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मुकेश अंबानी के RIL ने दिया कोविड रिलीफ में सर्वाधिक योगदान: हॉस्पिटल, ऑक्सीजन, पीपीई किट से लेकर मास्क का निर्माण

मुकेश अंबानी की रिलायंस इंडिया लिमिटेड (RIL) और रिलायंस फाउंडेशन भारत में कोरोना वायरस संक्रमण की दूसरी लहर के दौरान चल रहे राहत कार्यों में सर्वाधिक योगदान देने वाले औद्योगिक घरानों में से एक हैं।

IANS के द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट में बताया गया है कि कोरोना वायरस से संक्रमित मरीजों के लिए जामनगर और मुंबई में RIL ने अब तक 1,875 बेड स्थापित किए हैं। भारत का पहला 100 बिस्तरों वाला कोविड केयर इलाज केंद्र भी मुकेश अंबानी के रिलायंस समूह द्वारा अप्रैल 2020 में स्थापित किया गया था। इसके अलावा RIL ने मुंबई, सूरत और अन्य जगहों पर क्वारंटीन और आइसोलेशन सुविधा तैयार की है। रिलायंस फाउंडेशन ने मुंबई में हिन्दू हृदय सम्राट बालासाहब ठाकरे ट्रामा केयर अस्पताल में 10 बिस्तरों वाला एक डायलिसिस सेंटर भी स्थापित किया है।

देश में ऑक्सीजन की आपूर्ति के लिए भी रिलायंस अग्रणी रूप से सहायता कर रहा है। RIL इस समय देश का सबसे बड़ा ऑक्सीजन उत्पादक है जो प्रतिदिन 1,000 मीट्रिक टन ऑक्सीजन का उत्पादन कर रहा है। यह भारत के कुल ऑक्सीजन उत्पादन का लगभग 11% है एवं इससे 100,000 मरीजों को रोजाना मुफ़्त में ऑक्सीजन मिल रही है। आयात पर निर्भरता कम करने के लिए रिलायंस समूह अपने औद्योगिक केंद्रों में 1 लाख पीपीई किट और मास्क का निर्माण कर रहा है।

दान की बात करें तो रिलायंस समूह पीएम केयर्स और अन्य सहायता फंड में अब तक 556 करोड़ रुपए दान कर चुका है। अपने अन्न सेवा मिशन के माध्यम से रिलायंस समूह ने 18 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के 80 जिलों में 5.5 करोड़ खाद्य पैकेट मुहैया कराए हैं। रिलायंस द्वारा मई-जून 2021 तक 2 करोड़ खाद्य पैकेट मुहैया कराने का लक्ष्य रखा गया है।

लाखों मास्क, पीपीई किट और कोविड अवेयरनेस बुकलेट के अलावा रिलायंस 18 राज्यों के 249 जिलों में कोविड सेवा में लगे 14,000 एम्बुलेंस और वाहनों को 5.5 लाख लीटर से अधिक मुफ़्त ईधन उपलब्ध करा चुका है।

रिलायंस के अतिरिक्त अन्य औद्योगिक समूह भी कर रहे सहायता :

रिलायंस के अतिरिक्त भी अन्य औद्योगिक समूह भी कोरोना वायरस संक्रमण के विरुद्ध इस लड़ाई में अपना योगदान दे रहे हैं। अजीम प्रेमजी फाउंडेशन और विप्रो ने 1,125 करोड़ रुपए की सहायता दी है। इसके अलावा पुणे स्थित आईटी केंद्र को 450 बिस्तर वाले कोविड केयर अस्पताल में बदल दिया गया है। आईटी कंपनी इन्फोसिस ने भी 200 करोड़ रुपए का दान दिया है। साथ ही इन्फोसिस ने लगभग 1 मिलियन गरीबों और प्रवासी मजदूरों के लिए 2.4 मिलियन खाद्य पैकेट्स की व्यवस्था भी की है और पुलिस और फ्रंटलाइन वर्कर्स के लिए मास्क और सैनिटाइजर का प्रबंध भी किया है।

