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CAA विरोध के नाम पर अब बंगाल को जलाएगा PFI, ममता के सांसद अबू ताहिर भी होंगे साथ!

नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के विरोध के नाम पर उत्तर प्रदेश में हुई हिंसा में पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) की संलिप्तता सामने आई है। इस कट्टरपंथी संगठन के अब तक 25 लोग गिरफ्तार किए जा चुके हैं। राज्य के डीजीपी ओपी सिंह ने पीएफआई पर प्रतिबंध लगाने का प्रस्ताव तैयार कर गृह विभाग को भेजा है। यूपी में कसते शिकंजे के बाद अब इस कट्टरपंथी संगठन की नजर पश्चिम बंगाल पर है।

PFI के सदस्य हसीबुल इस्लाम ने 5 जनवरी को बंगाल के मुर्शिदाबाद में CAA के विरोध में प्रदर्शन का ऐलान किया है। उसका दावा है कि सत्ताधारी तृणमूल कॉन्ग्रेस के स्थानीय सांसद अबू ताहिर खान भी प्रदर्शन में शामिल होंगे।

हालाँकि, हसीबुल इस्लाम के इस दावे को अबू ताहिर खान ने खारिज किया है। उन्होंने मीडिया से बातचीत करते हुए कहा, “मुझे ऐसे किसी भी प्रदर्शन की जानकारी नहीं है। अगर उन्होंने मेरा नाम अपने पोस्टर पर लिख दिया है, तो मैं इसमें कुछ नहीं कर सकता।”

वैसे, महत्वपूर्ण सवाल यह नहीं है कि पीएफआई के प्रदर्शन में सत्ताधारी टीएमसी के सांसद शामिल होंगे या नहीं। हम सब जानते हैं कि किस तरह ममता बनर्जी की अगुवाई वाली सरकार अपनी राजनीतिक विरोधी भाजपा को राज्य में कार्यक्रम आयोजित करने की इजाजत देने से आनकानी करती रहती है। ऐसे में पीएफआई जैसे कट्टरपंथी समूह को प्रदर्शन की इजाजत किसने दी? यदि इजाजत नहीं दी गई है तो इसका सार्वजनिक तौर पर ऐलान करने के लिए इस समूह के लोगों पर कार्रवाई क्यों नहीं की गई? यह सवाल इसलिए भी जरूरी हो जाता है क्योंकि सीएए के विरोध में बंगाल में समुदाय विशेष के लोगों द्वारा हिंसा, आगजनी, ट्रेनों पर हमले की कई घटनाएँ सामने आ चुकी है।

गौरतलब है कि पीएफआई खुद को गैर सरकारी संगठन बताता है। लेकिन सिमी का छोटा रूप कहे जाने वाले इस संगठन पर कई गैर-कानूनी गतिविधियों में शामिल होने का आरोप है। गृह मंत्रालय का तो ये भी कहना है कि इस संगठन के लोगों के संबंध जिहादी आतंकियों से हैं। साथ ही इन पर इस्लामिक कट्टरवाद को बढ़ावा देने का भी आरोप है।

इसके अलावा बता दें कि यूपी में हुई हिंसा को लेकर भी कहा जा रहा है कि जाँच के दौरान पीएफआई से लिंक मिलने के पुख्ता प्रमाण मिले हैं। मीडिया रिपोर्ट्स में बताया जा रहा है कि संगठन से जुड़े आरोपितों के यहाँ से आपत्तिजनक सामग्रियाँ, साहित्य, सीडी आदि मिले थे। इसको आधार बनाकर पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया को बैन करने का प्रस्ताव उत्तर प्रदेश सरकार ने भेज दिया है।

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पाकिस्तान से जान बचाकर भागी हिंदू लड़की को राजस्थान में परीक्षा देने की इजाजत नहीं

बीते दिनों पाकिस्तान से भागकर आए तीन हिंदू बच्चों को दिल्ली के स्कूल में दाखिला पाने के लिए कई दिनों तक संघर्ष करना पड़ा था। उन्हें तो न्यायालय का दरवाजा खटखटाने के बाद इंसाफ मिल गया था। लेकिन, अब एक ऐसा ही मामला राजस्थान से आया है। दमी कोहली नामक एक पाकिस्तानी हिंदू शरणार्थी को राजस्थान माध्यमिक शिक्षा बोर्ड कथित तौर पर परीक्षा फॉर्म भरने की इजाजत नहीं दे रहा है। सभी प्रूफ जमा किए जाने के बाद भी उससे योग्यता प्रमाण पत्र माँगा जा रहा है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, दमी कोहली कुछ साल पहले अपने परिवार के साथ पाकिस्तान के सिंध प्रांत से भारत आई थी। उसे और उसके परिवार को धार्मिक प्रताड़ना के कारण पाकिस्तान छोड़ना पड़ा था। उसने 10वीं तक की पढ़ाई पाकिस्तान में की है और अब जोधपुर से सटे आंगनवा रिफ्यूजी कैंप में रहती है। इसी जगह उसने साल 2018 में एक स्कूल में 11वीं में एडमिशन लिया था। उसने ग्याहरवीं की परीक्षा पास की और अब उसे 12वीं की परीक्षा देने की दरकार है। लेकिन शिक्षा बोर्ड उससे योग्यता प्रमाण-पत्र माँग रहा है।

समाचार एजेंसी एएनआई को दिए साक्षात्कार के अनुसार दमी कोहली बताती हैं, “2018 में मैंने स्कूल में एडमिशन लिया। मैंने साल भर पढ़ाई की और 11वीं की परीक्षा पास की। मेरे पास मार्क्स शीट भी है। अगली बोर्ड परीक्षा में महज एक महीने बचे हैं और मुझे नोटिस देकर बताया गया है कि परीक्षा में शामिल होने की इजाजत नहीं मिलेगी।” बता दें, अपनी बच्ची के साथ हुई नाइंसाफी पर लड़की के पिता ने बताया कि उनकी बेटी को बोर्ड परीक्षा में इजाजत नहीं दिए जाने का नोटिस थमाया गया है। वहीं हिंदू बच्ची का कहना है कि उसने स्कूल को सभी प्रूफ दिए हैं और उसे शिक्षा का अधिकार मिलना चाहिए।

