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मजहबी भीड़ ने मंदिर में की तोड़-फोड़ और आगजनी: पटना में स्थानीय लोग और पुलिस इनके सामने असहाय

नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) एवं राष्‍ट्रीय नागरिक रजिस्‍टर (NRC) के विरोध में आयोजित राष्‍ट्रीय जनता दल (RJD) के बिहार बंद के दौरान शनिवार (दिसंबर 21, 2019) को राज्‍य में कई जगह भारी हिंसा हुई। सबसे बड़ी घटना पटना के फुलवारीशरीफ में हुई, जहाँ दो गुटों के बीच भिड़ंत के दौरान जमकर पथराव हुआ। इस दौरान हुई फायरिंग में 11 लोगों को गोली लगी, जबकि एक को छुरा भी मारा गया। घटना के दौरान पथराव में आधा दर्जन पुलिसकर्मियों सहित दो दर्जन लोग घायल हो गए।

इसके साथ ही उपद्रवियों ने फुलवारीशरीफ के एक मंदिर में भी तोड़-फोड़ और आगजनी की। जानकारी के मुताबिक, बंद के समर्थन में निकला जुलूस टमटम पड़ाव के पास धार्मिक स्थल से गुजर रहा था। इस जुलूस में उपद्रवी और असामाजिक तत्व भी मौजूद थे। सभी टमटम पड़ाव पर पहुँचने के बाद संगतपर मोहल्ले से आगे बढ़ने पर अड़ गए। लेकिन संगतपर निवासियों ने जुलूस का रास्ता रोक लिया था। पुलिस ने भी उन्हें आगे बढ़ने की अनुमति नहीं दी, जिसके बाद विवाद बढ़ गया और जुलूस में शामिल उपद्रवियों ने धार्मिक स्थल में तोड-फ़ोड़ करनी शुरू कर दी और फिर आगजनी भी की। इससे विवाद ने और विकराल रूप ले लिया। दोनों गुटों के बीच जमकर पत्थरबाजी और फायरिंग हुई।

बता दें कि बंद की पूर्व संध्या पर शुक्रवार (दिसंबर 20, 2019) को आरजेडी की ओर से राजधानी पटना समेत सभी जिलों, प्रखंडों एवं कस्बों में मशाल जुलूस निकाले गए। बंद को लेकर आरजेडी नेता व बिहार विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष तेजस्‍वी यादव ने प्रशासन को चेतावनी दी थी कि अगर उसने आरजेडी समर्थकों को नुकसान पहुँचाया तो अंजाम बुरा होगा, लेकिन बंद के दौरान आरजेडी कार्यकर्ता ही जगह-जगह हिंसा पर उतर गए। महागठबंधन के सहयोगी दलों एवं वाम दलों ने भी आरजेडी के बंद का समर्थन किया। उपद्रवी तत्‍वों ने मीडियाकर्मियों को भी नहीं छोड़ा। इस दौरान ‘लालू यादव जिंदाबाद’, ‘नरेंद्र मोदी मुर्दाबाद’ और ‘दिल्ली पुलिस हाय-हाय’ के नारे भी लगे।

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नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के खिलाफ बवाल शांत होने का नाम नहीं ले रहा है। विरोध प्रदर्शन के नाम पर नागरिकता के इस नए कानून को लेकर देश के अलग-अलग हिस्सों में हिंसा की जा रही है। असम से शुरू हुए इस विरोध प्रदर्शन की लपटों ने पहले कोलकाता को अपने आगोश में लिया, इसके बाद दिल्ली की जामिया मिलिया इस्लामिया के छात्रों के हिंसक प्रदर्शन ने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींचा। अब भुवनेश्वर के समुदाय विशेष ने भी विरोध के नाम पर देश-विरोधी और हिंदुओं के खिलाफ नारे लगाए। नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ समुदाय ने सड़कों पर उतरकर विरोध प्रदर्शन तेज कर दिया है।

इस बीच उड़ीसा के भुवनेश्वर में हुए विरोध प्रदर्शन का एक वीडियो वायरल हो रहा है, जिसमें विरोध के नाम पर हिन्दू विरोधी और देश विरोधी नारे लगाए जा रहे हैं। प्रदर्शनकारी उर्दू में लिखी तख्ती को लेकर विरोध कर रहे हैं और नारे लगा रहे हैं, “हम लेकर रहेंगे आजादी, इन काफिरों से आजादी, इन हत्यारों से आजादी, इस जहन्नुम से चाहिए आजादी, पुलिस बर्बरता से चाहिए आजादी, इस नाइंसाफी से चाहिए आजादी, इस्लामोफोबिया से चाहिए आजादी, दंगाइयों से आजादी।”

इसके अलावा सोशल मीडिया पर ऐसे तमाम वीडियो सामने आए हैं, जिनमें नागरिकता संशोधन कानून का विरोध कर रहे प्रदर्शनकारियों ने हिंसक रुख अख्तियार करते हुए पुलिसकर्मियों पर खूनी हमले किए, सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुँचाया है। लेकिन किसी वामपंथी और जनवादी लेखक ने इस तरह के हिंसक कृत्यों की कोई निंदा नहीं की है। बता दें कि नागरिकता संशोधन कानून से भारत के 20 करोड़ से अधिक अल्पसंख्यकों में से किसी एक को भी किसी प्रकार का कानूनी संकट नहीं आने वाला है। यह वैधानिक रूप से एक तथ्य है और देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह संसद से लेकर हर लोकमंच पर स्पष्ट कर चुके हैं। इसके बावजूद दूसरे मजहब के लोग लगातार बिना तथ्य को जाने, बिना विरोध की वजह जाने देश विरोध और हिंसक कृत्य करने पर उतारू हैं।

इतना ही नहीं, जो राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) अभी प्रस्तावित ही नहीं है उसका पूरा खाका (फर्जी और भ्रम फैलाने वाला) बनाकर पेश कर दिया गया है। इतिहास की भारत विरोधी भावनाएँ गढ़ने वाले ये बुद्धिजीवी असल में अपने असली चरित्र पर आ गए हैं। उनकी अपनी नाजी मानसकिता आज सबके सामने आ गई है, जो किसी भी सूरत में दक्षिणपंथी या अन्य विचार को स्वीकार नहीं करती है। इसके लिए वह झूठ या फिर हिंसा सबको जायज मानती है। हालाँकि, वह आज भी मानने को तैयार नहीं हैं कि उनकी भारत विरोधी और अल्पसंख्यकवादी राजनीतिक दलीलों को नया भारत खारिज कर चुका है।

2019 की इस मजहबी उन्मादी आग से 2024 में कितनी रोशन होगी भाजपा?