वेदांता समूह ने भी 201 करोड़ रुपए की सहायता की घोषणा की है जिसमें से 101 करोड़ रुपए पीएम केयर्स फंड को और शेष राशि फ्रंटलाइन वर्कर्स, दिहाड़ी मजदूरों और व्यापारिक सहयोगियों के कर्मचारियों को सहायता के रूप में दिए जाएँगे। इसके अलावा वेदांता ने ‘मील्स फॉर ऑल’ स्कीम भी लॉन्च की है जिसके अंतर्गत लाखों दिहाड़ी मजदूरों और गरीबों को मुफ़्त में भोजन उपलब्ध कराया जाता है। 

फार्मास्युटिकल कंपनी सिपला ने भी 25 करोड़ रुपए का योगदान दिया है। इसमें से 9 करोड़ रुपए पीएम केयर्स फंड में दिए गए गए हैं। शेष राशि से डॉक्टरों और मेडिकल स्टाफ के लिए ग्लव्स, मास्क और सैनिटाइजर उपलब्ध कराए जा रहे हैं। सिपला प्रवासी मजदूरों के लिए भी आवश्यक वस्तुओं, खाद्य पैकेटों और राशन किट की व्यवस्था कर रहा है।

‘ऑक्सीजन संकट के लिए मोदी सरकार नहीं, राज्य सरकारों को ठहराया जाना चाहिए जिम्मेदार’: BMC चीफ

भारत कोरोनो वायरस की दूसरी लहर से जूझ रहा है। कोरोना महामारी के खिलाफ लड़ाई में ऑक्सीजन की सप्लाई बेहद जरूरी हो गई है। दिल्ली, महाराष्ट्र समेत कई राज्य सरकारें ऑक्सीजन की कमी के लिए केंद्र सरकार को जिम्मेदार ठहरा रही हैं, लेकिन मुंबई बीएमसी चीफ इकबाल सिंह चहल ने कहा है कि ऑक्सीजन संकट के लिए केंद्र नहीं राज्य सरकारें जिम्मेदार हैं।

इंडियन एक्सप्रेस को दिए एक इंटरव्यू में चहल ने कहा कि केंद्र सरकार को देश में ऑक्सीजन संकट के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है। उन्होंने कहा कि राज्यों को ऑक्सीजन के अपर्याप्त आवंटन के लिए दोषी ठहराया जाना चाहिए।

चहल ने कहा, “भारत सरकार को इन सबके लिए दोष नहीं दिया जाना चाहिए। अगर किसी को जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए, तो वह राज्य हैं।” चहल ने कहा कि देश के कई राज्य यह स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थे कि उनके यहाँ कोरोना के कुल कितने मामले हैं। ऐसे में केंद्र उन्हें कैसे ऑक्सीजन आवंटित करता?”

‘सटीक ऑक्सीजन आवंटन के लिए केसों की सही संख्या बताएँ राज्य’

चहल ने तर्क देते हुए कहा कि केंद्र कोविड-19 मामलों की संख्या में भारी अंतर होने के कारण राज्यों को समान मात्रा में ऑक्सीजन कैसे आवंटित कर सकता है। उन्होंने कहा कि केंद्र 6,000 मामले वाले राज्य और महाराष्ट्र को समान रूप से ऑक्सीजन का आवंटन नहीं कर सकता है, जहाँ रोज 60,000 नए मामले दर्ज किए जा रहे हैं।

उन्होंने कहा कि अगर राज्य ठीक से जाँच करें, तो कोविड-19 मामलों की संख्या बहुत अधिक होगी। इसके अनुसार ही केंद्र सरकार उन्हें ऑक्सीजन आवंटित कर सकता है। लेकिन अगर वे ठीक से कोरोना के मामलों की रिपोर्ट नहीं करेंगे और कम मामले दिखाएँगे तो उनका ऑक्सीजन आवंटन उन मामलों की संख्या के अनुसार ही होगा, जिसे वे केंद्र को रिपोर्ट कर रहे हैं। ऐसी स्थिति में हम केंद्र को इसका दोष नहीं दे सकते हैं।

