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CAA के ख़िलाफ राजस्थान विधानसभा में प्रस्ताव पारित: केरल, पंजाब के बाद ऐसा करने वाला तीसरा राज्य

नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) के खिलाफ राजस्थान विधानसभा ने प्रस्ताव पारित किया है। ऐसा करने वाला वह तीसरा राज्य है। दो अन्य राज्य पंजाब और केरल हैं। पंजाब और राजस्थान में कॉन्ग्रेस की सरकार है, जबकि केरल में वामपंथी दल सत्ता में हैं।

शनिवार को राज्य विधानसभा में सीएए के खिलाफ पारित प्रस्ताव का जिक्र करते हुए राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने ट्वीट किया, “राज्य विधानसभा ने सीएए के खिलाफ संकल्प प्रस्ताव आज पारित किया। हम केंद्र सरकार से आग्रह करते हैं कि वह इस कानून को निरस्त करे, क्योंकि यह धार्मिक आधार पर लोगों से भेदभाव करता है जो हमारे संविधान के प्रावधानों का उल्लंघन है।”

उन्होंने कहा, “हमारा संविधान किसी भी प्रकार के भेदभाव पर रोक लगाता है। देश के इतिहास में पहली बार कोई ऐसा कानून बनाया गया है जो धार्मिक आधार पर लोगों के साथ भेदभाव करता है। यह हमारे संविधान के पंथनिरपेक्ष सिद्धांतों और हमारे संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन करता है।” गहलोत ने कहा कि संविधान की मूल भावना के खिलाफ होने के कारण देशभर में सीएए का विरोध हो रहा है। इसलिए इसे निरस्त किया जाना चाहिए।

हालॉंकि राज्य विधानसभाओं से सीएए के खिलाफ पारित प्रस्ताव मायने नहीं रखता। कॉन्ग्रेस नेता कपिल सिब्बल भी कह चुके हैं कि यदि सुप्रीम कोर्ट ने दखल नहीं दिया तो राज्य कानून लागू करने से इनकार नहीं कर सकते। ऐसा करना असंवैधानिक होगा।

गहलोत ने बताया कि प्रस्ताव ध्वनिमत से पारित किया गया। इस दौरान बीजेपी के नेताओं ने सदन के अंदर और फिर बाहर आकर प्रस्ताव पर सवाल खड़े किए। साथ ही सीएए लागू करो के नारे भी लगाए। नेता प्रतिपक्ष राजेंद्र राठौड़ ने कहा कि संसद के दोनों सदनों से पारित होने के बाद सीएए पहले ही कानून बन चुका है, ऐसे में इस तरह विधानसभा में संकल्प पत्र पेश करने का कोई औचित्य नहीं है।

गौरतलब है कि नागरिकता संशोधन बिल को पिछले महीने भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की अगुवाई वाली केंद्र सरकार ने 9 दिसंबर को लोकसभा से और 11 दिसंबर को राज्यसभा से पास कराया था। इसके तहत पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश से आए छह धर्मों के शरणार्थियों को नागरिकता देने का प्रावधान है। इसके तहत कहा गया कि नागरिकता केवल उन्हीं को दी जाएगी, जोकि धार्मिक प्रताड़ना के चलते भारत आए। साथ ही 31 दिसंबर, 2014 के पहले ही भारत आए लोगों को नागरिकता देने का नियम तय किया गया है।

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शाहीन बाग़ कोआर्डिनेशन कमिटी का चेयरमैन और इस पूरे विरोध प्रदर्शन का साज़िशकर्ता शरजील इमाम ने देश के ‘टुकड़े-टुकड़े’ करने की ओर इशारा तो किया ही, साथ ही उसने लोगों को भड़काने के लिए पूरा ज़ोर लगाया। इमाम ने शाहीन बाग़ में प्रदर्शनकारियों को सम्बोधित करते हुए स्वीकार किया कि जेएनयू में लेफ्ट वालों ने एबीवीपी के छात्रों की पिटाई की थी। साथ ही उसने बड़ा आरोप लगाया कि दिल्ली पुलिस ने गुंडों के साथ मिल कर वामपंथी छात्रों की पिटाई की। उसने आरोप लगाया कि कश्मीरी छात्रों और मुस्लिमों को खोज-खोज कर निशाना बनाया गया।

इमाम ने एबीवीपी और सीपीएम, दोनों को ही बराबर रूप से निशाने पर लिया। उसने कहा, “सीपीएम एक निहायती हिंसक पार्टी है और वो एबीवीपी से जरा भी अलग नहीं है। केरल और बंगाल का इतिहास को देखें तो सीपीएम के बारे में बहुत कुछ पता चलेगा। सीपीएम के कारण आम छात्रों की पिटाई हुई। सीपीएम मुस्लिम-विरोधी है। सीपीएम का इतिहास ही मुस्लिमों और आरक्षण के ख़िलाफ़ रहा है।”

