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NDTV के पत्रकार ने इमरान खान को फेक वीडियो भेज कर कराई Pak की फजीहत, रवीश ने जारी किया बयान!

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने शुक्रवार (जनवरी 3, 2019) को एक वीडियो ट्वीट किया। उस वीडियो के बारे में उन्होंने बताया कि भारत में पुलिस द्वारा अल्पसंख्यकों पर जुर्म किया जा रहा है। 1 किलो टमाटर के एवज में पाक पीएमओ के एक अधिकारी ने बताया कि जब इमरान ख़ान ये ट्वीट कर रहे थे, तब उनकी टेबल पर यूएन की एक रिपोर्ट पड़ी हुई थी। उस रिपोर्ट में बताया गया था कि इमरान के कार्यकाल में पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के ऊपर हो रहे मजहबी प्रताड़ना में वृद्धि हुई है। इमरान ख़ान 47 पन्नों की उस रिपोर्ट को देखते ही आग बबूला हो गए और उन्होंने वीडियो ट्वीट कर दिया।

वीडियो फेक निकला। वीडियो में जिन पुलिसवालों को भारत का बता कर दिखाया गया था, उनकी वर्दी पर साफ़-साफ़ RAB लिखा था। रैब, अर्थात रैपिड एक्शन बटालियन। ये बांग्लादेश का सुरक्षा बल है। वीडियो में बंगाली भाषा भी सुनी जा सकती है। लेकिन, इमरान ने इसे यूपी का बता कर ट्वीट कर दिया। दंगाइयों के एक-एक पत्थर के बदले उनकी संपत्ति बिकवाने वाली यूपी पुलिस भला इसे कैसे बर्दाश्त कर सकती थी? यूपी पुलिस ने फैक्ट्स के साथ इमरान को आइना दिखाया। फेक वीडियो शेयर करने वाले इमरान ने फजीहत होने के बाद अपना ट्वीट डिलीट कर लिया।

अब ऑपइंडिया के ‘तीखी मिर्ची सेल’ को कुछ सूत्रों ने बताया है कि इमरान ख़ान को ये वीडियो किसी भारतीय पत्रकार ने भेजा था। सोशल मीडिया पर ये बात लीक हो गई। क्विंट, वायर और स्क्रॉल जैसे मीडिया घरानों में हड़कंप मचा कि उनके किसी बाँकुरे ने तो ऐसा नहीं किया। पाकिस्तान इससे पहले भी क्विंट की रिपोर्ट को अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में पेश कर के कुलभूषण जाधव की फाँसी की सज़ा को सही ठहरा चुका है। हालाँकि, इन तीनों ने पाया कि अभी वो इतने भी बड़े नहीं हुए हैं कि इमरान ख़ान उनका भेजा वीडियो शेयर करें।

अब पता चल रहा है कि एनडीटीवी के किसी पत्रकार ने इमरान ख़ान को ये वीडियो भेजी थी। रवीश कुमार लगातार पुलिस के कथित अत्याचार पर शो कर रहे हैं। एनडीटीवी भी दंगाइयों के घर-घर जाकर उनके माता-पिता का इंटरव्यू ले रहा है। ऐसे में एनडीटीवी के किसी पत्रकार ने ये फेक वीडियो इमरान को भेज दिया। दरअसल, ग़लती उस पत्रकार की भी नहीं है। उसे भी किसी ने ये वीडियो भेजा था और दावा किया था कि इसे व्हाट्सप्प यूनिवर्सिटी से पीएचडी डिग्रीधारी स्कॉलर ने सत्यापित किया है। फिर क्या था, उसने इसे इमरान को ख़ुश करने का मौक़ा समझ इसे गँवाना उचित नहीं समझा।

सूत्र बताते हैं कि इमरान ख़ान ने ‘Indian Sickulars’ नाम से एक पूरा का पूरा व्हाट्सप्प ग्रुप ही बना रखा है, जिसमें राणा अयूब, सदानंद धुमे और बरखा दत्त सरीखे पत्रकार एडमिन के रूप में उपस्थित हैं। उसी ग्रुप में एनडीटीवी के किसी पत्रकार ने उक्त वीडियो भेजा, जिसे इमरान ने ट्वीट कर दिया। अब इमरान ख़ान ने उक्त पत्रकार को खरी-खोटी सुना कर उसे ग्रुप से लात मार कर निकाल बाहर किया है, क्योंकि उसने फेक वीडियो शेयर कर के पाकिस्तान की बेइज्जती कराई। ग्रुप के एडमिन्स ने भी माना है कि जब सवाल पाकिस्तान को ख़ुश करने का आए, तब उन्हें फेक न्यूज़ से बचना चाहिए।

फेक न्यूज़ पर उस ग्रुप में पूरा डिस्कशन हुआ। इसका निष्कर्ष ये निकला कि फेक न्यूज़ को भारतीय ट्विटर हैंडल्स से ही शेयर किया जाना चाहिए। इसमें पाकिस्तान या इमरान का नाम नहीं आना चाहिए। एनडीटीवी ने भी उक्त पत्रकार को निकाल बाहर करने का फ़ैसला किया है, क्योंकि वो पाकिस्तान से वफादारी के मामले में कोई रिस्क नहीं ले सकता। उसे डर है कि अगर बात जनरल बाजवा तक पहुँची तो स्थिति बिगड़ सकती है। इसीलिए, एनडीटीवी ने उस पत्रकार को लताड़ कर बाहर कर दिया है। ऐसा भी पता चला है कि उस पत्रकार ने एनडीटीवी के एक बड़े नाम के कहने पर ये वीडियो इमरान को भेजा था।

ये पहली बार नहीं है, जब एनडीटीवी और पाकिस्तान गलबहियाँ डाले घुमते नज़र आ रहे हों। अर्नब गोस्वामी ने भी अपने शो में इसकी पुष्टि की थी। उन्होंने कहा था कि पाकिस्तानी एनडीटीवी की ख़बरों और राहुल गाँधी के बयानों से विशेष प्रेम करते हैं। एनडीटीवी ने विंग कमांडर अभिनन्दन वर्तमान को लेकर भी पाकिस्तान-परस्त रवैया अपनाया था। इमरान ख़ान की पार्टी इससे पहले भी एनडीटीवी का वीडियो शेयर कर चुकी है। रवीश कुमार ने तो खुलेआम मीडिया को सलाह दे डाली थी कि भारत-पाक विवाद को कवरेज न दें, क्योंकि इससे भाजपा को चुनावी फ़ायदा होता है। इसी तरह एनडीटीवी के पत्रकार श्रीनिवासन जैन ने ननकाना साहिब पर मुस्लिम भीड़ द्वारा किए गए हमले से ज्यादा इस बात से चिंतित हैं कि कहीं इससे सीएए समर्थकों को फ़ायदा न हो जाए।


इमरान ख़ान ने बेइज्जती के बाद डिलीट किया फेक वीडियो

एनडीटीवी और पाकिस्तान के एक-दूसरे के प्रति प्रेम को देखते हुए इसमें आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि उसके ही किसी पत्रकार ने इमरान ख़ान को ये वीडियो भेजा। एनडीटीवी ने अब अपने सभी पत्रकारों के लिए ‘पाकिस्तान गाइडलाइंस’ जारी की है, जिसमें बताया गया है कि भविष्य में ऐसी गलतियों से कैसे बचना है। इस बारे में रवीश कुमार ने अपने चैनल के सभी पत्रकारों को ये सन्देश जारी किया है:

“हमारे पत्रकार ने तो इमरान ख़ान को सही वीडियो भेजा था। उसके फोन से इमरान के फोन तक पहुँचते ही वीडियो बदल गया। क्या आपको नहीं लगता कि ये भाजपा आईटी सेल की करतूत है। वो हमारे मोबाइलों में घुस चुके हैं। आपलोग टीवी मत देखिए, मोबाइल भी यूज नहीं कीजिए। भाजपा आईटी सेल वालों ने रास्ते में ही वीडियो मैसेज को पकड़ के उसे बदल दिया। क्या एक देश के प्रधानमंत्री की इस तरह बेइज्जती कराना सही है? क्या हमें हमारे प्यारे पड़ोसी से मिलजुल कर नहीं रहना चाहिए? आपलोग अपने-अपने मोबाइल फोन फोड़ डालिए क्योंकि उनमें आईटी सेल घुस चुका है। कभी-कभी तो मैं भी लिखना कुछ चाहता हूँ और लिख कुछ और देता हूँ। आईटी सेल वाले टाइपिंग के समय उँगलियों को इधर-उधर कर देते हैं। डर का माहौल है।”