‘अस्पतालों पर बेड बढ़ाने का दबाव बड़े शहरों में ऑक्सीजन संकट का जिम्मेदार’

यह पूछे जाने पर कि दिल्ली में निरंतर ऑक्सीजन संकट के पीछे क्या कारण हो सकता है। इस पर चहल ने बताया कि मुंबई और दिल्ली सहित कई बड़े शहरों में जब कोरोना के केस बढ़ते हैं, तब अस्पतालों पर बेड बढ़ाने के लिए दबाव डाला जाता है। हालाँकि, इस बात पर ध्यान नहीं दिया जाता है कि अस्पतालों में ऑक्सीजन की आपूर्ति सीमित है। चहल ने जोर देकर कहा कि जब कोरोना के मामले तेजी से बढ़ रहे हों ऐसी स्थिति में जंबो कोविड केंद्रों पर बेड बढ़ाए जाने चाहिए, जहाँ ऑक्सीजन की आपूर्ति का विस्तार किया जा सकता है।

बीएमसी कमिश्नर ने बताया कि 16-17 अप्रैल की रात को उनके पास खबर आई कि मुंबई में 6 अस्पतालों में ऑक्सीजन नहीं है। उन्होंने बताया कि इन अस्पतालों में 168 मरीज थे। इन्हें शिफ्ट कराने के लिए बीएमसी की ओर से रात को 1 बजे 5 बजे के बीच 150 एंबुलेंस लगाई गईं। सभी मरीजों को कोविड सेंटर लाया गया, जहाँ 3,600 बेड खाली थे। इनमें से 850 बेड ऑक्सीजन युक्त थे। बीएमसी सभी मरीजों की जान बचाने में सफल रही।

बीएमसी प्रमुख ने किया पूर्ण लॉकडाउन न लगाने के केंद्र के फैसले का समर्थन

चहल देश में पूर्ण लॉकडाउन लागू नहीं करने के केंद्र सरकार के फैसले से भी सहमत दिखे। उन्होंने तर्क दिया कि जिन राज्यों में कोरोना के कम मामले हैं, वे देशव्यापी लॉकडाउन का खामियाजा क्यों भुगतें। उन्होंने कोरोनो वायरस की दूसरी लहर से निपटने के लिए केंद्र के फैसले की सराहना की और राज्य सरकारों को आईना दिखाया।

बता दें कि ऑक्सीजन संकट के लिए जिम्मेदार राज्यों में एक महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे को चहल का यह करारा जबाब है। दरअसल, महाराष्ट्र में कोरोना संकट के लिए ठाकरे सरकार शुरू से ही केंद्र सरकार को जिम्मेदार ठहरा रही है। हालाँकि चहल ने अपने इंटरव्यू में उनके झूठ को बेनकाब कर दिया है।

‘मेरे समय में बॉयफ्रेंड न होना और वर्जिन होना जरूरी था, अब ऐसा नहीं’: बेटी अलाया के अफेयर पर पूजा बेदी

90 के दशक में बॉलीवुड की कई फिल्मों में नजर आने वाली एक्ट्रेस पूजा बेदी की बेटी अलाया एफ भी अब फिल्मी दुनिया में कदम रख चुकी हैं। पिछले साल उन्होंने जवानी जानेमन से अपना डेब्यू किया था। बाद में वह ऐश्वर्या ठाकरे (बाल ठाकरे के पोते) के साथ रिलेशन के कारण खबरों में आईं। हाल में उनके अफेयर पर उनकी माँ पूजा बेदी ने एक इंटरव्यू में खुलकर बात की है।

पूजा बेदी ने टाइम्स ऑफ इंडिया से बात करते हुए कहा कि उनके समय के मुकाबले आज के टाइम में लोगों के पास निजी जीवन में काफी आजादी है। उन्होंने कहा, “अलाया की पर्सनल लाइफ को लेकर हमेशा अटकलें लगाई जाएँगी। मेरे समय में चीजें अलग थीं। उस वक्‍त बॉयफ्रेंड नहीं होना, वर्जिन होना और गैर-शादीशुदा होना जरूरी था। आज हर एक इंसान को अपनी पर्सनल लाइफ का हक है।”