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2014 के आम चुनावों में नरेंद्र मोदी ने एक तरह से अविश्वसनीय जीत हासिल की थी। उनसे नफरत करने वाले भी यह मानने को मजबूर हो गए थे कि उनका करिश्मा देशव्यापी है। आजाद भारत में शायद इसकी तुलना इंदिरा गॉंधी की अपील से की जा सकती थी। नफरत करने वालों ने इंदिरा से तुलना जान-बूझकर की, क्योंकि नेहरू के मुकाबिल मोदी को खड़ा करना उनके लिए ईश निंदा जैसा होता। एक तथ्य यह भी है कि चुनावी जीत के संदर्भ में नेहरू के बराबर पायदान पर खड़े होने के लिए मोदी को भी 2024 के आम चुनावों में लगातार तीसरी बार फतह हासिल करनी होगी।

हालॉंकि राजनीतिक नब्ज भॉंपने की क्षमता और करिश्मे को लेकर इंदिरा के साथ मोदी की तुलना के पीछे भी एक मकसद था। एक दबी हुई इच्छा थी। मकसद था इंदिरा की तरह मोदी की निरंकुश छवि गढ़ना। दबी आकांक्षा यह थी कि मोदी लड़खड़ाएँगे और आपातकाल लगा देंगे। इससे सत्ता से उनकी विदाई का रास्ता तैयार होगा। यही कारण है कि हर मौके पर बार-बार यह भ्रम पैदा करने की कोशिश की गई कि देश में ‘अघोषित आपातकाल’ है।

मोदी से घृणा करने वाले आपातकाल का जिस बेचैनी और तड़प के साथ इंतजार कर रहे हैं, शायद ही कोई ‘संघी’ हिंदू राष्ट्र को लेकर उतना बेसब्र होगा।

बड़े पैमाने पर छात्रों के प्रदर्शन जो तेजी से जनांदोलन में बदल हो गया के कारण 1975 में आपातकाल लागू किया गया था। मोदी से घृणा करने वाले चाहते हैं कि ऐसा दोबारा हो। नतीजतन, छात्र की तरह दिखने और नारे लगाने वाला नजर आते ही आपातकाल लगने की उनकी आस जग जाती है और उन्हें बहुप्रतीक्षित सपना साकार होता दिखता है।

2016 की शुरुआत में जेएनयू के कुछ छात्र जब देश विरोधी कार्यक्रम आयोजित करने और वहाँ आतंकी अफजल गुरु के समर्थन में नारे लगने के बाद गिरफ्तार किए गए तो उन्होंने सोचा कि उनके सपने के पूरा होने का वक्त आ गया। इसके एक या दो हफ्ते पहले ही कट्टर वामपंथी राजनीति से प्रताड़ित होकर रोहित वेमुला नाम के एक छात्र ने आत्महत्या कर ली थी।

‘गया! अब दलित वोट भी गया!’ रोहित वेमुला की मौत के बाद मोदी से घृणा करने वाली एक ‘पत्रकार’ की यही प्रतिक्रिया थी। बता दें कि यह घटना जनवरी 2016 की है। उससे पहले भाजपा दो चुनाव हार गई थी। पहले दिल्ली और फिर बिहार में। अरविंद केजरीवाल के ‘मैं बनिया हूँ’ भाषण का हवाला देते हुए कहा गया कि आप ने दिल्ली में बीजेपी के बनिया वोटर छीन लिए और बिहार में ओबीसी का वोट नहीं मिला। ‘लिबरल’ पत्रकार वेमुला के मरने से काफी उत्साहित थी, क्योंकि यह भाजपा के दलित वोटों को भी छीन सकता था।

चाहे वह आत्महत्या हो, हत्या हो, विरोध हो, दुर्घटना हो, बिजनेस हो या फिर क्रिएटिव प्रोडक्ट- मोदी की चुनावी संभावनाओं पर इसका क्या असर पड़ेगा, इसकी परवाह लिबरलों की जमात को है। लिबरलों का जश्न या विरोध इस बात पर निर्भर करता है कि यह मोदी की मदद करेगा या नुकसान पहुँचाएगा। छात्रों का विरोध उनके अंदर आपातकाल की उम्मीद जगाता है। साथ ही इसमें यह भी अंतर्निहित होता है कि जिस तरह से 1977 में आपातकाल के बाद इंदिरा को हार मिली थी, उसी तरह से मोदी भी परास्त हो जाएँगे।

इसी उम्मीद के साथ उन्होंने जेएनयू के पार्ट-टाइम-छात्रों सह फुल-टाइम प्रदर्शनकारियों को हीरो बनाया गया था। रोहित वेमुला की मौत को विभिन्न शैक्षणिक परिसरों में भुनाने की कोशिश हुई। एफटीआईआई में गजेन्द्र चौहान को चेयरमैन नियुक्त किए जाने के विरोध में छात्रों का प्रदर्शन हुआ और फिर वह भी इस गतिविधि में शामिल हो गए। यहाँ तक कि हार्दिक पटेल जैसे को छात्र नेता के तौर पर पेश किया गया। छात्रों ने कैंपस को अशांत किया और फिर निराश हो बैठ गए। इसके बाद उन्होंने मॉब लिंचिंग, गौरी लंकेश की हत्या, घर वापसी इत्यादि को लेकर ‘माहौल’ बनाया और इसे अघोषित आपातकाल की निशानी के रूप में पेश किया गया।

ऐसा लगा आपातकाल उनके सपनों में आया। वे शोर मचाने लगे ये देखो आपातकाल। जिसका हम इंतजार कर रहे थे।

हालाँकि, उनके सपने 2019 में चकनाचूर हो गए, जब मोदी एक बार फिर से बड़े जनादेश के साथ सत्ता में लौटे। लेकिन जैसा कि एक लिबरल कभी गलत नहीं होता, लोग गलत होते हैं। मोदी से घृणा करने वाले पूरी तरह मुतमइन थे कि मोदी 2019 में हारने वाले थे, लेकिन बालाकोट एयरस्ट्राइक से बदले माहौल और उग्र राष्ट्रवाद के झॉंसे में मूर्ख जनता के आने की वजह से वे जीत गए।

यही कारण है कि ये लिबरल जमात दूसरे कार्यकाल में भी वही तीन-तिकड़म और भी आक्रामकता से दुहरा रहे हैं। वे एक बार फिर छात्र विरोध और क्रांति का सपना देख रहे हैं। इस बार नागरिकता संशोधन कानून (CAA) को लेकर माहौल बनाया जा रहा है।

