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संविधान और शरीयत में से शरीयत को चुन चुका है शाहीन बाग़

जब देशभर में नागरिकता संशोधन कानून और राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर का विरोध शुरू हुआ था, तब किसी ने यह शायद ही सोचा होगा कि कानून और सत्ता के विरोध के बहाने मजहबी घृणा और मजहबी प्रभुत्व की लड़ाई इतनी जल्दी अपने वास्तविक स्वरुप में आ जाएगी। शाहीन बाग़ में जो कुछ घट रहा है, या फिर घटित हो चुका है, वह भारत जैसे एक संवैधानिक देश में होते देखना निराश करने वाला है।

यदि इस पूरे CAA-NRC विरोध के घटनाक्रम पर नजर डालें तो हम देखते हैं कि नागरिकता संशोधन कानून की जगह यह पूरा विवाद ओवैसी द्वारा फैलाए गए डिटेंशन कैम्प और मीडिया गिरोहों की भ्रामक करतूतों से ही शुरू हुआ। मीडिया गिरोह में रवीश कुमार जैस बौद्धिक दैन्य पत्रकारों ने लोगों को डराने और उन्हें गुमराह करने में पूरी भूमिका निभाई।

रवीश कुमार और उनकी सेना ने तुरंत मोर्चा संभाला और उन्हें मानो अपने सदियों पुराने फासिज़्म के शगल पर चर्चा करने का बहाना ही मिल गया। फ़ौरन हायब्रिड कम्युनिस्ट फासिज़्म की ढपली उठाकर उसे बजाने लगे। प्राइम टाइम से लेकर उनकी सोशल मीडिया प्रोफाइल तक गैस चैंबर की ‘रूमानी’ शायरियों से भर दी गईं। बाकी बची हुई कसर पूरी करने के लिए उनके छोटे-बड़े स्क्रॉल, ऑल्ट न्यूज़ और दी क्विंट जैसे घातक दस्ते तो हैं ही।

इसके बाद शाहीन बाग़ मानो आज़ादी के इन फ़र्ज़ी चितेरों का मक्का बन गया। बुर्के और हिजाब में लोग अल्लाह हू अकबर और इस्लामिक नारे लगाते हुए इकट्ठे हुए। इस सबके बीच राजनीतिक विरोधी दल अपने वर्षों पुराने लक्ष्य में आधे कामयाब होते नजर आए। वर्ष 2014 के चुनाव के बाद से ही हमने देखा कि कॉन्ग्रेस जैसे विपक्षी दल जनता से खुद को सत्ता न सौंपने की भड़ास निकालते रहे। देश में जाति, धर्म आदि के नाम पर समय-समय पर दंगे करवाए गए। यह कहने में कोई अतिश्योक्ति नहीं है कि कॉन्ग्रेस इन दंगों को सरकार में न होने के बदले दंड के रूप में जनता को सौंपती है।

2014 से ही विपक्ष निरंतर यह चाहता रहा कि वह एक अनियंत्रित भीड़ को सत्ता के विरोध में सड़क पर लेकर आए। पहले किसानों के जरिए यह जोर आजमाया गया, फिर पुरस्कार वापसी गैंग को मैदान में उतरा गया। यही तरीका कश्मीर में अनुच्छेद 370 के निष्क्रीय किए जाने पर भी अपनाया गया। और भी ऐसे ही न जाने कितने तरीकों से सरकार विरोधी माहौल विपक्ष द्वारा तैयार किया गया। इस पूरे प्रकरण में सबसे दिलचस्प बात यह रही कि विरोधी हमेशा इस सरकार को संविधान को तोड़ने वाले और संविधान के प्रहरियों की लड़ाई के रूप में स्थापित करने का प्रयास करते हुए देखा गया।

लेकिन वास्तविकता आज बुरका पहनकर शाहीन बाग़ में अल्लाह हू अकबर के नारे लगाते हुए पत्रकारों की सामूहिक लिंचिंग कर रही है। शाहीन बाग़ कानून निर्माताओं द्वारा देश के सबसे पवित्र धर्मस्थल, संसद में बनाए गए कानून को प्राथमिकता देने के बजाए इस्लामिक नारे लगाते हुए जिहादियों की भाषा बोल रहा है। प्रोग्रेसिव लिबरल्स आज शाहीन बाग़ में अपनी विषैली मानसिकता के जहर को हवाओं में फेंकने के लिए आठ-दस साल के बच्चों तक को अपना हथियार बनाने से भी पीछे नहीं हट रहा है। सेकुलर शाहीन बाग़ आज ला इलाहा इल्लल्लाह और अल्हम्दुलिल्लाह का स्वर बोल रहा है, और क्योंकि यह स्वर क्रांतिजीवों, JNU-मतावलम्बियों के श्रीमुख से निकला है, इसलिए प्रोग्रेसिव लिबरल भी उनकी हाँ में हाँ मिलाता नजर आ रहा है।

शाहीन बाग़ की भीड़ कल तक इस देश को एक सीमाओं से बंधा देश मानने से इंकार करती थी, लेकिन आज वह यह साबित करते देखे जा रहे हैं कि इस देश की मिट्टी में उनका भी खून है। शाहीन बाग़ का शरजील भी आज द्वि-राष्ट्र सिद्धांत को समय से बहुत पहले कह देने वाले मुस्लिम धर्म सुधारक सर सैयद अहमद खान की भाषा बोल रहा है। वो शाहीन बाग़ की भीड़ से कह रहा है कि वो असम को भारत से काट देना चाहता है। इस सबके बीच सवाल बस यह है कि इस सबके बीच संविधान के रक्षक कौन नजर आ रहे हैं?

क्या इस भीड़ का नायक यह नव-द्विराष्ट्र सिद्धांत का प्रणेता शरजील है या, इसकी नेता नव-कम्युनिस्ट शेहला रशीद है, जो अल्हम्दुलिल्लाह कहकर जम्मू कश्मीर में राजनीति में कूदने के दाँव खेलकर सारे वामपंथी समाज को चकमा दे चुकी है? या फिर लालू प्रासाद यादव के पैर छूकर फासीवाद से लड़ने वाला मौकापरस्त कन्हैया कुमार इस भीड़ का नायक है? इसी भीड़ के लिए हरिशंकर परसाई कह गए थे कि तुम क्रांतिकारी नहीं, बल्कि तुम एक बुर्जुआ बौड़म हो।

आर्यों को विदेशी सिद्ध करने में ही अपनी सारी बौद्धिक शक्ति झोंक देने वाली इस शाहीन बाग़ की भीड़ को आज अगर संविधान निर्माता आकर यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) और शरीयत का विकल्प दें, तो हम सब जानते हैं कि यह भीड़ क्या चुनने वाली है। हमारे देश में ही हमारे ही संविधान के विपरीत कुछ उतावले लोग खड़े होकर हिंदुत्व विरोधी नारे लगाते हुए अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता की भी दुहाई देते हैं। याद रखें कि यह भीड़ उन्हीं लोगों का झुण्ड है, जो यह मानता है कि राष्ट्रीय एकता और अखंडता की निष्ठा अपरिहार्य होना ‘हायपर नेशनलिज़्म’ है।

हम सब जानते हैं कि अगर सिर्फ सत्ता के विरोध के लिए ‘फ़क़ हिंदुत्व’ कहने वाली इस्लामिक विचारधारा के सामने ही अगर दूसरी भीड़ को खड़ा कर के ‘फ़क़ *स्लाम’ बुलवा दिया जाए, तो शार्ली हेब्दो जैसी घटना होते देर नहीं लगेगी। कौन ‘प्रोग्रेसिव क्रांतिबीज’ कब और कहाँ से फूट पड़ेगा, यह तय करना मुश्किल हो जाएगा। खुसर-पुसर तो इस बात को भी लेकर खूब हो रही है कि ‘प्रोग्रेसिव लिबरल्स’ की जुबान पर इस्लामिक नारों का इस तरह से खुलकर आना राम मंदिर के फैसले और कश्मीर में अनुच्छेद 370 को निष्क्रीय करने के बाद से उमड़ कर आ रहा है। लेकिन अफवाहों पर ध्यान नहीं दिया जाना चाहिए।

