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हिन्दू होने के कारण दानिश के साथ पाक में हुआ भेदभाव: इमरान को पत्र लिखकर कहा- हालत बहुत ख़राब है

पाकिस्तान के पूर्व स्पिनर दानिश कनेरिया को लेकर किए गए पाकिस्तान के पूर्व तेज़ गेंदबाज़ शोएब अख़्तर के ख़ुलासे ने पाकिस्तान क्रिकेट में भूचाल ला दिया है। शोएब ने एक चैट शो में दावा किया था कि पाकिस्तान की टीम के कुछ खिलाड़ी हिन्दू खिलाड़ी दानिश कनेरिया के साथ भेदभाव करते थे और उनके साथ खाना तक नहीं खाते थे। अब इस मामले पर दानिश कनेरिया ने भी चुप्पी तोड़ दी है। उन्होंने इसे लेकर बड़ा ख़ुलासा करने का मन बना लिया है। दानिश का कहना है कि अब वो उन खिलाड़ियों के नाम बताएँगे, जिन्होंने उनके साथ हिन्दू होने की वजह से भेदभाव किया था। 

इसके अलावा, दानिश कनेरिया ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान, पूर्व क्रिकेटरों समेत अन्य देशों से भी मदद की गुहार भी लगाई है। उन्होंने कहा, “मेरी हालत बहुत ख़राब है और मैंने पाकिस्तान और दुनियाभर में कई लोगों से मदद की गुहार लगाई है लेकिन अभी तक मुझे कोई मदद नहीं मिली है। हालाँकि, पाकिस्तान में कई क्रिकेटरों की समस्याओं को सुलझाया गया है। मैंने एक क्रिकेटर के नाते पाकिस्तान के लिए अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया और मुझे इसका गर्व है। मुझे लगता है कि इस वक्त पाकिस्तान के लोग मेरी मदद करेंगे।”

दरअसल, इंग्लिश क्लब एसेक्स की तरफ़ से खेलने के दौरान दानिश कनेरिया पर स्पॉट फिक्सिंग का आरोप सिद्ध हुआ था। कनेरिया का कहना है कि लंबे समय से वो पाकिस्तान और दुनियाभर के लोगों से सम्पर्क कर अपनी समस्याओं का समाधान करने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन अब तक कोई मदद नहीं मिल सकी है, जबकि पाकिस्तान के अन्य कई खिलाड़ियों के मामले सुलझ गए हैं। 

ग़ौरतलब है कि पाकिस्तान के पूर्व क्रिकेटर शोएब अख़्तर ने एक चैट सो के दौरान ख़ुलासा किया था कि दानिश कनेरिया हिन्दू थे इसलिए पाकिस्तानी टीम में उनके साथ अच्छा व्यवहार नहीं किया जाता था। चैट शो में पूर्व क्रिकेटरों असीम कमाल और राशिद लतीफ के साथ शोएब अख्तर ने कई खुलासे किए।

इसी दौरान राशिद लतीफ ने यूसुफ योहाना का मामला उठाया और कहा कि यूसुफ को भी बहुत तंग किया गया, लेकिन वो भी बेमिसाल खिलाड़ी ‌थे। शोएब अख्तर ने यूसुफ के बारे में बताते हुए कहा था, “यूसुफ के नाम 12 हजार रन दर्ज हैं। मगर, हमने कभी उनका सम्मान नहीं किया। दो-तीन खिलाड़ियों से मेरी लड़ाई भी हुई। मैंने कहा कि अगर कोई हिन्दू है, तो भी वो खेलेगा और फिर उसी हिन्दू ने हमें टेस्ट सीरीज जिताई।”

एक सवाल के जवाब में शोएब अख्तर ने बताया था, “स्टीव वॉ ने एंड्रयू साइमंड्स को लगातार मौके दिए। वो दस साल तक क्रिकेट खेले। एबी डिविलियर्स ने क्विंटन डि कॉक को रिहेबिलिटेशन सेंटर भेजा, उन्हें तैयार किया और आज देखिए वो क्या कर रहे हैं? हमारे यहाँ तो ड्रेसिंग रूम में ही खिलाड़ियों को खराब कर दिया जाता है।”

‘हिंदू दानिश कनेरिया हमारे साथ क्यों खाता है?’ – Pak क्रिकेट टीम का घिनौना सवाल और अख्तर का जवाब

‘पाकिस्तान में हमने जो तकलीफें झेली हैं, अगर आप उससे गुजरे होते तो कभी प्रदर्शन नहीं करते’

‘अगर पाकिस्तान के मुस्लिम भारत आकर रहेंगे, तो विभाजन का क्या मतलब, पूरे को हिन्दुस्तान घोषित कर दो’

हिंदुओं से आजादी, हिंदुत्व की कब्र, अल्लाहू अकबर याद नहीं… राजदीप को भगवा झंडा देख लगा डर, फैलाई घृणा

नागरिकता संशोधन कानून के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन कर रहे लोग अब दंगाईयों का रूप ले चुके हैं। सोशल मीडिया पर वायरल होती अनेकों तस्वीरें और करोड़ों रुपयों की नष्ट हुई सार्वजनिक सम्पत्ति, इस बात का प्रमाण है। लेकिन, इतने पर भी मीडिया गिरोह के कुछ लोगों का मानना है कि सीएए के ख़िलाफ़ सड़कों पर दंगा मचा रहे लोग सही हैं और अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ रहे हैं। जबकि उन्हें रोकने के लिए सामने खड़ी पुलिस अत्याचारी है और सरकार के इशारों पर जनता पर जुल्म ढा रही है। इसी क्रम में अपनी प्रोपेगेंडा पत्रकारिता के लिए पहचाने जाने वाले राजदीप सरदेसाई ने भी आज एक ट्वीट किया है।

दरअसल, राजदीप सरदेसाई का कहना है कि वे अभी तक जितने भी सीएए के ख़िलाफ़ हो रही रैलियों में गए हैं, उन्होंने वहाँ केवल तिरंगा और महात्मा गाँधी की तस्वीरों को ही देखा है। जबकि सीएए की समर्थन वाली रैलियों में उन्होंने तिरंगे के साथ-साथ भगवा रंग का झंडा फहरते भी देखा।

अपने ट्वीट के माध्यम से राजदीप चाहते हैं कि उनके फॉलोवर्स इस तथ्य पर गौर फरमाएँ कि कौन लोग CAA के विरोध में हैं और कौन उसके साथ? साथ ही वे चाहते हैं कि दोनों रैलियों को करने वाले लोगों के मूल उद्देश्यों को भी उनके फॉलोवर्स पहचानें।

यहाँ गौर करने वाली बात है कि पिछले दो हफ्तों में सबसे अधिक दंगे भड़कने की खबरें शुक्रवार को जुमे की नमाज के बाद ही आई हैं और राजदीप का इस तरह का ट्वीट भी शुक्रवार की सुबह-सुबह ही आया है। ऐसे में दंगों के भड़कने के पीछे जुमे की नमाज के बाद का समय और ट्वीट करने के लिए शुक्रवार का दिन… क्यों चुना जाता है? क्या महज संयोग है? लेकिन राजदीप संयोग में तो यकीन नहीं ही करते होंगे!