गौरतलब है दमी कोहली के इस मामले ने राजस्थान में तूल पकड़ लिया है। जिसके बाद शिक्षा मंत्री गोविंद डोतासरा ने इस पर संज्ञान लिया और बताया कि पाकिस्तानी दूतावास को पत्र भेजकर लड़की के सिलेबस की पूरी जानकारी माँगी गई है।

शिक्षा मंत्री ने कहा, “उसने (दमी कोहली) पाकिस्तान बोर्ड से 10वीं की पढ़ाई पूरी की और अब राजस्थान में 12वीं की परीक्षा देना चाहती है। हमने पाकिस्तानी दूतावास को एक पत्र भेजकर उसके सिलेबस की जानकारी माँगी है। हमलोग राजस्थान और वहाँ के सिलेबस को मिला रहे हैं।”

शिक्षा मंत्री डोतासरा ने कहा है कि अगर उन्हें पाकिस्तान से सकारात्मक प्रतिक्रिया मिलती है तो लड़की को परीक्षा की इजाजत दी जाएगी। इसके अलावा अगर पाकिस्तान ने कुछ नहीं भी बताया तो भी वह नियमों में बदलाव कर उसे परीक्षा देने की अनुमति देंगे। बता दें, राजस्थान बोर्ड ने पाकिस्तानी हिंदू शरणार्थी लड़की दमी कोहली का 12वीं का परीक्षा फॉर्म खारिज कर दिया है, क्योंकि उसने पाकिस्तान बोर्ड से 10वीं की पढ़ाई की है।

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केरल विधानसभा में पास हुआ ‘CAA विरोध प्रस्ताव’ गैरकानूनी और असंवैधानिक: आरिफ मोहम्मद खान

नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) के खिलाफ केरल विधानसभा में पास किए गए प्रस्ताव को केरल के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान ने गैरकानूनी और असंवैधानिक करार दिया है। उनका कहना है कि नागरिकता विशेष रूप से केंद्र का विषय है, इसलिए इस प्रस्ताव का वास्तव में कुछ महत्व नहीं है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, उन्होंने कहा, “इस प्रस्ताव की कोई कानूनी और संवैधानिक वैधता नहीं, क्योंकि नागरिकता केंद्र का मामला है। इसका राज्य से कोई मतलब ही नहीं है।”

यहाँ बता दें कि केरल के राज्यपाल शुरुआत से ही सीएए का विरोध करने वालों के ख़िलाफ़ रहे हैं। लेकिन अब उन्होंने बतौर राज्यपाल विधानसभा में पास किए प्रस्ताव को भी खारिज करते हुए कहा है कि ये प्रस्ताव स्पष्ट रूप से गैरकानूनी और असंवैधानिक है। स्पष्ट है कि अब केरल विधानसभा में राज्य सरकार द्वारा पास किए गए प्रस्ताव का कोई अर्थ नहीं रहा। क्योंकि इस प्रस्ताव पर आगे काम करने के लिए पिनरई विजयन सरकार को राज्यपाल के हस्ताक्षर लेने अनिवार्य हैं, जो खुले तौर पर इसकी मुखालफत कर रहे हैं।

गौरतलब है कि इससे पहले केंद्रीय कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ केरल विधानसभा द्वारा पारित प्रस्ताव को असंवैधानिक बताया था। केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने संविधान के अनुच्छेद 245/46 और 256 का हवाला देते हुए कहा था कि केरल विधानसभा का प्रस्ताव गलत है और संविधान की भावनाओं के खिलाफ है।

अपनी बात को रखते हुए कानून मंत्री ने हैरानी प्रकट की थी कि जिस सरकार ने संविधान की शपथ ली है, वह गैर संवैधानिक बात कर रही है कि सीएए राज्य में लागू नहीं होने देंगे। यह कानून संसद द्वारा पारित है। नागरिकता लेना-देना संविधान की सातवीं अनुसूची का विषय है और इस पर कानून बनाने का अधिकार केवल संसद को है। इसलिए संसद नागरिकता संबंधी किसी विषय पर कानून बना सकती है।

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₹40 लाख/व्यक्ति/साल की कमाई, काम मु###नों को कट्टरपंथी बनाना: केरल में टेरर फंडिंग का नया खेल

₹40 लाख/व्यक्ति/साल की कमाई, काम मुस्लिमों को कट्टरपंथी बनाना: केरल में टेरर फंडिंग का नया खेल

केंद्रीय गृह मंत्रालय ने इस्लामिक कट्टरपंथी संगठनों के टेरर फंडिंग के बारे में विवरण माँगा है। यह विवरण खासकर मध्य-पूर्व के देशों से आने वाली फंडिंग को लेकर है। गृह मंत्रालय ने मंगलवार (31 दिसंबर) को राज्यों व ख़ुफ़िया एजेंसियों से यह विवरण माँगा। ऐसी एक रिपोर्ट आई थी, जिसमें विदेशी सरज़मीं से इस तरह की फंडिंग का उदाहरण था। इस रिपोर्ट के आधार पर ही गृह मंत्रालय ने यह विवरण मँगाया है। इस संबंध में विभिन्न एजेंसियों ने बताया कि कट्टरपंथी संगठनों को संयुक्त अरब अमीरात, कतर और तुर्की से धन प्राप्त होता है।

दरअसल, गृह मंत्रालय की एक रिपोर्ट से ख़ुलासा हुआ है कि केरल में ऐसे लोगों को सलाना 40 लाख रुपए तक दिए जाते हैं, जो युवाओं को कट्टरपंथी बनाने के लिए तैयार करते हैं। केरल वर्षों से कट्टरता का केंद्र बना हुआ है और राज्य में कई समूह हैं, जो कट्टरपंथी इस्लाम का प्रचार करते हैं।

ख़बर के अनुसार, एक वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी ने बताया,

“19 सितंबर को कट्टरपंथी इस्लामी संगठन के एक वरिष्ठ सदस्य ने दुबई का दौरा किया, जहाँ उसे कट्टरपंथी विचारधाराएँ फैलाने के लिए भारतीय मुद्रा में 40 लाख रुपए देने की पेशकश की गई।”

इसका सीधा मतलब है कि वहाँ उस व्यक्ति को इतनी बड़ी राशि देने की बात की गई, ताकि वो बड़े स्तर पर युवाओं को कट्टरपंथी विचारधारा से जोड़ सके। उसे यह भी कहा गया कि वो अधिक से अधिक युवाओं की भर्ती करे। इसी तरह की एक और घटना भारतीय सुरक्षा एजेंसियों के सामने आई, जिसमें उसी संगठन के सदस्य कतर और तुर्की के कुछ लोगों से मिले और ग़ैर-मुस्लिम समुदायों के ख़िलाफ़ जेहाद फैलाने के लिए धन की माँग की।