यह इस देश की सहिष्णुता ही है, जिसने हमेशा से शरणार्थियों से लेकर आतताइयों तक को भी सर आँखों पर बिठाए रखा और जो हम आज शाहीन बाग़ में देख रहे हैं वह इस सहिष्णुता का ही नतीजा है। CAA या NRC जरुरी है या नहीं लेकिन इस पूरे प्रकरण में कम से कम यह तो साबित हो ही चुका है कि इस देश का विचारक वर्ग देश के संविधान और इस्लामिक शरीयत कानून में से शरीयत को चुन चुका है। देखना अब यह बाकी है कि कानून के विरोध के नाम पर चल रहा यह देश विरोधी इस्लामिक एजेंडा अभी और कितनी करवटें लेता है।

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पुलिस के पास 7 दिन: 2 फरवरी को शाहीन बाग का बोरिया-बिस्तर बाँधने सड़क पर उतरेंगे लोग

नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) के विरोध में दिल्ली के शाहीन बाग में एक महीने से ज्यादा समय से चल रहा प्रदर्शन धीरे-धीरे हिंसक होने लगा है। यहॉं शुक्रवार को कुछ पत्रकारों के साथ मारपीट की गई थी। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार सड़क पार करने की कोशिश कर रहे कुछ लोगों को रोकने के भी मामले सामने आए हैं। हिंदुत्व विरोधी वीडियो और पोस्टर यहॉं से पहले ही सामने आ चुके हैं। अब स्थानीय लोगों का सब्र भी इस विरोध-प्रदर्शन को लेकर टूटता दिख रहा है।

असल में इस प्रदर्शन के कारण कालिंदी कुंज रोड बंद पड़ा है। इसके कारण नोएडा के स्कूल-कॉलेज में जाने वाले बच्चों और कामकाजी लोगों को काफी परेशानी हो रही है। इससे आजिज होकर लोगों ने सड़क पर उतरने का फैसला किया है। सरिता विहार के लोगों ने 2 फरवरी को इसके विरोध में प्रदर्शन करने की योजना बनाई है। यहॉं से शाहीन बाग तक मार्च निकाला जाएगा। इनका कहना है कि आम लोगों की सहूलियत देख बंद सड़क को खोल दिया जाए।

बताया जाता है कि इस संबंध में सरिता विहार के कुछ लोगों ने एसीपी अजब सिंह से मुलाकात भी की है। इनलोगों ने पुलिस को इस मसले का समाधान निकालने के लिए एक हफ्ते का वक्त दिया है। प्रदर्शन की तैयारी में जुटे एक व्यक्ति गब्बर सिंह चौहान के ह​वाले से एनबीटी ने कहा है कि उनका मार्च राजनीतिक पार्टियों की रैली जैसा नहीं होगा। उनका कहना है कि जैसे शाहीन बाग के लोगों को प्रदर्शन का हक है, वैसे ही सरिता विहार और जसोला के लोगों को भी इसका विरोध करने अधिकार है।

शाहीन बाग में 15 दिसंबर से सीएए के ख़िलाफ धरना चल रहा है। इससे पहले खबर आई ​थी कि शाहीन बाग में चल रहे प्रदर्शन के विरोध में स्थानीय लोगों के मार्च की जिम्मेदारी महिलाओं के जिम्मे होगी।

स्थानीय लोगों का कहना है कि नोएडा स्थित अपने स्कूल और कॉलेजों में उत्तरी-बाहरी दिल्ली के स्टूडेंट्स समय पर नहीं पहुँच पा रहे हैं। इसके अलावा नौकरीपेशा लोग भी बुरी तरह से प्रभावित हैं। रोड बंदी के कारण समय की बर्बादी हो रही है। रोड खुलवाने को लेकर पिछले दिनों दिल्ली हाईकोर्ट में एक याचिका दायर की गई थी। लेकिन इस याचिका पर हाईकोर्ट ने विचार करने से इनकार कर दिया था।

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‘इस्लाम नहीं कहता बुर्के में पढ़ने जाओ’: पटना के जेडी वीमेंस कॉलेज ने नोटिस बदला

बिहार की राजधानी पटना के जेडी वीमेंस कॉलेज ने विवाद के बाद अपना नोटिस बदल दिया है। यह नोटिस ड्रेस कोड को लेकर था। पहले जो नोटिस निकाला गया था उसमें निर्धारित पोशाक में ही कॉलेज आने को कहा गया था। साथ ही बताया गया था कि परिसर और क्लासरूम बुर्के का प्रयोग करना वर्जित है। इसका पालन नहीं करने पर 250 रुपए फाइन लगाने का प्रावधान किया गया था।

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार इस नोटिस से विवाद खड़ा हो गया। कुछ छात्राओं ने भी इस पर आपत्ति जताई थी। इसे देखते हुए कॉलेज ने नया नोटिस जारी किया है। इसमें बुर्के शब्द का कहीं उपयोग नहीं किया गया है। इसमें कहा गया है कि निर्धारित पोशाक में कॉलेज नहीं आने पर 250 रुपए फाइन देना पड़ेगा।

दबाव के बाद नोटिस में बदलाव

कॉलेज की प्राचार्य डॉ. श्यामा राय ने एएनआई को बताया कि बुर्का से संबंधित नोटिस वापस ले लिया गया है। नए निर्देशों में छात्राओं से ड्रेस कोड फॉलो करने को कहा गया है।

इससे से पहले डॉ. राय ने कहा था, “हमने ये नियम छात्राओं में एकरूपता लाने के लिए किया है। शनिवार के दिन वो अन्य ड्रेस पहन सकती हैं, शुक्रवार तक उन्हें ड्रेस कोड में आना होगा।” उन्होंने कहा कि इस बारे में पहले ही घोषणा की गई थी। छात्राओं ने कॉलेज प्रशासन के इस फैसले पर आपत्ति जताई थी। उनका कहना था कि बुर्के से कॉलेज को क्‍या द‍िक्‍कत है। साथ ही कॉलेज के इस निर्देश का मुस्लिम धर्मगुरुओं ने भी विरोध किया था।

हालाँकि वर्ल्ड इंस्टीट्यूट ऑफ इस्लामिक स्टडीज़ फॉर डायलॉग की डीजी डॉक्टर जीनत शौकत अली के हवाले से दैनिक भास्कर ने बताया है बुर्का की जिक्र कहीं पर भी कुरान में नहीं आया है। उन्होंने कहा कि इस्लाम में कहीं नहीं कहा गया है कि बुर्का पहनकर ही पढ़ने जाएं। महिलाओं को सम्मानजनक तरीकों से कपड़े पहनने को कहा गया है। छोटी-छोटी बातों को तूल देने की जगह पढ़ाई पर जोर देना चाहिए।

इस मामले में पटना हाईकोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता प्रभाकर टेकरीवाल ने कहा था कि कॉलेज में ड्रेस कोड तय है, तो पालन करना चाहिए। कोर्ट के लिए तय ड्रेस कोड का पालन वकील करते हैं। कोर्ट में कोई बुर्का पहन कर नहीं आता। लिहाजा, कॉलेज के मामले में भी आपत्ति का औचित्य नहीं है। कानूनन भी इसे अवैध नहीं ठहराया जा सकता। वहीं कार्यवाहक नाजिम, इमारत-ए-शरिया, मौलाना शिबली अलकासमी ने इसे समाज को तोड़ने वाला कदम बताया था।

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सबसे बड़ा फासिस्ट था गाँधी, संविधान और कोर्ट मुस्लिमों का दुश्मन: शाहीन बाग़ का शरजील

