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UP: ‘संघियों’ को गाली देने वाले कॉन्ग्रेस नेता पंकज पुनिया पर FIR, ट्विटर पर अभी भी उगल रहे जहर

कॉन्ग्रेस नेता पंकज पुनिया के खिलाफ उत्तर प्रदेश में केस दर्ज किया गया है। भाजपा नेता कपिल मिश्रा ने ट्वीट कर यह जानकारी दी है। पुनिया के खिलाफ लखनऊ के हज़रतगंज थाने में FIR दर्ज की गई है। उन पर आपत्तिजनक ट्वीट करने और उससे एक धर्म विशेष की भावनाओं को ठेस पहुँचाने का आरोप है।

कपिल मिश्रा ने ट्वीट करते हुए लिखा, “पंकज पुनिया के खिलाफ यूपी में साइबर क्राइम में आपराधिक केस दर्ज कर लिया गया है। देश भर में अलग अलग थानों में सैकड़ों FIR सुबह से दर्ज हो चुकी हैं। पंकज पुनिया माफी माँग रहा हैं। लेकिन अपराध अक्षम्य हैं। भगवान राम और धर्म का अपमान अस्वीकार्य।”

पुलिस ने FIR में लिखा है कि सोशल मीडिया पर मॉनिटिरिंग के दौरान देखा गया कि पंकज पुनिया के ट्वीट राजनीतिक और धार्मिक आपत्तिजनक ट्वीट, धर्म विशेष, समुदाय विशेष और आराध्य विशेष का नाम लेकर किया गया, जिससे समाज में द्वेष की भावना भड़क रही है।

FIR की कॉपी

उल्लेखनीय है कि कॉन्ग्रेस नेता पंकज पुनिया ने मंगलवार (मई 19, 2020) को एक ट्वीट किया था, जिस पर हिंदुओं की भावनाओं को ठेस पहुँचाने का आरोप लगाया गया। पंकज पुनिया ने अपने ट्वीट में ‘संघियों’ को बलात्कारी बताया, श्रीराम के नाम का गलत इस्तेमाल किया और उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार की आलोचना करते हुए उनके लिए आपत्तिजनक शब्द लिखे थे।

पुनिया ने ट्वीट में लिखा, “कॉन्ग्रेस सिर्फ़ मजदूरों को अपने खर्च पर उनके घरों तक पहुँचाना चाहती थी। बिष्ट सरकार ने राजनीति शुरू की। भगवा लपेटकर नीच काम संघी ही कर सकते हैं। ये कब्र से निकालकर लाशों का बलात्कार करने वाले लोग हैं। बेटियों के सामने पैंट उतारकर जय श्रीराम के नारे लगाने वाले हस्तमैथुन करने वाले लोग हैं।”

इसके बाद से ही ट्विटर पर उनकी आलोचना हुई और पुनिया की गिरफ्तारी की माँग की जाने लगी। FIR और कार्रवाई के डर से पुनीया ने ये ट्वीट तो डिलीट कर दिया था लेकिन इसके बाद भी वो जहर छोड़ते नजर आए। जिस पर कुछ लोगों ने उन्हें परेशान ना होने की सलाह भी दी।

गुजरात से आए मजदूरों के लिए नहीं कॉन्ग्रेस की बस: राजस्थान में पैदल चलने को मजबूर, जत्थे में गर्भवती महिला भी

कॉन्ग्रेस उत्तर प्रदेश के प्रवासी मजदूरों को उनके घर पहुँचाने के लिए 1000 बसों की व्यवस्था का दावा कर रही है। यूपी से लगी राजस्थान की सीमा पर उसने बसें खड़ी भी कर रखी है। लेकिन उसके ही शासन वाले राजस्थान में स्थिति बेहाल है। मजदूर पैदल चल घर जाने को मजबूर हैं, जबकि राजस्थान की गहलोत सरकार ने दावा किया था कि सूबे में कोई भी मजदूर पैदल चलता नहीं दिखेगा।

‘आजतक’ की ख़बर के अनुसार, राजस्थान में मजदूर अपने परिवार के साथ पैदल चलने को मजबूर हैं। उनके साथ महिलाएँ और बच्चे भी हैं। असल में सैकड़ों मजदूर राजस्थान होकर उत्तर प्रदेश पहुँचे हैं। उनमें से कई गुजरात से राजस्थान होते हुए यूपी में घुसे। ऐसा ही एक जत्था सूरत से पहुँचा, जो राजस्थान होते हुए यूपी के कासगंज के लिए निकला था। इनमें एक 8 महीने की गर्भवती महिला भी शामिल है, जिनका नाम सोनेन्द्री देवी है।

