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भारत ने सीमा पार ढकेले 1000+ घुसपैठिए, मोदी सरकार के एक्शन पर बांग्लादेश का रोना छूटा: जानें क्या है ‘ऑपरेशन पुश बैक’, जिससे छूटे बांग्लादेशी सेना के पसीने

भारत में बांग्लादेशी-रोहिंग्या घुसपैठियों के खिलाफ मोदी सरकार ने ऑपरेशन पुश-बैक चलाया हुआ है। इस ऑपरेशन के तहत त्वरित कार्रवाई करते हुए घुसपैठियों को उनके मुल्क चुन-चुनकर वापस भेजा रहा है। करीबन 1000+ बांग्लादेशी अब तक वापस भेजे जा चुके हैं। इसी तरह रोहिंग्याओं पर भी सरकार सख्त है। जाहिर ये कार्रवाई इस्लामी कट्टरपंथियों को और उन लोगों को पसंद नहीं आ रही जिनपर एक्शन हो रहा है। इसी क्रम में भारतीय सेना और सरकार दोनों को बदनाम करने के प्रयास भी पूरे हैं।

हाल में डेली स्टार ने एक खबर प्रकाशित जी है जिसमें उन लोगों के दुखड़ा बताया गया जिन्हें पकड़कर भारत से वापस भेजा गया। इनमें एक 41 साल की सेलिना बेगम का जिक्र है। बताया गया है कि सेना ने हरियाणा से पकड़ा था। वहाँ वह मजदूरी करती थी। बाद में उन्हें त्रिपुरा सीमा के नजदीक फेनी नदी में कमर पर खाली बोतलें बाँधकर फेंक दिया और वो पूरी रात नदी में बस तैरती रहीं। अंत में उन्हें उनके बांग्लादेश सीमा गार्ड ने बचाया। उनके मुताबिक उनके साथ उनकी बच्चियाँ भी थीं।

रिपोर्ट में दिखाया गया है कि कैसे भारतीय प्रशासन ने उन्हें प्रताड़ना दी। उन्हें भूखे रखकर अपनी कैद में रखा और फिर सीमा पार फेंक दिया। इसमें बीजीबी (बांग्लादेश बॉर्ड गार्ड) के महानिदेशक मेजर जनरल मोहम्मद अशरफज्जमां सिद्दीकी का कहना है कि वो बार-बार ऐसी घटना का विरोध कर रहे हैं, मगर फिर भी ऐसा हो रहा है। बीएसएफ उनकी सुन रही है।

इसी रिपोर्ट के मुताबिक 7 मई तक करीबन 1053 लोगों को सीमा पार वापस भेजा गया है। इनमें खगराछारी में 111 लोगों को, कुरीग्राम में 84 लोगों को, सिलहट में 103 लोगों को, मौलवीबाजार में 331 लोगों को, हबीगंज में 19 लोगों को, सुनामगंज में 16 लोगों को, दिनाजपुर में दो लोगों को, चपैनवाबगंज में 17 लोगों को, ठाकुरगाँव में 19 लोगों को, पंचगढ़ में 32 लोगों को, लालमोनिरहाट में 75 लोगों को, चुआडांगा में 19 लोगों को, झेनैदाह में 42 लोगों को, कुमिला में 13 लोगों को, फेनी में 39 लोगों को, सतखीरा में 23 लोगों को और मेहरपुर में 30 लोगों को सीमा पार कर भेजा गया है।

ऑपरेशन पुश बैक से क्या समस्या

दिलचस्प बात ये है कि जिस ऑपरेशन पुश बैक के नाम पर मोदी सरकार को घेरने का प्रयास हो रहा है और ऐसे दिखाया जा रहा है जैसे इससे मानवाधिकार हनन हो रहा है, वही मीडिया ये नहीं बता रहा है कि कैसे ये बांग्लादेशी भारत में चोरी-छिपे अवैध रूप से घुसे और उसके पास इन्होंने फर्जी आधार कार्ड, पहचान पत्र बनवाकर यहाँ सालों तक रहते रहे। अब जब इनके विरुद्ध कोई सरकार आई है और एक्शन ले रही है तो समस्या ये है कि ऐसा क्यों हो रहा है। क्यों देश में अवैध रूप से घुसे लोगों पर दया नहीं दिखाई जा रही है या उन्हें उन्हें डिटेंशन सेंटर में अच्छा भोजन क्यों नहीं कराया जा रहा।

क्या है ऑपरेशन पुश बैक?

‘ऑपरेशन पुश-बैक’ भारत सरकार की एक नई रणनीति है, जिसका उद्देश्य पूर्वी सीमा पर पकड़े जाने वाले बांग्लादेशी घुसपैठियों और रोहिंग्याओं से त्वरित रूप से निपटना है। ये वे लोग हैं जो कई वर्षों से अवैध रूप से भारत में रह रहे हैं।

इस ऑपरेशन के तहत अब उस पारंपरिक प्रक्रिया जैसे पुलिस को सौंपना, FIR दर्ज करना, अदालत में पेश करना, मुकदमा चलाना और फिर निर्वासन प्रोटोकॉल के तहत वापस भेजना को किनारे कर दिया गया है। अब भारतीय सुरक्षाबल घुसपैठियों को तुरंत सीमा पार बांग्लादेश की ओर धकेल रहे हैं। यह इसलिए हो रहा है ताकि समय और संसाधनों की बचत हो और अवैध घुसपैठ पर तुरंत प्रभाव डाला जा सके।

असम कॉन्ग्रेस अध्यक्ष बनते ही गौरव गोगोई ने पाकिस्तानी कनेक्शन पर तोड़ी चुप्पी, कहा- बीवी वहाँ काम करती थी, मैं भी गया हूँ: CM बोले- इनके आतंकी मुल्क से गहरे लिंक

असम कॉन्ग्रेस की जिम्मेदारी दिए जाने के बाद गौरव गोगोई ने कबूल किया है कि उनकी पत्नी ने पाकिस्तान में काम किया है। वो खुद साल 2013 में पाकिस्तान गए थे। उनका ये कबूलनामा तब सामने आया है, जब हिमंता बिस्वा सरमा ने उन पर पाकिस्तान में ट्रेनिंग लेने का आरोप लगाया था और बताया था कि 10 सितंबर को वो इस मामले की जाँच रिपोर्ट सामने रखेंगे।

बता दें कि 18 मई 2025 को गुवाहाटी में एक कार्यक्रम के दौरान हिमंता बिस्वा सरमा ने गौरव गोगोई पर गंभीर आरोप लगाए थे। उन्होंने कहा, “गौरव गोगोई पाकिस्तान में ISI के निमंत्रण पर गए थे। यह कोई पर्यटन यात्रा नहीं थी, बल्कि ट्रेनिंग के लिए थी। हमें उनके पाकिस्तान के गृह मंत्रालय से मिले निमंत्रण पत्र के दस्तावेज उपलब्ध हैं।” सरमा ने दावा किया कि यह मामला देश की सुरक्षा से जुड़ा है और 10 सितंबर को वे इसकी पूरी जाँच रिपोर्ट जनता के सामने रखेंगे।

हिमंता ने यह भी कहा कि गोगोई ने पाकिस्तान की सत्ता के साथ मिलकर काम किया और भारत लौटकर राफेल सौदे का विरोध किया। सरमा ने चुनौती दी कि अगर उनका एक भी शब्द गलत साबित हुआ, तो वे मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे देंगे।

गौरव गोगोई ने अपनी सफाई में क्या कहा?

गौरव गोगोई ने इन आरोपों का जवाब देते हुए कहा कि उनकी पत्नी एलिजाबेथ 14-15 साल पहले दक्षिण एशिया के एक प्रतिष्ठित ‘इंडिया-एशिया प्रोजेक्ट’ के तहत एक साल के लिए पाकिस्तान गई थीं। उन्होंने बताया, “मेरी पत्नी पब्लिक पॉलिसी विशेषज्ञ हैं और उनका काम पूरी तरह पेशेवर था। इस मुद्दे को बार-बार उठाकर मेरी छवि खराब करने की कोशिश हो रही है।” गोगोई ने यह भी स्वीकार किया कि वे खुद 2013 में एक बार पाकिस्तान गए थे, लेकिन इसके बाद किसी भी सरकारी एजेंसी ने उनसे सवाल नहीं उठाया। उन्होंने कहा, “अगर हमने कुछ गलत किया होता, तो 11 साल से केंद्र में बैठी सरकार और उसकी जाँच एजेंसियाँ क्या कर रही थीं?”