शाहीन बाग़ विरोध प्रदर्शन के मुख्य साज़िशकर्ता शरजील इमाम ने प्रदर्शनकारियों को सम्बोधित करते हुए कहा कि मुस्लिमों को सीएए और एनआरसी के ख़िलाफ़ जनता को अपने हिसाब से सब कुछ बताना चाहिए। उसने कहा कि जनता अभी चौथे गियर में है और वो सब कुछ सुन रही है। उसने कहा कि आज वो इंदिरा गाँधी और कॉन्ग्रेस के विरोध में बोलता है तो लोग उसे सुनते हैं, जो आज से कुछ दिन पहले संभव नहीं था। उसने कहा कि बात सीएए की नहीं है बल्कि लम्बे समय से हो रहे धोखे की कहानी है, 70 साल की। उसने कहा कि इंटरनेट आ गया है, इसीलिए, ‘जुल्म’ बढ़ेगा तो रिएक्शन भी ज़्यादा होगा।

उसने पुलिस और सेना पर कश्मीर से लेकर जामिया तक के साथ बर्बरता करने का आरोप लगाया। उसने कहा कि सीएए के बहाने जम्मू सहित अन्य जगहों पर सशस्त्र बलों की ‘बर्बरता’ की बात की जाए। उसने मुस्लिमों को वीडियो बना कर और पर्चे लिख कर लोगों को भड़काने की अपील की। उसने जामिया और अलीगढ़ के हज़ारों लड़कों को ये ‘जिम्मेदारी’ निभाने को कहा। उसका पूरा ज़ोर जनता को भड़काने पर था। उसने स्पष्ट कहा कि जो राष्ट्रवाद की बात करता है, वो मुस्लिमों का दुश्मन है।

शाहीन बाग़ के मुख्य साज़िशकर्ता ने कहा कि राष्ट्रवाद की बात करने वाले मुस्लिमों को ‘बूत की पूजा’ करने को मजबूर करते हैं। उसने आरोप लगाया कि न्यायपालिका आज़ादी से पहले कम पक्षपाती थी, जो दिखाता है कि मुस्लिमों को आज़ादी नहीं मिली बल्कि एक दुश्मन क़ौम उन पर हावी हो गई। उसने कहा कि अँग्रेज मुस्लिमों के कम दुश्मन थे, लेकिन न्यायपालिका 1950 के बाद से मुस्लिमों की दुश्मन है। उसने कहा कि 1900 से लेकर 1950 तक अँग्रेजों ने मुस्लिमों के साथ कम पक्षपात किया। उसने कहा कि 1950 के बाद मुस्लिमों को एक तरह की ग़ुलामी में डाल दिया गया।

महात्मा गाँधी से नफरत करता है शरजील इमाम

शरजील इमाम ने कहा कि संविधान के लागू होने के बाद से मुस्लिमों की परेशानी बढ़ गई है। उसने कहा कि ‘आज़ादी’ की बात मुस्लिमों को नहीं करनी चाहिए। उसने आगे की योजना की बात करते हुए कहा कि मुस्लिमों का एक ऐसा बुद्धिजीवी सेल होना चाहिए, जो गाँधी और राष्ट्र की बातें न करे। उसने आरोप लगाया कि महात्मा गाँधी ने ‘राम राज्य’ की बात कर के कॉन्ग्रेस को ‘हिन्दू पार्टी’ बना दिया। वो यहीं नहीं रूका। महात्मा गाँधी को 20वीं सदी का सबसे बड़ा फासिस्ट नेता तक कह डाला। उसने कहा कि जिन्ना और गोखले नरम राष्ट्रवादी थे।

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गुजरात के आणंद में नमाज के बाद पथराव और आगजनी, गोली लगने से विनोद की मौत

गुजरात के आणंद में दो समुदायों के बीच हिंसक झड़प में एक युवक की मौत हो गई। घटना शुक्रवार 24 जनवरी 2020 की है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार आणंद ज़िले के अकबरपुर गाँव की मस्जिद में शुक्रवार की दोपहर लोग नमाज पढ़ने के लिए जुटे थे। नमाज के बाद मामूली बात को लेकर दो गुटों के बीच पत्थरबाजी हो गई। हालात पर काबू पाने के लिए पुलिस को फायरिंग करनी पड़ी।

आज तक की रिपोर्ट के अनुसार हिंसा में विनोद एफ चावड़ा नाम के शख्स की मौत हो गई। हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि उसे भीड़ में से किसी ने निशाना बनाया या गलती से पुलिस की गोली लगने से उसकी मौत हुई। यह गॉंव खंभात पुलिस स्टेशन के तहत आता है। डिप्टी एसपी रीमा मुंशी के हवाले से एएनआई ने बताया है, “दो गुटों के बीच पत्थरबाजी हो गई। उन्हें खदेड़ने के लिए पुलिस ने लाठीचार्ज और रबड़ बुलेट का इस्तेमाल किया। हालात काबू में हैं।”

मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक हिंसा की सूचना मिलते ही पुलिस घटनास्थल पर पहुॅंची। उपद्रवियों को हटाने के लिए उसे लाठीचार्ज करना पड़ा। पुलिस ने भीड़ पर आँसू गैस के गोले भी दागे। साथ ही हवाई फायरिंग भी की। अमर उजाला ने पुलिस अधीक्षक मकरंद चौहान के हवाले से गोली चलाए जाने की पुष्टि की है। उसने मृतक का नाम विनू चावड़ा बताया है। रिपोर्ट में अकबरपुर को सांप्रदायिक रूप से संवेदनशील बताया गया है। साथ ही कहा गया है कि कुछ लोग घरों की छतों से पथराव कर रहे थे। एक अनाम पुलिस अधिकारी के हवाले से बताया गया है कि दोनों ही समुदायों के पॉंच लोगों के मकान जला दिए गए।

मृतक का शव पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया है। स्थानीय लोगों का कहना है कि हिंसा में मृत शख्स शामिल नहीं था। हिंसा के बाद इलाके में पुलिस बल तैनात कर दिया गया है। नागरिकता संशोधन कानून सीएए के विरोध के नाम पर जिस तरह देश में समुदाय विशेष के लोगों की ओर से हिंसा की जा रही है उसके कारण इस घटना को भी इससे जोड़कर देखा जा रहा था। बताया जा रहा है कि शुक्रवार को मस्जिद में नमाज पढ़ने के लिए काफी संख्या में लोग जुटते हैं। लेकिन, इस बार जुमे पर जुटान अन्य शुक्रवार की अपेक्षा काफी ज्यादा था। आशंका जताई जा रही है कि किसी खास मकसद से यह जुटान हुआ हो। एबीपी न्यूज के अनुसार हिंसा पतंगबाजी को लेकर हुई।

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CAA समर्थक जुलूस पर पथराव: धू-धू कर जला लोहरदगा, पथराव-आगजनी के बाद कर्फ्यू

जामिया के दंगों की तैयारी बहुत पहले हो चुकी थी, हर शुक्रवार को लगता है डर: जामिया के छात्र ने खोले कई राज़

नसीरुद्दीन शाह की बेटी बिल्लियों की नसबंदी कराने गईं, लेकिन अस्पताल में करने लगीं मारपीट, FIR दर्ज

वरिष्ठ फिल्म अभिनेता नसीरुद्दीन शाह की बेटी हीबा शाह पर एक क्लीनिक में मारपीट का आरोप लगा है। इसका वीडियो भी सामने आया है, जिसमें हीबा शाह दो महिला कर्मचारियों के साथ मारपीट करती हुई नज़र आ रही हैं। बताया जा रहा है कि नशीरुद्दीन शाह की बेटी और अभिनेत्री हीबा शाह ने वेटनरी क्लिनिक (पशु चिकित्सालय) में महिला कमर्चारियों के साथ मारपीट की। घटना सीसीटीवी में कैद हो गई है।

वेटनरी क्लिनिक ने हीबा शाह के खिलाफ मुम्बई पुलिस में शिकायत दर्ज कराई है। आरोप है कि हीबा ने वेटनरी क्लिनिक के 2 महिला कर्मचारियों के साथ मारपीट की। क्लिनिक प्रशासन ने मुम्बई पुलिस को सीसीटीवी फुटेज भी दिया है। पुलिस ने अभिनेत्री हीबा शाह के खिलाफ FIR दर्ज कर जाँच शुरू कर दी है।

