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देश में अभी 47481 वेंटिलेटर्स, अकेले PM CARES से आएँगे 50000 ‘मेड इन इंडिया’ वेंटिलेटर्स: ₹2000 करोड़ खर्च

पीएम केयर्स (PM CARES) फण्ड की विपक्ष ने जमकर आलोचना की थी। लेकिन इस फण्ड के उपयोग से जमीनी स्तर पर बदलाव लाया जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस इनिशिएटिव से हॉस्पिटलों में वेंटिलेटर्स पहुँचने शुरू हो गए हैं।

पीएम केयर्स से क्या फायदा हुआ है? दरअसल, इस फण्ड के प्रयोग से 50,000 वेंटिलेटर्स का उत्पादन किया जा रहा है। इसकी ख़ासियत ये है कि ये सब ‘मेक इन इंडिया’ कार्यक्रम के तहत किया जा रहा है। अर्थात, इससे स्वदेशी अभियान को भी बल मिल रहा है। साथ ही प्रवासी मजदूरों के लिए 1000 करोड़ रुपए की व्यवस्था भी पीएम केयर्स से ही की गई है। कोरोना से निपटने के लिए वैक्सीन बनाने के लिए जो रिसर्च चल रहा है, वहाँ भी पीएम केयर्स फण्ड से 100 करोड़ रुपए दिए गए हैं।

एक अध्ययन के अनुसार, अभी तक देश भर के अस्पतालों में कुल 47,000 वेंटिलेटर्स उपलब्ध हैं। क्या आपको पता है कि पीएम केयर्स के उपयोग के बाद ये संख्या कितनी हो जाएगी? दोगुनी से भी ज्यादा। यानी, 50,000 नए वेंटिलेटर्स सिर्फ़ पीएम केयर्स फण्ड से आने वाले हैं, वो भी स्वदेशी।

अध्ययन के अनुसार, जहाँ पब्लिक सेक्टर में 17,850 वेंटिलेटर्स उपलब्ध थे, वहीं प्राइवेट सेक्टर में 29,631 वेंटिलेटर्स मौजूद थे। यानी, कुल मिला कर 47,481 वेंटिलेटर्स।

केंद्र सरकार ने कहा है कि 50,000 नए वेंटिलेटर्स ख़रीदने के लिए पीएम केयर्स फण्ड से 2000 करोड़ रुपए आवंटित किए गए हैं। इसके करण से देश में उपलब्ध वेंटिलेटर्स की संख्या 97, 481 हो जाएगी। यानी, 1 लाख के क़रीब।

देश के सभी राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों में वेंटिलेटर्स की संख्या का अध्ययन

आलोचना का मुख्य बिंदु ये था कि जब पीएम रिलीफ फंड है ही तो फिर पीएम केयर्स की क्या ज़रूरत थी? दरअसल, पीएम रिलीफ फण्ड को इस तरह से डिजाइन नहीं किया गया था कि वो ऐसी आपदा की घड़ी में किसी प्रकार के सुधार कार्यक्रम के काम आ सके। हाँ, उसकी उपयोगिता ये ज़रूर थी कि किसी आपदा की घड़ी में पीड़ितों को मुआवजा दिया जाए या फिर पीड़ित परिवारों की मदद की जाए। पीएम केयर्स पूरे के पूरे सेक्टर में रिफॉर्म की क्षमता रखता है।

पीएम केयर्स से रिसर्च के लिए फंडिंग की जा सकती है। इससे स्वास्थ्य और फार्मा सेक्टर को आधुनिक बनाने और उन्हें अपग्रेड करने में मजबूती मिलेगी। इंफ्रास्ट्रक्चर को और ज्यादा मजबूत बनाने में पीएम केयर्स का उपयोग किया जा सकता है, जो अभी हो रहा है। पीएम रिलीफ फण्ड के माध्यम से ये सब संभव नहीं है। पीएम रिलीफ फण्ड के बोर्ड में कौन-कौन लोग हैं, ये भी जानने वाली बात है।

उसमें प्रधानमंत्री के अलावा कॉन्ग्रेस पार्टी की अध्यक्ष और कॉर्पोरेट जगत की हस्तियाँ भी शामिल हैं। यानी प्राइवेट उद्योगों के प्रतिनिधि और एक राजनीतिक दल के अध्यक्ष उस बोर्ड में शामिल हैं। जबकि पीएम केयर्स में प्रधानमंत्री के अलावा रक्षा, वित्त और गृह मंत्री शामिल हैं, यानी सारे चुने हुए प्रतिनिधि हैं जो सरकार का हिस्सा हैं। आखिर पीएम रिलीफ फंड में कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष की सदस्यता और भूमिका की व्यवस्था क्यों की गई है?

पीएम रिलीफ फंड के ऑडिटर्स में भी एमएस ठाकुर और वैद्यनाथ अय्यर जैसे लोग शामिल हैं। इस फण्ड की स्थापना रामेश्वर ठाकुर ने की थी, जो कि ज़िंदगी भर एक वफादार कॉन्ग्रेस नेता रहे थे। सोनिया गाँधी ने इसीलिए पीएम केयर्स का विरोध किया था, क्योंकि पीएम रिलीफ फण्ड के बोर्ड की वो आजीवन सदस्य हैं और ऑडिटर्स भी कॉन्ग्रेस के ही लोग थे। मोदी सरकार ने जिस एमएस सार्क एसोसिएट्स को पीएम रिलीफ फण्ड का ऑडिटर बनाया था, उसे ही पीएम केयर्स का ही ऑडिटर बनाया गया है। फिर हंगामा क्यों?

वो तो 2018-19 से ही पीएम रिलीफ फण्ड की ऑडिटिंग में लगा हुआ है, फिर जब पीएम केयर्स के लिए वही ऑडिटर्स हैं तो हंगामा का कारण यही है कि इसमें कॉन्ग्रेस वालों की कोई भूमिका नहीं है। तो यहाँ ये सवाल उठ सकता है कि क्या एमएस सार्क एंड एसोसिएट्स भाजपा की क़रीबी है?

दरअसल, ऐसा नहीं है। एमएस सार्क के सुनील गुप्ता उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हरेश रावत, दिल्ली की दिवंगत सीएम शीला दीक्षित, बड़बोले कॉन्ग्रेस नेता मणिशंकर अय्यर और पूर्व राष्ट्रीपति प्रतिभा पाटिल के साथ कई तस्वीरों में देखे जा सकते हैं।

मई के दूसरे हफ्ते में ही ख़बर आई थी कि पीएम केयर्स से कोरोना वायरस आपदा से निपटने के लिए 3100 करोड़ रुपए आवंटित किए गए हैं। इससे ख़रीदे गए 50,000 ‘मेड इन इंडिया’ वेंटिलेटर्स को देश भर के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के अस्पतालों में इनस्टॉल किया जाएगा। साथ ही 1000 करोड़ रुपए सभी राज्यों को स्थानीय स्तर पर कलक्टरों के माध्यम से ज़रूरी सुधार करने के लिए की गई।