एक्ट्रेस ने कहा, “करीना कपूर शादी के बाद बहुत बढ़िया कर रही है। मैं कहती हूँ कि आज के समय में इंडस्ट्री काफी बदल गई है और ये सब हुआ क्योंकि दर्शकों की मानसिकता बदली। इसके लिए सोशल मीडिया का धन्यवाद।”

बता दें कि ऐश्वर्य और अलाया पिछले कुछ समय में एक साथ कई जगह स्पॉट किए गए, तभी से ये अफवाहें मीडिया में रहती हैं कि दोनों एक-दूसरे को डेट कर रहे हैं। हालाँकि, एक इंटरव्यू में अलाया इन अफवाहों से इनकार कर चुकी हैं। उनका कहना है कि वे केवल अच्छे दोस्त हैं।

अलाया के मुताबिक, वे दोनों फैमिली फ्रेंड हैं। ऐश्वर्य की माँ उनके नाना कबीर बेदी और माँ पूजा बेदी दोनों को अच्छे से जानती हैं। इसके अलावा वह दोनों एक साथ एक्टिंग और डांस क्लास भी जाते थे। अब पैपराजी की तस्वीरों से ज्यादा कयास लगने लगे हैं। मगर हकीकत में वह पहले से एक-दूसरे को जानते थे और मिलते भी थे।

उल्लेखनीय है कि एक्ट्रेस पूजा बेदी ने साल 2019 में मानेक कॉन्ट्रैक्टर से सगाई की थी। पूजा के मुताबिक, उनकी बेटी ने उन्हें कहा था कि पापा को देखो उनके पास एक खूबसूरत साथी है, अब आपको भी आगे बढ़ना चाहिए।

आखिरी मुलाकात भी रही अधूरी: एक्टर राहुल वोहरा की कोविड से मृत्यु के बाद पत्नी ज्योति ने शेयर किया भावुक संदेश

यूट्यूब एक्टर राहुल वोहरा की कोरोना संक्रमण से मृत्यु के बाद उनका आखिरी सोशल मीडिया पोस्ट हर जगह वायरल है। वोहरा के उस आखिरी पोस्ट को शेयर करके लोग सरकार और प्रशासन की विफलता को उजागर कर रहे हैं। मगर, इस बीच उनकी पत्नी और सह कलाकार ज्योति तिवारी ने बेहद भावुक कर देने वाला पोस्ट अपने सोशल मीडिया पर शेयर किया है।

अपने पोस्ट में ज्योति ने राहुल वोहरा की कई तस्वीरें शेयर की। ज्योति ने लिखा, “चले गए न प्यार अधूरा कर के।” फेसबुक की एक स्टोरी में उन्होंने लिखा, “आज सारा भ्रम टूट गया।” ज्योति ने शादी के वक्त की तस्वीर को ब्लैक एंड व्हाइट में पोस्ट करते हुए उस पर लिखा, “हमारी आखिरी मुलाकात भी अधूरी रही। मुझे नहीं पता कि भगवान को तुम इतने पसंद क्यों आ गए। मेरी जिंदगी जहाँ भी गया तू खुश रह।”

बता दें कि राहुल वोहरा की मृत्यु से एक दिन पहले ही कई वेबसाइट्स ने उन्हें डेथ रिपोर्ट करना शुरू कर दी थी। ऐसे में ज्योति ने लिखा था कि कुछ पेज मेरे पति के बारे में फर्जी खबर फैला रहे हैं। उनकी रिपोर्ट करें। वह जल्दी अच्छे हो जाएँगे।

ज्योति ने अपने एक पोस्ट में वोहरा का पोस्ट शेयर करके मदद माँगी थी। इस पोस्ट में राहुल ने बताया था कि वो कोविड पॉजिटिव हैं और एडमिट हैं। लेकिन 4 दिन से उनकी हालत में सुधार नहीं है। उन्होंने लोगों से पूछा था कि क्या कोई अस्पताल है जहाँ उन्हें ऑक्सीजन बेड मिल जाए।

