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Video: किसानों के हमले में दीवार से एक-एक कर गिरते रहे पुलिसकर्मी, 109 घायल

‘किसान’ प्रदर्शनकारियों द्वारा आज दिल्ली स्थित लाल किले (Red Fort) पर पुलिस पर किए हमले का एक वीडियो सामने आया है। समाचार एजेंसी ANI द्वारा शेयर किए गए इस वीडियो में देखा जा सकता है कि भीड़ द्वारा किए गए हमले से पुलिसकर्मी एक-एक कर लाल किले की दीवार से नीचे गिरते जा रहे हैं।

पत्रकार सुशांत सिन्हा ने भी एक वीडियो शेयर करते हुए ट्वीट में लिखा है, “CAA के बाद ये दूसरा मौका है जब देश की राजधानी जल रही, देश का सिर शर्म से झुक रहा है और लोग पूछने पर मजबूर हैं कि गृहमंत्री कर क्या रहे हैं। तो अगर आप चिरनिद्रा से जाग जाएँ तो कृपाकर कुछ ऐक्शन लें ताकि देश में कानून का राज है पता चले।”

इस वीडियो में भी किसान प्रदर्शनकारियों को पुलिस का पीछा करते हुए उन्हें भगाते देखा जा सकता है।

दिल्ली में मंगलवार (जनवरी 26, 2021) सुबह से हुई इस हिंसा में घायल हुए पुलिसकर्मियों की संख्या 109 हो गई है। दिल्ली पुलिस ने एक बयान जारी करते हुए कहा है कि हिंसा में शामिल लोगों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

किसानों के समूहों द्वारा लाल किले पर अपना झंडा फहराने के बाद गृहमंत्री अमित शाह ने दिल्ली में कानून और व्यवस्था की स्थिति का जायजा लिया। प्रदर्शनकारियों को अब पुलिस ने लाल किला क्षेत्र से हटा दिया है। हिंसा के कारण दिल्ली के कुछ हिस्सों में इंटरनेट सेवाएँ भी निलंबित कर दी गईं।

गणतंत्र दिवस की सुबह से ही दिल्ली की सीमाओं पर अराजकता और हाथापाई के दृश्य सामने आते रहे। किसानों के समूहों ने बैरिकेड्स और पुलिस चौकियों को तोड़ दिया और राष्ट्रीय राजधानी में प्रवेश किया। पुलिस ने समूहों को नियंत्रण में लाने के लिए दिल्ली के मुकरबा चौक, नाँगलोई में आँसू गैस का इस्तेमाल किया। इसके अलावा, आईटीओ, अक्षरधाम में भी झड़पें हुईं।

बिहारी-गुजराती-तमिल-कश्मीरी किसान हो तो डूब मरो… क्योंकि किसान सिर्फ पंजाबी-खालिस्तानी होते हैं, वही अन्नदाता हैं

किसानों की परिभाषा आज दिल्ली की सीमाओं से बैरिकेड तोड़कर लाल किला पहुँचने के बाद मानक बन गई है। अब से शायद किसान वही होगा जो पंजाब से संबंध रखता होगा और जिसकी विचारधारा में खालिस्तानी भी खुद को जुड़ा हुआ महसूस कर पाएँगे। यदि इसके अलावा कोई राजस्थान, मध्यप्रदेश, कश्मीर, तमिलनाडु, यूपी, बिहार का किसान खुद को ‘अन्नदाता’ कहता पाया गया तो उसे वामपंथी व मीडिया गिरोह वहीं खबरदार कर देगें।

आखिर इतने दिनों से जो नैरेटिव इस गिरोह ने भुनाया उसका अंत इतने सारे राज्यों के अन्नदाता चुप बैठके कर दें! ये कैसे हो सकता है? आज राष्ट्रीय राजधानी में भड़की अराजकता देखने के बाद दूसरे राज्यों के कृषको को भले ही ये लगे कि अच्छा हुआ जो वो विपक्ष के भ्रम जाल में नहीं फँसे। 

लेकिन, गिरोह के लोगों के मुताबिक आज यही वो क्षण है जब दूसरे राज्य के किसानों को चेहरे पर संतुष्टि का भाव दिखाने से ज्यादा चुल्लू भर पानी में डूब मरने के लिए व्याकुल होना चाहिए। या मुमकिन हो तो खुद ही अपने ‘किसान’ होने की उपाधि उन प्रदर्शनकारियों को लाकर दे देनी चाहिए, जो खेती का ‘क-ख-ग’ न जानते हुए भी ढाई महीने से दिल्ली सीमा पर भीड़ बढ़ाते रहे और उनके कारण सोशल मीडिया पर एक दिशा में एजेंडा फलता-फूलता रहा।

इस बीच मध्यप्रदेश में जो किसानों ने नए कृषि कानूनों पर खुशी व्यक्त करके किसान कौम की थू-थू कराई है उसे तो शायद ही कभी ‘पूरे देश के अन्नदाता’ अर्थात दिल्ली की सीमाओं पर एकत्रित सच्चे किसान भुला पाएँ। राजस्थान में भी देखिए सत्ता में कॉन्ग्रेस होने के बावजूद पंचायत चुनाव में बीजेपी का बोल बाला हो गया। ये उन ग्रामीणों की अपनी कौम से दगाबाजी नहीं तो क्या है। आखिर कॉन्ग्रेस ने क्या कमी छोड़ी होगी भड़काने में! फिर भी अपने विवेक पर इस बात को समझ पाए कि उनके लिए कौन सी स्कीम सही है कौन सी नहीं।

आम जन के लिए संभव है कि इन ढाई महीनों के बीच में कई बार मन में ख्याल आया हो कि आखिर केवल गैर भाजपा शासित प्रदेशों से किसान इस आंदोलन का हिस्सा क्यों हो रहे हैं। अगर नए कृषि कानून इतने ही गलत हैं तो एक कृषि प्रधान देश से तो फिर कोने-कोने से आंदोलन होने चाहिए और आपके कान में न तो कहीं अन्य जगह से आंदोलन की आवाज पहुँची न उस पर हुई मीडिया खबर!