16 जनवरी को वर्सोवा के वाइल्ड वुड पार्क में रहने वाली अभिनेत्री हीबा शाह की दोस्त सुप्रिया शर्मा ने वेटनरी क्लिनिक में नसबंदी के लिए दो बिल्लियों के लिए स्लॉट बुक किए थे। लेकिन कुछ कारणवश वो नहीं जा सकीं, इसलिए हीबा दोनों बिल्लियों को लेकर वहाँ पहुचीं थीं।

फेलीन फाउंडेशन की ट्रस्टी मृदु खोसला ने मिड डे से बात करते हुए कहा, “16 जनवरी को दोपहर 2.50 के करीब हीबा दो बिल्लियों को लेकर नसबंदी के लिए आती हैं। यहाँ के कर्मचारियों ने उन्होंने 5 मिनट इंतजार करने के लिए कहा, क्योंकि क्लिनिक में सर्जरी चल रही थी। मगर 2-3 मिनट के बाद ही हीबा गुस्से में आ गई और वहाँ के कर्मचारियों से कहने लगीं, क्या तुम जानते नहीं कि मैं कौन हूँ? तुम लोग मुझसे इतने लंबे समय तक बाहर कैसे इंतजार करवा सकते हो? कैसे किसी ने मेरे आने पर बिल्लियों के पिंजरे को रिक्शा से उतारने में मदद की?”

बताया जा रहा है कि जैसे ही वहाँ मौजूद कर्मचारियों ने इलाज से पहले हीबा शाह को बिल्लियों के इलाज के लिए पेपर साइन करने के लिए कहा तो वो और भड़क गईं और क्लिनिक स्टाफ को भला-बुरा कहने लगीं। खोसला ने आगे बताया कि जब एक सीनियर स्टाफ ने बिना किसी कारण के दुर्व्यवहार करने के बाद उन्हें अपनी बिल्लियों के साथ परिसर छोड़ने के लिए कहा, तो उन्होंने दो महिला स्टाफ सदस्यों के साथ मारपीट की, उन्हें थप्पड़ मारा। जिसके बाद अस्पताल प्रशासन ने इसकी शिकायत की और पुलिस को वीडियो भी उपलब्ध कराया।

पुलिस ने हीबा के खिलाफ IPC 323, 504 और 506 के तहत मामला दर्ज कर जाँच शुरू कर दिया है। हीबा शाह ने भी कर्मचारियों के साथ बदसलूकी और मारने की बात कबूली। हालाँकि उनका कहना था कि शुरुआत अस्पताल के कर्मचारियों की तरफ से की गई। बता दें कि हीबा नसीरुद्दीन शाह की पहली पत्नी की बेटी है।

‘एहसान फरामोश नसीर! इसी देश ने आपको पैसा और शोहरत दिया, बेहतर अभिनेता की गलतफहमी मत पालिए’

आपने पूरी ज़िदगी जिन पदार्थों का सेवन किया उनका असर है: ‘फ्रस्ट्रेटेड’ नसीर को अनुपम खेर ने दिया दो-टूक जवाब

अनुपम खेर जोकर है, मनोरोगी है, मुझे मुस्लिम होने का अहसास कराया जा रहा: नसीरुद्दीन शाह

जिसने दी असम को हिंदुस्तान से काटने की धमकी, उस ‘इमाम’ के खिलाफ दर्ज होगा देशद्रोह का मुकदमा

दिल्ली के शाहीन बाग में नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के खिलाफ हो रहे विरोध प्रदर्शन के बीच एक वीडियो सामने आया। जिसमें शरजील इमाम नाम का शख्स असम को हिन्दुस्तान से परमानेंटली काटकर हटा देने की बात कहता हुआ नजर आ रहा है। अब असम के मंत्री हेमंत बिस्व शर्मा ने इस पर अपनी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने इस पर प्रतिक्रिया देते हुए शरजील के बयान को देशद्रोही बयान बताया है।  

असम के मंत्री ने कहा कि शाहीन बाग में हो रहे विरोध प्रदर्शन के मास्टरमाइंड शरजील ने कहा कि असम को भारत से काट दिया जाना चाहिए। हिमांत विश्व शर्मा ने कहा कि राज्य सरकार ने शरजील के इस देशद्रोही बयान पर संज्ञान लिया है और उसके खिलाफ मामला दर्ज करने का फैसला किया है।

उल्लेखनीय है कि शरजील ने वीडियो में कहा था, “असम को काटना हमारी जिम्मेदारी है। असम और इंडिया कटकर अलग हो जाए, तभी ये हमारी बात सुनेंगे। असम में मुस्लिमों का क्या हाल है, आपको पता है क्या? CAA-NRC लागू हो चुका है वहाँ। डिटेंशन कैंप में लोग डाले जा रहे हैं और वहाँ तो खैर कत्ले-आम चल रहा है। 6-8 महीनों में पता चलेगा कि सारे बंगालियों को मार दिया गया वहाँ, हिंदु हो या मुस्लिम। अगर हमें असम की मदद करनी है तो हमें असम का रास्ता बंद करना होगा फौज के लिए और जो भी जितना भी सप्लाई जा रहा है बंद करो उसे। बंद कर सकते हैं हम उसे, क्योंकि चिकन नेक जो इलाका है, वह मुस्लिम बहुल इलाका है।”

उसने कहा था, “हम नॉर्थ ईस्ट और हिंदुस्तान को परमानेंटली काट कर सकते हैं। परमानेंटली नहीं तो कम से कम एक-आध महीने के लिए असम को हिंदुस्तान से काट ही सकते हैं। मतलब इतना मवाद डालो पटरियों पर, रोड पर कि उनको हटाने में एक महीना लगे। जाना हो तो जाएँ एयरफोर्स से।” इस दौरान इस दौरान अल्लाह हू अकबर के नारे लगाते भी लगाए गए थे।

यूजर्स ने इसे बेहद दुर्भाग्यपूर्ण बयान बताया था और साथ ही कहा था कि अब देश की जनता को भी चाहिए कि ऐसे लोगों की पहचान कर इन पर ऐसा प्रहार करें कि ये या तो देश छोड़कर भाग जाएँ या फिर दोबारा ऐसी नीच हरकत करने की सोचें भी न।

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शाहीन बाग में रवीश Vs दीपक चौरसिया: एक से याराना, दूसरे संग मारपीट – Video में प्रदर्शनकारियों का दोहरा चरित्र

9 महीने में 12 पत्रकारों पर जानलेवा हमला, मारपीट, गाली-गलौज: सब के सब सेक्युलर और ‘शांतिपूर्ण’ जगहों पर!

मीडिया को भारतीय लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ कहा जाता है, जिसकी भूमिका बेहद अहम है। ऐसे में मीडियाकर्मियों पर हमला इस ओर इशारा करता है कि देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था को बनाए रखने में कहीं न कहीं कुछ तो गड़बड़ है। लेकिन ये कर कौन रहा है? हाल के दौरान, CAA-NRC के ख़िलाफ़ देश में चल रहे हिंसक-प्रदर्शनों में आए दिन ऐसी ख़बरें सामने आईं, जहाँ पत्रकारों पर हमला कर दिया गया और उन्हें गंभीर हालत में अस्पताल में भर्ती कराया गया।

इससे यह साफ़ पता चलता है कि पत्रकारों को निशाना बनाने का काम एक सोची-समझी रणनीति के तहत किया जा रहा है, जिससे फ़र्ज़ी ख़बरों को फैलाने वाले अराजक तत्व जनता के सामने सही ख़बर को लाने से रोक सकें।

हालिया मामला न्यूज़ नेशन के वरिष्ठ पत्रकार दीपक चौरसिया का है, जिन्हें शाहीन बाग में CAA के ख़िलाफ़ हो रहे विरोध-प्रदर्शन के दौरान कुछ गुंडों ने उनके साथ न सिर्फ़ बदसलूकी की बल्कि उनके साथ हाथापाई करते हुए उनका कैमरा तक तोड़ दिया। बता दें कि दीपक चौरसिया के साथ अभद्रतापूर्ण किया गया यह व्यवहार किसी पत्रकार के साथ पहली बार नहीं हुआ है। इस लेख में हम आपको उन 12 घटनाओं के बार में बताएँगे जहाँ पत्रकारों व उनकी टीम को निशाना बनाया गया। अप्रैल 2019 से अभी तक की इन 12 घटनाओं के बारे में क्रम से नीचे पढ़ें:

1. रिपब्लिक टीवी, इंडिया टुडे के पत्रकारों पर TMC के गुंडों ने बरसाई लाठियाँ, महिला पत्रकार को भी नहीं बख़्शा

2019 में लोकसभा चौथे चरण के चुनाव के दौरान जहाँ सारा देश लगभग शांति से मतदान कर रहा था, वहीं पश्चिम बंगाल से हिंसा और धांधली की खबरें आईं। इन खबरों को कवर करने गई रिपब्लिक टीवी ने बताया है कि इस दौरान TMC के गुंडों ने उन पर हमला किया गया। रिपब्लिक टीवी के अनुसार, उनकी पत्रकार शांताश्री, अपने साथी पत्रकार के साथ आसनसोल से रिपोर्टिंग कर रही थीं। 

वहाँ TMC के गुंडों ने लाठियों से उनकी कार पर हमला किया और खिड़की तोड़ दी। शांताश्री ने बताया कि वे भाजपा सांसद बाबुल सुप्रियो की कार के पीछे-पीछे चल रहे थे। अचानक से TMC के गुंडे भड़क गए और उन्होंने उन पर हमला कर दिया। रिपब्लिक टीवी के चालक दल के अलावा, इंडिया टुडे के चालक दल और पत्रकार मनोग्य लोईवाल पर भी कथित तौर पर TMC के गुंडों द्वारा ही हमला किया गया।

2. मध्य प्रदेश: दिनदहाड़े पत्रकार पर जानलेवा हमला, कॉन्ग्रेस नेता गोविंद सिंह पर लगा आरोप, लिबरल गैंग मौन

मध्य प्रदेश के भिंड ज़िले में स्थानीय पत्रकार रीपू धवन से मारपीट की एक वीडियो सोशल मीडिया पर 30 सितंबर 2019) को वायरल हुआ। वीडियो में यह साफ़तौर पर दिखा कि दिनदहाड़े कुछ बदमाश पत्रकार को ज़मीन पर लिटाकर बेरहमी से लगातार मार रहे थे। पत्रकार लाचार ज़मीन पर पड़ा है और उस पर चारों ओर से लाठियाँ बरस रही थीं। पूरी घटना वीडियो कैमरे में कैद हो गई थी, लेकिन सभी हमलावर बदमाशों ने अपने मुँह पर कपड़ा बाँधा हुआ था। वहीं, पत्रकार का आरोप था कि उसपर ये हमला कॉन्ग्रेस नेता गोविंद सिंह के आदेश पर हुआ।

इससे पहले मध्य प्रदेश में कॉन्ग्रेस नेता का नाम जबलपुर में पत्रकार पर हुए हमले में भी आया था। जहाँ कॉन्ग्रेस नेता एवं बिल्डर सत्यम जैन और मयूर जैन ने पत्रकार आलोक दिवाकर पर जानलेवा हमला किया था और उन्हें बुरी तरह मारा था।

3. इसके मज़े लो: JNU में महिला पत्रकार के साथ बदसलूकी, गूँजा ‘हिन्दी मीडिया मुर्दाबाद’ का नारा

जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी (JNU) लंबे समय से देश-विरोधी नारेबाजी आदि के लिए, नकारात्मक बातों के लिए ही चर्चा में रहती है। ज़ी न्यूज़ चैनल की एक महिला पत्रकार किसी मुद्दे पर जानकारी जुटाने के लिए विश्वविद्यालय के परिसर में पहुँची। इस दौरान उनके द्वारा पूछे गए सवालों का जवाब देने की बजाय वहाँ मौजूद छात्र-छात्राओं ने उनके साथ न सिर्फ़ अभद्रतापूर्ण व्यवहार किया बल्कि मारपीट भी की। महिला पत्रकार बार-बार स्टूडेंट्स से उनके मसले के बारे में पूछती रही, लेकिन स्टूडेंट्स ने उनकी एक नहीं सुनी और उनके साथ बदतमीज़ी करते रहे।

जिस परिसर में महिला पत्रकार कुछ स्टूडेंट्स से सवाल करती नज़र आ रही थीं, वहाँ मौजूद छात्रों के झुंड में से कुछ ने यह कहकर फ़ब्तियाँ कस रहे थे कि ‘इन्हें घेरो मत, मजा लो’। इतना सुनने के बाद जब महिला पत्रकार ने उन शब्दों पर आपत्ति जताते हुए सवाल किया तो उनमें से एक छात्र ने कहा, “यहाँ सब आपका मज़ा ले रहे हैं।”

महिला पत्रकार ने जब पूछा कि आप लोग यहाँ पढ़ाई करने आते हैं या मज़ा लेने आते हैं? इस सवाल के जवाब पर स्टूडेंट्स के झुंड ने एक साथ ‘हिन्दी मीडिया मुर्दाबाद’ के नारे लगाए और मीडियाकर्मियों को कैमरे बंद करने के लिए कहा।

4. झारखंड: कॉन्ग्रेस कैंडिडेट ने बूथ के बाहर लहराए हथियार, समर्थकों ने पत्रकारों को पीटा

झारखंड में विधानसभा चुनाव के पहले चरण की 13 सीटों पर 30 नवंबर 2019 को वोट पड़े। डाल्टनगंज के एक बूथ के बाहर कॉन्ग्रेस प्रत्याशी केएन त्रिपाठी का हथियार लहराते वीडियो सामने आया था। उनके समर्थकों और भाजपा प्रत्याशी आलोक चौरसिया के समर्थकों के बीच झड़प की खबर भी सामने आई। मीडिया ​रिपोर्टों के मुताबिक घटना को कैमरे में कैद कर रहे पत्रकारों की पिटाई भी त्रिपाठी समर्थकों ने की।

एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार पूर्वडीहा गॉंव में कॉन्ग्रेस नेता केएन त्रिपाठी त्रिपाठी के समर्थकों ने निजी चैनल के पत्रकार और कैमरामैन को पीट डाला। उनका कैमरा भी तोड़ दिया।

5. जामिया में प्रदर्शनकारी छात्रों की गुंडागर्दी, ABP की महिला पत्रकार के साथ बदसलूकी

जामिया मिलिया यूनिवर्सिटी के छात्रों का प्रदर्शन अब भी आक्रामकता के दौर से गुजर रहा था। 15 दिसंबर 2019 को छात्रों का विरोध-प्रदर्शन अचानक से हिंसक हो उठा, जब जामिया नगर से 4 बसों को जलाए जाने की ख़बर आई। कई मेट्रो स्टेशनों को बंद करना पड़ा, कई इलाक़ों में लम्बा ट्रैफिक जाम लगा और लोगों को ख़ासी परेशानी का सामना करना पड़ा। जामिया के छात्रों ने पत्रकारों को भी अपने चपेट में ले लिया था। यहाँ तक कि महिला रिपोर्टरों को भी नहीं बख्शा गया।

इस दौरान, एबीपी न्यूज़ की पत्रकार प्रतिमा मिश्रा लगातार छात्रों से पूछती रही थीं कि क्या यही उनका शांतिपूर्ण प्रदर्शन है, लेकिन छात्रों ने महिला रिपोर्टर को घेर कर उनके साथ बदतमीजी की और नारेबाजी शुरू कर दी। वो बार-बार पूछती रहीं कि आप एक महिला के साथ गुंडागर्दी क्यों कर रहे हैं लेकिन जामिया के प्रदर्शनकारी छात्र लगातार बदसलूकी करते रहे।

6. जामिया मिलिया के बाहर ANI पत्रकारों पर हमला, हॉस्पिटल भेजे गए: अन्य रिपोर्टरों से भी हो चुकी है बदसलूकी