जिस समय एक्टर ने यह पोस्ट किया उस समय उनका ऑक्सीजन लेवल लगातार गिर रहा था और उन्हें देखने वाला कोई नहीं था। राहुल ने पोस्ट में बताया था कि वो बहुत मजबूरी में अपना पोस्ट लिख रहे हैं, क्योंकि उनके घरवालों से कुछ नहीं संभल रहा।

जानकारी के मुताबिक राहुल और ज्योति की शादी 6 माह पहले हुई थी। दोनों यूट्यूब पर साथ में वीडियोज बनाते थे। फेसबुक पर राहुल के 2 मिलियन फॉलोवर, यूट्यूब पर 1 लाख से ज्यादा सब्सक्राइबर थे। अपने आखिरी संदेश में राहुल ने लिखा था, “मुझे भी ट्रीटमेंट अच्छा मिल जाता तो मैं भी बच जाता। तुम्हारा राहुल वोहरा।” अपनी डिटेल्स देते हुए आखिर में उन्होंने कहा था, “जल्द जन्म लूँगा और अच्छा काम करूँगा। अब हिम्मत हार चुका हूँ।”

दिल्ली हिन्दू विरोधी दंगों की ‘साजिशकर्ता’ नताशा नरवाल को 3 हफ्तों की अंतरिम जमानत, Covid-19 से हुई पिता की मौत

फरवरी में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए सीएए और हिन्दू विरोधी दंगों में साजिश रचने के आरोप में दिल्ली की तिहाड़ जेल में बंद ‘पिंजरा तोड़’ की कार्यकर्ता नताशा नरवाल को दिल्ली हाई कोर्ट ने सोमवार (10 मई) को तीन सप्ताह की अंतरिम जमानत दे दी। उन्हें यह जमानत अपने पिता के अंतिम संस्कार के लिए दी गई है जिनकी कोरोना वायरस संक्रमण के कारण मृत्यु हो गई थी।

एक दिन पहले ही नताशा के पिता महावीर नरवाल की मृत्यु कोरोना वायरस के चलते हो गई। महावीर नरवाल भारतीय मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (CPIM) के वरिष्ठ सदस्य थे। नताशा नरवाल के भाई आकाश भी कोरोना वायरस से संक्रमित हैं, इसी कारण नताशा को दिल्ली हाई कोर्ट ने जमानत दी। हालाँकि दिल्ली पुलिस ने भी मानवीय आधार पर नताशा की जमानत याचिका का कोई विरोध नहीं किया।

आपको बता दें कि सीएए विरोधी और पिंजरा तोड़ की कार्यकर्ता नताशा नरवाल मई 2020 से दिल्ली की तिहाड़ जेल में बंद हैं। उन पर फरवरी 2020 में हुए हिन्दू विरोधी दिल्ली दंगों में साजिश रचने का गंभीर आरोप है। नताशा पर UAPA के तहत मामला दर्ज हुआ था।

फरवरी 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हिन्दू विरोधी हिंसा भड़क उठी थी। सीएए के विरोध में महीनों से जारी आंदोलन फरवरी 2020 में हिंसक हो गया था। तीन दिनों तक चली इस हिन्दू विरोधी हिंसा में 50 से अधिक लोगों की मौत हो गई थी। दिल्ली की गलियों में हो रही इस हिंसा में इस्लामी भीड़ ने ऐसा क्रूर प्रदर्शन किया था, जो हाल के दिनों में नहीं देखने को मिला था।  

गैर बीजेपी मुख्यमंत्रियों की ‘हरकतों’ में मोदी विरोध का ‘हीरो’ तलाशता इकोसिस्टम: संघीय ढाँचे में राजनीतिक परंपराओं की ये कैसी नींव?

