ज़ी न्यूज़ के एडिटर इन चीफ सुधीर चौधरी के ख़िलाफ़ केरल पुलिस ने मामला दर्ज किया है। गैरजमानती धाराओं के अंतर्गत उनके खिलाफ़ FIR दर्ज किया गया है।
बताया जा रहा है वरिष्ठ पत्रकार के ख़िलाफ़ ये कार्रवाई 11 मार्च को ब्रॉडकॉस्ट हुए DNA प्रोग्राम के कारण की गई है। उन पर आरोप है कि अपने शो में उन्होंने इस्लाम को अपमानित किया है।
इस बात की जानकारी जी न्यूज के एंकर सुधीर चौधरी ने ट्विटर पर दी है। उन्होंने लिखा, “सच्चाई दिखाने के बदले ये रहा मेरा पुलित्जर प्राइज (पत्रकारिता श्रेत्र में उम्दा काम करने पर मिलने वाला सालाना प्राइज)। प्रमाण साझा कर रहा हूँ- मेरे खिलाफ केरल पुलिस द्वारा गैर-जमानती धाराओं के तहत एक प्राथमिकी दर्ज की गई है। ये इनाम मुझे सच उजागर करने के बदले मिला है। ये मीडिया के लिए एक साफ संदेश है। अगर आप दशकों पुरानी तथाकथित सेकुलर रेखा पर घुटने नहीं टेकोगे तो आपको जेल के भीतर डाल दिया जाएगा।”
Here’s my Pulitzer Prize for reporting the truth.Sharing the citation— an FIR filed against me by the Kerala police under nonbailable sections.The award for exposing inconvenient facts.A clear msg for media.If u don’t toe the decades old pseudo-secular line you’ll be behind bars. pic.twitter.com/zV3GvNg2YR
उन्होंने आगे लिखा, “ये इनाम मुझे जम्मू में जमीन जिहाद और केरल में लव जिहाद के ख़िलाफ़, सीएए प्रदर्शन में पीएफआई की फंडिग और शाहीन बाग में घुसने के कारण दिया गया है। मेरे मन में कानून के प्रति आदर है, लेकिन ये साजिशें मुझे नहीं रोक पाएँगी। और कर दो।”
This is the price for daring to speak against #ZameenJihad in Jammu,#LoveJihad in Kerala, PFI funding of CAA protests, and for daring to enter Shaheen Bagh. I have all the respect for the law but these tactics won’t stop me. Bring it on! https://t.co/4xoLhIgDSi
गौरतलब है कि 11 मार्च को सुधीर चौधरी के डीएनए प्रोग्राम में एक जिहाद चार्ट दिखाया गया था। जिसमें उन्होंने जिहाद के अलग-अलग रूप बताए थे।
हालाँकि, इस शो के बाद सोशल मीडिया समेत कई जगहों पर इस कारण उन पर इस्लामिक कट्टरपंथियों व सेकुलरों ने निशाना साधा था और उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई की माँग की थी। कुछ ने ये भी कहा था कि वे उनके ख़िलाफ़ रिपोर्ट कर चुके हैं।
न्यूजलॉन्ड्री ने तो अपनी रिपोर्ट में सुधीर चौधरी को लेकर यहाँ तक दावा किया था कि वे झूठी खबरें और मुस्लिमों के ख़िलाफ़ नफरत फैलाते हैं। इसलिए वे उन पर और जी न्यूज पर अपनी कवरेज करते हैं।
मुंबई के सायन अस्पताल से लापरवाही का बड़ा मामला सामने आया है। अस्पताल का एक वीडियो वायरल हुआ है। इससे पता चलता है कि कोरोना संक्रमितों का इलाज मुर्दों के बीच किया जा रहा है।
महाराष्ट्र देश का कोरोना से सर्वाधिक प्रभावित राज्य है। ऐसे में यह घटना बेहद चौंकाने वाली है। वीडियो में दिख रहा है कि वॉर्ड में मरीजों के बीच शव रखे गए हैं। मरीजों के बीच काले प्लास्टिक के बैगों में कोरोना पॉजिटिव मरीजों के शव भी वॉर्ड के बेडों पर रखे हैं। कुछ शवों को कपड़ों से तो कुछ कंबल से ढका गया है।
मरीज और उनके परिजनों ने इस संबंध में अस्पताल प्रबंधन से शिकायत भी की, लेकिन इस मामले ने तब तूल पकड़ा जब वीडियो वायरल हो गया। इसके बाद से बीएमसी निशाने पर है।
#Breaking | Sion Hospital Horror: BMC orders probe after a video surfaces on social media in which patients have been kept with dead bodies.
सायन अस्पताल में रिकॉर्ड किए गए इस वायरल वीडियो में, शव काले रंग के प्लास्टिक बैग में लिपटे हुए दिखाई दे रहे हैं, जो इलाज के लिए कोविद -19 रोगियों के ठीक बगल में रखे हुए हैं। यह घटना अस्पताल के प्रबंधन और राज्य के अधिकारियों के बारे में गंभीर सवाल उठा रही है।
अस्पताल के डीन डॉ. प्रमोद इंगले ने वायरल वीडियो की पुष्टि की है। डॉक्टर इंगले ने संवाददाताओं को बताया की कानूनी कार्यवाही और विशेष निर्देश के चलते वे अपने दम पर अंतिम संस्कार नहीं करा सकते थे। उधर, रिश्तेदार शवों को ले जाने के लिए नहीं आ रहे हैं। इसलिए इन्हें वार्ड में रखा गया। मॉर्चुरी में जो 15 सेल्फ हैं, उनमें से 11 भरे हुए हैं।
बीएमसी को शवों की हैंडलिंग पर स्पष्ट मार्गदर्शन जारी नहीं करने के लिए जिम्मेदार माना जा रहा है।
घटना के संबंध में भाजपा नेता नितेश राणे ने ट्वीट किया। उन्होंने लिखा, “सायन अस्पताल के डीन इस वीडियो को स्वीकार करते हुए कहते हैं कि रिश्तेदार शवों को ले जाने के लिए नहीं आ रहे हैं। इसलिए हमने उन्हें वहाँ रखा है। मुम्बइकर्स को बीएमसी से इसके बाद क्या उम्मीद करनी चाहिए? निजी अस्पताल मरीजों को स्वीकार नहीं कर रहे हैं और सरकारी अस्पताल गड़बड़ी में हैं! यह एक मेडिकल इमरजेंसी है!”
