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इजरायल के विपक्ष से कुछ तो सीखें हमारे नेता… हमारी लोकतान्त्रिक शक्तियाँ राष्ट्रहित को कब आगे रखेंगी?

फिलिस्तीन और इजराइल के बीच जारी लड़ाई पर अल ज़जीरा से बातचीत करते हुए नेफ्टली बेनेट

नेफ्टली बेनेट: …जब हमारे ऊपर सैकड़ों की संख्या में रॉकेट दागे जाएँगे तो हम एक साथ खड़े होकर लड़ेंगे और जीतेंगे।  

अल जज़ीरा न्यूज़ एंकर: आपने कहा, आप इस समय प्रधानमंत्री नेतन्याहू के समर्थन में खड़े हैं। इस समय इजराइल में नई सरकार बनाने की एक राजनीतिक प्रक्रिया चल रही है। ऐसी सरकार, शायद जिसमें आप भी हिस्सेदार होंगे।

नेफ्टली बेनेट: देखिए हम एक लोकतांत्रिक देश हैं और यह हमारे लिए गर्व की बात है। आलोचना लोकतांत्रिक प्रक्रिया का एक हिस्सा होती है पर हमारे इजराइल में एक तरह का अलिखित नियम है कि दुश्मन के साथ लड़ाई की बात पर हम एकसाथ खड़े रहते हैं। …ऐसे में किसी को जरा भी संशय नहीं होना चाहिए, हम हमास के एक-एक कमांडर को खोज कर मारेंगे। …और उनके पीछे तब तक पड़े रहेंगे, जब तक हम जीत नहीं जाते। 

नेफ्टली बेनेट, इजराइल में विपक्षी गुट के नेता हैं और संभावित प्रधानमंत्रियों की सूची में से एक। ये खुद बेंजामिन नेतन्याहू की सरकार में रक्षा मंत्री रह चुके हैं पर वर्तमान में उनसे अलग हैं। पर एक अच्छी लोकतांत्रिक व्यवस्था में अलिखित नियमों के प्रति पूरी तरह से अपने देश के लिए समर्पित। दुश्मन के विरुद्ध देश के नेतृत्व के साथ खड़े होने की बात पर बिल्कुल स्पष्ट। इनके लिए राष्ट्रहित के आगे राजनीतिक मतभेद का कोई स्थान नहीं है।

इस मामले में इजराइल शायद अकेला देश न हो। बहुत से ऐसे देश हैं, जहाँ राष्ट्रहित के आगे राजनीति के लिए स्थान नहीं है। अमेरिका में विदेश नीति को लेकर भी इसी तरह का अलिखित नियम है। हाल ही में फ्रांस में आतंकवाद विरोधी कानूनों पर विपक्ष सत्ता में बैठे लोगों के साथ खड़ा दिखा। 

ऐसे में प्रश्न यह उठता है कि इस तरह की राजनीतिक परिपक्वता भारत में दिखाई क्यों नहीं देती? विदेश नीति के विषय पर या फिर दुश्मन देशों के साथ संबंधों पर हमारे यहाँ भी अलिखित ही सही पर एक नियम क्यों नहीं है जिसके तहत हमारी लोकतांत्रिक शक्तियाँ एक साथ दिखाई दें? हमारे देश में इस कमी के मूल में क्या केवल वैचारिक भिन्नता एकमात्र कारण है?

एक प्रश्न और उठता है कि ऐसा राजनीतिक दृष्टिकोण पिछले दो-तीन दशक की बात है या उसके पहले भी ऐसा ही था? यदि हम पचास वर्ष पीछे जाएँ तो ऐसे उदाहरण मिलते हैं जब ऐतिहासिक घटनाओं पर नेताओं ने राष्ट्रहित को दलीय और व्यक्तिगत आकांक्षाओं के आगे रखा। 

पाकिस्तान के विरुद्ध 1971 की लड़ाई और बांग्लादेश बनने के समय अटल बिहारी वाजपेयी ने तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी का पूरा समर्थन किया था। कई वर्षों तक यह प्रचार भी चला कि वाजपेयी जी ने इंदिरा गाँधी को दुर्गा कहा था। यह तब तक चला जब तक खुद वाजपेयी ने इसका खंडन नहीं कर दिया।

यदि इस घटना से पीछे जाएँ तो फिर 1962 में भारत और चीन की लड़ाई की बात होती है जब हमारे वामपंथियों ने उस लड़ाई के दौरान नेहरू की सरकार में भारत का समर्थन नहीं किया। वैसे तो यहाँ तक कहा जाता है कि हमारे वामपंथियों ने उस युद्ध के लिए न केवल भारत की आलोचना की बल्कि चीन के लिए संसाधन भी जुटाने की कोशिश की थी।

यदि 1971 से आगे चलें तो 1998 में जब अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने पोखरण में परमाणु परीक्षण किया तब मुख्य विपक्षी दल के रूप में कान्ग्रेस ने उनकी खुलकर आलोचना की। आलोचना में कान्ग्रेस पार्टी की ओर से प्रवक्ता सलमान खुर्शीद द्वारा आरोप लगाया गया कि वाजपेयी सरकार द्वारा परमाणु विस्फोट के पीछे का उद्देश्य मात्र अपनी राजनीति चमकाना था और देश की सुरक्षा से इन विस्फोटों का कुछ लेना-देना नहीं था।

देश की सुरक्षा से जुड़े विषयों पर ऐसी आलोचना और आरोप के पीछे राजनीतिक कारण या मजबूरियाँ क्या होती हैं? यह समझना इतना कठिन क्यों है कि राष्ट्र है तो दल हैं, राष्ट्र है तभी राजनीति है। किसी तरह का संभावित राजनीतिक फायदा राष्ट्र के हित को पीछे क्यों फेंक देता है?