राजदीप अपने मालिक की चैनल में भले ही मीडिया मठाधीश होंगे, सोशल मीडिया पर तो सबकी ‘औकात’ टाइमलाइन या वॉल तक ही सीमित होती है। सो हुआ वही, जो होना था। इनके ट्वीट के नीचे उन तस्वीरों की बाढ़ आ गई, जहाँ CAA के विरोध की आड़ में दंगाई कहीं मंदिर तोड़ रहे तो कहीं पुलिस वालों को मार रहे, कहीं बस जला रहे।

राजदीप के ट्विटर वॉल पर तरह-तरह की तस्वीर और वीडियो आए। लेकिन सीएए के विरोध प्रदर्शनों में न महात्मा गाँधी दिखे और न ही तिरंगा। बल्कि दिखा तो सिर्फ़ ‘फक हिंदुत्व’ के पोस्टर और ‘हिंदुत्व से आजादी’ के नारे, पुलिस को मारते दंगाई, आग में लिपटी देश की संपत्ति। इसके अतिरिक्त ऊँ के चिह्न का अपमान और नारा-ए-तकबीर की गूँज।

राजदीप को आईना दिखाने के लिए कानून का समर्थन कर रही रैलियों की भी तस्वीरें लोगों ने शेयर की। जिनमें भगवा रंग से कई गुणा ज्यादा तिरंगा फहरते दिखा। लोग राजदीप को कहने लगे कि जिन लोगों ने तिरंगे के साथ भगवा उठा रखा है, उन्होंने ऐसा इसलिए किया है क्योंकि इस देश में भगवा रंग ने ही तिरंगे का सम्मान किया है और भगवा तिरंगे का ही एक रंग है, तो क्या वो इसे उससे अलग कर सकते हैं? इसके अलावा लोग राजदीप से ये भी पूछने लगे कि हफ्ते में और भी दिन होते हैं किंतु उन्हें सिर्फ जुमे का दिन ही याद रहता है?

वहीं, कुछ लोगों ने राजदीप के प्रोपेगेंडे को ध्वस्त करते हुए उन्हें मौलाना भी बताया है और कहा है कि वे हमेशा आतंकियों का ही समर्थन करेंगे। लोगों का कहना है कि राजदीप ही ऐसे दंगाईयों के लिए जनसंपर्क का काम कर रहे हैं। क्योंकि वे दंगाई, पत्थरबाज, गोली चलाने वालों पर एक शब्द भी नहीं बोल रहे।

बता दें कि सोशल मीडिया यूजर्स राजदीप से इतना ज्यादा नाराज हो चुके हैं कि उन्हें कह रहे हैं कि राजदीप का ट्वीट देखकर उनका पूरा दिन खराब हो गया। लोगों का पूछना है कि ‘हिंदुत्व की कब्र खुदेगी’ का क्या मतलब होता है और आखिर वे महात्मा गाँधी का नाम दंगाइयों के साथ क्यों जोड़ रहे। सीएए के खिलाफ़ प्रदर्शन पर उतरे लोग जो आज कर रहे, वो महात्मा गाँधी का दिखाया रास्ता नहीं हैं। उनके नाम पर सिर्फ़ बस, कार, बाइक जलाई जा रही है। लेकिन जहाँ भगवा झंडा है, वहाँ शांति मार्च निकल रहा है।

गौरतलब है कि बीते दिनों जुमे की नमाज के बाद हुए दंगों के कारण यूपी और दिल्ली जैसे राज्यों को काफी नुकसान हुआ है। प्रदर्शनकारियों की आड़ में दंगाइयों ने पुलिस पर पेट्रोल बम तक फेंकने का काम किया और उन पर गोलियाँ भी चलाई गईं। इस कारण कई पुलिस वाले घायल हुए और कई की जान जाते-जाते बची। लेकिन इतना सब होने के बाद भी अगर राजदीप जैसा कोई पत्रकार अपना प्रोपगेंडा साधने के लिए लोगों को बरगलाए और निष्पक्ष होने के बजाए एकतरफा बातें करें, तो फिर जाहिर है कि उन्हें ऐसी लताड़ लगनी जरूरी है। ताकि उन्हें समझ आ सके कि जिस जनता को वे अपने झूठ पर विचार करने के लिए कह रहे हैं, वो जनता मूर्ख नहीं है।

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‘सोनिया खुद इटली से आकर नागरिकता ले लीं, लेकिन सताए गए हिंदू-सिख भाइयों पर सवाल उठा रहीं’

नागरिकाता संशोधन क़ानून (CAA) संसद के दोनों सदनों से पारित होने के बाद से ही विरोध का विषय बना हुआ है। देश भर में हो रहे विरोध-प्रदर्शनों की आड़ में हिंसात्मक गतिविधियों को अंजाम दिया जा रहा है। कॉन्ग्रेस और विपक्ष इस क़ानून के लगातार विरोध में बने हुए हैं।

इस बीच, हरियाणा के गृह मंत्री अनिल विज ने कॉन्ग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा, “सोनिया गाँधी इटली से यहाँ आई हैं और उन्होंने नागरिकता ले ली थी, लेकिन यह लोग पाकिस्तान में सताए गए हमारे हिन्दू और सिख भाइयों को मिल रही नागरिकता का विरोध कर रहे हैं। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान भी उनके समूह का हिस्सा हैं, वे एक ही भाषा बोलते हैं।”