इमाम ने याद दिलाया कि वामपंथी मंडल आयोग के ख़िलाफ़ थे, उन्होंने कभी मुस्लिमों व पिछड़ों का साथ नहीं दिया। उसने कहा कि कॉन्ग्रेस ने भी ऐसा ही किया है। इमाम लोगों को ये समझा रहा था कि मुस्लिमों का दोस्त कौन है और दुश्मन कौन है? उसने सलाह दी कि एक मुस्लिम एक हिन्दू को अपने साथ ला सकता है, इससे विरोध करने वालों को कम्युनल का टैग नहीं लगेगा। लेकिन इसके लिए उसने जो शर्त रखी वो अजीबोगरीब थी – “ग़ैर-मुस्लिम मुस्लिमों की शर्तों पर प्रदर्शनकारियों के साथ खड़े हों और नारा-ए-तक़बीर लगाएँ। अगर ग़ैर-मुस्लिम ऐसा नहीं करते हैं तो इसका अर्थ है कि वो मुस्लिमों के हमदर्द नहीं हैं, उनका इस्तेमाल कर रहे हैं।”

शरजील इमाम के ऐसा कहते ही वहाँ उपस्थित लोग नारा-ए-तक़बीर चीखने लगे। लोगों ने ‘अल्लाहु अकबर’ के नारे के साथ उसके इस बयान का स्वागत किया। उसने कन्हैया कुमार से आग्रह किया कि अगर 5 लाख लोग मुस्लिमों के साथ आ जाएँ तो पूरा नॉर्थ-ईस्ट कट कर अलग हो जाएगा। बकौल इमाम, “उत्तर-पूर्वी भारत और असम को देश से काट कर अलग करना मुस्लिमों की जिम्मेदारी है। कन्हैया कुमार सिर्फ ‘इंकलाब’ का नारा लगवा के वापस आ जाता है, जिससे कुछ भी फायदा नहीं होता।”

वामपंथियों को शरजील इमाम ने बताया हिंसक

उसने आरोप लगाया कि कॉन्ग्रेस और लेफ्ट वाले भारत की पूजा करते हैं। उसने स्पष्ट कहा कि वो लोग भारत की सरकार और संविधान से परेशान हैं और इसी स्पष्टता के साथ ही विरोध आगे बढ़ सकता है। मुस्लिमों को संगठित होने पर वह बोला, “मैं शाहीन बाग़ में कॉन्ग्रेस के ख़िलाफ़ रोज़ बोलता हूँ। एनआरसी और सीएए के बारे में बहुत लोगों को नहीं पता। अगर मुस्लिम ख़ुद को बचा पाए, तभी ये देश बच पाएगा। मुस्लिम संगठित हों।”

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दुष्कर्म पीड़ित साथी का साथ देने की सजा: चर्च अधिकारियों ने सिस्टर को भूखा रखा

सिस्टर लूसी कलपूरा ने चर्च के अधिकारियों पर भूखा रखने का आरोप लगाया है। वे उन पॉंच ननों में शामिल हैं जिन्होंने बिशप फ्रैंको मुलक्कल पर रेप का आरोप लगाने वाली नन का समर्थन किया था। शनिवार को उन्होंने बताया कॉन्वेट में अधिकारी उन्हें भूखा रखते थे। खाने के लिए बाहर नहीं जाने देते थे।

मीडिया रिपोर्टों में 52 वर्षीय नन के ह​वाले से कहा गया कि अधिकारियों द्वारा खाना नहीं दिए जाने के बावजूद वे अंतिम सॉंस तक फ्रांसिस्कन क्लेरिस्ट कॉन्ग्रेसेशन (FCC) में बनी रहेंगी। उन्होंने कहा, “कॉन्वेंट के अधिकारियों के खिलाफ मैंने तीन बार शिकायत की। लेकिन, पुलिस कोई कदम उठाने में नाकाम रही। इससे लगता है कि मुझे परेशान करने वाले लोगों के खिलाफ कार्रवाई को लेकर पुलिस भयभीत है।”

बता दें कि FCC ने सिस्टर लूसी कलपूरा को पिछले साल अगस्त में गंभीर अनुशासनहीनता का हवाला देते हुए निष्कासित कर दिया था। सिस्टर कलपूरा ने बताया कि बीते साल दिसंबर में उनकी आत्मकथा ​रिलीज हुई थी। इसके बाद से उन्हें प्रताड़ित करने का सिलसिला तेज हो गया है। उन्होंने बताया कि अपने निष्कासन के खिलाफ वेटिकन चर्च में उन्होंने एक और अपील दायर की है। उम्मीद है कि पोप फ्रांसिस उनके पक्ष में जवाब देंगे।

इस संबंध में जल्द ही अदालत का दरवाजा खटखटाने की बात भी उन्होंने कही है। बीते साल वायनाड की एक अदालत ने एफसीसी की कार्रवाई पर रोक लगा दी थी। इस मामले में एफसीसी के प्रवक्ता ने टिप्पणी से इनकार किया है। गौरतलब हो कि सिस्टर कलापुरा उन नों में शामिल थीं, जिन्होंने मुल्लकल को गिरफ्तार करने में नाकाम रही पुलिस के ख़िलाफ कोच्चि में प्रदर्शन किया था। सिस्टर की ही एक सहयोगी ने मुल्लकल पर बलात्कार का आरोप लगाया था।