एनडीटीवी को इस बात का डर है कि कहीं उसके बचे-खुचे निवेशक भी नाराज़ न हो जाएँ। इसलिए, प्रणय रॉय ने कहा है कि जल्द से जल्द पाकिस्तान और इमरान ख़ान को ख़ुश करने के लिए कुछ किया जाए, नहीं तो वित्तीय संकट से जूझ रहे चैनल को बेचने की नौबत आ सकती है। वहीं क्विंट, वायर और स्क्रॉल काफ़ी ख़ुश हैं। इमरान भी अब एनडीटीवी से उब कर इन तीनों में से किसी को पूर्ण पाकिस्तानी छत्रछाया प्रदान कर सकते हैं। रेस में तो न्यूज़लॉन्ड्री भी है लेकिन उसे अभी ‘इंटर्न’ होने के कारण ये मौक़ा नहीं दिया जा सकता। ऑपइंडिया जल्द ही आपको इस बारे में सूचित करेगा।

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PM मोदी की हत्या का पोल चलाने वाले ‘वामपंथी गिरोह’ के रोहित चोपड़ा का अकाउंट सस्पेंड, लेख हटाया गया

वामपंथियों द्वारा हिन्दू धर्म और खासतौर से मोदी के प्रति उनकी घृणा छिपी नहीं है। ऐसे ही एक इसी लिबरल गिरोह का रोहित चोपड़ा अक्सर हिंदुओं के खिलाफ जहर उगलने का काम करता है। रोहित ने इस कार्य के लिए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल किया। चोपड़ा ने एक बार फिर से हिंदुओं को उकसाने के लिए सोशल मीडिया प्लेटफार्मों पर कई हिंदू विरोधी पोस्ट किए हैं।

हिंदुओं और विशेष रूप से मोदी के प्रति वामपंथी गिरोह द्वारा व्यक्त की गई घृणा किसी से छिपी नहीं है। इन्ही में से वामपंथियों का एक तथाकथित बुद्धजीवी ग्रुप ऐसा है जो सोशल मीडिया पर अक्सर फर्जी खबरें चलाता है। एक घटना सामने आई है जिसमें पीएम मोदी की अमित शाह द्वारा न सिर्फ हत्या की इच्छा व्यक्त की गई बल्कि ट्विटर पर इसके लिए एक पोल भी चलाया गया।


The Twitter poll ran by Rohit Chopra.

इस ट्वीट को रोहित चोपड़ा ने अपने ट्विटर अकाउंट ‘IndiaExplained’ पर ट्वीट किया। जिसमें यूजर को यह तय करने के साथ वोट देने के लिए कहा गया कि गृह मंत्री अमित शाह अगले प्रधानमंत्री के रूप में मोदी की हत्या कैसे करेंगे? साथ ही देश के प्रधानमंत्री की हत्या की बात किया गया और पीएम मोदी की हत्या के लिए चार बेहद घृणात्मक विकल्प भी प्रस्तुत किए। अब इसके बाद आप अंदाजा लगा सकते हैं कि चोपड़ा के मन में पीएम मोदी के प्रति नफरत का ज़हर किस तरह भरा हुआ है और चोपड़ा की पीएम मोदी के प्रति यह घृणा किसी को भी परेशान कर सकती है।

चोपड़ा ने आगे अपने ट्वीट में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी किया। जिसने कई लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचा।


Tweet by Rohit Chopra

बाद में पता चला कि उसे देश की राजधानी दिल्ली स्थित थिंक-टैंक ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन (ओआरएफ) ने प्रकाशित किया है। इसके बाद सोशल मीडिया यूजर्स ने न केवल तथाकथित पोल के खिलाफ, बल्कि उन्होंने यह भी बताया कि अल्ट्रा-लेफ्ट विंग फर्जी न्यूज पेडलर ओआरएफ का ही हिस्सा था। सोशल मीडिया पर लोगों की नाराजगी के बाद, ORF के अध्यक्ष समीर सरन ने कहा कि संगठन सोशल मीडिया पर ‘हेट स्पीच’ को समर्थन नहीं देता। इसलिए रोहित के लेख को हटा लिया जाएगा।

अपने अकाउंट से सोशल मीडिया पर इस तरह के नफरत फैलाने वाले पोल चलाने के बाद ट्विटर ने रोहित चोपड़ा के ट्विटर अकाउंट ‘@IndiaExplained’ को निलंबित कर दिया। इसके बाद भी अपने पर्सनल अकाउंट से रोहित का जहर फैलाना जारी रहा। अपने खुद के अकाउंट से वही पोल डाल दिया। और अकाउंट डिलीट करने की चुनौती दी।


Tweet by Rohit Chopra

ORF द्वारा लेख हटा लिए जाने के बाद रोहित चोपड़ा ने फिर से इस आशय का एक ट्वीट अपने अकाउंट से किया।


Tweet by Rohit Chopra

Tweet by Rohit Chopra

Tweet by Rohit Chopra

Tweet by Rohit Chopra

Tweet by Rohit Chopra

यह पहली बार नहीं है कि रोहित चोपड़ा द्वारा चलाया गया सोशल मीडिया अकाउंट विवादों में घिर गया हो। पहले भी चोपड़ा को पैरोडी अकाउंट ‘@RushdieExplains’ द्वारा सलमान रुश्दी के विचार पोस्ट करने के कारण फटकार लगी थी। चोपड़ा की यह हरकत बताती है कि यह वामपंथी गिरोह आज भी अपने तरीके को बदलने के लिए तैयार नहीं है. इसी गिरोह का रोहित चोपड़ा जो कि आपने नए प्रोफ़ाइल ‘@Indiaexplained’ के माध्यम से उसी प्रकार का हेट-स्पीच जारी रखे हुए था। बहरहाल इस ट्विटर अकाउंट को अब मोदी और शाह की हत्या के लिए कॉल करने के लिए ट्विटर द्वारा सस्पेंड कर दिया गया है।

कोटा पर कॉन्ग्रेसी मंत्री की खुली पोल: कहा- बीजेपी ने ₹1.7 करोड़ नहीं दिए, पता चला ₹6 करोड़ पड़े रह गए

कोटा के जेके लोन अस्पताल में शुक्रवार (जनवरी 3, 2020) को 2 और बच्चों की मौत हो गई। राजस्थान के स्वास्थ्य मंत्री रघु शर्मा भी सौ से ज्यादा बच्चों की मौत होने के बाद अस्पताल का जायजा लेने पहुॅंचे। इस दौरान उन्होंने प्रदेश की कॉन्ग्रेस सरकार की नाकामियों को छिपाने पर पूरा जोर लगाया। बावजूद उनके एक दावे की पोल खुल गई।

शर्मा ने पिछले दिनों अस्पताल की खस्ताहालत का दोष पूर्ववर्ती भाजपा सरकार पर मढ़ने की कोशिश की थी। कहा था कि भाजपा सरकार ने पर्याप्त पैसे नहीं दिए। उनका कहना था कि 2012 में जब कॉन्ग्रेस सत्ता में थी तो अस्पताल के लिए 5 करोड़ रुपए का बजट मंजूर किया गया था। लेकिन, सरकार बदल गई और उसने 5 करोड़ के बदले 1.7 करोड़ रुपए ही जारी किए। अब पता चला है कि अस्पताल के पास 6 करोड़ रुपए पड़े थे। लेकिन, इनका इस्तेमाल उपकरण वगैरह को ठीक करने के लिए नहीं किया गया।

यह बात खुद जिले के प्रभारी मंत्री प्रताप सिंह खाचरियावास ने कही है। वे भी शर्मा के साथ कोटा के जेके लोन अस्पताल पहुॅंचे थे। बाद में शर्मा ने भी ट्वीट कर बताया कि अस्पताल प्रशासन के पास 6 करोड़ का पर्याप्त बजट उपलब्ध था।

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यह तथ्य सामने आने के बाद राज्य सरकार की नाकामी को छिपाने की कोशिश करते हुए दोनों मंत्री ने सारा ठीकरा मीडिया और प्रशासन के सिर फोड़ दिया। प्रताप सिंह ने कहा कि उपकरण ख़रीद की ज़िम्मेदारी डॉक्टरों और अधिकारियों की होती है। उन्होंने लापरवाही की। वहीं अस्पताल के नए अधीक्षक डॉक्टर एससी दुलारा ने बताया कि उन्होंने अब तक बैलेंस शीट नहीं देखी है, इसीलिए उन्हें ख़र्च का अंदाज़ा नहीं है।

रघु शर्मा ने अस्तपाल की जायजा लेने के बाद कहा कि बजट की कमी नहीं है। सबकुछ जल्द ही ठीक कर लिया जाएगा। जबकि चंद दिन पहले ही उन्होंने वसुंधरा राजे की पूर्ववर्ती सरकार पर बजट आवंटन में पक्षपात करने का आरोप लगाया था और कहा था कि जितने बेड की अनुशंसा अशोक गहलोत के पिछले कार्यकाल में की गई थी, उतना नहीं बढ़ाया गया। बजट न होने का रोना रोने वाले रघु शर्मा और उनके साथी मंत्री प्रताप सिंह अब कह रह 6 करोड़ रुपए पड़े हुए थे। ऐसे में सवाल उठता है कि यदि रुपयों की कमी के कारण मौतें हुईं तो फिर 6 करोड़ पड़े क्यों रह गए? पहले से मौजूद राशि को ख़र्च क्यों नहीं किया गया?