सबसे पहले, एएमयू और जामिया के मजहबी प्रदर्शन को छात्रों के विरोध के रूप में पेश किया गया। फिर जामिया में दंगाइयों के खिलाफ पुलिस की कार्रवाई को छात्रों पर कार्रवाई के तौर पर प्रस्तुत किया गया। अन्य परिसरों के छिटपुट प्रदर्शनों को ‘छात्रों पर कार्रवाई’ के समर्थन में ‘विद्रोह’ के रूप में प्रस्तुत किया गया। यह सब बेहद सोचे-समझे तरीके से बॉलीवुड अभिनेताओं और अभिनेत्रियों की मिलीभगत से किया गया ताकि ऐसा भ्रम पैदा हो कि छात्रों का विरोध जनांदोलन में बदल रहा है।

इस तरह का सन्देश देने की कोशिश हुई कि अब आपातकाल को कोई नहीं रोक सकता। अनुराग कश्यप ने इमरजेंसी हैशटैग के साथ ट्वीट भी किया।

तो क्या इतिहास खुद को दोहराएगा? या फिर पिछली बार की तरह विफल रहेगा और 2024 में मोदी को और भी व्यापक जनादेश मिलेगा?

खैर, 2024 बहुत दूर है और कोई भी निश्चित तौर पर नहीं कह सकता कि उस समय क्या होगा। लेकिन मुझे लगता है कि मोदी 2024 में भी इसका फायदा उठाने की स्थिति में होंगे क्योंकि उनसे नफरत करने वाले 2019 की हार से कुछ भी सीखने को तैयार नहीं हैं। 2016 में जेएनयू के गढ़े हुए छात्र विरोध की वजह से आम लोगों के मन में राष्ट्रवाद की भावना बालाकोट एयरस्ट्राइक से पहले ही मजबूत हो चुकी थी। जेएनयू में लगे ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे’ के नारे सभी ने सुने थे। इसके बाद ही राष्ट्रवाद की भावना पैदा हुई। बावजूद इसके प्रोपेगेंडा फैलाने वाले धूर्त लिबरलों ने कहा कि इस वीडियो के साथ छेड़छाड़ की गई है।

इसी तरह, CAA को लेकर किए जा रहे छात्रों का मनगढ़ंत प्रदर्शन आम मतदाताओं के भीतर हिंदुत्व की भावना को मजबूत कर सकता है। ऐसा इसलिए क्योंकि CAA के खिलाफ हो रहे विरोध-प्रदर्शन मजहबी नंगई और तुष्टिकरण से हटकर कुछ भी नहीं है। फिर भी हिंसा में हिंदुओं के शामिल होने जैसे धूर्त दुष्प्रचार किया जा रहा है। ध्यान देने वाली बात है कि ऐसा कर वे ‘JNU वाली वीडियो के साथ छेड़छाड़ हुई है’ वाले उसे हास्यापद षड्यंत्र को आगे बढ़ा रहे हैं जैसा मोदी के पहले कार्यकाल में किया गया था।

यदि मोदी से नफरत रखने वाले इतनी बेताबी से इतिहास को दोहराने में लगे हैं, तो इतिहास निश्चित रूप से उन्हें निराश नहीं करेगा और 2019 के नतीजें फिर से 2024 में दोहराए जाएँगे। कम से कम आज तो मुझे ऐसा ही लगता है।

तो क्या यह तय मान लिया जाए कि विरोध-प्रदर्शनों से मोदी सरकार बेअसर है? किसी भी स्तर पर छात्रों या आम लोगों का प्रदर्शन उसकी चुनावी संभावनाओं को नुकसान नहीं पहुॅंचा सकता? तब भी जब कोई कहे कि मौजूदा CAA विरोधी प्रदर्शनों की तुलना 2016 के जेएनयू के प्रदर्शनों की बजाए 2011 के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से की जानी चाहिए? कुछ लोग बेहद चालाकी से “IAC” का इस्तेमाल करने भी लगे हैं। तब इसका मतलब था इंडिया अंगेंस्ट करप्शन और अब यह इंडिया अंगेस्ट CAA के तौर पर प्रचारित किया जा रहा है।

यह एक अच्छा तर्क है कि इसका विश्लेषण इसकी खूबियों के आधार पर किया जाना चाहिए। क्या यह मोदी 2.0 के लिए अन्ना आंदोलन साबित हो सकता है? क्या 2024 में इतिहास खुद को 2019 की बजाए 2014 के रूप में दोहरा सकता है?

इसके लिए, हमें यह देखना होगा कि अन्ना आंदोलन क्यों सफल हुआ? इसने कॉन्ग्रेस पार्टी को कैसे नुकसान पहुँचाया? क्या वही बात CAA के विरोध और भाजपा पर लागू होती है?

बता दें कि दोनों विरोधों के बीच प्रमुख अंतर मुद्दे का है। भ्रष्टाचार एक ऐसा मसला है जिससे हर भारतीय प्रभावित होता है। इससे हर कोई जुड़ा होता है। नागरिकता खोने का खतरे ऐसा नहीं है। मोदी विरोधी रणनीतिकारों ने यहाँ गलती की। वे चिल्लाते रहे कि CAA+NRC मुस्लिम विरोधी है और इस तरह उन्होंने अप्रत्यक्ष रूप से कहा कि गैर-मुस्लिमों को परेशान होने की आवश्यकता नहीं है। यह भ्रष्टाचार जैसी समस्या नहीं थी जो हर नागरिक को प्रभावित कर सके।

हालाँकि वामपंथी अब महसूस करते हैं कि यह एक बड़ी रणनीतिक गलती थी। अब गलती को सुधारने के लिए फरहान अख्तर जैसे लोगों ने अत्यधिक भ्रामक पर्चे फैलाए, जिसमें दावा किया गया कि गरीब, दलित, आदिवासी, ट्रांसजेंडर और अन्य समूह भी अपनी नागरिकता खो सकते हैं। वास्तव में ये बेतुकी बात है। उनके कहने का मतलब है कि करीब 90 फीसदी भारतीयों की नागरिकता चली जाएगी और उन्हें निर्वासित कर दिया जाएगा। कहॉं निर्वासन किया जाएगा? इस तरह के बेवकूफाना दुष्प्रचार पर भला कौन यकीन करे?

