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ऑल्टन्यूज़ वाले जुबैर पर NCPCR ने दिए कार्रवाई के निर्देश, बच्ची के ऑनलाइन हैरासमेंट का मामला

इस्लामिक प्रोपेगेंडा वेबसाइट ऑल्टन्यूज़ के संस्थापक मोहम्मद जुबैर द्वारा छोटी बच्ची की तस्वीर सार्वजनिक करने, उसके धमकियाँ देने और टॉर्चर करने के आरोप में राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) ने ट्विटर को नोटिस भेजा गया है। आयोग ने कहा है कि वह इस मामले में स्पष्टीकरण से संतुष्ट नहीं है और इसके लिए ट्विटर के सीनियर मैनेजर्स को 4 सितम्बर को उपस्थित होना होगा।

NCPCR के चेयरपर्सन प्रियंक कानूनगो ने भी ट्विटर पर इसकी जानकारी शेयर करते हुए लिखा है कि ट्विटर इंडिया के सीनियर मैनेजर को समन जारी करते हुए मोहम्मद जुबैर के खिलाफ एक्शन लेने के निर्देश दिए हैं। साथ ही, NCPCR द्वारा उचित कार्रवाई के लिए ट्विटर इंडिया और संबंधित कानून प्रवर्तन अधिकारियों को आवश्यक निर्देश दिए गए हैं। मोहम्मद जुबैर पर POCSO एक्ट के अंतर्गत कार्रवाई करने की भी माँग की जा रही है।

दरअसल, स्वघोषित फैक्ट चेकर मोहम्मद जुबैर ने हाल ही में एक ट्विटर यूजर को निशाना बनाते हुए एक छोटी बच्ची की तस्वीर सार्वजनिक करने का घटिया कारनामा किया था।

फैक्ट चेकिंग के नाम पर लोगों की निजी और गोपनीय जानकारियाँ सार्वजानिक करने के लिए कुख्यात समूह ऑल्टन्यूज़ के संस्थापकों में से एक मोहम्मद जुबैर ने शुक्रवार (अगस्त 07, 2020) को जगदीश सिंह नाम के एक ट्विटर यूजर को सार्वजनिक रूप से शर्मिंदा करने की कोशिश करते हुए एक नाबालिग बच्ची की तस्वीर को ही सार्वजानिक कर दिया। यह बच्ची और कोई नहीं बल्कि उन्हीं ट्विटर यूजर यानी, जगदीश सिंह की पोती थी।

ट्विटर यूजर जगदीश सिंह, मोहम्मद जुबैर के एक और फर्जी के फैक्ट चेकर से सहमत नहीं थे और उन्होंने सोशल मीडिया पर ऑल्टन्यूज़ के लिए प्रचलित जुमले का इस्तेमाल करते हुए जुबैर के ट्वीट के जवाब में ‘ल*डे का फैक्ट चेकर’ कह दिया।

यह जुमला ऑल्टन्यूज़ के कथित ‘फैक्ट चेक्स’ के फर्जीवाड़ों के लिए इन्टरनेट पर युवाओं के बीच काफी लोकप्रिय है। ट्विटर यूजर जगदीश सिंह के इस कमेंट पर मोहम्मद जुबैर ने तुरंत प्रतिक्रिया दी और उन्हें सीधे तौर पर जवाब देने के बजाए, उनकी ट्विटर डीपी (डिस्प्ले इमेज) निकाल ली, जिसमें जगदीश सिंह कथित तौर पर अपनी पोती के साथ नजर आ रहे थे।

जुबैर ने जगदीश सिंह की प्रोफाइल में लगी तस्वीर ट्वीट करते हुए लिखा- “हेलो जगदीश सिंह, क्या आपकी प्यारी पोती सोशल मीडिया पर लोगों को गाली देने की आपकी पार्ट टाइम जॉब के बारे में जानती है?”

ट्विटर यूजर की निजी तस्वीर का गलत इस्तेमाल करते हुए मोहम्मद जुबैर ने उन्हें अपनी प्रोफाइल फोटो बदलने की सलाह भी दी थी।

सुप्रीम कोर्ट से भी नहीं मिली कॉन्ग्रेस नेता डीके शिवकुमार को राहत, जारी रहेगी आयकर विभाग की जाँच

कर्नाटक कॉन्ग्रेस अध्यक्ष डीके शिवकुमार को आयकर विभाग की कार्रवाई पर सुप्रीम कोर्ट से किसी प्रकार की राहत नहीं मिली। कोर्ट ने विभाग की कार्रवाई पर रोक लगाने से इनकार कर दिया

कॉन्ग्रेस नेता ने कार्रवाई को चुनौती देते हुए शीर्ष अदालत में याचिका दायर की थी। याचिका में उन्होंने जाँच पर स्टे माँगा था। मगर जस्टिस एसए बोबडे, जस्टिस एएस बोपन्ना और जस्टिस वी रामसुब्रमण्यम की बेंच ने इनकम टैक्स की जाँच पर कर्नाटक के पूर्व मंत्री शिवकुमार को स्टे देने से इनकार कर दिया। वहीं दूसरी ओर आयकर विभाग को जवाब दाखिल करने के लिए और समय दिया गया है।

साल 2017 के अगस्त महीने में आईटी विभाग ने कॉन्ग्रेस नेता के 64 ठिकानों पर छापे मारे थे। इसके बाद से उन पर आय से अधिक संपत्ति और टैक्स चोरी का मामला चल रहा है। पिछले साल नवंबर में उन्होंने राहत पाने के लिए कर्नाटक हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी। लेकिन वहाँ भी उन्हें राहत नहीं मिली थी। उससे पहले बेंगलुरु की सत्र अदालत से भी उन्हें निराशा ही हाथ लगी थी।

जानकारी के अनुसार, शिवकुमार द्वारा दायर विशेष अवकाश याचिका का आधार है कि छापेमारी के दौरान मिली राशि को अघोषित आय के रूप में नहीं माना जा सकता है। उनके वकील की दलील है कि जो भी धन मिला उसे तभी अघोषित माना जा सकता है, जब आयकर अधिनियम की धारा 69 ए की शर्तें पूरी हुई हों।

आईटी अधिनियम की धारा 69 के अनुसार, किसी भी वित्तीय वर्ष में, यदि कोई धन, बहुमूल्य वस्तु, गहने या अन्य मूल्यवान चीजें किसी कर अधिकारी द्वारा अनधिकृत (unrecorded) पाए जाते हैं, और कर देने वाला व्यक्ति ऐसी आय की घोषणा नहीं करने के लिए एक वाजिब स्पष्टीकरण प्रदान नहीं करता है, तो जाँच करने वाला अधिकारी उस संपत्ति को कर देने वाले व्यक्ति की आय घोषित कर सकता है।