भरतपुर पहुँची महिला ने बताया कि वे लोग 10 दिनों से लगातार चलते जा रहे हैं। भरतपुर से ये जत्था उत्तर प्रदेश के लिए निकल जाएगा। ‘आजतक’ के सुरेश फौजदार को उन मजदूरों ने बताया कि कॉन्ग्रेस पार्टी की सैकड़ों बसें सीमा पर खड़ी तो हैं, लेकिन उन्होंने इन मजदूरों के लगातार निवेदन के बावजूद उन्हें घर ले जाने से मना कर दिया। बेसहारा प्रवासियों का पूछना है कि क्या वो मजदूर नहीं हैं? उनकी मदद क्यों नहीं की गई? ये बसें ऊँचा नगला सीमा पर खड़ी हैं।

यहाँ सवाल उठता है कि आख़िर मजदूरों की हितैषी होने का दावा करने वाली कॉन्ग्रेस ने इन मजदूरों को उत्तर प्रदेश की सीमा तक क्यों नहीं छोड़ा, जब राजस्थान में पार्टी की ही सरकार है? भाजपा नेता सतीश पूनियाँ ने भी यही आरोप लगाया है। उन्होंने बताया कि राजस्थान में पिछले 15 दिनों से हजारों प्रवासी मजदूर पैदल यात्रा करने को विवश हैं, लेकिन कॉन्ग्रेस अपने ही शासन वाले राज्य में उनके लिए कुछ नहीं कर रही। बता दें कि इस ‘बस सियासत’ पर कॉन्ग्रेस के अपने ही गढ़ की नेता ने पार्टी पर निशाना साधा है। विधायक अदिति सिंह ने कहा:

“राजस्थान के कोटा में जब उत्तर प्रदेश के हजारों बच्चे फँसे हुए थे, तब कहाँ थीं ये तथाकथित बसें? तब कॉन्ग्रेस सरकार इन बच्चों को घर तक तो छोड़िए, बॉर्डर तक भी नहीं छोड़ पाई। तब प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने रातोंरात बसें लगाकर इन बच्चों को घर पहुँचाया। तब खुद राजस्थान के सीएम अशोक गहलोत ने भी इसकी तारीफ की थी।”

ये वीडियो बताता है कि काफ़ी पहले से राजस्थान में मजदूर पैदल चलने को विवश हैं (साभार: आजतक)

इससे पहले कॉन्ग्रेस पार्टी ने यूपी सरकार को 1000 बसों की सूची सौंपने का दावा किया था। ये अलग बात है कि इनमें से 297 गाड़ियों में कोई न कोई गड़बड़ी है। 79 की फिटनेस नहीं है, 140 का बीमा समाप्त हो चुका है और 78 ऐसी हैं, जिनमें ये दोनों ही ख़त्म हो चुका है।

प्रियंका गाँधी द्वारा भेजे गए बसों की सूची में से 31 ऑटो थे, 69 एंबुलेंस, ट्रक या फिर अन्य वाहन थे। इसके साथ ही 70 ऐसे वाहनों की लिस्ट दी गई थी, जिसका कोई डेटा ही उपलब्ध नहीं था। बस ड्राइवरों को खाना भी नहीं दिया जा रहा हैं जिसके बाद उन्होंने कॉन्ग्रेस के खिलाफ नारेबाजी और विरोध प्रदर्शन किया।

स्वदेशी और आत्मनिर्भर भारत का वह सपना जो अंग्रेजों के राज में बिपिन चन्द्र पाल ने देखा था

स्वतंत्रता संघर्ष की सुप्रसिद्ध तिकड़ी लाल-बाल-पाल के सबसे वाक्पटु व्यक्ति बिपिन चन्द्र पाल की 20 मई को पुण्यतिथि है। आज उनके संबंध में चर्चा करना तार्किक और संदर्भ के अनुकूल है। साथ ही बिपिन चन्द्र पाल पर चर्चा का एक कारण प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भी जुड़ा हुआ है।

दरअसल 14 मई को प्रधानमंत्री ने राष्ट्र को संबोधित करते हुए स्वदेशी और आत्मनिर्भरता की बात कही थी। बिपिन चन्द्र स्वतंत्रता संग्राम के दौरान इन विषयों के सबसे प्रमुख समर्थक थे। अंतः इस चर्चा की प्रासंगिकता और अधिक हो जाती है।

स्वदेशी और आत्मनिर्भरता पर पाल के दृष्टिकोण को जानने से पूर्व उनके संबंध में मूल परिचय आवश्यक है। उनका जन्म 7 नवंबर 1858 को वर्तमान बांग्लादेश के हबीगंज जिले के पोइल गाँव में हुआ था। उनका जन्म अमीर हिंदू परिवार में हुआ था। पिता रामचंद्र पाल फारसी के बड़े विद्वान थे। बिपिन जब नौ वर्ष के हुए तो परिवार के साथ सिलहट आ गए।

