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22 मई से MP में ‘कोई नहीं होगा बेरोजगार’ योजना, 40 लाख मजदूरों को मिलेगा रोजगार

मध्यप्रदेश में मजदूरों को रोजगार मुहैया कराने के लिए राज्य सरकार ‘कोई नहीं होगा बेरोजगार, सबको मिलेगा रोजगार’ योजना शुरू करने जा रही है। इसको लेकर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने मंत्रियों और अधिकारियों के साथ बैठक की। इस योजना से 40 लाख मजदूरों को मनरेगा में रोजगार देने का लक्ष्य रखा गया है।

जानकारी के मुताबिक, मुख्यमंत्री चौहान ने भारत सरकार द्वारा घोषित आर्थिक निर्भरता पैकेज का लाभ प्रदेश में सुनिश्चित करने के लिए तैयारियाँ तत्काल करने के निर्देश दिए हैं। मनरेगा, शहरी पथ विक्रेता और छोटे उद्योगों के लिए पैकेज में महत्वपूर्ण रियायतें और योजनाएँ घोषित की गई हैं।

मजदूरों के बड़ी संख्या में प्रदेश लौटने पर अब सरकार का फोकस उन्हें काम दिलाने और आत्मनिर्भर बनाने पर है। यानी रोजमर्रा की जिंदगी चलाने के लिए मनरेगा मजदूरों को रोजगार उपलब्ध कराया जाएगा

‘कोई नहीं रहेगा बेरोजगार, सबको देंगे रोजगार’ की शुरुआत 22 मई को मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान भोपाल से करने जा रहे हैं। 52 जिलों में विधायक अपने-अपने जिलों में पंचायत स्तर पर इस अभियान के तहत मनरेगा मजदूरों को जॉब कार्ड बाँटेंगे। मई के आखिर तक मजदूरों को जॉब कार्ड दिए जाएँगे।

मुख्यमंत्री चौहान ने कहा कि प्रदेश में इस समय जरूरतमंद श्रमिकों को काम की आवश्यकता है, जिससे उनकी रोजी-रोटी का ठीक से प्रबंध हो सके। गृह और स्वास्थ्य मंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा ने बताया कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने फैसला लिया है कि प्रदेश भर में मंदिरों की जितनी भी खाली जगह है, वहाँ तालाब बनवाया जाए।

इसमें मनरेगा मजदूरों को लगाया जाएगा। सरोवर के साथ ही बागीचा और मंदिरों में गौशालाएँ बनाई जाएँगी। मंदिर के साधु-संत और पुजारियों को देखभाल की जिम्मेदारी दी जाएगी। मुख्यमंत्री ने निर्देश दिया है कि इसके लिए ग्रामीण विकास और पशुपालन विभाग संयुक्त रूप से कार्यवाही करें।

इसके साथ ही सीएम ने निर्देश दिए कि मनरेगा के अंतर्गत ऐसी संरचनाएँ निर्मित की जाएँ, जिनमें बारिश में भी कार्य संभव हो सकें। हर जरूरतमंद को कार्य मिले। इन कार्यों में मशीनों का प्रयोग न किया जाए। इसके साथ ही स्थायी प्रभाव वाले कार्य सम्पन्न हों। स्टॉप डैम, चेक डैम, सरोवर निर्माण, खेत तालाब, मेड़ बंधान, नंदन फलोद्यान जैसे कार्य करवाए जाएँ। स्थानीय श्रमिकों के साथ ही बाहर के श्रमिकों को भी जॉब कार्ड प्रदान किए जाएँ।

नरोत्तम मिश्रा ने बताया कि अब कोई भी सामान जो देश में बनता है, विदेश से नहीं मँगाया जाएगा। पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग के अपर मुख्य सचिव मनोज श्रीवास्तव ने बैठक में प्रजेंटेशन में बताया कि प्रदेश में वर्तमान में 20 लाख से अधिक श्रमिकों को मनरेगा कार्यो से रोजगार का बड़ा सहारा मिल रहा है।

यहाँ तक कि साढ़े सत्रह हजार दिव्यांग भी कार्यों से जुड़े हैं। प्रति ग्राम पंचायत औसतन 90 श्रमिक काम कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि प्रदेश में पिछले वर्ष करीब 10 लाख श्रमिक ही मनरेगा कार्यों से जुड़े थे। इस वर्ष इनकी संख्या बढ़कर 20 लाख यानी दोगुनी हो गई है। वहीं 1,12,000 छोटे व्यापारियों की पहचान की गई है, जिन्हें 10,000 रुपए का ऋण दिया जाएगा

भारी विरोध के बाद प्ले स्टोर पर TikTok की रेटिंग धराशायी, NCW ने की बैन की माँग

आपराधिक और मजहबी प्रवृत्तियों को बढ़ावा देने का मंच बनने के कारण चर्चा का विषय बनी वीडियो शेयरिंग ऐप TikTok का काफी विरोध हो रहा है। इसके चलते गूगल प्ले स्टोर (Google Play Store) पर TikTok ऐप की रेटिंग 4.6 से गिरकर 1.3 हो गई। NCW ने इस पर बैन की माँग की है।

गूगल प्ले स्टोर पर 4.6 से गिरकर 1.3 हुई टिकटोक की रेटिंग

कुछ दिनों पहले ही टिकटॉक के तथाकथित ‘सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर’ और यूट्यूब कंटेंट क्रिएटर्स के बीच एक प्रकार का युद्ध छिड़ गया था। इसके बाद TikTok पर कई ऐसे वीडियो भी देखे गए जिनमें महिलाओं और जानवरों पर एसिड हमले जैसे वीभत्स अपराधों को महिमामंडित किया गया था। इसे देखते हुए सोशल मीडिया पर कई लोगों ने कहा कि यह मनोरंजन का प्लेटफॉर्म होने के बजाए आपराधिक प्रवृत्तियों को बढ़ावा देने का जरिया बनकर उभर रहा है।

वाहियात, असंवेदनशील और घृणास्पद सामग्री के कारण, TikTok ऐप के प्रतिबंध की माँग बढ़ रही है। राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) की चेयरपर्सन रेखा शर्मा ने हाल ही में उस वीडियो को लेकर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म Tiktok को संदेश भी दिया है, जिसमें टिकटॉक यूजर्स महिलाओं पर एसिड अटैक की प्रवृत्ति को बढ़ावा देते नजर आ रहे हैं।

हालाँकि, कड़े विरोध के बाद यह वीडियो इसे अपलोड करने वाले यूजर द्वारा हटा दिया गया और बाद में उसके एकाउंट को TikTok द्वारा निलंबित कर दिया गया था।

रेखा शर्मा ने आरोप लगाया कि इस मंच पर महिलाओं के खिलाफ हिंसा से संबंधित कई वीडियो साझा किए गए हैं। ट्विटर पर इस बारे में उन्होंने कहा कि उनका मत है कि इस प्लेटफॉर्म पर प्रतिबंध लगा दिया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि वह इस संबंध में भारत सरकार को लिखेंगी।

उन्होंने कहा, “इसमें न केवल इस तरह के आपत्तिजनक वीडियो हैं, बल्कि यह युवाओं को एक लक्ष्यहीन जिन्दगी की ओर भी ले जा रहा है, जिसमें वो सिर्फ अपने फॉलोवर्स के लिए जी रहे हैं और जब ये कम होते हैं तो मर भी रहे हैं।”

TikTok के प्रवक्ता ने आईएएनएस को बताया, “टिकटॉक पर लोगों को सुरक्षित रखना सर्वोच्च प्राथमिकता है और हम अपनी सेवा की शर्तों और सामुदायिक दिशा-निर्देशों में यह स्पष्ट करते हैं कि हमारे मंच पर क्या-क्या स्वीकार्य नहीं है। नीति के अनुसार, हम ऐसी सामग्री की अनुमति नहीं देते हैं, जो दूसरों की सुरक्षा को खतरे में डालती हैं, शारीरिक नुकसान को बढ़ावा देती हैं या महिलाओं के खिलाफ हिंसा को बढ़ावा देती हैं।”

TikTok, जो कि एक चीनी फर्म ‘बाइटडांस’ के स्वामित्व में है के पास दो मिलियन से अधिक डाउनलोड थे और विरोध से पहले गूगल प्ले स्टोर पर इसकी 4.6 रेटिंग थी। लेकिन अब इसे इस्तेमाल करने वाले लोगों द्वारा बड़े पैमाने पर इसकी रेटिंग गिराई गई और अब इसकी रेटिंग 1.3 हो चुकी है। ज्ञात हो कि इसे पहले ‘सर्वश्रेष्ठ सोशल मीडिया ऐप’ के रूप में भी मान्यता प्राप्त थी। वर्तमान में भारत में इसके 600 मिलियन से अधिक उपयोगकर्ता हैं।

