गणतंत्र दिवस के दिन असम में एक के बाद एक हुए चार बम धमाकों के कारण दहशत का माहौल बन गया। चारों धमाके शक्तिशाली थे। 3 धमाके डिब्रूगढ़ में हुए और 1 धमाका चेराइडोई जिले में हुआ। ये धमाके तब हुए, जब पूरा देश गणतंत्र दिवस की खुशियाँ मना रहा था। एक धमाका डिब्रूगढ़ में ग्रैहम बाजार में हुआ। वहीं एक अन्य धमाका एटी रोड में स्थित गुरुद्वारे के पास हुआ। दोनों इलाक़े डिब्रूगढ़ पुलिस स्टेशन के अंतर्गत आते हैं। तेलों का शहर कहे जाने वाली दुलियाजान में हुआ।
वहीं, चैराडोई वाला धमाका सोनारी पुलिस थाने के अंतर्गत आने वाले टोक घाट इलाक़े में हुआ। वरिष्ठ अधिकारियों ने घटनास्थलों का दौरा किया, जिसके बाद उन्होंने बताया कि पुलिस मामले की तह तक पहुँचने का प्रयास कर रही है। ये धमाके तब हुए हैं, जब शाहीन बाग़ विरोध प्रदर्शन के मुख्य साज़िशकर्ता शरजील इमाम ने असम को शेष भारत से काट कर अलग करने की धमकी दी थी। भारत के ‘टुकड़े-टुकड़े’ करने की बात करते हुए शरजील ने कहा था कि ‘चिकेन्स नेक’ वाले क्षेत्र को ब्लॉक कर के पूरे उत्तर-पूर्व को शेष भारत से अलग-थलग कर देने का लक्ष्य होना चाहिए।
इसके बाद शाहीन बाग़ व अन्य जगहों पर सीएए के ख़िलाफ़ विरोध-प्रदर्शन के नाम पर उपद्रव कर रहे दंगाइयों के गैंग की असली साज़िश का पर्दाफाश हुआ था। जहाँ शरजील इमाम अब इस मामले में सफाई देने की बातें कह रहा है, शाहीन बाग़ का एक धड़ा उससे ख़ुद को अलग कर के दिखा रहा है। असम में शरजील इमाम के ख़िलाफ़ केस भी दर्ज किया गया है और असम पुलिस इस मामले में कार्रवाई कर रही है। ऐसे में, असम में इन धमाकों का होना देश की सुरक्षा व्यवस्था के लिए बड़ी चुनौती है।
4 blasts in Upper #Assam, no report of any casualties from any of the blast sites – Dibrugarh, Sonari, Duliajan; no militant outfit claims responsibility yet. @ANI@AmitShah@adgpipic.twitter.com/dGktAEBTzT
मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने इन बम धमाकों को आतंकी घटना करार दिया है। उन्होंने कहा कि इतने पवित्र दिवस पर हुए इस वारदात की वो निंदा करते हैं। उन्होंने जनता को आश्वासन दिया कि उनकी सरकार दोषियों को पकड़ने के लिए हरसंभव कार्रवाई करेगी। असम के डीजीपी ने भी कहा है कि इस मामले में आगे की जाँच की जा रही है।
Strongly condemn the bomb blasts in a few places of Assam. This cowardly attempt to create terror on a sacred day only exhibits the frustration of the terror groups after their total rejection by the people.
Our Govt will take the sternest action to bring the culprits to book.
दिल्ली चुनाव में भाजपा को बड़ी सफलता मिलती दिख रही है। पहले 70 सदस्यीय विधानसभा चुनाव में नुकसान की आशंका जताई जा रही थी। लेकिन, ताजा सर्वे कुछ और ही इशारा करते हैं। पार्टी के आंतरिक सर्वे में पूर्ण बहुमत पाने का अनुमान लगाया गया है। 70 में से 40 सीटें पार्टी के खाते में जाती दिख रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रामलीला मैदान में हुई रैली और 40 लाख लोगों की कॉलनियों को पक्का किए जाने के कारण भाजपा को फायदा हुआ है। पूर्व भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और दिल्ली के प्रदेश अध्यक्ष मनोज तिवारी पूरे जोर-शोर से प्रचार में जुटे हैं।
आम आदमी पार्टी इस बार के चुनाव में प्रचार के लिए प्रशांत किशोर की कम्पनी की सेवा ले रही है। ‘लगे रहो केजरीवाल’ जैसे गीत यूट्यब से लेकर सभी सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर प्रचार के लिए डाले जा रहे हैं। उधर कमज़ोर कॉन्ग्रेस के फिर से उभरने के प्रयासों के कारण ये लड़ाई दिलचस्प हो गई है। भाजपा चुनाव से पहले एक और फाइनल आंतरिक सर्वे कराएगी। फिर से पार्टी मतदान होने से पहले भी एक और सर्वे कराकर सीटों पर संभावित जीत का अपडेट जानेगी। भाजपा इस बार फूँक-फूँक कर क़दम रख रही है।
भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष मनोज तिवारी के आँकड़ों की मानें तो भाजपा इस बार कुल 47 सीटों पर जीत दर्ज करेगी। 14 जनवरी को दिए गए इंटरव्यू में उन्होंने कहा था कि पहले पार्टी को 42 सीटें मिलने की उम्मीद थी लेकिन अब संख्या में इजाफा हो सकता है। सीएए के नाम पर विपक्षी पार्टियों द्वारा कराई गई हिंसा को भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष ने सीटों में इजाफा की संभावनाओं के पीछे का कारण बताया। एक अन्य भाजपा नेता ने कहा:
“केजरीवाल सरकार की ओर से चलाए गए मुफ्त बिजली-पानी के दाँव से पहले तो भाजपा हताश थी। पहले लग रहा था कि चुनाव हाथ से निकल रहा है। मगर जिस तरह से गृहमंत्री अमित शाह और अध्यक्ष जेपी नड्डा ने खुद कमान संभाली और छोटी-छोटी सभाओं के जरिए माहौल बनाना शुरू किया, उससे दिल्ली इकाई के पदाधिकारी जोश से भर गए हैं। आंतरिक सर्वे ने भी बता दिया है कि भाजपा इस बार 40 सीटें जीतने की स्थिति में है। जिन सीटों पर पार्टी को कमजोर स्थिति मिली है, वहाँ दोगुनी मेहनत की जा रही है।”
भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने दिल्ली विधानसभा चुनाव में अपनी क्षमता का पता लगाने के लिए आंतरिक सर्वे कराया है. @ManojTiwariMPhttps://t.co/WaAGjsX05A
घोंडा, मालवीय नगर, द्वारका, कृष्णानगर, मॉडल टाउन, मुस्तफाबाद, गांधीनगर, लक्ष्मीनगर, रोहिणी और विश्वासनगर जैसी विधानसभा सीटों पर भाजपा के ज्यादा मजबूत होने की बात कही जा रही है। इस सर्वे से आम आदमी पार्टी की नींद उड़नी तय है।
इस बार के पद्म अवॉर्ड्स में कई चौंकाने वाले नाम भी हैं। वैसे नाम, जो मुख्यधारा की मीडिया में न तो चर्चा का विषय बनते हैं और न ही ग्लैमरस हैं। ऐसे ही एक योगी को पद्म भूषण मिला है। श्री एम मुमताज़ अली खान को ये अवॉर्ड मिला है, जिन्हें श्री एम के नाम से जाना जाता है। वे एक योगी हैं। वे महेश्वरनाथ बाबाजी के शिष्य हैं। महेश्वरनाथ भी योगी थे और वे विख्यात योगी महावतार बाबाजी के शिष्य थे। केरल के एक मुस्लिम परिवार में जन्मे 72 वर्षीय श्री एम को आध्यात्मिक विरासत अपने परिवार से ही मिली।
