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पाकिस्तानी हिन्दू शरणार्थियों को Uber ड्राइवर नसीम ने गाड़ी से निकाला… क्योंकि वे कर रहे थे CAA का समर्थन

दिल्ली भाजपा के प्रवक्ता तेजिंदर सिंह बग्गा ने उबर इंडिया पर गंभीर आरोप लगाए हैं। आरोप है कि उबर इंडिया ने एक व्यक्ति को मजनू का टीला शरणार्थी कैम्प तक छोड़ने से सिर्फ़ इसलिए इनकार कर दिया, क्योंकि वो पाकिस्तानी हिन्दू था। ड्राइवर नसीम की इस करतूत के बारे में बग्गा ने ट्विटर पर लोगों को जानकारी दी। उन्होंने बताया कि नसीम को जैसे ही पता चला कि उसे अपने कैब में एक पाकिस्तानी हिन्दू को लेकर जाना है, वह वहाँ से चला गया

दरअसल, दिल्ली के कनॉट प्लेस में सीएए के समर्थन में एक रैली आयोजित की गई थी, जिसमें बड़ी संख्या में लोगों ने भाग लिया। नागरिकता संशोधन क़ानून के समर्थन में आयोजित इस रैली में कई पाकिस्तानी शरणार्थियों ने भी हिस्सा लिया। इस क़ानून से तीनों पड़ोसी इस्लामिक मुल्कों पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान और बांग्लादेश के उत्पीड़ित धार्मिक अल्पसंख्यक शरणार्थियों को भारत की नागरिकता मिलने की राह प्रशस्त हो गई। इसीलिए, दिल्ली में रह रहे पाकिस्तानी हिन्दुओं में भी जश्न का माहौल है।

उक्त घटना के बारे में जानकारी देते हुए पाकिस्तानी हिन्दुओं ने बताया कि उबर इंडिया के ड्राइवर नसीम ने उन्हें नीचे उतरने को कहा। जैसे ही वो नीचे उतरे, वो गाड़ी लेकर फरार हो गया। तेजिंदर बग्गा ने उबर ड्राइवर नसीम द्वारा पाकिस्तानी हिन्दुओं को गाड़ी से निकाल बाहर किए जाने की निंदा की। ऑपइंडिया ने इस सम्बन्ध में उबर इंडिया से कॉन्टैक्ट किया है, लेकिन अभी तक उनकी तरफ से कोई बयान नहीं आया है।

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‘आप लोगों ने तो मेरे हाथ-पाँव काट दिए’ – जय श्रीराम से Video शुरू कर पाकिस्तानी गेंदबाज ने बयाँ किया दर्द

पूर्व पाकिस्तानी लेग स्पिनर दानिश कनेरिया ने यूट्यब पर एक भावुक वीडियो डाला है, जिसमें उन्होंने ताज़ा विवाद को लेकर बातचीत की। हाल ही में पाकिस्तान के पूर्व तेज़ गेंदबाज़ शोएब अख्तर ने खुलासा किया था कि हिन्दू होने के कारण पाकिस्तान क्रिकेट के ड्रेसिंग रूम में दानिश के साथ भेदभाव होता था। दानिश ने भी इन आरोपों की पुष्टि की है। उन्होंने ‘जय श्री राम’ से अपने वीडियो की शुरुआत करते हुए सबसे पहले लोगों को समर्थन के लिए धन्यवाद दिया। उन्होंने उन लोगों को करारा जवाब दिया, जो ये कह रहे थे कि दानिश सस्ती लोकप्रियता के लिए आरोप लगा रहे हैं।

दानिश ने याद दिलाया कि ये आरोप उन्होंने नहीं लगाए बल्कि शोएब अख्तर ने सबसे पहले इसका खुलासा किया। दानिश ने कहा कि घरेलू क्रिकेट से लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान के लिए खेल कर, उन्होंने जो कुछ भी झेला उसे अपने खेल के आड़े नहीं आने दिया। मीडिया चैनलों की आलोचना करते हुए दानिश ने कहा- “आपलोगों ने तो मेरे हाथ-पाँव काट दिए हैं।” उन्होंने आरोप लगाया कि कई टीवी चैनलों ने उन्हें काम देना बंद कर दिया। दानिश ने आरोप लगाया कि जिस चैनल के लिए उन्होंने काम किया, उसने भी अभी तक पेमेंट नहीं दी है।

दानिश ने पूछा कि ये चैनल वाले क्या चाहते हैं? क्या वो ख़ुद को ख़त्म कर लें? दानिश ने कहा कि उन्होंने 10 साल मेहनत कर के क्रिकेट खेली और एक दिन में 40 ओवर तक फेंके, लेकिन कभी बैक इंजरी वगैरह का बहाना नहीं किया। दानिश ने बताया कि उनकी उँगलियों में से ख़ून गिरता था, उन्होंने क्रिकेट ग्राउंड को अपना ख़ून दिया। दानिश ने कहा कि तीनों फॉर्मेट में खेलने और अच्छा करने के बावजूद उन्हें जानबूझ कर टेस्ट क्रिकेट तक सीमित रखा गया। इस दौरान दानिश ने अपने ऊपर लगे फिक्सिंग के आरोपों को लेकर भी बातचीत की।

पूर्व पाकिस्तानी स्पिनर ने बताया कि उन पर अन्य क्रिकेटरों को उकसाने का आरोप लगा था। उन्होंने बताया कि उन पर मैच को गुमराह करने का आरोप लगा था। दानिश ने अपनी ग़लती स्वीकारते हुए कहा कि इंसान से ही ग़लती होती है। साथ ही उन्होंने कहा कि कुछ लोगों ने तो मुल्क को ही बेच डाला, पैसे खाए और जेल गए। उन्होंने आरोप लगाया कि ऐसे लोगों को वापस टीम में लाया गया और उनका स्वागत किया गया। उन्होंने आरोप लगाया कि जिन पर फिक्सिंग के आरोप थे, उन्हें क्रिकेट बोर्ड में लाया गया, टीवी चैनलों में काम दिया गया और अन्य जगहों पर भी स्वागत किया गया।