शिवकुमार के वकीलों का तर्क है कि भले ही छापेमारी के दौरान पाई गई संपत्ति सेक्शन 69 ए के तहत आती है। लेकिन फिर भी उन पर आय छिपाने का इल्जाम नहीं लग सकता। क्योंकि जब आयकर विभाग द्वारा ने छापेमारी कर ये चीजें जब्त कीं तब शिवकुमार ने रिटर्न ऑफ इनकम दायर नहीं किया था।

संप्रदाय विशेष के परिवार ने नाबालिग लड़की की तोड़ी पसलियाँ, सिर मुँड़वा कर दी ईसाई से प्यार की सजा

फ्रांस में संप्रदाय विशेष की एक लड़की को एक ईसाई लड़के से प्रेम करना भारी पड़ गया। उसके कट्टर घर वालों ने इस रिश्ते की जानकारी होने पर न केवल विरोध किया, बल्कि उसे लात-घूँसों-मुक्कों से इतना पीटा कि उसकी पसलियाँ भी टूट गईं। ईसाई लड़के के साथ संबंध की बात जानकार लड़की का सिर भी मुँड़वाया गया और जब पुलिस आई तो घायल लड़की को छिपाने का प्रयास भी किया गया।

डेली मेल की रिपोर्ट के अनुसार, यह घटना पिछले हफ्ते सोमवार (अगस्त 17, 2020) की है। जिनेवा से 70 मील दूर उत्तर में बेसनकॉन शहर पड़ता है। वहीं, संप्रदाय विशेष की इस लड़की के परिवार ने उस पर हमला बोला। रिपोर्ट बताती है कि नाबालिग लड़की कुछ समय पहले बोस्निया और हर्जेगोविना से अपने परिवार के साथ फ्रांस आई थी।

इसके बाद ही उसने एक फ्रांसीसी लड़के को डेट करना शुरू किया। दोनों का रिश्ता काफी समय तक गुपचुप तरीके से चला। मगर, 13 अगस्त को अपने परिवार के डर से लड़की अपने ईसाई प्रेमी के साथ भाग गई और चार दिन बाद उन्हें मनाने के लिहाज से लड़के और उसके माता-पिता के साथ घर लौटी।

पुलिस को दिए बयान के मुताबिक, लड़की ने बताया कि उसके परिवार व रिश्तेदारों ने उसकी सुनने की बजाय उस पर हमला बोल दिया। घूँसे और मुक्के उसके सिर व शरीर पर लगातार मारे गए। फिर लड़की के पिता जाकर कैंची ले आए और उसके चाचा से लड़की के लंबे बाल काटने को कहा।

लड़की के परिवार का ऐसा रवैया देखते ही लड़का वहाँ से भाग निकाल और पुलिस को इन सबके बारे में जानकारी दी। पुलिस घटनास्थल पर कुछ ही समय में पहुँच गई। पड़ताल हुई तो परिवार वाले लड़की को छिपाने का प्रयास करते रहे। लेकिन खुशकिस्मती से घायल लड़की पुलिस को मिल गई।

लड़की की हालत देखते हुए पुलिस ने उसके माता-पिता, चाचा-चाची को गिरफ्तार कर लिया। अब इनके ख़िलाफ़ नाबालिग से हिंसा का मामला दर्ज है। वहीं लड़की को भी हर प्रकार से सुरक्षा प्रदान की गई है।

इस मामले में बता दें कि लड़की के घरवालों की जगह-जगह निंदा हो रही है। सोशल मीडिया पर भी लोग इस खबर को शेयर कर रहे हैं। नागरिकता के लिए मंत्री मार्लेने शियप्पा ने इस घटना पर कहा कि ऐसे परिवार को शर्मिंदा होना चाहिए।

वहीं फ्रांस के आंतरिक मंत्री जेराल्ड डारमेनिन ने इस घटना को बर्बर करार देते हुए कसम खाई है कि वह परिवार को वहाँ से निर्वासित करके ही छोड़ेंगे। उन्होंने ट्वीट करते हुए कहा है कि उन्हें सीमा पार जाना होगा, क्योंकि हमारी जमीन पर रहने के लिए उनके पास कोई कारण नहीं हैं।

गौरतलब है कि बोस्नियन मुस्लिमों और ईसाइयों में अनबन पिछले 25 सालों से चली आ रही है। दरअसल साल 1995 में, सेरेब्रेनिका नरसंहार में सर्ब बलों ने 8,000 Bosniak की हत्या कर दी थी। यह द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से यूरोप में सबसे बड़ी सामूहिक हत्या थी। इसके बाद साल 2015 के एक सर्वे से पता चला था कि केवल 15 प्रतिशत बोस्नियन मुस्लिम ही अपनी बेटी को ईसाइयों को सौंपने में सहज महसूस करते हैं।

शारदा चिटफंड घोटाला: कुणाल घोष से सीबीआई ने की पूछताछ, कहा था- सबसे ज्यादा फायदा ममता को

पश्चिम बंगाल की सत्ताधारी पार्टी टीएमसी के प्रवक्ता कुणाल घोष 26 अगस्त को सीबीआई के सामने पेश हुए। जॉंच एजेंसी ने उनसे करोड़ों रुपए के शारदा चिटफंड घोटाले को लेकर सवाल-जवाब किए।

करीब एक महीने पहले चिटफंड घोटाले के आरोपित कुणाल घोष आधिकारिक तौर पर टीएमसी में शामिल हुए थे। उन्हें पार्टी का प्रवक्ता भी नियुक्त किया गया था।

घोष को करीब सात साल पहले टीएमसी ने निलंबित कर दिया था। वे शारदा चिट फंड मामले में फिलहाल जमानत पर बाहर हैं। साल 2014 में कुणाल घोष ने आधिकारिक रूप से दावा किया था कि शारदा पंजी योजना में ममता बनर्जी को सबसे ज्यादा फ़ायदा मिला था। इसके अलावा कुणाल ने उन्हें सार्वजनिक तौर पर ‘कायर’ कहा था। साल 2019 में कोलकाता के पूर्व मंडलायुक्त राजीव कुमार ने शिलोंग में कुणाल से इस घोटाले को लेकर पूछताछ की थी। 

हाल ही में कुणाल घोष को सीबीआई ने पूछताछ के लिए समन भेजा था। केंद्रीय जाँच एजेंसी की आर्थिक शाखा लगभग सभी चिट फंड घोटाले के मामलों की जाँच कर रही है। इसमें शारदा, नरदा, रोज़वैली, आईकोर, प्रयाग समेत कई मामले शामिल हैं। हैरानी की बात यह भी है कि इन सभी मामलों लगाए गए आरोपों का सीधा संबंध बंगाल के सत्ताधारी दल से है।        

