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जब विवेकानंद ने कहा- संन्यासी हूँ तो क्या हृदय की कोमलता का भी त्याग कर दूँ

लगभग सभी के मन में महान हो जाने की अभिलाषा कहीं न कहीं दबी होगी। हर कोई जानने को इच्छुक होगा कि ऐसा क्या है जो हमें ‘लार्जर दैन लाइफ’ वाली फ़ीलिंग दे जाए।

चाहे वह बुद्ध हो, विवेकानंद या फिर गाँधी। अक्सर हमें किसी महापुरुष का उजला, चमत्कृत पक्ष ही दिखाया, बताया या सुनाया जाता है। उनके असली संघर्षो को छिपा दिया जाता है या उस पर इतना पर्दा डाल दिया जाता है कि सच स्वतः विकृत हो जाता है। किसी महापुरुष या महामानव को जानने का सबसे श्रेष्ठ उपाय क्या हो सकता है? बेहतर तो यही है कि उन लोगों द्वारा लिखित या मुख द्वारा निःसृत वाणियाँ। यह सब अगर उपलब्ध हो तो दूसरों के कहे का कोई मतलब नहीं होता पर अफ़सोस इस बात का है कि देश के बहुतेरे महामानवों ने अपने बारे में कुछ नहीं लिखा। यहाँ तक कि उन लोगों द्वारा लिखी गई चिट्ठियाँ भी उपलब्ध नहीं हैं। इसलिए सुनी-सुनाई बातों के आलावा हमें खास कुछ उपलब्ध नहीं होता।

आज विवेकानंद के जन्म दिवस पर उनके जीवन की उन घटनाओं के बारे में बताने जा रहा हूँ जो मृत्यु-पर्यंत उन्हें व्यथित करती रहीं। विवेकानंद सदा मानवता के कल्याण के प्रति चिंतित रहे। एक महामानव “महायोगी” विवेकानंद की कहानी का वह हिस्सा जो बहुत कम कहा गया है।

स्वामी विवेकानंद का जीवन बहुत लंबा न होने के बावजूद, सौभाग्य से विभिन्न समय पर लिखे गए पत्रों, संस्मरणों, लेखों और हँसी-ठिठोली से हम वंचित नहीं हुए हैं। खास बात ये है कि उनके लिखे कई पत्र, संस्मरण आज उनके न रहने के लगभग एक शताब्दी के बाद भी कई नए रहस्य उद्घाटित कर रहे हैं।

किशोरावस्था से ही सत्य की तलाश में भटकन और जवानी की शुरुआत में ही संन्यास लेने वाले विवेकानंद की यह कहकर ख़ूब मज़ाक उड़ाया जाता है कि स्वामीजी ने जीवन संघर्ष से भागकर, अभावों के कारण सन्यास ले लिया।

ये उलाहना अनायास नहीं था। सिद्धार्थ गौतम से लेकर वर्धमान महावीर तक, ऐसे कई राजपुत्र थे, जो संसार से ऊबकर, राजसी वैभव छोड़कर आत्मज्ञान या सत्य की ख़ोज में महल छोड़ वन, नदी, पहाड़ भटकने लगे। पलट कर ये भी नहीं सोचा कि हमारे बाद हमारे परिवार का क्या होगा?

किन्तु नरेंद्र नाथ (विवेकानंद) के साथ संयोग कुछ अलग था। कलकत्ते में 3 नंबर गौरमोहन मुखर्जी स्ट्रीट पर उनकी विशाल पुस्तैनी कोठी थी। पिता विश्वनाथ दत्त कलकत्ते के बहुत ही मशहूर बैरिस्टर थे। परिवार बेहद संपन्न था।

किंतु विडम्बना ने उन्हें भी नहीं छोड़ा, सुख के दिन जल्द ही दुर्दिन में बदल गए। 23 फ़रवरी वर्ष 1884 के दिन जब उनके पिता कलकत्ते में फ़ैले अकाल की भेंट चढ़ गए तो परिवार विपदाओं से घिरता गया। पिता की मृत्यु के बाद ही उनके विस्तृत परिवार में घमासान छिड़ गया था। उनके सगे-सम्बन्धियों ने ही उनके परिवार पर कई मुकदमे ठोक दिए थे। पुलिसिया तलाशी में उनकी पारिवारिक जानकारियों के न जाने कितने दस्तावेज़ ग़ायब हो गए। विवादों और मुकदमे के फलस्वरूप पारिवारिक बँटवारे ने जल्द ही उनके परिवार को आर्थिक रूप से तोड़ दिया। पति की मृत्यु के बाद उनकी माता भुवनेश्वरी देवी घर का ख़र्च चलाने की बमुश्क़िल कोशिश करती रहीं, जो नाकाफ़ी था।

जब विवेकानंद के पिता परलोकवासी हुए थे, उस समय उनकी उम्र लगभग 21 वर्ष थी। और घर में सबसे बड़े बेटे वही थे, उनसे बड़ी उनकी दो बहने थी। जिनमें से स्वर्णमयी 1932 तक जीवित रहीं। नरेंद्र नाथ अपने माता-पिता की कुल 14 संतानों में से छठे थे। विश्वनाथ दत्त और भुवनेश्वरी देवी की पहली तीन संतानों के नाम आज भी नहीं जान पाए हैं क्योंकि पैदा होते ही या बाल्यकाल में ही उनकी मृत्यु हो गई थी। दो अन्य पुत्रियाँ किरणबाला 18 की उम्र में और हरिमणि 22 की आयु में चल बसीं। पिता की मृत्यु के समय परिवार में स्वर्णमयी दीदी ही उनसे बड़ी थीं। नरेंद्र नाथ के दो और छोटे भाई, महेंद्रनाथ तब 15 के थे और भूपेंद्रनाथ तो अभी 3 वर्ष के बालक ही थे। कौन जानता था कि आगे चलकर महेंद्रनाथ एक बड़े लेखक और भूपेंद्रनाथ स्वतंत्रता सेनानी बनने वाले हैं? आम परिवारों की तरह अभाव सिर पर था और उससे परिवार को निकाल लेने की ज़िम्मेदारी नरेंद्र पर।

वर्ष 1881 में दक्षिणेश्वर में स्वामी रामकृष्ण परमहंस से भेंट के बाद से ही नरेंद्र नाथ का मन विचलित होकर, संसार और वैराग्य के बीच झूलने लगा था। इसी आत्मसंघर्ष में 1884 से 1886 तक के दो वर्ष बीत गए। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि क्या करें। एक तरफ़ सत्य की ख़ोज तो दूसरे तरफ़ खस्ता हाल परिवार! उनके सामने प्रश्न था – क्या परिवार को भूखे मरने को छोड़ दें? क्या खुद के बारे में सोचना उचित है, जब घर में खाने के भी लाले पड़े हों? ऐसी दुविधा का सामना कभी सिद्धार्थ गौतम या वर्धमान महावीर को नहीं करना पड़ा।

इन दो वर्षों में नौकरी की तलाश में, वे आवेदन लेकर दर-दर भटके। ईश्वरचंद्र विद्यासागर के सुविख्यात ‘मेट्रोपोलिटन इंस्ट‍िट्यूशन’ की एक शाखा जब सिद्धेश्वर लेन, चांपातला में खुली तो नरेंद्र नाथ ने वहाँ नौकरी के लिए आवेदन किया। नौकरी मिल भी गई। स्कूल के सेक्रेटरी विद्यासागरजी के जमाई थे। लेकिन नरेंद्रनाथ से किसी बात पर उनका विवाद हो गया तो उन्होंने नौवीं और दसवीं के छात्रों से कहलवा दिया कि उन्हें पढ़ाना ही नहीं आता! स्वयं विद्यासागरजी तक शिक़ायत पहुँची तो उन्होंने कह दिया कि नरेंद्र को कल से नौकरी पर नहीं आना है।