दरअसल, वास्तविकता ये है कि आप इतने दिनों से एक ऐसी भीड़ के जमावड़े को किसान का आंदोलन कहते रहे। जिसकी परिभाषा वामपंथी मीडिया गिरोह और विपक्षियों ने गढ़ी और जिसका पूरा ड्राफ्ट एक साल पहले हुए शाहीन बाग मॉडल के आधार पर तैयार हुआ।

तुलना कीजिए कि 1 साल पहले जैसे भारतीय मुसलमानों को इस बात को जानने में कोई दिलचस्पी नहीं थी कि सीएए/एनआरसी से भारतीय मुसलमानों का कोई नुकसान होगा। वैसे ही इस बार भी हालत यही है। तमाम राज्य के किसानों को मालूम है कि मंडी को लेकर आए नए नियम उन्हें अपनी आय तय करने की आजादी देंगे। मगर, दिल्ली सीमा पर प्रदर्शनकारी बार बार APMC और MSP को लेकर प्रश्न खड़े करते रहे। नतीजतन, धीरे-धीरे वहाँ इतनी भीड़ इकट्ठा हो गई कि कुछ लोग तो यही सोचने में लटक गए कि इतने सारे बुजुर्ग गलत थोड़ी हो सकते हैं।

गणतंत्र दिवस के दिन देश की राजधानी ने साल के साथ उन घटनाओं को दर्ज किया है जिसकी कल्पना भी कोई नहीं कर सकता था। बाहरी ताकतों से देश को बचाने के लिए सुरक्षाबल अलर्ट थे, लेकिन किसे उम्मीद थी ऐसा दंगा वो मचाएँगे जो कल तक शांतिपूर्ण ट्रैक्टर रैली निकालने की कसमें खा रहे थे। किसान एकता दिखाने की बात कर रहे थे।

ऐसा प्रदर्शन जिसमें कॉन्ग्रेस और आम आदमी पार्टी अपनी समांतर राजनीति करते रहे। वामपंथी कट्टरपंथी दिल्ली हिंसा के आरोपितों की रिहाई की माँग में जुट गए और खालिस्तानियों ने खुलेआम झंडा फहराहने पर इनाम घोषित कर दिया। तो सोचिए उस प्रदर्शन के क्या मायने थे और क्यों इसे जारी रखा जा रहा था? असली किसान की माँग ये तो नहीं होतीं।

यकीन करिए, आज दिल्ली के कोने-कोने से आ रही तस्वीर बिलकुल हैरान करने वाली नहीं है। शुरुआत में ही इस बात के कयास लग गए थे कि पिछले साल की भाँति कहीं इस साल भी राजधानी संघर्ष से न जूझे। आज वह अटकलें सही साबित हुईं। पहले पुलिस को झूठा आश्वासन देकर दिल्ली में एंट्री की गई। सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाया गया। फिर उन्हें घेर घेर कर मारा गया… मगर, सोशल मीडिया के क्रांतिकारियों के पास बात जब इस हिंसा के ख़िलाफ़ आपत्ति दर्ज कराने की आई तो मीडिया के एक तय ध़ड़े ने फिर मोर्चा संभालते हुए ये दिखा दिया कि पुलिस ने अन्नदाता पर हमला किया और बाद में वह भड़के।

आज जिन दिल्ली सीमा पर बैठे कथित किसानों के लिए मीडिया की संवेदनाएँ जिस तरह से निकल निकलकर बाहर आ रहीं है। वह क्यों मानेंगे कि आखिर यूपी बिहार, तमिल, और कश्मीर में भी खेती करने वाले अन्नदाता हैं जिन्हें अपनी ऊपज बेचने की चिंता उतनी ही है जितनी पंजाब के अन्नदाताओं को। उनके लिए तो वही सच है जिनसे उन्हें ब्रेकिंग न्यूज मिले।

मीडिया इतने दिनों से आपको ये दिखाने को आतुर है कि दिल्ली की ठंड में ठिठुरने वाले सैंक़़ड़ों किसानों की हालत की जिम्मेदार भाजपा है। लेकिन मीडिया आपको उनसे रू-ब-रू नहीं करवाएगा जो कृषि कानून आने से पहले भी और बाद में भी सुबह सुबह ठंड में घर से निकल कर रोज अपने खेत जाते हैं और जिनकी बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए मोदी सरकार पर्याप्त प्रयास कर रही है।

वो ये नहीं बताएगा आपको कि जो कॉन्ग्रेस इस मुद्दे पर किसानों को भड़का रही है, उसके अपने राज्य में कितने किसान कर्ज के तले दबकर सांस नहीं ले पा रहे। ये मीडिया आपको ये भी नहीं बताएगा कि मोदी सरकार कि प्राथमिकताओ में किसान का उत्थान सर्वोपरि है और जो कानून वो लेकर आए हैं वह दशकों की माँग थी ।

जर्मनी, आयरलैंड, स्पेन आदि में भी हो चुकी हैं ट्रैक्टर रैलियाँ, लेकिन दिल्ली वाला दंगा कहीं नहीं हुआ

आज गणतंत्र दिवस के मौके पर किसान प्रदर्शनकारियों द्वारा बैरिकेड तोड़ दिए गए, पुलिसकर्मियों पर हमला किया गया और लाल किले पर तिरंगा का अपमान कर सिख झंडा फहरा दिया गया। मंगलवार (जनवरी 26, 2021) के दिन यह सब ट्रैक्टर रैली के नाम पर किया गया क्योंकि सुप्रीम कोर्ट की सलाह के बाद दिल्ली पुलिस की ओर से किसानों को कुछ जगहों पर ट्रैक्टर रैली निकालने की इजाजत दी गई थी।

सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली में किसानों की प्रस्तावित ट्रैक्टर परेड पर रोक लगाने से इनकार करते हुए कहा था कि ट्रैक्टर परेड को दिल्ली में होने देना है या नहीं, ये सुरक्षा व्यवस्था से जुड़ा मामला है और इसका निर्णय दिल्ली पुलिस को करना है। मंगलवार सुबह से ही दिल्ली की अलग-अलग सीमाओं पर हजारों की संख्या में प्रदर्शन कर रहे किसानों ने ट्रैक्टरों के साथ दिल्ली में धावा बोल दिया, जिसमें तेज रफ्तार से ट्रैक्टर चला रहे एक व्यक्ति की स्टंट दिखाते हुए मौत भी हो गई।

लेकिन क्या अन्य देशों में भी भारत के जैसे ही विरोध प्रदर्शन के नाम पर इसी तरह से हिंसक ट्रैक्टर रैलियाँ की जाती हैं? आयरलैंड, जर्मनी, स्पेन में भी कई मौकों पर ट्रैक्टर रेलियाँ आयोजित की जाती हैं।

विरोध के ये तरीके यूरोपीय देशों तक ही सीमित नहीं हैं; जापान, न्यूज़ीलैंड और दक्षिण अफ्रीका समेत कई राष्ट्रों में समय-समय पर ट्रैक्टर परेड होती रही हैं। जर्मनी में किसानों द्वारा कानूनों के विरोध में ट्रैक्टर परेड का आयोजन किया गया था। लन्दन, स्पेन, नीदरलैंड जैसे देशों में ट्रैक्टर रेलियों का इस्तेमाल विरोध प्रदर्शन के मॉडल के रूप में किया जाता रहा है।

‘ट्रैक्टर परेड’ का यूरोपीय मॉडल

विदेशों में होने वाले विरोध प्रदर्शन के तरीकों से अलग, भारत में होने वाले विरोध प्रदर्शनों का स्वरुप पिछले कुछ वर्षों में बदला है। खासकर गत वर्ष हुए नागरिकता कानून के विरोध प्रदर्शनों के बाद से भारत में लिबरल गिरोह और वामपंथियों ने मजहबी उन्मादियों के साथ मिलकर विरोध प्रदर्शनों की नई परिभाषा गढ़ी है।

बीते पाँच सालों के दौरान लग्जमबर्ग से लेकर लंदन और बर्लिन से लेकर डबलिन तक कई यूरोपीय शहरों में ट्रैक्टर परेड की घटनाएँ सामने आती रहीं। इन ट्रैक्टर रैलियों का उद्देश्य भी किसानों और कृषि संबंधी विषयों पर अपना विरोध दर्ज करना था।

