Home Blog Page 3486

‘वो औरतों को मार कर कुत्तों को खिलाते हैं, इंसान नहीं समझते’: तालिबानियों की बर्बरता की कहानी अफगानी महिला की जुबानी

अफगानिस्तान में तालिबान के घुसने के बाद कई लोगों के पुराने जख्म हरे हो गए हैं। इसी सूची में एक नाम अफगानी महिला खटेरा (khatera) का भी है। वर्तमान में दिल्ली में रहने वाली अफगानी महिला खटेरा बताती हैं कि ये तालिबानी महिला के अंगों को कुत्तों को खिलाते हैं। न्यूज 18 से बात करते हुए खटेरा कहती हैं, “तालिबान की नजर में, महिलाएँ जीवित नहीं हैं और न ही इंसानों की तरह साँस ले रही हैं। उनके लिए महिलाएँ सिर्फ माँस हैं, जिसे हमेशा पीटा जाना चाहिए।”

उल्लेखनीय है कि 33 वर्षीय खटेरा को पिछले वर्ष तालिबानियों ने आँख में चाकू मार कर हमेशा के लिए अंधा बना दिया था। उनकी गलती बस ये थी कि वो घर से निकल कर जॉब करने जाती थीं। तालिबानियों को उनकी यही आत्मनिर्भरता नागवार गुजरी और एक दिन उनके दफ्तर से घर लौटते हुए उनपर हमला बोल दिया।

पूरी घटना अफगानिस्तान के गजनी प्रांत में हुई थी। खटेरा नाम की 33 वर्षीय महिला ने घटना से कुछ समय पहले क्राइम ब्रांच में एक अधिकारी के तौर पर काम करना शुरू किया था। एक दिन पुलिस थाने से काम पूरा करके वह घर लौट रही थीं तभी तालिबानियों ने उन्हें पकड़ा और उनपर गोली चला दी। इसके बाद उनकी आँख में चाकू घोपे गए।

जब महिला को होश आया तो वह अस्पताल में थीं। उन्होंने होश आने पर डॉक्टरों से पूछा कि आखिर वह देख क्यों नहीं पा रहीं? इस पर डॉक्टर्स का जवाब था कि आँख में चोट लगने के कारण बैंडेज लगी हुई है इसलिए वह देखने में असमर्थ हैं। हालाँकि, खटेरा को एहसास हो चुका था कि उनकी आँखें निकाल ली गई हैं। 

खटेरा ने अपने साथ हुई बर्बरता के लिए तालिबानियों के साथ उनके पिता को जिम्मेदार बताया था। उनका कहना था कि उनके पिता ने ही तालिबानियों को उनकी आईडी कार्ड की कॉपी दी थी ताकि यह साबित कर सकें कि वो पुलिस में काम करती हैं। जिस दिन हमला हुआ उस दिन भी महिला के पिता उसे लगातार कॉल कर रहे थे और उससे उसकी लोकेशन पता कर रहे थे।

गजनी पुलिस ने भी यह माना था कि इस हमले के पीछे तालिबानियों का ही हाथ था। उन्होंने खटेरा के पिता को कस्टडी में भी लिया। हालाँकि, तालिबान प्रवक्ता ने कहा कि उनके समूह को पूरे मामले का पता था लेकिन उनका इसमें कोई हाथ नहीं है क्योंकि यह पारिवारिक मामला था।

पीड़िता खटेरा कहती हैं, “तालिबान पहले हमें (महिलाओं को) प्रताड़ित करते हैं और फिर सजा के नमूने के रूप में दिखाने के लिए हमारे शरीर के साथ बर्बरता करते हैं। कभी-कभी हमारे शरीर को कुत्तों को खिलाया जाता है। मैं भाग्यशाली थी कि मैं इससे बच गई। अफगानिस्तान में तालिबान के अधीन रहना पड़ता है। कल्पना करना मुश्किल है कि वहाँ महिलाओं, बच्चों और अल्पसंख्यकों पर क्या-क्या अत्याचार हुए हैं।” 

वह अपने साथ हुई दिल दहला देने वाली घटना को याद करते हुए कहती हैं कि उनके लिए इलाज के लिए काबुल और दिल्ली जाना संभव था क्योंकि उन पर पैसे थे। लेकिन हर किसी को ऐसी सुविधा नहीं मिलतीं। वहाँ महिलाएँ या जो कोई भी तालिबान की बातें नहीं मानता वह सड़कों पर मारा जाता है।

खटेरा पूछती हैं, “तालिबान महिलाओं को पुरुष डॉक्टरों के पास जाने की अनुमति नहीं देता है, और साथ ही, महिलाओं को पढ़ने और काम करने नहीं देता है। तो फिर एक महिला के लिए क्या बचा है? मरने के लिए छोड़ना? अगर आपको ये भी लगता है कि हम सिर्फ बच्चे पैदा करने की मशीन हैं, तो भी ये कोई कॉमन सेंस नहीं बल्कि शुद्ध नफरत है। बिना चिकित्सीय देखभाल के इन पुरुषों के हुक्म के अनुसार एक महिला अपने बच्चे को कैसे जन्म दे सकती है।”

अपना दर्द बयां करते हुए वो बोलती हैं, “दुनिया के लिए यह कल्पना करना भी कठिन है कि हमने पिछले 20 वर्षों में क्या बनाया है। हमने सपने बुने, जो अब खत्म हो गए हैं। हमारे लिए सब खत्म हो गया है। तालिबान के देश पर अधिकार करने से पहले ही सरकार या पुलिस के साथ काम करने वाली महिलाओं का शिकार किया जा रहा था और उन्हें धमकाया जा रहा था। अब, चिंता महिलाओं को काम करने देने से आगे निकल गई है। इस समय, मुझे डर है कि क्या वे इन महिलाओं को जीवित छोड़ देंगे। वे सिर्फ महिलाओं को मारते नहीं हैं बल्कि जानवरों को उसे खिलवाते हैं। वे इस्लाम पर एक धब्बा हैं।”

वह कहती हैं, “हमारी महिलाओं और युवाओं ने इन 20 वर्षों में कहीं पहुँचने के लिए, एक स्थिर आजीविका खोजने के लिए, उचित शिक्षा प्राप्त करने के लिए, एक लंबा सफर तय किया है। महिलाएँ विश्वविद्यालयों में जा रही थीं। लड़कियों को स्कूल जाते हुए देखना बहुत ही खूबसूरत नजारा था। एक हफ्ते में ही सब गर्त में चला गया। मैंने अपने रिश्तेदारों से यहाँ तक ​​सुना है कि परिवारों ने लड़कियों को तालिबान से बचाने के लिए उनके शैक्षिक प्रमाणपत्रों को जलाना शुरू कर दिया है।”

