देश के कई हिस्सों से पालतू कुत्तों के आतंक की खबरें सामने आ चुकी हैं। मुंबई में भी पालतू कुत्ते ने डिलीवरी बॉय के प्राइवेट पार्ट पर हमला कर घायल कर दिया था। यह घटना 29 अगस्त की बताई जा रही है, जिसका वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, यह घटना मुंबई के पनवेल इलाके की है। जहाँ, इंडियाबुल्स कॉम्प्लेक्स में एक डिलीवरी बॉय डिलीवरी के बाद लिफ्ट से बाहर आ रहा था। लेकिन, जैसे ही उसने बाहर आने की कोशिश की वहाँ मौजूद एक पालतू कुत्ते ने डिलीवरी बॉय पर हमला कर दिया। इस हमले में उसके प्राइवेट पार्ट पर गहरा घाव हो गया। डिलीवरी बॉय का नाम नरेंद्र पेरियार बताया जा रहा है।
घायल डिलीवरी बॉय नरेंद्र पेरियार ने बताया, “मैं जैसे ही लिफ्ट से नीचे आया तो लिफ्ट के सामने एक कुत्ता खड़ा था, जिसे एक व्यक्ति ने चेन से पकड़ा हुआ था। इसके बाद उस व्यक्ति ने कुत्ते को लिफ्ट से थोड़ा दूर कर लिया। लेकिन, जैसे ही मैं लिफ्ट से बाहर निकला तो उस कुत्ते ने अचानक ही हमला कर दिया।”
नरेंद्र ने आगे बताया, “हमले के कराण मेरे प्राइवेट पार्ट से खून निकलने लगा, जिसके बाद मैं पार्किंग की ओर भागा और अपनी जान बचाई। वहाँ मौजूद कुछ लोगों ने मदद की और डॉक्टर के पास ले गए, जहाँ मुझे दवा और इंजेक्शन दिए गए हैं, साथ ही घावों का उपचार किया है। फिलहाल मैं ठीक हूँ।”
वहीं, डिलीवरी बॉय नरेंद्र पेरियार का इलाज करने वाले डॉक्टर्स का कहना है कि नरेंद्र का इलाज चल रहा है, उसे एंटी रेबीज इंजेक्शन दिया गया है। कुत्ते के काटने से जो घाव बने हैं, उन पर टाँके लगा दिए गए हैं।
उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद से 3 सितंबर 2022 को पालतू कुत्तों के हमले के दो मामले सामने आए। पहला मामला पार्क का था, जहाँ घुमाने के लिए लाई लड़की के हाथ से छूटकर पालतू कुत्ते ने वहाँ खेल रहे बच्चे को काट लिया था। कुत्ते के इस हमले में 10 साल का मासूम बच्चा घायल हो गया था। उसके शरीर पर 150 टाँके लगे थे।
दूसरा मामला गाजियाबाद की एक सोसाइटी का है। सोसायटी की लिफ्ट में एक पालतू कुत्ते ने एक बच्चे को काट लिया था। इस घटना के सीसीटीवी में फुटेज सामने आया था कि कुत्ते के काटने के बाद पीड़ित बच्चा काफी देर तक लिफ्ट में ही रोता रहा, लेकिन कुत्ते की मालकिन चुपचाप खड़ी देखती रही थी।
इससे पहले जुलाई में भी ऐसी ही घटना उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से सामने आयी थी। लखनऊ में एक जिम ट्रेनर के पालतू पिटबुल कुत्ते ने उसकी माँ को नोच कर मार डाला था। यह घटना पूरे देश में कुत्तों के पालने को लेकर सतर्कता बरतने की बात कही गई थी। लेकिन, इसके बाद भी कुत्तों के हमले वाली घटनाएँ आए दिन सामने आती रहती हैं।
देश के कई इलाकों में जिहादी किस कदर हावी हैं, इसका अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ जिले में हिन्दू परिवार मुस्लिमों के डर से घर छोड़ने को मजबूर हो गए हैं। यहाँ के कई घरों में ‘घर बिकाऊ है’ के पोस्टर भी लग चुके हैं। पीड़ित हिन्दुओं का कहना है कि मुस्लिम लड़के लड़कियों से छेड़छाड़ करते हैं और मना करने पर मारपीट करते हैं।
यह पूरा मामला अलीगढ़ जिले के मोरथल गाँव का है, जहाँ जिहादी मानसिकता से भरे हुए मुस्लिम लड़कों ने हिन्दू लड़कियों का जीना हराम कर दिया है। ‘टाइम्स नाउ नवभारत’ ने अपनी एक्सक्लुसिव रिपोर्ट में बताया है कि मुस्लिमों से परेशान होकर मोरथल गाँव के कई दलित परिवारों ने अपना घर छोड़कर पलायन करने की चेतावनी दी है। यही नहीं, जिन घरों में ‘यह मकान बिकाऊ है’ लिखा गया था, वहाँ काले रंग से पोत कर ढँकने का प्रयास किया गया है।
एक पीड़िता ने ‘टाइम्स नाउ’ से हुई बातचीत में बताया, “ये लोग (चार मुस्लिम युवक) मेरे साथ गाली-गलौच करने के अलावा जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल कर रहे थे। इतना ही नहीं, गंदे इशारे भी कर रहे थे। मैंने शाम को ये बात अपने पापा को बताई तो उन्होंने युवकों को डाँटा, जिसके बाद ये मुस्लिम लड़के मारने-पीटने पर उतारू हो गए। मेरे पिता को साइकिल की चैन से पीटा और मुझे घर के अंदर से खींचकर ले गए और गंदी-गंदी गालियाँ दी। ये सब लगातार बढ़ता जा रहा है।”
वहीं, एक अन्य शख्स ने आरोप लगाते हुए कहा है कि मुस्लिम समुदाय के युवक उसके मोहल्ले में आकर लड़कियों और महिलाओं के साथ गलत तरीके का व्यवहार करते हैं। बीते कुछ दिनों से मुस्लिमों का आतंक ज्यादा बढ़ गया है।
