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बेटियों को लेकर बहन के घर से लौट रहे थे पत्रकार विक्रम जोशी, बदमाशों ने घेर कर मारी गोली, 8 गिरफ्तार

उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद के विजयनगर इलाके में विक्रम जोशी नाम के पत्रकार को सोमवार (जुलाई 20, 2020) की देर रात घर लौटते समय गोली मार दी गई। करीब 8 बदमाशों ने मिलकर इस घटना को अंजाम दिया। जिस समय वारदात घटी उस वक्त विक्रम अपनी बेटियों के साथ अपनी बहन के घर से वापस लौट रहे थे।

पड़ताल के दौरान हाथ लगी सीसीटीवी फुटेज से पता चलता है कि बदमाशों ने पहले उनकी बाइक को रोका। फिर उनको घेरा और बाद में गोली चलाकर फरार हो गए। पिता को लहु-लुहान देख कर बेटियाँ मदद के लिए रो रोकर गुहार लगाती रहीं। इस वीडियो में गोली मारने वाली घटना स्पष्ट रूप से कैद नहीं हो पाई है। मगर बेटियों का जमीन पर पड़े पिता के साथ की तस्वीर क्लियर है।

बता दें, इस मामले में गाजियाबाद पुलिस ने आज 8 लोगों को गिरफ्तार कर लिया है। इससे पहले एसएसपी कलानिधि नैथानी ने इस संबंध में बताया था कि विक्रम के भाई ने पुलिस को सूचना दी थी कि विजय नगर में उनके भाई (पत्रकार) पर हमला हुआ है और अज्ञात बदमाशों ने उनको गोली मारी है। इसके बाद उन्हें गाजियाबाद के यशोदा हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस समय विक्रम की हालत गंभीर बनी हुई है और उनका इलाज यशोदा अस्पताल में चल रहा है। फिलहाल पुलिस ने 8 आरोपितों को इस संबंध में गिरफ्तार किया है। इसकी जानकारी भी गाजियाबाद एसएसपी ने ही मामले में ताजा अपडेट के साथ दी है।

न्यू इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, इस मामले आरोपितों की पहचान रवि, छोटू, मोहित, दलवीर, आकाश उर्फ ​​लूली, योगेंद्र, शकीर और अभिषेक के रूप में हुई है। इसके अलावा एक अन्य आरोपित आकाश बिहारी की तलाश भी पुलिस को है।

इस मामले में गाजियाबाद के प्रताप विहार के चौकी इंचार्ज को भी निलंबित किया गया है। एसएसपी ने इस संबंध में मीडिया को बताया कि परिजनों ने स्थानीय पुलिस पर पूर्व में चौकी पर शिकायत करने पर समुचित कार्रवाई न किए जाने का आरोप लगाया है। जिसकी जाँच क्षेत्राधिकारी प्रथम राकेश मिश्रा ने की । प्रारम्भिक जाँच के बाद चौकी इंचार्ज प्रताप विहार सब इंस्पेक्टर राघवेंद्र को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया गया है।

कहा जा रहा है कि इससे पहले भी विक्रम जोशी ने थाना विजय नगर में एक तहरीर दी थी, जिसमें उन्होंने बताया था कि कुछ लड़के उनकी भांजी के साथ छेड़खानी करते हैं। जिसका उन्होंने विरोध भी किया। हालाँकि, मामले में क्या कार्रवाई हुई इसका नहीं पता चल पाया। लेकिन उसके बाद ही पत्रकार पर ये हमला हुआ।

भांजी के साथ छेड़खानी मामले में विक्रम जोशी के भाई अनिकेत जोशी भी जिक्र करते हैं। वे बताते हैं कि उनकी भांजी के साथ कुछ लड़के छेड़खानी कर रहे थे, जिसका विरोध उनके भाई विक्रम जोशी ने किया था। विक्रम जोशी ने इसकी तहरीर थाने में भी दी थी ओर मुकदमा भी लिखा गया। मगर, सोमवार को उन लोगों ने मेरे भाई पर हमला कर दिया।

मिड-डे ने सुशांत को मनोवैज्ञानिक के नाम पर बताया ‘बाइपोलर डिसॉर्डर’ से पीड़ित: सवाल पूछने पर खुली पोल, एडिट की स्टोरी

सुशांत सिंह राजपूत की मौत के बाद से मीडिया चैनलों में और अखबारों में तरह-तरह की बातें चल रही हैं। कोई उनके प्रोफेशनल लाइफ पर बात कर रहा है। कोई उनके निजी जीवन पर टिप्पणियाँ कर रहा है। इसी बीच मिड-डे अखबार का एक कारनामा उजागर हुआ है।

दरअसल, मिड-डे ने अपने एक लेख में सुशांत को बाइपोलर डिसऑर्डर से पीड़ित बताया और जब फिल्म एडिटर अपूर्वा ने इस पर उनके सूत्रों के बारे में पूछा। तो फौरन आर्टिकल से बाइपोलर डिसऑर्डर हटाकर डिप्रेशन कर दिया।

इस बात को अपूर्वा ने खुद ट्विटर पर शेयर किया। उन्होंने लिखा, “आज मिड-डे ने अपनी स्टोरी में एक अज्ञात मनोवैज्ञानिक के हवाले से दावा किया कि सुशांत को बाइपोलर डिसऑर्डर है। मगर जैसे ही मैंने इस अज्ञात सूत्र के बारे में पूछा, लेख को फौरन एडिट कर दिया गया और उसकी बीमारी को डिप्रेशन में बदल दिया गया।” अपूर्वा मिड-डे की इस हरकत को उजागर करते हुए अपील करते हैं कि कंगना के प्रति अपनी नफरत की आड़ में अन्याय को ढँकने काम न करें।

