स्टार बैडमिंटन प्लेयर साइना नेहवाल भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गई हैं। उन्होंने भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा से मुलाक़ात के बाद अपनी बहन चन्द्रांशु के साथ भाजपा ज्वाइन की। हरियाणा में जन्मीं साइना कॉमनवेल्थ गेम्स से लेकर ओलम्पिक तक अपनी प्रतिभा का परचम लहरा चुकी हैं। उनसे पहले पूर्व हॉकी कप्तान संदीप सिंह और पहलवान बबिता फोगाट भाजपा में शामिल हो चुकी हैं। इन दोनों ने हरियाणा विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा का दामन थामा था।
साइना नेहवाल ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत में खेल को आगे ले जाने के लिए बहुत कुछ किया है। उन्होंने ‘खेलो इंडिया’ मूवमेंट की भी तारीफ की। साइना ने कहा कि वो देश और देश के लोगों के लिए और ज्यादा मेहनत करेंगी।
साइना नेहवाल पिछले दिनों में कई बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मोदी सरकार की नीतियों की तारीफ कर चुकी हैं। हाल ही में जब पीएम मोदी ने रामलीला मैदान में भाषण दिया था, तब साइना ने उनके सम्बोधन की प्रशंसा की थी।
Today, I am joining a party that performs well for the country.
Modi Ji has done so much for sports in India with initiatives like Khelo India. Looking forward to work hard for the country and the people: Badminton player @NSaina
ख़बरों में कहा जा रहा है कि साइना नेहवाल दिल्ली चुनाव में भी भाजपा के लिए प्रचार करेंगी। पार्टी सूत्रों का कहना है कि कैडर में जोश भरने के लिए साइना का प्रचार अभियान अहम साबित हो सकता है। खेल रत्न और अर्जुन अवॉर्ड से सम्मानित की जा चुकीं साइना युवाओं के बीच पहले से ही ख़ासी लोकप्रिय हैं।
29 वर्षीय साइना नेहवाल अब तक 24 अंतर्राष्ट्रीय टाइटल जीत चुकी हैं। विश्व की पूर्व नंबर एक बैडमिंटन खिलाड़ी साइना नेहवाल ये उपलब्धि हासिल करने वाली दूसरी भारतीय बैडमिंटन प्लेयर बनी थीं। इससे पहले प्रकाश पादुकोण ने ये उपलब्धि हासिल की थी।
केरल के हाईकोर्ट ने चर्चों में ‘होली सेक्रामेंट’ के नाम पर एक ही प्याली से पिलाई जाने वाली शराब जैसी प्रथा के ख़िलाफ़ दायर जनहित याचिका को रद्द कर दिया। कोर्ट का कहना है कि ये आस्था का मामला है, इसलिए वे इसमें दखल नहीं कर सकते।
‘होली सेक्रामेंट’ ईसाई धर्म की एक ऐसी प्रथा है, जिसमें गिरजाघरों में रोटी और शराब बाँटकर यीशु मसीह के ‘लास्ट सपर’ को स्मरण किया जाता है। डॉक्टरों और डेन्टिस्टों के संगठन ‘क्वालिफाइड प्राइवेट मेडिकल प्रैक्टिशनर्स एसोसिएशन’ ने इस प्रथा के ख़िलाफ़ हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की थी। अपनी याचिका में इन्होंने इस प्रथा, (‘होली सेक्रामेंट’ वितरित किए जाने की प्रथा) को अस्वास्थ्यकर बताया था। साथ ही कहा था कि इस प्रथा से आम जनता के स्वास्थ्य को गंभीर खतरा है, विशेषकर सहभागियों के लिए।
उल्लेखनीय है कि होली सेक्रामेंट की प्रथा में चर्च में पादरी हर सहभागी के मुँह में एक ही प्याली और चम्मच से शराब परोसते हैं। जिसके आधार पर डॉक्टर और डेंटिस्टों के संगठन का कहना था कि यह प्रक्रिया लार से गंदगी फैलने की आशंका को जन्म देती है, जोकि कई बीमारियों के प्रमुख कारणों में से एक है। उनमें से कुछ बीमारियाँ हवा में लार की बूंदों की मौजूदगी से भी फैल सकती है। लार की गंदगी के कारण बड़ी संख्या में लोगों में संक्रमण फैलने की आशंका होती है। इसलिए लोगों को ऐसी प्रथाओं में शामिल होने से बचना चाहिए।
जानकारी के अनुसार, इस जनहित यााचिका में माँग की गई थी कि चर्च सहित सभी धार्मिक संस्थानों में जहाँ भोजन वितरित होता है, वहाँ स्वच्छता संबंधी मानकों का पालन किया जाए और यह सुनिश्चित हो कि खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम, 2006 के अनुसार केवल सुरक्षित भोजन ही वितरित किया जाए।
मगर, याचिका पर सुनवाई के दौरान और अधिनियम के प्रावधानों का उल्लेख करते हुए, चीफ जस्टिस एस मानिकुमार और जस्टिस शाजी पी चाली की बेंच ने कहा कि खाद्य सुरक्षा प्राधिकरण को चर्चों में होली सेक्रामेंट के वितरण या व्यवस्थापन में हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं दिया गया है।
