Friday, April 10, 2020
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कॉन्ग्रेस भारत का वो बेजोड़ विपक्ष है जिसकी तलाश राष्ट्रवादियों को 70 सालों से थी

वरना UPA-2 के दौरान जितने ताबड़तोड़ घोटाले सत्तापरस्त कॉन्ग्रेस सरकार करती रही, उससे तो यही साबित होता है कि भाजपा एक कमजोर विपक्ष है और इसे विपक्ष की नहीं बल्कि देश के नेतृत्व की कमान दी जानी चाहिए। UNESCO चाहे तो कॉन्ग्रेस को 'बेस्ट विपक्ष' का पुरस्कार भी दे सकती है।

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आशीष नौटियाल
पहाड़ी By Birth, PUN-डित By choice

देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी, कॉन्ग्रेस, लगातार अपने आप को हर मोर्चे पर आजमा चुकी है और उसने साबित भी कर दिया है कि वो राजनीति में सिर्फ सत्ता में रहकर ही नहीं, बल्कि एक बेजोड़ विपक्ष की भी भूमिका बखूबी निभा सकती है। पिछले दो सालों में जो सूझ-बूझ कॉन्ग्रेस ने दिखाई है, हर राष्ट्रवादी व्यक्ति उन्हें इसी रूप में अपने हृदय के भीतरी कक्ष में स्थापित कर लेना चाहता है।

गोदी मीडिया द्वारा लाई गई ‘मोदी लहर’ और ‘मोदी आँधी’ के बीच भी कॉन्ग्रेस ने मोदी सरकार के कार्यकाल के दौरान मजबूती से अपने आप को स्थापित कर के रखा, बावजूद इसके कि 2014 के आम चुनाव में कॉन्ग्रेस को जनता ने संसद में विपक्ष कहलाए जाने लायक भी नहीं छोड़ा था। राष्ट्रवादी लोग चाहे कितनी भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस कार्यकाल की तारीफ़ करें, लेकिन मोदी भक्त कभी ये बात स्वीकार नहीं करेंगे कि इसमें पूरा योगदान कॉन्ग्रेस का ही रहा है।

सर्जिकल स्ट्राइक से लेकर एयर स्ट्राइक तक कॉन्ग्रेस ने जमकर माँगे सबूत

मोदी सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि आतंकवाद पर उनका सख्त रवैया रहा। लेकिन अगर कॉन्ग्रेस अपने प्रशंसकों की प्रार्थना के खिलाफ जाकर भी लगातार और दिन-रात मोदी सरकार पर दबाव न बनाती तो शायद ही कभी पीएम मोदी भारतीय सेना को कभी इतनी खुली छूट देते कि वो पाकिस्तान में घुसकर आतंकवादियों को सबक सिखा पाते।

तीन तलाक़ बिल

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अपने चुनावी मेनिफेस्टो से लेकर रैलियों तक में महिला सशक्तिकरण की माला जपने वाले गाँधी परिवार ने ‘कभी घोडा-कभी चतुर’ की नीति वाले कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता कपिल सिब्बल को खुली छूट दी थी कि वो तीन तलाक़ पर मोदी सरकार को घेरे। आखिरकार मोदी सरकार ने कॉन्ग्रेस की सदियों पुरानी तुष्टिकरण की राजनीति के सामने नई लकीर खींचकर और अल्पसंख्यक वोट बैंक की चिंता किए बिना ही तीन तलाक़ जैसे संवेदनशील विषय पर अध्यादेश लाना ही पड़ा।

SC-ST आयोग में कॉन्ग्रेस की भूमिका

सदियों से दलित वोट बैंक की हितैषी रहने वाली कॉन्ग्रेस पार्टी के दबाव के कारण ही भाजपा को दलितों के प्रति होने वाले सामाजिक शोषण रोकने के लिए यह आयोग बनाना पड़ा। हालाँकि, ‘थैंकलेस कॉन्ग्रेस’ चाहती तो आजादी के इतने वर्षों में इस आयोग का गठन कर  इसे आसानी से ‘पन्डित नेहरू आयोग’ का नाम दे सकती थी, लेकिन मूर्ख कॉन्ग्रेस ने इसका क्रेडिट भी नरेंद्र मोदी को सौंप दिया।