गोगोई ने आरोप लगाया कि एक विपक्षी सांसद के तौर पर संसद में उनकी सक्रियता के कारण उन्हें निशाना बनाया जा रहा है। उन्होंने कहा, “असम की जनता मुझे जानती है। मेरे और मेरी पत्नी का नाम बार-बार उछालकर कुछ लोग पब्लिसिटी हासिल करना चाहते हैं।” गौरव ने यह भी तंज कसा कि इस विवाद को आधार बनाकर एक ‘सी-ग्रेड बॉलीवुड फिल्म’ बन रही है, जो 10 सितंबर को रिलीज होगी, लेकिन वह पूरी तरह फ्लॉप होगी।

हिमंता ने फिर से किया पलटवार, कहा- कोई असम वासी नहीं करेगा स्वीकार

गौरव गोगोई की प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद हिमंता बिस्वा सरमा ने फिर से तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा, “यह व्यक्ति (गौरव गोगोई) खुलेआम पाकिस्तानी एजेंट है। कोई भी असम वासी कारगिल युद्ध में शहीद जिंटु गोगोई या पहलगाम घटना के बलिदान को नहीं भूलेगा। कोई भी असम वासी पाकिस्तान यात्रा को जायज ठहराने को स्वीकार नहीं करेगा।”

सरमा ने कहा कि गौरव गोगोई और उनकी पत्नी के पासपोर्ट और वीजा की जाँच के लिए एक केस दर्ज किया जाएगा। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि इस मामले में और भी खुलासे हो सकते हैं।

गौरतलब है कि हिमंता बिस्वा सरमा ने गौरव गोगोई की पत्नी एलिजाबेथ कोलबर्न पर भी गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि कोलबर्न 2011-15 के बीच क्लाइमेट एंड डेवलपमेंट नॉलेज नेटवर्क (CDKN) और LEAD जैसे संगठनों के लिए काम करते हुए अधिकतर समय पाकिस्तान में रहीं। सरमा ने दावा किया कि कोलबर्न पाकिस्तान सरकार की एक टास्क फोर्स में शामिल थीं, जो कथित तौर पर ISI का मुखौटा थी।

सरमा ने कोलबर्न की ब्रिटिश नागरिकता और उनके सुपरवाइजर अली तौकीर शेख के भारत विरोधी प्रोपेगैंडा का भी जिक्र किया। सरमा ने यह भी सवाल उठाया कि क्या गौरव गोगोई के पिता और पूर्व मुख्यमंत्री तरुण गोगोई के कार्यकाल में ISI का असम के मुख्यमंत्री कार्यालय तक दखल था।

नदी में डुबकी लगवाकर पीलीभीत के सिख बनाए गए ईसाई, छोटे-छोटे बच्चों का भी किया ब्रेनवॉश: स्थानीय बोले- पहले ले जाते हैं चर्च, फिर कहते हैं गुरु ग्रंथ साहिब छोड़ो

उत्तर प्रदेश का पीलीभीत जिला। इंटरनेशनल बॉर्डर पर पड़ती है पूरनपुर तहसील। यहाँ के तीन गाँव – सिंघाड़ा उर्फ टाटरगंज, भागीरथ और बेल्हा सिख बाहुल्य हैं। करीब 22000 राय सिखों की आबादी वाले इन गाँवों में 3000 से ज्यादा लोग ईसाई बन चुके हैं। साल 2002 से नेपाल के रास्ते शुरू हुआ धर्मांतरण का खेल अब खुलने लगा है। सिख संगठन, हिंदू संगठन लोगों की घर वापसी करा रहे हैं और करीब 700 लोग घर वापसी कर फिर से सिख संगत में लौट चुके हैं। इस बीच, कुछ नाम ऐसे आ रहे हैं, जो इस धर्मांतरण गिरोह से जुड़ी अहम कड़ी हो सकते हैं। ऐसा ही एक नाम है टाटरगंज के प्रधान का पति अर्जुन सिंह का।

भास्कर ने अपनी ग्राउंड रिपोर्ट में बताया है कि टाटरगंज की प्रधान का पति अर्जुन सिंह पहले सिख ही था। वो काफी दबंग है। लोग खूब डरते हैं। वो किसी वजह से ईसाई बन गया। अब लोगों को ईसाई बना रहा है। अर्जुन सिंह टाटरगंज में 4-5 बार ईसाइयों की मीटिंग भी करा चुका है। उसी एक मीटिंग में उसे पादरी का पद दे दिया गया और फिर वो जोर-शोर से ग्रामीणों को ईसाई बनाने में जुट गया।

एक स्थानीय युवक ने बताया, शुरू में कुछ लोग उसके समझाने पर आराम से ईसाई बनने के लिए मान गए। कुछ लोगों ने विरोध किया, तो उन्हें धमकाया गया। उनकी बेटियों से छेड़छाड़ की गई। ईसाई बनने पर इन सब चीजों से बचाने की गारंटी दी गई। उक्त युवक ने बताया कि अर्जुन सिंह को ईसाई गिरोह से गिफ्ट में एक घर भी मिला है। शायद अब भी उसके इस काम के लिए पैसे मिल रहे हैं। अब उसकी प्रधान पत्नी भी लोगों को ईसाई बनने पर सरकारी सुविधाओं को देने का लालच देने लगी है।

एक युवक ने बताया कि पहले तो हमसे गुरु ग्रंथ साहिब को दूर रहने के लिए कहा जाता है और फिर धीरे-धीरे ईसाइयत की तरफ मोड़ दिया जाता है। एक व्यक्ति ने बताया कि उसे नेपाल की सीमा पर शारदा नदी में तीन डुबकी लगवाई गई और ईसाई मजहब में शामिल कर लिया गया। इसकी शुरुआत वो चर्च ले जाने से करते हैं और फिर लालच देकर ईसाई बनाते हैं। पीलीभीत जिले में तैनात रहे एक अधिकारी ने ऑफ कैमरा बताया कि यहाँ धर्मांतरण खूब हुआ है। लालच इसके पीछे बड़ी वजह है।

ऑपइंडिया अपनी पिछली रिपोर्ट में बता चुका है कि सतनाम सिंह नाम का व्यक्ति सबसे पहले ईसाई बना था और फिर पूरे इलाके में धर्मांतरण की झड़ी लग गई। वह चरस की तस्करी करता था। टाटरगंज गाँव के रहले वाले सतनाम सिंह को पास्टर बनाया गया। उसने लालच देकर आसपास के गाँवों में ईसाई धर्मांतरण के इस रैकेट को आगे बढ़ाया।

पीलीभीत के बेल्हा गाँव के गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के सचिव परमजीत सिंह के हवाले से इस रिपोर्ट में बताया गया है कि करीब 150 घरों पर क्रॉस के निशान बने हुए हैं। कुछ घरों में प्रार्थना गतिविधियाँ भी हो रही है। उन्होंने बताया है कि शिकायत के बाद प्रशासन ने घरों के बाहर लगे क्रॉस निशान हटवाने का अभियान शुरू किया है। साथ ही करीब 100 घरों में विशेष तरह के कैलेंडर मिलने की बात कहते हुए धर्मांतरण के लिए दक्षिण कोरिया से पैसा आने की आशंका जताई है।

बता दें कि पीलीभीत के हजारा थाना क्षेत्र के गाँवों जैसे बेल्हा, टाटरगंज, बमनपुरी और सिंघाड़ा में लंबे समय से धर्मांतरण की शिकायतें सामने आ रही थीं। स्थानीय सिख संगठनों का दावा है कि नेपाल से आए पादरियों और कुछ स्थानीय पास्टरों ने आर्थिक लालच और चंगाई सभाओं के जरिए सिखों को ईसाई धर्म अपनाने के लिए प्रेरित किया। ऑल इंडिया सिख पंजाबी वेलफेयर काउंसिल के मुताबिक, पिछले कुछ सालों में 3,000 से ज्यादा सिखों का धर्म परिवर्तन हुआ। इनमें से 160 परिवारों की सूची प्रशासन को सौंपी गई थी।