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता: उसकी कमीज मेरी कमीज़ से सफेद कैसे? लोकतंत्र के लिए ये दाग अच्छे नहीं

80 के दशक में कपड़े धोने के साबुन का एक विज्ञापन बड़े जोर-शोर से चलता था। इसमें एक पात्र दूसरे से कहता है – ‘भला उसकी कमीज मेरी कमीज से सफ़ेद कैसे है?’ इस विज्ञापन के पीछे ईर्ष्या और द्वेष का भाव है।

आज अपने देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर चल रही बहस पर मुझे यह विज्ञापन पूरी तरह लागू होता दिखाई देता है। ऐसा लग रहा है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को भी खांचों में बाँट दिया गया है। मानो कुछ लोग कह रहे हैं – “मेरी वाली अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तेरी वाली अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से बेहतर है।”

कुछ तो लिखकर भी साफ़ कह रहे हैं कि क्योंकि उनकी कमीजें बाकी जनता की कमीज़ों से ज़्यादा सफ़ेद हैं, इसलिए सिर्फ वे ही अभिव्यक्ति के सही हकदार हैं। किसको बोलने की कितनी आज़ादी दी जाए, यह तय करने का ठेका भी कुछ लोगों ने अपने नाम लिखा लिया है। इसके लिए मीडिया, लेखकों, बुद्धिजीवियों, रचनाधर्मियों का एक पूरा पारतंत्र यानि ‘ईको सिस्टम’ बाकायदा काम में अनवरत लगा हुआ है।

आप सोच रहे होंगे कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसे गंभीर विषय के बीच में यह साबुन का विज्ञापन क्या कर रहा है? पर सोचिए क्या आज ऐसा ही नहीं हो रहा? अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का जो अधिकार भारत का संविधान भारत के हर नागरिक को देता है, उसे भी कुछ ठेकेदारों द्वारा आज जैसे बाज़ारू माल बना कर बेचा जा रहा है। भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर दो बड़ी घटनाएँ पिछले हफ्ते हुई।

प्रशांत भूषण के खिलाफ मानहानि का मुकदमा

उच्चतम न्यायालय में वकील प्रशांत भूषण के खिलाफ मानहानि मुकदमा हुआ। जिसमें उच्चतम न्यायालय ने प्रशांत भूषण को मानहानि का दोषी मानकर उन्हें सजा देना तय किया। मीडिया का एक वर्ग, कथित बुद्धिजीवी, कतिपय कलाकार, वामपंथी एक्टिविस्ट और वकीलों का एक वर्ग इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का विरोध कर रहा है। इन लोगों का कहना है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार एक मूलभूत अधिकार है और न्यायालय की अवमानना के नाम पर इस अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार को छीना नहीं जा सकता।

प्रशांत भूषण का समर्थन करने वाले यहीं तक नहीं रुके। जिस दिन प्रशांत भूषण के मामले की सुनवाई उच्चतम न्यायालय में हो रही थी, उस दिन न्यायालय के बाहर कुछ लोग इकट्ठे हुए, उन्होंने हाथ में तख्तियाँ ली हुई थीं। ये लोग उच्चतम न्यायालय के आने वाले फैसले का विरोध करने के लिए पहले से तैयार थे।

इनमें से कई लोगों ने सोशल मीडिया पर ये कहा कि भारतीय लोकतंत्र के लिए यह काला दिन है। ये लोग मानते हैं कि प्रशांत भूषण को उच्चतम न्यायालय के खिलाफ कुछ भी कहने का अधिकार है चाहे वह तथ्यपरक, न्यायपूर्ण या विधि सम्मत हो या नहीं। हालाँकि भारत का कानून इसकी इजाजत नहीं देता।

सवाल है, इस मामले में सुप्रीम कोर्ट तक की निंदा करने वाले क्या सच में ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ के पक्षधर हैं? या फिर ये बुद्धिजीवी का नक़ाब ओढ़े हुए राजनीतिक एक्टिविस्ट हैं? जब अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के इस भाव को पिछले हफ्ते ही हुए एक और मामले पर लागू किया जाता है तो कई लोगों की कलाई खुल जाती है। इनमें से अधिकतर बिना पालक झपकाए अपना रुख एकदम बदल लेते हैं। मानो नक़ाब उतर जाते हैं।

ब्लूम्सबरी प्रकाशन द्वारा दिल्ली के दंगों पर प्रकाशित होने वाली पुस्तक Delhi Riots 2020

Untold Story को रद्द करना। ये पुस्तक दिल्ली की जानीमानी वकील मोनिका अरोड़ा, सोनाली चितालकर और प्रेरणा मल्होत्रा ने मिलकर लिखी है। इस पुस्तक में इस साल के शुरू में दिल्ली के दंगों की कहानियों को उजागर किया गया है। हम इस बहस में नहीं जाते कि इस पुस्तक के अंदर क्या लिखा गया है।

असली बात यह है कि ब्लूम्सबरी ने इस पुस्तक का प्रकाशन करना तय किया था। तयशुदा बात है कि जब ब्लूम्सबरी जैसे जाने-माने प्रकाशक ने इस पुस्तक को निकालने का फैसला किया तो उन्होंने पहले से यह जांँच पड़ताल की थी कि इस पुस्तक में जो लिखा गया है, वह उनके मानकों के अनुसार है या नहीं।

जाहिर है कि सम्पादकों ने यह भी देखा होगा कि ये किताब कहीं समाज में वैमनस्य तो नहीं फैलाएगी? उनके वकीलों ने ठोक बजाकर लेखकों के साथ पुस्तक छापने का करार किया था। अगर ऐसा नहीं होता तो ब्लूम्सबरी जैसा प्रकाशक इस पुस्तक को शुरू में ही इसे छापने के लिए तैयार नहीं होता।

पुस्तक में क्या कहा गया है, यह हमारे तर्क के लिए महत्वपूर्ण नहीं है। उससे सहमत या असहमत होना हमारी लोकतान्त्रिक व्यवस्था का मूल आधार है। हम तो बात कर रहे हैं भारत के संविधान में दिए गए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार की। ये अधिकार यदि अपने मनमाफिक फैसला न आने पर उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों को गाली तक देने वाले वकील प्रशांत भूषण को है, तो फिर वही अधिकार मोनिका अरोड़ा, सोनाली और प्रेरणा जैसे लेखकों को क्यों नहीं है?