इसके बाद यदि पिछले दो दशकों को देखें तो अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अनगिनत ऐसी घटनाएँ हुईं जब सरकार और विपक्ष एक साथ नहीं दिखे। हाल की स्मृतियों में सबसे ताजा घटनाएँ भारत और पाकिस्तान के बीच संबंधों को लेकर हुई। बालाकोट पर जब एयर स्ट्राइक किया गया तब कॉन्ग्रेस के बड़े से बड़े और छुटभैये नेता लोग भी न सिर्फ देश की सत्ता से बल्कि भारतीय वायु सेना से भी जवाब माँग रहे थे।

भारत-चीन संबंधों को लेकर भी इन कॉन्ग्रेसियों का रवैया नहीं सुधरा। 1962 में जो काम वामपंथियों ने इनके ‘फोटो नेता’ नेहरू के साथ किया था, वही काम पिछले वर्ष जब लद्दाख में चीनी सेनाओं की घुसपैठ हुई तो अब के कॉन्ग्रेसियों ने किया। राहुल गाँधी, उनकी पार्टी को देख कर बाकी के विपक्षी दल भी तब लगातार सरकार की आलोचना करते हुए दिखे।  

उसी समय यह खुलासा भी हुआ कि पहले राजीव गाँधी फाउंडेशन को चीन की ओर से अनुदान मिलता रहा है। साथ ही यह भी खुलासा हुआ कि कॉन्ग्रेस पार्टी और चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के बीच एक समझौता भी हुआ है। बस अभी तक यह नहीं पता चल सका है कि उस समझौते का आधार क्या है? उसमें लिखा क्या है? ऐसी कौन सी बातें हैं जो विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र भारतवर्ष के सबसे पुराने राजनीतिक दल और चीन जैसे अलोकतांत्रिक देश के एकमात्र सत्ताधारी दल के बीच कॉमन हैं? ऐसे कौन से राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय उद्देश्य होंगे, जिन पर लोकतांत्रिक मूल्यों में विश्वास करने वाला एक राजनीतिक दल और चीन की कम्युनिस्ट पार्टी एक जैसा सोचते होंगे?

उसके पहले की घटना देखें तो एक और ऐसा विषय रहा है जिस पर सरकार और विपक्ष के मतभेद जगजाहिर थे। भारत के पैंसठ सांसदों ने अमेरिकी सरकार को पत्र लिखकर गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री और वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अमेरिकी वीजा न देने का अनुरोध किया। यह ऐसी घटना थी जो भारतीय लोकतांत्रिक राजनीति में पहले नहीं हुई थी।

मुख्यमंत्री जैसे संवैधानिक पद पर बैठे एक भारतीय नागरिक के खिलाफ ऐसा करना यह दिखाता है कि भारत में राजनीतिक मतभेद राष्ट्रहित को आगे रखकर नहीं सोच सकता। इन बड़ी घटनाओं के अलावा हाल के वर्षों में और घटनाएँ हैं जिन्हें देखकर कहा जा सकता है कि हमारे कुछ नेताओं और कुछ राजनीतिक दलों की सोच ऐसी है जो राष्ट्र को कभी आगे रख ही नहीं सकते। 

मणिशंकर अय्यर द्वारा पाकिस्तानी न्यूज़ चैनल पर की गई याचना किसे याद नहीं है? कौन भूल सकता है कि उन्होंने एक दुश्मन देश में बैठकर किनसे याचना करते हुए कहा कि; आप इन्हें हटाइए और हमें ले आइए। यह अपने आप में ऐसी घटना थी जिसने भारतीय लोकतांत्रिक मूल्यों को अंतरराष्ट्रीय मंच पर शर्मसार कर दिया था।

फिर आया बालाकोट। भारतीय हवाई सेना द्वारा बालाकोट एयर स्ट्राइक के पश्चात हमारे विपक्षी नेताओं ने जैसे बयान दिए उन्हें भला कौन भूल सकता है? कौन भूल सकता है कि राहुल गाँधी, अरविंद केजरीवाल और कई और विपक्षी नेताओं के बयानों को पाकिस्तान ने घरेलू और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इस्तेमाल किया। अनगिनत ऐसी घटनाओं में अब अरविंद केजरीवाल द्वारा सिंगापुर के बारे में दिया गया बयान जुड़ गया है।

इसके अलावा हाल के वर्षों में अपनी विदेश यात्राओं के दौरान राहुल गाँधी ने सार्वजनिक मंचों पर भारत को नीचा दिखाने का कोई मौका हाथ से जाने नहीं दिया। यूरोप हो या अरब देश, अमेरिका हो या सिंगापुर, सैम पित्रोदा द्वारा आयोजित कार्यक्रमों में राहुल गाँधी देश के विरुद्ध बोलते हुए पाए गए।

नरेंद्र मोदी के प्रति राहुल गाँधी की घृणा का तो यह हाल है कि देशी ही नहीं, विदेशी मंचों पर भी वे खुद नरेंद्र मोदी और भारत को एक मानकर चलते हैं। जब पिछले एक वर्ष से भारत और चीन के बीच तनाव की स्थिति है, विशेषज्ञों के साथ अपनी बातचीत में वे कई बार चीन की बड़ाई करते हुए बरामद हुए।

अमेरिकी निकोलस बर्न के साथ तो बातचीत करते हुए राहुल गाँधी ने खुलकर शिकायत कर दी कि भारत में लोकतंत्र का ह्रास हो रहा है पर अमेरिका कुछ क्यों नहीं कर रहा? उनका और उनके समर्थकों का यह हाल है कि भारत की आलोचना करते हुए जारी किये जाने वाले रिपोर्ट को ये बाकायदा सेलिब्रेट करते हैं।