इस विरोध को धर्मनिरपेक्ष-मानवतावादी विरोध के तौर पर पेश करने में उनसे काफी देरी हो चुकी है। लेकिन अभी भी मीडिया की मदद से बड़े पैमाने पर प्रयास किए जा रहे हैं। हालाँकि वे CAA+NRC के मजहब विरोधी होने के बारे में पहले से ही बहुत अधिक भयभीत हैं, क्योंकि मजहबी भीड़ ने अब सूत्र अपने हाथ में ले लिए हैं। इससे यह सुनिश्चित होगा कि इस मुद्दे को केवल मजहबी मुद्दे के रूप में देखा जाए।

दूसरा अंतर यह है कि दोनों विरोध सत्ता के संबंधित पक्षों को कैसे प्रभावित करते हैं। 2011 के भ्रष्टाचार विरोधी प्रदर्शन ने कॉन्ग्रेस पार्टी को भ्रष्टाचार का पर्याय बना दिया। ऐसा नहीं है कि पहले उसे कुछ साफ-सुथरी पार्टी के रूप में देखा जाता था, लेकिन कॉन्ग्रेस की छवि, विशेषकर शहरी युवाओं के बीच काफी बुरी तरह से बिगड़ गई। अगर भ्रष्टाचार आपके लिए चिंता की बात थी तो कॉन्ग्रेस एक विकल्प के रूप में भी नहीं रही।

यदि यह​ मान लिया जाए कि भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की तरह ही सीएए का विरोध है, तो भाजपा को सबसे बड़ा नुकसान यह होगा कि वह मुस्लिम विरोधी पार्टी का पर्याय बन जाएगी। क्या वास्तव में इससे भाजपा को कोई नुकसान होगा? क्या भाजपा को मौजूदा वक़्त में मुस्लिम समर्थक पार्टी के तौर पर देखा जाता है या यह भी माना जाता है कि उसे कथित अल्पसंख्यकों का समर्थन हासिल है? गौर करने वाली बात यह भी है कि बॉलीवुड अभिनेताओं और ‘बुद्धिजीवियों’ के समर्थन वाले ऐसे विरोध-प्रदर्शन शहर के अंग्रेजीदा युवाओं को सबसे ज्यादा पसंद आते हैं। यह वर्ग पहले से ही स्टैंड अप कॉमेडी के रूप में भाजपा विरोधी प्रोपेगेंडा और अन्य ‘रोमांचों’ से घिरा हुआ है।

इसका मतलब यह कतई नहीं है कि यदि आपकी छवि मुस्लिम विरोधी है तो आम भारतीय या हिंदू को इससे फर्क नहीं पड़ता और बीजेपी को कोई चिंता नहीं करनी चाहिए। असल में एक आम हिंदू में अपराध बोध का भाव इतना गहरा होता है कि ऐसे हालात में वह मान लेगा कि भाजपा समुदाय विशेष के साथ अन्याय कर रही है और उसे इसका दंड मिलना चाहिए।

लेकिन, हिंसक प्रदर्शन इस कदर उन्मादी हो चुका है कि उसके दृश्य हिंदुओं में उस अपराध बोध को गहराने नहीं देंगे जिसमें उसे मुस्लिम खासकर बांग्लादेशी और रोहिंग्या घुसपैठिए बेबस और लाचार दिखें। अपनी हिन्दुफोबिया से वामपंथी इस भाव को और गहरा ही करेंगे। बस वक्त की बात है जब विरोध की लपटें गाय, बीफ, मंदिर वगैरह तक पहुॅंचेगी। वे खुलकर आगे आएँगे। कुछ स्वयंभू सर्वज्ञ ‘कॉमेडियन’ तो वास्तव में इस मोर्चे पर जुट भी गए हैं। इस सूरतेहाल में एक आम हिंदू के मन में अपराध बोध कोई भाव बचा भी होगा तो उसकी तिलांजलि तय है।

यकीनन, इसका प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि मजहबी भीड़ का उन्माद और लिबरलों का हिन्दुफोबिया कितने वक्त तक चलता रहता है। जेएनयू से निकले “टुकड़े टुकड़े” नारे करोड़ों लोगों तक पहुॅंचे थे। मुझे एक दोस्त का कहा याद आ रहा है। जेएनयू के पास जाने के लिए उसने ऑटो लिया। ऑटो ड्राइवर जेएनयू को पाकिस्तान जैसा बता रहा था। इसी ने पुलवामा और बालाकोट से काफी पहले राष्ट्रवाद और पाकिस्तानी विरोधी भावनाओं को गहरा दिया था। फिर से वही सब दोहराया जा रहा है और यह इस्लाम विरोधी भावनाओं को गहरा सकता है। चिंता का सबब वे हिंसक घुसपैठिए हो सकते हैं जिन्हें ‘धर्मनिरपेक्ष’ भारत ने अरसे से पनाह दे रखी है।

2024 के शुरुआती दिनों में नरेंद्र मोदी यदि अयोध्या में बने भव्य मंदिर में पूजा करते नजर आए तो लिबरल शोर करेंगे कि लोकसभा चुनावों में जीत सुनिश्चित करने के लिए वे हिंदुत्व की भावनाओं को उभार दे रहे हैं। पर हकीकत यही है कि लिबरल खुद सांप्रदायिकता की आग लगा चुके हैं।

मूल रूप से अंग्रेजी में लिखे गए इस लेख का अनुवाद रचना झा ने किया है।

15 मौतें, 705 गिरफ्तारियाँ, 57 पुलिसकर्मियों को लगी गोली: यूपी में CAA पर हिंसा का हर डिटेल

नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के विरोध के नाम पर प्रदेश में हुई हिंसा को लेकर उत्तर प्रदेश पुलिस ताबड़तोड़ कार्रवाई कर रही है। उपद्रवियों की पहचान कर एफआईआर दर्ज करने और उन्हें गिरफ्तार का सिलसिला जारी है।

यूपी पुलिस के अनुसार राज्य में विरोध प्रदर्शनों के दौरान हिंसा में अब तक 15 लोगों की मौत हुई है। हिंसा को लेकर अलग-अलग जिलों के थानों में 124 मुकदमे दर्ज किए गए हैं। 705 लोग गिरफ्तार किए गए हैं। करीब 4500 लोगों को हिरासत में लेने के बाद छोड़ दिया गया है।

राज्य के पुलिस महानिदेशक (कानून-व्यवस्था) प्रवीण कुमार ने शनिवार (दिसंबर 21, 2019) को मीडिया से बात करते हुए ये आँकड़ें सार्वजनिक किए। उन्होंने बताया कि सीएए को लेकर लगातार हो रहे विरोध-प्रदर्शनों में अब तक 124 एफआईआर दर्ज की गई है। 705 लोगों को गिरफ्तार किया गया है। 4500 लोगों को निरोधात्मक कार्रवाई के तहत हिरासत में लिया गया।