यहाँ बता दें मिड-डे में सुशांत के ऊपर ये स्टोरी करने वाले रिपोर्टर का नाम फैजान खान है। जिन्होंने अपनी स्टोरी की हेडलाइन में भी उन्हें बाइपोलर डिसऑर्डर से पीड़ित बताया । लेकिन बाद में हेडलाइन बदलकर ये लिख दिया कि सुशांत लगातार डॉक्टर बदल रहे थे और दवाई भी छोड़ रहे थे। इसकी पुष्टि मनोवैज्ञानिक ने पुलिस के सामने की है।

मिड-डे की हरकत उजागर होने के बाद यूजर फिल्मफेयर को लेकर भी गौर करवा रहे हैं। स्क्रीनशॉट में बताया जा रहा है कि फिल्मफेयर ने भी सुशांत को बाइपोलर डिसऑर्डर से पीड़ित बताया। मगर, जब सवाल पूछे गए तो ट्वीट डिलीट हो गया।

सोशल मीडिया यूजर्स ये सब देखकर ऐसे लोगों पर लीगल कार्रवाई की माँग उठा रहे हैं और कह रहे हैं कि आज एक मृत व्यक्ति को मानसिक तौर पर पीड़ित बताया जा रहा है। ये पत्रकारिता का कैसा घटिया प्रयास है। शर्म आनी चाहिए। यूजर्स के अनुसार, बॉलीवुड का माफिया अब वही कर रहा है जो कंगना ने अनुमान लगाया था। ये लोग ऐसे लेखों से मुद्दे को भटकाकर खुद को बचाना चाहते हैं।

अफगानिस्तान के 700 प्रताड़ित सिखों, हिंदुओं को भारत में आने और लम्बे समय रहने की दी गई अनुमति: रिपोर्ट्स

अफगानिस्तान में अपहृत सिख नेता के छोड़ने के कुछ दिनों बाद अब गृह मंत्रालय ने अफगानिस्तान में रहने वाले 700 सिखों और हिंदुओं को दीर्घकालिक वीजा (long-term visa) देने की मंजूरी दे दी है। कश्मीरी पत्रकार आदित्य राज कौल के अनुसार इस तरह का दीर्घकालिक वीजा केवल क्षेत्र में प्रताड़ित अल्पसंख्यकों को दिया जाता है।

रिपोर्ट के अनुसार, भारत सरकार स्वतंत्रता दिवस से पहले उक्त अफगान नागरिकों को भारत लाने के लिए सभी आवश्यक औपचारिकताओं को पूरा कर रही है। रिपोर्ट में कहा गया है कि इस साल 25 मार्च को हुए गुरुद्वारा पर हमले के बाद लगभग 600 सिखों ने भारत में इतने लंबे समय के वीजा के लिए आवेदन किया था। बता दें कि काबुल में गुर हरराय साहिब गुरुद्वारा में हुए हमले में 27 निर्दोष सिखों की दर्दनाक मौत हो गई थी।

एक सरकारी अधिकारी ने बताया, “गृह मंत्रालय ने हाल ही में अफगान सिख और हिंदुओं को भारत में आश्रय देने की माँग को स्वीकार किया है। प्रारम्भ में 700 ऐसे नागरिकों को चिन्हित किया गया है, और उन्हें संभवत 15 अगस्त से पहले सकुशल भारत ले भी आया जाएगा।”

बताया जा रहा है कि भारत में आने वाले अफगान अल्पसंख्यकों में वे लोग शामिल हैं, जिन्हें सुरक्षा संबंधी खतरे हैं और भारत में उनके रिश्तेदार हैं।

उल्लेखनीय है कि अफगानिस्तान के मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में बहुत कम सिख और हिंदू समुदाय बचे हैं, जिन्हें ज्यादातर इस्लामी कट्टरपंथी नियंत्रित करते हैं। भारत ने पिछले साल नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) लाकर पड़ोसी इस्लामिक देशों में प्रताड़ित अल्पसंख्यकों के लिए भारतीय नागरिकता हासिल करने की प्रक्रिया में ढील दी थी।

अफगानिस्तान में अपहृत सिख को छुड़ाया गया

गौरतलब है कि अफगानिस्तान में सिख व्यक्ति निधान सिंह सचदेवा का 1 महीने पहले अपहरण कर लिया गया था। उन्हें शनिवार (जुलाई 18, 2020) को छोड़ दिया गया। सिख निधान सिंह सचदेवा को अफगानिस्तान के पक्तिआ प्रान्त में स्थित एक गुरूद्वारे से अपहृत कर लिया गया था। भारत ने उनकी रिहाई के लिए अफगानिस्तान सरकार को धन्यवाद दिया था।

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अनुराग सचदेवा ने अफगान नेतृत्व, सुरक्षा बलों और आदिवासी बुजुर्गों की सराहना की। भारत सरकार ने संकेत दिया है कि यदि वह नागरिक संशोधन अधिनियम के तहत भारतीय नागरिकता के लिए आवेदन करती है, तो सरकार अनुरोध पर कार्रवाई करेगी। सचदेवा 1990 के दशक में अपने परिवार के साथ भारत आ गए थे और भारतीय नागरिकता के योग्य हैं। सचेदवा ‘लॉन्ग टर्म वीजा’ लेकर लम्बे समय से दिल्ली में रह रहे हैं।

12वीं की NCERT पॉलिटिकल साइंस किताब में जोड़ा गया अनुच्छेद 370 हटाने का अध्याय, हटाया J&K से ‘अलगाववाद’

एनसीआरटी ने कक्षा 12 की राजनीति विज्ञान की किताब में जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाए जाने पर एक अध्याय शामिल किया गया है। वहीं दूसरी तरफ ‘Separatism and beyond’ नाम के हिस्से को हटा कर ‘2002 and Beyond’ जोड़ दिया गया है। किताब का नाम ‘Politics in India since Independence’ है और उस अध्याय का नाम ‘Regional Aspirations’ है।