राजस्थान पत्रिका के कोटा संस्करण में 4 जनवरी 2020 को प्रकाशित खबर

‘राजस्थान पत्रिका’ की एक रिपोर्ट के अनुसार, अस्पताल में 533 में से 320 उपकरण ख़राब पड़े हुए हैं। अर्थात, अस्पताल में 60% से ज़्यादा उपकरण ख़राब हैं। मुख्यमंत्री कहते हैं कि बच्चों की मौत कोई ‘नई बात’ नहीं है और चिकित्सा मंत्री कहते हैं कि राजनीति की जा रही है। अगर बच्चों की मौत होगी तो बातें होंगी ही। वो अलग बात है कि मीडिया इसे गोरखपुर अथवा मुजफ्फरपुर ट्रेजडी की तरह तवज्जो नहीं दे रहा। अस्पताल के 19 वेंटिलेटर में से 14 ख़राब पड़े हैं। यानी, 73% वेंटिलेटर ख़राब अवस्था में हैं। कई ट्यूबलाइट बंद थे, पर्दे-चादर वगैरह गंदे थे और परिसर में गाय-भैंस घूम रहे थे।

स्वास्थ्य मंत्री रघु शर्मा के दौरे के कारण अस्पताल की 6 बार सफाई की गई, सारे कपड़ों और लाइटों को बदल दिया गया। डॉक्टरों और स्थानीय अधिकारियों की लापरवाही की बातें भी सामने आ रही है। लेकिन रजथान की कॉन्ग्रेस सरकार ख़ुद को पाक-साफ़ दिखाने के लिए उन पर सारा दोष मढ़ बच निकलना चाहती है।

मर गए 14 और बच्चे: कोटा के जेके लोन अस्पताल में टूटे हुए हैं ख़िड़की-दरवाजे, घूमते हैं सूअर

जिस अस्पताल में 6 साल में मरे 6646 बच्चे, वहाँ मंत्री के स्वागत में बिछा ग्रीन कारपेट

नए साल पर सबसे ज्यादा किलकारियाँ भारत में गूँजी, फिर नरगिस के मरने की परवाह क्यों करें गहलोत

कॉन्ग्रेस ने ननकाना साहिब पर हमले के वीडियो को बताया फेक, गुलाम नबी ने कहा- घटना के बारे में पता नहीं

पाकिस्तान के मुस्लिम कट्टरपंथियों ने शुक्रवार (3 जनवरी) को जुमे की नमाज के बाद सिखों के पवित्र धार्मिक स्थल ननकाना साहिब गुरुद्वारे को घेर लिया। जमकर पत्थरबाज़ी की। मुस्लिम भीड़ ने सिखों को मारने-पीटने के अलावा उन्हें भगाने और ननकाना साहिब का नाम बदलकर ग़ुलाम-ए-मुस्तफ़ा रखने की धमकी दी। इस कट्टरपंथी भीड़ का नेतृत्व मोहम्मद हसन का परिवार कर रहा था। मोहम्मद हसन वही युवक है जिससे सिख लड़की जगजीत कौर का अपहरण कर जबरन निक़ाह कराया गया था। मोहम्मद हसन के आतंकी सरगना हाफ़िज़ सईद के संगठन से जुड़े होने की भी खबर आई थी।

बता दें कि जगजीत कौर गुरुद्वारे के ग्रंथी की बेटी हैं। इस घटना से जुड़े वीडियो में यह साफ़ तौर पर दिखा कि किस तरह से मुस्लिम भीड़ ने ननकाना साहिब गुरुद्वारे को घेरा हुआ था, वहाँ उन्होंने अल्लाह-हु-अकबर के नारे लगाए और सिखों पर को भगा देने की बाते कही। दुनिया भर में यह वीडियो बड़ी तेज़ी से वायरल हो चुका है और इसकी कड़ी निंदा हो रही है। इस मामले में भारत सरकार ने भी बयान जारी कर पाकिस्तान से कड़ी कार्रवाई करने को कहा है।

इन सबमें हैरान कर देने वाली बात यह है कि जहाँ पूरी दुनिया इस घटना से परिचित है, वहीं कॉन्ग्रेस का मानना है कि यह वीडियो ही फेक है, इसमें कोई सच्चाई नहीं है। कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता और राजयसभा में विपक्ष के नेता गुलाम नबी आज़ाद का कहना है कि उन्हें इस घटना के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है।

इस पर उसी वीडियो का सन्दर्भ लेते हुए, भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा ने चुटकी ली और कहा कि कोई वीडियो में धमकी देने वाले मुस्लिम के शब्दों (मैं आ रहा हूँ सिखों.. भागो.. अंजाम बहुत बुरा होगा.. या अल्लाह.. लाइलहाह इलल्लाह) का इतावली भाषा में अनुवाद कर दें ताकि कॉन्ग्रेस पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के उत्पीड़न का सबूत माँगना बंद कर दे।

भाजपा नेता के ट्वीट के जवाब में छत्तीसगढ़ कॉन्ग्रेस के ट्विटर हैंडल ने लिखा, “किसी भाषा में अनुवाद करने की ज़रूरत नहीं है, सब जानते हैं कि यह “संघी” भाषा है। इस भाषा में कुछ दिन पहले इंडिया गेट पर “गोली मारो..” के नारे भाजपा नेताओं द्वारा लगाए जा रहे थे। दोनों तरफ से एक जैसे झूठे वीडियो ट्वीट हो रहे हैं, एक जैसी भाषा बोली जा रही है। सभी क्रोनोलोजी समझें।”

सबसे पहले, यह स्पष्ट करना महत्वपूर्ण है कि घटना का वीडियो फेक नहीं है। पत्रकार रविन्द्र रॉबिन सिंह ने कई वीडियो पोस्ट किए, जहाँ एक ही कपड़े के एक ही आदमी को पाकिस्तान में ननकाना साहिब गुरुद्वारा पर हमला करने वाली भीड़ के हिस्से के रूप में देखा गया।

नीचे दी गई पहली इमेज पत्रकार द्वारा अपलोड किए गए वीडियो का एक स्नैपशॉट है, जिसके माध्यम से ब्रेकिंग न्यूज़ पोस्ट की गई। दूसरा उस वीडियो भाजपा नेता संबित पात्रा द्वारा पोस्ट किया गया। दोनों ही वीडियो में एक ही शख़्स (मुल्ला) है जो एक ही कपड़े में है।

पत्रकार द्वारा अपलोड किए गए वीडियो का स्क्रीनशॉट

भाजपा नेता संबित पात्रा द्वारा अपलोड किए गए वीडियो का स्क्रीनशॉट

इसके अलावा, एक बात और चौंकाने वाली है कि कॉन्ग्रेस को उस सिख लड़की के हितों से कोई लेना-देना नहीं है जिसका ज़बरदस्ती धर्म परिवर्तन करा निक़ाह करवा दिया गया। ननकाना साहिब पर हुए हमले से जुड़े वीडियो को नकारने के साथ ही वो मोहम्मद हसन जैसे मुस्लिमों का तो बचाव कर ही रही है, साथ ही पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों पर हो रहे ज़ुल्म से भी इनकार करती नज़र आ रही है।

नागरिकता संशोधन क़ानून (CAA) के ख़िलाफ़ दंगाइयों ने जब “ला इलाहा इल्लल्लाह” और “हिन्दुओं से आज़ादी” के नारे लगाए थे तब भी कॉन्ग्रेस ने चुप्पी साध रखी थी। ज़ाहिर सी बात है, ऐसा करके वो भारत के इस्लामी कट्टरपंथियों और पाकिस्तान के जिहादियों के भारत-विरोधी हरक़तों पर पर्दा डालने की जुगत में है।

इसी क्रम में, कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता गुलाम नबी आज़ाद ने मीडिया से बात करते हुए कहा, “मुझे इसके बारे में अधिक जानकारी नहीं है। ननकाना साहिब सिखों के लिए एक पवित्र स्थान है और सभी धर्मों के लोग इसका सम्मान करते हैं। अगर ऐसी कोई घटना हुई है, तो हम सभी इसकी कड़ी निंदा करते हैं।”

NDTV के पत्रकार को ननकाना साहिब पर मुसलमानों के हमले से दिक्कत नहीं, CAA समर्थकों को मुद्दा मिलने की चिंता