रिपोर्ट के अनुसार, रविवार (4 सितंबर, 2022) को जब एक बार फिर लड़कियों से छेड़खानी हुई तो यह मामला थाने तक पहुँचा। दलित समुदाय ने आरोप लगाया है कि पुलिस भी जाँच में सहयोग नहीं कर रही है। साथ ही ग्राम प्रधान भी इस मामले को लेकर दबाव बना रहा है और मुस्लिम पक्ष की ओर से समझौते की बात कर रहा है।
हालाँकि, इस मामले की सूचना मिलने के बाद पुलिस ने आरोपितों के खिलाफ केस दर्ज कर कार्रवाई का आश्वासन दिया है। साथ ही यह भी कहा है कि किसी को पलायन नहीं करने दिया जाएगा।
बॉलीवुड में हिंदू विरोधी मानसिकता और कंटेंट परोसने के कारण लोगों कुछ महीनों से रिलीज होने वाली फिल्मों का भारी विरोध जारी है। इस कारण कई बड़े बजट और नामी प्रोडक्शन हाउस की फिल्में बॉक्स ऑफिस पर धाराशायी हो चुकी हैं। इसके बावजूद हिंदू देवी-देवताओं का मजाक बनाने का सिलसिला उर्दूवुड में रूक नहीं रहा है।
अजय देवगन की आगामी फिल्म Thank God का शुक्रवार (9 सितंबर 2022) ट्रेलर रिलीज हुआ। इसके एक सीन में अजय देवगन खुद को हिंदू देवता चित्रगुप्ता बता रहे हैं और सामने वाले के कर्मों के हिसाब-किताब की बात कर रहे हैं।
बता यहाँ तक तो ठीक है, लेकिन अंदाज में वो फिल्म में डायलॉग बोल रहे हैं, वह उनका मजाक उड़ाने जैसा है। इतना ही नहीं, जब अजय देवगन खुद चित्रगुप्त बता रहे होते हैं, उस समय उनके अगल-बगल अधनंगी लड़कियाँ खड़ी रहती हैं।
T-Series के बैनर तले इस फिल्म को इंद्र कुमार, अशोक ठकेरिया, आनंद पंडित, मकरंद अधिकारी, सुनील खेत्रपाल आदि नेे प्रोड्यूस किया है। फिल्म को डायरेक्ट इंद्र कुमार ने किया है। इस फिल्म को आकाश कौशिक और मधुर शर्मा ने लिखा है। वहीं, इसके गाने के बोल मनोज मुंतशिर, रश्मि-विराग, समीर आदि ने लिखा है। फिल्म 25 अक्टूबर को रिलीज होने वाली है।
फिल्म का ट्रेलर रिलीज के साथ ही सोशल मीडिया पर इसकी आलोचना शुरू हो गई है। सोशल मीडिया यूजर्स फिल्म में देवी-देवताओं का मजाक उड़ाने के लिए फिल्म के संवाद लेखक और डायरेक्टर-प्रोड्यूसर को जमकर कोस रहे हैं। लोग इस फिल्म के साथ-साथ बॉलीवुड का बॉयकाट करने की अपील कर रहे हैं।
sudhirshiv567 नाम के एक ट्विटर हैंडल ने ट्रेलर के एक हिस्से को ट्विटर पर साझा करते हुए लिखा, “क्या बॉलीवुड के लिए हिंदू देवता मज़ाक, अश्लीलता के लिए हैं? Thank God में अजय देवगन भगवान चित्रगुप्त बने हैं, जिनके पीछे कम कपड़े पहने लड़कियाँ हैं। वह वासना, घटिया जोक्स पर चर्चा कर रहे हैं। क्या हिंदू देव मसखरे होते हैं? #BoycottbollywoodCompletely”
वहीं, gemsofbollywood नाम के ट्विटर हैंडल ने लिखा, “ये नहीं सुधरेंगे। #Urduwood का सर्वनाश करके ही छोड़ेंगे ये भस्मासुर। दो चार संवाद जन्नत और वहाँ के हूर समुदाय पर भी मार देते। सनातन धर्म से इतनी घृणा कहाँ से लाते हैं? चित्रगुप्त की पूजा होती है, विशेषतः कायस्थ समाज में। निर्देशक इंद्र ईरानी तथा टी सीरीज का और एक कचरा।”
ये नहीं सुधरेंगे. #Urduwood का सर्वनाश करके ही छोड़ेंगे ये भस्मासुर.
दो चार संवाद जन्नत और वहाँ के हूर समुदाय पर भी मार देते.
सनातन धर्म से इतनी घृणा कहाँ से लाते हैं? चित्रगुप्त की पूजा होती है, विशेषतः कायस्थ समाज में.
— Gems of Bollywood बॉलीवुड के रत्न (@GemsOfBollywood) September 9, 2022
एक अन्य ट्विटर यूजर ने लिखा, “ऐसा लगता है कि वे जानबूझकर हिंदुओं की भावनाओं का मजाक उड़ाने की कोशिश कर रहे हैं। मौजूदा हालात में ऐसी फिल्म को रिलीज करने का क्या मतलब है? माफी भूल जाओ, वे और भी खराब हो गए।”
बता दें कि बॉलीवुड के इस रवैए को लेकर लगभग एक साल से हिंदी फिल्म इंडस्ट्री का सोशल मीडिया पर बॉयकाट अभियान चलाया जा रहा है। इस अभियान का ये परिणाम हुआ कि पिछले एक साल में रिलीज हुई सारी फिल्में बॉक्स ऑफिस पर औंधे मुँह गिर गईं। इसमें ‘कश्मीर फाइल्स’ और ‘रॉकेट्री द नंबी इफेक्ट’ ही अपवाद हैं, क्योंकि यूजर्स ने इन्हें जबरदस्त तरीके से प्रमोट किया था।
बॉयकाट अभियान के कारण जो फिल्में बॉक्स ऑफिस पर नाकाम हुईं, उनमें आमिर खान और करीना कपूर अभिनीत लाल सिंह चड्ढा, शाहरुख खान अभिनीत पठान, अक्षय कुमार की सम्राट पृथ्वीराज और रक्षाबंधन, आलिया भट्ट की गंगूबाई काठियावाड़ी, रणवीर कपूर की शमशेरा, तापसी पन्नू की दोबारा और धाकड़ प्रमुख हैं।