जिस मेधावी नरेंद्र की कीर्ति विवेकानंद के रूप में पूरी दुनिया में एक विश्वशिक्षक और उपदेशक के रूप में छा जाने वाली थी, संसार जिसकी यश-पताका फ़हराने वाला था, उन्हें स्कूली छात्रों ने यह कहकर ख़ारिज़ कर दिया कि वे पढ़ाना नहीं जानते! और दूसरे यह कि ईश्वरचंद्र विद्यासागर जैसे महामानव से भी अभावग्रस्त नरेंद्रनाथ के पेट पर लात मारने का महापाप जाने-अनजाने हो गया था।

इसके बाद नरेंद्र नाथ को किसी ज़मींदारी कार्यालय में नौकरी मिल गई। परन्तु मार्च 1885 में वह नौकरी भी छोड़ दी। रामकृष्ण परमहंस को जाकर बताया, “ठाकुर, यह नौकरी भी छोड़ आया हूँ! परमहंस ने कहा: “ठीक किया, ठीक ही तो किया!” नरेंद्र! तेरा जन्म कुछ और करने के लिए हुआ है, तू कहाँ फँसा है ऐसे कामों में।”

परिवार पर चल रहे दीवानी मुक़दमे के दौरान 8 मार्च 1887 को कलकत्ता हाई कोर्ट में नरेंद्र नाथ की पेशी हुई। अंग्रेज़ बैरिस्टर साहब ने नरेंद्र नाथ से उनकी उम्र पूछी। नरेंद्र ने कहा, “होगी कोई तेइस चौबीस बरस!” पेशा पूछा तो उत्तर दिया, “बेकार हूँ! पिछले आठ महीने से मैं कुछ नहीं करता।” अब बैरिस्टर साहब ने उलाहना देते हुए कहा, “तुम किसी के चेला बन गए हो?” नरेंद्र ने उत्तर दिया, “आपका प्रश्न मेरे समझ में नहीं आया, मुझे नहीं मालूम कि चेला क्या होता है!” फिर नरेंद्र ने कहा, “मैंने कभी किसी भिक्षाजीवी साधु की चेलागीरी जैसा कोई कार्य कभी नहीं किया!” पिता की मृत्यु के बाद नरेंद्र के जीवन के वे दो वर्ष ऐसे ही घोर अपमान, उलाहना और कटाक्ष से भरे हुए बहुत ही पीड़ादाई थे।

स्वामी जी का जीवन कई बार संकट में नज़र आया। अनाहार, लम्बी भटकन, जहाँ-तहाँ पड़े रहना, कई बार उन्होंने खुद का जीवन संकट में डाला। तभी शंकर का ‘विवेकचूड़ामणि’ उन्होंने पढ़ा। शंकर ने कहा था : “मनुष्यत्व मुमुक्ष्यत्व: महापुरुष संश्रय।” यानी मनुष्य जाति, आत्मबोध की चाह और महान लोगों का साहचर्य, ये तीनों बातें कभी एक साथ, अकारण नहीं होतीं। और जब वैसा हो तो सत्य की खोज में प्राण-प्रण से जुट जाना चाहिए। नरेंद्र ने मन ही मन सोचा, “जाने कितने युगों के बाद मिला यह जीवन, क्या क्लर्क और टीचर की नौकरी करके ही गँवा दूँ? नहीं, यह संभव नहीं है। ठाकुर ठीक कहते हैं। मुझे कुछ और ही करना है अब वही करूँगा, जो माँ (काली) ने तय किया है।” तब जाकर वर्ष 1886 में उन्होंने संन्यास ले लिया।

वैसी ही किसी मनोदशा में तब विवेकानंद ने हरिदास देसाई को पत्र लिखकर कहा था, “आप मेरी दुखिनी माँ से मिलने गए, मुझे बहुत प्रसन्नता हुई। एक तरफ़ भारतवर्ष के करोड़ों नर-नारियों का दु:ख है, दूसरी तरफ़ आत्मीय स्वजनों की दुर्दशा, पीड़ा वेदना। ठाकुर के कहने पर मैंने संन्यास का पथ चुना है। आगे माँ काली ही मेरी रक्षा करेंगी!”

संन्यासी से आमतौर पर हम वैराग्य की अपेक्षा रखते हैं लेकिन नरेंद्र ने अपने मानवीय रूप को कभी नहीं छिपाया। विवेकानंद की एक बहन योगींद्रबाला ने पारिवारिक कलह से तंग आकर आत्महत्या कर ली थी। उसकी मृत्यु का समाचार मिलने पर विवेकानंद फूट-फूट कर रोने लगे, तो किसी ने टोका, “संन्यासी को ऐसा दुःख का प्रदर्शन शोभा नहीं देता!” इस पर विवेकानंद ने उत्तर दिया, “संन्यासी हूँ तो क्या अपने हृदय की कोमलता का भी त्याग कर दूँ? तो शेष ही क्या रहेगा।” उन्हें अपने परिवार के लिए कुछ न कर पाने का गहरा मलाल था, जिसका ज़िक्र उन्होंने कई बार परमहंस से भी किया था।

Vivekanand letter
खेतड़ी के महाराज को विवेकानंद का पत्र ( साभार-बेलूर मठ )

अतिविख्यात होने के बाद भी, परिवारिक चिंता और सत्य की ख़ोज का दायित्व, इस द्वन्द में विवेकानंद आजीवन पिसते रहे। विशेषकर माँ के प्रति उनकी चिन्ता ज़्यादा थी। इसके लिए याचना में हाथ फैलाने से भी उन्होंने संकोच नहीं किया। 1891 से ही महाराजा अजीत सिंह ने उनके परिवार का दायित्व संभाल रखा था। 100 रुपए मासिक उनके परिवार को भरण-पोषण के लिए मिलता था। 1 दिसंबर 1898 को खेतड़ी के महाराज को पत्र लिखकर विवेकानंद ने कहा, “मेरे रोग का ख़र्च आपको और अधिक दिन तक नहीं उठाना होगा क्योंकि अब मैं अधिक दिनों का मेहमान नहीं हूँ। किंतु आज मैं असहाय होकर आपसे निवेदन करता हूँ कि माँ को, परिवार के भरण-पोषण के लिए हर माह सौ रुपयों की जो आर्थिक सहायता आप भेजते हैं, उसे मेरी मृत्यु के बाद भी जारी रखें!”  