पीड़ित महिला चिंता जताती हैं कि उनके साथ ये सब उस दौरान हुआ था जब देश में पुलिस काम करती थी। अब तालिबानियों का राज है और उनके बच्चे गजनी में हैं। एंबेसियों ने वीजा देने बंद कर दिए हैं। खटेरा को डर है कि उनके पिता उनके बच्चों को हथियार उठवाने पर मजबूर करके उनकी जिंदगी तबाह कर देंगे।

स्वरा भास्कर के खिलाफ शिकायत दर्ज: हिन्दुओं की भावना को ठेस पहुँचाने का मामला, ‘हिंदुत्व’ की तालिबान से की थी तुलना

बॉलीवुड अभिनेत्री और वामपंथी विचारधार की पोषक स्वरा भास्कर के खिलाफ ‘तालिबानी आतंक’ से हिंदुत्व की तुलना करने वाले को लेकर पुलिस में शिकायत दर्ज कराई गई है। उन पर धर्म के आधार पर विभिन्न समुदायों के बीच दुश्मनी को बढ़ावा देने और अपने ट्वीट के जरिए सामाजिक शांति को भंग करने का आरोप लगाया गया है।

बॉम्बे हाईकोर्ट में प्रैक्टिस करने वाले वकील आशुतोष दुबे ने एक ट्वीट पोस्ट किया, जिसमें उन्होंने बताया कि उन्होंने स्वरा भास्कर के खिलाफ मुंबई पुलिस और पालघर पुलिस में शिकायत दर्ज कराई है। उन्होंने आगे कहा कि वह जल्द ही स्थानीय पुलिस स्टेशन में भी अभिनेत्री के खिलाफ शिकायत दर्ज कराएँगे।

उनके ट्वीट पर पालघर पुलिस ने जवाब देते हुए मामले की जाँच करने और उचित कार्रवाई करने की बात कही है।

साभार: ट्विटर

दुबे ने साइबर सेल में शिकायत भी दर्ज कराई थी। उन्होंने इस मामले की जानकारी सोशल मीडिया के जरिए दी। दुबे ने कहा कि पालघर साइबर पुलिस ने मामले में कार्रवाई करने के बारे में उनकी शिकायत को आगे बढ़ा दिया है। उन्हें बयान दर्ज कराने के लिए एसपी कार्यालय बुलाया गया है। महाराष्ट्र साइबर सेल ने दुबे की शिकायत का जवाब देते हुए उन्हें दस्तावेजों के साथ निकटतम पुलिस स्टेशन से संपर्क करने को कहा है।

स्वरा भास्कर ने हिंदुत्व और तालिबान के बीच अनुचित तुलना की

हिंदुत्व के खिलाफ किए गए अपमानजनक ट्वीट के कारण भास्कर के खिलाफ शिकायत दर्ज की गई है। इससे पहले कल अभिनेत्री ने हिंदुत्व की तुलना तालिबानी विचारधारा से करते हुए उसे अपमानित करने की कोशिश की थी। भास्कर ने हिंदुत्व और उसके फॉलोवर्स के खिलाफ जहर उगलने के लिए तालिबान द्वारा अफगानिस्तान पर कब्जे के अवसर का इस्तेमाल किया।

स्वरा भास्कर ने अपने ट्वीट में लिखा था, “हम तालिबान के आतंक पर हैरानी और दुःख जताते हुए ‘हिंदुत्व आतंकवाद’ की तारीफ नहीं कर सकते। ऐसा भी नहीं हो सकता कि हम तालिबान के आतंक पर चुप बैठें और ‘हिंदुत्व आतंकवाद’ पर आक्रोश जताएँ। हमारे मानवीय व नैतिक मूल्य इस पर आधारित नहीं होने चाहिए कि अत्याचारी कौन है और पीड़ित कौन है।” स्वरा भास्कर के इस तरह से हिन्दू धर्म को आतंकवाद व तालिबान से जोड़ने से लोग नाराज़ हो गए।

साभार: ट्विटर

हालाँकि, अभिनेत्री के तालिबान और हिंदुत्व के बीच अनुचित तुलना करने के तुरंत बाद, हिंदुओं और हिंदुत्व विचारधारास को मानने वाले लोगों ने स्वरा को हिंदुत्व के खिलाफ झूठे आरोप लगाने और तालिबान की केवल निंदा करने के लिए रीढ़ की हड्डी नहीं होने का आरोप लगाया। कई अन्य लोगों ने बताया कि कैसे हिंदुत्व की विचारधारा तालिबान द्वारा समर्थित विचारधारा से मौलिक रूप से भिन्न है, यह देखते हुए कि हिंदुओं ने केवल अफगानिस्तान ही नहीं, बल्कि दुनिया भर के सताए हुए लोगों को स्वीकार किया है और उन्हें अपने में समाहित किया।

तालिबान ने अफगानिस्तान पर किया कब्जा

गौरतलब है कि अफगान सेना के खिलाफ एक महीने तक चले युद्ध के बाद इस्लामी संगठन तालिबान रविवार (15 अगस्त) को काबुल के द्वार पर पहुँच गया था। राष्ट्रपति अशरफ गनी के देश से भाग जाने के कुछ घंटे बाद वो अफगानिस्तान के राष्ट्रपति भवन में भी घुस गया।

तभी से ऐसी तस्वीरें सामने आ रही हैं, जिनमें लोग अपनी जान बचाने के लिए देश से भागने की कोशिश कर रहे हैं। हवाई जहाज के पहियों पर लटककर भागने की कोशिश कर रहे अफगान लोगों के आसमान से गिरने के दृश्य सोशल मीडिया पर वायरल हो गए हैं। तालिबानियों को मनोरंजन पार्क के साथ-साथ अन्य असली दृश्यों में खुद ही मजे लेते हुए भी देखा गया है।

Twitter का कट्टरपंथी तालिबान के अकाउंट्स को डिलीट करने से इनकार, कहा- ‘हम सुनिश्चित करेंगे कि वो नियमों का पालन करें’

अफगानिस्तान में कब्जा करने के बाद कट्टरपंथी इस्लामी संगठन तालिबान को माइक्रो-ब्लॉगिंग साइट ट्विटर ने अपने प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करने से रोकने के मामले में कार्रवाई करने से इनकार कर दिया है। रिपोर्ट के मुताबिक, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ने इस मामले में फेसबुक, यूट्यूब जैसे अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का अनुसरण करने से इनकार कर दिया है।