इन घटनाओं और बयानों को देखते हुए और किसी भी पोलिटिकल करेक्टनेस को पीछे रखते हुए यह कहा जा सकता है कि जब अंतरराष्ट्रीय मंचों पर राष्ट्रहित की बात आती है तो कुछ दलों और उनके नेता हर बार गलत जगह खड़े दिखाई देते हैं। सबसे मजे की बात यह है कि इन नेताओं और दलों की ओर से यह दावे भी होते हैं कि वे ही राष्ट्रवादी भी हैं। ऐसी सोच इनकी राजनीतिक अपरिपक्वता को दर्शाता है।

हमारे देश में भले ही अभी तक ऐसा न हुआ हो पर वह कहावत है न कि जब जागो तभी सवेरा। ठोस लोकतांत्रिक मूल्यों वाले और देशों और उनके नेताओं को देखकर भी हमारे राजनीतिक दल यह सीख सकते हैं और अपने आचरण में वांछित बदलाव ला सकते हैं ताकि कुछ विषयों पर निज हित को अलग रख राष्ट्रहित की भी सोच सकें।

यूँ ही नहीं कोई ‘मेट्रो मैन’ बन जाता: चुनाव हारे पर वादा नहीं भूले ई श्रीधरन, दलितों के घर आई रोशनी

दुनिया ई श्रीधरन को ‘मेट्रो मैन’ के नाम से जानती है। इस बार वे केरल की पलक्कड विधानसभा सीट से बीजेपी के प्रत्याशी थे। विधानसभा चुनावों में वे करीबी मुकाबले में हार गए। लेकिन, वे अपना वादा नहीं भूले। चुनाव के बाद भी वे इस क्षेत्र के लोगों की सहायता के लिए आगे आए हैं। उन्हें कॉन्ग्रेस के शफ़ी परम्बिल ने लगभग 4,000 वोटों से हराया था।

88 वर्षीय ई श्रीधरन ने विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान पलक्कड नगर पालिका की मदुरावीरन कॉलोनी के निवासियों से वादा किया था कि चुनाव में उनकी जीत हो या हार, लेकिन क्षेत्र के सभी परिवारों को बिजली कनेक्शन मिलेगा। हाल ही में क्षेत्र के कुछ निवासी श्रीधरन के पास यह शिकायत लेकर आए कि नगर पालिका के वार्ड 3 में कुछ ऐसे अनुसूचित जाति परिवार हैं जिनके पास बिजली का कनेक्शन नहीं है। कुछ और भी लोग थे जिनका बिल बकाया होने के कारण बिजली कनेक्शन काट दिया गया था।

मंगलवार (18 मई 2021) को ई श्रीधरन ने मदुरावीरन के निवासियों की समस्या को हल करने के लिए केरल स्टेट इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड के असिस्टेंट इंजीनियर के नाम पर 81,525 रुपए का चेक दिया। श्रीधरन द्वारा चेक दिए जाने के बाद अनुसूचित जाति के 11 परिवारों को नया बिजली कनेक्शन मिलेगा। जिन लोगों का बिल जमा नहीं होने के कारण कनेक्शन काट दिया गया था उनके घर का भी अँधेरा दूर होगा।

आपको बता दें कि भारत में मेट्रो परियोजना की नींव रखने वाले पद्म विभूषण ई श्रीधरन केरल विधानसभा चुनाव के पहले भाजपा में शामिल हुए थे। वे एक कुशल प्रशासक माने जाते हैं और देश में उनके नेतृत्व में कई कठिन परियोजनाएँ सफल हुईं।  

₹50 में WhatsApp पर बेची Radhe, 3 सोशल मीडिया यूजर्स पर FIR

सलमान खान की फिल्म ‘राधे-योर मोस्ट वांटेड भाई’ का पारयेटेड वर्जन वॉट्सएप पर बेचने के लिए के लिए 3 सोशल मीडिया यूजर्स के खिलाफ मुकदमा दर्ज हुआ है। इन तीनों पर आरोप है कि इन्होंने 50 रुपए में राधे को मैसेजिंग ऐप पर लीक किया।

फिल्मफेयर वेबसाइट के अनुसार, रिलीज के बाद से ही लगातार फिल्म पर पायरेसी का खतरा था। इस बीच सलमान खान ने इसको लेकर सोशल मीडिया पर चेताया भी कि अगर किसी ने पायरेसी से मूवी देखने की कोशिश की तो उन्हें ये भारी पड़ सकता है। लेकिन, चेतावनी के बाद भी फिल्म का पायरेटेड वर्जन जगह-जगह घूमता रहा।

फिल्म मेकर को जब इस बात का पता चला तो उन्होंने लीगल टीम को बताया और टीम ने मुंबई साइबर सेल में शिकायत दी। पड़ताल में पता चला कि एक फेसबुक यूजर वॉट्सएप पर 50 रुपए में पायरेटेड फाइल बेच रहा था।

कथित तौर पर आरोपितों को पकड़ने के लिए सलमान खान की फिल्म का ही एक सदस्य खरीददार बनकर युवक के संपर्क में आया और पायरेड वर्जन खरीदने की इच्छा जाहिर की। इसके बाद जैसे ही युवक ने चैटिंग ऐप पर फिल्म भेजी, वह पकड़ा गया।

सबूत मिलने के बाद युवक और उसके साथियों के ख़िलाफ़ पायरेसी करने के मामले में शिकायत दर्ज हुई। शिकायत के आधार पर इनके ऊपर इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी एक्ट और कॉपीराइट एक्ट की विभिन्न धाराओं में मुकदमा दर्ज हुआ।

बता दें कि राधे- योर मोस्ट वॉन्टेड भाई 13 मई 2021 को पे-पर-व्यू मॉडल के तहत ज़ीप्लेक्स पर रिलीज़ हुई है, वहाँ इसे 249 रुपए में देखा जा सकता है। अभी तक के रिव्यूज में इस फिल्म की स्टोरी लाइन से लेकर कलाकारों की एक्टिंग सबकी आलोचना हो रही है। इसके अलावा इस पर मीम्स भी धड़ल्ले से बन रहे हैं।

