीरी जिहादी हैं। दिल्ली पुलिस का भी कहना है कि पाकिस्तानी ख़ुफ़िया एजेंसी ISI कश्मीरी और पंजाबी आतंकवाद को एक साथ जोड़ कर भारत को अस्थिर करना चाहती है। ऐसे में, निचले स्तर पर भी सिखों में हिन्दुओं के खिलाफ घृणा भरने की कोशिश की जा रही हो, ये भी हो सकता है। वरना, इंदिरा और मोदी को ठोकने की बातें न की जाती।

एक व्यक्ति ने याद दिलाया कि पाकिस्तान में सिखों के साथ क्रूरता हो रही है। उनकी बहू-बेटियों के साथ दुर्व्यवहार हो रहा है। उसने पूछा कि क्या सिख समुदाय को यहाँ इस तरह विरोध प्रदर्शन करने और इस तरह के वीडियो बनाने की बजाए ऐसी घटनाओं के खिलाफ विरोध नहीं जताना चाहिए? क्या पाकिस्तान के सिख, सिख नहीं हैं? क्या भारत का मुस्लिम वर्ग एक इस्लामी मुल्क में सिखों पर हो रहे इस अत्याचार पर आवाज़ उठाता है?

आलोक कुमार चौधरी ने लिखा कि इसमें नया क्या है? कभी वो कोलकाता के धर्मतला स्ट्रीट में आएँ, वहाँ हमेशा मुस्लिम वर्ग इसी तरह नमाज पढ़ता है और ट्रैफिक बंद रहता है। हिन्दू लोग उनका साथ देते हैं। वो वहाँ से गुजरते हैं, उन्हें दिक्कतें होती हैं, लेकिन वो एक शब्द नहीं कहते। शैलेन्द्र उपाध्याय ने इसका जवाब देते हुए लिखा कि हिंदू कुछ बोल भी नहीं सकते। कभी किसी अच्छे कारण से भी उन्हें रोक कर देखो, सारा ‘भाईचारा’ कहाँ घुसेड़ दिया जाएगा, पता भी न चलेगा।

मंगलवार (दिसंबर 8, 2020) को ‘किसान आंदोलन’ के समर्थकों ने ‘भारत बंद’ का ऐलान कर रखा है। इधर पेशेवर आंदोलनकारी और पाखंडी राजनीतिज्ञ योगेंद्र यादव ने सोमवार (7 दिसंबर 2020) को प्रदर्शनरत किसानों और राजनीतिक दलों द्वारा घोषित किए गए ‘भारत बंद’ के ठीक पहले सोशल मीडिया पर नई थ्योरी पेश कर गुमराह करने की कोशिश की। उन्होंने एक भ्रामक स्क्रीनशॉट शेयर कर दावा किया कि स्कूलों ने ‘भारत बंद’ का स्वागत किया है।

दिल्ली में गोहत्या, पूरे नाले में बिखरे मिले अवशेष: 2 पुलिस वाले सस्पेंड, अज्ञात लोगों के खिलाफ FIR

दिल्ली के द्वारका सेक्टर-23 स्थित पोचनपुर गाँव में एक नाले से गायों का शव और इनके अवशेष मिले हैं। पशु चिकित्सक, फॉरेंसिक और क्राइम टीम ने मौके पर पहुँच कर जाँच भी की है। इस मामले में अज्ञात लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया है। साथ ही दो पुलिसकर्मियों को लापरवाही के आधार पर सस्पेंड भी कर दिया गया है।

मामला जैसे ही स्थानीय सांसद परवेश साहिब सिंह के पास पहुँचा, उन्होंने भी मौके पर पहुँच कर खुद मुआयना किया। इस संबंध में उन्होंने अधिकारियों को जल्द से जल्द आरोपितों को पकड़ कर कार्रवाई करने का आदेश दिया। परवेश साहिब सिंह के अनुसार मौके पर अवैध गोहत्या के कारण पूरी नाली में अवशेष पड़े थे और ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे यह कार्य महीनों से चल रहा हो।

सांसद परवेश साहिब सिंह ने इस मामले को लेकर दो ट्वीट किए। फोटो सहित इन ट्वीट में उन्होंने लिखा, “इन मासूम जानवरों के शरीर के हिस्से पूरे नाले में बिखरे पड़े हैं। ऐसे अपराध को रोकने के लिए CCTV की जरूरत है। दोषियों की गिरफ्तारी होनी जल्द से जल्द होनी चाहिए।”

इससे पहले घटना की जानकारी मिलने पर दिल्ली पुलिस ने कार्रवाई करते हुए अज्ञात लोगों के खिलाफ FIR दर्ज किया था। इस संबंध में एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने बताया, “संबंधित धाराओं में अज्ञात लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया है। जाँच के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी।” पुलिस को संदेह है कि यह गौकशी का मामला हो सकता है।

लव जिहाद पर हिंदू चुप रहें, क्योंकि सागरिका घोष ऐसा ही चाहती हैं, उन्होंने तुर्किश शो भी देखी है