घर वापसी में जुटे सिख और हिंदू संगठन

इससे पहले, शुक्रवार (23 मई 2025) को बेल्हा और टाटरगंज गाँवों में आयोजित घर वापसी समारोह में सिख समुदाय के लोग बड़ी संख्या में शामिल हुए। विश्व हिंदू परिषद (विहिप) के इस कार्यक्रम में करीब 500 सिखों की घर वापसी हुई। अब तक कुल 700 सिखों की घर वापसी की बात कही जा रही है।

बांग्लादेश ने उस जमाती आतंकी को छोड़ा जिसने की 1250+ हत्या, चलाता था रेप कैंप, फूँक दिए थे हिंदुओं के गाँव: ATM अजहरुल इस्लाम को मिली थी मौत की सजा

बांग्लादेश के सुप्रीम कोर्ट ने जमात-ए-इस्लामी के आतंकी को रिहा कर दिया है। रिहा किए गए इस इस्लामी आतंकी का नाम ATM अजहरुल इस्लाम है। जेल से रिहा किए गए जाने के बाद उसका इस्लामी कट्टरपंथियों ने फूल-मालाओं से स्वागत किया है। यह मौलाना 1971 में किए गए रेप, हत्या और अपहरण जैसे युद्ध अपराधों के लिए सजा काट रहा था।

ATM अजहरुल इस्लाम को वर्ष 2012 में आवामी लीग सरकार ने गिरफ्तार किया था। उसे पाकिस्तानी सेना के साथ मिलकर 1,256 लोगों की हत्या, 17 लोगों का अपहरण और 13 महिलाओं के साथ रेप करने का दोषी पाया गया था।

जमात-ए-इस्लामी का यह आतंकी नरसंहार, हिरासत, यातना, लूटपाट और आगजनी में भी शामिल था। दिसंबर 2014 में अंतर्राष्ट्रीय अपराध न्यायाधिकरण (ICT) ने उसे दोषी ठहराया था। ATM अजहरुल इस्लाम को मानवता के खिलाफ अपराध के 3 मामलों में मौत की सजा और 2 मामलों में कारावास की सजा सुनाई गई थी।

अक्टूबर 2019 में सुप्रीम कोर्ट के इसी अपील डिवीजन ने उसकी मौत की सजा को बरकरार रखा था। हालाँकि, इस साल फरवरी में बांग्लादेश के सुप्रीम कोर्ट ने अजहरुल को दोषी फैसले को चुनौती देने के लिए नई अपील दायर करने की अनुमति दी।

इस अपील डिवीजन ने पहले उसकी दोषसिद्धि और मृत्युदंड को बरकरार रखा था। इसके बाद बांग्लादेश के सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (27 मई, 2025) को जमात-ए-इस्लामी आतंकी को बरी कर दिया। वह 28 मई को बाहर आया तो उसका स्वागत करने के लिए बांग्लादेश के इस्लामी कट्टरपंथी खड़े थे।

अगस्त, 2024 में शेख हसीना के सत्ता से जाने के बाद और मोहम्मद यूनुस के कुर्सी संभालने के बाद लगातार इस्लामी आतंकियों को रिहा किया जा रहा है।

ATM अजहरुल इस्लाम के 1971 के अपराध

ATM अजहरुल इस्लाम ने वैसे ही अपराध किए थे, जैसे ऑपरेशन सर्चलाईट के दौरान 26 मार्च 1971 और 25 मई 1971 के बीच पाकिस्तानी सेना द्वारा किए गए थे। उसके अपराध बांग्लादेश के रंगपुर डिवीजन में केंद्रित थे और बांग्लादेश मुक्ति युद्ध (26 मार्च 1971 से 16 दिसंबर 1971) के अंत तक चलते रहे।

अंतर्राष्ट्रीय अपराध न्यायाधिकरण की जाँच के अनुसार, ATM अजहरुल इस्लाम ने 16 अप्रैल 1971 को मोक्षेदपुर गाँव पर हमला किया था। वह निहत्थे नागरिकों की हत्या, घरों को लूटने और उन्हें आग लगाने में शामिल था। उसके साथ पाकिस्तानी सेना और जमात-ए-इस्लामी के अन्य आतंकवादी भी थे।

एक दिन बाद (17 अप्रैल 1971) को ATM अजहरुल इस्लाम ने हिंदू बहुल गाँवों में व्यवस्थित तरीके से हमले किए और झारूआरबील के पास 1200 से अधिक लोगों की हत्या कर दी। वह अपहरण, आगजनी, हत्या और बड़े पैमाने पर नरसंहार में शामिल था।

उसने पाकिस्तानी सेना के साथ मिलकर रंगपुर कारमाइकल कॉलेज पर छापा मारा और यहाँ 4 हिंदू प्रोफेसरों और 1 महिला का अपहरण किया। सभी 5 पीड़ितों की बेरहमी से हत्या कर दी गई। यह घटना 30 अप्रैल 1971 को हुई थी।

ATM अजहरुल इस्लाम ने मार्च और दिसंबर 1971 के बीच रंगपुर में एक ‘रेप कैम्प’ चलाया, जहाँ उसने अपने पीड़ितों का अपहरण किया, उन्हें कैद किया, प्रताड़ित किया और बार-बार बलात्कार किया। वह नवंबर और दिसंबर 1971 के बीच ‘जॉय बांग्ला’ का नारा लगाने वाले एक युवक के भाई पर हमला करने में भी शामिल था

मानवता के खिलाफ अपराधों में उसकी मिलीभगत के भारी सबूतों के बावजूद, आतंकवादी ATM अजहरुल इस्लाम को रिहा कर दिया गया है।

विनायक दामोदर सावरकर: एक ऐसा नाम जिससे अंग्रेज भी काँपते थे, जो थे हिन्दू राष्ट्र के पुनर्जागरण के स्वप्नद्रष्टा

भारत के इतिहास में कुछ ऐसे व्यक्तित्व हैं, जिनके बारे में जितना भी लिखा जाए, वह कम ही लगता है। वीर विनायक दामोदर सावरकर (स्वातंत्र्यवीर सावरकर) ऐसा ही एक नाम हैं। जब भी मैं उनके बारे में सोचता हूँ तो सिर्फ एक क्रांतिकारी चेहरा नहीं उभरता, बल्कि एक विचार, एक चेतना और एक जीवंत राष्ट्र का स्वप्न दिखाई देता है, जो आज भी हमें अपने भारतभूमि के लिए कुछ करने के लिए प्रेरित करता है।

अंग्रेजों की नजरों में सबसे खतरनाक व्यक्ति

सावरकर अंग्रेजों के लिए केवल एक राजबंदी नहीं थे, बल्कि वे उनके लिए एक ‘Dangerous Mind’ थे। अंग्रेजों को डर था कि अगर वीर सावरकर जैसे व्यक्ति देश में खुलकर बोलने लगे, तो उनका राज एक दिन भी टिक नहीं पाएगा। और यही कारण था कि उन्हें गिरफ़्तार करके काला पानी जैसी भयावह जेल में भेजा गया, जहाँ उन्होंने 11 वर्षों तक अमानवीय यातनाएँ सही। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी।

उन्होंने जिस तरह से 1857 की क्रांति को ‘भारत का पहला स्वतंत्रता संग्राम’ कहकर उसकी महिमा को पुनर्स्थापित किया, वह उस दौर में क्रांतिकारी सोच मानी जाती थी। उनकी लिखी किताब ‘1857 – India’s First War of Independence’ ब्रिटिश सत्ता को इतनी खतरनाक लगी कि उन्होंने उस किताब को प्रतिबंधित कर दिया।

हिन्दुत्व: धर्म नहीं, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की आत्मा

सावरकर के हिन्दुत्व को अक्सर गलत समझा गया है। उन्होंने हिन्दुत्व को किसी पूजा-पद्धति से जोड़कर नहीं देखा, बल्कि यह बताया कि हिन्दू वह है जिसकी पितृभूमि और पुण्यभूमि – दोनों भारत हैं। उनका हिन्दुत्व सबको साथ लेकर चलने वाला, संगठित समाज का विचार था। उन्होंने हिन्दुओं से आह्वान किया कि वे जातिगत संकीर्णताओं से ऊपर उठें और एक राष्ट्र के रूप में संगठित हों।