एक अधिकारी ने स्पष्ट किया कि केरल में कट्टरपंथी उग्रता है। और वहाँ कई युवा कट्टरपंथी इस्लामी समूहों द्वारा फँसाए जा रहे हैं। उन्होंने बताया, “पहले इन समूहों को पहचानने की ज़रूरत है और बाद में इस तरह की अवैध गतिविधियों के ख़िलाफ़ कानूनी कार्रवाई की जा सकती है।”

अधिकारी ने बताया, “एक दर्जन से अधिक लोगों को गिरफ़्तार किया गया है। NIA ने ISIS के संदिग्ध सदस्यों के ख़िलाफ़ ग़ैर-क़ानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम के तहत कई मामले दर्ज किए हैं।”

उन्होंने बताया कि केरल में संदिग्ध आतंकी संगठनों पर नकेल कसने के बाद से, कुछ कट्टरपंथी इस्लामी संगठनों ने विदेशी धरती से धन प्राप्त करने के बाद भारत-विरोधी गतिविधियों में शामिल होना शुरू कर दिया है। गृह मंत्रालय को बताया गया कि केरल में कई ऐसे छोटे समूह हैं, जो मुस्लिम युवाओं को सक्रिय रूप से कट्टरपंथी बना रहे हैं। विदेशी (जो भारत विरोधी हैं) केरल के इन समूहों की पहचान करते हैं, फिर उन्हें बड़ी रकम की पेशकश करते हैं।

भारतीय ख़ुफ़िया ब्यूरो ने हमेशा से कट्टरपंथी समूहों के ख़तरे के बारे में चेतावनी दी है। अब पाकिस्तान में हुए एक अध्ययन में भी इस बात की पुष्टि हुई है कि केरल का आतंकी संगठन ISIS से भी संबद्धता रखता है।

पाकिस्तान इंस्टीट्यूट फॉर कॉन्फ्लिक्ट एंड सिक्योरिटी स्टडीज के प्रबंध निदेशक अब्दुल्ला ख़ान द्वारा आयोजित ‘दक्षिण एशिया में विस्तार की संभावनाएँ’ शीर्षक से एक अध्ययन के मुताबिक़, भारत, बांग्लादेश और पाकिस्तान में विलायत-ए-हिन्द एक नया अध्याय है, जो जल्दी से शिक्षित युवाओं को अपनी ओर आकर्षित कर रहा है। इसके अनुसार, भारतीय नागरिक, विशेष रूप से केरल के लोग इस्लामिक स्टेट को दूसरे समूह की तुलना में अधिक आकर्षक लगते हैं। केरल के 54 लोग पिछले तीन वर्षों में ISIS में शामिल हो चुके हैं।

जानकारी के अनुसार, लगभग 1000 वहाबी प्रचारक (कट्टर इस्लाम के प्रचारक) केरल राज्य में आए, अपनी विचारधारा को फैलाया, पानी की तरह पैसा बहाया और फिर वहाँ से चले गए। उन्होंने नई मस्जिदों के निर्माण पर भारी खर्च किया। उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि इन धार्मिक स्थलों से कट्टचरपंथी विचारधारा का प्रचार किया जाएगा।

केरल में जो नई मस्जिदें बन रही हैं, उनका निर्माण भी उसी तरह से हो रहा है जैसा कि सऊदी अरब में हुआ है। यह सिर्फ़ एक छोटा सा संकेत है कि राज्य के लोग वहाबी विद्वानों द्वारा प्रचारित कट्टरपंथी शैली का पालन करने के लिए कितने तैयार हैं।

इसके अलावा, सऊदी से केरल में धन की आमद देश के किसी अन्य हिस्से की तुलना में सबसे अधिक है। यह वही केरल है, जहाँ एक शख़्स ओसामा बिन लादेन की मौत पर उसका पोस्टर लिए विलाप करते हुए दिखा था और अजमल कसाब को फाँसी दिए जाने के बाद उसने प्रार्थना भी की थी। इंटेलिजेंस ब्यूरो के अधिकारियों ने बताया कि बड़ी संख्या में युवा इस्लाम की इस कट्टरपंथी शैली से आकर्षित हो रहे हैं, लेकिन साथ में उन्होंने यह भी बताया कि कुछ बुजुर्ग हैं, जो इसका विरोध करने की कोशिश करते हैं।

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मध्य प्रदेश में अफसर बनना है तो पढ़ना पड़ेगा नेहरू को, कॉन्ग्रेसी सरकार ने लागू किया नया पाठ्यक्रम

वर्तमान में कॉन्ग्रेस शासित राज्य मध्य प्रदेश में लोक सेवा आयोग (MPPSC) की परीक्षा पास कर क्लास 1 अधिकारी बनने के लिए अब अभ्यर्थियों को देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के विचारों को भी पढ़ना अनिवार्य होगा। ऐसा इसलिए, क्योंकि ‘राज्यसेवा परीक्षा’ के लिए पीएससी (MPPSC) द्वारा जारी संशोधित पाठ्यक्रम में पं. नेहरू को शामिल किया गया है। उन्हें दार्शनिक और विचारकों की सूची में राज्यसेवा के पाठ्यक्रम में जगह दी गई है। ये संशोधित पाठ्यक्रम राज्यसेवा परीक्षा-2020 से लागू होगा।

नई दुनिया की रिपोर्ट के अनुसार पीएससी सचिव रेणु पंत ने इस बदलाव पर कहा, “हमने सिलेबस को बेहतर और भविष्य के अधिकारियों की आवश्यकता के हिसाब से अपडेट किया है। यह विद्यार्थियों के लिए भी सुविधाजनक होगा।”

गौरतलब है कि नए पाठ्यक्रम में प्रारंभिक और मुख्य परीक्षा के पेपरों की संख्या और परीक्षा योजना में किसी तरह का बदलाव नहीं किया गया है। पीएससी की मुख्य परीक्षा में पहले की तरह कुल 6 पेपर ही होंगे। इनमें से 4 पर्चे सामान्य अध्ययन के होंगे, जिनके पाठ्यक्रम को पुनः निर्धारित किया गया है। पहले पेपर में कोई खास बदलाव नहीं हुआ है।