तीसरी बार सत्ता में आने के बाद ममता बनर्जी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को तीन पत्र लिख चुकी हैं। पहले पत्र में उन्होंने केंद्र सरकार से अपने राज्य के लिए कोविड की महामारी से निपटने के लिए अधिक ऑक्सीजन, दवाइयाँ और वैक्सीन की माँग की। दूसरे पत्र में अधिक ऑक्सीजन की माँग करते हुए उन्होंने लिखा कि यदि राज्य के लिए मेडिकल ऑक्सीजन की मात्रा न बढ़ाई गई तो अधिक लोगों की मौत हो सकती है। तीसरे पत्र में उन्होंने लिखा कि केंद्र सरकार कोविड संबंधित दवाइयों के साथ-साथ ऑक्सीजन टैंक, क्रायोजेनिक टैंक, टैंकर, कॉन्सेंट्रेटर और सिलेंडर पर टैक्स की छूट दे। साथ ही उन्होंने पश्चिम बंगाल में उत्पादित ऑक्सीजन से दूसरे राज्यों का कोटा बढ़ाने पर केंद्र सरकार की आलोचना की।

केंद्र सरकार के सामने ये माँगें रखने के बाद वे एक माँग लेकर सुप्रीम कोर्ट भी पहुँच गई हैं। सुप्रीम कोर्ट से उनकी माँग है कि केंद्र द्वारा 18 से 44 वर्ष आयु वर्ग के लिए घोषित टीकाकरण अभियान पर रोक लगे और एक नया यूनिवर्सल टीकाकरण अभियान शुरू किया जाए जिसमें सबका मुफ्त में टीकाकरण हो।  

केंद्र सरकार के वित्त मंत्रालय की ओर से उनके एक पत्र के उत्तर में बताया गया कि कोविड की रोकथाम और इलाज के लिए देश में बनने वाली दवाइयों और उपकरणों पर जीएसटी आवश्यक क्यों है। साथ ही कोविड की राहत सामग्री, आयात होने वाले उपकरणों, दवाइयों और संबंधित चीजों पर आयात शुल्क 30 जून तक हटा लिया गया है।

बढ़ते संक्रमण को देखते हुए किसी भी राज्य के लिए अधिक ऑक्सीजन की माँग स्वाभाविक है। पर इस माँग को कैसे जायज ठहराया जा सकता है कि केंद्र सरकार पश्चिम बंगाल में उत्पादित ऑक्सीजन से अन्य राज्यों का कोटा न बढ़ाए? इस बात को देखते हुए कि ऑक्सीजन का उत्पादन अन्य राज्यों में भी होता है, कल और राज्य ऐसी माँगे उठाने लगेंगे तो उसका क्या परिणाम होगा?

ओडिशा से देश के अन्य राज्यों को ऑक्सीजन मिल रही है। क्या ऐसी ही माँग ओडिशा से आई? वेदांता को उच्चतम न्यायालय ने तमिलनाडु के उसके प्लांट में ऑक्सीजन के उत्पादन की अनुमति दी ताकि बढ़ते संक्रमण के चलते ऑक्सीजन की कमी को कुछ हद तक पूरा किया जा सके। पश्चिम बंगाल से प्रभावित होकर यदि तमिलनाडु भी यह माँग कर दे तो?

जिन राज्यों में वैक्सीन का उत्पादन होता है, क्या वे राज्य माँग कर सकते है कि चूँकि वैक्सीन उन राज्यों में बनती है इसलिए उस पर पहला अधिकार उनका है? वहाँ के नागरिकों के टीकाकरण के बाद यदि वैक्सीन बची तभी दूसरे राज्यों को दी जा सकेगी? क्या होगा यदि दवाइयों का उत्पादन करने वाले राज्य यह माँग करें कि दवाइयाँ पहले उन राज्य के नागरिकों को मिलेंगी और बाकी राज्यों को उसी स्थिति में मिलेंगी जब अतिरिक्त होंगी?