ट्विटर ने तालिबानी नेताओं के अकाउंट को सस्पेंड करने से इनकार कर दिया है। कट्टरपंथी इस्लामिक आतंकी संगठन के खिलाफ ट्विटर कार्रवाई करेगा या नहीं इसको लेकर कंपनी के प्रवक्ता ने मीडिया के इस सवाल को ही दरकिनार कर दिया। कंपनी के स्पोक्सपर्सन कहा कि वो ‘हिंसा का महिमामंडन’, अपने ‘प्लेटफॉर्म में हेरफेर और स्पैम’ पर अपने नियमों को लागू करता रहेगा।

सोशल मीडिया दिग्गज ने दावा किया, “ट्विटर की सर्वोच्च प्राथमिकता लोगों को सुरक्षित रखना है, और हम सतर्क रहते हैं।”

वर्तमान में, तालिबान के आधिकारिक प्रवक्ताओं के ट्विटर पर कई असत्यापित अकाउंट हैं। इनमें से एक जबीहुल्लाह मुजाहिद के सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर 3,10,000 से अधिक फॉलोवर्स हैं। मंगलवार (17 अगस्त 2021) को जबीहुल्ला ने तालिबान द्वारा आयोजित कथित प्रेस कॉन्फ्रेंस को बढ़ावा देने वाला एक ट्वीट पोस्ट किया था, जिसमें सैकड़ों लोगों ने कमेंट किए थे। इनमें कई आतंकी संगठन के समर्थक थे।

तालिबान के दूसरे प्रवक्ता कारी यूसुफ अहमदी के ट्विटर पर 63,000 से अधिक फॉलोवर हैं। वो हाल ही अफगानिस्तान में सरकार पर तालिबानी हमले के दौरान तेजी से प्रसिद्ध हुआ। प्रवक्ता ने अफगान नेशनल आर्मी के खिलाफ हमलों और तालिबान के विभिन्न शहरों पर कब्जा करने के बारे में आक्रामक रूप से ट्वीट किया था।

मीडिया प्लेटफॉर्म पर तालिबान का चेहरा सुहैल शाहीन भी ट्विटर पर काफी सक्रिय है। वह आतंकी संगठन की वार्ता टीम और राजनीतिक समूह का सदस्य भी है। खास बात यह है कि ट्विटर ने अभी तक इनमें से एक एक अकाउंट के खिलाफ भी कार्रवाई नहीं की है। तालिबान के प्रवक्ता अपने सैकड़ों-हजारों फॉलोवर्स को अपडेट करने के लिए कि उन्होंने अफगानिस्तान के विभिन्न क्षेत्रों पर कब्जा कर लिया है, ट्विटर का इस्तेमाल करते हैं। माइक्रो ब्लॉगिंग साइट्स ने आतंकियों को अपना प्लेटफॉर्म उपलब्ध करा रखा है। इसके लिए उसकी काफी आलोचना भी की जा रही है।

कट्टरपंथी इस्लामवादियों से जुड़े अकाउंट्स को डिलीट करने में ट्विटर की अनिच्छा ने माइक्रो-ब्लॉगिंग साइट के पाखंड को उजागर किया है। ट्विटर के कई आलोचकों ने बताया है कि कैसे ट्विटर इस साल की शुरुआत में वाशिंगटन में कैपिटल हिल दंगों के बाद संयुक्त राज्य अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प पर प्रतिबंध लगाने के लिए उत्सुक था। हालाँकि, यह उसी इरादे से इस्लामी संगठन के खिलाफ कोई भी कार्रवाई नहीं कर रहा है।

फेसबुक, यूट्यूब ने तालिबान पर प्रतिबंध लगाया

जबकि, मंगलवार (17 अगस्त 2021) को ही सोशल मीडिया की दिग्गज कंपनी फेसबुक ने घोषणा की कि उसने तालिबान और उसके सभी प्लेटफार्मों से उसका समर्थन करने वाली सभी सामग्री पर प्रतिबंध लगा दिया है, क्योंकि अमेरिकी कानून के तहत तालिबान आतंकवादी संगठन है। कंपनी ने कहा था कि अफगान विशेषज्ञों की एक समर्पित टीम समूह से जुड़े सभी कंटेंट की निगरानी कर रही है और उन्हें अपने प्लेटफॉर्म से हटा रही है।

ज्ञात हो कि तालिबान लंबे समय से अपनी आतंकी वारदातों औऱ संदेशों के प्रचार के लिए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का उपयोग कर रहा है। रिपोर्ट्स में कहा गया है कि तालिबान ने अपने संदेश को फैलाने के लिए व्हाट्सएप का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया है।

इस मामले में फेसबुक ने एक बयान में कहा, “तालिबान को अमेरिकी कानून के तहत एक आतंकवादी संगठन के माना गया है और हमने अपनी नीतियों के तहत खतरनाक संगठन को अपनी सेवाओं से प्रतिबंधित कर दिया है। इसका मतलब है कि हम तालिबान द्वारा या उसकी ओर से बनाए गए अकाउंट्स को हटा रहे हैं औऱ उसकी प्रशंसा, समर्थन और प्रतिनिधित्व करने वालों पर प्रतिबंध लगा रहे हैं।”

कंपनी ने आगे कहा, “हमारे पास अफगानिस्तान के विशेषज्ञों की एक समर्पित टीम भी है, जो देशी दारी और पश्तो बोलने वाले हैं और स्थानीय संदर्भ का ज्ञान रखते हैं, जो हमें मंच पर उभरते मुद्दों को पहचानने और सतर्क रहने में मदद करते हैं।”

इसी तरह, वीडियो शेयरिंग प्लेटफॉर्म यूट्यूब ने भी कहा है कि वह तालिबान के स्वामित्व और संचालन वाले सभी अकाउंट को बैन कर देगा। फेसबुक की ही शाखा व्हाट्सएपने अफगानिस्तान पर नियंत्रण करने के बाद तालिबान द्वारा स्थापित एक शिकायत हेल्पलाइन को भी बंद कर दिया है।

तालिबान का पूरे मुल्क पर कब्जा, पर बैंक से हाथ नहीं लगेगी फूटी कौड़ी? : बायडेन प्रशासन ने संपत्ति फ्रीज कर किया कंगाल