स्पेन में भी वर्ष 2017 में एक शो में सैकड़ों किसानों ने बार्सिलोना से ट्रैक्टर रैली का आयोजन किया था। तब ये किसान स्पेन से अलग होने के लिए वे कैटेलोनिया का समर्थन कर रहे थे और स्पेन से अलग देश बनाने के लिए कैटलोनिया में जारी जनमत संग्रह के बीच हिंसक झड़पें भी हुई थीं। लेकिन दिल्ली में जो आज हुआ, स्पेन के किसानों ने वो नहीं किया, हालाँकि वो भी अन्नदाता ही थे।

वर्ष 2014 में जर्मनी की कृषि नीतियों, विशेष रूप से औद्योगिक खेती के खिलाफ विरोध करने के लिए लगभग 50 किसानों ने बर्लिन से अपने ट्रैक्टर परेड का आयोजन किया। इस परेड में लगभग 10,000 प्रदर्शनकारियों ने जर्मन चांसलर भवन के बाहर अपना विरोध दर्ज किया था। उनका नए पर्यावरण नियमों के खिलाफ वे कहते हैं कि उनकी आजीविका को खतरा है। नवम्बर 2019 में जर्मनी के बर्लिन शहर में भी हज़ारों की संख्या में ट्रैक्टर सवार किसान पहुँचे थे।

फ्रांस में वर्ष 2015 के सितम्बर माह में खाद्यान के गिरते दामों और सस्ते आयात के खिलाफ विरोध जताने के लिए ‘1000 ट्रैक्टर सेट मोई’ प्रदर्शन का आयोजन किया गया था, जिसमें बड़ी संख्या में किसान अपने ट्रैक्टरों के साथ पेरिस के लिए रवाना हुए।

हालाँकि, किसानों की ट्रैक्टर रैलियों का अनुभव सिर्फ पेरिस के ही पास नहीं था; इसी दौरान लग्जमबर्ग में भी दूध और कृषि उत्पादों के दामों में गिरावट और सरकार से मदद की माँग को लेकर किसानों ने ट्रैक्टरों से मुख्य मार्गों की नाकेबंदी कर डाली थी। ब्रसल्स में भी योरोपीय संघ मुख्यालय के बाहर ट्रैक्टर पर सवार होकर आए किसानों और पुलिस के बीच झड़पें हुई थीं।

वहीं, नीदरलैंड्स में अक्टूबर, 2019 में ट्रैक्टर परेड का आयोजन हुआ था। तब भारी संख्या में किसानों ने सरकार की नीतियों का विरोध जताने के लिए ट्रैक्टर परेड का विकल्प चुना था। नाइट्रोजन उत्सर्जन कम करने के लिए मुर्गियों और सुअरों की संख्या कम करने सम्बन्धी नियमों का विरोध कर रहे किसान बड़ी संख्या में नीदरलैंड्स की राजधानी हेग पहुँच गए थे।

आयरलैंड की राजधानी डबलिन में नवम्बर 2019 में शहर की घेराबंदी ट्रैक्टरों से की गई थी। ट्रैक्टर रैली का नज़ारा नवम्बर, 2019 से लेकर जनवरी, 2020 तक जारी रहा। वहीं, अक्टूबर, 2020 में ब्रितानी कृषि कानूनों पर नाराजगी व्यक्त करते हुए ब्रिटेन के सैकड़ों किसान ट्रैक्टरों के साथ लंदन उतर आए थे। किसानों की माँग ब्रेग्जिट के बाद ब्रिटेन के भावी कारोबारी समझौतों में किसानों के हितों के संरक्षण की माँग कर रहे थे।

दिल्ली की ट्रैक्टर परेड

दिल्ली में जो आज के गणतंत्र दिवस के अवसर पर किसानों द्वारा ट्रैक्टर परेड के नाम पर किया गया, वह वास्तव में ऐतिहासिक है। लाल किले पर प्रदर्शनकारियों ने अपने समुदाय का झंडा फहरा दिया और एक स्टंट कर रहा ‘किसान’ तेज रफ्तार में ट्रैक्टर दौड़ाते हुए मारा गया। प्रदर्शनकारियों ने बैरिकेड्स को तोड़ा और आईटीओ, लाल किले पर उत्पात मचाया। दिल्ली के आईटीओ पर किसानों और पुलिस के बीच जमकर संघर्ष भी हुआ है। किसानों ने दिल्ली में घुसने के लिए कुछ बैरिकेड्स तोड़ दिए।

अब बारी मजहबी फैक्ट चेकर्स द्वारा इन उन्मादी प्रदर्शनकारियों को फैक्ट चेक कर ‘क्लीन चिट’ देने की है। भारत के कुछ फुल टाइम प्रदर्शनकारियों ने नागरिकता कानून के विरोध प्रदर्शनों के बाद जो स्वरुप विरोध प्रदर्शनों को दिया है, वास्तव में वह मुद्दों के विरोध के बजाय सत्ता के खिलाफ षड्यंत्र ज्यादा रहे हैं। हालाँकि, संविधान या नियम कानूनों को अपने ध्येय सिद्धि तक ही श्रेष्ठ माने जाते रहने का प्रचलन लिबरल गिरोह के लिए कब तक सकारात्मक साबित होता रहेगा, इसका जवाब समय के गर्भ में ही है।

किसानों के आंदोलन में खालिस्तानी कड़े और नारे का क्या काम?

मंगलवार (जनवरी 26, 2021) को ‘इंडिया टुडे’ के पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने फेक न्यूज फैलाते हुए तिरंगे में लिपटी मृतक की लाश की तस्वीर अपने ट्विटर अकाउंट से शेयर करते हुए लिखा कि इसकी मौत पुलिस की गोली से हुई है। राजदीप ने ट्विटर पर लिखा, “पुलिस फायरिंग में आईटीओ पर 45 साल के नवनीत की मौत हो गई है। किसानों ने मुझे बताया कि उसका ‘बलिदान’ व्यर्थ नहीं जाएगा।” 

बता दें कि इस तस्वीर में शव के पास बैठे एक शख्स के हाथ में खालिस्तानी कड़े देखे जा सकते हैं। इसके अलावा केंद्र के तीन नए कृषि कानूनों के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे किसानों ने अपनी ट्रैक्टर परेड के दौरान लाल किले के अंदर घुस कर उस पर लाल-पीला झंडा भी फहरा दिया। प्रदर्शनकारी किसानों ने लाल किले के फाटक पर रस्सियाँ बाँधकर इसे गिराने की भी कोशिश की।

कथित किसान विरोध प्रदर्शन के दौरान सिख झंडों के बीच खालिस्तानी उकसावे की बहस का भी जमकर बोलबाला रहा। मंगलवार दोपहर लाल किले पर पहुँचे किसानों को एक गुंबद के शीर्ष पर एक झंडा लगाते हुए देखा गया। एक अन्य प्रदर्शनकारी ने उस जगह पर अपना झंडा लगा दिया, जहाँ पर प्रधानमंत्री हर वर्ष स्वतन्त्रता दिवस के मौके पर तिरंगा फहराते आए हैं।