आज एक बार फिर वो खुद को असहाय पा रहे थे। गुरुभाई भी परिव्राजक ही थे। वो भी उनके परिवार के लिए कुछ नहीं कर सकते थे। दुर्भाग्य ने यहाँ भी उनका पीछा नहीं छोड़ा। स्वयं खेतड़ी के महाराज, विवेकानंद से पूर्व ही 1901 में स्वर्ग सिधार गए। खेतड़ी के महाराज ने ही नरेंद्र को पहली बार ‘विवेकानंद’ कहा था।

संसार संन्यासी को देखता है। संसार महायोगी का नाम जपता है। ‘विवेकानंद’ कहकर जयघोष करता है। किंतु इस महायोगी का जीवन कितना दारुण था – अंत समय में उन्हें कई रोगों ने जकड़ लिया था, जीवन भर अभावों में उनका जीवन बीता, संन्यस्त हो कर अपने परिवार के लिए कुछ न कर पाने का उन्हें गहरा अपराधबोध था।

फिर भी, क्षीण शरीर के बाद भी संतोष इस बात का कि शरीर भले ही चालीस की वय भी न पार कर पाए पर संसार को जो कुछ भी दे कर जा रहा हूँ, वो हज़ार वर्षों की ख़ुराक है।

मृत्यु को समीप जानकर, कहते हैं अगर अभी और एक विवेकानंद होता, तो वह समझ पाता कि विवेकानंद क्या कर रहें हैं। समय-समय पर अनगिनत विवेकानंद जन्म लेंगे।

जब-जब मृत्यु मेरे नज़दीक आती है, मेरी सारी कमज़ोरी चली जाती है। मैं खुद को मृत्यु के लिए प्रस्तुत करने को तैयार हो जाता हूँ। वस्तु की असारता किसी के पकड़ में आई है, तो वह इन्सान मैं हूँ। जो यह सोचता है, वह जग़त का कल्याण करेगा, वह अहमक़ है। लेकिन अच्छा या बुरा काम करते रहना होगा। हमारे हर तरह के बन्धनों की परिसमाप्ति के लिए है। आशा करता हूँ, वह कार्य मैंने किया है। अब प्रभु मुझे संसार के उस पार ले जाएँ।

संसार सर्व-विख़्यात महायोगी विवेकानंद को याद रखता है, किंतु उनके जीवन के इन आत्मसंघर्षों को भुलाकर खुद विवेकानंद हो जाना चाहता है। जबकि सत्य तो यही है कि महामानव विवेकानंद की कोई भी महागाथा उनके जीवन की इन कथाओं को जाने बिना कभी भी पूर्ण नहीं हो सकती।

विवेकानंद को एक सच्चा मानव और एक महायोगी, दोनों ही रूप में एकसाथ देखें, तभी जाकर हम उनको और उनके विचारों को आत्मसात कर खुद भी महामानव होने के मार्ग पर अग्रसर कर पाएँगे। जीवन को उसकी सम्पूर्णता में जी पाएँगे। मानवता के कल्याण के लिए अपने तरफ से भी कोई योगदान दे पाएँगे।

डिस्क्लेमर: शंकर की लिखी पुस्तक ‘विवेकानन्द की आत्मकथा’ से दृष्टान्त लिए गए हैं

उत्तिष्ठत जाग्रत: ज्ञान रूपी अस्त्र के हिमायती थे स्वामी विवेकानंद

गाँधी नहीं, ऑरोबिन्दो-विवेकानंद के मापदण्ड पर तौलिए हिंदुत्व को

छपाक का बहिष्कार तालिबानी मानसिकता: फेसबुक पोस्ट पर उत्तर भारतीय का सिर मूँड़ने वाली शिवसेना

बॉलीवुड अभिनेत्री दीपिका पादुकोण अभिनीत फ़िल्म ‘छपाक’ तमाम विवादों के बीच अपने तय दिन यानी शुक्रवार (10 जनवरी) को सिनेमाघरों में रिलीज़ तो हो गई, लेकिन इससे जुड़ा विवाद अभी भी थमने का नाम नहीं ले रहा है। इस फ़िल्म के रिलीज़ होने से पहले अभिनेत्री दीपिका पादुकोण ने फ़िल्म के प्रमोशन का दाँव खेलते हुए मंगलवार (7 जनवरी) को JNU हिंसा में वामपंथी छात्रों से मिलकर एक विवाद को जन्म दे डाला था।

दरअसल, ऐसा करके दीपिका पादुकोण ने यह दिखा दिया था कि वो उन वामपंथी छात्रों के समर्थन में खड़ी थीं, जिन्होंने शीतकालीन सेमेस्टर के लिए पंजीकरण कराने वाले छात्रों के साथ न सिर्फ़ हिंसा की थी बल्कि सर्वर रूम पर क़ब्ज़ा कर पूरी पंजीकरण व्यवस्था को तहस-नहस कर दिया था। इसके अलावा, उन्होंने वामपंथी गुंडों द्वारा पीटे गए असली पीड़ितों की बजाए आरोपित आइशी घोष और उनके दोस्तों से मुलाक़ात की थी।

यह बात कई लोगों की इतनी नागवार लगी कि उन्होंने फ़िल्म छपाक का बहिष्कार करने का आह्वान किया। फ़िल्म का बहिष्कार करने वाले लोगों की निंदा करते हुए भगवा से लिबरल विचारधारा में तब्दील हुई शिवसेना ने कहा कि इस तरह का कृत्य ‘तालिबानी मानसिकता का प्रतिबिंब’ है।

आज का इंटरनेट युग कभी कुछ न भूलता है और न नहीं भूलने देता है। सोशल मीडिया के यूज़र्स ने शिवसेना को तुरंत आड़े हाथों लिया और पार्टी को ठग करार दिया।

नवंबर, 2017 में, दीपिका पादुकोण अभिनीत फ़िल्म पद्मावत की रिलीज़ से पहले, शिवसैनिकों ने फ़िल्म निर्माता संजय लीला भंसाली के पुतले जलाए थे और फ़िल्म पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की पुरज़ोर माँग की थी। वास्तव में, शिवसेना के ‘लिबरल’ बनने और कॉन्ग्रेस और एनसीपी से हाथ मिलाने के बावजूद पार्टी के कार्यकर्ताओं ने दिसंबर, 2019 में महाराष्ट्र में एक कन्नड़ फ़िल्म की स्क्रीनिंग रोक दी। इससे पहले भी कई बार शिवसेना ने फ़िल्मों की रिलीज़िंग पर हिंसक विरोध किए। इनमें मणिरत्नम की बॉम्बे, करण जौहर की माई नेम इज़ खान, आमिर खान की पीके सहित अन्य फ़िल्में शामिल हैं।

सोशल मीडिया के यूज़र्स ने शिवसेना को उस दौर की भी याद दिलाई, जब उन्होंने सार्वजनिक सम्पत्ति को नष्ट किया था।

अक्टूबर 1991 में, शिव सैनिकों ने पाकिस्तान के ख़िलाफ़ मोर्चा खोलते हुए और उसे देश में खेलने से रोकने के लिए मुंबई के वानखेड़े स्टेडियम की पट्टी तक खोद डाली थी। बता दें कि शिवसेना ने ऐसा केवल एक बार नहीं बल्कि कई बार किया, जब उन्होंने महाराष्ट्र के अंदर क्रिकेट मैचों को रोकने की न सिर्फ़ कोशिश की बल्कि वो उन्हें रोकने में सफल भी रही।

सोशल मीडिया के यूज़र्स ने शिवसेना को एक और घटना याद दिलाई कि कैसे उनके कार्यकर्ताओं ने हाल ही में एक उत्तर भारतीय का सिर जबरन मुँड़वा दिया था, क्योंकि उसने एक फेसबुक पोस्ट में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री और शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे की आलोचना की थी। बाद में, शिवसेना के गुंडों ने एक फेसबुक पोस्ट में उद्धव ठाकरे को ‘नालायक’ कहने के लिए एक सरकारी कर्मचारी पर हमला किया था।