कलकत्ता के प्रेसिडेंसी कॉलेज में शिक्षा अधूरी छोडकर बिपिन चन्द्र पाल हेडमास्टर के रूप में कार्य करने लगे। इसके बाद उन्होंने एक सार्वजनिक पुस्तकालय में लाइब्रेरियन का कार्य किया। यहीं उनका स्वतंत्रता सेनानियों से संपर्क हुआ। बिपिन चन्द्र ने लेखक और पत्रकार के रूप में स्वतंत्रता संग्राम में अपना योगदान देना प्रारंभ किया। इसके लिए उन्होंने कलकत्ता, लाहौर, इलाहाबाद और लंदन से कई अंग्रेजी और बंगाली समाचार पत्र-पत्रिकाओं का संपादन किया। इनमें परिदर्शक, न्यू इंडिया, वंदेमातरम्, द डेमोक्रेट और द इंडिपेंडेंट प्रमुख हैं।

लाल-पाल-बाल की प्रसिद्ध त्रयी ने राष्ट्रवाद के उग्रवादी स्वरुप का प्रचार किया। ब्रिटिश वस्तुओं और दुकानों का बहिष्कार, पश्चिमी वस्त्रों की होली जलाना और ब्रिटिश कारखानों पर हमला करने जैसी गतिविधियाँ कीं।

जब लार्ड कर्जन ने बंगाल विभाजन की घोषणा की तो इसका बिपिन चन्द्र ने सबसे प्रखर विरोध किया। इसके विरोध में ही उन्होंने स्वदेशी और बहिष्कार जैसे आन्दोलन प्रारंभ किए थे। वर्ष 1920 में पाल ने कुछ वरिष्ठ कॉन्ग्रेस नेताओं के साथ मिलकर गॉंधीजी के असहयोग आन्दोलन के प्रस्ताव का विरोध किया था, क्योंकि वह इस आन्दोलन को स्वराज के लक्ष्य को संबोधित करने वाला नहीं मानते थे। किन्तु उनका प्रस्ताव पारित नहीं हो सका और वह धीरे-धीरे सक्रिय राजनीति से दूर हो गए।

अपने जीवन की द्वितीय पारी में उन्होंने अपना समय राजनीतिक गतिविधियों की तुलना में दर्शन और धर्म के अध्ययन के लिए अधिक समर्पित किया। 20 मई 1932 को 73 वर्ष की आयु में कलकत्ता (कोलकाता) में स्वतंत्रता संग्राम के नायक बिपिन चन्द्र पाल का निधन हो गया।

स्वतंत्रता सेनानियों में बिपिन चन्द्र स्वदेशी, स्वराज्य और बहिष्कार के सबसे प्रबल समर्थक थे। उन्होंने 1906 से 1909 के मध्य दिए ‘द गॉस्पेल ऑफ स्वराज’ और ‘स्वराज इट्स वेस एंड मीन्स’ के भाषणों में इन शब्दों का अर्थ समझाया था। पाल ने स्वराज को स्व-कराधान, वित्तीय नियंत्रण का अधिकार और विदेशी आयातों पर सुरक्षात्मक और निषेधात्मक शुल्क लगाने का अधिकार प्राप्त करना माना था। इसके साथ ही इस लक्ष्य प्राप्ति का साधन कानून के भीतर निष्क्रिय प्रतिरोध और आत्मनिर्भरता को माना था।

प्रधानमंत्री ने जिस आत्मनिर्भर भारत और स्वदेशी की बात की है उसे बिपिन चन्द्र पाल के दृष्टिकोण से भी देखा जा सकता है। स्वदेशी के संबंध में बिपिन चन्द्र पाल ने कहा था कि हम बाजार में सस्ती वस्तुओं का आयात प्रतिबंधित नहीं कर सकते हैं। न ही सरकार को ऐसा करने के लिए मजबूर कर सकते हैं। किन्तु हम दृढ़ संकल्प से विदेशी वस्तुओं को खरीदने से इनकार अवश्य कर सकते हैं। इस प्रकार विदेशी सामान खरीदने से इनकार कर बहिष्कार आंदोलन द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से अपने स्वयं के उद्योगों की रक्षा की जा सकती है।

आज भी सरकार के लिए विश्व व्यापार संगठन और अंतर्राष्ट्रीय व्यापार संधियों के कारण आयात प्रतिबंधित करना सहज नहीं है। ऐसे में बिपिन चन्द्र पाल का दृष्टिकोण स्वदेशी को बढ़ावा देने के लिए प्रासंगिक प्रतीत होता है।

लॉकडाउन में गरीब मजदूरों की मदद करने पर मुंबई पुलिस कर रही उत्पीड़न: पर्यावरणविद् अफरोज शाह

