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दिल्ली पुलिस ने जामिया हिंसा में शामिल 69 संदिग्धों की तस्वीरें जारी कर रखा इनाम

दिल्ली पुलिस ने 69 ऐसे लोगों की तस्वीरें जारी की हैं, जो गत दिसंबर राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के जामिया नगर में CAA-विरोध को लेकर हुई हिंसा में शामिल हो सकते हैं। पुलिस का कहना है कि यह तस्वीरें CCTV फुटेज और हिंसा के दौरान बनाए गए वीडियो से ली गई हैं, जिसमें ये लोग हिंसा करते दिखाई दे रहे थे।

रिपोर्ट्स के अनुसार, पुलिस का कहना है कि ये लोग हिंसा में प्रत्यक्ष रूप से शामिल थे और आम जनता से इनकी जानकारी साझा करने के लिए कहा है। पुलिस ने संभावित आरोपितों के बारे में किसी भी तरह की जानकारी के लिए इनाम भी रखा है।

ज्ञात हो कि गत दिसंबर 15, 2019 को जामिया नगर और नई फ्रेंड्स कॉलोनी में हुई हिंसा में कम से कम पाँच बसें और सौ से ज्यादा निजी वाहनों को नुकसान पहुँचाया गया था। जामिया मिलिया विश्वविद्यालय समेत सौ से ज्यादा लोग इस हिंसा और विरोध प्रदर्शन में शामिल बताए जा रहे हैं।

SIT द्वारा करीब सौ लोगों को अब तक इस सम्बन्ध में पकड़ा जा चुका है। जिनमें से कुछ पर तोड़फोड़ को लेकर केस भी दायर किए गए हैं। पूर्व कॉन्ग्रेस नेता आसिफ मुहम्मद, जामिया मिलिया यूनिवर्सिटी के छात्र चंदन कुमार और स्थानीय नेता आशु खान से इस हिंसा के बारे में गत शुक्रवार को सात घंटों तक पूछताछ की गई थी।

प्रदर्शनकारियों द्वारा फेंके गए पत्थरों, काँच की बोतल और ट्यूबलाइट फेंकने के चलते छात्रों व पुलिस समेत 30 लोग घायल हुए थे। अधिकारियों ने इनके मोबाइल फोन, से डाटा जो कि अब डिलीट कर दी गई जानकारी तलाशने के लिए फोरेंसिक विभाग को भेजे जा रहे हैं, कॉल रिकॉर्ड्स और अन्य जानकारियाँ, जो कि जाँच के लिए जरुरी हैं आदि सीज कर लिए हैं।

शिक्षा पर योगी सरकार के ठोस कदम बनाम केजरीवाल के खोखले दावे

चुनाव दिल्ली में है, लेकिन चर्चा यूपी के स्कूलों की हो रही है। दिल्ली के गिने-चुने स्कूलों की तस्वीर दिखाते हुए उसकी तुलना यूपी से करते AAP नेता आजकल खूब दिखाई देते है। यूपी एक बड़ा राज्य है। इसकी तुलना दिल्ली जैसे छोटे से केन्द्रशासित प्रदेश से करना तर्कसंगत नहीं है।

फिर भी कुछ तथ्य जाने

  1. आर्थिक स्थिति के हिसाब से भी देखें तो दिल्ली में औसतन जितनी बड़ी आबादी व्यापार, नौकरी करता है, टैक्सपेयर की सूची में है, उतना यूपी में नहीं है।
  2. अगर प्रति व्यक्ति आय की बात करें तो जहाँ यूपी में वर्ष 2018-19 में राष्ट्रीय औसत सवा लाख से 49.1% कम थी, वहीं दिल्ली में प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय औसत से 3 गुनी अधिक थी।

शिक्षा के मसले पर भी दिल्ली और यूपी की तुलना नही हो सकती लेकिन अगर आँकड़ों के आधार पर तुलना करें तो कुछ रोचक तथ्य सामने आते है:

  1. आज दिल्ली सरकार के पास केवल 1030 स्कूल हैं। इन स्कूलों में प्राइमरी और सेकेंडरी दोनों कक्षाएँ लगती है। वहीं यूपी के स्कूलों की बात करें तो राज्य के 75 जिलों में से 70 जिलों में दिल्ली से अधिक संख्या में स्कूल चलते है। कुल स्कूलों की संख्या बात करें तो यूपी में 1 लाख 60 हजार से भी अधिक स्कूल चलते हैं।
  2. दिल्ली की अनुमानित आबादी 2 करोड़ है। लगभग 14 लाख बच्चें ही दिल्ली के सरकारी स्कूलों में पढ़ते है। वहीं यूपी के सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों की संख्या डेढ़ करोड़ से अधिक है।
  3. सरकारी स्कूलों मे पढ़ने वाले बच्चों का औसत दिल्ली की बजाय यूपी में अधिक है।
  4. दिल्ली का पूरा बजट यूपी में केवल शिक्षा के लिए आवंटित होने वाले बजट की राशि से भी कम है। वर्ष 2019-20 में दिल्ली का जहाँ कुल बजट 60 हजार करोड़ रुपए का था, वहीं यूपी में केवल शिक्षा के लिए आवंटित बजट की राशि 62,938 करोड़ थी दिल्ली के शिक्षा मंत्री इस तथ्य पर ही बहस के लपेटे में आ सकते हैं।

बात अगर शिक्षा में हुए बीतें 5 वर्षों के काम की करें तो बात शिक्षा विभाग में नई नौकरी की सबसे पहले आती है:

  1. दिल्ली सरकार के आँकड़ों की मानें तो शिक्षा विभाग के 77305 पदों में से 34970 यानी 45 फीसदी पद खाली है। यूपी में इतने पद खाली नहीं हैं।
  2. दिल्ली में जितने शिक्षक के कुल पद (लगभग 65000) है, उससे अधिक शिक्षकों की बहाली की प्रक्रिया योगी आदित्यनाथ सरकार ने सरकार बनाते ही शुरु कर दी। यूपी में बीते 3 वर्षों में 68000 से अधिक शिक्षकों की नियुक्ति की प्रक्रिया शुरु हुई है। न्यायिक प्रक्रिया पूरी होते ही ये शिक्षक स्कूलों में पढ़ाने लगेंगे। यही नहीं, यूपी ने लाखों अतिथि शिक्षकों के मसले सुलझाए हैं, जो राजनीतिक और शैक्षिक रूप से बेहद संवेदनशील थे।
  3. दिल्ली में भारी बजट होने और बड़ी संख्या में शिक्षकों के पद खाली होने के बावजूद स्थाई शिक्षकों के 5% खाली पद भी नही भरे जा सकें है, वही गेस्ट टीचर बहाल कर सकने की शक्ति होने के बावजूद लगभग 15% शिक्षकों के पद खाली है।

