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इस्लामी कट्टरपंथ पर पर्दा डालने का रिवाज पुराना, इसलिए ‘द कश्मीर फाइल्स’ से जले-भुने हैं लिबरल: जिंदा रहने के लिए ‘शठे-शाठ्यं समाचरेत’ की नीति जरूरी

निर्माता-निर्देशक विवेक अग्निहोत्री और उनकी पत्नी पल्लवी जोशी, अभिनेता अनुपम खेर आदि के सम्मिलित प्रयास से निर्मित बहुचर्चित फिल्म ‘द कश्मीर फाइल्स (The Kashmir Files)’ लीक से हटकर बनी है। इस कलाकृति में समाज को उसकी वास्तविक स्थिति से अवगत कराने और समय रहते सचेत होने का संदेश है। जो सामाजिक चिकित्सा-विज्ञानी, निर्देशक-कलाकार, राजनेता आदि समाज से उसके कैंसर को छुपाकर, लंबे समय से पर्दे पर कुछ और ही दिखा कर कश्मीर के कड़वे सच को दफन करने में व्यस्त रहे, वे आज सच उजागर होने से बौखलाए हुए हैं और असंगत प्रतिक्रियाएँ दे रहे हैं।

निर्देशक विनोद कापड़ी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से ट्विटर पर पूछते हैं कि वे गुजरात दंगों पर फिल्म बनाने जा रहे हैं, क्या प्रधानमंत्री प्रदर्शन की अनुमति देंगे? उनसे प्रतिप्रश्न है कि क्या फिल्म की अनुमति प्रधानमंत्री देते हैं? यदि नहीं, तो उनसे प्रश्न क्यों? और यदि हाँ, तो क्यों नहीं देंगे? उन्हें अवश्य देना चाहिए। गुजरात दंगों का सच सामने आना ही चाहिए। उसमें सबसे पहले यह भी दिखाया जाना चाहिए कि किस प्रकार एक समुदाय के लोगों ने योजना बनाकर दूसरे समुदाय के निर्दोष और निहत्थे 59 लोगों को साबरमती एक्सप्रेस के दो डिब्बों में जिंदा जलाकर मार डाला। जहाँ पाकिस्तान और बांग्लादेश में हिंदू अपने जान-माल की रक्षा तक नहीं कर पा रहे हैं, वहाँ भारतवर्ष में अल्पसंख्यक कहे जाने वाले मुस्लिम समुदाय के आपराधिक तत्व बहुसंख्यक हिंदुओं को जिंदा जलाने का जघन्य कृत्य कर रहे हैं। इनकी शक्ति और दुस्साहस का स्रोत क्या है? वे कौन सफेदपोश हैं, जिनके चुनाव में विजयी घोषित होने की संभावना अथवा सूचना मात्र से जेहादी मानसिकता अकस्मात आक्रमक हो उठती है? जिनके शपथ-ग्रहण करते ही दंगा भड़क उठता है? अब समय आ गया है कि इन प्रश्नों के उत्तर जितनी जल्दी समाज को मिल जाएँ उतना ही अच्छा है, क्योंकि अब भारतीय गैर-इस्लामिक जनता की सुरक्षा इन्हीं उत्तरों पर निर्भर है।

बुद्धिजीवियों, साहित्यकारों, कलाकारों, पत्रकारों, राजनेताओं, धर्मगुरुओं, शासन-प्रशासन में बैठे पदाधिकारियों, न्यायाधीशों आदि सार्वजनिक जीवन से जुड़े लोगों पर सारे समाज के संरक्षण और हित साधन का दायित्व होता है। अतः इनका किसी एक वर्ग-समूह के प्रति संवेदनशील बन जाना और दूसरे के हितों पर कठोर प्रहार देख कर भी चुप रहना, किसी भी दृष्टि से उचित नहीं कहा जा सकता। हमारा संविधान समानता और न्याय की स्थापना का शंखनाद करता हुआ सब की सुरक्षा के लिए प्रतिबद्धता दर्शाता है तथापि कश्मीर घाटी में हिंदुओं पर हुए अत्याचार के विरुद्ध विगत तीस-बत्तीस वर्षों में कहीं से भी कोई सशक्त स्वर मुखर नहीं हुआ। लाखों हिंदू हत्या, बलात्कार, लूट और आतंक के बल पर घाटी से पलायन को विवश कर दिए गए। उनकी संपत्तियों पर अवैध कब्जे कर लिए गए और एक भी अपराधी को सजा मिलना तो दूर उसके विरुद्ध एफआईआर तक दर्ज नहीं हुई। आखिर क्यों? यह अनुत्तरित प्रश्न हमारी तथाकथित धर्मनिरपेक्षता और न्याय व्यवस्था पर भी एक बड़ा प्रश्न चिन्ह है।

गुजरात दंगों और बाटला हाउस कांड में एनकाउंटर किए गए कुछ आतंकवादियों के पक्ष में जिन राजनेताओं और सामाजिक ठेकेदारों ने धरती-आसमान एक कर दिया उन्होंने पीड़ित कश्मीरी हिंदुओं के पक्ष में कभी सहानुभूति का एक शब्द तक नहीं कहा और आज जब ‘द कश्मीर फाइल्स‘ के रूप में कश्मीरी हिंदुओं की पीड़ा जनता-जनार्दन तक पहुँची है तो मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति करते हुए वोट बैंक को अपने पक्ष में करने के लिए बेतुके बयान दे रहे हैं। सामाजिक समानता के झंडाबरदारों के ऐसे बयान दुर्भाग्यपूर्ण हैं।

‘द कश्मीर फाइल्स’ पर तंज कसते हुए सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव कहते हैं कि ‘लखीमपुर फाइल्स भी बना लेते’। सपा नेता का यह बयान उनकी यादव-मुस्लिम वोट बैंक वाली राजनीति के अनुरूप ही है। उनसे कश्मीरी पंडितों के प्रति किसी सहानुभूति की आशा नहीं की जा सकती, क्योंकि पीड़ित समूह ना तो यादव है और ना मुस्लिम। उनमें तो अधिकतर पंडित हैं, जिनसे नेताजी का कुछ काम केवल चुनाव के समय ही रहता है। कश्मीर के लाखों हिन्दुओं के साथ हुई भीषण त्रासदी की लखीमपुर की घटना से तुलना किया जाना नेता जी के बौद्धिक दिवालियापन की उद्घोषणा है। कहाँ एक लाखों लोगों का उत्पीड़न, सैकड़ों हत्याएँ, असंख्य बलात्कार और हिंसा की क्रूर अमानुषिक यातनाएँ तथा लाखों-करोड़ों की संपत्ति छोड़कर केवल धर्म पालन के लिए पलायन की विवशता और कहाँ एक गाड़ी से कुछ लोगों के कुचल जाने की दुर्घटना! दोनों ही दुखद हैं किंतु दोनों में कोई समानता दूर-दूर तक नहीं है। फिर भी नेता जी के लिए दोनों दुर्घटनाएँ सामान हैं क्योंकि ऐसा कहने से उनकी राजनीति मजबूत होती है। यह भी आश्चर्यजनक है कि इस हिंदू नेता के मुखारविंद से पीड़ित कश्मीरियों के पक्ष में और उनकी उत्पीड़क आतंकवादी शक्तियों के विरोध में अब भी एक शब्द नहीं फूट रहा है!