5 अगस्त साल 2019 के दिन केंद्र सरकार ने जम्मू कश्मीर को अनुच्छेद 370 के तहत मिला विशेष राज्य का दर्जा वापस ले लिया था। राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों में बाँट दिया गया था, जम्मू -कश्मीर और लद्दाख। ‘2002 and Beyond’ नाम के हिस्से में ऐसा लिखा है “महबूबा मुफ़्ती के शासन में सबसे ज़्यादा आतंकवाद और आतंरिक – बाहरी स्तर पर तनाव भी देखा गया। जून 2018 में जैसे ही भारतीय जनता पार्टी ने अपना समर्थन वापस लिया वैसे ही राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया गया। इसके बाद जम्मू कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम तैयार किया गया और उसके अंतर्गत उसे दो केंद्र शासित राज्यों में बाँट दिया गया, जम्मू-कश्मीर और लद्दाख।

कुल मिला कर ‘2002 and Beyond’ नाम का अध्याय जम्मू कश्मीर की गठबंधन सरकार और राज्य से अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बारे में बात करता है। अध्याय के मुताबिक़ जुलाई साल 2008 के दौरान राज्य में राष्ट्रपति शासन लग जाने के बाद कॉन्ग्रेस के ग़ुलाम नबी की सरकार अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाई थी। समझौते के तहत मुफ़्ती मोहम्मद सईद ने गठबंधन में हुए समझौते के तहत शुरू के तीन साल सरकार चलाई थी।

इसके बाद साल 2008 के नवंबर दिसंबर महीने में चुनाव हुए। अध्याय के मुताबिक़ “एक बार फिर गठबंधन की सरकार सत्ता में आई। जिसके मुखिया थे उमर अब्दुल्ला लेकिन राज्य के भीतर हुर्रियत कॉन्फ्रेंस की तरफ से तनाव जारी था। साल 2014 में एक बार फिर विधानसभा चुनाव हुए। इस चुनाव में बीते 25 सालों की तुलना में सबसे ज़्यादा मतदान हुए।” 

इस बार पीडीपी और भाजपा की गठबंधन सरकार सत्ता में आई। इस अध्याय के मुताबिक “साल 2016 के अप्रैल महीने में मुफ़्ती मोहम्मद सईद की मृत्यु के बाद उनकी बेटी महबूबा मुफ़्ती सईद जम्मू कश्मीर की पहली महिला मुख्यमंत्री बनीं।” अध्याय में इस कार्यकाल को हिंसक भी बताया गया है।

जम्मू कश्मीर और यहाँ होने वाली हिंसा का ज़िक्र करने वाला अध्याय कुछ ऐसे शुरू होता है। “जैसा कि आपने पिछले हिस्से में पढ़ा होगा, अनुच्छेद 370 के तहत जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा मिला हुआ है। जम्मू कश्मीर में हुई हिंसा, सीमा पार से होने वाला आतंकवाद और राजनीतिक अस्थिरता ने राज्य को भीतर और बाहर दोनों तरफ से प्रभावित किया।” 

इसके अलावा अध्याय में यह भी लिखा हुआ है, “इसकी वजह से राज्य के निर्दोष नागरिक और सुरक्षाकर्मी समेत बहुत से लोगों की जान गई। इतना ही नहीं, बहुत बड़े पैमाने पर कश्मीरी पंडितों का विस्थापन भी हुआ।” इसके अलावा अध्याय में राज्य का इतिहास, अनुच्छेद 370 की वजह से हुई हिंसा को हटा कर बताया गया है। अध्याय में लिखा है, “अपने जम्मू कश्मीर में हुई हिंसा के बारे में ज़रूर सुना होगा। इसकी वजह से बहुत से मासूम जानें गईं और तमाम परिवारों को अपना घर तक छोड़ना पड़ा। कश्मीर विवाद भारत और पाकिस्तान के बीच हमेशा से ही एक बड़ा विवाद रहा है। लेकिन राज्य की राजनीति के कई पहलू हैं।”

एक और बदलाव, इस बात का ज़िक्र करता है जब कश्मीर विवाद संयुक्त राष्ट्र में रखा गया था। अध्याय में लिखी हुई जानकारी के मुताबिक, “यह विवाद संयुक्त राष्ट्र संघ में पेश किया गया था। फिर संयुक्त राष्ट्र ने इस मुद्दे का हल निकालने के लिए 21 अप्रैल 1948 के प्रस्ताव के आधार पर 3 चरणों की प्रक्रिया का सुझाव दिया। सबसे पहले पाकिस्तान को कश्मीर में मौजूद अपने सारे नागरिक वापस बुलाने होंगे। दूसरा, भारत को वहाँ सुरक्षाबलों की संख्या घटानी चाहिए, जिससे वहाँ शांति स्थापित हो। तीसरा, इतना कुछ होने के बाद राज्य में निष्पक्ष होकर एक जनमत संग्रह कराया जाए। लेकिन अफ़सोस इसमें से किसी भी सुझाव पर काम नहीं हो पाया।”

इसके बाद नई और पुरानी किताबों को पढ़ने और तुलना करने के बाद एक और बात पता चलती है। नई किताब में जम्मू कश्मीर के तीन नए सामाजिक/राजनीतिक हिस्सों (जम्मू, कश्मीर और लद्दाख) को परिभाषित करने के दौरान “Heart of kashmir region is the kashmir valley” जैसी पंक्ति हटा दी गई है। “जम्मू का इलाका तलहटी और मैदानों का मिश्रण है। यहाँ मूल रूप से हिन्दू, मुस्लिम, सिख समेत कुछ अलग समुदाय के लोग भी रहते हैं।”

किताब के नए संस्करण में यह भी लिखा है, “कश्मीर इलाके में महज़ कश्मीर घाटी ही है। इसमें मुख्य रूप से कश्मीरी मुस्लिम रहते हैं और कुछ हिन्दू, सिख, बौद्ध समुदाय के लोग रहते हैं। लद्दाख ज़्यादातर पहाड़ों से घिरा हुआ है, यहाँ की आबादी बहुत कम है। जिसमें लगभग आधे मुस्लिम और आधे बौद्ध हैं।” 