दानिश ने आगे कहा कि उन्होंने कभी भी पैसे नहीं खाए। उन्होंने उनके केस को तोड़ने-मरोड़ने और ग़लत एंगल से पेश किए जाने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि उन्हें एक विवादित व्यक्ति से इंट्रोड्यूस कराते हुए कहा गया था कि वो भी हिन्दू है। दानिश ने कहा कि घरेलू क्रिकेट से लेकर पाकिस्तान के लिए खेल तक, उन्होंने हमेशा ईमानदारी से खेला और पाकिस्तान को मैच जिताए। उन्होंने आगे कहा:

“चाहे भारत का टूर हो या फिर ऑस्ट्रेलिया का, मुझे बस यही चिंता रहती थी कि पाकिस्तान को किस तरह जिताना है। मैं रात को सोता तक नहीं था। जो लोग मेरे कजन भाई अनिल दलपत को इस मामले में घसीट रहे हैं, उनसे भी जाकर पूछिए कि उनके साथ क्या सलूक हुआ। उन्होंने भी क्रिकेट खेली है। चैनलों पर बकवास किया जा रहा है। जिन लोगों ने कभी क्रिकेट नहीं खेली, वो लोग झूठी बातें कर के अपना लेवल डाउन कर रहे हैं। मैं इतने वर्षों तक पाक क्रिकेट बोर्ड से और पाकिस्तान की जनता से मदद माँगता रहा, लेकिन किसी ने भी मेरी सहायता नहीं की। मुझे प्रतिबंधित कर दिया गया।”

पूर्व पाकिस्तानी गेंदबाज दानिश कनेरिया का बयान

दानिश कनेरिया ने आरोप लगाया कि कई पाकिस्तानी खिलाड़ियों ने लीग मैच खेलने के लिए देश के क्रिकेट को किनारे पर रखा। अपना दर्द बयाँ करते हुए कनेरिया ने कहा कि उनके पास रोज़गार नहीं है। उन्होंने बताया कि वो एक दशक से बेरोज़गार हैं। उन्होंने कहा कि उनके पास परिवार भी है, उनकी मदद कौन करेगा? भावुक दानिश ने पाकिस्तान के विशेषज्ञों से कहा कि वो हकीकत जान कर ही बात करें। दानिश ने भारत के लोगों का भी समर्थन के लिए शुक्रिया अदा किया।

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बाप की मौत, माँ डिटेंशन कैंप में… बेटी को जबरन भेजा हॉस्टल: चीन में 5 लाख उइगर बच्चों की कहानी

चीन में डिटेंशन कैंंप की आड़ में लाखों उइगर और कजाक मुस्लिमों को क़ैद कर रखा गया है, जहाँ उन्हें कई तरह से प्रताड़ित किया जाता है। शुरुआत में इन ख़बरों का खंडन करने के बाद अब चीन ने स्वीकार कर लिया है कि वो मुस्लिमों को व्यावसायिक प्रशिक्षण मुहैया कराने के लिए ट्रेनिंग कैंप में भेजता है। हालाँकि, इसका मक़सद इस समुदाय की कट्टरता को ख़त्म करना और उनका दमन करना है। डिटेंशन सेंटर में भेजे गए मुस्लिमों के बच्चों को चीन के सरकारी-बोर्डिंग स्कूलों में रखा गया है, जिससे उनमें बचपन से ही कट्टरता की भावना को पनपने से रोका जा सके। ऐसे बच्चों की संख्या लगभग पाँच लाख है।

चीन के शिनजियांग प्रांत में ऐसे सैकड़ों बोर्डिंग स्कूल खुले हुए हैं, जिनमें उइगर बच्चों को रखा जा रहा है। न्यूयॉर्क टाइम्स की ख़बर के अनुसार, ऐसा ही एक मामला पहली कक्षा में पढ़ने वाली एक छोटी बच्ची का है। उसके क्लास के दोस्त उसे बहुत प्यार करते हैं और वह पढ़ने-लिखने में भी अच्छी है, लेकिन वह अकेले में रोया करती है। दरअसल, वह अपनी माँ के पास जाना चाहती है, जिसे चीन में एक डिटेंशन सेंटर में रखा गया है। उसके पिता का देहांत हो चुका है।

मगर, प्रशासन ने बच्ची को उसके दूसरे नज़दीकी रिश्तेदारों को सौंपने के बजाय बोर्डिंग स्कूल में डाल दिया। रिपोर्ट में इस बात का भी उल्लेख किया गया कि बीते तीन सालों में क़रीब 10 लाख से अधिक उइगर और कज़ाक मुस्लिमों को डिटेंशन कैंपों में रखा गया है। इसका मक़सद उइगर आबादी की इस्लाम में आस्था को कमज़ोर करना है। इसके साथ-साथ चीन की सरकार समाज के बच्चों को टारगेट कर रही है। लिहाज़ा, उनके बच्चों को बोर्डिंग स्कूलों में रखा गया, जिससे वो शुरू से ही अपने मज़हब से दूर हो जाएँ।

चीन की सत्तारूढ़ कम्युनिस्ट पार्टी का कहना है कि ऐसे स्कूलों को ग़रीब बच्चों के लिए तैयार किया गया है, जिनके परिजन सुदूर इलाक़ो में काम करते हैं और उनकी देखभाल करने में असमर्थ हैं। हालाँकि, 2017 के एक दस्तावेज़ के अनुसार, सरकार चाहती है कि बच्चों को उनके परिवारों से दूर रखा जाए, जिससे उनके परिवार का प्रभाव उन बच्चों पर न पड़े। शिनजियांग प्रांत की सरकार की ओर से जारी एक दस्तावेज़ के अनुसार, अगले साल के अंत तक सूबे के 800 से अधिक इलाक़ो में ऐसे एक या दो स्कूल खोलने की योजना है।

उइगरों को लेकर चीन के कारनामे लगातार सामने आ रहे हैं। हाल ही में एक ख़बर सामने आई थी जिसमें डिटेंशन सेंटर से आई कई महिलाओं ने दावा किया था कि वहाँ उइगर महिलाओं को बुरी तरह प्रताड़ित किया जा रहा है।