बात केवल स्कूली शिक्षा को बेहतर बनाने के लिए हुए प्रयासों की ही करे तो:

  1. जब यूपी में नई सरकार 2017 में बनी तो उसने प्रदेश के लगभग दो तिहाई से अधिक यानी 1 लाख 2 हजार स्कूलों के कायाकल्प का बीड़ा उठाया और बीते ढाई सालों में ही 54000 से अधिक स्कूलों के रिनोवेशन अर्थात सजा-सँवार कर बेहतर बना दिया है। एक लाख का लक्ष्य अगले वर्ष तक पूरा हो जाएगा।
  2. दिल्ली में जब सरकार बनी तो केवल 5% अच्छें स्कूलों को छाँटा गया, उन्हीं पर ध्यान दिया गया। एक हजार में से केवल 54 स्कूल चुने गए, उन्हें मॉडल स्कूल का नाम दिया। उपलब्ध आँकड़े बताते है कि 4 वर्ष बाद भी आधे स्कूलों में ही काम पूरा हो सका। इन्हीं में से 2 में स्विमिंग पूल, एक में जिम बनाए गए और बातें ऐसे बनाई गई मानों सभी स्कूलों में क्रांति आ गई हो।

इसके अतिरिक्त अगर कुछ अन्य प्रयासों की बात करें तो:

  1. आर्थिक रूप से गरीब होने के बावजूद यूपी के सभी स्कूलों में न्यूनतम 12500 और अधिकतम डेढ़ लाख तक की राशि दी गई ताकि वे अपने जरूरतों को पूरा कर सकें।
  2. यूपी के 5,000 प्राइमरी और एक हजार अपर प्राइमरी स्कूलों को English Medium Schools के रूप में Convert किया गया है।
  3. शिक्षकों और बच्चो की बेहतरी के लिए DIET के खाली पदों को भरा गया है।
  4. प्रशासनिक व्यवस्था दुरुस्त करने के लिए 2009 बैच के IAS अधिकारी विजय किरण आनंद जी को पहला Director-general of school education (DGSE) बनाया गया। कड़क ऑफिसर माने जाने वाले विजय जी की कुंभ के सफ़ल आयोजन में बड़ी भूमिका थी।

यूपी बस विज्ञापनों पर ध्यान दे दे तो अच्छे सरकारी स्कूलों की फोटों की बाढ़ आ जाएगी।

भावी बजट रचेगा इतिहास: 8%+ विकास दर की रखेगा नींव, कुछ बड़े सुधारों की पहल

सोमवार (जनवरी 20, 2020) को वित्त मंत्रालय में पारम्परिक ‘हलवा रस्म’ के साथ ही बजट की अंतिम तैयारियाँ शुरू हो गई। वर्षों से इसी रस्म के बाद बजट की छपाई का काम प्रारम्भ होता है। हमारी संस्कृति है कि कोई भी बड़ा या पवित्र कार्य शुरू करने से पहले कुछ मीठा खाया जाता है। ‘हलवा रस्म’ भी कुछ इसी तरह का है। हालाँकि, इसका कोई पुष्ट विवरण उपलब्ध नहीं है कि इस रस्म की शुरुआत कब से हुई, लेकिन इतना ज़रूर है कि ये लम्बे समय से चला आ रहा है। अब प्रश्न तो यही है कि भावी बजट कैसा होगा और ये हमारी उम्मीदों पर कितना खरा उतरेगा?

यहाँ एक बात गौर करने लायक है कि पहले बजट आने से पहले ही इस बात की सुगबुगाहट शुरू हो जाती थी कि कौन सी चीजें सस्ती हो जाएँगी और कौन सी चीजें महँगी। ऐसा जीएसटी के लागू होने से पहले हुआ करता था। जीएसटी के आने के बाद अब बजट का हमारे जीवन पर, हमारी ख़रीददारियों पर उतना असर नहीं पड़ता, जितना पहले हुआ करता था। यही कारण है कि अब बजट को लेकर आपको रोज बड़े-बड़े आर्टिकल्स पढ़ने को नहीं मिलते, जिनमें ताज़ा वित्तीय वर्ष में चीजों के सस्ते या महँगे होने की बातें होती है।

तो फिर हमारे जीवन पर बजट का क्या असर पड़ेगा? व्यक्तिगत इनकम टैक्स रेट्स और कस्टम ड्यूटीज- इन दो चीजों का एक उपभोक्ता पर सीधा प्रभाव पड़ता है। हालाँकि, बड़े स्तर पर देखें तो अर्थव्यवस्था के लिए बजट एक पॉलिसी दस्तावेज है, जिसका प्रभाव हम सब पर पड़ना लाजिमी है। वर्तमान वित्तीय वर्ष की दूसरी चौमाही में विकास दर 8% से घट कर 4.5% पर आ गया है, जो चिंता की बात है। इसमें कोई शक नहीं है कि गड़बड़ियाँ हुई हैं और इस पर लगातार चर्चा हो रही है कि क्या ग़लत हो गया? लेकिन, एक बात स्पष्ट है कि भावी बजट सारी समस्याओं के समाधान की दिशा में अहम साबित हो सकता है। ये एक मौक़ा है, एक बड़ा मौका- चीजों को ठीक करने का।

ऐसा नहीं है कि सरकार कुछ नहीं कर रही। केंद्र सरकार ने अगस्त 2019 से ही कई ऐसे क़दम उठाए हैं, जिनसे बाजार में सकारात्मकता आई है और उम्मीद बंधी है कि सत्ता अर्थव्यवस्था को ठीक करने की दिशा में पहल कर रही है। साफ़ है कि बजट इस क्रम में इन प्रयासों की अगली कड़ी होगा। ये सरकार की उन नीतियों को आगे लेकर जाएगा, जिन्हें सरकार ने गिरती आर्थिक विकास दर को संभालने के लिए आजमाया है।