ननकाना साहेब गुरुद्वारे पर मुस्लिमों का हमला, कहा- कोई सिख नहीं रहेगा यहाँ, नाम होगा गुलाम-ए-मुस्तफा

अगवा सिख लड़की पहुँची घर, हाफ़िज़ सईद के आतंकी संगठन के मो. हसन से करवाया गया था निकाह

कॉन्ग्रेस नेता ने शेयर की फेक तस्वीर, कहा- CAA का विरोध करने पर असम में महिला के कपड़े फाड़ रही सेना

नागरिकता संशोधन क़ानून (CAA) पर दुष्प्रचार फैलाने के लिए कॉन्ग्रेस तमाम हथकंडे अपना रही है। सोशल मीडिया पर फेक न्यूज़ शेयर कर उसके नेता अफवाह फैला रहे हैं। ऐसी ही एक फोटो पिंकू गिरि ने शेयर की है। गिरि बिहार के दरभंगा जिला कॉन्ग्रेस सोशल मीडिया आईटी सेल का जिलाध्यक्ष है। उसने जो फोटो शेयर की है उसमें एक जवान महिला के साथ दुर्व्यवहार करते और उसके कपड़े पकड़ कर खींचते हुए दिख रहा है। इस फोटो को शेयर कर कॉन्ग्रेस नेता ने दावा किया कि असम में महिलाओं के साथ ऐसा व्यवहार किया जा रहा है।

इस फोटो के बारे में कॉन्ग्रेस नेता ने दावा किया- “आज असम में ये हालत हैं तो कल यूपी और दिल्ली में भी ज़रूर नज़र आएँगे। दिल्ली में तो देश भर के कोने-कोने से आकर लोग बसे हुए हैं, वो कहाँ से अपने कागज दिखाएँगे?” कॉन्ग्रेस नेता ने सीएए के विरोध-प्रदर्शन के नाम पर भारतीय सेना को बदनाम करने का प्रयास किया। दावा किया कि असम में सेना महिलाओं के साथ बुरा व्यवहार कर रही है, क्योंकि उनके पास डाक्यूमेंट्स नहीं हैं। साथ ही कहा कि कल को दिल्ली व यूपी-बिहार के लोगों के साथ भी ऐसा ही किया जाएगा।

कॉन्ग्रेस नेता ने भारतीय सेना को किया बदनाम

लेकिन, कॉन्ग्रेस के प्रोपेगंडा की पोल तब खुल गई, जब पता चला कि ये फोटो असम का है ही नहीं। साथ ही ये फोटो भारत के किसी हिस्से का भी नहीं है। इसमें सेना की वर्दी में दिख रहे लोग भी भारतीय सेना के नहीं हैं। असल में ये फोटो 2008 का है। इसे आज से 12 साल पहले रायटर्स ने अपलोड किया था। कॉन्ग्रेस नेता ने जो फोटो शेयर कर के लोगों को डराया, वो नेपाल की राजधानी काठमांडू का है। फोटो में दिख रहे प्रदर्शनकारी भी भारतीय नहीं हैं, वो तिब्बती हैं। वे सभी काठमांडू में यूएन बिल्डिंग के पास मार्च 24, 2008 को प्रदर्शन कर रहे थे।

गोबर हैं भाजपा शासित राज्य: कॉन्ग्रेस नेता का फेसबुक पोस्ट

जब ऑपइंडिया ने कॉन्ग्रेस नेता का फेसबुक प्रोफाइल खँगाला तो पता चला कि वो फेक न्यूज़ फैलाने में माहिर है। उसने महात्मा गाँधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे से स्वतंत्रता सेनानी वीर सावरकर के शारीरिक सम्बन्ध होने की बात भी फेसबुक पर पोस्ट की थी। एक फेसबुक पोस्ट में उसने गुजरातियों को लुटेरा साबित करने का प्रयास करते हुए दावा किया कि 29 गुजराती देश का रुपया लेकर भाग चुके हैं। एक फेसबुक पोस्ट में उसने भारत का नक्शा दिखा कर दावा किया कि जहाँ-जहाँ भाजपा का राज्य है, वो राज्य गोबर हैं। फेक न्यूज़ शेयर करने और पोल खुलने के बावजूद कॉन्ग्रेस नेता ने अपना फेसबुक पोस्ट डिलीट नहीं किया।

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CAA पर नेहरू का हवाला कॉन्ग्रेस को नहीं आया रास, केरल के गवर्नर को न्योता देकर कहा- अब मत आना

…16 साल पुराना मनमोहन सिंह का वो वीडियो, CAA पर भ्रम फैलाने से पहले कॉन्ग्रेस को देखना चाहिए

NDTV के पत्रकार को ननकाना साहिब पर कट्टरपंथियों के हमले से दिक्कत नहीं, CAA समर्थकों को मुद्दा मिलने की चिंता

पाकिस्तान में ननकाना साहिब गुरुद्वारे पर कट्टरपंथियों की भीड़ के हमले की दुनिया भर में निंदा हो रही है। शुक्रवार (जनवरी 3, 2019) को मुस्लिमों की दंगाई भीड़ ने गुरुद्वारे को घेर लिया और ‘या अल्लाह, ला इलाहा इल्लल्लाह’ के नारे लगाते हुए गुरुद्वारे को तहस-नहस करने की धमकी दी। पत्थरबाजी भी की गई। पाकिस्तान में अल्पसंख्यक सिख पहले से ही जबरन धर्मान्तरण और प्रताड़ना के शिकार रहे हैं।

वहीं एनडीटीवी सरीखे चैनलों को इस बात से कोई दिक्कत नहीं है कि पाकिस्तान में कट्टरपंथियों ने एक गुरुद्वारे को घेर कर भड़काऊ नारेबाजी की। गुरु नानक के जन्मस्थल को क्षतिग्रस्त करने की धमकी दे रहा था। एनडीटीवी व उसके पत्रकारों को इस बात से परेशानी है कि कहीं इस घटना का इस्तेमाल सीएए के पक्ष में न कर लिया जाए। एनडीटीवी ने पत्रकार श्रीनिवासन जैन ने सिखों के ख़िलाफ़ मुस्लिम भीड़ के उपद्रव पर टिप्पणी करते हुए लिखा:

“ये काफ़ी बुरी ख़बर है। आशा कीजिए कि इसका इस्तेमाल नागरिकता संशोधन बिल के पक्ष में चलाए जा रहे प्रोपेगेंडा के पक्ष में न किया जाए। बता दूँ कि सीएए में दिसंबर 2014 का कट-ऑफ डेट रखा गया है। इसीलिए, इसका पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफ़ग़ानिस्तान में रह रहे अल्पसंख्यकों से कुछ भी लेना-देना नहीं है।”

ये दिखाता है कि एनडीटीवी के श्रीनिवासन जैन को इससे कोई मतलब नहीं है कि मोहम्मद हसन नामक युवक ने एक सिख लड़की जगजीत कौर का अपहरण कर लिया और जबरन उससे इस्लाम कबूल करवाया। इससे भी एनडीटीवी को कोई दिक्कत नहीं है कि आरोपित हसन के समर्थन में मुस्लिम भीड़ ने ‘उलटा चोर कोतवाल को डाँटे’ वाली कहावत को चरितार्थ करते हुए गुरु नानक के पवित्र जन्मस्थान को निशाना बनाया। एनडीटीवी को ये डर सता रहा है कि कहीं सीएए के पक्ष में इस घटना का इस्तेमाल न किया जाए।

श्रीनिवासन जैन को पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान की निंदा करनी चाहिए, जो बांग्लादेश का फेक वीडियो शेयर कर के भारत में ‘अल्पसंख्यकों पर पुलिस के अत्याचार’ की बात करते हैं और फजीहत होने पर वीडियो डिलीट कर लेते हैं। श्रीनिवासन जैन को सीएए का स्वागत करना चाहिए, जिसके कारण सिखों सहित पाकिस्तान के कई प्रताड़ित अल्पसंख्यक शरणार्थियों को भारत की नागरिकता मिलने का रास्ता साफ़ हुआ है। लेकिन, श्रीनिवासन लिखते हैं कि इसका कट-ऑफ डेट दिसंबर 2014 है, इसीलिए फ़िलहाल पाकिस्तान में रह रहे अल्पसंख्यकों को इससे फ़ायदा नहीं है।

श्रीनिवासन जैन से एक सवाल- अगर सीएए से वहाँ पहले रह रहे अल्पसंख्यकों को फ़ायदा हुआ है तो फिर इसका विरोध क्यों? वो ख़ुद मान रहे हैं कि इस क़ानून को अल्पसंख्यकों के कल्याण के लिए लाया गया है। फिर वे सीएए के पक्ष में माहौल बनने से चिंतित क्यों हैं? जिस चैनल में रवीश कुमार कार्यरत हों, वहाँ के पत्रकारों से ऐसा ही अपेक्षित भी है।