कोरोना संकट के इस दौर में कई लोग जरूरतमंदों को भोजन, मास्क, सैनिटाइजर और अन्य आवश्यक सामग्री उपलब्ध कराने में जुटे हैं। हालाँकि, कई जगहों पर इन “कोरोना योद्धाओं” के साथ पुलिस और कानून उस तरह का सम्मानपूर्वक व्यवहार नहीं करती है, जिसके ये हकदार होते हैं। कथित तौर पर इसी तरह की घटना प्रसिद्ध पर्यावरणविद् और वकील अफरोज शाह के साथ हुई है।

अफरोज शाह दुनिया के सबसे बड़े समुद्र तट वर्सोवा बीच की सफाई को लेकर जाने जाते हैं। वे लॉकडाउन के बीच गरीबों और बेघरों की तकलीफों को दूर करने की भी गतिविधियों में भी शामिल हैं। अफरोज शाह ने ट्विटर पर मुंबई पुलिस के व्यवहार पर निराशा व्यक्त की है।

अफरोज ने प्रवासी श्रमिकों की मदद करते हुए उन्हें जूस, पानी और भोजन मुहैया कराया। साथ ही चिलचिलाती गर्मी के बीच अपने गंतव्य स्थान तक पैदल जाने वालों की कठिनाई को आंशिक रूप से कम करने के लिए उन्होंने गाड़ियों की व्यवस्था की। लेकिन शाह को मुंबई पुलिस ने प्रवासी श्रमिकों को मुंबई में उनके गंतव्य तक पहुँचाने के लिए हिरासत में ले लिया

शाह ने आरोप लगाया है कि तिलक नगर पुलिस द्वारा उन्हें 2 घंटे तक परेशान किया गया। उत्पीड़न से निराश, शाह ने घोषणा की कि वह कोरोना वायरस लॉकडाउन के दौरान गरीबों की मदद करने की सभी गतिविधियों को निलंबित कर देंगे।

कई सोशल मीडिया यूजर्स ने इस पर प्रतिक्रिया देते हुए अफरोज शाह के साथ हुए दुर्व्यवहार के लिए मुंबई पुलिस की निंदा की है। भाजपा नेता कपिल मिश्रा ने भी इसी कड़ी निंदा करते हुए ट्वीट किया, “अफरोज शाह के साथ महाराष्ट्र पुलिस का दुर्व्यवहार बहुत गलत व निंदायोग्य। अफरोज काफी लंबे समय से लॉकडाउन में गरीबों की मदद का शानदार काम कर रहे हैं। मुम्बई की मीठी नदी और समुद्र तटों की सफाई का अद्भुत काम करते हैं। अफरोज एक कोरोना वॉरियर हैं।”

कई अन्य लोगों ने भी अफरोज शाह को हिरासत में लेने और उनको काम करने से रोकने को लेकर महाराष्ट्र सरकार के नेतृत्व पर सवाल उठाए हैं।

गौरतलब है कि मुंबई में कोरोना वायरस संक्रमितों का आँकड़ा 22,700 हो चुका है। ऐसे संकट वाले समय में मुंबई पुलिस को उन लोगों की मदद करनी चाहिए, जो नि:स्वार्थ भाव से जरूररतमंदों की सेवा में लगे हैं। मगर उस पर उन्हें परेशान करने के आरोप लग रहे हैं।

कोलकाता: कोरोना+ मिलने के बाद भी बैरक नहीं करवाया सैनेटाइज, 500 सिपाहियों ने DCP पर किया हमला

कोलकाता में मंगलवार (मई 19, 2020) को एक हैरान कर देने वाली घटना सामने आई। यहाँ करीब 500 की तादाद में इकट्ठा सिपाहियों ने DCP पर हमला कर दिया।

अधिकारी की पहचान डीसीपी एनएस पॉल के रूप में हुई, जिन्हें कुछ अन्य पुलिस वालों ने बड़ी मशक्कत के बाद नाराज सिपाहियों से बचाया और ले जाकर अस्पताल में भर्ती कराया।

द न्यू इंडियन एक्सप्रेस की खबर के अनुसार, सिपाहियों का आरोप है कि एक सब इंस्पेक्टर के कोरोना पॉजिटिव निकलने के बावजूद उनके बैरक को सैनिटाइज नहीं करवाया गया। सिपाहियों का ये भी आरोप है कि कंटेनमेंट जोन में ड्यूटी करने के बावजूद भी उन्हें मास्क नहीं उपलब्ध करवाए गए।

रिपोर्ट्स की मानें तो मंगलवार को 500 सिपाहियों की भीड़ पीटीएस (पुलिस ट्रेनिंग स्कूल) के गेट पर एकत्रित हुई और हल्ला करने लगी। इस बीच, पॉल अपने निवास स्थान से निकलकर उनसे बात करने पहुँचे। मगर, इस दौरान भीड़ में मौजूद कुछ नाराज पुलिसकर्मियों ने उनपर हमला बोल दिया।