एक वीडियो, जो सोशल मीडिया पर बड़े स्तर पर वायरल हो रहा है, में देखा जा सकता है कि उपद्रवियों की भीड़ में से लाल किले पर एक आदमी सिखों का झंडा लगाने खम्बे पर चढ़ रहा है। भीड़ में से जब एक आदमी ने उसकी ओर राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा बढ़ाया तो उसने बेहद अपमानजनक तरीके से तिरंगे को दूर फेंक दिया। झंडा फहराने के दौरान खालिस्तानी नारा भी सुना जा सकता है।

अब सवाल उठता है कि जो लोग इसे पवित्र निशान साहिब बोल रहे हैं, वो ये बताएँ कि ये नारा और कड़ा किसका है? यह भी बताएँ कि एक किसान आंदोलन में मजहबी झंडा कहाँ से आया? उसे कैसे डिफेंड किया जाए कि तिरंगा फेंक कर मजहबी झंडा लगा दिया गया? सोचने वाली बात यह भी है कि किसान के तथाकथित आंदोलन में ‘सिख’ झंडा क्या कर रहा है? खालिस्तानी भी तो सिखों के लिए अलग देश चाहते हैं और यहाँ तिरंगे के पोल पर सिख झंडा लगा दिया गया। 

खालिस्तानी और देश के दुश्मनों के साथ मिलकर कुछ नेता पीएम नरेंद्र मोदी और देश के खिलाफ षड़यंत्र कर लाल किले पर तिरंगा उतारकर किसान आंदोलन का झंडा फहराया। देश को बदनाम करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की आवश्यकता है। आंदोलन किसान के नाम पर किए जाते हैं, लेकिन झंडे फहराए जा रहे हैं खालिस्तान के।

इस बीच आम आदमी पार्टी के नेता अमरीक सिंह का पोस्ट भी सामने आया है, जिसमें उन्होंने कैप्शन दिया था, “राज करेगा खालसा, लाल किला फतेह।”

एक सोशल मीडिया यूजर द्वारा शेयर किए गए पोस्ट में कॉन्ग्रेस को पंजाबी एक्टर दीप सिद्धू को प्रमोट करते हुए देखा जा सकता है। बता दें कि ये वही दीप सिद्धू है, जिसने लाल किले पर खालसा का झंडा फहराने का समर्थन किया है। उसने लोगों से खालिस्तानी नारे भी लगवाए।

इसके अलावा पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की पोती महिमा शास्त्री ने राजदीप सरदेसाई के ट्वीट को शेयर करते हुए लिखा है, “मेरे दादाजी लाल बहादुर शास्त्री ने असली किसानों के लिए नारा दिया था, न कि खालिस्तानियों के लिए। क्या हमें अधिक प्रमाण की आवश्यकता है कि यह किसान आंदोलन नहीं है?”

बता दें कि राजदीप सरदेसाई ने अराजक हिंसा का वीडियो ट्वीट करते हुए लिखा था, “गणतंत्र दिवस पर और अधिक दुखद क्या हो सकता है जब जय जवान, जय किसान ITO में किसान बनाम जवान बन जाता है।”

ये भी ध्यान देने वाली बात है कि दो सप्ताह पहले प्रतिबंधित खालिस्तानी संगठन ‘सिख फॉर जस्टिस (SFJ)’ ने ऐलान किया था कि जो भी दिल्ली के लाल किला पर खालिस्तानी झंडा फहराएगा, उसे 2.5 लाख डॉलर (1.83 करोड़ रुपए) इनाम के रूप में दिए जाएँगे। 

‘RSS नक्सलियों से भी ज्यादा खतरनाक, संघ समर्थक पैर छूकर गोली मार देते हैं’: कॉन्ग्रेसी सांसद और CM भूपेश बघेल का ज्ञान

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की टिप्पणी पर पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने तंज कसा है। उन्होंने कहा कि न भूपेश बघेल ने और न ही उनके सांसदों ने इतिहास पढ़ा है। आरएसएस के बारे में न उनकी सोच है और न ही समझ है। पारिवारिक कार्य से कवर्धा पहुँचे डॉ. रमन सिंह ने कहा कि आरएसएस राष्ट्रभक्त संगठन है। इससे बड़ा देशभक्त संगठन न तो देश में है और न ही विश्व में है। इसने संगठन के साथ-साथ पीढ़ियों का निर्माण किया। संगठन से निकले अटल बिहारी वाजपेयी, लाल कृष्ण आडवाणी और अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश का नेतृत्व कर रहे हैं।

बता दें कि छत्तीसगढ़ प्रांत में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) में हुए नेतृत्व बदलाव के बाद मुख्यमंत्री भूपेश बघेल (CM Bhupesh Baghel) ने आरएसएस की तुलना नक्सलियों से की है। उन्होंने कहा, “जैसे नक्सलियों के बड़े कमांडर आंध्र और तेलंगाना में रहते हैं और यहाँ के लोग केवल बंदूक चलाते हैं। उसी प्रकार से आप आरएसएस में भी देखेंगे कि उसके सारे लोग नागपुर के हैं। यहाँ के लोग केवल अफवाह फैलाने की मशीन की तरह काम करते हैं।”

बस्तर प्रवास पर रवाना होने से पहले मुख्यमंत्री ने कहा कि आरएसएस के कार्यकर्ता नागपुर के बंधुआ मजदूर हो गए हैं। वे इससे उबर नहीं पा रहे हैं। बिसराराम जी स्थानीय व्यक्ति थे। छत्तीसगढ़ के माटीपुत्र थे। अब उनको भी हटा दिया गया। अब यहाँ आरएसएस का कोई आदमी स्थानीय स्तर पर कुछ बड़ा नहीं बोल सकता। सीएम भूपेश ने कहा कि आरएसएस के समर्थक पैर छूकर गोली मार देते हैं। महात्मा गाँधी की हत्या कैसे किया गया था? पहले पैर छुए फिर उनके सीने में गोली मारी।

बता दें कि संघ के संविधान के अनुसार तीन साल में निर्वाचन होता है। पिछले नौ वर्ष से बिसराराम यादव प्रांत संघचालक थे। उनका कार्यकाल पूरा होने पर रविवार (जनवरी 24, 2021) को निर्वाचन हुआ, जिसमें अस्थिरोग विशेषज्ञ डॉ. पूर्णेन्दु सक्सेना को प्रांत संघचालक चुना गया।

गौरतलब है कि इससे पहले सांसद दीपक बैज ने आरएसएस और बीजेपी को नक्सलवाद से ज्यादा खतरनाक संगठन बताया। उन्होंने यह बयान रविवार को अपने बीजापुर प्रवास के दौरान नैमेड़ में दिया। सांसद यहाँ एक क्रिक्रेट प्रतियोगिता के समापन अवसर पर पहुँचे थे। यहाँ पत्रकारों से बातचीत के दौरान सांसद ने कहा कि इलाके में सड़क निर्माण के जो विरोध हो रहे हैं वह आरएसएस और भाजपा के लोग करवा रहे हैं। सांसद यहीं नहीं रुके और बोल पड़े कि नक्सलवाद से ज्यादा खतरनाक तो ये संगठन है।

कैपिटल हिल के लिए छाती पीटने वाले दिल्ली के ‘दंगाइयों’ के लिए पीट रहे ताली: ट्रम्प की आलोचना करने वाले करेंगे राहुल-प्रियंका की निंदा?