पीएम केयर्स की स्थापना एक पब्लिक चैरिटेबल ट्रस्ट के रूप में हुई है, जबकि 1948 में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने पीएम रिलीफ फण्ड की मौखिक रूप से घोषणा की थी। पीएम रिलीफ फण्ड का उद्देश्य था कि त्वरित सहायता पहुँचाई जाए, जबकि पीएम सिस्टेमेटिक ढंग से योजना बना कर वित्त उपलब्ध कराता है। पीएम रिलीफ फण्ड का कोई एडवाइजरी बोर्ड नहीं है, जबकि पीएम रिलीफ फण्ड में रिसर्च, क़ानून, स्वास्थ्य, समाजसेवा और विज्ञान के 10 प्रबुद्धजन एडवाइजरी बोर्ड में शामिल होने का प्रावधान है।

पीएम रिलीफ फण्ड में ट्रस्टियों की जिम्मेदारियाँ परिभाषित ही नहीं की गई हैं, जबकि पीएम केयर्स फण्ड में सभी ट्रस्टियों की जिम्मेदारियाँ वर्णित हैं। साथ ही इसके ऑडिटर्स का भी रोटेशन होगा, पीएम रिलीफ फण्ड की तरह आजीवन कोई कॉन्ग्रेसी ही नहीं बैठा रहेगा। एक और बात जानने लायक है कि पीएम रिलीफ फण्ड को उस समय पाकिस्तान से आए विस्थापित शरणार्थियों की त्वरित सहायता के लिए स्थापित किया गया था।

अब बाढ़, तूफ़ान या फिर भूकंप से पीड़ित लोगों को इसके माध्यम से त्वरित सहायता दी जाती है। लेकिन, कोई कोरोना जैसी अचानक बड़ी आपदा आ जाए तो उसके लिए पीएम केयर्स की स्थापना हुई है। पीएम केयर्स का अपना एक अलग वेबसाइट है, जहाँ से सारी जानकारियाँ मिल सकती हैं। जब कोई ऐसी आपदा आएगी जो पूरे देश को प्रभावित कर सके तो पीएम केयर्स के फण्ड का उपयोग किया जाएगा।

कोरोना वायरस व ऐसी अन्य प्रकार की महामारी से निपटने के लिए बनाए गए इस फण्ड को विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम (FCRA) से मुक्त करने के बाद विदेशों से दान के लिए खोला गया है। अब विदेशों से दान करने वाले लोग सीधे पीएम केयर्स पोर्टल से दान की रसीदें डाउनलोड कर सकते हैं। केंद्र द्वारा सोनिया गाँधी की माँग को ठुकरा दिया गया था कि इसमें प्राप्त हुई धनराशि को पीएम रिलीफ फण्ड में ट्रांसफर किया जाए।

दिग्विजय सिंह को राज्यसभा भेजने के लिए कॉन्ग्रेस ने दी दलित की ‘बलि’: MP में चुनाव के बीच याद आया वडोदरा

पूर्वी दिल्ली का सीलमपुर। यहॉं दलितों की अच्छी-ख़ासी आबादी है। 27 मार्च 2014) को यहॉं नरेंद्र मोदी भाषण दे रहे थे। तब वे प्रधानमंत्री नहीं बने थे। लोकसभा चुनाव का प्रचार जोरों पर था। गुजरात के वडोदरा से मोदी के चुनाव लड़ने की घोषणा हो चुकी थी।

इसी दौरान सीलमपुर में नरेंद्र मोदी ने एक विशाल सभा को सम्बोधित करते हुए कहा था;

“कॉन्ग्रेस ने वडोदरा से उम्मीदवार बदल दिया है और इसका कारण ये है कि वे दलित थे। शहजादे को लोकतंत्र में विश्वास नहीं है। क्या दलित होना गुनाह है? कॉन्ग्रेस ने ऐसा कर एक दलित का अपमान किया है। शहजादे को एक दलित के साथ हुए अत्याचार का जवाब देना होगा। तोमर को एक प्रक्रिया के तहत उम्मीदवार चुना गया था। फिर भी उन्हें हटा दिया गया। उन्हें दलित होने की सज़ा दी गई है।

अब जानते हैं कि मोदी ने ऐसा क्यों कहा था? असल में नरेंद्र रावत जो कि कॉन्ग्रेस के प्रमुख भी थे, को लोकसभा चुनाव लड़ना था। लेकिन, जैसे ही नरेंद्र मोदी ने वहाँ से चुनाव लड़ने की घोषणा की, कॉन्ग्रेस ने उम्मीदवार बदल दिया।

नए उम्मीदवार का नाम था मधुसूदन मिस्त्री, जो पहले साबरकाँठा से 2 बार सांसद रह चुके थे। वही लोकसभा क्षेत्र, जहाँ से भारत के प्रधानमंत्री रहे गुलजारी लाल नंदा ने हैट्रिक बनाई थी। बाद में रामानंद सागर के रामायण में रावण का किरदार निभाने वाले अरविन्द त्रिवेदी भी यहीं से सांसद रहे थे।

अब मिस्त्री रसूखदार थे, कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी के क़रीबी माने जाते थे, उन्हें टिकट मिलने के बाद हंगामा हुआ। हंगामे का कारण उन्हें टिकट मिलने से ज्यादा नरेंद्र रावत का टिकट काटना था।

मोदी के उस संबोधन को छह साल से भी ज्यादा हो गए, लेकिन कॉन्ग्रेस वहीं की वहीं है। बस इलाक़ा बदल गया है। ताज़ा मामला मध्य प्रदेश में होने जा रहे राज्यसभा चुनाव और वहाँ के बड़बोले नेता और पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह से जुड़ा है। कॉन्ग्रेस के एक वर्ग की माँग थी कि अनुसूचित जाति से आने वाले फूल सिंह बरैया को राज्यसभा पहुँचाया जाए, ताकि दलितों के बीच पार्टी का आधार मजबूत करने में बल मिले।

हालाँकि, ऐसा नहीं है कि कॉन्ग्रेस में सब दिग्विजय के पक्ष में गोलबंद थे और सार्वजनिक रूप से आवाज़ नहीं उठी थी। कॉन्ग्रेस के ही नेता चौधरी राकेश सिंह चतुर्वेदी ने ट्वीट कर कहा था कि दिग्विजय सिंह को इस बात की पहल करनी चाहिए कि फूल सिंह बरैया राज्यसभा चुनाव में प्रथम वरीयता का उम्मीदवार बनें। चौधरी राकेश सिंह ने दिग्विजय सिंह को त्याग का परिचय देने की सलाह दी थी। पर पार्टी ने उन्हें नज़रअंदाज़ किया।

बता दें कि दिग्विजय सिंह ने ही बरैया को राजनीति में एंट्री कराई थी, लेकिन अब उनकी राह में दिग्विजय ही बाधा बन गए। बरैया को राज्यसभा जाने का मौका नहीं मिला और दिग्विजय कॉन्ग्रेस के उम्मीदवार बन गए। पिछले लोकसभा चुनाव में भोपाल से साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर ने दिग्विजय को करारी मात दी थी। एक दलित की जगह चुनाव हारे हुए उम्मीदवार को तरजीह दी गई। तभी तो भाजपा ने इस पर बयान देते हुए कहा:

“कॉन्ग्रेस का दलित विरोधी चेहरा फिर सामने आ गया है। दिग्विजय सिंह राज्यसभा जाएँगे और फूल सिंह बरैया को बाहर का रास्ता देखना पड़ेगा। दिग्विजय सिंह का रवैया लगातार दलित विरोधी रहा है। जब कॉन्ग्रेस विपक्ष में थी तब भी बाला बच्चन को दिग्विजय सिंह ने नेता प्रतिपक्ष नहीं बनने दिया था। नेहरू ने बाबासाहब आंबेडकर को चुनाव हरवाया था। इंदिरा ने बाबू जगजीवन राम को अपमानित कराया था। सोनिया ने सीताराम केसरी को कमरे में बंद कर अध्यक्ष पद हथियाया था। नेहरू ख़ानदान की हर पीढ़ी ने अनुसूचित वर्ग का अपमान किया है।”

हालाँकि, अगर चुनावी समीकरणों की बात करें तो एक सीट कॉन्ग्रेस और दो सीटें भाजपा के पक्ष में जानी तय है। लेकिन, यहाँ एक ट्विस्ट आता है। दिग्विजय सिंह के बाद फूल सिंह बरैया को भी राज्यसभा प्रत्याशी बना दिया गया है, जबकि राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं कि उनकी हार तय है। भाजपा भी कहती है कि दलित बरैया को ‘दोयम दर्जे’ का प्रत्याशी बनाया गया है। यानी, दिग्विजय की राज्यसभा सदस्यता के लिए एक दलित की ‘बलि’ ले ली गई।

एक सवाल ये भी उठ सकता है कि जब कॉन्ग्रेस को दलित फूल सिंह बरैया को राज्यसभा भेजने का मन नहीं था तो उसने उन्हें आगामी विधानसभा उपचुनाव के लिए क्यों नहीं उतारा? कॉन्ग्रेस का एक धड़ा मानता है कि चम्बल-दियारा क्षेत्र में उनके उतरने से एक सीट तो पक्की हो ही जाती। अन्य सीटों पर भी दलितों के कुछ वोट कॉन्ग्रेस के पाले में आते। लेकिन, कॉन्ग्रेस ने ऐसा नहीं किया। क्या दाँव उलटा पड़ने का डर था?

कॉन्ग्रेस को ये डर भी हो सकता है कि फूल सिंह बरैया को उतारने से कहीं ओबीसी या सामन्य वर्ग पार्टी के खिलाफ एकजुट न हो जाए। जहाँ उपचुनावों में ऐसी स्थिति में सत्ताधारी पार्टी की जीत का इतिहास रहा है, कॉन्ग्रेस यहाँ अपनी इज्जत बचाने उत्तर रही है, क्योंकि कमलनाथ सरकार के काम गिनाने के नाम पर उसके पास कुछ है नहीं। कर्जमाफी फ्लॉप हो गई और उलटा किसानों के गुस्से का कारण बनी।

क्या ध्रुवीकरण के इसी भय के कारण बरैया की ‘बलि’ दे दी गई?

अब आते हैं आंबेडकर वाली बात पर। दरअसल, वो पहले चुनाव में ‘शेड्यूल्ड कास्ट पार्टी ऑफ इंडिया’ से खड़े हुए थे। कॉन्ग्रेस ने उनके खिलाफ उम्मीदवार उतारा, सीपीआई ने उनके खिलाफ प्रचार किया और उनकी हार हो गई। आंबेडकर चौथे नंबर पर रहे। नेहरू ने बॉम्बे नॉर्थ से नारायण शाडोबा काजरोलकर को उतारा था जो आंबेडकर के सहयोगी रहे थे। उनकी जीत हुई।

इसी तरह आपातकाल के दौरान इंदिरा गाँधी से तंग आकर बाबू जगजीवन राम ने कॉन्ग्रेस छोड़ी थी। सोनिया गाँधी जब अध्यक्ष बनी थीं, तब तत्कालीन कॉन्ग्रेस अध्यक्ष सीताराम केसरी को अपमानित किया गया था। यहाँ तक कि बूढ़े केसरी जब अपने घर पहुँचे तो वहाँ उन्हें रिसीव करने के लिए एक कुत्ते के अलावा कोई नहीं था। स्वाभाविक है कि ऐसी घटनाओं के मद्देनज़र कॉन्ग्रेस को उसका इतिहास याद दिलाया जाएगा।

दरगाह के पास 10वीं की छात्रा से रेप: इमरान, राशिद गिरफ्तार – कुछ दिन पहले पीड़िता के घर पेंट करने गया था राशिद

ग्वालियर में दसवीं की एक छात्रा के साथ गैंगरेप का मामला सामने आया है। पुलिस ने इस केस में 2 आरोपितों को गिरफ्तार किया है। इनकी पहचान इमरान खान और राशिद खान के रूप में हुई है। इन पर आरोप है कि इन्होंने पहले नाबालिग का अपहरण किया, फिर दरगाह के पास ले जाकर उसका रेप किया और विरोध करने पर लड़की को जान से मारने की धमकी दी।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, घटना ग्वालियर के ख्वाजा थाना क्षेत्र की है। यहाँ 11 जून (गुरुवार) को 10वीं में पढ़ने वाली नाबालिग अपने घर से कुछ सामान लेने के लिए निकली थी।

इसी दौरान घर से कुछ दूरी पर इमरान और राशिद खान खड़े थे। छात्रा जब उनके पास से गुजरी तो इमरान ने उसका मुँह दबा लिया और राशिद गाड़ी को लेकर उसके पास पहुँचा।

इसके बाद दोनों ने उसे खींचकर गाड़ी में बिठाया और ख्वाजा खानून की दरगाह के पास ले गए। वहाँ उसका बलात्कार किया। इस बीच जब नाबालिग ने खुद को बचाने के लिए विरोध किया तो दोनों ने उसे जान से मार डालने की धमकी दी।

पीड़ित छात्रा, इमरान और राशिद के सामने रोती और गिड़गिड़ाती रही। लेकिन आरोपितों का दिल नहीं पसीजा। उन्होंने उससे मारपीट करते हुए वीडियो भी बनाया। बाद में उसे धमकी दी कि अगर मुँह खोला तो वीडियो वायरल कर देंगे।

इस पूरी घटना में लड़की बुरी तरह से घायल हो गई। बाद में किसी तरह अपने घर पहुँचकर उसने सारी जानकारी अपने परिजनों को दी। मामले की जानकारी होते ही लड़की के घरवाले थाने पहुँचे।

उन्होंने इस मामले में शिकायत दर्ज करवाई। इसके बाद पुलिस ने लड़की को अस्पताल पहुँचाया। जहाँ प्राथमिक इलाज के बाद लड़की को छुट्टी दे दी गई।

वहीं पुलिस ने इस मामले पर त्वरित कार्रवाई करते हुए दोनों आरोपितों को गिरफ्तार कर लिया। इनके मोबाइल फोन भी जब्त कर लिए गए। इसके साथ ही इन्हें शुक्रवार को कोर्ट में पेश करके जेल भेज दिया गया। जाँच में पता चला कि राशिद खान कुछ दिनों पहले लड़की के घर पेंट करने गया था।