प्रश्न यह उठता है कि भारत के संघीय ढाँचे में यह कैसी राजनीतिक परंपराओं की नींव रखी जा रही है? अपने ही पत्र में खुद ममता बनर्जी लिखती हैं कि महामारी से यदि हम मिलकर लड़ेंगे तभी उसे परास्त कर सकेंगे। ऐसी माँगों से मिलकर लड़ने वाली सोच की ख़ुशबू आ रही है? यह कैसा मिलकर लड़ना है जिसमें संघीय ढाँचे, उद्योग और व्यापार के मूलभूत नियमों और परंपराओं को ताक पर रखने की कोशिशें आरंभ हो गई हैं?

दवाइयों, उपकरणों और संबंधित चीजों पर आयात शुल्क हटाने की माँग पर केंद्र सरकार की ओर से यह बताया गया कि शुल्क पहले ही हटा लिया गया है। एक राज्य के मुख्यमंत्री को पत्र लिखने से पहले क्या यह जानकारी नहीं ले लेनी चाहिए कि जिन शुल्कों को वे हटाने की माँग कर रही हैं वे वर्तमान में लगते हैं या नहीं? यह जानकारी लेने में क्या समस्या है कि जिन शुल्क को हटाने की माँग होने जा रही है, उन्हें लेकर वर्तमान सरकारी नीति क्या है? यह जानना कितना कठिन है?

इन मुख्यमंत्रियों के साथ ‘सहानुभूति’ रखने वाला मीडिया ऐसे पत्र पर बढ़-चढ़कर रिपोर्टिंग करता है। लेकिन इन पत्रों के जवाब गोल कर जाता है। विरोधी मुख्यमंत्रियों के ऐसे प्रश्नों पर जो हल्ला मचाया जाता है उसे लेकर आम नागरिकों के मन में एक धारणा जन्म लेती है कि केंद्र सरकार इतनी ख़तरनाक महामारी से लड़ने को लेकर उतनी गंभीर नहीं है जितने राज्यों के ये मुख्यमंत्री हैं। कुछ ऐसी ही स्थिति दिल्ली उच्च न्यायालय में दिखाई दी जब दिल्ली सरकार के वकील ने माँग रखी कि न्यायालय केंद्र सरकार को आदेश देकर रेमडेसिविर के निर्यात पर रोक लगाए। जवाब में उन्हें जब यह सुनने को मिला कि निर्यात पहले से ही बंद है तो उसके बाद उनके पास कुछ कहने को नहीं था।

इस तरह से उठाए जाने वाले प्रश्न क्या अनभिज्ञता का परिणाम हैं? यदि यह राज्य सरकारों की अनभिज्ञता का ही परिणाम है तो क्या राज्य सरकारों के प्रतिनिधियों की ज़िम्मेदारी नहीं बनती कि वे अपना होमवर्क करके प्रधानमंत्री को पत्र लिखें? पत्र लिखने की ऐसी क्या जल्दी है कि एक मुख्यमंत्री एक ही विषय पर सप्ताह भर में तीन पत्र लिखे, साथ मिलकर काम करने की वकालत भी करे और उसके बाद भी अपनी एक माँग लेकर सुप्रीम कोर्ट भी पहुँच जाए?

दरअसल इस तरह की घटनाएँ केंद्र विरोधी राज्यों की सोच, उनकी प्राथमिकता और उनकी गंभीरता दर्शाती हैं। वे ऐसी हरकतें कर खुद कुछ करते हुए दिखना चाहते हैं, साथ ही यह भी साबित करना चाहते हैं कि केंद्र सरकार या प्रधानमंत्री गंभीर नहीं हैं। यही सोच झारखंड के मुख्यमंत्री से ट्वीट करवाती है कि प्रधानमंत्री ने फ़ोन कर अपने मन की बात की। काश वे काम की बात करते। ये ऐसा कर सकते हैं, क्योंकि इन्हें पता है कि इनकी विफलताओं की चर्चा नहीं होगी। इनसे सवाल नहीं पूछे जाएँगे क्योंकि मीडिया इनमें वह हीरो खोजने में लगा है जो नरेंद्र मोदी को कुछ भी करके नीचा दिखा दे।