मोबाइल, ₹250 और 15 मिनट: घर पर खुद करें कोरोना टेस्ट, CoviSelf की पूरी डिटेल

इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (ICMR) ने बुधवार (19 मई 2021) को कोविसेल्फ (CoviSelf) के उपयोग को मँजूरी दे दी। यह कोरोना संक्रमण की पहचान के लिए बनाई गई टेस्ट किट है। इस किट की मदद से लोग घर में ही Covid-19 की जाँच कर सकेंगे। यह टेस्ट किट पुणे की मॉलेक्यूलर बायोलॉजी कंपनी MyLab Discovery Solutions द्वारा बनाई गई है। MyLab की यह टेस्ट किट कोविसेल्फ (CoviSelf), कोरोना के रैपिड एंटीजन टेस्ट (RAT) पर आधारित है।

संक्रमण की शुरुआत के बाद से देश में कोरोना टेस्टिंग 20 लाख प्रतिदिन तक हो चुकी है। बावजूद लगातार टेस्ट की संख्या बढ़ाने की जरूरत महसूस की जाती रही है। कोविसेल्फ (CoviSelf) इस दिशा में बड़ा कदम साबित हो सकता है। इससे टेस्टिंग पर आने वाला बोझ कम होगा और घरेलू स्तर पर ही लोग जाँच कर सावधान हो जाएँगे।

कोविसेल्फ (CoviSelf) टेस्ट किट में एक्स्ट्रैक्शन ट्यूब, नजल स्वैब, एक टेस्टिंग कार्ड और कचरे को फेंकने के लिए बायो हजार्ड बैग उपलब्ध होता है। इस टेस्टिंग किट की प्रारम्भिक कीमत 250 रुपए है। वर्तमान में कंपनी की क्षमता 70 लाख किट प्रति हफ्ते निर्मित करने की है, जिसे बढ़ाकर 1 करोड़ किट प्रति हफ्ते किए जाने का लक्ष्य रखा गया है। कोविसेल्फ किट से 15 मिनट के अंदर टेस्ट रिजल्ट प्राप्त किया जा सकता है।

ICMR की गाइडलाइन

MyLab द्वारा बनाई गई टेस्ट किट के उपयोग पर ICMR ने दिशा-निर्देश जारी किए हैं। ICMR के अनुसार इस टेस्ट किट का उपयोग उन्हें ही करना चाहिए जो किसी संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में आए हैं अथवा संक्रमण के लक्षणों से पीड़ित हैं। कोविसेल्फ से Covid-19 का पॉजिटिव रिजल्ट आने पर उपयोगकर्ता को स्वयं को पॉजिटिव ही मानना चाहिए और उसे दोबारा टेस्ट कराने की आवश्यकता नहीं है। किन्तु यदि कोई लक्षण वाला मरीज इस किट के मुताबिक Covid-19 पॉजिटिव नहीं है तो उसे आरटी-पीसीआर टेस्ट कराने की सलाह दी गई है।

ICMR की गाइडलाइन में यह भी कहा गया है कि कोविसेल्फ (Coviself) से जिस व्यक्ति का Covid-19 टेस्ट पॉजिटिव आता है उसे स्वास्थ्य मंत्रालय की गाइडलाइन के अनुसार आइसोलेशन और इलाज संबंधी सभी प्रोटोकॉल्स का पालन करना होगा।

कोविसेल्फ (Coviself) के उपयोग पर ICMR की गाइडलाइन

इसके अलावा ICMR ने इस घरेलू टेस्टिंग किट के उपयोग के लिए निर्माता कंपनी MyLab के सभी दिशा-निर्देशों का पालन करने का सुझाव भी दिया है। टेस्टिंग किट के उपयोग को लेकर कंपनी के दिशा-निर्देश वीडियो और कंपनी के यूजर मैनुअल में उपलब्ध हैं। साथ ही इस कोविसेल्फ टेस्ट किट की विशेषता है कि यह कंपनी के आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) आधारित मोबाइल एप्लीकेशन से लिंक होता है और यूजर को अपना टेस्ट स्टेटस इस एप्लीकेशन में अपलोड करना होता है जिससे ICMR को संक्रमण के सही आँकड़े प्राप्त हो सकें।   

टेस्ट किट पर कंपनी के दिशा-निर्देश

कोविसेल्फ का उपयोग करने से पहले कोविसेल्फ मोबाइल एप्लीकेशन डाउनलोड करना होता है। यह एक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) आधारित मोबाइल एप्लीकेशन है। इस मोबाइल एप्लीकेशन पर पूरी जानकारी देनी होती है। उसके बाद ही इस किट का उपयोग किया जा सकता है। ऐसा इसलिए किया गया है जिससे कोरोना वायरस संक्रमण के आँकड़ों की पूरी निगरानी की जा सके। इस दौरान संग्रहित डाटा पूरी तरह से भारत सरकार के नियमों के अनुसार सुरक्षित रखा जाता है।

Covid-19 टेस्ट किट कोविसेल्फ (Coviself) के उपयोग की पूरी जानकारी इसे बनाने वाली कंपनी MyLab की वेबसाइट पर उपलब्ध कराई गई है। साथ ही टेस्ट किट का उपयोग करने के लिए एक वीडियो भी है। इसके अलावा टेस्ट किट के उपयोग के लिए यूजर मैनुअल भी उपलब्ध कराया गया है, जिसमें किट के संचालन की पूरी जानकारी होती है।