उनका मानना था कि जब तक हिन्दू समाज भीतर से बँटा रहेगा, भारत मज़बूत नहीं हो सकता। वे जातिप्रथा के विरोधी थे और सामाजिक समरसता के प्रबल पक्षधर।

भारत के लिए उनका दृष्टिकोण स्पष्ट था।

सावरकर के लिए भारत केवल एक भूगोल नहीं था, बल्कि वह एक जीवंत संस्कृति थी। उन्होंने तुष्टिकरण की राजनीति को स्पष्ट शब्दों में नकारा और राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखा। उनका मानना था कि अगर किसी भी वर्ग की माँगें राष्ट्र की अखंडता और संस्कृति से टकराती हैं, तो उसे सहन नहीं किया जाना चाहिए।

वे धर्मनिरपेक्षता के नाम पर अपनी ही संस्कृति से दूरी बनाने की प्रवृत्ति के कट्टर विरोधी थे। वे मानते थे कि भारत का निर्माण उसकी संस्कृति और मूल्यों के अनुरूप ही होना चाहिए, ना कि पश्चिमी मॉडल की नकल बनकर।

आज सावरकर क्यों जरूरी हैं?

आज जब हम भारत को फिर से वैश्विक नेतृत्व की ओर बढ़ता देख रहे हैं, तो हमें सावरकर जैसे विचारकों की सबसे ज़्यादा ज़रूरत है। वे हमें याद दिलाते हैं कि अगर समाज संगठित हो, सांस्कृतिक रूप से सजग हो, और राष्ट्रहित में सोचने की क्षमता रखे, तो कोई शक्ति भारत को रोक नहीं सकती।

आज की राजनीति, मीडिया और शिक्षा में जिस प्रकार से इतिहास को तोड़-मरोड़कर पेश किया गया है, उसमें सावरकर जैसे सच्चे नायकों का सम्मान और सही मूल्यांकन होना नितांत आवश्यक है।

वीर सावरकर का जीवन केवल बलिदान की कहानी नहीं है, वह आने वाली पीढ़ियों के लिए दिशा है। वे केवल स्वतंत्रता सेनानी नहीं, बल्कि भारत के सांस्कृतिक पुनर्जागरण के एक अग्रदूत थे। हमें उन्हें केवल एक ‘राजनीतिक विवाद’ तक सीमित नहीं करना चाहिए, बल्कि उनके विचारों को जनमानस तक पहुँचाना चाहिए। अगर हमें वास्तव में एक संगठित, शक्तिशाली और सांस्कृतिक रूप से जागरूक भारत बनाना है, तो सावरकर हमारे पथ-प्रदर्शक हो सकते हैं।

एक चुम्मा जिससे एक राजकुमारी का प्यार ठुकराने की कहानी हो गई वायरल, क्या फुटबॉलर पाब्लो गावी ने गँवा दिया ‘स्पेन का राजा’ बनने का मौका?

गर्लफ्रेंड के साथ खिलाड़ियों का सार्वजनिक तौर पर दिखना नई बात नहीं है। गर्लफ्रेंड को चूमना या गले लगना भी सामान्य है। लेकिन मशहूर फुटबॉलर पाब्लो गावी जैसे ही अपनी गर्लफ्रेंड के साथ दिखे, इसने इंटरनेट पर सनसनी पैदा कर दी। कहा जा रहा है गर्लफ्रेंड एना पेलायो के लिए गावी ने स्पेन की राजकुमारी लियोनोर का प्यार ठुकरा दिया है।

वैसे यह चर्चा काफी समय से रही है कि बार्सिलोना के इस मिडफील्डर की स्पेन की राजकुमारी दीवानी हैं। लेकिन न तो शाही परिवार ने और न ही गावी ने कभी इसकी पुष्टि की। कहा तो यह भी जा रहा है कि गावी यदि राजकुमारी के इश्क को कबूल कर लेते तो वे स्पेन के राजा भी बन सकते थे।

अब जैसे ही मैदान पर गावी अपनी गर्लफ्रेंड के साथ खुलेआम इश्क फरमाते नजर आए, सोशल मीडिया पर फिर से राजकुमारी लियोनोर, उनके क्रश और उनका प्यार ठुकराने की चर्चा होने लगी है। कहा जाता है कि 2022 में राजा फेलिप 4 ने गावी से एक जर्सी पर ऑटोग्राफ लिया था। ये जर्सी छोटी थी, इसलिए माना गया कि ये ऑटोग्राफ प्रिंसेस के लिए ली गई है।

प्रिंसेस को लेकर ये भी अफवाह उड़ी थी कि वो अपनी किताब में गावो का फोटो लेकर घूमती थी। 2024 में प्रिंसेस गावी और फुटबॉलर पाब्लो की मुलाकात हुई थी। माना जाता है कि पाब्लो ने स्पेन की राजकुमारी से शादी से इनकार कर दिया था। अफवाह ये भी है कि अगर ये शादी होती तो फुटबॉलर पाब्लो को अपने पहले ‘प्यार’ यानी फुटबॉल को छोड़ना पड़ता।

फुटबॉलर पाब्लो गावी बार्सिलोना के धाकड़ मिडफिल्डर हैं। 2024-25 में उनका प्रदर्शन जबरदस्त रहा है। चैंपियंस लीग, स्पेनिश सुपर कप, कोपा डेल रे, यूरो कप, ला लीगा समेत कई चैंपियनशिप में जबरदस्त खेल का प्रदर्शन किया। चैंपियंस लीग में पाब्लो की टीम सेमीफाइनल तक पहुँची। मैदान पर उनके खेलने का अंदाज काफी आकर्षक है इसलिए उनकी फैन फॉलोइंग अच्छी खासी है। स्पेन की राजकुमारी भी फुटबॉल देखती हैं और काफी पहले से ही पाब्लो गावी की फैन हैं।

स्पेन ने जब 2024 में यूरो कप जीता था तो गावी के प्रदर्शन की काफी तारीफ हुई थी। इसके बाद पूरी स्पेन की टीम ने जर्जुएला पैलेस में प्रिंसेस से मुलाकात की थी। इस दौरान लियोनोर और पाब्लो गावी को एक-दूसरे से हाथ मिलाते हुए तस्वीर सामने आई थी, जो वायरल हुई थी। अफवाह है कि इस दौरान प्रिंस फेलिप ने अपनी बेटी के मन की इच्छा भी गावी को बताई थी। लेकिन, गावी ने मना कर दिया था क्योंकि शाही परिवार से जुड़ने पर उन्हें फुटबॉल खेलना छोड़ना पड़ता।

सुप्रीम कोर्ट को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू का पत्र ‘स्वस्थ लोकतंत्र’ की निशानी, प्रेसिडेंट-गवर्नर के लिए डेडलाइन तय करने को लेकर पूछे हैं 14 सवाल: जवाब में भी दिखनी चाहिए गंभीरता

हाल ही में भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने उच्चतम न्यायालय से रेफरेंस भेजकर 14 सवाल पूछे हैं। ये सवाल राष्ट्रपति द्वारा संविधान के अनुच्छेद 143 (1) के तहत किए गए हैं। मूलत: ये प्रश्न उच्चतम न्यायालय द्वारा इसी वर्ष 8 अप्रैल को दिए गए फैसले से संबंधित हैं।

इसके अलावा कुछ प्रश्नों का सन्दर्भ एवं दायरा न्यायपालिका, विधायिका और कार्यपालिका की संवैधानिक शक्तियों और कार्यक्षेत्र से संबंधित भी है। राष्ट्रपति के प्रश्न सटीक और समीचीन हैं।उन्होंने कानून निर्माण के सम्बन्ध में राज्यपाल और राष्ट्रपति को संविधानप्रदत्त शक्तियों को न्यायिक आदेश द्वारा सीमित/नियंत्रित किये जाने पर प्रश्नवाचक चिह्न लगाया है। 