15 जनवरी के बाद Chhapaak की रिलीज पर रोक: दिल्ली HC का आदेश – चलानी है मूवी तो करो एडिट

नहीं रिलीज़ होगी Chhapaak? जिस लड़की पर बनी फिल्म, उसी की वकील ने दायर की याचिका

‘छपाक’ की रियल स्टोरी: 15 साल की लक्ष्मी ने शादी से इनकार किया तो 32 साल के नईम ने तेजाब फेंका

वामपंथियों को कीमोथैरेपी देने वाले ऑपइंडिया के एक साल: न्यूजरूम की तरफ से आपका आभार

स्वामी विवेकानंद के जन्मदिवस के शुभ दिन पर ऑपइंडिया (हिन्दी) आम जनता तक खबरों का दूसरा (और लगभग गौण) पक्ष रखने के उद्देश्य से अस्तित्व में आया। लक्ष्य पूरी तरह से स्पष्ट था कि हमें इस गौण पक्ष की खाई को पाटना है, और ऐसे पाटना है कि लोगों में यह संदेश जाए कि चाटुकारिता और लैपडान्स वाली एकतरफा पत्रकारिता के मायाजाल को तोड़ने की मुहिम शुरू हो चुकी है।

इस एक साल में हमने 10,000 से ज़्यादा लेख लिखे, जिसे दो करोड़ से ज़्यादा बार पढ़ा गया। इसी बीच हमने सारे वामपंथी प्रोपेगेंडा पोर्टलों को नाकों चने चबवा दिए। जब हमने न सिर्फ विश्लेषण से, बल्कि ट्रैफिक के मामले में भी लगभग सारे हिन्दी पोर्टलों को पीछे छोड़ दिया, जो सिर्फ पोर्टल ही हैं, उनका टीवी चैनल या अखबार आदि नहीं है। यूट्यूब पर हमारे विडियो को काफी सराहा गया और पिछले नौ महीने में, जब से हम वहाँ सक्रिय हुए, एक करोड़ से ज्यादा बार हमारे विडियो को देखा गया, और लगभग छः करोड़ मिनट लोगों ने हमारे चैनल पर बिताए। फेसबुक पर हमारे कई विडियो एक मिलियन से ज़्यादा बार देखे गए हैं, और दिनों-दिन उनका औसत व्यू बढ़ता ही जा रहा है।

ये सारे आँकड़े बताते हैं कि आप सब हमारे पीछे कितनी मजबूती से खड़े हैं। बिना आपके सहयोग के, न तो ये पोर्टल चलता, न इसके लेख पढ़े जाते, न आप इसके लिंक प्रपंचियों के कमेंट में चिपकाते, न ही हर वामपंथी हमें गाली दे कर खारिज करने की कोशिश करता रहता। जब इस तरह के आक्रमण होने लगते हैं, इसका मतलब है कि किसी को दर्द हो रहा है। हमारी कोशिश है कि इस दर्द की तीव्रता बढ़ाते रहें।

हमारा लक्ष्य वामपंथी प्रोपेगेंडा को ध्वस्त करना है जो कि कैंसर बन कर इस समाज और राष्ट्र को खोखला करता रहा है। अब वो गर्त में जा रहे हैं, लेकिन हमें अपने उपचार की इंटेंसिटी कम नहीं करनी। इस जहरीले वामपंथ को कीमोथैरेपी दे कर हमें इतना कमज़ोर बनाना है कि अपने उड़ते बाल, गिरते नाखून और सूखती काया के साथ यह अपने अंत के दिन गिने।

हमने पत्रकारिता के बने-बनाए मानदंडों में से ‘पोलिटिकली करेक्ट’ होने और अपराधियों के ‘समुदाय विशेष’ के नाम पर छुपाने के प्रपंच को अलविदा कहा। ऐसा करना अत्यावश्यक था क्योंकि हमें चुनाव नहीं जीतने कि हम अपराधियों का बचाव करें। वो नेताओं का काम है, हमारा काम जो हो रहा है, जो कर रहा है, बिना मसाला लगाए, आप तक उसे उसकी विद्रूपता में पहुँचाना है। आतंकी समुदाय विशेष से है तो हम उसे ‘आतंक का मजहब नहीं होता’ के नाम पर डिफेंड नहीं करेंगे।

इस तरह की पत्रकारिता ने हमें अपनी चर्चाओं में कमज़ोर बनाया है। हमें एक तय तरीके से सोचने को विवश किया है। इसी को तोड़ना हमारी प्राथमिकता है। हम वामपंथियों की प्रायोजित भाषा की पत्रकारिता नहीं करते। हम चाशनी में शब्दों को नहीं लपेटते, जो है, कहते हैं। इसकी ज़रूरत इसलिए पड़ी क्योंकि इस मकड़जाल ने सूचनाओं और विश्लेषण को एक ही लीक पर चलने को मजबूर कर दिया था।

हमने लीक छोड़ी भी है, तोड़ी भी है। ऑपइंडिया इसी तरह की सशक्त पत्रकारिता करता रहेगा, और इस नैरेटिव को तोड़ता रहेगा जहाँ एक मजहब हमेशा पीड़ित की तरह दिखाया जाता है और दूसरा शोषक की तरह। जबकि इसके उलट इस मजहब के कई लोगों ने जो अपने विक्टिम कार्ड को भुना-भुना कर जो आतंक मचाया है, वो खुले में दिख रहा है।

हम उनके नाम लेंगे, उनके बाप का नाम लेंगे, वो कहाँ से मजहबी तालीम पाते हैं, ये भी बताएँगे। हम वामपंथियों के हर नैरेटिव पर प्रहार करेंगे, और बहुत ज़ोर से करेंगे। आप में से कई कहते हैं कि हमें इन्हें इग्नोर करना चाहिए। लेकिन हमारा मानना है कि समूल नाश ही बेहतर विकल्प है। इनके नैरेटिव के हर अक्षर, हर शब्द, हर वाक्य, हर अनुच्छेद, हर लेख, हर अध्याय और अंततः इनकी पूरी किताब को अम्लवृष्टि से जला देंगे।

पूरे साल अपना स्नेह हम तक पहुँचाने के लिए पूरी ऑपइंडिया टीम की तरफ से हम हर सदस्य की तरफ से आपको दसगुणा प्रेम लौटाते हैं। आप हमारे संबल हैं, हमारी पत्रकारिता का इंधन हैं, आप हमें चलायमान रखते हैं। उम्मीद है कि यह यात्रा चलती रहेगी, नए लीक बनाएगी, पुराने लीक तोड़ेगी।

धन्यवाद!