रणबीर कपूर और आलिया भट्ट की फिल्म ‘ब्रह्मास्त्र’ को एक ओर तगड़ा झटका लगा है। फिल्म रिलीज के पहले ही दिन ऑनलाइन लीक हो चुकी है। फिल्म शुक्रवार (9 सितंबर 2022) को रिलीज हुई और रिलीज के कुछ ही घंटों के बाद ये इंटरनेट पर लीक हो गई है। फिल्म में रणबीर कपूर और आलिया भट्ट पहली बार एक-साथ स्क्रीन शेयर कर रहे हैं।
एबीपी न्यूज की एक रिपोर्ट के मुताबिक। फिल्म ‘ब्रह्मास्त्र’ तमिलरॉकर्स (Tamilrockers), मूवी रूल्स (Movierulz), फिल्मी जिला (Filmyzilla), 123 मूवीस (123movies), टेलीग्राम (Telegram) और टोरेंट साइट्स (Torrent Sites) जैसे प्लेटफॉर्म्स पर HD क्वालिटी में उपलब्ध है। इस फिल्म का भी पायरेसी का शिकार हो जाना निर्माताओं के लिए किसी बड़ी मुसीबत से कम नहीं है।
बताया जा रहा है कि इन तमाम वेबसाइट्स पर इस फिल्म से पहले हाल ही में रणबीर की ‘शमशेरा’, आमिर खान की ‘लाल सिंह चड्ढा’, अक्षय कुमार की ‘रक्षा बंधन’ और विजय देवरकोंडा की ‘लाइगर ‘जैसी कई बड़ी-बड़ी फिल्में भी लीक हुई थी। लीक होने के कारण भी इन तमाम मेगा बजट वाली फिल्मों को भारी नुकसान का भी सामना करना पड़ा था।
यदि ‘ब्रह्मास्त्र’ की बात करें तो इस फिल्म का बजट 410 करोड़ रुपए बताया जा रहा है, ऐसे में फिल्म निर्माताओं को भारी-भरकम नुकसान हो सकता है। बता दें बड़े बजट के साथ-साथ इस फिल्म को पूरा होने में भी लगभग 10 साल का समय लग गया। फिल्म निर्देशक आयान मुखर्जी का ये ड्रीम प्रोजेक्ट माना जाता है।
गौरतलब है कि फिल्म रिलीज से पहले भी कई बड़े विवादों के बीच फँसी हुई थी। इसमें सबसे बड़ा रोल बॉयकोट ट्रेंड ने निभाया। इसी क्रम में हाल ही में रणबीर कपूर, आलिया भट्ट और निर्देशक आयान मुखर्जी उज्जैन पहुँचे तो उनका हिंदू संगठनों ने भी खूब विरोध किया। इसके बाद फिल्म आखिरकार 9 सितंबर को बड़े पर्दे पर उतरीं तो उसे फिल्म समीक्षकों का भी अच्छा रिस्पॉन्स नहीं मिला।
आपको बताते चलें कि फिल्म ‘ब्रह्मास्त्र’ में रणबीर कपूर (Ranbir Kapoor), आलिया भट्ट (Alia Bhatt) के अलावा अभिनेता अमिताभ बच्चन, मौनी रॉय, नागार्जुन और सौरभ गुर्जर जैसे नामी चेहरे भी दिखाई दे रहे हैं। इन सब के अलावा फिल्म में अभिनेता शाहरुख खान का भी कैमियो है। फिल्म के निर्माता करण जौहर हैं। अब इस फिल्म के लीक होने की खबर आग की तरह सोशल मीडिया पर फैल चुकी है।
हाल में कई रिपोर्टें आई हैं जो बताती हैं कि नेपाल-भारत सीमा पर तेजी से डेमोग्राफी में बदलाव हो रहा है। मस्जिद-मदरसों की संख्या लगातार बढ़ रही है। जमीनी हालात का जायजा लेने के लिए 20 से 27 अगस्त 2022 तक ऑपइंडिया की टीम ने सीमा से सटे इलाकों का दौरा किया। हमने जो कुछ देखा, वह सिलसिलेवार तरीके से आपको बता रहे हैं। इस कड़ी की सातवीं रिपोर्ट:
भारत नेपाल सीमा पर उत्तर प्रदेश का जिला बलरामपुर मौजूद है। इसी जिले की जरवा सीमा से हम नेपाल के दांग जिले में प्रवेश किए थे। इस जिले में श्रावस्ती रोड पर नेपाल सीमा की रखवाली करने वाली पैरामिलिट्री SSB (सशस्त्र सीमा बल) का बेस कैम्प है। सबसे पहले हमने इस जिले के शहरी क्षेत्रों की जानकारी जुटाई।
यह रिपोर्ट एक सीरीज के तौर पर है। इस पूरी सीरीज को एक साथ पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।
शहर में घुसते ही मस्जिदें
गोंडा रोड से आते हुए जब हम बलरामपुर शहर में घुसे, तब हमें चीनी मिल दूर से दिखी। यह क्षेत्र भगवतीगंज इलाके में आता है, जहाँ हमें सड़क पर ही मस्जिदें दिखाई देने लगीं। इसी इलाके के रहने वाले नीरज तिवारी ने हमें बताया कि शहर में कई इलाके मुस्लिम बाहुल्य हैं, जिसमें सबसे ज्यादा चर्चित नाम बलुहा मोहल्ले का है। गौरतलब है कि बलुआ मोहल्ले में ही सितम्बर 2020 में अकरम नाम के व्यक्ति के घर में हुए ब्लास्ट में एक मकान जमींदोज हो गया था और जन-धन की हानि हुई थी।
भगवती गंज इलाके में बनी मस्जिद
अभी हम भगवतीगंज इलाके में ही थे और अधिकतम 500 मीटर ही आगे बढ़े होंगे कि हमें दूसरी मस्जिद सड़क के किनारे दिखाई दी। इस मस्जिद से थोड़ी ही दूर पर पुलिस चौकी भगवतीगंज है। यहाँ से पास ही श्रीदत्त गंज बाजर जाने के लिए सड़क गई है।
भगवतीगंज इलाके की दूसरी मस्जिद
हनुमान गढ़ी मंदिर पर अवैध कब्ज़ा
ऑपइंडिया की टीम बलरामपुर शहर के ठीक मध्य में मौजूद हनुमान गढ़ी मंदिर पहुँची। इस मंदिर के महंत महेंद्र दास जी महराज हैं, जो अयोध्या के प्रसिद्ध संत कमलनयन दास जी महराज के उत्तराधिकारी हैं। यह मंदिर सीधे अयोध्या की छोटी छावनी नाम के धर्मस्थल से संबंधित है।