निश्चय ही, उन्होंने अपनी मर्यादा का उल्लंघन और सीमा का अतिक्रमण करने वाली न्यायपालिका को प्रश्नांकित करते हुए उसके द्वारा संवैधानिक व्यवस्थाओं  और प्रावधानों को बदलने से सम्बन्धित सवाल पूछे हैं।

उनके प्रश्न भारत की लोकतान्त्रिक व्यवस्था में अंतर्निहित संवाद की स्वस्थ परम्परा का परिचय और प्रमाण हैं। 8 अप्रैल,2025 को माननीय उच्चतम न्यायालय ने राज्यपाल बनाम तमिलनाडु राज्य नामक वाद का निर्णय दिया था। इस अत्यंत महत्वपूर्ण मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति जे बी पारदीवाल एवं न्यायमूर्ति  आर महादेवन की दो सदस्यीय न्यायपीठ ने की थी। 

यह मामला तमिलनाडु विधानसभा द्वारा पारित विधेयकों से संबंधित था। राज्य सरकार का कहना था कि विधानसभा द्वारा पारित कई विधेयक लंबे समय से राज्यपाल द्वारा लंबित रखे गए हैं। साथ ही, राज्य सरकार ने राज्यपाल द्वारा एक  साथ कई विधेयकों को राष्ट्रपति को विचारार्थ भेजने पर भी प्रश्न उठाया था।

इन विधेयकों में राज्य द्वारा संचालित  विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति का पदेन दर्जा  मुख्यमंत्री को देने से संबंधित विधेयक भी शामिल है। निश्चय ही, राज्यपाल द्वारा अनिश्चित अवधि तक विधेयकों को लंबित रखना भी संविधान-सम्मत नहीं है।

उच्चतम न्यायालय ने अपने उपरोक्त मामले से सम्बन्धित फैसले में कुछ संवैधानिक पहलुओं को नए सिरे से प्रस्तुत  किया है। ऐसा करते हुए माननीय न्यायालय ने संविधान के कुछ हिस्सों को व्याख्यायित भी किया है।

अगर उच्चतम न्यायालय के उक्त फैसले पर ध्यान दें तो इसके तीन पहलू नजर आते हैं। पहला, राज्यपाल एवं राष्ट्रपति द्वारा विधेयकों को स्वीकृति प्रदान करने हेतु समय सीमा का निश्चित किया जाना है। यह समय सीमा तीन माह तय की गई है।

दूसरा, अगर समय सीमा के भीतर राज्यपाल या राष्ट्रपति द्वारा विधेयक पर प्रतिक्रिया नहीं दी जाती है तो राज्य के अनुरोध पर उच्चतम न्यायालय ‘परमादेश रिट’(Writ of Mandamus) के तहत विधेयक को स्वीकृति प्रदान करने की क्षमता रखता है।

तीसरा, उच्चतम न्यायालय ने स्वयं को संविधान के अनुच्छेद 142  द्वारा प्रदत्त शक्ति का उपयोग करते हुए 10 लंबित विधेयकों को कानून का दर्जा दे दिया है। यह पहला अवसर है जब बिना राष्ट्रपति या राज्यपाल की स्वीकृति के विधेयक कानून बन गये हैं।

इस फैसले ने ‘पॉकेट वीटो’ को भी खारिज कर दिया है। यह न्यायपालिका द्वारा अपनी संवैधानिक शक्तियों और मर्यादा का अतिक्रमण है। इस निर्णय से न्यायपालिका और कार्यपालिका के सम्बन्धों में तनाव और टकराहट बढ़ने की आशंका है।

इस निर्णय की पृष्ठभूमि में संवैधानिक वस्तुस्थिति को समझना अत्यंत आवश्यक है। सर्वप्रथम अनुच्छेद 200 की बात आती है।  इस अनुच्छेद के अंतर्गत राज्यपाल के समक्ष प्रस्तुत विधेयकों के सम्बन्ध में उनके पास मौजूद विकल्पों का विवरण है।

इसके तहत राज्यपाल या तो विधेयक को स्वीकृति देता है या उसे रोक लेता है या वह विधेयक को राष्ट्रपति के विचार के लिए प्रेषित कर देता है। राष्ट्रपति के विचारार्थ आरक्षित विधेयक के लिए एक कसौटी का उल्लेख है।

वह यह है कि ‘राज्यपाल की राय में’ यदि वह (विधेयक) कानून बन जाए तो उच्च न्यायालय की शक्तियों को इस प्रकार अल्पीकृत करेगा कि वह व्यवस्था खतरे में पड़ जाएगी, जिसे भरने के लिए संविधान द्वारा उस व्यवस्था का निर्माण किया गया है।

ध्यान देने की बात यह है कि यह कसौटी मसौदा अनुच्छेद 175 में संविधान सभा में बहस के पश्चात जोड़ी गई, जो बहस 30 जुलाई, 1 अगस्त और 17 अक्टूबर 1949 को हुई थी। जिसे हम वर्तमान में अनुच्छेद 200 के नाम से जानते हैं। 

उक्त अनुच्छेद में कसौटी के निर्णयन हेतु जिस पद का इस्तेमाल है वह है ‘राज्यपाल की राय में’।  इसके दो अर्थ हो सकते हैं। पहला निहितार्थ यह हो सकता है कि राज्यपाल मंत्री-परिषद् के सहयोग एवं सुझाव से ऐसा करेगा।

अब इसमें सवाल यह उठता है कि मंत्रिपरिषद जो विधानमंडल का हिस्सा है और विधेयक बनाने में शामिल है। आखिर क्योंकर पहले अपने सीमा क्षेत्र से बाहर जाकर विधेयक पारित करेगी और फिर राज्यपाल को परामर्श देकर उसे राष्ट्रपति को भिजवाएगी।

दूसरा निहितार्थ यह हो सकता है कि राज्यपाल अपने ‘विवेकाधिकार’ का प्रयोग करते हुए ऐसा करेगा। बहुत हद तक ऐसा भी संभव है कि ये दोनों अर्थ भी अलग-अलग मामलों में लागू किए जा सकते हैं।

संविधान सभा में हुई बहसों से गुजरने से ऐसा लगता है कि वह राज्यपाल के विवेकाधिकार के दायरे को (विधेयक निर्माण के संदर्भ में) अनियंत्रित और असीमित तो नहीं करना चाहती थी लेकिन एकदम से खारिज भी नहीं करना चाहती थी।

अनुच्छेद 201 दूसरा महत्वपूर्ण अनुच्छेद है, जो इस बहस में सामने आया है। इस अनुच्छेद में राज्यपाल द्वारा राष्ट्रपति के  विचारार्थ आरक्षित विधेयक से सम्बन्धित चर्चा है।  इसके तहत राष्ट्रपति या तो विधेयक पर स्वीकृति देता है या उसे रोक देता है। 

साथ ही, वह अपने सुझावों और निर्देश के साथ विधेयक को राज्यपाल के मार्फ़त वापस विधानमंडल को भेज सकता है। तत्पश्चात वह पुन: विधानमंडल से  पारित कराकर  राष्ट्रपति की स्वीकृति हेतु प्रस्तुत किया जाएगा।

इसके आगे राष्ट्रपति उस विधेयक पर क्या फैसला लेते हैं? इस पर संविधान में स्पष्टता नहीं है। गौर करने की बात है कि उक्त अनुच्छेद (मसौदा अनुच्छेद 176, संविधान सभा 1948) बिना किसी बदलाव के संविधान सभा द्वारा स्वीकृत कर लिया गया था।

8 अप्रैल के माननीय उच्चतम न्यायालय के निर्णय के अनुसार राज्यपाल अब पहली प्रस्तुति में तीन महीने एवं दूसरी प्रस्तुति में अधिकतम एक महीने तक ही विधेयक को अपने पास रख सकते हैं। 

विधेयक निर्माण प्रक्रिया में राज्यपाल के ‘विवेकाधिकार’ को माननीय उच्चतम न्यायालय ने अब न्यायिक समीक्षा के अंतर्गत बताया है।  यह पहले से चली आ रही प्रणाली में बहुत बड़ा बदलाव है, जिसमें राज्यपाल के विवेकाधिकार को सीमित किया गया है।

इसके आगे उच्चतम न्यायालय ने अनुच्छेद 200 एवं 201 के तहत राष्ट्रपति के विचारार्थ प्रेषित विधेयकों को संवैधानिक एवं वैधानिक त्रुटियों से बचाने के लिए राष्ट्रपति को अनुच्छेद 143(1) के तहत उच्चतम न्यायालय के परामर्श क्षेत्राधिकार के आधार पर सुझाव लेने के लिए भी निर्देशित किया है।

न्यायालय का यह मानना है कि ऐसा करने से विधेयक में वैधानिक त्रुटियाँ भी नहीं रहेंगी एवं कानून बनने के बाद उसकी संवैधानिकता पर उठने वाले प्रश्नों से भी बचा जा सकेगा।

सबसे पहला और सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या उच्चतम न्यायालय के इस फैसले से न्यायपालिका, विधायिका एवं कार्यपालिका के मध्य ‘शक्ति के बंटवारे’ के सिद्धांत का उल्लंघन तो नहीं हो रहा है?