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उद्धव ठाकरे सरकार में खींचतान शुरू: शिवसेना के मंत्री अब्दुल सत्तार ने दिया इस्तीफ़ा

महाराष्ट्र की उद्धव ठाकरे सरकार में खींचतान शुरू हो गई है, इसलिए मंत्रिमंडल विस्तार के बाद से ही लगातार मंत्री पद न मिलने पर विधायकों की नाराज़गी की ख़बरें सामने आ रही थीं। इस बीच, औरंगाबाद से शिवसेना के विधायक और राज्यमंत्री पद की शपथ लेने वाले अब्दुल सत्तार ने शनिवार (4 जनवरी) को अपने मंत्रिपद से इस्तीफ़ा दे दिया है। ऐसा कहा जा रहा है कि उन्हें कैबिनेट मंत्री पद नहीं मिला था इस बात से वो ख़ासा नाराज़ थे। अपनी माँग पूरी न होने पर उन्होंने मंत्री पद से इस्तीफ़ा दे दिया। हालाँकि, विधायक के पद पर वह अभी भी बने हुए हैं।

महाराष्ट्र की राजनीति में कद्दावर नेता माने जाने वाले अब्दुल सत्तार का इस्तीफा उद्धव सरकार के लिए एक बड़ा झटका है। आपको बता दें कि सत्तार पहले कॉन्ग्रेस में थे और उन्होंने विधानसभा चुनावों से कुछ पहले ही शिवसेना का दामन थामा था। 

जानकारी के अनुसार, शिवसेना ने पार्टी के मुखपत्र ‘सामना’ में 1994 में प्रकाशित अपनी एक रिपोर्ट में अब्दुल सत्तार को दाऊद का क़रीबी बताया था। 25 साल पुरानी सामना की यह रिपोर्ट अब सोशल मीडिया पर तेज़ी से वायरल हो रही है और शिवसेना के नेताओं को इसका जवाब देते नहीं बन रहा है। सामना ने 11 जून, 1994 को ‘शेख सत्तार के दाऊद गिरोह से क़रीबी संबंध’ शीर्षक से रिपोर्ट प्रकाशित की थी। तब अब्दुल सत्तार कॉन्ग्रेस में थे और उन्होंने शिवसेना के पार्षद को चुनाव में हराया था। 

इसके अलावा, 1993 के मुंबई विस्फोट मामले में मौत की सज़ा पाए याकूब मेमन के लिए दया का अनुरोध करने वाले विधायकों में भी सत्तार शामिल थे। लेकिन, आज की तस्वीर यह है कि मंत्रालयों के बँटवारे को लेकर एनसीपी और कॉन्ग्रेस में अब ठन गई है।

एनसीपी और शिवसेना अपने कोटे से एक भी मंत्री पद कॉन्ग्रेस से अदला-बदली करने के लिए तैयार नहीं है। एनसीपी और कॉन्ग्रेस नेताओं के बीच जारी घमासान के चलते दोनों दलों के नेता बैठक बीच में ही छोड़कर वहाँ से चलते बने। दोनों पार्टियों के आपसी विवाद के कारण मंत्रियों के विभागों का बँटवारा एक टेढ़ी खीर बनी हुई है।

अब्दुल सत्तार के इस्तीफ़ा दिए जाने के बाद से उद्धव ठाकरे की मुसीबत बढ़ गई, इसलिए उन्होंने शिवसेना के नेता को उन्हें मनाने के लिए भेज दिया है। ग़ौरतलब है कि 30 दिसंबर को 36 नए मंत्रियों की शपथ के साथ महाराष्ट्र में मंत्रिपरिषद के सदस्यों की संख्या अब 43 हो गई है, लेकिन नए मंत्रियों को उद्धव ठाकरे ने अभी तक विभागों का आवंटन नहीं किया है।

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लश्कर-ए-तैयबा का आतंकी निसार अहमद डार श्रीनगर से गिरफ़्तार: कश्मीर में बड़े हमले की रच रहा था साज़िश

श्रीनगर पुलिस ने सुरक्षा बल के साथ एक ज्वाइंट ऑपरेशन में शुक्रवार देर रात आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा के खूंखार आतंकवादी को धर-दबोचा है। पुलिस ने बताया कि यह आतंकी श्रीनगर में तैनात सुरक्षा बल के जवानों पर हमला करने की साज़िश रच रहा था। उन्होंने जानकारी दी कि गिरफ़्तार किए गए आतंकी के पास से बड़ी मात्रा में गोला-बारूद बरामद किया गया है।

बड़ी तादाद में बरामद हुए गोला-बारूद से इस बात का अंदाज़ा लगाया जाा सकता है कि वो किसी बड़ी घटना को अंजाम देने की फ़िराक में था। ख़बर के अनुसार, एक पुलिस अधिकारी ने बताया कि जम्मू-कश्मीर पुलिस के ‘स्पेशल ऑपरेशंस ग्रुप’ ने उत्तर कश्मीर के बांदीपोरा ज़िले में हाजिन इलाक़े के निवासी निसार अहमद डार को शहर के श्री महाराजा हरि सिंह अस्पताल से गिरफ़्तार किया।

पूछताछ के दौरान पता चला है कि 23 वर्षीय आतंकवादी निसार अहमद डार हाजिन के वहाब पर्रे का रहने वाला है। इस बात का भी पता चला है कि वो पिछले कुछ समय से आतंकियों को हथियार सप्लाई करता था। आतंकी निसार के ख़िलाफ़ 2017 से लेकर 2019 तक आठ FIR दर्ज की जा चुकी है।

ख़बर के अनुसार, आतंकी निसार का स्थानीय आतंकी मोहम्मद सलीम पर्रे से गहरा रिश्ता था। उत्तरी कश्मीर में जब सुरक्षा बल और आतंकियों के बीच मुठभेड़ हुई थी, तब निसार वहाँ से भाग निकला था। गिरफ़्तारी के बाद से ही पुलिस निसार से पूछताछ में जुटी हुई है। बता दें कि दो दिन पहले ही गादरबंद ज़िले से लश्कर के एक भूमिगत कार्यकर्ता रईस अहमद लोन को गिरफ़्तार किया गया था। उसके बारे में पता चला था कि उसने गुंड ज़िले में सक्रिय लश्कर के आतंकवादियों के लिए कई कार्ड पंजीकृत कराए थे।

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फैज़ अहमद फैज़: उनकी नज़्म और वामपंथियों का फर्जी नैरेटिव ‘हम देखेंगे’

फैज़ से मेरी मुलाकात लगभग 20 साल पहले हुई थी या यूँ कहिए मैंने फैज़ को वर्षों पहले, करीब 18-19 साल पहले खोजा था। मेरी पीढ़ी के और नवयुवको की तरह मैं भी उन दिनों संगीत और कविता में अपनी रुचि तलाश रहा था और इन सब का एक मात्र कारण थे जगजीत सिंह, जिनकी ग़ज़लों का चयन सरल और समझने में बेहद आसान था। इन ग़ज़लों को जगजीत सिंह ने अपनी सहज गायन शैली और मखमली आवाज से और भी आसान बना दिया था। और शायद ऐसा हर किसी के साथ ही होता है इस पीढ़ी में कि ग़ज़लों को जानने, समझने की यात्रा जगजीत सिंह द्वारा आरंभ करने के बाद, आप गुलाम अली और मेहंदी हसन जैसे अन्य गायकों ढूँढना शुरू करते हैं, और अंत में, आप उन रचनाकारों तक भी पहुँच ही जाते हैं जिन्होंने उन सुंदर, ज्यादातर रोमांटिक, ग़ज़लों को लिखा था।

मुझे मेहंदी हसन की आवाज़ में “गुलों में रंग भरे” बेहद पसंद था, हालाँकि यह फ़ैज़ को जानने के लिए पर्याप्त नहीं था। जब मैंने फैज़ के बारे में आगे पढ़ना शुरू किया तो मेरे एक संगीत में रूचि रखने वाले मित्र ने मुझे बताया था कि प्रसिद्ध क्लासिक बॉलीवुड गीत “तेरी आँखों को सिवा दुनिया में रखा क्या है” असल में फैज़ द्वारा लिखित एक नज़्म से ली गई एक लाइन थी।

दोनों “गुलों में रंग भरे” (जिसे फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ द्वारा लिखा गया है) और “तेरी आँखों के सिवा” (जिसे मजरूह सुल्तानपुरी द्वारा लिखा गया है) संजीदा रोमांटिक कविताएँ हैं, लेकिन जब आप फ़ैज़ की नज़्म – “मुझसे पहली सी मोहब्बत मेरे महबूब ना माँग” पढ़ते हैं, जिसके बाद वाली लाइन से मजरूह साहब प्रेरित हुए थे, वहाँ आपकी मुलाक़ात एक नए फैज़ से होती है या यूँ कहिए कि आप अपने सामने “क्रांतिकारी” कवि फैज़ को पाते हैं या आधुनिक भाषा में, ‘वोक’ फ़ैज़ , जी हाँ वही ‘वोक मानुस’ जिसे आप जागा हुआ इन्सान कह सकते हैं।

