रवीन्द्र शर्मा, कपिल भाटी, पीयूष भाटी, रोहित कुमार, रोहित चंदेला और राहुल भाटी… ये वो नाम हैं जिनके सहारे नोएडा में एक मुस्लिम नौकरी के नाम पर ठगी करता था। लाखों सब्स्क्राइबर का यूट्यूब चैनल चलाने वाला यह ठग युवाओं को ओप्पो, वीवो जैसी कम्पनियों में नौकरी दिलाने के नाम पर लाखों ठग चुका था। वह खुद को ‘पत्रकार’ बताता था।
नोएडा पुलिस ने बुधवार (04 मई, 2025) को इस ठग को गिरफ्तार किया है। इसका नाम वसीम अहमद है। वसीम उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले का रहने वाला है और फिलहाल नोएडा के इकोटेक-3 इलाके में रह रहा था। पुलिस ने बताया है कि वसीम पिछले 6 महीने से नोएडा के सेक्टर-81 में एक फर्जी ऑफिस चला रहा था।
वसीम खुद को पत्रकार बताकर बेरोजगार युवाओं को नौकरी का झाँसा देकर उनसे ठगी करता था। यहाँ वह एक फर्जी ऑफिस चलाता था। DCP सेंट्रल नोएडा शक्ति मोहन अवस्थी ने बताया कि आरोपित ने ऑफिस में 2 महिलाओं को भी काम पर रखा था, जिन्हें वह ₹12,000 सैलरी देता था। वह 100+ लोगों को ठग चुका था।
यहाँ से वो युवाओं को सैमसंग, ओप्पो, वीवो, और एलजी जैसी नामी कंपनियों में नौकरी दिलाने का झाँसा देता था। पूछताछ में वसीम ने बताया कि उसके पास एक यूट्यूब चैनल है जिसका नाम ‘टुडे जॉब्स नोएडा’ है।
इस चैनल पर वह फर्जी नौकरी के विज्ञापन डालता था, जिससे कई बेरोजगार युवा उसकी बातों में आ जाते थे। वह उनसे रजिस्ट्रेशन फीस और फाइल चार्ज के नाम पर पैसे लेता और फिर एक नकली इंटरव्यू के बाद उन्हें फर्जी नियुक्ति पत्र थमा देता था।
स्क्रीन शॉर्ट ऑफ चैनल
जब युवाओं को असली कंपनी से कोई जवाब नहीं मिलता और वे वसीम से संपर्क करने की कोशिश करते, तो वह अपना मोबाइल फोन बंद कर देता था। इसी का शिकार हुए एक पीड़ित योगेंद्र ने 26 अप्रैल, 2025 को शिकायत की जिसके बाद सेक्टर-63 थाना पुलिस ने इस मामले की जाँच शुरू की।
खुफिया जानकारी के आधार पर पुलिस ने बुधवार को वसीम को गिरफ्तार कर लिया। उसके पास से 200 से ज्यादा विजिटिंग कार्ड, नौकरी से जुड़े दस्तावेज, इंटरव्यू फॉर्म, दो मोबाइल फोन और एक कार बरामद हुई है।
डीसीपी अवस्थी ने बताया कि वसीम का पहले से आपराधिक रिकॉर्ड है और वह इसी तरह की ठगी के मामलों में पहले भी सेक्टर-49 और सेक्टर-20 के थानों में गिरफ्तार हो चुका है। पुलिस अब उससे पूछताछ कर रही है और यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि इस गैंग में और कौन-कौन शामिल है।
वंदे भारत एक्सप्रेस अब कटरा से श्रीनगर के बीच तेजी से दौड़ेगी। यह ट्रेन न सिर्फ यात्रा का समय कम करेगी, बल्कि जम्मू-कश्मीर के लोगों को एकदम आरामदायक और शानदार सफर का अनुभव देगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 6 जून 2025 को उद्धमपुर-श्रीनगर-बारामूला रेल लिंक (यूएसबीआरएल) पर कश्मीर की पहली वंदे भारत ट्रेन को हरी झंडी दिखाकर रवाना करेंगे।
यह नई आधुनिक सेमी-हाई-स्पीड ट्रेन कटरा के श्री माता वैष्णो देवी स्टेशन से श्रीनगर के नौगाम स्टेशन तक 150 किलोमीटर का सफर तय करेगी। इस ट्रेन में ऑटोमैटिक दरवाजे, पत्थरों से बचाव वाले सीसें और खास हीटिंग सिस्टम लगे होंगे, जो इसे और सुरक्षित और आरामदायक बनाएँगे। 23 जनवरी 2025 को भारतीय रेलवे ने इस ट्रेन का कटरा से श्रीनगर तक टेस्ट रन किया था, जो पूरी तरह सफल रहा।
फोटो साभार: राइजिंग कश्मीर
इस प्रोजेक्ट को पहले 19 अप्रैल को शुरू करना था, लेकिन खराब मौसम की वजह से इसे टालना पड़ा। फिर 22 अप्रैल को पहलगाम में हुए आतंकी हमले ने उद्घाटन को और पीछे धकेल दिया। पहले पीएम मोदी को श्रीनगर में इस ट्रेन का उद्घाटन करना था, लेकिन अब वे जम्मू के कटरा से इसे हरी झंडी दिखाएंगे।
अभी कश्मीर के बारामूला-श्रीनगर से संगलदान तक ट्रेनें चल रही हैं। रेलवे अधिकारियों ने बताया, “संगलदान और जम्मू के कटरा के बीच रेल लाइन अब पूरी तरह जुड़ गई है। अब इस पूरे रास्ते पर ट्रेनें बिना किसी रुकावट के चल सकती हैं।”
इसके साथ ही, पीएम मोदी दो बड़े इंजीनियरिंग चमत्कारों का भी उद्घाटन करेंगे। पहला है भारत का पहला केबल-स्टे रेल ब्रिज, जिसे अंजी खड्ड ब्रिज कहते हैं, और दूसरा है दुनिया का सबसे ऊँचा रेलवे ब्रिज, चिनाब ब्रिज।
चिनाब पुल
पिछले महीने रेलवे ने एक ‘ट्रायल स्पेशल ट्रेन’ चलाई थी, जो कटरा से काजीगुंड के बीच गई। इस ट्रेन में सैनिक सवार थे और यह चिनाब ब्रिज से होकर गुजरी। यह ब्रिज कश्मीर को भारत के बाकी हिस्सों से रेल के जरिए जोड़ने वाला आखिरी और सबसे अहम हिस्सा है।
अंजी केबल ब्रिज
इंजीनियरिंग का गजब का कारनामा
उद्धमपुर-श्रीनगर-बारामूला रेल लिंक, यानी यूएसबीआरएल, आजाद भारत का सबसे बड़ा और सबसे मुश्किल रेलवे प्रोजेक्ट है। यह 272 किलोमीटर लंबा रास्ता हिमालय की जंगली और मुश्किल भरी जमीन पर बना है। इस पूरे प्रोजेक्ट को बनाने में 43,780 करोड़ रुपये की लागत आई है। यह रेल लाइन घाटियों, पहाड़ों और दर्रों को जोड़ती है, जो अपने आप में एक बहुत बड़ा काम है।
इस प्रोजेक्ट में बिना बैलास्ट (पटरियों के बीच-सीमेंट के खंबे) की पटरियाँ बिछाई गई हैं, जो 943 पुलों और 36 बड़े टनलों से होकर गुजरती हैं। इन टनलों की कुल लंबाई 119 किलोमीटर है। इनमें से सबसे खास है टी-50 टनल, जो भारत की सबसे लंबी रेलवे टनल है और इसकी लंबाई 12.7 किलोमीटर से भी ज्यादा है।
इस प्रोजेक्ट का एक और बहुत जरूरी हिस्सा है बनिहाल-काजीगुंड रेलवे टनल, जिसे लोग पीर पंजाल रेलवे टनल भी कहते हैं। यह टनल 11.215 किलोमीटर लंबी है और हिमालय की पीर पंजाल रेंज में बनी है। यह टनल जम्मू-कश्मीर को भारत के बाकी हिस्सों से जोड़ने में बहुत अहम भूमिका निभाती है।
पीर पंजाल रेलवे सुरंग
यह ट्रेन दूर-दराज के इलाकों को देश के रेल नेटवर्क से जोड़ रही है। इससे जम्मू-कश्मीर में आवाजाही, व्यापार और पर्यटन को एक नया रास्ता मिलेगा। इस प्रोजेक्ट को हिमालय की मुश्किल भौगोलिक परिस्थितियों को ध्यान में रखकर बनाया गया है। कटरा से श्रीनगर के बीच वंदे भारत एक्सप्रेस इस कनेक्टिविटी को और बेहतर बनाएगी। यह ट्रेन हिमालय की सख्त सर्दियों में भी आसानी से चलेगी, जहाँ तापमान माइनस 20 डिग्री सेल्सियस तक चला जाता है।
History in the making: For the first time ever, #Kashmir is connected directly, seamlessly to Jammu, New Delhi and the rest of India by train on 6 June 2025. @PMOIndia@narendramodi to flag off the first passenger train (Vande Bharat) at Katra. The world's highest railway… pic.twitter.com/qismUnm3ph
ट्रेन में गर्म विंडशील्ड, खास हीटिंग सिस्टम और इंसुलेटेड टॉयलेट लगाए गए हैं, जो साल भर आरामदायक और भरोसेमंद सफर सुनिश्चित करते हैं। एक खास बर्फ हटाने वाली ट्रेन इसके आगे चलती है, जो पटरियों को साफ रखती है, ताकि बर्फ की वजह से कोई रुकावट न आए। साथ ही, भूकंप के झटकों को सहने के लिए सिस्मिक डैम्पर्स लगाए गए हैं, जिससे इस जोखिम भरे इलाके में सफर सुरक्षित और आरामदायक रहे।
ट्रेन में सर्दियों में साफ दिखने के लिए खास इंतजाम किए गए हैं। इसमें ठंड के मौसम में काम करने वाले हीटिंग सिस्टम हैं और ड्राइवर के सामने वाले शीशे में डीफ्रॉस्टिंग के लिए हीटिंग तत्व लगे हैं। यह ट्रेन चिनाब ब्रिज से होकर गुजरेगी, जो समुद्र तल से 359 मीटर की ऊँचाई पर है।
ये सारे इंतजाम जम्मू-कश्मीर की सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था को और भरोसेमंद, मजबूत और भविष्य के लिए तैयार बना रहे हैं। इस प्रोजेक्ट में एक और खास चीज है अंजी खड्ड ब्रिज, जो भारत का पहला केबल-स्टे रेल ब्रिज है। यह ब्रिज 725 मीटर लंबा है और समुद्र तल से 331 मीटर की ऊँचाई पर बना है। इसे 96 केबलों ने सहारा दिया हुआ है।