लेकिन सामान्य अध्य्यन के दूसरे पेपर में संविधान, शासन व्यवस्था व राजनैतिक प्रशासन के साथ ही अर्थशास्त्र, समाज शास्त्र और मानव संसाधन विकास को जोड़ा गया है। इसी पेपर की चौथी इकाई भारतीय राजनीतिक विचारकों की रखी गई है। इसमें विचारकों के रूप में कुल 8 लोगों को शामिल किया गया है। इनमें कौटिल्य, महात्मा गाँधी, सरदार पटेल, जयप्रकाश नारायण (जेपी), डॉ अंबेडकर, राममनोहर लोहिया और दीनदयाल उपाध्याय के साथ पंडित जवाहरलाल नेहरू का नाम शामिल है।

यहाँ स्पष्ट कर दें कि अब तक राज्यसेवा की मुख्य परीक्षा के पाठ्यक्रम में कौटिल्य से लेकर गाँधी, बुद्ध और शंकराचार्य जैसे 20 विचारकों, दार्शनिकों व समाज सुधारकों के नाम शामिल थे, लेकिन नेहरू को जगह नहीं दी गई थी। उन्हें बीते वर्षों में सिलेबस से बाहर कर दिया गया था।

बता दें कि रिपोर्ट के मुताबिक राज्यसेवा की तैयारी करवाने वाले प्रदीप श्रीवास्तव ने बदलाव को बेहतर बताया है। क्योंकि, लोक प्रशासन को भी पाठ्यक्रम में खासी जगह दी गई है। कानून वाला हिस्सा हटाया भी गया है। खास बात ये है कि पं नेहरू को शामिल करने के साथ दीनदयाल उपाध्याय को भी बरकरार रखा गया है। प्रश्न पत्रों में प्रश्नों के अंक का विभाजन और शब्द सीमा भी बदली गई है।

सभी बांग्लादेशी मूल रूप से हिन्दू, इस्लाम तो बाद में आया: प्रियंका चोपड़ा के अमेरिकी शो की लेखिका अहमद

अमेरिका में रहने वाली बांग्लादेश की लेखिका शरबरी जोहरा अहमद का मानना है कि मूल रूप से हिन्दू होने की वजह से बांग्लादेशी लोग भारतीयों की तरह हैं। हालाँकि, लेखिका का कहना है कि अब बांग्लादेशी लोग अपनी जड़ों को भूल गए हैं। शरबरी का जन्म बांग्लादेश के ढाका में हुआ था और वह जब सिर्फ तीन सप्ताह की थीं तभी अमेरिका चली गईं थीं।

लोकप्रिय अमेरिकी टेलीवीजन शो ‘क्वांटिको’ की पटकथा की सहलेखिका शरबरी ने कहा कि उन्हें इस बात का अफ़सोस है कि दक्षिणपंथी धार्मिक समूहों के प्रभाव की वजह से एक बंगाली के तौर पर उनकी पहचान बांग्लादेश में खोती जा रही है। ‘क्वांटिको’ में भारतीय अभिनेत्री प्रियंका चोपड़ा ने मुख्य भूमिका निभाई है।

लेखिका शरबरी ने पीटीआई-भाषा से बातचीत में कहा, “कैसे बांग्लादेश अपनी हिन्दू विरासत से इनकार कर सकता है? हम मूल रूप से हिन्दू थे। यहाँ इस्लाम बाद में आया। ब्रिटेन ने हमारा उत्पीड़न किया, हमसे छीना और हमारी हत्याएँ की।” उन्होंने कहा कि अविभाजित भारत के ढाका में फलते-फूलते मलमल उद्योग को अंग्रेजों ने तबाह कर दिया।

उन्होंने कहा कि उनकी आस्था के सवाल और बांग्लादेश में पहचान के मुद्दे ने उन्हें ‘Dust Under Her Feet’ उपन्यास लिखने के लिए प्रेरित किया। बांग्लादेश में इस्लाम राजधर्म है। सरबरी ने विंस्टन चर्चिल को ‘नस्लवादी’ बताया। लेखिका ने कहा, “अपने सैनिकों के लिए वह बंगाल से चावल ले गए लेकिन बताए जाने के बावजूद उन्होंने यहाँ के लोगों की परवाह नहीं की।”

लेखिका ने कहा:

“अपनी रिसर्च के दौरान मुझे पता चला कि क़रीब 20 लाख बंगाली चर्चिल की वजह से उत्पन्न कृत्रिम अकाल से मर गए। जब लोग चर्चिल की प्रशंसा करते हैं तो यह वैसा ही है जैसे कि कोई यहूदियों के सामने हिटलर की प्रशंसा करे। वह भयानक इंसान था।”

उन्होंने कहा कि उनकी किताब में यह बताने की कोशिश की गई है कि वाकई उस समय क्या हुआ था। यह किताब द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान कोलकाता की पृष्ठभूमि में लिखी गई है। उस समय बड़ी संख्या में अमेरिकी सैनिक शहर में आए थे।

लेखिका ने कहा कि विडंबना यह थी कि जब ये अमेरिकी सैनिक स्थानीय लोगों से अच्छे थे, तो वे तथाकथित “Black” सैनिकों को अलग कर देते थे। उन्होंने कहा, “कलकत्ता एक कॉस्मोपॉलिटन था और बाक़ी दुनिया को यह जानने की ज़रूरत है कि तब शहर के लोगों का किस तरह से शोषण किया गया, उनके खजाने को लूटा गया, लोगों को बाँटा गया और नफ़रत पैदा की गई।”

लेखिका शरबरी जोहरा अहमद ने कहा, “मेरी माँ के यहाँ जन्म लेने के बाद से ही मेरे पहले उपन्यास के लिए कोलकाता मेरी पसंद था। उन्होंने (माँ) ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ के दौर को तब देखा था, जब वह एक बच्ची थीं और उन्हें गहरा आघात पहुँचा था। उन्होंने देखा था कि पार्क सर्कस में अपने घर के पास मु###नों द्वारा एक हिन्दू को कैसे मार दिया गया था।”

डायरेक्ट एक्शन डे – इसे कलकत्ता में नृशंस हत्याओं के रूप में जाना जाता है। 16 अगस्त 1946 को बड़े पैमाने पर साम्प्रदायिक दंगा हुआ था, जो अगले कुछ दिनों तक जारी रहा था। इस हिंसा में हज़ारों लोग मारे गए थे।