मनरेगा vs किसान निधि योजना

कॉन्ग्रेस के बड़ी विदेशी यूनिवर्सिटी से पढ़कर आए बड़े नेताओं ने किसानों को सामाजिक और आर्थिक तौर पर सक्षम बनाने के लिए उनको मात्र 60 साल में किसान से मनरेगा मजदूर में तब्दील कर उनका मानसिक प्रोमोशन किया, लेकिन खुद को प्रधानसेवक कहने वाले चायवाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किसानों को उत्तम कृषि तकनीक के लिए अनेक योजनाएँ जारी की, जिनके कारण किसान सिर्फ किसान ही बनकर रह जाएगा। किसानों को कृषि और हल छोड़कर फावड़ा और सब्बल उठाकर दिहाड़ी-मजदूरी करने का जो अवसर कॉन्ग्रेस ने दिया था, वो अब मोदी जी ने समाप्त कर दिया है।

कॉन्ग्रेस ने फिर भी एक आदर्श विपक्ष की भूमिका में रहकर किसानों के लिए नया चुनावी जुमला ईजाद किया, कृषि ऋण माफ़ी। इस ऋण माफ़ी की नेहरूवादी दूरगामी सोच यह है कि किसान आराम से लेट-लेटकर ऋण लेता रहे और अपनी सेहत सुधारे। लेकिन फिर नरेंद्र मोदी ने सॉइल हेल्थ कार्ड और किसान निधि योजना का उद्घाटन कर किसानों को बुनियादी स्तर पर मजबूत बनाने और सहायता प्रदान कर उनके उस आराम के जीवन में दखल दे डाली, जिसने आजादी के इतने वर्षों बाद तक किसानों की एड़ियों में बिवाई डाली थी।

अगर कॉन्ग्रेस लगातार किसानों के माध्यम से धरना प्रदर्शन न करवाती और किसानों की एड़ियों का प्रोफेशनल तरीके से फोटोग्राफी करवाकर नरेंद्र मोदी सरकार को न दिखाती तो शायद मोदी सरकार इन योजनाओं की ओर कभी कदम नहीं उठाती और किसान की मनरेगा की आस में जीवन गुजारना पड़ता।

सामान्य वर्ग में आरक्षण

समाज की विभिन्न जातियों और वर्गों को देखते ही उनकी वोट बैंक क्षमता पहचानने की अचूक शक्ति रखने वाली कॉन्ग्रेस कभी सामान्य वर्ग को नहीं देख पाई थी। अगर कभी देख भी सकी तो वोट बैंक क्षमता को भाँपकर उसकी ओर ध्यान देना जरुरी नहीं समझा। समाज के जातिगत समीकरणों में कॉन्ग्रेस अपनी तमाम पंचवर्षीय में इतनी व्यस्त रही कि उसे कभी यह महसूस नहीं हुआ था कि सामान्य श्रेणी में भी ऐसे गरीब हो सकते हैं, जिन्हें सामाजिक न्याय की जरूरत है। लेकिन ‘थैंकलेस’ कॉन्ग्रेस सरकार ने आजादी के इतने वर्षों बाद भी सामान्य वर्ग के गरीबों को सामाजिक न्याय सिर्फ इसलिए नहीं दिया ताकि इसका श्रेय वो नरेंद्र मोदी को दे सकें।

लोग कॉन्ग्रेस पर परिवारवाद की राजनीति करने का आरोप लगाते हैं लेकिन इस पंचवर्षीय में उन्होंने एक कदम आगे बढ़कर नरेंद्र मोदी को इन सब जरुरी और बुनियादी कामों का श्रेय लेने का मौका दिया। वो भी तब, जब नेहरू, इंदिरा, राजीव इत्यादि गाँधी के नाम पर इन सब योजनाओं को चला सकती थी।

सबसे बड़ी उपलब्धि कॉन्ग्रेस सरकार की इन 5 वर्षों में ये रही कि इसने नरेंद्र मोदी सरकार को एक भी घोटाला नहीं करने दिया। यहाँ तक कि अपने पारिवारिक घोटाले भी अगले आम चुनाव से पहले कॉन्ग्रेस ने स्वीकार कर डाले। इन सब बातों को बड़े स्तर पर देखा जाए तो कॉन्ग्रेस के अंदर एक अच्छे विपक्ष के सारे गुण नजर आने लगे हैं। वरना UPA-2 के दौरान जितने ताबड़तोड़ घोटाले सत्तापरस्त कॉन्ग्रेस सरकार करती रही, उससे तो यही साबित होता है कि भाजपा एक कमजोर विपक्ष है और इसे विपक्ष की नहीं बल्कि देश के नेतृत्व की कमान दी जानी चाहिए। UNESCO चाहे तो कॉन्ग्रेस को ‘बेस्ट विपक्ष’ का पुरस्कार भी दे सकती है।