मुझे ये नए वाले जागे हुए ‘जागृत फैज़’ अधिक आकर्षक दिखाई दिए। मुझे उनकी ये नज़्म बेहद पसंद थी और मैं उसमें बसे हुए जूनून से प्यार करने लगा था। मुझे उनकी अन्य नज़्में भी पसंद थीं, जैसे “चंद रोज़ और मेरी जान”, “बोल के लब आज़ाद हैं तेरे, और फिर उनकी सबसे शानदार नज्म, ‘हम देखेंगे’ को मैं दिल से लगा कर रखता था। अगस्त 1947 में जब भारत और पाकिस्तान को आज़ादी के बाद विभाजन मिला, तो उन्होंने सुबह-ए-आज़ादी नाम से भी एक नज़्म लिखी थी जिसमें कहा गया था, “वो इंतज़ार था जिसका यह वो सहर तो नहीं” जो ये दर्शाता था कि धर्म के आधार पर विभाजन फैज़ को पसंद नहीं था।

मुझे मेरे एक मित्र ने बताया था कि फैज़ ज़िया के पाकिस्तान से खुश नहीं थे, और ज़िया द्वारा सैन्य तख्तापलट के माध्यम से सत्ता पर कब्जा करने के बाद वो भारत वापिस आने की फ़िराक में थे। हालाँकि बाद में, उन्होंने लेबनान को शरण के लिए चुना था क्योंकि उन्हें पता था कि अगर उन्होंने भारत में शरण ली तो उनके बाकी “क्रांतिकारी” कवियों या रिश्तेदारों को ज़िया शासन द्वारा तंग किया जा सकता था और फिर ऐसा भी माना जा सकता था कि, फैज़ भारत को, जो की पाकितान का जानी दुष्मन है, दिल ही दिल से चाहते थे।

ऐसी पृष्ठभूमि और इतिहास के साथ, जब आईआईटी कानपुर कैंपस में ‘हम देखेंगे‘ के गायन को लेकर विवाद खड़ा हुआ, तो मेरी पहली प्रतिक्रिया “लिबरल्स” की तरह ही थी। मेरे दिमाग में सबसे पहले यही आया कि ये बात ठीक नहीं है और मैंने नूपुर, जो कि Opindia की संपादक हैं, को साफ़ साफ़ कहा था कि फैज़ या उनकी कविता को किसी इस्लामिक प्रोजेक्ट के रूप में चित्रित करके नुपुर अपने को हंसी का पात्र न बनाए। वो बात दीगर है कि मैं ट्विटर पर लगातार तथाकथित लिबरल्स के मज़े ले रहा था और क्यूँ न लेता एक वही तो मेरा फेवरिट टाइम पास है।

इतना होने बावजूद भी मैंने इस विषय पर कोई वीटो नहीं लगाया था। क्योंकि इससे पहले, बी एच यू विवाद के दौरान, जब कई राईट विन्गर्स छात्रों को मुस्लिम शिक्षक का कथित रूप से विरोध करने के लिए प्रेरित कर रहे थे, तो मेरी पहली प्रतिक्रिया यही थी कि शायद छात्र कुछ ज्यादा ही ओवर रियेक्ट कर रहे हैं। दिल से कहूँ तो इस मुद्दे पर ऑपइंडिया की रिपोर्टिंग वास्तव में अच्छी थी और उस एक लेख ने मुझे अपना शुरुआती रुख बदलने पर मजबूर कर दिया था। मूल रूप से, मैं गलत साबित हुआ था, और जब आई आई टी वाला मामला सामने आया तो मैंने सोचा कि अगर मैं फैज़ के बारे में फिर से गलत हुआ तो क्या होगा?

और आज करीब दो सप्ताह के बाद, क्या अब मुझे लगता है कि मैं फैज़ के बारे में गलत था? क्या अब मुझे लगता है कि वह एक इस्लामवादी थे? अगर कुछ मीडिया रिपोर्ट्स की माने तो आईआईटी कानपुर में उस एक पैनल का गठन स्पष्ट रूप से यह तय करने के लिए किया गया था कि क्या फैज़ हिंदू विरोधी थे?

सबसे पहली बात तो ये कि वह फर्जी खबर है किआईआईटी कानपुर में पैनल का गठन उन प्रशासनिक मुद्दों की जाँच के लिए किया गया है जहाँ फैज़ की कविता पाठ का आयोजन किया गया था। सच ये है कि पैनल इस बात का विश्लेषण करेगा कि क्या इस आयोजन की उचित अनुमति ली गई थी या कुछ आयोजकों या प्रतिभागियों द्वारा नियमों की अवहेलना की गयी थी। और अगर कुछ तोड़ फोड़ या कुछ अनुशासनहीनता हुई भी थी तो उस  कुछ कार्रवाई करने की आवश्यकता है या नहीं, आदि इत्यादि।  इस पैनल का गठन फ़ैज़ या फैज़ की शायरी के मनोविश्लेषण के लिए तो कतई नहीं किया गया है।

आइए क्यों न हम वास्तव में “असली लिबरल” बने और लंबे समय से आयोजित मान्यताओं पर सवाल उठाना शुरू करें? यही तो होती है सच्चे लिबरल की पहचान?  क्यूँ नहीं हम फैज़ के बारे में उनकी शायरी से आगे जाने की कोशिश करें?

क्या थी फैज़ की राजनीति?

शुरुआत से ही फैज़ को एक खालिस मार्क्सवादी और गहन वामपंथी कवि माना जाता रहा है जिसे ‘लेनिन शांति पुरस्कार’ से नवाज़ा गया था। जी हाँ ये वही पुरस्कार है जिसे सोवियत रूस, जो कि उन दिनों एक साम्यवादी महाशक्ति था, द्वारा फैज़ को प्रदान किया गया था। असल में हम भारतीय, भारतीय मार्क्सवादियों और वामपंथियों को उनकी विचारधारा और प्रोपेगेंडा के कारण आमतौर पर हिन्दू विरोधी ही मानते हैं। फैज़ को वामपंथी मानने के बाद आमतौर पर ऐसा ही मान जाएगा कि फ़ैज़ हिंदू विरोधी थे, क्योंकि भारत में कम्युनिस्ट वास्तव में हिंदू विरोधी ही होते हैं। लेकिन देखने वाली बात ये है जनाब कि फ़ैज़ पाकिस्तानी सेटअप में वामपंथी थे, भारतीय सेटअप में नहीं तो इसका मतल तो उल्टा ही निकालता है न? लेकिन अगर सच कहें तो वास्तव में ऐसा कुछ भी नहीं है जो यह साबित कर सके कि फैज़ हिंदू विरोधी थे।

देखा जाए तो वामपंथी रुल के मुताबिक इस्लामी समाज में तो एक वामपंथी को हिंदुओं के प्रति सहानुभूति ही होनी चाहिए, क्योंकि हिन्दू वहाँ के हाशिए पर हैं और उत्पीड़ित समुदाय हैं। उदाहरण के लिए पाकिस्तान में जन्मे लेखक और कमेंटेटर तारिक फतह को ले लीजिए। फतह एक पाकिस्तानी सेटअप में वामपंथी है और वह हिंदू विरोधी नहीं है। यहाँ तक कि आज जब  “तथाकथित भारतीय धर्मनिरपेक्ष सेक्युलर गैंग”  नागरिक संशोधन बिल के खिलाफ सड़कों पर दंगे कर रहा है, वहाँ पाकिस्तान में कई वामपंथी कार्यकर्ता और पत्रकार पाकिस्तानी हिंदुओं की दुर्दशा को उजागर कर रहे हैं।

सच कहूँ तो मुझे आजतक फैज़ द्वारा पाकिस्तान के अल्पसंख्यक हिंदुओं के समर्थन में किसी भी आन्दोलन के बारे में कोई खबर नहीं है। मुझे नहीं लगता कि फैज़ ने अल्पसंख्यक हिंदुओं की दुर्दशा को उजागर करते हुए कुछ भी, कभी भी, कहीं भी क्रांतिकारी लिखा हो। आप मुझे अगर गलत साबित कर दें तो मुझे बेहद खुशी होगी, लेकिन “महान-क्रांतिकारी” फैज़ इस मामले में थोड़े नहीं, बेहद कमज़ोर नज़र आते हैं। चलिए एक पल के लिए हिंदुओं को भूल जाते हैं , किन्तु एक मुस्लिम संप्रदाय अहमदिया के समर्थन में भी फैज द्वारा कभी कुछ नहीं किया गया। मान लेते हैं कि कविताओं के लिए उनकी स्याही सूख गयी होगी लेकिन कम से कम कोई एक अवार्ड तो लौटाया ही जा सकता था या एक छोटे-मोटे धरने पर तो बैठा ही जा सकता था लेकिन अफ़सोस कि आपको इतिहास के किसी भी पन्ने पर ऐसा कुछ नहीं मिलेगा।