जून 2018 में एक 43 वर्षीय नन ने एक पुलिस में शिकायत दर्ज कराते हुए मुल्लकल पर आरोप लगाया था कि, 2014 में एक जरूरी मुद्दे पर चर्चा करने के बहाने मुलक्कल ने उसे बुलाकर उसका यौन उत्पीड़न किया था। इसके बाद यह क्रम लगातार दो वर्ष तक जारी रहा। इसके बाद इस मामले की जाँच के लिए एक कमेटी का गठन किया गया था। जिसने पिछले वर्ष सितंबर में मुल्लकल को कई बार पूछताछ के लिए बुलाया। इसके बाद उसकी गिरफ्तारी हुई थी।

नन ने अपनी आत्मकथा में आरोप लगाया है कि यौन शोषण जैसी घटनाओं को आरोपितों द्वारा सेमिनारों में आसानी से अंजाम दिया जाता है। दूसरी ओर इन्हीं आयोजनों में सहज सुधारों का आह्वान किया जाता है। उसने किताब में यह भी आरोप लगाया है कि उसने अपने कॉन्वेंट जीवन के दौरान कम से कम चार बार यौन उत्पीड़न के प्रयासों का सामना किया और कई नन आसानी से इस तरह की धमकियों का शिकार भी हो जाती हैं।

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…और ऐसे ख़त्म हो गई ‘मसीहा पत्रकारों’ के गैंग की मौज: मशहूर न्यूज़ एंकर से समझिए पूरी क्रोनोलॉजी

क्रोनोलॉजी समझाने वालों की क्रोनोलॉजी मैं समझाता हूँ आपको। इनकी लाइफ मजे में चल रही थी। ‘खाओ और खाने दो’ के दिन थे। मसीहा पत्रकारों की मौज थी। मंत्रालय में घुसकर काम करा लेना, लाईजिनिंग, मंत्री बनवाने का काम, टिकट दिलवाने का काम सरपट दौड़ रहा था। प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के प्लेन में मुफ्त में रिपोर्टिंग के नाम पर घूम आने का मज़ा लूटा जा रहा था। विदेशी दौरों पर विदेश मंत्रालय के कर्मचारियों के लिए बस या वैन लगती थी, मसीहा पत्रकारों के लिए चमचमाती कारें आती थीं। प्राइवेट चैनल के कार्यक्रम के लिए राष्ट्रपति भवन वेन्यू बन जाता था।

फिर अचानक एक दिन एक ऐसा नेता जो लुटियन्स गैंग का नहीं था, वो पीएम की कुर्सी की तरफ बढ़ने लगा। इनको दिक्कत उस व्यक्ति के पार्टी से नहीं थी, क्योंकि उसमें भी कइयों के साथ शैम्पेन खोलने का सिलसिला चलता था पर ये व्यक्ति तो बिल्कुल बाहरी था, ‘गैंग’ का नहीं था। दिक्कत वहीं शुरू हुई। पहले पीएम की कुर्सी पर पहुँचने से रोकने की कोशिश हुई। वो फेल हो गई। फिर इनको लगा कि भाई भी सेट हो जाएगा। वो कोशिश फेल हो गई। अवार्ड्स जिनकी बपौती थी, वो अवॉर्ड मिलने बंद हो गए। विदेशी दौरों के लाले पड़ गए। विदेशी फंडिंग रुक गई। शेल कम्पनियों पर ताले लग गए। ‘भाई लोग’ तिलमिला गए।

फिर शुरू हुआ कभी अवॉर्ड वापसी, कभी EVM में झोल, कभी लिंचिंग तो कभी हिन्दू आतंकवाद को इस देश की नई तस्वीर बताने का सिलसिला चालू हो गया। फेक न्यूज़ फैलाने का प्रोपगेंडा चल पड़ा। पर उसमें दिक्कत थी मीडिया का एक तबका तार्किक सवाल पूछकर इन कोशिशों की हवा निकाल रहा था। फिर ईजाद किया गया ‘गोदी मीडिया’। आरिफ मुहम्मद खान साहब सही कहते हैं कि जब किसी को तर्क से नहीं हरा सको तो उसकी नीयत पर हमला कर दो। इस गैंग ने वही रास्ता चुना। लोगों के दिमाग में भरना शुरू किया कि ये सब मोदी से मिले हुए हैं। मोदी से खुद की नफरत औरों में वायरस की तरह फैलाने लगे।

इस काम में वक्त लगा लेकिन आज एक खास तबका जिसे मोदी अथवा भाजपा से हमेशा से नफरत थी, उसे इन लोगों ने आसानी से टारगेट कर लिया। हालात ये हो गए कि कोई इस रोबोटिक भीड़ से ये भी पूछ ले कि CAA के बारे में पता है या नहीं या NRC तो अभी आया नहीं, तो उसे भी गोदी मीडिया बताकर हमले होने लगे। भीड़ तो भीड़ है। उसको इनके गैंग के हर एक सदस्य का थोड़े ही पता है। एक आध इनके लोग भी धो डाले। इनकी आत्मा आहत हुई तो उनकी रिपोर्ट दिखा दी, बाकी जहाँ-जहाँ दूसरे पत्रकारों पर हमले हुए उसके मज़े लेते रहे। चुप्पी साध ली या इफ/बट के साथ निंदा कर दी खानापूर्ति के लिए।