प्रशांत भूषण भी वकील है और मोनिका अरोड़ा भी वकील हैं। दोनों की राजनीतिक सोच में अंतर हो सकता है। लेकिन क्या किसी के राजनीतिक विचारों में अंतर होने के आधार पर यह तय किया जाएगा कि संविधान में प्रदत्त अधिकार उसे मिलने चाहिए कि नहीं? और, इस मामले में तो प्रशांत भूषण को भारत के उच्चतम न्यायालय ने अवमानना का दोषी माना है।

प्रशांत भूषण ने जो कहा वह सीधे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर भी नहीं कहा जा सकता। यह अन्य किसी ने नहीं बल्कि, भारत की सबसे बड़ी अदालत ने तय कर दिया। किताब लिखने वालों ने तो ऐसा कुछ भी गैरकानूनी नहीं किया।

हैरत की बात है कि जो लोग दोषी करार दिए जाने के बाद भी न्यायाधीशों को गाली दिए जाने की हद तक जाने वाले प्रशांत भूषण के लिए बोलने की आज़ादी की वकालत कर रहे हैं, वे ही पुस्तक को छपने से रोक रहे हैं। यहाँ ‘भला उसकी कमीज मेरी कमीज़ से सफेद कैसे हैं’ का भाव आ गया है।

प्रश्न है कि क्या दलगत प्रतिबद्धताओं, राजनीतिक विचारों और विचारधारा की कमीज देखकर संविधान के अधिकारों का रंग तय किया जाएगा? क्या अपने को ‘लेफ्ट लिबरल’ कहने वाले मुट्ठीभर लोग तय करेंगे कि देश में किसे बोलने की कितनी स्वतंत्रता है और किसे नहीं है?

कुतर्क की भी हद होती है। इस पुस्तक को छापने से रोकने के लिए जो दलीलें दी गई हैं, वे बौद्धिक रूप से असंगत तो है ही। भारत जैसे प्रजातान्त्रिक और खुले समाज में तार्किक रूप से ये बातें भी सही नहीं बैठती।

लेखक विलियम डेलरिंपल कहते हैं उन्होंने ब्लूम्सबरी के ब्रिटेन स्थित मुख्यालय को इसके बारे में सूचना दी कि दिल्ली दंगों पर पुस्तक को लेकर विवाद चल रहा है। उनसे पूछा जाना चाहिए कि वे लेखक हैं या फिर इस असंगत बौद्धिक घमासान में किसी पक्ष के मुखबिर? मतलब साफ़ है कि विलियम डेलरिंपल पुस्तक न छपे, इसके लिए ही काम कर रहे थे।

मीना कंदसामी नाम की कवियत्री कहती हैं कि ‘साहित्य को फासीवाद’ से बचाने के लिए वे इसे छापने का विरोध कर रहीं हैं। पर ये ठेका उन्हें किसने दिया? सद्भावना देशपांडे नाम की लेखक और डायरेक्टर कहती हैं कि इस पुस्तक का ज्ञान से कोई लेना देना नहीं है। बल्कि यह पुस्तक भारत के सेकुलर ढाँचे पर प्रहार करती है, इसलिए इसे छपना ही नहीं चाहिए। क्या बात है? भई ये तो बता दीजिए कि भारत में लोकतंत्र है या अधिनायकवाद? और ऐसा कह कर किस तरफ खड़े हैं?

अगर इनके तर्कों को सही मान भी लिया जाए तो फिर प्रशांत भूषण को सुप्रीम कोर्ट ने उनकी अवमाननापूर्ण ट्वीट्स के लिए जो सजा दी, उसका बचाव और पुस्तक प्रकाशन का विरोध – ये दोनों बातें एक साथ कैसे हो सकती हैं?

दरअसल आभिजात्य मानसिकता वाले इस कथित बुद्धिजीवी वर्ग का सोचना है कि वही इस देश में तय करेंगे कि किसको कौन सा अधिकार कब और कितनी मात्रा में मिलना चाहिए। अपनी जन्मजात, कुलीन बौद्धिकता के गर्व में जीने वाले ये कथित बुद्धिजीवी और मीडिया का एक वर्ग असल में बौद्धिक बेईमानी और दोगलेपन का शिकार है।

देखा जाए तो ये बुद्धिजीवी है ही नहीं। वे तो राजनीतिक एक्टिविस्ट हैं, जिन्होंने पिछले कई दशकों से सत्ता प्रतिष्ठान का सहारा लेकर बौद्धिकता का लबादा ओढ़ लिया है। अपने को लेफ्ट लिबरल कहने वाले ये तत्व हर मुद्दे पर अति-वामपंथ, अराजकतावादियों और जिहादी इस्लामिक एक्टिविस्ट के बौध्दिक चम्पुओं की तरह व्यवहार करते दिखाई देते हैं।

इसलिए कोई भी बात जब उनके आकाओं के राजनीतिक स्वार्थों या उनकी विचारधारा से भिन्न होती है तो वे ऊलजलूल तर्क देकर दूसरों की आवाज दबाने का प्रयास करते हैं। यह प्रयास बिल्कुल वैसा ही है जैसा कि प्रशांत भूषण कई बार अपने प्रलाप और उच्चतम न्यायालय में अपनी दलीलों के द्वारा करते आए हैं।

आज जब उच्चतम न्यायालय ने उनको दोषी करार दे दिया है तो वे न्यायालय को ही मानने को तैयार नहीं है। अपनी राजनीतिक दलीलों को वे ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, ‘अंतरात्मा की आवाज़’, ‘नैतिक दायित्व’ और ‘लोकतान्त्रिक मूल्यों की रक्षा’ जैसे बड़े-बड़े शब्दजाल के पीछे छिपाना चाहते हैं।

गोस्वामी तुलसीदास जी ने शायद इन्हीं के बारे में लिखा था:

‘पंडित सोइ जो गाल बजावा।’
समवेत स्वरों में बस जोर से शोर मचाने वाले इन ‘विद्वान् पंडितों’ के तर्क नितांत बेढव और अटपटे हैं।

Delhi Riots 2020: The Untold Story का प्रकाशन ब्लूम्सबरी द्वारा रद्द लिए जाने का मामला तो बेहद गंभीर है। लेखिका मोनिका अरोड़ा का कहना है कि ‘किताब का विरोध करने वाले ज़्यादातर लोगों ने किताब पढ़ी तक नहीं है। तो फिर ये कैसे तय कर दिया गया कि किताब छपनी ही नहीं चाहिए?