प्रोपेगेंडा के लिए TikTok

उल्लेखनीय है कि टिकटॉक का इस्तेमाल सिर्फ मनोरंजन ही नहीं बल्कि मजहबी और भारत-विरोधी गतिविधियों के लिए भी किया जाता रहा है। कोरोना वायरस की महामारी के दौरान भी देखा गया कि मुस्लिम युवक इस ऐप के जरिए यह संदेश देने का प्रयास कर रहे हैं कि कोरोना वायरस अल्लाह का काफिरों पर अजाब है। ऐसे ही कई मामलों के सामने आने के बाद ही इस ऐप में होने वाली गतिविधियों की ओर लोगों का ध्यान गया।

2 महीने फ्री अनाज: मोदी कैबिनेट की मुहर, 8 करोड़ प्रवासी मजदूरों को होगा फायदा

मोदी कैबिनेट ने लॉकडाउन की वजह से दिक्कतों का सामना कर रहे करीब आठ करोड़ प्रवासी मजदूरों को अगले दो माह तक निशुल्क अनाज देने से जुड़े प्रस्ताव को बुधवार (मई 20, 2020) को मँजूरी दे दी। इस योजना के तहत सरकार अगले दो माह तक प्रवासी मजदूरों को प्रति व्यक्ति के हिसाब से पाँच किलो अनाज उपलब्ध करवाएगी।

बता दें कि वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने आर्थिक राहत पैकेज के तहत घोषणा की थी कि सरकार दो महीने के लिए प्रति व्यक्ति प्रतिमाह 5 किलो अनाज मुफ्त में प्रदान करेगी।

बुधवार को सरकार द्वारा जारी विज्ञप्ति में कहा गया है कि इस आवंटन से, कोविड-19 की वजह से आर्थिक उथल-पुथल से प्रभावित प्रवासी/फँसे हुए प्रवासियों की कठिनाइयों को कम करने में मदद मिलेगी। इस योजना से सरकार पर 2,982.27 करोड़ रुपये का खाद्य सब्सिडी बोझ आएगा।

इसके साथ ही इसमें कहा गया है कि इसके अलावा, अंतर-राज्यीय परिवहन, खाद्यान्न के रख-रखाव, डीलर मार्जिन/अतिरिक्त डीलर मार्जिन का खर्च लगभग 127.25 करोड़ आएगा, जो केंद्र सरकार वहन करेगी। इसके अनुसार, इस काम के लिए भारत सरकार की कुल अनुमानित सब्सिडी लगभग 3,109.52 करोड़ रुपए है।

इससे पहले निर्मला सीतारमण ने कहा था, सरकार अगले दो माह तक प्रवासी मजदूरों को बिना राशन कार्ड के भी प्रति व्यक्ति के हिसाब से पाँच किलोग्राम अनाज और प्रति परिवार के हिसाब से एक किलोग्राम चना उपलब्ध कराएगी। उन्होंने कहा था कि जो राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून के दायरे में नहीं हैं या जिनके पास राज्यों की तरफ से मिले गरीबी कार्ड नहीं हैं, वे भी मुफ्त अनाज ले सकेंगे। इस कदम से लगभग 8 करोड़ प्रवासी लाभान्वित होंगे।

इसके अलावा घोषणा की गई कि राशन कार्ड को ‘पोर्टेबल’ बनाया जाएगा। यानी प्रवासी मजदूर अपने राशन कार्ड का किसी भी राज्य में उपयोग कर सकेंगे। वित्त मंत्री ने कहा कि इससे 23 राज्यों में अगस्त तक 67 करोड़ लाभार्थी या सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) के दायरे में आने वाले 83 फीसदी लाभार्थी इस सुविधा का लाभ उठा सकेंगे। उन्होंने कहा था कि मार्च 2021 तक ‘वन नेशन, वन राशन कार्ड’ की व्यवस्था’ को पूरी तरह से लागू कर दिया जाएगा।

बता दें कि वन नेशन वन राशन कार्ड का खाका सरकार ने बीते साल के दिसंबर महीने में ही तैयार कर लिया था और इसका मानक प्रारूप तैयार करते हुए राज्यों को नया राशन कार्ड जारी करने के लिए नए मानक को अपनाने के निर्देश दिए गए थे। उस वक्त सरकार ने पूरे देश में एक जैसे राशन कार्ड जारी करने की पहल के तहत छह राज्यों में पायलट प्रोजेक्ट भी चालू किया था। केंद्र सरकार ने इस योजना को एक जून, 2020 से पूरे देश में लागू करने की योजना बनाई थी, लेकिन अब इसकी समय-सीमा बढ़ाकर मार्च 2021 कर दिया गया है।

‘वन नेशन, वन राशन कार्ड’ योजना के पूरे देश में लागू होने के बाद कोई भी कार्डधारक राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून (एनएफएसए) के तहत किसी भी राज्य की राशन की दुकान से अपना राशन ले सकेगा। खाद्य मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार, राष्ट्रीय स्तर पर राशन कार्ड पोर्टेबिलिटी लक्ष्य को हासिल करने के लिए यह जरूरी है कि विभिन्न राज्य और केंद्र शासित प्रदेश जो भी राशन कार्ड जारी करें, वे सभी एक मानक प्रारूप में हों। इसलिए राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून के तहत राशन जारी करने के लिए मानक प्रारूप जारी किया गया है, जिसे अब अमलीजामा पहनाया जा रहा है।

बे-बस कॉन्ग्रेस ने MLA अदिति सिंह को फिर दी घुड़की, महिला विंग की महासचिव पद से हटाया

मजदूरों की मदद के नाम पर ​कॉन्ग्रेस की बस सियासत की अपने ट्वीट से हवा निकाल देने वाली पार्टी MLA अदिति सिंह को महिला विंग के महासचिव पद से हटाने की खबरें आ रही है। इसका सीधा मतलब है कि उनके खिलाफ कार्रवाई पर दो टूक फैसला लेने का कॉन्ग्रेस आलाकमान हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है।

बीते साल पार्टी के मना करने के बावजूद जब अदिति सिंह ने विधानसभा के विशेष सत्र में भाग लिया था, तब कॉन्ग्रेस ने उन्हें कारण बताओ नोटिस जारी किया था। उस वक्त भी रायबरेली की विधायक ने इस नोटिस का ठेंगा दिखा दिया था।

कॉन्ग्रेस के सूत्र ने ANI को बताया, “विधायक अदिति सिंह को कॉन्ग्रेस महिला विंग की महासचिव के पद से निलंबित कर दिया गया है।” कॉन्ग्रेस विधायक अदिति सिंह ने उत्तर प्रदेश में श्रमिकों के बसों के लिए हो रही राजनीति पर सवाल उठाया था। अपनी ही पार्टी को आड़े हाथों लेते हुए पूछा कि कोरोना की आपदा के समय इतनी ‘ओछी राजनीति’ करने की क्या आवश्यकता थी? 

उन्होंने बताया कि प्रियंका गाँधी द्वारा भेजे गए 1000 बसों की सूची में से 297 कबाड़ बसें, 98 ऑटो रिक्शा व एबुंलेंस जैसी गाड़ियाँ और 68 वाहन बिना कागजात के हैं। उन्होंने अपनी पार्टी से सवाल दागा कि अगर इतनी संख्या में बसें थीं तो उन्हें पंजाब, राजस्थान और महाराष्ट्र में क्यों नहीं लगाया गया?

बता दें कि सिंह के खिलाफ एक शिकायत पहले से ही उत्तर प्रदेश के विधानसभा अध्यक्ष के पास लंबित है। पार्टी ने उनकी सदस्यता खत्म करने की माँग कर रखी है। अदिति कॉन्ग्रेस की महिला शाखा ‘प्रियदर्शिनी’ की राष्ट्रीय प्रभारी हैं। उन्हें इसकी कार्रवाई के बारे में सूचित किया गया है। फिलहाल इस पर अभी तक उनकी कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है।

गौरतलब है कि राष्ट्रपति महात्मा गाँधी की 150वीं जयंती के मौके पर 2 अक्टूबर को उत्तर प्रदेश विधानसभा का विशेष सत्र आयोजित किया गया था। राज्य की विधानसभा के इस विशेष सत्र का कॉन्ग्रेस समेत पूरे विपक्ष ने बहिष्कार किया था। कॉन्ग्रेस के बहिष्कार के बावजूद अदिति सिंह ने सदन में पहुँच कर सभी को चौंका दिया था। सदन में अदिति ने कहा था कि वो एक पढ़ी-लिखी विधायक हैं और यहाँ विकास पर चर्चा हो रही है, इसलिए उन्होंने आना जरूरी समझा। 