चिनाब ब्रिज की बात करें तो यह चिनाब नदी पर 1,178 फीट की ऊँचाई पर बना है, जो एफिल टावर से भी ऊँचा है। एक रेलवे अधिकारी ने बताया, “ट्रेनें चलाने और सुरक्षा के सारे इंतजाम पूरी तरह तैयार हैं।” इस रूट पर सिर्फ चार स्टेशन होंगे: श्रीनगर, बनिहाल, जम्मू तवी और श्री माता वैष्णो देवी कटरा।
ट्रेन का समय और शेड्यूल
रेल मंत्रालय ने चार वंदे भारत ट्रेनों को मंजूरी दी है। इनमें जम्मू तवी-श्रीनगर वंदे भारत एक्सप्रेस (26401/26402) और जम्मू तवी-श्रीनगर वंदे भारत एक्सप्रेस (26403/26404) शामिल हैं। दो ट्रेनें श्रीनगर से चलेंगी और दो जम्मू से।
श्रीनगर-जम्मू तवी वंदे भारत एक्सप्रेस (26402) हर दिन दोपहर 2 बजे श्रीनगर से निकलेगी (मंगलवार को छोड़कर) और शाम 6:50 बजे जम्मू पहुँचेगी। दूसरी ट्रेन (26404) सुबह 8 बजे श्रीनगर से चलेगी और दोपहर 12:40 बजे जम्मू पहुंचेगी (बुधवार को छोड़कर)।
जम्मू तवी-श्रीनगर वंदे भारत एक्सप्रेस (26403) हर दिन दोपहर 1:20 बजे जम्मू से रवाना होगी (बुधवार को छोड़कर) और शाम 6 बजे श्रीनगर पहुँचेगी। दूसरी ट्रेन (26401) सुबह 6:20 बजे जम्मू से चलेगी और सुबह 11:10 बजे श्रीनगर पहुंचेगी (मंगलवार को छोड़कर)।
रेलवे के आदेश में कहा गया है कि ट्रेन को समय पर और सुविधाजनक तारीख को शुरू करना है। पहली ट्रेन एक खास सेवा हो सकती है, जो बाद में सामान्य समय-सारिणी से जुड़ जाएगी। आदेश में यह भी कहा गया है कि उत्तरी रेलवे के प्रस्तावों के अनुसार बदलाव किए जाएँगे।
हाई स्पीड ट्रेन ट्रायल के दौरान चिनाब ब्रिज
कटरा से श्रीनगर का किराया अभी आधिकारिक तौर पर तय नहीं हुआ है, लेकिन रेलवे सूत्रों के मुताबिक, एसी चेयर कार का किराया करीब 1600 रुपये और एग्जीक्यूटिव चेयर कार का किराया 2500 रुपये हो सकता है। इस ट्रेन में 530 यात्री सफर कर सकते हैं। इसमें सात लग्जरी कोच और एक एग्जीक्यूटिव कोच होगा।
इसके अलावा, एक अलग मालगाड़ी सेवा भी मौसमी जरूरतों के हिसाब से चलेगी। यह खास तौर पर ताजी सब्जियों और अन्य जरूरी सामानों को लाने-ले जाने के लिए होगी। साथ ही, पीएम मोदी उत्तरी कश्मीर के बारामूला से कटरा के बीच यात्री सेवा भी शुरू करेंगे।
कुछ रिपोर्ट्स के अनुसार, पीएम मोदी दो वंदे भारत ट्रेनों को हरी झंडी दिखाएँगे: एक कटरा से श्रीनगर और दूसरी श्रीनगर से कटरा। अभी ये ट्रेनें सिर्फ इन दो शहरों के बीच चलेंगी। जम्मू रेलवे यार्ड में कुछ निर्माण कार्य चल रहा है, जिसके चलते जम्मू से श्रीनगर की सीधी वंदे भारत सेवा अभी शुरू नहीं हो सकती। यात्रियों को कटरा में ट्रेन बदलनी होगी। यह काम अगस्त या सितंबर तक पूरा हो जाएगा।
वंदे भारत से विकास की नई राह
कटरा से श्रीनगर के बीच सड़क का सफर कम से कम 6 से 7 घंटे लेता है, लेकिन वंदे भारत ट्रेन सिर्फ 3 घंटे में यह दूरी तय कर देगी। रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने कहा है कि इस ट्रेन की वजह से लोग एक ही दिन में जम्मू से श्रीनगर जाकर वापस आ सकेंगे।
यह ट्रेन कश्मीर के लोगों के लिए बहुत फायदेमंद होगी। इससे सेब, ड्राई फ्रूट्स, पश्मीना शॉल, हस्तशिल्प जैसी चीजों को देश के बाकी हिस्सों में आसानी से और कम खर्चे में भेजा जा सकेगा। साथ ही, देश के अन्य हिस्सों से घाटी में रोजमर्रा का सामान लाने की लागत भी बहुत कम हो जाएगी। बनिहाल और बारामूला के बीच चार कार्गो टर्मिनल बनाने की योजना है, जिनमें से तीन जगहों की पहचान हो चुकी है।
ट्रायल रन के दौरान वंदे भारत ट्रेन
कटरा और श्रीनगर के बीच इस रूट पर 18 बड़े स्टेशन होंगे, जिनमें रियासी, बक्कल, दुग्गा, सावलकोट, संगलदान, सम्बर, खारी, बनिहाल, शहाबाद हिल हॉल्ट, काजीगुंड, सादुरा, अनंतनाग, बिजबेहरा, पंजगाम, अवंतीपोरा, रतनिपोरा, काकापोरा और पंपोर शामिल हैं। ये स्टेशन आसपास के लोगों के लिए सफर को और आसान बनाएँगे।
इस बड़े प्रोजेक्ट के बनने का सफर
हिमालय की जमीन नई है और यह भूकंप के लिहाज से सबसे सक्रिय जोन IV और V में आती है। यहाँ शिवालिक पहाड़ियाँ और पीर पंजाल पर्वत हैं। इस मुश्किल इलाके में भारी बर्फबारी के बीच बड़े-बड़े पुल और टनल बनाना बहुत बड़ा चैलेंज था।
इस प्रोजेक्ट के लिए 205 किलोमीटर सड़कें बनाई गईं, जिनमें 320 पुल और एक टनल शामिल हैं। इन सड़कों को बनाने में 2000 करोड़ रुपये की लागत आई। ये सड़कें कर्मचारियों, भारी मशीनों और निर्माण सामग्री को 70 डिग्री ढलान वाले पहाड़ी इलाकों तक ले जाने के लिए बनाई गई थीं।
फोटो साभार: X_trainwalebhaiya
रेलवे इंजीनियरों ने एक नया तरीका निकाला, जिसे हिमालयन टनलिंग मेथड (एचटीएम) कहते हैं। इसमें आम डी-शेप की टनलों की जगह हॉर्सशू-शेप की टनल बनाई गईं। इससे ढीली मिट्टी वाले इलाकों में टनल की संरचना को और मजबूती मिली।
इस ब्रॉड गेज रेल लाइन का ढलान 0.5 से 1 प्रतिशत रखा गया है, जिससे पहाड़ी इलाके में ट्रेनों को चलाने के लिए अतिरिक्त इंजन की जरूरत नहीं पड़ती। पहले योजना थी कि ट्रेनें डीजल इंजन से चलेंगी, लेकिन बाद में इन्हें इलेक्ट्रिक करने का विकल्प रखा गया। हर बड़े पुल, टनल और स्टेशन पर सीसीटीवी कैमरे और लाइटिंग की व्यवस्था की गई है। टनल और पटरियों को इस तरह बनाया गया है कि उन्हें कम से कम रखरखाव की जरूरत पड़े।
जम्मू-कश्मीर में रेलवे का नया बदलाव
फरवरी 2024 में बनिहाल से संगलदान तक 48 किलोमीटर की रेल लाइन शुरू हुई। बारामूला-श्रीनगर-बनिहाल-संगलदान का 185.66 किलोमीटर का हिस्सा पूरी तरह इलेक्ट्रिक कर दिया गया। पीएम मोदी ने संगलदान से बारामूला के बीच सेवा शुरू की और कश्मीर घाटी की पहली इलेक्ट्रिक ट्रेन को हरी झंडी दिखाई।
जनवरी 2025 में बनिहाल-कटरा के 111 किलोमीटर खंड की आखिरी सुरक्षा जाँच शुरू हुई। इस हिस्से में 4 सात-किलोमीटर लंबे पुल और 97 किलोमीटर की टनल हैं। जम्मू रेलवे स्टेशन को नया रूप दिया जा रहा है, जिसमें आठ प्लेटफॉर्म और आधुनिक सुविधाएँ होंगी।
फोटो साभार: INSIGHTS IAS
जनवरी में जम्मू रेलवे डिवीजन शुरू हुआ, जो उत्तरी रेलवे का हिस्सा है। यह डिवीजन जम्मू-कश्मीर, लद्दाख, हिमाचल प्रदेश और पंजाब के कुछ हिस्सों को कवर करेगा। यह भारतीय रेलवे का 70वाँ डिवीजन है और इसमें पुराने फिरोजपुर डिवीजन का बड़ा हिस्सा शामिल किया गया है। यह डिवीजन यूएसबीआरएल के बड़े हिस्सों का मैनेजमेंट करेगा और इलाके में रेलवे के काम को और बेहतर बनाएगा।
उद्धमपुर से कटरा (25 किमी) और संगलदान से बारामूला (184 किमी) तक स्थानीय ट्रेनें पहले से चल रही हैं। अब आखिरी 63 किलोमीटर का कटरा-संगलदान खंड भी जनता के लिए खुल गया है।
साल 1983 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की कॉन्ग्रेस सरकार ने उद्धमपुर-श्रीनगर रेल लाइन की नींव रखी थी। लेकिन असल में काम 2002 में शुरू हुआ, जब अटल बिहारी वाजपेयी की एनडीए सरकार ने इसे राष्ट्रीय प्रोजेक्ट घोषित किया।
भारत को एक सूत्र में पिरो रहा रेलवे
यूएसबीआरएल प्रोजेक्ट को 1994-95 में मंजूरी मिली थी और 2002 में इसे राष्ट्रीय प्रोजेक्ट का दर्जा दिया गया। इसे चरणों में पूरा किया गया। इसके कई हिस्से पहले ही शुरू हो चुके हैं, जैसे बनिहाल-काजीगुंड (2013), उद्धमपुर-कटरा (2014), बनिहाल-बारामूला (2009) और बनिहाल-संगलदान (2020)। पिछले साल रियासी-संगलदान लाइन पर इलेक्ट्रिक मल्टीपल यूनिट (MEMU) ट्रेन का सफल ट्रायल हुआ था।
फोटो साभार: Mint
यह प्रोजेक्ट सिर्फ एक नई ट्रेन सेवा शुरू करने तक सीमित नहीं है। यह पिछले 11 सालों में मोदी सरकार के तहत जम्मू-कश्मीर के रेलवे सिस्टम में हुए बड़े बदलाव का सबूत है। इस क्षेत्र का रेलवे नक्शा पूरी तरह बदल गया है। जो पहले दूर के सपने थे, वे अब लोगों उनकी आजीविका और जगहों को जोड़ने वाले असल रास्ते बन गए हैं।