हमने यहाँ के प्रबंधक नरेश सिंह से बात की तो उन्होंने बताया कि कभी इस मंदिर की जमीनों पर मुस्लिमों का अवैध अतिक्रमण हुआ करता था, जो अभी भी है लेकिन पहले के मुकाबले काफी कम। नरेश सिंह ने यह भी कहा कि मंदिर से ठीक सटी 2 दुकानें अभी भी मुस्लिमों की हैं, जिस पर कोर्ट में मुकदमा लंबित है। इसमें से एक का नाम बदरुद्दीन है और दूसरा काजू होटल वाला है।
हनुमान गढ़ी मंदिर बलरामपुर
मंदिर में फेंकी जाती थीं हड्डियाँ
बलरामपुर के सामाजिक कार्यकर्ता पवन शुक्ला ने हमें बताया कि योगी सरकार आने के बाद और मंदिर के महंत के संघर्ष के चलते मुख्य शहर में अवैध कब्ज़े की शिकार कई जमीनें वापस मिल चुकी हैं। पवन शुक्ला ने यह भी कहा कि कभी पूर्व सांसद मुन्नन खां ने इस मंदिर के मुख्य गेट पर अजमेरी होटल नाम से दुकान खुलवाई थी और बाद में वहाँ अपना ऑफिस बनवा लिया था।
पवन शुक्ला के मुताबिक तब मंदिर के अंदर अजमेरी होटल में बनने वाले नॉनवेज की हड्डियाँ फेंकी जाती थीं। पवन शुक्ला के मुताबिक अब काफी कुछ बदलाव आया है।
मंदिर के इस हिस्से पर अभी भी अवैध कब्ज़े का आरोप
मंदिर के महंत शासन से माँग चुके हैं सुरक्षा
हनुमान गढ़ी मंदिर के महंत महेंद्र दास जी महराज शासन को कई बार अपनी सुरक्षा बढ़ाने का पत्र भेज चुके हैं। हमें मंदिर के मुख्य गेट पर होमगार्ड के 2 जवान भी तैनात मिले। मंदिर के लगभग 1 किलोमीटर परिधि में लगभग आधे दर्जन मस्जिदें और मदरसे हैं।
हनुमान गढ़ी मंदिर की दूसरी तरफ मंदिर की ही एक धर्मशाला भी है। मंदिर के प्रबंधक नरेश सिंह के मुताबिक कभी उस धर्मशाला के भी एक हिस्से पर कुछ मुस्लिमों का कब्ज़ा था, जिसे हटवाने के लिए लम्बी कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ी थी।
झारखंडी मंदिर के सरोवर में कर्बला
वीर विनय चौराहा बलरामपुर से जैसे ही हम SSB कैम्प जाने वाली रोड पर आगे बढ़े, वैसे ही रेलवे लाइन पार करते ही हमें सड़क के बगल में झारखंडी मंदिर दिखा। इस मंदिर से ठीक सटा एक बड़ा तालाब है जिसे स्थानीय लोगों ने झरखंडी सरोवर बताया।
झारखंडी मंदिर में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ दिखाई दी। यहाँ मुख्य रूप से महादेव शिव की पूजा की जाती है। हमें झारखंडी सरोवर के पास हरे रंग के झंडे लगे दिखाई दिए।
झारखंडी सरोवर और वहाँ लहराते हरे झड़े
ऑपइंडिया से बात करते हुए स्थानीय सामाजिक कायर्कता पवन शुक्ला ने बताया कि सभी कागजों में यह जगह झारखंडी सरोवर के तौर पर दर्ज है लेकिन यहाँ कर्बला बना दिया गया है। पवन शुक्ल के मुताबिक हर साल यहाँ ताजिए दफन किए जाते हैं। शुक्ला के अनुसार ऐसा क्यों और किसके आदेश से हो रहा है, ये उन्हें भी नहीं मालूम। बलरामपुर के ही रहने वाले ओमकार तिवारी के मुताबिक सरकारों के हिसाब से कुछ लोगों ने अपने प्रभुत्व को कायम रखा।
अन्य मार्गों पर भी मस्जिदें
झारखंडी मंदिर रेलवे स्टेशन से महज कुछ ही दूरी पर स्थित है। बलरामपुर शहर में तुलसीपुर रोड पर भी हमें मुस्लिम समुदाय के लोगों की कार मैकेनिक आदि की कई दुकानें और मस्जिदें दिखाई दीं। SSB कैम्प से 2 किलोमीटर की परिधि में भी हमें लगभग आधे दर्जन मस्जिदों की मीनारें दिखाई दीं।
हाल ही में, कर्नाटक वक्फ बोर्ड ने बेंगलुरु के ईदगाह मैदान में गणेशोत्सव के लिए तय किए गए स्थान पर आपत्ति जताते हुए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। इसके बाद, सुप्रीम कोर्ट ने भी ईदगाह मैदान में गणेशोत्सव कार्यक्रम की अनुमति नहीं दी। इस मामले ने, एक कथित धर्मनिरपेक्ष देश में वक्फ की प्रचलित प्रथा और इसे लगातार बनाए रखने वाले वक्फ बोर्ड के कामकाज पर पूरे देश का ध्यान आकर्षित किया है।
गौरतलब है, बृहत बेंगलुरु महानगर पालिका (बीबीएमपी) ने दावा किया था कि ईदगाह की जमीन सरकारी है और इसे किसी मुस्लिम संगठन को हस्तांतरित नहीं किया गया था। लेकिन, वक्फ बोर्ड ने दावा किया कि यह 1850 के दशक से ही वक्फ की संपत्ति है। साथ ही यह भी कहा कि एक बार जो संपत्ति वक्फ की हो गई, वह हमेशा के लिए वक्फ की ही रहेगी।
वक्फ बोर्ड के वकील दुष्यंत दवे ने कोर्ट में तर्क दिया था कि वक्फ अधिनियम एक अधिभावी कानून है, जिस पर कोई भी कानूनी प्रक्रिया नहीं हो सकती। इसलिए न्यायालय वक्फ संपत्ति पर आदेश पारित नहीं कर सकता है। इसके बाद, सुप्रीम कोर्ट ने गणेशोत्सव की अनुमति देने से इनकार करते हुए ईदगाह मैदान पर यथास्थिति रखने का आदेश दिया।
वक्फ क्या है?