आईजी के अनुसार पथराव, आगजनी में 263 पुलिसकर्मी घायल हुए हैं। इनमें 57 पुलिसकर्मियों को गोली लगी है। इस पूरी हिंसा में 15 लोगों की मौत हुई है। जाँच में पुलिस ने नॉन प्रतिबंधित बोर के 405 खोखे बरामद किए हैं।

गौरतलब है कि सड़कों पर उतरे उपद्रवियों के अलावा सोशल मीडिया पर भी इस समय यूपी पुलिस ने कड़ी निगरानी बनाई हुई है। आईजी प्रवीण कुमार ने मीडिया से बातचीत में बताया कि सोशल मीडिया के 14,101 आपत्तिजनक पोस्टों से संबंधित लोगों पर कार्रवाई की गई है। इनमें टि्वटर की 5965, फेसबुक की 7995 और यूट्यूब की 142 आपत्तिजनक पोस्टों पर कार्रवाई की गई है। इनमें 63 एफआईआर दर्ज की गई हैं, वहीं 102 आरोपियों को गिरफ्तार किया गया है, इनके अलावा 442 पाबंद किए गए हैं।

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3 करोड़ परिवारों तक पहुँचेगी भाजपा, CAA के समर्थन में 1100 बुद्धिजीवी आगे आए

नागरिकता संशोधन कानून (CAA) पर फैले भ्रम को दूर करने के लिए भाजपा ने घर-घर पहुॅंचने का फैसला किया है। इस कड़ी में पार्टी 3 करोड़ परिवारों तक पहुॅंचेगी। कानून के विरोध के नाम पर देश के कुछ हिस्सों में हुई हिंसा के बीच पार्टी ने यह फैसला किया है। इस बीच, करीब 1100 बुद्धिजीवियों ने भी इस कानून का समर्थन करते हुए इसके लिए केंद्र सरकार और संसद को बधाई दी है।

CAA पर विपक्षियों पार्टियों और विरोधियों के भ्रम के जवाब में बीजेपी ने यह फैसला किया है। इस दौरान कार्यकर्ता घर-घर जा कर कानून को लेकर जागरूकता बढ़ाएँगे।

इसकी जानकारी शनिवार को बीजेपी महासचिव और राज्यसभा सांसद भूपेंद्र यादव ने दी। उन्होंने कहा, “पार्टी ने तय किया है कि आने वाले 10 दिनों में हम एक विशेष कैंपेन लॉन्च करेंगे। इसके तहत हम 3 करोड़ परिवारों से मिलेंगे। नागरिकता संशोधन विेधेयक पर लोगों तक अपनी बात पहुंचाएँगे। इस बिल के समर्थन में हम जगह-जगह 250 से ज्यादा प्रेस कॉन्फ्रेंस करेंगे।”

दूसरी तरफ 1,100 अकादमिक विद्वानों, बुद्धिजीवियों और रिसर्च स्कॉलर्स ने इस कानून के समर्थन में साझा बयान जारी किया है। बयान में कहा गया है कि यह एक्ट धर्म के आधार पर सताए गए लाखों शरणार्थियों की माँग को पूरा करता है, जो पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से प्रताड़ित होकर भारत आए हैं। इसके अलावा यह ऐक्ट पड़ोसी देशों में प्रताड़ित होने वाले अहमदिया, हजारा, बलोच या फिर अन्य किसी समुदाय के लोगों को भारतीय नागरिकता हासिल करने से नहीं रोकता।

इतना ही नहीं, अकादमिक जगत के विद्वानों ने इस एक्ट के लिए केंद्र सरकार और संसद को बधाई भी दी। साथ ही पत्र में भारत के सिद्धांतों को बनाए रखने और धर्म के आधार पर पीड़ित समुदायों को शरण देने के लिए सरकार की सराहना की। बुद्धिजीवियों ने सरकार द्वारा लाए गए एक्ट को जरूरी बताते हुए ये भी कहा गया कि 1950 के नेहरू-लियाकत पैक्ट की असफलता के चलते यह लाया गया है। यहाँ तक कि विचारधारा से ऊपर उठकर सीपीएम, कॉन्ग्रेस जैस पार्टियों ने भी पाकिस्तान और बांग्लादेश से आने वाले शरणार्थियों को भारत की नागरिकता देने की माँग की थी। इनमें ज्यादातर दलित समुदाय के लोग हैं।

पत्र में नॉर्थ ईस्ट के राज्यों की चिंताओं को भी ध्यान में रखने की बात करते हुए कहा गया, “हम यह भी मानते हैं कि पूर्वोत्तर के राज्यों की चिंताओं को भी सुना जाना चाहिए और उनका समाधान होना चाहिए। यह ऐक्ट भारत की सेक्युलरिज्म की परंपरा और संविधान के मुताबिक है। यह किसी भी धर्म और किसी भी देश के व्यक्ति को भारत की नागरिकता लेने से नहीं रोकता।”

साथ ही पत्र में आरोप लगाया गया है कि देश में जानबूझकर डर का माहौल फैलाया जा रहा है, जिसकी वजह से देश के कई हिस्सों में और खास तौर पर बंगाल में हिंसा हुई। बयान में जरिए बुद्धिजीवियों द्वारा समाज के हर तबके से अपील की गई है कि वे शांति बरतें और सांप्रदायिकता और अराजकतावाद की चपेट में न आएँ।

समर्थन में बयान जारी करने वालों में जेएनयू के आनंद रंगनाथन और प्रोफेसर श्री प्रकाश सिंह, वरिष्ठ पत्रकार कंचन गुप्ता, इंस्टिट्यूट ऑफ पीस एंड कॉन्फ्लिक्ट स्टडीज के सीनियर फेलो अभिजीत अय्यर मित्रा, सुप्रीम कोर्ट के एडवोकेट जे साई दीपक, पटना यूनिवर्सिटी के डिपार्टमेंट ऑफ लॉ के गुरु प्रकाश, आईसीएसएसआर की सीनियर फेलो मीनाक्षी जैन, शांतिनिकेतन स्थित विश्वभारती के डॉक्टर देबाशीष भट्टाचार्य, एमिटी यूनिवर्सिटी के मानद प्रोफेसर जीतेन जैन, मणिपुर यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर प्रोफेसर एपी पांडेय, डीयू के भास्कराचार्य कॉलेज की डॉक्टर गीता भट्ट समेत कई नाम शामिल हैं।