नागरिकता सेशोधन क़ानून का विरोध कर रहे जामिया के छात्रों ने समाचार एजेंसी ANI के दो कर्मचारियों पर 16 दिसंबर, 2019 को दोपहर हमला कर दिया गया, जब वे जामिया मिल्लिया इस्लामिया के प्रदर्शनकारी छात्रों को कवर करने गए थे। ANI के पत्रकार और कैमरामैन पर हमला यूनिवर्सिटी के गेट नंबर-1 के पास हुआ। हमले में घायल हुए पत्रकार उज्जवल रॉय और कैमरामैन सरबजीत सिंह को होली फैमिली हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया था।

7. गिरफ़्तार हुआ पत्रकारों की पिटाई करने करने वाला कॉन्ग्रेस नेता, फरार होकर भी चला रहा था फेसबुक

राष्ट्रीय जनता दल (राजद) समेत कई विपक्षी दलों ने 21 दिसंबर 2019 को बिहार बंद का आयोजन किया था। उसी समय कॉन्ग्रेस के नेता आशुतोष शर्मा ने एक पत्रकार की न सिर्फ़ पिटाई की थी बल्कि कई अन्य मीडियाकर्मियों के साथ भी बदतमीजी की थी। उसने कई अख़बारों के पत्रकारों व फोटोग्राफरों की पिटाई की थी। कॉन्ग्रेस नेता ने पत्रकारों के कैमरे व अन्य उपकरणों को तो तोड़ ही डाला गया था साथ ही पत्रकारों के मोबाइल फोन को भी नहीं बख्शा था। साथ ही एक फोटोग्राफर का सिर फोड़ डाला था। इसके बाद वो कई दिनों तक फ़रार रहे।

8. ‘तेरी माँ की…’ गाली देने वाला है The Hindu का पूर्व जर्निलस्ट, रेप पीड़िता को भी कह चुका है K*tti, har*#zadi

जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) कैंपस में 5 जनवरी को नकाबपोश गुंडों ने धावा बोला और हॉस्टल में छात्रों को निशाना बनाया था। लाठी, पत्थरों और लोहे की छड़ों के साथ गुंडों ने हाथापाई, मारपीट और खिड़कियों, फर्नीचर सामानों में तोड़फोड़ की। इसी दौरान रिपब्लिक भारत के रिपोर्टर पीयूष मिश्रा भी रिपोर्टिंग करने वहाँ पहुँचे थे। वहाँ पर उपस्थित छात्रों के साथ ही फ्रीलांस जर्नलिस्ट अभिमन्यु सिंह उर्फ अभिमन्यु कुमार ने भी गाली-गलौच और बदसलूकी की। बता दें कि अभिमन्यु सिंह मीडिया संस्थान द हिन्दू, संडे गार्डियन में काम कर चुके हैं और फिलहाल ऑनलाइन पोर्टल जनता की आवाज के साथ जुड़े हुए हैं।

ऑपइंडिया की रिपोर्ट प्रकाशित होने के बाद हरियाणा की रहने वाली एक महिला मीना (बदला हुआ नाम) ने हमसे संपर्क किया था और आरोप लगाया था कि फ्रीलांस जर्नलिस्ट अभिमन्यु सिंह ने उनके साथ दुर्व्यवहार किया और उन्हें ‘K*tti’ और ‘har*mzadi’ कहा।

9. रिपब्लिक के पत्रकार के साथ धक्का-मुक्की कर चुकी है वामपंथियों को कोचिंग देने वाली ‘इंडिया टुडे’ की तनुश्री

12 जनवरी 2020 को ऑपइंडिया ने ‘इंडिया टुडे’ के पत्रकार के वायरल वीडियो को लेकर एक ख़बर प्रकाशित की थी। उस वीडियो में देखा जा सकता था है कि पत्रकार तनुश्री पांडेय जेएनयू के सर्वर रूम में वामपंथी छात्रों को सिखाती हुई दिख रही थीं कि उन्हें कैमरे के सामने क्या बोलना है?

इसके बाद एक वीडियो सामने आया था कि ‘इंडिया टुडे’ की तनुश्री पांडेय जेएनयू छात्र संगठन की अध्यक्ष आईसी घोष के साथ मिल कर ‘रिपब्लिक टीवी’ के पत्रकार के साथ धक्का-मुक्की की थी। पत्रकार तनुश्री, वामपंथी छात्र नेता आईसी व अन्य वामपंथी छात्रों ने ‘रिपब्लिक टीवी’ के पत्रकार के साथ सिर्फ़ इसीलिए धक्का-मुक्की की थी क्योंकि उन्होंने कुछ सवाल पूछे थे। ये घटना नवंबर 20, 2019 की थी, जब जेएनयू में हॉस्टल फी बढ़ाने को लेकर हंगामा चल रहा था।

10. कॉन्ग्रेस नेता का बेहूदा रवैया: मेट्रो में सुरक्षकर्मियों को धमकी, महिला पत्रकार से बदसलूकी – वायरल हुआ Video

15 जनवरी 2020 को इंडियन एक्सप्रेस की पत्रकार तबस्सुम ने अपने ट्विटर पर मेट्रो स्टेशन पर हुए एक वाकये को शेयर किया था। अपने ट्वीट में उन्होंने लिखा था, मेट्रो स्टेशन में घुसते ही उन्होंने किसी को यह कहते सुना था, “तुम जानते हो मैं पार्षद हूँ।” जब उन्होंने पास जाकर देखा तो वो कॉन्ग्रेस नेता विक्रांत चव्हाण थे। वो मेट्रो स्टाफ और सुरक्षाकर्मियों पर तेज आवाज में चिल्ला रहे थे और सुरक्षाकर्मी उन्हें शांत करने की कोशिश में जुटे थे।

इसके बाद तबस्सुम ने साजिद नाम के सुरक्षाकर्मी से पूछा कि आखिर हुआ क्या है? साजिद ने बताया,”ये पार्षद हैं, यही कारण है कि ये चिल्ला रहे हैं और किसी की सुन ही नहीं रहे।” कॉन्ग्रेस नेता का ऐसा रवैया देख, तबस्सुम ने हस्तक्षेप किया। उन्होंने बड़े आराम से चव्हाण को शांत हो जाने को कहा, लेकिन उनकी आवाज़ और तेज़ हो गई। वो पत्रकार को कहने लगे, “तू जा यहाँ से, मैं विक्रांत चव्हाण हूँ। पार्षद।” बस फिर क्या, तबस्सुम मे पूरे मामले की वीडियो बनानी शुरू कर दी। जिसे देखकर चव्हाण नाराज हो गए और तबस्सुम के हाथ पर मारकर वीडियो रोकने की कोशिश की।

11. CPI नेता अमीर जैदी ने टीवी डिबेट में दीपक चौरसिया को दी गाली, बताया भ*वा पत्रकार

“रंज की जब गुफ्तगू होने लगी आप से तुम तुम से तू होने लगी।” मशहूर शायर दाग दहलवी की ये शायरी तब प्रासंगिक नजर आई जब CPI के पार्टी प्रवक्ता अमीर हैदर ज़ैदी ने टीवी पर बहस के दौरान टीवी पत्रकार दीपक चौरसिया को ‘तू-ता’ कहकर गालियाँ देते नजर आए। इसके अलावा, CPI के पार्टी प्रवक्ता ने दीपक चौरसिया को गाली देते हुए उन्हें ‘भ*वा पत्रकार’ तक कह दिया था। इसके बाद वो इतने पर भी नहीं रुके और दीपक चौरसिया पर और भी आरोप लगाते हुए ज़ैदी उन्हें भ*वा कहते हुए भद्दी गालियाँ देते हुए उन्हें दोहराते रहे। हालाँकि, इस दौरान दीपक चौरसिया सिर्फ मंद-मंद मुस्कुराते हुए ज़ैदी के आरोप सुनते रहे।

इस निंदनीय घटना को दीपक चौरसिया ने ट्वीट करते हुए लिखा था, “जब किसी संगठन की वैचारिक तर्कशक्ति मर जाती है, तो वो गाली-गलौच पर आ जाता है! मुझे गाली देने से आपका स्वास्थ्य अच्छा होता है तो और दीजिए। लेकिन जैदी साहब, बच्चों के दिमाग में अपनी मानसिक कुंठा मत भरिए!”

