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NPR की प्रक्रिया पर रोक लगाने से SC का इनकार, जनहित याचिकाओं की सुनवाई पर केंद्र को नोटिस

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (27 जनवरी, 2020) को नागरिकता संशोधन कानून (CAA) और राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (NPR) प्रक्रिया को चुनौती देने वाली नई याचिकाओं पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है। हालाँकि, सुनवाई के दौरान कोर्ट ने इन प्रक्रियाओं पर रोक लगाने से इनकार कर दिया है। इसके साथ ही सभी नई याचिकाओं को नागरिकता संशोधन क़ानून (CAA) की अन्य याचिकाओं के साथ सूचीबद्ध कर दिया। इन पर पाँच सदस्यीय संविधान पीठ क़रीब तीन सप्ताह बाद सुनवाई करेगी।

दरअसल, याचिका में डेटा की सुरक्षा को लेकर सवाल उठाया गया था। एक याचिकाकर्ता ने कहा था कि नागरिकता (नागरिकों का पंजीकरण और राष्ट्रीय पहचान पत्र जारी करना) नियम, 2003 के तहत एकत्र की जा रही जानकारी के तहत दुरुपयोग से किसी भी सुरक्षा की गारंटी नहीं है।

इसके आगे याचिका में आगे कहा गया कि यह आधार या जनगणना के लिए इकट्ठा की गई जानकारी से काफी अलग है, जिसमें एकत्र की गई सूचना/ डेटा को क़ानून के अनुसार सुरक्षा और सुरक्षा की गारंटी दी जाती है। याचिका में इस बात पर भी चिंता जताई गई कि इकट्टा किए डेटा के कारण नागरिकों की निगरानी हो सकती है। हालाँकि, कोर्ट ने याचिकाकर्ता की सुनवाई पर NPR प्रक्रिया में तुरंत रोक लगाने से इनकार कर दिया।

ख़बर के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने इससे पहले 22 जनवरी को स्पष्ट किया था कि वो केंद्र सरकार का पक्ष जाने बगैर कोई निर्णय नहीं लेगा। तब कोर्ट ने इस क़ानून के ख़िलाफ़ दायर याचिकाओं पर जवाब देने के लिए केंद्र सरकार को चार सप्ताह का समय दिया, जिसकी सुनवाई पाँच सदस्यीय संविधान पीठ करेगी।

मुख्य न्यायाधीश एसए बोबडे, न्यायाधीश एस अब्दुल नज़ीर और न्यायाधीश संजीव खन्ना की पीठ ने इस कानून को चुनौती देने वाली दर्जनों याचिकाओं पर केंद्र को नोटिस जारी किया। हालाँकि, पीठ ने साफ़ किया त्रिपुरा और असम से संबंधित याचिकाओं पर अलग से विचार किया जाएगा क्योंकि इन राज्यों की नए नागरिकता क़ानून को लेकर परेशानी देश के अन्य हिस्सों से अलग है।

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शाहीन बाग पर कुमार विश्वास का केजरीवाल पर हमला, ‘खुद भेजते हो अमानती गुंडे, दूसरे को बोलते हो हटाओ’

शाहीन बाग में नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के खिलाफ विरोध प्रदर्शन के लिए बीजेपी पर आरोप लगाने वाले दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल पर उनके पूर्व सहयोगी कुमार विश्वास ने बड़ा हमला बोला है। विश्वास ने एक ट्वीट कर आम आदमी पार्टी (AAP) पर वहाँ अपने गुंडों को बैठाने का आरोप लगाया है।

बता दें कि केजरीवाल ने एक ट्वीट कर कहा था बीजेपी शाहीन बाग पर गंदी राजनीति कर रही है। केजरीवाल ने शाहीन बाग में प्रदर्शन के लिए बीजेपी को ही जिम्मेदार ठहराया था। अरविंद केजरीवाल ने ट्वीट करते हुए लिखा था, “शाहीन बाग में बंद रास्ते की वजह से लोगों को परेशानी हो रही है। भाजपा नहीं चाहती कि रास्ते खुलें। भाजपा गंदी राजनीति कर रही है। भाजपा के नेताओं को तुरंत शाहीन बाग जाकर बात करनी चाहिए और रास्ता खुलवाना चाहिए।”

इसी पर कुमार विश्वास ने ट्वीट से केजरीवाल और AAP पर हमला बोला। विश्वास ने केजरीवाल पर छल करने का भी आरोप मढ़ा। उन्होंने ट्वीट कर लिखा, “अपने अमानती-गुंडे को भेजकर बिठाओ तुम और उठाएँ दूसरे? तुम्हारा निर्वीर्य नायब शाहीन बाग के साथ खड़ा हूँ, तुम कह रहे हो हटाओ। अपनी हर गैर-मुनासिब सी जहालत के लिए, बारहा तू जो ये बातों के सिफर तानता है, छल-फरेबों में ढके सच के मसीहा मेरे, हमसे बेहतर तो तुझे, तू भी नहीं जानता है।”

बता दें कि नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ दिल्‍ली के शाहीन बाग इलाके में महीने भर से भी ज्‍यादा समय से चल रहे विरोध-प्रदर्शन की वजह से इस मार्ग का इस्‍तेमाल करने वाले लोगों को दिक्‍कतों का सामना करना पड़ रहा है। कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने भी शाहीन बाग में नागरिकता कानून के खिलाफ हो रहे प्रदर्शन पर सवाल उठाया। उन्होंने सोमवार (जनवरी 27, 2020) को कहा कि शाहीन बाग में लोग सिर्फ मोदी का विरोध कर रहे हैं। वहाँ प्रदर्शनकारी एंबुलेंस को निकलने नहीं देते। बच्चों को स्कूल नहीं जाने दिया जा रहा। लोगों को दफ्तर जाने से रोका जा रहा है। वहाँ कुछ हजार लोग भारत को तोड़ने की कोशिश कर रहे हैं।