प्रत्येक अर्थशास्त्री, नीति विशेषज्ञ और पब्लिक पॉलिसी पर नज़र रखने वाले लोगों ने बजट को लेकर अपनी-अपनी उम्मीदों की पोटली तैयार की है। चूँकि ये बजट गिरती आर्थिक विकास दर और डगमगाती अर्थव्यवस्था के बीच आ रहा है, कड़े निर्णय लेने का ये सबसे सही समय है क्योंकि सामान्य समय में ऐसे फ़ैसले लेना मुश्किल हो जाता है। पहला क़दम ये होना चाहिए कि ड्यूटीज को न बढ़ाया जाए ताकि घरेलू उद्योगों को आगे बढ़ने का मौक़ा मिले। 1991 से पहले इसे आजमाया गया था और देश ने देखा था कि कैसे ‘नेहरुवियन इम्पोर्ट सब्स्टीट्यूट पॉलिसी’ धड़ाम से गिरी थी।

1991 के बाद जिस तरह से भारत का आर्थिक विकास दर तेज़ी से बढ़ा, उसी रफ़्तार से ग़रीबी भी कम होती गई। हालाँकि, इम्पोर्ट को लेकर एक बात समझने की ज़रूरत है। भारत इम्पोर्ट इसीलिए करता है ताकि खपत हो। इम्पोर्ट्स बढ़ा देने का अर्थ ये नहीं हो जाता कि भारतीय प्रोडक्ट्स के दाम घट जाएँगे। उदाहरण के तौर पर कार इंडस्ट्री को लीजिए। अंतरराष्ट्रीय बाजार में ये एक प्रतिस्पर्धी इंडस्ट्री है। मान लीजिए, अगर स्टील और रबर पर टैरिफ को बढ़ा दिया जाता है तो क्या इससे ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री में कम्पटीशन कम नहीं हो जाएगा? ऐसा नहीं किया जाना चाहिए।

सरकार को ट्रेड पॉलिसी को ठीक से देखना पड़ेगा और इनवर्टेड ड्यूटी स्ट्रक्चर को ठीक करना पड़ेगा। हमें ज़रूरत है विदेशी निवेशकों को ये समझाने की कि हम ग्लोबल सप्लाई चैन का सम्मान करते हुए वैल्यू चैन को आकर्षित करने में सक्षम हैं। कृषि क्षेत्र में सरप्लस लेबर है और हमें एक ऐसा क्षेत्र चाहिए, जहाँ उनका उपयोग किया जा सके।

कर सुधार और डायरेक्ट टैक्स कोड की दिशा में एक और अहम क़दम ये है कि ‘Tax Regime’ को सिम्प्लीफाई किया जा सके। इसके लिए ‘लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन टैक्स (LTCGT)’ को हटाना पड़ेगा। टैक्स रेट्स और टैक्स स्लैब्स का रेशनलाइजेशन करना होगा। काफ़ी लोग ये कहते हैं कि टैक्स दरों में कटौती से बेहतर है कि मनरेगा जैसी योजनाओं व इंफ्रास्ट्रक्चर कार्यक्रमों को बढ़ाया जाए। जहाँ एक तरफ टैक्स रेट्स में कटौती का भारत की जनसंख्या के एक छोटे हिस्से पर असर पड़ेगा, वहीं दूसरी तरफ़ ये भी ध्यान रखना होगा कि इस जनसंख्या की खपत का अनुपात बेमेल है।

अब बात उठती है राजस्व टारगेट की। क्या वो इस वित्त वर्ष में पूरा हो पाएगा, अगर हम उपर्युक्त सुधार करते हैं तो? देखा जाए तो वैसे भी किसी को उम्मीद नहीं है कि हम इस वित्तीय वर्ष अपने राजस्व लक्ष्य को प्राप्त करेंगे। कई विशेषज्ञों का जोर है कि अगले कुछ वर्षों में राजस्व लक्ष्य को उतनी महत्ता न देकर आर्थिक सुधारों पर जोर दिया जाए।

ये इस दशक का पहला बजट होगा और इस दशक में हमारा देश 8% की आर्थिक विकास दर को पार कर जाएगा, ये तय है। और हाँ, इसकी नींव आगामी बजट ही रखेगा- बजट 2020-21, जो आने ही वाला है। कुछ ही महीनों पहले सितम्बर 20, 2019 को वित्त मंत्री ने 21वीं सदी के सबसे बड़े कॉर्पोरेट टैक्स कट्स की ऐतिहासिक घोषणा कर के आर्थिक सुधारों की दिशा में बड़ा क़दम उठाया था।

गणतंत्र दिवस पर रोड़ जाम करने वाले 600 AMU छात्रों के ख़िलाफ अलीगढ़ पुलिस ने दर्ज किया मुकदमा

सीएए के खिलाफ AMU में चल रहे विरोध प्रदर्शन के बीच यूपी पुलिस ने भी उपद्रवी छात्रों के खिलाफ कार्रवाई तेज कर दी है। 26 जनवरी को अपनी माँगों को लेकर आंदोलनकारी छात्रों द्वारा रोड को जाम करने वाले 600 छात्रों के खिलाफ यूपी पुलिस ने मुकदमा दर्ज किया है, जिसके बाद से पुलिस सीसीटीवी कैमरों की मदद से छात्रों की पहचान करने में जुट गई है।

गणतंत्र दिवस के दिन आयोजित कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में पहुँचे विश्वविद्यालय के वीसी तारिक मंसूर के खिलाफ सीएए के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे आंदोलनकारी छात्रों ने ‘गो बेक गो’ के नारे लगाते हुए उन्हें काले झंडे दिखाए थे। इस दौरान प्रॉक्टर टीम ने कार्रवाई करते हुए चार छात्रों को हिरासत में ले लिया। इसके बाद गुस्साए छात्रों ने चारों छात्रों को छोड़ने की माँग करते हुए मुरादाबाद रोड के एटा चुंगी रोड को जाम कर दिया था। वहीं छात्रों द्वारा किए जा रहे हंगामे को देखते हुए एएमयू प्रशासन ने तीन छात्रों को छोड़ दिया, लेकिन एक छात्र के खिलाफ कार्रवाई करते हुए उसे जेल भेज दिया था।