अफगानिस्तान पर फतह हासिल करने के बाद तालिबानी एक ओर जहाँ फूले नहीं समा रहे तो वहीं दूसरी ओर मुल्क की आर्थिक स्थिति से जुड़ी एक नई जानकारी सामने आई है। इस जानकारी के मुताबिक, बायडेन प्रशासन ने सोमवार को अमेरिकी बैंकों में रखी अफगान सरकार की संपत्ति को फ्रीज कर दिया है यानी साफ है कि तालिबान को आसानी से अफगान केंद्रीय बैंक की तकरीबन 10 अरब डॉलर की संपत्ति नहीं मिल पाएगी।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद और ओबामा प्रशासन के दौरान विदेशी संपत्ति नियंत्रण कार्यालय के निदेशक के वरिष्ठ सलाहकार रहे एडम स्मिथ ने बताया कि अमेरिका को इस संपत्ति को फ्रीज करने का पहले से ही अधिकार मिला हुआ है। वहीं, न्यूज एजेंसी रॉयटर्स ने इस मामले से अवगत एक अन्य स्रोत के हवाले से बताया कि अधिकांश संपत्ति अफगानिस्तान के बाहर रखी गई है, जहाँ तक पहुँच पाना तालिबान के लिए मुश्किल भरा काम है। रिपोर्ट्स ये भी बता रही हैं कि अमेरिका में रखी अफगान केंद्रीय बैंक की संपत्ति तालिबान को उपलब्ध नहीं कराई जाएगी।

एक अफगान अधिकारी के अनुसार, देश के केंद्रीय बैंक ‘द अफगानिस्तान बैंक’ के पास विदेशी मुद्रा, सोना और अन्य खजाना है। हालाँकि, यह कुल संपत्ति कितनी है, इसकी सही-सही जानकारी नहीं मिल पाई है। लेकिन, यूनेस्को के अनुसार, अफगान केंद्रीय बैंक की तिजोरी में 2,000 साल पुराने सोने के आभूषण, गहने और सिक्के हैं जिन्हें बैक्ट्रियन ट्रेजर कहा जाता है। लगभग 21,000 प्राचीन कलाकृतियाँ केंद्रीय बैंक के तहखाने में मिली थीं, जबकि 2003 तक माना जा रहा था कि ये गुम हो चुकी हैं। ये कलाकृतियाँ तालिबान की नजर से बची हुई थीं। कुछ न्यूज के मुताबिक अफगान नेताओं ने चोरी और लूटपाट के भय से खजाने को विदेश में रखने का विचार रखा था।

इस मामले पर अफगानिस्तान के केंद्रीय बैंक (DAB) के प्रमुख अजमल अहमदी ने बुधवार (अगस्त 18, 2021) को लगातार कई ट्वीट कर जानकारी दी। उन्होंने बताया कि देश की करीब 9 अरब डॉलर की राशि में से 7 अरब डॉलर अमेरिकी फेडरल रिजर्व के बॉन्ड, संपत्तियों और सोने में जमा है। उन्होंने ये भी बताया कि अफगानिस्तान के पास अमेरिकी मुद्रा का भंडार ‘शून्य’ है। उन्होंने कहा कि तालिबान द्वारा देश पर कब्जे के बीच देश को नकदी का भंडार नहीं मिल पाया है।

उन्होंने कहा कि अमेरिकी डॉलर की कमी से अफगानिस्तान की मुद्रा का मूल्य गिरेगा और महंगाई बढ़ेगी। इसका प्रत्यक्ष असर गरीब जनता पर पड़ेगा। अमेरिका की सरकार ने तालिबान पर प्रतिबंध लगा रखा है। इस कारण विदेशों में जमा भंडार को लाना मुश्किल होगा। उन्होंने कहा कि तालिबान ने भले ही सैन्य रूप से जीत हासिल कर ली है लेकिन अब उसके लिए देश चलाना आसान काम नहीं होगा। गवर्नर कहते हैं कि अफगान सेंट्रल बैंक की कुल संपत्ति का तालिबान केवल 0.1%-0.2% एक्सेस कर सकता है। ऐसा सिर्फ इसलिए क्योंकि अधिकतर फंड अंतरराष्ट्रीय अकॉउंट्स में फ्रीज हो चुके हैं।

ब्लूमबर्ग के आँकड़ों के मुताबिक देश की करेंसी अफगानी की कीमत मंगलवार को डॉलर के मुकाबले 1.7 फीसदी गिरकर 83.5013 के भाव पर आ गई। ऐसे में कई निवेशकों को डर है कि पाकिस्तान में भी कानून व्यवस्था की स्थिति बदतर हो सकती है और तालिबान के सपोर्ट के कारण पाकिस्तान दुनिया में अलग-थलग पड़ सकता है।

उल्लेखनीय है कि अफगानिस्तान पर तालिबान के कब्जे के बाद से कहा जा रहा है कि बायडेन प्रशासन इस मामले में अहम फैसले लेगा, लेकिन मालूम हो कि अभी तक तालिबान पर कार्रवाई को लेकर व्हाइट हाउस से कोई बयान नहीं जारी किया गया है। बस कहा जा रहा है कि अमेरिकी प्रशासन तालिबान से सीधे संवाद करेगा और अफगानिस्तान की मदद जारी रहेगी।

‘मुस्लिमों को डराने की कोशिश कर रही है योगी सरकार’: देवबंद में ATS कमांडो सेंटर से भड़की समाजवादी पार्टी

उत्तर प्रदेश सरकार ने मुस्लिम संस्था देवबंद में आतंकवाद निरोधी दस्ता (ATS) की स्थापना करने का ऐलान किया है, जिसका समाजवादी पार्टी ने कड़ा विरोध किया है। सपा ने योगी सरकार पर मुस्लिमों को डराने की कोशिश करने का आरोप लगाया है। दरअसल, दारुल उलूम देवबंद भारत का सबसे बड़ा इस्लामिक मदरसा है, जो कि कई बार आतंकी घटनाओं के मामलों में भी सामने आ चुका है।

योगी सरकार के देवबंद में एटीएस कमांडो सेंटर बनाने के फैसले के बाद उत्तर प्रदेश के एडीजी कानून व्यवस्था प्रशांत कुमार ने इसको लेकर जानकारी देते हुए बताया कि आतंकवाद निरोधी अभियानों में तेजी लाने के लिए केवल देवबंद में ही नहीं, बल्कि मेरठ, बहराइच और श्रावस्ती व जेवर में भी एटीएस की इस तरह की इकाइयों की स्थापना की जा रही है। इसके लिए तैयारी भी शुरू हो चुकी है। एडीजी के मुताबिक, देवबंद में एटीएस का सेंटर बनने से पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हम अपनी पकड़ और अधिक मजबूत कर पाएँगे।