उनकी दादी का झुकाव सूफी संस्कृति की तरफ़ था। इसलिए बचपन में उन्हें अपनी दादी से कई सूफी कहानियाँ सुनने को मिलीं। वो सत्संग फाउंडेशन के संस्थापक हैं। एक शिक्षाविद् और समाज सुधारक श्री एम की अपने गुरु से मुलाक़ात की कहानी भी दिलचस्प है। जब वो तिरुवनंतपुरम के हॉस्टल में रहते थे, तब अचानक से एक दिन उसके कंपाउंड में कटहल के वृक्ष के नीचे एक साधु बैठे हुए मिले। वो कहाँ से आए थे, कहाँ चले गए और कैसे आए थे- किसी को नहीं पता। उन्हीं महेश्वर बाबाजी ने श्री एम के अंदर योग के प्रति जिज्ञासा जगा दी। मात्र 19 वर्ष की उम्र में हिमालय उनका घर बना।
गुरु से उनकी पहली मुलाक़ात संक्षिप्त थी। हिमालय पर वो अपने लिए एक गुरु खोजने ही निकले थे। हरिद्वार और ऋषिकेश होते हुए उन्होंने ये यात्रा शुरू की। इस दौरान उन्होंने योग और उपनिषद के ज्ञान में ख़ुद को दक्ष बनाया। रास्ते में वो कई ऋषियों से मिलते चले। वो कुल मिला कर 220 किलोमीटर पैदल ही चले। वहाँ निराश होकर उन्होंने अलकनंदा नदी में कूद कर प्राण त्याग करने का निश्चय लिया, लेकिन अचानक से महेश्वर बाबाजी वहाँ आए और उन्हें अपने साथ ले गए। उनकी कुण्डलिनी जागृत करने के लिए महेश्वर बाबाजी ने उन्हें योग सिखाया और अंत में उनकी मुलाक़ात महावतार बाबाजी से भी हुई।
इसके बाद उन्हें आदेश दिया गया कि वो वापस लौटें और गृहस्थ जीवन शुरू करें। उन्होंने कई तीर्थों का दौरा किया और हर धर्म के आध्यात्मिक गुरुओं से मिल कर प्रत्येक संस्कृति को समझा और जाना। श्री एम मानते हैं कि सत्संग जात-पात से लोगों को ऊपर उठा देता है। हालाँकि, वो ख़ुद क्रिया योग में अभ्यस्त हैं लेकिन वो कहते हैं कि ये सभी के लिए सूटेबल नहीं है। उन्होंने 2011 में अपनी आत्मकथा भी लिखी, जिसका नाम “Apprenticed to a Himalayan Master – A Yogi’s Autobiography“ है। ये किताब बेस्टसेलर बनी।
— TheSatsangFoundationOfficial (@SatsangTweets) January 26, 2020
श्री एम अभी भी सादी ज़िंदगी जीते थे। उनकी पत्नी व दो बच्चे हैं। वो बंगलुरु से 126 किलोमीटर की दूरी पर स्थित मंदापल्ले में रहते हैं। हालाँकि, वो अधिकतर समय सत्संगियों को देश भ्रमण कराने में लगाते हैं, जो 7500 किलोमीटर की यात्रा होती है और 11 राज्यों से गुजरती है। उन्होंने रामकृष्ण मिशन और कृष्णमूर्ति फाउंडेशन में भी अच्छा-ख़ासा समय व्यतीत किया है।
एक महीने से ज्यादा वक्त से दिल्ली के शाहीन बाग में बैठी औरतों को सेक्युलर, संविधान बचाने वाली, महिला सशक्तिरण और न जाने कैसे-कैसे प्रतीकों के तौर पर स्थापित करने के लिए वामपंथी गिरोह ने तमाम घोड़े खोल रखे हैं। देश में जगह-जगह शाहीन बाग बनाने की कोशिशें भी हो रही हैं। लेकिन, वक्त-वक्त पर शाहीन बाग से ऐसी तस्वीरें, ऐसे वीडियो और ऐसे नारे सामने आ ही जाते हैं जो इनके प्रपंच की पोल खोल देते हैं। शाहीनबाग प्रदर्शन के मास्टरमाइंड बताए जा रहे शरजील इमाम पर तो देशद्रोह का मुकदमा तक दर्ज हो चुका है। असम को भारत से काटने की धमकी दे रहे शरजील से अब शाहीन बाग पल्ला झाड़ने की कोशिश कर रहा है। लेकिन, फेहरिस्त इतनी लंबी है कि दाग शायद ही धुले।
सो, संविधान के आईने में इन महिलाओं को देखने के लिए 26 जनवरी से बेहतर दिन शायद ही कोई हो। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या ये औरतें उसी रास्ते पर हैं, जिसका सपना उन 15 महिलाओं ने देखा था जिन्होंने संविधान बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। यकीनन, नहीं। क्योंकि उन 15 महिलाओं ने संविधान के निर्माण में अपनी भूमिका इसलिए ही निभाई थी कि देश में अराजकता का माहौल न बनें। पहचान और मजहब के नाम पर शोरगुल न मचाया जाए। महिलाएँ सशक्त बनें न कि कठपुतली। इन कसौटियों पर शाहीन बाग की वे औरतें जिनकी डोर किसी और ने थाम रखी है, खरी नहीं उतरतीं।
पितृसत्ता को तोड़कर देश की आवाज़ बनने वाली उन 15 महिलाओं ने बताया था कि सशक्तिरण और कट्टरपंथ के बीच का फर्क क्या होता है। 389 सदस्यीय संविधान सभा में इन महिलाओं की संख्या आँकड़ों के लिहाज से काफी कम यानी 15 ही था। लेकिन, उनकी आवाज आज भी महसूस की जाती है। संविधान का मसौदा तैयार करने में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका थी। इनमें एक मुस्लिम भी थीं।
संविधान सभा की एक मात्र मुस्लिम महिला सदस्य बेगम एजाज रसूल महिला सशक्तिरण की अनूठी मिसाल थीं। मुस्लिम लीग का हिस्सा होने के बावजूद देश का साथ नहीं छोड़ा। 1950 में मुस्लिम लीग भंग होते ही कॉन्ग्रेस में शामिल हो गईं। साल 1952 में राज्यसभा के लिए चुनी गईं। 1969 से 1990 तक उत्तर प्रदेश विधानसभा की सदस्य रहीं। 1969 से 1971 के बीच वह सामाजिक कल्याण और अल्पसंख्यक मंत्री भी रहीं। समाज कल्याण में उनका योगदान इतना था कि साल 2000 में उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया गया।
बेगम एजाज के अलावा दक्षिणानी वेलायुद्ध भी संविधान सभा में एक ऐसी महिला सदस्य थीं जो उस दौर में पिछड़े समुदाय से उभर कर आगे आईं। इसी वर्ग के 70-75% (दलित, गरीब) प्रतिशत आबादी को नागरिकता संशोधन कानून के तहत नागरिकता मिलने वाली है। लेकिन शाहीन भाग की औरतों का विरोध देखकर लगता है कि वे इसके लिए राजी नहीं हैं। यही फर्क़ है संविधान बचाने वाली महिलाओं में और संविधान बनाने वाली महिलाओं में।
दक्षिणानी वेलायुद्ध का जन्म 4 जुलाई 1912 को कोचीन में बोल्गाटी द्वीप पर हुआ था। लेकिन आगे चलकर वे शोषित वर्गों की नेता बनीं। साल 1945 में, दक्षिणानी को कोचिन विधान परिषद में राज्य सरकार द्वारा नामित किया गया। वह साल 1946 में संविधान सभा के लिए चुनी गईं और पहली दलित नेता बनीं।
शाहीन बाग पर प्रदर्शन कर रही महिलाओं को आज देश की सबसे पुरानी पार्टी कॉन्ग्रेस का समर्थन है। उसी कॉन्ग्रेस का जिसकी नींव आजाद राष्ट्र के लिहाज रखी गई थी। लेकिन वही पार्टी जो भारत की आजादी के बाद ओछी राजनीति करने पर उतर आई । जिसका उद्देश्य आज केवल साम्प्रदायिकता, ऊँच-नीच करवाना रह गया है।