कोर्ट ने कहा धार्मिक समूह के सदस्यों द्वारा, होली सेक्रामेंट प्राप्त करने की प्रथा, सदस्यों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता है, जिसे संविधान के अनुच्छेद 21 में संरक्षित किया गया है। संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 का हवाला देते हुए, हाईकोर्ट ने इस दौरान कहा कि धर्मावलंबी द्वारा ‘होली सेक्रामेंट’ ग्रहण करना उक्त प्रथा में उस व्यक्ति का विश्वास है और किसी नागरिक का धार्मिक विश्वास उस व्यक्ति की धार्मिक स्वतंत्रता है। हाईकोर्ट ने इसके बाद याचिका को खारिज करते हुए यह भी कहा कि याचिकाकर्ताओं ने ऐसा कोई उदाहरण नहीं दिया, जिससे पता चले कि होली सेक्रामेंट वितरित किए जाने से किसी व्यक्ति को कोई संक्रामक रोग हुआ या स्वास्थ्य संबंधी खतरा पैदा हुआ।
सोशल मीडिया पर पूर्व भाजपा सांसद हरि माँझी ने एक वीडियो शेयर किया है। इसमें उन्होंने दावा किया है कि राजस्थान का एक मुस्लिम नेता खुलेआम लोगों को धमका रहा है। सीएए और एनआरसी के ख़िलाफ़ बोलते हुए उक्त मुस्लिम नेता आरएसएस के लिए आपत्तिजनक भाषा का प्रयोग करता हुआ दिख रहा है। हरि माँझी लगातार दो बार बिहार के गया से सांसद रह चुके हैं। उन्होंने ट्विटर पर वीडियो शेयर करते हुए बताया कैसे मुस्लिम नेता खुलेआम प्रशासन को धमका रहा है।
साथ ही वो खुलेआम गोली मारने की भी धमकी दे रहा है। माँझी ने इस ट्वीट में राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और कॉन्ग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष सचिन पायलट को टैग करते हुए पूछा कि वो भड़काऊ बयान देने वाले इस नेता के ख़िलाफ़ क्या कार्रवाई करने वाले हैं? माँझी ने भाजपा प्रवक्ता तजिंदर सिंह बग्गा और राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को भी इस ट्वीट में टैग किया।
“मैं प्रशासन को चेतावनी देता हूँ। मच्छीपुरा से आने वाली गाड़ियों पर पथराव किया गया है। याद रखना, कुचल के फेंक देंगे। ग़लतफ़हमी में मत रहना। ये चड्डा-चड्डी वालों को, गोली मारो सालों को। बाहर निकालो सालों को।”
मुस्लिम नेता अपने वीडियो में प्रशासन और संघ के लिए आपत्तिजनक भाषा का प्रयोग करते हुए धमकी दे रहा है और साथ ही गोली मारने व बाहर निकालने की बात भी कह रहा है। हालाँकि, अभी तक मुख्यमंत्री गहलोत या उप-मुख्यमंत्री पायलट ने इस वीडियो पर कुछ प्रतिक्रिया नहीं दी है।
अगर आपको लगता है कि माँ सरस्वती की पूजा सिर्फ़ भारत में ही की जाती है और केवल हिन्दू धर्म में ही ऐसा होता है, तो आप ग़लत हैं। दरअसल, देवी सरस्वती की पूजा विभिन्न समय-काल में, विश्व की विभिन्न सभ्यताओं द्वारा अलग-अलग स्वरूपों में की जाती रही है। जापान में उनकी पूजा बेंजाइटन के रूप में की जाती है। बेंजाइटन को भी वीणा बजाते हुए दिखाया गया है, ठीक माँ सरस्वती की तरह। सरस्वती के बारे में वेदों में कई ऋचाएँ हैं। सबसे प्राचीन वेद ऋग्वेद में सरस्वती का वर्णन नदी के रूप में है। बाद में उन्हें विद्या की देवी का दर्जा मिला।
सरस्वती नदी के बारे में लिखा गया है कि वो ऐसी शक्तिशाली नदी थी, जिसकी धार पहाड़ों को चीरते हुए धरती पर आती थी। ऋग्वेद में इसका प्रमाण मिलता है कि यज्ञ वगैरह के लिए सरस्वती नदी के तट को दुनिया में सबसे शुद्ध माना जाता था। पुराणों में उन्हें ब्रह्मा जी की पत्नी के रूप में दर्शाया गया है। बौद्ध धर्म में माँ सरस्वती का ख़ास महत्व है क्योंकि भगवान बुद्ध को ज्ञान मिलने का कारण उन्हें ही बताया गया है। बौद्ध मानते हैं कि जो भी धर्म की उपासना करता है, माँ सरस्वती उनकी रक्षा करती हैं।
अगर जापान में पूजी जाने वाले बेंजाइटन की बात करें तो चीन में ‘सुवर्णप्रभास सूत्र’ के स्थानीय भाषाओं में अनुवाद होने के बाद उन्हें ख्याति मिली। इसी तरह ये साहित्य जापान पहुँचा और वहाँ बेंजाइटन की पूजा होने लगी। उन्हें जल, विद्या, ज्ञान, समय और संगीत की देवी माना गया है। जापान में उन्हें ‘शीसीफुकूजिन’ के अंतर्गत रखा जाता है। अर्थात, ऐसे 7 देवी-देवता, जिनकी पूजा करना व्यक्ति को भाग्यशाली बनाता है। उन्हें बेंटेन ये बेन्ज़ाइटेन्नयो के नाम से भी जाना जाता है।
प्राचीन वैदिक साहित्य में वृत्र नामक असुर का जिक्र मिलता है, सरस्वती ने जिसका वध किया था। वृत्र को ‘अहि’ यानी साँप के रूप में चित्रित किया गया है। वहीं जापान में उसे ड्रैगन के रूप में जाना गया है। कई लोग मानते हैं कि 8वीं या 9वीं शताब्दी में सरस्वती को जापान में बेंजाइटन के रूप में पूजा जाने लगा। लेकिन, पाँचवीं-छठी शताब्दी में लिखी गई बौद्ध पुस्तकों में बेंजाइटन का जिक्र है।
Today is #BasantPanchami when we worship Ma #Saraswati, the Goddess of Art & Knowledge. Did you know she is worshiped not only in the Indian subcontinent but also in #Japan as #Benzaiten, being the ONLY goddess in the group of 7 Lucky Gods of Japan!