कोलकाता पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी बताते हैं, “बातचीत करते हुए, कुछ कॉन्स्टेबलों ने पॉल को परेशान करना शुरू कर दिया। स्थिति को भाँपते हुए, वे वहाँ से भागे। लेकिन नाराज पुलिसकर्मियों ने उनका पीछा किया।”

नाराज सिपाहियों का आरोप है कि कोरोना संकट में उनकी सुरक्षा के लिए कोई इंतजाम नहीं किए गए हैं। ऐसे ही एक कॉन्स्टेबल के मुताबिक, “हमारे साथ रहने वाले एक सब-इंस्पेक्टर के कोरोना पॉजिटिव पाए जाने के बाद, हमारी जगह को सैनेटाइज नहीं कराया गया। कुछ दिन बाद तीन और कोरोना संक्रमण के केस आ गए। फिर भी बैरक को सैनिटाइज नहीं करवाया गया। हमें नहीं पता कि हम में से कितने लोग कोरोना संक्रमित हो चुके हैं।”

उल्लेखनीय है कि इस घटना के सामने आने के बाद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने खुद मामले पर संज्ञान लिया। बुधवार की सुबह पुलिस ट्रेनिंग स्कूल (घटनास्थल) पहुँचकर कॉन्सटेबल्स से इस बारे में बात की।

हमें क्यों मारा जा रहा, हमारे बच्चे नहीं हैं क्या: बस ड्राइवरों ने कॉन्ग्रेस के खिलाफ राजस्थान सीमा पर लगाए नारे

कोरोना वायरस की वजह से देश में लॉकडाउन चल रहा है। वहीं, यूपी में इस भयानक महामारी के बीच ‘बस पॉलिटिक्स’ शुरू हो गई है। यूपी-राजस्थान बॉर्डर पर भरतपुर के पास प्रियंका गाँधी द्वारा प्रवासियों को ले जाने के लिए तैनात किए गए बसों के ड्राइवरों ने कॉन्ग्रेस के खिलाफ ही बगावती सुर अपना लिए हैं।

बस ड्राइवरों ने भरतपुर बॉर्डर पर कॉन्ग्रेस के खिलाफ नारेबाजी की। एबीपी न्यूज के मुताबिक, बस ड्राइवरों ने कॉन्ग्रेस पार्टी, खासकर अशोक गहलोत के नेतृत्व वाली राजस्थान सरकार के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन किया, क्योंकि उन्हें घटिया खाना दिया जा रहा। ड्राइवरों ने कॉन्ग्रेस सरकार द्वारा गलत व्यवहार किए जाने का विरोध किया और उत्तर प्रदेश-राजस्थान सीमा पर कॉन्ग्रेस विरोधी नारे लगाए।

इन ड्राइवरों को राजस्थान कॉन्ग्रेस सरकार ने राज्य में फँसे मजदूरों को निकालने के लिए तैनात किया है, जैसा कि प्रियंका गाँधी ने दवा किया था। बताया जा रहा है कि ये ड्राइवर तीन दिनों से सीमापर फँसे हैं।

एबीपी न्यूज की रिपोर्ट के मुताबिक ड्राइवरों और उनके साथ काम करने वालों ने आरोप लगाया कि उन्हें खाना नहीं मिल रहा है और मिल रहा है तो सड़ा हुआ मिल रहा है। उन्होंने दावा किया कि पहले तो वो भूखे-प्यासे खड़े थे और फिर जब उन्हें खाना भी मिला, तो वो इतनी खराब क्वालिटी का था कि वो खा नहीं सकते थे। इसके बाद उन्होंने कॉन्ग्रेस के खिलाफ नारेबाजी शुरू कर दी।

एक ड्राइवर ने आक्रोश व्यक्त करते हुए सवाल किया, “हम प्रवासियों को बचाने के लिए आए हैं, तो हमें क्यों मारा जा रहा है? हमारे बच्चे नहीं हैं क्या? हमारे माँ-बाप नहीं हैं क्या, जो हम यहाँ पर फँसे हुए हैं। हमें यहाँ पर खाने-पीने नहीं दिया जा रहा है।” चिंता की बात यह भी है कि कॉन्ग्रेस के मुताबिक इन ड्राइवरों को प्रवासियों को एक जगह से दूसरे जगह ले जाने के लिए तैनात किया गया है, लेकिन इनमें से किसी ने भी न तो मास्क पहना था और सोशल डिस्टेंसिग का ध्यान रख रहे थे।

गौरतलब है कि कॉन्ग्रेस पार्टी ने यूपी सरकार को 1000 बसों की सूची सौंपने का दावा किया था। ये अलग बात है कि इनमें से 297 गाड़ियों में कोई न कोई गड़बड़ी है। 79 की फिटनेस नहीं है, 140 का बीमा समाप्त हो चुका है और 78 ऐसी हैं, जिनमें ये दोनों ही ख़त्म हो चुका है।