So the dean of Sion hospital accepts the video n says the relatives don’t come 2 claim the bodies so v hv kept them there.. Wat shud v as Mumbaikers expect from the BMC after this ans? Pvt hospitals r not accepting patients n Gov hospitals r in a mess! It’s a medical emergency !
इस संबंध में कॉन्ग्रेस नेता मिलिंद देवड़ा ने ट्वीट कर कहा है, “BMC कोरोनोवायरस संक्रमित लाशों का अंतिम संस्कार WHO द्वारा निर्धारित प्रोटोकॉल के अनुसार क्यों नही कर रहीं है? सार्वजनिक अस्पताल के कर्मचारी सीमित संसाधनों के साथ अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन कर रहे हैं। मुंबई के प्रशासन को अब कदम बढ़ाने की जरूरत है!”
Outraged to see corpses laid beside the sick at Sion Hospital. Why isn’t @mybmc following @WHO-prescribed protocols when disposing of #COVIDー19 corpses?
Public hospital staff are doing their best with limited resources at hand. Mumbai’s administration needs to step up NOW! pic.twitter.com/MURUNsIyfc
— Milind Deora मिलिंद देवरा (@milinddeora) May 7, 2020
इससे पहले, कूपर अस्पताल से इसी तरह की घटना सामने आई थी, जहाँ एक मरीज को कथित तौर पर लावारिस छोड़ दिया गया था और उसे अपने आसपास दो लाशों के साथ रात गुजारनी पड़ी थी।
इसी तरह कोलकाता से भी संक्रमित लाशों को सँभालने में लापरवाही के बारे में शिकायतें सामने आई थी। एक वायरल वीडियो में, कोलकाता के एमआर बांगुर अस्पताल में लाशें लावारिस हालत में पड़ी देखी गईं थी।
ऑल इंडिया रेलवेमेंस फेडरेशन (AIRF) ने कॉन्ग्रेस अध्यक्ष सोनिया गॉंधी को पत्र लिखा है। इसमें उनसे श्रमिक स्पेशल ट्रेनों पर राजनीति नहीं करने की अपील की गई है।
सोनिया गाँधी ने सोमवार (मई 04, 2020) को कहा था कि देशभर में फँसे मजदूरों को घर वापस जाने के लिए रेलयात्रा का खर्च कॉन्ग्रेस उठाएगी।
पत्र में कॉन्ग्रेस अध्यक्ष से कहा गया है कि राजनीतिक फायदे के लिए अच्छी व्यवस्था को न बिगाड़ा जाए। व्यवस्था में अस्थिरता पैदा करने पर उन रेलवे कर्मचारियों के लिए कोरोना संक्रमण का खतरा बढ़ेगा जो अपनी जान की परवाह किए बिना इन ट्रेनों के सुचारू संचालन में जुटे हैं।
दरअसल, कॉन्ग्रेस ने ट्वीट करते हुए लिखा था कि पार्टी ने यह निर्णय लिया है कि प्रदेश कमेटी की हर इकाई हर जरूरतमंद श्रमिक व कामगार के घर लौटने की रेल यात्रा का टिकट खर्च वहन करेगी व इस बारे जरूरी कदम उठाएगी।
इसका नतीजा यह हुआ कि अन्य राज्यों में फँसे हुए मजदूरों और शासन-प्रशासन के बीच कई प्रकार की गलतफहमी पैदा हो गईं। खुद कॉन्ग्रेस शासित राज्य ही यह फैसला नहीं कर पाए कि उन्हें आखिर करना क्या है।
AIRF के सचिव शिव गोपाल मिश्रा ने सोनिया गाँधी को लिखे हुए पत्र में इस असुविधा का जिक्र करते हुए लिखा है कि सोनिया गाँधी को कम से कम उन रेलवे कर्मचारियों के बारे में सोचना चाहिर जो अपनी जान की परवाह किए बिना अपनी सेवाएँ दे रहे हैं।
पत्र में कहा गया है कि रेलवे ने प्रवासी श्रमिकों के लिए चलाई जा रही विशेष ट्रेनों के लिए 85% टिकट किराए में सब्सिडी दी है और शेष 15% का भुगतान राज्य सरकार को करना है। यह आवश्यक था। अब संबंधित राज्य सरकारें भुगतान करके ट्रेनों को बुक करेंगी, इससे यात्रियों को स्टेशनों पर भगदड़ करने से भी रोका जा सकेगा।
उल्लेखनीय है कि केंद्र सरकार ने ‘श्रमिक स्पेशल ट्रेन’ शुरू की हैं जो कोरोना वायरस के कारण अन्य राज्यों में फँसे प्रवासी मजदूरों को उनके गृह राज्यों तक पहुँचाएगी। रेलवे और केंद्र सरकार के यह स्पष्ट करने के बावजूद कि श्रमिकों को यात्रा के लिए भुगतान नहीं करना होगा, कॉन्ग्रेस ने इस मुद्दे पर अनावश्यक विवाद पैदा करने की कोशिश की।
हकीकत यह है कि कॉन्ग्रेस शासित राजस्थान सरकार ने खुद यह स्वीकार किया है कि उन्होंने श्रमिकों को ट्रेन से भेजने के बदले उन्हें मुफ्त भेजने के बजाए उन्हीं से रुपए भी वसूले हैं।
भारत सरकार ने पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) और गिलगित-बाल्टिस्तान को लेकर एक बड़ा फैसला लिया है। देश में मौसम का पूर्वानुमान बताने वाली संस्था भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने अपने पूर्वानुमान सूची में गिलगित-बाल्टिस्तान और मुजफ्फराबाद को शामिल किया है।
भारतीय मौसम विभाग (India Meteorological Department-IMD) ने पूरे जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के लिए मौसम की जानकारी जारी की है। IMD के डायरेक्टर जनरल मृत्युंजय महापात्रा ने बताया कि गिलगित-बाल्टिस्तान और मुजफ्फराबाद को भी मौसम बुलेटिन में शामिल किया गया है।