‘मशहूर पत्रकार’ सागारिका घोष ने ग्रूमिंग जिहाद (लव जिहाद) के ख़तरे से निपटने के लिए नया तरीका इजाद किया है। उनके मुताबिक़ मुस्लिम पुरुषों के खुद को हिन्दू बताकर हिन्दू महिलाओं को शादी का झाँसा देना, या मुस्लिम पुरुषों द्वारा अलग-अलग धर्म की महिलाओं के साथ अंजाम दिए जाने वाले यौन अपराधों को, तुर्की के टेलीविजन धारावाहिक एर्टुग्रुल (Ertugrul) देखकर हल किया जा सकता है।

सागारिका घोष का विवादित ट्वीट

सागारिका घोष ने बेहद सुविधाजनक तरीके से ग्रूमिंग जिहाद के ज़रिए होने वाले जबरन धर्मांतरण के ख़तरे को, हिन्दू परिवारों और मुस्लिम दामादों के बीच बतौर ‘मानसिक उन्माद’ तोड़-मरोड़ कर रख दिया। इसके बाद सागारिका घोष जघन्य अपराध के पीड़ितों को चुप कराते हुए पीड़ित को ही दोष देने लगती हैं। उनका मानना है कि उन महिलाओं की आपबीती जिन्हें इस तरह के भयावह हालातों का सामना करना पड़ता है, यह “मुस्लिम दामादों” के प्रति मानसिक उन्माद का नतीजा है।

इस तरह के कुतर्क हमें उल्लेखनीय तथ्यों की ओर ले जाते हैं। कानपुर की पीड़िता का उदाहरण ले लीजिए। एक मुस्लिम युवक ने खुद की पहचान सचिन शर्मा बता कर युवती को बहलाया-फुसलाया। उसका नाम बदल कर ज़ोया रखा गया, उस पर बीफ़ खाने का दबाव बनाया गया, इतना ही नहीं उस पर मौलवी के साथ सेक्स करने का दबाव भी बनाया गया। जब वह गर्भवती हुई तब उसका गैर क़ानूनी लिंग परीक्षण कराया गया, परीक्षण में पता चला कि लड़की है तब उन्होंने बच्चे को सुरक्षित रख लिया जिससे आने वाले समय में उसका ‘इस्तेमाल’ किया जा सके। 

सागारिका घोष यह चाहती हैं कि हम भी यह मान लें सब कुछ सिर्फ ‘मानसिक उन्माद’ है, क्योंकि उन्हें तुर्की टीवी श्रृंखला में एक अच्छे नज़र आने वाले इंसान को देखने में मज़ा आई। इसी तरह के एक और मामले में गोलू खान नाम के आरोपित ने हिन्दू बन कर एक नाबालिग को बहलाया-फुसलाया और उस पर इस्लाम स्वीकार करने का दबाव बनाया और अंत में उससे निकाह किया। इस घटना को अंजाम देने के दौरान लोगों के सामने हिन्दू नज़र आने के लिए उसने तिलक लगाया और कलेवा भी पहना। 

एक और मामले में बलिया के इमरान खान ने अपना मज़हब छुपा कर नाबालिग लड़की को झाँसे में लिया। इसके बाद वह नाबालिग के साथ भागने में कामयाब भी रहा, लेकिन नाबालिग के रिश्तेदारों ने उसे धर दबोचा। अंत में उसकी गिरफ्तारी हुई थी और उस पर संबंधित धाराओं में मामला दर्ज किया गया था। ऐसे ही एक और मामले में मुस्लिम युवक ने अपनी पहचान हिन्दू बता कर एक दलित युवती से संबंध बनाए और शादी करने की बात पर धर्म परिवर्तन का दबाव बनाने लगा। 

इस तरह के मामलों की सूची अनंत है। अब राजनीतिक दलों पर ऐसे मामलों का संज्ञान लेने का दबाव है, देश के भाजपा शासित राज्यों की सरकारें इस तरह के मामलों का सामना करने के लिए क़ानून लेकर भी आ रही हैं। उत्तर प्रदेश की योगी सरकार इस मुद्दे पर अध्यादेश लागू कर चुकी है। वहीं मध्य प्रदेश में इस क़ानून को अंतिम सूरत देने की तैयारियाँ अंतिम चरण में हैं। 

सागारिका घोष जैसे लोगों की इस मुद्दे को लेकर अस्वीकार्यता लगातार जारी है। एक क्षण के लिए इसके भीषण पहलू पर गौर करिए। सबसे पहले तो ये लोग इस तरह की आपराधिक घटनाओं के होने की बात को नकारते हैं, जबकि पिछले कुछ समय में इस तरह के न जाने कितने मामले सामने आए हैं। फिर इन लोगों की ऐसे मुद्दों पर परेड चालू हो जाती है और ऐसे मामलों पर होने वाले विरोध को हिन्दुओं की कथित कट्टरता के सबूत के रूप में पेश करते हैं। 