एक डेडिकेटेड रेलवे डिवीजन, स्टेशनों का आधुनिकीकरण और पूर्ण विद्युतीकरण ने इस क्षेत्र को तेज, स्वच्छ और सभी के लिए बराबर विकास के रास्ते पर ला दिया है। मोदी सरकार ने कश्मीर घाटी को देश के बाकी हिस्सों से जोड़ दिया है। 2014 के बाद से रेलवे नेटवर्क का बहुत विस्तार हुआ है। उन इलाकों को भी रेल से जोड़ा गया, जहाँ पहले रेल सेवा सिर्फ एक सपना था।
पूर्वोत्तर से लेकर कश्मीर तक, रेलवे ने देश के सबसे दूर-दराज के इलाकों को मुख्यधारा से जोड़ा है। इससे आर्थिक विकास को बढ़ावा मिला है और लोगों को सुविधा और आराम मिला है। यह प्रोजेक्ट स्थानीय लोगों के जीवन को बेहतर बनाएगा। साथ ही बागवानी, पर्यटन, कृषि और शिक्षा जैसे उद्योगों को भी बढ़ावा देगा।
पहले अलग-थलग माने जाने वाले पूर्वोत्तर और आतंक प्रभावित कश्मीर अब भारत की मुख्यधारा का हिस्सा बन गए हैं। हाल के ये सारे बदलाव इसका सबूत हैं। रेलवे ढाँचे पर मौजूदा ध्यान एकीकरण और सभी को साथ लेकर चलने वाले विकास की प्रतिबद्धता को दिखाता है। यह नया रेल लिंक कश्मीर से कन्याकुमारी तक एक निर्बाध रेल लाइन बनाकर सात दशक पुराने राष्ट्रीय एकीकरण के सपने को पूरा करेगा।
पाकिस्तान की एक ‘ट्रैवल एजेंट’ भारत में 500 जासूस तैयार करना चाहती थी। उसे ISI ने इस काम के लिए ट्रेनिंग दी थी। इसी ने ज्योति मल्होत्रा और जसबीर जैसे यूट्यूबरों को पाकिस्तान का वीजा दिलाने में मदद की थी। उसका कोडनेम ‘मैडम एन’ बताया गया है। इस मैडम N के निशाने पर हिन्दू-सिख होते थे।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इस मैडम N का असल नाम नोशाबा शहजाद है। शहजाद पाकिस्तान के एक रिटायर्ड नौकरशाह की बीवी है। मैडम N उर्फ़ शहजाद पाकिस्तान के लाहौर में ‘जयियाना टूर और ट्रेवल्स’ नाम से एक कम्पनी चलाती है। इस मैडम N के विषय में जानकारी ज्योति मल्होत्रा और बाकी जासूसों से पूछताछ में सामने आई है।
इस मैडम N को पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI ने भारत में जासूसों का एक नेटवर्क तैयार करने के निर्देश दिए थे। इसके तहत इसे 500 ऐसे लोगों का जासूसी नेटवर्क तैयार करना था, जो आम जनता की नजर में संदिग्ध ना लगें। ज्योति मल्होत्रा जैसे इन्फ्लुएंसर इसीलिए इसका निशाना बने।
मैडम N का प्रमुख काम ऐसे भारतीयों को पहचान कर उन्हें पाकिस्तान का वीजा दिलाने, उन्हें पाकिस्तान के भीतर यात्रा में मदद करने और बाक़ी सहायता पहुँचाने का था। इसके प्रमुख निशाने पर सिख और हिन्दू रहते थे ताकि मजहबी एंगल ना आए। इसीलिए जसबीर और ज्योति मल्होत्रा इसके निशाने पर आए।
इस मैडम N के तार नई दिल्ली स्थित पाकिस्तानी उच्चायोग से भी जुड़े हुए थे। यहाँ वह वीजा विभाग के लोगों से जुड़ी हुई थी। यहाँ वह पाकिस्तानी उच्चायोग के अधिकारी सुहैल क़मर और उमर शहरयार से जुड़ी हुई थी। वह उस दानिश के सम्पर्क में भी थी, जिसने ज्योति मल्होत्रा से जासूसी करवाई। यहाँ उसके एक फोन पर वीजा बन जाते थे।
जब यह मैडम N लोगों का वीजा बनवा देती थी तो वह इसके बाद अपने प्लान पर काम करना चालू करती थी। यह पाकिस्तान पहुँचने वाले भारतीयों को इसके बाद ISI से मिलवाती थी। ISI इसके बाद इन लोगों को फँसा कर भारत से सूचनाएँ निकलवाती थी।
रिपोर्ट्स में बताया गया है कि उसने लगभग 3000 भारतीयों को पाकिस्तान का वीजा दिलाने में सहायता की है। उसके निशाने पर सिर्फ भारतीय नागरिक ही नहीं बल्कि विदेशों में रहने वाले भारतीय भी रहते थे। उसने 1500 NRI को भी वीजा दिलवाया है।
पाकिस्तान के भीतर जाकर वीडियो बनाने या फिर सिख-हिन्दू स्थानों की यात्रा करने की इच्छा रखने वाले लोग इस मैडम N की कम्पनी का सहारा लेने को मजबूर होते थे। असल में, यह अकेली ऐसी पाकिस्तानी कम्पनी है, जो ऐसे टूर करवाती है। यह काम ISI और पाकिस्तानी फ़ौज की शह पर होता है। उसके ट्रैवल एजेंट दिल्ली तक में है।
उसकी जड़ें कहाँ तक फैली हैं, इसकी जाँच अब भारतीय जाँच एजेंसियाँ जोरशोर से कर रही हैं। बीते कुछ वर्षों में पाकिस्तान की यात्रा करने वाले यूट्यूब व्लॉगर्स पर भी नजर रखी जा रही है।
चीन के पास पृथ्वी के दुर्लभ चुंबकीय तत्वों का भंडार है। अमेरिका के साथ टैरिफ वार के बाद चीन ने इन दुर्लभ तत्वों के निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया है। इसका सबसे बड़ा नुकसान भारत को होने वाली है। भारत में स्थापित ऑटोमोबाइल, सेमीकंडक्टर और अन्य उपकरण निर्माण से जुड़े उद्योगों को इस प्रतिबंध से काफी नुकसान हो सकता है।
अप्रैल 2025 में चीन ने 7 मध्यम से भारी दुर्लभ तत्वों पर सुरक्षा और प्रसार संबंधी चिंताओं का हवाला देते हुए निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया। इसके बाद चीन ने निर्यातकों को लाइसेंस लेने की जरूरत बता दी। दुर्लभ मैग्नेट इलेक्ट्रिक और पेट्रोल वाहनों, रक्षा उपकरणों और स्वच्छ ऊर्जा प्रणाली में एक अहम भूमिका निभाते हैं। इनका उपयोग मोटर और स्टीयरिंग सिस्टम, ब्रेक, वाइपर और ऑडियो उपकरणों के निर्माण में किया जाता है।
चीन के प्रतिबंध के कदम ने दुनिया भर में आपूर्ति शृंखला को प्रभावित किया है। खासकर भारत की EV इंडस्ट्री की बात की जाए तो देश पूरी तरह से चीन पर ही पृथ्वी के दुर्लभ चुंबकीय तत्वों के लिए निर्भर करता है। चीन के द्वारा अनिवार्य की गई लाइसेंसिंग प्रक्रिया में महीनों का समय लग सकता है। ऐसे में इनकी आपूर्ति में देरी होगी और वैश्विक उत्पादन श्रृंखला प्रभावित हो सकती है।
क्या हैं दुर्लभ पृथ्वी चुंबक?
दुर्लभ पृथ्वी चुंबक स्थायी चुंबकों का एक प्रकार हैं।जो दुर्लभ पृथ्वी तत्वों जैसे कि नियोडिमियम (Neodymium) और समेरियम-कोबाल्ट (Samarium-Cobalt) के मिश्रधातु से बनाए जाने वाले दुर्लभ पृथ्वी तत्वों से ये बनाए जाते हैं। ये अब तक दुनिया में सबसे मजबूत और स्थायी चुंबक होते हैं और अन्य चुंबकों की तुलना में इनका चुंबकीय क्षेत्र काफी अधिक होता है।
दुर्लभ पृथ्वी चुंबक मुख्य रूप से दो प्रकार के होते हैं- नियोडिमियम-आयरन-बोरॉन (NdFeB) और समेरियम-कोबाल्ट (SmCo)। अपनी अनोखी विशेषताओं के कारण इन मैग्नेट्स का उपयोग ऑटोमोबाइल, एयरोस्पेस और सेमीकंडक्टर उद्योग सहित कई क्षेत्रों में व्यापक तौर पर किया जाता है। इस लिहाज से इसकी आपूर्ति में कमी होने से पूरी उत्पादन चेन ब्रभावित हो सकती है।
इस सेक्टर में कैसे हावी है चीन?
दुनिया भर में चीन दुर्लभ पृथ्वी तत्वों का सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता है। ये वैश्विक दुर्लभ पृथ्वी तत्वों की कुल आपूर्ति का 60% और दुर्लभ पृथ्वी चुंबकों की 90% आपूर्ति की हिस्सेदारी रखता है।
ऐसा नहीं है कि पृथ्वी पर कहीं और ये दुर्लभ तत्व नहीं हैं पर चीन के पास इन्हें निकालने के लिए काफी विकसित और विस्तृत क्षमता मौजूद है। इसलिए उसे इन तत्वों के उत्पादन और आपूर्ति में बढ़त मिलती है।
चीन इस क्षेत्र में इसलिए भी हावी है क्योंकि इसने दुर्लभ पृथ्वी तत्वों को निकालने की कठिन प्रक्रिया में महारत हासिल कर ली है। 1980 के दशक से अब तक चीन लगातार अपनी बेतरीन तकनीक से दुर्लभ पृथ्वी तत्वों को निकालने का काम करता आ रहा है। इसके अलावा, कम दरों पर श्रमिक मिलने और पर्यावरणीय नियामकों में ढील से चीन को कम लागत में अधिक मुनाफा कमाने का मौका मिलजाता है।
बिजनेस टाइकून एलन मस्क ने चीन के दुर्लभ पृथ्वी तत्वों की आपूर्ति पर प्रतिबंध लगाने के फैसले पर कहा,”लोग सोचते हैं कि ‘दुर्लभ’ शब्द जोड़ देने भर से पृथ्वी के ये खनिज भंडार असल में दुर्लभ हैं लोकिन ये झूठ है। ये तत्व हर जगह हैं। लिथियम की तरह ही चीन के पास खनिजों के प्रसंस्करण का भारी उद्योग है, जो कि दूसरे देशों के पास नहीं है।”
China has suspended exports of certain rare earth minerals and magnets to the US and around the world.