प्रियंका गाँधी द्वारा भेजे गए बसों की सूची में से 31 ऑटो थे, 69 एंबुलेंस, ट्रक या फिर अन्य वाहन थे। इसके साथ ही 70 ऐसे वाहनों की लिस्ट दी गई थी, जिसका कोई डेटा ही उपलब्ध नहीं था।

इससे पहले आगरा जिले के नजदीक बॉर्डर पर मंगलवार (मई 19, 2020) को उत्तर प्रदेश कॉन्ग्रेस कमिटी के अध्यक्ष अजय कुमार लल्लू अपने समर्थकों के साथ मौजूद थे, जहाँ से पुलिस ने उन्हें हिरासत में ले लिया।

मोस्टवांटेड हिजबुल आतंकी रुस्तम अली गिरफ्तार, RSS कार्यकर्ता चंद्रकांत शर्मा की हत्या में था शामिल

राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) ने किश्तवाड़ से हिजबुल मुजाहिदीन के आतंकी रुस्तम अली को गिरफ्तार किया है। रुस्तम हाल ही में मारे गए आतंकी रियाज नायकू का करीबी था। रुस्तम पिछले साल अप्रैल में आरएसएस कार्यकर्ता चंद्रकांत शर्मा और उनके पीएसओ की हुई हत्या में शामिल था। रुस्तम का नाम एनआईए की चार्जशीट में भी शामिल था। चंद्रकांत किश्तवाड़ ज़िला अस्पताल में ही फार्मासिस्ट थे।

रुस्तम की गिरफ्तारी जम्मू-कश्मीर की चेनाब घाटी क्षेत्र में हिजबुल मुजाहिदीन के खात्मे की तरफ सुरक्षा जाँच एजेंसियों के लिए एक और बड़ी सफलता है।

गौरतलब ये है कि डोडा में ताहिर भट के एऩकाउंटर के बाद यह गिरफ्तारी हुई है। ताहिर भट के साथ मिलकर रुस्तम चेनाब वैली में हिजबुल मुजाहिदीन की जड़ें जमाने की कोशिश में था।

गिरफ्तार किया गया आतंकी रुस्तम किश्तवाड़ में युवाओं को आतंकी संगठन में भर्ती कराने का काम करता था। हाल ही में एऩकाउंटर में मारा गया आतंकी ताहिर भट डोडा जिले में आतंकियों को भर्ती करने में कोशिश में लगा था।

एक साल पहले ही ताहिर और रुस्तम ने अपने अन्य साथियों के साथ मिलकर किश्तवाड़ के जाने-माने सामाजिक कार्यकर्ता और आरएसएस नेता चंद्रकांत शर्मा की अस्पताल में घुसकर हत्या कर दी थी। इसमें हमले में चंद्रकांत शर्मा के पीएसओ ने भी अपनी जान गँवाई थी।

इस केस की जाँच का काम एऩआईए को सौंपा गया था। इसके बाद जम्मू-कश्मीर पुलिस और एनआईए हिजबुल मुजाहिदीन के मॉड्यूल का लगभग खात्मा कर चुकी है। करीब 2 हफ्ते पहले सुरक्षाबलों ने घाटी के मोस्टवांटेड आतंकी रियाज नायकू को मार गिराया था।

WHO में भारत को मिला अहम स्थान, डॉ हर्षवर्धन बने कार्यकारी बोर्ड अध्यक्ष

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WH0) के मुख्यालय में वार्षिक बैठक का नेतृत्व करने के लिए अब भारत पूरी तरह तैयार है। भारत की ओर केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ हर्षवर्धन 22 मई को विश्व स्वास्थ्य संगठन के कार्यकारी बोर्ड अध्यक्ष का पद संभालने वाले हैं।

डॉ हर्षवर्धन वैश्विक स्तर पर इस बड़े पद को संभालते हुए जापान के डॉ हिरोकी नकातानी को रिप्लेस करेंगे। डॉ हिरोकी वर्तमान में 34 सदस्यों के बोर्ड के अध्यक्ष हैं।

गौरतलब है कि इससे पहले WHO की बैठक में भारत की तरफ से नामित किए गए डॉ हर्षवर्धन को नियुक्त करने का प्रस्ताव 19 मई को 194 देशों ने पारित किया था।

स्वास्थ्य क्षेत्र में बेहतर 34 देशों को ही कार्यकारी बोर्ड का सदस्य बनाया जाता है। लेकिन पहली बार इसमें ऐसे देशों को शामिल किया गया है, जो इस क्षेत्र में बहुत आगे नहीं हैं।

जानकारी के मुताबिक, भारत के अलावा बोर्ड के सदस्यों में बोट्सवाना, कोलंबिया, घाना, गिनि बिसाऊ, मेडागास्कर, ओमान, रिपब्लिक ऑफ कोरिया, रूस और ब्रिटेन को जगह मिली है।