इसके लिए अदिति सिंह को नोटिस भेजा गया था। अदिति सिंह ने पार्टी के कारण बताओ नोटिस का उन्होंने मजाक भी उड़ाया था। अदिति का कहना था कि उन्हें नोटिस मिला ही नहीं है। उनके अनुसार पार्टी नेता ने मीडिया में नोटिस दिया होगा। नवंबर में अदिति की विधायक की सदस्यता खत्म करने को लेकर भी यूपी विधानसभा अध्यक्ष हृदय नारायण दीक्षित को नोटिस दिया गया था।

अदिति पार्टी की पूर्व अध्यक्ष राहुल गॉंधी और महासचिव प्रियंका गॉंधी की बेहद करीबी बताई जाती रही हैं। लेकिन, पिछले कुछ समय से वो कई बार पार्टी लाइन से अलग विचार जाता चुकी हैं। उन्होंने जम्मू-कश्मीर से आर्टिकल 370 को हटाने का भी समर्थन किया था।

बेंगलुरु में भयानक गर्जना से लोगों में दहशत, लोगों ने बताया सोनिक बूम या एलियंस के आने की आहट

बेंगलुरु में बुधवार (मई 20, 2020) दोपहर करीब 1.30 मिनट पर एक रहस्यमयी और अजीबोगरीब आवाज सुनने को मिली, जिससे लोगों में दहशत फैल गई है। शहर के पूर्वी इलाकों में अजीबोगरीब आवाज ने वहाँ रह रहे लोगों को हैरत में डाल दिया है। इसके बाद से ही सोशल मिडिया पर इसे लेकर कई तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं।

कुछ बेंगलुरु निवासियों ने सोशल मीडिया पर लिखा कि इस क्षेत्र में एक तेज आवाज के साथ ही झटके भी महसूस किए गए। साथ ही घरों की खिड़कियाँ भी कुछ पलों तक हिलती रहीं।

कुछ एजेंसियाँ इस आवाज के बारे में पता करने में जुटी हैं। आशंका जताई जा रही हैं कि यह भूकंप की आवाज थी, या फिर किसी प्रकार के विमान की आवज। यहाँ तक कि लोगों ने इसे एलियंस के आने की सूचना तक बता दिया। इसके बाद ट्विटर पर #SonicBoom और #Aliens ट्रेंड करने लगा।

इस बारे में अभी कुछ स्पष्ट रूप से नहीं कहा जा सकता है लेकिन कहा जा रहा है कि यह अजीबोगरीब आवाज अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट, कल्याण नगर, एमजी रोड, मराठाहल्ली, व्हाईटफील्ड, सरजापुर, इलेक्ट्रानिक सिटी से लेकर हेब्बागोडी तक सुनी गई। सुरक्षा एजेंसियाँ इस आवाज के स्रोत के बारे में पता लगाने की कोशिश कर रही हैं।

ह्वाइटफील्ड डिवीजन के DCP एमएन अनुचेत ने कहा कि पूर्वी बेंगलुरु में आज जो अजीब सी आवाज सुनी गई उस के स्रोत के बारे में पता किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि ह्वाइटफील्ड एरिया की तलाशी ली गई, लेकिन वहाँ पर किसी तरह का नुकसान नहीं हुआ है।

सोशल मीडिया पर कई लोगों ने यह भी अनुमान लगाया कि यह भारतीय वायु सेना के एक सुपरसोनिक फाइटर जेट द्वारा बनाया गया एक सोनिक बूम था। कई लोगों ने यह भी कहा कि यह एक मिराज 2000 से पैदा हुई आवाज थी, और बताया कि आज सुबह से ही इस क्षेत्र पर जेट विमान उड़ रहे हैं।

सोनिक बूम

सोनिक बूम वह ध्वनि है जो तब उत्पन्न होती है, जब कोई वस्तु ध्वनि की गति से तेज चलती है। जब कोई सुपरसोनिक जेट ध्वनि की गति को तेज करता है और गुजरता है, तो यह एक प्रकार की ‘शॉक वेव्स’ यानी कम्पन तैयार करता है, जिस कारण बहुत तेज शोर पैदा होता है।

इस से उत्सर्जित लहरें घरों के आसपास की खिड़कियों और अन्य वस्तुओं को भी हिलाने में सक्षम होती हैं। यह बेशक एक डराने वाला अनुभव भी हो सकता है। यही वजह है कि कुछ लोगों ने इसकी भूकम्प जैसी घटना से तुलना की है।

वहीं, रिपोर्ट्स के अनुसार, HAL ने अभी-अभी इस बात की पुष्टि की है कि इस गर्जना का उनसे कोई सम्बन्ध नहीं था। बेंगलुरु पुलिस फिलहाल वायु सेना के जवाब की प्रतीक्षा कर रही है कि क्या यह किसी उड़ान का नतीजा था। इस बारे में अभी तक जाँच जारी है।

नेपाल ने जारी किया नया नक्शा: PM ओली ने कहा- ‘भारतीय वायरस’ घातक, मनीषा कोइराला ने किया समर्थन

नेपाल ने नया नक्शा जारी कर भारत के कुछ हिस्सों को अपना बताया है। इसके बाद उसके बाद प्रधानमंत्री केपी ओली ने ‘भारतीय वायरस’ को उस कोरोना वायरस से भी ज्यादा घातक बताया है, जिसके कारण चीन और इटली में हजारों लोगों की जान गई है। वहीं, लंबे समय तक बॉलीवुड फिल्मों में काम कर चुकी नेपाली मूल की अभिनेत्री मनीषा कोइराला ने इस बयान का समर्थन किया है।

मनीषा कोइराला ने ट्वीट किया, “हमारे छोटे राष्ट्र की गरिमा बनाए रखने के लिए धन्यवाद। हम सभी तीन महान देशों के बीच शांतिपूर्ण और सम्मानजनक बातचीत की उम्मीद कर रहे हैं।”

49 वर्षीय अभिनेत्री मनीषा कोइराला ने नेपाली विदेश मंत्री प्रदीप ग्यावली के उस ट्वीट के जवाब में अपना समर्थन व्यक्त किया है, जिसमें कहा गया था कि नेपाल के मंत्रियों ने अपने सात प्रांतों, 77 जिलों और 753 स्थानीय प्रशासनिक प्रभागों को दिखाते हुए देश का एक नया नक्शा प्रकाशित करने का निर्णय लिया है, जिसमें “लिम्पाधुरा, लिपुलेख और कालापानी” शामिल हैं। उन्होंने यह भी कहा कि आधिकारिक मानचित्र जल्द ही देश के भूमि प्रबंधन मंत्रालय द्वारा प्रकाशित किया जाएगा।

नेपाल के प्रधानमंत्री ओली का यह बयान ऐसे समय में आया है, जब नेपाल सरकार ने आधिकारिक तौर पर नया राजनीतिक और प्रशासनिक नक्शा जारी करते हुए इस नए नक्‍शे में लिपुलेख, कालापानी और लिंपियाधुरा के कुल 335 वर्ग किलोमीटर के इलाके को अपना बताया है।

सोमवार (मई 18, 2020) को हुई नेपाल कैबिनेट बैठक में भूमि संसाधन मंत्रालय ने नेपाल का संशोधित नक्शा जारी किया था, जिसका सबने समर्थन किया था।

नेपाल का सीमा विवाद कुछ दिन से चर्चा का विषय है। दरअसल, गत 8 मई को भारत ने उत्तराखंड राज्य के लिपुलेख दर्रे से कैलाश मानसरोवर के लिए सड़क का उद्घाटन किया था, जिसे लेकर नेपाल ने कड़ी आपत्ति जताई थी। इसके बाद नेपाल ने नया राजनीतिक नक्शा जारी करने का फैसला किया।

नेपाल ने जारी किया नया नक्‍शा, लिपुलेख, कालापानी और लिंपियाधुरा को बताया अपना

रिपोर्ट्स के अनुसार, नेपाल के प्रधानमंत्री केपी ओली ने भी कहा था कि वह एक इंच जमीन भारत को नहीं देंगे। नेपाल ने अपने नए नक्‍शे में कुल 335 वर्ग किलोमीटर के इलाके को शामिल किया है। लिंपियाधुरा, लिपुलेख और कालापानी के अलावा गुंजी, नाभी और कुटी गॉंवों को भी शामिल किया गया है। ये इलाके भारत की सीमा में आते हैं।

वहीं सोशल मीडिया पर लोग यह आशंका भी व्यक्त करते नजर आ रहे हैं कि हो सकता है नेपाल यह सब चीन के इशारे पर कर रहा हो।

भारत को बताया वायरस

भारत और नेपाल के बिगड़ते राजनयिक सम्बन्धों के बीच, नेपाल के प्रधानमंत्री केपी ओली ने आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल करते हुए भारत पर नेपाल में कोरोना वायरस के प्रसार का दोष लगाया है। साथ ही, ‘भारतीय वायरस’ पर इटली और चीन में मौत के लिए जिम्मेदार कोरोना वायरस की तुलना में ‘अधिक वायरल’ होने का आरोप भी लगाया है।