माना ये जाता है कि अहमदिया संप्रदाय को सैन्य तानाशाह जिया-उल-हक द्वारा गैर-मुस्लिम घोषित किया गया था जबकि सच ये है कि ये कारनामा वास्तव में जुल्फिकार अली भुट्टो की लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई सरकार द्वारा किया गया था। ये भुट्टो ही थे जिन्होंने ने 1974 में एक संवैधानिक संशोधन के माध्यम से अहमदियों को गैर-मुस्लिम घोषित किया था। और फिर सैन्य तानाशाह जिया-उल-हक ने 10 साल बाद एक अध्यादेश के माध्यम से संवैधानिक संशोधन कर अहमदियों के जीवन को बद से बदतर बना दिया। असली पाप के हक़दार तो जनाब ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो थे और ये जानकार आपके पैरों तले ज़मीन सरक जाएगी कि महान क्रन्तिकारी और वामपंथी विचारधारा वाले फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ असल में इन्ही भुट्टो के ख़ास सहयोगी थे। फैज़ काफी समय तक भुट्टो सरकार में विभिन्न मंत्रालयों में सलाहकार और वरिष्ठ भूमिकाओं में काम करते रहे लेकिन भुट्टो ने अहमदियों के साथ जो किया उसका विरोध करने के लिए उन्होंने इस्तीफा नहीं दिया।

एक क्रांतिकारी कवि को कम से कम ऐसा तो करना चाहिए था कि नहीं?

अल्पसंख्यकों के विरुद्ध पाकिस्तान सरकार द्वारा किसी भी कार्रवाई में फैज़ की कोई भी सक्रियता आपको कहीं भी नहीं दिखाई देगी। उस दौरान भी नहीं जब पाकिस्तानी सेना ने पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) में भयानक जनसंहार कर डाला था। 2018 में प्रकाशित द हिंदू के एक लेख में तर्क दिया गया है कि फ़ैज़ युद्ध में इस तरह से सक्रिय थे, इस तरह से योगदान दे रहे थे कि उन्होंने  “पाकिस्तानी सेना का मनोबल बढ़ाने के लिए ‘देशभक्ति’ कविताएँ लिखने से इनकार कर दिया था। हद ही है, आप किसी को इतना कैसे संदेह का लाभ दे सकते हैं? असल में क्रांतिकारी कारनामा तो वो होता जब फैज़ वास्तव में सेना के अन्याय के खिलाफ कविताएँ लिख रहे होते जो कि भले ही आपकी अपनी सेना द्वारा किया गया हो।

फैज़ के “जागृत” प्रशंसको को इस बात से कभी तकलीफ नहीं होती है कि फैज़ ने भारतीय सेना के बारे में क्या-क्या नहीं लिखा है लेकिन वो उस बात से खुश होते हैं कि लाखों लोगों को मारने और बलात्कार करने वाली सेना पर फैज़ ने कुछ नहीं लिखा। उनकी एक “ना” उनको एक क्रांतिकारी बना देती है जबकि असल में वो एक डरे हुए कवि थे जो “हाँ” कहने में डर गए थे ।

आप पाएँगे कि फ़ैज़ की सारी क्रांति ज़िया-उल-हक़ के विरोध से शुरू होती हैं और वहीं खत्म हो जाती है। इसके पीछे भी उनका स्वार्थ ही कहा जा सकता है क्योंकि ज़िया ने फ़ैज़ के एक दोस्त और अन्नदाता भुट्टो को सत्ता से बाहर कर दिया था। यदि फैज़ इस्लामवाद के विरोधी थे, तो उन्हें अपने मित्र भुट्टो को अहमदियों के खिलाफ कानून के लिए विरोध करना चाहिए था और यदि वे सत्ताधारी पार्टी का विरोध करते थे, तो उन्हें तब विरोध करना चाहिए था जब पूर्वी पाकिस्तान में लोगों के साथ भयानक अत्याचार किया जा रहा था। आज तक मुझे इन दोनों मोर्चों पर उनके द्वारा सक्रिय या मुखर विरोध का कोई रिकॉर्ड नहीं मिला है और रही पाकिस्तान के हिंदुओं के लिए किया गया उनका कोई भी आन्दोलन तो उसको तो आप भूल ही जाइए।

इन सब कारिस्तानियों के बाद भी फ़ैज़ को हिंदू विरोधी नहीं कह सकते हैं। ज्यादा से ज्यादा उन पर ये आरोप लगाया जा सकता है कि वो पाकिस्तान में हिन्दुओं की हो रही दुर्दशा की तरफ आँख मूँदे रहे लेकिन आज लोग “हम देखेंगे” का विरोध इसलिए कर रहे हैं, क्योंकि ये गीत उन सभी रूपकों का प्रयोग करता है जिसमें इस्लाम की मूर्तिपूजा के खिलाफ मान्यताओं को एक बल मिलता है जिसे वो एक क्रांति मानते है।

कवि की कविता का रिश्ता क्या?

ऐसा माना जाता है कि कोई भी कविता एक समय गुज़र जाने के साथ कवि के नाम से स्वतंत्र हो जाती है। और यही वो बात है जो ये लोग नहीं जानते जो फैज़ को न जानने के “अनपढ़ संघियों” पर ताना मार रहे हैं। और फिर ये भी वही लोग हैं जो भारतीयों द्वारा अल्लामा इकबाल की कविता को अपनाने को सही ठहराते हैं, भले ही इकबाल एक कट्टर इस्लामवादी थे और पाकिस्तान के निर्माण की दिशा में काम करने वाले एक प्रमुख व्यक्ति थे।

जनाब इक़बाल वही थे जिनकी शुरुआत हुई थी “हिंदी है हम, वतन है हिंदुस्तान हमारा” और पकिस्तान पहुँचते  पहुँचते ये बदल कर हो गयी थी  “मुस्लिम है हम, वतन है सारा जहाँ हमारा” लेकिन इस कारण ये कविता अर्थहीन नहीं हो जाती है। ये उन सभी द्वारा गाई जाती है जो इस कविता के मायने और इस कविता की भावना से सरोकार रखते हैं।

1994 की Il Postino (द पोस्टमैन) नामक एक इतालवी भाषा की फिल्म थी जिसका एक संवाद है जो इस मान्यता को कि “एक कविता एक समय गुज़र जाने के साथ कवि के नाम से स्वतंत्र हो जाती है” खूबसूरती से व्यक्त करता है। फिल्म एक काल्पनिक कहानी है जहाँ एक युवा डाकिया कवि पाब्लो नेरुदा से नियमित रूप से मिलता है और उनकी कविता से प्रभावित हो जाता है। बाद में वही डाकिया एक स्थानीय लड़की, जिससे वह प्यार करता है और शादी करना चाहता है, को प्रभावित करने के लिए नेरुदा की कुछ कविताओं को अपने नाम से उसे भेंट करता है। जब नेरूदा को इसका पता चलता है तो वे डाकिया से नारजगी ज़ाहिर करते हैं। जवान डाकिया यह कहते हुए अपने काम को सही ठहराता है कि “कविता उन लोगों की नहीं है जो इसे लिखते हैं, यह उन लोगों के हैं जिन्हें इसकी आवश्यकता है।”

बात में तो दम है क्यूंकि जब इक़बाल कहते हैं, “कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी” तो ये एक लाइन अब सिर्फ इकबाल की नहीं रह जाती है, क्योंकि वो बाद में फैज़ का चरित्र उस रूप में परिवर्तित हो गया था जिसे हिंदुस्तान के अस्तित्व की परवाह ही नहीं थी है। आज उन्ही इकबाल की ये एक छोटी सी लाइन कि “कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी” हर एक भारतीय को आश्वासन देती है कि उनका देश सभी बाधाओं के बावजूद अपना अस्तित्व बनाए रखेगा।

अगर देखा जाए तो इस्लामवादी इकबाल के शब्दों का इस्तेमाल एक “संघी” द्वारा खुद को आश्वस्त करने के लिए किया जा सकता है कि हिंदुस्तान, हिन्दुओं की जन्मभूमि, आज भी जिंदा है जबकि समकालीन सभ्यताएं लुप्त हो गई हैं। और वहीं दूसरी तरफ, एक ’क्रांतिकारी’ फैज़ के शब्दों का उपयोग इस्लामवादी खुद को राहत देने के लिए कर सकते हैं कि ग़ज़वा-ए-हिंद बस होने ही वाला है।

फैज़ के “देखेंगे” में इस्तेमाल किए गए शब्द, मूर्तिपूजा के विरोध में इस्लाम की प्रचलित मान्यताओं के रूपक मात्र हैं और काबा में पूर्व-इस्लामिक मूर्तियों के नष्ट होने और अल्लाह के वर्चस्व की स्थापना की कल्पना का परिवेश पैदा करते हैं।

लेकिन जनाब अब ज़रा ये बताइए कि “वे” शब्द नागरिक संशोधन कानून के विरोध में कैसे उपयुक्त हो सकते हैं? याद है ना आपको कि इस तरह के विरोध प्रदर्शनों में जो भीड़ देखी गई थी वो क्या नारे लगा रही थी?