उन्होंने कहा, “केजरीवाल, सिसोदिया शाहीन बाग वालों के साथ खड़े हैं। लेकिन उन लाखों लोगों की शांत आवाज उनको क्यों नहीं सुनाई देती? जिनके बच्चे स्कूल नहीं जा पा रहें, लोग दफ्तर नहीं जा पा रहें? दुकानें बंद हैं, एंबुलेंस नहीं निकल सकती।”


‘वायर’ की वामपंथन रोहिणी सिंह को पत्रकार दीपक चौरसिया का ‘तीन बेडरूम’ वाला जवाब

दिल्ली के शाहीन बाग इलाक़े में नागरिकता संशोधन क़ानून (CAA) के ख़िलाफ़ हो रहे विरोध-प्रदर्शन के दौरान कुछ गुंडों ने शुक्रवार (24 जनवरी) को न्यूज़ नेशन के कंसल्टिंग एडिटर दीपक चौरसिया पर हमला कर दिया था। इस हमले के बारे में उन्होंने सोशल मीडिया पर एक वीडियो शेयर किया था। इसमें उन्होंने बताया था, “हम सुन रहे हैं कि संविधान ख़तरे में है, हम सुन रहे हैं कि लड़ाई लोकतंत्र को बचाने के लिए है! जब मैं शाहीन बाग की उसी आवाज़ को देश को दिखाने के लिए पहुँचा, तो वहाँ मॉब लिंचिंग से कम कुछ नहीं मिला!”

इस घटना का जो वीडियो सामने आया वह काफ़ी चौंका देने वाला था। विरोध-प्रदर्शन की आड़ में कुछ गुंडों ने पत्रकार दीपक चौरसिया पर हमला कर दिया था। इस दौरान उनके अलावा उनके साथ गए कैमरा पर्सन पर भी हमला किया गया और उपद्रवियों ने उनके कैमरे को भी तोड़ डाला। पत्रकार के अनुसार, उनकी सुरक्षा के लिए वहाँ कोई पुलिसकर्मी मौजूद नहीं था।

इस हमले की जहाँ एक तरफ़ तो कड़ी निंदा की जा रही है, वहीं दूसरी तरफ वामपंथी पत्रकारों ने इस हमले को सही ठहराते हुए इस्लामवादी मोर्चे के कृत्य पर पर्दा डालने की कोशिश की।

NDTV के श्रीनिवासन जैन ने चौरसिया के बारे में बोलते हुए कहा कि वह एक समय में एक अच्छे पत्रकार हुआ करते थे, लेकिन अब नहीं हैं। यह प्रतिक्रिया उन्होंने रोहिणी सिंह के ट्वीट पर दी। रोहिणी सिंह वही हैं, जिन्होंने दीपक चौरसिया पर हुए हमले को सही ठहराया था और उन्हें एक पत्रकार मानने तक से इनकार कर दिया था।

रोहिणी सिंह के इसी ट्वीट का जवाब देते हुए पत्रकार दीपक चौरसिया ने लिखा, “मैंने एक ग़रीब पृष्ठभूमि से आकर अपने दम पर पत्रकारिता की। मेरा कसूर सिर्फ़ इतना है कि मैं आप की तरह डिजाइनर पत्रकार नहीं हूँ! मेरा वित्त मंत्रालय में परिचय नीरा राडिया ने नहीं कराया! ना ही मैंने आज तक किसी सरकार से 3BHK फ़्लैट लेकर खबरें लिखी है!”

2010 में, कॉन्ग्रेस के शासनकाल के दौरान, एक घोटाला सामने आया था जिसमें पत्रकार बरखा दत्त और एमके वेणु (जो द वायर के संस्थापक संपादक हैं, जहाँ अब रोहिणी सिंह काम करती हैं) कॉर्पोरेट लॉबिइंग नीरा राडिया के साथ सम्पर्क थे। एमके वेणु को कॉरपोरेट लॉबिस्ट नीरा राडिया से अनुरोध करते हुए सुना गया था कि वो रोहिणी सिंह को अपने (लॉबीस्ट के) सर्कल (राजनेताओं, व्यापारियों, लॉबिस्टों आदि) में इंट्रोड्यूज़ करें। राडिया के बारे में पता चला था कि वो यूपीए सरकार से अपने कॉर्पोरेट ग्राहकों के लिए अनुकूल सौदे करने के लिए दलालों के रूप में पत्रकारों का इस्तेमाल कर रही थीं। रोहिणी सिंह वर्तमान में द वायर के साथ ही काम कर रही हैं। दीपक चौरसिया ने अपने ट्वीट में उसी 2010 प्रकरण को याद दिलाते हुए लिखा कि उनका परिचय वित्त मंत्रालय द्वारा नहीं कराया गया है।

इसके अलावा, चौरसिया ने यह दावा भी किया उन्हें किसी सरकार के प्रति अनुकूल ख़बरें लिखने के लिए 3BHK अपार्टमेंट नहीं दिया गया। ऐसा उन्होंने इसलिए लिखा क्योंकि उत्तर प्रदेश चुनावों से पहले, यह अफ़वाह थी कि रोहिणी सिंह को समाजवादी पार्टी द्वारा 2BHK अपार्टमेंट प्राप्त हुआ था। इस तरह की अफ़वाह इसलिए उड़ी थी क्योंकि रोहिणी सिंह ने अपने लेख में ऐसा ज़िक्र किया था कि आने वाले समय में प्रदेश में समाजवादी पार्टी सत्ता में आएगी। इसके बाद, चुनाव परिणाम घोषित होने के बाद, वह अचानक ग़ायब हो गई थीं और महीनों तक सोशल मीडिया से दूरी बनाए रखी थीं। हालाँकि, ये आरोप केवल आरोप ही बने रहे और इन आरोपों को पुष्टि करने का कोई सबूत अभी तक सामने नहीं आया है।

दिलचस्प बात यह है कि दीपक चौरसिया ने यह बात कही है कि रोहिणी सिंह को जो अपार्टमेंट दिया गया था वो 2BHK नहीं बल्कि 3BHK अपार्टमेंट था। लेकिन, हम यह स्पष्ट कर देना चाहते हैं कि दीपक चौरसिया के इस दावे की पुष्टि ऑपइंडिया बिल्कुल नहीं करता।

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9 महीने में 12 पत्रकारों पर जानलेवा हमला, मारपीट, गाली-गलौज: सब के सब सेक्युलर और ‘शांतिपूर्ण’ जगहों पर!