कुल मिला कर किताब के नए और संशोधित संस्करण में कश्मीरियत को बहुत अच्छे से परिभाषित किया गया है। लेकिन ‘कश्मीरियत’ का ज़िक्र नहीं किया गया है। जिसका उल्लेख किताब के पुराने संस्करण में था। पुराने संस्करण के मुताबिक, ‘कश्मीर मुद्दा’ सिर्फ भारत और पाकिस्तान के बीच का विवाद नहीं है। इस मुद्दे के भीतर और बाहर भी कई आयाम हैं। विवाद की एक बड़ी वजह ‘कश्मीरियत’ और यहाँ के राजनेताओं की राजनीतिक आकांक्षाएँ हैं। 

वहीं नए बदलावों के मुताबिक कश्मीर की व्याख्या ही विवादों की असल जड़ रहा है। पाकिस्तान के नेताओं का ऐसा मानना था कि कश्मीर उनका हिस्सा है क्योंकि वहाँ की ज़्यादातर आबादी मुस्लिम थी। जबकि लोग ऐसा नहीं सोचते थे, लोगों के हिसाब से कश्मीरी सबसे ऊपर थे। इस पूरे विवाद को ‘कश्मीरियत’ नाम दिया गया था। अंत में किताब का नया संस्करण बहुलवाद की बात करता है।

“जम्मू कश्मीर और लद्दाख भारत के विविध समाज का असल उदाहरण हैं। वहाँ केवल हर तरह की विविधता (धार्मिक, सांस्कृतिक, भाषिक, सामाजिक आदि) ही नहीं है। बल्कि पिछले कुछ समय में इन्हीं के चलते राज्य में विविधता के आधार पर कई बड़े बदलाव हुए हैं।”

2 साल तक अपनी ही नाबालिग बेटी से मदरसा शिक्षक अब्बू 6 साथियों के साथ करता रहा रेप

केरल के कासरगोड जिले की नीलेश्वर पुलिस ने सोमवार (जुलाई 20, 2020) को 50 वर्षीय एक मदरसा शिक्षक को गिरफ्तार किया है, जो अपनी 16 वर्षीय बेटी के साथ पिछले दो वर्षों से बार-बार रेप और यौन शोषण कर रहा था।

जानकारी के मुताबिक पीड़िता के साथ उसके अब्बू समेत 7 लोगों ने बलात्कार किया था। पुलिस ने मदरसा शिक्षक (पीड़िता का अब्बू) सहित 4 लोगों को गिरफ्तार किया है। 3 की तलाश जारी है। मदरसा शिक्षक के अलावा गिरफ्तार तीन आरोपितों के नाम रियास (19), एजाज (20) और मोहम्मद अली (20) है। सभी सात आरोपितों के खिलाफ POCSO एक्ट के तहत मामला दर्ज किया गया है।

Janam TV की रिपोर्ट के मुताबिक पीड़िता ने पुलिस को दिए अपने बयान में दावा किया कि उसके पिता तीन साल से उसके साथ छेड़छाड़ और बलात्कार कर रहे थे। पीड़िता के साथ घर पर बलात्कार किया गया और एक बार उसका गर्भपात भी कराया गया।

जाँच अधिकारी पीआर मनोज ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि पीड़िता का दो महीने पहले गर्भापत कराया गया। एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने कहा, “गर्भपात करने वाले डॉक्टर की भी जाँच चल रही है क्योंकि वह अपराध की जानकारी देने में विफल रहा।”

लड़की के मामा के निर्देश पर नीलेश्वरम पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज होने के बाद यह घटना सामने आई। हालाँकि, पीड़ित की माँ को घटना के बारे में पता था, लेकिन वह पुलिस के पास नहीं पहुँची। पुलिस ने कहा कि घटना को छिपाने के लिए माँ पर भी आरोप लगाया जाएगा। पीआर मनोज का कहना है कि अभी सिर्फ शुरुआती जाँच हुई है, मामले में और भी आरोपित हो सकते हैं।

जाँच अधिकारी के मुताबिक पीड़िता के अब्बू POCSO मामले में पहले से ही अपराधी है। पीआर मनोज ने बताया कि मदरसा शिक्षक का यौन अपराध का अतीत रहा है। 2017 में उस पर चार नाबालिग लड़कों के यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया गया था।

बेकल पुलिस स्टेशन में उस पर POCSO अधिनियम के तहत चार मामले दर्ज किए गए थे, हालाँकि बाद में उसे जमानत मिल गई थी। एक अधिकारी ने बताया कि वह कर्नाटक के दक्षिण कन्नड़ जिले में सुलिया का मूल निवासी है। उसकी एक और पत्नी और पाँच बच्चे हैं। वह मदरसे में पढ़ाने के लिए कासरगोड आया था। मगर बेकल में यौन शोषण आरोप के बाद उसे बर्खास्त कर दिया गया था।

गौरतलब है कि इसी तरह के एक मामले में, भोपाल में नाबालिग बच्चियों के यौन शोषण के मुख्य आरोपित प्यारे मियाँ ने भी बेटी के रूप में गोद ली गई 13 साल की बच्ची से भोपाल और इंदौर में दुष्कर्म किया था। जाँच में सामने आया था कि प्यारे मियाँ का रैकेट नाबालिग बच्चियों को फँसाकर रसूखदारों के सामने पेश करता था। इस रैकेट में फँसाई गईं लड़कियाँ प्यारे मियाँ को ‘अब्बू’ कहकर बुलाती थीं।