उन्‍होंने कहा कि लोग गैर-कानूनी तरीके से भारत से नेपाल आ रहे हैं, वो देश में वायरस को काफी तेजी से फैला रहे हैं। ओली ने आरोप लगाते हुए कहा कि उनके साथ स्‍थानीय प्रतिनिधि और पार्टी के नेता भी भारत से बिना टेस्टिंग के लोगों को नेपाल में लाने के लिए जिम्‍मेदार हैं। नेपाली पीएम के इन अपमानजनक बयानों का सोशल मीडिया पर कड़ा विरोध हो रहा है।

TikTok में पोर्न, रेप, हिंसा: पूर्व कर्मचारी ने चाइनीज कम्पनियों की गुलाम बनाती मानसिकता का किया पर्दाफाश

‘तुमसे बेहतर जानते हैं’ – चायनीज कंपनी में काम कर रहे चीनियों की यह खास पहचान है। इसी विश्वास के साथ वे बाजार में उतरते हैं। बाजार भी ऐसा, जहाँ की संस्कृति अलग है, जहाँ की भाषाएँ उनके समझ से परे हो या फिर किसी तरह की अन्य समस्या हो। लेकिन उनकी यह खास पहचान बनी रहती है। मैंने दो चायनीज कंपनियों के लिए काम किया है, बाइटडांस (टिकटॉक की मालिकाना कंपनी) उनमें से एक है। कुछ मेरे दोस्त हैं, जो अन्य चीनी कंपनियों के साथ काम कर चुके हैं।

एक बात मैं शुरुआत में ही स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि पूर्व कर्मचारी होने के नाते मैं किसी नकारात्मक इरादे से उन्हें बदनाम नहीं करूँगा। और ना ही मैं उनके किसी व्यापारिक गोपनीयता का उल्लंघन करने जा रहा हूँ क्योंकि ये अवैध और अनैतिक है। मैं बस अपना और अपने दोस्तों का अनुभव लिख रहा हूँ।

जैसा कि पहले ही बता दिया हूँ कि चाइनीज कंपनियों की आदत होती है कि वो किसी विदेशी कर्मचारी पर भरोसा नहीं करते, उनकी बात नहीं मानते। हाँ, कॉन्फ्रेंस मीटिंग में आपको बोलने का मौका दिया जाएगा, आपकी बातों को नोट करने का दिखावा भी किया जाएगा लेकिन अमल नहीं किया जाएगा। किया जाएगा तभी, जब उन्हें लगेगा कि यह करने लायक है।

सोचिए, किसी क्षेत्र में आपका 10 साल का अनुभव हो। आपके साथी कर्मचारी भी इतने ही वर्षों का अनुभव लेकर काम कर रहे हों। और आपके टीम लीडर 20 साल से उस फील्ड के जाने-माने नाम हों… लेकिन इस पूरे टीम का निर्णय वो लेगा, जिसके पास मुश्किल से 5 साल का भी अनुभव नहीं है।

उनकी समझ के बारे में एक उदाहरण देकर समझा देता हूँ। वे हिंदी भाषा के लिए बीजिंग यूनिवर्सिटी से इस भाषा में B.A. पास किए किसी लड़के पर निर्भर रहते हैं। नवभारत टाइम्स से लेकर दैनिक भास्कर और दैनिक जागरण तक में काम करने वालों को तवज्जो देने के बजाय वो बीजिंग वाले B.A. हिंदी के लड़के पर भरोसा करते हैं। एक बार हुआ यूँ कि वो चायनीज लड़का नेपाली को हिंदी समझ कर कन्फ्यूज हो गया क्योंकि दोनों ही भाषाओं की स्क्रिप्ट समान है। लेकिन काम ऐसे ही चलता है वहाँ।

चायनीज मैनेजमेंट को लगता है कि उनके प्रोडक्ट्स या कम्पनी को लेकर उनकी समझ दूसरों से कई गुना बेहतर है। अपनी इसी सनक भरी सोच के साथ वो विभिन्न बाजारों में दखल देते हैं। वहाँ पाँव पसार लेते हैं। टिक-टॉक (TikTok) तो बस उदाहरण भर है।

कैसे विदेशी बाजारों पर कब्ज़ा करती हैं चाइनीज कम्पनियाँ

ये लोग जैसे ही किसी विदेशी बाजार में क़दम रखते हैं, वो किसी सफल प्रोडक्ट के 3-4 क्लोन्स बना लेते हैं और उसे टेस्ट करते हैं। उनकी कई टीमें इन प्रोडक्ट्स की पसंद के बारे में जनता की नब्ज टटोलने में व्यस्त रहती हैं। जैसे ही इनमें से कोई प्रोडक्ट उन्हें सफल होता दिखता है या फिर सफलता की उम्मीद भी दिखती है, सारी टीमों को उस पर लगा दिया जाता है।

अगर भारतीय यूजर शेयरचैट का फैन है तो वो ये भी नोट करेंगे कि क्या उन्हें अलग-अलग प्रकार के कीबोर्ड्स का उपयोग करना पसंद है। उनके ‘सर्वे’ में ये सब नोट होगा। अपना अलग कीबोर्ड होने का फायदा ये है कि वो ये भी देख सकते हैं कि आप क्या लिख रहे हैं- यहाँ तक कि आपका कार्ड नंबर और पासवर्ड सहित अन्य व्यक्तिगत डिटेल्स भी।

तकनीकी चीजों को चीनी मुख्यालय से ही देखा जाता है। यूआई का काम उनके निर्देशन में भारतीयों से कराया जाता है।

कुछ ही हफ़्तों में ये टीमें पता लगा लेती हैं कि देश के विभिन्न हिस्सों में रह रहे लोगों की पसंद क्या है। या फिर वो किसी बड़े अंतरराष्ट्रीय संस्था से भी इस प्रकार की सूचनाओं को ग्रहण कर लेते हैं। वो बड़े स्तर पर मार्केटिंग के साथ अपने डुप्लीकेट एप्लीकेशन को ही इतना लोकप्रिय बना देते हैं कि वो जिसका ओरिजिनल होता है, वही धीरे-धीरे लुप्त हो जाता है।

आर्थिक ताक़त के बल पर ऐसा किया जाता है। ज्यादा से कर्मचारियों को भर्ती किया जाता है। कॉपी प्रोडक्ट बड़ा होता चला जाता है और ओरिजिनल गायब हो जाता है।

उनकी कम्पनी में 10 से 20 साल तक के अनुभव वाले भारतीय लोग हायर किए जाते हैं। अपने क्षेत्र और समाज में इतना लम्बा अनुभव रखने वाले ये लोग भी एक चाइनीज बॉस के अंतर्गत काम करते हैं, उनसे आदेश लेते हैं। उस बॉस की एकमात्र ‘काबिलियत’ यही होती है कि वो चाइनीज है। हो सकता है कि वो अभी-अभी किसी कॉलेज से पासआउट होकर निकला/निकली हो लेकिन वो भारत में काम कर रहे एक अनुभवी कर्मचारी के बॉस का बॉस होगा/होगी।

चाइनीज कंपनियों का मकड़जाल: समझिए इनमें काम कर चुके एक कर्मचारी से

बाइटडान्स में एक साल काम कर चुके एक कर्मचारी से हमने बात की तो पता चला कि चीनी कम्पनियों को भारतीय समाज की संवेदनाओं से खास फर्क नहीं पड़ता। नाम न छापने की शर्त पर बात करते हुए उन्होंने कहा,

“चाहे शेयर चैट जैसे भारतीय एप्प की पूरी तरह से कॉपी कर के Helo एप्प बनाना हो, या उस पर किस तरह के कंटेंट को चलने दें, इसमें ये लोग तब तक इंतजार करते हैं जब तक कोई बड़ी संस्था इन पर कोर्ट में केस न कर दे। हेलो एप्प पर जब शेयरचैट ने केस किया तो कोर्ट में पेशी होने से पहले रातोंरात उन्होंने पूरा UI (एप्प का हर स्क्रीन कैसा दिखता है, कौन से बटन हैं, किस रंग के हैं) बदल दिया। हेलो एप्प पर भी इतने अश्लील पोस्ट आते थे कि मानवीय रूप से उन्हें खत्म करना संभव नहीं था। 4-5 लोगों से आप लाखों पोस्ट को ऑडिट नहीं कर सकते।”