अब रोड जाम करने की घटना को गंभीरता से लेते हुए यूपी पुलिस ने 600 एएमयू छात्रों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया है। वहीं अलीगढ़ पुलिस ने आगे की कार्रवाई करते हुए घटनास्थल के आस-पास के सभी सीसीटीवी कैमरों को खंगालना शुरू कर दिया है। सीओ सिविल लाईन अनिल समानियां के मुताबिक जाँच के आधार पर जो भी नाम सामने आएँगे उनके खिलाफ आगे की कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने बताया कि जिस एक छात्र को जेल भेजा गया था, उसे कोर्ट से जमानत मिल गई है, जिसे जेल से रिहा कर दिया गया है।

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में गणतंत्र दिवस का कार्यक्रम CAA-विरोधी छात्रों के हंगामे की भेंट चढ़ गया था। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (AMU) में 71वें गणतंत्र दिवस समारोह के दौरान कुछ छात्रों ने परिसर में हंगामा कर व्यवस्था बिगाड़ने की कोशिश की थी। इस दौरान हंगामा कर रहे छात्रों ने कुलपति वापस जाओ (VC Go Back) के नारे लगाए और उन्हें अपना भाषण देने से रोका था। इसके बाद वहाँ मौजूद सुरक्षाकर्मियों ने उपद्रवी छात्रों को पकड़कर समारोह स्थल से बाहर कर दिया और कुछ को हिरासत में ले लिया था। जिसके बाद आंदोलनकारी छात्रों ने उग्र होकर हिरासत में लिए गए छात्रों की रिहाई की माँग करते हुए रोड को जाम कर दिया था।


मैनफोर्स कंडोम ने बताया ‘कमरा’ और ‘कामरा’ के लिए कौन से ‘प्रिवेंशन’ अपनाएँ

सोशल मीडिया पर हर घटना के लिए क्रिएटिविटी के अलग तरीके देखने को मिलते हैं। एक ओर जहाँ आम आदमी घटना का लुत्फ़ लेते हैं वहीं, ब्रांड्स इन मुद्दों को अपने प्रोमोशन के लिए भुनाना नहीं भूलते।

कल ही कथित कॉमेडियन कुणाल कामरा द्वारा जर्नलिस्ट अर्णब गोस्वामी के साथ इंडिगो फ्लाइट में बदतमीजी करने की घटना के बाद सोशल मीडिया पर अनेक प्रतिक्रियाएँ देखने को मिली हैं। इन्हीं में से एक है गर्भनिरोधक कंडोम निर्माता कम्पनी मैनफोर्स। मैनफोर्स ने ट्विटर पर एक पोस्टर शेयर करते हुए दिखाया है कि ‘कमरा’ और ‘कामरा’ के लिए किस तरह से सुरक्षा अपनाई जानी चाहिए। ज्ञात हो कि कंडोम का प्रयोग यौन रोगों से बचाव के लिए भी आवश्यक होता है।

दरअसल, फ्लाइट के दौरान जब कुणाल कामरा अर्णब गोस्वामी को परेशान कर रहे थे, तो बदले में अर्नब गोस्वामी ने कुछ ना कहते हुए अपने सन ग्लासेज़ और कानों में एयरफ़ोन लगाकर रखे और कुणाल कामरा को मुँह नहीं लगाया। मैनफोर्स ने इसी घटना को भुनाते हुए अपने प्रमोशनल पोस्टर बनाते हुए लिखा है कि कमरे में सुरक्षा के लिए ‘मैनफोर्स’ अपनाएँ और ‘कामरा’ से सुरक्षा के लिए अर्णब वाला तरीका यानी, कानों में एयरफ़ोन और आँखों में सन ग्लासेज़ लगाकर रखें।

सोशल मीडिया पर कुणाल कामरा द्वारा की गई हरकत का खूब मजाक बन रहा है –

इसी विषय पर ऑपइंडिया पर पढ़िए तीखी मिर्ची –

कामरा शुरू करेगा निजी विमान सेवा अर्णब-Go, सस्ते चुटकुलों पर हँसने वालों के लिए टिकट मुफ्त

ममता के बंगाल में मेरी किसी भी दिन की जा सकती है हत्या: पद्म पुरस्कार विजेता काजी मासूम अख्तर

हाल ही में बंगाल के पाँच पद्म पुरस्कार विजेताओं में से एक मुस्लिम शिक्षक ने अपने जीवन को लेकर डर ज़ाहिर किया है। उन्होंने कहा कि बंगाल में मेरी किसी भी समय हत्या की जा सकती है, क्योंकि राजनीतिक तुष्टीकरण की नीति के कारण आरोपित खुले आम घूम रहे हैं।

हाल ही में मोदी सरकार ने बंगाल के पाँच लोगों को पद्म पुरस्कार से सम्मानित किया है, जिसमें से बंगाल के काजी मासूम अख्तर को साहित्य व शिक्षा के लिए भारत के चौथे बड़े पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। अख्तर ने कहा कि पद्म श्री मिलना एक नैतिक जीत है, लेकिन मैं आज भी अदालत में हमले का मुकदमा लड़ रहा हूँ और ममता बनर्जी की तृणमूल कॉन्ग्रेस सरकार की तुष्टिकरण की नीतियों के कारण मेरा उत्पीड़न करने वाले आरोपित स्वतंत्र रूप से घूम रहे हैं और यही कारण है कि मुझे न्याय नहीं मिल रहा है। इसीलिए मुझे अभी भी अपने जीवन को लेकर डर है और किसी भी दिन मेरी हत्या की जा सकती है, लेकिन मैं सच बोलना जारी रखूँगा।

अख्तर ने बंगाल और देश के कई हिस्सों में नागरिकता (संशोधन) अधिनियम के खिलाफ चल रहे विरोध प्रदर्शनों पर बोलते हुए कहा कि इसके बारे में भारतीय मुस्लिमों को चिंता करने की कोई जरूरत नहीं है, क्योंकि इस कानून को संसद के दोनों सदनों द्वारा पारित किया गया है। राज्यसभा में भाजपा के पास बहुमत नहीं था, तो गैर-भाजपा दलों ने उनका समर्थन किया, लेकिन वही पार्टियाँ अब अपने निहित राजनीतिक हितों के लिए सीएए के खिलाफ हो रहे विरोध को हवा दे रहे हैं।