लेकिन याद रखिए कि भीड़ बनाना आसान होता है, उसे नियत्रित और संयमित रखना मुश्किल। ये भीड़ वैसी ही है। अभी और हमले होंगे। पर इन्हें कोई फर्क नहीं पड़ेगा। ये ना आपके हैं, न किसी और के। ये कभी किसी को गोदी मीडिया बताकर तो कभी किसी के सवालों को उसकी कुंठा या नफरत बताकर बच निकलेंगे। लेकिन धीरे धीरे ही सही, पब्लिक सब देख रही है। इन्हें सिर्फ और सिर्फ अपने उन पुराने मालदार अच्छे दिनों का इंतज़ार है। बाहर से आया वो व्यक्ति पीएम की कुर्सी से हट जाएगा, इनकी दुकान चल पड़ेगी। आप इनका मोहरा हैं। बस मोहरा। जागिए और बचिए।

(ये लेख ‘इंडिया टीवी’ के न्यूज़ एंकर सुशांत सिन्हा के ट्विटर थ्रेड पर आधारित है और उनके विचार हैं।)

UP में ‘शाहीन बाग़’ बनाने की कोशिश नाकाम: 110 दंगाइयों पर FIR, हिरासत में 12 उपद्रवी

यूपी पुलिस ने लखनऊ के घंटाघर के पास विरोध-प्रदर्शन के नाम पर उपद्रव कर रहे लोगों को हिरासत में लेना शुरू कर दिया है। हुसैनाबाद में कई महिलाएँ विरोध-प्रदर्शन पर बैठी हैं और उनके कारण क्षेत्र में शांति-व्यवस्था भी ख़राब हो रही है। पुलिस की लगातार चेतावनी के बावजूद वो वहाँ से हटने को तैयार नहीं हैं। शनिवार को पुलिस ने इस मामले में पाँचवी एफआईआर दर्ज की। दरअसल, ये देश के हर शहर में एक शाहीन बाग़ बनाने की साज़िश का हिस्सा है। इनकी योजना है कि कहीं भी धरने पर बैठ कर स्थानीय लोगों को परेशान किया जाए और मीडिया में सुर्खियाँ बटोरी जाएँ।

लखनऊ पुलिस ने आज कुछ उपद्रवी महिलाओं को हिरासत में लिया है। नागरिकता संशोधन क़ानून के नाम पर उपद्रव कर रही 12 महिलाओं को पुलिस ने हिरासत में लिया। वहाँ समाजवादी पार्टी की भी कई महिला नेत्री विरोध-प्रदर्शन पर बैठ गई थीं, जिन्हें हटाने के लिए पुलिस को मशक्कत करनी पड़ी। बार-बार चेतावनी के बावजूद बात न मानने के कारण पुलिस ने उपद्रवी महिलाओं को हिरासत में लेने की कार्रवाई की। समाजवादी पार्टी की पूजा शुक्ला का नाम 3 एफआईआर में है, जो वहाँ लगातार उपद्रव कर रही हैं।

इस धरना प्रदर्शन में कई पुरुष भी शामिल थे, जो थोड़ी दूरी पर रह कर ये जताना चाहते थे कि ये सिर्फ़ महिलाओं का विरोध-प्रदर्शन है। वो पुरुष महिलाओं को लगातार उकसा रहे थे। पुलिस ने जब ये देखा तो उन पुरुषों को वहाँ से भगाया गया। पुलिस ने इस बात की सावधानी रखी है कि डर का माहौल न बने। इसलिए, पुलिस धरना स्थल पर सिर्फ़ डंडे लेकर पहुँची थी। उन महिलाओं की जिद है कि वो धरना स्थल पर गणतंत्र दिवस मनाएँगी और झंडा भी फहराएँगी।

ये महिलाएँ क़रीब एक सप्ताह से भी ज़्यादा से वहाँ डेरा जमाए हुए है, जिसके कारण क्षेत्र में लोगों को ख़ासी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। लखनऊ पुलिस ने 110 उपद्रवियों के ख़िलाफ़ एफआईआर दर्ज किया है। इससे पहले 4 एफआईआर ठाकुरगंज पुलिस थाने में दर्ज किए गए थे। इन उपद्रवियों पर दंगा करने, प्रशासन की अवज्ञा करने, अवैध रूप से जुटान करने, स्थानीय लोगों के कामकाज में व्यवधान पैदा करने और ऑन-ड्यूटी अधिकारियों के साथ दुर्व्यवहार करने का आरोप लगाया गया है।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पहले ही कह चुके हैं कि उत्तर प्रदेश में देशविरोधी गतिविधियों के लिए कोई जगह नहीं है। उन्होंने कहा था कि पुरुष घर में रहे रजाई ओढ़ कर सो रहे हैं और उन्होंने जानबूझ कर महिलाओं व बच्चों को सड़क पर बैठने के लिए छोड़ दिया है।