एक समय में इसी पार्टी की मालती चौधरी, पूर्णिमा बनर्जी, कमला चौधरी, लीला रॉय, सरोजिनी नायडू, सुचेता कृपलानी, विजय लक्ष्मी पंडित, एनी मास्कारेन जैसी नेता संविधान सभा में शामिल थीं। संविधान का मसौदा तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इनके अलावा रेनूका रे, राजकुमारी अमृत कौर, हंसा जिवराज मेहता, दुर्गाबाई देशमुख और अम्मू स्वामीनाथन भी इसी सूची में शामिल हैं।
संविधान का मसौदा तैयार करने वाली उन महिलाओं की संक्षिप्त जानकारी, जिनका नाम इतिहास में कम ही पढ़ाया गया… अम्मू स्वामीनाथन– अम्मू स्वामीनाथन 1952 में तमिलनाडु के डिंडिगुल लोकसभा से चुनाव जीतकर संसद में पहुँचीं थीं। वे तमिलानाडु की तेज तर्रार गाँधीवादी नेताओं में शुमार थीं। छोटी उम्र से ही वे महिला अधिकारों की आवाज बनीं। राजकुमारी अमृत कौर– संविधान सभा की सलाहकार समिति व मौलिक अधिकारों की उप समिति की सदस्य थीं। सभा में वह सेंट्रल प्राविंस व बेरार की प्रतिनिधि के तौर पर शामिल हुई थीं। दुर्गाबाई देशमुख– दुर्गाबाई ने न सिर्फ देश को आजाद कराने बल्कि समाज में महिलाओं की स्थिति बदलने के लिए भी लडा़ई लडी़। भारत के दक्षिणी इलाकों में शिक्षा को बढा़वा देने के लिए इन्होंने ‘बालिका हिन्दी पाठशाला’ भी शुरू की। 12 साल की छोटी सी उम्र में वह असहयोग आंदोलन का हिस्सा बनीं। उन पर महात्मा गांधी का प्रभाव था। वकील होने के नाते उन्होंने संविधान के कानूनी पहलुओं में योगदान दिया। हंसा मेहता– समाज सेविका व स्वतंत्रता सेनानी होने के साथ ही कवयित्री व लेखिका भी थीं। वह 1946 में ऑल इंडिया वुमन कांफ्रेंस की अध्यक्ष भी रहीं थीं। वह संविधान सभा की मौलिक अधिकारों की उप समिति की सदस्य थीं। उन्हें संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार की सार्वभौमिक घोषणा में ‘ऑल मेन आर बॉर्न फ्री एंड इक्वल’ को बदलकर ‘ऑल ह्यूमन बीइंग आर बॉर्न फ्री एंड इक्वल’ करवाने के अभियान के लिए भी जाना जाता है। संविधान सभा में वह मुंबई के प्रतिनिधि के तौर पर शामिल हुई थीं। मालती नवकृष्ण चौधरी भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महत्वपूर्ण अग्रदूतों में से एक थीं। उसने माना कि जीवन में उसका मिशन उड़ीसा के गरीब लोगों को शिक्षित करना था। मालती नवकृष्ण चौधरी अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों की दुर्दशा से चिंतित थीं। उन्होंने ओडिशा के गाँवों से गुजरते हुए अपनी पीड़ा का अनुभव किया था। उन्होंने अपना पूरा जीवन गरीब लोगों को ज्ञान देने के लिए समर्पित कर दिया। वह गाँधीजी और टैगोर की पसंदीदा संतान थीं। प्रेम में से गांधीजी ने उन्हें “टोफनी” और टैगोर ने उन्हें “मीनू” कहा। कमला चौधरी-लखनऊ के समृद्ध परिवार से आने वाली कमला चौधरी ने साल 1930 में गाँधी द्वारा शुरू की गई नागरिक अवज्ञा आंदोलन में सक्रियता से हिस्सा लिया| अखिल भारतीय कॉन्ग्रेस कमेटी की उपाध्यक्ष बनीं और सत्तर के उत्तरार्ध में लोकसभा के सदस्य के रूप में चुनी गईं। रेनूका रे-पद्मभूषण से सम्मानित रेणुका रे स्वतंत्रता-सेनानी, सामाजिक कार्यकर्ता के साथ दूसरी और तीसरी लोकसभा के सक्रिय सांसदों में थीं। लंदन स्कूल ऑफ इकॉनोमिक्स से शिक्षित रेणुका रे अपनी उच्च कोटि की सामाजिक आर्थिक समझ वाली सांसद के तौर पर याद की जाती हैं। 1959 में रेणुका रे की अगुवाई में समाज कल्याण और पिछड़ा वर्ग कल्याण के लिए एक समिति बनी। इस समिति की रिपोर्ट को रेणुका रे कमेटी के तौर पर जाना जाता है। इस समिति ने गृह मंत्रालय के अंतर्गत पिछड़ा वर्ग के लिए विभाग बनाने की सलाह दी।
सोचिए परिस्थियाँ कितनी अधिक बदल चुकी हैं। ये महिलाएँ थी, जिन्होंने अपनी शिक्षा और विवेक के बलबूते सामाजिक कुरीतियों को ध्वस्त किया और भारत को लोकतांत्रिक देश बनाने में योगदान दिया। एक शाहीन बाग पर बैठी महिलाएँ हैं, जिनका न विवेक उनके वश में है और न ही उनकी बुद्धि। वो खुले तौर पर शर्जील इमाम और ओवैसी जैसे इस्लामिक कट्टरपंथियों की कठपुतलियाँ बन चुकी हैं और इसी को वो आवाज़ उठाना बता रही हैं।
आज जिन महिलाओं को सशक्तिकरण का चेहरा बता पेश किया जा रहा है वे उस कानून को लेकर हंगामा कर रही हैं जिसका किसी भारतीय से कोई लेना-देना नहीं है। जिनकी डोर मजहब के ठेकेदारों के हाथ में है। जिनके नारे हिंदू विरोधी हैं। जो हलाला और माहवारी की उम्र होते ही निकाह कर देने की रवायत के खिलाफ आवाज नहीं उठाना चाहतीं। जो तीन तलाक की दरिंदगी से मुक्ति को अपने धर्म में दखल मान रहीं हैं। सोचिए!
देश में अवैध रूप से रह रहे घुसपैठियों की संख्या बढ़ती जा रही है। पिछले कुछ दिनों में अलग-अलग इलाक़ों से कई घुसपैठियों को हिरसत में लिया गया है। इसी क्रम में गुजरात के अहमदाबाद से 11 बांग्लादेशी नागरिकों को पुलिस ने हिरासत में लिया है, जो अवैध रूप से वहाँ रह रहे थे। गुजरात पुलिस के विशेष अभियान समूह (SOG) ने शनिवार (जनवरी 25, 2020) को ये कार्रवाई की। हिरासत में लिए गए सभी बांग्लादेशी अहमदाबाद में अवैध रूप से प्रवास कर रहे थे।
एसओजी असिस्टेंट कमिश्नर ऑफ पुलिस बीसी सोलंकी ने जानकारी दी है कि हिरासत में लिए गए सभी बांग्लादेशियों को वापस उनके मुल्क़ में प्रत्यर्पित करने के लिए प्रयास किया जा रहा है। पुलिस ने इस दिशा में कार्रवाई भी शुरू कर दी है। अवैध रूप से रह रहे ये सभी बांग्लादेशी मजदूरी का काम कर रहे थे। पुलिस ने बताया कि हिरासत में लेने के बाद उनके बांग्लादेश प्रत्यर्पण के लिए कार्यवाही शुरू कर दी गई है।
हिरासत में लिए गए लोगों से उनका डाक्यूमेंट्स दिखाने को कहा गया था, लेकिन उनके पास भारतीय नागरिकता साबित करने वाले कोई दस्तावेज नहीं थे। पुलिस को शक है कि उनमें से कुछ आपराधिक गतिविधियों में भी संलग्न हैं। पुलिस इस बात का पता लगाने में जुटी है कि हिरासत में लिए गए बांग्लादेशियों का क्या आपराधिक इतिहास रहा है? एसओजी ने 2 टीम बना कर छापेमारी की और उन 11 अवैध बांग्लादेशियों को पकड़ा। इशानपुर में चंदोला झील के पास बनी बस्ती से इन्हें हिरासत में लिया गया है।
As many as 11 Bangladeshi nationals who were living in #Ahmedabad illegally were detained today, #police said. The Special Operations Group of the #Gujarat police said it detained 11 persons from a settlement near Chandola Lake in Isanpur here.