सदा कड़वे सच को नकार कर और काल्पनिक आदर्श को प्रचारित करके समाज को भ्रमित करने वाले तथा सांप्रदायिक विद्वेष की भट्ठी में झोंकने वाले ऐसे ही अनेक बुद्धिजीवियों का विचार है कि ‘द कश्मीर फाइल्स’ से समाज में नफरत फैल रही है। इसे बनाया जाना और इसके प्रदर्शन की अनुमति दिया जाना गलत है। यदि यह गलत है तो किसी भी चिकित्सक द्वारा रोगी को उसके रोग से अवगत कराया जाना भी गलत है। रोगी की जीवन-रक्षा के लिए उसे उसके रोग से अवगत कराया जाता है ताकि वह समय पर सावधान होकर अपनी रोग मुक्ति के लिए उचित आवश्यक उपचार कर अपने जीवन की रक्षा कर सके। बीमारी छुपाने से रोगी रोग-मुक्त नहीं हो सकता- रोग को पहचानकर, उसके कारणों को जानकर और उसका आवश्यक उपचार करके ही उसके स्वास्थ्य और जीवन की रक्षा की जा सकती है।

इसी भाव से ‘द कश्मीर फाइल्स’ बनाई गई है और प्रदर्शित की जा रही है। कट्टरता और हिंसक आतंक तक फैली पैशाचिक सांप्रदायिकता की असाध्य व्याधि से देश स्वतंत्र और स्वायत्तता संपन्न होकर भी निरंतर जूझ रहा है, कमजोर हो रहा है फिर भी हमारे तथाकथित बुद्धिजीवी सोचते हैं कि समाज का यह कैंसर उजागर न हो, बीमारी दबी रहे, भले ही मृत्यु हो जाए। समझदारों को अपनी समझ पर एक बार फिर विचार करना चाहिए अन्यथा रोग को छिपाने और उसका आवश्यक उपचार ना होने देने की गलत सोच आगामी दशकों में पूरे देश को जिहादियों के लिए जन्नत और गैर-इस्लामी समूहों के लिए जहन्नुम बना देगी।

भारतीय राजनीति में मुस्लिम कट्टरपंथियों द्वारा हिंदुओं पर किए जाने वाले अत्याचारों पर पर्दा डालने का रिवाज बहुत पुराना है। इसे महात्मा गाँधी के नेतृत्व वाली कॉन्ग्रेस ने खिलाफत आंदोलन से शुरू किया। प्रथम विश्वयुद्ध के बाद ब्रिटेन और तुर्की के बीच हुई ‘सीवर्स की संधि’ से तुर्की के खलीफा के समस्त अधिकार छिन गए और तुर्की राज्य छिन्न-भिन्न हुआ। विश्वभर के मुसलमानों ने खलीफा के पक्ष में ब्रिटिश सरकार पर दबाव बनाने के लिए 1919 में खिलाफत आंदोलन की शुरुआत की। भारतवर्ष में भी मुसलमानों ने इस आंदोलन को प्रारंभ किया। भारतवर्ष के स्वतंत्रता संग्राम और बहुसंख्यक हिंदू समाज से इस आंदोलन का कोई लेना-देना नहीं था, फिर भी गाँधीजी ने कॉन्ग्रेस का नेतृत्व करते हुए खिलाफत का समर्थन किया। जबकि उसी समय केरल के मोपलाओं ने मलाबार में सैकड़ों हिंदुओं की निर्मम हत्याएँ की। विरोध ब्रिटिश शासन से था, भरपाई हिंदुओं के नरसंहार से हुई। वीर सावरकर की पुस्तक मोपला में उस समय हुए हिंदुओं के नरसंहार और जबरन धर्मांतरण का खौफनाक वर्णन है, किंतु इतिहास में उसकी चर्चा ना के बराबर है।

23 दिसंबर, 1926 को दिल्ली में हत्यारे अब्दुल राशिद ने आर्य-समाज के प्रमुख नेता श्रद्धेय श्रद्धानंद की गोली मारकर हत्या कर दी। स्वामी श्रद्धानंद सरस्वती उस समय हिंदुओं के बड़े धर्म-गुरुओं में से एक थे। किंतु घटनास्थल पर रंगे हाथों पकड़े गए हत्यारे अब्दुल राशिद को बचाने के लिए स्वयं महात्मा गाँधी ने उसके पक्ष में अनेक बयान दिए और उसे ‘अपना भाई’ कहा। कैसी विडम्बना है कि हिंदुओं को हमेशा अहिंसा सिखाने वाले हमारे बड़े नेता ने हिंसक हत्यारे का पक्ष लिया और श्रद्धानंद की मृत्यु पर शोक तक प्रकट नहीं किया। अक्टूबर-नवंबर, 1946 में बंगाल के चटगाँव डिवीजन के नोआखाली जनपद में डायरेक्ट एक्शन के नाम पर मुसलमानों द्वारा वहाँ के हिंदुओं का भयंकर नरसंहार किया गया।

बलपूर्वक धर्मांतरण, आगजनी और हिंदुओं की संपत्ति की लूट की सैकड़ों सुनियोजित दुर्घटनाएँ हुईं, किंतु मुस्लिम-तुष्टिकरण की कॉन्ग्रेसी राजनीति ने इसे अपनी सफेद बेदाग चादर से ढक दिया। विभाजन की त्रासदी के कारण लाखों हिंदुओं को पाकिस्तानी क्षेत्रों में जो अमानवीय यातनाएँ मिलीं, सत्ता प्राप्ति की प्रसन्नता में झूमती दिल्ली सरकार ने उनकी ओर आँख उठाकर भी नहीं देखा। प्रत्येक त्रासदी के लिए प्रायः पीड़ित हिंदू पक्ष ही उत्तरदायी ठहराया जाता रहा। पंजाब के खालिस्तानी आतंकवादियों द्वारा सैकड़ों हिंदुओं को मारा गया और हजारों हिंदू पंजाब से खदेड़ दिए गए, किंतु उन क्रूरताओं की वेदना भी अनसुनी रह गई। कश्मीर घाटी के हिंदुओं की त्रासदी भी ऐसा ही अचर्चित पृष्ठ है जो ‘द कश्मीर फाइल्स’ के रूप में अचानक जनता के सामने खुल गया है और धर्मनिरपेक्ष भारत की वकालत करने वालों से उत्तर माँग रहा है।