मानवाधिकार संगठनों और विश्लेषकों का कहना है कि चीन की सरकार के सख्त नियंत्रण वाले उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र में क़रीब 10 लाख उइगरों को हिरासत कैंपों में रखकर उन्हें प्रताड़ित किया जा रहा है। हालाँकि, चीन उइगरों के लिए इन केंद्रों को आतंकवाद निरोधी क़दम के तौर पर देखता है जहाँ पर क़ैदियों को मंदारिन और चीनी क़ानून पढ़ाया जाता है।

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कॉन्ग्रेस कार्यकर्ता को भारी पड़ा प्रियंका को स्कूटी पर बैठा कर फर्राटे भरना, कटा ₹6100 का चालान

उत्तर प्रदेश में शनिवार (दिसंबर 28, 2019) को प्रियंका गाँधी का एक वीडियो वायरल हुआ था, जिसमें वो एक कॉन्ग्रेस कार्यकर्ता के साथ स्कूटी पर बैठ कर जाती हुई दिख रही हैं। इस दौरान लखनऊ में प्रियंका और उनके साथियों ने एक महिला पुलिसकर्मी को धक्का भी दिया। हालाँकि, बाद में कॉन्ग्रेस ने आरोप लगाया कि महिला पुलिसकर्मी अर्चना सिंह ने इन आरोपों को नकार दिया और कहा कि वो बस अपनी ड्यूटी कर रही थीं। अर्चना ने बताया कि प्रियंका का फ्लीट इंचार्ज होने के कारण वो उनके सुरक्षा काफिले में शामिल रहीं लेकिन अचानक से प्रियंका वहाँ जाने लगी, जहाँ का उनका कार्यक्रम तय नहीं था।

अब यूपी ट्रैफिक पुलिस ने उस कॉन्ग्रेस कार्यकर्ता पर जुर्माना लगाया है, जो प्रियंका गाँधी को स्कूटी पर बिठा कर फर्राटे भर रहा था। सीएए विरोधी रैली में उपद्रव मचाने वाले पूर्व आईपीएस अधिकारी एसआर दारापुरी के परिजनों से मिलने के लिए प्रियंका ने यूपी पुलिस को चकमा दिया था। उस दौरान उन्होंने एक कॉन्ग्रेस कार्यकर्ता के स्कूटी के पीछे बैठ कर अपनी यात्रा तय की थी। चूँकि कॉन्ग्रेस कार्यकर्ता ने हेलमेट नहीं पहना हुआ था, पुलिस ने उसका 6100 रुपए का चालान काटा है।

प्रियंका गाँधी को जब पुलिस ने रोका, तो उन्होंने पैदल चलना शुरू कर दिया। एक कॉन्ग्रेस कार्यकर्ता ने बताया कि प्रियंका ने लगभग 3-4 किलोमीटर पैदल चल कर पुलिस को चकमा दिया। प्रियंका गाँधी के कारण उस क्षेत्र में ट्रैफिक व्यवस्था अस्त-व्यस्त हो गई और घंटों जाम लगा रहा। प्रियंका ने इसके लिए पुलिस को जिम्मेदार ठहराया। प्रियंका गाँधी ने कहा कि अगर सरकार उन्हें गिरफ़्तार करना चाहती हैं तो वो इसके लिए तैयार हैं।

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फीका ही रहा मोरहाबादी का मेला, उद्धव की तरह हेमंत सोरेन भी नहीं जमा सके कर्नाटक जैसा रंग

झारखंड में विधानसभा चुनाव के नतीजे आए तो इस राज्य की सत्ता भाजपा से छिटक कर विपक्षी झामुमो-कॉन्ग्रेस-राजद गठबंधन की झोली में जाकर गिर गया। नतीजों के बाद सोशल मीडिया में भारत का वह नक्शा जमकर शेयर किया गया जो बता रहा था कि देश में भाजपा शासित राज्यों की संख्या कम हो रही है। लेकिन, रविवार (29 दिसंबर 2019) को रॉंची के मोरहाबादी मैदान में जब हेमंत सोरेन ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली तो विपक्ष वैसा रंग नहीं जमा पाया, जैसा कर्नाटक में मई 2018 में एचडी कुमारस्वामी के शपथ ग्रहण समारोह में दिखा था।

इसके कारण क्या हैं? क्या विपक्ष अब भी लोकसभा चुनाव की करारी शिकस्त के सदमे से उबर नहीं पाया है? क्या मोदी मैजिक के और गाढ़ा होने के डर अब विपक्ष एक मंच पर जुटने की भी हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है? उसे डर सता रहा है कि मंच से विपक्षी एकता का हुंकार भरने वाले क्षेत्रीय क्षत्रप मंच से उतरते ही फिर उसी तरह अपनी-अपनी राह पकड़ लेंगे जैसा उन्होंने कुमारस्वामी के शपथ लेने के बाद किया था?

जवाब तलाशने से पहले कर्नाटक के उस प्रकरण को फिर से याद करते हैं। विधानसभा चुनावों में भाजपा सबसे बड़े दल के तौर पर उभरी थी। लेकिन बहुमत से थोड़ा दूर रह गई थी। एक-दूसरे के खिलाफ चुनाव लड़ने वाले जनता दल (एस) और कॉन्ग्रेस ने सत्ता के लिए गठजोड़ कर लिया। ठीक वैसे ही जैसे अभी हाल में हमने महाराष्ट्र में देखा है। जनता दल (एस) के कुमारस्वामी ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। उन्हें शपथ लेते देखने के लिए सोनिया गॉंधी, मायावती, ममता बनर्जी, अखिलेश यादव, राहुल गॉंधी, शरद पवार, अरविंद केजरीवाल, सीताराम येचुरी, चंद्रबाबू नायडू, नारायणसामी, पिनरई विजयन जैसे विपक्षी खेमे के नेता जुटे। माया का हाथ पकड़े सोनिया की तस्वीर पर तो पूरा लिबरल गिरोह ही निहाल हो गया था। इस तस्वीर को दिखाकर मोदी की विदाई का दंभ भरने वालों की कमी न थी।