ये नारे थे ‘तेरा मेरा रिश्ता क्या, ला इलाही इल्लल्लाह’ और ‘काफिरों से आजादी’ और साथ में अगर आपको याद हो तो पटना में भगवान हनुमान की एक मूर्ति को नष्ट भी कर दिया गया था।

अब आप यह तर्क दे सकते है कि यह कविता आईआईटी कानपुर में पढ़ी गई थी, जहाँ भीड़ ने इस तरह के नारे नहीं लगाए थे। लेकिन आपकी जानकारी के लिए बता दूँ कि इन दिनों अंबेडकर-पेरियार स्टडी सर्कल (APSC) जैसे गैंग इन संस्थानों में पैर जमा रहे हैं। वे रामायण महोत्सव मनाने जैसी घटनाओं का विरोध सिर्फ इसलिए करते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि ये उनकी भावनाओं के लिए अपमानजनक है बावजूद इसके कि जो लोग महोत्सव मना रहे हैं वो इन से भावनात्मक रूप से जुड़े होते हैं।

दशानन दहन भी बुराई पर अच्छाई की जीत का रूपक है और इसे काबा से हटाई जा रही मूर्तियों के रूपक के समान माना जा सकता है। लेकिन APSC जैसे समूह इस विचारधारा का विरोध करते हैं। उनके विचार में, रावण एक द्रविड़ / दलित राजा था और उसका जलाया जाना बुराई पर अच्छाई की जीत नहीं बल्कि आर्यों / उच्च जातियों के दलित और पिछड़ी जातियों पर वर्चस्व के बारे में है और फिर वे क्या करते हैं? वे इस विरोध में राम का पुतला जलाते हैं। उनको इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि रावण के पतन का जश्न मनाने वाले लोग उसे द्रविड़ या दलित जैसा कुछ नहीं मानते हैं, बल्कि उसे सिर्फ और सिर्फ एक खलनायक के रूप में देखते हैं।

इस सार्वभौमिक धार्मिक विचारधारा के विरोध का पूरा समर्थन लिब्रल्स और “जागृत” पीढ़ी करती है। इन्हीं बे सिर-पैर के तर्कों के सहारे जेएनयू जैसे परिसरों में महिषासुर की पूजा का आयोजन किया जाता है और दुर्गा पूजा का विरोध किया जाता है और हमारे तथाकथित लिबरल्स इसे “वैकल्पिक इतिहास” का नाम देते है। उनका ये समर्थन इस “वैकल्पिक इतिहास” को एक सामान्य घटना दिखाने के लिए किया जाता है बिना ये जाने हुए कि ऐसा करने से उन भावनाओं का क्या होगा जो महोत्सवों के विरोध में हुई घटनाओ से क्षुब्द हैं।

और फिर अगर ऐसा ही है तो फैज़ की शायरी का विरोध करने वालों को इस बात की परवाह क्यों कर होनी चाहिए कि इस कविता का मतलब क्या है या फैज़ उन लोगों का कौन था जो इस कार्यक्रम का आयोजन कर रहे थे?

सिर्फ मूर्तियों को नष्ट किए जाने की कल्पना मात्र और केवल अल्लाह का नाम ही इस दुनिया में रहना चाहिए, ये सोच मात्र ही इस कविता का विरोध करने के लिए काफी होना चाहिए ना? या फिर लिबरल्स को ये लगता है कि उनकी भावनाएँ दूसरों की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण हैं?

यह बेहद दुखद है कि फैज़ को इस सब में घसीटा गया है, लेकिन जान लीजिए कि यह फैज़ के खिलाफ लड़ाई नहीं है। यह एक पुरानी उलझी हुई कट्टर परम्परा के खिलाफ लड़ाई है, जो माँग करती है कि ‘जहिल’ लोगों को पूरी तरह से सर झुका कर मानना होगा कि वो क्या पढ़ें, क्या सोचे, बिना आज्ञा के कोई कार्य न करें, और इन सब बातों के खिलाफ कभी आवाज़ ना उठाएँ।

लेकिन उन्हें इस बात का एहसास नहीं है कि जाहिलों ने अब मन बना लिया है और बोलने का फैसला किया है और उनके “लब भी आज़ाद हैं”। उन्होंने अब दीवार से पीठ सटा कर खड़े होने से इनकार कर दिया है और पत्थर का जवाब चट्टान से देने का ठान लिया है। उन्हें अब अपनी ‘जाहिलियत‘ पर शर्म नहीं आती या फैज़ के शब्दों में कहें तो जाहिलों ने ऐलान कर दिया है कि:

हम परवरिश-ए-लौह-ओ-क़लम करते रहेंगे
जो दिल पे गुज़रती है रक़म करते रहेंगे

नोट: राहुल रौशन द्वारा मूल रूप से अंग्रेजी में लिखे इस लेख का अनुवाद मनीष श्रीवास्तव द्वारा किया गया है।

JNU में नक़ाबपोश छात्रों ने लाइट बंद कर किया हंगामा: टेक्निकल स्टाफ को किया बाहर, रजिस्ट्रेशन में डाला व्यवधान

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) में विवादों का सिलसिला अभी थमा नहीं है। दरअसल, एक ख़बर सामने आई थी कि विश्वविद्यालय के सूचना केंद्र मे छात्रों के एक ग्रुप ने हमला बोल दिया, इस वजह से रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया प्रभावित हो गई। JNU प्रशासन का कहना है कि शुक्रवार (3 जनवरी) को दोपहर के क़रीब 1 बजे, छात्रों का एक समूह जो अपना चेहरा ढके हुए थे वो सूचना प्रणाली के केंद्र में जबरन घुसे और उन्होंने बिजली की सप्लाई को भी बंद कर दिया। सभी तकनीकी कर्मचारियों को जबरन बाहर निकाल दिया और सर्वर को बंद कर दिया।

इस मामले पर विश्वविद्यालय प्रशासन का कहना है कि छात्रों के इस हमले से रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया में बाधा उत्पन्न हुई और छात्रों के लिए अपना रजिस्ट्रेशन प्रोसेस पूरा करना असंभव हो गया। प्रशासन ने चेतावनी देते हुए बताया कि उन सभी हुड़दंगियों के ख़िलाफ़ विश्वविद्यालय प्रशासन सख़्त कार्रवाई करेगी, जिन्होंने रजिस्ट्रेशन करने वाले हज़ारों छात्रों को परेशान किया।

इससे पहले भी ऐसी कई ख़बरें आ चुकी हैं जिनमें JNU के छात्रों ने प्रोफेसर्स और वैज्ञानिकों को न सिर्फ़ बंधक बनाया बल्कि उनके साथ बदतमीज़ी करते हुए उन्हें गालियाँ भी दी। इनमें वैज्ञानिक आनंद रंगनाथन जैसे नाम शामिल हैं जिन्हें उन्हीं की लैब में नहीं जाने दिया गया था। जेएनयू के छात्रों की गुंडागर्दी से आहत रंगनाथन ने कहा था कि पता नहीं इस देश में विज्ञान कैसे आगे बढ़ेगा।

इसी तरह, प्रोफेसर गोवर्धन दास को एक इंटरनेशनल ग्रांट प्रपोजल पर काम करना था, जो संभव नहीं हो सका। उन्हें एक निश्चित समय सीमा के भीतर अपना काम ख़त्म करना था, लेकिन लैब में तालाबंदी कर छात्रों ने उन्हें परेशान किया। इस दौरान उनके साथ धक्का-मुक्की की गई, उनका मोबाइल छीना गया और उन्हें 40 छात्रों की भीड़ ने गालियाँ दी। इन दोनों के अलावा वैज्ञानिक शैलजा सिंह भी लैब में नहीं जा सकीं। 

ग़ौरतलब है कि जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के हॉस्टल शुल्क में वृद्धि 11 नवंबर 2019 को की गई थी, जिसके बाद से ही विरोध-प्रदर्शन शुरू हो गए थे। इस दौरान, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के हज़ारों छात्र पुलिस के साथ भिड़ गए। इससे मानव संसाधन विकास मंत्री रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में छह घंटे से अधिक समय तक फँसे रहे।

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