“हमने बार-बार यह बात मैनेजमेंट के साथ उठाई, वो आराम से सुन लेते लेकिन कुछ करते नहीं थे। वही हाल आज टिकटॉक में देखने को मिल रहा है। चीन में इस तरह की समस्या नहीं है क्योंकि वहाँ इन लोगों ने तकनीक का प्रयोग किया है और हर चीज सरकार की देखरेख में सेंसर हो कर ही ‘पोस्ट’ हो पाती है। जाहिर है कि हम भारत में उस तरह की सेंसरशिप नहीं चाहते, लेकिन तकनीक के प्रयोग से मजहबी उन्माद, घृणा, लड़कियों को लेकर अभद्रता, अश्लील बातें और हिंसक पोस्ट्स को रोका जा सकता है।”

जब हम टिकटॉक के कंटेंट को देखते हैं तो समझ में आ जाता है कि वाकई चीनी कम्पनियाँ तब तक कुछ नहीं करतीं जब तक पानी उनकी नाक में न घुसने लगे। यहाँ भी इतने बवाल होने के बाद ही इन्होंने एक बयान जारी किया है।

टिकटॉक वालों ने अभी भी यह नहीं बताया कि कम्यूनिटी गाइडलाइन्स को लागू कैसे करेंगे? क्या ये बाकी लोगों के सहारे बैठे हैं कि कोई रिपोर्ट करेगा, तब वो एक्शन लेंगे? यह तो वही बात हुई कि जो चल रहा है, चलने दो, जब कुछ होगा तो देखा जाएगा।

चाइनीज कंपनियों में सब कुछ चीनियों द्वारा ही डिसाइड किया जाता है, भारतीयों की नहीं सुनते वो

यह तो मेरा निजी अनुभव है कि मेरे बॉस (जिनका पत्रकारिता में करीब 20 साल का अनुभव था), उनकी रिपोर्टिंग मैनेजर एक लड़की थी जिसकी उम्र 32 साल की थी, और अनुभव के नाम पर कॉलेज से निकलने के बाद के 5 साल। आप इन लोगों को समझा नहीं सकते क्योंकि ये सुनते सब कुछ हैं, मानते वही हैं जो इनके मैनेजमेंट में तय होता है और जिसका भारतीय संवेदनाओं से कोई वास्ता नहीं होता।

आख़िर किसी भी कम्पनी में अनुभवी कर्मचारी क्या करते हैं? वो प्रोडक्ट्स को अच्छा बनाने के लिए काम करते हैं और साथ ही विभिन्न पहलुओं को लेकर प्रबंधन को सलाह भी देते रहते हैं। चीनी कंपनियों में ये सब नहीं चलता।

उनकी सोच है कि वो फलाँ अनुभवी कर्मचारी के समाज, इलाक़े और पसंद-नापसंद को उससे बेहतर समझते हैं, भले ही उसने अपनी पूरी ज़िंदगी ही क्यों न इन सबका अनुभव लेने में ही खपा दी हो। उनका स्पष्ट मोटो होता है- “अनुभवी हो? ठीक है, अपना अनुभव अपने पास रखो।” इसी सोच पर वो काम करते हैं।

इन तौर-तरीकों के कारण भारतीय लोगों की पसंद-नापसंद पर भी चीनी प्रभाव और सोच का असर पड़ने लगता है। इसका अर्थ ये हुआ कि एक तानाशाही शासन के अंतर्गत रहने वाला व्यक्ति जो एक संस्कृति, एक सरकार और एक बच्चे वाली क़ानून के बीच पला-बढ़ा है, अपने विचार और सोच उस लोकतान्त्रिक व्यवस्था में रह रहे लोगों पर थोप रहा है, जो दर्जन भर धर्म-मजहब, सैकड़ों भाषाओं, दसियों सभ्यताओं और कई राजनीतिक विकल्पों के बीच जीवन-व्यापन करने के अभ्यस्त हैं।

TikTok विवाद: अश्लीलता को जानबूझ कर नज़रअंदाज़ कर रही कम्पनी

टिक-टॉक (TikTok) जैसों की भी यही कहानी है। भले ही कम्पनी में ऑडिटर्स भारत से हों लेकिन सम्पूर्ण दिशा-निर्देश हमेशा चीन से ही आएगा। हो सकता है कि इन चीनियों के लिए एसिड अटैक कोई नई चीज हो, उन्हें ‘हैदर के तलवार’ का अर्थ न पता हो या फिर ये भी नहीं मालूम हो कि हिजाब न पहनने पर किसी लड़की को थप्पड़ मारे जाने का क्या मतलब है। लेकिन, नियम-क़ानून चीन से ही आएँगे, सारे निर्णय वहीं लिए जाएँगे, जिनका पालन यहाँ होना होता है।

जब उनसे पूछा जाएगा तो वो कहेंगे, “अरे नहीं, ये सब करने के लिए तो हमारे पास भारतीय कर्मचारी हैं ही।” उन्हें मेरा ये जवाब होगा- “मैं भी एक भारतीय कर्मचारी हूँ, जिसने 2 चीनी कंपनियों के लिए काम किया है। ‘चीता मोबाइल’ और ‘बाइटडांस’ जैसी कंपनियों में 46 महीने काम करने के बाद मुझे पता है कि इन कंपनियों में क्या होता है और क्या नहीं। मुझे उनके कामकाज की समझ है क्योंकि मैंने सब कुछ क़रीब से देखा है।

दरअसल, भारतीय कर्मचारी तो बस उनके लिए मुखौटे से ज्यादा कुछ नहीं हैं। या फिर व्यापारिक ज़रूरतों के लिए उन्हें रखा जाता है। एक तो इन चीनियों को अंग्रेजी ठीक से आती नहीं और ऊपर से भारत में तमाम तरह के करार और बिजनेस सम्बंधित अन्य कामकाज में अंग्रेजी की ज़रूरत पड़ती ही है, इसीलिए ये उनकी मज़बूरी भी बन जाती है।

यहाँ मैं उन्हें नीचा दिखाने की कोशिश नहीं कर रहा। ये तो वास्तविकता है कि भारत में अधिकतर चीनी कर्मचारियों को ठीक से अंग्रेजी में एक वाक्य तक बोलने नहीं आता।

यही तो कारण है, जिससे आज ये टिक-टॉक (TikTok) वाला पूरा विवाद शुरू हुआ है। यही कारण है कि अगर किसी वीडियो में काफिरों का सिर काट कर लाने की बात की जाती है तो उसे भी अनुमति दे दी जाती है।

ये कोई अपवाद नहीं है, ये उनके लिए सामान्य है। ‘हैदर की तलवार’ वाला वीडियो तो इतना वायरल है कि इसे लेकर रोज कई वीडियो अपलोड किए जाते हैं। यहाँ तक कि टिक-टॉक (TikTok) पर किसी लड़की के बनाए कंटेंट का दुरूपयोग करना भी आम बात है।

टिक-टॉक (TikTok) जैसे एप्प तब तक इस मामले में कुछ एक्शन नहीं लेंगे, जब तक कोई क़ानूनी आदेश न आ जाए। हाँ, वो एआई का इस्तेमाल करेंगे लेकिन अपने हिसाब से। जैसे चीन के विरुद्ध कुछ हो या फिर कुछ तिब्बत या दलाई लामा के समर्थन में हो।

अब तो ऐसा हो चुका है कि ऐसे अश्लील वीडियो अधिकतर बच्चों और किशोरों द्वारा पोस्ट किए जा रहे हैं। क्या वो तकनीक के इस्तेमाल से उम्र का पता नहीं लगा सकते? ऐसे अश्लील और महिला-विरोधी कंटेन्ट्स को रोक नहीं सकते?

भारत में सैकड़ों भाषाएँ बोली जाती हैं, इससे कोई अनभिज्ञ नहीं है। ‘हेलो’ की ही बात करें तो ये दर्जन भर से भी ज्यादा भाषाओं में काम करता है। अब इन सभी भाषाओं के कंटेंट्स को फ़िल्टर करना हो तो ये कैसे हो पाएगा?