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‘अल्पसंख्यकों को मोदी-शाह की हत्या कर देनी चाहिए’ – गिरफ्तार हुआ कॉन्ग्रेस नेता व लेखक

नागरिकता संशोधन क़ानून (CAA) के ख़िलाफ़ यूँ तो देश भर में विरोध-प्रदर्शन हो रहे हैं और जगह-जगह हिंसक विरोध-प्रदर्शनों की ख़बरें सुर्ख़ियों में बनी रहीं। इस बीच, तमिलनाडु के एक लेखक और कॉन्ग्रेस नेता नेल्लई कन्नन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री को लेकर ऐसी टिप्पणी कर दी, जिससे उन्हें पेरांबलूर से गिरफ़्तार कर लिया गया। कन्नन की गिरफ़्तारी के लिए बीजेपी जमकर विरोध-प्रदर्शन कर रही थी। बता दें कि कन्नन के ख़िलाफ़ 15 से अधिक मामले दर्ज किए गए हैं। तमिलनाडु पुलिस ने भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा-504, 505, 505 (2) के तहत FIR दर्ज की है।  

दरअसल, शनिवार (29 दिसंबर) को सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ़ इंडिया ने CAA के विरोध में बैठक बुलाई थी। इस बैठक में कॉन्ग्रेस नेता नेल्लई कन्नन ने भी भाषण दिया था। इस भाषण में उन्होंने नागरिकता संशोधन क़ानून और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) के ख़िलाफ़ टिप्पणियाँ की थी। इस दौरान नेल्लई कन्नन ने लोगों को भड़काते कहा था कि अल्पसंख्यकों को पीएम मोदी और अमित शाह की हत्या कर देनी चाहिए। उन्होंने कहा था कि उन्हें उम्मीद थी कि कोई प्रधानमंत्री और गृह मंत्री शाह को ख़त्म कर देंगे, लेकिन किसी ने ऐसा नहीं किया।

गिरफ़्तार किए गए लेखक कन्नन ने कहा था कि पीएम नरेंद्र मोदी के पीछे अमित शाह का दिगाम है और दोनों में से किसी एक को समाप्त होना चाहिए, लेकिन अभी तक ऐसा नहीं हो सका। 

इस प्रकार के विवादित बयान पर बीजेपी ने कड़ा विरोध जताया। बीजेपी के राष्ट्रीय सचिव एच राजा ने तमिलनाडु पुलिस से कन्नन के ख़िलाफ़ सख़्त कार्रवाई की माँग की। उन्होंने अपने ट्वीट में लिखा, “कॉन्ग्रेस नेता नेल्लई कन्नन ने अपने भाषण में पीएम और गृहमंत्री को ख़त्म करने के लिए मु###नों को उकसाया है। मैंने तमिलनाडु पुलिस के महानिदेशक से व्हाट्सएप पर और ऑनलाइन भी शिक़ायत की है। मैं तमिलनाडु सरकार से तत्काल कार्रवाई करने का अनुरोध करता हूँ।”

अपने एक अन्य ट्वीट में उन्होंने लिखा, “कन्नन ने न सिर्फ़ पीएम मोदी और अमित शाह के ख़िलाफ़ अपमानजनक टिप्पणी की है, बल्कि उन्होंने पीएम और गृहमंत्री को जान से मारने की धमकी दी।” इसके आगे उन्होंने लिखा कि कन्नन कुछ ऐसा करना चाहते हैं जैसा तमिलनाडु में राजीव गाँधी के साथ हुआ था।

नेल्लई कन्नन की टिप्पणी के ख़िलाफ़ बीजेपी के वरिष्ठ नेताओं ने बुधवार (1 जनवरी 2020) को चेन्नई के मरीना के बीच पर गाँधी प्रतिमा के पास बैठकर तमिल लेखक की गिरफ़्तारी तक धरना दिया था। इसमें बीजेपी के चार वरिष्ठ नेता पोन राधाकृष्णन, सीपी राधाकृष्णन, एल गणेशन और एच राजा भी शामिल थे। 

ग़ौरतलब है कि नागरिकता संशोधन क़ानून 31 दिसंबर, 2014 को या उससे पहले पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफ़ग़ानिस्तान से आए ग़ैर-मुस्लिम शरणार्थियों को भारतीय नागरिकता देने का काम करता है। यह उन लोगों पर लागू होता है, जिन्हें धर्म के आधार पर उत्पीड़न के कारण भारत में शरण लेने के लिए मजबूर किया गया था। इसका उद्देश्य ऐसे लोगों को अवैध प्रवास की कार्यवाही से बचाना है। नागरिकता के लिए कट-ऑफ की तारीख 31 दिसंबर, 2014 है, जिसका अर्थ है कि आवेदक उस तारीख को या उससे पहले भारत में प्रवेश कर चुका हो।

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1 अप्रैल से NPR: घर-घर जाकर जुटाया जाएगा डाटा, मोदी सरकार ने ₹8500 करोड़ की दी मंजूरी

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कोटा में बच्चों की मौत पर प्रियंका गाँधी ‘बेनकाब’: UP में राजनीति व राजस्थान में चुप्पी पर मायावती ने साधा निशाना

राजस्थान के कोटा में लगातार हो रही बच्चों की मौत का मामला अब तूल पकड़ता जा रहा है। कॉन्ग्रेस के शीर्ष नेताओं की चुप्पी को अब अन्य पार्टियाँ संदेह की नजर से देख रही हैं। इस कड़ी में भारतीय जनता पार्टी के बाद बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो मायावती ने मुख्यमंत्री अशोक गहलोत समेत कॉन्ग्रेस की महिला राष्ट्रीय महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा पर खुलेआम निशाना साधा है।

बीएसपी अध्यक्ष मायावती ने आज इस मामले को ट्विटर पर उठाते हुए पहले बच्चों की मौत को अति दुखद और दर्दनाक बताया। फिर उन्होंने मुख्यमंत्री गहलोत और राज्य सरकार के रवैये को गैर जिम्मेदार और उदासीन करार दिया।