गणतंत्र दिवस के दिन अराजकता का एक नया नमूना देख रहे हैं, जिसने ‘किसानों’ के नाम पर पूरी दिल्ली में ऐसा उत्पात मचाया है कि इतिहास में ये शर्मिंदगी के रूप में दर्ज होगा। सुप्रीम कोर्ट पहले ही तीनों कृषि कानूनों पर रोक लगा चुका है। केंद्र सरकार 1.5 वर्षों के लिए इन्हें स्थगित करने के लिए तैयार है। बावजूद इसके ‘किसान’ दंगाइयों ने दिल्ली में लाल किला पर चढ़ कर ‘खालिस्तानी झंडा’ फहरा दिया। अब जरा कैपिटल हिल कांड को याद कीजिए।

अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का आरोप था कि चुनाव में धाँधली हुई है, इसीलिए वो हारे और जो बायडेन की जीत हुई। जिस दिन इलेक्टोरल कॉलेज के वोट्स की गिनती होनी थी, उसी दिन कैपिटल हिल में प्रदर्शनकारी घुसे और हंगामा किया। उनमें से कई अजीबोगरीब वेशभूषा में थे। बैरिकेड्स तोड़ कर और दीवारें लाँघ कर खिड़की से लोग भीतर घुस गए। जनवरी के पहले हफ्ते के अंत में हुई इस घटना के बाद पूरे वाशिंगटन डीसी को लॉकडाउन में डाल दिया गया था।

तब लिबरल गिरोह की इस पर क्या प्रतिक्रिया थी? याद कीजिए। सब ने एक स्वर से इसके लिए डोनाल्ड ट्रम्प की आलोचना की और कैपिटल हिल में घुसने वालों को स्पष्ट रूप से ‘दंगाई’ कहा। बरखा दत्त ने पूछा कि क्या अमेरिका अब दूसरों को लोकतंत्र को लेकर भाषण दे सकता है, जब ट्रम्प ने उसे शर्मिंदगी से भर दिया है। सागरिका घोष ने उसमें भी ‘भगवा झंडा लिए हिंदुत्ववादी’ को देख लिया था। राजदीप सरदेसाई ने कहा कि जब किसी एक व्यक्ति के हाथ में सारी सत्ता आ जाती है तो उसके समर्थक ऐसे ही करते हैं।

उनका इशारा किस ओर था, हम समझ सकते हैं। रवीश कुमार ने इस पर पूरा का पूरा प्राइम टाइम करके अपने अनुयायियों को इशारों में चेताया कि ऐसा भारत में भी हो सकता है। हो सकता है, सत्ता में जो भाजपा बैठी है, वो कर सकती है। इसी तरह से सारे भारतीय मीडिया के लोग इस तरह से मातम मना रहे थे, जैसे उन्हें कोई व्यक्तिगत नुकसान हुआ हो। NDTV के प्रणय रॉय ने बायडेन के शपथग्रहण के बाद ‘Yeeeeeee’ मोमेंट भी शेयर किया।

ये लिबरल गिरोह इस फेर में थे कि दिल्ली में कुछ ऐसा हो जिसका आरोप सीधा केंद्र सरकार पर मढ़ा जा सके और दिखाया जा सके कि जो कैपिटल हिल में ‘ट्रम्प ने करवाया’, वही मोदी सरकार भारत में करवा रही है। लेकिन, ‘किसान आंदोलन‘ ने उनकी कलई खोल कर रख दी। दिल्ली दंगों के समय जैसे सोशल मीडिया पर सबूत आते गए और ये बेनकाब होते गए, ठीक उसी तरह से ये लोग अब इस ‘किसान आंदोलन’ में बेनकाब हो रहे हैं।

किसानों ने पहले वादा किया कि वो हंगामा नहीं करेंगे। दिल्ली पुलिस ने अनुमति भी दे दी। रूट भी तय कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने तीनों कृषि कानूनों को तो रोक दिया, लेकिन किसानों की ट्रैक्टर रैली से पल्ला झाड़ते हुए इस पर दिल्ली पुलिस को निर्णय लेने को कहा। दिल्ली में किसान घुसे, लेकिन उन्होंने बताए गए रूट का अनुसरण न कर के सीधा लाल किला और ITO की तरफ बढ़ाना शुरू कर दिया। फिर हिंसा का दौर शुरू हुआ।

पुलिसकर्मियों के ऊपर ट्रैक्टर चढ़ाने की कोशिश की गई। महिला पुलिसकर्मी के साथ बदसलूकी हुई। एक पुलिसकर्मी बेहोश हो गया। सोशल मीडिया से राहुल गाँधी और प्रियंका वाड्रा जैसे नेता हिंसा करने वालों को और भड़काते रहे, उनका बचाव करते रहे। ट्रैक्टरों में शराब भरे हुए हैं। दिल्ली पुलिस के जवानों को तलवारें लहराते हुए खदेड़ा गया। बसों को क्षतिग्रस्त कर दिया गया। पुलिस के वाहन को भी नहीं बख्शा गया।

और इस बीच कैपिटल हिल उपद्रव की निंदा करने वाले क्या कर रहे हैं? बचाव। दंगाइयों और उपद्रवियों का बचाव। राजदीप सरदेसाई अफवाह फैलाने में लगे हुए हैं कि दिल्ली पुलिस ने ‘किसान आंदोलन’ में एक किसान को मार डाला। रोहिणी सिंह खालिस्तानी झंडे को राष्ट्रीय ध्वज बता रहीं। नरेंद्र नाथ मिश्रा पुलिस पर ही क्रूरता का आरोप लगा रहे। राहुल गाँधी ‘हिंसा से देश का नुकसान’ होने की दुहाई दे रहे।

लेकिन, इन घाघ लिबरलों के सोशल मीडिया हैंडल्स सस्पेंड नहीं होंगे। क्या जिस तरह से ये लोग ट्रम्प की आलोचना कर रहे थे, उस तरह से इस उपद्रव की आग में घी डालने का काम करने वाले राहुल-प्रियंका की निंदा कर सकते हैं? इनमें हिम्मत है? जिस तरह से कैपिटल हिल के दंगाई को दंगाई कहा, उस तरह से दिल्ली में जमा अराजकतावादियों को ये दंगाई कहने की हिम्मत रखते हैं? कैपिटल हिल के लिए छाती पीटने वाले अब ताली क्यों पीट रहे?