उन्होंने कहा कि ये भी भारत के हिस्से हैं इसलिए हमने इन्हें मौसम बुलेटिन में शामिल किया है।
आईएमडी के महानिदेशक मृत्युंजय महापात्रा ने मीडिया से बातचीत में कहा कि भारतीय मौसम विज्ञान विभाग पूरे जम्मू-कश्मीर और लद्दाख क्षेत्र के लिए मौसम बुलेटिन जारी कर रहा है।
उन्होंने कहा कि इस बुलेटिन में गिलगित-बाल्टिस्तान और मुजफ्फराबाद का भी उल्लेख है, क्योंकि यह भारत का हिस्सा है। उल्लेखनीय है कि हाल ही में पाकिस्तानी सुप्रीम कोर्ट ने गिलगित-बाल्टिस्तान में चुनाव कराने को मँजूरी दी थी। इसके लिए पाकिस्तान सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से 2018 के एक कानून में संशोधन और वहाँ चुनाव कराने के निर्देश दिए थे।
इसके बाद भारतीय विदेश मंत्रालय ने कड़ी आपत्ति जताई थी। भारत ने पाकिस्तान से साफ तौर पर कहा था कि केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर और लद्दाख जिसमें गिलगित-बाल्टिस्तान भी शामिल हैं और वह पूरी तरह से कानूनी और अपरिवर्तनीय विलय के तहत भारत का अभिन्न अंग है।
विदेश मंत्रालय ने बहुत सख्त संदेश में पाकिस्तान से कहा है कि पाकिस्तान को गिलगित-बाल्टिस्तान को तुरंत खाली करना चाहिए। विदेश मंत्रालय ने कहा, “चूंकि गिलगित-बाल्टिस्तान भारत का अभिन्न हिस्सा है, लिहाजा पाकिस्तान इसे फौरन खाली कर दे। उसका यहाँ कब्जा गैरकानूनी है। हमने पाकिस्तान के एक सीनियर डिप्लोमेट को तलब कर उन्हें अपना पक्ष बता दिया है।”
टाइम्स ऑफ इंडिया पर हिंदूफोबिया से लबरेज खबरें पढ़कर अक्सर हैरानी होती है कि इतना नामी मीडिया संस्थान इस प्रकार की हरकत कैसे कर सकता है? वास्तविकता में इसके लिए संस्थान नहीं, बल्कि उसके भीतर शीर्ष पद पर बैठी समीना शेख जैसे जिम्मेदार हैं।
समीना शेख वैसे तो बॉम्बे टाइम्स की हेड हैं और टाइम्स के कई संस्करणों से जुड़ी हैं। लेकिन इसके अतिरिक्त उनकी एक और पहचान है। यह बताती है कि समीना शेख बुरी तरह हिंदूफोबिया से ग्रसित हैं और उन जैसों के कारण ही पाठकों को TOI पर कई बार पक्षपाती पत्रकारिता के नमूने दिखने को मिलते हैं।
समीना और टाइम्स ऑफ इंडिया के बीच इस संबंध का खुलासा आज एक ट्वीट से हुआ। इसे पहले समीना ने अपने ट्विटर अकाउंट से शेयर किया और थोड़ी देर बाद वही ट्वीट टाइम्स ऑफ इंडिया के अकाउंट से भी शेयर किया गया।
ये ट्वीट इफ्तारी के लिए बनाई गई खीर को लेकर था। इस ट्वीट को समीना ने एक तस्वीर के साथ अपने ट्विटर पर शेयर किया था और उस पर लिखा था, “आज चावल की खीर बनाई है। आसान और स्वादिष्ट- अब इसे चखने के लिए इफ्तारी का इंतजार कर रही हूँ…”
Another hinduphobic tweet, and removing of 370 & 35a is hyper nationalism?
समीना के ट्वीट के 15-20 मिनट के भीतर टाइम्स ऑफ इंडिया ने इस तस्वीर को उसी कैप्शन के साथ शेयर किया। बस फिर क्या? सोशल मीडिया पर दोनो अकाउंट को फॉलो करने वाले यूजर्स को ये समझने में देर नहीं लगी कि माजरा क्या है?
एक यूजर ने समीना के सारे पुराने ट्वीट खँगालने शुरू किए और स्क्रीनशॉट्स लेकर इस बात को सार्वजनिक किया कि समीना कितने बड़े स्तर पर हिंदूफोबिया से ग्रसित हैं।
स्क्रीनशॉट्स देखकर स्पष्ट पता चला कि समीना कोरोना महामारी में भी गौमूत्र, गोबर जैसे मुद्दों पर तंज कस हिंदुओं की भावना का मजाक उड़ाती हैं और भाजपा समर्थकों को बेरोजगारी जैसे मुद्दे पर बर्नोल लगाने की सलाह देती हैं।
No abuses, no bad word, forget about rape threats.. victim card is the new weapon for Anti hindu ecosystem? pic.twitter.com/erdedSkbFS
इसके अलावा जो यूजर उनकी हकीकत को लोगों के सामने लाता है वे उसके ख़िलाफ़ मुंबई पुलिस में शिकायत भी दर्ज करवा देती हैं, वो भी सिर्फ़ इस आधार पर कि हकीकत सामने आने के कारण लोग उनसे सवाल कर रहे हैं और कह रहे हैं कि TOI में हिंदू फोबिक खबरें दिखने का कारण वो हैं।
बता दें, समीना ने अपने ट्वीट को लॉक कर लिया है। लेकिन उनके पुराने ट्वीट और TOI में हिंदूफोबिया की खबरों के बीच का संबंध जानकर लोगों ने ट्विटर पर दोनों को आड़े हाथों ले लिया है। लोगों का कहना है कि यही कारण कि टाइम्स के हर संस्करण में ऐसे हिंदूफोबिया को बढ़ावा दिया जाता है। इसलिए अब बेहतर है इसे अनसब्सक्राइब किया जाए।
So :@timesofindia handler is hinduphobic. Gaumutra pe hi banana tha n khana.. ? Terr0rist ki language bolenge or phir victim khelenge. Expose to karna hi h. Well done bro.