यहाँ बता दें कि डॉ हर्षवर्धन को मिलने वाला ये पद हर साल बदलता रहता है। लेकिन यह जानना भी जरूरी है कि पिछले साल WHO के दक्षिण-पूर्व एशिया समूह ने सर्वसम्मति से निर्णय लिया था कि भारत को तीन साल के कार्यकाल के लिए कार्यकारी बोर्ड के लिए चुना जाएगा।

इससे पहले हर्षवर्धन ने सोमवार को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से 73वीं विश्व स्वास्थ्य सभा को संबोधित किया था। उन्होंने कहा कि भारत ने COVID-19 महामारी का मुकाबला करने के लिए समय पर सभी आवश्यक कदम उठाए। उन्होंने दावा किया था कि देश ने बीमारी से निपटने में अच्छा किया है और आने वाले महीनों में बेहतर करने का भरोसा है।

WHO में कार्यकारी अध्यक्ष के पद के लिए चुने जाने के बाद सोशल मीडिया पर डॉ हर्षवर्धन को बधाइयाँ दी जा रही हैं। स्तंभकार सुहेल सेठ ने भी उनको इस बड़ी कामयाबी के लिए शुभकामनाएँ दी हैं, जिसपर केंद्रीय मंत्री ने उन्हें आभार प्रकट किया है।

कौन हैं कॉन्ग्रेस विधायक अदिति सिंह, जो लगातार अपनी ही पार्टी की ‘बस राजनीति’ को घटिया कह रही हैं

कॉन्ग्रेस पार्टी की अध्यक्ष सोनिया गाँधी के गढ़ रायबरेली से ही पार्टी के एक विधायक ने उत्तर प्रदेश में श्रमिकों के बसों के लिए हो रही राजनीति पर सवाल उठाया है। विधायक अदिति सिंह ने अपनी ही पार्टी को आड़े हाथों लिया है।

अदिति सिंह ने अपनी पार्टी से पूछा कि कोरोना की आपदा के समय इतनी ‘ओछी राजनीति’ करने की क्या आवश्यकता थी? बता दें कि अदिति सिंह को कॉन्ग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष राहुल गाँधी ने अगस्त 2018 में महिला कॉन्ग्रेस का नेशनल जनरल सेक्रेटरी मनोनीत किया था।

अदिति ने उत्तर प्रदेश के हालिया राजनीतिक घटनाक्रम और अपनी पार्टी की उसमें भागीदारी पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि जो 1000 बसों की सूची भेजी गई है, उसमें आधी से ज्यादा बसों में फर्जीवाड़ा है।

उन्होंने बताया कि इनमें 297 कबाड़ बसें, 98 आटो रिक्शा व एबुंलेंस जैसी गाड़ियाँ और 68 वाहन बिना कागजात के हैं। उन्होंने अपनी पार्टी से सवाल दागा कि अगर इतनी संख्या में बसें थीं ही तो उन्हें पंजाब, राजस्थान और महाराष्ट्र में क्यों नहीं लगाया गया?

बता दें कि पंजाब और राजस्थान में कॉन्ग्रेस की सरकार है। राजस्थान की ही अधिकतर बसों को यूपी भेजा जा रहा है। महाराष्ट्र में पार्टी शिवसेना और एनसीपी के साथ मिल कर सत्ता की मलाई चाभ रही है। अदिति सिंह ने आगे कहा:

“राजस्थान के कोटा में जब उत्तर प्रदेश के हजारों बच्चे फँसे हुए थे, तब कहाँ थीं ये तथाकथित बसें? तब कॉन्ग्रेस सरकार इन बच्चों को घर तक तो छोड़िए, बॉर्डर तक भी नहीं छोड़ पाई। तब प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने रातोंरात बसें लगाकर इन बच्चों को घर पहुँचाया। तब खुद राजस्थान के सीएम अशोक गहलोत ने भी इसकी तारीफ की थी।”

बता दें कि नवम्बर 2019 में कॉन्ग्रेस ने रायबरेली सदर से विधायक अदिति सिंह की सदस्यता खत्म करने को लेकर यूपी विधानसभा अध्यक्ष हृदय नारायण दीक्षित को नोटिस दिया था

अदिति कॉन्ग्रेस अध्यक्ष सोनिया गॉंधी के संसदीय क्षेत्र की सीट से विधानसभा के लिए चुनी गई थीं। वे कॉन्ग्रेस महासचिव प्रियंका गॉंधी की करीबी मानी जाती हैं। उन पर पार्टी के व्हिप का उल्लंघन कर के विधानसभा सत्र में शामिल होने का आरोप लगाया गया था। ये सत्र 2 अक्टूबर को बुलाया गया था।