बॉलीवुड की वो फिल्म, जिसमें पाकिस्तानी दर्शकों का ख्याल रखते हुए बदल दी गई कहानी

“कॉलिंग सहमत” (calling sehmat) नाम की एक किताब है, जिसके लेखक हैं हरिंदर सिक्का। आलिया भट्ट की फिल्म ‘राज़ी’ इस किताब पर ही आधारित है। सोमवार के दिन उन्होंने अपनी किताब से जुड़ा एक बड़ा खुलासा किया। हरिंदर सिक्का ने बताया कि फिल्म का अंतिम हिस्सा उनकी किताब से पूरी तरह अलग है। 

रिपब्लिक टीवी चैनल पर एक चर्चा के दौरान हरिंदर सिक्का ने इस बात का ज़िक्र किया। उन्होंने बताया कि फिल्म का अंतिम हिस्सा उनकी लिखी हुई किताब से पूरी तरह अलग है। सिक्का ने यह भी कहा कि फिल्म की निर्देशक मेघना गुलज़ार ने ऐसा पाकिस्तान के दर्शकों को रिझाने के लिए किया।

फिल्म की नायिका सहमत (आलिया भट्ट) जो पाकिस्तान में जासूसी करने वाली भारतीय जासूस का किरदार निभाती है। उसे इस बात की नाराज़गी होती कि उसका इस्तेमाल किया जा रहा है। हरिंदर सिक्का ने समझाया कि यह ‘नाराज़गी’ और ‘इस्तेमाल’ ही पाकिस्तान के दर्शकों को खुश करने के लिए जबरन ठूँसा गया।

फिल्म में ऐसा दिखाया जाता है कि पाकिस्तान की सेना 1971 में भारत पर हमले की योजना बनाती है। लेकिन अंततः बांग्लादेश पाकिस्तान से अलग होकर एक नया देश बन जाता है। सहमत इसका खुलासा करती है और उसे इस बात का बहुत पछतावा रहता है। जबकि असलियत में उसके लिए देश से बढ़ कर कुछ नहीं था। सहमत ने खुफिया जानकारी इकट्ठा करने के दौरान पाकिस्तानी सेना में भर्ती अपने पति को जान से मार दिया था। इसके कुछ ही समय बाद वह जानकारी लेकर भारत वापस आ गई थी। 

फिल्म में ऐसा दिखाया गया है कि अपने पति को मारने के बाद वह काफी दुखी हो जाती है। लेकिन हरिंदर सिक्का ने बताया कि फिल्म की असल नायिका (किताब वाली) को भारत लौटने या पति को मारने का ज़रा भी दुःख नहीं था। लेकिन निर्देशक मेघना गुलज़ार ने पाकिस्तानी दर्शकों को रिझाने के लिए फिल्म का “नैरेटिव” ही बदल दिया।

पिछले कुछ समय में नेपोटिज़्म और बॉलीवुड माफिया पर बहस शुरू हुई है। इसी पर हरिंदर सिक्का ने अपना नज़रिया रखा। उन्होंने यह भी बताया आखिर कैसे बॉलीवुड की मशहूर हस्तियाँ गुटबाजी करती हैं। हरिंदर सिक्का ने राज़ी की निर्देशक पर सारा श्रेय लेने का आरोप लगाया। साथ ही यह भी कहा कि ऐसे लोग नहीं चाहते हैं कि किसी बाहरी को पुरस्कार मिले।   

जो हिंदू लड़की निकाह कर बनी मुस्लिम और फिर आतंकी… उसकी माँ ने कहा – ‘बेटी को सजा मिले’

ढाका पुलिस की काउंटर टेररिज्म एंड ट्रांसनेशनल क्राइम (सीटीटीसी) की इकाई ने शुक्रवार (जुलाई 17, 2020) को आएशा जन्नत नामक एक युवती को गिरफ्तार किया था, जिसका नाम पहले प्रज्ञा देबनाथ था। वो पश्चिम बंगाल के हुगली की निवासी है, जो पहले संस्कृत की छात्रा थी। इस्लामी धर्मान्तरण के बाद कट्टरता की आग में ऐसी कूदी कि अब वो आतंकी संगठनों में भर्ती करती है।

इससे अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि पश्चिम बंगाल में इस्लामी धर्मान्तरण और माइंडवॉश का कैसा खतरनाक खेल चल रहा है। कोलकाता ही नहीं बल्कि पश्चिम बंगाल के अन्य जिलों में, गाँवों में असली खेल चल रहा है। आएशा जन्नत (पहले प्रज्ञा देबनाथ) बंगाल की धनियाखाली कॉलेज में पढ़ाई करती थी। उसकी माँ गीता कपड़ों की सिलाई कर के परिवार का पालन-पोषण करती है। लॉकडाउन में उसके पिता प्रदीप की भी नौकरी छिन गई।

प्रदीप बतौर सिक्योरिटी गार्ड काम करते थे। दसवीं और बारहवीं की परीक्षाओं में अच्छे नंबर लाने वाली प्रज्ञा देबनाथ (अब आएशा जन्नत) ने कॉलेज में संस्कृत पढ़ने का निर्णय लिया। इसी दौरान उसका संपर्क एक लड़के से हुए, जो आतंकवादी था। दोनों के बीच प्रेम-सम्बन्ध प्रगाढ़ होते चले गए और एक दिन अचानक से प्रज्ञा देबनाथ ने अपनी माँ को फोन कर के बताया कि उसने इस्लाम अपना कर अपने बॉयफ्रेंड से निकाह कर लिया है और अब आएशा जन्नत बन गई।

उसी लड़के ने प्रज्ञा देबनाथ को ऑनलाइन बंगाल व बांग्लादेश के आतंकी संगठनों से परिचय कराया। प्रज्ञा देबनाथ सितम्बर 24, 2016 को किताब खरीदने के बहाने घर से बाहर जो निकली, उसके बाद वापस नहीं लौटी। बस उसके परिवार तक उसका कॉल ही आया, जिसने सबके होश उड़ा दिए। वो बांग्लादेश में जन्नतुल तस्नीम नाम से काम करती थी। आतंकी के तौर पर उसका नाम आएशा जन्नत रखा गया।