12. अल्लाह हू अकबर के नारे लगाते हुए शाहीन बाग के गुंडों ने की पत्रकार दीपक चौरसिया से मारपीट, कैमरा भी तोड़ा

शाहीन बाग़ में चल रहे CAA-विरोधी प्रदर्शन में न्यूज़ नेशन के वरिष्ठ पत्रकार दीपक चौरसिया के साथ 24 जनवरी 2020 को वहाँ प्रदर्शन कर रहे गुंडों ने बदसलूकी की। यही नहीं, उनके साथ हाथापाई करने के बाद उनका कैमरा भी तोड़ दिया गया। इस दौरान सोशल मीडिया पर शेयर किए जा रहे वीडियो में धक्का-मुक्की कर रही भीड़ को अल्लाह हू अकबर के नारे लगाते भी सुना गया।

यह घटना तब हुई जब न्यूज़ नेशन के पत्रकार दीपक चौरसिया शाहीन बाग़ घटना को कवर करने गए थे। उन्होंने एक वीडियो के ज़रिए बताया था कि शाहीन बाग में प्रदर्शन के नाम पर कई असामाजिक तत्व हिंसा फैला रहे हैं। साथ ही न्यूज नेशन के कैमरामैन का कैमरा तोड़ दिया गया।

नोट: मीडियाकर्मियों पर हुए इन हमलों की संख्या केवल 12 तक ही सीमित नहीं हैं। यदि पाठकों को मीडियाकर्मियों पर हुए हमले से जुड़ी अन्य घटनाओं के बारे में पता है, तो वो हमें उन घटनाओं से अवगत करा सकते हैं। हम उन्हें इस लेख में जोड़कर इस लेख को अपडेट कर देंगे।

चीन में 41 लोगों की जान लेने वाले Corona Virus ने भारत में दी दस्तक, 11 लोगों को निगरानी में रखा गया

चीन में तेजी से फैला कोरोना (Coronavirus) वायरस अब दुनिया के लिए एक बड़ी चिंता का विषय बन चुका है। इतना ही नहीं यह वायरस चीन से निकलकर दूसरे कई देशों तक भी पहुँच चुका है। इस वायरस को गंभीरता से लेते हुए भारत ने दूसरे देशों से आने वाले 11 लोगों को जाँच के लिए निगरानी में रखा है। चीन में इसकी चपेट में आने से होने वाली मौतों की संख्या 26 से बढ़कर 41 हो गई है।

द न्यू यॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक चीन में पिछले दिनों इस वायरस से हुई 26 मौतों का आँकड़ा बढ़कर 41 हो गया है। इन मौतों में से सिर्फ तीन लोगों की मौत चीन के वुहान (Wuhan) शहर के बाहर हुई हैं और इसी शहर को इस वायरस का केंन्द्र बताया गया है।

चीन में इससे पहले राष्ट्रीय स्वास्थ्य आयोग की रिपोर्ट ने पुष्टि की थी कि 800 से अधिक लोग कोरोना वायरस से संक्रमित थे, जबकि 26 लोगों की मौत हो गई थी। 15 मौतों की ताजा रिपोर्ट के साथ अब यह संख्या 41 हो गई है। वर्तमान में चीन के तेरह शहर लॉकडाउन के अधीन हैं क्योंकि देश और विदेशों में घातक वायरस का प्रसार जारी है।

इसी बीच, भारत सरकार के केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने शुक्रवार (24 जनवरी) को जानकारी देते हुए कहा था कि भारत में कुल 11 लोगों को इसलिए निगरानी पर रखा गया है कि कहीं वो इस वायरस की चपेट में तो नहीं आ गए हैं। इनमें से तीन को मुंबई, सात लोगों को केरल और एक को हैदराबाद के अस्पताल में रखा गया है। इन 11 लोगों में से 4 लोगों में इस वायरस के होने की आशंका जताई जा रही है। हालाँकि, अभी तक इसकी पुष्टि नहीं हो सकी है। ये चारों लोग हाल ही में चीन से भारत लौटे हैं।

इससे पहले, बीते शुक्रवार को दिल्‍ली स्‍थित एम्‍स अस्‍पताल ने भी कोरोना वायरस से निपटने को लेकर तमाम ठोस इंतजाम किए जाने की बात कही। इस सन्दर्भ में, अस्‍पताल के निदेशक डॉक्‍टर रणदीप गुलेरिया ने बताया था कि ‘कोरोना वायरस’ के मरीजों के इलाज के लिए हमारे पास तमाम तरह की सुविधाएँ उपलब्ध हैं। उन्होंने बताया था कि इस वायरस से निपटने के लिए एक अलग से वार्ड भी तैयार किया गया है। इस वायरस की चपेट में आने से बचने के लिए स्‍वास्‍थ्‍य कर्मियों को मास्क, हैंड सैनिटाइजर जैसी तमाम तरह की सुविधाएँ भी उपलब्‍ध कराई जा चुकी हैं।

चीन में कोरोना वायरस के फैलते ही भारत सरकार अपने सभी एयरपोर्ट्स को अलर्ट जारी कर चुकी है। इसके तहत चीन से आने वाले यात्रियों की गहनता के साथ जाँच की जा रही है। स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा जारी किए गए एक बयान में बताया गया था कि 24 जनवरी तक भारत में 20,844 यात्रियों की जाँच की जा चुकी है।

इसके अलावा, थाईलैंड, वियतनाम, सिंगापुर, जापान, दक्षिण कोरिया, ताइवान, नेपाल, फ्राँस और संयुक्त राज्य अमेरिका में भी इस वायरस के होने की पुष्टि की गई है। थाईलैंड में पाँच, सिंगापुर और ताइवान तीन में तीन, जापान, वियतनाम, दक्षिण कोरिया और संयुक्त राज्य अमेरिका में दो-दो मामले सामने आए हैं, वहीं, नेपाल में एक मामला सामने आया है।

चीन के वुहान शहर से निकला कोरोना वायरस दूसरे देशों में भी फैलने के साथ-साथ अब ये वैश्विक स्तर पर महामारी का रूप ले चुका है। इसकी रोकथाम करना दुनिया भर के स्वास्थ्य अधिकारियों के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है। ऐसा इसलिए क्योंकि अब तक दुनिया भर के क़रीब 1200 लोग इस वायरस की चपेट में आ चुके हैं।

‘Corona Virus’ को लेकर हम गंभीर, इलाज के लिए पर्याप्त इंतजाम: एम्स के निदेशक रणदीप गुलेरिया

‘फ्री कश्मीर’ की चाह लिए वामपंथी गुंडे हिंदू कॉलेज की दीपिका को दे रहे धमकी

DU बीट नामक ‘स्वतंत्र विद्यार्थी अखबार’ ने अपने फीचर्ड इमेज में कहीं का एक पोस्टर लगाया है जिसमें ‘स्टॉप वेपनाइजिंग कश्मीरी पंडित एग्जोडस’ (यानी कश्मीरी पंडितों के पलायन का हथियार की तरह इस्तेमाल करना बंद करो) लिखा है। भीतर में यह भी दावा किया गया है कि कॉलेज के जो ‘विद्यार्थी’ दीपिका के पत्र-पाठ पर नारेबाजी कर रहे थे, वो ‘कश्मीरी पंडितों के साथ’ होने के पोस्टर ले कर भी खड़े रहे हैं। कमाल की बात यह है कि DU बीट ने एक रैंडम पोस्टर फीचर्ड इमेज में लगाया है, और दूसरा पोस्टर हिमांशु सिंह और अभिराम एस विनोद नामक लड़कों को क्रेडिट दे कर, जिसमें कश्मीर का जिक्र कहीं नहीं है। रैंडम पोस्टर अगर इन विद्यार्थियों के हाथ में उस दिन होता, तो शायद इस आर्टिकल में दिख जाता।