फ़िलहाल तकनीकी दुनिया अंग्रेजी में ऐसा करने को संघर्ष कर रही है। चीन में वो ज्यादा से ज्यादा कर्मचारियों को भर्ती कर के ये काम कर लेते हैं। वहाँ के तो कंटेंट्स भी सरकार से फ़िल्टर होने के बाद ही सार्वजनिक किए जाते हैं।

सिर्फ़ यूजरों की संख्या बढ़ाओ, बाकि सब कुछ इग्नोर करो: TikTok जैसी चाइनीज कंपनियों का मोटो

TikTok कम से कम वायरल ऑडियो को तो चेक कर ही सकता है कि ये किस प्रकार का कंटेंट है, जो वायरल हो रहा है। उसे हटाया जा सकता है या फिर यूजर को आगे से उसे अपलोड न करने की हिदायत दी जा सकती है। कम से कम इसके लिए तो प्रोग्रामिंग की ही जा सकती है लेकिन वो ऐसा नहीं करते।

किसी लड़की ने कोई वीडियो अपलोड किया। अब लोग उस वीडियो को आधी स्क्रीन में डाल कर बाकी की आधी में कैसी भी हरकतें कर के उसे अपलोड कर देते हैं। रेप का महिमामंडन, ‘ब्लो-जॉब’ का दिखावा हो या फिर उसके चरित्र हनन के लिए आपत्तिजनक शब्दों का प्रयोग करना- ये अजीबोगरीब हरकतें लगातार चलती रहती हैं।

इसीलिए, टिक-टॉक का अचानक नींद से जाग कर ये कहना है कि वो क्रिएटिविटी को बढ़ावा दे रहा है और कम्युनिटी गाइडलाइन्स के अनुसार ही काम हो रहा है, यह एक पाखंड के सिवा और कुछ भी नहीं।

उन्हें तो बस एक ही बात की चिंता रहती है और वो ये है कि उनके एप्लीकेशन पर कितने करोड़ यूजर हैं और इंगेजमेंट रेट क्या है। इंगेजमेंट टाइम को बढ़ाना, ज्यादा से ज्यादा लोगों को आकर्षित करना और उन्हें इस एप्लीकेशन पर समय व्यतीत करने के लिए प्रेरित करना- इन चक्करों में बाकि चीजें उनके लिए कोई मायने नहीं रखती।

वो तब तक चुप्पी साधे रहते हैं, जब तक कोई बड़ा विवाद न उठ खड़ा हो। पोर्न, अश्लील हरकतें, कामोत्तेजक पोस्ट्स, आपत्तिजनक यौन हरकतों वाले वीडियो- ये सब से तो उनका एंगेजमेंट रेट बढ़ता ही है। उनके एप्लीकेशन पर ज्यादा से ज्यादा लोग समय व्यतीत कर रहे हैं। इससे विभिन्न ब्रांड्स को दिखाने के लिए प्रभावशाली आँकड़े आ जाते हैं।

इसके बाद टिक-टॉक (TikTok) पर ‘सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर’ पैदा होते हैं। इन्हें यूट्यब, फेसबुक अथवा इंस्टाग्राम के लोगों से बेहतर दिखाया जाता है। इसके बाद किसी कॉमेडी नाटक के मसखरे की तरह बाल रखने वाले कोई बेहूदा अजीबोगरीब हरकतें करता है, रेप और एसिड अटैक का महिमामंडन करता है।

और अव्वल तो ये कि उसके 1.35 करोड़ की संख्या में फॉलोवर्स होते हैं। कोई 15 सेकंड में स्कर्ट पहन कर कुछ अजीब सी हरकतें कर देगा और उसके बाद कोई पेड व्यक्ति आपको ये समझाएगा कि इस एक पोस्ट से उसे कितने फॉलोवर्स मिले, कमेंट्स आए। या फिर ये बताएगा कि कैसे उसके कुत्ते ने उसे प्यार करना शुरू कर दिया है।

आप सबको देर रात आने वाले टेलीब्रांड प्रचारों के बारे में पता ही है। लोग रोज हज़ारों एमबी डेटा इन ऐप्स पर खपा देते हैं। एक तरह से ये लोग बिना कुछ जाने-समझे उन चाइनीज कंपनियों के शिकार बन जाते हैं, जिनका उद्देश्य ही है कि किसी बाजार में घुस कर उस पर कब्ज़ा कर लेना।

ठीक है, टिक-टॉक (TikTok) मनोरंजन के लिए ठीक है। लोगों की आवाज़ और क्रिएटिविटी को दिखाने का यह एक जरिया हो सकता है या फिर भले ही ये उनकी आवाज़ हो, जिन्हें कभी अपना हुनर दिखाने-सुनाने का मौका नहीं मिला, लेकिन इससे कहीं ज्यादा इसके नकारात्मक प्रभाव हैं।

जिस तरह से यहाँ कामोत्तेजक वीडियो, अश्लील हरकतों, सेक्सिज्म, नारीद्वेष, पोर्न, कसी के कंटेंट का दुरूपयोग, मजहबी कट्टरता, झूठी सूचनाओं और घरेलू हिंसा को बढ़ावा दिया जाता है, ये सब बर्दाश्त से बाहर है। इसे प्रतिबंधित करना एकमात्र समाधान दिख रहा है। ऐसे प्लेटफॉर्म्स को बैन करना ही पड़ेगा, जहाँ कंटेंट ऑडिट इतनी घटिया तरीके से की जाती है। मुझे तो लगता है कि उनके पास ऐसे कंटेंट्स को रोकने के लिए कोई तकनीक भी नहीं है।

अगर उनके पास ऐसी तकनीक है, तो उन्हें उससे अवगत कराना चाहिए। ऐसा इसीलिए, ताकि ऐसी कंटेंट्स का विश्लेषण कर के उन्हें लाखों लोगों तक पहुँचने से रोका जा सके। सार्वजनिक होने से पहले उस कंटेंट की समीक्षा की जा सके। अगर आप ऐसा नहीं कर सकते हो फिर इस मीठे जहर को जनता को परोसने से बचिए।

अंत में बात डेटा की। एक और चीज जिसमें चीनी कम्पनियाँ दक्ष हैं, वो है डेटा की चोरी करना। आप खुद एप्लीकेशन को डाउनलोड कीजिए और आप ये देख सकते हैं। उन्हें आपके सिम कार्ड से लेकर कॉन्टेक्ट्स और फोटोज तक के एक्सेस चाहिए होते हैं। यहाँ तक कि प्राइवेसी को लेकर भी तमाम तरह की समस्याएँ क्रिएट की गई हैं।

क्या आपको पता है एंड्राइड फोन्स में काम करने वाले ‘स्पीड बूस्टर’ या ‘क्लीनर’ टाइप के एप्स कैसे काम करते हैं?

सबसे पहले तो वो आपके फोन के एक-एक डिटेल्स का पता लगाते हैं, सभी चीजों का एक्सेस ले लेते हैं। वो आपको बताएँगे कि इतने जीबी का डेटा क्लीन करने की ज़रूरत है और साथ ही रॉकेट उड़ते हुए दिखाया जाएगा, जिससे आपको लगे कि आपका फोन ख़ासा फ़ास्ट हो रहा है। दरअसल, ये एक डेटा चोरी की प्रक्रिया है। आपके सारे डेटा को चुरा कर अलीबाबा, अमेजन और अन्य कंपनियों को बेच दिया जाता है।

ईद की नमाज के लिए मस्जिद खोलने के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट का हस्तक्षेप से इनकार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ईद के मौके पर मस्जिद और ईदगाह खोलने के मामले में दखल देने से इनकार कर दिया है। हाईकोर्ट ने कहा कि पहले यूपी सरकार से मस्जिदें खोलने की अर्जी लगाई जाए, यदि वहाँ खारिज कर दिया जाता है, या फिर लटकाए रखा जाता है तभी वह हाईकोर्ट में याचिका दायर कर सकते हैं। बिना सरकार को अर्जी दिए सीधे हाईकोर्ट में याचिका दायर नहीं की जा सकती। इस तरह से सीधे हाईकोर्ट आना ठीक नहीं है।

चीफ जस्टिस गोविंद माथुर और जस्टिस सिद्धार्थ वर्मा की खंडपीठ ने ये आदेश दिया है। दरअसल याचिकाकर्ता ने सरकार के समक्ष अपनी माँग रखे बगैर जनहित याचिका दायर कर मस्जिदों को खोलने की माँग की थी। जिस पर कोर्ट ने हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया

बता दें कि शाहिद नाम के एक शख्स ने ईद की नमाज के लिए ईदगाह व जुमे की नमाज के लिए एक घंटे मस्जिदों को खोलने को लेकर जनहित याचिका लगाई थी। अर्जी में दलील दी गई थी कि जमात में ईद और जुमे की नमाज होती है।

इसके साथ ही अर्जी में जून माह तक जुमे की नमाज के लिए भी अनुमति माँगी गई थी। याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया था कि ईद के दिन मस्जिद में जाकर नमाज पढ़ना जरूरी होता है। अगर ऐसा न किया जाए तो इबादत पूरी नहीं होती है।

गौरतलब है कि शुक्रवार (15 मई, 2020) को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मस्जिद से अजान पर बड़ा फैसला देते हुए कहा था कि अजान इस्लाम का हिस्सा है, लेकिन लाउडस्पीकर से अजान देना इस्लाम का हिस्सा नहीं हो सकता। इसके लिए कोर्ट ने तर्क दिया था कि लाउडस्पीकर के आने से पहले मस्जिदों से मानव आवाज में अजान दी जाती थी। मानव आवाज में मस्जिदों से अजान दी जा सकती है।