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‘अरेस्ट करने को पुलिस टीम भेज दी है’ – असम को भारत से काटने वाले ‘इमाम’ पर अलीगढ़ SSP का आदेश

शरजील इमाम द्वारा भारत को तोड़ने और असम को भारत से अलग कर देने की बात करने वाले शरजील इमाम के खिलाफ देशद्रोह का मुकदमा दर्ज किया गया है। CAA विरोध प्रदर्शन के दौरान भड़काऊ बयान देने के आरोप में शरजील इमाम के खिलाफ असम और उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ में FIR दर्ज की गई है।

अलीगढ़ के SSP आकाश कुल्हारी के अनुसार, शरजील के खिलाफ IPC की धारा 124ए, 153ए, 153बी और 505 (2) के अंतर्गत FIR दर्ज की जा चुकी है और उनकी टीम जल्द ही शरजील को गिरफ्तार करेगी।

अलीगढ़ एसएसपी ने कहा है कि शाहीन बाग़ में CAA विरोधी गतिविधियों के मास्टरमाइंड और JNU के छात्र शरजील इमाम ने 16 जनवरी, 2020 को अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (AMU) में देश विरोधी बयान दिए थे। एसएसपी ने बताया कि शरजील इमाम के खिलाफ वीडियो के आधार पर केस फ़ाइल किया गया है। और उसकी गिरफ्तारी के लिए पुलिस दल भेज दिया गया है। इस मामले में हिंदू संगठन ने मुकदमा दर्ज करने के लिए अलीगढ़ सिविल साइन थाने में शिकायत दी थी।

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जिसने दी असम को हिंदुस्तान से काटने की धमकी, उस ‘इमाम’ के खिलाफ दर्ज होगा देशद्रोह का मुकदमा

‘इन गद्दारों की बात सुन कैसे मान लूँ कि इनका खून यहाँ की मिट्टी में शामिल है’

नागरिकता संशोधन कानून (CAA) को लेकर देश भर में कई जगहों पर भड़काऊ नारेबाजी और हिंसक विरोध प्रदर्शन देखने को मिल रहे हैं। इसी बीच जेएनयू के पूर्व छात्र शरजील इमाम का आपत्तिजनक वीडियो सामने आया है। वीडियो में इस्तेमाल की गई भाषा हमारे संघीय ढाँचे पर प्रहार की तरह है। यह वीडियो अलगाववादी और देश को विभाजित करने के एजेंडे को दिखाती है। वीडियो में शरजील इमाम ने कहा है कि असम को भारत से अलग कर देना चाहिए। शरजील इमाम के इस भड़काऊ बयान पर राजनीति शुरू हो गई है। भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा के बाद अब केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने ट्वीट कर शरजील को गद्दार करार दिया है।

गिरिराज सिंह ने ट्वीट करते हुए लिखा है, “यह कहते हैं सभी का खून है शामिल यहाँ की मिट्टी में, किसी के बाप का हिंदुस्तान थोड़ी है। इन गद्दारों की बात सुनकर कैसे मान लूँ कि इनका खून शामिल है, यहाँ की मिट्टी में? कह रहा है असम को काट कर हिंदुस्तान से अलग कर देंगे।”

बता दें कि शरजील ने विवादित वीडियो में असम को हिंदुस्तान से परमानेंटली काटने की बात कही थी और साथ ही चिकन नेक इलाके को बंद करने के लिए कहा था। उसका कहना था कि चिकन नेक समुदाय विशेष का इलाका है। इस दौरान अल्लाह हू अकबर के नारे भी लगाए गए थे। अब बेहद आपत्तिजनक भाषण देकर शरजील इमाम बुरी तरह फँस चुका है। भड़काऊ बयान के मामले में शरजील के खिलाफ केस दर्ज किया गया है।

इससे पहले असम सरकार के मंत्री हेमंत बिस्व शर्मा ने कहा था, “दिल्ली में शाहीन बाग विरोध-प्रदर्शन के मुख्य आयोजक शरजील ने कहा है कि असम को शेष भारत से काट दिया जाना चाहिए। असम सरकार ने इस देशद्रोही बयान का संज्ञान लिया है और उसके खिलाफ मामला दर्ज करने का फैसला किया है।”

इससे पहले संबित पात्रा ने शरजील इमाम का वीडियो शेयर करते हुए लिखा, “दोस्तों शाहीन बाग की असलियत देखें। पात्रा ने यह सवाल किया है कि क्या यह देशद्रोह नहीं है।” फिर बाद में पात्रा ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि शाहीन बाग की साजिश पूरे विश्व के सामने आ गया है। शाहीन बाग को तौहीन बाग कहना चाहिए। शाहीन बाग में एंटी नेशनल बातें की गईं। असम को भारत से आज़ाद करने की बात कही गई हैं।

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महात्मा गाँधी भी शाहीन बाग़ में धरना देते: दिग्विजय सिंह, लेकिन… शाहीन बाग़ वाले बता चुके हैं गाँधी को फासिस्ट