इनके साझा शोर से ये प्रकाशक भी डर गया और उसने बिना सोचे-विचारे प्रकाशन रद्द कर दिया। ब्लूम्सबरी प्रकाशन की व्यावसायिक प्रतिबद्धता पर भी हजार सवाल उठने स्वाभाविक है। मूल बात है कि क्या इस पुस्तक के लिखने वालों को अपनी बात कहने का अधिकार है कि नहीं?

लोकतान्त्रिक समाज में कुछ लोग ये कैसे तय कर सकते हैं कि सिर्फ वही जब चाहेंगे और जैसी चाहेंगे, वैसे ही पुस्तकें लिखी जाएँगी। उनके मन मुताबिक ही लेख लिखे जाएँगे। वही बात सार्वजनिक जीवन में आएगी, जिस रूप में ये तत्त्व चाहते हैं। अगर ये फासीवाद नहीं तो क्या है? असल में फासीवादी इस पुस्तक के लेखक नहीं। असली फासीवादी वे लोग हैं, जिन्होंने इस पुस्तक के ब्लूम्सबरी द्वारा प्रकाशन को लेकर हो हल्ला मचाया और इसे रद्द कराया।

हमने अपनी बात 80 के दशक के एक विज्ञापन से शुरू की थी। अपनी बात का अंत हम आजकल चल रहे एक अन्य विज्ञापन से करेंगे। ये विज्ञापन भी कपड़ों की सफाई का ही है। ये कहता है – ‘दाग अच्छे हैं।’ इन अनुदारवादी पॉलीटिकल एक्टिविस्ट को ये समझ लेना चाहिए कि ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की सफेद कमीज’ पहनने का अधिकार भारत के हर नागरिक को है। चाहे वह किसी भी राजनीतिक दल, सामाजिक संगठन या विचारधारा का प्रतिनिधित्व क्यों न करता हो।

मीडिया, अकादमिक संस्थानों, कला क्षेत्र और साहित्यिक जगत पर अब तक राज करते आए ये लोग अक्सर दूसरे की सफेद कमीज तक को खराब घोषित करते आए हैं। इन घटनाओं ने साबित कर दिया है कि बौद्धिक दोगलेपन की जो छीटें इनके दामन पर पड़े हैं, वे अब अनुदारवाद और घोर असहिष्णुता के स्याह काले दागों में तब्दील हो गए हैं। कुछ भी हो भारतीय लोकतंत्र के लिए ये दाग अच्छे नहीं हैं।

सुशांत की मौत के बाद उनका क्रेडिट कार्ड इस्तेमाल कर रही थी रिया, पिन बदलने के लिए मिरांडा से माँगी थी मदद

रिया चक्रवर्ती और दिवंगत बॉलीवुड अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत के घर के प्रबंधक सैमुअल मिरांडा के बीच बातचीत का एक और किस्सा सामने आया है। इससे पता चला है कि सुशांत की मौत के बाद वे उसके बैंक खातों तक पहुँचने की कोशिश कर रहे थे और उनके पैसों का इस्तेमाल कर रहे थे।

टाइम्स नाउ की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि सैमुअल मिरांडा को रिया ने एक संदेश में लिखा, “क्या आप स्माल कार्ड का पिन बदल सकते हैं और हम नेटबैंकिंग का पिन भी बदल सकते हैं ना?”

रिपोर्ट्स के अनुसार, रिया चक्रवर्ती ने सुशांत सिंह राजपूत के डेबिट कार्ड के पासवर्ड को दिवंगत अभिनेता के घर के मैनेजर सैमुअल मिरांडा की मदद से कथित तौर पर चुरा लिया था। बताया जा रहा है कि रिया और मिरांडा, दोनों ही सुशांत की मौत के बाद अपने खर्च के लिए सुशांत सिंह राजपूत के रुपयों का इस्तेमाल कर रहे थे।

इस महीने की शुरुआत में ही केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) और प्रवर्तन निदेशालय (ED) के अधिकारियों द्वारा मिरांडा से पूछताछ के दौरान इस रहस्य से पर्दा उठा है। एजेंसियाँ जाँच कर रही हैं कि रिया ने सुशांत के डेबिट कार्ड के पासवर्ड क्यों चुराए? एजेंसियों ने यह भी पाया कि रिया कथित तौर पर ड्रग्स में भी शामिल थी और उसके साथ मिरांडा भी इसमें शामिल थे।

दरअसल, रिया के मोबाइल फोन से ड्रग्स से जुड़ी हुई उनकी कई चैट सामने आई हैं। समाचार चैनल टाइम्स नाउ के पास नई व्हाट्सएप चैट हैं, जिनसे पता चला है कि रिया चक्रवर्ती ने ‘वीड’ के दो बैग के लिए 17,000 रुपए का भुगतान किया था। 

रिपोर्ट के मुताबिक, रिया चक्रवर्ती दिवंगत अभिनेता सुशांत सिंह के हाउसहेल्प दिपेश सावंत से ड्रग्स खरीदती थी।रिया और दिपेश की करीब 120 चैट सामने आई हैं, जिन्हें कि डिलीट किया गया था। इसके अनुसार,अप्रैल 27, 2020 को दिपेश ने रिया को कहा था कि एक ग्रीन बैग के 5000 रुपए होंगे।

तजा रिपोर्ट के अनुसार, ED ने मुंबई पुलिस को रिया चक्रवर्ती के पिता की सुरक्षा में तैनात होने के लिए कहा है, ताकि वे बिना किसी परेशानी पूछताछ के लिए ED ऑफिस आ सकें और इस केस में सहयोग कर सकें। इसके बाद मुंबई पुलिस की एक टीम उनके घर के बाहर पहुँची। रिया ने इसके बाद एक वीडियो जारी करते हुए कहा कि उनकी जान को मीडिया की भीड़ से खतरा है।

IC 814 विमान हाइजैक का पुलवामा आतंकी हमले से मिला कनेक्शन, NIA की चार्जशीट से खुलासा

IC 814 विमान का हाइजैक भारतीय इतिहास के सबसे काले अध्यायों में से एक है। 24 दिसंबर 1999 का दिन था। इंडियन एयरलाइंस की फ्लाइट आईसी-814 ने नेपाल की राजधानी काठमांडू के त्रिभुवन अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे से दिल्ली के इंदिरा गाँधी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे के लिए उड़ान भरी थी।

इसके बाद पाकिस्तानी आतंकियों ने विमान का अपहरण कर लिया। आतंकी विमान को कंधार, अफगानिस्तान में उतरने से पहले इसे कई जगह ले गए। करीब एक हफ्ते प्लेन आतंकियों के कब्जे में रहा।