बच्चे पढ़ रहे- RSS मुस्लिम विरोधी: हाई कोर्ट ने कहा- किताब से निकालो आपत्तिजनक बात

मद्रास हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से 10वीं कक्षा की पुस्तक से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के बारे में कही गई आपत्तिजनक बातों हटाने का आदेश दिया है। बता दें कि 10वीं कक्षा के सामाजिक विज्ञान की पुस्तक में हिंदू सांप्रदायिकता, मुस्लिम सांप्रदायिकता और भारतीय राष्ट्रवाद टॉपिक के अंतर्गत कहा गया है कि “आरएसएस ने मुस्लिम विरोधी रुख अपनाया था”।

इसको लेकर चेन्नई RSS के सचिव चंद्रशेखरन ने याचिका दायर की थी। जिस पर सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट ने
शुक्रवार (जनवरी 10, 2019) को इस आपत्तिजनक हिस्से को पाठ्यपुस्तक से हटाने का निर्देश दिया। स्कूल शिक्षा विभाग की तरफ से इस पाठ्यपुस्तक को तमिल और अंग्रेजी दोनों संस्करणों में प्रकाशित किया गया है। चंद्रशेखरन ने इस याचिका के लिए तमिलनाडु सरकार के प्रमुख सचिव, स्कूल शिक्षा विभाग के निदेशक और तमिलनाडु पाठ्यपुस्तक एवं शिक्षा सेवा निगम के मैनेजिंग डायरेक्टर के साथ ही एससीईआरटी के डायरेक्टर को पक्षकार बनाया था।

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पाठ्यपुस्तक में आरएसएस के बारे में प्रकाशित आपत्तिजनक सामग्री (फोटो साभार:vinita hindustani)

याचिकाकर्ता चंद्रशेखरन के वकील डॉ. जी बाबू ने कोर्ट में दलील देते हुए कहा कि पाठ्यपुस्तक में सामग्री ऐसी दिखाई गई है जैसे कि स्वतंत्रता के लिए संघर्ष में आरएसएस ने मुस्लिम विरोधी रुख अपनाया हो और इसके परिणामस्वरूप देश का विभाजन हुआ। जबकि यह तथ्य पूरी तरह से गलत है। आरएसएस ने कभी भी किसी धर्म के खिलाफ कोई रुख नहीं अपनाया और धर्म के आधार पर देश के फैसले का विरोध किया।

उन्होंने आगे कहा कि पाठ्यपुस्तकों में प्रकाशित आपत्तिजनक सामग्री के माध्यम से स्कूली छात्रों के दिमाग में आरएसएस के बारे में इस तरह की गलत धारणा बनाई गई है। मसलन, आरएसएस एक ऐसा संगठन है जो मुस्लिमों के खिलाफ काम कर रहा है, जो कि पूरी तरह से गलत है।

बदले में प्रतिवादी ने कोर्ट के समक्ष अपनी बात रखते हुए कहा कि आपत्तिजनक सामग्री को पाठ्यपुस्तक से हटा दिया जाएगा। उनका कहना था कि इस तरह की प्रक्रिया पहले से ही चल रही है। कोर्ट ने प्रतिवादी पक्ष को इस बाबत एक हलफनामा दायर करने का निर्देश दिया है कि कैसे मौजूदा पाठ्यपुस्तकों में से आपत्तिजनक सामग्री को हटाया जा सकता है। इसके अनुपालन लिए 22 जनवरी 2020 तक का समय दिया गया है।

RSS की किस शाखा में जाते हो? राजस्थान की कॉन्ग्रेस सरकार ने कर्मचारियों से पूछा

कोलकाता में RSS कार्यकर्ता को मारी गोली, TMC के मंत्री ने कहा था- ये मिनी पाकिस्तान है

आंतकियों के निशाने पर हैं हिन्दू नेता, RSS के पदाधिकारी: ख़ुफ़िया विभाग का ख़ुलासा

CAA के समर्थन में कॉन्ग्रेस विधायक: कहा- अब मुस्लिम भी नहीं कर रहे विरोध

नागरिकता संशोधन कानून (CAA) को लेकर कॉन्ग्रेस के भीतर ही विरोध तेज होता जा रहा है। पहले गोवा में पार्टी स्टैंड का विरोध करते हुए कुछ नेताओं ने पार्टी छोड़ी। अब मध्य प्रदेश के दो कॉन्ग्रेस विधायकों ने इसके विरोध पर आपत्ति जताई है। ये विधायक हैं मंदसौर जिले के सुवासरा विधानसभा क्षेत्र से चुने गए हरदीप सिंह डांग और राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के छोटे भाई लक्ष्मण सिंह।

लक्ष्मण सिंह ने ट्वीट कर पार्टी स्टैंड को लेकर आपत्ति जताई है। उन्होंने कहा है कि सीएए पर अब पॉलिटिक्स बंद होनी चाहिए। मुस्लिम भी अब इसका विरोध नहीं करना चाहते। चांचौड़ा से विधायक सिंह पहले भी कह चुके हैं कि संसद में कानून पारित हो चुका है और सभी राजनीतिक दल अपने विचार व्यक्त कर चुके हैं। ऐसे में इसे विषय पर ज्यादा टिप्पणी, बयान व्यर्थ है। उन्होंने कहा ​था कि इसके कबूल कर लोगों को आगे बढ़ना चाहिए।

वहीं, विधायक हरदीप सिंह डांग ने यह कहते हुए CAA का समर्थन किया है कि यह देश के नहीं बल्कि पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश में रह रहे अल्पसंख्यकों को नागरिकता देने के लिए है, जो बहुत ही अच्छी बात है। डंग ने CAA और NRC पर आम लोगों के साथ राजनीतिक पार्टियों की अधूरी जानकारी को लेकर हैरानी भी जताई है। उन्होंने कहा कि अधूरी जानकारी के कारण ही लोग सड़कों पर आकर विरोध-प्रदर्शन कर रहे हैं।

सीतामऊ में पत्रकारो से बात करते हुए डांग ने कहा कि पाकिस्तान में प्रताड़ित लोगों को यदि भारत में सहारा मिलता है तो इसमें कोई गलत बात नहीं है। उन्होंने कहा कि CAA और NRC अलग-अलग हैं। इन्हें अलग-अलग ही देखा जाना चाहिए।

लक्ष्मण सिंह और डांग का ये बयान ऐसे वक्त में सामने आया है जब सीएए को लेकर कॉन्ग्रेस लगातार आक्रामक रुख अपनाए हुए है। बीते दिनों मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ भी विरोध-प्रदर्शन में शामिल हुए थे। वैसे यह पहला मौका नहीं है जब डांग और लक्ष्मण सिंह ने अपनी पार्टी के ही स्टैंड का विरोध किया हो। जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को निरस्त करने के मोदी सरकार के फैसले का भी उन्होंने स्वागत किया था। लक्ष्मण सिंह भी कर्जमाफी सहित कई मसलों पर कमलनाथ सरकार को घेर चुके हैं।

इससे पहले गोवा में कॉन्ग्रेस के चार नेताओं ने CAA के मसले पर पार्टी छोड़ दी थी। इन नेताओं का कहना था कि पार्टी अल्पसंख्यकों खासकर, समुदाय विशेष वालों को बरगलाने की कोशिश कर रही है। पार्टी छोड़ने वाले नेताओं में पणजी कॉन्ग्रेस ब्लॉक समिति के अध्यक्ष प्रसाद अमोनकर, उत्तर गोवा अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ प्रमुख जावेद शेख, ब्लॉक समिति सचिव दिनेश कुबल और नेता शिवराज तारकर शामिल थे। सीएए का समर्थन करते हुए इनमें से तीन नेता भाजपा की सदस्यता भी ले चुके हैं।

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‘डरा हुआ मुस्लिम नैरेटिव’ गढ़ने में शुमार रहे गालीबाज अनुराग कश्यप लगातार पीएम मोदी और उनकी सरकार के खिलाफ जहर उगलते रहते हैं। मोदी सरकार के खिलाफ जहर उगलने और अपने जहरीले प्रोपेगेंडा को हवा देने के लिए वो इतने उतावले हो जाते हैं कि भाषा की मर्यादा तक भूल जाते हैं और अपने ट्वीट्स में अश्लील भाषा का प्रयोग करते हैं। हाल-फिलहाल में भी उन्होंने ऐसे कई सारे ट्वीट्स किए हैं।