बता दें कि कोरोना महामारी के प्रकोप के चलते सभी धर्मस्थल बंद हैं। मुस्लिम धर्मगुरुओं ने भी लोगों से घरों पर रहकर नमाज अदा करने की अपील की है। इदारा-ए-शरिया दारुल इफ्ता वल कजा फिरंगी महल के अध्यक्ष मौलाना मुफ्ती अबुल इरफान मियां फरंगी महली ने फतवा जारी कर अलविदा जुमा और ईद में नमाज अपने घरों में अदा करने का ऐलान किया है।

इसी प्रकार दारुल उलूम देवबंद ने भी नमाज अदा करने को लेकर मुस्लिमों की रहनुमाई करते हुए फतवा जारी किया है, जिसमें कहा गया है कि शासन-प्रशासन के निर्देशों पर अमल करते हुए जुमे की तरह ही ईद की नमाज घरों पर अदा करें। यदि मजबूरी में कोई नमाज अदा नहीं कर पाया तो उनके लिए नमाज-ए-ईद माफ होगी।

Zee न्यूज की मरकज के साथ तुलना केवल कुंठा… जमात के गुनाहों पर पर्दा डालने का और तरीका तलाशो लिबरलों

बीते दिनों हमने सोशल मीडिया पर देखा कि कैसे जी न्यूज (zee news) में कोरोना संक्रमण की सूचना ने लिबरलों को ऑकसीजन देने का काम किया। हमने देखा कि किस तरह से जी न्यूज के कर्मचारियों के संक्रमित होने की सूचना पाते ही वामपंथी गिरोह ने इस खबर को प्रमुखता से अपनी टाइमलाइन पर ब्रेकिंग न्यूज की तरह चलाया। संस्थान के लिए ‘छी’ न्यूज जैसे शब्द इस्तेमाल कर वहाँ काम कर रहे सभी कर्मचारियों का मखौल उड़ाया।

वामपंथियों की टाइमलाइन पर zee news में संक्रमितों लोगों की संख्या गिनने की उत्सुकता इतनी देखने को मिली, जैसे कोई पुरानी मुराद ने अपना असर दिखाया हो। नैतिकता का पाठ पढ़ाते-पढ़ाते पूरा गिरोह जी न्यूज और सुधीर चौधरी को घेरने लगा। तबलीगी जमात की करतूतों पर सवाल उठाने के कारण संस्थान के कर्मचारियों की स्थिति को मरकज के जमातियों से भी तौला गया।

न्यूजलॉन्ड्री तो इतना उत्साहित हुआ कि अपना एजेंडा चलाने के लिए जी न्यूज की अंदरुनी सच्चाई के नाम पर सुधीर चौधरी के ख़िलाफ़ पूरा एक आर्टिकल लिख डाला। उनके ख़िलाफ़ घृणा की उलटी कर डाली और अंत में इस बात को भी जोड़ दिया कि वो वास्तिविक स्थिति को जानने के लिए सुधीर चौधरी से बात करने की कोशिश कर रहे हैं, पर उनका फोन स्विच ऑफ हैं। इसलिए जब भी उनसे या संस्थान के एचआर से बात होगी वो आर्टिकल को अपडेट कर देंगे। 

अब आखिर ये शुभ काम कब होगा? किसी को नहीं पता और ये बात भी कोई नहीं जानता कि यदि सुधीर चौधरी या जी न्यूज का एचआर उनके लेख (एजेंडे) से उलट जवाब में कोई बात कह देंगे तो क्या आर्टिकल की पूरी भाषा दोबारा बदली जाएगी या फिर बदले हुए नाम वाले कर्मचारियों को सत्यापित करवाया जाएगा जिनकी आड़ में न्यूज़लॉन्ड्री ने ये आरोप लगाए हैं?

खैर! सोशल मीडिया पर इस समय इस आर्टिकल को खूब शेयर किया जा रहा है और वामपंथी भी अपनी अद्भुत लेखन शैली से पाठकों पर प्रभाव छोड़ने के लिए zee news के नाम पर तरह-तरह की बातें कर रहे हैं। मगर, इन बुद्धिजीवियों की बातों में एक चीज जो हर जगह सबसे सामान्य देखने को मिल रही है। वो ये कि ये लोग जी न्यूज में पाए गए कोरोना संक्रमितों के लिए या तो बहुत खुश हैं या फिर तबलीगी जमातियों के बराबर में रखकर उनसे संवेदना व्यक्त कर रहे हैं और सुधीर चौधरी को भाईचारे का मतलब समझा रहे है।

किंतु विचार करने वाली बात ये है कि भ्रामक शब्दों के जाल में फँसकर क्या वाकई तबलीगी जमातियों की ‘हरकत’ को zee news के कर्मचारियों की ‘स्थिति’ के साथ तौला जा सकता है? क्या वाकई कोरोना योद्धाओं को कोरोना बम कहकर बुलाया जा सकता है? नहीं, बिल्कुल भी नहीं।

दरअसल, 15 मई के बाद से शुरू हुई ये तुलना केवल उस कुँठा की उपज है, जिसमें गिरोह सदस्य के लोग पिछले महीने से ही झुलस रहे थे और बहुत चाहने के बाद भी जमातियों की करतूत को जस्टिफाई नहीं कर पा रहे थे। मगर, आज जब एक ऐसा मीडिया संस्थान महामारी की चपेट में आया, जिसने जमातियों के ख़िलाफ़ खुलकर रिपोर्टिंग की, तो इन लोगों को संवेदनाओं के नाम पर खेलने का मौका मिल गया। 

इन बिंदुओं पर गौर करिए और खुद फैसला करिए कि तबलीगी जमात के सदस्यों के गुनाह को आखिर कोई बिना एजेंडा के कैसे जी न्यूज के कर्मचारियों से जोड़ सकता है…

  1. जी न्यूज एक मीडिया संस्थान है और ये बात सब जानते हैं कि कोरोना संकट में मीडियाकर्मियों को ‘कोरोना योद्धाओं’ की श्रेणी में रखा गया है। उन्हें अपना काम रोकने से मनाही नहीं है। ऐसे समय में जब हर सेक्टर वर्क फ्रॉम करने के लिए बाध्य है, उस समय पत्रकारिता जगत से जुड़े लोगों को पूरा अधिकार है कि वह अपने दर्शकों को, पाठकों को यथास्थिति से अवगत कराने के लिए प्रयासरत रहें। 
    लेकिन, निजामुद्दीन स्थित मरकज- एक मजहबी स्थल है, जहाँ कोरोना के हालात जानने के बाद भी लोगों को मजहब के नाम पर जबरन रोका गया और अल्लाह का हवाला देकर समझाया गया कि मरना है तो यही मरो, इससे बढ़िया जगह कोई और होगी क्या?
  1. जी न्यूज में कोरोना संक्रमण का पहला केस आने के बाद फौरन संस्थान की ओर से स्टेटमेंट जारी की गई और सारे हालातों से दर्शकों को अवगत कराया गया।
    लेकिन मरकज में संक्रमण फैलने के बाद हालातों को छिपाने की पूरी कोशिश हुई। बात यहाँ तक बिगड़ गई कि जब प्रशासन खुद संक्रमण के बारे में पता करने इलाके में पहुँची तो स्थानीय लोगों ने एंबुलेंस को भगा दिया।
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कर्मचारियों के संक्रमित होने पर zee news की प्रतिक्रिया
  1. जी न्यूज में कोरोना संक्रमितों की संख्या बढ़ने के बाद सुधीर चौधरी खुद सामने आए। उन्होंने संस्थान में बिगड़े हालातों को स्वीकारा, उन्होंने कहा कि हो सकता है जिस तरह की परिस्थिति बन गई है, उसमें स्वयं भी कोरोना संक्रमित हो जाएँ।
    लेकिन, मरकज के मामले में अपने कुकर्मों की पोल खुलते ही मौलाना साद फरार हो गया और आज भी दिल्ली पुलिस को उसे ढूँढने के लिए मशक्कत करनी पड़ रही है, जगह-जगह छापे मारने पड़ रहे हैं, बार-बार ये कहना पड़ रहा है कि वह कोरोना चेक टेस्ट करवाकर सामने आए।
  1. न्यूजलॉन्ड्री के आर्टिकल के हिसाब से संस्थान में कई कर्मचारी हैं जिन्होंने अपने बूते कोरोना का टेस्ट कराया। हालाँकि, एजेंडा चलाने के लिए उन्होंने इस बात को कैसे प्रेषित किया, ये दूसरा विषय है। लेकिन गौर करने वाली बात ये है कि कर्मचारियों ने स्थिति को समझते हुए, सतर्कता बरतते हुए अपना बीड़ा खुद उठाया। 
    मरकज से निकाले गए लोगों के कारनामों को याद करिए। जब प्रशासन ने जमातियों को अस्पताल में भर्ती करवाया, उन्होंने प्रशासन की नाक में दम कर डाला।
  1. जी न्यूज के कर्मचारियों की स्थिति को मरकज के जमातियों से तौलने से पहले उन घटनाओं को भी याद रखने की जरूरत है, जब अस्पताल में भर्ती होने के बाद जमाती नर्सों के सामने नंगे घूमते दिखाई दिए। पैंट उतारकर अश्लील हरकतें की। क्वारंटाइन सेंटर में गंदगी फैलाई। मौका देखकर डॉक्टरों पर हमला करने से भी नहीं चूके।  
    क्या 15 मई के बाद से हम में से किसी ने भी तबलीगियों की तरह जी न्यूज के कर्मचारियों को ये उत्पात मचाते देखा। या फिर सुधीर चौधरी को इस मामले पर कुछ कहने से बचते देखा? 