NDTV के पत्रकार ये समझाने में लगे हुए हैं कि लाल किला पर फहराया गया झंडा फलाँ झंडा था, फलाँ नहीं था। दंगों का महिमामंडन हो रहा है। इन सबके बीच योगेंद्र यादव भी टीवी चैनलों पर इंटरव्यू देते हुए घूम रहे हैं, ताकि ‘बुद्धिजीवियों’ के बीच दंगाइयों के पक्ष में माहौल तैयार कर सकें। ट्रम्प की आलोचना करने वाले राहुल-प्रियंका तो दूर, इच्छाधारी प्रदर्शनकारी योगेंद्र यादव के खिलाफ भी एक शब्द तक बोलने की हिम्मत नहीं रखते।

NDTV इन सबके बीच JNU के छात्रों का इंटरव्यू ले रहा है। मीडिया पर पत्थरबाजी हो रही है लेकिन मीडिया के ही लोग उन्हीं दंगाइयों को बचाने में लगे हुए हैं। किसी आंदोलन में गलती से भी कभी कोई हिंदू प्रतीक चिह्न दिख जाए तो उसे ‘भगवा आतंकवाद’ नाम दे दिया जाएगा लेकिन आज उनका सारा जोर इस बात पर है कि फलाँ झण्डा खालिस्तानी नहीं था बल्कि ये तो सिखों का पवित्र ध्वज था। यहाँ आंदोलन में धर्म घुसने से उन्हें दिक्कत नहीं होती?

एक दिन पहले यही लोग इस बात में लगे थे कि कैसे राष्ट्रपति भवन में लगाए गए नेताजी सुभाष चंद्र बोस की तस्वीर को एक अभिनेता का साबित किया जा सके। महुआ मोइत्रा की ट्वीट के बाद पत्रकारों ने एक बाढ़ सी ला दी राष्ट्रपति को बदनाम करने के लिए। 1 दिन भी नहीं बीता कि अब यही पूरा का पूरा गैंग गणतंत्र दिवस का मजाक बना कर रख देने वालों के बचाव में जुटा हुआ है। कल CAA विरोधी दंगाई थे, आज ‘किसान’ उपद्रवी हैं।

‘लाल किले पर लहरा रहा खालिस्तान का झंडा- ऐतिहासिक पल’: ऑल पाकिस्तान मुस्लिम लीग ने मनाया ‘ब्लैक डे’

गणतंत्र दिवस पर लाल किले पर ‘खालिस्तानी झंडा’ फहराने को लेकर ऑल पाकिस्तान मुस्लिम लीग (APML) काफी खुश है। पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ द्वारा स्थापित पाकिस्तानी राजनीतिक पार्टी ने इसे ‘ऐतिहासिक क्षण’ बताया है।

Pakistan Political Party celebrates the hoisting of 'Flag of Khalistan' at Red Fort
Source: Twitter

ऑल पाकिस्तान मुस्लिम ने जश्न मनाते हुए इसे ‘Flag changing ceremony’ करार दिया।

Pakistan Political Party celebrates the hoisting of 'Flag of Khalistan' at Red Fort
Source: Twitter

एपीएमएल ने अपने आधिकारिक ट्विटर हैंडल के माध्यम से कहा, “शांतिप्रिय सिख प्रदर्शनकारी ने लाल किले से भारतीय झंडा को हटा दिया और निशान साहिब ध्वज को फहरा दिया, जो कि सिख लोगों के लिए काफी पवित्र है।” इसके साथ ट्विटर हैंडल से ‘सिख किसानों और मुसलमानों’ से ‘मजबूत रहने’ का भी आग्रह किया।

Pakistan Political Party celebrates the hoisting of 'Flag of Khalistan' at Red Fort
Source Twitter

लाल किले पर फहराया गया झंडा सिख ध्वज बताया जा रहा है, लेकिन भारत के खिलाफ सिख भावनाओं को और भड़काने के लिए पाकिस्तानी स्पष्ट रूप से दोनों के बीच अंतर नहीं कर रहे हैं। यह भी उल्लेख करना उचित है कि आतंकवादी संगठन सिख फॉर जस्टिस ने माँग की थी कि गणतंत्र दिवस पर खालिस्तानी झंडा फहराया जाए।

पाकिस्तानी राजनैतिक दल इसे भारतीय गणतंत्र के लिए ‘काला दिवस’ बता रहा है। विरोध करने वाली भीड़ की कार्रवाइयों से भारत को भारी शर्मिंदगी हुई है। हालाँकि, कॉन्ग्रेस पार्टी राष्ट्रीय राजधानी में व्यापक अराजकता का जश्न मना रही है। कॉन्ग्रेस पार्टी ने इसे ‘रिपब्लिक की शक्ति’ नाम दिया है।

उल्लेखनीय है कि सीमावर्ती इलाकों में पुलिस बैरिकेड तोड़ने और प्रदर्शनकारियों द्वारा दिल्ली के कई हिस्सों में पुलिस के साथ भिड़ंत के बाद किसानों के विरोध प्रदर्शन ने एक हिंसक रूप ले लिया है। दिल्ली के अलग-अलग इलाकों में मंगलवार (जनवरी 26, 2021) को हिंसा हुई है।

बता दें कि गणतंत्र दिवस के मौके पर किसानों ने ट्रैक्टर रैली निकालने की बात कही थी। लेकिन मंगलवार सुबह से ही दिल्ली की अलग-अलग सीमाओं पर उत्पात की स्थिति देखने को मिली है। दिल्ली के गाजीपुर बॉर्डर, आईटीओ समेत अन्य कई इलाकों में पुलिस और प्रदर्शनकारियों में भिड़ंत हुई है।

प्रदर्शन कर रही भीड़ ने पुलिस कर्मियों पर हमला कर दिया, पुलिसकर्मी पर पथराव करने का प्रयास किया और तलवार, रॉड और पत्थरों से पुलिस पर हमला किया। उन्होंने सभी नियमों और कानूनों की अवहेलना की, बैरिकेड्स को तोड़ दिया और राष्ट्रीय राजधानी की सड़कों पर बेवजह अराजकता फैला दी।

वीडियो: जब दंगाई को किसी ने लाल किला पर तिरंगा लगाने दिया, और उसने फेंक दिया!

केंद्र सरकार के तीन नए कृषि कानूनों के विरोध में जारी किसानों का विरोध प्रदर्शन आज ट्रैक्टर रैली के दौरान हिंसक हो उठा। दिल्ली की सीमा से घुसे किसानों की भीड़ इतनी उन्मादी हो पड़ी कि लाल किला परिसर में भी दाखिल हो गए और वहाँ निशान साहब का झंडा फहरा दिया गया।

इस सब उपद्रव के बीच एक चर्चा जोरों पर रही कि ‘क्या किसानों ने तिरंगा झंडा हटाया’? यह सवाल अभी तक भी बहस का विषय बना हुआ है। कथित किसान विरोध प्रदर्शन के दौरान सिख झंडों के बीच खालिस्तानी उकसावे की बहस का भी जमकर बोलबाला रहा। मंगलवार (जनवरी 26, 2021) दोपहर लाल किले पर पहुँचे किसानों को एक गुंबद के शीर्ष पर एक झंडा लगाते हुए देखा गया। एक अन्य प्रदर्शनकारी ने उस जगह पर अपना झंडा लगा दिया, जहाँ पर प्रधानमंत्री हर वर्ष स्वतन्त्रता दिवस के मौके पर तिरंगा फहराते आए हैं।