वास्तव में हिंदुओं पर जेहादी अत्याचार विगत तेरह सौ वर्षों से निरंतर जारी है। सिंध पर अरबों का आक्रमण और सोमनाथ मंदिर के विध्वंस से प्रारंभ हजार साल पुरानी कट्टरता आज इक्कीसवीं शताब्दी में भी दंगों और जेहादी आतंकी करतूतों के रूप में तथैव जीवित है। हाल ही में होली के दिन बांग्लादेश में इस्कॉन मंदिर पर होने वाला मुस्लिम कट्टरपंथियों का आक्रमण इसका साक्षी है। ‘द कश्मीर फाइल्स’ अत्याचारों और हत्याओं से भरी इस लंबी दर्दीली दास्तान का एक अंश मात्र है, जो हिंदुओं को आत्मरक्षा के लिए सावधान करती है। इस अवसर पर यह भी विचारणीय है कि हिंदुओं की इस दुर्दशा के लिए उत्तरदायी कौन है? अपने ही देश में हिंदुओं का संख्याबल क्षीण हो रहा है। उनकी मातृभूमि खंडित और विभाजित हुई है, भविष्य में फिर नए विभाजन का संकट संभावित है। कभी भी, कहीं भी शरारती तत्व मंदिरों में मूर्तियाँ खंडित करने का दुस्साहस कर जाते हैं। इस सबके लिए प्रायः इस्लाम की कट्टरवादी मानसिकता को दोषी ठहराया जाता है। यही सही भी है, क्योंकि यदि इस्लाम के जेहादी सबको हरे रंग में रंग लेने का दुराग्रह त्याग कर मानवीय-दृष्टि से उदार व्यवहार करें तो गैर-इस्लामिक लोगों का जीवन-पथ दूर तक निरापद हो सकता है। किंतु यही अंतिम सत्य नहीं है। सत्य यह भी है कि भारत में इन कट्टरपंथी जेहादी संगठनों को असली ताकत हिंदू समाज से ही मिलती है।

अपनी सुविधा और सत्ता के लिए अधिकांश हिंदू नेता अप्रत्यक्ष रुप से इन कट्टरपंथियों का ही बचाव करते रहें हैं, सामाजिक एकता और सदभाव के नाम पर इनकी काली करतूतों पर पर्दा डालते रहे हैं, अब भी पर्दा डालने की पुरजोर कोशिश में लगे हैं। जब तक हिंदू समाज अपनी रक्षा के लिए स्वयं दृढ़ संकल्प नहीं लेता, स्वयं को संगठित नहीं करता और अपने बीच गाजर घास की तरह फैले हिंदुत्व रहित तथाकथित हिंदुओं, मानसिंहों और जयचंदों के नेतृत्व को बहिष्कृत नहीं करता तब तक सुरक्षित नहीं हो सकता।

किसी से द्वेष करना, शत्रुता रखना अथवा उसे हानि पहुँचाना कभी भी उचित नहीं कहा जा सकता। किंतु स्वयं पर अपनी दुरभिलाषा की पूर्ति के लिए आघात करने वालों पर प्रतिप्रहार करना भी अनुचित नहीं कहा जा सकता। हिंदुओं को पलायन की प्रवृत्ति त्याग कर संगठन बलिदान और संघर्ष का आश्रय लेना होगा। अपराधी तत्वों और उनके सहायकों को चिन्हित कर उनसे ‘शठे-शाठ्यं समाचरेत‘ की नीति अपनानी होगी। हिरण्यकशिपु के लिए नृसिंह, खरदूषणों के लिए राम और कंसों के लिए कृष्ण बनना होगा। आत्मरक्षा के लिए हर संभव प्रयत्न करना होगा। तब ही अपनी अस्मिता और आत्म गौरव की रक्षा हो सकेगी।

अहिंसा और क्षमा बड़े ऊँचे मानवीय मूल्य हैं। किंतु ये महान मूल्य हिंसक और आक्रामक नरपशुओं के समक्ष कोई महत्व नहीं रखते। अतः आत्मरक्षा हेतु प्रत्येक सार्थक प्रयत्न किया जाना अपेक्षित है। केवल इस्लामिक कट्टरवाद को कोसने से कुछ हासिल होने वाला नहीं। भारतीय-समाज में राजनीति की हवाओं से दहकते शोलों की बढ़ती तपिश के कड़वे सच को स्वीकार कर उसका सामना करने के लिए समाज स्वयं को तैयार करे। जाति, धर्म, प्रान्त आदि के भेद भूलकर, विशुद्व भारतीयता की भावभूमि पर स्थिर होकर, पक्षपात छोड़कर ‘हम भारत के लोग’ हर गलत को गलत और सही को सही कहना प्रारंभ करें, तब ही हमारा भविष्य निरापद और सुरक्षित हो सकता है। यही ‘द कश्मीर फाइल्स’ के सृजन और प्रदर्शन का प्रयोजन भी है और संदेश भी।

(लेखक डाॅ. कृष्णगोपाल मिश्र, शासकीय नर्मदा महाविद्यालय नर्मदापुरम्, मध्य प्रदेश में हिंदी के विभागाध्यक्ष हैं)

कोरोना+ फिर भी फाइव स्टार होटल में रोज 6 लोगों के साथ सेक्स, कोविड के बीच भी धड़ल्ले से चला देह व्यापार

हॉन्गकॉन्ग से देह व्यापार का चौकाने वाला मामला प्रकाश में आया है। पुलिस द्वारा पकड़े जाने के बाद एक एक संदिग्ध प्रॉस्टीट्यूट ने पुलिस के सामने खुलासा किया कि जब वो कोरोना संक्रमित थी, उसी दौरान उसने शहर के एक फाइव स्टार होटल में प्रतिदिन पाँच से 6 ग्राहकों यौन सेवाएँ दी थी।

इस मामले के खुलासे के बाद पुलिस ने ऐसी सेवाएँ लेने वाले लोगों को कोरोना संक्रमण को लेकर चेतावनी दी है। इस मामले का खुलासा उस वक्त हुआ जब पिछले शुक्रवार (18 मार्च 2022) को पुलिस ने 20 साल की संदिग्ध को मुख्य भूमि की 6 अन्य महिलाओं समेत शहर में अवैध तरीके से घुसने के आरोप में पकड़ा। इसके साथ ही अधिकारियों ने बिना कागजात वाले अप्रवासियों की सहायता करने के मामले में तीन पुरुष ग्राहकों को भी उठा लिया था।

छापा मारने से पहले पुलिस ने कई जगहों पर सर्च अभियान चलाया और देह व्यापार के इस सिंडिकेट के कथित सरगना और पाँच लोगों को गिरफ्तार कर लिया। बताया जा रहा है कि इन सभी ने चीन से सेक्स वर्कर्स की तस्करी की थी और उनके वहाँ के होटलों में रहने और काम करने की व्यवस्था की थी।

पुलिस के मुताबिक, इस सिंडिकेट का लीडर 40 वर्षीय वू शिंग वू ट्रायड का मेंबर है। उसे सिम शा त्सुई में रूटीन जाँट के दौरान पकड़ा गया। वहीं सेक्स सेवा देने वाली संदिग्ध महिला को लेकर पुलिस के सूत्रों का कहना है कि वो इसी साल जनवरी में शेनझेन से नाव के जरिए अवैध तरीके से शहर में घुसी थी। आशंका इस बात की जताई जा रही है कि हो सकता है कि संदिग्ध महिला अपने कस्टमर्स के जरिए संक्रमित हुई हो और अब दूसरों को भी संक्रमित कर दे।

पुलिस की ओर से इस बात की भी चेतावनी जारी की है, “वर्तमान में महामारी फैल रही है और यौन सेवाओं को संरक्षण देना लोगों के स्वास्थ्य के लिए बहुत अधिक खतरनाक हो सकता है।” बहरहाल सभी संदिग्दों का कोविड टेस्ट निगेटिव आया है।