ऐसे ही गौमूत्र पर तंज देखकर एक यूजर का ये भी कहना है कि ये लोग आतंकियों की भाषा बोलते हैं। पुलवामा के समय में आतंकी ने अपनी वीडियो में हिंदुओं को गौमूत्र लेकर ही निशाना साधा था। आज इनकी भाषा उन आतंकियों की भाषा से अलग नहीं है।
यूजर्स का पूछना है कि क्या TOI समीना को फायर करेगा? क्योंकि अब सबको पता चल गया है कि वे अपने पद का गलत इस्तेमाल करती हैं और अपने मजहबी प्रोपेगेंडा को चलाने के लिए एक ऐसे संस्थान की आड़ लेती है जिसके देश में लाखों पाठक हैं।
गुरुग्राम में 12वीं कक्षा के छात्र मानव सिंह ने मंगलवार को आत्महत्या कर ली थी। सोशल मीडिया पर एक लड़की द्वारा यौन शोषण का आरोप लगाए जाने के बाद उसने यह कदम उठाया था। मानव के भाई ऋषि सिंह ने एक इंस्टाग्राम पोस्ट में अपने भाई को निर्दोष बताया है।
मानव का बचाव करते हुए उसने बताया है कि किस तरह के हालात ने उसके भाई को इस तरह का कदम उठाने को मजबूर किया। उसने अपील की है कि उसके भाई को एक ऐसे अपराध के लिए दोषी नहीं ठहराया जाना चाहिए जो उसने किया ही नहीं। साथ ही कहा है कि इस घटना का ‘बॉयज लॉकर रूम’ मामले से कोई लेना-देना नहीं है।
A post shared by Rishi Singh (@_rishisingh_) on May 6, 2020 at 6:38am PDT
“मानव बलात्कारी नहीं था। वह मौत का हकदार नहीं था” कैप्शन के साथ लिखे पोस्ट के साथ उसने #justiceformanav, #stopdefaming, #slander, #falseaccusations वगैरह हैशटैग का इस्तेमाल किया है। ऋषि ने बताया है कि उसके भाई पर लड़की ने रेप और छेड़छाड़ का झूठा आरोप लगाया। यह सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। उसका भाई इस दबाव को नहीं झेल पाया और उसने आत्महत्या कर ली।
ऋषि ने कहा कि जो सोशल मीडिया पोस्ट वायरल हुआ वह दो साल पहले हुई एक कथित घटना के बारे में था, जब मानव 14 या 15 साल का था। उन्होंने दावा किया कि आरोप लगाने वाली लड़की के पास इसके कोई सबूत नहीं थे।
ऋषि ने लिखा कि लड़की की कहानी सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद मानव को धमकी भरे कॉल और मैसेज आने लगे। मानव ने उस लड़की और उसके दोस्तों के सामने खुद को साबित करने की कोशिश की। लेकिन वह लगातार मिल रही धमकियों से नहीं निपट सकता था और यह मानता था कि उसकी बात नहीं सुनी जाएगी।
ऋषि ने यह भी आरोप लगाया कि मानव की आत्महत्या के बारे में सुनने के बाद उस लड़की ने एक और पोस्ट किया जिसमें यह कहा कि अगर “मानव दबाव नहीं सँभाल सकता तो यह उसकी गलती नहीं है।” उस लड़की को ज़रा भी अपनी गलती पर पछतावा नहीं है। उसने जो लिखा उससे न केवल एक छोटे बच्चे की मौत हो गई, बल्कि उसका परिवार तबाह हो गया।
ऋषि सिंह ने कहा है कि सोशल मीडिया पर बदनामी लोगों के मानसिक स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकती है। सोशल मीडिया ने उसके भाई को रातोंरात बलात्कारी बना दिया। सोशल मीडिया ने मानव को उस अपराध का दोषी घोषित किया जो उसने किया ही नहीं था। वह बलात्कारी नहीं है, उसे इस नाम से ना बुलाए। उसने लिखा है,”एक परिवार के तौर पर हम इस बात का सबूत हैं कि इंस्टाग्राम पर कहानी कैसे किसी की जिंदगी तबाह कर सकती है।”
गुजरात में कोरोना के बढ़ते संक्रमण के बीच प्रशासनिक स्तर पर बड़ा उलटफेर हुआ है। स्वास्थ्य विभाग की प्रिंसिपल सेक्रेट्री डॉ. जयंती रवि को किनारे लगा दिया गया है। उनकी जगह एसीएस (रेवेन्यू) पंकज कुमार को कोविड-19 से बचाव हेतु सभी निर्णय लेने का जिम्मा सौंपा गया है।
यह फैसला मंगलवार को लिया गया है। महामारी के बीच हालात की निगरानी और रोकथाम में अपेक्षित परिणाम नहीं मिलने के बाद IAS अधिकारी डॉ. जयंती रवि पर कार्रवाई की गई है।
इससे पहले अहमदाबाद नगर निगम आयुक्त विजय नेहरा पर कोरोना संबंधी सभी सूचना सोशल मीडिया पर देने की जिम्मेदारी थी और डॉ. जयंती पर मीडिया को संबोधित करने की जिम्मेदारी थी।
डॉ. जयंती रवि कौन हैं?
डॉ. जयंती रवि एक वैज्ञानिक हैं। उन्होंने एस रवि मद्रास विश्वविद्यालय से परमाणु भौतिकी में मास्टर डिग्री हासिल की है। इसके अलावा वे 1991 के गुजरात कैडर की IAS अधिकारी भी हैं। 2002 में जब कारसेवकों की ट्रेन को मुस्लिम भीड़ ने आग के हवाले कर दिया था तब वह गोधरा की जिलाधिकारी थीं।
इसके बाद पूरे गुजरात में साम्प्रदायिक दंगे हुए। जुलाई 2002 में तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने गोधरा से उनका तबादला कर दिया। लेकिन बाद में मीडिया में उनकी वाहवाही होने लगी कि उन्होंने साम्प्रदायिक तनातनी को बहुत बढ़िया से सँभाला।
नतीजतन, साल 2004 में कॉन्ग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी ने उन्हें अपने राष्ट्रीय सलाहकार परिषद में नियुक्त किया जिसकी अध्यक्षता वे खुद कर रही थीं। साल 2007 तक वह यहाँ रहीं।
कोरोना वायरस विवाद
अप्रैल 2020 में गुजरात राज्य स्वास्थ्य आयुक्त जय प्रकाश शिवहरे ने मरीजों की निजी जानकारी के संबंध में डॉ. टेको (DrTecho) एप्लीकेशन के इस्तेमाल पर अपनी चिंता जाहिर की थी। उनका मत था कि इसके अपग्रेडेड वर्जन का इस्तेमाल करने में रोगी की सहमति, डेटा के स्वामित्व, डेटा स्टोरेज और इसके इस्तेमाल में कुछ कानूनी पहलुओं को ध्यान में रखना आवश्यक है।