‘शक्ति के बंटवारे’ का सिद्धांत संविधान की बुनियादी संरचना का हिस्सा है। न्यायपालिका, विधायिका एवं कार्यपालिका के कार्य में सरल रेखीय बंटवारा तो नहीं है, किंतु अगर हम माननीय न्यायालय के फैसले पर ध्यान दें तो राष्ट्रपति को दिए गए निर्देश के मद्देनजर ऐसा प्रतीत होता है कि विधेयक के कानून बनने के पूर्व ही न्यायपालिका का हस्तक्षेप हो रहा है।

किसी भी विधेयक को प्रस्तुत करने एवं उस पर बहस करने का कार्य जनता द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधियों का ही होता है। विधायिका के इस कार्य में हस्तक्षेप संविधान के बुनियादी ढांचे को चुनौती देता है, जो कि समय-समय पर दिए गए माननीय उच्चतम न्यायालय के कई फैसलों में भी परिलक्षित होता रहा है।  

यह निर्णय अवांछित ‘न्यायिक सक्रियता’ का एक और उदाहरण है। इस फैसले के बाद एक प्रश्न लगातार चर्चा में है कि क्या संवैधानिक व्याख्या एक संवैधानिक पीठ से इतर किसी अन्य पीठ द्वारा संभव है? संवैधानिक पीठ में न्यूनतम पांच न्यायाधीश होते हैं।

वहीं उक्त फैसला मात्र दो न्यायाधीशों की पीठ द्वारा किया गया है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने प्रश्न संख्या 12 में  इस विषय को उठाया है। राज्यपाल एवं राष्ट्रपति न सिर्फ कार्यपालिका के प्रमुख हैं, बल्कि विधायी प्रक्रिया में भी उनका महत्वपूर्ण स्थान और भूमिका है।

संविधान में उनकी परिकल्पना एकदम बंधे-बँधाये रूप में नहीं की गई है। राज्यपाल या राष्ट्रपति रोबोट या कठपुतली नहीं हैं, न ही होने चाहिए। संविधान द्वारा प्रदत्त ’विवेकाधिकार’ सम्बन्धी शक्ति विशिष्ट कारणों से दी गयी है।

शक्ति-विहीन राज्यपाल या राष्ट्रपति महज सजावटी पद बनकर रह जायेगा। राज्यपाल या राष्ट्रपति सिर्फ कहने के लिए राज्य या संघ का संवैधानिक प्रमुख नहीं होता, बल्कि उसके पास विशेष परिस्थितियों में विशिष्ट शक्तियां होती हैं।

इसीलिए संविधान में दलगत राजनीति से निरपेक्ष विवेक-बुद्धि संपन्न व्यक्ति को इन पदों पर नियुक्त करने का प्रस्ताव है। राज्यपाल को भी केंद्र में सत्तारूढ़ दल के कार्यकर्त्ता के रूप में आचरण नहीं करना चाहिए।

पिछले कुछ दशकों में मुख्यधारा की राजनीति से रिटायर्ड राजनेताओं को राज्यपाल के रूप में समायोजित करने की प्रवृत्ति बढ़ी है। जबकि राज्यपाल साहित्य, कला, विज्ञान, शिक्षा, कानून, पत्रकारिता आदि के क्षेत्र में महनीय उपलब्धियां हासिल करने वाले गैर-राजनीतिक और सम्मानित व्यक्तियों को बनाया जाना चाहिए। 

स्पष्ट है कि उक्त निर्णय से केंद्र एवं राज्य सरकार के सम्बन्ध बदल गए हैं। संघीय व्यवस्था के कारण कई बार केंद्र एवं राज्य सरकार की शक्तियों को स्वतंत्र एवं समान समझने की गलती की जाती है।

जबकि संविधान में ऐसे कई प्रावधान हैं जिनसे केंद्र की वरीय स्थिति सुस्पष्ट है। मसलन, केंद्र की विधायी क्षमता जो कि राज्य सरकार से कहीं ज्यादा विस्तृत एवं प्रभावी है।  बाबासाहेब अंबेडकर ने भी कहा था कि भारत संघीय व्यवस्था के बावजूद केंद्रीय प्रवृत्ति वाला राष्ट्र है।

यह व्यवस्था अलगाव और अराजकता को नियंत्रित करते हुए देश की एकता और अखंडता सुनिश्चित करती है। उपरोक्त निर्णय की पृष्ठभूमि में राष्ट्रपति द्वारा पूछे गए सवालों के न्यायपालिका द्वारा दिए गए उत्तर से न सिर्फ संघ और राज्य के सम्बन्धों का समीकरण प्रभावित होगा, बल्कि न्यायपालिका, विधायिका और कार्यपालिका के पारस्परिक सम्बन्ध और कार्यक्षेत्र भी पुनर्परिभाषित होगा।

इसलिए उच्चतम न्यायालय को संविधान की आधारभूत संरचना और अंतर्निहित भावना का ध्यान रखते हुए बहुत सोच-समझकर और सूझ-बूझ के साथ उत्तर देने की आवश्यकता है।

PM राजीव गाँधी ने भारत-पाकिस्तान में सुलह के लिए अमेरिका से माँगी थी मदद, राष्ट्रपति रीगन को लिखा था पत्र: भाजपा MP निशिकांत दुबे ने 1987 का पत्र दिखा पूछे सवाल

भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने बुधवार (28 मई 2025) को कॉन्ग्रेस पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया है कि 1987 में भारत-पाकिस्तान के बीच शांति समझौता करने के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गाँधी ने अमेरिका से मदद माँगी थी। निशिकांत दुबे ने यह दावा अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन द्वारा राजीव गांधी को लिखे एक पुराने पत्र के आधार पर किया है, जिसे अब सार्वजनिक कर दिया गया है।

निशिकांत दुबे ने दिखाया 1987 पत्र

निशिकांत दुबे का कहना है कि 1972 के शिमला समझौते के तहत यह तय हुआ था कि भारत और पाकिस्तान के बीच कोई भी विवाद सिर्फ दोनों देशों के बीच बातचीत से सुलझाया जाएगा, इसमें कोई तीसरा देश शामिल नहीं होगा। ऐसे में राजीव गाँधी का अमेरिकी मदद माँगना इस समझौते का उल्लँघन है।

दुबे ने 25 मार्च, 1987 को अमेरिकी राजदूत द्वारा राजीव गाँधी को भेजे गए एक कथित पत्र का हवाला दिया है। निशिकांत दुबे ने बताया कि इस पत्र में गाँधी ने सीमा पार से होने वाली नशीले पदार्थों की तस्करी पर भारत और पाकिस्तान के बीच बातचीत में अमेरिकी विशेषज्ञों की मदद माँगी थी ऐसा लिखा है। रीगन ने कहा था कि अगर भारत और पाकिस्तान की सरकारें मदद माँगती हैं तो उन्हें खुशी होगी।

हालाँकि, रीगन के इस पत्र में सीधे तौर पर 1987 के भारत-पाकिस्तान युद्धविराम में अमेरिका की दखलअंदाजी का कोई संकेत नहीं मिलता है। पत्र में सिर्फ भविष्य के तनाव को कम करने के लिए पूर्वी और पश्चिमी यूरोप के बीच प्रभावी तरीकों के बारे में कुछ जानकारी देने की बात कही गई है।