China is drafting a new regulatory approach to the minerals to prevent them reaching American companies pic.twitter.com/WX8Uh89gkO
हाल के कुछ वर्षों से, चीन का दुर्लभ पृथ्वी तत्वों के बाजार पर प्रभुत्व कम हो रहा है। 2010 में इसका बाजार हिस्सा 98% था, जो अब घटकर लगभग 70% रह गया है। ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि अन्य देश भी अपने क्षेत्रों में इन तत्वों को निकालने की तकनीक और क्षमता विकसित कर रहे हैं।
स्टैटिस्टा की रिपोर्ट
बढ़ती प्रतिस्पर्धा के बीच अपनी स्थित को मजबूत बनाए रखने के लिहाज से चीन ने 2023 में दुर्लभ पृथ्वी तत्वों को निकालने की तकनीक के निर्यात पर ही प्रतिबंध लगा दिया।
1950 के दशक से ही अमेरिका दुर्लभ पृथ्वी तत्वों के निकालने के लिए नई तकनीक विकसित कर रहा है लेकिन इस प्रक्रिया में रेडियोएक्टिव कचरा निकालने के कारणइसका व्यापक उपयोग नहीं कर पा रहा है।
चीन के प्रतिबंध ने भारतीय ऑटोमोबाइल उद्योग के लिए कैसे खड़ी की चुनौतियाँ
चीन के प्रतिबंध ने वैश्विक स्तर पर कई उद्योगों को प्रभावित किया है। इनमें ऑटोमोबाइल उद्योग भी शामिल है। जापान, दक्षिण कोरिया और यूरोप के कई प्रमुख निर्माता और डिप्लोमैट्स रुकी हुई निर्यात लाइसेंस प्रक्रिया को फिर से तेजी से पूरा करने के लिए चीन के अधिकारियों से मुलाकात की कोशिश कर रहे हैं।
भारत का ऑटोमोबाइल उद्योग दुनिया में तीसरा सबसे बड़ा उद्योग है। हालाँकि ये भी चीन के प्रतिबंध के कारण प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना कर रहा है। बीते दो महीनों से भारत में दुर्लभ पृथ्वी चुंबकों का आयात बंद है। इसके अलावा, लाइसेंस प्रक्रिया के कारण आपूर्ति में भी देरी हो रही है जिसके कारण ऑटोमोबाइल के उत्पादन में परेशानी आ रही है। भारतीय ऑटोमोबाइल निर्माता उत्पादन को जारी रखने के लिए चुनौतियों का सामना कर रहे हैं।
भारत का उभरता हुआ EV सेक्टर चीन के प्रतिबंधों के कारण दुर्लभ पृथ्वी चुम्बकों की कमी से दो -चार हो रहा है। चुंबकों की कमी का सीधा असर इलेक्ट्रिक दोपहिया गाड़ियों के सेक्टर पर इसका सबसे अधिक असर पड़ सकता है। भारत के EV उद्योग में दुर्लभ पृथ्वी चुंबकों की अनुमानित वार्षिक मांग 6,000 से 7,500 टन है। इसके लिए भारत पूरी तरह से चीन पर निर्भर करता है।
इस स्थिति से निपटने के लिए भारत सरकार और ऑटोमोबाइल निर्माता चीनी अधिकारियों से संपर्क कर रहे हैं ताकि रुकी हुई आपूर्ति को एक बार फिर से शुरू करवाया जा सके।
रिपोर्ट्स के अनुसार, सोसाइटी ऑफ इंडिया ऑटोमोबाइल मैन्युफैक्चरर्स (SIAM) और ऑटोमोटिव कंपोनेंट मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (ACMA) के प्रतिनिधि चीन के अधिकारियों से मिलने की योजना बना रहे हैं। भारत सरकार भी डिप्लोमैटिक चैनल्स के जरिए इस मुद्दे का हल निकालने की कोशिश कर रही है।
कॉन्टिनेंटल ऑटोमोटिव, हिताची एस्टेमो, महले इलेक्ट्रिक ड्राइव्स, वारोक इंजीनियरिंग और फ्लैश इलेक्ट्रॉनिक्स समेत 17 भारतीय ऑटोमोबाइल कंपोनेंट निर्माताओं ने पिछले महीने चीन को आयात के लिए अपने आवेदन भेजे थे।
हालाँकि चीनी वाणिज्य मंत्रालय की मंजूरी अब तक न मिलने के कारण आपूर्ति अभी भी ठप पड़ी है। इनमें से नौ आयात आवेदनों को चीनी दूतावास ने मंजूरी दी है।
इसके अलावा चीन के दुर्लभ पृथ्वी चुंबक उद्योग के लिए नए ट्रैकिंग सिस्टम की शुरुआत के कारण आपूर्ति प्रक्रिया में अभी और देरी होने का अनुमान है। इस प्रणाली को पिछले सप्ताह लागू किया गया था। इसके तहत,उत्पादकों को ट्रेडिंग वॉल्यूम और अपने ग्रहकों के नाम समेत अन्य जानकारी ऑनलाइन मुहैया करवानी पड़ेगी।
(मूल रूप से अंग्रेजी में अदिति द्वारा लिखी गई इस खबर का हिंदी अनुवाद रामांशी नेकिया है)
अशोका यूनिवर्सिटी के ट्रस्टी संजीव बिखचंदानी ने संस्थान को “बहुत ज़्यादा सिरदर्द” बताया और प्रोफेसर अली खान महमूदाबाद के राजनीतिक पोस्ट और गिरफ्तारी पर विवाद के बाद इस्तीफा देने पर विचार करने की बात कही है।
उन्होंने जोर देकर कहा कि विश्वविद्यालय किसी व्यक्ति द्वारा व्यक्तिगत रूप से कहे गए राजनीतिक विचारों का समर्थन करने के लिए बाध्य नहीं है। अशोका यूनिवर्सिटी को लेकर उन्होंने कहा कि इसे एक गैर-राजनीतिक विश्वविद्यालय बने रहना चाहिए।
साथी ट्रस्टी के साथ इस्तीफा देना चाहते थे बिखचंदानी
बिखचंदानी ने एक आंतरिक ईमेल में कहा है कि उन्होंने और उनके साथी ट्रस्टी प्रमथ राज सिन्हा और संस्थापक अध्यक्ष आशीष धवन ने अपने पदों से हटने पर गंभीरता से विचार किया है। उनका ये मेल सामने आ गया है।
उन्होंने पूछा, “आप और अन्य पूर्व छात्र आगे आकर कार्यभार क्यों नहीं संभालते? प्रमथ, आशीष और मैंने गंभीरता से इस विकल्प पर चर्चा की है कि क्या हम इससे दूर हो सकते हैं। अशोका बहुत ज्यादा सिरदर्द है। क्या यह प्रयास के लायक है?”
उन्होंने जोर देकर कहा, “फेसबुक या ट्विटर (एक्स) या इंस्टाग्राम पर व्यक्त की गई राजनीतिक राय अकादमिक विद्वता नहीं है। नतीजतन, सोशल मीडिया पर किसी अकादमिक द्वारा व्यक्त की गई राजनीतिक राय के बारे में कोई भी सार्वजनिक आक्रोश अकादमिक स्वतंत्रता पर हमला नहीं है, भले ही उस राय को व्यक्त करने वाला व्यक्ति अकादमिक के रूप में काम करता हो।” उन्होंने सोशल मीडिया में कहा कि वह कोरोना से भी आजकल पीड़ित हैं।
Had been feeling out of sorts for the last three days. Tested positive for Covid last evening. Went into isolation. A Sindhi friend in Mumbai had sent some Lolas. Feeling peckish at 5am I had half a Lola. I could not taste anything. Key learning – you know it is Covid when a…
बिखचंदानी ने कहा, “यदि कोई नियामक या सरकार या कानून प्रवर्तन आपके सोशल मीडिया पोस्ट के लिए आपके पीछे पड़ जाता है, तो यह अकादमिक स्वतंत्रता का उल्लंघन नहीं है। यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उल्लंघन हो सकता है। हालाँकि संविधान और कानून के भीतर ऐसे प्रावधान हैं, जहाँ आप सुरक्षा पा सकते हैं।”
उन्होंने महमूदाबाद पर भी निशाना साधा और टिप्पणी की, “आप एक वयस्क हैं। आप अपने कार्यों और उसके किसी भी परिणाम के लिए जिम्मेदार हैं। अशोका आपकी व्यक्तिगत क्षमता में व्यक्त की गई राजनीतिक राय के लिए आपका समर्थन करने के लिए बाध्य नहीं है। आपने सोशल मीडिया पर पोस्ट करने से पहले अशोका की सहमति नहीं ली, अब आप अशोका से समर्थन की उम्मीद नहीं कर सकते। यह सुनने में भले ही क्रूर लगे, लेकिन आप अपनी पसंद बनाते हैं और परिणाम के साथ जीते हैं।”
अली खान महमूदाबाद हरियाणा के सोनीपत स्थित अशोका यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर और राजनीति शास्त्र विभाग के डायरेक्टर हैं। उन्होने सोशल मीडिया पर पोस्ट करके ऑपरेशन सिंदूर की ब्रीफिंग करने वाली सेना की दो अधिकारियों विंग कमांडर व्योमिका सिंह और कर्नल सोफिया कुरैशी के खिलाफ टिप्पणी की थी। इसकी वजह से उन्हें पिछले महीने गिरफ्तार कर लिया गया था।
अली खान ने सोशल मीडिया पर सरकार पर निशाना साधते हुए कहा था कि महिला अधिकारियों को प्रेस ब्रीफिंग के लिए भेजना दिखावा और ढोंग है। इस बयान से विवाद बढ़ा और हरियाणा महिला आयोग ने उसे नोटिस भेजा।
एक्टिव होना और विश्वविद्यालय एक- दूसरे से अलग है
बिखचंदानी ने कहा, “राजनीतिक रूप से एक्टिव होना और विश्वविद्यालय एक दूसरे से जुड़े हुए नहीं हैं। अशोका यूनिवर्सिटी एक लिबरल आर्ट और साइंस यूनिवर्सिटी है। राजनीतिक कार्यकर्ता बनना या न बनना लोगों का अपना निर्णय है।”
उन्होंने ये भी कहा कि पहले भी उन्होंने अशोका यूनिवर्सिटी में ‘सक्रियता’ को लेकर चिंता जताई थी और हर बार उन्हें यूनिवर्सिटी से जुड़े रहे कर्मचारियों और छात्रों की प्रतिक्रिया का सामना करना पड़ा है। अशोक यूनिवर्सिटी के अंदर और बाहर के छात्र, शिक्षक और कर्मचारी इसमें शामिल हैं।
उन्होंने दावा किया, “यदि आप एक विश्वविद्यालय चला रहे हैं, तो आप ऐसी समस्याओं में फँसते है”। उन्होने कहा “मैं एक स्वाभिमानी ऑनर हूँ, बुरी सोच वाले लोग यह नहीं समझते कि एक विश्वविद्यालय कैसे चलता है? (वे भूल जाते हैं कि वही व्यवसायी उन्हें वेतन दे रहे हैं)।”
अशोका यूनिवर्सिटी के सह संस्थापक ने कहा, ” अशोका यूनिवर्सिटी देश के कानून द्वारा शासित होता है। यह नियामकों और सरकारी अधिकारियों के प्रति जवाबदेह है। यह एक राजनीतिक दल या आंदोलन नहीं है। यह एक शैक्षणिक संस्थान है।”
बिखचंदानी ने एक “नीतिगत मुद्दे” की ओर भी इशारा किया। इस पर अशोका यूनिवर्सिटी की सत्तारूढ़ परिषद को विचार करने की आवश्यकता थी। उन्होंने पूछा, “क्या एक पूर्णकालिक शिक्षाविद भी राजनीतिक करियर बना सकता है? निजी क्षेत्र में हम आम तौर पर उन लोगों से दूर रहते हैं जिन्हें ‘राजनीतिक व्यक्ति’ कहा जाता है। क्या अशोका यूनिवर्सिटी के पास ऐसी नीति नहीं होनी चाहिए?”