उन्होंने कहा था कि इन परिस्थितियों में टेको सॉफ्टवेयर ऐप का इस्तेमाल बढ़ाने के लिए ऐप डेवलपर के साथ समझौता ज्ञापन होना चाहिए। बावजूद इसके अहमदाबाद मिरर की एक रिपोर्ट के अनुसार, डॉ. जयंती रवि प्राइवेट डॉक्टरों और कोविड-19 रोगियों के पंजीकरण के लिए अपनी मीडिया ब्रीफिंग आदि में इस ऐप का प्रचार करती रहीं।
दिलचस्प बात ये है कि एक ओर जहाँ डॉ जयंती रवि स्वास्थ्य प्रमुख सचिव थीं और इस ऐप का प्रमोशन कर रही थीं। वहीं इस ऐप के लिए सॉफ्टवेयर Argusoft india ltd ने बनाया था। इसके अध्यक्ष डॉ. जयंती रवि के पति रवि गोपालन हैं।
जानकारी के अनुसार डॉ. जयंती के सचिव रहते हुए इस ऐप का इस्तेमाल स्वास्थ्य विभाग दो साल से कर रहा है। इसे न केवल आशा वर्कर्स के फोन में इंस्टाल करवाया गया था, बल्कि इसी में उन्हें गाँव में जाकर लोगों का डेटा कलेक्ट करने को भी बोला गया था।
गौरतलब है कि इस समय राज्य में कोरोना को लेकर हालात बिगड़ते जा रहे हैं। 7 मई 2020 तक राज्य में कुल 6625 केस सामने आ चुके हैं। इनमें से 4500 केस तो केवल अहमदाबाद से है। हालाँकि अब तक राज्य में 1500 लोग ऐसे भी हैं जो ठीक हो गए हैं। लेकिन इस बात को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि 400 के करीब लोगों की मौतें भी हुई हैं।
ऐसे में जयंती रवि के बदले कोविड-19 में जिम्मा सँभालने वाले पंकज कुमार के बारे में सूचना है कि वे पहले भी अग्र सचिव भी रह चुके हैं। रेवेन्यू विभाग के एसीएस होने के कारण वर्तमान परिस्थिति में कोरोना के नियंत्रण के लिए राज्य भर के कलेक्टर और प्रशासनिक सेवाओं से संपर्क में होने के कारण सरलता से इस बीमारी के खिलाफ लड़ाई करने की व्यवस्था कर सकते हैं।
वे हाल में अहमदाबाद सिविल हॉस्पिटल के लिए मेडिकल फैसिलिटी, ह्यूमेन रिसोर्सेज़ तथा स्वास्थ्य जानकारियों पर काम कर रहे हैं और आगे वे स्वास्थ्य विभाग में कोरोना की तमाम जानकारियाँ रखेंगे व परिस्थिति को देखते हुए उपयुक्त निर्देश देंगे।
इसके अलावा पूर्व नगर आयुक्त, मुकेश कुमार, जो वर्तमान में गुजरात मैरीटाइम बोर्ड के प्रमुख हैं, को अहमदाबाद के आयुक्त के रूप में प्रभारी-आयुक्त बनाया गया है। कोरोना संक्रमित के संपर्क में आने के कारण अहमदाबाद के आयुक्त इस समय 14 दिन आइसोलेशन पीरियड में हैं।
आतंकवादियों की प्रेम कहानी के न होने का जिक्र यूँ तो शाका ने बहुत साल पहले ही कर दिया था, लेकिन फिर भी कुछ लोग सुधरते नहीं, प्रेम कर ही लेते हैं। साथ ही, आतंकियों के मरने पर उसके बाप, चाचा, भाई, बेटे की बातें तो सब करते हैं, लेकिन प्रेमिकाओं के बारे में जानकारी कम ही मिल पाती है।
“शाका का बस चले तो यहाँ का हर मंडप जला दे, यहाँ से चालीस गाँव में किसी की शादी ना हो।” दाएँ कंधे को जरा ज्यादा झुकाकर, जुबान में विमल पान दबाए, टेढ़ी चाल में चलते हुए शाका की इन बातों में प्यार में धोखा खाए प्रेमी को अनुभवी दारा की पारखी निगाहों ने पहचान लिया था।
“प्रेमी है… पागल है… दीवाना है… लेकिन ये मत भूल कि दुनिया की नजरों में तू आतंकवादी है।” और इसके आगे दारा ने वो कालजयी बात कह डाली, जो प्यार में धोखा खाए हर दूसरे इंसान की जीवनी बन गई – “…लेकिन आतंकवादी की प्रेम कहानी नहीं होती।”
हाहाहा के ठहाके लगाते हुए दारा ने मटका बजाना शुरू किया और अपनी सुरीली आवाज में एक नज़्म गाई जो किसी क़ाफ़िर कवि नहीं बल्कि मुगलों द्वारा भारत लाए गए शायर मिर्चा गालिव ने जिहादियों को समर्पित कर लिखी थी।
इस नज़्म के लिरिक्स कुछ इस तरह थे – “इक प्रेम कहानी में, इक लड़की होती है, इक लड़का होता है…” इस नज़्म में ‘लड़का-लड़की’ का जिक्र तो था लेकिन कहीं भी आतंकवादी का जिक्र नहीं था। हालाँकि ये नज़्म इस लाइन से आगे कभी भी पूरी नहीं सुनी और गाई गई।
दारा और शाका की प्रेम कहानी पर चर्चा का एक दुर्लभ दृश्य
समय बीतता गया। एक के बाद एक जिहादी जन्नत उल फिरदौस के स्वप्न को गंभीरता से लेकर भारतीय सेना की गोलियों को हँसकर निगलते रहे। लेकिन जमात-ए-लिबरल-मीडिया गिरोह ने जो दगाबाजी इन युवा आतंकवादियों के साथ की, वो ये कि कोई उनके हेडमास्टर पिता पर बात करता रहा, कोई उनकी पढ़ाई पर, कोई ये साबित करता नजर आया कि आतंकवादी की गणित अच्छी थी और इसका इस्तेमाल उसने कार्ड्स खेलते हुए जमकर किया।
यहाँ तक भी बताया गया कि वो कभी भी अन्य आतंकवादियों के साथ पत्ते खेलते हुए हारा नहीं और इसके लिए उसकी गणित पर पकड़ जिम्मेदार थी। लेकिन किसी ने कभी ये नहीं पूछा कि फलाने मोहम्मद, जो कल सेना द्वारा मारे गए, क्या उन फलाने मोहम्मद की भी कोई गर्लफ्रेंड थी?
आतंकियों के प्रेम में डूबी युवती के लिए क्यों प्राइम टाइम स्क्रीन काली नहीं की जाती?
सेना की गोलियों से मारे जा रहे जिहादियों की मौत के बाद कभी इस बात को लेकर स्क्रीन काली नहीं की गई कि अपने पीछे जो वो अपनी कुछ गर्लफ्रेंड्स को छोड़ गया है, उनका भविष्य अब क्या होगा? यह तो दूर की बात है, कभी यह चर्चा तक नहीं उठाई गई कि उसकी गर्लफ्रेंड क्या करती थी?