MyLab द्वारा कोविसेल्फ (Coviself) के उपयोग पर जारी वीडियो

ICMR द्वारा यह सुझाव दिया गया है कि इस घरेलू टेस्ट किट के उपयोग के लिए कंपनी द्वारा बताई गई उपयोग विधि का पालन करना आवश्यक है। पुणे की मॉलेक्यूलर बायोलॉजी कंपनी MyLab Discovery Solutions के डायरेक्टर ने कहा कि कई देशों में घरेलू टेस्ट की सुविधा उपलब्ध है। हमने भारत में भी एक ऐसा प्रयास किया है। हमारा उद्देश्य है कि कोरोना वायरस की दूसरी या आगे आने वाली लहरों को देखते हुए देश तैयार रहे।

पादरी का सिर काटा, फिर जीभ भी निकाल ली: ईसाई-इस्लाम पर बहस कर लोगों को ईसा मसीह की शरण में बुला रहे थे

पूर्वी युगाँडा के पल्लीसा शहर के कोमोलो गाँव में ईसाई धर्म और इस्लाम के बारे में सार्वजनिक बहस में शामिल होने पर 3 मई को हुई पादरी की हत्या में इस्लामी कट्टरपंथियों के शामिल होने का शक है। इस घटना में एक पादरी का सिर धड़ से अलग कर दिया और उनकी जीभ को भी बाहर खींच लिया।

इस्लाम पर बात करने वाले पादरी थॉमस चिकूमा उस इलाके के बहुत ही प्रसिद्ध पादरी थे, जिन्होंने अपने पूरे जीवन में करीब 50 चर्च स्थापित किए थे। उन्हें ईसाई और इस्लाम धर्म के बारे में खुली बहस करने के लिए बुलाया गया था।

खुली बहस के लिए बुलाया फिर पादरी पर भड़के कट्टरपंथी

रिपोर्ट्स के मुताबिक, रिश्तेदारों ने बताया कि पादरी चिकूमा 14 लोगों (जिनमें 6 मुस्लिम भी थे) को लेकर उस सभा में गए, जहाँ ईसाई-इस्लाम पर सार्वजनिक बहस होनी थी। यहाँ उन्होंने बाइबल और कुरान का हवाला देकर ईसाई धर्म का पक्ष रखा और लोगों से ईसा मसीह के शरण में आने को कहा। इससे वहाँ उपस्थित कई मुस्लिम नाराज हो गए और ”अल्लाहू अकबर” और ”अल्लाह सबसे बड़ा” जैसे नारे लगाने लगे, जिसके बाद पादरी और उनके बेटे को वहाँ से भागना पड़ा।

पादरी के बेटे ने बताया कि घर जाते वक्त दो मोटरसाइकिलों पर सवार और इस्लामी पोशाक पहने दो मुस्लिम हमारी बगल से निकले। जब हम अपने घर से करीब 200 मीटर की दूरी पर थे, तो वे मोटरसाइकिल हमारे घर के पास ही स्थित नालुफेन्या प्राथमिक विद्यालय के पास रुक गए।

दोनों मोटरसाइकिलों को जंक्शन पर खड़ी देख पादरी को शक हुआ तो उसने अपने बेटे को कुछ दूरी बनाकर चलने के लिए कहा। पादरी चिकूमा के बेटे ने बताया कि उसने पिता को दोनों मोटरसाइकिल सवारों और दो अन्य लोगों से बात करते हुए देखा। पादरी के बेटे ने कहा, ”अचानक ही वहाँ उन लोगों ने खुली बहस के बारे में बात करना शुरू कर दिया और उनमें से एक ने मेरे पिता को थप्पड़ जड़ दिया। मैं डर गया और कसावा के खेतों से होकर अपने घर पहुँच गया।”

क्रिश्चियन हेडलाइंस के अनुसार, पादरी चिकूमा की पत्नी जेसिका नाइकोम्बा एक घंटे बाद घर पहुँचीं तो उन्हें वहाँ कोई नहीं मिला। पादरी की पत्नी ने बताया, “काफी ढूँढने के बाद मैंने अपने पति को आखिरकार ढूँढ लिया। हमें वह खून से लथपथ मिले, उनके सिर को काट दिया गया था और उनकी जीभ निकाल ली गई थी।”

बहरहाल, पल्लीसा पुलिस ने शव को अपने कब्जे में लेकर पल्लीसा के ही एक अस्पताल में पोस्टमार्टम के लिए पहुँचा दिया। फिलहाल पुलिस मामले की छानबीन कर रही है।

अब व्हाइट फंगस का अटैक, प्राइवेट पार्ट्स को बनाता है निशाना: ब्लैक फंगस से कई गुना ज्यादा खतरनाक – जानिए लक्षण और इलाज

कोरोना वायरस महामारी के बीच ‘ब्लैक फंगस’ का आतंक सामने आया है, जिससे मरीज की आँखों की रोशनी को खासी क्षति पहुँच रही है। वहीं अब इससे भी कई गुना खतरनाक ‘व्हाइट फंगस’ के मामले मिलने शुरू हो गए हैं। बिहार की राजधानी पटना में ही इसके 4 मरीज मिले हैं। ब्लैक फंगस संक्रमण पहले ही भारत के कई राज्यों में फ़ैल चुका है और इसे लेकर केंद्र सरकार ने राज्यों को कई निर्देश भी दिए हैं।

White Fungus से कितना है खतरा?