लेकिन, आम चुनावों के नतीजों ने साबित किया कि ऐसे जमावड़ों से मोदी मैजिक और गहरा हो जाता है। यही कारण है कि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी तो रॉंची पहुॅंच गईं, लेकिन सोनिया और मायावती ​नजर नहीं आईं। सोनिया को शपथ ग्रहण में शामिल होने का न्योता खुद हेमंत सोरेन 10 जनपथ आकर दे गए थे। इसी तरह दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल भी नहीं दिखे। उनके प्रतिनिधि के तौर राज्यसभा के सांसद संजय सिंह दिखे। वापमंथी खेमे से न माकपा महासचिव येचुरी थे और न केरल के सीएम विजयन। भाकपा के डीराजा जरूर दिखे। लालू यादव रॉंची के ही जेल में बंद हैं। हेमंत के साथ राजद के एकमात्र विधायक को भी शपथ लेनी थी तो राजद नेता और बिहार के पूर्व उप मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव को आना ही था और वे आए भी। साथ में शरद यादव भी थे। दक्षिण की भागीदारी के नाम पर डीएमके नेता स्टालिन की मौजूदगी दिखी जो कुमारस्वामी के शपथ ग्रहण में नहीं आए थे।

विपक्षी नेताओं के जुटान का हेमंत का प्रयास उद्धव ठाकरे के शपथ ग्रहण से भी फीका हो जाता यदि कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गॉंधी नहीं आते। उनके साथ कॉन्ग्रेस शासित दो राज्यों राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और छत्तीसगढ़ के सीएम भूपेश बघेल भी थे। उल्लेखनीय है कि उद्धव के शपथ ग्रहण में राहुल गॉंधी नहीं पहुॅंचे थे।

मोरहाबादी मैदान में चंद्रबाबू नायडू का न होना तो समझ में आता है। जब कुमारस्वामी ने शपथ लिया था उस वक्त वे एनडीए से बाहर निकल आए थे। विपक्ष को एक कुनबे की बॉंधने की कोशिश में थे। आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री हुआ करते थे। अब उनकी राजनीतिक हैसियत ही वह नहीं रही कि वे विपक्षी एकता का दंभ भर सकें। लेकिन, महाराष्ट्र में भाजपा को सत्ता से दूर रखकर विपक्ष की आँखों के तारे बने कथित किंगमेकर शरद पवार भी झारखंड के जमावड़े से दूर ही रहे।

लेकिन सबसे ज्यादा चौंकाने वाली गैर मौजूदगी थी कॉन्ग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गॉंधी की। वे उद्धव के शपथ ग्रहण में भी नहीं पहुॅंची थीं। उस समय उन्हें न्योता देने के लिए उद्धव ठाकरे ने अपने विधायक बेटे आदित्य ठाकरे को 10 जनपथ भेजा था। बावजूद इसके उनके मुंबई नहीं पहुॅंचने के कारणों को समझना मुश्किल नहीं था। असल में कॉन्ग्रेस और शिवसेना विचारधारा के स्तर पर दो विपरीत ध्रुव पर खड़े थे। ऐसे में वहॉं सोनिया का न होना असहज करने वाले मुश्किल सवालों को टालने की रणनीति हो सकती है।

लेकिन, झारखंड में उनके साथ ऐसी दुविधा न थी। हेमंत सोरेन की पार्टी झामुमो के साथ कॉन्ग्रेस पहले भी मिलकर चुनाव लड़ चुकी है। दोनों दल केंद्र और राज्य की सरकार में साथ भी रहे हैं। हेमंत सोरेन के पिता शिबू सोरेन तो मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार में मंत्री भी हुआ करते थे। इतना ही नहीं इस बार के विधानसभा चुनाव में कॉन्ग्रेस ने झारखंड में 16 सीटें जीती है। अलग राज्य बनने के बाद से हुए विधानसभा चुनावों में उसका यह अब तक का सबसे बेहतरीन प्रदर्शन है।

बावजूद इसके सोनिया का नहीं पहुॅंचना बताता है कि कर्नाटक के अनुभव और आम चुनावों के नतीजे उन्हें विपक्षी एकता का संदेश देने से रोक रहे हैं। वे जानती हैं कि ऐसी एक और कोशिश मोदी के रंग को और गहरा कर देगा। मतदाताओं को उनके साथ और मजबूती से खड़ा करेगा। अगले कुछ महीनों में दिल्ली में भी विधानसभा चुनाव होने हैं। ऐसे में केजरीवाल के साथ मंच साझा करना दिल्ली में दोनों दलों को असहज कर सकता था। बंगाल में भी टीएमसी, वाम दलों और कॉन्ग्रेस के एक साथ आने की सूरत नहीं दिख रही।

लेकिन, इस फीके रंग ने भी भाजपा को तंज कसने का मौका दे दिया है। शपथ ग्रहण के बाद बिहार के स्वास्थ्य मंत्री और बीजेपी नेता मंगल पांडे ने ट्वीट किया, “झारखंड में हुए आज शपथ ग्रहण समारोह में पूरब से चिटफंड पहुॅंचा था तो दक्षिण से 2G। वही उत्तर से चारा घोटाला तो मध्य से नेशनल हेराल्ड। रही-सही कसर मुख्यमंत्री जी के पिता जी के कोयला घोटाला ने पूरी कर दी।”

यानी, मंच पर विपक्ष का रंग भले न जम पाया हो भाजपा को बैठे-बिठाए एक मुद्दा जरूर मिल गया है, जिसका शोर बिहार के विधानसभा चुनावों में भी अगले साल सुनाई पड़ सकता है।

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धर्मान्तरण कराने पहुँचा था ईसाई मिशनरी, बौद्ध भिक्षु ने मारा ज़ोरदार थप्पड़, वीडियो वायरल