आतंकी आएशा जन्नत का सफर

अधिकतर आतंकी संगठन अपने आतंकियों को ऐसे ही कई नामों से काम करने की सलाह देते हैं। आएशा ने ऑनलाइन माध्यमों का इस्तेमाल कर के युवाओं को भड़काना शुरू कर दिया। इसके बाद वो बांग्लादेश के ही एक अनरजिस्टर्ड मदरसा में पढ़ाने लगी। बांग्लादेश को वैसे भी ‘टेरर इन्ट्रोडक्शन प्रोग्राम’ का अड्डा माना जाता है। आएशा जमात-उल-मुजाहिद्दीन के महिला प्रकोष्ठ की सबसे बड़ी सरगना तब बन गई, जब उसकी मुखिया आसमानी खातून को गिरफ्तार किया गया।

वो मार्च 2020 से ये काम देख रही थी। उसने ओमान में स्थित एक बांग्लादेशी टेरर फाइनेंसर से निकाह किया, जो काफ़ी अमीर है। हालाँकि, कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में ये भी कहा गया है कि आएशा स्कूल के दौरान ही किसी के संपर्क में आने के बाद कन्वर्ट हो गई थी। यह और बात है कि पूछताछ में उसने बताया था कि उसका जबरन धर्मांतरण हुआ था, जब वो कक्षा 9 में थी। उसकी उम्र महज 25 साल ही है, लेकिन उसने आतंक की दुनिया में कई सीढ़ियाँ बड़ी कम उम्र में लाँघ लीं।

आएशा ने साल 2016 से ही ढाका में घूमना शुरू कर दिया था। सबसे पहले उसने नकली जन्म प्रमाण पत्र बनवाया। इसकी मदद से बांग्लादेशी पहचान पत्र भी बनवाया। इतने के अलावा उसके पास एक भारतीय पासपोर्ट भी बरामद हुआ है। आएशा ने ओमान में रह रहे आमिर हुसैन सद्दाम नाम के बांग्लादेशी युवक से फोन पर ही शादी की थी। उसने ढाका में घर लिया और शहर के ही केरानीगंज और नारायणगंज इलाके में स्थित मदरसे में धार्मिक शिक्षक बन गई थी।

‘द न्यू इंडियन एक्सप्रेस’ की खबर के अनुसार, उसके गाँव के लोग अभी भी उसे एक होनहार विद्यार्थी के रूप में ही जानते हैं, जो साइकिल से पढ़ने जाती थी और लोगों से हँस-बोल कर मिलती थी। उसकी माँ को वो दिन अब भी याद है जब वो हमेशा के लिए घर छोड़ कर निकल गई थी। फोन ऑफ आने के बाद परिवार ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी। जब उसने इस्लाम अपनाने की फोन पर जानकारी दी थी, तब उसने फोन पर कहा था कि वो अंतिम बार उनसे बात कर रही है और उनकी दुआ चाहती है।

उसके पड़ोसी कहते हैं कि वो काफी शर्मीली थी और उन्हें इसका अंदाज़ा तक नहीं था कि वो आतंकी बन जाएगी। सब उसे एक सीधी-सादी कॉलेज की लड़की के रूप में ही याद करते हैं। उसकी माँ गीता को स्थानीय मीडिया से अपनी बेटी की गिरफ़्तारी की खबर मिली। उन्होंने सोचा था कि वो अपनी बेटी को अब शायद कभी नहीं देख पाएगी। वो चाहती हैं कि क़ानून के मुताबिक उनकी बेटी को सज़ा मिले।

महेश भट्ट की बीवी-बेटी सब पड़ गई कंगना के पीछे, ‘खुलासे’ के बाद सोशल मीडिया पर डाले पोस्ट

कंगना रनौत ने हाल में रिपब्लिक टीवी को एक इंटरव्यू दिया। इस इंटरव्यू के बाद बॉलीवुड की लॉबी और वहाँ के ताकतवर परिवारों को लेकर मुद्दा और गरमा गया। कंगना ने अपने इंटरव्यू में जिन लोगों को आड़े हाथों लिया, उसमें से एक महेश भट्ट का परिवार भी है। 

कंगना के अनुसार महेश भट्ट के ऑफर को यदि कोई कलाकार ठुकराता है तो वो नाराज हो जाते हैं। कंगना बताती हैं कि एक बार तो महेश भट्टे ने उन्हें जूता फेंक कर मार दिया था। उनकी गलती बस ये थी कि उन्होंने फिल्म को नकार दिया था और उसके कंटेंट पर सवाल उठाया था।

रिपब्लिक टीवी को दिए इंटरव्यू में कंगना बताती हैं कि उन्हें धोखा फिल्म ऑफर हुई थी। ये फिल्म एक सुसाइड बॉम्बर के बारे में थी। मगर, कंगना किसी आत्मघाती हमलावर का महिमामंडन नहीं करना चाहती थी। ये वो समय था, जब वो 18 साल की ही थी और इस बात को समझती थीं कि अत्याचार के बदले भी सुसाइड बॉम्बर बनना ठीक नहीं है। 

उनके मुताबिक महेश भट्ट ने इस बात को लेकर उन पर बहुत गुस्सा किया और चार्ज भी लगाया। वे कहती हैं कि भट्ट उस समय उन पर चिल्लाए। मगर पूजा भट्ट ने उन्हें नहीं रोका। अपने इस इंटरव्यू में कंगना ने सुशांत पर अपनी बात रखी और कहा कि अगर महेश भट्ट सुशांत की काउंसलिंग कर रहे थे, तो वो दिमागी रूप से और परेशान हो गए होंगे।