अल्लाह हू अकबर के नारे लगाते हुए शाहीन बाग के गुंडों ने की पत्रकार दीपक चौरसिया से मारपीट, कैमरा भी तोड़ा

IIT Bombay ने निकाली तिरंगा यात्रा, वामपंथी शरजील के समर्थन में पोस्टर बनाने में रहे व्यस्त

महाराष्ट्र में आईआईटी बॉम्बे के छात्रों ने गणतंत्र दिवस से एक दिन पहले अपने कॉलेज परिसर से तिरंगा यात्रा निकाली। इस यात्रा में 1000 फीट लंबे तिरंगे के साथ 1,500 से अधिक छात्रों, प्रोफेसरों, गैर-शिक्षण कर्मचारियों  समेत उनके परिवार के सदस्यों ने भाग लिया। यह यात्रा लगभग साढ़े चार किलोमीटर तक कॉलेज परिसर को जोड़ने वाले रास्ते पर चली। इस मार्च का विषय ‘आईआईटी बॉम्बे फॉर नेशन-बिल्डिंग’ था। 

इस तिरंगा यात्रा के माध्यम से जहाँ छात्र और फैकल्टी मेंबर्स कैंपस के अंदर लेफ्ट द्वारा की जा रही राजनीतिकरण की निंदा की, वहीं अम्बेडकर पेरियार स्टडी सर्किल के नेतृत्व वाले वामपंथी छात्र शाहीन बाग विरोध प्रदर्शन के मास्टरमाइंड शरजील इमाम के समर्थन में पोस्टर बनाने में व्यस्त थे। वही शरजील इमाम, जिसने नार्थ इस्ट को हिन्दुस्तान से परमानेंटली काट देने की बात कही थी।

‘IIT Bombay for Justice’ नामक फेसबुक पेज पर छात्रों की तस्वीर अपलोड की गई, जिसमें वो ‘Reclaim the Republic’ नामक इवेंट में जाने के लिए तैयार थे। हमें जानकारी मिली कि यह फेसबुक पेज अम्बेडकर पेरियार स्टडी सर्किल से जुड़े लेफ्ट छात्रों द्वारा चलाया जाता है और इस इवेंट का आयोजन भी उन्होंने ही किया है। इस इवेंट में कॉमेडियन वरुण ग्रोवर ने भी हिस्सा लिया, जिन्होंने CAA और NRC के विरोध में ‘कागज़ नहीं दिखाएँगे’ नामक एक कविता भी लिखी, जिसे वामपंथियों का खुला समर्थन मिला। मोदीविरोधी गैंग ने इस कविता को सोशल मीडिया में वायरल करने में जान लगा दी। 


Poster for Left students’ ‘Reclaim the Republic’ event at IIT B

ऑपइंडिया ने पाया कि ‘IITB4Justice’ नामक ग्रुप APSCC द्वारा चलाया जाता है और जब लेफ्ट छात्रों द्वारा रैली की तैयारी की जा रही थी तो इस फेसबुक पेज ने इनकी पोस्टर बनाते हुए तस्वीरें पोस्ट की।

लेफ्ट स्टूडेंट्स द्वारा बनाए जा रहे पोस्टर्स

इन पोस्टर पर साफ तौर से ‘Support Sharjeel Imam’ लिखा हुआ देखा जा सकता है। शरजील इमाम शाहीन बाग में हो रहे विरोध प्रदर्शन का मास्टरमाइंड है और उसने अलीगढ़ में एक सभा के दौरान भारत को तोड़ने वाला देशद्रोही बयान दिया था। जिसके बाद असम, मणिपुर, उत्तर प्रदेश, दिल्ली और अरुणाचल प्रदेश पुलिस द्वारा उसके खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया गया है।

उल्लेखनीय है कि शरजील इमाम शुरू से ही CAA के खिलाफ विरोध प्रदर्शन और समुदाय विशेष को उकसाने में सक्रिय रहा है। 17 दिसंबर 2019 को एक वीडियो वायरल हुआ था, जिसमें शरजील इमाम समुदाय विशेष को सड़कों पर आने और दिल्ली में चक्का जाम करने के लिए उकसाता हुआ दिखाई दे रहा है। वीडियो में वह कहता है, “क्या मुस्लिमों की इतनी हैसियत भी नहीं कि उत्तर भारत के शहरों को बंद किया जा सके। यूपी में शहरी मुस्लिमों की आबादी 30 फीसदी से ऊपर है। क्या आपको शर्म नहीं आती? अरे भाई शर्म करो, आप यूपी में चक्काजाम क्यों नहीं कर सकते? कैसे चल रहा है वह शहर? बिहार का वह इलाका जहाँ से मैं आता हूँ, वहाँ ग्रामीण मुस्लिम आबादी 6% है, जबकि शहरी मुस्लिम आबादी 24% है। हिन्दुस्तान का मुस्लिम शहरी है। वो शहर में रहता है। शहर बंद कीजिए और जो रास्ते में आता है, उसे मना कीजिए, उसे भगाइए।”