एक वीडियो, जो सोशल मीडिया पर बड़े स्तर पर वायरल हो रहा है, में देखा जा सकता है कि उपद्रवियों की भीड़ में से लाल किले पर एक आदमी सिखों का झंडा चढ़ाने खम्बे पर चढ़ रहा है। भीड़ में से जब एक आदमी ने उसकी ओर राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा बढ़ाया तो उसने बेहद अपमानजनक तरीके से तिरंगे को दूर फेंक दिया।

‘बेफिटिंग फैक्ट्स’ नाम के ट्विटर यूजर ने ये वीडियो शेयर करते हुए लिखा है कि जो लोग आज के उपद्रव को ऐतिहासिक पल बता रहे हैं, उन्हें यह देखना चाहिए कि उन्होंने हमारे राष्ट्रीय ध्वज को किस तरह से फेंक दिया।

यह वीडियो ऐसे समय में वायरल हो रहा है, जब लिबरल जमात और तमाम निष्पक्ष पत्रकार मिलकर गणतंत्र दिवस पर किसानों द्वारा किए गए इस उपद्रव को ‘क्लीन चिट’ देने का प्रयास कर रहे हैं। इनमें से कई पत्रकार ऐसे हैं जो यही ट्वीट करते देखे जा रहे हैं कि लाल किले पर तिरंगा को नहीं हटाया गया और उसका अपमान नहीं किया गया।

गणतंत्र दिवस की सुबह से ही किसानों का प्रदर्शन उग्र होता गया। इस बीच, दिल्ली के DDU मार्ग पर एक व्यक्ति की ट्रैक्टर पलटने के कारण मौत हो गई। आईटीओ के पास पूरे चौक पर सैकड़ों की संख्या में किसान ट्रैक्टर लेकर खड़े रहे। जिसे लेकर समाचार चैनल ‘इंडिया टुडे’ के पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने एक और फेक न्यूज़ फैला दी और पोल खुलने पर अपना ट्वीट चुपके से डिलीट भी कर दिया।

गणतंत्र दिवस पर दिल्ली पुलिस की ओर से किसानों को कुछ जगहों पर ट्रैक्टर रैली निकालने की इजाजत दी गई थी। लेकिन मंगलवार सुबह से ही दिल्ली की अलग-अलग सीमाओं पर हजारों की संख्या में प्रदर्शन कर रहे किसानों ने ट्रैक्टरों के साथ दिल्ली में धावा बोल दिया।

प्रदर्शनकारियों ने बैरिकेड्स को तोड़ा और आईटीओ, लाल किले पर उत्पात मचाया। दिल्ली के आईटीओ पर किसानों और पुलिस के बीच जमकर संघर्ष भी हुआ है। किसानों ने दिल्ली में घुसने के लिए कुछ बैरिकेड्स तोड़ दिए थे। दिल्ली के बीचों बीच आईटीओ पर भी किसान और पुलिस के बीच झड़प देखने को मिली। प्रदर्शनकारी हाथ में डंडे लेकर पुलिसकर्मियों को दौड़ाते और अपने ट्रैक्टरों को वहाँ खड़ी बसों को टक्कर मारते दिखे। कुछ प्रदर्शनकारियों ने तो पुलिस को रौंदने के इरादे से भी तेज रफ्तार में ट्रैक्टर दौड़ाए।

एक पुलिसकर्मी के साथ कुछ किसान प्रदर्शनकारियों द्वारा दिल्ली स्थित आईटीओ में मारपीट और हाथापाई का वीडियो सामने आया है। हाथ में डंडे लिए इन प्रदर्शनकारियों द्वारा पुलिसकर्मी को सड़क पर घेर लिया गया और उनके साथ हाथापाई की गई। तभी उन्हीं प्रदर्शनकारियों में से कुछ लोगों ने आकर बीच-बचाव कर पुलिसकर्मी को सुरक्षित खींच निकाला।

देशी-विदेशी शराब से लदी मिली प्रदर्शनकारी किसानों की ट्रैक्टर: दिल्ली पुलिस ने किया सीज, देखें तस्वीरें

जो आशंका शुरु से जताई जा रही थी, वो सही साबित हो रही है। ‘किसान आंदोलन’ के नाम पर देश विरोधी ताकतें देश की राजधानी दिल्ली में हिंसा फैलाने की साजिश लंबे समय से रच रही थीं। आज वो आशंका सच साबित हुई है जब दिल्ली में ट्रैक्टर रैली के नाम पर पत्थरबाजी, आगजनी और गुंडागर्दी की जा रही है।

इस बीच पुलिस ने शराब से भरे एक ट्रैक्टर को सीज किया है। सामने आए फोटो में देखा जा सकता है कि पूरा ट्रैक्टर शराब से भरा हुआ है। यानी कि शराब के नशे में ट्रैक्टरों को चलाया जा रहा है। देशी और विदेशी शराब से भरे इस ट्रैक्टर में नमकीन के पैकेट्स भी हैं। जबकि ट्रैक्टर रैली के लिए जारी की गई गाइडलाइन में साफ तौर पर लिखा था कि इस दौरान किसी भी तरह के नशीले पदार्थों का सेवन वर्जित होगा। ये तस्वीरें सवाल उठाती है कि क्या वाकई ये आंदोलनकारी किसान हैं? 

वहीं आंदोलन कर रहे किसानों का दिल्ली पुलिस के साथ मंगलवार (जनवरी 26, 2021) को टकराव हो गया है। कई किसानों का पुलिस के साथ आमना-सामना भी हुआ। कृषि कानूनों के विरोध में प्रदर्शन कर रहे किसानों के राष्ट्रीय राजधानी के आईटीओ पहुँचने के बाद दिल्ली में आगे की ओर बढ़ने की कोशिश पर पुलिस के साथ भिड़ंत हुई। पुलिस ने बल प्रयोग करते हुए लाठीचार्ज किया और आँसू गैस के गोले दागे।

किसानों ने तय समय से पहले विभिन्न सीमा बिंदुओं से अपनी ट्रैक्टर परेड शुरू की। किसान अनुमति नहीं मिलने के बावजूद मध्य दिल्ली के आईटीओ पहुँच गए। प्रदर्शनकारी हाथ में डंडे, तलवार लेकर पुलिस कर्मियों को दौड़ाते हुए दिखे। पुलिस ने भी लाठीचार्ज और आँसू गैस के गोले छोड़कर भीड़ को तितर-बितर करने का प्रयास किया।

दिल्ली पुलिस ने मंगलवार को प्रदर्शनकारी किसानों से अपील की है कि वे कानून को हाथ में नहीं लें और शांति बनाए रखें। पुलिस की यह अपील राष्ट्रीय राजधानी में कई स्थानों पर पुलिस और प्रदर्शनकारी किसानों के बीच झड़प की घटना के बीच आई है। पुलिस ने किसानों से कहा कि वह पूर्व निर्धारित मार्ग पर ही ट्रैक्टर परेड़ निकाले।