उन्होंने यह भी कहा कि मुझे बहुत आश्चर्य होता है जब मैं उन्हीं लोगों को देखता हूँ, जिन्होंने मेरे छात्रों को राष्ट्रगान गाने के लिए कहने पर लाठी-डंडों से मारा, अब वही लोग राष्ट्रीय झंडे के साथ प्रदर्शन स्थलों पर बैठे हैं और वही राष्ट्रगान गा रहे हैं। यह एक मज़ाक है। अख्तर ने आरोप लगाते हुए कहा कि राजनीतिक दल मेरे समुदाय को पीछे धकेल रहे हैं और उनका उपयोग केवल राजनीतिक प्यादे के रूप में कर रहे हैं। उनका पूरी तरह से ब्रेनवॉश कर उन्हें सार्वजनिक संपत्ति को आग लगाने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है और फिर राष्ट्रगान गाने के लिए कहा जाता है।

द प्रिंट की खबर के मुताबिक 49 वर्षीय शिक्षक मासूम अख्तर द्वारा मदरसे के बच्चों को राष्ट्रगान गाने के लिए कहने को लेकर 26 मार्च 2015 को कुछ कट्टरपंथियों द्वारा लाठी और डंडों से हमला किया गया था, जिसके बाद उन्हें अस्पताल ले जाया गया, लेकिन अस्पताल में भी उनके साथ फिर से मारपीट की गई और गँभीर रूप से घायल कर दिया गया। अख्तर का कहना है कि उन्होंने घटना के तुरंत बाद 26 मार्च 2015 को राजाबगान पुलिस स्टेशन में एक प्राथमिकी दर्ज कराई थी, जिस पर पुलिस द्वारा आज तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई।

काजी मासूम अख्तर द्वारा थाने में कराई गई FIRकी कॉपी (साभार- द प्रिंट)

अख्तर ने बताया कि पिछले पाँच वर्षों में मैंने अलीपुर अदालत में तीन याचिकाएँ दायर की हैं। अदालत ने जाँच अधिकारियों से मेरे मामले में कार्रवाई करने के लिए भी कहा, लेकिन पुलिस ने एक रिपोर्ट दर्ज की और कहा कि आरोपित व्यक्ति फरार थे। हालाँकि 10 जनवरी को अदालत ने दोषियों के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी कर दिया था।

वैसे शिक्षक मासूम अख्तर कई बार कट्टरपंथियों के निशाने पर आए। 2018 में काजी मासूम अख्तर ने मुस्लिम महिलाओं के लिए ट्रिपल तलाक़ के खिलाफ एक लाख लोगों के हस्ताक्षर लेकर सुप्रीम कोर्ट और राष्ट्रपति को ज्ञापन सौंपा था, ताकि ट्रिपल तलाक़ कानून से हो रहे महिलाओं के ऊपर अत्याचार को रोका जाए, लेकिन दिल्ली से लौटने के बाद मुस्लिम कट्टरपँथी ने उनके और उनके पिता को यह कहते हुए जान से मारने की धमकी दे डाली कि आप शरिया के खिलाफ काम कर रहे हैं। इसके बाद आज तक मासूम अख्तर अपने घर नहीं जा सके।

इसके बाद अख्तर को मदरसे में प्रधानाध्यापक के पद से हाथ धोना पड़ा था। मुस्लिम मौलवियों के एक वर्ग ने उनके खिलाफ याचिका दायर की जिसमें कहा गया था कि वह छात्रों को गुमराह करने का प्रयास कर रहे थे और राष्ट्रगान गाकर और ‘इस्लाम विरोधी’ अखबार और किताबें, गीत लिखकर धर्म का अपमान कर रहे थे। आपको बता दें कि अपने समुदाय से बहिष्कृत अख्तर अभी जादवपुर में एक सरकारी स्कूल के हेडमास्टर हैं। विडम्बना यह है कि वही ममता बनर्जी सरकार जिस पर वो हमलावरों की रक्षा करने का आरोप लगाते हैं उसने ही उन्हें 2017 में ‘सर्वश्रेष्ठ शिक्षक’ का पुरस्कार दिया था।

काजी मासूम अख्तर को ‘सर्वश्रेष्ठ शिक्षक’ पुरस्कार से सम्मानित करतीं सीएम ममता बनर्जी


AAP नेता अमानतुल्लाह खान पर वक्फ बोर्ड की संपत्ति के दुरुपयोग और भर्तियों में अनियमितता के आरोप, FIR दर्ज

दिल्ली एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB) ने आम आदमी पार्टी विधायक अमानतुल्लाह खान के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप में FIR दर्ज की है। यहाँ FIR ‘प्रिवेंशन ऑफ करप्शन’ के तहत दर्ज की गई है। AAP विधायक अमानतुल्लाह खान के खिलाफ वक्फ बोर्ड की रिक्रूटमेंट प्रक्रिया में गड़बड़ी की शिकायत मिली थी। जाँच के बाद इस मामले में FIR दर्ज की गई।

दरअसल, अमानतुल्लाह पर दिल्ली वक्फ बोर्ड के फंड के दुरुपयोग करने और भर्तियों में अनियमितता के आरोप हैं। ज्ञात हो कि AAP विधायक अमानतुल्लाह दिल्ली वक्फ बोर्ड के चेयरमैन हैं और दिल्ली में होने वाले विधानसभा चुनाव में ओखला विधानसभा क्षेत्र से प्रत्‍याशी हैं। दिल्‍ली चुनाव के बीच में FIR दर्ज होने से आम आदमी पार्टी के प्रत्‍याशी को परेशानी हो सकती है।

रिपोर्ट्स के अनुसार, जुलाई 2019 में हाफिज इरशाद कुरैशी नाम के व्यक्ति ने दिल्ली एंटी करप्शन डिपार्टमेंट (ACB) में अमानतुल्लाह के खिलाफ 10 पन्नों की शिकायत दी थी। शिकायत में वक्फ बोर्ड में गलत तरीके से भर्ती करवाना और वक्फ बोर्ड के लिए मिलने वाले सरकारी फंड में हेर-फेर करने का आरोप लगाया गया था।