उसका आतंकी मजनू जब बम फोड़ने की ट्रेनिंग लेकर घर लौटता था, तो क्या वो अपनी उंगलियों से उसकी पीठ पर ‘जिहाद’ लिखती थी या नहीं? उसे फ्राइड मोमो पसन्द थे या फिर बिरयानी? उसके काजल का रंग भगवा था या हरा?
ऑपइंडिया ने अक्सर ऐसी पहल करने के प्रयास किए। हालाँकि, इस बात पर संशय बरकरार है कि ऑपइंडिया की इस पहल को देश के लिबरल गिरोह ने कभी सराहा या नहीं!
हाल ही की एक घटना में सेना द्वारा जन्नत भेजे गए एक आतंकवादी की महबूबा के इस अधिकार से चिंतित होकर ऑपइंडिया ने उनसे सम्पर्क स्थापित किया।
उन्होंने ऑपइंडिया से बात करते हुए बताया, “जब भी हम इंडियन एक्सप्रेस, क्विंट, वायर, NDTV की खबरें पढ़ते हैं कि उसका बाप हेडमास्टर था, भाई बोर्ड में था, चाचा आतंकवादी था, तो हमें बड़ा दुख होता है कि नारीशक्ति के चरम वाले इस युग में भी गर्लफ्रेंडों की बात कोई नहीं करता।” इतना कह कर बिलख-बिलख कर हमारे रिपोर्टर की छाती पर मुक्का मारते हुए वो नवयुवती फूट-फूटकर रोने लगीं।
हमारा रिपोर्टर सख्त लौंडा समूह का प्रादेशिक अध्यक्ष था और उसने अपना पूरा ध्यान खबर पर रखा और कोमलांगी नवयौवना के सुकोमल हाथों को हटा कर उन्हें कहा कि वो अपने बारे में और बताएँ कि क्या मृतक सलीम 555 कम्पनी की बीड़ी पीता था या उसे विदेशी सिगरेट की लत थी?
वियोग श्रृंगार रस में डूबी युवती ने बताया कि हालाँकि किसी प्रकार का कार्बनिक नशा तो वो नहीं किया करता था लेकिन फॉल्ट न्यूज़ के फैक्ट चेक और सबा नकली के किसी ट्वीट को वो मिस नहीं करता था। यही नहीं, उसने बताया कि वह बिग-बीसी और दी लायर का भी नियमित पाठक था।
युवती ने ऑपइंडिया से बातचीत में बड़ा खुलासा करते हुए बताया कि जमात-ए-प्रोपेगेंडा के इन्हीं समाचार स्रोतों से उसके आतंकवादी बॉयफ्रेंड को यह प्रेरणा मिली थी कि एक दिन उसके गणित में अच्छे होने, अच्छा बॉयफ्रेंड, अच्छा शायर, होने के चर्चे भी देश की मीडिया के सामने होंगे।
जब हमने पूछा कि वो निजी ज़िंदगी में कैसा प्रेमी था तो जानूँ ने बताया, “अपनी सुकोमल उँगलियों से जब मैं आतंकी रियाज़ की पीठ पर गणित के ए प्लस बी का होल स्क्वायर की जगह ‘जिहाद’ लिख देती थी तो गणित का मास्टर ग्रेनेड की पिन निकालने को आमादा हो उठता था!”
“वो कहा करता था, ‘अपनी इन उँगलियों के नाखून से मेरी पीठ पर ‘जिहाद’ गोद दे… जब भी मैं जिहाद की बमबाजी से थक कर नीचे सुस्ताने बैठूँगा और मेरी पीठ किसी पत्थर को छुएगी तो इस रिसते जख्म के दुखते ही मैं वापस खड़ा हो कर दो बम और फोड़ दूँगा।’”
यह कहने के बाद नवयुवती रोने लगी, सिसकते हुए उसने आगे कहा, “वो बहुत ही दरियादिल आदमी था। अपनी कमाई के पैसे बच्चों को पत्थर फेंकने को प्रेरित करने में ही खर्च कर देता था। मैंने कई बार कहा कि एक लिप्सटिक दिला दे मुझे, तो वो मेरे होंठों पर बंदूक की नाल रगड़ देता था और कहता था कि जिहादियों की लिप्सटिक यही है।”
इसके साथ ही उसने बगल से वो रायफल निकाली तो हमारा रिपोर्टर डर ही गया। लेकिन उसने कर के बताया कि आतंकी गणितज्ञ रियाज उसके होंठों पर बंदूक से कैसे लगाता था लिप्सटिक।
प्रेमी की मौत से क्षुब्ध नवयुवती ने एक ऐसी डायरी भी हमें दिखाई, जिसमें शहीद हो चुका आतंकवादी छुप छुपकर कविता भी लिखा करता था। इनमें से एक कविता इस प्रकार है –
“सुन पगली तुझे ऐसा प्यार करूँगा कि तेरे होंठों की लिपस्टिक बिगड़ेगी But प्रॉमिस तेरे आँखों का काजल कभी नहीं बिगड़ेगा – HeArt हैकर रियाज़ उर्फ अब्दुल”
ये सेक्युलर नज़्म पढ़ते हुए दिवंगत आतंकी की प्रेमिका एक बार फिर हमारे संवाददाता से लिपटकर फूट-फूटकर रोई। भावुक संवाददाता ने किसी प्रकार खुद को संभाला और आगे की जानकारी के लिए बातचीत जारी रखी। संवाददाता ने अपने दल को बताया कि उसने युवती की बातों में एक बार के लिए खुद के दर्द को भी महसूस किया।
वास्तव में, यह अक्सर देखा गया है कि NDTV, The Wire, The Quint, आदि आतंकवादियों की खाने-पहनने, नाचने-गाने के शौक पर तो खूब साहित्य लिखते हैं लेकिन आतंकवादियों की जिंदगी के इस अहम पहलू, यानी उनकी लव-लाइफ़ पर कभी भी प्रकाश नहीं डालते।
इन तथाकथित मीडिया वालों को जनता के सामने यह बात भी रखनी चाहिए कि आतंकवादियों की भी प्रेम कहानी हुआ करती है। और कभी-कभी तो वही सेना से उनकी मुखबिरी कर उन्हें मरवाने में मददगार भी साबित होती है।
आतंकवादियों की प्रेम कहानी बन सकती है युवाओं के लिए सबक
आतंकवादियों की लव-लाइफ़ के पहलू से प्रेम में धोखा खाए उन युवाओं को भी बड़ी प्रेरणा मिल सकती है, जिन्होंने फेसबुक एंजल प्रिया बनना भी स्वीकार किया इसके बावजूद भी वो एक गर्लफ्रेंड बना पाने में नाकाम रहे और आखिर में उन्होंने अपना जीवन टिकटोक वीडियो के नाम कर दिया।
वायर, क्विंट, NDTV अगर यह ख़बर जनता के सामने नहीं लेकर आएँगे कि आतंकवादियों के सीने में भी एक दिल होता है, जो छुप-छुपकर नज़्म भी लिखता है, जिनकी मौत के बाद उनकी प्रेमिकाएँ सख्त संवाददाताओं से लिपटकर फूट-फूटकर रोती हैं, तो जनता के मन में उनके इस मानवीय पहलू के प्रति संवेदना कैसे पैदा होगी?