शनिवार (जनवरी 25, 2019) को वायरल हुए एक अन्य वीडियो में शरजील असम को भारत से परमानेंटली काटने की बात कहते हुए नजर आता है।

लेफ्ट द्वारा निकाली गई रैली

दिलचस्प बात यह है कि आईआईटी बी के छात्रों और फैकल्टी मेंबर्स द्वारा 1000 फीट लंबे तिरंगा मार्च में बड़े पैमाने में लोग नजर आए जबकि वामपंथी छात्रों द्वारा किए गए आयोजन में शायद ही कोई व्यस्तता देखी गई।


लेफ्ट द्वारा निकाली गई रैली

लेफ्ट द्वारा किए गए आयोजन में से एक और पोस्टर निकल कर सामने आई। जिसमें ‘ताहा एलन’ को रिलीज करने की माँग की गई है।


लेफ्ट द्वारा निकाली गई रैली

बता दें कि एलन सुहेब और ताहा फजल दोनों कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य हैं, जिन्हें माओवादियों के साथ लिंक की वजह से UAPA के तहत हिरासत में रखा गया है।

इस तरह से शरजील इमाम के समर्थन में पोस्टर बनाना और और उसके समर्थन में खड़े  होना केवल यह दर्शाता है कि आईआईटी जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में भी वामपंथी संगठन अपनी तुच्छ राजनीति से बाज नहीं आते हैं और राजनीतिक लाभ के लिए वो इस तरह की हरकतें करते हैं। 

यहाँ तक कि फैकल्टी मेंबर्स ने भी तिरंगा मार्च के दौरान इस राजनीतिकरण की निंदा की। प्रोफेसर आशुतोष कुमार ने कहा, “आईआईटी बॉम्बे एक ऐसी संस्था है जो राजनीति में नहीं बल्कि शोध में उत्कृष्टता के लिए जानी जाती है। यह हमारे शोध में बाधा है। हम इसकी निंदा करते हैं। आज जो ज्यादा महत्वपूर्ण है, वह है गणतंत्र दिवस मनाना और हम उसके लिए यहाँ पर हैं।”

आईआईटी बॉम्बे फैकल्टी के प्रोफेसर वरदराज बापट सोम ने शैक्षिक परिसरों के राजनीतिकरण की निंदा की और कहा कि यह (IIT- बॉम्बे) परिसर राजनीति के लिए या फिर किसी के राजनीतिक प्रोपेगेंडा को फैलाने के लिए नहीं है।

CAA के ख़िलाफ़ नारेबाजी कर CPIM नेता ने केरोसिन डालकर लगाई आग, हुई मौत

CAA के विरोध में 24 जनवरी को खुद पर केरोसीन उड़ेलकर आग लगाने वाले सीपीआईएम नेता रमेश प्रजापति ने रविवार (जनवरी 26, 2020) की रात दम तोड़ दिया। इंदौर के एमवाई अस्पताल के बर्न यूनिट में इलाज के दौरान उनकी मौत हुई।

वयोवृद्ध मार्क्सवादी नेता रमेश प्रजापति CAA से नाराज़ थे। जब उन्होंने खुद को आग लगाई तब उनके पास CAA और NRC (राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर) को लेकर कुछ कागजात थे। उनके परिवार ने इस मामले में शंका जताते हुए पुलिस से जाँच की माँग की है।

परिजनों को शक है कि जब रमेश प्रतिदिन धरना-प्रदर्शन में शामिल होने जाते थे, कम्युनिस्ट पार्टी से सालों से जुड़े थे, और इससे पहले भी बड़े-बड़े मुद्दों पर पार्टी के साथ जुड़कर प्रदर्शन कर चुके थे, तो फिर उस दिन ऐसा क्या हुआ कि उन्होंने खुद को आग लगा ली।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, तुकोगंज टीआई निर्मल श्रीवास ने बताया कि रमेश प्रजापति शुक्रवार शाम 7 बजे गीता भवन चौराहा स्थित एक ऑटोमोबाइल्स शोरूम के पास पहुँचे थे। यहाँ बाेतल में भरा केरोसिन खुद पर उड़ेलकर उन्होंने खुद में आग लगाई।

जानकारी के मुताबिक आसपास के लोगों ने जब उन्हें आग की लपटों में घिरा देखा। तो तुरंत घटनास्थल पुलिस कंट्रोल रूम को सूचना दी गई। तुकोगंज थाने के जवान वहाँ पहुँचे और लोगों की मदद से आग बुझाकर प्रजापति को एमवाय अस्पताल पहुँचाया। जहाँ डॉक्टरों ने बताया कि वो इस घटना में 90 फीसदी जल गए। बता दें पुलिस ने अभी निर्णायक तौर पर नहीं बताया है कि उन्होंने ये कदम किस वजह से उठाया। पुलिस के मुताबिक जाँच जारी है, वे जल्दी ही पता कर लेंगे कि प्रजापति द्वारा ऐसा करने के पीछे असली कारण क्या था।

कम्यूनिस्ट पार्टी के जिला सचिव छोटेलाल सरावद और कैलाश लिंबोदिया ने बताया कि प्रजापति रिटायर्ड सरकारी कर्मचारी थे। वे कई दिनों से सीएए और एनआसी के विरोध में माणिबाग और बड़वाली चौकी में पार्टी की ओर से प्रदर्शन कर रहे थे। जबकि यूथ कॉन्ग्रेस अध्यक्ष रमीज खान के अनुसार प्रजापति ने खुद को आग लगाने से पहले भी सीएए के ख़िलाफ़ नारे लगाए थे।

‘टुकड़े-टुकड़े गैंग द्वारा प्रायोजित है शाहीन बाग, तिरंगे का इस्तेमाल भारत बाँटने वाले कर रहे’

केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने सोमवार (जनवरी 27, 2020) को प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हुए शाहीन बाग में चल रहे प्रदर्शन पर जमकर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि दिल्ली के शाहीन बाग में चल रहा प्रदर्शन देश को बाँटने वाले लोगों के लिए कवर बन गया है।

प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए रविशंकर प्रसाद ने कहा- “शाहीन बाग कोई इलाका नहीं रहा बल्कि यह एक आइडिया है, जहाँ पर भारतीय झंडे को कवर के तौर पर इस्तेमाल वे लोग कर रहे हैं जो भारत को बाँटना चाहते हैं। इसका टुकड़े-टुकड़ें गैंग की तरफ से समर्थन किया जा रहा है।”

इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में भाजपा नेता और कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने प्रदर्शन कर रहे लोगों को आड़े हाथों लेते हुए पूछा कि क्या बोलने का अधिकार कुछ ही लोगों को है जो प्रदर्शन कर रहे हैं। उन लोगों को नहीं जो खामोश हैं लेकिन परेशान हैं? उन्होंने कहा कि शाहीन बाग का सच सामने आना चाहिए।

इसके अतिरिक्त राहुल गाँधी और अरविंद केजरीवाल पर निशाना साधते हुए कानून मंत्री ने ये भी कहा कि राहुल गाँधी, केजरीवाल खामोश हैं, लेकिन उनके लोग खूब बोल रहे हैं। मनीष सिसोदिया बोलते हैं हम शाहीन बाग के साथ हैं। कॉन्ग्रेस के दिग्विजय सिंह और मणिशंकर अय्यर वहाँ जाकर क्या-क्या बोले हैं वो आप जानते हैं।

केन्द्रीय मंत्री ने स्पष्ट शब्दों में कॉन्ग्रेस को चेताया- “मैं कॉन्ग्रेस के लोगों को एक बात साफ-साफ कहना चाहता हूँ कि अब इस देश बँटवारा होने नहीं दिया जाएगा। अगर कोई ऐसा करेगा तो उसके खिलाफ शख्त कार्रवाई की जाएगी।”

कानून मंत्री ने पूछा – “ये कैसा हिंदुस्तान हम बनाना चाहते हैं? ये कैसी दिल्ली हम बनाना चाहते हैं? दिल्ली में कुछ लोग होंगे टुकड़े-टुकड़े के नाम पर अपनी आवाज बुलंद करेंगे। क्या दिल्ली में ऐसे लोगों को जगह मिलनी चाहिए जो असम को भारत से काटने की बात करेंगे?”

बता दें रविशंकर प्रसाद ने इस कॉन्फ्रेंस में पूरे विरोध को सीएए का न करार देते हुए नरेन्द्र मोदी के ख़िलाफ़ हो रहा विरोध बताया। उन्होंने कहा, “हमने बार-बार बताया कि नागरिकता संशोधन विधेयक किसी कि नागरिकता नहीं छिनता। इस देश का हर मुस्लिम नागरिक इज्जत के साथ इस देश में रहता है और रहेगा।”

उल्लेखनीय है कि कानून मंत्री के बयान के बाद दिल्ली मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने शाहीन बाग को लेकर भाजपा नेताओं पर निशान साधा है। केजरीवाल का कहना है कि भाजपा गंदी राजनीति कर रही हैं। शाहीन बाग के रास्ते बीजेपी क्यों नहीं खोलना चाहती है। शाहीन बाग में रास्ता बंद है, बहुत से लोगों को तकलीफ हो रही है। स्कूल बस, एम्बुलेन्स जाने में दिक्कत आ रही है। विरोध की वजह से आम जनता को परेशानी नही होनी चाहिए।

बहुविवाह, निकाह-हलाला को AIMPLB का समर्थन, कहा- इस्लामिक कानून पर गैरों को सवाल उठाने का अधिकार नहीं

बहुविवाह और निकाह-हलाला के ख़िलाफ़ भाजपा नेता एवं वकील अश्विनी उपाध्याय द्वारा सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका पर ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) ने अपना विरोध दर्ज कराया है। बोर्ड ने 1997 के एक फैसले का हवाला देते हुए कहा कि ये साफ हो चुका है कि पर्सनल लॉ को मूल अधिकारों की कसौटी पर नहीं आँका जा सकता। बोर्ड ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि वह निकाह हलाला, बहु विवाह का समर्थन करता है।

AIMPLB ने सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका का विरोध करते हुए कहा है कि इस्लामिक कानून पर किसी भी गैर-इस्लामिक शख्स को सवाल उठाने का कोई अधिकार नहीं हैं। AIMPLB ने कोर्ट में दाखिल अपनी याचिका में कहा कि बहुविवाह और अन्य प्रथाओं पर पहले ही फैसला सुनाया जा चुका है।

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की ओर से दाखिल अपनी याचिका में यह भी कहा गया कि धार्मिक प्रथा को चुनौती देने वाली जनहित याचिका उस व्यक्ति द्वारा दायर नहीं की जा सकती, जो उस धार्मिक संप्रदाय का हिस्सा नहीं है। मुस्लिम हितों की रक्षा के लिए ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड समेत कई मुस्लिम संगठन मौजूद हैं।

गौरतलब है कि इस मामले पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को नोटिस भेजा है। इसके साथ ही इस मामले को संविधान पीठ को भेजने का फैसला किया है। लेकिन, फिलहाल अभी तक संविधान पीठ का गठन नहीं हुआ है।

बता दें अश्विनी उपाध्याय द्वारा दायर की गई याचिका में हलाला और बहुविवाह को रेप जैसा अपराध घोषित करने की माँग की गई है। जबकि बहुविवाह को संगीन अपराध घोषित करने की माँग की गई है।

याचिका में कहा गया है कि यह प्रथाएं संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 21 का उल्लंघन करते हैं। उपाध्याय के मुताबिक अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता का अधिकार देता है। वहीं अनुच्छेद 15 धर्म, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर भेदभाव को रोकता है। 