दरअसल, बीजेपी ने नागरिकता संशोधन क़ानून को लेकर गुरुवार (26 दिसंबर) को रोहतक में बैठक की थी। इस बैठक में यह चर्चा की गई कि इस क़ानून को लेकर किस तरह से जन जागरपण अभियान चलाया जाए। हरियाणा के गृह मंत्री अनिल विज भी इस बैटक का हिस्सा थे। जगह-जगह होने वाले विरोध-प्रदर्शनों को लेकर जब उनसे सवाल पूछा गया तो उन्होंने स्पष्ट तौर पर कहा, “नागरिकता संशोधन क़ानून, नागरिकता छीनने के लिए नहीं बल्कि नागरिकता देने के लिए बना है।”

इससे पहले उन्होंने पश्चिम बंगाल के गृह मंत्री सिद्दीकी उल्ला चौधरी पर भी जमकर पलटवार किया था। दरअसल, उल्ला चौधरी ने कड़ा रुख़ अख़्तियार करते हुए कहा था कि अगर नागरिकता संशोधन क़ानून वापस न लिया तो केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के कोलकाता आने पर उन्हें एयरपोर्ट से बाहर नहीं निकलने दिया जाएगा। इस बयान के पलटवार में अनिल विज ने कहा था कि पश्चिम बंगाल भी हिन्दुस्तान का हिस्सा है और हिन्दुस्तान का कोई भी शख़्स किसी भी प्रांत में कभी भी जा सकता है।

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48 घंटों में 10, एक महीने में 77 बच्चों की मौत: राजस्थान के डॉ कह रहे – सब मौतें सामान्य, अस्पताल की लापरवाही नहीं

राजस्थान के कोटा स्थित जेके लोन अस्पताल में इस महीने 77 बच्चों की मौत से हड़कंप मचा हुआ है। पिछले 48 घंटे में ही 10 बच्चों की मौत हो चुकी है। इसमें नवजात शिशु भी शामिल हैं। एक महीने में इतने बच्चों की मौत के बाद अस्पताल प्रशासन की नींद नहीं खुली है और वह इन आँकड़ों को सामान्य बता रहा है। अस्पताल प्रशासन ने डॉक्टरों की ओर से किसी तरह की लापरवाही से इनकार किया है। अस्पताल प्रशासन द्वारा इन बच्चों की मौत की जाँच के लिए गठित एक कमिटी ने कहा कि अस्पताल के सारे उपकरण सुचारू रूप से चल रहे हैं, इसलिए अस्पताल की तरफ से लापरवाही का सवाल पैदा ही नहीं होता।

ख़बर के अनुसार, अपनी रिपोर्ट में अस्पताल ने बताया कि पिछले दो दिन में जिन 10 बच्चों की मौत हुई है, उनकी स्थिति बेहद गंभीर थी और वे वेंटिलेटर पर थे। अस्पताल ने यह भी दावा किया कि 23 और 24 दिसंबर को जिन 5 नवजात शिशुओं की मौत हुई, वे केवल एक दिन के थे और भर्ती करने के कुछ ही घंटों के अंदर उन्होंने आखिरी साँस ली। रिपोर्ट में इस बात का भी उल्लेख किया गया वे हाइपॉक्सिक इस्केमिक इंसेफ्लोपैथी से पीड़ित थे। इस अवस्था में नवजात के मस्तिष्क में पर्याप्त ऑक्सिजन नहीं पहुँच पाती है।

इसके अलावा, रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि 23 दिसंबर को पाँच महीने के बच्चे की गंभीर निमोनिया की वजह से मौत हुई, जबकि सात साल के एक बच्चे की एक्यूट रेस्पिरटरी डिस्ट्रेस सिंड्रोम यानी सांस लेने में दिक्कत की वजह से मौत हुई। इसी दिन एक डेढ़ महीने के बच्चे की मौत भी हो गई, जो जन्म से ही दिल की बीमारी से पीड़ित था। इनके अलावा 24 दिसंबर को दो महीने के बच्चे की गंभीर एस्पिरेशन निमोनिया और एक अन्य डेढ़ महीने के बच्चे की ऐस्पिरेशन सीजर डिसऑर्डर की वजह से मौत हो गई।

बुधवार (25 दिसंबर) को अस्पताल अधीक्षक डॉ. एसएल मीणा ने बताया, “जाँच के बाद सामने आया कि 10 बच्चों की मौत सामान्य थीं न कि अस्पताल प्रशासन की लापरवाही की वजह से।” अस्पताल के पीडिएट्रिक विभाग के अमृत लाल बैरवा ने कहा कि जिन बच्चों की मौत हुई है, उस सभी को गंभीर अवस्था में अस्पताल लाया गया था।

उन्होंने कहा, “नैशनल एनआईसीयू रेकॉर्ड के अनुसार, शिशुओं की 20 प्रतिशत मौतें स्वीकार्य हैं, जबकि कोटा में शिशु मृत्यु दर 10 से 15 प्रतिशत है जो खतरनाक नहीं है क्योंकि अधिकतर बच्चों को गंभीर हालत में अस्पताल लाया गया था। गंभीर मरीज़ बूंदी, बारां, झालावाड़ और मध्य प्रदेश से भी आए थे। यहाँ प्रतिदिन एक से तीन शिशुओं और नवजात की मौत होती है।”

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रवीना टंडन, भारती सिंह और फ़राह खान पर केस: एक शब्द को लेकर ईसाई संगठन की शिक़ायत

ईसाई धर्म से जुड़े एक शब्द को ग़लत ढंग से बोलने या प्रचारित करने के आरोप में बॉलीवुड अभिनेत्री रवीना टंडन, कॉमेडियन भारती सिंह और फ़िल्म निर्देशक फ़राह खान के ख़िलाफ़ पंजाब के अजनाला में मामला दर्ज किया गया है। ईसाई समाज फ्रंट के प्रदेश अध्यक्ष सोनू जाफ़र की अगुआई में अजनाला चौक में इस तीनों के ख़िलाफ़ भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा-295-A के तहत FIR दर्ज की गई है।

दरअसल, एक निजी यूट्यूब चैनल की तरफ़ से जारी किए गए वीडियो में कॉमेडियन भारती सिंह, रवीना टंडन और फ़राह खान ईसाई धर्म से जुड़े शब्द हालेलुयाह (Hallelujah) का मज़ाक उड़ाते हुए दिख रही हैं। इस शब्द के ग़लत रूप से प्रचारित किए जाने पर आपत्ति जताते हुए सोनू जाफ़र ने अजनाला के डीएसपी सोहन सिंह को ज्ञापन सौंपकर इन तीनों के ख़िलाफ़ क़ानूनी कार्रवाई किए जाने की माँग की है। वहीं, डीएसपी का कहना है कि इस मामले में FIR दर्ज कर ली गई है और जाँच जारी है।