शाहीन बाग़ में चल रहे CAA और NRC के विरोध प्रदर्शन में कॉन्ग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने भी अपनी उपस्थिति दर्ज कर ली है। दिग्विजय सिंह ने कहा है कि आज अगर महात्मा गाँधी होते तो वो शाहीन बाग़ में धरना देते।

रिपोर्ट्स के अनुसार, कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता और मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने भोपाल में ‘गाँधी, एक भारत’ नामक पुस्तक के विमोचन कार्यक्रम के दौरान मोदी सरकार को नागरिकता कानून (CAA), NRC और आर्टिकल 370 के मुद्दे पर घेरा। दिग्विजय सिंह ने कहा कि महात्मा गाँधी की 150वीं जयंती पर हमें आज वो सब देखना पड़ रहा है, जिसे महात्मा गाँधी कभी स्वीकार नहीं करते। उन्होंने कहा कि महात्मा गाँधी आज होते तो वह भी शाहीन बाग में धरने पर अवश्य बैठते। इसमें आश्चर्यजनक बात यह रही कि खुद दिग्विजय सिंह ने यह बात शाहीन बाग के ठंड में बैठ कर कहने के बजाय भोपाल से कही है!

कॉन्ग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने कार्यक्रम के दौरान कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाए जाने का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि आर्टिकल 370 हटाने से कश्मीर के लोगों में अविश्वास पैदा हुआ है। विवादित नेता दिग्विजय सिंह ने कहा कि आज कुछ लोग महात्मा गाँधी के हत्यारों को राष्ट्रभक्त कह रहे हैं। उन्होंने कहा कि हिन्दू मुस्लिम एकता के लिए गाँधी ने बहुत कुछ किया है लेकिन आज गाँधी को हिन्दू विरोधी साबित करने की कोशिश ही रही है।

‘गाँधी हिंसा का कोई कदम स्वीकार नहीं करते’

कार्यक्रम के दौरान कॉन्ग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने कहा कि महात्मा गाँधी ने सरलता के साथ आम जनता को कॉन्ग्रेस से जोड़ा और गाँधी हिंसा का कोई कदम स्वीकार नहीं करते थे। गाँधी के बहाने ही दिग्विजय सिंह ने कहा कि CAA और NRC आंदोलन अब राजनीतिक दलों और पुरुषों के हाथों से निकलकर महिलाओ और बच्चों के हाथों में पहुँच गया है।

इसके साथ ही विवादित कॉन्ग्रेस नेता ने कहा कि आज कल शिक्षकों को भी गाँधी और राष्ट्रवाद के बारे में जानकारी नहीं है। साथ ही, दिग्विजय सिंह ने CAA लागू ना करने वाले राज्यों को बधाई भी दी।

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‘पाकिस्तान और बांग्लादेश के मुस्लिमों को निकालो, शिवसेना ने भगवा रंग नहीं छोड़ा है’

नागरिकता संशोधन कानून (CAA) को लेकर शिवसेना का पेंडुलम रुख जगजाहिर है। इस बिल का लोकसभा में उसने समर्थन किया था। लेकिन महाराष्ट्र में उसकी सहयोगी कॉन्ग्रेस ने जब इस पर आपत्ति जताई तो उसने राज्यसभा में बिल के पक्ष में मतदान से कन्नी काट ली। अब राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना की सक्रियता से इस मसले पर उसकी नींद उड़ गई है। पार्टी के मुखपत्र ​दोपहर का सामना के संपादकीय में कहा गया है, “देश में घुसे पाकिस्तानी और बांग्लादेशी मुस्लिमों को निकालो। उन्हें निकालना ही चाहिए, इसमें कोई दो राय नहीं।”

‘कर सकते हो तो करो!, दो झंडों की कहानी’ शीर्षक से शनिवार (जनवरी 25, 2019) को प्रकाशित संपादकीय में राज ठाकरे की पार्टी पर तंज कसते हुए कहा गया है कि शिवसेना ने हिंदुत्व का भगवा रंग नहीं छोड़ा है। दरअसल, 23 जनवरी को ‘महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना’ का मुंबई में महाधिवेशन हुआ था। इसमें राज ठाकरे ने 9 फरवरी को मुंबई में रह रहे अवैध घुसपैठियों के खिलाफ रैली करने की बात कही थी।

पिछले दिनों राज ठाकरे की पार्टी ने अपनी पार्टी का झंडा बदल दिया था। उन्होंने हिंदुत्व के राह पर चलने के संकेत दिए हैं। इसे लेकर संपादकीय कहा गया है कि 14 साल पहले राज ठाकरे की पार्टी मराठी मुद्दे पर बनी और आज हिंदुत्व पर जाती दिख रही है। इसे रास्ता बदलना नहीं कहेंगे तो क्या कहेंगे।