उन्होंने लिखा, “कॉन्ग्रेस शासित राजस्थान के कोटा जिले में हाल ही में लगभग 100 मासूम बच्चों की मौत से माँओं का गोद उजड़ना अति-दुःखद व दर्दनाक है। तो भी वहाँ के सीएम गहलोत स्वयं व उनकी सरकार इसके प्रति अभी भी उदासीन, असंवेदनशील व गैर-जिम्मेदार बने हुए हैं, जो अति-निन्दनीय।”

इसके बाद उन्होंने राज्य सरकार के रवैये से भी ज्यादा दुखद प्रियंका गाँधी द्वारा इस मामले पर चुप्पी साधने को बताया। उन्होंने आगे लिखा, “किन्तु उससे भी ज्यादा अति दुःखद है कि कॉन्ग्रेस पार्टी के शीर्ष नेतृत्व व खासकर महिला महासचिव की इस मामले में चुप्पी साधे रखना। अच्छा होता कि वह यूपी की तरह उन गरीब पीड़ित माँओं से भी जाकर मिलतीं, जिनकी गोद केवल उनकी पार्टी की सरकार की लापरवाही आदि के कारण उजड़ गई हैं।”

वे प्रियंका गाँधी की मंशा पर सवाल उठाते हुए लिखती हैं, “यदि कॉन्ग्रेस की महिला राष्ट्रीय महासचिव राजस्थान के कोटा में जाकर मृतक बच्चों की ‘माँओं‘ से नहीं मिलती हैं तो यहाँ अभी तक किसी भी मामले में यूपी पीड़ितों के परिवार से मिलना केवल इनका यह राजनैतिक स्वार्थ व कोरी नाटकबाजी ही मानी जाएगी, जिससे यूपी की जनता को सर्तक रहना है।”

गौरतलब है कि बीते दिनों यूपी में भड़की हिंसा में मारे गए लोगों के परिजनों से मिलकर अपनी संवेदना व्यक्त करने के लिए प्रियंका गाँधी सुरक्षाकर्मियों एवं अधिकारियों पर इल्जाम लगाते, नियम तोड़ते तक पाईं गईं। लेकिन जब बात कॉन्ग्रेस शासित राज्य की आई तो उन्होंने चुप्पी साध ली। जिससे विपक्षी पार्टियों को उनपर सवाल उठाने का मौक़ा मिला और उनकी मंशा पर संदेह जताने का भी।

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‘सभी मूर्तियों को हटा दिया जाएगा… केवल अल्लाह का नाम रहेगा’: IIT कानपुर में जाँच कमिटी गठित, 15 दिन में रिपोर्ट

नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) के विरोध के नाम पर जामिया विश्वविद्यालय में हिंसा भड़काने वाले छात्रों पर हुई पुलिस कार्रवाई के खिलाफ IIT कानपुर में 17 दिसंबर को हुए प्रदर्शन के मामले ने अब तूल पकड़ लिया है। जहाँ संस्थान के कई प्रोफेसरों ने कुछ दिन पहले शिकायत की थी कि 17 दिसंबर को हुए प्रदर्शन में शामिल छात्रों ने अपना विरोध जताने के लिए पाकिस्तानी शायर फैज अहमद की नज्म ‘हम देखेंगे, लाजिम है हम भी देखेंगे…’ गाई। इन लोगों ने आरोप लगाया कि यह हिंदू और राष्ट्र विरोधी है। अब IIT कानपुर में इस पर एक उच्चस्तरीय जाँच कमिटी गठित की गई है। कमिटी इस बात की जाँच कर रही है कि जिस दिन यह नज्म IIT कैंपस में गाया गया, क्या उसके दौरान विश्वविद्यालय के नियमों का उल्लंघन किया गया। कमिटी यह भी देखेगी कि इस नज्म के गाने के बाद सोशल मीडिया पर जो पोस्ट इसके संबंध में डाले गए, वो भड़काऊ थे या नहीं। कमिटी 15 दिन के भीतर रिपोर्ट आईआईटी निदेशक को देगी।

नज्म के बोल इस तरह हैं– “लाजिम है कि हम भी देखेंगे, जब अर्ज-ए-खुदा के काबे से, सब बुत उठाए जाएँगे, हम अहल-ए-वफा मरदूद-ए-हरम, मसनद पे बिठाए जाएँगे। सब ताज उछाले जाएँगे, सब तख्त गिराए जाएँगे। बस नाम रहेगा अल्लाह का। हम देखेंगे।”

इस नज्म को फैज ने 1979 में सैन्य तानाशाह जिया-उल-हक के संदर्भ में और पाकिस्तान में सैन्य शासन के विरोध में लिखी थी। जिसके बाद फैज अपने क्रांतिकारी विचारों के कारण कई सालों तक जेल में रहे थे।

गौरतलब है कि जामिया मिलिया इस्लामिया में छात्रों का प्रदर्शन उग्र होने के बाद पुलिस को लाठियाँ चलानी पड़ी थी। जिसके बाद पुलिस कार्रवाई की निंदा करने के लिए कई संस्थानों में छात्रों ने विरोध किया। इस कड़ी में आईआईटी कानपुर के छात्रों ने भी प्रदर्शन की अनुमति आईआईटी प्रशासन से माँगी। हालाँकि शहर में धारा-144 लागू होने के कारण उस समय प्रशासन ने इसकी अनुमति नहीं दी, लेकिन फिर भी उन्होने शांति मार्च निकालकर अपना विरोध जताया।

इसी बीच कुछ छात्रों ने वहाँ राष्ट्र और हिंदू विरोधी भाषणबाजी की। साथ ही पाकिस्तानी शायर फैज अहमद की नज्म गाई। कुछ छात्रों ने इसका तब विरोध भी किया था। जिससे छात्रों के बीच तनाव हो गया और एक वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हुई।

बता दें कि इस मामले में संस्थान के फैकल्टी सदस्य डॉ वाशी शर्मा समेत 16 फैकल्टी सदस्यों और छात्रों ने शिकायत दर्ज की। शिकायत में स्पष्ट लिखा है कि इस नज्म के कुछ बोल ऐसे हैं, जो हिंदुओं की भावनाओं को ठेस पहुँचा सकते हैं।

शिक़ायतकर्ता डॉ वाशी शर्मा ने IIT प्रशासन से “नफ़रत फैलाने वाली भीड़ के ख़िलाफ तत्काल अनुशासनात्मक और क़ानूनी कार्रवाई” करने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि इस कार्यक्रम के आयोजकों और मास्टरमाइंड की पहचान की जानी चाहिए और उन्हें तुरंत निष्कासित कर दिया जाना चाहिए।