अमानतुल्लाह खान का विवादों से है पुराना रिश्ता

ओखला विधानसभा से आम आदमी पार्टी के विधायक अमानतुल्लाह को AAP ने इस बार फिर उम्मीदवार बनाया है। उनका विवादों से रिश्ता पुराना है। वर्ष 2016 में एक महिला को धमकी देने के आरोपों में उन्हें अरेस्ट किया गया था। हालाँकि, इस मामले में उन्हें बेल मिल गई थी। अमानतुल्ला पर एक महिला ने यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए थे। जिसके बाद उन्होंने पार्टी के सभी पदों से इस्तीफा दे दिया था, लेकिन आम आदमी पार्टी प्रमुख और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने इसे व्यक्तिगत मामला बताकर उनका इस्तीफा अस्वीकार कर दिया था।

शर्जील इमाम को हीरो बनाने के लिए ‘लिबरल गिरोह’ अब क्या-क्या करेगा कमाल, समझिए पूरी क्रोनोलॉजी

देश से असम को काटकर अलग कर देने की बात करने वाले शर्जील इमाम की गिरफ्तारी के साथ ही सोशल मीडिया पर #ISUPPORTSHARJEEL ट्रेंड कराने की कोशिश शुरू हो चुकी है। एक समुदाय विशेष के लोगों के साथ मीडिया गिरोह के कुछ पत्रकार भी बढ़-चढ़कर शर्जील का समर्थन कर रहे हैं। अपनी एकजुटता प्रदर्शित कर रहे हैं। तर्क-कुतर्क करके ये साबित किया जा रहा है कि शर्जील ने जो कहा वो सही है और मोदी सरकार व उनके समर्थक जानबूझकर उसे देशद्रोही बता रहे हैं।

यहाँ ध्यान देने वाली बात है कि ये सब पहली बार नहीं हो रहा। जिस तरह से देश के ख़िलाफ़ बयानबाजी करने वालों को अभिव्यक्ति की आजादी की आड़ में छिपाया जाता रहा है। उनके प्रति संवेदना दिखाई जाती रही है। एक तय क्रम के साथ उनके विवादों में आने के बाद उन्हें हीरो बनाने की कोशिश हुई। उससे पहले के घटनाक्रमों और इन गिरोहों के एजेंडे को देखते हुए ये स्पष्ट हो चुका है कि शर्जील इमाम के मामले में अब आगे क्या-क्या हो सकता है? पूरी तत्परता के साथ कार्य शुरू हो चुका है जिस पर आप सबकी नजर पड़ी होगी। अब जरा ध्यान से नीचे दी गई टाइमलाइन पर नजर डालिए।

क्या लगता है आपको कि याकूब मेमन, अफ़ज़ल गुरु और बुरहान वानी का समर्थन कर चुके लोग शरजील इमाम को उसके हाल पर छोड़ देंगे? नहीं ऐसा नहीं होगा तो क्या होने की संभावना है इसके लिए पूरी क्रोनोलॉजी समझिए।

  1. आज बड़ी चालाकी से उसे “जेएनयू का छात्र” लिखा जा रहा है, “द वायर का पत्रकार” नहीं।
  2. एक-दो दिन में उसके लिए सहानुभूति पैदा करने का काम शुरू होगा, जिसके लिए यही छात्र शब्द बुनियाद बनेगा।
  3. बताया जाएगा कि वो तो चिकेन नेक पर चक्का जाम की बात कर रहा था।
  4. सेक्युलर मीडिया उसके पक्ष में संपादकीय लिखेगा, संपादक ट्वीट करेंगे।
  5. बताया जाएगा कि जेएनयू के नकाबपोशों को तो पुलिस अब तक नहीं पकड़ पाई।
  6. मानो कैंपस में मारपीट करना और असम को देश से अलग करना एक जैसा अपराध है।
  7. धीरे-धीरे उसे ब्रांड बनाया जाएगा। यूएन का ह्यूमन राइट्स कमीशन उसकी गिरफ़्तारी पर चिंता जताएगा।
  8. प्रियंका वाड्रा शरजील इमाम की माँ से मिलने जाएगी। उनसे लिपटकर फ़ोटो खिचवाएँगी।
  9. दीपिका पादुकोण के बाद रघुराम राजन अब शर्जील का सपोर्ट करेंगे, ताकि पब्लिसिटी मिले।
  10. “विराट हिंदू” नाम के फ़ेसबुक अकाउंट से शरजील को ग़द्दार कहा जाएगा, जिसका स्क्रीनशॉट दिखाकर रवीश जी प्राइम टाइम करेंगे कि क्या भीड़ तय करेगी कि कौन ग़द्दार है।
  11. मेरठ में “हिंदू सेना” शरजील इमाम की गर्दन काटने पर 5 लाख रुपये इनाम घोषित करेगी। 3 दिन तक चैनलों पर ख़बर चलेगी।
  12. PFI कपिल सिब्बल के अकाउंट में 50-60 लाख रुपए भेजेगा, ताकि वो उसका मुकदमा लड़ें।
  13. मुक़दमा ट्रायल कोर्ट में नहीं, सीधे सुप्रीम कोर्ट में चलेगा।
  14. अदालत पर “जनभावनाओं” दबाव बनेगा और उसे ज़मानत पर रिहा कर दिया जाएगा।
  15. इसके बाद वो देशभर के चैनलों में नागरिक अधिकारों के प्रवक्ता के तौर पर बुलाया जाएगा।
  16. लिट्रेचर फ़ेस्टिवल में उसके सेशन में सबसे ज़्यादा भीड़ होगी। जहां बुर्के वालियां उसके साथ सेल्फ़ी खिचवाएँगी।
  17. धीरे-धीरे आम लोगों को भी को लगने लगेगा कि स्टूडेंट ही तो है। ग़लती हो गई। क्या फ़र्क़ पड़ता है?
  18. अगली बार कोई तमिलनाडु, केरल, बंगाल को देश से तोड़ने की बात करेगा। हम चुप रहेंगे छोड़ो जाने दो, हमको क्या फ़र्क़ पड़ता है।