चीन की मुख्य भूमि से लाई जा रही महिलाएँ

पुलिस का कहना है कि उन्होंने वेश्यावृति के खिलाफ अपने अभियान से चीन की मुख्य भूमि से शहर में अवैध तरीके से काम करने के लिए भर्तियाँ करने वाले सिंडिकेट को तोड़ दिया है। पुलिस का ये भी कहना है कि ग्राहकों को कमरे से में लाने से पहले उन्हें होटल की लॉबी में महिलाओं से मिलने को कहा गया। प्रति ग्राहक HK$1,000 (9,755.12 भारतीय रुपए) और HK$2,000 (19,510.52) के बीच फीस ली गई थी।

जिंदा जलाने से पहले मृतकों को बुरी तरह पीटा गया था: पोस्टमार्टम में खुलासा, ममता बनर्जी के दौरे पर बोली भाजपा- 900 चूहे खाकर दीदी हज को गईं

पश्चिम बंगाल में बीरभूम जिले के बोगटुई गाँव में जिंदा जलाए गए 8 लोगों को मारने से पहले बुरी तरह प्रताड़ित किया गया था। दो बच्चों और तीन महिलाओं सहित कुल 8 शवों के पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में इस बात का खुलासा किया गया है। वहीं, आज मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इलाके के लोगों से जाकर मुलाकात की। इस पर भाजपा के प्रवक्ता संबित पात्रा ने कहा कि सौ-सौ हत्याएँ कराकर दीदी हज को चलीं।

फोरेंसिक विशेषज्ञों ने अपने प्रारंभिक निष्कर्ष में कहा है कि घरों में मिले शवों के परीक्षण में पता चला है कि पीड़ितों को पहले बुरी तरह पीटा गया था। उसके बाद उन्हें जिंदा जला दिया गया।

बवाल बढ़ने के बाद ममता बनर्जी घटनास्थल पर पहुँचकर कर पीड़ित परिवारों से मुलाकात की। इस दौरान ममता बनर्जी के स्वागत में तोरण द्वार लगाए गए थे। इसे देखकर सोशल मीडिया पर यूजर्स भड़क गए। लोग वीडियो-फोटो शेयर कर कह रहे हैं कि ममता बनर्जी में थोड़ी-बहुत भी शर्म बची होती तो स्वागत बोर्ड हटवा देतीं। घटनास्थल पर वह लोगों का दर्द बाँटने जा रही हैं, चुनाव प्रचार करने नहीं।

ममता बनर्जी पर तंज कसते हुए भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा ने कहा, “बंगाल के कुछ नेता निर्मम हत्याओं पर चादर ढंकने की कोशिश कर रहे हैं। वो कह रहे हैं कि शॉर्ट सर्किट हो गया है, सिलेंडर ब्लास्ट हो गया है। पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में साफ है कि महिलाओं और बच्चों को बर्बरतापूर्वक मारा-पीटा गया है। इतना सब होने के बावजूद सीएम ममता बनर्जी का बीरभूम जाना ठीक वैसा ही है, जैसे 900 चूहे खाकर मानो ‘दीदी’ हज को गई हों।”

इस नरसंहार को लेकर अब तक कम-से-कम 20 लोगों को गिरफ्तार किया गया है। सोमवार (20 मार्च 2022) को एक बम हमले में TMC नेता भादू शेख के मारे जाने की खबर आई, जिसके बाद उपद्रवी भड़क गए। आक्रोशित उपद्रवी भीड़ ने कई घरों को ध्वस्त कर दिया और जम कर लूटपाट की। कई घरों को आग के हवाले कर दिया गया।

इस घटना पर बुधवार (23 मार्च) को प्रधानमंत्री ने मोदी ने कहा था, “मैं पश्चिम बंगाल के बीरभूम में हुई हिंसक वारदात पर दुख व्यक्त करता हूँ, अपनी संवेदना व्यक्त करता हूँ। मैं आशा करता हूँ कि राज्य सरकार बंगाल की महान धरती पर ऐसा जघन्य पाप करने वालों को जरूर सजा दिलवाएगी।”

उन्होंने कहा, “मैं बंगाल के लोगों से भी आग्रह करूँगा कि ऐसी वारदात को अंजाम देने वालों को, ऐसे अपराधियों का हौसला बढ़ाने वालों को कभी माफ न करें। केंद्र सरकार की तरफ से मैं राज्य को इस बात के लिए आश्वस्त करता हूँ कि अपराधियों को जल्द से जल्द सजा दिलवाने में जो भी मदद वो चाहेगी, उसे मुहैया कराई जाएगी।”

कर्नाटक के हिन्दू मंदिरों में मुस्लिमों को दुकान लगाने की अनुमति नहीं: राज्य सरकार ने फैसले को सही माना, कॉन्ग्रेस ने जताई आपत्ति

कर्नाटक के कई हिन्दू मंदिरों में मुस्लिमों द्वारा दुकानें लगाए जाने से रोक के बाद अब इस पर राज्य सरकार के कानून मंत्री ने सरकार का रूख स्पष्ट किया है। जेसी मधुस्वामी ने इसे सरकारी नियम बताते हुए मंदिर प्रशासन के निर्णय पर सहमति जताई है। इस मुद्दे पर कर्नाटक विधानसभा में बुधवार (23 मार्च, 2022) को चर्चा हुई थी। यह आदेश सभी गैर हिन्दुओं पर लागू है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक विधानसभा में शून्यकाल के दौरान यह मुद्दा उठा था। कॉन्ग्रेस पार्टी के यू.टी. खादर और रिजवान अरशद ने मंदिरों पर लगे गैर हिन्दुओं को दुकानें न देने के फैसले वाले बैनरों पर आपत्ति जताई थी। उन्होने यह भी कहा कि ऐसा कई सार्वजनिक स्थलों पर भी हो रहा है। उन्होंने सरकार से इसे रोकने की माँग की।

इसके जवाब में कानून मंत्री जेसी मधुस्वामी ने ‘कर्नाटक धार्मिक संस्थान और धर्मार्थ बंदोबस्ती अधिनियम 2002’ के नियम संख्या 12 को सदन में रखा। उन्होंने कहा, “हिन्दू धर्मस्थलों के पास मौजूद किसी भी जमीन की संपत्ति गैर-हिन्दू को नियमानुसार नहीं दी जा सकती। ये नियम हमारी सरकार के नहीं बल्कि कॉन्ग्रेस सरकार द्वारा बनाए गए हैं। यदि पट्टे का आवेदन मंदिर परिसर से बाहर है तो एक बार उस पर विचार किया जा सकता है।”

गौरतलब है कि कर्नाटक में चल रहे हिजाब मामले में हाईकोर्ट द्वारा बुर्का को इस्लाम का अनिवार्य अंग मानने से इनकार कर दिया था। इस फैसले के विरोध में मुस्लिम संगठनों ने बंद का आह्वान किया था। इस बंद में वो दुकानदार भी शामिल हुए जो मंदिर परिसर में फूल और नारियल की दुकानें लगाया करते थे। इसके बाद कर्नाटक के उडुपी में होसा मारिगुडी मंदिर, महालिंगेश्वर मंदिर और शिवमोगा में कोटे मरिकंबा जात्रा की आयोजन समिति ने उत्सव के दौरान केवल हिंदू दुकानदारों को अपनी दुकानें स्थापित करने की अनुमति देने का फैसला किया था।