इसमें लिखा गया है कि पाकिस्तानी और बांग्लादेशी मुस्लिमों को बाहर निकालने के लिए किसी राजनीतिक दल को अपना झंडा बदलना पड़े, ये मजेदार है। दूसरी बात ये कि इसके लिए एक नहीं, दो झंडों की योजना बनाना ये दुविधा या फिसलती गाड़ी के लक्षण हैं। राज ठाकरे और उनकी 14 साल पुरानी पार्टी का गठन मराठा मुद्दे पर हुआ था। लेकिन अब उनकी पार्टी हिंदुत्ववाद की ओर जाती दिख रही है। शिवसेना ने मराठी मुद्दे पर बहुत काम किया हुआ है। इसलिए मराठियों के बीच जाने के बावजूद उनके हाथ कुछ नहीं लगा और लगने के आसार भी नहीं हैं।

सामना में प्रकाशित संपादकीय

आगे लिखा है, “मनसे प्रमुख को अपने मुद्दे रखने और उसे आगे बढ़ाने का पूरा अधिकार है। लेकिन उनकी आज की नीति और इसी मुद्दे पर 15 दिन पहले की नीति में कोई मेल नहीं दिख रहा। उन्होंने कल कहा कि नागरिकता कानून को हमारा समर्थन है और कानून के समर्थन के लिए हम मोर्चा निकालने वाले हैं। लेकिन एक महीने पहले उनकी अलग और उल्टी नीति थी। शिवसेना ने प्रखर हिंदुत्व के मुद्दे पर देशभर में जागरूकता के साथ बड़ा कार्य किया है। मुख्य बात ये है कि शिवसेना ने हिंदुत्व का भगवा रंग कभी नहीं छोड़ा। यह रंग ऐसा ही रहेगा।”

संंपादकीय में कहा गया है कि NRC और CAA पर देश भर में विरोध है। केंद्र का मकसद राजनीतिक लाभ उठाना है। इस कानून का नुकसान सिर्फ मुस्लिमों को ही नहीं, बल्कि 30 से 40 प्रतिशत हिंदुओं को भी होगा। इस सच को छुपाया जा रहा है। इसमें राज ठाकरे पर निशाना साधते हुए कहा गया है कि भाजपा के शिवसेना द्वेष की बवासीर दूसरे रास्तों से बाहर निकल रही है और ये उनका पुराना खेल है।

संपादकीय में कहा है, “बालासाहेब के किसी पुराने भाषण की हू-ब-हू ‘कॉपी’ पढ़ी गई। फिर मंदिर में आरती, मुस्लिमों की नमाज और बांग्लादेशियों की हकालपट्टी के मुद्दे भी आए। वीर सावरकर और हिंदूहृदयसम्राट बालासाहेब ठाकरे का हिंदुत्व का मुद्दा लेकर चलना बच्चों का खेल नहीं। फिर भी देश में कोई हिंदुत्व की बात पर अपनी घड़ी फिट कर रहा है तो हमारे पास उनका स्वागत करने की दिलदारी है। विचार ‘उधार’ के भले हों लेकिन हिंदुत्व के ही हैं।”

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दिल्ली के शाहीन बाग इलाक़े में नागरिकता संशोधन क़ानून (CAA) के ख़िलाफ़ हो रहे विरोध-प्रदर्शन के दौरान कुछ गुंडों ने शुक्रवार (24 जनवरी) को न्यूज़ नेशन के कंसल्टिंग एडिटर दीपक चौरसिया पर हमला कर दिया था। इस हमले के बारे में उन्होंने सोशल मीडिया पर एक वीडियो शेयर किया था। इसमें उन्होंने बताया था, “हम सुन रहे हैं कि संविधान ख़तरे में है, हम सुन रहे हैं कि लड़ाई लोकतंत्र को बचाने के लिए है! जब मैं शाहीन बाग की उसी आवाज़ को देश को दिखाने के लिए पहुँचा, तो वहाँ मॉब लिंचिंग से कम कुछ नहीं मिला!”

इस घटना का जो वीडियो सामने आया वह काफ़ी चौंका देने वाला था। विरोध-प्रदर्शन की आड़ में कुछ गुंडों ने पत्रकार दीपक चौरसिया पर हमला कर दिया था। इस दौरान उनके अलावा उनके साथ गए कैमरा पर्सन पर भी हमला किया गया और उपद्रवियों ने उनके कैमरे को भी तोड़ डाला। पत्रकार के अनुसार, उनकी सुरक्षा के लिए वहाँ कोई पुलिसकर्मी मौजूद नहीं था।

इस हमले की जहाँ एक तरफ़ तो कड़ी निंदा की जा रही है, वहीं दूसरी तरफ वामपंथी पत्रकारों ने इस हमले को सही ठहराते हुए इस्लामवादी मोर्चे के कृत्य पर पर्दा डालने की कोशिश की।

CNN न्यूज 18 की राजनीतिक संपादक, मारिया शकील (Marya Shakil) ने दीपक चौरसिया पर हुए हमले की एक तरफ तो निंदा की, तो वहीं दूसरी तरफ वो इस्लामिक गुंडों को सही ठहराती भी नज़र आईं।