मई 2019 में रथयात्रा से पहले अहमदाबाद विशेष अभियान समूह (एसओजी) ने गैरकानूनी तरीके से शहर के विभिन्न हिस्सों में रह रहे 47 बांग्लादेशी नागरिकों को हिरासत में लिया था। ये दिखाता है कि गुजरात की क़ानून-व्यवस्था के लिए घुसपैठिए सिरदर्द बन रहे हैं। हाल ही में पुलिस को सूचना मिली थी कि तरमुगली द्वीप पर कुछ संदिग्ध लोगों को नाव के साथ देखा गया है। पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए 66 लोगों को हिरासत में लिया था। ये सभी बाद में रोहिंग्या मुस्लिम निकले। हिरासत में लिए गए सभी आरोपित बांग्लादेश से आए थे।
आदरणीय राष्ट्रपति जी, ठीक दस दिन पहले मैंने अपना कार्यभार संभाला था। तब से अब तक मैं एक छोटी रिपोर्ट लिखने के लिए दस मिनट का समय भी नहीं निकाल सका। स्थिति इतनी गंभीर और संकटपूर्ण थी। … यह वाकई चमत्कार था कि 26 जनवरी को काश्मीर बचा लिया गया और हम राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय शर्मिंदगी उठाने से बच गए। इस दिन की कहानी लम्बी है और यह बाद में पूरे ब्यौरे के साथ बताई जानी चाहिए। … मैंने 26 जनवरी को हुई घटनाओं में अपनी भूमिका पूरी तरह अदा की है और मुझे इसका गर्व है। लेकिन अपना काम जारी रखना मेरे लिए कठिन हो जाएगा यदि यह प्रभाव बना रहा कि जनता में मुझे पूरा समर्थन नहीं प्राप्त है। पहले से ही मुझे एक टूटा और बिखरा प्रशासन मिला है। यदि कमांडर पर ही हर रोज छिप कर वार किया जाए तो सफलता का क्या अवसर रह जाता है इसकी कल्पना की जा सकती है। … कामचलाऊ समाधानों या सुगम रास्तों का सहारा लेना आत्मघाती नहीं तो गलत जरूर होगा। विष महत्वपूर्ण अंशों तक पहुॅंच चुका है। जब तक कि उसे पूरी तरह समाप्त नहीं किया जाता, हम एक संकटपूर्ण स्थिति से दूसरी में ही लड़खड़ाते रहेंगे। आपका -जगमोहन
1990 के जनवरी के आखिरी दिनों में जम्मू-कश्मीर के तत्कालीन राज्यपाल जगमोहन द्वारा राष्ट्रपति को लिखे इस पत्र की चुनिंदा पंक्तियों को पढ़कर, आपको उस समय के हालात का अंदाजा लग गया होगा। श्रीनगर से लेकर दिल्ली की सियासत का अहसास भी हो रहा होगा। यह भी समझ गए होंगे कि 1990 की वह 26 जनवरी भारत के लिए कितनी महत्वपूर्ण थी। पत्र में जगमोहन जिस चीज को चमत्कार बता रहे हैं, आखिर वे परिस्थितियॉं क्या थी? ये जानने से पहले इस पर नजर डालते हैं कि दूसरी बार जगमोहन को किन परिस्थितियों में राज्यपाल बनाकर जम्मू-कश्मीर भेजा गया था।
19 जनवरी 1990। कुछ याद आया। वह मनहूस रात जब घाटी के हर मस्जिद से एक ही आवाज आ रही थी कि हमें कश्मीर में हिंदू औरतें चाहिए, लेकिन बिना किसी हिंदू मर्द के। वो रात जब हिंदुओं को केवल तीन विकल्प दिए गए थे। पहला, कश्मीर छोड़कर भाग जाओ। दूसरा, धर्मांतरण कर लो। तीसरा, मारे जाओ। वो रात जिसने मानवीय इतिहास के सबसे बड़ी पलायन त्रासदियों में से एक का दरवाजा खोला। जिसके कारण करीब 4 लाख कश्मीरी हिंदू जान बचाने के लिए अपना घर, अपनी संपत्ति अपने ही देश में छोड़कर भागने को मजबूर हुए। वे आज भी जड़ों की ओर लौटने का इंतजार ही कर रहे हैं।
उसी शाम, यानी 19 जनवरी 1990 की शाम को ही जगमोहन ने राज्यपाल पद की शपथ ली थी। कश्मीर: समस्या और समाधान में जगमोहन लिखते हैं, “अचानक विमान झटके के साथ नीचे झुका। ऐसा बाहरी हवा में दबाव के अन्तर के कारण हुआ। सीमा सुरक्षा बल का वह छोटा से विमान उसे आसानी से झेल नहीं सकता था। पूरा विमान कॉंप उठा और उसके साथ मेरी विचारधारा भी। शायद इसने मुझे संस्मरण दिलाया कि मैं ऐसे राज्य में जा रहा हूॅं जो अशांति और दहशत में फॅंसा है। यह 19 जनवरी 1990 की दोपहर थी। मैं विमान द्वारा दूसरी बार जम्मू-काश्मीर जा रहा था।”
ऐसे हालात में पहुॅंचे जगमोहन ने शाम में शपथ ली। जितने स्थान का प्रबंध किया गया था उससे कहीं अधिक लोग जुटे थे। लेकिन कॉन्ग्रेस और नेशनल कॉन्फ्रेंस ने इस शपथ ग्रहण समारोह का बहिष्कार किया था। बकौल जगमोहन, मैं उनका उद्देश्य समझ नहीं सका। यह घाटी को बचाने का समय था या मेरी परेशानियों में एक और अड़ॅंगा लगा राजनैतिक फायदा उठाने का? शपथ लेने के बाद जगमोहन अपने स्वभाव के विपरीत पहले से तैयार एक भाषण देते हैं। जिसका लबोलुबाब था- यह ‘गवर्नर रूल’ नहीं, ‘गवर्नर सर्विस’ है। एक नर्स की तरह मरीज को प्यार, दुलार और सेवा दी जाएगी ताकि वह स्वस्थ हो और शांति से रचनात्मक जीवन जी सके।
बावजूद उस रात क्या हुआ इससे हम सब परिचित हैं। जगमोहन ने खुद लिखा है कि पहले ही दिन आतंकवादियों, पाकिस्तान समर्थित तत्वों, कट्टरपंथी और सांप्रदायिक तत्वों तथा राजनीतिक और शासकीय निहित तत्वों ने अपने-अपने तरीके से उन्हें कमजोर और पंगु बनाने का निर्णय कर लिया था। लेकिन सिलसिला इसके बाद भी थमा नहीं। जगमोहन लिखते हैं कि मस्जिदों के लाउडस्पीकर से इस्लामी नारे सुनाई दे रहे थे। आसपास के गॉंवों से लोग शहरों में इकट्ठा हो रहे थे। उन्हें लगता था कि आजादी बस आ ही चुकी है। कश्मीर में तियनमान स्क्वेयर और ब्लू स्टार दोहराने की बातें हो रही थीं। फिर धीरे-धीरे भयावह शांति छा गई। लेकिन, जगमोहन की असली चुनौती 26 जनवरी को इंतजार कर रही थी। अंतिम प्रहार उसी दिन होना था।
साजिश
उस साल की वह 26 जनवरी जुमे के दिन थी। ईदगाह पर 10 लाख लोगों को जुटाने की योजना बनाई गई थी। मस्जिदों के लाउडस्पीकरों से लोगों को छोटे-छोटे समूह में ईदगाह पहुॅंचने को उकसाया जा रहा था। श्रीनगर के आसपास के गॉंव, कस्बों से भी जुटान होना था। योजना थी कि जोशो-खरोश के साथ नमाज अता की जाएगी। आजादी के नारे लगाए जाएँगे। आतंकवादी हवा में गोलियॉं चलाएँगे। राष्ट्रीय ध्वज जलाया जाएगा। इस्लामिक झंडा फहाराया जाएगा। विदेशी रिपोर्टर और फोटोग्राफर तस्वीरें लेने के लिए वहॉं जमा रहेंगे। उससे पहले 25 की रात टोटल ब्लैक आउट की कॉल थी।
साभार: कश्मीर: समस्या और समाधान
उन्हें कामयाबी का पूरा गुमान था। वे जानते थे कि गणतंत्र दिवस होने के कारण आवाजाही पर कोई प्रतिबंध नहीं होगा। नेता और अधिकारी जम्मू में सलामी लेने में व्यस्त होंगे। स्थानीय अधिकारी कोई काम नहीं करेंगे। इस्लामी झंडा लहराते ही उनका सरेंडर करवाया जाएगा। तैयारियॉं पूरी थी और योजना पर गुप्त तरीके से अमल हो रहा था। उन्होंने अंतिम वक्त में हैरान कर देने के मॅंसूबे पाल रखे थे। 14 अगस्त, 1989 को वे इसका एक प्रयोग कर चुके थे। तब कुछ आतंकियों ने परेड की सलामी ली थी। पाकिस्तान का स्वतंत्रता दिवस मनाया गया था। अखबारों में उस जश्न की ख़बरें और तस्वीरें छपी थीं। अगले दिन भारत के स्वतंत्रता दिवस पर तिरंगे को सार्वजनिक रूप से जलाया गया था।