इन सब बातों का अनुमान कर पहले से व्यक्त कर देना इतना भी मुश्किल नहीं है। क्योंकि लिबरल गिरोह कैसे संचालित होता रहा है, अब लोग उनके चालों और छल-कपट-धूर्तता से भली भाँति परिचित होने लगे हैं। हो सकता है कि पैटर्न में थोड़ा बदलाव भी नजर आए लेकिन मूल भावना शाहीन बाग़ के मास्टरमाइंड शरजील को पाक-साफ साबित कर एक नए युवा क्रन्तिकारी नेता के रूप में स्थापित करने की होगी। क्योंकि कन्हैया पर लगाया गया दाव वामपंथी गिरोह को फेल होता नज़र आ रहा है और उसकी मुस्लिम समुदाय में उतनी पैठ भी नहीं है।

नोट- यह क्रोनोलॉजी चंद्र प्रकाश जी के फेसबुक पोस्ट से ली गई है।

दिल्ली को दहलाना चाहता था जलीस अंसारी, 20 लोगों का तैयार किया था दस्ता: ATS के सामने खोले राज

50 से ज्यादा धमाकों में शामिल रहा आतंकी जलीस अंसारी मुंबई एटीएस की पूछताछ में नए-नए राज उगल रहा है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार देश की राजधानी दिल्ली भी उसके निशाने पर थी। कनाट प्लेस, करोलबाग सहित साउथ इलाकों के कुछ इलाकों की उसने रेकी भी कर रखी थी। ‘डॉ. बम’ के नाम से कुख्यात अंसारी को 17 जनवरी को यूपी के कानपुर से पकड़ा गया था। वह परोल पर अजमेर की जेल से निकला था। परोल खत्म होने से ठीक पहले वह मुंबई से फरार हो गया था।

मुंबई में सिलसिलेवार धमाकों के दोषी इस आतंकी को जब 19 जनवरी को एसटीएफ अधिकारी लखनऊ के अमौसी एयरपोर्ट से ले जा रहे थे तब उसने देश की कानून-व्यवस्था को कमजोर बताते हुए कहा था कि उसका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। उसने कहा था कि अब तक उसने 65 से ज्यादा धमाके किए, लेकिन पुलिस केवल 3 मामलों में उस पर आरोप सिद्ध कर पाई।

जलीस को 1995 में दिल्ली से ही पकड़ा गया था। हिन्दुस्तान की रिपोर्ट के अनुसार उसने अपने दम पर दिल्ली को दहलाने का प्लान बनाया था। लेकिन, उसके गुट के लोगों तक सीबीआई पहुॅंच गई और उसके मंसूबे विफल हो गए थे। गिरफ्तारी से बचने के लिए उसने पाकिस्तान, दुबई और नेपाल में अपने आकाओं से संपर्क भी किया था। मुंबई एटीएस को उसने बताया कि उसने कुछ युवाओं को बम बनाने की सामग्री और कुछ को उपकरण इकट्ठा करने का का काम दिया था। 20 लोगों को चिह्नित जगहों की रेकी सौंपी थी। लेकिन, इनमें से कुछ सीबीआई के हत्थे चढ़ गए और जलीस का भेद खुल गया।

एटीएस को जलीस ने बताया कि सूचना लीक करने वाले का पता लगाने की उसने बहुत कोशिश की। जेल से भी अपने कुछ लोगों को इस काम पर लगाया था। लेकिन, उसके बारे में वह अब तक कुछ जान नहीं पाया है।

कानपुर से गिरफ्तारी के बाद जलीस ने अधिकारियों से कहा था, “कोई भी बड़ा आतंकी मेरे बिना कुछ नहीं हैं। जेल में रहकर जो मैं कर सकता हूँ, वह कोई संगठन बाहर रहकर भी नहीं कर सकता।” उसने यह भी दावा किया था कि ‘डेंजरस माइंड’ नामक किताब उसके ऊपर ही है। अगर वे इसे पढ़ेंगे तो उन्हें कई तथ्यों के बारे में जानकारी मिल जाएगी। बता दें कि डेंजरस माइंड किताब को हुसैन जैदी ने लिखा है। हुसैन जैदी मुंबई के रहने वाले और लंबे समय तक उन्होंने अंडरवर्ल्ड समेत आतंकवाद पर बहुत काम किया है।

अंसारी ने बताया था कि मुंबई से भागकर कानपुर वह अपने दो दोस्तों से मिलने आया था। इनमें से एक का इंतकाल हो चुका था और दूसरा अब वहॉं नहीं रहता था। इसके बाद पुलिस को झॉंसा देने के लिए वह एक बच्चे को साथ लेकर मस्जिद से निकल रहा था जब उसे दबोच लिया गया।

मुंबई से नमाज पढ़ने निकला था ‘डॉ. बम’, कानपुर की मस्जिद से निकलते धराया
नमाज के लिए निकला ‘डॉ. बम’ लापता, परोल पर बाहर था मुंबई धमाकों का गुनहगार

कामरा शुरू करेगा निजी विमान सेवा अर्णब-Go, सस्ते चुटकुलों पर हँसने वालों के लिए टिकट मुफ्त

अर्णब गोस्वामी के साथ इंडिगो की फ्लाइट में बदसलूकी करने वाले कथित कॉमेडियन कुणाल कामरा लगभग सभी विमान सेवाओं द्वारा निष्कासित किए जाने के बाद अब अपनी व्यक्तिगत विमान सेवा शुरू करने जा रहे हैं। फॉल्ट न्यूज़ द्वारा सत्यापित सूत्रों का कहना है कि चूँकि कुणाल कमरा के निष्कासन की प्रक्रिया इंडिगो से शुरू हुई थी, इसलिए वो अब अपनी सेवा का नाम मोदी-Go या अर्नब-Go कर सकते हैं।

सूत्रों का कहना है कि कुणाल कामरा की इस निजी विमान सेवा में गिरती हुई अर्थव्यवस्था में रोजगार तलाश रहे ध्रुव राठी भी इन्वेस्ट करने पर विचार कर रहे हैं। कुणाल कामरा की इस निजी विमान सेवा में विशेष लाभ युवाओं के उस अल्पसंख्यक वर्ग के लिए रखे जाने की बात सामने आ रही हैं, जो कि कुणाल कामरा के चुटकुलों पर हँसने का जज्बा रखते हों।