हिंदू लड़का, दूसरे धर्म की लड़की प्यार में भागे घर से: लड़की के परिवार वालों ने करवाया गिरफ्तार, आसनसोल में तनाव

पश्चिम बंगाल के आसनसोल के एक प्रेमी जोड़े को झारखंड के झरिया से गिरफ्तार किया गया है। गिरफ्तारी के बाद नाबालिग लड़की को छोड़ दिया, जबकि 19 वर्षीय गौरव को जेल भेज दिया गया। गौरव और उसकी प्रेमिका को झरिया में उसके मामा के घर से पकड़ा गया। गौरव पर नाबालिग प्रेमिका को अगवा करने का आरोप लगाया गया है। हालाँकि गौरव की माँ ज्योति देवी का कहना है कि यह मामला अपहरण का नहीं बल्कि प्रेम प्रसंग का है। उन्होंने कहा कि लड़की के दूसरे समुदाय के होने के कारण दबाव में पुलिस उनके पूरे परिवार और रिश्तेदारों को परेशान कर रही है।

दरअसल गौरव को दूसरे समुदाय की लड़की से प्यार हो गया। वो उसके साथ शादी करना चाहता था। मगर इसकी भनक लड़की के घरवालों को लग गई तो बखेड़ा खड़ा हो गया। इसके बाद गौरव और उसकी प्रेमिका ने भागने का फैसला किया। दोनों के घर से भागने के बाद आसनसोल की स्थिति और भी ज्यादा तनावपूर्ण हो गई। इलाके में सांप्रदायिक तनाव उत्पन्न हो गया। पुलिस को इसकी शिकायत दी गई। जिसके बाद पुलिस ने कार्रवाई करते हुए दोनों को झरिया से पकड़ा। पुलिस का कहना है कि वे दोनों गौरव के मामा के घर में छुपे हुए थे।

आसनसोल साउथ थाना के पुलिस अधिकारी स्वरूप मुखर्जी ने बताया कि 21 जनवरी को एक व्यक्ति ने अपनी नाबालिग बेटी के अपहरण की शिकायत दर्ज कराई थी। अपनी शिकायत में उसने बीगू ठाकुर के 19 वर्षीय पुत्र गौरव ठाकुर, नीरज ठाकुर और कौशल तिवारी के खिलाफ उसकी बेटी के अपहरण की बात कही थी। उसका कहना था कि उसकी बेटी 17 साल की है और कक्षा 9 में पढ़ती है।

थाने में शिकायत दर्ज होने के बाद पुलिस ने कार्रवाई शुरू की। जाँच के दौरान पुलिस को दोनों के झरिया में छुपे होने की बात पता चली। इसके बाद पुलिस ने वहाँ पर छापेमारी की और दोनों को गिरफ्त में लिया। फिर पुलिस ने कानूनी कार्रवाई करते हुए गौरव को अपहरण के आरोप में जेल भेज दिया। बता दें कि गाैरव के पिता आसनसोल नगर निगम के पार्षद हैं।

असम में सुलझ गया 34 साल पुराना विवाद: 6 उग्रवादी गुटों ने टेके घुटने, अमित शाह ने की घोषणा

केंद्रीय गृह मंत्रालय ने असम में शांति की पहल को मजबूत करते हुए त्रिपक्षीय करार पर हस्ताक्षर किया है। बोडो आंदोलनकारियों की लम्बे समय से एक अलग बोडोलैंड की माँग रही है, और इसके लिए समय-समय पर क़ानून-व्यवस्था पर भी ख़तरा पैदा हुआ है। अब गृह मंत्रालय की पहल के बाद इस पर विराम लगने की उम्मीद है। बता दें कि असम में बोडोलैंड एक क्षेत्र है, जिसे आधिकारिक रूप से बोडो टेरिटोरियल कॉउन्सिल के नाम से जाना जाता है। ब्रह्मपुत्र नदी के उत्तरी छोर पर स्थित चार जिलों को मिला कर ये नाम दिया गया है, जिनकी सीमाएँ अरुणाचल प्रदेश और भूटान से मिलती हैं।

फ़रवरी 2003 में बोडो एकॉर्ड पर हस्ताक्षर होने के बाद ये क्षेत्र अस्तित्व में आया, जहाँ मुख्य रूप से बोडो जनजाति व असम की अन्य प्राचीन जनजातियों के लोग रहते हैं। उनकी लम्बे समय से एक अलग राज्य की माँग रही है। इसके साथ ही ‘नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट ऑफ बोडोलैंड (NDFB)’ के सभी चार पक्ष हथियार सहित समर्पण कर देंगे और हिंसा का मार्ग त्याग देंगे। इसके साथ ही असम में एक पुरानी समस्या समाधान की ओर बढ़ती दिख रही है।

30 जनवरी को एनडीएफबी के सभी गुट हथियारों के साथ आत्मसमर्पण करेंगे। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने ख़ुद घोषणा करते हुए कहा कि इस करार पर हस्ताक्षर होने के साथ ही दशकों से विद्रोह और बगावत की आग में जल रहे बोडोलैंड में शांति आएगी।

चारों विद्रोही गुटों का नेतृत्व राजन दईमारी, गोविंदा बसुमतारी, धीरेन बोडो और बी सओरिगरा करते रहे हैं। इनके अलावा एक अन्य बोडो संगठन एबीएसयू के अध्यक्ष प्रमोद बोडो और बोडोलैंड टेरीटोरियल कॉउन्सिल के अध्यक्ष हाग्रामा मोहिलारी ने भी इस करार पर साइन किया। असम के मुख्य सचिव संजय कृष्णा ने भी इस करार पर हस्ताक्षर किया। केंद्रीय गृह मंत्री ने कहा कि इस त्रिपक्षीय करार पर हस्ताक्षर होने के साथ ही बोडोलैंड आंदोलन की राजनीतिक और वित्तीय माँगें पूरी हो गई है। बोडोलैंड क्षेत्र के विकास के लिए सरकार ने 900 करोड़ रुपए भी जारी किया है।