हालाँकि सुप्रीम कोर्ट ने महमूदाबाद को अंतरिम जमानत दे दी, लेकिन महमूदाबाद की टिप्पणियों की बिखचंदानी ने भी निंदा की। उनकी भाषा को असम्मानजनक बताया। कोर्ट ने भी भाषा की मर्यादा को रेखांकित किया था। अदालत ने जोर देकर कहा था कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का इस्तेमाल इस तरह नहीं हो सकता। इसे लोकप्रियता के लिए नहीं बल्कि जवाबदेही के साथ इस्तेमाल करने की जरूरत है।
महमूदाबाद ने कहा था विंग कमांड व्योमिका सिंह और कर्नल सोफिया कुरैशी द्वारा सशस्त्र बलों का प्रतिनिधित्व “दिखावा और पाखंड” है। महमूदाबाद ने कहा, “कर्नल सोफिया को सरकार मात्र मीडिया में दिखावा करने के लिए आगे लेकर आ रही है। वैसे तो सरकार मुस्लिम लोगों के खिलाफ उनके धर्म के खिलाफ काम करती रहती है और अब कर्नल सोफिया कुरैशी को आगे कर रही है। प्रो. अली खान द्वारा यह भी कहा गया कि दोनों देशों में कुछ पागल फौजी लोगों के कारण ही इस तरह सीमा पर तनाव बना है। मनमानी से, अप्रत्याशित तरीके से और बेमतलब ही लोगों को मौत के मुंह में फेंका जा रहा है।”
उन्होंने अपनी टिप्पणियों को उचित ठहराते हुए कहा कि उनके बयान को गलत तरीके से समझा गया है और इसका उद्देश्य महिलाओं के प्रति विद्वेष फैलाना नहीं है।
महमूदाबाद की गिरफ्तारी, सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणियों और अब बिखचंदानी के पत्र ने विश्वविद्यालय में वामपंथी सक्रियता को सुर्खियों में ला दिया है। हालाँकि यह लंबे समय से वामपंथी राजनीति का केंद्र रहा है। इजरायल विरोधी सक्रियता, ब्राह्मण विरोध से लेकर चुनाव में हेराफेरी के झूठे दावों तक, संस्थान के छात्रों और शिक्षकों ने अपने भ्रामक आख्यान को बढ़ावा देने में कोई कसर नहीं छोड़ी है।
मई 2024 में, अशोक विश्वविद्यालय के छात्रों ने अपने दीक्षांत समारोह में फिलिस्तीन समर्थक तख्तियाँ दिखाईं। इस कार्यक्रम को कैप्चर करने वाले एक वीडियो ने सोशल मीडिया पर काफी सुर्खियाँ बटोरी। इसमें डिग्री प्रदान करने के लिए तैयार छात्रों को उनके सिर के ऊपर “फ़्री फिलिस्तीन” और “नरसंहार रोकें” के नारे लगाने वाले पोस्टर पकड़े हुए दिखाया गया था। महत्वपूर्ण बात यह है कि अशोका विश्वविद्यालय छात्र संघ (एयूएसजी) इजरायल के तेल अवीव विश्वविद्यालय के साथ संबंध विच्छेद की वकालत कर रही थी।
मार्च 2024 में, अशोका विश्वविद्यालय के छात्रों पर विश्वविद्यालय परिसर में हिंदू विरोधी नारे लगाने का आरोप लगा था। खास तौर पर “ब्राह्मण-बनियावाद मुर्दाबाद” के नारे। इन छात्रों के वीडियो सोशल मीडिया पर खूब वायरल हुए। ब्राह्मण और बनिया समुदायों को अपमानित करने के अलावा, उन्होंने “जय भीम-जय मीम” और “जय सावित्री-जय फातिमा” जैसे नारे भी लगाए। उन्होंने अशोका में जाति जनगणना और आरक्षण की माँग की।
फरवरी 2024 में, AUSG ने गाजा में इजरायल की सैन्य कार्रवाइयों की निंदा करते हुए एक बयान जारी किया और जोर देकर कहा कि गाजा में हो रहे “नरसंहार” को रोका जाना चाहिए। सोशल मीडिया पोस्ट में यहूदी राज्य के भीतर 7 अक्टूबर को हमास आतंकवादियों द्वारा किए गए भयानक आतंकी हमले को “7 अक्टूबर 2023 को होने वाली घटनाओं” के रूप में वर्णित किया गया। जैसा कि अनुमान था, 1,300 इजरायली और विदेशी नागरिकों की हत्या, महिलाओं के बलात्कार या गाजा में बंधकों को ले जाने का कोई संदर्भ नहीं था। हमास के सभी अत्याचारों को जानबूझकर अनदेखा कर दिया गया।
सोशल मीडिया पर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) पर चुनावी हेराफेरी करने का आरोप लगाने वाले इस लेख ने व्यापक ध्यान आकर्षित किया। इसे प्रोफेसर सब्यसाची दास ने प्रकाशित किया था। अध्ययन में कई त्रुटियां थीं और शोधपत्र की जाँच के मद्देनजर उन्होंने अपने पद से इस्तीफा देने का फैसला किया। AUSG ने शोधपत्र का समर्थन किया और आरोप लगाया कि प्रोफेसरों द्वारा किया गया शोध “अत्याधुनिक” है।
नवंबर 2021 में प्रोफेसर नीलांजन इरकर ने गलत दावा किया कि राष्ट्रपति भवन में स्थित नेताजी सुभाष चंद्र बोस के चित्र में बंगाली अभिनेता प्रसनजीत चटर्जी को दर्शाया गया है। उन्होंने भाजपा की आलोचना के नाम पर भगवान राम का मजाक उड़ाने की कोशिश की। विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान के सहायक प्रोफेसर के रूप में कार्यरत इसरार ने अब डिलीट हो चुके ट्वीट में कहा, “बिलकुल आश्चर्यजनक! यह नेताजी सुभाष चंद्र बोस नहीं हैं। यह प्रसिद्ध बंगाली अभिनेता प्रसेनजीत चटर्जी की एक फिल्म में नेताजी का किरदार निभाते हुए तस्वीर है।”
विश्वविद्यालय के ट्रैक रिकॉर्ड को देखते हुए कहा जा सकता है कि महमूदाबाद की हालिया कार्रवाई और बिखचंदानी की आलोचना अप्रत्याशित नहीं है।
कानून की छात्रा और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर शर्मिष्ठा पनोली को कलकत्ता हाई कोर्ट ने गुरुवार (5 जून, 2025) को अंतरिम जमानत दे दी है। यह जमानत उन्हें ₹10 हजार के निजी मुचलके (बॉन्ड) पर मिली है। हाई कोर्ट ने शर्मिष्ठा के विदेश यात्रा करने पर भी रोक लगा दी है। गौरतलब है कि 3 मई 2025 को हाई कोर्ट ने उनकी जमानत अर्जी खारिज कर दी थी और कहा था कि इससे ‘आसमान नहीं टूट पड़ेगा।’
Kolkata, West Bengal: In the Sharmishta Panoli case, the Calcutta High Court granted her interim bail on a personal bond of Rs. 10,000. She has been prohibited from traveling abroad until further notice. pic.twitter.com/tZ8qpNVgX6
शर्मिष्ठा पनोली को पश्चिम बंगाल पुलिस ने हरियाणा के गुरुग्राम से 30 मई 2025 को गिरफ्तार किया था। उन पर ‘ऑपरेशन सिंदूर’ से जुड़े एक वीडियो में अपमानजनक टिप्पणी करने का आरोप है।
इस मामले में वजाहत खान ने शिकायत दर्ज कराई थी। गिरफ्तारी के बाद, शर्मिष्ठा को 13 जून 2025 तक न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया था।
पिता का बयान
शर्मिष्ठा पनोली के पिता पृथ्वीराज पनोली ने गिरफ्तारी के बाद एक बड़ा बयान दिया है। पिता पृथ्वीराज ने दावा किया है कि कोलकाता पुलिस ने उनके परिवार को लेकर गलत दावे किए हैं। जानकारी के अनुसार, पृथ्वीराज ने कहा कि जिस दिन पुलिस कोर्ट से गिरफ्तारी वारंट लेने गई, मैं खुद कोलकाता पुलिस के साथ बैठा था। इसके बावजूद उन्होंने दावा किया कि हमारा परिवार फरार है। यह बिल्कुल गलत है।
पृथ्वीराज पनोली का कहना है कि उनकी बेटी को ‘रेप और मर्डर की धमकियाँ’ मिल रही थीं। उन्होंने बेटी को ढूँढने और सुरक्षा के लिए कोलकाता पुलिस से संपर्क भी किया था, लेकिन इसके बजाय पुलिस ने उन्हें और उनके परिवार को फरार घोषित कर दिया था।
NHRC का हस्तक्षेप
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने इस मामले में हस्तक्षेप किया है। NHRC ने पश्चिम बंगाल पुलिस महानिदेशक को निर्देश दिया है कि शर्मिष्ठा पनोली की सुरक्षा का पूरा ध्यान रखा जाए। NHRC के सदस्य प्रियंक कानूनगो ने बताया कि शर्मिष्ठा को गिरफ्तार होने के बाद से ‘बलात्कार और जान से मारने की कई धमकियाँ’ मिल रही हैं, जिसके बाद यह कदम उठाया गया है।
NHRC को एक शिकायत भी मिली है, जिसमें आरोप लगाया गया है कि पश्चिम बंगाल पुलिस ने गुरुग्राम से शर्मिष्ठा को गिरफ्तार करते समय सही कानूनी प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया। NHRC ने पश्चिम बंगाल के मुख्य सचिव और DGP से शर्मिष्ठा की सुरक्षा सुनिश्चित करने को कहा है। साथ ही, हरियाणा सरकार से भी यह पूछा गया है कि क्या गिरफ्तारी के दौरान सभी नियम-कानूनों का पालन किया गया था। इन जवाबों के आधार पर ही NHRC आगे की कार्रवाई तय करेगा।
पनोली के वकील का तर्क
पनोली के वकील डीपी सिंह ने तर्क दिया कि उनकी गिरफ्तारी ‘मौलिक अधिकारों का उल्लंघन’ थी क्योंकि उन्हें नोटिस नहीं दिया गया था। वकील ने कहा कि पनोली ने अगले ही दिन अपना आपत्तिजनक वीडियो हटा दिया था और माफी माँग ली थी। डीपी सिंह ने यह भी कहा कि ‘ईशनिंदा देश के कानून में नहीं है’ और उनकी मुवक्किल सिर्फ एक पाकिस्तानी लड़की के साथ सोशल मीडिया पर बातचीत का जवाब दे रही थी।
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद, कोर्ट ने पाया कि पनोली का पता सार्वजनिक हो गया था और उन्हें धमकियाँ मिल रही थीं। कोर्ट ने माना कि शर्मिष्ठा पनोली की हिरासत में पूछताछ की कोई आवश्यकता नहीं है, जिसके बाद उन्हें अंतरिम जमानत दी गई। कोर्ट ने राज्य पुलिस को पनोली की सुरक्षा सुनिश्चित करने का भी आदेश दिया।
उत्तर प्रदेश के बागपत में 2 दिन पहले पाकिस्तान के पूर्व तानाशाह परवेज मुशर्रफ की जमीन सरकार ने नीलाम कर दी। कुछ दिन पहले उत्तराखंड में राजा महमूदाबाद की संपत्ति को सरकार ने पार्किंग प्लेस में बदल दिया, तो बीते साल दिसंबर में पाकिस्तान के पहले प्रधानमंत्री लियाकत अली खान की संपत्ति (जिसमें 1918 में बनी मस्जिद भी शामिल थी) को कोर्ट के आदेश के बाद सरकार ने अपने कब्जे में ले लिया।
इस जमीन को लेकर दावा किया गया था कि देश की आजादी से पहले ही इसे वक्फ कर दिया गया था, जो दावा फर्जी निकला। ऐसे में मस्जिद होने और वक्फ के दावे के बावजूद ये जमीन सरकार को मिली, क्योंकि ये जमीन एनिमी प्रॉपर्टी (शत्रु संपत्ति) के दायरे में आती थी।
तीनों मामलों को देखें तो इनमें एक लिंक कॉमन था। वो था शत्रु संपत्ति का होना और अब ऐसी संपत्तियों को भारत सरकार अपने हितों के मुताबिक इस्तेमाल कर सकती है। ऐसा इसलिए हो पाया, क्योंकि साल 2017 में मोदी सरकार एक कानून लाई थी, जिसका नाम शत्रु संपत्ति (संशोधन और सत्यापन) विधेयक 2016 था। इस कानून के मुताबिक, सिर्फ दुश्मन देश में गया व्यक्ति ही नहीं, दुश्मन देश गए व्यक्ति के वारिस भी दुश्मन की श्रेणी में आएँगे और वो दुश्मन संपत्ति यानी शत्रु संपत्ति पर कोई दावा नहीं कर पाएँगे।
मोदी सरकार के इस कदम से देश भर की 13 हजार से अधिक संपत्तियाँ, जिनकी कीमत 1 लाख करोड़ रुपए से अधिक है, वो अब सरकार की होंगी। इस बारे में आगे विस्तार से बताएँगे… फिलहाल ये बता दें कि मोदी सरकार जो वक्फ संसोधन कानून लेकर आई है, जिसमें भी एविक्टी (शत्रु संपत्ति) पर वक्फ के दावों को नकार दिया गया है। इसका असर दूरगामी है।
मोदी सरकार ने दोनों कानून लाकर वो काम किया है, जो कॉन्ग्रेस की पूर्ववर्ती सरकारें तमाम वजहों से करने से बचती रही हैं। कॉन्ग्रेस का जिक्र आया ही है और शत्रु संपत्ति के मामले में, तो एक अहम जानकारी आपको जो होनी चाहिए- वो दे देते हैं। लेकिन उससे पहले बताते हैं कि आखिर शत्रु संपत्ति है क्या और कैसे मोदी सरकार वो कानून लेकर आई, जिसे न लाकर कॉन्ग्रेस नीत यूपीए सरकार ने हजारों करोड़ की संपत्ति देश के दुश्मनों के वारिसों दे दी थी।
शत्रु संपत्ति क्या है?