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PAK में प्रोफेसर जुनैद हाफिज को सजा-ए-मौत, फेसबुक पोस्ट के जरिए ईशनिंदा का था आरोप

पाकिस्‍तान की एक जिला एवं सत्र अदालत ने मुल्‍तान की बहाउद्दीन जकारिया यूनिवर्सिटी के एक लेक्‍चरर को ईशनिंदा के आरोप में मौत की सजा सुनाई है। प्रोफेसर का नाम जुनैद हाफ‍िज है। जुनैद पंजाब प्रांत के मुल्तान शहर की यूनिवर्सिटी में इंग्लिश लिट्रेचर विभाग में बतौर अतिथि लेक्‍चरर के तौर पर कार्यरत थे। उन पर एक फेसबुक पोस्ट में ईश निंदा करने के आरोप में बीते 23 मार्च 2013 को मामला दर्ज हुआ था। लेकिन मामले की कार्रवाई साल 2014 में शुरू की गई। इसके बाद से ही वे जेल में हैं।

पाकिस्‍तानी मीडिया डॉन की रिपोर्ट के मुताबिक, अतिरिक्‍त सत्र न्‍यायाधीश काशिफ कयूम ने उन्हें यह सजा सुनाई। अदालत की ओर से आरोपित जुनैद हाफ‍िज पर 5 लाख रुपए का जुर्माना भी लगाया गया। उन्हें ये सजा पाकिस्‍तान दंड संहिता की धारा- 295-C के तहत सुनाई गई।

इसके अलावा, अदालत ने जुनैद हाफ‍िज को कुछ अन्य धारों के तहत उम्रकैद एवं 1 लाख रुपए जुर्माने की सजा भी सुनाई। अदालत ने अपने फैसले में कहा है कि सभी सजाएँ साथ चलेंगी और दोषी को धारा 382-B CrPC का लाभ नहीं मिलेगा। ऐसा इसलिए क्योंकि पाकिस्तान के ईशनिंदा कानून में दोषी के लिए रहम की इजाजत नहीं है। इस मामले में अभियोक्ता की ओर से दावा किया गया कि जाँचकर्ताओं ने उनके लैपटॉप से ऐसी चीजें बरामद कीं, जो मजहब के ख़िलाफ़ है।

गौरतलब है कि पिछले 6 साल से पाकिस्तान की जेल में जीवन काट रहे जुनैद हाफिज का नाम बीते दिनों अमेरिका के धार्मिक स्वतंत्रता आयोग (यूएससीआईआरएफ) ने अपने वैश्विक पीड़ितों के डेटाबेस में शामिल किया था। इस दौरान आयोग ने स्पष्ट किया था कि जुनैद किस भयावह संकट में हैं और जेल में उनकी जान को किस हद तक खतरा है।

इसके अलावा यूएससीआईआरएफ ने उनके मामले में ये भी कहा था कि जुनैद के इतने लंबे मामले में अब आठवें जज की नियुक्ति हुई और अभियोजन कथित ईशनिंदा का एक भी सबूत नहीं पेश कर सका। इस दौरान जुनैद को भयावह मानसिक व शारीरिक पीड़ा से गुजरना पड़ा। साथ ही उन्हें, उनके परिवार व वकीलों को जान से मारने की धमकियाँ दी गईं। इतना ही नहीं, बता दें साल 2014 में जुनैद के वकील को उनके कार्यालय में घुसकर मारा गया।

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Loc पर सेना की जवाबी कार्रवाई, 2 पाकिस्तानी रेंजर्स ढेर, 1 पोस्ट भी तबाह

जम्मू-कश्मीर के अखनूर सेक्टर में नियंत्रण रेखा (एलओसी) पर भारतीय सेना ने पाकिस्तान की नापाक हरकतों पर जवाबी कार्रवाई करते हुए उनके 2 रेंजर्स को मार गिराया और साथ ही उनका एक पोस्ट भी तबाह कर दिया है। मीडिया रिपोर्ट्स में रक्षा सूत्रों के हवाले से यह जानकारी दी गई है।

नवभारत टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक रक्षा सूत्रों ने बताया कि शुक्रवार की रात पाकिस्तान ने अग्रिम चौकियों को निशाना बनाया और बिना किसी के उकसाए सेक्टर में फायरिंग शुरू की। इसके बाद भारतीय सेना ने प्रभावी तरीके से उनकी इस हरकत का जवाब दिया और सुबह एलओसी के पास 2 शव पड़े देखे।

जानकारी के मुताबिक पाकिस्तान की ओर से अब भी इलाके में गोलीबारी की जा रही है और साथ ही सीमा पार से लगातार संघर्ष विराम का उल्लंघन हो रहा है। लेकिन, ऐसी स्थिति में भी संतोषजनक बात ये है कि भारतीय सेना चुप नहीं बैठी है। वह पड़ोसी मुल्क की हरकतों का लगातार मुँहतोड़ जवाब दे रही हैं। जिसके चलते उन्हें जान-माल दोनों का काफी नुकसान हो रहा है।

गौरतलब है कि अखनूर सेक्टर के अलावा पाकिस्तान ने सुंदरबनी सेक्टर के केरी बट्टल इलाके में सीज फायर का उल्लंघन किया है। लेकिन यहाँ भी उन्हें भारतीय सुरक्षाबल की ओर से करारा जवाब मिला। पाकिस्तान की ओर ये यहाँ करीब 11.30 बजे फायरिंग की गई थी।

इसके अलावा जम्मू-कश्मीर के तंगधार और कंझालवान सेक्टर में आज यानी शनिवार को पाकिस्तान की तरफ से भारी गोलीबारी की गई है। यहाँ अभी तक किसी भी प्रकार के नुकसान की खबर नहीं है।

बवैसे तो जम्मू-कश्मीर के कई इलाकों में पाकिस्तान की ओर से लगातार सीजफायर उल्लंघन करने की खबरें मीडिया में आ रही हैं, लेकिन यदि क्षेत्र के हिसाब से देखा जाए तो पिछले कुछ समय में पाकिस्तान ने सबसे ज्यादा पुंछ जिले की एलओसी पर सीजफायर का उल्लंघन किया है। खबरों की मानें तो अकेले पुंछ में ही इस साल 1800 से अधिक बार पाकिस्तान की ओर सीजफायर तोड़ा गया है। 

25-30 पुलिस वालों को दुकान में बंद कर जिंदा जलाने का प्रयास: नमाज के बाद हापुड़ में उपद्रवियों का तांडव