सरकार ने सभी संगठनों को आश्वासन दिया है कि बोडोलैंड की प्राचीन संस्कृति, भाषा और परंपरा को बचाए रखने के लिए हरसंभव प्रयास किया जाएगा। साथ ही बोडो भाषा को असम की दूसरी आधिकारिक भाषा का दर्जा दिया जाएगा।

चोट हलाला, पॉलीगेमी, तलाक पर की जाती है, दर्द इन्हें होता है: मिलिए ‘The Wire’ की आरफा खानम जी से

प्रोपेगंडा पोर्टल ‘द वायर’ की आरफा खानम शेरवानी के ताज़ा आर्टिकल्स और न्यूज़ आइटम्स को आप देखेंगे तो पाएँगे कि पिछले दो महीने से ख़ुद को पत्रकार बताने वाली इस महिला का एक ही उद्देश्य है और वो है शाहीन बाग़ के उपद्रवियों का महिमामंडन करना। वीडियो और आर्टिकल्स के जरिए आरफा ने शाहीन बाग़ के एक-एक दंगाई को देवता तुल्य साबित करने के लिए जो परिश्रम किया है, उससे साफ़ दिखता है कि सीएए विरोध के नाम पर कुछ और हो रहा है। अभी ख़बर आई है कि 120 करोड़ रुपए इस्लामिक कट्टरवादियों ने इस विरोध प्रदर्शन में लगाए। मोदी के विरोध के लिए अमेरिकी उद्योगपति जॉर्ज सोरोस भी 100 करोड़ डॉलर दे रहे हैं।

वित्तीय संसाधन को भाजपा विरोधियों तक पहुँचा कर उन्हें देश विरोध के लिए उकसाना अब एक नई रणनीति दिख रही है, जिसकी पल-पल पोल भी खुल रही है। जिस शाहीन बाग़ का महिमामंडन करके आरफा ने पिछले 2 महीने गुजारे हैं, उसी शाहीन बाग़ का मुख्य साज़िशकर्ता शरजील इमाम भारत के टुकड़े-टुकड़े कर के पूरे उत्तर-भारत को अलग-थलग करने की मंशा रखता है। ये तो एक बानगी भर है। आरफा और शरजील जैसे हज़ारों लोग जुड़े हैं इस दंगे से, जिनकी मंशा इसी तरह खतरनाक है।

आरफा खानम शेरवानी उन लोगों में से एक है, जो आज के दौर की तुलना जर्मनी की नाज़ी सरकार से करते हैं। और हाँ, मोदी और हिटलर के बीच समानताएँ ढूँढ़ते-ढूँढ़ते तो ये उस मामले में पीएचडी कर चुके हैं। आरफा जैसों की नज़रों में 2014 का चुनाव विश्व युद्ध-1 था और 2019 के चुनाव विश्व युद्ध-2। नाजी से तुलना करने वाले ये भी ख़ूब समझते हैं कि वो रोज 5 बार मोदी को गाली देकर भी चैन से घर में बैठ सकते हैं क्योंकि लोकतंत्र पहले से ज्यादा मजबूत हुआ है, कमजोर नहीं। अनुराग कश्यप सरीखे तो गालियाँ बक कर भी आराम कर रहे होते हैं।फिर भी, आरफा ने मोदी और हिटलर की तुलना करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है।

आरफा खानम शेरवानी हाल ही में इसीलिए चर्चा में आई हैं, क्योंकि उन्होंने दंगाइयों को सलाह दी है कि वो लक्ष्य सफल होने तक अपनी मुस्लिम पहचान को सामने न लाएँ। यानी, अभी आम आदमी बन कर प्रदर्शन करें और समय आते ही अपना असली कट्टरपंथी चेहरा ले कर हाजिर हो जाएँ। मुस्लिमों को उनकी सलाह है कि घर पर खूब मजहबी व कट्टरवादी नारे पढ़ कर आएँ क्योंकि उनसे इन्हें ऊर्जा मिलती है। लेकिन, बाहर में मुस्लिम ऐसा दिखाएँ जैसे कि वो आम आदमी हैं ताकि अन्य लोग भी उनके प्रदर्शन में जुड़ सकें। जाहिर है, समय आते ही हर दंगाई को शरजील इमाम बन कर अपना असली चेहरा सामने लाने को कहा जाएगा।

जब मुस्लिमों की कुरीतियों के बारे में बात की जाती है तो आरफा खानम शेरवानी को मिर्ची लग जाती है और वो एक पल भी नहीं लगाती अपने मजहब और समाज की कुरीतियों को जायज ठहराने में। जब जायरा वसीम ने अल्लाह और इस्लाम का रोना रोते हुए एक्टिंग को अलविदा कहा था, तब कॉन्ग्रेस नेता व वरिष्ठ वकील मनु सिंघवी ने पूछा था कि हलाला जायज और एक्टिंग हराम, क्या ऐसे तरक्की करेगा हिंदुस्तान? जायरा वसीम को क्या जबरदस्ती अभिनय में लाया गया था? वो आई तब उन्हें ‘अल्लाह और इस्लाम’ का ख्याल नहीं रहा। सिंघवी के इस जायज सवाल पर भड़की आरफा ने पूछा कि क्या राहुल गाँधी अपनी पार्टी के एक वरिष्ठ नेता के इस बयान का समर्थन करते हैं?