आपके मन में यह सवाल जरूर उठ रहा होगा कि आखिर वक्फ है क्या? इस्लाम के अनुसार, वह संपत्ति जो केवल मजहबी या मजहब के उद्देश्यों के लिए उपलब्ध हो, वह वक्फ है। ऐसी संपत्ति का कोई अन्य उपयोग या बिक्री नहीं की जा सकती है। शरिया कानून के अनुसार, एक बार वक्फ की स्थापना हो जाने के बाद संपत्ति वक्फ को समर्पित कर दी जाती है। इसके बाद, यह हमेशा के लिए वक्फ संपत्ति के रूप में बनी रहती है। यही नहीं, शरिया के अनुसार, वक्फ संपत्ति स्थायी रूप से अल्लाह को समर्पित होती है।
आसान भाषा मे कहें तो ‘वक्फ’ वह व्यक्ति है, जो लाभार्थी के लिए वक्फ बनाता है। यानी कि वक्फ संपत्ति अल्लाह को दी जाती है। हालाँकि, अल्लाह भौतिक रूप से उपस्थित नहीं होता है, इसलिए वक्फ़ की संपत्ति की व्यवस्था या प्रबंधन करने के लिए एक व्यक्ति जिसे मुतवल्ली कहा जाता है, को नियुक्त किया जाता है।
भारत में वक्फ और वक्फ बोर्डों का इतिहास
भारत में, वक्फ का इतिहास दिल्ली सल्तनत के शुरुआती दिनों से ही माना जाता है। सुल्तान मुइज़ुद्दीन सैम घोर ने मुल्तान की जामा मस्जिद के पक्ष में दो गाँव समर्पित किए और इसका प्रशासन शेखुल इस्लाम को सौंप दिया। जैसे-जैसे दिल्ली सल्तनत और बाद में इस्लामी राजवंश भारत में फले-फूले, भारत में वक्फ संपत्तियों की संख्या बढ़ती चली गई।
19वीं शताब्दी के अंत में हालाँकि भारत में वक्फ की समाप्ति का भी एक मामला सामने आया था। उस दौरान, ब्रिटिश शासन के समय में लंदन की प्रिवी काउंसिल में एक वक्फ संपत्ति पर विवाद शुरू हुआ था। इस मामले की सुनवाई करने वाले चार ब्रिटिश न्यायाधीशों ने वक्फ को “सबसे खराब और सबसे हानिकारक” बताते हुए अमान्य घोषित कर दिया था।
भारत में इस निर्णय को स्वीकार नहीं किया गया और 1913 के मुसलमान वक्फ मान्यकरण अधिनियम ने भारत में वक्फ को बचा लिया था। इसके बाद से अब तक वक्फ पर अंकुश लगाने का कोई प्रयास नहीं किया गया है। यही कारण है, वक्फ बोर्ड अब सशस्त्र बलों और भारतीय रेलवे के बाद भारत में तीसरा सबसे बड़ा भूमि मालिक है।
वास्तव में, वोट बैंक की राजनीति के चलते देश की आजादी से बाद से वक्फ को लगातार पोषण मिलता रहा है और यह साल दर साल मजबूत होता चला गया। नेहरू सरकार द्वारा पारित वक्फ अधिनियम 1954 ने वक्फों के केंद्रीयकरण की दिशा में एक रास्ता बनाया था। यही नही, भारत सरकार द्वारा 1954 के इसी वक्फ अधिनियम के तहत साल 1964 में सेंट्रल वक्फ काउंसिल ऑफ इंडिया की स्थापना की गई थी।
तत्कालीन भारत सरकार द्वारा स्थापित किया गया सेंट्रल वक्फ काउंसिल ऑफ इंडिया एक केंद्रीय संस्था है। यह संस्था विभिन्न राज्य के वक्फ बोर्डों के काम की देखरेख करता है, जो वक्फ की धारा 9 (1) के प्रावधानों के तहत स्थापित किए गए थे। 1954 वक्फ अधिनियम को साल 1995 में मुस्लिमों के लिए और भी अधिक अनुकूल बनाया गया। इसके बाद से यह एक अधिभावी कानून है और इस पर कोई विधायी शक्तियाँ काम नहीं कर सकती हैं। एडवोकेट दवे ने भी कोर्ट में यही तर्क दिया।
वक्फ अधिनियम 1995
22 नवंबर 1995 को वक्फ अधिनियम 1995 लागू किया गया। यह अधिनियम वक्फ परिषद, राज्य वक्फ बोर्डों और मुख्य कार्यकारी अधिकारी की शक्ति और कार्यों के साथ-साथ मुतवल्ली के कामकाज को भी देखता है।
यह अधिनियम एक वक्फ ट्रिब्यूनल की शक्ति और प्रतिबंधों का भी वर्णन करता है, जो अपने अधिकार क्षेत्र के तहत एक सिविल कोर्ट की तरह कार्य करता है। वक्फ ट्रिब्यूनल को एक सिविल कोर्ट माना जाता है और सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के तहत एक सिविल कोर्ट द्वारा प्रयोग की जाने वाली सभी शक्तियों का उपयोग और कार्यों को करने की क्षमता रखता है।
वक्फ ट्रिब्यूनल ऐसा है कि इसका निर्णय अंतिम और सभी पक्षों पर बाध्यकारी होगा। इस अधिनियम के तहत अगर कोई भी मसला वक्फ ट्रिब्यूनल द्वारा निर्धारित किया जाना है तो वो विवाद या कानूनी कार्यवाही किसी दीवानी अदालत के अधीन नहीं जा सकती है। सीधे शब्दों में कहें तो वक्फ ट्रिब्यूनल के फैसले किसी भी सिविल कोर्ट से ऊपर हैं।
एक बार वक्फ की संपत्ति, हमेशा के लिए वक्फ की संपत्ति
वक्फ के मामले में संपत्ति का स्वामित्व वक्फ से अल्लाह को ट्रांसफर किया जाता है। और कोई भी संपत्ति अल्लाह से वापस नहीं ली जा सकती है। इसलिए एक बार संपत्ति वक्फ बन जाने के बाद, यह हमेशा वक्फ रहेगी और इसका मालिक अल्लाह होगा लेकिन उपयोग वक्फ बोर्ड करेगा।
ठीक ऐसा ही बेंगलुरु ईदगाह मैदान के मामले में भी देखा गया। भले ही सरकार के अनुसार किसी भी मुस्लिम संगठन को इस भूमि का मालिकाना हक नहीं दिया गया है। लेकिन, वक्फ का दावा है कि यह 1850 के दशक से वक्फ की संपत्ति थी, इसका मतलब है कि यह अब हमेशा के लिए वक्फ संपत्ति है।
(फोटो साभार: वक्फ वेबसाइट)
हाल ही में, गुजरात वक्फ बोर्ड ने सूरत नगर निगम की बिल्डिंग पर दावा पेश किया था, जो अब वक्फ की संपत्ति है क्योंकि इस बिल्डिंग से जुड़े किसी भी दस्तावेज को अपडेट नहीं किया गया था। वक्फ के अनुसार, मुगल काल के दौरान, सूरत नगर निगम की इमारत एक होटल थी और हज यात्रा के दौरान इस्तेमाल की जाती थी। ब्रिटिश शासन के दौरान संपत्ति तब ब्रिटिश साम्राज्य की थी। हालाँकि, जब साल 1947 में भारत को स्वतंत्रता मिली, तब संपत्तियों को भारत सरकार को हस्तांतरित कर दिया गया था। लेकिन, जैसा कि ऊपर भी बताया गया है कि दस्तावेजों को अपडेट नहीं किया गया था, इसलिए यह सूरत नगर निगम की इमारत वक्फ बोर्ड के पास चली गई।
वक्फ बोर्ड सम्पत्ति पर दावा करने के मामले में कभी पीछे नहीं रहा। दिव्य भास्कर ने बताया था कि वक्फ बोर्ड ने देवभूमि द्वारका में दो द्वीपों के स्वामित्व पर दावा करते हुए गुजरात हाईकोर्ट में अपील की थी। इस पर हाई कोर्ट के जज ने हालाँकि सुनवाई करने से इनकार कर दिया था। साथ ही, कोर्ट ने वक्फ बोर्ड से अपनी याचिका को संशोधित करने के लिए भी कहा था।
वक्फ का एक और दिलचस्प पहलू यह है कि यदि आपकी हाउसिंग सोसाइटी के किसी अपार्टमेंट का मालिक अपने अपार्टमेंट को वक्फ बोर्ड के नाम करता है तो वह अपार्टमेंट किसी भी दिन समाज के अन्य सदस्यों की इजाजत या बातचीत के बिना ही मस्जिद में बदल सकता है। कुछ ऐसा ही सूरत की शिव शक्ति सोसाइटी में हुआ था। वहाँ, एक प्लॉट के मालिक ने गुजरात वक्फ बोर्ड में अपना प्लॉट रजिस्टर कराया, जिससे वह मुसलमानों के लिए ‘पवित्र’ स्थान बन गया और लोग वहाँ नमाज पढ़ने लगे।
एक धर्मनिरपेक्ष देश में क्या कर रहा है वक्फ?