गौरतलब है कि नाबालिग के साथ दुष्कर्म का एक ताजा मामला दिल्ली में भी सामने आया है। यहाँ प्रीत विहार में बतौर सहायिका काम करने वाली 16 साल की लड़की झारखंड अपने घर जाने के लिए आनंद विहार की ओर गई थी। लेकिन वहाँ किसी ने उसे कहा कि झारखंड जाने वाली ट्रेन नई दिल्ली से मिलेगी।

इसके बाद वह किसी तरह नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पहुँची। यहाँ कुछ लोगों ने उसे सहायता का झांसा देकर ट्रेन में बैठाया, फिर सुनसान जगह पर उतारकर उसे शराब पिलाई और गैंगरेप किया।

लड़की बदहवास हालत में भटकते हुए कोतवाली इलाके में पहुँची। यहाँ महिला पुलिसकर्मी ने पहले उसे भोजन कराया, फिर उससे पूछताछ की। इसके बाद उसका मेडिकल कराके आरोपितों के ख़िलाफ केस दर्ज कर लिया गया। अब बच्ची को नारी गृह में रखा गया है।

कोरोना संक्रमितों को दफन करने के लिए छोटा पड़ा 5 बीघे का कब्रिस्तान, 300 कब्र अकेले शमीम ने खोदे: लॉकडाउन के बाद शव दोगुने

नई दिल्ली में ITO के पास है जदीद कब्रिस्तान। यह 45 एकड़ में फैला है। इसमें से 5 बीघा जमीना कोरोना संक्रमण से मरने वालों को दफन करने के लिए आरक्षित की गई थी। दैनिक भास्कर की खबर के अनुसार, कुछ ही हफ्तों में इस 5 बीघे जमीन का 75 फीसदी हिस्सा भर चुका है।

शमीम के हवाले से दैनिक भास्कर ने बताया है कि जिस रफ्तार से मौतें हो रही है कोरोना संक्रमितों के लिए आरक्षित यह कब्रिस्तान हफ्ते भर से भी कम समय में भर जाएगा। उन्होंने बताया कि इसके बाद ऐसे लोगों का शव दफन करने के लिए कब्रिस्तान प्रबंधन कमिटी को और जमीन आवंटित करनी पड़ेगी। शमीम यहॉं शवों के लिए कब्र खोदने का काम करते हैं।

यहाँ बता दें, कब्रिस्तान में 5 बीघा जमीन के लिए बहुत पेड़ गिराने पड़े थे। ऐसे में अगर जमीन की जरूरत आगे पड़ती है, तो और पेड़ों को गिराना होगा।

रिपोर्ट के मुताबिक, शमीम को प्रति दिन हरेक कब्र के लिए 100 रुपए मिलते हैं। वे दिल्ली के पहले ऐसे शख्स हैं जो कोरोना के कारमण मरने वालों का कब्र खोदने आगे आए। लॉकडाउन से अब तक वह 300 शव दफना चुके हैं। 25 दिन पहले 4,500 रुपए का उन्होंने खुद का कोरोना टेस्ट भी कराया था।

दैनिक भास्कर से बातचीत में शमीम बताते हैं कि लॉकडाउन खत्म होने के बाद शवों में अचानक वृद्धि हुई है। लॉकडाउन में कब्रिस्तान में सिर्फ 5-6 शव आते थे। लेकिन, इसके बाद से 10-12 शव रोज आ रहे।

शमीम का कहना है कि हो सकता है कोरोना महामारी के चलते लोगों को अन्य गम्भीर बीमारियों के लिए अच्छा इलाज नहीं मिल पा रहा है। इसलिए ऐसा हुआ हो।

उल्लेखनीय है कि इस कब्रिस्तान में आमतौर पर पुरानी दिल्ली के लोग आते हैं। लेकिन कोरोना के कारण यहाँ दिल्ली के अलग-अलग जगहों से शवों को लाया जा रहा है। इनमें से कई शव तो ऐसे भी हैं जिन्हें 4-5 दिन बाद लाया गया। उनके मुताबिक यह देरी, कोरोना जाँच की रिपोर्ट के इंतजार में हो रही है।

याद दिला दें, पिछले हफ्ते, दिल्ली में कब्रिस्तान कमेटी के सदस्य मसरूर सिद्दीकी ने कहा था कि दरियागंज में एक कब्रिस्तान में रोजाना लगभग 10-12 शवों को दफाने के लिए लाया जा रहा है। जिसके कारण कब्रिस्तान की जगह जल्द भर जाएगी।

उन्होंने बताया था कि अप्रैल से अब तक यहाँ 300 शव दफन किए जा चुके हैं। अब केवल 100-150 के लिए जगह बाकी है। लेकिन जिस तरह से शवों का आना चालू है, उस हिसाब से लगता है कि जून के अंत तक ये कब्रिस्तान भर जाएगा।

जानकारी के लिए बता दें, दिल्ली के मंगोलपुरी, द्वारका, खादर और गाजीपुर में प्रोटोकॉल के अनुसार कोरोनॉवायरस पॉजिटिव लोगों के शवों को दफनाया जा रहा है। हालाँकि, दिल्ली गेट में शवों की संख्या बहुत अधिक है। जहाँ अब तक 299 शव दफन किए जा चुके हैं।

कश्मीर: महिला सरपंच को अगवा कर बनाया वीडियो, विजय रैना बोले- अजय पंडिता के बाद अगला निशाना मैं

जम्मू-कश्मीर के सोपोर में एक महिला सरपंच का अपहरण कर लिया गया। जाहिदा नामक इस सरपंच का आतंकियों ने एक वीडियो बनाया है। वीडियो में उससे कहवाया गया है कि वो अपने पद से इस्तीफा दे देंगी।

हालाँकि, वीडियो रिकॉर्ड करने के बाद महिला सरपंच को छोड़ देने की सूचना सामने आ रही है। हाल ही में सरपंच अजय पंडिता की हत्या कर दी गई थी।

अनंतनाग में अजय पंडिता की हत्या की जिम्मेदारी द रेजिस्टेंस फ्रंट (TRF) ने ली थी, जो लश्कर-ए-तैयबा से जुड़ा हुआ आतंकी संगठन है। इसके बाद पूरे देश में रोष प्रदर्शन हुआ था।

रविवार (जून 14, 2020) को कपिल मिश्रा के आह्वान पर दुनिया भर के 100 से भी अधिक शहरों के हिन्दुओं ने जम्मू-कश्मीर में सपरंच अजय पंडिता की आतंकियों द्वारा हत्या के खिलाफ ऑनलाइन विरोध-प्रदर्शन किया।

दक्षिणी कश्मीर के एक गाँव के सरपंच और भारतीय जनता पार्टी के स्थानीय नेता कश्मीरी पंडित विजय रैना को भी जान से मार डालने की धमकी मिली है। उन्होंने आशंका जताई है कि वे आतंकियों का अगला निशाना हो सकते हैं।

वे कुलगाम जिला भाजपा के प्रवक्ता भी हैं। उन्होंने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से सुरक्षा की गुहार लगाई है और जम्मू-कश्मीर के सभी अल्पसंख्यक सरपंचों की सुरक्षा की व्यवस्था करने की माँग की है।