संदेश
26 जनवरी से दो दिन पहले अफवाह फैलाई गई कि अर्धसैनिक बलों ने कश्मीर आर्म्ड फोर्सेस के चार जवानों को मार गिराया है। ‘खून का बदला खून’ का आह्वान किया गया। 25 जनवरी की सुबह श्रीनगर में भारतीय वायुसेना के स्क्वाड्रन लीडर रवि खन्ना और तीन अन्य अफसर की आतंकियों ने निर्मम हत्या कर दी। हत्या उस समय की गई जब वे ड्यूटी पर जाने के लिए अपनी दफ्तर की गाड़ी का इंतजार कर रहे थे। आतंकियों ने संदेश दे दिया था।
साभार: कश्मीर: समस्या और समाधान
समर्पण
आतंकियों के हौसले बुलंद थे। उनके लिए आज़ादी बस कुछ घंटे दूर थी। उन्हें लग रहा था कि इस साजिश की भनक जगमोहन को नहीं लगेगी। लगी भी तो 10 लाख लोगों पर बल प्रयोग का जोखिम नहीं उठाया जाएगा। लेकिन, मजहबी उन्मादियों को घुटने पर लाने का प्लान पहले से तैयार था। उन्हें चौंकाते हुए जगमोहन ने 25 जनवरी की दोपहर ही कर्फ्यू लगा दिया। अपने कुछ विश्वस्त सहयोगियों को उसी शाम बता दिया कि वे सलामी लेने जम्मू नहीं जाएँगे। श्रीनगर में ही डेरा डाले रहेंगे। सभी सरकारी विभागों को आदेश दिए कि हर हाल में दफ्तरों में लाइटें जलनी चाहिए। हर हाल में स्ट्रीट लाइट ऑन रहनी चाहिए। इसके लिए पीडब्ल्यूडी और बिजली विभाग को विशेष आदेश दिए गए। शाम हुई तो बिजलियॉं जल उठीं। बकौल जगमोहन, आप इसे अथॉरिटी का सम्मान कहिए या डर, कर्मचारियों ने इसका पालन किया।
साभार: कश्मीर: समस्या और समाधान
इन लाइटों की रोशनी से जो गर्माहट पैदा हुई वह इस्लामिक आतंकवाद पर भारत की पहली मनोवैज्ञानिक जीत थी। इसने तय कर दिया कि जीतना भारत को ही है। कश्मीर को संविधान के आईन में ही चलना है, न कि किसी मजहबी उन्माद में जलना है।
(संदर्भ:My Frozen Turbulence In Kashmir, कश्मीर: समस्या और समाधान)
गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर वर्ष 2020 के लिए पद्म पुरस्कारों का ऐलान किया गया। इस बार 7 लोगों को पद्म विभूषण, 16 को पद्म भूषण और 118 लोगों को पद्म श्री देने का ऐलान किया गया है। इस साल देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न का ऐलान नहीं किया गया है।
Arun Jaitley, Sushma Swaraj and George Fernandes conferred with Padma Vibhushan award. (file pics) pic.twitter.com/OlEd2eXDs8
पूर्व केंद्रीय मंत्री जॉर्ज फर्नांडीस, अरुण जेटली और सुषमा स्वराज को मरणोपरांत पद्म विभूषण सम्मान दिया गया है। अध्यात्म क्षेत्र में यह सम्मान मरणोपरांत विशवेश्वतीर्थ स्वामीजी श्रीपेजावरा अधोखाजा माता उडुपी को भी देने की घोषणा की गई है। इनके अलावा मुक्केबाज एमसी मैरीकॉम, शास्त्रीय गायक छन्नूलाल मिश्रा और मॉरीशस के पूर्व प्रधानमंत्री अनिरूद्ध जगन्नाथ को भी इस साल गणतंत्र दिवस पर पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया है।
Kangana Ranaut, on being conferred with Padma Shri: I’m humbled&honored. I thank my country for this recognition& I dedicate this to every woman who dares to dream. To every daughter… to every mother… to the dreams of women who will shape the future of our country. (file pic) pic.twitter.com/VNlz0DcNoC
उद्योगपति आनंद महिंद्रा और बैडमिंटन खिलाड़ी पीवी सिंधू सहित 16 को पद्म भूषण सम्मान के लिए चुना गया है। नगालैंड के पूर्व मुख्यमंत्री एससी जमीर और जम्मू कश्मीर के नेता मुजफ्फर हुसैन बेग को पद्म भूषण से नवाजा गया है। लखनऊ के इतिहासकार और पत्रकार योगेश प्रवीण, असम के इतिहासकार जोगेंद्र नाथ फूकन को पद्म श्री चुना गया गया है। क्रिकेटर जहीर खान, हॉकी खिलाड़ी रानी रामपाल, निशानेबाज जीतू राय को भी पद्म श्री से सम्मानित किया जाएगा।
पद्म श्री पुरस्कारों में कई आम लोगों के नाम भी शामिल हैं। इनमें लंगर बाबा के नाम से मशहूर जगदीश लाल अहूजा और 25 हजार लावारिस लाशों का अंतिम संस्कार करने वाले मोहम्मद शरीफ भी हैं। अहूजा सैंकड़ों गरीब मरीजों को हर दिन मुफ्त भोजन मुहैया करवाते हैं। उन्होंने 1980 में इसकी शुरुआत की थी। बीते 15 सालों से हर दिन आहूजा जी 2 हजार लोगों को मुफ्त भोजन करवाते हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पद्म पुरस्कार से सम्मानित व्यक्तियों को बधाई दी और कहा कि इनमें असाधारण लोग शामिल हैं। उन्होंने ट्वीट किया, “पद्म पुरस्कार प्राप्त करने वाले सभी को बधाई।” प्रधानमंत्री ने कहा कि पुरस्कृत लोगों में समाज राष्ट्र और मानवता के प्रति असाधारण योगदान देने वाले व्यक्ति शामिल हैं।
दिल्ली के उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने शनिवार (25 जनवरी) को भाजपा सरकार को 24 घंटे के भीतर शरजील इमाम को गिरफ़्तार करने की चुनौती दी। उन्होंने कहा कि यदि शरजील को नहीं किया गया तो इसका मतलब है कि उसे इस तरह का भड़काऊ भाषण देने के लिए भाजपा ने ही भेजा था।
बता दें कि सोशल मीडिया पर जैसे ही यह शरजील का वीडियो आया, यूजर्स ने उसे पहचान कर आप पार्टी को नसीहत देनी शुरू कर दी। एक यूज़र ने लिखा कि AAP का नेता अमानतुल्लाह खान पहले दिन से ही शरजील इमाम के साथ दिखाई दे रहा था।
So this Amanatullah Khan of AAP was with Sharjeel Imam from the very first day pic.twitter.com/qTQfzAxZEy
पत्रकारों से बातचीत करते हुए सिसोदिया ने कहा कि एक व्यक्ति जो असम को भारत से अलग करने की बात कर रहा है और ऐसे समय में बीजेपी उस पर एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस कर रही है, यह बड़ी अश्चर्यजनक बात है। उन्होंने कहा कि शरजील को गिरफ़्तार करने के लिए वो भाजपा को 24 घंटे की मोहलत दे रहे हैं और अगर ऐसा नहीं हो सका तो इसका मतलब वो भाजपा का आदमी है और भाजपा को देश की सुरक्षा की कोई परवाह नहीं है।
इससे पहले, भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता संबित पात्रा ने अपने ट्विटर हैंडल से लिखा था, “दोस्तों शाहीन बाग़ की असलियत देखें: 1) असम को इंडिया से काट कर अलग करना हमारी ज़िम्मेदारी 2) “Chicken Neck” मुस्लिमों का है 3) इतना मवाद डालो पटरी पे की इंडिया की फ़ौज Assam जा ना सके 4) सारे ग़ैर मुस्लिमों को मुस्लिमों के शर्त पर ही आना होगा If this is not ANTI NATIONAL then what is?”