बाद में ड्रैगनों का राजा अनवतप्त की बेटी के रूप में बेंजाइटन की कथा बताई गई है। ये दिखाता है कि काफ़ी पहले से उनकी पूजा होती रही है। बता दें कि अनवतप्त नामक एक झील की भी बौद्ध साहित्यों में ख़ूब चर्चा है, जिसके बारे में बताया गया है कि वो धरती के बीचोंबीच स्थित है।
माँ सरस्वती की तरह बेंजाइटन को भी संगीत और ज्ञान की देवी माना गया है। जिस तरह भारत में माँ सरस्वती का चित्रण सफ़ेद शरीर वाली देवी के रूप में किया गया है, जापान में भी बेंजाइटन की अधिकतर प्रतिमाएँ आपको एकदम सफ़ेद ही मिलेंगी।
शाहीन बाग में चल रहे प्रदर्शन के कारण रविवार (जनवरी 26, 2020) को एक महिला की जान पर बन आई। महिला का पति अपनी बीवी की जान बचाने के खातिर गिड़गिड़ाता रहा। लेकिन शाहीन बाग में बैठी प्रदर्शनकारियों ने एंबुलेंस जाने का रास्ता नहीं दिया। नतीतजन महिला की हालत गंभीर होती गई। अंत में महिला को प्राइवेट अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। जहाँ उसकी हालत देखकर उसे वेंटिलेटर पर रखा गया।
पंजाब केसरी की रिपोर्ट के अनुसार, शनिवार की रात से ही 44 वर्षीय मायावती को साँस लेने में तकलीफ हो रही थी। लेकिन रविवार को उनकी तबीयत अचानक ज्यादा बिगड़ गई। साँस लेने में तकलीफ और दर्द देखकर मायावती के पति देवता प्रसाद मौर्य ने तुरंत एंबुलेंस को फोन किया और ड्राइवर से जल्द से जल्द आने को कहा। लेकिन एंबुलेंस शाहीन बाग में प्रदर्शकारियों के कारण काफी देर अटकी रही।
दैनिक जागरण की रिपोर्ट के अनुसार, मायावती के पति ने बताया कि अगर उनकी बीवी को कुछ भी हुआ, तो इसके लिए सिर्फ़ शाहीन बाग के प्रदर्शनकारी जिम्मेदार होंगे। इनके कारण दिल्ली-नोएडा का रोड पूरा ब्लॉक हो रहा है। उनके अनुसार सिर्फ प्रदर्शनकारियों के कारण एंबुलेंस सही समय पर नहीं पहुँची। इसकी वजह से उनकी बीवी की तबीयत ज्यादा खराब हो गई। वो अपनी पत्नी को फौरन सफदरजंग अस्पताल लेकर जाना चाहते थे। लेकिन जब काफी समय तक एंबुलेंस नहीं आ पाई, तो उन्होंने एक खुद ऑटो किया और अपनी पत्नी को न्यू फ्रेंड कॉलोनी इलाके के प्राइवेट अस्पताल में भर्ती कराया। अस्पताल में मायावती की गंभीर हालत देखकर उन्हें वेंटिलेटर पर रखा गया।
गौरतलब है कि शाहीन बाग पर चल रहे प्रदर्शन के कारण ये पहला मामला नहीं है, जहाँ किसी को इस तरह की परेशानी का सामना करना पड़ा हो। रोजाना वहाँ से गुजरने वाले लोगों के लिए ये दिक्कत पिछले एक महीने से आम हो गई हैं। सीएए विरोध के नाम पर कालिंदी कुंज रोड को ब्लॉक कर रखा है जो फरीदाबाद, नई दिल्ली और नोएडा को जोड़ती हैं।
केरल विधानसभा में राज्यपाल आरिफ मोहम्मद ख़ान के साथ बदसलूकी हुई। राज्यपाल के ख़िलाफ़ सदन में जम कर नारेबाजी की गई। दरअसल, राज्यपाल ने मुख्यमंत्री को सूचित किया था कि वो अपने सम्बोधन का पैराग्राफ 18 नहीं पढ़ेंगे, क्योंकि उसमें सीएए के ख़िलाफ़ बातें लिखी हुई हैं। इस पैराग्राफ में नागरिकता संशोधन क़ानून को असंवैधानिक और भेदभाव करने वाला बताया गया है। ड्राफ्ट में सीएए के बारे में इस तरह की बातें लिखे जाने पर राज्यपाल ने आपत्ति जताई। बाद में राजभवन ने सीएम पिनाराई विजयन के स्पष्टीकरण को ख़ारिज कर दिया। राज्यपाल के सम्बोधन के ड्राफ्ट को मंत्रिपरिषद द्वारा तैयार किया गया गया था।
मुख्यमंत्री कार्यालय ने राजभवन को सलाह दी थी कि राज्यपाल को अपना सम्बोधन बिना कोई बदलाव किए हुए पढ़ना चाहिए। राजभवन ने सुप्रीम कोर्ट के एक ऑर्डर का जिक्र करते हुए कहा कि राज्यपाल को ऐसा करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। राजभवन का आरोप है कि केरल मंत्रिपरिषद ने ‘विचारों’ को ‘नीतियों और योजनाओं’ के साथ मिक्स कर के पेश करने का प्रयास किया है और राज्यपाल इसके लिए राजी नहीं हैं। हालाँकि, मंत्रिपरिषद ने राज्यपाल की आपत्तियों को नकार दिया।
बुधवार (जनवरी 29, 2020) को जब केरल के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद ख़ान बजट सेशन को सम्बोधित करने विधानसभा पहुँचे, तब विपक्षी पार्टी कॉन्ग्रेस के विधायकों ने उन्हें सदन में घुसने से रोक दिया। पोस्टर-बैनर लेकर राज्यपाल का रास्ते रोकते हुए कॉन्ग्रेस विधायकों ने जम कर नारेबाजी की। बाद में सिक्योरिटी गार्ड्स ने इन विधायकों को वहाँ से हटाया। कॉन्ग्रेस विधायकों का कहना था कि राज्यपाल ने लोकतंत्र का अपमान किया है क्योंकि विधानसभा ने सीएए के ख़िलाफ़ प्रस्ताव पास किया था। विधायकों ने सदन से वाकआउट किया।
Thiruvananthapuram: United Democratic Front (UDF) MLAs stage a walk-out from the assembly as Kerala Governor Arif Mohammad Khan begins his address. https://t.co/ohQS12yVQrpic.twitter.com/sqE05PSQtS