फिर, भारत की तरफ से तीन आतंकवादियों- मुश्ताक अहमद ज़रगर, अहमद उमर सईद शेख, और मौलाना मसूद अजहर को छोड़ने के बाद आतंकियों ने प्लेन को भी छोड़ दिया। भयावह बात यह है कि विमान आईसी 814 के हाइजैक करने का कनेक्शन पुलवामा हमले से मिला है।

समाचार एजेंसी IANS के मुताबिक, पाकिस्तान में जैश-ए-मोहम्मद के आतंकवादियों और उनके कमांडरों ने IC 814 इंडियन एयरलाइंस के अपहरणकर्ता और साजिशकर्ता इब्राहिम अतहर के बेटे मोहम्मद उमर फारूक के बैंक खाते में पुलवामा आतंकी हमले के लिए पाकिस्तानी करेंसी में 10 लाख रुपए जमा किए थे।

बता दें ये चौंकाने वाले खुलासे पुलवामा आतंकी हमले के मामले में NIA द्वारा दायर किए गए 13,500 पेज की चार्जशीट में किए गए थे।

चेकबुक IANS द्वारा अपलोड

इसके अलावा चार्जशीट से पता चला है कि पुलवामा आतंकी हमले के लिए फारूक ने मारुति ईको कार, 200 किलोग्राम विस्फोटक और अन्य सामान को खरीदने के लिए 5.7 लाख रुपए का इस्तेमाल किया।

आईएएनएस के अनुसार, एक वरिष्ठ सुरक्षा अधिकारी ने कहा, “मार्च 2019 में भारतीय सुरक्षा बलों के साथ मुठभेड़ में मारे गए फारूक के बैंक खाते में पाकिस्तान करेंसी (PKR) में 10 लाख की राशि जमा की गई थी।”

गौरतलब है इब्राहिम अतहर IC 814 हाइजैक का साजिशकर्ता था। पुलवामा आतंकी हमले को अंजाम देने के लिए वह आतंकवादी मोहम्मद उमर फारूक के बेटे का इस्तेमाल कर रहा था। पुलवामा आतंकी हमले में विस्फोटकों से लदी एक कार से हुए विस्फोट में 40 भारतीय सैनिक वीरगति को प्राप्त हुए थे।

रेप के बाद दलित छात्रा का गला रेतने वाले दिलशाद पर NSA के तहत कार्रवाई, पीड़ित परिवार को ₹5 लाख की मदद

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने लखीमपुर खीरी में छात्रा की रेप के बाद हत्या की घटना में गुरुवार (अगस्त, 27, 2020) को आरोपित के खिलाफ एनएसए (NSA) लगाने सहित कठोर कार्रवाई के निर्देश दिए। साथ ही पीड़‍ित परिजनों के प्रति गहरी संवेदना व्यक्त करते हुए 5 लाख की आर्थिक सहायता देने की घोषणा की।

उत्तर प्रदेश मुख्यमंत्री कार्यालय की ओर से कहा गया है कि सीएम योगी आदित्यनाथ ने अपराधियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने और राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के अंतर्गत कार्रवाई करने के निर्देश दिए हैं। मुख्यमंत्री ने पीड़‍ित परिवार को 5 लाख रुपये की आ​र्थिक सहायता देने की घोषणा की है।

लखीमपुर खीरी की घटना को संज्ञान में लेते हुए सीएम योगी आदित्यनाथ ने इस मामले में सख्ती बरतने के साथ इस प्रकरण की सुनवाई फास्ट ट्रैक कोर्ट में करने का निर्देश दिया था। ताकि अपराधियों को यथाशीघ्र सख्त से सख्त सजा दी जा सके।

बता दें कि लखीमपुर खीरी के नीम का थाना क्षेत्र के एक गाँव में एक दलित युवती की रेप के बाद हत्या कर दी गई थी। पुलिस ने इस मामले में दिलशाद नाम के युवक को गिरफ्तार किया है। रिपोर्ट के अनुसार मृत लड़की की शादी उसके परिवार द्वारा कहीं और तय कर दी गई थी। प्रेमी दिलशाद को यह फैसला पसंद नहीं आया। मृत लड़की ने अपने परिवार के फैसले के खिलाफ नहीं जाने की बात दिलशाद को बताई। इस बात को लेकर दिलशाद गुस्से में आ गया। उसने पहले अपनी प्रेमिका का रेप किया और बाद में चाकू से गला काट कर हत्या कर दी।

गौरतलब है, जिले के एसपी कार्यालय से जारी प्रेस नोट के अनुसार मृतका के शव के पास से उसका मोबाइल व हत्या में उपयोग किया गया चाकू पुलिस ने बरामद किया है। सभी पहलुओं की जाँच में जब मोबाइल कॉल की जाँच की गई तो पाया गया कि मृतका और संदिग्ध दिलशाद के बीच पिछले कई महीने से मोबाइल पर बात हो रही थी। घटना से एक दिन पहले भी दोनों के बीच 13 बार बात हुई थी। संदेह के आधार पर पुलिस ने जब दिलशाद से पूछताछ की तो उसने अपना जुर्म स्वीकार कर लिया।

मृतका के परिजनों के मुताबिक वह सोमवार को घर से निकली थीं। उन्हें पास के शहर में स्कॉलरशिप का ऑनलाइन फार्म भरने के लिए जाना था। लेकिन वो लौट कर घर नहीं आईं तो पुलिस को इसकी सूचना दी गई। मृतका और हत्या आरोपित दिलशाद के बीच संबंध शायद चोरी-छिपे थे, क्योंकि लड़की के चाचा शुरुआत में कहा था, ”मैं वास्तव में कुछ नहीं जानता, किस पर संदेह है, कुछ नहीं कह सकता।”

सुशांत मामले में मीडिया ट्रायल पर रोने वाले राजदीप सरदेसाई की ‘त्रि-या चरित्र’ पत्रकारिता

सुशांत सिंह राजपूत की मौत के बाद सवालों के घेरे में आई रिया चकवर्ती का इंडिया टुडे ने एक लंबा इंटरव्यू किया है। इसे वह रिया चकवर्ती का अब तक का सबसे धमाकेदार इंटरव्यू कहकर प्रचारित कर रहा है। साक्षात्कार राजदीप सरदेसाई ने लिया है।

