राजनैतिक मुद्दे

हिन्दुओं की सबसे बड़ी समस्या: वामपंथियों, कॉन्ग्रेसियों के गुनाहों की माफ़ी माँगते रहना

भाजपा के सर पर सम्प्रदायवाद मढ़ दिया जाता है, लेकिन याद कीजिए कि कॉन्ग्रेस के दंगाई इतिहास और वामपंथियों के आतंक के शिकार लोगों के लिए, उनके और तृणमूल के पोलिटिकल किलिंग्स पर कितनी बार माफ़ी माँगी गई? किसी ने कह दिया कि भाजपा कम्यूनल है, तो वो गई क्या? सिद्धू ने अपने बयान के लिए माफ़ी माँगी? मणिशंकर अय्यर ने? आज़म खान ने? राहुल गाँधी ने?

साध्वी का दोष कि वो हिन्दू थी? कि पिता IAS नहीं थे? कि वो LSR की छात्रा नहीं थी?

मैं साध्वी की बात से सहमत नहीं हूँ। मैं पीड़ित नहीं हूँ और महिला भी नहीं हूँ। मैं सत्य नहीं जानता। मैं यह जानता हूँ जहाँ कान पकड़ने पर एक व्यक्ति पुलवामा में 45 लोगों की हत्या कर देता है, एक साधनहीन महिला सिर्फ़ एक श्राप दे कर ठहरती है।

कॉन्ग्रेस शासन के अधिकारी RVS मणि ने बयान किया हेमंत करकरे और ‘भगवा आतंक’ के झूठ का सच

यह भी सच है कि कई सवाल न केवल अंदरूनी सूत्र आरवीएस मणि और पीड़िता साध्वी प्रज्ञा द्वारा उठाए गए हैं, बल्कि कई अन्य लोगों ने उनके आचरण और मिलीभगत के बारे में ‘भगवा आतंक’ का झूठ गढ़ने के लिए उठाए हैं। सच्चाई शायद बीच में कहीं है। लेकिन साध्वी प्रज्ञा की आवाज़ को चुप कराने की कोशिश करने वाले, इन तमाम मीडिया गिरोहों से कोई भी उम्मीद करना बेमानी है।

साध्वी प्रज्ञा को गोमाँस खिलाने वाले, ब्लू फिल्म दिखाने वाले लोग कौन थे?

साध्वी प्रज्ञा को जख्मी फेफड़ों के साथ अस्पताल में 3-4 फ्लोर तक चढ़ाया जाता था। ऑक्सीजन सप्लाई बंद कर दी जाती थी और उन्हें तड़पने के लिए छोड़ दिया जाता था। लगातार 14 दिन की प्रताड़नाओं के बीच साध्वी प्रज्ञा की रीढ़ की हड्डी भी टूट गई थी, इसी बीच उन पर एक और केस फाइल कर दिया गया।

उर्मिला ‘भटकी’ मातोंडकर का राजनीति में आना देश के लिए घातक, न कि PM मोदी पर फिल्म बनना

10 साल की उम्र से अपने अभिनय करियर की शुरुआत करने वाली उर्मिला मातोंडकर को राजनीति में आने के बाद भी तंज कसने का मौका सिर्फ़ मोदी की बायोपिक पर ही मिला। जिस महिला को किसी व्यक्ति के जीवन संघर्षों पर बनी फिल्म कॉमेडी टाइप लगती है, तो संदेह होता है कि उन्होंने अभिनय की दुनिया में इतने वर्ष बिताने के बाद भी क्या सीखा?

बंगाल जो चुनावी हिंसा का पर्याय है, ममत्व ऐसा कि भाजपाइयों की लटकती लाश आम दृश्य है

भाजपा कार्यालय से लेकर पेड़ तक पर भाजपा कार्यकर्ताओं की लाशें लटकी होने की ख़बर इतनी आम हो गई हैं कि सुन कर पहले ही सोच लेता हूँ कि बंगाल की ही ख़बर होगी।

महबूबा जी, आतंकी की लाश देख उसका छोटा भाई बंदूक उठा ले तो उसकी परवरिश खराब है

आखिर आतंकियों के सम्मान का कोई सोच भी कैसे सकता है? फिर याद आता है कि ये तो नेत्री भी हैं, इनको तो वोट भी वही लोग देते हैं जो आतंकियों के जनाज़े में टोपियाँ पहन कर पाकिस्तान परस्ती और भारत को बाँटने की ख्वाहिश का नारा लगाते शामिल होते हैं।

‘हिन्दू आतंकवाद’: एक शिगूफ़ा, एक थ्योरी एक नैरेटिव, क्यों ढह गई झूठ की यह इमारत

आज भले ही साध्वी प्रज्ञा ठाकुर के ऊपर से मामला पूरी तरह खतम न हुआ हो लेकिन यह भी सच है कि कॉन्ग्रेस के कार्यकाल में ऐसा कोई भी व्यक्ति दंडित नहीं किया जा सका जिसे हिन्दू आतंकी कहा गया।

प्रतिबंध किस पर है? कम्युनिस्टों के खिलाफ बोलने पर या देश के वीरों की गाथाएँ सुनाने पर

दोनों पुस्तकों के पिछले कई महीनों से बाज़ार में उपलब्ध होने का अर्थ यह है कि इनके पाठकों की संख्या उनसे कई गुना अधिक है जो निमंत्रण पाकर या गाहे बगाहे बुक लॉन्च में पहुँचते। बुक लॉन्च जैसे आयोजन लेखकों को अपनी वह बात कहने का मंच देते हैं जो वे पुस्तक में नहीं लिख पाते।

ध्रुव ट्रोल राठी! ब्रो, मीम बनाने पर फोकस करो, कहाँ नागरिक शास्त्र पर ज्ञान दे रहे हो!

राठी जी, राजनीति के विषय जितना प्रैक्टिकल से सीखे जा सकते हैं उतना थ्योरी में नहीं। पहले खुद का फंडा साफ कर लें, और जनता को मूर्ख न बनाएँ!

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