नेहरू को जाता है मोदी सरकार की सफलता का ‘पूरा-पूरा क्रेडिट’

बड़प्पन में कॉन्ग्रेस ने 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को सत्ता सौंपी और खुद विपक्षी पार्टी बनने का फैसला किया। इन सबके बावजूद भी जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कहते हैं कि जवाहरलाल नेहरू ने इस देश को कश्मीर समस्या के सिवाय कुछ नहीं दिया है, तो इससे यही साबित होता है कि नरेंद्र मोदी नेहरू द्वारा दिए गए अवसरों के प्रति उदार नहीं हैं। मोदी सरकार पर दबाव बनाने के लिए कॉन्ग्रेस अकेले मैदान में नहीं रही बल्कि उसने अपने गोदी मीडिया, सस्ते कॉमेडियन्स, न्यूट्रल पत्रकारों के गिरोह और अवार्ड वापसी गैंग जैसी घातक टुकड़ियों को भी इस प्रक्रिया में एड़ी-छोटी का जोर लगाने पर मजबूर किया। यह दर्शाता है कि विपक्ष में बैठकर कॉन्ग्रेस, मोदी सरकार को अच्छे से मॉनिटर कर सकती है।

अगले चुनाव इन्हें विपक्ष ही दीजो’

मोदी सरकार के इस कार्यकाल की सबसे ख़ास बात यह रही है कि चुनाव से पहले पहले ‘लगभग’ कई बड़े विपक्ष के नेता भाजपा में शामिल हो रहे हैं। यह बड़ी उपलब्धि है कि आजकल जैसी ही कोई नेता कहता है कि वो उसी पार्टी के साथ खड़ा होगा, जो ‘देशहित’ की बात करेगी तो राष्ट्रवादी और गैर-राष्ट्रवादी जनता तुरंत समझ जाती है कि ये भाजपा में शामिल होने की बात कर रहा है। कॉन्ग्रेस के तमाम सस्ते-महँगे, बड़ी-छोटी गोदी मीडिया जिस ‘राष्ट्रवाद’ और ‘देशभक्ति‘ शब्द को मजाक साबित करने के प्रयास करती रही, चुनाव से पहले वही शब्द सम्मान का विषय बनकर उभर चुके हैं। शायद नरेंद्र मोदी की इन्हीं खूबियों का नतीजा भी है कि इस चुनाव में कॉन्ग्रेस ने भी उनके खिलाफ कोई PM कैंडिडेट मैदान में नहीं उतरा है। लेकिन राष्ट्रवादी लोग कॉन्ग्रेस का मास्टरस्ट्रोक कभी समझेंगे ही नहीं।

ऐसे ही तमाम मुद्दे हैं, जिनके लिए यदि विपक्ष में बैठी कॉंग्रेस द्वारा भाजपा पर निरंतर दबाव न बनाया गया होता, तो शायद राष्ट्रवादी मोदी सरकार का उन पर ध्यान ही नहीं जाता। इसलिए देशहित तो इसमें नजर आता है कि कॉन्ग्रेस इसी तरह से विपक्ष में रहकर भाजपा पर इसी सख्ती से दबाव बनाती रहे, ताकि सभी राजनीतिक और सामाजिक कार्यक्रम चाक-चौबंद तरीके से आगे बढ़ते रहें और नरेंद्र मोदी अपने भारत निर्माण का लक्ष्य पूरा कर सकें। आरक्षण, सर्जिकल स्ट्राइक, आतंकवाद, जो भी आपत्तियाँ विपक्ष द्वारा लगायी गईं, मोदी सरकार को उन्हें पूरा करना पड़ा। अब जिस संवेदनशीलता से राम मंदिर पर विपक्ष सरकार को लगातार कोस रहा है, उससे लगता है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जल्दी ही राम मन्दिर निर्माण कार्य को भी पूरा करेंगे और मास्टरस्ट्रोक की झड़ी लगाते रहेंगे।

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