नागरिकता संशोधन कानून (CAA) को लेकर देश भर में विरोध प्रदर्शन के नाम पर गुंडई हो रही है। यह किसी भी दृष्टिकोण से विरोध प्रदर्शन नहीं दिख रहा है। यदि प्रदर्शनकारियों द्वारा किए जा रहे इस हिंसक प्रदर्शन को दंगा कहा जाए, तो शायद कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी और इसे करने वाले को प्रदर्शनकारी नहीं बल्कि उपद्रवी या दंगई कहना चाहिए, क्योंकि प्रदर्शन करने का ये तरीका तो बिल्कुल नहीं होता है।

जिस तरह से ये प्रदर्शन कर रहे हैं, उसमें साफ दिख रहा है कि इनके ऊपर खून सवार है और ये जान लेने पर उतारू हैं। वरना 25 पुलिसकर्मी की भीड़ को घेरना और भी उन्हें एक दुकान में बंद कर आगजनी और पथराव करना मामूली बात नहीं है। बता दें कि मेरठ में शुक्रवार (दिसंबर 20, 2019) जुमे की नमाज के बाद अचानक अराजकता फैली और उपद्रवी सड़कों पर आ गए। मेरठ, मुजफ्फरनगर, बिजनौर और बुलंदशहर में उपद्रवियों ने जमकर उत्पात मचाया। इस दौरान एक बैंक व पुलिस चौकी समेत सैकड़ों वाहनों को आग के हवाले कर दिया गया। उपद्रवियों को नियंत्रित करने में पुलिस व दंगा नियंत्रण बल को खासी मशक्कत करनी पड़ी।

अमर उजाला के मेरठ संस्करण में प्रकाशित खबर

हापुड़ में बवालियों का मन इतना बढ़ गया कि पुलिस की एक पूरी टीम की घेराबंदी की और एक दुकान में बंधक बना लिया था। उपद्रवियों ने पुलिस को दुकान के अंदर बंद करके शटर पर आग लगाने का प्रयास किया। जब सूचना पाकर पर पुलिस वहाँ पहुँची तो उपद्रवियों ने उनकी गाड़ी पर भी पथराव किया और फायरिंग कर उन्हें दौड़ा दिया। इसके बाद एसडीएम-सीओ भी आए, लेकिन वो ट्रेनी सिपाहियों को बंधनमुक्त नहीं करा पाए। एक बात तो निश्चित है कि अगर ट्रेनी सिपाही शटर तोड़कर निकलते तो उपद्रवी उन्हें छोड़ते नहीं।

इसके अलावा बुलंदशहर में भीड़ में शामिल युवकों ने अवैध हथियारों से पुलिस पर फायरिंग शुरू कर दी, जिससे पुलिसकर्मी भागकर थाने में घुस गए। इस दौरान भीड़ ने सड़क के किनारे खड़े एक दर्जन से अधिक चार पहिया और दो पहिया वाहनों को क्षतिग्रस्त कर दिया। उपद्रवियों ने पथराव भी किया, जिसमें आधादर्जन पुलिसकर्मी घायल हो गए।

इससे पहले इसी तरह के हिंसक प्रदर्शन की कई तस्वीरें गुजरात के अहमदाबाद से भी आईं थी। अहमदाबाद के शाह आलम इलाके में दरगाह में इकट्ठी हुई भीड़ ने नमाज के पुलिसकर्मियों को घेर लिया और उन पर पथराव शुरू कर दिया था। पुलिसकर्मी भागकर छिपने की कोशिश कर रहे होते हैं, लेकिन उपद्रवी लगातार उन पर पत्थर लाठियों से वार करते रहे।

उपद्रवियों का ये जानलेवा और हिंसक रवैया दिखाता है कि इनके अंदर न तो कानून का डर है और न ही इंसानियत बची है और कुछ लोग इसे ‘शांतिपूर्ण प्रदर्शन’ और इन उपद्रवियों को ‘शांतिप्रिय प्रदर्शनकारी’ कहते हैं। वहीं कुछ लोगों द्वारा उपद्रवियों की इस भीड़ को ‘डरा हुआ’ भी कहा जा रहा है। पता नहीं वो लोग किस चश्मा से देख रहे हैं इस हिंसक प्रदर्शन को।

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कानपुर में CAA पर हिंसा: दंगाइयों ने पुलिस पर तेज़ाब और पेट्रोल बम से किया हमला, 50 गिरफ़्तार-12 को लगी गोली

उत्तर प्रदेश के कानपुर में नागरिकता क़ानून (CAA) के ख़िलाफ़ शुक्रवार (20 दिसंबर) को जुमे की नमाज़ के बाद दंगाइयों ने क़रीब ढाई घंटे तक जमकर उत्पात मचाया। बाबूपुरवा के बेगमपुरवा, बगाही मस्जिद के पास प्रदर्शन के दौरान अराजक तत्वों ने पुलिस पर तेज़ाब से हमला कर दिया। यहाँ आगजनी, पथराव और गोलीबारी में 12 लोगों को गोली लगी है।

पथराव में दो सर्किल ऑफ़िसर (सीओ), दो दारोगा समेत सात पुलिसकर्मी बुरी तरह से ज़ख़्मी हो गए। पुलिस पर पथराव करने के आरोप में मुक़दमा दर्ज कर बिल्हौर के पालिकाध्यक्ष शादाब ख़ान समेत क़रीब 50 उपद्रवियों को गिरफ़्तार किया गया। प्रदर्शनकारियों ने बिल्हौर, नौबस्ता, मुरे कंपनी पुल, चकेरी, जाजमऊ आदि क्षेत्रों में भी प्रदर्शन कर जमकर बवाल काटा।

ख़बर के अनुसार, कानपुर में दंगाइयों ने फ़ोर्स के साथ खड़े बाबूपुरवा चौकी इंचार्ज पर तेज़ाब से भरी बोतल फेंककर हमला कर दिया। बोलत को अपनी तरफ आता देख चौकी इंचार्ज वहाँ से पीछे हट गए। ऐसा करके ही वो हिंसक हमले का शिकार होने से ख़ुद को बाल-बाल बचा सके। हालाँकि, तेज़ाब की छींटे उनकी पैंट पर पड़ गईं थी। पुलिस पर पथराव के साथ-साथ खाली बोतलों से भी हमला किया गया। हमले में पुलिसकर्मियों के अलावा वहाँ मौजूद मीडियाकर्मियों को भी चोटें आई।