‘होटल ने कश्मीरियों को नहीं दिया रूम, दिल्ली पुलिस का है आदेश’: वायरल वीडियो का सच सामने आया, RJ सायमा ने शेयर किया था

सोशल मीडिया (Social Media) पर एक वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है। इस वीडियो में दावा किया जा रहा है कि दिल्ली में जम्मू-कश्मीर के एक शख्स को होटल (Hotel) में कमरा नहीं दिया गया। दावा यह भी किया जा रहा था कि दिल्ली पुलिस ने होटल वालों को जम्मू-कश्मीर आईडी वाले किसी भी शख्स को भी अनुमति नहीं देने का आदेश दिया है। सोशल मीडिया पर जब यह वीडियो वायरल हुआ तो दिल्ली पुलिस ने इसकी सच्चाई बताई और कहा कि ऐसा कोई निर्देश नहीं दिया गया है।

पुलिस का कहना है कि उनकी तरफ से ऐसा कोई निर्देश नहीं दिया गया। पुलिस ने एक ट्वीट (Tweet) में कहा है, “कुछ नेटिजन्स वीडियो के जरिए जानबूझकर दिल्ली पुलिस की छवि को खराब करने की कोशिश कर रहे हैं, जो दंडात्मक कार्रवाई करने के लिए मजबूर कर सकता है।”

इस मामले पर होटल के मालिक राकेश कुमार ने भी चीजें स्पष्ट की हैं। उन्होंने कहा, “जो चीजें फैलाई जा रही है, ऐसा कुछ नहीं है। चीजों को अलग तरीके से हाइलाइट किया जा रहा है। मेहमान ने OYO के जरिए बुकिंग की थी। सभी कमरे बुक थे, सिर्फ एक कमरे को छोड़कर, जिसका AC ठीक से काम नहीं कर रहा था।”

इसके साथ ही उन्होंने यह भी बताया कि गेस्ट ने उस कमरे को लेने से मना कर दिया और प्रभारी के खिलाफ अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया। वह कहते हैं, “ऐसा नहीं है कि हम जम्मू-कश्मीर के आईडी वाले लोगों को कमरे नहीं देते। हमारा बिजनेस उनके साथ काम करता है।”

बता दें कि वायरल हो रहे इस वीडियो को ट्विटर पर नासिर नाम के एक शख्स ने शेयर किया था। इसमें कश्मीरी आदमी को रूम न दिए जाने के पीछे कथित तौर पर दिल्ली पुलिस को कारण बताया जा रहा था। कहा जा रहा था कि दिल्ली पुलिस की मनाही के बाद ही युवक को कमरा नहीं दिया गया। रेडियो जॉकी सायमा ने भी इस वीडियो को शेयर करते हुए झूठ फैलाने की कोशिश की। इसके बाद सायमा और कश्मीरी पंडितों के नरसंहार पर फिल्म बनाने वाले निर्देशक विवेक अग्निहोत्री आमने-सामने आ गए। मामला यहाँ तक बढ़ गया कि ‘द कश्मीर फाइल्स’ फिल्म के निर्देशक विवेक अग्निहोत्री ने सायमा को ये तक कह दिया कि वो कभी उसे अपने शो पर बुलाएँ।

दरअसल, पूरा मामला कुछ यूँ है कि नासिर ने ट्वीट में सायमा को मेन्शन करते हुए लिखा था, “The Kashmir Files का ग्राउंड पर असर देखिए, दिल्ली के होटल में पहचान पत्र और अन्य दस्तावेज उपलब्ध कराने के बावजूद कश्मीरी व्यक्ति को रूम देने से इनकार कर दिया। क्या कश्मीरी होना अपराध है?” इसी ट्वीट के जवाब में सायमा ने विवेक अग्निहोत्री को मेन्शन करते हुए कोट किया था, “शुरू हो चुका है विवेक अग्निहोत्री।”

इसके बाद रेडियो जॉकी सायमा के ट्वीट पर कोट करते हुए विवेक अग्निहोत्री ने जवाब देते हुए लिखा, “मोहतरमा, आप RJ हैं। कभी बुलाइए अपने रेडियो शो में। मिल के बातचीत करते हैं और दूध का दूध और पानी का पानी करते हैं। मंज़ूर है तो DM करिए।”

इसके साथ ही सायमा ने एक और ट्वीट में विवेक अग्निहोत्री पर हमलावर होते हुए कहा, “मेरे तीखे प्रश्न से मत भागो। क्या आप #KashmirFilesMovie देखने के बाद मुस्लिमों के खिलाफ नफरत की घटनाओं और टिप्पणियों की निंदा करते हैं? हाँ या ना?।” खैर, अब इस पूरे मामले पर बढ़ते बवाल और खुद के कटघरे में आने के बाद दिल्ली पुलिस ने सामने आकर सच पर से पर्दा हटा दिया है और इस तरह RJ सायमा के प्रोपेगंडा की पोल भी खुल गई है।

शिव की भक्त हो गई है वह खुशी अहमद, जिसकी सुमित से शादी के बाद मुस्लिम भीड़ ने दलित बस्ती पर किया था हमला

साल 2021 का था। 20 मार्च की रात मुस्लिम भीड़ ने दिल्ली के सराय काले खाँ की दलित बस्ती में घुसकर हमला कर दिया था। वजह खुशी अहमद की दलित युवक सुमित से शादी थी। हमले के बाद खुशी और सुमित को काफी समय तक गुप्त जगह पर रहना पड़ा था। वीडियो जारी कर खुशी ने अपनी और अपने पति की सुरक्षा के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से गुहार भी लगाई थी।

अब सुमित और खुशी सराय काले खाँ के अपने घर लौट चुके हैं। हालाँकि हमले के साल भर बाद भी हमले के शिकार दलित परिवारों के दिक्कतों का अंत नहीं हुआ है। 21 मार्च 2022 को जब ऑपइंडिया की टीम इस बस्ती में पहुँची तो गली में हालात सामान्य दिखे। सुमित का परिवार जिस गली में रहता है वहाँ निर्माण कार्य चल रहे हैं।

हमारी नौकरियाँ चली गईं, मुआवजा नहीं मिला: सुमित के पिता किशनदीप

ऑपइंडिया से बातचीत में सुमित के पिता किशनदीप ने बताया कि अभी माहौल ठीक है। लेकिन वे लोग अपनी तरफ से अब भी सतर्कता बरत रहे हैं। हालाँकि उस घटना के बाद उनलोगों को किसी तरह धमकी नहीं मिली है। उन्होंने बताया कि इस पूरे विवाद में बीजेपी और आरएसएस से जुड़े लोगों ने उनके परिवार की काफी मदद की। वहीं, दलितों के नाम पर राजनीति करने वाले संगठनों से कोई उनकी मदद को नहीं आया। उनके अनुसार आप के काउंसलर एक बार आए थे और कैमरे लगाने का आश्वासन देकर चले गए।