हालाँकि, सरकार के इस फैसले से समाजवादी पार्टी नाखुश है। सपा के विधायक दल के नेता रामगोविंद चौधरी का कहना है कि देवबंद इस्लामिक शिक्षा का बड़ा केंद्र है, जो कि दुनियाभर में धार्मिक शिक्षा के लिए प्रसिद्ध है। ऐसे में एटीएस कमांडो सेंटर स्थापित कर योगी सरकार मुस्लिमों को डरा रही है। रामगोविंद का आरोप है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मुस्लिमों की जनसंख्या काफी अधिक है इसीलिए ऐसा किया जा रहा है।

फिलहाल, दारुल उलूम देवबंद की 2000 वर्ग मीटर की जमीन को सरकार ने एटीएस को ट्रांसफर कर दिया है।

गौरतलब है कि मंगलवार को उत्तर प्रदेश सरकार के प्रवक्ता शलभमणि त्रिपाठी ने ट्वीट कर एटीएस सेंटर बनाए जाने की जानकारी दी थी। उन्होंने बताया था कि इसके लिए युद्धस्तर पर काम शुरू भी हो गया है और प्रदेश भर से चुने हुए करीब डेढ़ दर्जन तेज-तर्रार ATS अधिकारियों की यहाँ तैनाती की जाएगी। बता दें कि देवबंद में ही ‘दारुल उलूम’ स्थापित है, जहाँ से इस्लामी देवबंदी अभियान शुरू हुआ था। तालिबान को भी इसी विचारधारा से प्रेरित बताया जाता है। आतंक के मामले में भी देवबंद बदनाम रहा है।

‘आपकी अफगानिस्तान की टिकट का पैसा मैं भरूँगी’ : तालिबान ‘प्रेम’ में बौराए मौलाना को रुबिका ने दिया बंपर ऑफर, स्वरा को भी लगाई लताड़

अफगानिस्तान में तालिबानियों की बर्बरता देख पूरा विश्व इस समय उनकी निंदा करने में लगा है। ऐसे में भारत का सेकुलर और कट्टरपंथी धड़ा है जो इस माहौल में भी अपना-अपना एजेंडा चला रहा है। हालाँकि, दिलचस्प बात ये है कि टीवी जर्नलिस्ट रुबिका लियाकत जैसे लोग ‘बंपर ऑफर्स’ और अपने ‘तीखे सवालों’ के साथ उन्हें जवाब दे रहे हैं।

उदहारण के लिए, तालिबान द्वारा अफगानिस्तान कब्जाने के बाद ‘ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB)’ के प्रवक्ता मौलाना सज्जाद नोमानी फूले नहीं समा रहे थे। लेकिन रुबिका ने उनकी बात सुनने के बाद उन्हें जवाब में लिखा, “मौलाना साहब आपकी तालिबान को लेकर बेइंतहा मुहब्बत देखते हुए आपके लिए एक बंपर ऑफ़र मेरे मन में आया है- आपको एक पल उनसे दूर नहीं रहना चाहिए आपकी अफगानिस्तान की टिकट का पैसा मैं भरूँगी।”

बता दें कि मौलाना ने तालिबान का समर्थन करते हुए कहा था कि तालिबान ने दुनिया की सबसे मजबूत फौज को शिकस्त दे दी है। AIMPLB प्रवक्ता ने कहा था, “एक बार फिर यह तारीख रकम हुई है। एक निहत्थी कौम ने सबसे मजबूत फौजों को शिकस्त दी है। काबुल के महल में वे दाखिल होने में कामयाब रहे। उनके दाखिले का अंदाज पूरी दुनिया ने देखा। उनमें कोई गुरूर और घमंड नहीं था।”

इसी तरह स्वरा भास्कर ने लिखा था, “हम तालिबान के आतंक पर हैरानी और दुःख जताते हुए ‘हिंदुत्व आतंकवाद’ की तारीफ नहीं कर सकते। ऐसा भी नहीं हो सकता कि हम तालिबान के आतंक पर चुप बैठें और ‘हिंदुत्व आतंकवाद’ पर आक्रोश जताएँ। हमारे मानवीय व नैतिक मूल्य इस पर आधारित नहीं होना चाहिए कि अत्याचारी कौन है और पीड़ित कौन है।”

अभिनेत्री के इस ट्वीट पर टीवी जर्नलिस्ट रुबिका ने लिखा, “हिंदुत्व टेरर! लड़ाके कहाँ है? रॉकेट लॉन्चर, मशीन गन के साथ घूम रहे आतंकी दिखा दीजिए। मुल्क पर क़ब्ज़ा करने की कोई तस्वीर दिखा दीजिए, संस्कृत या हिंदी में लिखा वो कानून बता दीजिए जहाँ घूँघट के बग़ैर औरतों के निकलने पर पाबंदी हो, अच्छा आप बस हिंदुस्तान से भाग रहे मुसलमान दिखा दें।”

उल्लेखनीय है कि ये पहली दफा पत्रकार रुबिका लियाकत ने एक्ट्रेस स्वरा भास्कर को लताड़ नहीं लगाई। पिछले साल हिंदुस्तान पेपर और एबीपी समाचार चैनल के संयुक्त प्रयास से ‘शिखर समागम’ का आयोजन किया जा रहा था, जिसमें आयोजित एक सत्र में CAA, NRC, NPR विषय पर चर्चा हो रही थी। इसी दौरान रुबिका ने स्वरा से एक के बाद एक कई सवाल किए थे।

रुबिका ने पूछा था- “NRC का draft कहाँ है?, बस आपको हवा-हवाई बातें करनी हैं, Vote देने जाएँगी कागज़ दिखाएँगी, और नारे लगवाएँगी कागज़ नहीं दिखाएँगे, मैडम आपने CAA एक्ट पढ़ा है? मुझे यकीन था आपने एक्ट नहीं पढ़ा होगा। आप मुस्लिमों को डरा रही हैं।”

अफगान दूतावास ने अशरफ गनी की गिरफ्तारी के लिए इंटरपोल से माँगी मदद, तालिबानी कमांडर ने की हामिद करजई से मुलाकात

तालिबानी हमले के कारण देश छोड़कर भागे अफगानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति अशरफ गनी की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। दरअसल, ताजिकिस्तान में अफगान दूतावास ने सार्वजनिक संपत्ति की चोरी के आरोप में पूर्व राष्ट्रपति अशरफ गनी, हमदल्लाह मोहिब और फजल महमूद फाजली को हिरासत में लेने के लिए इंटरपोल पुलिस से मदद माँगी है ताकि उन्हें पकड़ कर उनके द्वारा ले जाए गए कैश को वापस लिया जा सके।