एससपी विक्रम जीत दुग्गल ने बताया कि ईसाई संगठनों की शिक़ायत के आधार पर बॉलीवुड अभिनेत्री रवीना टंडन, कॉमेडियन भारती सिंह और फ़िल्म निर्देशक फ़राह खान के ख़िलाफ़ मामला दर्ज किया गया है। बता दें कि वायरल हुए इस वीडियो में फ़राह एक एंकर की भूमिका में थीं।

ईसाई संगठनों की अगुआई कर रहे सोनू जाफ़र ने अपनी शिक़ायत में बताया कि शो की एंकर फ़राह खान ने भारती सिंह और रवीना टंडन को एक अंग्रेज़ी शब्द ‘Hallelujah’ लिखने को कहा। इन दोनों ने ब्लैकबोर्ड पर ‘Hallelujah’ शब्द की स्पेलिंग लिखी। इस दौरान भारती सिंह ने जो स्पेलिंग लिखी वो ग़लत तो थी ही, साथ ही ‘Hallelujah’ शब्द का मतलब न जानते हुए उन्होंने शब्द का मज़ाक उड़ाया। इसमें फ़राह और रवीना ने भी भारती सिंह का साथ दिया। हालाँकि, फ़राह खान ने बाद में उस अंग्रेज़ी शब्द का मतलब भी बताया।

फ़िल्म अभिनेत्री रवीना टंडन ने माफ़ी माँगते हुए इस वीडियो के लिंक को शेयर करते हुए लिखा, “प्लीज़ ये लिंक देखें। मैंने ऐसा कोई शब्द नहीं बोला है जो किसी भी धर्म का अपमान कर रहा हो। मैं, फ़राह खान और भारती सिंह तीनों में से किसी का इरादा अपमान करने का बिल्कुल नहीं था। लेकिन, अगर ग़लती से जो लोग आहत हुए थे, मैं उनसे माफ़ा माँगती हूँ।”

ख़बर के अनुसार, अजनाला के डीएसपी सोहन सिंह ने बताया कि शिक़ायतकर्ताओं की तरफ़ से पेश की गई वायरल वीडियो की साइबर सेल बड़ी बारीकी से जाँच कर रहा है। इस वीडियो की लैबोरेटरी जाँच के दौरान अगर वीडियो क्लीपिंग के बोल व तथ्य सही पाए गए तो इन तीनों हस्तियों को अपना पक्ष रखने के लिए पुलिस थाने में समन भेजकर तलब किया जाएगा। इसके अलावा, ईसाई भाईचारे ने इन तीनों की गिरफ़्तारी के लिए पुलिस पर दबाव बनाने के लिए शुक्रवार (27 दिसंबर) को अजनाला में प्रदर्शन की घोषणा भी की है।

भगवा चोगा-रुद्राक्ष की माला में बिशप की तस्वीरों से बवाल, हिन्दुओं को गुमराह करने का आरोप

मैंने मूर्तियों पर लात मारी, मुझे बहुत ख़ुशी मिली, अब तक सैकड़ों क्राइस्ट गाँव बनाए: पादरी का क़बूलनामा

ईसाई स्कूल में जबरन धर्म परिवर्तन, विरोध करने पर वार्डन ने 9वीं के लड़के को इतना मारा कि वो मर गया

हामिद अंसारी ‘कनेक्शन’ से जिस ISRO वैज्ञानिक को जाना पड़ा जेल, उन्हें मिलेगा ₹1.3 करोड़ का मुआवजा

केरल सरकार ने इसरो के पूर्व वैज्ञानिक नाम्बी नारायणन को 1.3 करोड़ रुपए का मुआवजा देने की सैद्धांतिक रूप से मंजूरी दे दी है। तिरुवनंतपुरम उप अदालत में नारायणन की गैरकानूनी गिरफ्तारी के खिलाफ दायर मामले का निपटारा करने के लिए यह मुआवजा मंजूर किया गया। नाम्बी नारायणन ने तिरुवनंतपुरम उप अदालत में अपनी गैरकानूनी गिरफ्तारी के खिलाफ मामला दायर किया था।

वैज्ञानिक नाम्बी नारायणन को नवंबर 1994 में गिरफ्तार किया गया था। उस समय नारायणन के साथ दो अन्य वैज्ञानिकों डी शशिकुमारन और के चंद्रशेखर को भी गिरफ्तार किया गया था। गिरफ्तारी के समय नारायणन इसरो में क्रायोजनिक प्रॉजेक्ट के डायरेक्टर थे। इन तीन वैज्ञानिकों के अलावा रूसी स्पेस एजेंसी का एक भारतीय प्रतिनिधि एसके शर्मा, एक लेबर कॉन्ट्रैक्टर और फौजिया हसन नामक एक व्यक्ति की भी गिरफ्तारी हुई थी। इन सभी पर पाकिस्तान को इसरो के रॉकेट इंजन की सीक्रेट जानकारी देने के आरोप लगाए गए थे।

पूरे मामले की जाँच के दौरान नाम्बी नारायणन को 50 दिनों तक हिरासत में रखा गया था और उन्हें काफी यातनाएँ दी गई थीं। लेकिन पूरी कहानी में ट्विस्ट आया 1996 में। सीबीआई ने अप्रैल 1996 में चीफ जूडिशल मैजिस्ट्रेट को बताया कि यह पूरा मामला फर्जी है, जो भी आरोप लगाए गए हैं, उसके पक्ष में कोई सबूत नहीं है। इसके बाद कोर्ट ने तब के चर्चित इसरो जासूसी केस में गिरफ्तार किए गए सभी आरोपितों को रिहा कर दिया था।

लेकिन नाम्बी नारायणन को रिहाई से संतुष्टि नहीं थी। वो अपने ऊपर लगा गद्दारी का दाग धोना चाहते थे। और इसके लिए उन्होंने लंबी कानूनी लड़ाई की ओर जाने का फैसला किया। उनकी यह लड़ाई चली भी सच में बहुत लंबी – 24 साल, सुप्रीम कोर्ट तक। देश की सर्वोच्च न्यायालय ने 14 सितंबर 2018 को कहा कि नारायणन को केरल पुलिस ने बेवजह गिरफ्तार किया और उन्हें मानसिक प्रताड़ना दी। तब सुप्रीम कोर्ट ने नारायणन को 50 लाख रुपए का मुआवजा देने का आदेश भी दिया था।