शत्रु संपत्ति वो संपत्तियाँ हैं, जो उन लोगों के पास थीं, जिन्होंने 1947 के भारत-पाकिस्तान विभाजन के दौरान या 1962 (चीन के साथ युद्ध), 1965 और 1971 (पाकिस्तान के साथ युद्ध) के बाद भारत छोड़कर पाकिस्तान या चीन की नागरिकता ले ली। भारत सरकार ने इन्हें ‘शत्रु’ माना, क्योंकि ये लोग उन देशों के साथ चले गए, जो भारत के खिलाफ युद्ध में थे। ऐसी संपत्तियों को जब्त करने का मकसद था कि इनका इस्तेमाल देश की सुरक्षा और विकास के लिए हो।
शत्रु संपत्ति अधिनियम 1968 के तहत इन संपत्तियों की देखरेख के लिए कस्टोडियन ऑफ एनिमी प्रॉपर्टी फॉर इंडिया (CEPI) बनाया गया, जो गृह मंत्रालय के अधीन काम करता है। देश भर में ऐसी 13,252 संपत्तियाँ हैं, जिनमें से 12,485 पाकिस्तानी नागरिकों और 126 चीनी नागरिकों की हैं। इनकी कुल कीमत 1.04 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा है। इसमें भी सबसे ज्यादा संपत्तियाँ उत्तर प्रदेश (6,255) और पश्चिम बंगाल (4,088) में हैं।
उदाहरण के लिए, मुजफ्फरनगर में पाकिस्तान के पहले प्रधानमंत्री लियाकत अली खान की आठ बिसवा जमीन थी, जिस पर मस्जिद और दुकानें बनी थीं। जाँच में पाया गया कि ये शत्रु संपत्ति थी। इसी तरह भोपाल में नवाब हमीदुल्लाह खान की बेटी आबिदा सुल्तान (जो 1950 में पाकिस्तान चली गई थीं) की संपत्तियाँ- जैसे फ्लैग स्टाफ हाउस और नूर-उस-सबाह पैलेस (कीमत 15,000 करोड़ रुपये से ज्यादा) भी शत्रु संपत्ति घोषित हुईं। परवेज मुशर्रफ की बागपत में 13 बीघा जमीन को 2024 में 1.38 करोड़ रुपये में नीलाम किया गया। ये सारी संपत्तियाँ भारत सरकार के कब्जे में हैं, ताकि इनका दुरुपयोग न हो।
शत्रु संपत्ति और वक्फ का टकराव
अब सवाल ये है कि शत्रु संपत्ति और वक्फ संपत्ति का आपस में क्या झगड़ा है? दरअसल, कई बार ऐसा हुआ कि जो संपत्तियाँ शत्रु संपत्ति थीं, उन्हें वक्फ बोर्ड ने अपने कब्जे में लेने की कोशिश की। इसका सबसे बड़ा कारण 1984 और 1995 के वक्फ कानूनों में कुछ खामियाँ थीं।
1984 में इंदिरा गाँधी सरकार ने वक्फ कानून में एक संशोधन किया, जिसके तहत ‘इवैक्यूई प्रॉपर्टी’ (यानी वो संपत्तियाँ जो विभाजन के दौरान छोड़ी गई थीं) को वक्फ घोषित करने की छूट दी गई। अगर कोई संपत्ति पहले वक्फ थी, लेकिन बाद में शत्रु संपत्ति बन गई, तो उसे फिर से वक्फ में बदला जा सकता था। इसका मतलब ये हुआ कि जो संपत्तियाँ देश छोड़कर गए लोगों की थीं, उन्हें वक्फ बोर्ड अपने नाम कर सकता था।
मोदी सरकार ने साल 2017 में कानून में किया संशोधन: 2017 में शत्रु संपत्ति (संशोधन और सत्यापन) अधिनियम लाया गया, जिसने इस कानून को और सख्त किया। इस संशोधन ने कई अहम बदलाव किए-
शत्रु की परिभाषा का विस्तार: अब शत्रु के वारिस, भले ही वे भारत के नागरिक हों, इन संपत्तियों पर दावा नहीं कर सकते।
कस्टोडियन का मालिकाना हक: शत्रु संपत्ति का मालिक अब कस्टोडियन (भारत सरकार) है।
सिविल कोर्ट की भूमिका खत्म: शत्रु संपत्ति से जुड़े मामले अब सिविल कोर्ट में नहीं, बल्कि खास ट्रिब्यूनल में सुने जाएँगे।
बिक्री की अनुमति: सरकार अब ऐसी संपत्तियों को बेच सकती है, और इसका पैसा देश के खजाने (Consolidated Fund of India) में जाएगा।
राजा महमूदाबाद की हजारों करोड़ की संपत्तियों का मामला
राजा महमूदाबाद, यानी मोहम्मद अमीर अहमद खान एक प्रमुख शिया मुस्लिम परिवार से थे। महमूदाबाद एस्टेट के तहत उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में विशाल साम्राज्य था। उनके अब्बू महाराजा सर मोहम्मद अली मोहम्मद खान ने 1931 में अपनी मृत्यु के बाद विशाल संपत्ति छोड़ी, जिसमें लखनऊ का बटलर पैलेस, हजरतगंज में महमूदाबाद मेंशन, नैनिताल में मेट्रोपोल होटल और सीतापुर में 956 एकड़ जमीन, एक चीनी मिल, पॉलिटेक्निक संस्थान और डिग्री कॉलेज शामिल थे।
मोहम्मद अमीर अहमद खान 1945 में इराक चले गए और 1957 में पाकिस्तानी नागरिकता ले ली। वे मुस्लिम लीग के कोषाध्यक्ष और मोहम्मद अली जिन्ना के करीबी सहयोगी थे, जिन्होंने पाकिस्तान आंदोलन को वित्तीय और राजनीतिक समर्थन दिया। खास बात ये है कि अमीर अहमद खान ने अपनी सारी संपत्तियाँ पाकिस्तान को दान दे दी थी, जो उनके पास थी। लेकिन भारत में उनकी संपत्तियाँ छूटी हुई थी। ऐसे में भारत सरकार ने उनकी संपत्तियों को शत्रु संपत्ति अधिनियम 1968 के तहत जब्त कर लिया।
उनके बेटे मोहम्मद अमीर मोहम्मद खान (जिन्हें सुलैमान मियाँ भी कहा जाता था) भारतीय नागरिक थे और उन्होंने 1974 से अपनी पैतृक संपत्तियों को वापस पाने के लिए कानूनी लड़ाई शुरू की। यह लड़ाई 37 साल तक चली, जिसमें जिला अदालत, बॉम्बे हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट शामिल थे। साल 2005 में सुप्रीम कोर्ट ने एक बड़ा फैसला दिया, जिसमें कहा गया कि सुलैमान मियाँ भारतीय नागरिक हैं और ‘शत्रु’ नहीं हैं। कोर्ट ने उनकी सभी संपत्तियों को वापस करने का आदेश दिया, जिनकी कीमत उस समय 20,000 से 50,000 करोड़ रुपये बताई गई। इनमें लखनऊ का बटलर पैलेस, हजरतगंज की प्राइम रियल एस्टेट, महमूदाबाद का किला और सीतापुर की विशाल जमीनें शामिल थीं।
संपत्तियाँ लौटाने के खेल में कॉन्ग्रेस सरकार की भूमिका
साल 2005 में जब सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया, तब केंद्र में मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्रित्व में कॉन्ग्रेस नीत यूपीए सरकार थी। इस फैसले ने सरकार को असहज स्थिति में डाल दिया, क्योंकि इतनी विशाल संपत्तियाँ एक ऐसे परिवार को लौटाना, जिसके अब्बा ने पाकिस्तान आंदोलन का समर्थन किया था, राष्ट्रीय सुरक्षा और जनभावना के लिए संवेदनशील मुद्दा था। लेकिन यूपीए सरकार ने इस फैसले को प्रभावी ढंग से लागू करने की दिशा में कदम उठाए। लखनऊ जिला प्रशासन ने 21 दिसंबर 2005 को बटलर पैलेस की चाबी और छह अन्य संपत्तियों के दस्तावेज सुलैमान मियाँ को सौंप दिए।
कॉन्ग्रेस सरकार की इस कार्रवाई की कई वजहें थीं। जिनमें…
सुप्रीम कोर्ट का फैसला लागू करना कानूनी रूप से जरूरी था।
सुलैमान मियाँ खुद 1985 और 1989 में कॉन्ग्रेस के टिकट पर महमूदाबाद से विधायक रह चुके थे, जिससे उनका पार्टी के साथ गहरा रिश्ता था।
उस समय कॉन्ग्रेस की राजनीति में मुस्लिम वोट बैंक को मजबूत करने की रणनीति थी।
कई लोग मानते हैं कि कॉन्ग्रेस ने इस मामले में ढील बरती और सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में मजबूती से अपना पक्ष नहीं रखा, जिसके कारण इतनी बड़ी संपत्तियाँ राजा महमूदाबाद को लौटाने का रास्ता साफ हुआ।
हालाँकि, इस फैसले के बाद भारी विवाद हुआ। कई राजनीतिक दलों खासकर बीजेपी ने इसे राष्ट्रीय हितों के खिलाफ बताया। इसके जवाब में यूपीए सरकार ने 2010 में एक आकस्मिक अध्यादेश (Ordinance) लाने की कोशिश की, जिसमें कहा गया कि शत्रु संपत्तियों पर केवल सरकार का अधिकार होगा। लेकिन यह अध्यादेश संसद में विधेयक के रूप में पेश नहीं हो सका, क्योंकि कॉन्ग्रेस के भीतर और बाहर से दबाव था। इस दबाव में सलमान खुर्शीद की अहम भूमिका थी, जिसने सुप्रीम कोर्ट वाले केस में राजा महमूदाबाद की पैरवी की थी और अगले ही साल वो यूपीए की केंद्र सरकार में कानून मंत्री जैसी हैसियत में था।
सलमान खुर्शीद की पर्दे के पीछे की भूमिका
वरिष्ठ वकील और कॉन्ग्रेस नेता सलमान खुर्शीद उस समय केंद्रीय अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री थे। वे राजा महमूदाबाद के वकील के तौर पर सुप्रीम कोर्ट में उनके पक्ष में लड़े। इस केस में उनके सामने पी. चिदंबरम, अरुण जेटली और राम जेठमलानी जैसे दिग्गज वकील थे, जो सरकार की तरफ से थे। खुर्शीद ने तर्क दिया कि सुलैमान मियाँ भारतीय नागरिक हैं और उनके पिता की गतिविधियों के आधार पर उन्हें ‘शत्रु’ नहीं माना जा सकता। उनकी दलीलों ने 2005 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले में अहम भूमिका निभाई।
लेकिन सलमान खुर्शीद की भूमिका सिर्फ कोर्टरूम तक सीमित नहीं थी। 2010 में जब यूपीए सरकार ने शत्रु संपत्ति अधिनियम को संशोधित करने के लिए अध्यादेश लाने की कोशिश की, तो खुर्शीद ने इसका विरोध किया। उन्होंने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मुलाकात कर एक मुस्लिम सांसदों के समूह का नेतृत्व किया, जिसमें लालू प्रसाद यादव, मुलायम सिंह यादव और मोहम्मद अदीब जैसे नेता शामिल थे। इस समूह ने तर्क दिया कि शत्रु संपत्ति कानून में संशोधन ‘मुस्लिम विरोधी’ है और इससे भारतीय मुस्लिम समुदाय की भावनाएँ आहत होंगी।
खुर्शीद की अगुआई में इस दबाव के चलते अध्यादेश को संसद में विधेयक के रूप में पेश नहीं किया गया। इसके अलावा अध्यादेश में एक प्रावधान था कि शत्रु संपत्ति के वारिस को 120 दिनों के भीतर अपनी भारतीय नागरिकता साबित करनी होगी। लेकिन जब विधेयक तैयार हुआ, तो इस प्रावधान को हटा दिया गया, जिससे शत्रु संपत्तियों पर दावे आसान हो गए। कई विश्लेषकों का मानना है कि खुर्शीद ने अपनी कानूनी और राजनीतिक पहुँच का इस्तेमाल कर राजा महमूदाबाद के पक्ष में माहौल बनाया और कॉन्ग्रेस सरकार को इस मामले में नरम रुख अपनाने के लिए मजबूर किया।
इसके पीछे की वजहें थीं, जिसमें…
सलमान खुर्शीद का कॉन्ग्रेस में मजबूत प्रभाव और उनकी मुस्लिम समुदाय के बीच लोकप्रियता।
राजा महमूदाबाद का कॉन्ग्रेस से पुराना रिश्ता, क्योंकि सुलैमान मियाँ दो बार कॉन्ग्रेस विधायक रह चुके थे।
यूपीए सरकार की वह रणनीति, जिसमें वह मुस्लिम वोट बैंक को खुश रखना चाहती थी।
इस पूरे मामले में खुर्शीद की भूमिका को साफ तौर पर ‘वोट बैंक की राजनीति’ से जोड़कर देखा जा सकता है, क्योंकि उन्होंने इसे मुस्लिम समुदाय के हितों से जोड़ा, भले ही इसका राष्ट्रीय सुरक्षा पर असर पड़ता।
मोदी सरकार का वक्फ (संशोधन) विधेयक 2024, शत्रु संपत्तियों को वक्फ बनने से रोकना
मोदी सरकार ने वक्फ (संशोधन) विधेयक 2024 में शत्रु संपत्तियों को वक्फ बनने से रोकने के लिए कई सख्त कदम उठाए। पुराने वक्फ अधिनियम 1995 में कुछ खामियाँ थीं, जिनके चलते वक्फ बोर्ड मनमाने तरीके से संपत्तियों को वक्फ घोषित कर सकता था। उदाहरण के लिए, धारा 40 के तहत बोर्ड बिना ठोस सबूत के किसी भी संपत्ति को वक्फ बता सकता था और इसे केवल वक्फ ट्रिब्यूनल में चुनौती दी जा सकती थी। इससे कई शत्रु संपत्तियाँ जैसे मुजफ्फरनगर में लियाकत अली खान की जमीन, वक्फ के दावे में फँस गई थीं।
वक्फ (संशोधन) विधेयक 2024 ने इन खामियों को दूर किया और इन अहम प्रावधानों के जरिए शत्रु संपत्तियों को वक्फ बनने से रोका..