दुनिया भर में ईसाई मिशनरियों द्वारा दूसरे धर्म के लोगों का धर्मान्तरण कराए जाने की बातें सामने आती रहती हैं। ख़ासकर ऐसे लोगों को ज़्यादा निशाना बनाया जाता है, जो आर्थिक रूप से पिछड़े इलाक़ों में रहते हैं या फिर मुख्यधारा से दूर हैं। तरह-तरह के प्रलोभन देकर और ईसाई मजहब को सबसे श्रेष्ठ बता कर ऐसी करतूतों को अंजाम दिया जाता है। ऐसे ही एक मिशनरी को एक बौद्ध भिक्षु ने करारा सबक सिखाया। श्रीलंका के पूर्वी क्षेत्र में स्थित बट्टीकलोआ में बौद्ध भिक्षु सुमनरत्ना थेरो ने एक ईसाई मिशनरी को खींच कर चाटा मारा।

ईसाई मिशनरी भोले-भाले लोगों को प्रलोभन दे रहा था और अपने मजहब की श्रेष्ठता का बखान कर रहा था। तभी वहाँ पहुँचे बौद्ध भिक्षु सुमनरत्ना ने उसे ऐसा चाटा मारा कि उसका चश्मा ज़मीन पर जा गिरा और वो व्यक्ति कुछ क़दम पीछे जा खड़ा हुआ। इस घटना के समय वहाँ कई अन्य बौद्ध भिक्षु और स्थानीय लोग भी उपस्थित थे। नीचे संलग्न किए गए वीडियो में आप देख सकते हैं:

इसके बाद बौद्ध भिक्षु ने वहाँ के पुलिस अधिकारियों की भी क्लास लगाई। सुमनरत्ना थेरो ने पुलिसकर्मियों को जम कर फटकारा और पूछा कि वो अपने क्षेत्रों में ईसाई धर्मान्तरण को रोकने में विफल क्यों साबित हो रहे हैं? सुमनरत्ना ने एक अन्य क्रिस्चियन मिशनरी को उसकी बाइक रोक कर उसे फटकार लगाई। कई लिबरल लोगों ने जहाँ इस घटना को लेकर कहा कि अगर ग़लत हो रहा था तो क़ानून को कार्रवाई करनी चाहिए थी, वहीं आम लोगों ने बौद्ध भिक्षु की सराहना की।

‘कोलोंबो टेलीग्राफ’ के अनुसार, श्रीलंका में राष्ट्रपति गोटाभाया राजपक्षे के सत्ता में आने के बाद से ही क्रिस्चियन मिशनरियों व इस्लामिक कट्टरपंथियों के ख़िलाफ़ लोग आवाज़ उठा रहे हैं। श्रीलंका की सरकार पर आरोप लग रहे हैं कि ये सिंहला प्रभुत्व वाली सरकार है और तमिलों को उनका हक़ नहीं मिल रहा। हाल ही में भारत दौरे पर आए राष्ट्रपति राजपक्षे ने ऐसे किसी भेदभाव से इनकार किया था। लेकिन, इस्लामिक आतंकवाद और कटवारपंथ को लेकर उन्होंने कड़े तेवर दिखाए थे।

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शिव मंदिर में फेंके प्रतिबंधित मांस के टुकड़े, बीफ के कारण पहले भी इस इलाके में हुआ था बवाल

झारखण्ड के धनबाद और जामताड़ा जिले की सीमा पर स्थित करमदाहा में रविवार (दिसंबर 29, 2019) को सुबह हिन्दुओं की धार्मिक भावनाएँ भड़काने के लिए मंदिर के पास प्रतिबंधित माँस का टुकड़ा फेंका गया। ये घटना दुखिया महादेव मंदिर के समीप हुई। पुलिस ने कहा है कि ये कुछ शरारती तत्वों की करतूत है। इस मामले में अज्ञात लोगों के ख़िलाफ़ प्राथमिकी दर्ज की गई है। मंदिर में मांस की खबर सुन आक्रोशित स्थानीय लोगों ने क़रीब 6 घंटे तक सड़क को जाम रखा। पुलिस ने समझा-बुझा कर स्थिति को शांत कराया।

इस सम्बन्ध में ऑपइंडिया ने दैनिक जागरण के स्थानीय पत्रकार प्रमोद चौधरी से बातचीत की, जिन्होंने बताया कि मुस्लिम-बहुल आबादी के कारण यह इलाक़ा पहले से ही संवेदनशील रहा है। चौधरी ने बताया कि यहाँ हिन्दू-मुस्लिम तनाव का पुराना इतिहास रहा है। स्थानीय लोगों और पुलिस में इस घटना के कारण झड़प भी हुई। जब पुलिस ने दोषियों की तुरंत गिरफ़्तारी का आश्वासन दिया, तब जाकर लोग शांत हुए। ऑपइंडिया ने एसडीपीओ अरविन्द उपाध्याय से भी कॉन्टैक्ट करने की कोशिश की लेकिन उनसे बात नहीं हो सकी।

आक्रोशित लोगों ने दोषियों की त्वरित गिरफ़्तारी की माँग की

ये घटना जहाँ पर हुई, वो इलाक़ा अक्सर सुनसान रहता है। उक्त मंदिर बराकर नदी के घाट पर स्थित है। गोविंदपुर से साहिबगंज जाने वाली सड़क इसी आसपास से होकर गुजरती है, जिसे आक्रोशित लोगों ने 6 घंटे तक जाम रखा। जामताड़ा के विधायक व कॉन्ग्रेस नेता इरफ़ान अंसारी ने इस घटना पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा:

“जामताड़ा की जनता ने मुझे प्रचंड बहुमत से जिताया है। मैं भरोसा दिलाता हूँ कि दोषियों को नहीं बख्शा जाएगा। जिन्होंने आग लगाई है, वो भी जेल जाएँगे। जिन्होंने मंदिर में मांस का टुकड़ा फेंका है, उन्हें भी पकड़ कर जेल भेजा जाएगा। मैं यहाँ चकमाबाजी और धोखाधड़ी नहीं चलने दूँगा। दहशतगर्द जल्द ही पुलिस के शिकंजे में होंगे। आप मेरे पर भरोसा रखिए।”