हालाँकि, हंगामे के बीच ही राज्यपाल आरिफ मोहम्मद ख़ान ने अपना सम्बोधन शुरू किया। नेता प्रतिपक्ष रमेश चेनिथाला ने विधानसभा अध्यक्ष से कहा कि वो राज्यपाल को वापस भेजने के लिए एक प्रस्ताव पास करें, जिसमें राष्ट्रपति से अनुरोध किया जाए वो आरिफ मोहम्मद ख़ान को वापस बुला लें। जब से आरिफ मोहम्मद ख़ान ने सीएए विरोधी प्रस्ताव की आलोचना की है, तब से केरल में पक्ष और विपक्ष, दोनों ही उनका एक सुर से विरोध कर रहे हैं।
राज्यपाल के सम्बोधन के दौरान उन्हें मार्शलों ने घेरे रखा ताकि कोई विधायक उन तक पहुँच कर बदसलूकी न करे। उन्हें मार्शलों की सुरक्षा के बीच मंच तक पहुँचाया गया। इस घटना को लेकर केरल भाजपा ने कॉन्ग्रेस और वामपंथियों की निंदा की है।
जहाँ एक तरफ़ पूरी दुनिया रोहिंग्याओं पर हो रहे कथित अत्याचार की बात करती है और भारत में कई आपराधिक वारदातों में उनकी संलिप्तता पर चुप्पी साध लेती है, वहीं दूसरी तरफ रोहिंग्या ईसाइयों की बदहाल स्थिति पर कोई भी संगठन कुछ नहीं कहता। रोहिंग्या ईसाइयों के हक़ के लिए कोई आवाज़ नहीं उठाता, क्योंकि उन पर रोहिंग्या मुस्लमान ही अत्याचार कर रहे हैं। रोहिंग्या क्रिश्चियन रिफ्यूजी कमिटी इस सम्बन्ध में समय-समय पर आवाज़ उठाता रहा है। अपने ताज़ा ट्वीट में भी संगठन ने पूछा है कि रोहिंग्या लगातार रोहिंग्या ईसाइयों के घरों व चर्चों को जला रहे हैं, फिर अंतरराष्ट्रीय समुदाय चुप क्यों है?
बांग्लादेश के कुटुपलोंग में रोहिंग्याओं ने न सिर्फ़ चर्च को लूटा बल्कि वहाँ रखी बाइबिल की पवित्र पुस्तकों को भी फाड़ कर बिखेड़ दिया। उन्होंने चर्च में रखे सारे सामान लूट लिए। ये घटना रविवार (जनवरी 26, 2020) की है, जिसे मीडिया द्वारा कवरेज नहीं दिया गया। ये घटना कुटुपलोंग के ब्लॉक 2 में स्थित चर्च में हुई। पिछले वर्ष मई में भी लगातार तीन दिन रोहिंग्या ईसाइयों को निशाना बनाया गया था।
Oh, human rights organizations, you who are working for Rohingya Muslims, see what they are doing to Rohingya Christians. Yesterday the R.M and ARSA destroyed Rohingya Christians’ houses and church. They lotted all of their goods and strewed Bibles and books in the church. pic.twitter.com/p6uu1pJhPw
— Rohingya Christian Refugee committee (@RohingyaCRC) January 27, 2020
नीचे आप एक अन्य चर्च की तस्वीर देख सकते हैं, जहाँ दिसंबर 2018 में धूमधाम से क्रिसमस का त्योहार मनाया गया था, लेकिन अब स्थिति इसके उलट है चर्च के नाम पर वहाँ एक तम्बू गड़ा हुआ है। चर्च को रोहिंग्याओं ने तोड़-फोड़ डाला। मार्च 27, 2019 को इस चर्च पर रोहिंग्याओं का कहर बरपा। इतना ही नहीं, वहाँ चर्च की जगह पर मस्जिद भी बना दिया गया।
This was their previous church and school, in it they celebrated Christmas in 2018. But the Rohingya Muslims demolished it on March 27, 2019 and built a mosque within one day. Here one picture is of church and another one is of the mosque. pic.twitter.com/CLrCGjYur8
— Rohingya Christian Refugee committee (@RohingyaCRC) January 28, 2020
रोहिंग्या मुस्लिम संगठन ARSA पर रोहिंग्या ईसाइयों को प्रताड़ित करने के आरोप लगे हैं। हाल ही में ARSA के हमले में 12 रोहिंग्या ईसाई गंभीर रूप से घायल हो गए, जिनका इलाज हो रहा है। इनमें से कुछ के शरीर पर एसिड फेंक कर हमला किया गया। कुछ की सर्जरी की नौबत आन पड़ी। एक व्यक्ति को उसकी आँखों से दिखाई नहीं दे रहा। 26 जनवरी की रात ARSA ने 25 रोहिंग्या ईसाई परिवारों पर हमले किए। यहाँ तक कि बांग्लादेश सरकार भी इस मामले में ईसाइयों का साथ नहीं दे रही है। पीड़ितों में महिलाएँ एवं बच्चे भी शामिल हैं।
इस मामले में अभी तक किसी को हमलावर को पकड़ा नहीं जा सका है। तीन रोहिंग्या ईसाइयों के परिवार अभी भी गायब हैं। दक्षिणी-पूर्वी बांग्लादेश के कुटुपलोंग में जहाँ ये हमला हुआ, वहाँ रोहिंग्या ईसाइयों के कई कैम्प हैं। पुलिस इसे हेट क्राइम न मान कर सामान्य आपराधिक वारदात बता रही है।
हाल ही में संयुक्त राष्ट्र की प्रतिनिधि यांगी ली ने पीड़ित रोहिंग्या ईसाइयों से मुलाक़ात की और उनके कैम्पों का दौरा किया। रोहिंग्या ईसाइयों के संगठन ने उम्मीद जताई है कि अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संस्थाएँ उनकी बातों को उठाएँगी।