दूतावास ने कहा है कि गनी को गिरफ्तार किया जाना चाहिए, ताकि उनके द्वारा चुराए गए धन को अफगानिस्तान को वापस किया जा सके। टोलो न्यूज के मुताबिक, ताजिकिस्तान में राजदूत मोहम्मद ज़हीर अघबर ने आज कहा है कि संविधान के अनुसार, राष्ट्रपति की अनुपस्थिति, पलायन या मृत्यु में, उपराष्ट्रपति कार्यवाहक राष्ट्रपति बनता है। अमरुल्ला सालेह वर्तमान में आधिकारिक कार्यवाहक राष्ट्रपति हैं।

हामिद करजई से मिला तालिबान

इस बीच अफगानिस्तान में कब्जा करने के बाद वहाँ सरकार बनाने की कोशिशों के तहत तालिबानी कमांडर अनस हक्कानी ने बुधवार (18 अगस्त 2021) को बातचीत के लिए देश के पूर्व राष्ट्रपति हामिद करजई से मुलाकात की। तालिबानी अधिकारी ने कहा कि बैठक में करजई के साथ पुरानी सरकार के मुख्य शांति दूत अब्दुल्ला अब्दुल्ला भी थे। अफगानिस्तान के कार्यवाहक राष्ट्रपति बने अमरुल्ला सालेह का कोई जिक्र नहीं था, जिन्होंने राष्ट्रपति अशरफ गनी के जाने के बाद देश के ‘वैध’ कार्यवाहक राष्ट्रपति होने का दावा किया था।

गौरतलब है कि अफगानिस्तान में तालिबान के कब्जे के बाद वहाँ के राष्ट्रपति अशऱफ गनी देश छोड़कर चले गए थे। वो अपने साथ एक हेलीकॉप्टर और चार कारों में पैसे भी भरकर ले गए थे। उनके पास इतना कैश था कि जब वो पैसा अपने साथ नहीं ले जा सके तो उन्हें यू ही रनवे पर छोड़ दिया था। इस बात की जानकारी रूस के दूतावास ने दी थी।

वहीं अशरफ गनी के जाने के बाद उपराष्ट्रपति रहे अमरुल्लाह सालेह ने खुद को देश का कार्यवाहक राष्ट्रपति घोषित कर दिया था।

भारतीय लिबरलों की बंदर बैलेंसिंग यूॅं ही नहीं, हिंदूफोबिया के काटों का नया आका है तालिबान

अफगानिस्तान पर तालिबान का कब्जा कोई खास आश्चर्य लेकर नहीं आया। पिछले कई महीनों में जो वातावरण तैयार हुआ था उससे लगभग तय लग रहा था कि देर-सबेर यही होना है। अफगानिस्तान के भीतर और बाहर कुछ लोगों को शायद यह आशा थी कि राष्ट्रपति अशरफ गनी की सेना तालिबान का मुकाबला करेगी पर वह नहीं हुआ।

गनी के भागते ही सेना ने हथियार डाल दिए। देश पर तालिबान के कब्जे के समय को लेकर जो अनुमान लगाए गए थे, उससे काफी पहले तालिबान ने अपना काम खत्म कर लिया। मानवता पर आई नई त्रासदी से दुःखी लोग इस तरह से चिंता प्रकट कर रहे हैं मानो तीन दिन पहले तक अफगानिस्तान में बड़ा मजबूत लोकतंत्र था। उप राष्ट्रपति सालेह अभी तक अपने बयानों की सहायता से लड़ रहे हैं पर यह तय है कि बयानों से लड़ाई नहीं लड़ी जा सकेगी। सालेह ललकार कर जिन्हें नींद से जगाना चाहते हैं, वे पहले से ही जाग रहे हैं।

भारत में भी लोग जाग रहे हैं। सोशल मीडिया पर बहस चल रही हैं। भारत को क्या करना चाहिए, भारत को क्या नहीं करना चाहिए, भारत को वहाँ रहने वालों हिंदुओं और सिखों को तुरंत देश में लाना चाहिए या नासमझी की वजह से भारत ने अफगानिस्तान में अपने निवेश का सत्यानाश कर लिया, जैसे ख़ास विश्लेषण आम हो चले हैं। कुछ लोगों का मानना है कि केवल हिंदुओं और सिखों को ही नहीं, भारतीय सरकार को चाहिए कि वहाँ के मुसलमानों को भी आने दे। यही मानवता का तकाजा है।

कुछ प्रतिक्रियाएँ यह भी बताती हैं कि पहले सोवियत रूस और फिर अमेरिका को हराने के बाद तालिबान अब भारत की ओर न केवल रुख करेगा बल्कि उसे भी हराकर रहेगा। यह सोच लिबरल भारतीय से लेकर पाकिस्तानी सुरक्षा विशेषज्ञों तक की है। कुल मिलाकर लगातार जागने वालों ने अपने शोर को नई आवाज दे दी है। यह बात अलग है कि इस्लाम के एक धड़े ने दूसरे की जगह ली है।

वैसे भारतीय ‘लिबरल’ अभी भी सो रहे हैं। इनकी नींद में खलल बस उस दबाव की वजह से है जिसमें इन्हें तालिबान के खिलाफ कुछ बोलना ही है। यह समय इनके लिए बड़ा कठिन होता दिख रहा है। ऐसे कठिन समय में तालिबान या इस्लामिक आतंकवाद की आलोचना गले से निकालें भी तो कैसे? उलाहना से पैदा होनेवाला दबाव बढ़ता है तो इन्हें आतंकवाद की आलोचना भी करनी पड़ती है। पर तालिबान की इस आलोचना की शुरुआत ये राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की आलोचना से करते हैं। इन्हें कहना पड़ता है कि तालिबान की आलोचना करना हो तो साथ संघ की भी आलोचना होनी चाहिए। तालिबान यदि आतंकवादी हैं तो संघ के लोग भी आतंकवादी हैं।

इस बंदर बैलेंसिंग में ये बस यह नहीं बता पाते कि संघ ने कब और कहाँ किसी का तख़्त पलटा? कब महिलाओं पर अत्याचार किया, उन्हें गोली मारी या उन्हें सार्वजनिक तौर पर सजा सुनाई? पर हाल यह है कि ये लानत भी भेजते हैं तो उस गोली पर जो तालिबान के असॉल्ट राइफल से निकलती है। शिकायत भी करते हैं तो भारत से उसने अफगानिस्तान में निवेश क्यों किया? इस बार तो हाल यह है कि दूसरी बार सत्ता पर काबिज होने वाले तालिबान को ये मॉडरेट तालिबान बताने पर तुले हुए हैं, उस पकिस्तानी ‘जनरैल’ की तरह जिसने पहली बार दुनिया के सामने ‘गुड तालिबान’ और ‘बैड तालिबान’ का सिद्धांत प्रतिपादित किया था।