लेकिन कोर्ट-कचहरी से परे भी नाम्बी नारायणन की एक कहानी है। कहानी राजनीति और साजिश वाली। उस कहानी के अनुसार पूर्व रॉ अधिकारी ने भारत के उप-राष्ट्रपति रहे हामिद अंसारी पर कई गंभीर आरोप लगाए। यह तब हुआ जब एक पत्रकार चिरंजीवी भट ने पूर्व रॉ अधिकारी एनके सूद से बातचीत की, जिसमें उन्होंने हामिद अंसारी के क़रीबी द्वारा वैज्ञानिक नाम्बी नारायणन को बदनाम करने और उनका करियर तबाह करने की बात का खुलासा किया। (आप पूरे इंटरव्यू को हूबहू यहाँ पढ़ सकते हैं) पूर्व रॉ अधिकारी ने पत्रकार चिरंजीवी भट से बात करते हुए कहा:

“रतन सहगल नामक व्यक्ति हामिद अंसारी का सहयोगी रहा है। आपने नाम्बी नारायणन का नाम ज़रूर सुना होगा। उन पर जासूसी का आरोप लगा था लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उनके ख़िलाफ़ लगे सारे आरोपों को निराधार पाया था। वे निर्दोष बरी हुए। लेकिन, किसी को नहीं पता है कि उनके ख़िलाफ़ साज़िश किसने रची? ये सब रतन सहगल ने किया। उसने ही नाम्बी नारायणन को फँसाने के लिए जासूसी के आरोपों का जाल बिछाया। ऐसा उसने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि बिगाड़ने के लिए किया। रतन जब आईबी में था तब उसे अमेरिकन एजेंसी सीआईए के लिए जासूसी करते हुए धरा जा चुका था। अब वह सुखपूर्वक अमेरिका में जीवन गुजार रहा है। वह पूर्व-राष्ट्रपति अंसारी का क़रीबी है और हमें डराया करता था। वह हमें निर्देश दिया करता था।”

जिस वैज्ञानिक नाम्बी नारायण की यह कहानी है, उन्हें 25 जनवरी 2019 को पद्म भूषण से सम्मानित किया गया। अफ़सोस की बात है कि उन्हें सत्ता और सियासत के षड्यंत्र का शिकार बनाया गया। जिस व्यक्ति को राष्ट्रीय अलंकरण देकर सम्मानित किया जाना चाहिए था, उसे ही जेल की सलाखों के पीछे बन्द कर दिया गया। उन्हें देश का गद्दार करार दिया गया।

‘हामिद अंसारी के क़रीबी ने वैज्ञानिक नाम्बी नारायणन के ख़िलाफ़ साज़िश रच उनका करियर तबाह किया’

अगर ‘JNU कांडियों’ और नम्बी नारायणन में से आप सिर्फ़ पहले वालों को जानते हैं, तो समस्या आपके साथ है

कहानी वैज्ञानिक नाम्बी नारायणन की जिन्हें केरल की राजनीति ने बर्बाद किया

जुमे की नमाज़ से पहले पूरे UP में हाई अलर्ट: 20 ज़िलों में इंटरनेट बंद, ड्रोन से निगरानी

नागरिकता संशोधन क़ानून (CAA) के ख़िलाफ़ देशभर में हिंसक विरोध-प्रदर्शन हो रहे हैं। इस विरोध की आड़ में पिछले शुक्रवार (20 दिसंबर) को जुमे की नमाज़ के बाद हुई व्यापक हिंसा को देखते हुए आज शुक्रवार को होने वाली जुमे की नमाज़ के मद्देनज़र पूरे उत्तर प्रदेश में हाई अलर्ट घोषित किया गया है। सुरक्षा व्यवस्था को और मज़बूत करते हुए गश्त बढ़ा दी गई है। शरारती तत्वों पर ड्रोन से भी नज़र रखी जा रही है। कई ज़िलों में इंटरनेट सेवा बंद कर दी गई है। पुलिस प्रशासन का कहना है कि उपद्रवियों से सख़्ती से निपटा जाएगा। इसके अलावा, यूपी में पहले से ही धारा-144 लगी हुई है।

गाज़ियाबाद, मेरठ, कानपुर, अलीगढ़ समेत 20 जिलों में अगले 24 घंटे के लिए मोबाइल इंटरनेट सेवाओं को बंद कर दिया गया है। सुरक्षा-व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए गाज़ियाबाद में शुक्रवार (27 दिसंबर) रात 10 बजे तक इंटरनेट बंद रहेगा। सहारनपुर में भी जुमे की नमाज़ को लेकर पुलिस प्रशासन पूरी तरह से चौकस है। इस बीच मौलवियों ने जुमे की नमाज़ से पहले शांति की अपील की है।

अफ़वाहों पर लगाम लगाने के लिए राजधानी लखनऊ, गाज़ियाबाद, मेरठ, अलीगढ़, सहारनपुर, बुलंदशहर, बिजनौर, मुज़फ़्फ़रनगर, शामली, संभल, फिरोजाबाद, मथुरा आगरा, कानपुर और सीतापुर में इंटरनेट सेवाओं को बंद कर दिया गया है। मेरठ और अलीगढ़ में गुरुवार (26 दिसंबर) रात 10 बजे से इंटरनेट बैन का आदेश दिया गया था। वहीं, वेस्ट यूपी के संवेदनशील मुज़फ़्फ़रनगर ज़िले में 28 दिसंबर तक इंटरनेट बंद रखने का आदेश दिया गया है।

मुज़फ़्फ़रनगर शहर में सुरक्षा के कड़े इंतज़ाम किए गए हैं। जुमे की नमाज़ के बाद अधिकारी लोगों को नमाज़ के बाद सड़कों पर नहीं आने के लिए समझा रहे हैं। एक सप्ताह पूर्व हुए उपद्रव वाले स्थानों में मदीना चौक, कच्ची सड़क, मीनाक्षी चौक, फक्करशाह चौक व अन्य स्थलों पर भी फ़ोर्स तैनात कर दी गई है। इसी बीच, गुरुवार (26 दिसंबर) को सरवट क्षेत्र में विवादित पोस्टर लगाकर कुछ लोगों ने शहर का माहौल बिगाड़ने की कोशिश की। पुलिस ने तत्काल प्रभाव से उन पोस्टर्स को उतारकर कब्ज़े में ले लिए।