पटना में जिन मरीजों को ‘व्हाइट फंगस’ ने शिकार बनाया है, उनमें से एक शहर के लोकप्रिय चिकित्सक हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि ‘व्हाइट फंगस’ अगर किसी के शरीर में प्रवेश कर गया तो वो उसके फेंफड़ों के साथ-साथ नाखून, चमड़ी, पेट, किडनी, दिमाग और मुँह के अलावा प्राइवेट पार्ट्स को भी निशाना बनाता है, इसीलिए इसे ‘ब्लैक फंगस’ से ज्यादा खतरनाक बताया गया है। इसकी प्रकृति कोविड-19 वायरस की तरह ही है।

ये हाई रिजोल्यूशन सिटी (HRCT) स्कैन से पकड़ में आता है। अगर इसका संक्रमण फैलता है तो फिर देश के स्वास्थ्य व्यवस्था को तीन मोर्चों पर लड़ाई लड़नी पड़ेगी। जैसे कोरोना मुख्यतः मरीज के फेंफड़ों को निशाना बनाता है, ये भी वैसा ही करता है लेकिन कई अन्य अंगों पर भी दुष्प्रभाव छोड़ता है। मुँह के भीतर ये घाव का कारण बन जाता है। पटना में सामने आए मामलों को भी कोरोना समझ कर भर्ती किया गया था, लेकिन वो ‘व्हाइट फंगस’ के निकले।

इन सभी लोगों की कोरोना रिपोर्ट नेगेटिव आई थी। ऐसी स्थिति में तत्काल एंटी-फंगल दवाइयॉं चालू करनी पड़ती है, वरना ये नियंत्रण से बाहर हो जाता है। ये असाध्य नहीं है। मरीज ठीक भी हो रहे हैं। ‘सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन’ के अनुसार, ये फंगी पर्यावरण में ही रहते हैं, खासकर मिट्टी या फिर सड़ रहे आर्गेनिक पदार्थों में। सड़ी हुई पत्तियों, खाद, सड़ी हुई लकड़ी इत्यादि में ये पाए जा सकते हैं।

क्या है ब्लैक फंगस और व्हाइट फंगस?

ब्लैक फंगस को Mucormycosis या Zygomycosis भी कहते हैं, जो Mucormycetes नामक फफूँदी समूह के कारण पैदा होते हैं। अगर इसका इलाज नहीं किया जाए तो ये काफी ज्यादा खतरनाक हो जाते हैं। अगर आपके सर व चेहरे में दर्द है, साँस लेने में तकलीफ हो रही है, मानसिक स्थिति ठीक नहीं है, उलटी में खून निकल रहा हो और देखने में परेशानी हो रही हो तो जल्द ही डॉक्टर से संपर्क करें।

इसके इलाज के लिए प्रतिदिन इन्ट्रावेनस इंजेक्शन दिया जाता है, जिसकी कीमत 3500 रुपए के आसपास होती है। लगभग 8 हफ़्तों तक इसे रोज लेने की ज़रूरत पड़ सकती है। ये फ़िलहाल अकेला ड्रग है, जिससे सफलतापूर्वक इसका इलाज हो रहा है। ‘ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया’ ने इस साल मार्च में सीरम की दवा Liposomal Amphotericin B (LAmB) को मंजूरी दी। इसकी और भी दवाएँ आ सकती हैं।

क्या कर रही है सरकार?

व्हाइट फंगस के मामले हाल ही में सामने आए हैं, ऐसे में इसके अध्ययन के बाद ही केंद्र सरकार दिशानिर्देश जारी करेगी। वहीं सभी राज्यों को “ब्लैक फंगस” को महामारी घोषित करने का निर्देश दिया गया है। इसका मतलब है कि ब्लैक फंगस के सभी पुष्ट या संदिग्ध मामले (कोविड के ठीक होते रोगियों में देखी जाने वाली स्थिति) की सूचना स्वास्थ्य मंत्रालय को देनी होगी। सभी अस्पतालों को जाँच, डायग्नोसिस, प्रबंधन के लिए दिशा-निर्देशों का पालन करना होगा।

‘बच्चों को उर्दू छाप लिरिक्स की ट्रेनिंग’: कक्षा-1 के पाठ्यक्रम में NCERT की ‘डबल मीनिंग’ कविता पर बवाल

कक्षा 1 में पढ़ाई जाने वाली NCERT की किताब रिमझिम-1 की एक कविता सोशल मीडिया पर ट्रेंड हो रही है। इस कविता का शीर्षक ‘आम की टोकरी’ है। वैसे तो कविता के शीर्षक में कोई समस्या नहीं है। लेकिन कविता की भाषा को पढ़कर कुछ लोगों का कहना है कि यह डबल मीनिंग दे रही है, इसलिए इसे पाठ्यक्रम से हटा देना चाहिए।

आम की टोकरी कविता रामकृष्ण शर्मा खद्दर ने लिखी है। कक्षा 1 के पाठ्यक्रम में इसे 2006 से लगातार पढ़ाया जा रहा है। इस कविता को लेकर सबसे पहले छत्तीसगढ़ कैडर के IAS ने ट्विटर पर आपत्ति जताई थी। इसके बाद कई यूजर्स भी कविता के शब्दों में गंदगी खोजकर इसे हटाने की माँग करने लगे।

आईएएस अवनीश शरण ने इस संबंध में ट्वीट में लिखा, “ये किस ‘सड़क छाप’ कवि की रचना है ?? कृपया इस पाठ को पाठ्यपुस्तक से बाहर करें।”

ट्विटर यूजर संजीव नेवार ने कविता शेयर कर लिखा, “हम अपने बच्चों को साहित्यिक शिक्षा दे रहे हैं या उन्हें उर्दूछाप लिरिक्स की ट्रेनिंग दे रहे रहे हैं।”

अभिनव प्रकाश ने इस कविता पर सरकार को लानत दी। उन्होंने कहा कि 7 सालों के बावजूद एनसीईआरटी किताब से एक सिंगल लाइन भी नहीं हटी। शर्म आनी चाहिए।

अंकिता पवार ने शिक्षा मंत्री को टैग करते हुए लिखा, “अगर ये NCERT पाठ्यक्रम में है तो इसे फौरन हटा देना चाहिए। बच्चों को ये जानने की जरूरत नहीं है कि छोकरी और छोकरा क्या है। ये पक्की बात है कि उनसे वह शिक्षा के क्षेत्र में आगे नहीं बढ़ेगा और न ही इसका अर्थ अच्छे संदर्भ में है।”