धारा 40 का खात्मा: पुराने कानून में धारा 40 वक्फ बोर्ड को अनियंत्रित शक्ति देती थी। अब इसे हटा दिया गया है, जिससे बोर्ड बिना दस्तावेजी सबूत के किसी संपत्ति को वक्फ नहीं बता सकता। इससे शत्रु संपत्तियों पर वक्फ का दावा करना लगभग असंभव हो गया है। उदाहरण के लिए – भोपाल में नवाब की संपत्तियाँ जो शत्रु संपत्ति हैं, अब वक्फ नहीं बन सकतीं।
केंद्रीय वक्फ संपत्ति पोर्टल: इस विधेयक ने एक केंद्रीय पोर्टल की व्यवस्था की है, जहाँ सभी वक्फ संपत्तियों का रिकॉर्ड पारदर्शी तरीके से रखा जाएगा। इससे केवल वैध दस्तावेजों वाली संपत्तियाँ ही वक्फ मानी जाएँगी। शत्रु संपत्तियों जैसे लियाकत अली खान की जमीन अब वक्फ के नाम पर कब्जा नहीं किया जा सकेगा।
शत्रु संपत्ति को वक्फ में बदलने पर रोक: पुराने कानून की धारा 108 और 108A जो शत्रु संपत्तियों को वक्फ में बदलने की छूट देती थीं, अब खत्म कर दी गई हैं। इससे यह सुनिश्चित हुआ है कि कोई भी शत्रु संपत्ति वक्फ नहीं बन सकती। उदाहरण के लिए -विजयपुरा (कर्नाटक) में 123 एकड़ जमीन पर वक्फ बोर्ड का दावा खारिज हुआ, क्योंकि वह शत्रु संपत्ति थी।
जिला कलेक्टर की जाँच: अब जिला कलेक्टर को वक्फ संपत्तियों की जाँच का अधिकार है। अगर कोई संपत्ति शत्रु संपत्ति निकलती है, तो कलेक्टर उसे वक्फ घोषित होने से रोक सकता है। यह प्रावधान वक्फ बोर्ड की मनमानी को रोकता है।
मुतवल्ली की जवाबदेही: विधेयक में मुतवल्ली (वक्फ संपत्ति के प्रबंधक) की जवाबदेही बढ़ाई गई है। अगर कोई मुतवल्ली रिकॉर्ड नहीं रखता या संपत्ति का दुरुपयोग करता है, तो उसे हटाया जा सकता है। इससे शत्रु संपत्तियों को गलत तरीके से वक्फ बताने की कोशिशें रुकेंगी।
मोदी सरकार ये प्रावधान न करती तो क्या होता?
अगर वक्फ (संशोधन) विधेयक 2024 में ये प्रावधान न किए जाते तो शत्रु संपत्तियाँ वक्फ बोर्ड के कब्जे में जा सकती थीं। उदाहरण के लिए – महमूदाबाद की संपत्तियाँ, जिनकी कीमत 50,000 करोड़ रुपये से ज्यादा थी, वक्फ के नाम पर जा सकती थीं। इससे न सिर्फ आर्थिक नुकसान होता, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा को भी खतरा हो सकता था, क्योंकि ऐसी संपत्तियों का दुरुपयोग देश के खिलाफ हो सकता था। साथ ही वक्फ बोर्ड की अनियंत्रित शक्तियाँ और बढ़ जातीं, जिससे आम लोगों की संपत्तियों पर भी गलत दावे हो सकते थे। जैसे, विजयपुरा में 123 एकड़ जमीन और मुनंबम (केरल) में कई संपत्तियों पर वक्फ बोर्ड ने दावे किए थे, जो शत्रु संपत्तियाँ थीं।
कॉन्ग्रेस नीत यूपीए सरकार ने 2005 में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद राजा महमूदाबाद को हजारों करोड़ रुपये की संपत्तियाँ लौटाने में अहम भूमिका निभाई। इस प्रक्रिया में सलमान खुर्शीद की भूमिका निर्णायक थी, जिन्होंने न सिर्फ कोर्ट में सुलैमान मियाँ का पक्ष मजबूती से रखा, बल्कि 2010 में अध्यादेश को कमजोर करने के लिए मुस्लिम सांसदों का नेतृत्व कर सरकार पर दबाव बनाया। लेकिन वक्फ (संशोधन) विधेयक 2024 और शत्रु संपत्ति (संशोधन) अधिनियम 2017 ने ऐसी संपत्तियों को वक्फ बनने से रोकने के लिए सख्त कदम उठाए।
मोदी सरकार ने राजा महमूदाबाद की संपत्तियों को वापस करने से इनकार कर दिया है। ये मामला कोर्ट में लंबित है और अब मौजूदा कानूनों के तहत इनका वापस राजा महमूदाबाद के वारिसों तक पहुँचना असंभव दिखता है। ऐसे में साफ है कि मोदी सरकार के लाए इन कानूनों ने न सिर्फ वक्फ बोर्ड की मनमानी पर लगाम लगाई, बल्कि यह भी सुनिश्चित किया कि शत्रु संपत्तियाँ देश के हित में रहें। मोदी सरकार का यह कदम न सिर्फ आर्थिक और कानूनी पारदर्शिता को बढ़ाते हैं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा को भी मजबूत करते हैं।
यूपी पुलिस की एक इंस्पेक्टर नरगिस खान जो कभी मेरठ में महिला थाना प्रभारी थीं, आजकल अपनी ढेर सारी संपत्ति और पुराने विवादों को लेकर खूब चर्चा में हैं। एंटी करप्शन विभाग की जाँच में पता चला है कि उनकी और पति सुरेश कुमार यादव की संपत्ति उनकी कमाई से दोगुनी है, और ये सब करोड़ों में है। नरगिस खान का नाम पहले भी कई बड़े विवादों से जुड़ा रहा है। नरगिस को एक नाबालिग बच्ची को गलत तरीके से सौंपने के मामले में निलंबित भी किया जा चुका है।
‘सपा’ से कनेक्शन
नरगिस खान का पुलिस महकमे में हमेशा से अच्छा-खासा दबदबा रहा है। मेरठ में 10 साल पहले जब वो महिला थाना प्रभारी थीं, तब की बातें आज भी पुलिसकर्मी बताते हैं। नरगिस ने एक बार नाबालिग बच्ची को गलत तरीके से किसी को सौंपा था, जिसके बाद DIG लक्ष्मी सिंह ने नरगिस को सस्पेंड कर दिया था।
यूपी में जब समाजवादी पार्टी की सरकार थी, उस दौरान इंस्पेक्टर नरगिस खान की तूती बोलती थी। नरगिस ने कई बार अपने पति सुरेश कुमार यादव को सपा नेता शिवपाल यादव का OSD (ऑफिसर ऑन स्पेशल ड्यूटी) बताकर भी अफसरों और नेताओं पर रौब जमाया है।
नरगिस खान के घर शिवपाल यादव आया-जाया करते है, जिसके बाद उनका रुतबा और अधिक बढ़ गया था। नरगिस के पति सुरेश कुमार यादव खुद एक शराब कारोबारी हैं और मेरठ में उनका एक ‘नंदिनी बार’ भी है।
सपा सरकार के कार्यकाल में नरगिस खान कई मुख्य थानों की प्रभारी भी रही हैं। नरगिस ने मेरठ और आसपास के जिलों में करीब 23 सालों तक काम किया। नरगिस की तैनाती और काम करने का तरीका पहले भी सवालों के घेरे में रहा है।
महँगी गाड़ियों का शौक
एंटी करप्शन विभाग के मुताबिक, नरगिस खान को महँगी गाड़ियों का बहुत शौक है। नरगिस के पास BMW, मर्सिडीज, रेंज रोवर और थार जैसी गाड़ियाँ मौजूद हैं, जिनकी कुल कीमत करीब ₹3 करोड़ बताई जा रही है।
नरगिस के पति के पास भी 3 पेट्रोल और डीजल टैंकर के साथ 7 मोबाइल टैंकर हैं, जिनकी कीमत भी करीब ₹3 करोड़ बताई जा रही है।
पति की हालिया गिरफ्तारी
नरगिस खान और उनके पति सुरेश पहले भी विवादों में रहे हैं। साल 2021 में उन्हें लखनऊ से गिरफ्तार किया गया था। उन पर गाजियाबाद के कविनगर थाने में डिप्टी लेबर कमिश्नर कार्यालय से करोड़ों रुपये के घोटाले का आरोप था। इसके अलावा भी पति-पत्नी पर कई आरोप लगे और पुलिस ने उनके खिलाफ मुकदमे दर्ज किए।
हाल ही में, नरगिस के पति सुरेश को एक भाई की हत्या के मामले में कानपुर पुलिस ने गिरफ्तार किया था, जिसकी पैरवी खुद नरगिस खान कर रही थीं। शिकायतकर्ता उमा ने बताया है कि नरगिस खान 1990 बैच की दरोगा रही हैं और 1994-95 में बुलंदशहर में पोस्टिंग के दौरान वे सुरेश के संपर्क में आई थीं, जिसके बाद दोनों ने शादी कर ली।
करोड़ों की संपत्ति का भंड़ाफोड़
जाँच एजेंसियों ने इंस्पेक्टर नरगिस के बैंक खातों और लेन-देन की जाँच की है। इसमें नरगिस की संपत्ति उनकी आय से दोगुनी मिली है। नरगिस ने अपने पति के नाम पर कई अचल संपत्तियाँ भी खरीदी हैं, जिनमें मेरठ, गाजियाबाद, नोएडा, अमरोहा, बरेली, लखनऊ, कानपुर देहात और देहरादून में बेशकीमती कोठियाँ, प्लॉट, दुकानें, बार, रेस्टोरेंट और पेट्रोल पंप शामिल हैं। इन सभी संपत्तियों की अनुमानित कीमत करोड़ों में है।