फिलहाल इस गली में कोई सुरक्षा-व्यवस्था नहीं है। किशनदीप बताते हैं, “अब पैरामिलिट्री यहाँ से हट चुकी है। हमारे नुकसान का अभी तक कोई भी मुआवजा नहीं मिला है। इस घटना का केस अभी ठप पड़ा है। जो जेल गए थे उन्हें एक-डेढ़ महीने में ही कोरोना में छोड़ दिया गया है। उसके बाद वो जेल नहीं गए, जबकि उन पर SC/ST का भी केस लगा हुआ है। हम उन पर कानूनी करवाई चाहते हैं जिस से वो किसी और के साथ ये हरकत न करें।”

सुमित के पिता किशनदीप

किशनदीप ने आगे बताया, “मैं पहले होटल में जॉब करता था। मेरी और मेरी बेटी की जॉब इस केस के चलते छूट गई। जो पैसा था वह बेटी की शादी में खर्च हो गया। अभी हमारी आमदनी का कोई भी साधन नहीं है। मैं शादी से पहले भी लड़की के परिवार से मिला और उन्हें समझाने की कोशिश की थी। मैंने अपना मकान तक उनकी बेटी के नाम करने और हर चीज स्टाम्प पर लिख कर देने को तैयार था। लेकिन उन्होंने हमें जातिसूचक शब्द बोल कर मना कर दिया था।”

हिन्दू संगठनों और प्रशासन ने बहुत साथ दिया: सुमित की माँ रजनी

ऑपइंडिया से बात करते हुए सुमित की माँ रजनी ने कहा, “हम मूल रूप से उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। अब हमें कोई डरा-धमका नहीं रहा। मेरी बहू मेरे परिवार में मिल-जुलकर रहती है। वो मेरे घर में बहुत खुश है। उनके घर से कभी-कभार छोटी बहन मिलने आ जाती है। हंगामे के दौरान हिन्दू संगठनों और प्रशासन ने हमारा बहुत साथ दिया था।”

सुमित की माँ

पुलिस कार्रवाई से संतुष्ट नहीं है सुमित

सुमित के अनुसार शादी करते हुए उन्हें कोई डर नहीं लगा था। उन्हें उम्मीद भी नहीं थी कि इतना बड़ा बवाल हो जाएगा। उसके अनुसार शादी से पहले उसने खुशी के परिवार को काफी समझाने का प्रयास किया था। लेकिन वे लोग उस पर जा​तीय टिप्पणी करते थे। उसने बताया, शादी के बाद मैं गाजियाबाद में रहने चला गया था। बवाल के डेढ़ महीने बाद ही घर वापस आया। तब से हम पर कोई धमकी, हमला या दबाव जैसी कोई बात नहीं है। मेरी पत्नी मायके नहीं जाती। उनके मम्मी-पापा 1 या 2 बार अपनी बेटी से मिलने आए हैं। मेरी भी उनसे कभी-कभार फोन पर बातचीत हो जाती है।”

सुमित के परिवार का पूजा घर

हमले के दिन का जिक्र करते हुए सुमित ने बताया, “जब पिछले साल यह बवाल हुआ था तब पुलिस ने आकर सबसे पहले बवाल के वीडियो मेरे DVR से डिलीट करवा दिए थे। फिर वहीं पर दूसरे आदमी से उसका DVR माँगने लगे तो उसने दिया नहीं। उसने पुलिस को बताया कि DVR से वीडियो डिलीट कर भी दोगे तो वीडियो फोन में भी सेव हो चुकी है। तब वह वीडियो वायरल हुई थी। हमने पुलिस को 16 आरोपितों के नाम दिए थे। लेकिन उनमे से सिर्फ 8 को ही गिरफ्तार किया गया। इस घटना में जो मुख्य हमलावर हैं उन पर न तो केस दर्ज हुआ और न ही उनकी गिरफ्तारी हुई।”

सुमित ने आगे बताया, “हमलावर CCTV फुटेज में साफ दिख रहे थे। उस समय के SHO प्रवीण कुमार और चौकी इंचार्ज प्रदीप कुमार से मैंने कई बार मुख्य हमलवारों को पकड़ने की माँग की, लेकिन उन्होंने टाल दिया। अब दोनों का ट्रांसफर हो चुका है। 1 साल पहले ही हमारा और एक अन्य आदमी के CCTV का DVR पुलिस ले गई है। उसे 3 बार थाने जा कर माँगने के बाद भी अब तक लौटाया नहीं गया। अगर कल हम पर फिर से हमला हो जाए तो वो वीडियो कैसे मिलेगी।”

मैं भगवान शिव को बहुत मानती हूँ: खुशी

खुशी अहमद अब खुशी कुड़िया बन गई है। भगवान शिव की अराधना करती है। वह कहती है, “मैं यहाँ बहुत खुश हूँ। ग्रेजुएशन की पढ़ाई कर रही हूँ। जॉब भी तलाश रही हूँ। मैं भगवान शिव को बहुत मानती हूँ और उनकी पूजा करती हूँ।” उसने बताया, “शादी से पहले मैं जब भी अपने परिवार को समझाने की कोशिश करती वे सुमित की जाति की बात करने लगते थे। मेरा परिवार लड़ाई-झगड़े वाला नहीं है। लेकिन आसपास के लोग उनको उकसाते हैं।”

वे हमलावर आज भी मुझे घूरते हैं: सुमित का पड़ोसी रोहित

ऑपइंडिया से बात करते हुए सुमित के पड़ोसी रोहित ने बताया, “जिन हमलावरों ने मेरी 10 साल की बहन के कपड़े फाड़ने की कोशिश की थी, उनमे से अभी कोई नहीं पकड़ा गया। सभी हमलावरों की उम्र 24 से 25 साल के आसपास थी। सब आराम से घूम रहे हैं। वो हमलावर जब भी मुझे देखते हैं तो घूरते हैं।”

सुमित के पड़ोसी रोहित (पीड़ित)

ऑपइंडिया ने पीड़ित परिवारों की शिकायत और केस में प्रगति के संबंध में जानकारी के लिए सनलाइट कॉलोनी थाना के SHO विजय शानवाल से संपर्क किया। उन्होंने बताया, “आप स्टोरी लिख रहे हैं या जाँच कर रहे है। अगर किसी को दिक्कत है तो वो एप्लिकेशन दें। हम किसी को ऐसे ही जानकारी नहीं देते।”

‘इसे सनसनीखेज न बनाएँ’: सुप्रीम कोर्ट ने बुर्का मामले की तुरंत सुनवाई से किया इनकार, कहा – इसका परीक्षाओं से कोई लेना-देना नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (24 मार्च 2022) को बुर्का मामले में तत्काल सुनवाई से इनकार करते हुए कर्नाटक की मुस्लिम छात्राओं को फटकार लगाई है। याचिकाकर्ताओं ने अदालत से अपील की थी कि परीक्षाएँ जल्द शुरू होने जा रही हैं, इसे देखते हुए इस मामले पर तत्काल सुनवाई की जाए। लेकिन अदालत ने याचिका को फिर से खारिज करते हुए साफ कर दिया कि इस मामले का परीक्षाओं से कोई लेना देना नहीं है।