स्थानीय कॉन्ग्रेस विधायक इरफ़ान अंसारी का बयान

बता दें कि ये वही इलाक़ा है, जहाँ एक वर्ष पूर्व मिन्हाज अंसारी नामक व्यक्ति ने बीफ की फोटो शेयर की था। बाद में पुलिस की हिरासत में उसकी मौत हो गई थी, जिसके बाद काफ़ी बवाल हुआ था। 22 वर्षीय मिन्हाज ने कटी हुई गाय का फोटो व्हाट्सप्प पर शेयर किया था और साथ में भड़काऊ बयानों को भी आगे बढ़ाया था। बाद में उसके परिजनों ने आरोप लगाया था कि उसे पुलिस ने प्रताड़ित किया और फिर मार डाला। पुलिस के अनुसार, कस्टडी में ही उसकी हालत बिगड़ गई, जिसके बाद उसे रिम्स में भर्ती कराया गया था। वहाँ उसकी मौत हो गई थी।

मुस्लिम भीड़ ने CAA के विरोध के नाम पर हनुमान मंदिर में घुस कर मूर्तियों को तोड़ा: वीडियो आया सामने

लिबरपंथियो, आँकड़े चाहिए हिन्दुओं पर हुए अत्याचार के? ये लो – रेप, हत्या, मंदिर सब का डेटा है यहाँ

मुस्लिम मॉब ने मंदिर में की तोड़-फोड़ और आगजनी: पटना में स्थानीय लोग और पुलिस इनके सामने असहाय

‘पैगंबर मुहम्मद ने 19 महिलाओं से निक़ाह क्यों किया?’ – सवाल पूछने पर मुस्लिम लड़की को सरेआम फाँसी की माँग

पाकिस्तान की अनीला एहसान ने पैगंबर मुहम्मद पर सवाल उठाकर वहाँ के कट्टरपंथियों को बैठे-बिठाए एक मुद्दा दे दिया। अब उन्हें इस्लामिक क़ानून के अनुसार, मज़हब के ख़िलाफ़ ‘ईशनिंदा’ के आरोप का सामना करना पड़ सकता है। वहीं, पाकिस्तानी यूज़र्स ट्विटर पर उनकी गिरफ़्तारी और फाँसी की माँग करते हुए हैशटैग ट्रेंड करा रहे हैं।

अनीला ने ट्वीट के ज़रिए पैगंबर मुहम्मद की निक़ाह से संबंधित सवाल उठाया और पूछा था कि उन्होंने (पैगंबर) खदीजा के अलावा 18 महिलाओं से निक़ाह क्यों किया था? इसी सवाल के जवाब में, पाकिस्तानियों ने अपने ट्वीट में अपने प्रधानमंत्री इमरान खान को टैग करते हुए अनीला को सार्वजनिक तौर पर फाँसी देने की माँग की।

हालाँकि, कुछ लोग चाहते हैं कि उन्हें ट्रायल के बाद मौत के घाट उतारा जाए। किसी भी इस्लामिक राज्य में ईशनिंदा की सज़ा मौत होती है। साथ ही नबी के अपमान को निन्दा के सबसे ख़राब रूपों में से एक माना जाता है।

कुछ लोग कह रहे हैं कि अनीला अपने ट्वीट्स के कारण ‘इस्लाम-विरोधी और चरमपंथी’ प्रतीत हो रही हैं। वे चाहते हैं कि अधिकारी इस बात की जाँच करें कि वह इस तरह के चरमपंथी एजेंडे पर काम क्यों कर रही हैं?

अन्य लोगों ने अनीला पर “नफ़रत फैलाने” का आरोप लगाया और कहा कि वे अलीना के कुछ ही ट्वीट्स पढ़ सके उससे अधिक वो नहीं पढ़ सकते थे क्योंकि उन ट्वीट्स में “खुले तौर पर ईशनिन्दा” की गई है।

पाकिस्तान में ईशनिन्दा के लिए एक बड़ी सज़ा है, यहाँ तक ​​कि इसके लिए फाँसी की सज़ा भी हो सकती है। इतना ही नहीं जो लोग ईशनिंदा करने वालों का समर्थन करते देखे जाते हैं, उनके जीवन पर भी ख़तरा मँडराने लगता है। पाकिस्तान में ईशनिंदा क़ानूनों से छुटकारा पाना असंभव है और अधिकारी ईशनिंदा को बहुत गंभीरता से लेते हैं क्योंकि ऐसा करने में विफल होने से क़ानून-व्यवस्था पर संकट आ सकता है। यदि अधिकारियों ने कोई कार्रवाई नहीं की, तो मौलाना वर्ग एक उन्मादी भीड़ को इकट्ठा कर उत्पात मचाएगा। इस तरह की उन्मादी भीड़ सैन्य पकड़ को अस्थिर करने की पूरी क्षमता रखती है।

इस बात को भी याद रखना होगा कि पाकिस्तान में ईशनिंदा क़ानूनों को खत्म करने के पैरवी करने वाले सलमान तासीर की हत्या की गई थी। इतना ही नहीं हत्यारे को पाकिस्तानी समाज ने नायक के रूप में सम्मानित भी किया था।

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‘अगस्त में बच्चे मरते ही हैं’ और ‘बच्चों की मौत कोई नई बात नहीं’ के बीच मीडिया की नंगी सच्चाई

प्रदेश के हर अस्पताल में प्रत्येक दिन 3-4 मौतें होती हैं। यह कोई नई बात नहीं है। इस साल पिछले 6 सालों के मुकाबले सबसे कम मौतें हुई हैं। मेरे पास इसके आँकड़े हैं। इस साल केवल 900 मौतें हुई हैं। एक भी बच्चे की मौत दुर्भाग्यपूर्ण है, लेकिन इससे पहले तक़रीबन 1400 और 1500 मौतें भी हुई हैं। 900 भी क्यों हुई हैं, वह भी नहीं होनी चाहिए। मैंने जाँच कराई है। एक्शन भी लिया है। अपनी सरकार के पिछले टर्म में भी मैंने अस्पतालों के ऑपरेशन थिएटर को लंबे अंतराल के बाद अपग्रेड कराया था।