सीएए और एनआरसी भी विपक्ष खासकर कॉन्ग्रेस का दोहरा चरित्र जगजाहिर है। बॉलीवुड गैंग के विरोध की भी वजहें निजी हैं। अनुराग कश्यप भी सरकार खैरात बंद होने की वजह से ही गालीबाज बने हैं। बताया जा रहा है कि अपनी पिटी हुई फिल्मों के लिए सरकारी ‘भीख’ (अनुदान) नहीं मिलने से कुंठित होकर वे विरोध के नाम पर गाली-गलौज पर उतरे हैं। पूर्व में यूपी की अखिलेश सरकार ने उनकी ‘मसान’ फिल्म के निर्माण के लिए उन्हें ₹2 करोड़ दिए थे। अब ऐसी ही राशि अनुराग कश्यप ‘सांड की आँख’ और ‘मुक्केबाज’ फिल्म के लिए योगी सरकार से माँग रहे हैं। वर्तमान यूपी सरकार अभी इसका मूल्यांकन कर रही है। ऐसे में अब तक कोई राशि ना मिलने के कारण वह सीएए के मुद्दे को लेकर मोदी सरकार के खिलाफ लगातार जहर उगल रहे है।

यूपी बीजेपी प्रदेश प्रवक्ता शलभ मणि त्रिपाठी ने अनुराग कश्यप द्वारा योगी सरकार को लिखी पत्र की कॉपी शेयर करते हुए लिखते हैं, “पिटी हुई फिल्मों के लिए सरकारी भीख ना मिली तो अनुराग कश्यप कुंठित होकर गाली-गलौज पर उतर आए। कुछ सरकारें इनकी फ्लॉप फिल्मों पर भी करोड़ों देती थीं। यश भारती के पेंशन की शहद भी चटाती थीं। योगी जी ने मुफ्त की पेंशन बंद कर पैसा गरीबों, विधवाओं, किसानों में बाँट दिया, यही चिढ़ है इनकी।” उन्होंने एक अन्य ट्वीट में लिखा, “मोदी जी, अमित शाह जी और योगी जी से नफ़रत की वजह तो समझिए, पिटी फ़िल्मों पर भी जनता की गाढ़ी कमाई उड़ाते हुए बँटने वाली सरकारी भीख और पेंशन की बख्शीश बीजेपी सरकार आते ही बंद हो गई, फिर क्या मुफ्तखोरों में नफरत तो भड़कनी ही है !!”

“मुक्केबाज” और “सांड की आंख” के लिए सब्सिडी का आग्रह करते हुए अनुराग कश्यप ने लिखा था कि इन फिल्मों के ज्यादातर हिस्से उत्तर प्रदेश में फिल्माए गए हैं। इनके कथानक और पात्र उत्तर प्रदेश से मिलते हैं, इसलिए सरकारी नियमों का हवाला देकर अनुराग कश्यप ने फिल्मों के लिए सब्सिडी की माँग की थी। बता दें कि यूपी में समाजवादी पार्टी की अखिलेश यादव की सरकार यश भारती सम्‍मान के साथ 50 हजार रुपए मासिक पेंशन भी देती थी। मगर यूपी में बीजेपी सरकार आने के बाद अनुराग कश्यप सहित कई लोगों का यह पेंशन बंद कर दिया गया है।

उनके द्वारा लिखे गए पत्र के सामने के बाद उनकी बौखलाहट और बढ़ गई और उन्होंने ट्वीट करते हुए लिखा, “सरकार को डर किस बात का है जो स्टेट पॉलिसी का सरकारी काग़ज़ unofficially लीक कर के क्या करवाना चाह रही है। ताकि मोदी को अपने काग़ज़ दिखाने को हम ना कहें, या उनका ग्रेजुएशन सर्टिफ़िकेट माँगना बंद करें। खुद बुलाती है और खुद ही इल्ज़ाम लगाती है। हम तो फिर भी बोलेंगे #F**K CAA”

बता दें कि ने अनुराग सरकार के खिलाफ जहर उगलते हुए कई सारे ट्वीट्स किए हैं। इसी कड़ी में शनिवार (जनवरी 11, 2019) तड़के एक ट्वीट करते हुए अनुराग कश्यप ने लिखा, “आज CAA लागू हो गया। मोदी को बोलो पहले अपने कागज, अपनी डिग्री इन “entire political science” दिखाए, और अपने बाप का और ख़ानदान का birth सर्टिफ़िकेट दिखाए सारे हिंदुस्तान को। फिर हमसे माँगे। #f**k CAA”

एक अन्य ट्वीट में अनुराग कश्यप ने पीएम मोदी को अनपढ़ बताया था। उन्होंने ट्वीट करते हुए लिखा था, “CAA/CAB कहीं नहीं जाने वाला है। इनके लिए कुछ भी वापस लेना नामुमकिन है, क्योंकि वो उनके लिए हार होगी। यह सरकार हर चीज़ को हार-जीत में ही देखती है। इनका इगो ऐसा है कि सब जल जाएगा, राख हो जाएगा लेकिन मोदी कभी ग़लत नहीं हो सकता। क्यों? क्योंकि अनपढ़ लोग ऐसे ही होते हैं।”

उन्होंने शनिवार को एक बार फिर से पीएम की पढ़ाई पर सवाल उठाते हुए ट्वीट किया, हमारे ऊपर CAA लागू करने वाले PM की degree in “entire political science” देखनी है मुझे। पहले साबित करो पहले कि मोदी पढ़ा लिखा है। फिर बात करेंगे। #F**K CAA”

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विपक्षी दलों की बैठक से ममता का किनारा, कॉन्ग्रेस को लताड़ मोदी से की मुलाकात

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आज पश्चिम बंगाल के दो दिवसीय दौरे पर कोलकाता पहुँचे। राज्यपाल जगदीप धनखड़ और तृणमूल कॉन्ग्रेस के मंत्रियों ने उनका स्वागत किया। पीएम से मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी मुलाक़ात की। ममता ने बताया कि उन्होंने पीएम से सीएए और एनआरसी को वापस लेने का निवेदन किया। प्रधानमंत्री ने इस पर कहा कि वे दिल्ली आकर अपनी बात रखें, इसके बाद बात होगी। ममता बनर्जी ने बताया कि उन्होंने पीएम मोदी से कह दिया कि उन्हें सीएए और एनआरसी स्वीकार्य नहीं है।

इधर ममता बनर्जी ने वामपंथियों की जम कर आलोचना करते हुए विपक्ष की साझा बैठक में हिस्सा लेने से इनकार कर दिया। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या ममता बनर्जी को इस बात का डर है कि विपक्षी बैठकों में शामिल होने से उनका मुद्दा हाइजैक हो जाएगा? ममता बनर्जी जहाँ बंगाल में सीएए और एनआरसी के विरोध में लगातार रैलियाँ और पदयात्रा कर रही हैं, दिल्ली में वो विपक्षी एकता के शक्ति-प्रदर्शन में हिस्सा लेने से बच रही हैं। ज्ञात हो कि ये वही ममता हैं, जिन्होंने लोकसभा चुनाव से पहले कोलकाता में विपक्षी नेताओं का जमावड़ा लगाया था।