दोस्तों शाहीन बाग़ की असलियत देखें: १)असम को इंडिया से काट कर अलग करना हमारी ज़िम्मेदारी २)”Chicken Neck” मुसलमानो का है ३)इतना मवाद डालो पटरी पे की इंडिया की फ़ौज Assam जा ना सके ४)सारे ग़ैर मुसलमानो को मुसलमानों के शर्त पर ही आना होगा If this is not ANTI NATIONAL then what is? pic.twitter.com/kgxl3GLwx1
इस ट्वीट के बाद संबित पात्रा ने कॉन्फ्रेन्स कर शाहीन बाग में CAA के ख़िलाफ़ विरोध कर रहे प्रदर्शनकारियों को लेकर कई सवाल उठाए थे। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार की बातें शाहीन बाग में हो रही हैं वास्तव में उसे ‘दिशाहीन बाग’ या ‘तौहीन बाग’ कहना चाहिए।
दरअसल, भारत-विरोधी एक वीडियो सोशल मीडिया पर तेज़ी से वायरल हो रहा था। इसमें दिखाया गया कि JNUSU के पूर्व सदस्य और शाहीन बाग समन्वय समिति के प्रमुख शरजील इमाम ने उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ में समुदाय विशेष को निर्देश दिया कि वो रेलवे, सड़कों को अवरुद्ध करके असम से भारत को काट दे। शरजील ने एनआरसी से बहिष्कार के चलते राज्य के शिविरों में असम के मुस्लिमों को हिरासत में लेने का दावा करते हुए, मुस्लिमों को ‘अपने क्रोध का उपयोग करने के लिए’ उकसाया। इस वीडियो में उसे यह कहते पाया गया कि केंद्र को अपनी बात सुनाने का एकमात्र यही तरीका है। शरजील ने मुस्लिमों को चक्काजाम करने की भी सलाह दी।
वायरल हुए इस वीडियो में शरजील कहता है, “अगर हमारे पास 5 लाख संगठित लोग हैं तो हम नार्थ ईस्ट और हिंदुस्तान को परमानेंटली काट कर सकते हैं। परमानेंटली नहीं तो कम से कम एक-आध महीने के लिए असम को हिंदुस्तान से काट ही सकते हैं। मतलब इतना मवाद डालो पटरियों पर, रोड पर कि उनको हटाने में एक महीना लगे। जाना हो तो जाएँ एयरफोर्स से।”
इसके आगे इमाम ने कहा, “असम को काटना हमारी जिम्मेदारी है। असम और इंडिया कटकर अलग हो जाए, तभी ये हमारी बात सुनेंगे। असम में मुस्लिमों का क्या हाल है, आपको पता है क्या? CAA-NRC लागू हो चुका है वहाँ। डिटेंशन कैंप में लोग डाले जा रहे हैं और वहाँ तो खैर कत्लेआम चल रहा है। 6-8 महीनों में पता चलेगा कि सारे बंगालियों को मार दिया गया वहाँ, हिंदू हो या मुस्लिम। अगर हमें असम की मदद करनी है तो हमें असम का रास्ता बंद करना होगा फौज के लिए और जो भी जितना भी सप्लाई जा रहा है बंद करो उसे। बंद कर सकते हैं हम उसे, क्योंकि चिकन नेक जो इलाका है, वह मुस्लिम बहुल इलाका है।”
उत्तर प्रदेश के कैराना से सपा विधायक नाहिद हसन को 14 दिन जेल में गुजारने होंगे। फास्ट ट्रैक कोर्ट ने जमानत याचिका खारिज करते हुए उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया। धोखाधड़ी के एक मामले में हसन को शुक्रवार को गिरफ्तार किया गया था। जमीन धोखाधड़ी के इस मामले में हसन के अलावा आठ अन्य लोग भी आरोपित हैं।
जमानत याचिका खारिज होने के बाद कड़ी सुरक्षा में हसन को न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया। इससे पहले विधायक को 7 दिनों की अंतरिम जमानत मिली थी। कैराना के ही रहने वाले मोहम्मद अजीज ने जनवरी 2018 में नाहिद हसन और उनकी मॉं तबस्सुम बेग पर जमीन के बैनामे में तकरीबन 80 लाख रुपए की धोखाधड़ी का आरोप लगाते हुए शिकायत दर्ज कराई थी।
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अक्टूबर 2018 में हसन की गिरफ्तारी पर रोक और प्राथमिकी रद्द करने वाली याचिका खारिज कर दी थी। उन्हें निचली अदालत में हाजिर होने तक के लिए गिरफ्तारी से राहत दे दी थी। शुक्रवार को हसन फास्ट ट्रैक कोर्ट में अपनी जमानत कराने के लिए पहुॅंचे। कोर्ट ने उनकी अंतरिम जमानत को भी खारिज करते हुए जेल भेजने के आदेश दिए। कोर्ट के आदेश के बाद पहुॅंचे पुलिस के आला अधिकारियों ने उन्हें हिरासत में लिया और मुजफ्फरनगर की जेल भेज दिया।
सपा विधायक के कोर्ट में पेशी के दौरान सुरक्षा के कड़े इंतजाम थे। विधायक को जेल भेजने के बाद माहौल को देखते हुए जिला प्रशासन ने इलाके में पुलिस फोर्स की तैनाती कर दी। नाहिद हसन के वकील इंतजार अहमद ने बताया कि सपा विधायक के विरुद्ध फर्जी मुकदमा दर्ज कराया गया है। जमानत के लिए उच्च कोर्ट में अर्जी डालने की बात उन्होंने कही है।
शाहीन बाग़ के विरोध प्रदर्शन के बारे में अब तक आपको पता चल गया होगा कि किस तरह इस विरोध प्रदर्शन के कारण भारी ट्रैफिक जाम लग रहा है, दफ्तर आने-जाने वालों को परेशानी हो रही है और बच्चे स्कूल नहीं जा पा रहे हैं। इस पूरे आंदोलन के पीछे हाथ है जेएनयू के छात्र रहे शरजील इमाम का, जो इसे संगठित रूप से आयोजित कर रहा है। परदे के पीछे से वो पूरी साज़िश रच रहा है और कैमरे के सामने आकर वो भारत के टुकड़े करने की बातें कर रहा है। अँग्रेजों को अपना दोस्त बताने वाला शरजील भारतीय संविधान, न्यायपालिका और महात्मा गाँधी को समुदाय विशेष का दुश्मन बताता है। वामपंथियों और कॉन्ग्रेस से भी उसको दिक्कत है।