वो पूछती हैं कि आखिर इन लोगों को कौन अधिकार देता है कि वो एक एक्टर को ये बोलें कि तुम्हारा अंत नजदीक है? अगर इन्हें पता था कि सुशांत अच्छा महसूस नहीं कर रहे, तो उन्होंने उसके पिता को क्यों फोन करके नहीं बताया कि उनका बेटा ठीक नहीं है।

कंगना माँग करती हैं कि पुलिस को भट्ट परिवार से सुशांत की आत्महत्या मामले में पूछताछ करनी चाहिए। उनका कहना है कि महेश भट्ट आखिर सुशांत और रिया के बीच में क्या कर रहे थे? इसे हर कोई जानना चाहता है। फिर मुंबई पुलिस उन्हें पूछताछ के लिए क्यों नहीं बुला रही।

गौरतलब हो कि कंगना के इस इंटरव्यू के बाद पूरा भट्ट परिवार अजीबोगरीब स्टेटस सोशल मीडिया पर शेयर करने लगा। इन स्टेटस को पढ़कर लगता है कि जैसे वे कंगना की बातों पर अपनी ओर से कोई संदेश देना चाहते हैं।

सबसे पहले महेश भट्ट लिखते हैं, “सच्चे शब्द स्पष्ट नहीं होते। स्पष्ट शब्द सच्चे नहीं होते। समझदार लोगों को अपने आप को साबित करने की जरूरत नहीं होती और जिन्हें खुद को साबित करना पड़े, वो समझदार नहीं होते।”

पूजा भट्ट अपने ट्वीट में कामंड कजौरी को कोट करते हुए लिखती हैं, “हम जब दूसरे लोगों के बारे में बोलना शुरू करते हैं तो हम अपने बारे में बहुत सी बातों का खुलासा करते हैं।”

इसके बाद सोनी राजदान भी अपने इंस्टाग्राम पर लिखती हैं कि कोई झूठ तभी तक चलता है, जब तक सच उस पर भारी न पड़े।

यहाँ बता दें कि कंगना रनौत ने अपने साक्षात्कार में सिर्फ़ भट्ट परिवार पर इल्जाम नहीं लगाए थे। बल्कि करण जोहर और यशराज फिल्म को भी नेपोटिज्म मामले पर आड़े हाथों लिया था। इसके बाद करण जौहर का एक क्लिप वायरल हुआ, जिसमें वो कह रहे थे कि कंगना को इंडस्ट्री छोड़ देनी चाहिए।

इस रक्षाबंधन सब सूना, मेरे भाई अंकित को क्यों मारा: रोती बहन का सवाल, दंगाइयों का बचाव करने वाले लिबरल देंगे जवाब?

दिल्ली दंगों के दौरान ताहिर हुसैन और उसके गुंडों पर आईबी में कार्यरत रहे अंकित शर्मा की बेरहमी से हत्या करने का आरोप है। दंगों की जाँच के बीच रक्षाबंधन भी आने वाला है। ऐसे में अंकित शर्मा की बहन इस बार राखी किसे बाँधेंगीं, यही सोच कर वो बार-बार बिलख कर रो उठती हैं। ताहिर हुसैन और खालिद सैफी जैसों ने एक बहन से उसके निर्दोष भाई को छीन लिया और लिबरल गैंग उलटा दंगाइयों को बचाने में लगा रहा।

‘Kreately’ की ख़बर के अनुसार, अंकित शर्मा की बहन सोनम बार-बार यही पूछते हुए रो उठती हैं कि मेरे भाई को क्यों मारा, इस बार मैं राखी किसे बाँधूँगी? सोनम का कहना है कि इस रक्षाबंधन उनके लिए सब कुछ सूना-सूना सा है। जब कई नेता, पत्रकार और बुद्धिजीवी हत्यारोपित ताहिर हुसैन और खालिद सैफी जैसों को बचाने में लगे हुए हैं, क्या उन्हें एक बहन की चीख नहीं सुनाई दे रही है?

हाल ही में कट्टर इस्लामी पत्रकार राणा अयूब ने ट्विटर पर खालिद सैफी की बेटी की तस्वीर शेयर करते हुए भावनात्मक पोस्ट लिखा और एक अपराधी को ऐसे पेश किया जैसे वो किसी स्वतंत्रता सेनानी के लिए आवाज़ उठा रही हों। अयूब ने इमोशनल कार्ड खेलते हुए पूछा कि ये बच्चे पूछ रहे हैं कि इस ईद पर उनके अब्बू आएँगे या नहीं या फिर उनके जन्मदिन पर वो रहेंगे या नहीं? जबकि सवाल तो यह पूछा जाना चाहिए था कि क्या खालिद ने ऐसा अपराध करने से पहले सोचा था?

जिहादियों के हिमायती दंगे भड़काने वाले, उनकी फन्डिंग करने वाले, और बेरहमी से हत्या करने वालों के बच्चों की तस्वीरें लगा कर ईद की बातें करते हैं और ईमोशनल कार्ड खेल कर माहौल बनाते हैं, क्या उनसे ये सवाल नहीं पूछा जाना चाहिए कि जिनका वो बचाव कर रहे हैं, उन्हीं के द्वारा बेरहमी से मार डाले गए हिंदुओं के पीड़ित परिवारों का क्या होगा, जो सदा के लिए दूर चले गए?