DU बीट में प्रकाशित खबर का स्क्रीनशॉट

दूसरी बात, जिस दो नामों का जिक्र इस लेख में किया गया है, उन दोनों ने ही ‘फ्री कश्मीर’ वाले पोस्ट पर ‘लव’ रिएक्ट किया है। अब सवाल यह है कि अपनी प्रोफाइल में SFI से ताल्लुक बताने वाला हिमांशु सिंह और अभिराम, अगर कश्मीरी हिन्दुओं के साथ खड़े हैं तो वो फ्री कश्मीर के पोस्ट को ‘दिल’ क्यों दे रहे हैं? या तो हिमांशु जैसे नव-वामपंथी छात्रों को पता नहीं है कि कश्मीर का मुद्दा क्या है, जो अगर वो दीपिका की श्रद्धांजलि सभा में शांति बना कर कुछ मिनट सुन लेते तो ज्ञान हो जाता, या फिर ये लोग मूर्खतावश किसी भी पोस्ट को ‘लव’ रिएक्ट देते रहते हैं। दोनों ही मामले में, हिमांशु या अभिराम छात्र होने की बुनियादी जरूरत – जो लिखा है, जो बोला जा रहा है, उन्हें समझ पाना – पूरी नहीं कर पा रहे।

ऑपइंडिया पर दीपिका शर्मा के इंटरव्यू के बाद, वामपंथी गुंडों का सारा अजेंडा बाहर आ चुका है और ये लोग अब मिट्टी डाल कर ढकने की फिराक में हैं। जब ये लोग इस बात को मानते हैं कि जनवरी 19 को ही दीपिका के ग्रुप के छात्र-छात्राओं द्वारा श्रद्धांजलि सभा का आयोजन था, जिसमें बमुश्किल 10-20 लोग आए, तो फिर ‘कश्मीरी पंडितों के साथ खड़े होने वाले’ छात्रों का दिमाग क्या घास चरने गया था कि अगले दिन वहाँ गला फाड़ कर चिल्लाने लगे? क्या इन गुंडों का ‘श्रद्धांजलि’ या ‘सॉलिडेरिटी’ का मतलब भी पता है? क्या दीपिका किसी ‘फासिस्ट’ संस्था से संबद्ध थी? क्या उसका कोई अजेंडा था? या फिर उसी दिन को वो सभा होनी चाहिए थी क्योंकि भारतीय इतिहास का वही दिन वो काला दिन था?

हिमांशु और अभिराम के फेसबुक प्रोफाइल का स्क्रीनशॉट, जहाँ वो ‘फ्री कश्मीर’ की वकालत कर रहे हैं

इन लफंगों से सवाल यह है कि प्रोटेस्ट करना क्या उनका ही निजी अधिकार है? क्या उन्हीं के हिसाब से प्रोटेस्ट होगा? स्वघोषित रूप से वामपंथी छात्रों द्वारा ‘फ्री कश्मीर’ और ‘इन सॉलिडेरिटी विद कश्मीरी पंडित’ दोनों जगह सहमति देना उनकी मूर्खता पर बहुत कुछ नहीं कहता? अगर यह भी मान लिया जाए कि फीचर्ड इमेज वाला पोस्टर ले कर हिमांशु जैसे लड़के घूम रहे थे, तो DU बीट को यह तो बताना चाहिए कि दीपिका के किन शब्दों से कश्मीरी पंडितों के पलायन को हथियार की तरह इस्तेमाल किया जा रहा था?

आज दीपिका को धमकियाँ मिल रही हैं, उसे अलग-थलग करने की कोशिशें हो रही हैं। जब वो अपना पक्ष रख रही है, तो यह बताया जा रहा है कि उसका पक्ष ‘भ्रम’ फैला रहा है, गलत तरीके से दिखाया गया है। ऑपइंडिया से बातचीत में दीपिका शर्मा ने बताया था कि जैसे ही उन्होंने यह पत्र पढ़ना शुरू किया, कॉलेज के ही कुछ वामपंथी छात्र गुटों ने दीपिका के खिलाफ जोर-जोर से नारेबाजी शुरू कर दी। दीपिका ने बताया कि हालाँकि उन्हें यह पहले से ही आभास था कि इसके लिए वामपंथी गुट उन्हें परेशान करेंगे। बावजूद दीपिका ने यह जोखिम उठाया।

दीपिका ने बताया कि आज के समय में अगर आप खुद को लेफ्टिस्ट का तमगा नहीं देते हैं, तो आपको नकार दिया जाता है। साथ ही उन्होंने कहा कि उनके दक्षिणपंथी होने की वजह से उन्हें ब्राह्मणवादी, पिछड़ा और भी न जाने कितने ही विशेषण दिए जाते हैं। उन्होंने बताया कि वामपंथी विचारधारा के लोग अपने साथ खड़े न होने पर लोगों को किसी भी तरह से पिछड़ा हुआ साबित करने का प्रयास करते हैं और मानसिक प्रताड़ना देते हैं। उन्होंने कहा कि कश्मीरी पंडितों के साथ समर्थन व्यक्त करने के लिए उनके खिलाफ ‘इस्लामॉफ़ोबिक’ नारे लगाए गए। दीपिका ने सवाल उठाते हुए कहा कि यदि कोई कश्मीरी पंडितों के अधिकारों की बात करता है तो वह इस्लाम विरोधी क्यों ठहरा दिया जाता है? उन्होंने बताया कि ‘बोल कि लब आजाद हैं तेरे’ जैसे नारे लगाने वाले नहीं चाहते कि उनके अलावा कोई दूसरा बोले।

इसमें गलत क्या दिखाया गया है?

वामपंथी गुंडों ने नारेबाजी की। श्रद्धांजलि सभा पर नारेबाजी, वो भी तब जब जगह और सभा की जानकारी पहले से ही हो, रुक कर तब तक की जाए जब तक वो लड़की भावुक हो कर, यह सोच कर टूट न जाए कि कैसे लोग हैं जो लाखों लोगों की व्यथा पर शोर कर रहे हैं, गुंडागर्दी और लफ़ंगापन ही है। इसके लिए और कोई नाम नहीं।

ये लोग गुंडे इसलिए हैं क्योंकि जिस बात का ये विरोध कर रहे हैं, उसे पढ़ने की जगह, उसे समझने की जगह, बस अपने प्रोफेसरों के कहने पर, या अपनी ही अटल अज्ञानतावश पोस्टर ले कर निकल पड़े हैं। इन्होंने अपनी बुद्धि-विवेक का प्रयोग बंद कर दिया है और जो भी इनके साथ नहीं है, जो भी न्यूट्रल है, कुछ और करना चाह रहा है, जो पोलिटिकल नहीं है, वो इनका दुश्मन बन जाता है।

कैम्पसों को वैचारिक चर्चा की जगह, ‘एक ही तरह के विचारों पर चर्चा’ की जगह बनाने की वामपंथी मुहिम सिर्फ इसलिए चल रही है क्योंकि एकेडमिक जगहों में ऐसे शिक्षकों का वर्चस्व है जो पढ़ाने की जगह बच्चों को बरगलाते रहते हैं कि उनका पहला काम सड़क पर नारे लगाना है। ये शिक्षक अपनी राजनैतिक महात्वाकांक्षा या कुंठा को हवा देने के लिए बच्चों को ब्लैकमेल तक करते हैं। जो बच्चे इनकी रैलियों में नहीं आते उनके ‘इंटरनल मार्क्स’ कम किए जाने की अनकही धमकी हर जगह सुनाई देती है।

इसलिए, एक ऐसी छात्रा पर हमला बोलना जिसने कोई राजनीति नहीं की, बल्कि एक छोटी सी, शांतिपूर्ण श्रद्धांजलि सभा बुलाई, यह बताता है कि वामपंथी सड़ाँध से बजबजाते कॉलेज और विश्वविद्यालय वैचारिक पतन के किस रास्ते चल चुके हैं।

हिंदू कॉलेज में कश्मीरी पंडितों का दर्द बयाँ कर रही थी दीपिका, टूट पड़े वामपंथी गुंडे