उपद्रवियों द्वारा पुलिस पर पथराव किए जाने से पूरी सड़के ईंट-पत्थरों से पट गई। बेक़ाबू हालात पर नियंत्रण पाने के लिए पुलिस को लाठीचार्ज, आँसू गैस का इस्तेमाल करना पड़ा। लाठीचार्ज से दंगाइयों पर तोड़ा असर तो पड़ा, लेकिन गलियों और छतों से उनके ऊपर पथराव करना शुरू कर दिया गया।

यतीमखाना और नई सड़क की तरफ़ से आ रहे उत्पातियों ने सबसे पहले सद्भावना चौकी के सामने नारेबाज़ी की। इसके बाद नारेबाज़ी करते हुए क़रीब 20 हज़ार दंगाई परेड चौराहे स्थित एकता चौकी पहुँचे। पहले तो उन्होंने सड़क पर बैठकर नारेबाज़ी की फिर इसके बाद प्रेस क्लब में घुसने की कोशिश की।

फ़िलहाल, हाईअलर्ट के बीच भारी पुलिस व अर्धसैनिक बल तैनात किया गया है। बाबूपुरवा में सेवन क्रिमिनल एक्ट के तहत 1500 अज्ञात समेत शहर के 10 थाना क्षेत्रों में 15 हज़ार उपद्रवी भीड़ के ख़िलाफ़ 12 मुक़दमे दर्ज किए गए। उपद्रवियों की ओर से सुरक्षा बलों पर पेट्रोल बम फेंके गए तो हालात और ख़राब हो गए। पुलिस के आला अधिकारी घटनास्थल पर पहुँचे और उपद्रवी भीड़ को तितर-बितर किया। पथराव में सीओ बाबूपुरवा मनोज कुमार गुप्ता, बेगमपुरवा चौकी प्रभारी अनूप कुमार, बाबूपुरवा चौकी प्रभारी राजकुमार रावत समेत सात पुलिस कर्मी घायल हो गए।

इस मामले पर जानकारी देते हुए कानपुर के एडीजी प्रेम प्रकाश ने बताया कि उपद्रवियों पर कड़ी कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने इस बात की पुष्टि की कि बेगमपुर में गोली लगने से 12 लोग घायल हुए हैं। इसके अलावा उन्होंने पुलिस द्वारा गोलीबारी से इनकार किया। उन्होंने बताया कि आत्मरक्षा के लिए पैलट गन का प्रयोग किया गया था, और जो घायल हुए हैं वो उपद्रवियों द्वारा चलाई गई गोली से हुए हैं।

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CAA विरोधी ट्वीट से नहीं हुई परिणीति चोपड़ा की छुट्टी, 2017 में ही समाप्त हो गया था कॉन्ट्रेक्ट

नागरिकता संशोधन कानून (CAA) को लेकर बॉलीवुड के कई सितारों की प्रतिक्रिया सामने आई है। इसके विरोध में एक ट्वीट अभिनेत्री परिणीति चोपड़ा का भी आया। इसके बाद सोशल मीडिया पर खबरें फैल गईं कि सीएए का विरोध करने पर परिणीति चोपड़ा को हरियाणा सरकार ने ‘बेटी-बचाओ, बेटी-पढ़ाओ’ अभियान के एंबेसडर से की भूमिका से हटा दिया है।

अब चूँकि हरियाणा में भाजपा की सरकार है और ऐसी खबर से सीधे केंद्र सरकार पर सवाल उठते, तो लगभग हर मीडिया हाउस ने बिना सच्चाई की जाँच-परख किए इस खबर को जोर-शोर से कवर किया। शेखर गुप्ता समेत कई लोगों ने इसे अपने पर्सनल अकॉउंट से शेयर कर लोगों में भ्रम फैलाने की पूरी कोशिश की। इसके बाद लोग नरेंद्र मोदी सरकार पर तरह-तरह के सवाल उठाने लगे। सोशल मीडिया पर यूजर टैग कर पूछने लगे कि ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ बोलने वाले अब बेटी के बोलने पर उसे उसके पद से हटा रहे हैं। आखिर ये क्या बात हुई?

इस महत्वाकांक्षी अभियान से परिणीति चोपड़ा को हरियाणा सरकार द्वारा अलग करने की खबरें मीडिया रिपोर्ट्स में ‘कथित तौर पर’ लिखकर चलाई गई थी। इससे पहले कोई इस बात की पुष्टि या खारिज करता, खुद हरियाणा सरकार ने इसका खंडन कर दिया है।

अफवाहों का खंडन करते हुए हरियाणा के महिला एवं बाल विकास विभाग ने इस पूरे मामले में सच्चाई बताई और कहा कि एक्ट्रेस को अभियान से अलग करने जाने की खबरें निराधार हैं। परिणीति चोपड़ा के साथ सरकार का कॉन्ट्रेक्ट केवल 1 साल का था। यह 2017 में ही खत्म हो चुका है। इसके बाद इस कभी नवीकृत नहीं किया गया। जाहिर है, इस अभियान से परिणीति के अलग होने की वजह CAA के ख़िलाफ़ बोलना नहीं है। वह समझौता है जो साल 2017 में ही समाप्त हो चुका है। बताया गया है, “एक्ट्रेस को ट्वीट करने पर एंबेसडर की भूमिका से नहीं हटाया गया है। हमने एक्ट्रेस से एक साल का एग्रीमेंट साइन किया था, जो अप्रैल 2017 में खत्म हो गया था, जिसे बाद में रिन्यू भी नहीं किया गया था।”

महिला एवं बाल विकास विभाग के प्रवक्ता ने यह झूठ फैलाने के लिए कॉन्ग्रेस प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला पर भी निशाना साधा और कहा कि वे इस मामले पर गलत जानकारी शेयर कर बेवजह विवाद खड़े कर रहे हैं। उन्होंने हर किसी से अपील की बिना तथ्यों के ऐसी ख़बरें प्रकाशित कर गलत सूचना को न फैलाएँ, क्योंकि इससे राष्ट्रीय योजना के मूल उद्देश्य को भी नुकसान पहुँच सकता है।

गौरतलब है कि बीते दिनों सीएए का विरोध कर रहे लोगों पर कार्रवाई को लेकर एतराज जताते हुए परिणीति ने लिखा था कि “जब भी एक नागरिक अपना विरोध करना चाहेगा और यह सब होगा तो सीएए को भूल जाओ। हमें चाहिए कि ऐसा बिल पास करे, जिसमें हम देश को आगे से लोकतांत्रिक ना बता पाएँ! अपनी बात कहने के लिए मासूम लोगों को पीटना बर्बरता है।”

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