जहाँ तक सरपंच जाहिदा के अपहरण की ख़बर है, ये घटना शुक्रवार (जून 12, 2020) की है। सरपंच का वीडियो बनाकर इंटरनेट पर वायरल कर दिया गया। ‘जम्मू कश्मीर नाउ’ के अनुसार, जम्मू-कश्मीर पुलिस के एक शीर्ष अधिकारी ने पत्रकारों से बातचीत में कहा कि लश्कर-ए-तैयबा और हिज्बुल मुजाहिदीन के आतंकी जमीनी स्तर के कार्यकर्ताओं में दहशत पैदा करने के लिए ऐसी घटनाओं को अंजाम दे रहे हैं। उन्होंने आम नागरिकों से अपील की है कि वे इस वीडियो को वायरल ना करें, क्योंकि इससे आतंकियों को दहशत फैलाने में मदद मिलेगी। 

अजय पंडिता की हत्या के बाद कश्मीरी पंडितों ने कहा था कि कश्मीर में 700 साल से ज्यादा से कश्मीरी पंडितों का नरसंहार होता आ रहा है और हमारा जनेऊ हमेशा में रक्त में लिपटा रहा है। ये सिर्फ कश्मीरी पंडितों का ही नहीं सभी हिंदुओं का हाल है। बकौल कश्मीरी पंडित, अजय का अपराध बस इतना था कि उनका नाम अजय पंडिता था, वे जेनेऊधारी थे, इसीलिए उन्हें मौत की नींद सुला दिया गया।

जिस मंदिर पर इस्लामी कट्टरपंथियों ने चलवाया था बुलडोजर, अब हिंदूवादी संगठन करवा रहे उसका फिर से निर्माण

तमिलनाडु में इस्लामिक कट्टरपंथियों की शिकायत पर बीते दिनों तेनकासी नगर में एक मंदिर पर प्रशासन ने बुलडोजर चलावाया था। अब ताजा अपडेट के अनुसार तमिलनाडु के एक हिंदूवादी संगठन- ‘इंदू मक्काल काटची’ के प्रयासों से स्थानीय निकाय ने सरकारी रुपए से मंदिर को दोबारा बनाने का निर्णय लिया है।

इस खबर की जानकारी इंदू मक्काल काटची ने अपने आधिकारिक अकाउंट से दी। उन्होंने लिखा, “हमारे हस्तक्षेप से, स्थानीय निकाय ने निर्णय लिया है कि वह सरकारी खर्च पर मंदिर को दोबारा बनवाएँगे। आपका सबका आवाज उठाने के लिए धन्यवाद।”

गौरतलब है कि कुछ दिनों पहले तमिलनाडु में इस्लामिक कट्टरपंथियों की शिकायत पर तेनस्कासी नगर (Tenkasi town) के सम्मेनकुलम गाँव (Sammenkulam village) स्थित कट्टुप्पासथी मदसामी (Kattuppasathy Madasamy) मंदिर तोड़े जाने की खबर आई थी।

स्थानीयों ने बताया था कि पॉपुलर फ्रंट ऑफ़ इंडिया (PFI), सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ़ इंडिया (SDPI) और अन्य मुस्लिम कट्टरपंथी संगठनों ने मंदिर के नवीनीकरण के काम पर आपत्ति जताते हुए दावा किया था कि इससे मुस्लिम महिलाओं की निजता का हनन होगा। 

इसके बाद इन समूहों की शिकायत पर जिला प्रशासन ने संज्ञान लिया और बिना हिंदुओं के प्रदर्शन पर गौर करते हुए मंदिर पर बुलडोजर चलवा दिया था।

मामला तूल पड़ने के बाद हिंदू महासभा के नेता बालसुब्रमण्यम ने पहले से भी विशाल मंदिर बनाने का आश्वासन ग्रामीणों को दिया था और कई अन्य हिंदू संस्थान भी उनकी मदद में आगे आए थे।

इस मंदिर को तोड़े जाने से आहत नादर समुदाय के लोगों ने प्रशासन पर आरोप लगाया था कि जिला प्रशासन व पुलिस प्रशासन ने यह हरकत मुस्लिम समुदाय को खुश करने के लिए की है। इस घटना के बाद यह भी आरोप लगे कि तमिलनाडु के सीएम ने मुस्लिम वोट बैंक के लिए यह सब किया, क्योंकि चुनाव आने वाले हैं।

‘जय खालिस्तान, जय पाकिस्तान’ वाले आ रहे भड़काऊ कॉल्स: अकाल तख़्त ने दिलाई कॉन्ग्रेस के नरसंहार की याद

अकाल तख़्त के कार्यकारी जत्थेदार ज्ञानी हरप्रीत सिंह ने कहा है कि दुनिया भर में सिख युवकों को राजनैतिक, आर्थिक और धार्मिक रूप से एकदम चौकस रहने की ज़रूरत है। एक प्रेस स्टेटमेंट में उन्होंने याद दिलाया कि आज़ादी के बाद कुछ वरिष्ठ सिख नेताओं ने केंद्र सरकार द्वारा सिखों के साथ किए गए धोखे के कारण ‘हालेमी राज’ के सिद्धांत पर जोर दिया था। उन्होंने कहा कि ये सिखों के संघर्ष और उनके साथ हुई हिंसा से ज्यादा सरकारी अत्याचार का प्रदर्शन था।

उन्होंने कहा कि पंजाब ने काफ़ी दिनों तक दर्द सहे हैं, जहाँ आतंकवाद के नाम पर सिखों का नरसंहार किया गया। उन्होंने पूछा कि आख़िर कौन बूढ़ा पिता चाहेगा कि उसका बेटा पुलिस एनकाउंटर में मारा जाए? उन्होंने याद दिलाया कि किस तरह कई सिखों को मार कर उनके मृत शरीर की पहचान न होने की बात कही गई और दफ़न कर दिया गया। ज्ञानी ने कहा कि सिखों के लिए ‘हालेमी राज’ उनका जन्मसिद्ध अधिकार है।

उन्होंने कहा कि इस सम्बन्ध में सिख नेताओं ने समय-समय पर बयान दिया है और ‘गुरबाणी’ से चीजें उद्धृत की हैं। उन्होंने कहा कि कई सिख नेताओं ने उनके बयान को लेकर गैर-ज़रूरी बयान दिया है लेकिन उन नेताओं ने कभी न कभी अलग सिख प्रदेश का समर्थन किया है। ऑपरेशन ब्लू स्टार की बरसी पर उन्होंने कहा था कि सिख खालिस्तान की माँग करते हैं तो इसमें कुछ भी गलत नहींं है। अगर केंद्र सरकार सिखों को खालिस्तान देती है, तो सिख इनकार नहीं करेंगे। इस पर बयान पर पंजाब में जम कर हंगामा हुआ था।