यह पहला मौका नहीं है जब संदिग्ध को सफाई का भरपूर अवसर देने के लिए मीडिया ने मंच मुहैया कराया हो। ‘आपको कब पता चला कि सुशांत अवसाद में थे’, जैसे सवाल जो आरोपित की थ्योरी को मजबूती प्रदान करते हों, भी पहली बार नहीं पूछे गए हैं। लेकिन, ये वही राजदीप हैं जिन्होंने सुशांत सिंह राजपूत के पारिवारिक वकील को अपने शो में बुलाते ही मीडिया ट्रायल चलाने का सवाल दागा था। सुशांत की परिवार की जाँच की मॉंग के ‘इरादों’ पर सवाल उठाए थे। यह भी कहा था कि सुशांत कोई बड़े अभिनेता नहीं थे, जिसके लिए मुंबई पुलिस पर इतना दबाव डाला जाए।

ऐसे राजदीप और आजतक के लिए रिया चकवर्ती का प्रोफाइल इतना बड़ा कैसे हो गया कि उसे घंटों सफाई देने का मंच मुहैया कराया गया? मीडिया ट्रायल की बात कहने वालों ने खुद का कोर्ट लगा लिया? ऐसे में सोशल मीडिया में इस इंटरव्यू की मंशा को लेकर उठते सवाल चौंकाते नहीं हैं।

सवाल इस मामले में मीडिया की आक्रामक रिपोर्टिंग को लेकर भी उठ रहे हैं। सोशल मीडिया की जरा इन प्रतिक्रियाओं पर गौर करें

  • हिंदी न्यूज़ चैनल R-भारत ने फिर साबित किया… खूब चिल्लाओ, कामयाबी झक मारकर पीछे भागेगी…
  • घर की चाबी ग़ायब होने पर हिंदी न्यूज़ चैनल R-भारत के ऑफ़िस जाना ठीक है या सीधे CBI के पास चले जाएँ?
  • सुशांत आत्महत्या केस के सारे संदिग्धों से Republic के जाँच अधिकारी पूछताछ कर रहे हैं तो फिर CBI किससे पूछताछ कर रही है?
  • Republic TV को बड़ा झटका! सुप्रीम कोर्ट ने सुशांत आत्महत्या केस की जाँच Republic TV के बजाए CBI को सौंपी…

लेकिन क्या मीडिया की आक्रामक रिपोर्टिंग के बिना यह मामला उस मोड़ पर आज होता, जहॉं वह है? 14 जून 2020 को जब सुशांत सिंह राजपूत के अपने ही फ्लैट में फंदे से लटके मिलने की खबर आई तो हममें से ज्यादातर ने इसे एक और सुसाइड का ही मामला मान लिया। सुशांत को भी उन नामचीनों की श्रेणी में डाल दिया जो दबाव नहीं झेल पाते हैं।

लेकिन यह मीडिया (रिपब्लिक भारत जैसे संस्थान) ही है, जिसने इस मामले की एक-एक परतें लगातार खोली और यह सवाल पैदा किया कि यह महज आत्महत्या नहीं है। उससे पहले कंगना रनौत लगातार इस मामले को लेकर मुखर रहीं और बताया कि किस तरह बॉलीवुड में नेपोटिज्म है। वह कैसे आउटसाइडर को निशाना बनाता है। किस तरह उनके इशारे पर मीडिया आउटसाइडर का चरित्रहनन करता है।

ये मीडिया रिपोर्टिंग से सामने आए तथ्य ही थे, जिससे इस मामले में सीबीआई जाँच को लेकर दबाव बना। वरना सुशांत के पिता की एफआईआर पर बिहार पुलिस की जॉंच को तो मुंबई में ‘क्वारंटाइन’ कर दिया गया था। मीडिया ने ही बताया कि सुशांत की मौत के बाद रिया गुपचुप शवगृह में घुसी थी। इसके बाद वह अस्पताल जाँच के दायरे में आया, जहाँ पोस्टमॉर्टम हुई थी। मीडिया ने ही उन कॉल डिटेलों और बैंक स्टेटमेंट के आधार पर रिपोर्टिंग की, जिससे बॉलीवुड नेक्सस और सुशांत के पैसों के संदिग्ध लेनदेन के आरोपों को बल मिला।

मीडिया इस मामले के उन सभी किरदारों तक पहुँची, जिनके दरवाजे पर मुंबई पुलिस को दस्तक देनी थी। उन विरोधाभासों को सामने लाया, जिसकी पड़ताल मुंबई पुलिस को करनी चाहिए था। आज जाँच एजेंसियॉं इन्हीं लोगों से पूछताछ कर रही है। इन्हीं विरोधाभासों को खँगाल रही है।

जिन्हें लगता है कि मीडिया को इस तरह की खबरें नहीं निकालनी चाहिए थी, उन्हें ध्यान रखना चाहिए कि कई बार इंसाफ धक्कों के बाद ही मिलता है। यदि मीडिया आक्रामक नहीं हुई होती तो क्या जेसिका लाल मर्डर केस में मनु शर्मा को सजा होती? क्या नीतीश कटारा की हत्या में विकास यादव को सजा हुई होती?

29 अप्रैल 1999 की रात दिल्ली के टैमरिंड कोर्ट रेस्टोरेंट में जेसिका की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। कारण उसने मनु शर्मा को यह कहते हुए शराब परोसने से मना कर दिया था कि अब बार बंद हो चुका है। हत्या को कई लोगों की नजरों के सामने अंजाम दिया गया था। बावजूद फरवरी 2006 में सभी आरोपी बरी हो गए ​थे।

यह जेसिका के परिवार की इंसाफ पाने की अटूट चाहत और मीडिया का दबाव ​था कि यह मामला दोबारा खुल पाया। इस मामले मे इसी मीडिया की आक्रामक रिपोर्टिंग की वजहों से हमने जाना कि चश्मदीदों ने झूठ बोला था।

आज जिस तरह एक धड़ा बॉलीवुड नेक्सस के प्रभाव में दिखता है, उसी तरह उस वक्त भी एक वर्ग मनु शर्मा के पिता विनोद शर्मा और विकास यादव के पिता डीपी यादव के प्रभाव में था। उस समय भी यह कहने वाले कम न थे कि मामले में मीडिया ट्रायल हो रहा है। सजा पाने के बाद भी इन्हें नेक्सस से मदद पहुँचाने की तमाम कोशिश की गई, जो छिपी नहीं है।

स्वरा भास्कर का यह कहना चौंकाता नहीं है, “मुझे नहीं लगता है कि कसाब भी मीडिया पर इस तरह का Witch Hunt का विषय रहा होगा। जिस तरह रिया चक्रवर्ती मीडिया ट्रायल को झेल रही हैं। शर्म आनी चाहिए भारतीय मीडिया… इस विषैले जहरीले हिस्टीरिया को ग्रहण करने वाली टॉकसिक जनता पर हमें शर्म आती है।”