दरअसल ये लिबरल सराहना से लेकर आलोचना तक, कुछ भी विशुद्ध नहीं कर सकते। केवल एक बात इनकी विशुद्ध रहती है और वह है बेशर्मी। ये यह कहकर बेशर्मी दिखाने की औकात रखते हैं कि तालिबान ने अफगानिस्तान के लोगों पर जुल्म भले किया पर वे प्रेस कॉन्फ्रेंस कर रहे हैं। ये यह भी कहते हैं कि भारत में फासीवाद बढ़ गया है और भारत रहने लायक नहीं रहा पर पता नहीं कौन सी मज़बूरी के तहत अफगानिस्तान के मुसलमानों को भारत ले आने की भी माँग करते हैं। अब यह विशुद्ध बेशर्मी नहीं है तो और क्या है? ये चाहते हैं कि भारतीय सरकार अफगानिस्तान के मुसलामानों को भारत ले आए, बिना यह सोंचे कि वे यहाँ आना चाहते हैं या नहीं? वैसे भी अफगानिस्तान के मुसलमान यदि आना ही चाहते हैं तो वे सरकार से सीधी अपील करेंगे कि इन लिबरल की माँगों का इंतजार करेंगे?

दरअसल इन लिबरल में से कुछ की खुशी छिपाए नहीं छिप रही। और ऐसा क्यों न हो? आखिर जिस इमरान खान को इन्होंने कभी स्टेट्समैन घोषित किया था, उसके अनुसार; तालिबान द्वारा सत्ता पर कब्जे के बाद अफगानिस्तान के लोगों की दिमागी जंजीरें टूट गई हैं। इनकी आदर्श चीनी सरकार के विदेश मंत्री पहले से ही तालिबान से न केवल मुलाकातें कर रहे हैं, बल्कि उन्हें मान्यता भी दे चुके हैं। हाल यह है कि दुनिया में कहीं भी इस्लामिक आतंकवाद को लेकर इनकी प्रतिक्रिया लगातार खतरनाक स्तर की ओर जा रही है। सत्ता पर तालिबान के दोबारा कब्जे को उपमहाद्वीप के अधिकतर मुसलमान इस्लाम की जीत मानते हैं। दूसरी तरफ ये भारतीय लिबरल अफगानिस्तान में घटी इस घटना को यह कहकर सेलिब्रेट कर रहे हैं कि तालिबान ने औरतों को शरिया के तहत उनका अधिकार सौंपने का वादा किया है। कुछ तो यहाँ तक कहते हुए मिल रहे हैं कि सोवियत संघ और अमेरिका जैसी ताकतों को हराने वाले तालिबानी अब भारत को हराएँगे।

भारतीय लिबरलों का यह मानसिक दिवालियापन खुलकर सामने आ गया है। वैसे भी वर्तमान भारतीय प्रधानमंत्री के प्रति अपनी घृणा में ये इतने नीचे चले जाते हैं कि इन्हें अपने सार्वजनिक आचरण का भान नहीं रहता। इस्लामिक आतंकवाद के समर्थन और उसके कुकृत्यों पर चूना पोतने के अपने पुराने एजेंडे पर काम करते समय इन्हें मानवता पर आई किसी त्रासदी या इनकी अपनी नैतिकता में लगातार हो रही गिरावट से जरा भी समस्या नहीं है। यह ऐसी स्थिति है जिसमें हम कभी इनसे सार्वजनिक तौर पर भी नैतिकता की आशा नहीं कर सकते। इन भारतीय लिबरल का आचरण इस बात को बल देता है कि आज इस्लामिक आतंकवाद के साथ वैचारिक कन्धा मिलाकर खड़ा होने में जिन्हें शर्म नहीं, वे भविष्य में सामरिक कंधा देने के लिए खड़े हो जाएँ तो आश्चर्य न होगा।

पंजशीर की जमीन, जासूसों का नेटवर्क, नॉर्दर्न अलायंस के फाइटर: क्या तालिबान की कब्र खोद पाएँगे अमरुल्लाह सालेह

अफगानिस्तान से सटा हुआ देश है ताजिकिस्तान। यहाँ अफगानी दूतावास से देश छोड़ भागे राष्ट्रपति अशरफ गनी की फोटो हटा दी गई है। लेकिन वहाँ तस्वीर किसी तालिबानी शासक की नहीं, बल्कि अमरुल्लाह सालेह की लगाई गई है।

तालिबानी कब्जे से पहले सालेह अफगानिस्तान के उपराष्ट्रपति हुआ करते थे। ऐसे वक्त में जब राष्ट्रपति देश छोड़ भाग चुके हैं, फौज घुटने टेक चुकी है, अफगान नागरिक किसी भी तरह मुल्क से बाहर निकलना चाहते हैं, सालेह ने तालिबान के आगे झुकने से इनकार करते हुए खुद को अफगानिस्तान का कार्यवाहक राष्ट्रपति घोषित किया है।

ध्यान देने वाली बात यह भी है कि ताजिकिस्तान के अफगान दूतावास में सालेह के साथ कमांडर अहमद शाह मसूद की तस्वीर भी लगाई गई है, जिन्हें ‘पंजशीर का शेर’ कहा जाता है। पंजशीर अफगानिस्तान का एकमात्र ऐसा प्रांत है जो तालिबान के कब्जे से बाहर है। माना जा रहा है कि सालेह भी यहीं हैं।

कौन हैं अमरुल्लाह सालेह?