बता दें कि सोशल मीडिया पर एक तबका जहाँ इस कविता का विरोध कर रहा है। वहीं दूसरा तबका ऐसा है जो इसमें संशोधन की गुंजाइश बता रहा है और तीसरा तबका है जो कह रहा है कि उन्हें इसमें कोई बुराई नहीं लग रही। अगर कोई इसमें अलग मतलब निकाल रहा है तो ये उसकी समस्या है।

‘जाहिल, बेशर्म, नग्न’: मोदी पर लालू की पार्टी RJD का घटिया ट्वीट, नेटिजन्स ने की कार्रवाई की ​माँग

राजनीति का स्तर कितना अधिक गिरता जा रहा है इसका एक नमूना राष्ट्रीय जनता दल (राजद) ने पेश किया है। पार्टी ने बुधवार (19 मई 2021) को अपने आधिकारिक ट्विटर हैंडल पर बिहार के पूर्व डिप्टी सीएम और बीजेपी नेता सुशील कुमार मोदी के खिलाफ अपमानजनक पोस्ट किया। हालाँकि, बाद में बिना माफी माँगे ही आरजेडी ने उसे डिलीट भी कर दिया।

आरजेडी के डिलीट हो चुके ट्वीट का स्क्रीनशॉट

अपनी पोस्ट में आरजेडी ने सुशील कुमार मोदी के लिए जाहिल, बेशर्म, नग्न जैसी बातें की। पार्टी ने दावा किया कि मोदी के ट्विटर पर 2 मिलियन फॉलोवर होने के बाद भी उन्हें 100 लाइक तक नहीं मिलते हैं। उन्हें ट्विटर पर कोई भी तवज्जो नहीं देता है। बावजूद इसके वह सोशल मीडिया पर बार-बार अपनी कुंठा को मिटाने के लिए आ जाते हैं। आरजेडी ने आरोप लगाते हुए दावा किया कि सोशल मीडिया पर वह बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के कहने पर आते हैं।

बता दें कि जिस ट्वीट में राजद ने बिहार के पूर्व उपमुख्यमंत्री को गाली दी थी, वो वर्तमान में उसके आधिकारिक ट्विटर हैंडल से हटा लिया गया है। हालाँकि, जब तक पार्टी अपने उस विवादित ट्वीट को हटाती लोगों ने उसके स्क्रीनशॉट ले लिए थे। अब वो स्क्रीनशॉट सोशल मीडिया पर वायरल है और उस पर कई प्रतिक्रियाएँ आ रही हैं।

बिहार के पूर्व उपमुख्यमंत्री को लेकर किए गए आरजेडी के ट्वीट्स से सोशल मीडिया यूजर भड़क गए।

राजद के खिलाफ गुस्सा व्यक्त करते हुए, एक सोशल मीडिया यूजर ने पूछा कि आखिर सुशील कुमार मोदी ने अभी तक इस तरह की आपत्तिजनक टिप्पणी करने के लिए शिकायत क्यों नहीं की है? यूजर्स ने इस आपत्तिजनक पोस्ट पर बिहार के सीएम नीतीश कुमार की चुप्पी पर भी सवाल उठाया और उनसे बिहार पुलिस को कार्रवाई करने का निर्देश देने का आग्रह भी किया।

इसके बावजूद राजद ने माइक्रोब्लॉगिंग साइट पर अपने घटिया आचरण के लिए माफी नहीं माँगी है।

केंद्र ने राज्यों से कहा, ‘ब्लैक फंगस’ को करें महामारी घोषित: कई राज्यों में प्रकोप, महाराष्ट्र में अब तक 52 की मौत

कोविड के बीच ”ब्लैक फंगस” (Black Fungus) या म्यूकोरमायकोसिस के बढ़ते कहर के बीच केंद्र सरकार ने गुरुवार को सभी राज्यों को “ब्लैक फंगस” को महामारी घोषित करने का निर्देश दिया। स्वास्थ्य मंत्रालय ने राज्यों से ब्लैक फंगस को “महामारी रोग अधिनियम” के तहत दुर्लभ लेकिन संभावित घातक संक्रमण के तहत दर्ज करने को कहा है। हाल के दिनों में देश में कोविड-19 से उबर चुके लोगों में ब्लैक फंगस के मामले सामने आए हैं।

इसका मतलब है कि ब्लैक फंगस के सभी पुष्ट या संदिग्ध मामले (कोविड के ठीक होते रोगियों में देखी जाने वाली स्थिति) की सूचना स्वास्थ्य मंत्रालय को देनी होगी।

स्वास्थ्य मंत्रालय के संयुक्त सचिव लव अग्रवाल ने राज्यों को लिखे पत्र में कहा है, “सभी सरकारी और निजी स्वास्थ्य सुविधाओं और मेडिकल कॉलेजों को म्यूकोरमायकोसिस की जाँच, डायग्नोसिस, प्रबंधन के लिए दिशा-निर्देशों का पालन करना होगा।”

राजस्थान, तेलंगाना और तमिलनाडु में ब्लैक फंगस महामारी घोषित

बुधवार (19 मई) को राजस्थान के ब्लैक फंगस को महामारी घोषित करने के बाद गुरुवार (20 मई) को दो और राज्यों तेलंगाना और तमिलनाडु ने भी इस बीमारी को महामारी घोषित कर दिया।

तमिलनाडु में ब्लैक फंगस से पहली संदिग्ध मौत की सूचना है। थूटूकुड्डी जिले में कोविड से पीड़ित एक 57 वर्षीय व्यक्ति की सरकारी अस्पताल में ब्लैक फंगस से मौत होने की आशंका है।