आख़िर इतने ही दिन में ऐसा क्या बदल गया, जिससे ममता बनर्जी ने विपक्ष की बैठक में हिस्सा लेने से इनकार कर दिया। दरअसल, इसके पीछे हाल ही में वामपंथी दलों और कॉन्ग्रेस समर्थित ‘भारत बंद’ को पश्चिम बंगाल में सफल बनाने के लिए पूरी ताक़त झोंक दी। ममता चाहती थीं कि ये बंद असफल हो जाए लेकिन वामपंथी और कॉन्ग्रेस समर्थित संगठनों के बंद का असर राज्य में दिखा। इससे घबराईं ममता बनर्जी ने वामपंथियों की जम कर आलोचना की। ममता बंगाल में ये दिखाना चाहती हैं कि वो सीएए व एनआरसी के ख़िलाफ़ सबसे बड़ी आवाज़ हैं।

इन सबके अलावा उन्हें मुस्लिम वोटरों के छिटकने का भी ख़तरा सता रहा है, जिसके कारण वो कॉन्ग्रेस से दूरी बना रही हैं। राज्य में कॉन्ग्रेस विधायक दल के नेता अब्दुल मन्नान को बनाया है, जो राज्य में पार्टी के प्रमुख मुस्लिम चेहरों में से एक हैं। ऐसे में, ममता बनर्जी कॉन्ग्रेस का साथ देकर मुस्लिमों में कन्फ्यूजन या संशय का माहौल नहीं बनाना चाहतीं। ओवैसी की पार्टी भी पश्चिम बंगाल में पूरा ज़ोर लगा रही है और एआईएमआईएम ने कहा है कि कोलकाता में एक भव्य रैली आयोजित होगी, जिसमें ख़ुद हैदराबाद के सांसद असदुद्दीन ओवैसी शामिल होंगे।

अब ममता बनर्जी को डर है कि जिस मुस्लिम तुष्टिकरण में उन्होंने कई साल गुजार दिए उनके वोट कॉन्ग्रेस और एआईएमआईएम हड़प न ले। इसीलिए, वो विपक्ष के साथ रहते हुए भी उनसे अलग दिखना दिखना चाहती हैं और ऐसा प्रतीत कराना चाहती हैं कि वो सीएए और एनआरसी के ख़िलाफ़ अकेले लोहा ले रही हैं। अब देखना यह है कि दिल्ली में पीएम मोदी और सीएम ममता की बैठक के बाद राज्य की सियासी हवा किस करवट लेती है। ममता बंद को लेकर कॉन्ग्रेस की भी आलोचना कर चुकी हैं। उन्होंने कहा था कि पश्चिम बंगाल में ख़त्म हो चुकी कॉन्ग्रेस बंद के जरिए सस्ती राजनीति कर रही है।

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‘रंगा-बिल्ला’ वाली अरुंधति पहुँचीं जामिया, कहा- एक दिन हम आज़ाद होंगे

भारतीय सेना पर फालतू आरोप लगाने और विदेशी मंचों पर भारत को बदनाम करने वाला बयान देने के लिए कुख्यात अरुंधति रॉय ने जामिया मिल्लिया इस्लामिया में एक बार फिर से डिटेंशन सेंटर का राग अलापा। बता दें कि वामपंथी लगातार दावा करते हैं कि देश के सभी मुस्लिमों को प्रताड़ना कैम्पों में भेज दिया जाएगा और मोदी सरकार एनआरसी लागू कर उनकी नागरिकता छीन लेगी। सरकार कई बार साफ़ कर चुकी है कि अब तक पूरे देश में एनआरसी लागू करने के सम्बन्ध में कोई आधिकारिक चर्चा नहीं हुई है। लेकिन वामपंथी और विपक्षी दल लगातार अफवाह फैलाने में व्यस्त हैं।

अरुंधति ने इससे पहले दिल्ली यूनिवर्सिटी में एक कार्यक्रम के दौरान कहा था कि जनगणना से पहले होने वाली एनपीआर की प्रक्रिया के दौरान जब कोई आपका नाम-पता पूछने आए तो नाम ‘रंगा-बिल्ला’ और पता ‘7 रेस कोर्स रोड’ बता देना। इसे अब ‘लोक कल्याण मार्ग’ के रूप में जाना जाता है और यह भारत के प्रधानमंत्री का आधिकारिक आवास है। अब जामिया में अरुंधति ने अजीबोगरीब बयान देते हुए कहा कि मोदी सरकार ही डिटेंशन सेंटर में चली जाएगी। उन्होंने दावा किया कि अगर सभी साथ रहें तो सरकार के बनाए ‘डिटेंशन सेंटरों’ में जगह कम पड़ जाएगी।

जब एक पत्रकार ने अरुंधति से पूछा कि क्या विरोध-प्रदर्शन के कुछ परिणाम निकलेंगे तो उन्होंने जवाब देने से इनकार कर दिया। उम्मीद जताई कि ‘सभी लोग आज़ाद हो जाएँगे।’ हालाँकि, उन्होंने ये स्पष्ट नहीं किया कि वो किस किस्म की आज़ादी की माँग कर रही हैं। उन्होंने कहा कि विरोध कर रहे लोग कभी भी पीछे नहीं हटेंगे।

अरुंधति रॉय ने इससे पहले ही सीएए को विभाजनकारी, भेदभाव वाला और असंवैधानिक करार दिया। जामिया मिल्लिया इस्लामिया में दिसंबर 15, 2019 को छात्रों ने पुलिस के साथ झड़प की थी। दंगाई छात्रों से निपटने के लिए पुलिस को कैम्पस के भीतर घुसना पड़ा था। कैम्पस में कई बाहरी लोगों के घुसे होने की भी ख़बर आई थी। जामिया प्रशासन और छात्रों ने जाँच में सहयोग करने से इनकार करते हुए पुलिस को सीसीटीवी फुटेज देने से इनकार कर दिया था।

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यूपी पुलिस को मिलेगी और पावर, ‘कमिश्नर सिस्टम’ को हरी झंडी दिखा सकते हैं योगी

उत्तर प्रदेश में क़ानून-व्यवस्था का राज़ कायम करने के लिए सरकार बड़ा क़दम उठाने का संकेत दे रही है। पुलिसिया व्यवस्था में आमूल-चूल परिवर्तन का इशारा ख़ुद डीजीपी ओपी सिंह ने किया है। सिंह ने कहा है कि लखनऊ और नोएडा में ‘कमिश्नर सिस्टम’ की व्यवस्था लागू की जा सकती है, ताकि दोनों क्षेत्रों में अपराधियों से सख्ती से निपटा जा सके। गुरुवार (जनवरी 9, 2020) को लखनऊ के वरिष्ठ एसपी का गाज़ियाबाद ट्रांसफर करने और गौतम बुद्ध नगर के एसएसपी को निलंबित करने का आदेश जारी किया गया था।

डीजीपी ओपी सिंह ने बताया कि उपर्युक्त दोनों क्षेत्रों के लिए पुलिस कमिश्नर सिस्टम लागू करने के विषय में विचार किया जा रहा है। इस सिस्टम के लागू होने के बाद इंपेक्टर जनरल ऑफ पुलिस, अर्थात आईजी रैंक के पुलिस अधिकारियों के पास अतिरिक्त मजिस्ट्रेट की शक्तियाँ आ जाएँगी। अब तक ये व्यवस्था देश भर में 15 राज्यों के 71 शहरों में लागू की गई है।