अफगानिस्तान के उपराष्ट्रपति और खुफिया एजेंसी का पदभार सँभालने वाले सालेह तालिबान और पाकिस्तानी आतंकी संगठनों के विरोधी रहे हैं। उन्होंने हमेशा तालिबान का विरोध किया और आज की परिस्थिति में भी सालेह अफगानी नागरिकों से तालिबान के विरोध में खड़े होने की अपील कर रहे हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक सालेह के नेतृत्व में प्रतिरोधी सेनाओं ने न केवल तालिबान के खिलाफ कार्रवाई की, बल्कि काबुल के उत्तरी हिस्से में स्थित परवान प्रांत के चरिकार इलाके से तालिबान को हटा दिया है।

खुफिया नेटवर्क की बात की जाए तो सालेह संभवतः अफगानिस्तान के सबसे बड़े नेतृत्वकर्ता हैं। सालेह ने अपने कार्यकाल के दौरान जासूसों का एक ऐसा नेटवर्क तैयार किया जो तालिबान, पाकिस्तानी आतंकी संगठन और ISIS पर पैनी नजर रखते हैं। सालेह के संबंध भारत के साथ भी हमेशा से ही बेहतर रहे हैं, खास तौर पर भारतीय खुफिया एजेंसी रॉ (RAW) के साथ। अफगानिस्तान में तालिबान के शुरूआती दौर में जब इस्लामी संगठन के खिलाफ मसूद ने जंग का ऐलान किया था, तब सालेह उनके साथ थे। सालेह ने ही मसूद की मुलाकात भारतीय अधिकारियों से कराई थी जिससे मसूद को काफी सहायता मिली थी।

पंजशीर और नॉर्दर्न अलायंस

पंजशीर, अफगानिस्तान का एकमात्र ऐसा प्रांत है जो तालिबान के कब्जे से बाहर है और यहाँ एक बार फिर नॉर्दर्न अलायंस का झंडा बुलंद कर दिया गया है। 2001 के बाद एक बार फिर पूरे पंजशीर में नॉर्दर्न अलायंस के झंडे दिखाई दे रहे हैं जो इस बात की गवाही दे रहे हैं कि पंजशीर आज भी तालिबान के आगे नहीं झुका है। पंजशीर के बारे में खास बात यह है कि सालेह यहीं के रहने वाले हैं और तालिबान के प्रखर विरोधी रहे कमांडर अहमद शाह मसूद को भी ‘पंजशीर का शेर’ कहा जाता है। सालेह, मसूद को अपना नायक मानते हैं और कहते हैं कि वो कभी भी अपने नायक के साथ गद्दारी नहीं करेंगे।

सालेह की पंजशीर से कई फोटो भी सामने आईं जहाँ वो लोगों के साथ बैठकर चर्चा कर रहे हैं। अहमद शाह मसूद के बेटे अहमद मसूद के नेतृत्व में तालिबान विरोधी सेनाएँ लगातार मजबूत हो रही हैं। नॉर्दर्न अलायंस एक तालिबान विरोधी आंदोलन था जो 1996 के दौरान मजबूत हुआ था। अहमद शाह मसूद के नेतृत्व में पहले इस आंदोलन में ताजिकिस्तान मूल के कुछ समूह जुड़े थे, लेकिन समय के साथ इसमें कई अफगानी समूह भी शामिल होते गए।

अब जबकि सालेह ने खुद को अफगानिस्तान का कार्यवाहक राष्ट्रपति घोषित कर दिया है और उनके नेतृत्व में तालिबान विरोधी सेनाएँ भी सक्रिय दिखाई दे रही हैं तो संभावना है कि अफगानिस्तान में सालेह और नॉर्दर्न अलायंस के नेतृत्व में एक बार फिर तालिबान विरोधी आंदोलन उठ खड़ा हो और यह भी संभव है कि इस आंदोलन का केंद्र भी पंजशीर ही बने जहाँ तालिबान अपने इतिहास में कभी कदम भी नहीं रख पाया। एक सवाल यह भी है कि क्या अमरुल्लाह सालेह ‘अफगानिस्तान के शेर’ बन पाएँगे, क्योंकि इसी तालिबान ने उनकी बहन की हत्या की थी।

बांग्लादेश के शिव मंदिर में प्रतिमाएँ विखंडित की, 18 वर्षीय शकीलउद्दीन रंगे हाथों धराया: हिन्दुओं ने पुलिस को सौंपा

बांग्लादेश के नोआखली में एक हिन्दू मंदिर में तोड़फोड़ की घटनाएँ सामने आई हैं। मंदिर में तोड़फोड़ करने आए शकीलउद्दीन नामक युवक को रंगे हाथों पकड़ा गया। ‘बांग्लादेश हिन्दू यूनिटी काउंसिल’ ने सोशल मीडिया के माध्यम से बताया कि मैजड़ी मास्टरपारा इलाके में ये घटना हुई है। स्थानीय हिन्दुओं ने आरोपित युवक को रंगे हाथों दबोच लिया और इसके बाद उसे पुलिस के हवाले कर दिया गया।

आरोपित की पहचान जिले के बेगमगंज उपजिला के जिरताली संघ के अब्दुर गफूर पुत्र मोसलेह उद्दीन उर्फ ​​शकील के रूप में हुई है। उसकी उम्र मात्र 18 वर्ष है। गिरफ्तार युवक को मंगलवार (18 अगस्त, 2021) की सुबह नोआखली मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी की अदालत में पेश किया गया। इससे पहले घटना उपजिला के मैजड़ी कस्बे के मास्टरपारा इलाके के एक शिव मंदिर में सोमवार की रात करीब साढ़े 11 बजे तोड़फोड़ हुई

घटनास्थल से कैद एक वीडियो पहले ही सोशल मीडिया पर सामने आ गया था। वीडियो में देखा जा सकता है कि शिव मंदिर के अंदर दो मूर्तियों में एक प्रतिमा को क्षतिग्रस्त कर दिया गया और दूसरे वाले को भी जमीन पर पटक दिया गया। बगल में दूसरी मूर्ति बिलकुल ठीक थी। मंदिर के बाहर आक्रोशित हिन्दुओं ने आरोपित युवक को दबोचने में कामयाबी आई। पुलिस के आने तक उसे मंदिर के ही सामने एक खम्भे से बाँध कर रखा गया था, ताकि वो भागे नहीं।

सुधारम पुलिस प्रभारी प्रभारी (ओसी) ने कहा कि आरोपी युवक शकील ने मूर्ति तोड़ने की बात कबूल कर ली है।

इससे पहले बांग्लादेश में कुछ कट्टरपंथियों ने अल्पसंख्यक हिंदू समुदाय के कई घरों, दुकानों पर हमला किया और चार मंदिरों में तोड़फोड़ की थी। यह घटना बांग्लादेश के खुलना जिले के रूपशा उपजिला के शियाली गाँव में हुई थी। मुस्लिम भीड़ ने इलाके के सभी मंदिरों और 58 हिंदुओं के घरों में तोड़फोड़ की थी। हथियारों से लैस आतंकियों ने घात लगाकर गाँव पर हमला किया था।  6 दुकानों को भी नष्ट कर दिया गया।