केवल एक मजहब की मजहबी संपत्तियों के लिए एक विशेष अधिनियम होना बेहद अजीब लगता है। साथ ही, तब जबकि देश को धर्मनिरपेक्ष देश कहा जाए और बाकी धर्मों की सम्पत्तियों के साथ भेदभाव हो। दरअसल, एडवोकेट अश्विनी कुमार उपाध्याय ने यही सवाल पूछते हुए फिलहाल दिल्ली हाई कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की है। वक्फ की संवैधानिक वैधता को लेकर इस याचिका पर दिल्ली हाई कोर्ट ने केंद्र सरकार को नोटिस भी जारी किया है।
गौरतलब है कि इस्लामी देश तुर्की, लीबिया, मिस्र, सूडान, लेबनान, सीरिया, जॉर्डन, ट्यूनीशिया और इराक में वक्फ मौजूद नहीं है। लेकिन भारत में वोट-बैंक की राजनीति के चलते न केवल वक्फ बोर्ड सबसे बड़ा शहरी जमींदार है, बल्कि उसके पास कानूनी रूप से उनकी रक्षा करने वाला एक अधिनियम भी है।
इस लेख की मूल कॉपी OpIndia पर प्रकाशित हुई है। इसका अनुवाद आकाश शर्मा ‘नयन’ ने किया है।
कॉमेडियन का ढोंग करने वाले प्रोपेगेंडानिस्ट कुणाल कामरा (Kunal Kamra) के शो को हरियाणा के गुरुग्राम (Gurugram) प्रशासन ने रद्द कर दिया है। विश्व हिंदू परिषद (VHP) और बजरंग दल (Bajrang Dal) जैसे हिंदू संगठनों के विरोध और चेतावनी के बाद प्रशासन ने यह कदम उठाया है।
विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल ने शुक्रवार (9 सितंबर 2022) को गुरुग्राम के डिप्टी कमिश्नर को पत्र लिखकर कामरा के 17-18 सितंबर के शो को रद्द करने की माँग की थी। पत्र में कहा गया है कि कुणाल कामरा अपने शो में हिंदू देवताओं का मजाक उड़ाते हैं। अगर उनके शो को अनुमति दी गई तो जिले में तनाव पैदा हो सकता है।
VHP today given a letter to the @DC_Gurugram to cancel the show of AntiHindu Kunal Kamra scheduled in Gurugram on 17th of this month. These hatemongers must be booked under panel provisions of law. Can't be allowed to perform in public. The @gurgaonpolice sud take action. pic.twitter.com/jbLWPX4IRU
कुणाल कामरा को 17 और 18 सितंबर को गुरुग्राम के सेक्टर 29 के स्टूडियो Xo बार में परफॉर्म करना था। बार ने 29 अगस्त को अपने इंस्टाग्राम हैंडल पर इसकी जानकारी साझा की थी। बार ने उसमें शो के समय और टिकट की डिटेल देते हुए ‘कुणाल कामरा लाइव’ नाम से पोस्टर जारी किया था।
ज्ञापन में कहा गया था कि कुणाल कामरा पर अपने शो में हिंदू देवी-देवताओं का मजाक उड़ाने के कारण पहले भी एफआईआर हो चुकी है। इस शो के कारण इलाके में तनाव उत्पन्न हो सकता है। इसलिए कामरा के शो को तत्काल प्रभाव से रद्द किया जाए। अगर ऐसा नहीं किया जाता है तो विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल इसका विरोध करेंगे।
बता दें कि कुणाल कामरा (Kunal Kamra) ने अपने नए ‘कॉमेडी’ शो ‘बी लाइक’ में भारत के सर्वोच्च न्यायालय पर मार्च में अपमानजनक टिप्पणी की थी। सुप्रीम कोर्ट में उनके खिलाफ अवमानना चल रहे केस को लेकर कामरा ने कहा, “प्रिय सुप्रीम कोर्ट! कल की बातें भूल जा, ल*ड़ा पकड़ के झूल जा।”
सुप्रीम कोर्ट के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी करने से पहले कामरा ने कहा था कि उनके मन में शीर्ष न्यायालय से अधिक सम्मान शॉपिंग मॉल के फूड कोर्ट के लिए है। उन्होंने आगे आरोप लगाया कि सुप्रीम कोर्ट ‘ब्राह्मण बनिया’ का मामला है और यह विभिन्न संस्कृतियों का प्रतिनिधित्व नहीं करता है।
कामरा ने कहा था, “देश का सर्वोच्च न्यायालय, जिसे मैं भी नहीं मानता… मैं एक शॉपिंग मॉल के फूड कोर्ट का अधिक सम्मान करता हूँ … कम से कम यह विभिन्न संस्कृतियों का प्रतिनिधित्व करता है। देश का सर्वोच्च न्यायालय ‘ब्राह्मण-बनिया’ का मामला है। मैं इसका सम्मान नहीं करता।”
सुप्रीम कोर्ट ने दिसंबर 2020 में कुणाल कामरा को एक लिबरल ‘हीरो’ या ‘शहीद’ बनने की कोशिश में न्यायपालिका के खिलाफ अवमानना वाली टिप्पणी करने के बाद कार्रवाई को लेकर एक नोटिस जारी किया था। अपने एक ट्वीट में उन्होंने तत्कालीन सीजेआई अरविंद बोबडे को अपनी मध्यमा उंगली दिखाई थी और दूसरे ट्वीट में उन्होंने सुप्रीम कोर्ट को भगवा रंग में रंगते हुए आरोप लगाया था कि यह एनडीए सरकार की कठपुतली बन गई है।
इसके बाद कामरा ने जर्मनी में प्रधानमंत्री नरेंद्र (PM Modi) को देशभक्ति गीत सुनाने वाले बच्चे का मजाक बनाया था। इस पर मई में राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) ने कुणाल कामरा द्वारा शेयर किए गए मॉर्फ्ड वीडियो पर संज्ञान लिया था।
एनसीपीसीआर ने ट्विटर इंडिया को पत्र लिखकर कामरा के खिलाफ सख्त कार्रवाई की माँग करते हुए फर्जी वीडियो को तत्काल सोशल मीडिया से हटाने के लिए कहा है। इसके अलावा कामरा की शिकायत पुलिस से भी की है। एनसीपीसीआर ने कहा कि कथित कॉमेडियन ने ट्विटर पर अपने राजनीतिक एजेंडे के लिए ऐसा किया है।