उत्तर प्रदेश के उन्नाव से एसिड अटैक का मामला सामने आया है। यहाँ एक मुस्लिम युवती ने एकतरफा इश्क में हिंदू युवक पर तेजाब फेंक दिया। लड़की 5 महीने से लड़के का पीछा कर रही थी। जब लड़के ने इसकी शिकायत उसके पिता से करने को कही तो लड़की ने इस वारदात को अंजाम देने का मन बनाया। घटना की सूचना मिलने के बाद आरोपित युवती को हिरासत में ले लिया गया। उसके परिजनों से पूछताछ जारी है। जाँच के बाद सारी स्थिति स्पष्ट होगी। फिलहाल युवक को गंभीर हालत में अस्पताल में भर्ती कराया गया है। जहाँ उसका इलाज चालू है।
हिंदुस्तान के उन्नाव संस्करण में प्रकाशित संबंधित खबर
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार पुलिस ने इस मामले में बताया कि यह घटना मौरावां गाँव के नजदीक की है। जहाँ 25 वर्षीय रोहित यादव दूध डेयरी चलाता है। सोमवार देर रात करीब 2 बजे वह टैंकर में दूध डलवाने के बाद डेयरी में सफाई कर रहा था, तभी डेयरी के सामने रहने वाली 20 वर्षीय मुनीर वहाँ पहुँची और उसने उससे बल्ब बुझाने को कहा। पहले तो लड़के ने उसे घर जाने को कहा, लेकिन जब लड़की नहीं मानी तो उसने बल्ब बुझा दिया।
अंधेरा होते ही युवती ने युवक पर तेजाब फेंक दिया। जिससे उसका गला, कान, गर्दन व पीठ गंभीर रूप से झुलस गए। घटना को अंजाम देने के बाद मुनीर वहाँ से भाग निकली। मगर लड़का वहीं चिल्लाता रहा। गंभीर रूप से घायल रोहित को पहले पड़ोसियों ने मदद की और फिर उसने स्वजनों को पूरी घटना बताई। घरवालों ने यूपी-112 पर सूचना देने के बाद रोहित को लेकर लखनऊ ले गए। सूचना के बाद सीओ एमपी शर्मा के साथ पुलिस की टीम ने पड़ताल की।
दैनिक जागरण के उन्नाव संस्करण में प्रकाशित संबंधित खबर
जानकारी के अनुसार युवक का कुसूर सिर्फ इतना था कि उसने युवती के प्रेम प्रस्ताव से इनकार कर घर वालों से शिकायत करने की बात की थी। जो मुनीर को रास नहीं आई। दैनिक जागरण के अनुसार, अब तक की पूछताछ में युवती ने बताया कि 5 माह से वह युवक से प्रेम का इजहार कर रही थी। घर से निकलने और डेयरी तक उसका पीछा करती रहती थी। कई बार डेयरी पर जाकर उससे प्रेम का इजहार भी किया लेकिन उसने हर बार मना करते हुए भाग जाने को कहा। इससे गुस्से में आकर उसने युवक पर तेजाब फेंकने का मन बना लिया था।
सीओ पुरवा एमपी शर्मा ने बताया कि एसिड अटैक करने वाली युवती ने पूछताछ में बताया कि है कि उसके प्यार के इजहार को युवक मानने को तैयार नहीं था। बर्तन साफ करने के बहाने पड़ोस में रहने वाली लड़की से एसिड भी लड़के के घर से मँगवाया था। पीड़ित युवक के पिता की तहरीर पर आरोपित युवती के खिलाफ एसिड अटैक की धारा में रिपोर्ट दर्ज की गई है।
अमिताव घोष ने लिखा है- कोई नहीं जानता, कोई जान भी नहीं सकता, अपनी स्मृतियों में भी नहीं, क्योंकि काल के गर्भ में कुछ ऐसे क्षण होते हैं जो जाने भी नहीं जा सकते।
मारीचझापी की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। बकौल दलित लेखक मनोरंजन व्यापारी यह एक ऐसा नरसंहार है, जिसने सुंदरबन के बाघों को आदमखोर बना दिया। आजाद भारत का सबसे भीषण नरसंहार जिसमें मार डाले गए हिंदू शरणार्थियों की संख्या को लेकर यकीनी तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता। सरकारी फाइलों में 10 मौतें जो अलग-अलग आकलनों में 10 हजार तक पहुॅंचती है। जो मारे गए उनमें ज्यादातर दलित (नामशूद्र) थे। जिनकी शह पर नरसंहार हुआ, वह दलितों के वोट से बंगाल में दशकों तक राज करने वाले वामपंथी थे। नरसंहार और उसे इतिहास के पन्नों से मिटा देने की साजिश को जिसकी मौन सहमति हासिल थी, वह कॉन्ग्रेस थी। वही, कॉन्ग्रेस जिसने मंगलदोई में समुदाय विशेष की घुसपैठ इस तेजी से करवाई कि जनसंख्या वृद्धि के सभी सिद्धांत धाराशायी हो गए और जिसके विरोध में असम आंदोलन की लौ फूटी।
1979 के इस नरसंहार के पन्नों को खोलने से पहले जरा नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के विरोध के नाम पर हो रही हिंसा के किरदारों पर गौर करें। मजहबी उन्मादी भीड़, उसके बीच खड़ा दलितों का मसीहा बनने को आतुर भीम आर्मी का चीफ चंद्रशेखर आज़ाद उर्फ रावण, पर्दे के पीछे से साजिश रचते कॉन्ग्रेसी और वामपंथी। हिंदुत्व की कब्र खुदने के नारों के बीच ‘जय भीम-जय मीम’ की वही फुसफुसाहट, जिसने जोगेंद्रनाथ मंडल को 72 साल पहले धोखा, विश्वासघात और पश्चाताप के सिवा कुछ भी नहीं दिया था।
सो, हैरत नहीं कि खुशी सिंह ट्विटर पर लिखती हैं, “मैं दलित हूॅं। ज्यादातर बांग्लादेशी और पाकिस्तानी हिंदू दलित हैं। पाकिस्तान और बांग्लादेश के दलित शरणार्थियों को नागरिकता देने के विरोध में जामा मस्जिद पर हो रहे प्रदर्शन में चंद्रशेखर आजाद क्या कर रहा है? कौन इसे दलित नेता कहता है?”