ऐसा लगता है जैसे सागारिका घोष चाहती ही यही हैं कि हिन्दू समुदाय अपनी महिलाओं को ऐसे अपराधों की भट्टी में झोंक दे। इसके लिए उन्होंने एक टीवी श्रृंखला का हवाला दिया जो इस्लामी इतिहास के किरदार का महिमामंडन करता है। सागारिका हिन्दुओं को नीचा दिखाने के लिए इतना तत्पर रहती हैं कि एक तरह से यह चाहती हैं कि हिन्दू महिलाओं को जिहाद के हवाले कर दिया जाए। सागारिका घोष जिस पाप को जन्म दे रही हैं वह उन लोगों से कम नहीं है जो महिलाओं का धर्म परिवर्तन कराने के लिए उनका ब्रेनवाश करते हैं। वह इतिहास के काल्पनिक चित्रण के ज़रिए हिन्दू महिलाओं के साथ होने वाले अपराधों की सफ़ेदपोशी करती हैं। यह ग्रूमिंग जिहाद के पीड़ितों पर अत्याचार जारी रखने का सबसे निंदनीय तरीका है।

फेमिनिस्ट अक्सर यह कहते हैं कि ‘बिलीव ऑल वुमेन’ लेकिन ऐसा लगता है जैसे ग्रूमिंग जिहाद की पीड़ित हिन्दू महिलाएँ इस पैमाने पर खरी नहीं उतरती हैं। इन पर विश्वास तो बहुत कम है, ये लोग उन महिलाओं की दिल दहला देने वाली कहानियाँ भी नहीं सुन सकते हैं जिसमें उनके साथ न जाने कितना अत्याचार हुआ। अपनी बात साबित करने के लिए ये लोग हैरान करने वाली दलीलें देते हैं (जैसे टीवी सीरीज़), पीड़ितों ने जिन दिक्कतों का सामना किया है उसका ही मज़ाक बनाएँगे। यह केवल नैतिक नियति की कमी और दुराचार दर्शाता है जो पूरे लिबरल विमर्श को ढकने के लिए आया है।

भारत बंद के पहले इच्छाधारी आंदोलनकारी योगेंद्र यादव को नेटिजन्स ने किया रोस्ट

पेशेवर आंदोलनकारी और पाखंडी राजनीतिज्ञ योगेंद्र यादव ने सोमवार (7 दिसंबर 2020) को प्रदर्शनरत किसानों और राजनीतिक दलों द्वारा घोषित किए गए ‘भारत बंद’ के ठीक पहले सोशल मीडिया पर नई थियरी पेश कर गुमराह करने की कोशिश की। योगेंद्र यादन ने एक स्क्रीनशॉट साझा किया जो खुद में संदिग्ध नज़र आ रहा था, उसमें यह दावा किया गया था शिक्षकों ने भी ‘किसानों’ का समर्थन करते हुए भारत बंद का समर्थन किया है। 

योगेंद्र यादव द्वारा साझा किए गए स्क्रीनशॉट में किसी स्कूल या किसी बोर्ड का उल्लेख नहीं था और इसका शीर्षक था, ‘Sub:information’। इस स्क्रीनशॉट में लिखा था, “प्यारे अभिवावकों, क्लास एलकेजी से लेकर क्लास 10 तक के लिए सूचना: कल (8 दिसंबर) भारत बंद होने की वजह से कोई ऑनलाइन क्लासेस नहीं होंगी। हम प्रार्थना करते हैं कि जल्द से जल्द किसानों की माँग पूरी की जाएँ। साभार प्रिंसिपल।” इस संदेश में कई तरह की गलतियाँ थीं और इसमें समय 3:13 PM दिया गया था। 

मज़े की बात यह है कि संदेश में भेजने वाले की पहचान करने वाली किसी भी तरह की जानकारी नहीं दी गई थी। स्कूल, बोर्ड, शहर, प्रदेश- इस तरह की कोई जानकारी नहीं दी गई थी जिनका ज़िक्र एक प्रिंसिपल ‘अभिवावकों’ को संदेश देते हुए करता है। 

योगेंद्र यादव ने जैसे ही यह संदेश साझा किया, इसके कुछ ही देर बाद नेटिज़न्स ने उनकी जम कर मौज ली या यूँ कहें योगेंद्र यादव को तबीयत  से रोस्ट किया। 

एक ज़िम्मेदार नेटिज़न ने इशारा किया कि स्कूल्स को किसी भी तरह की राजनीति का पक्ष नहीं लेना चाहिए, चाहे वह सरकार के समर्थन में हो या विरोध में। 

वहीं एक और नेटिज़न ने कहा कि कितनी अनूठी बात है कि योगेंद्र यादव द्वारा साझा किए गए संदेश में प्रिंसिपल ‘अज्ञात’ है। 

वहीं कुछ अन्य लोगों ने इसी तरह का संदेश साझा किया जो उन्हें प्राप्त हुआ था। 

होगवार्ट्स ने इस नेटिज़न के लिए एक उल्लू भेजा। 

होब्बिट्स (hobbits) के पास भी लगाने के लिए एक दिलचस्प अनुमान है। 

तो हाँ, यह कुछ इस तरह पूरा हुआ। 

इसके अलावा योगेंद्र यादव ने यहाँ तक दावा किया कि 8 दिसंबर को भारत बंद के दौरान दूध जैसे आवश्यक चीज़ों की आवाजाही नहीं होगी। 