इसमें कोई शक नहीं कि नाबालिग बच्चे का कोई दोष नहीं। लेकिन, क्या खालिद सैफी जैसों को यह नहीं सोचना चाहिए था कि उसके घर में बच्चे हैं या उसका परिवार है तो वो कोई ऐसा काम ही न करे, जिससे वो अपराधी बन जाए और उसकी करतूतें उसके ही परिवार पर भारी पड़ने लगे? ईद की बात कर के मजहब को बीच में लाया जाता है और अपराधियों को बचाने के लिए ये लिबरल पत्रकार हर बार यह कार्ड खेलते हैं।

क्या आपको पता है कि खालिद सैफी कौन है और उसने किया क्या था? खालिद सैफी (Khalid Saifi) पर आरोप है कि उसने दिल्ली में हिंसा से पहले शाहीन बाग में जेएनयू के पूर्व छात्र उमर खालिद और पूर्व आम आदमी पार्टी के पार्षद ताहिर हुसैन के बीच मीटिंग करवाई थी। शाहीन बाग में इस साल 8 जनवरी को दोनों की मुलाकात हुई थी। इस मीटिंग में उमर खालिद, ताहिर हुसैन और खालिद सैफी शामिल थे।

प्रोपेगेंडा पत्रकार रवीश कुमार, आम आदमी पार्टी प्रमुख और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल से लेकर सोशल मीडिया पर इस्लामी विचारधारा की समर्थक RJ सायमा सहित न जाने कितनी ही कथित सेक्युलर हस्तियों के साथ उसकी तस्वीरें वायरल हुई थीं। इससे उसकी पहुँच का अंदाज लगता है। जाहिर है, उसके नेटवर्क में शामिल उसके लोग हर क्षेत्र में हैं, जो उसे बचाने के लिए हर जतन करेंगे ही। उसका ‘कर्ज’ चुकाएँगे ही।

खालिद सैफी वही शख्स है, जिस पर आरोप लगा है कि उसने सिंगापुर सहित मध्य-पूर्व के एक देश से दंगों के लिए धन जुटाया और मलेशिया तक जाकर जाकिर नाइक से मुलाकात की। इसके अलावा उमर खालिद और ताहिर हुसैन की शाहीन बाग में मीटिंग कराने वाला भी यही शख्स था। जिसके संबंध बड़े बड़े मीडिया गिरोह के लोगों से भी थे। राणा अय्यूब जैसों ने आज इस्लामिक आतताइयों के कारनामों को धो-पोंछ कर उन्हें स्मृतियों से मिटाने का बीड़ा उठाया है।

BJP नेता की नाबालिग बहन के कथित रेप और हत्या मामले में ABVP ने उठाई आवाज, कहा- बंगाल में अपराधियों को संरक्षण

पश्चिम बंगाल के दिनाजपुर में एक भाजपा नेता की नाबालिग बहन के साथ कथिततौर पर रेप के बाद हत्या का मामला अब महिला राष्ट्रीय आयोग तक पहुँच गया है। महिला आयोग की अध्यक्ष रेखा शर्मा ने इस मामले को अपने ट्विटर पर शेयर किया है। उन्होंने राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग का ध्यान आकर्षित करवाते हुए इस पर जल्द कार्रवाई की माँग की है।

NCW अध्यक्ष रेखा शर्मा ने सोनाक्षी डोगरा नामक एबीवीपी कार्यकर्ता का ट्वीट रीट्वीट करते हुए राष्ट्रीय बाल संरक्षण आयोग और आयोग के अंध्यक्ष प्रियांक कानूनगो को टैग किया है। साथ ही ये भी लिखा है कि बच्ची नाबालिग थी। इसलिए कृपया इसपर जल्द से जल्द संज्ञान लें।

बता दें जिस ट्वीट को रेखा शर्मा ने ट्वीट किया उसमें अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के ओर से जारी प्रेस रिलीज है। इस रिलीज में ABVP की ओर से बच्ची के रेप और हत्या के आरोपित को जल्द से जल्द गिरफ्तार करने की बात है।

इस रिलीज में ABVP ने पूरे मामले में सीधे तौर पर टीएमसी को जिम्मेवार ठहराया है। इसमें लिखा है कि 16 साल की बच्ची के रेप और हत्या के बाद जनता स्तब्ध है। पीड़िता ने अभी सिर्फ़ अपनी 10वीं के एग्जाम दिए थे। जिसे टीएमसी द्वारा पोषित मुस्लिम गुंडों ने उठाया और सामूहिक दुष्कर्म करके जहर दे दिया।

रिलीज के अनुसार, बंगाल में सत्ताधारी टीएमसी महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा प्रायोजित कर रही है। इसमें उनके पार्टी नेता भी शामिल होते हैं। इसके अलावा सबसे घटिया चीज ये है कि ऐसे अपराध करने के बाद राज्य पुलिस द्वारा उन अपराधियों को घर तक संरक्षित किया जाता है। इसलिए उत्तरी बंगाल में एबीवीपी की यही माँग है कि स्कूल छात्रा के साथ रेप और हत्या के आरोपित को जल्द गिरफ्तार किया जाए।

गौरतलब है कि भाजपा नेता की बहन को 19 जुलाई को कथित रूप से घर से अगवा किया गया था। इसके बाद उसकी तलाश की गई तो वो बेहोशी की अवस्था में मिली। उसे तुरंत स्थानीय प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र ले जाया गया। जब वहाँ पर उसकी हालत में सुधार नहीं आया तो फिर उसे इस्लामपुर सब-डिविजनल अस्पताल ले जाया गया। जहाँ उसने दम तोड़ दिया। बच्ची की मौत के बाद कई जगह इस मामले पर प्रदर्शन भी हुए। पुलिस ने मामला गर्माने के बाद पोस्टमार्टम का हवाला दिया।

पुलिस ने कहा कि रिपोर्ट में कहीं भी यौन उत्पीड़न की कोशिश या चोट का जिक्र नहीं है। बच्ची की मौत अधिक मात्रा में जहर पीने की वजह से हुई है। पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में लड़की के शरीर पर कहीं भी खरोच के निशान नहीं हैं।

इसके अलावा आरोपित फिरोज अली को लेकर भी कुछ मीडिया रिपोर्ट में कहा गया कि जिस फिरोज को आरोपित समझकर ढूँढा जा रहा था। उसे लेकर कुछ लोगों ने दावा किया है कि उसकी लाश सोनारपुर इलाके के एक तालाब में मिली है।