I am a Dalit (Chamar), Most of the Bangladesh and Pakistani hindus are DALITS
What the fuck that PIG Chandrasekhar Azad doing in Jama Masjid and protesting against citizenship to DALITS of Pak and Bangladesh
Who call that pig a DALIT LEADER ? That pig is not my leader.
खुशी जैसों की बात में दम है, क्योंकि पाकिस्तान के ज्यादातर हिंदू शरणार्थी मेघवाल, भील, कोली, बलाई जैसी जातियों से हैं। बांग्लादेशी नामशूद्र हैं। ऐसे में वह कानून जो पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के प्रताड़ित अल्पसंख्यक शरणार्थियों को नागरिकता देने का मार्ग प्रशस्त कर सकता है, कैसे दलित विरोधी हो सकता है? इस सवाल का जवाब आप जब तलाशते हैं तो जड़ें मरीचझापी के नरसंहार में मिलती हैं।
हालॉंकि बंगाल में अपने तीन दशक के शासनकाल में वामपंथियों ने जो खूनी खौफ कायम किया उसका ही असर है कि बमुश्किल चार दशक पुरानी इस घटना का ज्यादा ब्यौरा नहीं मिलता। अमिताव घोष की किताब ‘द हंग्री टाइड्स’ की पृष्ठभूमि यही नरसंहार है। इसके अलावा आनंद बाजार पत्रिका और स्टेट्समैन जैसे उस समय के अखबारों में इस घटना का एकाध विवरण मिलता है। लेकिन, इसका सबसे खौफनाक और प्रमाणिक विवरण पत्रकार दीप हालदार की किताब ‘द ब्लड आइलैंड’ में है, जो इसी साल प्रकाशित हुई है। दीप ने इस नरसंहार में जीवित बच गए लोगों और इससे जुड़े अन्य किरदारों के मार्फत उस खौफनाक घटना का विवरण पेश किया है।
किताब में एक प्रत्यक्षदर्शी के हवाले से कहा गया है, “14-16 मई के बीच आजाद भारत में मानवाधिकारों का का सबसे खौफनाक उल्लंघन किया गया। पश्चिम बंगाल की सरकार ने जबरन 10 हजार से ज्यादा लोगों को द्वीप से खदेड़ दिया। बलात्कार, हत्याएँ और यहॉं तक की जहर देकर लोगों को मारा गया। समंदर में लाशें दफन कर दी गईं। कम से कम 7000 हजार मर्द, महिलाएँ और बच्चे मारे गए।”
साभार: दीप हालदार की किताब ‘द ब्लड आइलैंड’
आप जानकर हैरत में रह जाएँगे कि वाम मोर्चे की सरकार ने जिनलोगों की हत्याएँ कि उन्हें यहॉं बसने के लिए भी उसने ही प्रोत्साहित किया था। यह तब की बात है जब वामपंथी सत्ता में नहीं आए थे और हिंदू नामशूद्र शरणार्थी उन्हें अपना शुभेच्छु मानते थे। वामदलों की शह पर खासकर, राम चटर्जी जैसे नेताओं के कहने पर ये नामशूद्र शरणार्थी दंडकारण्य से आकर दलदली सुंदरबन डेल्टा के मरीचझापी द्वीप पर बसे। अपने पुरुषार्थ के बल पर बिना किसी सरकारी मदद के इस निर्जन द्वीप को उन्होंने रहने लायक बनाया। खेती शुरू की। मछली पकड़ने लगे। स्कूल, क्लीनिक तक खोल लिए।
नामशूद्र दलित हिंदुओं का यह समूह उस पलायन का एक छोटा सा हिस्सा था, जो बांग्लादेश में प्रताड़ित होने के बाद भारत के अलग-अलग हिस्सों में बसे। लेकिन, सत्ता में लौटने के बाद वामपंथियों को ये बोझ लगने लगे। एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक जनवरी 1979 में मरीचझापी द्वीप पर बांग्लादेश से आए करीब 40,000 शरणार्थी थे। वन्य कानूनों का हवाला दे वामपंथी सरकार ने उन्हें यहॉं से खदेड़ने का कुचक्र रचा। 26 जनवरी को मरीचझापी में धारा 144 लागू कर दी गई। टापू को 100 मोटर बोटों ने घेर लिया। दवाई, खाद्यान्न सहित सभी वस्तुओं की आपूर्ति रोक दी गई। पीने के पानी के एकमात्र स्रोत में जहर मिला दिया गया। पाँच दिन बाद 31 जनवरी 1979 को पुलिस फायरिंग में शरणार्थियों का बेरहमी से नरसंहार हुआ। प्रत्यक्षदर्शियों का अनुमान है कि इस दौरान 1000 से ज्यादा लोग मारे गए। लेकिन, सरकारी फाइल में केवल दो मौत दर्ज की गई।
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार उच्च न्यायालय के आदेश पर 15 दिन बाद रसद आपूर्ति की अनुमति लेकर एक टीम यहाँ गई थी। इसमें जाने-माने कवि ज्योतिर्मय दत्त भी थे। दत्त के अनुसार उन्होंने भूख से मरे 17 व्यक्तियों की लाशें देखीं।