टिकट बुकिंग के दौरान उपभोक्ता को कुणाल कमरा के दो सस्ते एवं निहायत ही घटिया (मतलब उनके वीडियो से कोई भी रैंडम) चुटकुले सुनाए जाएँगे, इसके बाद यदि उपभोक्ता टिकट खिड़की पर हँसते हुए पाया जाता है, तो उसके लिए कुणाल कमरा की इस विमान सेवा में 6 महीने की समयावधि के लिए मुफ्त सफर घोषित किया जाएगा। यह खबर सुनते ही ऑटो-रिक्शा से सफर कर के फेसबुक पर IGI एयरपोर्ट पर ‘चेक-इन’ करने वाले ‘HeArT हैकर’ रोनू ने भी कुणाल कमरा जैसे ही अन्य स्वघोषित कॉमेडियंस को पत्रकारों का पीछा करने के बदले स्वरोजगार मॉडल अपनाने की सलाह दी है।

कुणाल कामरा अपनी इस निजी विमान सेवा के लिए प्रधानमंत्री मुद्रा योजना (PMMY) द्वारा लोन लेंगे। उनका कहना है कि ट्विटर पर सस्ते चुटकुले बनाते हुए उन्हें कभी पता ही नहीं चल पाया कि मुद्रा योजना के फायदे स्वरोजगार के लिए भी उठाए जा सकते हैं।

वहीं, ‘व्यंग्य इंडिया कमिटी’ ने फैसला लिया है कि कुणाल कामरा के नाम के आगे कॉमेडियन लिखने वालों को भी आज के बाद से इंडिगो और अन्य राष्ट्रीय विमान सेवाओं से निष्काषित किया जा सकता है। कमेटी ने इस मामले में सख्त एहतियात बरतने के भी निर्देश दिए हैं। रिपोर्ट लिखे जाने तक यह रिपोर्ट पूरी लिखी जा चुकी थी।

दुनिया की लगभग प्रत्येक एसोसिएशन और एकता मंचों से निष्काषित कुणाल कामरा ने निजी विमान सेवा शुरू करने के अपने फैसले को ऐतिहासिक बताया है। कामरा ने कहा –
“गुलामी की जंजीरों से आज़ादी की शान अच्छी,
खान्ग्रेसी बिस्कुट से निजी विमान सेवा की दुकान अच्छी”

उन्हें साइकिल, रिक्शा, ठेला, कार, बस, रेलगाड़ी और हवाई जहाज के साथ-साथ इलोन मस्क के SpaceX तक से अनिश्चितकाल तक के लिए प्रतिबंधित कर दिया है। इसी बीच एक चौंकाने वाली खबर यह भी सामने आई है कि दुनिया की लगभग सभी सेवाओं से बहिष्कृत कुणाल कामरा रात के अँधेरे में, तैर कर गंदे नाले से कहीं आने-जाने का प्रयास कर सकते हैं। NASA द्वारा जारी, न्यूज़लौंडी द्वारा हमें भेजी गई, तस्वीर में यह पाया गया कि कामरा वाक़ई ऐसा कर रहे थे। इसका संज्ञान लेते हुए ‘राष्ट्रीय गंदी नाली यूनियन’ ने फ़ौरन यह चेतावनी जारी कर दी कि कुणाल कामरा को देश की किसी भी गन्दी नाली में पड़े रहने की इजाजत नहीं होगी।

दरअसल, कुणाल कामरा अपने मित्र मनुराग कश्यप के साथ फ्राइडे नाइट को जब सस्ता नशा कर के घर लौट रहे थे, उसी वक़्त कुणाल कामरा ने मनुराग कश्यप की किसी फिल्म में प्रयोग हुई एक गाली का प्रयोग मनुराग पर ही कर दिया। यह सुनते ही मनुराग कश्यप ने कुणाल कामरा को अपनी अभिव्यक्ति की आजादी का इस्तेमाल संभल कर करने की राय देते हुए उसकी जमकर फिटनेस बनाई और वहाँ दोनों के बीच जमकर लात-घूँसे चले। इसके बाद अगली सुबह कुछ स्थानीय लोगों को कुणाल कामरा गंदी नाली में पड़े हुए मिले।

इसके साथ ही सूत्रों ने बताया है कि ऑटो रिक्शा एसोसिएशन, अखिल भारतीय कचरा गाड़ी यूनियन और ऑल इंडिया सुलभ शौचालय यूनियन ने भी कुणाल कामरा को अब अपनी संस्थाओं के प्रयोग से बहिष्कृत कर दिया है। फिलहाल कामरा ने मानवाधिकार आयोग का दरवाजा खटखटाया है।

पृथ्वी पर मौजूद तमाम संस्थाओं द्वारा बहिष्कृत होने के बाद अब शायद अंतरिक्ष की किसी अज्ञात आकाशगंगा में ही कोई ऐसी संस्था होगी, जिसके इस्तेमाल से अभी तक कुणाल कामरा को प्रतिबंधित नहीं किया गया है। उस आकाशगंगा की तलाश के लिए मशहूर भौतिक विज्ञानी अल्बर्ट मनीष सिसोदिया की अध्यक्षता में एक सचल दस्ते का गठन किया गया है।

मशहूर भौतिक विज्ञानी अल्बर्ट मनीष सिसोदिया ने कहा है कि अभी वो मोटर के जरिए आकशगंगा से सम्पर्क साध रहे हैं और वापस किसी आवाज के आने तक उन्हें करीब आधा घंटा इन्तजार करना होगा। उन्होंने यह भी आशंका जताई है कि मोटर द्वारा गलत समय पर सम्पर्क स्थापित करने से आकाशगंगा से ‘नमस्कार, मैं अरविन्द केजरीवाल बोल रहा हूँ, फोन मत काटना’ की आवाज सुनाई देने का खतरा हो सकता है, इसलिए वो जोखिम उठाने के मूड में भी नहीं हैं।

एक नजर ऐसी तस्वीरों पर, जिनमें बढ़ती हुई असहिष्णुता का अनुमान लगाया जा सकता है –