तीस हजार बाबरी बाकी है, और हम उसे ले कर रहेंगे

हमारी सहिष्णुता, सर्वसमावेशी स्वभाव, विधर्मियों को भी यथोचित सम्मान से नहीं बल्कि पूर्ण सम्मान से ही देखना, आतंकी विचारधारा वाली कौम से किसी प्रकार सुधरने की उम्मीद करना आदि हिन्दुओं को हेय, तुच्छ और नीची निगाह से देखे जाने वाली डरपोक जनसंख्या की तरह प्रचारित करती है। आदर्श रूप में यही वो सद्गुण हैं जिससे एक समाज, धर्म के मार्ग पर चलते हुए अपना अस्तित्व बचाए रखता है और वृहद् समाज को भी विवेकशील बनाते हुए उत्कृष्ट नागरिकों के रूप में राष्ट्र के सार्वभौमिक विकास की पताका को ऊँचा और लहराता हुआ रखता है।

परन्तु, समय सदैव एक-सा नहीं रहता। कुछ मजहब जिनका जन्मसिद्ध मकसद ही दुनिया के दूसरे धर्मों का विनाश, लोगों का मतांतरण, बहू-बेटियों का शीलहरण, धार्मिक स्थलों का विनाश और उनकी बात न मानने वाले लोगों का सामूहिक नरसंहार रहा हो, वो तो तलवारों और कटारों के दौर से बाहर आते ही, नित नए हथियारों और सूचनाओं के द्रुत आवागमन के दौर में अपनी विकृत सोच को धरातल पर क्रियान्वित करने हेतु नए पैंतरे बदलेंगे ही। ऐसे मजहब के लोगों में ऐसी मानसिक विकृति, कि जो हमारे मजहब के प्रतीकों को नहीं मानते वो कत्ल के योग्य हैं, अब विस्तार पाने लगी है। उनकी वहशी सोच अब चंद मजहबी स्थलों से बाहर, छोटे-छोटे मजहबी स्थलों तक पहुँच कर, घरों तक पैठ बना चुकी है।

बदलते राजनैतिक समीकरण ने इस मजहब के कुछ नेताओं और लोगों के मन में हिन्दुओं को ले कर ऐसे घृणा के बीच बो दिए हैं कि अब न तो लोकतांत्रिक सरकार का महत्व रह गया है, न ही सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए फैसलों का। एक कौम किसी विचित्र सोच से उत्प्लावित हो कर यह सोचने लगी है कि वो कैसे ज्यादा बच्चे पैदा करे, कैसे अपने मजहब के नेताओं को ही चुने, कैसे हिन्दुओं की बच्चियों को धोखे से प्रेम में फँसा कर, बलात्कार, हत्या और अन्य दुष्कृत्य करे और अंततः उसके मतलब के लोग सत्ता में पहुँचे और वहाँ पहुँचते ही वह वो करे जिसकी परिकल्पना दिल दहला देने वाली है।

हिन्दुओं के प्रतीकों को तोड़ना, देवी-देवताओं की मूर्तियाँ विखंडित करना, धार्मिक जुलूसों पर पत्थरबाजी, दंगों की स्थिति उत्पन्न करना और स्वयं को ही पीड़ित बताना, हिन्दुओं को उकसाना और उनकी असीमित धैर्य की परीक्षा लेना इस कौम की विशेषता बनती जा रही है और इसी उत्कंठा से प्रणोदित हो कर गली और मुहल्ले में आकंठ विष लिए घूमने वाली यह कौम विनाशवृत्ति का नग्न नृत्य करना चाहती तो है, लेकिन हिन्दुओं के संख्याबल और प्रशासनिक सूझ-बूझ के कारण छुच्छी में आग पकड़ने के बाद मसल कर बुझा दी जाती है।

यह क्रोध इनके भीतर वैसे ही जमता जा रहा है जैसे धूम्रपान से फेफड़ों के भीतरी रोएँ के जल जाने से बलगम और टार जमता जाता है। यही असंगत क्रोध इनके हर सोशल मीडिया पोस्ट, हर बयान, हर बातचीत में फफक कर बाहर आता रहता है, और अगर बाहर न आ पाए तो पीब बन कर आंतरिक रिसाव से इनके पूरे व्यक्तित्व को ही विषैला बनाता रहता है। इसी मजहबी घृणा का बलगम छः साल से चल रहे ‘डॉट्स’ ट्रीटमेंट को ले कर प्रतिरोध दिखाता रहता है, लेकिन समुचित डबल डोज दे कर इसे नियंत्रण में ले आया जाता है। यह ट्रीटमेंट दीर्घकालिक हो, तभी इनकी सोच से लहसुन-ए-हिंद की बलवती अवधारणा क्षीण हो पाएगी, अन्यथा ये छतों पर पत्थर, पेट्रोल बम, एसिड के पाउच आदि ऐसे इकट्ठा करते हैं जैसे कब दंगा करना पड़े और ऐन मौके पर छत खाली न मिल जाए।