अदिति ने तब पार्टी के कारण बताओ नोटिस का मजाक उड़ाया था। अपनी पार्टी से मिले ‘कारण बताओ नोटिस’ का जवाब देते हुए अदिति ने कहा था कि उन्हें नोटिस मिला ही नहीं है। उन्होंने तंज कसा था कि पार्टी नेता ने मीडिया में नोटिस दिया होगा।

राष्ट्रपति महात्मा गाँधी की 150वीं जयंती के मौके पर अक्टूबर 2, 2019 को उत्तर प्रदेश विधानसभा में विशेष सत्र आयोजित किया गया था। राज्य की विधानसभा के इस विशेष सत्र का कॉन्ग्रेस समेत पूरे विपक्ष ने बहिष्कार किया था।

इसके पहले उन्होंने कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाए जाने का भी समर्थन पार्टी लाइन के खिलाफ जाकर किया था। इसके अलावा उन्होंने प्रियंका गाँधी-वाड्रा के गाँधी जयंती पर किए गए ‘शांति मार्च’ से भी किनारा कर लिया था।

अदिति सिंह ने मुख्यमंत्री से मुलाक़ात कर और सत्र में शामिल होकर सभी को चौंका दिया था। वो न सिर्फ़ सत्र में शामिल हुई थीं बल्कि उन्होंने स्वच्छता व पानी जैसे कई मुद्दों पर अपनी बात भी रखी थी। पार्टी अब भी उनसे नाराज़ रहती है।

मुस्लिम मिरर के खिलाफ FIR, क्राइम ब्रांच अधिकारियों को बताया था ‘BJP-RSS के हथियार वाले कार्यकर्ता’

अहमदाबाद पुलिस ने हिंदुओं और मुस्लिमों के बीच नफरत फैलाने के आरोप में मुस्लिम मिरर (Muslim mirror) वेबसाइट के ख़िलाफ़ FIR दर्ज की है। पोर्टल पर आरोप है कि उसने अपने ट्विटर अकॉउंट से शाहपुर में हुई पत्थरबाजी वाली वीडियो शेयर करके सांप्रदायिकता फैलाने का प्रयास किया। साथ ही वीडियो शेयर करते हुए क्राइम ब्रांच के अधिकारी और डी-स्टाफ के अधिकारियों को BJP और RSS का हथियार वाला कार्यकर्ता बताया था।

इस खबर की जानकारी स्वराज्य के इंटर्न हर्षिल मेहता ने अपने ट्विटर पर दी है। हर्षिल ने मामले से अवगत कराते हुए एफआईआर के स्क्रीनशॉट अपने ट्विटर पर शेयर किए हैं। साथ ही मुस्लिम मिरर के उस ट्वीट का स्क्रीनशॉट भी शेयर किया है, जिसके आधार पर अहमदाबाद पुलिस ने मुस्लिम मिरर पर कार्रवाई की और उनके ख़िलाफ़ आईपीसी की धारा 153, 505 (1)ब के तहत FIR दर्ज की।

जानकारी के लिए बता दें कि ये पूरा मामला 8 मई को शाहपुर में लॉकडाउन का नियम पालन कराने पहुँची पुलिस पर हुई पत्थरबाजी से संबंधित है। दरअसल, इस मामले के मद्देनजर, पुलिस ने कुछ पत्थरबाजों को गिरफ्तार किया था। साथ ही साइबर क्राइम को सोशल मीडिया पर झूठी जानकारी फैलाने वालों पर कड़ी नजर रखने के निर्देश दिए थे।

इन्हीं निर्देशों का पालन करते हुए साइबर पुलिस को मुस्लिम मिरर के इस ट्वीट के बारे में पता चला और फिर आगे उपयुक्त कार्रवाई हुई।

पुलिस के अनुसार, शाहपुर में घटी घटना को मुस्लिम मिरर के ट्विटर हैंडल पर न केवल ट्विस्ट करके अपलोड किया गया, बल्कि वीडियो को शेयर करते हुए पुलिस अधिकारियों को भाजपा और आरएसएस का ऐसा कार्यकर्ता बताया गया, जो हथियार लेकर चलते हैं।

अहमदाबाद मिरर की रिपोर्ट के अनुसार, साइबर क्राइम के पीआई एसडी कलाट ने कहा, “हम फिलहाल ट्वीट और ट्विटर अकॉउंट से संबंधी बाकी डिटेल्स निकाल रहे हैं और आगे की पड़ताल भी जारी है।”

मुस्लिम मिरर पर एफआईआर होने के बाद मुस्लिम मिरर के संपादक सैयद जुबेर अहमद ने अपने ऊपर लगे सभी इल्जामों को खारिज किया है। उनका कहना है कि वो अपने ट्वीट पर अडिग हैं और उन्हें वीडियो व्हॉट्सएप के जरिए मिली थी। उनके अनुसार उन्होंने अहमदाबाद के अपने सूत्रों से इसे सत्यापित करने के बाद ही ट्विटर हैंडल पर अपलोड किया था।