शरजील इमाम उस समय भी जेएनयू में मौजूद था, जब वहाँ वामपंथी गुंडों ने एबीवीपी के छात्रों को चुन-चुन कर मारा था। शरजील इमाम देश को तोड़ कर पूरे उत्तर-पूर्व को भारत से अलग करने की बातें करता है। विदेश में बैठे देश के दुश्मन भी यही सोच रखते हैं। शरजील इमाम जिस तरह से ज़हर उगलता है, उसकी एक बानगी देखते हैं। उसके ताज़ा ज़हरीले बयानों की चर्चा चारों तरफ है लेकिन ये जानने वाली बात है कि यह सब अचानक नहीं हुआ है। वो पहले से ही ऐसी ही सोच रखता है। इसमें आश्चर्य नहीं होना चाहिए अगर ऐसा व्यक्ति भ्रमित मुस्लिमों के किसी आंदोलन का ‘नायक’ बन कर उभर आया हो।
जेएनयू के छात्रों को सम्बोधित करते हुए शरजील इमाम ने कहा था, “मुस्लिमों को पूरी दिल्ली में चक्का-जाम करना चाहिए। देश के जिस भी शहर में मुस्लिम हैं, वहाँ चक्का-जाम किया जाना चाहिए। मुस्लिमों को देश के 500 शहरों में चक्का-जाम किया जाना चाहिए।” उसने मुस्लिमों को भड़काते हुए कहा था कि क्या मुस्लिमों की इतनी आबादी और हैसियत भी नहीं कि वो पूरे देश में चक्का-जाम कर सकें? हिंदुस्तान का अधिकतर मुस्लिम अपने शहर को बंद कर सकता है। उसने कुरान का हवाला देते हुए कहा कि जो तुम्हें अपने घर से निकाले, उसे अपने घर से निकाल दो।
शरजील इमाम जो द वायर में एक स्तंभकार भी है। जिस किसी ने भी जिन्ना के सन्दर्भ में प्रकाशित उसके लेख को पढ़ा होगा, तो उसे शरजील के बयानों पर कोई हैरानी नहीं होगी।
इससे पहले कि हम द वायर पर प्रकाशित उस लेख के बारे में बात करें, आइये पहले एक नज़र उसके फेसबुक पोस्ट पर डालते हैं, जिससे पाठकों को अंदाज़ा हो जाएगा कि वो हमेशा से भारत में ज़हर फैलाने की कोशिश करता रहा है। 2015 में, उसने याकूब मेमन और अफ़ज़ल गुरु जैसे आतंकियों की क्षमायाचना को लेकर पैरवी की थी। उसके अनुसार, भारत में इस दो खूंखार आतंकियों को फाँसी की सज़ा देने से मुस्लिम लोग देश के प्रति अपना विश्वास खो देंगे।
स्रोत: शारजील इमाम की फेसबुक प्रोफाइल
इसके अलावा, फरवरी 2019 में पुलवामा आतंकी हमले के दौरान भी शरजील की टिप्पणी हैरान कर देने वाली थी। अपनी फेसबुक पोस्ट में उसने लिखा कि हिन्दुस्तान भी मेरी है, और पाकिस्तान भी मेरा है, लेकिन इन दोनों मुल्क़ों में अमेरिका का डेरा है। इसके आगे उसने लिखा कि F-16, राफ़ेल आदि के तमाशे में अमेरिका और वेस्टर्न वर्ल्ड का कंट्रोल जगज़ाहिर है। मगर एक और चीज़ हमें अमेरिका ने सिखाई है कि मजहबी आदमी आसानी से आतंकवादी बन जाते हैं। वो इस बात को भी आसानी से प्रूफ भी कर देते हैं, इराक़ को बर्बाद किया और कहा कि देखो आतंकवादी बन गए सब।
स्रोत: शारजील इमाम की फेसबुक प्रोफाइल
शरजील किस कदर हिंदू घृणा में डूबा हुआ है, जरा देखिए, “हमें हिन्दुओं का साथ नहीं चाहिए, सिर्फ़ मुस्लिम बिना हिन्दुओं की अनुमति के सब कुछ कर सकते हैं। 70 साल का इतिहास याद करो, संविधान फासिस्ट है। बार-बार मुस्लिमों को फेल करने वाला संविधान कभी भी मुस्लिम की आख़िरी उम्मीद नहीं हो सकता।” शरजील इमाम मानता है कि दिल्ली राजधानी है, इसीलिए यहाँ अराजकता फैलाने से अंतरराष्ट्रीय ख़बर बनेगी। उसने मुस्लिमों को लाठी खाने की आदत विकसित करने की सलाह दी क्योंकि सरकार उन्हें पिटवाएगी। शरजील का पूरा जोर है कि सभी राजनीतिक दलों व संविधान को किनारे कर के मुस्लिम अपने हाथ में सब कुछ लें और संगठित रूप से काम करें।
देश की लोकतान्त्रिक प्रक्रिया में भरोसा नहीं करता है शरजील इमाम
शरजील इमाम की बातों को सुनें तो पता चलता है कि कॉन्ग्रेस, वामपंथ, भाजपा या केजरीवाल की पार्टी, उसे सभी राजनीतिक दलों से सिर्फ़ इसलिए दिक्कत है क्योंकि ये संविधान और लोकतंत्र के बने-बनाए ढर्रे पर चलते हैं। शरजील की सोच का पोस्टमॉर्टम करें तो पता चलता है कि उसे मुस्लिमों का किसी भी ऐसी लोकतान्त्रिक प्रक्रिया में हिस्सा लेने से आपत्ति है, जिसमें हिन्दुओं का नेतृत्व हो। वो सभी दलों को इसीलिए एक चश्मे से देखता है क्योंकि सब में बड़े पदों पर कोई हिन्दू काबिज है। वो संविधान, लोकतंत्र, न्यायपालिका और सरकार- इनमें से किसी पर भी भरोसा नहीं करता।
अब बात करते हैं जिन्ना वाले लेख के बारे में। शरलीन जिन्ना के बारे में कहता है, “मैं जितना अधिक जिन्ना पत्रों को पढ़ता हूँ, उतना ही मुझे इस बात का एहसास होता है कि जिन्ना ने अपना राजनीतिक करियर एक अल्पसंख्यक समुदाय के नेता के रूप में बिताया। उन्होंने अल्पसंख्यक समुदाय को विपरीत परिस्थितियों से लड़ने के लिए संगठित किया। इसके अलावा, शरजील ने हिन्दुओं को लेकर लिखा उनका उद्देश्य ब्रिटिश सत्ता छोड़ने के बाद सत्ता पर एकाधिकार करना था।
स्रोत: शारजील इमाम की फेसबुक प्रोफाइल
70 साल बाद, मुस्लिम और भारत के अन्य अल्पसंख्यकों को अच्छी तरह से पता है कि उनका क्या मतलब था। दूसरे शब्दों में, जिन्ना जो अपने जीवन के 72 वर्षों के पहले 71 वर्ष तक एक भारतीय मुस्लिम थे, पाकिस्तान के मुस्लिमों की तुलना में भारतीय मुस्लिम अल्पसंख्यक के लिए असीम रूप से अधिक प्रासंगिक हैं। शरजील ने जिन्नाह के बारे में बखान करते हुए लिखा कि बहुत विशिष्ट तरीकों से, एक भारतीय मुस्लिम राजनेता के रूप में उनके द्वारा अल्पसंख्यको के अधिकारों आदि के लिए लड़ना हमारे लिए सबक है हमें उनका अध्ययन करना चाहिए।
अपने एक अन्य फेसबुक पोस्ट में शरजील ने मूर्ति-पूजा को बदनाम किया। हिन्दू देवी-देवताओं के लिए अपमानजनक बातें लिखी और राष्ट्रवाद को वतन-परस्ती तक कहा।
स्रोत: शारजील इमाम की फेसबुक प्रोफाइल