कुछ आतंकवादी भाग्यशाली थे कि वो गणित में अच्छे थे, उनके पिता स्कूल में हेडमास्टर थे, या फिर उनकी एक प्रेमिका थी। ये सारे भाग्यशाली आतंकी थे।
जरा उन आतंकवादियों का सोचिए, जो गणित में भी अच्छे नहीं, जिनका बैंक PO में भी चयन नहीं हुआ, जिनकी प्रेमिका ने ठीक उनके UPSC इंटरव्यू की पहली शाम कहा कि घरवाले नहीं मानेंगे, और फिर भी दारा की उस एक बात को दिल पर लगाए जिंदगी भर मटका बजाकर उसे फोड़ने लगे, जिसमें दारा ने शाका से कहा था कि आतंवादियों की प्रेम कहानी नहीं होती… हा हा हा
दारा और शाका का वह संवाद, जिसे जिहाद चुनने से पहले हर आतंकवादी को देखना चाहिए –
‘सेक्युलर-लिबरल’ मीडिया गिरोह देशभर के हिंदुओं को निशाना बनाने के लिए अक्सर प्रोपेगेंडा फैलाता रहता है। वे लगातार ऐसा माहौल बनाने की कोशिश में लगे रहते हैं जिससे लगे कि देश में सांप्रदायिक हिंसा का कोई भी हिंदू पीड़ित नहीं है।
इसी प्रोपेगेंडा को भारत-विरोधी दुष्प्रचार के लिए पहचान रखने वाली वामपंथी पोर्टल द वायर ने पालघर मॉब लिंचिंग मामले में भी बढ़ाया था। महाराष्ट्र के पालघर में 16 अप्रैल 2020 को दो साधुओं और उनके ड्राइवर की भीड़ ने निर्मम तरीके से हत्या कर दी थी।
वायर ने दावा किया था दोनों साधु गैर-अधिसूचित जनजाति (denotified tribes) के थे और उनकी हत्या सांप्रदायिक हिंसा नहीं थी।
‘द वायर’ ने अपनी रिपोर्ट में दोनों मृतक व्यक्तियों- 70 वर्षीय कल्पवृक्ष गिरि और 35 वर्षीय सुशील गिरि को गोसावी खानाबदोश जनजाति से संबंधित बताया। साथ ही कहा कि उनके लिंचिंग का कोई धार्मिक एंगल नहीं था और वे भी ईसाई बने पालघर के आदिवासियों की तरह इसी समुदाय से ताल्लुक रखते थे। द वायर की रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि वे हिंदू नहीं थे और न ही साधु।
पालघर लिंचिंग पर वायर की रिपोर्ट
रिपोर्ट में कहा गया कि 70 वर्षीय कल्पवृक्ष गिरि ने भगवा पहन रखा था और ट्विटर पर उन्हें ‘हिंदू’ और ‘साधु’ बताया जाने लगा। लेकिन, सामाजिक कार्यकर्ता और गोसावी समुदाय के नेताओं का कहना है कि दोनों मृतक घुमंतू जनजाति (nomadic tribal) से संबंध रखते थे।
सिद्धार्थ वर्दराजन द्वारा साधुओं को खानाबदोश जनजातियों का बताना
पत्रकार स्वाति गोयल शर्मा के अनुसार, द वायर के संस्थापक संपादक सिद्धार्थ वरदराजन ने न्यूजलॉन्ड्री से बात करते हुए भी यह दावा किया था कि “साधु खानाबदोश जनजातियों से संबंधित” थे। शर्मा ने इस मुद्दे को आगे बढ़ाते हुए यह बताया है कि कैसे ये पोर्टल्स इस तथ्य को दरकिनार करने की कोशिश कर रहे थे कि साधु हिंदू थे। इसके बाद ‘द वायर’ की पत्रकार सुकन्या शांता ने उन्हें ब्लॉक भी कर दिया।
In a recent interview to @MnshaP of Newslaundry, Mr Vardarajan @svaradarajan repeated the misinformation that sadhus lynched in Palghar were adivasi tribals. They were NOT tribals. They were born in Tiwari and Dubey families in UP, as reported by multiple other publications pic.twitter.com/WCv456S9Hb
न्यूजलॉन्ड्री के मनीषा पांडे को दिए इंटरव्यू में वरदराजन गलत सूचना को दोहराया कि पालघर में जिन साधुओं की लिंचिंग हुई वे आदिवासी थे। अक्सर मीडिया नैतिकता पर व्याख्यान करने वाली न्यूजलॉन्ड्री की एंकर ने ‘द वायर’ के संस्थापक संपादक को सही करने की जहमत भी नहीं उठाई।
पालघर की लिंचिंग पर प्रिंट द्वारा गलत जानकारी देना
‘द प्रिंट’ जिसने हमेशा गैर-हिन्दुओं के अपराधों को छुपाया है, उसने पालघर पर झूठे प्रचार का सहारा लिया था। उसने बताया कि दोनों साधु गोसावी जनजाति के थे, जबकि इस जानकारी का कोई स्रोत नहीं था।
Theprint.in की रिपोर्ट का हिस्सा
दो मृतक साधु ब्राह्मण समुदाय से थे
जैसा कि लिबरल-धर्मनिरपेक्ष मीडिया ने साधुओं की पहचान के बारे में गलत सूचना फैलाने का सहारा लिया, वैसे ही कई स्वतंत्र मीडिया संगठनों ने ग्राउंड रिपोर्ट प्रकाशित करते हुए कहा कि साधु आदिवासी समुदाय के थे।
दैनिक भास्कर और न्यूज चैनल आजतक की ग्राउंड रिपोर्ट बताती है कि दोनों साधुओं का जन्म उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण हिंदू परिवारों में हुआ था। दोनों ने किशोरावस्था से पहले अपने परिवारों को संन्यासी बनने के लिए छोड़ दिया था।
द वायर द्वारा अपनी जानकारी की रिपोर्ट को सही करना