ये बात बिलकुल सच है कि कोरोना महामारी का ये समय वो काल है जब हर किसी को अपनी सुरक्षा का ध्यान रखना है। मगर, उसी बीच इस बात को भी ध्यान रखना है कि हमारे कारण किसी अन्य को नुकसान न पहुँचे। जी न्यूज के प्रत्येक कर्मचारी ने इस बात को अपने बूते सार्थक किया। साथ ही प्रोफेशन के लिए प्रतिबद्धता और अपने काम के प्रति लगन का उदहारण पेश किया।

इसलिए, उनका इस संकट की चपेट में आना केवल बने-बनाए हालातों का परिणाम है या ये कहें एक दुर्घटना है। किंतु मरकज के कारण जो पूरे देश कोरोना तेजी से फैला, वह समुदाय विशेष के बीच फैली धूर्तता व कट्टरपंथ का नमूना है।  

यहाँ बता दें, सोशल मीडिया पर इस समय जी न्यूज को मरकज से जोड़ने के लिए उसको ‘जी मरकज’ जैसे शब्दों की उलाहना भी दी जा रही है, जिसपर सुधीर चौधरी ने खुद सफाई दी है कि उनका ऑफिस नोएडा प्रशासन द्वारा पिछले फ्राइडे को ही सील किया जा चुका है और जिन्हें यकीन नहीं है वे खुद आधिकारिक बयान को पढ़ लें और झूठ के कारोबार को विराम दें।

आखिर में सिर्फ़ ये बात याद रखने वाली है कि अपवाद हर जगह पर होते हैं। मरकज में भी थे। जी न्यूज में भी रहे होंगे।  किंतु, अपने सामाजिक दायित्वों का निर्वाहन करते हुए कौन दो व्यक्ति, कौन से दो संस्थान, समाज के भले के लिए कैसा बर्ताव कर रहे हैं, बस यही बिंदु उन्हें समांतर रखते हुए तुलना के योग्य बनाता है। वरना अगर दो अलग-अलग प्रवृति की किन्हीं चीजों को बराबर रखा जाता है, उनपर एक साथ बात की जाती है, तो उसे समानता नहीं बल्कि अंतर कहते हैं। जैसे जी न्यूज और तबलीगी जमातियों को लेकर ऊपर हमने बिंदुवार बताया है।

हम ये बात मानते हैं कि मरकज में बहुत से जमाती रहे होंगे जिन्हें कोरोना का मालूम पड़ते ही वह वहाँ से भागने को विचलित हो उठे। लेकिन सच ये भी है कि अधिकांश जमाती छुप-छुपकर अपने घर लौटे व बात खुलने पर सामने नहीं आए। इस क्रम में पढ़े लिखे डॉक्टर से लेकर विदेश से आए लोग भी शामिल थे। तो बताइए, कैसे मरकज की स्थिति एक ऐसे मीडिया संस्थान से जोड़ने के लायक है, जहाँ कर्मचारी केवल अपने प्रोफेशन के साथ इसलिए ईमानदारी से लगे हुए थे, क्योंकि प्रशासन ने उन्हें इसकी इजाजत दी थी।

बंगाल: भ्रष्टाचार उजागर करने वाले युवक की मौत, TMC पार्षद रुपाली सरकार और उनके समर्थकों ने किया था हमला

पश्चिम बंगाल के कामरहटी के बेलघोरिया इलाके में सौमन दास नाम के एक युवक की मृत्यु हो गई। कथित तौर पर तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) पार्षद रुपाली सरकार और उनके सहयोगियों ने सौमेन पर 4 मई को हमला किया था।

भ्रष्टाचार उजागर करने पर रुपाली सरकार और उनके समर्थकों ने सौमन पर हमला किया था। सौमन ने पिछले दिनों सोशल मीडिया पर एक वीडियो पोस्ट किया था, जिसमें साफ तौर पर दिख रहा था कि रुपाली सरकार राहत सामग्री बाँटने में भेदभाव कर रही हैं, किसी को दे रही हैं, किसी को नहीं।

सरकार और उसके सहयोगियों ने दास को कथित रूप से पीटा। इससे उनके सिर, छाती और कमर में चोटें आईं। उन्हें कमरहटी के सागर दत्ता अस्पताल ले जाया गया, जहाँ उन्होंने दम तोड़ दिया

वीडियो में सौमन दास ने टीएमसी पार्षद रुपाली सरकार पर जरूरतमंदों को राहत आपूर्ति के वितरण में भ्रष्टाचार का आरोप लगाया था। इस वीडियो के बाद, दूसरे समूह के युवाओं ने एक वीडियो पोस्ट किया। इसमें दिखाया गया कि सौमन दास सामुदायिक किचेन के लिए सामान इकट्ठा कर रहे हैं। इस वीडियो में कथित तौर पर कुछ प्रतिकूल टिप्पणियाँ भी थीं।

इस वीडियो का विरोध करने के बाद सौमन दास के लिए परेशानियाँ शुरू हुई। दूसरे समूह के लोग, जो कथित तौर पर टीएमसी पार्षद रुपाली सरकार के समर्थक थे, ने उन्हें बुरी तरह से पीटा।

दास की माँ ने कहा कि उनका बेटा 100 रुपए लेकर घर से यह कहकर निकला था कि वह अपने दोस्तों के साथ ज़रूरतमंदों को भोजन और अन्य राहत सामग्री मुहैया कराने में योगदान देगा, लेकिन वह उसके बाद घर नहीं लौटा। बाद में उन्हें जानकारी मिली कि रुपाली सरकार और उनके गुंडों ने दास को बेरहमी से पीटा है। जब वे दौड़ेकर वहाँ पहुँचे तो उन्होंने देखा कि दास सड़क पर बेहोश पड़ा था। फिर उन्हें अस्पताल ले जाया गया।

चश्मदीद बताते हैं कि रुपाली सरकार ने दास का कॉलर पकड़कर खींचा था और अपने साथियों के साथ मिलकर उनकी पिटाई की थी। सौमन के रिश्तेदारों ने भी खुलासा करते हुए बताया, “हमें राहत सामग्री नहीं दी जा रही थी। बार-बार अपील के बावजूद पार्षद ने कार्रवाई नहीं की। कार्रवाई करने के बजाय टीएमसी पार्षद के लोगों ने सौमन की बेरहमी से पिटाई की।”

सौमेन दास ने भी दम तोड़ने से पहले खुद पुलिस से पुष्टि की थी कि रुपाली सरकार ने अपने साथियों के साथ मिलकर उन पर हमला किया था। हालाँकि टीएमसी द्वारा संचालित नगरपालिका के अध्यक्ष गोपाल साहा का कहना है, “राहत सामग्री के वितरण में परेशानी हुई। अगर किसी पर कोई आरोप था, तो उसे सोशल मीडिया पर अफवाह फैलाने के बजाय प्रशासन के पास शिकायत दर्ज करानी चाहिए थी। हम मामले की जाँच कर रहे हैं।”

घटना के बाद, एक भीड़ ने तृणमूल कॉन्ग्रेस के पार्षद के घर के बाहर तोड़फोड़ की। पुलिस सूत्रों ने कहा कि 5 मई (मंगलवार) को एक भीड़ रुपाली सरकार के घर के बाहर इकट्ठा हुई और पथराव किया। बाद में रैपिड एक्शन फोर्स के कर्मियों द्वारा उन्हें खदेड़ दिया गया। बैरकपुर के पुलिस आयुक्त मनोज वर्मा ने कहा कि भीड़ द्वारा किए गए पथराव में एक पुलिसकर्मी घायल हो गया। रुपाली सरकार को पुलिस ने इलाके से बाहर निकाल लिया।

टीएमसी पार्षद ने उस समय दावा किया था कि उनकी इस घटना में उनकी कोई भूमिका नहीं है। यह उनको फँसाने की राजनीतिक साजिश है। मगर अब बताया जा रहा है कि उन्होंने खुद ही आत्मसमर्पण कर दिया है और कामाहाती पुलिस ने उन्हें हिरासत में ले लिया है।