ये बयान है उस व्यक्ति था, जिस पर देश के सबसे बड़े राज्य का दारोमदार है। अशोक गहलोत कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता हैं, जो तीसरी बार राजस्थान के मुख्यमंत्री के रूप में काम कर रहे हैं। अब तक वो 11 साल इस कुर्सी पर बीता चुके हैं। और उनके पास अपने पिछले (2008-13) या उससे भी पिछले (1998-03) कार्यकाल की उपलब्धियों को गिनाने के नाम पर यही है कि उन्होंने ऑपरेशन थिएटरों को अपग्रेड कराया है। अशोक गहलोत के लिए 900 बच्चों की जान जाना कोई ‘नई बात’ नहीं है। इसके पीछे उनका तर्क ये है कि पहले इससे भी ज़्यादा मौतें हुई हैं।

अगर इससे पहले भी ज़्यादा मौतें हुई हैं तो क्या इसके लिए अशोक गहलोत ज़िम्मेदार नहीं है, जो इससे पहले मुख्यमंत्री के रूप में 2 बार अपना कार्यकाल पूरा कर चुके हैं? राज्य में बसपा विधायक दल को 2 बार पूरा का पूरा तोड़ देने वाले गहलोत राजनीति में सिद्धहस्त माने जाते हैं लेकिन मुख्यमंत्री के रूप में उनका ये बयान बताता है कि वो एक प्रशासक के रूप में विफल रहे हैं। ये वही गहलोत हैं, जो बिहार के मुजफ्फरपुर में इंसेफ्लाइटिस से बच्चों की मौत पर दुःख जता रहे थे। दुःख जताना अच्छी बात है लेकिन किसी घटना से न सीखना और उस पर राजनीति करना सही नहीं है। आज यही गहलोत दूसरों पर अफवाह फैलाने का आरोप मढ़ रहे हैं।

दरअसल, मामला राजस्थान के कोटा में 1 महीने में 77 बच्चों की मौत का है। शुक्रवार (दिसंबर 27, 2019) तक सिर्फ़ एक सप्ताह में 12 बच्चों की जानें जा चुकी थीं। जेके लोन हॉस्पिटल ने बताया है कि इस साल बच्चों की मौत का आँकड़ा 940 है। अस्पताल प्रशासन कह रहा है कि ये असामान्य घटना है जबकि राज्य के मुख्यमंत्री कहते हैं कि नई बात नहीं है। जब मामला हाथ से बाहर हो गया, तब राज्य के गृह सचिव को वस्तुस्थिति का जायजा लेने भेजा गया। कोटा के सांसद और लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने भी राज्य सरकार को इस मामले में संवेदनशीलता से कार्य करने की सलाह दी है।

मुख्यमंत्री का बयान संवेदनहीन है क्योंकि राजस्थान के गृह सचिव वैभव गालरिया ने प्रारंभिक जाँच में पाया है कि हॉस्पिटल के सिस्टम में, इंफ्रास्ट्रक्चर में काफ़ी गड़बड़ियाँ हैं। हॉस्पिटल के नवजात शिशु वाले आईसीयू में ऑक्सीजन सप्लाई सही नहीं है। संक्रमण से बचने के लिए कोई व्यवस्था नहीं है और ज़रूरी दवाओं का अभाव है। साफ़ ज़ाहिर होता है कि मुख्यमंत्री अपनी सरकार की विफलताओं पर पर्दा डालने के लिए ऐसे बयान दे रहे हैं। अफ़सोस ये कि मुजफ्फरपुर की तरह (जहाँ सत्ताधीशों से ज़्यादा डॉक्टरों से सवाल-जवाब किया गया) यहाँ सवाल पूछने के लिए मीडिया का आभाव है।

2017 में यूपी में भी कुछ ऐसा हुआ था। तब राज्य के स्वास्थ्य मंत्री सिद्धार्थ नाथ सिंह ने कहा था कि हर साल अगस्त में बच्चों के मरने की संख्या बढ़ जाती है। इसे रोकने का जिम्मा किसके पास होता है? सरकार के पास। अगर सिर्फ आँकड़ों की ही बात की जाए तो भाजपा नेता और गहलोत, दोनों के बयान सच हैं, लेकिन संवेदनशीलता की कसौटी पर ये बयान निष्ठुर और संवेदनहीन ही कहे जाएँगे। ऐसा नहीं है कि उन बच्चों का मरना जरूरी है, बल्कि सरकारों का काम है मृत्यु दर घटाना।

सारी बात यह है कि मीडिया के लिए हमेशा की तरह मुद्दा ‘बच्चों की मौत’ की जगह, ‘भाजपा सरकार में बच्चों की मौत’ और ‘भाजपा नेता का संवेदनहीन बयान’ है। इसी सेलेक्टिव आउटरेज का कारण है कि जब एक राज्य में ऐसी घटना होती है तो दूसरा राज्य उससे सीखने की चेष्टा नहीं करता बल्कि सोचता है कि जब ‘होगा तो देखा जाएगा’।

मेनस्ट्रीम मीडिया और कथित संवेदनशील बुद्धिजीवी तथा लिबरल गिरोह जो किसी माँ के हाथ में बच्चे की नाक में लगी ऑक्सीजन पाइप वाली तस्वीर दिखा कर संवेदना दिखा रहा था, आज वो चुप हैं क्योंकि कॉन्ग्रेस के सरकार में बच्चों का इस संख्या में मरना जायज है। इस देश के मीडिया की दुर्गति यही है कि जब तक ‘भाजपा’ वाला धनिया का पत्ता न छिड़का गया हो, इन्हें न तो दलित की मौत पर कुछ कहना है, न बड़ी संख्या में नवजात शिशुओं की मृत्यु पर इन्हें वो ज़ायक़ा मिल पाता है।

कुल मिला कर ये लोग भाजपा सरकारों में नकारात्मक खबरों के लिए प्रार्थना करते हैं, जबकि गैर-भाजपा सरकार में बंगाल जले, मध्य प्रदेश में लोन माफी या बेरोजगारी भत्ता न मिले, राजस्थान में बच्चे मरें, नौकरियों पर सवाल हों, ये बस चुप रहते हैं। जिस तरह मुजफ्फरपुर और गोरखपुर में बच्चों की मौत को लेकर मीडिया रिपोर्टिंग हुई, उसी तरह कोटा मामले में भी होनी चाहिए। चाहे वो योगी सरकार हो, नीतीश सरकार हो या गहलोत की, इतनी बड़ी संख्या में अगर बच्चों की मौत को मीडिया भाजपा और गैर-भाजपा के चश्मे से देखता है तो यह एक भयावह ट्रेंड है।