यह नया दावा ऐसे समय में आया है जब हाल ही में पहलगाम आतंकवादी हमले और भारत के जवाबी ऑपरेशन ‘सिंदूर’ के बाद भारत-पाकिस्तान संबंधों में तनाव बढ़ा हुआ है, और तीसरे पक्ष की भूमिका को लेकर राजनीतिक बहस जारी है।

इंदिरा गाँधी पर सवाल

भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी पर भी सवाल उठाए हैं। उन्होंने मंगलवार (27 मई 2025) को एक अमेरिकी खुफिया दस्तावेज़ शेयर किया। निशिकांत दुबे ने बताया कि यह दस्तावेज़ 1971 के बांग्लादेश युद्ध से जुड़ा है, जिसमें इंदिरा गाँधी ने संयुक्त राष्ट्र के युद्धविराम के प्रस्ताव को मान लिया था।

दुबे ने पूछा कि क्या भारत ने पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (POK) को वापस लेने और करतारपुर गुरुद्वारा जैसी जगहों को सुरक्षित करने के बजाय बांग्लादेश बनाने को ज़्यादा अहमियत दी। निशिकांत दुबे ने ‘X’ (पहले ट्विटर) पर लिखा कि इंदिरा गाँधी ने अमेरिकी दबाव में आकर 1971 का युद्ध रोक दिया था, जबकि उस समय के रक्षा मंत्री जगजीवन राम और सेना प्रमुख सैम मानेकशॉ इसके खिलाफ थे।

कॉन्ग्रेस का पलटवार

कॉन्ग्रेस नेता जयराम रमेश ने विदेश मंत्री एस. जयशंकर पर निशाना साधा है। जयराम रमेश ने कहा कि जब अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने भारत और पाकिस्तान के बीच बातचीत में अमेरिका की मदद और किसी ‘तटस्थ जगह’ पर बात करने की बात कही, तो जयशंकर चुप क्यों रहे।

हालाँकि, भारत ने अमेरिकी राष्ट्रपति के उन दावों को खारिज कर दिया है, जिनमें कहा गया था कि उन्होंने भारत-पाकिस्तान के बीच शांति स्थापित करने में मदद की। भारत ने अपनी पुरानी नीति को दोहराते हुए साफ किया है कि जम्मू-कश्मीर से जुड़ा कोई भी मुद्दा भारत और पाकिस्तान मिलकर ही सुलझाएँगे, इसमें किसी तीसरे देश की दखलअंदाजी नहीं होगी।

निशिकांत दुबे के इस दावे के बाद भारत द्वारा पूर्व में लिए गए इस फैसलों पर राजनीतिक बहस और तेज़ हो गई है।

सवाल- कितनी लड़कियों से थे रिलेशन, इंदौर के रेपिस्ट कोच मोहसिन खान का जवाब- बहुत सारी लड़की… 25-30 से थे संबंध: पीड़िताओं का कलावा कटवाता था, मुस्लिम बनने का डालता था दबाव

मध्य प्रदेश के इंदौर में लड़कियों को शूटिंग सिखाने वाले कोच मोहसिन खान ने पुलिस जाँच में अपने कांड कबूल किए हैं। उसने माना है कि 25 से 30 लड़कियों का उत्पीड़न किया है। उसके कबूलनामे का वीडियो आया है।

दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के अनुसार, वीडियो में मोहसिन ये कहते हुए नजर आ रहा है कि इंदौर के अलावा कुछ अन्य जिलों में भी उसने लड़कियों का फायदा उठाया। उसके कई लड़कियों के साथ संबंध भी थे।

इंदौर के अन्नपूर्णा इलाके में शूटिंग कोच मोहसिन खान ड्रीम ओलंपिक एकेडमी चलाता है। उस पर 20 मई 2025 से अब तक 5 FIR दर्ज हो चुकी है। आखिरी शिकायत उसके घर पर काम करने आई लड़की ने सोमवार (26 मई 2025) को दर्ज करवाई है।

पीड़िता ने शिकायत में कहा था कि मोहसिन और उसके दो दोस्तों फैजान और इमरान ने 15 दिनों तक बंधक बना कर उसके साथ रेप किया था। उस समय उसकी उम्र महज 17 साल थी।

मोहसिन को पॉक्सो एक्ट और अन्य धाराओं में पुलिस ने गिरफ्तार कर 7 दिन की रिमांड पर भेजा था। पूरे मामले की जाँच के लिए पुलिस कमिश्नर ने 6 सदस्यीय कमेटी भी गठित की है। पुलिस की जाँच में पता चला है कि आरोपित के मोबाइल में 100 से ज्यादा अश्लील वीडियो हैं।

मोहसिन के साथ पुलिस FIR में नामजद अन्य लोगों की तलाश में भी लगी हुई है। इस कड़ी में बुधवार (28 मई 2025) की सुबह इंदौर के खजराना इलाके में इमरान के फोन की लोकेशन मिली। पुलिस ने दबिश देकर गिरफ्तार कर लिया है।

मोहसिन खान की गिरफ्तारी के बाद से उसका पूरा परिवार फरार है। पुलिस को उसके मामा और दो बड़े भाइयों-इमरान और साजिद की अब भी तलाश है।

पुलिस ने मोहसिन की एकेडमी को सील कर सीसीटीवी फुटेज जब्त कर लिए हैं। लड़कियों द्वारा उपलब्ध साक्ष्य की भी जाँच करवाई जा रही है। साथ ही पुलिस ने एकेडमी में आने वाली 40 से अधिक लड़कियों की सूची तैयार की है। उनसे भी पूछताछ की जाएगी।

अब तक पड़ताल में पता चला है कि मोहसिन खान लड़कियों के हाथ से कलावा खुलवाकर उन्हें गोमांस खिलाता था। फोटो-वीडियो बना लेता था और फिर वायरल करने की धमकी देकर अपने पास बुलाता था। इस केस में भी राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने भी संज्ञान लिया है और 7 दिन के भीतर रिपोर्ट पेश करने को कहा है।

इस मामले को उजागर करने में बजरंग दल ने भी अहम भूमिका निभाई थी। पीड़िताओं में से एक ने बजरंग दल से सहायता माँगी थी। इसके बाद दल ने कई दिनों तक एकेडमी पर नजर रखी और जाँच के दौरान उन्हें कई वीडियो और बयान मिले।

बजरंग दल के जिला मंत्री ने बताया कि मोहसिन के फोन में 150 से भी ज़्यादा हिंदू युवतियों के फोटो और वीडियो मिले हैं। पुलिस उसके फोन से मिले हर एक डेटा की गहन पड़ताल कर रही है। इसके अलावा उसके बैंक खातों की पड़ताल की जा रही है। उसमें लड़कियों की ओर से भेजे गए पैसों के ट्रांजैक्शन मिले हैं। आगे भी जाँच जारी है।

बांग्लादेश में हिंदुओं के घर मुस्लिमों ने फूँके- मोहम्मद यूनुस ने ऑपइंडिया की रिपोर्ट को माना सत्य, पर वामपंथी मीडिया को ‘मसाला’ देने के फेर में खुद बन गए मजाक

बांग्लादेश में हिंदुओं के खिलाफ हिंसा की खबरें लगातार सामने आ रही हैं, खासकर जब से 5 अगस्त 2024 को पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को सत्ता से हटाया गया। इस बीच मुहम्मद यूनुस की सरकार न सिर्फ इन हमलों को नजरअंदाज कर रही है, बल्कि इन्हें छिपाने और झूठा ठहराने की कोशिश भी कर रही है।

यूनुस ने हाल ही में ऑपइंडिया की एक रिपोर्ट को निशाना बनाया, जिसमें जेसोर जिले के दहार मसिहती गाँव में हिंदू घरों को मुस्लिम भीड़ द्वारा जलाए जाने की बात कही गई थी। लेकिन यूनुस ने इस घटना को सांप्रदायिक हिंसा मानने से इनकार कर दिया और इसे महज ‘बिजनेस विवाद’ करार दिया।