पंजाबी सिंगर हनी सिंह और उनकी पत्नी शालिनी तलवार के बीच शादी का रिश्ता अब कागजी तौर पर भी खत्म हो गया है। शालिनी बीते कुछ समय से लगातार हनी सिंह और उनके परिवार पर उत्पीड़न का आरोप लगा रही थीं। धीरे-धीरे दोनों के बीच दूरियाँ बढ़ती गईं और आखिरकार दोनों ने अलग होने का फैसला लिया।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, रैपर हनी सिंह (Yo Yo Honey Singh) के ख़िलाफ़ उनकी पत्नी शालिनी तलवार ने घरेलू हिंसा का मुकदमा 3 अगस्त, 2022 को दायर करवाया था। शालिनी ने तब ‘द प्रोटेक्शन ऑफ वुमन फ्रॉम डोमेस्टिक वायलेंस एक्ट’ के तहत दिल्ली की तीस हजारी कोर्ट में याचिका दी। इसके बाद कोर्ट ने हनी सिंह के ख़िलाफ़ नोटिस जारी किया था। तलाक के लिए सेटलमेंट के रूप में हनी सिंह द्वारा पूर्व पत्नी को एक करोड़ रुपए दिए जाने की भी खबर है।
बाद में दोनों के बीच आरोप-प्रत्यारोप और समझौतों का दौर भी चला, लेकिन अब खबर आ रही है कि गुरुवार (8 सितंबर, 2022) को दोनों का औपचारिक तलाक हो गया है। जानकारी यह भी मिली है कि इस केस में अगले प्रस्ताव को लेकर सुनवाई 20 मार्च, 2023 को होगी। हनी और शालिनी की शादी साल 2011 में हुई थी और यह एक लव मैरिज थी। दोनों स्कूल लाइफ से ही एक दूसरे को प्यार करते थे।
गौरतलब है कि पिछले साल शालिनी ने अपनी याचिका में हनी सिंह और उनके परिवार पर बहुत से गंभीर आरोप लगाए थे। इसमें हनी सिंह के माता पिता और उनकी बहन का भी नाम शामिल किया गया था। शालिनी ने कोर्ट में कई घटनाओं का जिक्र किया है जब उनके साथ ज्यादती हुई। उन्होंने बताया कि उन्हें मारा पीटा जाता रहा, उनके बाल खींचे गए, दीवार में सिर मारा गया।
उन्होंने ये भी बताया कि उन्हें हनी सिंह से शादी के बाद कभी घर में आने वाला कोई पैसा नहीं मिला और सब कुछ सिंगर के माता पिता पर जाता था। इसके साथ-साथ शालिनी ने हनी सिंह के पिता पर आरोप लगाया कि एक बार जब शालिनी कपड़े बदल रही तो उनके ससुर कमरे में घुस गए और उनको गलत तरीके से छूने लगे।
शालिनी तलवार के मुताबिक, उनके पति हनी सिंह के शादी के बाद भी कई अन्य महिलाओं के साथ भी शारीरिक संबंध रहे चुके हैं। वहीं शालिनी ने यह भी आरोप लगाया था कि हनी उनके साथ जानवरों जैसा बर्ताव भी करते थे। बता दें सिंगर हनी सिंह ने भी इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहा था कि उन्हें बदनाम करने के लिए ये आरोप लगाए जा रहे हैं।
सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) शुक्रवार (9 सितम्बर, 2022) को पूजा स्थल अधिनियम, 1991 (Worship Act) को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई के लिए तैयार हो गया। शीर्ष अदालत ने कहा कि तीन न्यायाधीशों की पीठ 11 अक्टूबर को याचिकाओं पर सुनवाई करेगी। मुख्य न्यायाधीश यूयू ललित, जस्टिस रवींद्र भट और जस्टिस पीएस नरसिम्हा की पीठ ने केंद्र से दो सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने को कहा है।
ये याचिकाएँ अधिनियम के खिलाफ दायर की गई हैं। जमीयत उलेमा-ए-हिंद और ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल बोर्ड ने पूजा स्थल अधिनियम, 1991 की समीक्षा की माँग करने वाली याचिकाओं का विरोध करते हुए याचिकाएँ दायर की थीं। जमीयत ने शीर्ष अदालत से अपील की थी कि वह चुनौती देने वाली याचिकाओं के संबंध में नोटिस भी जारी न करे और उन्हें खारिज कर दे। जमीयत के मुताबिक, नोटिस जारी करने से मुस्लिमों में डर पैदा होगा।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, पीठ दिल्ली भाजपा के पूर्व प्रवक्ता अश्विनी उपाध्याय, भाजपा के राज्यसभा सांसद डॉ सुब्रमण्यम स्वामी और कुछ अन्य लोगों द्वारा पूजा स्थल अधिनियम 1991 को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर विचार कर रही है। आज की सुनवाई में जमीयत उलेमा-ए-हिंद (जो मामले में हस्तक्षेप करने की माँग कर रहा है) की ओर से पेश अधिवक्ता एजाज मकबूल ने कहा कि बाबरी मस्जिद-राम जन्मभूमि मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने कानून की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा है। वहीं उपाध्याय की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी ने कहा कि उन टिप्पणियों का ढिंढोरा पीटा गया था।