बता दें कि किसानों के ट्रैक्टर मार्च के लिए अलग-अलग बॉर्डर से रूट तय किए गए थे, जिसे किसानों ने नहीं माना और कई जगह तय रूट की धज्जियाँ उड़ाईं गई। इतना ही नहीं रूट को तोड़ किसान लाल किले के अंदर तक जा घुसे और प्राचीर में खड़े होकर हथियार लहराने लगे।

राष्ट्रीय राजधानी में कई स्थानों पर पुलिस और प्रदर्शनकारी किसानों के बीच झड़पों के बाद मध्य एवं उत्तर दिल्ली के 10 से ज्यादा मेट्रो स्टेशनों पर प्रवेश और निकास द्वार बंद कर दिए गए।

मुंगेर में माँ दुर्गा भक्तों पर गोलीबारी करने वाले सभी पुलिस अधिकारी बहाल, जानिए क्या कहती है CISF रिपोर्ट

बिहार पुलिस द्वारा दुर्गा प्रतिमा विसर्जन जुलूस पर बर्बरता बरतने के महीनों बाद सभी निलंबित अधिकारियों को वापस सेवा में बहाल कर दिया गया है। दैनिक भास्कर ने अपनी रिपोर्ट में इसकी जानकारी दी। पिछले साल 26 अक्टूबर को बिहार के मुंगेर में दुर्गा प्रतिमा विसर्जन के दौरान लाठीचार्ज और फायरिंग में अनुराग पोद्दार की मौत हो गई थी। कई अन्य लोग घायल हो गए थे। पुलिसिया क्रूरता की इस घटना ने एक अलग ही तस्वीर दिखाई थी।

जब यह घटना हुई थी उस समय लिपि सिं​ह मुंगेर की एसपी हुआ करती थीं। इस घटना के बाद उन्हें चुनाव आयोग ने हटा दिया था। हालाँकि, अब बिहार सरकार ने पोस्टिंग की प्रतीक्षा में रही लिपि सिंह को सहरसा का एसपी बनाया है। इसी तरह, तत्कालीन जिला मजिस्ट्रेट राजेश मीणा को सहकारिता विभाग में रजिस्ट्रार नियुक्त किया गया है। वहीं, पुलिस प्रमुख (कासिम बाजार स्टेशन) शैलेश कुमार को नौगछिया पुलिस स्टेशन में स्थानांतरित कर दिया गया है।

बिहार सरकार ने IAS और IPS अधिकारियों के बड़े पैमाने पर स्थानांतरण का आदेश दिया था। देर रात की अधिसूचना में 13 पुलिस अधीक्षकों (एसपी) के साथ बारह जिलों के मजिस्ट्रेट (डीएम) को बदल दिया गया। वहीं, तत्कालीन पुलिस उप महानिरीक्षक (DIG) मनु महाराज ने एक विशेष जाँच दल (SIT) के गठन का आदेश दिया। प्रभारी डीआईजी शफीउल हक ने बताया कि पुलिस की बर्बरता के वायरल वीडियो की जाँच की जा रही है और आरोपितों के खिलाफ उचित कार्रवाई की जाएगी।

CISF की रिपोर्ट क्या कहती है?

हालाँकि, पूर्व मुंगेर एसपी लिपि सिंह ने शुरू में गोलीबारी की किसी भी घटना से इनकार किया था, लेकिन CISF ने अपनी आंतरिक रिपोर्ट में यह स्पष्ट कर दिया कि पुलिस और CISF ने भक्तों पर गोलीबारी की थी। रिपोर्ट के अनुसार, दुर्गा विसर्जन जुलूस के दौरान पुलिस और भक्तों के बीच हाथापाई हो गई। CISF की रिपोर्ट में दावा किया गया कि पुलिस ने भीड़ को नियंत्रित करने के लिए भक्तों पर गोलियाँ चलाईं, जिसके बाद CISF के 20 कर्मियों ने 13 राउंड फायरिंग भी की।

मगध आयुक्त की जाँच रिपोर्ट, पीड़ित परिवार को कोई मुआवजा नहीं

चुनाव आयोग ने मामले की जाँच करने और 7 दिनों में एक निष्कर्ष रिपोर्ट सौंपने के लिए मगध रेंज के आयुक्त, असंगमा चुआ आवा को मुंगेर भेजा था। असंगमा ने मुंगेर का दौरा किया और स्थानीय लोगों और सुरक्षा कर्मियों से पूछताछ की। दैनिक भास्कर ने बताया कि जाँच रिपोर्ट चुनाव आयोग को सौंप दी गई है लेकिन अभी तक इसे सार्वजनिक नहीं किया गया है। सूत्रों का हवाला देते हुए, हिंदी दैनिक ने कहा कि मगध रेंज के आयुक्त ने मुंगेर के एसपी लिपि सिंह और डीएम राजेश मीणा पर 1 घंटे देरी से अपराध स्थल पर पहुँचने का आरोप लगाया है।

मृतक अनुराग के पिता अमरनाथ पोद्दार ने जानकारी दी कि उन्हें बिहार सरकार से अभी तक कोई मुआवजा नहीं मिला है। उन्होंने वासुदेवपुर ओपी प्रभारी सुशील कुमार को नामजद अभियुक्त बनाया था। इसके बावजूद पुलिस द्वारा पुत्र का शव दिए जाते समय उनका हस्ताक्षर गलत तरीके से लेकर अज्ञात के विरूद्ध मामला दर्ज कर दिया गया। जिसके विरूद्ध केस दर्ज करवाया है। इसके साथ ही ग्रामीणों और पीड़ित के रिश्तेदारों ने बिहार पुलिस पर आरोपितों को बचाने और मामले को दबाने का आरोप लगाया है।

अनुराग पोद्दार की मौत

मुंगेर गोलीकांड के बाद लिपि सिंह को ‘जनरल डायर‘ का नया नाम मिला था। दुर्गा पूजा समिति से जुड़े लोगों ने उस समय दावा किया था कि लिपि सिंह के सामने ला-ला कर विसर्जन में शामिल लड़कों को पीटा गया था। रात में वीरान सड़क पर माँ की प्रतिमा पड़ी हुई थी। अनुराग पोद्दार के पिता के बयान को आधार बनाते हुए पुलिसकर्मियों के खिलाफ FIR दर्ज की गई थी। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा था कि पुलिस की चलाई गोली से उनके बेटे की हत्या हुई।

विधानसभा चुनाव से पहले दुर्गा पूजा विसर्जन समारोह के दौरान बिहार के मुंगेर शहर में फैली हिंसा में एक भक्त की मौत हो गई। एसपी मुंगेर लिपि सिंह ने भक्तों पर पुलिस द्वारा की गई बर्बरता का बचाव किया था। जिसमें दावा किया गया कि भक्तों ने पथराव कर आगामी हिंसा को भड़काया। बता दें कि पुलिस कर्मियों ने निर्दयता से मुंगेर जिले में दुर्गा जुलूस निकालते भक्तों पर हमला किया था। भक्तों पर लाठी चार्ज किया गया और उन पर गोली चलाई गई, जिसमें एक 18 वर्षीय हिंदू लड़के की मौत हो गई।