संस्थान के डिप्यूटी डॉरेक्शन मनिंदर अग्रवाल के अनुसार, इस मामले में 6 सदस्यों की कमिटी को गठित किया गया है। जिसका नेतृत्व वे खुद कर रहे हैं, ताकि मामले में जाँच की जा सके। कुछ छात्रों से पूछताछ की जा रही है, जबकि अन्य कुछ छात्रों से तब पूछताछ की जाएगी, जब वे छुट्टियों से आएँगे।

डिप्यूटी डॉयरेक्टर के अनुसार, इस कविता के शब्दों को लेकर सोशल मीडिया पर भी द्वंद्व जारी है। कुछ इसके समर्थन में हैं और कुछ इसके विरोध में।

आईआईटी निदेशक प्रोफेसर अभय करंदीकर के मुताबिक जाँच कमिटी से 15 दिन में रिपोर्ट मांगी गई है। अगर छात्र दोषी पाए गए, तो कड़ी कार्रवाई की जाएगी। उनका संस्थान से निष्कासन तक किया जा सकता है। बता दें कि नज्म के बोलों के अलावा संस्थान में इस बारे में भी जाँच की जा रही है कि बिना अनुमति 17 दिसंबर को छात्रों ने शांति मार्च कैसे निकाल लिया।

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26 साल बाद परीक्षा, 1 साल विवाद, अब मेरिट जंजाल: कमलनाथ राज में सड़क पर शिक्षा

बीते साल के आखिरी दिनों में सोशल मीडिया में एक शब्द खासी चर्चा में रहा था। यह शब्द है- क्रोनोलॉजी। कॉन्ग्रेस महासचिव प्रियंका गॉंधी ने 27 दिसंबर को ट्वीट कर एक क्रोनोलॉजी पेश की। ऐसा करते वक्त उनके निशाने पर भले केंद्र की मोदी सरकार थी, पर उन्होंने इसकी प्रेरणा कॉन्ग्रेस शासित मध्य प्रदेश से ली थी।

बेरोजगारी भत्ते का वादा कर सत्ता में आई कमलनाथ के नेतृत्व वाली प्रदेश सरकार न केवल अपने कहे से मुकर चुकी है, बल्कि उसके साल भर के ही शासन में राज्य में बेरोजगारों की संख्या भी करीब 7 लाख बढ़ गई है। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय ​राजनीतिक प्रयोगशाला में बदल दिया गया है। पूर्ववर्ती शिवराज सिंह चौहान की सरकार ने ढाई दशक बाद सहायक प्राध्यापकों (असिस्टेंट प्रोफेसर्स) की भर्ती का जो रास्ता खोला था, वह साल भर विवादों में रहा। पदयात्रा, मुंडन, धरना-प्रदर्शनों के बाद सरकार नियुक्ति प्रक्रिया शुरू करने को झुकी। लेकिन, आरक्षित वर्ग की उन 91 महिलाओं की ही अनदेखी कर दी गई जो मेरिट लिस्ट में हैं। उपेक्षा से आहत अतिथि विद्वान तो इस कड़ाके की ठंड में करीब दो हफ्ते से धरने पर बैठे हैं। राज्य सरकार की साख किस कदर गर्त में है, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इनमें से किसी को मुख्यमंत्री कमलनाथ तक के आश्वासन पर यकीन नहीं है।

आखिर ऐसा क्या हुआ कि जिन्हें क्लासरूम में बच्चों को इस समय पढ़ाते रहना था वह खुद सड़क पर हैं? इसे जानने से पहले शिल्पी वर्मा को सुनते हैं। मध्य प्रदेश लोकसेवा आयोग (MPPSC) की सहायक प्राध्यापक भर्ती परीक्षा की चयनित सूची में शिल्पी ज्योग्राफी की मेरिट लिस्ट में हैं। बकौल शिल्पी उनसे कम अंक पाने वालों को नियुक्ति पत्र मिल चुके हैं। लेकिन, वे इससे महरूम हैं।

उच्च शिक्षा विभाग के मंत्री जीतू पटवारी से मुलाकात के बाद अपनी बात रखती शिल्पी वर्मा

शीतल हो या महजबीन… दर्द साझा

शिल्पी अकेली नहीं हैं। उनकी जैसी 91 महिलाएँ हैं। श्वेता हार्डिया, महजबीन अंसारी, शीतल वर्मा, प्रीति तगाया, शीतल जोशी, अरुणा सोलंकी, प्रीति देशमुख, दिव्या पटेल, सबाहत अंजुम कुरैशी, चंदा यादव, दिव्या सेप्ता, इंदिरा परमार…वगैरह। इन सबके विषय अलग-अलग हैं। अलग-अलग शहरों की हैं। ये सब आरक्षित वर्ग की वे चयनित आवेदक हैं जिनका नाम मेरिट लिस्ट में है। लेकिन इनको नियुक्ति पत्र नहीं दिया गया। इनमें 70 ओबीसी, 18 अनुसूचित जाति और 3 अनुसूचित जनजाति से हैं।

प्रीति तगाया ने ऑपइंडिया को बताया कि अपनी समस्या को लेकर वे लोग कई बार MPPSC और उच्च शिक्षा विभाग के सचिव से मिल चुकी हैं। तीन बार राज्य के उच्च शिक्षा मंत्री जीतू पटवारी के पास भी फरियाद लगा चुकी हैं। उन्होंने बताया कि पटवारी ने अगली सुनवाई पर उनकी की कंडीशनल नियुक्ति के लिए हाई कोर्ट में एफिडेविट दाखिल किए जाने का भरोसा दिलाया है।

मंत्री जीतू पटवारी को अपनी परेशानी से अवगत करातीं मेरिट लिस्ट की महिलाएँ

क्यों आई यह नौबत?