जमीयत की ओर से तर्क दिया कि अगर अदालत अधिनियम की समीक्षा करने के लिए सहमत होती है, तो देश में मस्जिदों के खिलाफ मुकदमों की बाढ़ आ जाएगी। दिलचस्प बात यह है कि ऐसे समय में जब श्री कृष्ण जन्मभूमि-शाही ईदगाह विवाद और ज्ञानवापी विवादित ढाँचे का मामला सुर्खियों में है, सुप्रीम कोर्ट पूजा स्थल अधिनियम, 1991 को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई के लिए सहमत हो गया है। गौरतलब है कि इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अगस्त 2022 में निचली अदालत को कृष्ण जन्मभूमि के विवादित हिस्से के सर्वेक्षण से संबंधित याचिका पर चार महीने के भीतर सुनवाई पूरी करने का निर्देश दिया था।
क्या है पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991
पीवी नरसिम्हा राव के नेतृत्व में कॉन्ग्रेस सरकार द्वारा लाए गए पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम में कहा गया है कि 15 अगस्त, 1947 तक अगर किसी धर्म का कोई पूजा स्थल है तो उसे दूसरे धर्म के पूजा स्थल में नहीं बदला जा सकता। कानून में इसके लिए एक से तीन साल तक की जेल और जुर्माना का प्रावधान किया गया है। इस कानून में अयोध्या को अलग रखा गया था, क्योंकि उस समय यह मामला कोर्ट में था।
इस कानून की धारा-2 में कहा गया है कि अगर 15 अगस्त, 1947 में मौजूद किसी धार्मिक स्थल में बदलाव को लेकर अगर किसी अदालत, न्यायाधिकरण या अन्य प्राधिकरण में कोई याचिका लंबित है तो उसे रद्द किया जाएगा। कानून की धारा-3 में कहा गया है कि किसी पूजा स्थल को पूरी तरह या आंशिक रूप से दूसरे धर्म के पूजा स्थल में नहीं बदला जा सकता है।
वहीं, इस कानून के धारा-4(1) में कहा गया है कि किसी भी पूजा स्थल का चरित्र देश की स्वतंत्रता के दिन का वाला ही रखना होगा। इस कानून का धारा-4(2) उन मुकदमों, अपीलों और कानूनी कार्यवाहियों पर रोक लगाता है, जो पूजा स्थल कानून के लागू होने की तिथि पर लंबित थे।
साल 1993 के मुंबई ब्लास्ट में फाँसी की सजा पाए याकूब मेमन (Yakub Memon) की कब्र पर मार्बल लगाने के मामले में एक नई बात सामने आ रही है। बड़ा कब्रिस्तान ट्रस्ट से जुड़े एक शख़्स ने कहा है कि अंडरवर्ल्ड माफिया टाइगर मेमन की धमकी के कारण कब्र पर मार्बल लगाकर सजाया गया।
टाइगर मेनन के नाम से बड़ा कब्रिस्तान के ट्रस्ट के पूर्व सदस्य जलील नवरंगे को धमकी दी गई थी। इसी कब्रिस्तान में याकूब मेमन का शव दफन किया गया है। धमकी देने वाले शख्स ने कहा था कि अगर कब्रिस्तान की इस जमीन को उसके नाम पर नहीं किया गया था उसके बुरे परिणाम होंगे। धमकी देने वाले ने खुद को टाइगर मेमन का चचेरा भाई बताया था।
टाइगर मेमन द्वारा दी गई धमकी में कहा गया, “याकूब भाई को तो शहादत नसीब हुई, मगर टाइगर भाई अभी जिंदा हैं। तुम लोग मेरा बड़ा कब्रिस्तान का काम करके दो, वरना टाइगर भाई को बोलकर तुम दोनों को ठिकाने लगवा दूँगा। तु नहीं जानता, टाइगर भाई क्या चीज हैं। वे आज तक किसी के हाथ नहीं आए। तुम दोनों को कब गायब कर देंगे, पता भी नहीं चलेगा। टाइगर भाई से फोन से बात कर अभी।”
धमकी के बाद दो पूर्व ट्रस्टी जलील नवरंगे और परवेज सरकारे ने साल 2020 में मुंबई पुलिस में इसकी शिकायत की थी। इसके साथ ही उन्होंने मुंबई पुलिस कमिश्नर, महाराष्ट्र एटीएस चीफ और बॉम्बे हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को भी इस धमकी के बारे में लिखा था।
खुद को टाइगर मेमन का चचेरा भाई बताने एआर मेमन नाम के उस शख्स ने नवरंगे को धमकी देने का काम लगातार जारी रखा। नवरंगे ने अपनी शिकायत में कहा कि उन्होंने धमकी देने वाले व्यक्ति से किसी भी तरह का गैर-कानूनी काम करने से इनकार कर दिया था।
नवरंगे के अनुसार, इसके बाद धमकी देने वाले एआर मेमन ने नवरंगे को जामा मस्जिद ऑफ बॉम्बे ट्रस्ट में बदनाम करने की धमकी दी। इतना ही नहीं, नवरंगे के खिलाफ ट्रस्ट में फर्जी शिकायत भी दर्ज करवाई। इसमें कहा गया था कि काम करने के बदले में ट्रस्ट के लोग पैसों की माँग कर रहे हैं।
उधर महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे (Eknath Shinde) ने कहा, “याकूब मेमन बॉम्बे ब्लास्ट का आरोपी है, उसे महिमामंडित नहीं किया जा सकता। हम ना इसे स्वीकार करेंगे और ना ऐसा होने देंगे। मैंने इसके बारे में BMC और मुंबई पुलिस को सूचित कर दिया है। गृह मंत्रालय उचित कार्रवाई करेगा।”
याकूब मेमन बॉम्बे ब्लास्ट का आरोपी है, उसे महिमामंडित नहीं किया जा सकता। हम ना इसे स्वीकार करेंगे और ना ऐसा होने देंगे। मैंने इसके बारे में BMC और मुंबई पुलिस को सूचित कर दिया है, गृह मंत्रालय उचित कार्रवाई करेगी: महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे pic.twitter.com/Ei8hddPPZr
बता दें कि आतंकवादी गतिविधियों में फाँसी की सजा पाए याकूब मेमन को महिमामंडित करने की कोशिश की जा रही थी। उसकी कब्र को आसपास लाइट और मार्बल आदि लगाकर उसे मजार बनाने की कोशिश की गई। मामला सामने आने के बाद काफी विवाद हुआ। हालाँकि, बाद में पुलिस ने मार्बल और लाइट को वहाँ से हटवा दिया।