ये वही लोग हैं जिन्हें तब शर्म नहीं आई थी, जब महाराष्ट्र के सत्ताधारी दल के एक नेता ने सुशांत के पिता की दो शादियों का झूठा दावा किया और परिवार के इरादों पर सवाल उठाए। जब द प्रिंट इस केस के बहाने बिहारियों के खिलाफ घृणा उगलता है।

ऐसे लोगों के लिए रिया को आजतक द्वारा सफाई का मौका देना पत्रकारिता है। उसके कॉल रिकॉर्ड की तफ्तीश मीडिया ट्रायल। मीडिया, राजनीति और ग्लैमर के इस खोल पर जब-जब वार होता है तो ये ऐसे ही बिलिबिलाते हैं।

असल में उन्होंने तो मान लिया था कि मामला बंद है। पर मुंबई पुलिस के देखते-देखते इसमें बिहार पुलिस शामिल हुई। ईडी, सीबीआई और अब नार्कोटिक्स ब्यूरो भी। उम्मीद की जानी चाहिए कि इस बार वह लीक भी टूटेगी जो अमूमन हाईप्रोफाइल मामलों की जाँच में दिखती है। यानी, मामलों की तरह ही जाँच का भी गुत्थी बन जाना।

अपनों पर हमला करने में ऊर्जा बर्बाद न करें: जितिन प्रसाद का समर्थन कर कपिल सिब्बल ने कॉन्ग्रेस पर साधा निशाना

पूर्व केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल ने एक बार फिर अपनी ही पार्टी पर निशाना साधा है। उन्होंने ट्वीट कर कहा है, “अफसोस की बात है कि जितिन प्रसाद को उत्तर प्रदेश में आधिकारिक तौर पर निशाना बनाया जा रहा है। जरूरत इस बात की है कि कॉन्ग्रेस बीजेपी पर सर्जिकल स्‍ट्राइक करे न कि अपनों पर हमले करके अपनी ऊर्जा बर्बाद करे।”

पूर्व केंद्रीय मंत्री जितिन प्रसाद के खिलाफ कॉन्ग्रेसियों के विरोध-दर्शन के बाद यह ट्वीट आया है। इससे स्पष्ट है कि भले सोनिया गॉंधी को कॉन्ग्रेस ने छह और महीने के लिए अंतरिम अध्यक्ष चुन लिया हो पर पार्टी की अंदरूनी लड़ाई खत्म नहीं हुई है।

जितिन प्रसाद उन 23 नेताओं में शामिल थे जिन्होंने कॉन्ग्रेस नेतृत्व में बदलाव को लेकर सोनिया गाँधी को चिट्ठी लिखी थी। दरअसल बुधवार (26 अग्गास्त 2020) को लखीमपुर खीरी जिला कॉन्ग्रेस कमेटी की बैठक में जितिन प्रसाद समेत अन्य नेताओं की कड़ी आलोचना की गई थी। इन सभी पर अनुशासनात्मक कार्रवाई की माँग की गई थी। साथ ही इस संबंध में सोनिया गाँधी को प्रस्ताव भी भेजा गया था।   

बैठक की अध्यक्षता करते हुए जिलाध्यक्ष प्रह्लाद पटेल ने भी इस मुद्दे पर बयान दिया था। उनका कहना था कि सोनिया गाँधी एक सर्वमान्य नेता हैं। साथ ही दल के लोग राहुल और प्रियंका पर पूरा भरोसा करते हैं। बैठक में शामिल अन्य नेताओं का कहना था कि जिस वक्त यह सब हुआ उस दौरान सोनिया गाँधी का स्वास्थ्य ठीक नहीं था। राजस्थान और मध्य प्रदेश की सरकार पर भाजपा हमलावर थी। ऐसे कठिन समय में जितिन प्रसाद समेत अन्य वरिष्ठ नेताओं ने पत्र लिख कर हस्ताक्षर किया। पत्र के माध्यम से सोनिया गाँधी की कार्यशैली पर ऊँगली उठाई। शीर्ष नेताओं की इस हरकत से यह साफ़ हो गया था कि वह सोनिया गाँधी पर बिलकुल भरोसा नहीं करते हैं। जो काम असल में भाजपा का था वह दल के ही लोग कर रहे थे, इससे दल की नींव ही कमज़ोर हुई।   

जितिन प्रसाद के विरोध में जारी किए गए निंदा प्रस्ताव में एक और अहम बात कही गई थी। निंदा प्रस्ताव के मुताबिक़ जितिन प्रसाद का पारिवारिक इतिहास गाँधी परिवार के विरोध का रहा है। जितिन प्रसाद के पिता ने खुद सोनिया गाँधी के विरोध में चुनाव लड़ा था। इसके बावजूद सोनिया गाँधी ने उन्हें पार्टी में जगह दी, लोकसभा का टिकट दिया और मंत्री भी बनाया था। लिहाज़ा जितिन प्रसाद की यह हरकत अनुशासनहीनता मानी जाएगी। इस बात का ज़िक्र करते हुए प्रस्ताव के अंत में जितिन प्रसाद पर कड़ी कार्रवाई की माँग उठाई गई थी। इसके अलावा बैठक के दौरान जितिन प्रसाद के विरोध में नारे भी लगाए गए थे।   

कॉन्ग्रेस कार्यसमिति की बैठक में राहुल गाँधी ने भी इस पत्र के समय पर सवाल खड़े किए थे। उन्होंने इस मुद्दे पर सवाल करते हुए कहा था कि पार्टी नेताओं द्वारा यह पत्र ऐसे वक्त में लिखा गया जब सोनिया गाँधी अस्पताल में भर्ती थीं। नेतृत्व पर सवाल करते हुए यह पत्र ऐसे समय में लिखा गया जब राजस्थान कॉन्ग्रेस सरकार पर संकट था। राहुल ने कथित तौर पर इसमें बीजेपी के साथ मिलीभगत की बात भी कही थी।

इसके बाद कपिल सिब्बल ने ट्वीट कर कहा था, “राहुल गाँधी कहते हैं कि हमारी बीजेपी के साथ साँठ-गाँठ है, राजस्थान हाईकोर्ट में पार्टी को सफलता दिलाई। मणिपुर में बीजेपी के खिलाफ पूरी ताकत से पार्टी का बचाव किया। पिछले 30 सालों में बीजेपी के पक्ष में एक भी बयान नहीं दिया। फिर भी हम पर बीजेपी से साँठ-गाँठ का आरोप लग रहा है।” हालॉंकि बाद में उन्होंने यह कहते हुए यह ट्वीट वापस ले लिया था कि उनकी राहुल से बात हुई है और उन्होंने ऐसी कोई बात नहीं कही थी।