शिवराज सिंह चौहान के मुख्यमंत्री रहते हुए 2017 में एमपीपीएससी ने सहायक प्राध्यापकों, लाइब्रेरियन और स्पोर्टस ऑफिसर की नियुक्ति के लिए विज्ञापन जारी किया। 1992 के बााद पहली बार सहायक प्राध्यापकों की नियुक्ति के लिए प्रक्रिया शुरू की गई थी। विधानसभा चुनाव के कारण परीक्षा 2018 में हुई। लेकिन रिजल्ट आते ही विवाद शुरू हो गए। करीब सालभर नियुक्ति ही नहीं दी गई। फिर सहायक प्राध्यापक के चयनित उम्मीदवारों ने पद यात्रा निकाली। राजधानी भोपाल पहुॅंचकर सिर मुॅंडवाए। इसके बाद 3 दिसंबर को सीएम कमलनाथ ने ट्वीट कर बताया कि उन्होंने पीएससी से चयनित लोगों को नियुक्ति पत्र जारी करने के निर्देश दे दिए हैं। साथ ही कहा कि पहले से काम कर रहे अतिथि विद्वान भी बने रहेंगे।

इस बीच कई मामले कोर्ट भी गए। इनमें से ही एक मामला मेरिट लिस्ट में आने वाली आरक्षित वर्ग की 91 महिलाओं से जुड़ा है। परीक्षा के दौरान ज्यादा अंक पाने वाले आवेदकों को मेरिट लिस्ट के आधार पर अनारक्षित सीट के लिए चयनित किया गया। सामान्य वर्ग की महिला आवेदकों ने इसके खिलाफ हाई कोर्ट में याचिका दायर की। 18 सितंबर 2019 को हाई कोर्ट का आदेश आया। श्वेता हार्डिया ने ऑपइंडिया को बताया कि इसमें स्पष्ट रूप से कहा गया था कि आरक्षित वर्ग की मेरिट लिस्ट में आने वाली महिला उम्मीदवारों का समायोजन सामान्य श्रेणी के कोटे में होगा। कोर्ट का आदेश आप नीचे पढ़ सकते हैं,


18 सितंबर 2019 का हाई कोर्ट का आदेश

हार्डिया के अनुसार इस आदेश की तरीके से व्याख्या नहीं की गई और उन्हें महाविद्यालयों की च्वाइस फिलिंग की प्रक्रिया से रोक दिया। इसके बाद 14 अक्टूबर को ये महिलाएँ हाई कोर्ट पहुॅंची और आदेश पर स्पष्टीकरण देने की गुहार लगाई। 17 अक्टूबर को हाई कोर्ट ने मेरिटोरियस महिलाओं को नियुक्ति प्रक्रिया में शामिल करने का आदेश MPPSC और उच्च शिक्षा विभाग को दिया। हार्डिया के अनुसार फिर भी उनको नियुक्ति पत्र नहीं दिया गया है, जबकि ऐसे लोगों को नियुक्ति पत्र दिए गए हैं जिनके नाम चयन सूची के आखिर में हैं।

हाई कोर्ट से आदेश पर स्पष्टीकरण देने की गुहार

तगाया के अनुसार अब मंत्री जीतू पटवारी सात जनवरी को होने वाली सुनवाई के दौरान उनकी नियुक्ति के लिए कोर्ट में एफि​डेविट दाखिल करने की बात कह रहे हैं। जबकि हकीकत यह है कि कोर्ट ने उनकी ज्वाइनिंग पर रोक ही नहीं लगाई है।

शीतल जोशी ने ऑपइंडिया को बताया कि इस मामले में एक तरफ उच्च शिक्षा विभाग उनके साथ अन्याय कर रहा है तो दूसरी ओर एमपीपीएससी के वकील कोर्ट में पेश ही नहीं होते। तीन बार वकील सुनवाई पर गैरहाजिर रहे हैं। उन्होंने बताया कि अनारक्षित सीटें मेरिट से भरी जाती हैं। बाद में आ​रक्षित वर्ग की सीटें उस कोटे के उम्मीदवारों से भरी जाती है। पीएससी की तमाम परीक्षाओं में यही पॉलिसी लागू होती है। इस बार भी लाइब्रेरियन और स्पोर्टस ऑफिसर की चयन सूची भी इसी आधार पर तैयार हुई। फिर उनके साथ भेदभाव क्यों हो रहा है। वे पूछती हैं कि क्या अधिक नंबर लाना, ज्यादा प्रतिभा होना गुनाह है?

महजबीन अंसारी ने ऑपइंडिया को बताया, “नियमानुसार सबसे पहले हमारी नियुक्ति होनी चाहिए थी। हममें से कई चयनित सूची में अव्वल हैं। लेकिन, उच्च शिक्षा विभाग ने हमारी ही नियुक्तियाँ रोक दी। विभाग इसका कोई कारण भी हमें नहीं बता रहा।”

इधर जैसे-तैसे सहायक प्राध्यापकों की नियुक्ति की प्रक्रिया शुरू हुई तो सालों से पढ़ा रहे अतिथि विद्वानों के भविष्य पर संकट मंडराने लगा। दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के अनुसार रीवा में मंत्री जीतू पटवारी की अतिथि विद्वानों से तीखी नोंकझोंक हो गई। अतिथि विद्वानों का कहना था कि वे बीते 25 साल से पढ़ा रहे हैं। अब असिस्टेंट प्रोफेसरों की नियुक्ति के नाम पर उन्हें बाहर किया जा रहा है। भोपाल में करीब दो हफ्ते से धरने पर बैठे अतिथि विद्वानों ने तो कफन ओढ़कर नए साल का स्वागत किया। अतिथि विद्वान संघर्ष मोर्चा के संयोजक डॉ. देवराज सिंह का कहना है कि जब तक सरकार नियमित नहीं करती, उनका धरना-प्रदर्शन जारी रहेगा।

दिलचस्प यह है कि बार-बार मुख्यमंत्री कमलनाथ और जीतू पटवारी की तरफ से आश्वासन मिलने के बावजूद भी अतिथि विद्वानों का धरना चल रहा है। इसका कारण सरकार की नीयत पर इनका भरोसा नहीं होना है। अब आप समझ गए होंगे कि क्रोनोलॉजी समझाते हुए प्रियंका गाँधी ने क्यों लिखा कि जब आप प्रोटेस्ट करेंगे तो वे आपको ‘फूल’ कहेंगे। उनका इशारा शायद अपनी ही सरकार की ओर था।

पर वे भूल गईं कि ये एमपी के मास्टरसाहब हैं। हाथ के लिए फिर से फूल बनने को तैयार नहीं हैं। यही कारण है कि अब मंत्री जीतू पटवारी उनके विरोध-प्रदर्शन को भाजपा के कमल फूल से जोड़ने की जुगत में हैं।

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