बाबरी जिंदा है…

हिन्दुओं के लिए ही नहीं, पूरे भारतीय समाज के लिए पाँच सौ वर्षों से खड़े एक कोढ़ और एक लुटेरे नस्ल के आतंकी विचारधारा की कहानी कहती एक इमारत ‘जय श्री राम’ के नारों से छः दिसम्बर के भरभरा कर गिर गई। कहा जाता है कि किसी मजहबी इमारत को बचाने के लिए इतनी बड़ी ‘ह्यूमन चेन’ को उस दिन चाँद से भी देखा जा सकता था, और हिन्दू समाज ने हर संभव कोशिश की कि कोई उसे नुकसान न पहुँचाए। परंतु, दैवसंयोग देखिए कि मुगलई आतंक की कहानी कहती, काली होती इमारत जो कि एक हिन्दू मंदिर के मलबे को किसी तरह रेगिस्तानी तकनीक से जोड़ कर खड़ी की गई थी, राम नाम के जयकारे को भी थम नहीं पाई और नकलची, चोर मुगलों की पोलपट्टी खोल गई जो कहते रहते हैं कि भारत की बड़ी इमारतें मुगलिया वास्तुकला का अद्भुत नमूना हैं।

सवाल यह है कि रेगिस्तानों में कौन-सी विलक्षण इमारत इन चोरों ने कहाँ खड़ी की थी चार सौ साल पहले, कि वो किसी को दिखाई नहीं देती? या कहीं ऐसा तो नहीं कि नाक पर सींग लगी घोड़ी के खुर लगने से वो अंतर्धान हो चुकी हैं? या फिर दोगले मुगल शासक, जो पितृहंता थे, जबरन समलैंगिक संबंध बनाने के लिए उद्यत पाए जाते थे, और सत्ता के मद में चूर किसी भारतीय से ही सारी इमारते बनवा कर लहसुन-नामा और स्कोडा-ए-अकबरी में अपना नाम लिखवाते थे? क्योंकि बिरयानी को अपना कहने वाले मुगलों ने बाप जनम में न तो चावल देखा था, और उसमें पड़ने वाले मसाले बालू में नहीं उगते।

जिन्हें अपना बाप मानने वाले आज भी बकरे के मांस को कटवाना तक नहीं जानते, वो हमारे ही मसाले, चावल और मांस को पकाने की विधि को मुगलई बताते फिरते हैं। चोर और लुटेरे विनाश करना जानते हैं, निर्माण उनके गुणसूत्रों में ही नहीं होता, फिर वो खाने और बनाने की विधि भला कैसे जानेंगे! डरा-धमका कर कुतुब मीनार को क़ुतुबुद्दीन का बता देने से, प्रयागराज इलाहाबाद नहीं बन जाता। वो प्रयागराज ही रहेगा जहाँ गंगा और यमुना का संगम होता है, और दोनों हिन्दुओं की ही हैं चाहे तहजीब के नाम पर जो नौटंकी कर लो।

बाबरी एक घटिया इमारत थी, ढह गई। बाद में न्यायालय ने भी कह दिया कि वहाँ राम मंदिर था और सत्तर साल से हिन्दुओं की बाट जोहते रामलला की किलकारियाँ उनके नए घर में गूँजेगी जिसे कब्र में कयामत की राह देख रहे बाबर और उसकी नस्ल को दिन में अनगिनत बार सुनाई देगी। और उन्हें सुनाना आवश्यक भी है क्योंकि पता तो चले कि मलबे जोड़ने वाली लुटेरी और आतंकी कौम धरती के नीचे दफ्न है और राम मंदिर वापस उदित हो रहा है। शंख और घड़ीघंट के नाद से वैसे भी हानिकारक जीवाणुओं का नाश हो ही जाता है, इस बार सुना है 2100 किलोग्राम की घंटी बनाई है और दूसरी रामेश्वरम से ग्यारह राज्यों की यात्रा कर के पहुँची है! और भी जगहों की कई घंटियाँ लगने वाली हैं, कितने मूर्तिभंजक सोच वालों के दिमाग पर इसका असर पड़ेगा, इस पर शीघ्र ही शोध हो सकता है।