इनकी हिटलरवादी सोच देखिए। दूसरों को हिटलर कहने वाली आरफा का मानना है कि किसी नेता को एक शब्द भी बोलने के लिए अपनी पार्टी के मुखिया से अनुमति लेना आवश्यक है वरना उसे मुँह खोलने का अधिकार नहीं। क्या किसी पार्टी का नेता तभी बोलेगा जब उसकी पार्टी का अध्यक्ष उसे अनुमति देगा? असली तानाशाही तो यही है, जिसे आरफा जैसे लोग बढ़ावा देते हैं। सिंघवी के जवाब से आरफा को और मिर्ची लगी। वरिष्ठ कॉन्ग्रेस नेता ने लताड़ते हुए कहा कि जब तक आरफा जैसे लोग मुस्लिम समाज में प्रभावी रहेंगे, तब तक मुस्लिम पिछड़े के पिछड़े ही रहेंगे। बात सही है। आरफा और शरजील जैसों की बातों पर ‘इंशाअल्लाह’ कहने वाला समाज आगे नहीं बढ़ सकता।

और हाँ, लिबरल गैंग का सबसे पहला कर्त्तव्य यही होता है कि किसी मंदिर, संत, देवता और हिंदुत्व को बदनाम करना। आरफा खानम शेरवानी ने इस काम के लिए गोरखनाथ मंदिर को चुना। क्योंकि इस क़दम से देश के सबसे ज्यादा जनसंख्या वाले राज्य के मुख्यमंत्री को बदनाम किया जा सकता है और साथ ही भाजपा, हिंदुत्व और मंदिर को भी बदनाम किया जा सकता है। आरफा ने झूठ फैलाते हुए लिखा कि फलाँ नवाब ने गोरखनाथ मंदिर के लिए ज़मीन दी थी। आरफा भूल गईं कि गोरखनाथ मंदिर का 800 वर्षों का इतिहास रहा है, जब उनके फलाँ नवाब के दादा भी पैदा नहीं हुए थे।

आरफा जैसों को पहचानने का एक और तरीका ये है कि वो इस्लामी मजहबी नारों का महिमामंडन करते रहते हैं और हिंदुत्व के प्रतीकों का जी भर अपमान करते हैं। जैसे, आरफा ने ‘ला इलाहा इल्लल्लाह’ को ऊर्जा देने वाला स्लोगन बताया था और इसी आरफा ने हनुमान जी के पोस्टर को ‘डर फैलाने वाला’ करार दिया था। सीएए विरोधी प्रदर्शन में ‘ला इलाहा इल्ललाह’ का इस्तेमाल क्यों हुआ, ये छिपा नहीं है। ख़ुद जामिया की हिजाबी छात्राएँ आयशा और लदीदा ने कहा था कि अब समय आ गया है जब सेक्युलर नारों से तौबा किया जाए और इस्लामी नारे लगाए जाएँ। उनकी नज़र में जिन्हें ये नारे पसंद नहीं, वो मुस्लिमों के साथ नहीं हैं।

यही तो उस शरजील इमाम की भी सोच है, जिसके पीछे असम की पुलिस, ईटानगर का क्राइम ब्रांच और केंद्रीय जाँच एजेंसियाँ लगी हुई हैं। वो भी तो कहता है कि अब मुस्लिमों के साथ कौन है और कौन नहीं, ये मुस्लिम अपने शर्तों पर तय करेंगे। अर्थात, मुस्लिम बोलेंगे कि तुम फलाँ नारे लगाओ और फलाँ काम करो, तभी हमारे साथ माने जाओगे। वहीं सदियों से चले आ रहे ‘जय श्री राम’ से उन्हें दिक्कत है। आरफा और शरजील जैसों के बयानों में आयशा और लदीदा जैसों के जहर का छौंक लग जाता है तो स्पष्ट दिख जाता है कि न तो ये ‘आंदोलन’ है और न ही सीएए या एनआरसी से इनका कोई लेना-देना है। इन्हें बस इस्लामी मजहबी कट्टरता स्थापित करनी है, अराजकता फैलानी है।

जब कोई मुस्लिम नेता कुछ गलतबयानी करता है, तब उनका बचाव करने के लिए सबसे पहले आरफा जैसी कथित ‘Muslim Influencer’ ही आगे आती है। एक महिला होकर आरफा ने आज़म ख़ान की महिलाविरोधी टिप्पणी का बचाव किया, जो ये दिखाता है कि ये वामपंथी अथवा इस्लामिक कट्टरवादी महिलाधिकार का सिर्फ़ ढोंग रचाते हैं। इन्हें महिलाओं की कोई चिंता नहीं। आज़म ने जया प्रदा के लिए ‘खाकी चड्डी’ जैसी घृणित टिप्पणी की और आरफा ने इसका बचाव किया। बचाव में आरफा ने कहा कि आज़म ने अमर सिंह को भी तो बोला। यही लोग जब कैंडल लेकर महिलाओं के हित की बात करते हुए सड़क पर उतरते हैं, तो उनके इस कृत्य को ढोंग नहीं तो और क्या कहा जाए?

जेएनयू और जामिया में छात्रों के हितों की बात करने का दावा करने वाली इसी आरफा ने बीएचयू के छात्रों को बदनाम करने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी थी। फरहान अख्तर जैसों का साथ देते हुए उन छात्रों को बदनाम किया गया था। इससे पता चलता है कि ये वामपंथी और कट्टरवादी इस्लामी एक्टिविस्ट्स छात्रों और युवाओं के भी पक्षधर नहीं हैं, अपने सहूलियत के हिसाब से सिर्फ़ उनका इस्तेमाल करते हैं। अब जब उनका दिखावटी चोला पूरी तरह उतर चुका है, वो तिरंगा झंडा और संविधान का सहारा लेकर ख़ुद को पाक-साफ़ साबित करने को जुटे हैं। वही संविधान, जिसके बारे में शरजील कहता है कि उससे मुस्लिमों को कोई उम्मीद नहीं है।