पालघर में नृशंस भीड़ हत्या के पीड़ितों की पहचान को लेकर फर्जी खबर चलाने के लगभग एक महीने बाद ‘द वायर‘ ने चुपचाप अपनी रिपोर्ट को एडिट करते हुए यह दावा किया है कि दोनों साधु ब्राह्मण परिवारों से थे, जो कि उनकी पिछली रिपोर्ट के एकदम विपरीत है। पुरानी रिपोर्ट में दावा किया गया था कि वे गोसावी आदिवासी समुदाय से थे।
वायर द्वारा स्पष्टीकरण
पालघर में मॉब लिंचिंग की घटना
16 अप्रैल 2020 को, जूना अखाड़े से जुड़े साधु कल्पवृक्ष गिरि महाराज और सुशील गिरि महाराज के साथ उनके ड्राइवर 30 वर्षीय नीलेश तेलगुदेवे की हत्या कर दी गई थी। 100 से अधिक लोगों की उन्मादी भीड़ ने उन पर हमला किया था। कहा जा रहा था कि ग्रामीणों ने उन्हें चोर समझ लिया और उन पर हमला करना शुरू कर दिया।
पुलिस ने दावा किया कि उनकी टीम उन्हें बचाने के लिए घटनास्थल पर पहुँची थी, मगर वे भी हिंसक भीड़ के निशाने पर आ गए थे। लेकिन बाद में कुछ वीडियो सामने आए, जिन्होंने पुलिस के दावे को पूरी तरह से खारिज कर दिया।
इन वीडियो में साधु पुलिस की हिरासत में दिख रहे थे और पुलिसकर्मियों ने उन्हें भीड़ के हवाले कर दिया। भीड़ ने पुलिसकर्मियों के सामने उन्हें तब तक पीटा जब तक उनकी मौत नहीं हो गई। बाद में, यह भी पता चला कि साधुओं की हत्या जान-बूझकर की गई थी। हत्या के मामले में अल्ट्रा-लेफ्ट लिंक्स की भूमिका सामने आई है। बताया जा रहा है कि साधुओं की मॉब लिंचिंग में मुख्य आरोपित का सम्बन्ध अल्ट्रा-लेफ्ट समूहों से है।
हार्डकोर नक्सली और दो लाख के इनामी पीएलएफआई के सबजोनल कमांडर बसंत गोप को टांगी से प्रहार कर एक निर्भीक आदिवासी महिला विनीता उरांव ने मार गिराया। यह घटना वृंदा नायक टोली में मंगलवार (मई 05, 2020) की रात की है।
झारखंड में गुमला सहित कई जिलों में आतंक का पर्याय बन चुके उग्रवादी संगठन पीएलएफआई (PLFI) के कमांडर बसंत गोप को ग्रामीण महिला ने टांगी से काटकर मार डाला। मारे गए नक्सलियों के सबजोनल कमांडर बसंत गोप के खिलाफ गुमला सहित विभिन्न जिलों के थानों में हत्या, लूट, अपरहण सहित दो दर्जन से अधिक मामले दर्ज हैं।
बसंत गोप के मारे जाने के बाद पुलिस प्रशासन के साथ-साथ जिलावासियों ने भी राहत की साँस ली है। शव की शिनाख्त पुलिस द्वारा बसंत गोप के रूप में की गई।
नरसंहार करने के लिए अपने 6 साथियों के साथ रात किया था विनीता के परिवार पर हमला
बसंत गोप ने मंगलवार रात करीब 8:30 बजे वृंदा नायकटोली में भीम उरांव के घर पर हमला किया था। हमला करने के बाद दरवाजा तोड़कर जबरन अंदर घुसने का प्रयास किया। अपने 6-7 साथियों के साथ उसने नायकटोली स्थित विनीता उरांव के घर पर हमला बोला। वे यह कहते जा रहे थे कि आज भीम उरांव (विनीता के पति) के घर के सब को पूजेंगे।
पहले नक्सली उग्रवादी भीम उरांव के परिवार को बाहर निकलने के लिए कहते रहे। उन्होंने गोलीबारी भी की लेकिन कोई जवाब ना मिलने पर जब नक्सलियों ने भीम उरांव के घर में घुसने की कोशिश की तो विनीता ने अपने परिवार को छुपाकर बसंत गोप पर टांगी से हमला कर दिया। महिला ने नक्सली पर कई वार किए, जिससे वो दरवाजे पर ही गिर गया।
विनीता का यह रूप देखकर नक्सलियों में अफरा-तफरी मच गई। टांगी के हमले से बसंत गोप गंभीर रूप से घायल हो गया, जिसे उठाकर उसके साथी जंगल की ओर भाग निकले लेकिन बसंत गोप की मृत्यु के बाद उसके साथी शव को पुजार बगीचा में छोड़कर भाग निकले। बुधवार सुबह गाँव वालों को उसकी लाश मिली।
झारखण्ड -गुमला में उग्रवादी संगठन पीएलएफआई का सब जोनल कमांडर बसंत गोप की टांगी से काटकर हत्या .नक्सली गांव में हत्या की नियत से आए थे लेकिन महिलाए नक्सली से भीड गई और कुख्यात नक्सली महिलाओ के हाथो मारा गया #Jharkhand#Naxal#Policepic.twitter.com/xzZFbXndMU
इसके बाद परिवार ने पुलिस को सूचना दी और पुलिस रात को गाँव पहुँची। थाना प्रभारी शंकर ठाकुर ने बताया कि निश्चित रूप से बसंत गोप आतंक का पर्याय बन चुका था और वो लेवी वसूलने सहित हत्या के कई मामलो में संलिप्त था।
रिपोर्ट्स के अनुसार, बसंत गोप के कारण ही शनिचरवा उरांव (भीम उरांव) का पूरा परिवार 2018 में गाँव छोड़कर चला गया था। बसंत गोप लेवी के लिए इस परिवार को तंग करता था। परेशान होकर पूरा परिवार गाँव छोड़कर राँची चला गया था। कुछ दिन पहले ही यह परिवार कोरोना वायरस के कारण हुए बंद के बाद राँची से गाँव लौटा था। इसकी जानकारी जब बसंत गोप को मिली तो वह अपने साथियों के साथ मंगलवार रात को परिवारवालों की हत्या करने घर पहुँच गया।