किसी गुमनाम शायर ने कहा है कि ‘तेल लगा लो डाबर का, नाम मिटा दो बाबर का’। ये पंक्तियाँ पैफ्फलेटों से होते हुए, एसएमएस, फेसबुक और यूट्यूब पर प्रचलित हो चुकी है। ये बात और है कि शायर ने यह नहीं बताया है कि तेल कहाँ लगाना है। फिर भी क्या मिटाना है, यह तो स्पष्ट है ही और अब वो कायदे से मिट भी चुका है। जैसे आडवाणी जी द्वारा दिया गया एक साधारण नारा, ‘मंदिर वहीं बनाएँगे’, पूरे जनमानस को चलायमान रखने का, उनके दृढ़संकल्प का, उनकी सहिष्णुता का प्रतीक बन गया और कालांतर में ‘मंदिर वहीं बन रहा है ब्रो’ हो गया, वैसे ही ‘डाबर-बाबर’ भी सनातन आस्था के इस अनूठे अनुप्रयोग के प्रणोदक के रूप में स्थापित हो चुका है जब ‘जय श्री राम’ के उद्घोष से ही बाबरी ढनमना कर ढह गई। कोर्ट ने भी माना कि संघ या भाजपा के नेताओं ने ढाँचा नहीं गिराया था।

बाबरी जिनके लिए जिंदा है वो रंग-पेंट ले कर पोस्टर बनाते रहें, घर में वैसे ही लगा कर रखें जैसे कश्मीरी आतंकियों के घर में ईरान के कासिम सुलेमानी की तस्वीरें लगी होती हैं। अपने घर में जिन्हें बाबर को बाप मानना है, वो मानते रहें। जिन्हें लगता है कि विदेशी आक्रांताओं ने ही उनके पूर्वजों के साथ संसर्ग किया था और उनके दादे-परदादे उन्हीं से जनमे, उसमें कोई दूसरा क्या कर सकता है। समझदार लोग ऐसी बातों को ‘वो तो पुरानी बात है’ कह कर छुपाने की कोशिश करते हैं, यहाँ तो होड़ लगी हुई है कि मुगलिया अस्तबलों में घोड़े की लीद उठाने वाले भी स्वयं को बाबर की औलाद और भारत का शहजादा मानते हैं। ये बात और है कि अरब वाले उन्हें बाबर की नस्ल तो दूर, हममजहब भी मानने से इनकार करते हैं।

बाबर मर गया, बाबरी ढह गई। जहाँ मंदिर था, मंदिर वहीं बनेगा। भूमिपूजन हो चुका है, सीमेंट-बालू-छड़-पत्थर आ रहे हैं। क्या पता बाबरी नस्ल के कुछ लोगों को भी रोजगार मिले और वो स्वयं हिन्दू आस्था के विराट प्रतीक को आकार लेता देख सकें। स्कोडा-लहसुन तहजीब का एक उदाहरण यह भी सही। जब सारी तथाकथित मुगलिया इमारतें हिन्दू कारीगरों और श्रमिकों ने ही बनाईं, तो बड़े भाई होने के नाते थोड़ा काम तो बाबर को बाप बताने वालों को दे ही सकते हैं। तहजीब की मशाल में वो भले ही बारूद डालते हैं, हमें तो गौ माता के दूध से बनी घी ही डालनी चाहिए।

आग लगाने वाले पीड़ित होने का नैरेटिव न चलाएँ

भारत उन चंद विचित्र राष्ट्रों में से एक है जहाँ स्टॉकहोम सिंड्रोम वृहद् तौर पर समाज को घेरे हुए है। अंग्रेजियत आवश्यकता से अधिक हमें पसंद है, और नाम में चिकन जहाँगीरी होने से हमें लगता है कि जहाँगीर ने ही अपनी बेगम के साथ संभोग कर के किसी पर्वत पर मुर्गी को जन्म दिया था। दासता और हिन्दू विरोधी शासन को औपनिवेशिक एवम् ऐतिहासिक गलतबयानी कि खुमारी से जूझता समाज अपने एकमात्र बेहतर भूतकाल के रूप में देखता है। उसे हर वह चीज दकियानूसी लगती है जो हिन्दू है, या हिन्दू धर्म की परम्पराओं से पोषित है।

यही कारण है कि आज वो भी बाबर को बाप बनाने पर आमादा हैं जिनके पूर्वजों को तलवार की नोक पर मतपरिवर्तन करा कर ‘शांतिप्रिय’ समुदाय का हिस्सा बना दिया गया था। भले ही जो कन्वर्ट हुए उनके सामने उनकी बेटियों की इज्जत लूटी गई हो, माँओं को नंगा कर के घसीटा गया हो, पूरे गाँव को जला दिया गया हो, लेकिन वो आज भी ‘आह अकबर, वाह औरंगजेब’ के नाम के कसीदे काढ़ने से नहीं चूकते।

आप ही सोचिए कि वह कैसी बेगैरत नस्ल होगी जो उन बलात्कारियों, आततायियों, हत्यारों, लुटेरों और आतंकवादियों को सजदा करती है जिन्होंने उन्हीं के घरवालों के साथ बलात्कार किया, अत्याचार किए, हत्याएँ कीं, गाँव लूटे और धार्मिक स्थलों को नष्ट किया। ऐसी बेगैरत नस्ल न सिर्फ जीवित है, बल्कि फल-फूल रही है और छाती ठोक कर कहती फिरती है कि बाबर उनका बाप था।