क्या है पूरा घटनाक्रम, क्यों देनी पड़ रही सफाई

ऑपइंडिया ने अपनी रिपोर्ट (बांग्लादेश में हिंदुओं पर फिर टूटा मुस्लिम भीड़ का कहर, घरों में लगाई आग-मचाई लूटमार: इस बार लोकल नेता की मौत को बनाया हिंसा का बहाना) में बांग्लादेशी अखबार प्रोथोम आलो के हवाले से बताया कि 22 मई को दहार मसिहती गाँव में एक मछली पालन के लिए जमीन के विवाद को लेकर बीएनपी की किसान शाखा के नेता तारिकुल इस्लाम की हत्या हो गई। इसके बाद मुस्लिम भीड़ ने बदले की कार्रवाई में गाँव के 20 से ज्यादा हिंदू घरों को आग के हवाले कर दिया। दो दुकानें जला दी गईं और चार अन्य को तोड़-फोड़ दिया गया। इस हमले में 10 से ज्यादा लोग घायल हुए।

प्रोथोम आलो के पत्रकार ने बताया कि गाँव के हर हिंदू घर को जलाकर राख कर दिया गया। छह वाहन, पाँच बाइक और एक वैन भी नष्ट कर दी गई। हमलावरों ने एक 25 साल के हिंदू युवक सागर बिस्वास को अगवा कर लिया, जिसे बाद में छुड़ाया गया। पीड़ितों ने बताया कि पहले 4-5 लोगों ने हमला किया, फिर 150 से ज्यादा लोग शामिल हो गए और घरों को लूटकर, तोड़-फोड़ कर आग लगा दी।

झूठ बोलकर इस्लामी कट्टरपंथियों का बचाव कर रहे यूनुस

यूनुस ने इस घटना को सांप्रदायिक हिंसा मानने से साफ इनकार किया। उन्होंने बीबीसी और डीडब्ल्यू जैसे वामपंथी मीडिया के हवाले से दावा किया कि यह कोई सांप्रदायिक मामला नहीं, बल्कि तारिकुल की हत्या के बाद ‘गुस्साए ग्रामीणों’ की प्रतिक्रिया थी।

हैरानी वाली बात यह है कि जब तारिकुल की हत्या की बात आई, तो यूनुस ने हत्यारों को ‘हिंदू ग्रामीण’ कहा, लेकिन जब हिंदू घरों को जलाने की बारी आई, तो हमलावर सिर्फ ‘गुस्साए ग्रामीण’ बन गए। यह साफ दिखाता है कि यूनुस का मकसद हिंदुओं को बदनाम करना और मुस्लिम भीड़ को बचाना है।

यूनुस ने ऑपइंडिया की रिपोर्ट पर हमला बोला, जिसमें लिखा था, “मुस्लिम भीड़ ने स्थानीय नेता की मौत के बाद हिंदू घरों को आग लगाई, यूनुस के राज में अराजकता जारी।” यूनुस ने इस खबर को गलत ठहराने की कोशिश की, लेकिन ऑपइंडिया की रिपोर्ट में कोई गलती नहीं थी।

यह पूरी तरह प्रोथोम आलो की खबर पर आधारित थी, जिसमें तथ्य साफ थे। यूनुस ने न तो इस रिपोर्ट के तथ्यों को गलत ठहराया, न ही कोई ठोस सबूत दिया। उनकी पूरी कोशिश थी कि ऑपइंडिया और अन्य भारतीय मीडिया, जो हिंदुओं पर हमलों की सच्चाई उजागर कर रहे हैं, उन्हें बदनाम किया जाए।

वामपंथी मीडिया की आड़ में सच्चाई छिपाने की कोशिश

यूनुस ने बीबीसी और डीडब्ल्यू जैसे वामपंथी मीडिया का सहारा लिया, जो हमेशा से हिंदुओं के खिलाफ हिंसा को कम करके दिखाते हैं। ये मीडिया हाउस ‘फैक्ट-चेक’ के नाम पर सच्चाई को दबाने की कोशिश करते हैं।

इनका पुराना तरीका है- पहले हिंसा को पूरी तरह नकारो, अगर वह न चले तो उसे ‘राजनीतिक विवाद’ बताकर कमजोर कर दो। बांग्लादेश में हिंदुओं पर हमले साफ तौर पर सांप्रदायिक हैं, लेकिन यूनुस और उनके वामपंथी मीडिया सहयोगी इसे ‘बिजनेस विवाद’ या ‘राजनीतिक तनाव’ बताकर सच को छिपा रहे हैं।

ऐसा ही इतिहास में हुआ है। जैसे औरंगजेब के मंदिर तोड़ने को कुछ इतिहासकार ‘राजनीतिक कदम’ बताते हैं, न कि धार्मिक असहिष्णुता। कश्मीर में हिंदुओं के नरसंहार को भी ‘राजनीतिक समस्या’ कहा जाता है, जबकि आतंकवादी खुलेआम इसे धार्मिक जंग कहते हैं। बांग्लादेश में भी यही हो रहा है। यूनुस और उनके समर्थक मीडिया हिंदुओं पर हमलों को झूठा या बढ़ा-चढ़ाकर बताया हुआ कहकर बच रहे हैं।

यूनुस की नाकामी और इस्तीफे की खबरें

यूनुस न सिर्फ हिंदुओं पर हमलों को छिपा रहे हैं, बल्कि उनकी सरकार पूरी तरह नाकाम रही है। उनकी अंतरिम सरकार न तो ‘स्वतंत्र और निष्पक्ष’ चुनाव करा पाई है, न ही देश में अमन-चैन ला पाई है। अब खबरें हैं कि बढ़ते असंतोष के बीच यूनुस इस्तीफा दे सकते हैं।

सूत्रों के मुताबिक, वह अपनी नाकामी छिपाने के लिए भारत विरोधी भावनाएँ भड़काने की कोशिश कर रहे हैं। उनके सहयोगी महमूदुर रहमान मन्ना ने दावा किया कि यूनुस ने देश को ‘भारतीय आधिपत्य’ के खिलाफ एकजुट होने को कहा। यह साफ दिखाता है कि यूनुस अपनी नाकामी का ठीकरा भारत पर फोड़कर अपनी साख बचाने की कोशिश कर रहे हैं।

ऑपइंडिया पर हमला कर एक्सपोज हो गए मोहम्मद यूनुस

ऑपइंडिया ने जो बताया, वह पूरी तरह तथ्यों पर आधारित था। उनकी रिपोर्ट प्रोथोम आलो की खबर पर आधारित थी, जिसमें साफ था कि हिंदू घरों को निशाना बनाकर जलाया गया। ऑपइंडिया ने न सिर्फ इस घटना को उजागर किया, बल्कि बांग्लादेश में हिंदुओं पर हो रहे लगातार हमलों की सच्चाई को भी सामने लाया।

यूनुस का ऑपइंडिया पर हमला उनकी हताशा दिखाता है, क्योंकि वह नहीं चाहते कि उनकी सरकार की नाकामी और हिंदुओं पर अत्याचार की सच्चाई दुनिया के सामने आए। ऑपइंडिया ने निष्पक्ष पत्रकारिता की है और यूनुस के झूठ को बेनकाब करने में अहम भूमिका निभाई है।

यूनुस की सरकार हिंदुओं पर हो रहे हमलों को न सिर्फ नजरअंदाज कर रही है, बल्कि उन्हें छिपाने और गलत ठहराने की कोशिश भी कर रही है। ऑपइंडिया की रिपोर्ट पूरी तरह सही थी, जिसे यूनुस ने बिना किसी सबूत के गलत बताने की कोशिश की। वामपंथी मीडिया के साथ मिलकर वह हिंदुओं पर हमलों को ‘बिजनेस विवाद’ या ‘राजनीतिक तनाव’ बताकर सच को दबा रहे हैं। लेकिन सच को ज्यादा देर तक छिपाया नहीं जा सकता। ऑपइंडिया और अन्य भारतीय मीडिया ने बांग्लादेश में हिंदुओं की दुर्दशा को सामने लाकर सराहनीय काम किया है। यूनुस को अपनी नाकामी छिपाने की बजाय हिंदुओं की सुरक्षा सुनिश्चित करनी चाहिए।

(ये रिपोर्ट मूल रूप से अंग्रेजी भाषा में रुक्मा राठौर ने लिखी है। इस लेख का भावानुवाद किया है श्रवण शुक्ल ने।)