दरअसल, कर्नाटक हाईकोर्ट के आदेश को छात्राओं ने शीर्ष कोर्ट में चुनौती दी है। इसको लेकर आज सर्वोच्च न्यायालय में मुस्लिम छात्राओं के वकील देवदत्त कामथ ने सीजेआई एनवी रमना से कहा कि यह मामला अत्यंत जरूरी है। यदि शीर्ष न्यायालय ने जल्दी सुनवाई नहीं की तो छात्र परीक्षा नहीं दे पाएँगे, जिससे उनका साल खराब हो जाएगा। इस पर चीफ जस्टिस रमना ने वकील से कहा कि इस मामले का परीक्षाओं से कोई लेना-देना नहीं है, इस विषय को सनसनीखेज न बनाएँ। इस मामले पर अगली सुनवाई कब होगी, उस संबंध में अदालत की तरफ से कोई तारीख नहीं दी गई है।

मालूम हो कि बीते दिनों कर्नाटक में हिजाब पहनने के लिए किए विरोध प्रदर्शन में शामिल कई मुस्लिम छात्राओं ने स्वेच्छा से परीक्षाओं का बहिष्कार किया था। इन्हीं छात्राओं को लेकर कर्नाटक सरकार ने फैसला सुनाया था कि जिन 12वीं की छात्राओं की प्रैक्टिकल एग्जाम में अनुपस्थिति थी, उनका अलग से एग्जाम नहीं करवाया जाएगा

प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा मंत्री बी सी नागेश ने अन्य छात्रों का हवाला देते हुए कहा था, “हम इसकी संभावना पर कैसे विचार करें। अगर हम उन छात्राओं के लिए दोबारा एग्जाम करवाते हैं, जिन्होंने हाईकोर्ट के अंतरिम आदेशों के बावजूद हिजाब के लिए प्रदर्शन किया, तो बाकी बच्चे किसी और कारण को लेकर दूसरा चांस माँगने लगेंगे। ये असंभव है।”

कर्नाटक हाईकोर्ट के जज को मिली थी जान से मारने की धमकी

इस साल 2 जनवरी से शुरू हुए हिजाब विवाद पर पिछले दिनों कर्नाटक हाईकोर्ट का फैसला आया था। कर्नाटक हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि हिजाब पहनना इस्लामी प्रथा या आस्था का जरूरी हिस्सा नहीं है। चीफ जस्टिस ऋतु राज अवस्थी, जस्टिस कृष्ण एस दीक्षित और जस्टिस जेएम खाजी की बेंच ने यह भी कहा था, “स्कूल यूनिफॉर्म अधिकारों का उल्लंघन नहीं है। यह संवैधानिक रूप से स्वीकार्य है जिस पर छात्र आपत्ति नहीं कर सकते हैं।”

यह फैसला सुनाने के बाद कर्नाटक हाईकोर्ट के न्यायाधीश को एक इस्लामी संगठन द्वारा मौत की धमकी दी गई थी। यह धमकी तमिलनाडु तौहीद जमात (TMTJ) नाम के संगठन ने मदुरै में एक आयोजन के दौरान 17 मार्च को दी थी। धमकी देने वाले आरोपित का नाम कोवाई आर रहमतुल्लाह बताया गया था।

इस वीडियो को इंदु मक्क्ल ने शेयर किया था। वीडियो में रहमतुल्लाह को धमकी देते सुना गया था, “अगर हिजाब मामले में जज की हत्या हो जाती है तो वो अपनी मौत के खुद जिम्मेदार होंगे। न्यायपालिका भाजपा के हाथों बिक चुकी है। अदालत का आदेश अवैध और गैरकानूनी है। कर्नाटक हाईकोर्ट ने ये आदेश अमित शाह के इशारे पर दिया है। फैसला देने वाले जज को अपने फैसले पर शर्म आनी चाहिए। जजों के फैसले संविधान के आधार पर होने चाहिए न कि उनके व्यक्तिगत सोच पर।”

₹3000000 करोड़ का निर्यात कर भारत ने रचा इतिहास: PM मोदी के नेतृत्व में हर दिन हुआ ₹7600 करोड़ का एक्सपोर्ट

विकास की दिशा में आगे बढ़ते हुए कल (23 मार्च 2022) भारत ने ऐतिहासिक मुकाम पाया। केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने जानकारी दी कि 23 मार्च को भारत ने 400 बिलियन डॉलर यानी कि 30 लाख करोड़ रुपए के प्रोडक्ट्स के एक्सपोर्ट का नया रिकॉर्ड बना लिया है। केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने इस नई सफलता के पीछे पीएम मोदी के नेतृत्व और उनकी प्रतिबद्धता को वजह बताया। साथ ही ये जानकारी भी दी कि कैसे पीएम मोदी ने हर प्रोग्रेस में नजर बनाई हुई थी और हितधारकों के साथ विभिन्न स्तरों पर जुड़े थे।

उन्होंने बताया कि पीएम मोदी से पहले उन्होंने कभी भी किसी पीएम को एक्सपोर्ट बिजनेस पर इतना फोकस करते हुए नहीं देखा था। लेकिन पीएम मोदी ने इसे चुनौती की तरह लिया। उन्होंने इस इंडस्ट्री में और हितधारकों में जोश भरा। वह कहते हैं कि कई लोगों को लगा होगा कि इस मुकाम को पाना असंभव था। लेकिन पीएम इससे निजी स्तर पर जुड़े और लगातार मार्गदर्शन करते रहे।

विदेश व्यापार के महानिदेशक संतोष कुमार सारंगी ने इस संबंध में बताया कि, 2020-21 में 292 बिलियन डॉलर का एक्सपोर्ट हुआ था जिसमें 37 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। 2021-22 में 400 बिलियन डॉलर का एक्सपोर्ट किया गया है, जिनमें नॉन बासमती राइस, गेहूँ, समुद्री उत्पाद, मसाले और चीनी जैसी चीजों ने एक्सपोर्ट ग्रोथ को बढ़ाया है। पिछले साल की तुलना में इंजीनियरिंग के सामान का एक्सपोर्ट लगभग 50% तक बढ़ा है। उन्होंने बताया कि इंजीनियरिंग सामान सबसे ज़्यादा अमेरिका में निर्यात किए गए। उसके बाद पेट्रोलियम प्रोडक्ट यूएई निर्यात हुए। रत्न और आभूषण सबसे ज्यादा चीन को निर्यात किए गए, बांगलादेश को ऑर्गैनिक और नॉन ऑर्गैनिक केमिकल निर्यात किए गए और  ड्रग्स और फार्मासुटिकल्स का निर्यात सबसे ज्यादा नीदरलैंड को किया गया।