ऐसे लोग इस बात का रोना रोते हैं कि बाबरी में मूर्तियाँ रख दी गईं, जबकि इस बात पर कोई कुछ नहीं कह पाता कि हमारे मंदिर पर कुछ दोगलों ने पूरा विवादित ढाँचा ही रख दिया था। तुम्हारा ढाँचा अगर रातोंरात उग सकता है, तो हमारे रामलला भी प्रकट हो सकते हैं। हमारे रामलला के प्रकट होने के आसार ज्यादा हैं क्योंकि जमीन में नीचे तो मंदिर ही था, लेकिन बाबरी ढाँचा कैसे उग आया वहाँ, इसका साइंस तो बताओ! या फिर यही कह दो कि जैसे बिना चावल वाले रेगिस्तान से बिरयानी भारत में आई, वैसे ही बाबर अयोध्या में चादर बिछा कर बैठा और धप्प से ढाँचा आसमान से गिर कर स्थापित हो गया।

ये नैरेटिव नहीं चलेगा। भारत में जितने बड़े मंदिर थे, अगर वो वर्तमान में मंदिर ही नहीं हैं, वहाँ कुछ और है, तो उस कुछ और को मंदिर में बदलना हमारी पीढ़ी का कार्य होना चाहिए। क्रूर शासकों की लवस्टोरी पढ़ा कर पीढ़ी दर पीढ़ी एक पूरे समाज को सच्चाई से वंचित रख कर, मुगलों का जो बॉलीवुडीकरण हुआ है, उसे पलटना जरूरी है। इन बलात्कारी मुगलों का हमारे इतिहास में होना आवश्यक है, लेकिन उनके सच्चे रूप में। हमें यह पता होना चाहिए कि औरंगजेब ने कितने मंदिर तुड़वाए, टीपू सुल्तान ने हिन्दू महिलाओं को स्तन क्यों कटवाए, अकबर ने जोधाबाई से शादी की थी या ये फर्जीवाड़ा गढ़ा गया, रक्षाबंधन हुमायूँ और कर्णावती के कारण शुरू हुआ या फिर यह सनातन पर्व है।

सच बताने, रक्तपिपासु और हिन्दूविरोधी विचारों के क्रूरतम स्वरूप को स्कूली शिक्षा का अंग बनाने से ही हमारी पीढ़ी को पता चलेगा कि हमारे साथ हमारे अपनों ने ही छल किया है। न जाने कौन सी विवशता रही होगी कि लुटेरों के नाम पर दिल्ली में सड़कें हैं और देश आजाद होने के बाद भी ‘कूव्वत-उल-इस्लाम’ समेत हजारों मजहबी स्थल ऐसे हैं जिनकी दीवारों में, सीढ़ियों के पायदानों में, झरोखों में हिन्दू मंदिरों के अवशेष दिखते हैं। आज भी हिन्दुओं का उपहास करने के लिए, हिन्दुओं के ही पैसों से ‘रखरखाव’ के छद्मावरण के साथ इन जगहों को सँवारा जाता है। आज भी मुगलिया शासकों और उनके मुस्लिम सैन्याधिकारियों के मल को सर पर ढोने वाले डरपोक लोगों के नस्लें इन्हीं इमारतों का नाम ले कर चिढ़ाती हैं कि उनके ही बापों ने हिन्दुओं पर आठ सौ साल राज किया था।

तीस हजार मंदिरों का वापस लेना ही होगा

सरकारें आएँगी, जाएँगी लेकिन हिन्दू यहीं रहेगा क्योंकि उसके पास विकल्प है नहीं। हिन्दुओं को सरकार-निरपेक्ष हो कर, अपनी बात रखने, एक दवाब समूह की तरह कार्य करने और अपनी लड़ाई लड़ने के लिए सतत प्रयासरत होना पड़ेगा। इधर एक कौम है जो सत्ता में नहीं है, जो सत्ता में स्थापित प्रतिनिधियों को खुलकर अपना प्रतिनिधि मानने से इनकार करती है, लेकिन सारे कानून अपने हिसाब के बनवाती है, और विदेशी नागरिकों तक के लिए 53 लाशें गिरवा देती है क्योंकि वो उसकी कौम के हैं। दूसरी तरफ वह समुदाय है जिसके नेता हमेशा सत्ता में होते हैं, फिर भी कभी उसकी काँवड़ यात्रा पर पथराव होता है, कभी देवी दुर्गा की मूर्ति विखंडित होती है, कभी उसके शिवलिंग पर पेशाब कर दिया जाता है…

इसलिए, धीरे-धीरे ही सही, अपने अधिकारों की लड़ाई को अपने सामूहिक अस्तित्व से जोड़ कर देखना ही होगा। हमें हर सत्ताधीश को यह ध्यान दिलाना ही होगा कि राष्ट्र हमारा है, और हमारी उपेक्षा भारी पड़ सकती है। सत्ताधीश या सत्तारूढ़ दल हमारी बात समझ लें तो अच्छा है, वरना उन्हें अपनी बात मनवाने पर विवश करने आना चाहिए। किसी भी प्रकार की अशांति फैलाए बिना, सिर्फ संख्या बल के कारण, हिन्दू समाज अपने अधिकारों के लिए एकजुट हो सकता है, अपनी बात मनवा सकता है।