अकेले मेरठ में करीब ₹20 करोड़, अमरोहा में ₹10 करोड़ का एक प्लॉट है। इसके अलावा, कानपुर देहात में ₹9 करोड़ की एक और संपत्ति है, जो अनुसूचित जाति के एक व्यक्ति के नाम पर ‘अवैधानिक’ तरीके से खरीदी गई बताई जा रही है।
जानकारी के मुताबिक, नरगिस खान ने ₹7 करोड़ की जमीन अपने बेटे वेदांत और पति के नाम पर खरीदी है, और करोड़ों की बेनामी संपत्ति भी उनके पति के नाम पर होने का शक जताया जा रहा है।
यह मामला अब पुलिस विभाग में बड़े सवाल खड़े कर रहा है कि एक इंस्पेक्टर के पास इतनी संपत्ति कैसे आई और उनके विवादित अतीत के बावजूद उन्हें लगातार अहम पदों पर क्यों रखा गया।
उत्तर प्रदेश के नगीना से लोकसभा सांसद और ‘भीम आर्मी’ के संस्थापक चंद्रशेखर आज़ाद ‘रावण’ पर एक बार फिर उत्पीड़न के आरोप लगे हैं। इन आरोपों का खुलासा स्विट्जरलैंड में Ph.D कर रहीं रोहिणी घावरी ने किया है। वह ऐसे आरोप पहले भी रावण पर लगा चुकी हैं।
रोहिणी घावरी ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक पोस्ट साझा किया है। इसमें उसने एक चैट का स्क्रीनशॉट लगाया है। इस पोस्ट में उसने रोहिणी ने चंद्रशेखर की सताई हुई एक लड़की से बात करने का दावा किया है। रोहिणी ने पोस्ट में लिखा है कि यह चंद्रशेखर के विक्टिम नंबर 3 है।
चंद्रशेखर की विक्टिम नंबर 3 एक 12 साल की बच्ची नेहा राजपूत जिससे यह ट्रेन में मिला फिर उसे अपने घर ले आया उस बच्ची को नौकर बना कर रखा खूब शोषण किया उसका बाद में अपने भाई से उसकी शादी करा दी एक बेटा हुआ !! उस बेटी को इतना प्रताड़ित किया की वो इनके घर से भाग गई छुप के रहने लगी अब… pic.twitter.com/5oTGBQJPcB
— Dr. Rohini Ghavari ( रोहिणी ) (@DrRohinighavari) June 4, 2025
रोहिणी ने पोस्ट में लिखा, “एक 12 साल की बच्ची नेहा राजपूत से चंद्रशेखर ट्रेन में मिला। फिर उसे अपने घर ले आया। उस बच्ची को नौकर बना कर रखा। उसका खूब शोषण किया। इसके बाद अपने भाई से उसकी शादी करा दी जिससे एक बेटा हुआ। उस बेटी को इतना प्रताड़ित किया की वो इनके घर से भाग कर छुप के रहने लगी।”
पीड़िता की कहानी आगे बताते हुए रोहिणी ने लिखा, “इस लड़की को चंद्रशेखर के घरवाले न तो इज्जत देते हैं और मन ही उसे अपने बेटे से मिलने देते हैं। ऐसी कई लड़कियाँ हैं जिनका जीवन बर्बाद हुआ है। अब इन सब बेटियों को न्याय मैं दिलाऊँगी।”
रोहिणी ने खुद के उत्पीड़न का भी लगाया था आरोप
रोहिणी घावरी ने 2023 में चंद्रशेखर आजाद ‘रावण’ पर उत्पीड़न के आरोप लगाए थे। एक्स पर ही रोहिणी ने एक वीडियो शेयर किया, जो इन दोनों के वीडियो कॉल के दौरान का था। इसमें रावण रोता हुआ दिख रहा था। रोहिणी ने लिखा कि झूठे आँसू दिखा कर और अपनी शादी छिपा कर ‘रावण’ कई मासूम लड़कियों का जीवन बर्बाद कर चुका है।
रोहिणी घावरी ने अपनी पोस्ट में चंद्रशेखर के काले कारनामे में उसकी पत्नी के साथ देने का आरोप लगाया। साथ ही आंदोलन से मोटा पैसा आने की बात कही। रोहिणी ने लिखा, “ये ‘महिला’ भी इसमें उसका साथ देती रही, क्योंकि आंदोलन से करोड़ों रुपए आ रहे थे।”
रोहिणी ने रावण पर आरोप लगाते हुए अपने हालिया पोस्ट में लिखा, “यह चाहता था की मैं इसकी क्राइम पार्टनर बनूँ और काले कारनामे में साथ दूँ, लेकिन मैं इनकी तरह नीच नहीं हूँ, अपना जमीर नहीं बेच सकती।”
रोहिणी ने ‘रावण’ को छल-कपट-षड्यंत्र वाला व्यक्ति करार देते हुए आरोप लगाया कि वो कभी दलित समाज का नेता नहीं बन सकता।
कौन हैं रोहिणी घावरी
रोहिणी घावरी वाल्मीकि समाज से आती हैं और खुद को दलितों का ठेकेदार बताने वाले कुछ नेताओं द्वारा ब्राह्मणों के प्रति घृणा फैलाए जाने से ताल्लुक नहीं रखती। उलटा उन्होंने बताया है कि वो वाल्मीकि समाज से आती हैं और ब्राह्मणों का उनके जीवन में बहुत योगदान है
रोहिणी घावरी संयुक्त राष्ट्र (UN) में भी संबोधन दे चुकी हैं। उन्होंने बताया था कि वहाँ भी जाने के लिए उनके एक पंडित अंकल ने उनका मार्गदर्शन किया। UN में राम मंदिर को लेकर रोहिणी पाकिस्तान को खरी-खरी सुना चुकी हैं। उन्होंने ‘जय श्री राम’ का उद्घोष करते हुए कहा था कि दुनिया के हर हिन्दू के लिए राम मंदिर प्राण-प्रतिष्ठा वाला दिन ऐतिहासिक है।
इस खबर के संबंध में ऑपइंडिया ने अधिक जानकारी के लिए डॉ. रोहिणी घावरी से संपर्क किया। हालाँकि उनसे अब तक बात नहीं हो सकी है। संपर्क होने के बाद खबर को आगे अपडेट किया जाएगा।
कर्नाटक के लक्कुंडी में दूसरी बार खुदाई शुरू हुई है। 20 साल पहले यहाँ एक बार खुदाई की गई थी। इस बार कोटे वीरभद्रेश्वर मंदिर की वस्तुएँ, सिक्के और शिलालेख को जमा करने के लिए पर्याप्त जगह बनाई गई है। सेवानिवृत वैज्ञानिक केशव और एएसआई की टीम साथ में काम कर रही है।
इतिहासकार खुदाई में निकलनेवाली कलाकृतियों को लेकर काफी उत्साहित है। इससे पहले लक्कुंडी में खुदाई के काम के लिए 10 टीमें लगाई गई थी। इनलोगों ने 5 कुएँ, 6 शिलालेख और 600 नक्काशी की गई ऐतिहासिक पत्थर को निकाला था।
इस बार एएसआई अधिकारियों ने एक खुला संग्रहालय बनाया है जहाँ खुदाई में मिलनेवाली वस्तुओं को एकत्रित किया जाएगा। लक्कुंडी हेरिटेज डेवलपमेंट अथॉरिटी के मुताबिक राष्ट्रकूट, कल्याणी, चालुक्य और होयसल काल के सिक्के, कुछ और कुएँ, मंदिर और दूसरी वस्तुएँ खुदाई में यहाँ मिलने की उम्मीद हैं।
दक्षिण के साम्राज्य की समृद्ध कला
राष्ट्रकूट राजवंश और होयसल राजवंश के साक्ष्य उनकी कला, वास्तुकला, अभिलेख और साहित्यिक स्रोतों से मिलते हैं।
राष्ट्रकूट सामाज्य ने 8वीं से 10 वीं शताब्दी तक दक्कन के क्षेत्र में फैला सबसे अहम साम्राज्यों में एक था। दन्तिदुर्ग ने इस साम्राज्य की स्थापना की थी। इस साम्राज्य में करीब साढ़े सात लाख गाँव शामिल था। राष्ट्रकूटों ने दक्कन की स्थापत्य कला में जबरदस्त योगदान दिया।
एलोरा की गुफाएँ राष्ट्रकूट राजाओं ने बनवाई
राष्ट्रकूट साम्राज्य की वास्तुकला में एलोरा की गुफाएँ, खासकर कैलाशनाथ मंदिर महत्वपूर्ण हैं, ये मंदिर चट्टान को काटकर बनाए गए हैं। मंदिरों की दीवारों पर शिव-पार्वती और दूसरे देवी-देवताओं की कथाओं की शानदार मूर्तियाँ बनाई गई है। इनलोगों ने हाथी के शानदार रॉक कट गुफा का निर्माण करवाया।
वहीं होयसल ने हलेबिड का होयसलेश्वर मंदिर और बेलूर का चेन्नाकेशव मंदिर समेत कई मंदिरों का निर्माण कराया। इनकी नक्काशी और मूर्तियाँ समृद्ध कला को दर्शाती हैं। मंदिरों के शिलालेख होयसल शासकों के बारे में जानकारी देती हैं। UNESCO ने बेलूर, हेलबिदु और सोमनाथपुरा के मंदिर को विश्व धरोहर माना है।
होयसल साम्राज्य के अवशेष खास कर मंदिर और शिलालेख उनके शासनकाल में कला और संस्कृति की संपन्नता को दर्शाता है।
10वीं से 14वीं शताब्दी तक दक्कन क्षेत्र में होयसल राजवंश का शासन था। इनलोगों ने 317 वर्ष तक शासन किया। मूल रूप से कर्नाटक और कावेरी नदी के उपजाऊ क्षेत्र वाले तमिलनाडू में इसका शासन था। नृप काम द्वितीय 1026 ई. में होयसल राज की नींव रखी। विंष्णुवर्धन जैसे कई प्रभावशाली राजा हुए जिनके कार्यकाल में वैष्णव संप्रदाय यहाँ फला-फूला।