गौरतलब है कि भारत ने एक्सपोर्ट क्षेत्र में जो नया रिकॉर्ड अपने नाम किया है उसके लिए एक समय सीमा थी लेकिन भारत ने उस समय से 9 दिन पहले ही इस टारगेट को हासिल कर लिया। जो आँकड़े मीडिया में बताए जा रहे हैं उसके अनुसार भारत ने प्रति माह 33 बिलियन का निर्यात किया जबकि 1 दिन में 1 बिलियन (7600 करोड़ रुपए) और 1 घंटे में 350 करोड़ रुपए का निर्यात किया। कल इस उपलब्धि की जानकारी पीएम मोदी ने भी दी थी। उन्होंने कहा था, “भारत भारत का बढ़ता हुआ एक्सपोर्ट, हमारी इंडस्ट्री की शक्ति, हमारे MSMEs, हमारी मैन्यूफैक्चरिंग क्षमता, हमारे एग्रीकल्चर सेक्टर के सामर्थ्य का प्रतीक है।”

हिमाचल प्रदेश में अब नहीं घुस सकेगी भिंडरावाले के झंडे-पोस्टर वाली गाड़ियाँ, भड़के गुरुद्वारा कमिटी ने कहा – ‘भावनाओं को ठेस पहुँची’

खालिस्तानी चरमपंथ लगातार बढ़ रहा है। ऐसे में हिमाचल प्रदेश की जयराम ठाकुर सरकार ने खालिस्तानी आतंकी भिंडरावाले की पोस्टर जिन-जिन गाड़ियों पर लगे हैं, उन्हें राज्य में घुसने से रोकने का आदेश जारी किया है। सीएम जयराम ठाकुर ने स्पष्ट कहा कि हम ‘निशान साहिब’ (सिख ध्वज) का पूरा सम्मान करते हैं, लेकिन भिंडरावाले को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

दरअसल, पंजाब से आने वाली कई गाड़ियों पर भिंडरावाले की तस्वीरों वाले बैनर लगे हुए थे, जिस पर ज्वालामुखी और मंडी जिलों के लोगों ने आपत्ति जताई थी। ऐसे कई सारे वीडियो सामने आए, जिनमें स्थानीय लोग इन झंडों को हटाने की माँग करते दिखे। इसके बाद सरकार ने ये एक्शन ले लिया।

ट्विटर यूजर अमन बाली ने भिंडरावाले का झंडा लिए एक सिख व्यक्ति का वीडियो शेयर किया, जिसमें कुछ भिंडरावाले के पोस्टर के इस्तेमाल पर आपत्ति जता रहे थे। अमन बाली ने इसे गुंडागर्दी करार देते हुए खालिस्तानी आतंकी को ‘संत जी’ कहा।

वायरल हो रहे वीडियो में स्पष्ट देखा जा सकता है कि सिख व्यक्ति निशान साहिब की जगह भिंडरांवाले का झंडा लेकर चल रहा था। हिमाचल प्रदेश की पुलिस ने भी अगले दिन सोशल मीडिया दावों पर निशान साहिब के झंडे को हटाए जाने के दावे का भी खंडन किया। साथ ही ये भी स्पष्ट किया कि किसी भी धार्मिक झंडे को नहीं हटाया गया।

इस मामले में सीएम जयराम ठाकुर ने कहा कि पंजाब के साथ इसको लेकर चर्चा की गई है। उन्होंने कहा, “हम निशान साहिब के प्रतीक का बहुत सम्मान करते हैं और इसका इस्तेमाल करने के लिए किसी का भी स्वागत है, लेकिन भिंडरांवाले की तस्वीरों वाले झंडे को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।” इसके अलावा राज्य के डीजीपी संजय कुंडू ने भी किसी भी तरह के उकसावे से इनकार किया है।

भिंडरावाले पर बैन से बौखलाया SGPC

हिमाचल प्रदेश सरकार द्वारा भिंडरावाले पर बैन लगाए जाने से नाराज शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (SGPC) ने बुधवार सीएम जयराम ठाकुर को पत्र लिखकर बैन का विरोध किया। हरजिंदर सिंह धामी ने दावा किया कि दुनिया भर के सिख भिंडरावाले को अपना आदर्श और नेता मानते हैं। के रूप में देखते हैं।

एसजीपीसी ने भिंडरावाले पर बैन को ‘धार्मिक भावनाओं को आहत’ करने वाला कदम बताया। SGPC ने जोर देकर कहा कि खालिस्तानी आतंकवादी भिंडरावाले, जिसके कार्यों से हजारों लोगों की मौत हुई, पर आपत्ति ‘धार्मिक भावनाओं को आहत’ करने वाली है। सिख कमेटी ने कहा, “आपके (जयराम ठाकुर) द्वारा दिए गए बयान से सिखों की भावनाओं को ठेस पहुँची है। हम आपसे अपने अत्यधिक आपत्तिजनक बयान को वापस लेने का आग्रह करते हैं और उम्मीद करते हैं कि भविष्य में हिमाचल प्रदेश में ऐसा कोई विवाद पैदा न हो।”

गौरतलब है कि भिंडरावाले वो आतंकी है, जिसके कृत्यों से हजारों लोगों की जानें गई थीं।

घर के सामने ‘बाबा का बुलडोजर’ देख काँप उठा रेपिस्ट: प्रयागराज में पुलिस के सामने कर दिया सरेंडर

उत्तर प्रदेश में अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की ‘बुलडोजर नीति’ कारगर सिद्ध हो रही है। संगीन मामलों में फरार अपराधियों को पकड़ने के लिए पुलिस बुलडोजर का सहारा लेने लगी है। प्रयागराज में दुष्कर्म के फरार आरोपित के सामने पुलिस ने बुलडोजर खड़ा कर दिया है। इसके बाद आरोपित खुद ही सरेंडर करने पहुँच गया।

प्रदेश के प्रतापगढ़ रेलवे स्टेशन पर बने शौचालय में एक महिला से दुष्कर्म करने के बाद आरोपित शुभम मोदनवाल उर्फ अन्ना फरार हो गया। उसके बाद से पुलिस लगातार उसकी खोजबीन करती रही, लेकिन वह गिरफ्त में नहीं आया। इसके बाद पुलिस ने बुलडोजर ले जाकर उसके घर के सामने खड़ा कर दिया और उसके परिजनों से कहा कि अगर आरोपित ने 24 घंटे के भीतर खुद को पुलिस के हवाले नहीं किया तो उसका घर तोड़ दिया जाएगा। इसके बाद घरवालों ने आरोपित से बात कर बताया कि वह चुंगी के पास है। उसके बाद पुलिस ने आरोपित को गिरफ्तार कर लिया।

दरअसल, अंतू थाना क्षेत्र की रहने वाली एक विवाहित महिला शुक्रवार (18 मार्च) को अपने पति के साथ प्रयागराज से अहमदाबाद जाने के लिए निकली थी। रात में 12 बजे विवाहिता पति खाना लाने के लिए निकला। इसी दौरान विवाहिता वॉशरूम खोजने लगी। वाहन स्टैंड के पास खड़े एक लड़के ने महिला को रेलवे के सुलभ शौचालय के बारे में बताया और उसकी चाबी दी।

महिला जब शौचालय में अंदर गई तो वह लड़का भी उसके पीछे घुस आया और उसके साथ दुष्कर्म किया। कुछ देर बाद पीड़िता का पति वहाँ पहुँच गया और आरोपित को दबोच लिया। इसी दौरान आरोपित के साथी वहाँ पहुँच गए पीड़िता के पति को पिटने लगे और मौका पाकर आरोपित फरार हो गया। तब से पुलिस उसकी तलाश कर रही थी।