सहारनपुर में जुमे की नमाज़ के बाद नागरिकता संशोधन क़ानून के विरोध को देखते हुए ज़िले में अलर्ट घोषित किया गया है। गुरुवार दोपहर को ही इंटरनेट सेवाएँ बंद कर दी गईं थी। पुलिस अधिकारियों ने पूरे ज़िले में पैदल मार्च निकालकर शांति व्यवस्था बनाए रखने की अपील की। देवबंद में जुलूस, धरना प्रदर्शन और रैली आदि पर पूर्णत: पाबंदी लगा दी गई है। इसके अलावा, बागपत को चार ज़ोन और 16 सेक्टर में बाँट दिया गया है। चप्पे-चप्पे पर फ़ोर्स की तैनाती की गई है।

यूपी के एडीजी लॉ ऐंड ऑर्डर पीवी रमाशास्त्री ने बताया कि जुमे की नमाज़ को देखते हुए राज्य के अलग-अगल ज़िलों में सुरक्षा-व्यवस्था के सभी पुख़्ता इंतज़ाम कर लिए गए हैं। शांति-व्यवस्था बनाए रखने के लिए लोगों से बातचीत भी की गई है। उन्होंने बताया कि सुरक्षा के मद्देनज़र कई ज़िलों में इंटरनेट सेवा प्रतिबंधित की गई है और साथ ही सोशल मीडिया पर की जा रही पोस्ट पर भी कड़ी निगरानी रखी जा रही है।

उधर, लखनऊ के मौलाना ख़ालिद रशीद फिरंगी ने मुस्लिम समुदाय से अपील की है कि वो नमाज़ के बाद किसी भी तरह का विरोध-प्रदर्शन न करें। साथ ही उन्होंने शांति और सौहार्द की बात कहते हुए मुस्लिम समुदाय से एक दिन का रोज़ा रखने की अपील भी की। ऐसी ही शांति-व्यवस्था और रोज़ा रखने की अपील देहरादून में पलटन बाज़ार की जामा मस्जिद के इमाम ने भी की है। वहीं, मेरठ में आईजी, कमिश्नर, डीएम और एसएसपी ने ज़िम्मेदार लोगों के साथ मीटिंग करके उनसे शांति बनाए रखने की अपील की।

ग़ौरतलब है कि नागरिकता संशोधन क़ानून के विरोध में उत्तर प्रदेश में विरोध-प्रदर्शनों ने काफ़ी हिंसक रूप ले लिया था। जिन शहरों में हिंसक वारदातों की ख़बरें आई थीं, उनमें फ़िरोज़ाबाद, हापुड़, लखनऊ, कानपुर, बहराइच, सीतापुर, गोरखपुर, मुज़फ़्फ़रनगर, मेरठ, अलीगढ़, बलरामपुर, बिजनौर, गोंडा और हमीरपुर प्रमुख थे। इन जगहों पपर हिंसक विरोध-प्रदर्शनों के दौरान पुलिस को निशाना बनाते हुए उन पर पत्थरबाज़ी, फायरिंग, तेज़ाब की भरी बोतलों और पेट्रोल बम से हमले किए गए थे। इन हमलो में बड़ी संख्या में पुलिसकर्मी और मीडियाकर्मी भी घायल हुए थे, जिन्हें इलाज के लिए अस्पतालों में भर्ती भी कराया गया।

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CAA के विरोध में हैं BHU के 51 प्रोफेसर? वामपंथी प्रोपेगेंडा के शिकार कई प्रोफेसरों ने कहा- धोखे से लिया गया हस्ताक्षर

ख़बर आई थी कि बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी के 51 प्रोफेसरों ने केंद्र सरकार के नागरिकता संशोधन क़ानून के ख़िलाफ़ हस्ताक्षर अभियान चला कर के विरोध जताया है? जिसे कई मीडिया संस्थानों ने छापा भी, बिना उन प्रोफेसरों से बात किए या कन्फर्म किए। जबकि पत्र का स्वरूप और शैली देखकर कई लोगों ने संदेह जताया था कि ये भी वामपंथी प्रोपेगेंडा हो सकता है। शाम होते-होते BHU में CAA समर्थक छात्रों और कई प्रोफेसरों ने इसे खारिज करना शुरू कर दिया। छात्रों ने तो बाकायदा इस वामपंथी प्रोपेगेंडा के जवाब में उन्हीं की शैली में पोस्टर वॉर भी छेड़ दिया।

सबसे पहले एक नजर आप उस पर्चे को देख सकते हैं, जिसे सीएए-NRC के विरोध में कहकर 51 प्रोफेसरों के नाम और हस्ताक्षर के साथ सर्कुलेट किया गया था।

बीएचयू के प्रोफेसरों का CAA के विरोध में कथित प्रेस रिलीज-1

बाकायदा बीएचयू के प्रोफेसरों के नाम से एक प्रेस रिलीज जारी हुआ, जिसके बारे में दावा किया गया कि सीएए-NRC के विरोध को 51 प्रोफेसरों ने हस्ताक्षर करके समर्थन दिया है। आप 51 प्रोफेसरों के हस्ताक्षर देख सकते हैं, जिनके बारे में दावा किया गया कि वो सरकार के इस कानून के विरोध में हैं।


बीएचयू के प्रोफेसरों का CAA के विरोध में कथित प्रेस रिलीज-2 और 51 प्रोफेसरों के हस्ताक्षर वाला पैम्पलेट

इसी रिलीज के आधार कुछ मीडिया संस्थानों ने ये खबर चलाई कि बीएचयू के प्रोफेसरों ने हस्ताक्षर कर सीएए और NRC का विरोध किया है।

‘भाषा’ (PTI) ने बीएचयू को लेकर चलाई खबर

जनसत्ता ने भी दावा किया कि बीएचयू के 51 प्रोफेसर सीएए और NRC के विरोध में हैं और उन्होंने केंद्र सरकार के इस क़दम का विरोध किया है। हालाँकि, ‘जनसत्ता’ ने ‘भाषा’ के हवाले से ये ख़बर चलाई थी। ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ ने भी ‘पीटीआई’ के हवाले से ही इस ख़बर को आगे बढ़ाया। साथ ही कई अन्य मीडिया समूहों ने भी।