वहीं अब उन्होंने कहा कि कॉन्ग्रेस सरकार द्वारा सिख गुरुद्वारों पर हमला करना और उनके द्वारा सिखों का नरसंहार करना ही ‘हलीम राज’ की माँग का मुख्य काऱण बना। उन्होंने कहा कि कई नॉन-सिख नेताओं ने भी इस नीति का विरोध किया है लेकिन सिखों के घाव को भरने के लिए अभी तक केंद्र सरकार ने कोई प्रयास नहीं किया है। उन्होंने गुरमत को उद्धृत करते हुए अपनी माँग को सही ठहराया और इसे संविधान के अनुरूप भी बताया। उन्होंने कहा:

“मैं सिखों से गंभीरता से अपील करता हूँ कि वो एक ऐसा राजनीतिक संगठन बनाएँ जो पंजाब को सरकारी अत्याचार, साजिश और बल प्रयोग से बचाए। सिखों को उनसे सावधान रहना चाहिए, जो उन्हें भड़का कर हिंसा करवाना चाहते हैं और ख़ुद किसी राजनीतिक पद भोगने की लालसा लिए बैठे हैं। ये साबित हो चुका है कि तब की सरकार ने सिखों के ख़िलाफ़ घृणा का माहौल बनाने के लिए नरसंहार करवाया था। सोशल मीडिया से सिखों को हिंसा और आतंकवाद की तरफ भड़काने की कोशिश हो रही है।”

उधर पाकिस्तान भी सिखों को भड़काने के लिए चालें चल रहा है। खालिस्तान के लिए चलाई जा रही मुहिम रेफरेंडम-2020 को लेकर पाकिस्तान इंटरनेट कॉल के जरिए सिखों को भड़का रहा है और साथ ही ऑनलाइन हस्ताक्षर अभियान भी चला रहा है, जो भारत को बाँटने की एक साजिश है। पंजाब में फिर से माहौल ख़राब करने का प्रयास किया जा रहा है, जिससे सुरक्षा और ख़ुफ़िया एजेंसियों के कान खड़े हो गए हैं।

फोन पर पाकिस्तानी कॉलर की तरफ से लोगों को भड़काते हुए उन्हें एक रेकॉर्डेड आवाज़ सुनाई जाती है। इसमें पंजाबी में कहा जाता है, “खालिस्तान जिंदाबाद। सिखी नूँ मनन वालयो खालिस्तान बनान लई जुलाई 4 तारीख तो शुरू होन वाली रेफरेंडम-2020 मुहिम च हिस्सा लवो ताकि खालिस्तान बनाया जा सके। जय खालिस्तान-जय पाकिस्तान।” इसमें एक साथ कई नंबरों पर कॉल की जाती है। हालाँकि, पंजाब पुलिस ने कहा है कि वो माहौल ख़राब नहीं होने देंगे।

इससे पहले ‘जिन्ने मेरा दिल लुटिया गाने’ से नेम और फेम कमाने वाले भारतीय-कनाडाई पंजाबी गायक जसविंदर सिंह (Jazzy B) ने अपने नए गाने में खालिस्तान का समर्थन किया था। अपने नए गाने “Putt Sardara De”  के जरिए उसने ऑपरेशन ब्लू स्टार में मारे गए जरनैल सिंह भिंडरावाले का महिमामंडन भी किया था। इस गाने में उसने सिखों के लिए अलग देश खालिस्तान की माँग का भी समर्थन किया है। गाने को लिखने वाले का नमा अमित बोवा है।

‘मुझे कोरोना हुआ तो पूरे परिवार को हो जाएगा’ – डर और घबराहट में IRS ऑफिसर ने एसिड पी कर की आत्महत्या

दिल्ली के द्वारका इलाके में एक IRS अधिकारी की आत्महत्या का चौंकाने वाला मामला सामने आया है। बताया जा रहा है कि 56 वर्षीय अधिकारी के भीतर कोरोना का डर बैठ गया था। उन्हें आशंका थी कि अगर उन्हें कोरोना हुआ तो पूरे परिवार को हो जाएगा। इसी सोच में उन्होंने कार का एसिड पी लिया।

IRS अधिकारी की पहचान शिवराज सिंह के रूप में हुई। वह DOMS आरके पुरम में एडिशनल CIT के पद पर तैनात थे। वो द्वारका के समती कुंज अपार्टमेंट में रहते थे और 2006 बैच के थे।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, पुलिस ने बताया कि रविवार को दोपहर में द्वारका के एक अस्पताल से उन्हें जानकारी मिली कि एक शख्स ने सुसाइड कर लिया है और अस्पताल में उसका शव रखा हुआ है।

पुलिस अस्पताल पहुँची तो पता चला कि मृतक 56 साल के शिवराज थे, जो आयकर विभाग में एडीशनल कमिश्नर थे और फिलहाल उनकी पोस्टिंग आरके पुरम इलाके में आयकर विभाग के दफ्तर में थी।

जाँच में पता चला कि वे द्वारका सेक्टर 6 इलाके में अपनी कार के अंदर बेहोशी की हालत में पाए गए, फिर उन्हें अस्पताल लाया गया, जहाँ उन्हें मृत घोषित कर दिया गया। कार से एक सुसाइड नोट बरामद हुआ।

इस नोट में कोरोना के शक के बारे में बात कही गई। सुसाइड नोट में यह भी लिखा गया है कि उन्हें लगता है उनकी वजह से उनके परिवार को कोरोना का संक्रमण हो गया है। इसके अलावा अपने पत्र में अधिकारी ने अपने बच्चों को परेशान न करने की बात लिखी।

यहाँ बता दें कि शिवराज ने एक हफ्ते पहले अपना कोरोना चेकअप कराया था, उन्हें चिंता थी कि उन्हें कोरोना न हो जाए। लेकिन उनका टेस्ट नेगेटिव आया था। अब पुलिस इस बात का पता लगा रही है कि क्या इसके बाद उन्होंने फिर कोई कोरोना टेस्ट करवाया था।

फिलहाल द्वारका दक्षिण थाना पुलिस ने उनके शव को लेकर पोस्टमॉर्टम के लिए सुरक्षित रखवा दिया है। रिपोर्ट आने के बाद ही पता चलेगा कि उनकी मौत की असली वजह क्या है।

पड़ताल में ये बात भी मालूम चली है कि शिवराज की कई दिनों से तबीयत खराब थी और वह शनिवार को अपनी गाड़ी लेकर बाहर निकले थे। पर, जब देर शाम वह घर नहीं लौटे तो उनकी तलाश शुरू हुई। बाद में उनकी गाड़ी घर से थोड़ी दूरी पर मिली। जिसमें वह पीछे की सीट पर पड़े थे।

‘दारू इतनी फैला दो कि सब पीएँ और पड़े रहें’ – दिग्विजय ने शेयर किया CM चौहान का एडिटेड वीडियो, FIR दर्ज

मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के खिलाफ भोपाल में शिकायत दर्ज कराई गई है। आरोप है कि उन्होंने मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का छेड़छाड़ किया हुआ वीडियो शेयर कर के उनके मुँह में जबरदस्ती वो शब्द डालने की कोशिश की, जो उन्होंने कहा ही नहीं है। बकौल दिग्विजय, शिवराज ने कहा था कि दारू इतनी फैला दो कि सब पीएँ और पड़े रहें। भाजपा का कहना है कि ये वीडियो एडिटेड है।