बावजूद इसके करीब 30,000 शरणार्थी मरीचझापी में अभी भी थे। मई 1979 में इन्हें खदेड़ने पुलिस के साथ वामपंथी कैडर भी पहुॅंचे। 14-16 मई के बीच जनवरी से भी भीषण कत्लेआम का दौर चला। ‘ब्लड आइलैंड’ में इस घटना का बेहद दर्दनाक विवरण दिया गया है। मकान और दुकानें जलाई गईं, महिलाओं के बलात्कार हुए, सैंकड़ों हत्याएँ कर लाशों को पानी में फेंक दिया गया। जो बच गए उन्हें ट्रकों में जबरन भर दुधकुंडी कैम्प में भेज दिया गया। इस किताब में मनोरंजन व्यापारी के हवाले से बताया गया है कि लाशें जंगल के भीतरी इलाकों में भी फेंके गए और सुंदरबन के बाघों को इंसानी गोश्त की लत गई।
लेकिन, मरीचझापी को न तो वामदलों ने मुद्दा बनने दिया और न कॉन्ग्रेस ने इन दलितों की फिक्र की। वह तो इसी वक्त मुस्लिम घुसपैठियों को मंगलदोई में बसाने में जुटी थी। अपनी किताब ‘द लास्ट बैटल आफ सरायघाट’ में रजत सेठी और शुभ्राष्ठा ने लिखा है कि इमरजेंसी के बाद हुए 1977 के चुनावों में असम में कॉन्ग्रेस को 14 में से 10 सीटें मिली। तीन सीटें जनता पार्टी को मिली थीं। इनमें एक सीट मंगलदोई की थी। इस सीट पर जनता पार्टी के हीरा लाल पटवारी (तिवारी) चुनाव जीते थे। मंगलदोई लोकसभा क्षेत्र में 5,60, 297 मतदाता थे। एक साल बाद हीरा लाल की मौत हो गई तो उपचुनाव कराया गया। महज़ एक साल से थोड़े से अधिक समय में जब मतदाता सूची (वोटर लिस्ट) अपडेट की गई तो मतदाताओं की यह संख्या 80,000 बढ़ गई! यानी रातों-रात 15% की एकाएक वृद्धि! इनमें से लगभग 70,000 मतदाताओं का मजहब इस्लाम था। तमाम नागरिक समूहों ने इसके विरुद्ध शिकायतें दर्ज कराईं। ऐसे मामलों की संख्या भी लगभग 70 हज़ार थी, इनमें से 26 हज़ार ही टिक पाए। यहीं से भारतीय राजनीति में ‘अवैध बांग्लादेशी’ शब्द आता है, जिसका बड़ा हिस्सा बांग्लादेशी मुस्लिमों का है। इनके लिए ही आज ममता बनर्जी जैसी नेता राजनीतिक स्वार्थों की वजह से ढाल बनकर खड़ी नजर आ रहीं हैं।
साभार: द लास्ट बैटल आफ सरायघाट
वैसे, ‘जय भीम-जय मीम’ के नाम पर दलित हिंदुओं को छलने का सिलसिला गुलाम भारत से ही शुरू हो जाता है। जोगेंद्रनाथ मंडल भी इसी छलावे के शिकार हुए थे। यह मंडल ही थे जिनके कारण बांग्लादेश का सयलहेट पाकिस्तान में चला गया था। 3 जून 1947 की घोषणा के बाद असम के सयलहेट जिले को मतदान से ये तय करना था कि वो पाकिस्तान का हिस्सा बनेगा या भारत का। उस इलाके में हिन्दुओं और मुस्लिमों की जनसंख्या लगभग बराबर थी। चुनाव में नतीजे बराबरी के आने की संभावना थी। जिन्ना ने मंडल को वहाँ भेजा। दलितों का मत, मंडल ने पाकिस्तान के समर्थन में झुका दिया।
देश के विभाजन के बाद फौरी तौर पर मंडल को इसका इनाम भी मिला। वे पाकिस्तान के पहले कानून मंत्री और श्रम मंत्री थे। सन 1949 में जिन्ना ने उन्हें कॉमनवेल्थ और कश्मीर मामलों के मंत्रालय की जिम्मेदारी भी सौंप दी थी। लेकिन जब पाकिस्तान में हिन्दुओं पर अत्याचार शुरू हुए तो मंडल बेबस हो गए। बलात्कार आम बात थी। हिन्दुओं की स्त्रियों को उठा ले जाना मंडल की नजरों से भी छुपा नहीं था। वो बार-बार इन पर कार्रवाई के लिए चिट्ठियाँ लिखते रहे। इस्लामिक हुकूमत को ना उनकी बात सुननी थी, ना उन्होंने सुनी। हिन्दुओं की हत्याएँ होती रहीं। जमीन, घर, स्त्रियाँ लूटी जाती रहीं। कुछ समय तो मंडल ने प्रयास जारी रखे। आखिर उन्हें समझ आ गया कि उन्होंने किस पर भरोसा करने की मूर्खता कर दी है। जिन्ना की मौत होते ही 1950 में वे भारत लौट आए और 5 अक्टूबर 1968 को गुमनामी की मौत मर गए।