इस खबर के बाहर आते ही BHU के छात्रों ने उन प्रोफेसरों से मिलकर कारण जानना चाहा तो कई प्रोफेसरों ने इस प्रेस रिलीज से अनभिज्ञता जाहिर की। बता दें कि बड़े पैमाने पर BHU के छात्रों ने सरकार के नागरिकता संशोधन कानून का समर्थन किया था। और इसके सम्बन्ध में रैली निकालकर एकजुटता भी प्रदर्शित की थी। हालाँकि वामपंथी संगठन जॉइंट एक्शन कमिटी के तहत मुट्ठी भर छात्रों ने CAA और NRC का विरोध भी किया गया था। जिनकी संख्या कम होने के कारण उन्हें BHU के राष्ट्रवादी छात्रों का आक्रोश और विरोध भी झेलना पड़ा था। मीडिया गिरोह ने यहाँ भी विरोध की खबर को प्रमुखता दी थी और समर्थन की खबर को दबा दिया था।

अब जब छात्रों के अनुसार वामपंथी धड़े के द्वारा ही छल से हस्ताक्षर करा कर एक CAA और NRC के विरोध में पर्चा रिलीज किया गया तो इसके विरोध में छात्रों ने प्रोफेसरों के हस्ताक्षर वाले कागज का पोस्टर बनाकर पूरे बीएचयू में पोस्टर वॉर छेड़ दिया। BHU के CAA और NRC समर्थक छात्रों ने वामपंथी और देश विरोधी तथाकथित प्रेस रिलीज का मुखर विरोध करते हुए, प्रतिउत्तर में जो पोस्टर लगाए हैं उन पोस्टरों में लिखा है, “रोहिंग्या की गोद में खेले हैं, ये हाफिज के चेले हैं‘” कई अन्य पोस्टरों में लिखा हुआ है- “ये घुसपैठियों के यार हैं, पहचान लो ये गद्दार हैं।

बीएचयू में सीएए समर्थकों के पैम्प्लेट्स पर लिखा गया- “ये घुसपैठियों के यार हैं

ऑपइंडिया ने छात्रों से बात की तो बताया गया कि BHU के ज़्यादातर प्रोफ़ेसर देश विरोधी नहीं हैं। ये चंद वामपंथी प्रोफेसरों, छात्रों और उनके उनके अफवाह तंत्र द्वारा फैलाया गया एक प्रोपेगेंडा है। जिसकी पोल खुद कई प्रोफेसरों ने ही खोल दी। कई प्रोफेसरों ने आरोप लगाया है कि उनसे धोखे से हस्ताक्षर करा लिया गया था कि CAA और NRC पर अकादमिक चर्चा होगी। और बिना उनकी अनुमति के ऐसा प्रचारित कर दिया कि ये सारे प्रोफेसर सीएए-NRC के विरोध में हैं। कई प्रोफेसरों ने अपने बयान में कहा कि ये झूठ है। हम सरकार के खिलाफ नहीं हैं तो कुछ वामपंथी प्रोफेसरों ने हामी भी भरी कि उन्हें इस सरकार से कोई काम नहीं है तो वे इसका विरोध करते हैं। लेकिन यहाँ भी देश विरोधी प्रोफेसरों की संख्या बहुत कम है। कहा जा रहा है ऐसे ही कुछ वामपंथी प्रोफेसरों ने गलत मंशा से बाकी प्रोफेसरों का धोखे से हस्ताक्षर लेकर PTI के माध्यम से छपवा दिया।

समाजशास्त्र विभाग के विभागाध्यक्ष प्रोफेसर अजीत कुमार पांडेय ने बताया कि किस से तरह से बिना मूल उद्देश्य को बताए उनका हस्ताक्षर लिया गया। इसके साथ ही विभिन्न मीडिया संस्थानों पर उनके नाम से चलाए जा रहे बयान का भी उन्होंने खण्डन किया है। उन्होंने कहा है कि वो सीएए-NRC का विरोध नहीं करते हैं। प्रोफेसर पांडेय ने कहा:

“मैंने ऐसा कोई बयान नहीं दिया है, जिसमें सीएए, एनआरसी या फिर एनपीआर का विरोध किया गया हो। ऐसी बातें मिथ्या है। ये झूठ है कि मैं सीएए का विरोधी हूँ। यूनिवर्सिटी के शिक्षक होने के नाते हमारे हर बयान के पीछे कुछ कारण होता है। हम एक लोकतंत्र में रहते हैं और जनता के फायदे के लिए सरकार जो भी करने की कोशिश कर रही है, उसका समर्थन किया जाना चाहिए। जनसत्ता ने मेरे से कोई बातचीत नहीं की है। सीएए जनता के फ़ायदे के लिए है। आम जनता को फायदा होना चाहिए।”

प्रोफेसर पांडेय ने वामपंथियों के साज़िश का भंडाफोड़ करते हुए आगे बताया:

अगर कहीं दिक्कत है तो सरकार चर्चा करेगी। इस बारे में सीधे प्रधानमंत्री को भी लिखा जा सकता है। अगर सरकार के काम में कोई खामी है तो हमें उसे ध्यान दिलाना चाहिए। मैं आश्चर्यचकित हूँ। मैंने सरकार या सीएए के ख़िलाफ़ कोई बयान नहीं दिया। जिस पैम्पलेट में प्रोफेसरों का हस्ताक्षर दिख रहा है, उसे धोखे से साइन कराया गया। कहा गया कि सीएए पर चर्चा होगी और हस्ताक्षर ले लिया गया। जब सीएए जनता के फायदे के लिए है, तो उसके विरोध में स्टैंड क्यों लूँगा मैं?”