हालाँकि, इससे पहले भी यूपी में ये व्यवस्था लागू की गई थी लेकिन आईपीएस और आईएएस अधिकारियों के टकराव के बाद इसे टाल दिया गया था। अब प्रदेश में योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में चल रही मजबूत इच्छाशक्ति वाली सरकार अपराध से निपटने के लिए ऐसी व्यवस्था लाने पर विचार कर रही है। इस सम्बन्ध में उत्तर प्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल राम नाइक ने दिसंबर 2018 में यूपी सरकार को सलाह दी थी। उन्होंने योगी सरकार से कहा था कि राज्य में क़ानून-व्यवस्था को और तगड़ा करने के लिए कमिश्नर सिस्टम लागू करने पर विचार करना चाहिए। उन्होंने सीएम योगी की उपस्थिति में एक कार्यक्रम के दौरान यह सलाह दी थी।

नाइक ने कहा था कि लखनऊ, गाजियाबाद और कानपुर में ये व्यवस्था सबसे पहले ट्रायल के रूप में लागू की जानी चाहिए, क्योंकि इन तीनों शहरों की जनसँख्या 20 लाख के पार है। अभी तक नई व्यवस्था के प्रारूप के बारे में कुछ ख़ास पता नहीं चला है, लेकिन इससे पुलिस को आकस्मिक परिस्थितियों में डीएम की अनुमति लेने से आज़ादी मिल जाएगी। जिले में डीएम के पास रहने वाली तमाम फाइलों के निपटारे में पुलिस कमिश्नर अहम फ़ैसले ले सकेंगे। गुंडा एक्ट, गैंगस्टर एक्ट और रासुका जैसे मामलों में फिलहाल डीएम की अनुमति चाहिए होती है।

इस सिस्टम के लागू होने के बाद से होटल के लाइसेंस, बार के लाइसेंस और हथियार के लाइसेंस देने का अधिकार भी पुलिस को मिल जाएगा। नोएडा और लखनऊ में एसएसपी के हटने के बाद इसे पायलट प्रोजेक्ट के रूप में लागू किया जा सकता है। इसके बाद से डीएम की कुछ शक्तियाँ पुलिस कमिश्नर के पास चली जाती हैं। सीएम योगी आदित्यनाथ ने इस सम्बन्ध में बैठकें भी की हैं।

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मैंने झूठी खबर चलाई, मुझे माफ़ कर दो: पढ़िए, राजदीप सरदेसाई का माफीनामा

इंडिया टुडे लगातार अपनी ‘पत्रकारिता’ के कारण चर्चा में बना हुआ है। मामला चाहे JNU में हुई हिंसा पर एक खोजी ‘मेगा इन्वेस्टिगेशन‘ वाले वीडियो का हो या फिर इंडिया टुडे समूह की ही वेबसाइट ‘दी लल्लनटॉप‘ के संपादक द्वारा बीजेपी समर्थकों पर अभद्र टिप्पणी का हो, इंडिया टुडे ग्रुप फर्जी पत्रकारिता के नए आयाम स्थापित करते ही जा रहा है।

इंडिया टुडे समूह से जुड़े पत्रकारों का इतिहास भी विवादों से जुड़ा रहा है। इसमें एक प्रमुख नाम राजदीप सरदेसाई का भी है। राजदीप सरदेसाई भी स्वयं नहीं चाहते होंगे कि कोर्ट के समक्ष उनके द्वारा माफ़ी माँगने की घटना सामने आए। यह मामला वर्ष 2007 में सामने आया था, जब आईपीएस अधिकारी राजीव त्रिवेदी द्वारा राजदीप सरदेसाई और कुछ अन्य लोगों पर मानहानि का आपराधिक मुकदमा दायर किया गया था।

उस समय राजदीप CNN-IBN से जुड़े हुए थे। यह आपराधिक मामला राजदीप सरदेसाई द्वारा चलाए जा रहे एक कथित समाचार से संबंधित है, जो कि वर्ष 2007 में सोहराबुद्दीन शेख से मुठभेड़ के संबंध में CNN-IBN पर प्रसारित हुआ था। 2007 में राजदीप सरदेसाई की अगुवाई में चल रहे न्यूज़ चैनल CNN-IBN ने एक कहानी चलाई, जिसमें IPS राजीव त्रिवेदी पर सोहराबुद्दीन शेख मुठभेड़ की घटनाओं में प्रमुख भूमिका निभाने का आरोप लगाया गया। उक्त आपराधिक मामले में अतिरिक्त मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट, हैदराबाद ने राजदीप सरदेसाई और अन्य को अभियुक्त के रूप में मुकदमे का सामना करने के लिए बुलाया।

इसके विरोध में राजदीप सरदेसाई ने आंध्र प्रदेश के उच्च न्यायालय में एक याचिका दायर करके उक्त आदेश को चुनौती दी। याचिका में राजदीप ने प्रार्थना की थी कि निचली अदालत के समन आदेश को अलग रखा जाए और उनके खिलाफ लगे आपराधिक मामला रद्द किया जाए। हालाँकि आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने राजदीप की चुनौती को खारिज कर दिया।

इसके बाद राजदीप सरदेसाई ने सुप्रीम कोर्ट के सामने इस चुनौती दी और अपने खिलाफ आपराधिक कार्यवाही को खत्म करने की माँग की। 14 मई, 2015 को सर्वोच्च न्यायालय ने भी राजदीप की इस याचिका को खारिज कर दिया।

सर्वोच्च न्यायालय में राजदीप के वकील ने यह तर्क दिया था कि आपराधिक कार्यवाही ‘प्रेस की स्वतंत्रता’ के लिए ख़तरा हो सकती है। ठीक इसी तरह की बात NDTV के प्रोपेगेंडा पत्रकार रवीश कुमार भी कहते देखे गए थे, जब गृह मंत्री अमित शाह के बेटे जय शाह ने एक वेबसाइट पर 100 करोड़ की मानहानि का केस करने का फैसला लिया था। फिर सर्वोच्च न्यायालय ने राजदीप की उक्त दलील को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि व्यक्तिगत प्रतिष्ठा समान रूप से महत्वपूर्ण है और इसे प्रेस की स्वतंत्रता के नाम पर नहीं रौंदा जा सकता।

अंत में राजदीप सरदेसाई ने एक लिखित दस्तावेज में स्वीकार किया कि उनके द्वारा आईपीएस अधिकारी राजीव त्रिवेदी पर झूठे आरोप लगाए गए थे और उन्होंने झूठी खबर का प्रसारण किया था।

राजदीप सरदेसाई के माफीनामे को यहाँ पढ़ सकते हैं,

हिन्दू राष्ट्र, मोदी आजीवन राष्ट्रपति और राहुल के 3 इस्तीफे: राजदीप सरदेसाई, ये ‘डर’ अच्छा लगा

राजदीप सरदेसाई ने स्वीकारा 2002 के दंगों के लिए मोदी ज़िम्मेदार नहीं, मीडिया ने झूठ फैलाया

हिंदुओं से आजादी, हिंदुत्व की कब्र, अल्लाहू अकबर याद नहीं… राजदीप को भगवा झंडा देख लगा डर, फैलाई घृणा

अन्य लोगों ने भी इस मामले में माफीनामा दायर की थी, जिसमें CNN-IBN के पत्रकार भी थे।