बता दें कि मध्य प्रदेश में उपचुनाव होने वाले हैं, इसीलिए राजनीतिक माहौल काफ़ी गर्म है। 24 सीटों के लिए होने वाले उपचुनाव में शिवराज सरकार का भविष्य भी जुड़ा हुआ है। ऐसे में इस तरह की राजनीति होना नई बात नहीं है। भाजपा नेताओं ने रविवार (जून 14, 2020) की रात भोपाल पुलिस क्राइम ब्रांच के समक्ष शिकायत दर्ज कराई। बताया गया कि ये वीडियो उसी दिन दोपहर 2:50 में डाला गया।

दिग्विजय सिंह के आधिकारिक ट्विटर हैंडल पर डाले गए वीडियो और मीम्स के अनुसार, शिवराज सिंह चौहान ने जनवरी 12, 2020 को अपने आधिकारिक ट्विटर हैंडल से वीडियो डाल कर दारू फैलाने की बात की थी। जबकि भाजपा का कहना है कि ये वीडियो 2 मिनट 19 सेकंड का है, जिसके साथ छेड़छाड़ कर के इसे 9 सेकंड का बना दिया गया और दिग्विजय सिंह ने इसे ट्विटर हैंडल पर डाल कर जनता को गुमराह किया।

एडिशनल एसपी क्राइम ब्रांच निश्चल झारिया ने जानकारी दी कि रविवार की रात को पूर्व मंत्री व विधायक विश्वास सारंग, पूर्व मंत्री उमाशंकर गुप्ता, विधायक कृष्णा गौर, रामेश्वर शर्मा सहित अन्य नेताओं ने लिखित शिकायत दर्ज कराई। वीडियो की कॉपी को भी सबूत के रूप में पेन ड्राइव में डाल कर पुलिस को सौंप दिया गया है। शिकायत में कहा गया है कि कॉन्ग्रेस नेता कमलनाथ की आबकारी नीति में गाँव-गाँव में शराब की दुकानें फैलाने की योजना बनाई जा रही थी।

इसी पर किसी पत्रकार ने जनवरी में शिवराज सिंह चौहान से सवाल पूछे थे। इसी पर प्रतिक्रिया देते हुए उन्होंने जो कहा, उसे काट-छाँट कर पेश करते हुए वीडियो को अपलोड कर दिया गया। शिवराज सिंह चौहान ने समाज हित की चर्चा करते हुए कॉन्ग्रेस सरकार की आबकारी नीति का कड़ा विरोध किया था। एएसपी झारिया ने कहा कि इस मामले में पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के खिलाफ मामला संज्ञान में लेकर जाँच की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। 

वहीं भोपाल DIG इरशाद वली ने बताया कि सीएम शिवराज सिंह चौहान के पुराने वीडियो को एडिट कर छवि खराब करने के उद्देश्य से सोशल मीडिया पर वायरल करने के मामले को गंभीरता से लिया गया है। उन्होंने कहा कि इस वीडियो को शेयर करने वालों के ख़िलाफ़ कड़ी कार्रवाई की जाएगी। दिग्विजय के साथ-साथ इस वीडियो को रीट्वीट करने वाले 11 लोगों के ख़िलाफ़ भी मामला दर्ज किया गया है। 

‘दिग्गी राजा’ पर झूठ फैलाने का आरोप, शिकायत दर्ज

राज्य के गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा ने कहा कि झूठ, फरेब व चरित्र हनन की राजनीति करना कॉन्ग्रेस की आदत है। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री चौहान का शराब माफियाओं के खिलाफ दिया गया बयान जिस तरह से तोड़ मरोड़ कर वायरल किया गया है, वह उसी की एक कड़ी है। मिश्रा ने बताया कि उन्होंने पुलिस अधिकारियों को कड़े निर्देश दिए हैं कि जल्दी ही दोषियों पर विधिसम्मत कठोर कार्रवाई की जाए। 

‘मेवात में धर्मांतरण करवाने वाले RSS के एजेंट होंगे, दीन नहीं देता जबरन धर्म परिवर्तन की इजाजत’

हरियाणा के मेवात में दलितों के साथ अत्याचार का मामला सामने आने के बाद अब इस विषय की चहुँओर चर्चा है। सोशल मीडिया से लेकर कई मीडिया चैनलों पर इस मुद्दे पर डिबेट जारी है। हर जगह साक्ष्यों के साथ सवाल उठाया जा रहा है कि आखिर हरियाणा जैसी पावन भूमि पर पाकिस्तान वाली स्थितियों को पैदा करने के लिए कौन जिम्मेदार है?

बावजूद इन सभी बातों के कुछ तथाकथित बुद्धिजीवियों की प्रतिक्रिया अब भी हैरान करने वाली है, जो यह मानने को ही तैयार नहीं है कि समुदाय विशेष इस मामले में कहीं भी जिम्मेदार है।

बीते दिनों मेवात मामले के मद्देनजर न्यूज स्टेट पर दीपक चौरसिया ने एक डिबेट करवाई- “मेवात: वो जगह जहाँ जाकर पाकिस्तान वाली फीलिंग आती है!” इस डिबेट में विभिन्न क्षेत्रों के लोग आए। सबने अपनी अपनी बात रखी। मगर, इसी दौरान इस्लामिक स्कॉलर इलियास शरीफुद्दीन और राजनीतिक विश्लेषक के तौर पर पैनलिस्ट बने पत्रकार माजिद हैदरी ने मेवात पर ऐसी बातें बोलीं, जिन्हें सुनने के बाद साफ हो गया कि उन्हीं जैसी मानसिकता वाले लोगों के कारण मेवात के कट्टरपंथियों को शह मिली है और उन्हीं जैसों की आड़ में कट्टरपंथ अपने चरम पर पहुँचा है।

सबसे पहले तो इस्लामिक स्कॉलर शरीफुद्दीन की बात पर गौर करिए। शरीफुद्दीन, मेवात में तेजी से हो रहे धर्मांतरण को कोई गुनाह नहीं मानते हैं। बल्कि उनका तो कहना है कि वहाँ दलित हिंदू बच्चियाँ इस्लाम की उन्नति, शांति, एकता देखकर इस धर्म को स्वीकार कर रही हैं।

वहीं, दूसरे बुद्धिजीवी व राजनीतिक विश्लेषक माजिद हैदरी कहते हैं कि जबरन धर्म परिवर्तन कराने की इजाजत उनका दीन नहीं देता। अगर कोई ऐसा कर रहा है तो इसका मतलब है कि वह समुदाय का नहीं बल्कि वह संघ का एजेंट होगा। 

माजिद हैदरी मेवात क्षेत्र में धर्मांतरण के मामले पर उठती आवाजों की मंशा पर भी सवाल करते हैं और प्रियंका चोपड़ा का उदाहरण देकर पूछते हैं कि जब वह किसी फिरंगी ईसाई से शादी करती हैं, तब किसी के पेट में दर्द नहीं होता। लेकिन मेवात पर सब सवाल उठा देते हैं।