समाजशास्त्र विभाग के विभागाध्यक्ष प्रोफेसर अजीत कुमार पांडेय का बयान

कई और प्रोफेसरों ने भी इस बात की पुष्टि की कि उनका हस्ताक्षर बिना प्रयोजन बताए लिया गया था। इससे यह साबित हो जाता है कि जिस पैम्पलेट में प्रोफेसरों के हस्ताक्षर के साथ दावा किया गया था कि वो सभी सीएए-NRC के विरोध में हैं, वो फ़र्ज़ी निकला। उस पैम्पलेट में कहा गया था कि ये क़ानून स्वीकार्य नहीं है और ये बँटवारे की भावना फैला रहा है। जबकि अब कई प्रोफेसरों ने खुलेआम ऐसी किसी बात का समर्थन करने से इनकार किया है।

इस खंडन के बाद काशी हिन्दू विश्वविद्यालय को लेकर फैलाया जा रहे लेफ्ट-कॉन्ग्रेसी प्रोपेगण्डे की पोल खुल गई है। जिन 51 शिक्षको को लेकर पूरे देश मे यह माहौल बनाया जा रहा था कि काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के बहुत सारे शिक्षक CAA और NRC के ख़िलाफ़ हैं, वह फेक और झूठा साबित हुआ।

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CAA: दंगाइयों के आकाओं को जनरल रावत ने फटकारा, CPI व कॉन्ग्रेस ने बताया असंवैधानिक बयान

सेना प्रमुख जनरल विपिन रावत ने नागरिकता संशोधन क़ानून के विरोध की आड़ में हिंसा करने वालों को फटकार लगाई है। सेना प्रमुख ने कहा कि नेता वो नहीं होता है, जो भीड़ को हिंसा और आगजनी के लिए भड़काता है। जनरल रावत ने कहा कि भीड़ को गलत दिशा में ले जाने वाला लीडर नहीं होता है। पाकिस्तान की ओर से सीजफायर तोड़ने की घटनाओं को लेकर पूछे गए सवाल पर भारतीय सेना प्रमुख बिपिन रावत ने कहा कि इसमें नया क्या है?

सेना प्रमुख ने साथ ही नागरिकता संशोधन कानून पर कहा कि नेता वे नहीं हैं जो भीड़ को गलत दिशा में ले जाएँ। उन्होंने कहा– “कई घटनाओं के गवाह हैं, जहाँ छात्र नेताओं ने गलत दिशा में भीड़ का नेतृत्व किया, जिससे आगजनी और हिंसा हुई।” एक सच्चे नेता की परिभाषा समझाते हुए जनरल विपिन रावत ने कहा कि लीडर वो होते हैं, जो जनता और टीम की देखभाल और सुरक्षा करते हैं। हिंसक भीड़ के नेतृत्वकर्ताओं के बारे में उन्होंने कहा कि वो सब लीडर नहीं हैं। आर्मी चीफ ने कहा कि सेना को अपनी संस्कृति पर गर्व है।

वहीं सीपीआई सरीखे राजनीतिक दलों ने जनरल रावत के बयान की आलोचना की है। कॉन्ग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने कहा कि नेता वो भी नहीं होते हैं, जो अपने लोगों को सांप्रदायिक हिंसा के लिए उकसाते हैं। साथ ही उन्होंने पूछा कि क्या ‘जनरल साहब’ उनकी बातों से सहमत हैं? कॉन्ग्रेस नेता बृजेश कलप्पा ने कहा कि जनरल रावत का सीएए के उपद्रवियों के ख़िलाफ़ बोलना असंवैधानिक है।

वहीं हैदराबाद के सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने कहा कि नेता होने का एक गुण ये भी है कि आप अपनी सीमाओं को पहचानों। इसके साथ ही उन्होंने संवैधानिक संस्थानों की स्वतंत्रता और जनता को प्राथमिकता दिए जाने का भी रोना रोया। योगेंद्र यादव ने कहा कि एक नेता को अपने लोगों को सही दिशा में ले जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि पीएम के मन में भी शायद यही बात होगी।

मुस्लिम चरवाहों ने 2019 में मार डाले 1000 ईसाई किसान, पिछले 4 सालों में मारे गए 6000 के पार: रिपोर्ट

नाइजीरिया के ‘मिडल बेल्ट‘ में केवल एक साल के भीतर 1000 ईसााईयों को मार दिया गया। द ह्यूमनेटेरियन क्रिश्चियन एड रिलीफ ट्रस्ट (HART) ने इसका खुलासा अपनी रिपोर्ट में किया। रिपोर्ट में इस नरसंहार के पीछे बोको हराम के जिहादियों और मुस्लिम चरवाहों को जिम्मेदार ठहराया गया

रिपोर्ट में कहा गया कि मुस्लिम चरवाहों के समूह ने यहाँ ईसाई किसानों को उनकी जमीन हथियाने के लिए निशाना बनाया। साथ ही आक्रामक और रणनीतिक रूप से उनकी जमीन हथियाने के लिए नारा दिया- ‘Your land or your blood’।

HART की संस्थापक बैरोनोस कॉक्स (Baroness Cox) ने इस संबंध में बताया कि हिंसा प्रभावित गावों में वे कई बार गई। जहाँ उन्होंने मौत और बर्बादी की कई शोकपूर्ण घटनाएँ देखीं।

वे बताती है कि जिन क्षेत्रों में ये सब होता है वहाँ के हालत इतने बेकार हैं कि हर गाँव से सिर्फ़ मदद माँगती आवाजें ही आती हैं। वहाँ स्थानीय लोग कहते हैं- “प्लीज-प्लीज हमारी मदद करो। फुलानी ( मुस्लिम चरवाहे) आ रहे हैं। हम अपने घरों में भी सुरक्षित नहीं हैं।”

उनके मुताबिक, पिछले कुछ सालों में जमीन और पानी की लड़ाई ने यहाँ एक भयंकर मजहबी रूप ले लिया है। जिसके चलते जनवरी 2019 से अब तक 1000 ईसाई मारे जा चुके हैं। जबकि पिछले 4 सालों में ये आँकड़ा 6000 से ज्यादा का है। इसके अलावा 12,000 से ज्यादा लोगों को फुलानी समूह उनके घरों से विस्थापित कर चुके हैं।

इतना ही नहीं, कॉक्स के मुताबिक, किसानों पर हमला करने वाले मुस्लिम चरवाहे इस्लामिक विचारधारा के साथ इन इलाकों में विविधताओं और विभिन्नताओं को बदल देना चाहते हैं, लेकिन जब वहाँ का स्थानीय ऐसा करने से मना करता है, तो नरसंहार होता है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक कॉक्स कहती हैं, बहुत जल्दी, यहाँ कुछ बदलना चाहिए। क्योंकि जब तक इस तरह के नरसंहारों को झेला जाता रहेगा, तब तक इन्हें श्रेय मिलती रहेगी और ये लोग यहाँ किसानों को मारना जारी रखेंगे।