जहाँ तक मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की बात है, उनका ट्विटर हैंडल चेक करने पर आपको उत्तर प्रदेश में सीएए के ख़िलाफ़ आगजनी और हिंसा करने वालों की बातें दिखेंगी। उनके बचाव में योगी की आलोचना है। योगी को क्या करना चाहिए था, ऐसे कुछ सलाह हैं। प्रियंका गाँधी के साथ यूपी में दुर्वव्यवहार किए जाने का आरोप है। उस पर तो पूरा का पूरा बयान है, वीडियो के माध्यम से। बच्चों की मौत के बीच गहलोत झारखण्ड भी पहुँचे, जहाँ उन्होंने हेमंत सोरेन के शपथ ग्रहण समारोह में हिस्सा लिया। बच्चों की मौत को लेकर भी उनके बयान हैं ट्विटर हैंडल पर, जरा गौर कीजिए:

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प्रियंका गाँधी के सामने जिस लेडी अफसर से हुई धक्का-मुक्की, सुबह ही हुई थी उनके भाई की मौत

पिछले दिनों हमने देखा था कि कैसे मीडिया गिरोह ने सुलेमान को हीरो बनाने की कोशिश की थी। नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में यूपी के बिजनौर में हुई हिंसा के दौरान वह मारा गया था। सुलेमान को हीरो बनाने के लिए बताया गया कि वह यूपीएससी की तैयारी करता था। सरकारी अधिकारी बनने के सपने देखा करता था। इसकी आड़ में यह सच्चाई छिपाने की कोशिश की गई कि सुलेमान देशी कट्टा लेकर हिंसा करने पहुॅंचा था। उसने कांस्टेबल मोहित के पेट में गोली मारी थी। आत्मरक्षा में मोहित ने गोली चलाई जिससे सुलेमान मारा गया। सुलेमान को हीरो बनाने की कोशिश करने वालों ने न मोहित की सुध लेने की कोशिश की और न उसके परिवार वालों का हाल जाना। शायद इसलिए क्योंकि मोहित हिंदू था। वह ऐसे प्रदेश की पुलिस सेवा में था जहॉं भाजपा की सरकार है।

इसी तरह शनिवार 28 दिसंबर 2019 को जब कॉन्ग्रेस की महासचिव प्रियंका गॉंधी ने अपनी लखनऊ यात्रा को सुर्खियों में लाने के लिए एक महिला अधिकारी पर गला दबाने का आरोप मढ़ दिया तो मीडिया गिरोह अचानक से सक्रिय हो गया। योगी की पुलिस पर अभिव्यक्ति की आजादी का गला घोंटने का आरोप लगाया। लेकिन, अपने दावे के समर्थन में प्रियंका कोई सबूत नहीं पेश कर पाई। यहॉं तक कि कॉन्ग्रेस ने जो वीडियो शेयर किया उसमें भी प्रियंका के साथ खड़े लोग ही महिला अधिकारी के साथ धक्का-मुक्की करते नजर आए। बाद में प्रियंका गॉंधी भी गला दबाने की बात से पलट गई।

महि​ला अधिकारी ने बताया कि कैसे प्रियंका पहले से तय रास्ते को छोड़कर दूसरे मार्ग से निकलने लगी तो अपनी ड्यूटी निभाते हुए उन्होंने उन्हें रोक कर इस संबंध में बात की। कॉन्ग्रेस ने जो वीडियो शेयर किया है उसमें भी यही दिख रहा है। इस महिला अधिकारी का नाम डॉ. अर्चना सिंह है। उन्होंने बताया, “इन आरोपों में कोई सच्चाई नहीं है। मैं उनकी (प्रियंका गाँधी) फ्लीट इंचार्ज थी। उनके साथ किसी ने भी अभद्रता नहीं की। मैंने सिर्फ अपनी ड्यूटी की। इस घटना के दौरान मेरे साथ धक्का-मुक्की की गई थी।” इस घटना को लेकर उन्होंने वरीय अधिकारियों को जो रिपोर्ट भेजी उसे आप नीचे पढ़ सकते हैं।

मूल रूप से बस्ती की रहने वाली डॉ. सिंह मॉडर्न कंट्रोल रूम में सीओ हैं। वे 2008 बैच की पीपीएस अधिकारी हैं। पीपीएस के लिए उनका चयन पहले ही प्रयास में हो गया था। उनके पति प्रमोद सिंह प्रोफेसर हैं। एक बेटा और एक बेटी है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार जिस दिन डॉ. सिंह की तैनाती प्रियंका गॉंधी के फ्लीट में की गई थी उसी दिन सुबह उनके भाई की मौत हुई थी। वह छुट्टी चाहती थीं। नहीं मिलीं। लेकिन, टूटी नहीं और अपनी ड्यूटी निभाने निकल पड़ीं।

दैनिक जागरण के लखनऊ संस्करण में प्रकाशित खबर

बताया जाता है कि डॉ. सिंह के चचेरे भाई को पीलिया हो गया था। इसके कारण उनके शरीर में संक्रमण हो गया। दिल्ली के एक अस्पताल में वे कई दिनों से जिंदगी और मौत से लड़ रहे थे। शनिवार सुबह उनकी मौत की खबर आई। लेकिन, वीवीआईपी ड्यूटी की वजह से डॉ. सिंह को छुट्टी नहीं मिली। इसके बाद अपनी भावनाओं को परे रखकर वे यह सुनिश्चित करने में जुट गईं कि प्रियंका गॉंधी की सुरक्षा में कोई सेंध न लगे। लेकिन, तब उन्होंने शायद सोचा भी नहीं होगा कि ऐसा करते वक्त एक वीवीआईपी उन पर एक घटिया आरोप लगा देगा और उसके साथ चल रहे लोग उनसे ही बदतमीजी पर उतर आएँगे। खाकी का यह एक ऐसा पक्ष है जिसे शायद ही CAA विरोध के नाम पर हिंसा को उकसाने वाले कॉन्ग्रेसी कभी समझ पाएँगे!

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