वहीं तेलंगाना में सरकारी और निजी अस्पतालों में करीब ब्लैक फंगस के 80 मरीजों का इलाज चल रहा है। सरकार ने इसके इलाज के लिए गाँधी जनरल हॉस्पिटल और सरकारी अस्पताल ईएनटी हॉस्टिपल को ब्लैक फंगस के इलाज के लिए नोडल केंद्रों के रूप में चिन्हित किया है।

राजस्थान के स्वास्थ्य सचिव अखिल अरोड़ ने कहा कि अभी ब्लैक फंगस के करीब 100 से अधिक मामले हैं और उनके इलाज के लिए जयपुर स्थित सवाई मान सिंह अस्पताल में एक अलग वॉर्ड बनाया गया है।

ब्लैक फंगस के मामले शुरू में गुजरात और महाराष्ट्र में सामने आए थे और इसके बाद ये देश के कई राज्यों में फैल गया। ब्लैक फंगस से महाराष्ट्र में पिछले साल कोविड-19 फैलने के बाद से अब तक 52 लोगों के मरने की खबर है। राज्य में इस बीमारी से करीब 1500 लोगों का इलाज चल रहा है। पुणे में ही ब्लैक फंगस से पीड़ित 270 लोगों का इलाज चल रहा है

वहीं गुजरात में अब तक इसके 100 से अधिक मामले सामने आ चुके हैं जबकि 40 लोग ब्लैक फंगस की वजह से आँखों की रोशनी गँवा चुके हैं जिनमें से 8 तो सूरत के ही हैं।

मध्य प्रदेश में भी ब्लैक फंगस से दो लोगों की मौत हुई है, जबकि उत्तर प्रदेश और दिल्ली में एक-एक मौत हुई हैं।

अब तक ब्लैक फंगस का प्रकोप गुजरात, महाराष्ट्र, दिल्ली, मध्य प्रदेश, राजस्थान, कर्नाटक, तेलंगाना, यूपी, बिहार, तमिलनाडु और हरियाणा समेत 11 राज्यों में देखा जा रहा है।

पागल, मूर्ख, नस्लवादी, सूअर, मदरफ*#… ट्रंप को ओबामा ने दे रखे थे कई नाम, पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति की बातें किताब से जगजाहिर

अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को उनके पूर्ववर्ती बराक ओबामा ने कई नाम दे रखे थे। मसलन, पागल, नस्लवादी, सेक्सिस्ट सूअर, मूर्ख आदमी, भ्रष्टाचारी मदरफ*#। एक किताब के हवाले से विदेशी मीडिया की रिपोर्टों में यह दावा किया गया है।

इस किताब का नाम है: Battle for the Soul: Inside the Democrats’ Campaigns to Defeat Trump। लेखक हैं एडवर्ड इसाक डोवर (Edward-Isaac Dovere)। डोवर अटलांटिक के स्टाफ राइटर हैं। यह किताब अगले सप्ताह बाजार में आएगी।

किताब में डोवर ने बताया है कि ट्रंप के लिए एक बार ओबामा ने कहा था, “मैंने नहीं सोचा था कि यह इतना बुरा होगा… मैंने नहीं सोचा था कि हमारे पास एक नस्लवादी, सेक्सिस्ट सूअर होगा… वह च*** पागल हो गया है।” रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि ट्रंप के लिए बराक ओबामा सार्वजनिक तौर पर कुछ नहीं बोलते। लेकिन पर्दे के पीछे वह अपनी स्पष्ट राय रखते थे। उन्होंने ट्रंप के लिए भी यह बातें गुस्से में कही थी।

रिपोर्ट के अनुसार ट्रंप को लेकर ओबामा की सोच जगजाहिर है। लेकिन शायद ही इससे पहले कभी इस पर खुल कर रिपोर्ट की गई गई हो। इसके मुताबिक शुरुआत में ओबामा ने राष्ट्रपति के रूप में ट्रंप की संभावना को प्राथमिकता दी थी। लेकिन 2017 से उनके विचार बदल गए और कई अन्य अमेरिकियों की तरह वे ट्रंप को पागल कहने लगे। सबसे हैरान करने वाली टिप्पणी उनकी ‘that corrupt motherf***er’ थी। ये शब्द उन्होंने तब कहे थे जब उन्हें पता चला कि ट्रम्प बिना किसी सहयोगी के पुतिन के साथ बात कर रहे हैं।

गार्जियन की रिपोर्ट में बताया गया है कि जोनाथन एलन और एमी पर्नेस की किताब  ‘Lucky: How Joe Biden Barely Won the Presidency’ की तरह डोवर ने भी अपनी किताब में ओबामा और बाइडन की रिलेशनशिप पर भी बात की है। इसमें कहा गया है कि दोनों के बीच संबंध सहज नहीं थे, क्योंकि वे 8 साल सत्ता में थे। 

एलन और पार्नेस की तरह डोवर ने ओबामा के संदेहों पर चर्चा करते हुए बताया कि कैसे बाइडन के बेहतर अतीत के बावजूद चर्चा ये थी कि वह इस समय काफी बुजुर्ग हैं। इसके अलावा जो बाइडन की पत्नी जिल बाइडन की बात का भी इस रिपोर्ट में जिक्र है क्योंकि उन्होंने कमला हैरिस को लेकर आपत्तिजनक शब्द कहे थे।

उन्होंने अपने समर्थकों से कहा था कि कमला, जो पर हमला बोलने के लिए किसी भी घटिया हद (Kamala could ‘go f*** herself’ for attacking Joe for supporting racist policies) तक जा सकती हैं। लेकिन दिलचस्प बात ये है कि 2020 में राष्ट्रपति चुने जाने के बाद जो बाइडन ने कमला हैरिस को उपराष्ट्रपति पद के लिए चुना।