नागरिकता संशोधन क़ानून के ख़िलाफ़ चल रहे विरोध के संबंध में, शरजील की बयानों को शेहला राशिद और अन्य लोगों ने पसंद किए और आगे बढ़ाया। 22 जनवरी को लिखे फेसबुक पोस्ट में उसने लिखा कि शाहीन बाग़ में 25 दिसंबर के पहले, जब अंतर्राष्ट्रीय या राष्ट्रीय मीडिया में ख़बर नहीं छपी थी, तब उस हाइवे को ब्लॉक करने वाली आवाम का हौसला बढ़ाने कौन-कौन आया था? अपनी पोस्ट में उसने लिखा कि ऐसा नहीं है कि लेफ्टिस्ट, लिबरल और बाक़ी सेकुलर को ख़बर नहीं थी, मगर मीडिया नहीं थी, तो ‘इस्लामिक’ मंच पे आना सेकुलरिज्म के उसूल के ख़िलाफ़ ठहरा। मगर कैमरा आने के बाद हर सियासी पार्टी और हर ‘क्रांतिकारी’ ग्रुप उसी इस्लामी मंच पे टूट पड़े, क्योंकि मीडिया में फुटेज खाना उनका उसूल है।
स्रोत: शारजील इमाम की फेसबुक प्रोफाइल
लेकिन, यही शरजील आम आदमी पार्टी के कट्टरपंथी इस्लामी नेता अमानतुल्लाह ख़ान के साथ मंच शेयर करता है। विरोध प्रदर्शन में उसे और अमानतुल्लाह को एक साथ देखा जा सकता है। इसका पूरा मतलब ये निकलता है कि ख़ुद को मुस्लिमों का रहनुमा बनाने के लिए पागल हो चुका शरजील अपनी रैलियों में तिरंगे झंडे का इस्तेमाल भी इसीलिए करता है, ताकि लोगों को बेवकूफ बना सके क्योंकि उसका असली उद्देश्य ये है कि वो इस देश को तोड़ सके।
So this Amanatullah Khan of AAP was with Sharjeel Imam from the very first day pic.twitter.com/qTQfzAxZEy
शरजील के इरादे ‘खलीफा राज’ से अलग नहीं है। वो ख़ुद कह चुका है कि केस लड़ते समय संविधान और न्यायपालिका का इस्तेमाल करें लेकिन उम्मीद न पालें। अर्थात, ऐसी स्थिति आने पर वो संविधान को धता बता देगा। उसी संविधान को, जिसका पाठ कर के शाहीन बाग़ में प्रदर्शन हो रहे हैं।
शरजील इमाम पाकिस्तान जाना चाहता है
पाकिस्तान को लेकर क्या सोचता है शरजील इमाम? शरजील इमाम मुस्लिमों के भारत में रहने को मज़बूरी बताता है। क्यों? क्योंकि यहाँ मुस्लिमों का पूर्ण प्रभुत्व नहीं है, ऐसा उसे लगता है। तभी तो वो फेसबुक पर लिखता है कि मुस्लमान इस मज़बूरी में भारत में रह गया क्योंकि जामा मस्जिद और अजमेर शरीफ को झोले में पैक कर के पाकिस्तान नहीं ले जा सका। वो मानता है कि मुस्लिमों ने भारत को नहीं चुना है क्योंकि उन्हें विकल्प ही नहीं दिए गए थे। बकौल शरजील, मुस्लिम अपनी ज़मीन-जायदाद के कारण पाकिस्तान नहीं गए वरना पूरे हैदराबाद को ले जाकर लाहौर के बगल में रख देते। उसका स्पष्ट मानना है कि मुस्लिम ‘देश से मोहब्बत’ के कारण भारत में नहीं रुके, वो दूसरे वजहों से रुके।
उपर्युक्त घटिया तर्कों से ये साबित होता है कि शरजील इमाम पूरे अखंड भारत को पाकिस्तान बना कर मुस्लिमों का राज़ चाहता है और हिन्दुओं को दोयम दर्जे का नागरिक बना कर रखना चाहता है। वो मानता है कि हैदराबाद, जामा मस्जिद, ताजमहल- ये सब मुस्लिमों का है और इन चीजों का भारत में होना उसे स्वीकार्य नहीं है। शरजील इमाम की पाकिस्तानपरस्ती का आलम ये है कि उसका बस चले तो पूरे भारत को उठा कर पाकिस्तान में डाल आए। ऐसे लोग यहाँ मुस्लिमों के रहनुमा बन कर घूम रहे हैं और आश्चर्य की बात ये कि उसके भड़काने पर अराजकता फैलाने वालों को मीडिया ‘आंदोलनकारी’ कह कर उनका महिमामंडन कर रहा है। देश तोड़ने वाला ‘आंदोलन’?
भारत के टुकड़े करने की बात कहने वाले शरजील इमाम ने 2017 में अपनी फेसबुक पोस्ट में पाकिस्तानी क्रिकेट टीम के प्रति अपना असीम प्रेम व्यक्त करते हुए लिखा था, “सोशल मीडिया पर हमारे कई जवान पाकिस्तान की क्रिकेट टीम में जीत की ख़ुशी मना रहे हैं। पहले सोशल मीडिया नहीं था तो घर पर, गलियों में मनाते थे। बचपन में कई बार मैं इनमें शरीक भी रहा हूँ। हालाँकि, 12 साल से मैंने न क्रिकेट देखा है, ला किसी की जीत पर ख़ुशी मनाई है। उसने भारतीय क्रिकेट टीम को लेकर लिखा था कि टीम इंडिया नहीं टीम बीसीसीआई (BCCI) है, एक प्राइवेट टीम जो कि बड़े कॉरपोरेट करप्शन का एक हथियार है।
स्रोत: शारजील इमाम की फेसबुक प्रोफाइल
सबसे ज्यादा गौर करने लायक बात है कि शरजील इमाम संविधान को नहीं मानता। उसने ‘टीआरटी वर्ल्ड’ पर फरवरी 2019 में लिखे एक लेख में दावा किया था कि भारत के संविधान के दोहरे रवैये के कारण देश पिछले 70 वर्षों से एक ‘हिन्दू गणतंत्र’ है। संविधान के प्रति उसकी घृणा का आलम ये है कि वो लिखता है कि संविधान मुस्लिमों के साथ पक्षपात करता है। बकौल शरजील, संविधान ने पिछले 70 वर्षों में मुस्लिमों और अल्पसंख्यकों की आबादी घटाने का काम किया है। उसे देश का नाम ‘भारत’ होने से तकलीफ है और वो लिखता है कि भारत नाम हिन्दू प्रभुत्व की निशानी है। उसका आरोप है कि मुस्लिमों को विधायिका और प्रशासन में उचित प्रतिनिधित्व नहीं मिला।
उसके एक वर्ष पूर्व के लेख में इतना सारा ज़हर था, जो संविधान के प्रति उसकी घृणा को रेखांकित करता है। वो ‘ला इलाहा इल्लल्लाह’ का बचाव करते हुए और कट्टर हो जाता है। वो कहता है कि ये नारा मुस्लिमों के साथ आने की पहली शर्त है और इससे कोई समझौता नहीं हो सकता। शरजील इमाम के दोहरे रवैये का एक नमूना देखिए कि वो यूँ तो कॉन्ग्रेस को गाली देता फिरता है और जब शशि थरूर जामिया आते हैं तो उनका खुल कर सिर्फ़ इसीलिए विरोध करता है क्योंकि वो ख़ुद को हिन्दू बताते हैं और हिन्दू रीति-रिवाजों के बारे में अपनी किताब में लिखते हैं।