हर राष्ट्र में कानून बहुसंख्यकों के हिसाब से होता है और अल्पसंख्यकों को उसी दायरे के अनुकूल बनना पड़ता है। यहाँ हमेशा उल्टा होता आया है क्योंकि सर्वसमावेशन और सहिष्णुता की बात सिर्फ हिन्दुओं की ही जिम्मेदारी बन गई है। यहाँ दिन में पाँच बार कर्कश आवाज आपका ध्यान भंग करेगी, सर्वोच्च न्यायालय ने आदेश दे रखे हैं, लेकिन मजाल है कि एक मजहबी स्थल से लाउडस्पीकर उतार लिया जाए! वहीं हर दीवाली वायु प्रदूषण, हर होली जल की बर्बादी, हर करवाचौथ फेमिनिज्म और हर दुर्गापूजा बलात्कारी हिन्दू पुरुषों के नैरेटिव की बलि चढ़ जाते हैं।

ये इसलिए होता है क्योंकि हमने ऐसा होने दिया, और लम्बे समय तक ऐसा होने दिया। ये इसलिए होता है क्योंकि हमने इसे लम्बे समय तक मजाक में लिया, गंभीर नहीं हुए। दीवाली के लिए पूरे महीने पटाखे पर बैन और क्रिसमस-न्यू ईयर में चंद घंटे का प्रतिबंध बताता है कि हमारी आवाज छः दिन के उस कुक्कुर के बच्चे जैसी है जिसकी आँख भी नहीं फूटी है। जबकि हमारी आवाज ऐसी होनी चाहिए कि हम इन्हीं प्राधिकरणों के मुँह पर प्रदूषण का आँकड़ा फेंक कर मार सकें, उसे कोर्ट में घसीटें और वकीलों के जरिए परमादरणीय न्यायाधीशों से कहलवा सकें कि पटाखों द्वारा प्रदूषण के स्तर इतना कम है कि उस पर प्रतिबंध लगाना सिवाय हिन्दूघृणा के और कुछ है ही नहीं।

हमें उन संस्थाओं को वैचारिक और आर्थिक सहयोग देना होगा जो मंदिरों के पुनरुत्थान के लिए युद्धस्तर पर जुटे हुए हैं। हमें उन्हें खोजना, समझना और आगे बढ़ाना होगा जो हिन्दू मंदिरों को सरकारी चंगुल से मुक्त कराने के लिए प्रयासरत हैं। हमें हिन्दुओं द्वारा दान की गई राशि और संसाधनों को हिन्दुओं के गुरुकुलों, चिकित्सालयों, सेवाघरों, अनाथालयों, आश्रय गृहों आदि के लिए ही प्रयोग में लाने के लिए दवाब बनाने होंगे।

आखिर एक मंदिर के ट्रस्ट में ईसाई कैसे घुस जाता है? किसी सरकार को यह अधिकार कैसे मिल जाता है कि मंदिर के दान के पैसों से विधर्मियों के लिए संसाधन जुटाने की बातें होने लगती हैं? जबकि हमारा लक्ष्य यह होना चाहिए कि हमारे मंदिरों के पैसे का एक हिस्सा कानूनी लड़ाई के लिए अलग होना चाहिए और एक हिस्सा इस संघर्ष के लिए घेराबंदी, दवाब आदि के लिए जाना चाहिए।

तीस हजार बाबरियाँ हिन्दुओं के अस्तित्व का उपहास करती खड़ी हैं। हर मंदिर के लिए सत्तर साल की कानूनी लड़ाई का धैर्य हिन्दू समाज में नहीं होना चाहिए, क्योंकि यह धैर्य नहीं कायरता है। धार्मिक स्थलों की यथास्थिति को लेकर जो कानून है, उसे निरस्त करना समय की माँग है क्योंकि वो बिल्कुल ही हिन्दू विरोध में है। सिर्फ हिन्दुओं के ही मंदिर तोड़ कर मस्जिद बनाए गए हैं, अतः यह कानून सिर्फ कहने के लिए ‘हर धार्मिक स्थल’ के लिए है, जबकि इसका एक ही लक्ष्य है कि गैरकानूनी और अनैतिक रूप से मंदिरों को तोड़ कर बनाए गए मस्जिदों को सत्ता का संरक्षण देना।

कानून समाज के अनुरूप होने चाहिए, समाज कानून के अनुरूप नहीं हो सकता। पहले समाज है, तब कानून है। बहुसंख्यकों को गलत इतिहास की भाँग पिला कर एक समय तक ही सुलाया जा सकता है। अब वह समय आ गया है कि जब भी कोई ‘बाबरी जिंदा है‘ कहे, तो हमें कहना चाहिए कि हाँ, तीस हजार जिंदा है, और एक-एक को तोड़ कर, मंदिर वहीं बनाएँगे। तेल और उसका ब्रांड भले बदल जाएगा लेकिन नाम तो बाबर का मिटा ही देंगे।

जय श्री राम!