गौरतलब हो कि यह दोनों इस्लामी बुद्धिजीवी इस प्रकार की टिप्पणी उस शो में करते हैं, जिसमें इस्लामिक बर्रबरता का शिकार हुई मीना की कहानी खुद उसका पति सुनाता है और बच्चे बताते हैं कि आखिर कैसे उनकी माँ का पहले अपहरण हुआ, गैंगरेप हुआ, फिर धर्मपरिवर्तन न करने पर किस तरह उनकी नसें काट-काटकर हत्या कर दी गई।

सोचने वाली बात है कि उलेमाओं के रूप में समुदाय विशेष कैसे लोगों को अपने प्रतिनिधि के तौर पर चुन रहा है। जिनके समक्ष आज सारी स्थिति शीशे की तरह साफ होने के बाद भी वह हकीकत को नहीं देखना चाहते और इस बात को मानने को तैयार नहीं है कि मेवात में दलितों पर अत्याचार हो रहा है या बहुल आबादी के कारण मेवात के कई गाँव हिंदूविहीन हो रहे हैं।

यदि वाकई शरीफुद्दीन जैसों का तर्क सही है कि इस्लाम की उन्नति देखकर वहाँ की दलित लड़कियाँ इस्लाम मजहब अपना रही हैं तो सवाल उठता कि आखिर मीना जैसी महिलाओं के साथ क्या हुआ? आखिर क्यों साल 2019 में मेवात की जमीन पर लव जिहाद का मुद्दा चर्चाओं में आया? 

क्यों आकिल खान और राशिद खान ने एक लड़की को जादू टोने के बलबूते उसका धर्मांतरण करवाया था? क्यों वहाँ दलितों में बहन-बेटियों के अपहरण के मामले बढ़ते देख आक्रोश उमड़ा था? क्यों उन सबने इस घटना से खफा होकर हाइवे पर प्रदर्शन किया था?

बात सिर्फ बेटियों के साथ होते अपराध तक सीमित नहीं है। यह मामला दलितों के अस्तित्व को लेकर है, जिस पर मजहबी नेता या तथाकथित दलित नेता हमेशा अपनी राजनीति खेलते हैं। पर बात जब इनके लिए आवाज उठाने की आती है, तो सब मौन हो जाते हैं।

माजिद हैदरी वो शख्स हैं, जिन्होंने साल 2018 में कश्मीर में होती पत्थरबाजी के लिए भी RSS को वजह बता दिया था। वह एक बार फिर साल 2020 में मेवात में फैले कट्टरपंथ के बचाव में कहते हैं कि मेवात में होती घटना के लिए संघ के लोग जिम्मेदार हैं। लेकिन संघ के लोगों को 500 में से 103 गाँवों को हिन्दुविहीन कर देने से मिलेगा क्या? वह क्यों चाहेंगे कि ऐसी स्थिति पैदा हो, जिससे 84 गाँवों में सिर्फ 4-5 हिन्दू परिवार रह जाएँ?

सोचिए क्या वाकई ये बात कोई जिम्मेदार आदमी कह सकता है। वो भी तब जब उसे विश्लेषक की उपाधि मिल गई हो और उसके सामने ऐसे कई उदहारण हों, जो साबित करे कि मेवात की बहुल आबादी ने अल्पसंख्यकों पर अनेकों प्रकार से दबाव बनाया, उनकी दुर्गति की।

साल 2017 का एक मामला है। जब हरियाणा के मेवात मॉडल स्कूल पर आरोप लगे था कि यहाँ पर हिंदू छात्रों को धर्म परिवर्तन और नमाज पढ़ने के लिए दबाव बनाया जाता है और ऐसा करने से इंकार करने पर उन्हें मारा-पीटा तक जाता है।

2018 का एक केस है, जब मेवात के नगीना खंड गाँव मोहालका से दलित परिवार पर जानलेवा हमला हुआ था। इस हमले का कारण ही ये निकल कर आया था गाँव में रहने वाले किशन के परिवार पर इस्लाम नाम का युवक लंबे समय से धर्म परिवर्तन का दबाव डाल रहा था। लेकिन जब किशन के परिवार ने इससे इंकार किया तो इस्लाम, तौफीक, मोसिम, अतरु, असमीना ने उसके परिवार पर लाठी डंडों व सरिया से जानलेवा हमला कर दिया और जातिसूचक शब्दों से संबोधित कर उन्हें अपमानित भी किया।

इसके बाद, साल 2018 में ही एक नाबालिग से साथ दुष्कर्म की चौंकाने वाली घटना सामने आई थी। मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो नूँह के भंडका में घटी इस घटना में पुलिस ने 14 वर्षीय लड़की के घर में घुसकर उसके साथ रेप करने के आरोप में असलम को गिरफ्तार किया था। जबकि बाकी दोनों उस समय तक पकड़ में नहीं आए थे। 

मेवात में हुई इन धर्मांतरण, रेप, मारपीत जैसी घटनाओं के चुनिंदा उदाहरणों को पढ़िए, समझिए और बताइए, कहाँ आपको धर्मांतरण में हिंदुओं की मर्जी दिखी? कहाँ मारपीट में आपसी भाईचारा लगा? और कहा संघ नेताओं के नाम आए?

क्या जिन जगहों पर आपसी प्रेम होता है, वहाँ एक समुदाय का नाम धीरे धीरे मलीन होता जाता है? क्या उस जगह अल्पसंख्यक रोते-बिलखते दिखते हैं? क्या वहाँ की महिलाएँ असुरक्षित होती हैं? क्या वहाँ दलित बच्चों पर फब्तियाँ कसी जाती हैं? क्या स्कूलों में धर्म परिवर्तन का दबाव बनाया जाता है? नहीं, ये सब अत्याचार आपसी प्रेम वाली जगहों पर नहीं होते, बल्कि उन जगहों पर देखने को मिलते हैं, जहाँ हिंदू अल्पसंख्यक हों, जैसे पाकिस्तान।

आज कई हिन्दू संगठनों का दावा है कि मेवात में हिंदुओं की हालत पाकिस्तान से बदतर है। कार्यकर्ताओं का कहना है कि उन्होंने कुछ मामले ही उठाए हैं, अभी बहुत प्रकाश में आना बाकी है। अनेकों खबरें हैं, जो इस बात की ओर इशारा करती हैं कि आखिर क्यों मेवात को दलितों का कब्रिस्तान बताया गया। कई रोते बिलखते चेहरे वीडियो में कैद हैं, जो दिखाते हैं कि मीडिया में उठा मेवात का यह मुद्दा निराधार नहीं है।

मगर फिर भी देश में इस्लामोफोबिया का रोना रोने वाले यदि समुदाय विशेष के पढ़े लिखे लोग, यह मान चुके हैं कि मेवात में हो रही घटनाएँ सामान्य हैं और गंगा जमुना तहजीब को बढ़ावा दे रही है। तो विचार करिए कि वहाँ की अल्पसंख्यक आबादी की पीड़ाओं का अब कोई अंत कैसे होगा? मेवात का भूगोल बदलकर कट्टरपंथियों ने न केवल हिंदुओं की जमीनों को, धार्मिक स्थलों को, पहचान को अपनी मुट्ठी में किया है, बल्कि राजनीति व प्रशासन को भी कथित तौर पर अपनी कठपुतली बना लिया है।