मंडल से लेकर आज तक का इतिहास गवाह है कि ‘जय भीम-जय मीम’ की ओट में दलित हमेशा छले ही जाते रहे हैं। भले रावण जैसा कोई फौरी तौर पर अपना कद ऊँचा कर ले, लेकिन भीड़ दलितों के नाम पर अपने मजहबी उन्माद को छिपा लेती है। दलितों के सहारे सत्ता में आ कॉन्ग्रेसी और वामपंथी हर बार उनकी ही लाशों पर चढ़ ‘मीम’ का तुष्टिकरण करते हैं। आज CAA विरोध के नाम पर जो कुछ दिख रहा है वह भी इससे अलग नहीं है। आखिर, आंबेडकर ने यूॅं ही नहीं कहा था, “वतन के बदले क़ुरान के प्रति वफादार हैं मुस्लिम। वो कभी हिन्दुओं को स्वजन नहीं मानेंगे।”
झारखंड के लोहरदगा में सीएए के समर्थन में हुई रैली पर मुस्लिमों ने हमला किया। इस दौरान घायल हुए नीरज राम प्रजापति की 5 दिनों तक ज़िंदगी और मौत से जूझने के बाद मौत हो गई। उनकी पत्नी दिव्या कुमारी ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को पत्र लिख कर अपने पति की मौत में न्याय करने और परिवार के भरण-पोषण में मुआवजा देने की माँग की लेकिन मंगलवार को सीएम दिन भर मंत्रिमंडल विस्तार में व्यस्त रहे। उलटा पुलिस प्रशासन परिजनों पर दबाव बनाता रहा कि वो नीरज के बाथरूम में गिर कर घायल होने की बात कहें और इसे ही मृत्यु का कारण बताएँ। स्थानीय हिंदूवादी नेताओं ने आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री के इशारे पर मामले में लीपापोती की जा रही है।
अब ताज़ा सूचना आई है कि नीरज राम प्रजापति की अंतिम यात्रा में शामिल लोगों की संख्या प्रशासन ने डिसाइड की है। इसमें 35 से ज्यादा लोगों को शामिल नहीं होने दिया गया। राँची से लेकर लोहरदगा तक कई लोग अंतिम यात्रा में शामिल होना चाहते थे लेकिन उन्हें ‘माहौल बिगड़ने की आशंका’ के कारण रोक दिया गया। ‘हिन्दू जागरण मंच’ ने भी प्रशासन के इस व्यवहार को लेकर आक्रोश जताया। गुरुवार (जनवरी 28, 2020) की देर शाम नीरज के पार्थिव शरीर को लोहरदगा लाया गया।
क्षेत्र के पारंपरिक श्मशान में नीरज प्रजापति का अंतिम संस्कार नहीं करने दिया गया क्योंकि रास्ते में मस्जिद पड़ती है। क़रीब पौने 8 बजे बॉडी घर पहुँची और सवा 8 में अंतिम संस्कार के लिए रवाना कर दी गई। परिजनों ने ऑपइंडिया से बात करते हुए आरोप लगाया कि पुलिस व प्रशासन ने जल्दी-जल्दी अंतिम संस्कार कराने के चक्कर में धार्मिक रीति-रिवाज भी पूरा नहीं करने दिया। जबरदस्ती रात में ही दाह संस्कार करने का दबाव बनाया गया। मृतक के एक पड़ोसी ने पुलिस के इस रवैए को लेकर आक्रोश जताया।
झारखंड सरकार पर इस मामले में तानाशाही रवैया अपनाने के आरोप लग रहे हैं। किसी भी पत्रकार को अंतिम संस्कार या अंतिम यात्रा के दौरान फोटो लेने की अनुमति नहीं दी गई। एक स्थानीय पत्रकार ने ऑपइंडिया से कहा कि पुलिस ने उनका कैमरा तोड़ डालने की धमकी दी। अंतिम यात्रा के दौरान लोगों को छत से देखने की इजाजत भी नहीं दी गई। फिर भी कई लोगों ने खिड़कियाँ खोल कर नीरज प्रजापति के पार्थिव शरीर का अंतिम दर्शन किया।
Raghu – BJP leader in Trichy was hacked to death
Neeraj Ram Prajapati, died during deadly Islamist attack @ Lohardaga
Ved (doctor) was removed from his job in Kerala
All for taking a Pro-CAA Stance.
But, democracy is not in Danger until a Jeehadi is booked for burning Bus.
पुलिसिया हूटर की आवाज़ में अंतिम यात्रा निकाली गई। क़रीब 2 बस और 8 छोटे वाहनों में मुस्तैद पुलिस अंतिम यात्रा के दौरान माइक से लगातार अनाउंसमेंट कर रही थी। मृतक नीरज के पड़ोसियों ने बताया कि इस दौरान क्षेत्र में काफ़ी भय का माहौल रहा।
वहीं लोहरदगा के सांसद सुदर्शन भगत ने ऑपइंडिया से बातचीत के दौरान बताया कि वो इस मामले को संसद में उठाएँगे। पत्थरबाजी और हिंसा करने वाले लोगों की पहचान के बारे में बोलते हुए भागत ने कहा कि पूरे देश में कौन ऐसा करते हैं, ये सभी को पता है। सुदर्शन भगत ने कहा कि जब से हेमंत सरकार सत्ता में आई है, पूरे झारखंड में कत्लेआम व अपराध आम बात हो गई है।