मारिया शकील का कहना है कि पत्रकारों को यह सोचना चाहिए कि वो जिस माइक का इस्तेमाल दूसरों की आवाज़ उठाने के लिए करते हैं, वो उससे लोगों को डराने-धमकाने लगे। उन्होंने सवालिया होते हुए कहा कि आखिर मीडिया पर लोगों को भरोसा क्यों नहीं है? उन्होंने यह भी कहा कि आज का मीडिया “ख़तरनाक और ध्रुवीकरण बहस” के लिए एक पार्टी बनकर रह गई है।

मारिया की इस प्रतिक्रिया से इस बात का अंदाज़ा तो बख़ूबी लगाया जा सकता है कि वो पत्रकार दीपक चौरसिया पर हुए हमले की निंदा तो कर रही थी, लेकिन साथ ही शाहीन बाग की उस भीड़ का भी बचाव कर रही थी जो विरोध-प्रदर्शन की आड़ में हिंसक-प्रदर्शन को अंजाम दे रही थी।

मारिया के जवाब में, वामपंथी रोहिणी सिंह ने एक क़दम आगे बढ़कर अपनी प्रतिक्रिया दर्ज की। उन्होंने ट्वीट किया कि उचित व्यवहार का दायित्व हमेशा ऐसे नागरिकों पर ही क्यों होता है जो एक ही मीडिया द्वारा लगातार अमानवीय और अपमानित होते रहते हैं।

अपनी इस प्रतिक्रिया से उन्होंने मुस्लिमों का सीधे तौर पर तो कोई उल्लेख नहीं किया, लेकिन इस सन्दर्भ में शाहीन बाग के प्रदर्शनकारियों की हरक़तों को छिपाने का प्रयास ज़रूर किया।

वामपंथी पत्रकार रोहिणी सिंह इतने पर भी नहीं रुकीं, आगे बढ़ते हुए उन्होंने दीपक चौरसिया को लगभग लताड़ लगाते हुए कहा कि शाहीन बाग में मुस्लिम महिलाएँ विरोध-प्रदर्शन कर रही थीं और आप (दीपक चौरसिया) वहाँ अपनी आवाज़ बुलंद करने गए थे। ऐसा कहकर रोहिणी सिंह ने बेशर्मी से चौरसिया पर हुए हमले को वैध ठहरा दिया।

शेखर गुप्ता के नेतृत्व वाले द प्रिंट की पत्रकार जैनब सिंकदर का ट्वीट तो और भी शर्मनाक था। उन्होंने सीधे तौर पर कहा कि शाहीन बाग के गुंडे वास्तव में दीपक चौरसिया के साथ ‘विनम्र’ थे। यह सोचने वाली बात है कि उनकी इस प्रतिक्रिया से कहीं उनका आशय यह तो नहीं था कि गुंडों को उन्हें (दीपक चौरसिया) और पीट देना चाहिए था।

ऐसा प्रतीत होता है जैसे द प्रिंट की पत्रकार दीपक चौरसिया पर हुए हमले पर ख़ुशी जता रही हों। ग़ौर करने वाली बात यह है कि शेखर गुप्ता, जो एडिटर्स गिल्ड को लीड करते हैं, उन्होंने राजदीप सरदेसाई के ख़िलाफ़ केवल एक ट्वीट करने के लिए भाजपा आईटी सेल के प्रमुख अमित मालवीय के ख़िलाफ बयान जारी कर दिया था।

अन्य छोटे स्वयंभू पत्रकारों ने भी इस मुद्दे पर अपने-अपने विचार रखे। ध्रुव राठी ने आज के मीडिया जगत को गोदी मीडिया की संज्ञा देते हुए शाहीन बाग के प्रदर्शनकारियों को सहिष्णु होने की सलाह दी।

ग़ौरतलब है कि अभी कुछ दिन पहले ही दीपक चौरसिया को CPI नेता CPI के पार्टी प्रवक्ता अमीर हैदर ज़ैदी ने टीवी पर बहस के दौरान टीवी पत्रकार दीपक चौरसिया को ‘तू-ता’ कहकर गालियाँ दी थीं। अमीर हैदर ने दीपक चौरसिया को गाली देते हुए उन्हें ‘भ*वा पत्रकार’ तक कह दिया था। इसके बाद वो इतने पर भी नहीं रुके और दीपक चौरसिया पर और भी आरोप लगाते हुए ज़ैदी उन्हें भ*वा कहते हुए भद्दी गालियाँ देते हुए उन्हें दोहराते रहे।

बता दें कि कश्मीरी पंडित पलायन की 30वीं वर्षगाँठ के दिन, शाहीन बाग में प्रदर्शनकारी कश्मीरी पंडितों के साथ भिड़ गए थे। CAA के ख़िलाफ़ इन विरोध प्रदर्शनों में हिन्दूफोबिक पोस्टर भी लगाए गए हैं। शाहीन बाग वही जगह है जहाँ ‘जिन्ना वली आज़ादी’ के नारे लगाए गए थे। इस विरोध-प्रदर्शन में, अपने एजेंडे के तहत बच्चों का भी इस्तेमाल किया गया था। विरोध में खड़े बच्चों ने देश-विरोधी ऐसे नारे लगाए जिनके बारे में उन्हें कुछ पता भी नहीं था।

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