‘एलियंस ने 50 बार किया मेरा अपहरण, साबित करने के लिए हैं खरोंच के निशान’, ब्रिटिश महिला का हैरान करने वाला दावा

ब्रिटेन की एक 50 वर्षीय महिला पाउला स्मिथ (Paula Smith) ने दावा किया है कि एलियंस उनका कई बार अपहरण कर चुके हैं। पाउला का दावा है कि एलियंस ने एक या दो बार नहीं बल्कि पचास से भी अधिक बार न केवल उनका अपहरण किया है बल्कि उन्हें अपने यूएफओ में भी ले जा चुके हैं। स्मिथ ने अपने शरीर पर बने कुछ खरोंच के निशान भी दिखाएँ हैं जो अपहरण के बाद एलियंस के द्वारा उनके शरीर पर बना दिए जाते थे। स्मिथ के अनुसार जब वो छोटी थीं तभी से उनके साथ इस तरह की घटनाएं घटती रही हैं।

ब्रिटेन के यॉर्कशर के ब्रैडफोर्ड की रहने वाली पाउला स्मिथ ट्रांसपोर्ट सेक्टर में काम करती हैं। स्मिथ ने दावा किया है कि उन्होंने पहली बार 1982 में एलियंस का विमान देखा। उन्होंने बताया कि बचपन से ही एलियंस उनका अपहरण करके यूएफओ में ले जाते थे और पूरी दुनिया की सैर कराते थे। स्मिथ का यह भी कहना है कि एलियंस उन्हें ऐसी तकनीकि दिखाते थे जो पृथ्वी पर मौजूद नहीं है। इसके अलावा एलियंस उन्हें एक वीडियो क्लिप दिखाते थे जिसमें एक नदी होती है जो अचानक काली हो जाती थी और नीला आसमान अचानक से लाल हो जाता था।

डेली स्टार की रिपोर्ट के अनुसार स्मिथ ने बताया कि बचपन से लेकर अब तक 52 बार एलियंस उन्हें अपने साथ ले जा चुके हैं। स्मिथ के घरवालों का भी कहना है कि स्मिथ अक्सर 4 या 5 घंटे के लिए गायब हो जाती थीं लेकिन इसके बाद फिर से घर लौट आती थीं। स्मिथ के अनुसार एलियंस उन्हें उनके बेडरूम की खिड़की से और बेड से ले जाते थे।

स्मिथ ने कहा कि उनके पास अपनी बात साबित करने के लिए कोई सबूत नहीं है सिवाय उन खरोंचों के जो एलियंस उनके शरीर पर बना देते थे। उन्होंने एक सिल्वर एलियन की तस्वीर भी बनाई है।

पौला स्मिथ द्वारा बनाई गई एलियंस की ऑइल पेंटिंग (फोटो : डेली स्टार)

पहली बार के अपने अनुभव के बारे में बताते हुए स्मिथ एलियंस के विमान के बारे में कहती हैं कि वह एक तीन भुजाओं वाला विमान था जिसकी प्रत्येक भुजा के अंत में एक लाइट होती थी। एक लाइट का रंग नीला जबकि दूसरी भुजा के अंत में हरे रंग की लाइट थी। स्मिथ ने कहा कि तीसरी भुजा की लाइट के बारे में उन्हें कुछ याद नहीं है। स्मिथ के अनुसार वह विमान 30 फुट ऊँचा और 30 फुट चौड़ा था। नीली और हरे रंग की लाइट वाला वह विमान काले रंग का था।

पाउला स्मिथ कहती हैं, “मैंने यह घटना कभी किसी को नहीं बताई क्योंकि लोग मुझे पागल कहेंगे लेकिन कई ऐसे लोग हैं जिनके साथ ऐसे अनुभव हो चुके हैं। ऐसे लोगों को सामने आना चाहिए और अपने अनुभव सबके साथ साझा करने चाहिए।“   

क्या मोदी सरकार ने 12 साल के बच्चों को कोवैक्सीन लगाने की मंजूरी दे दी? जानें क्या है सच

भारत में कोरोना वायरस संक्रमण के खिलाफ चल रहे टीकाकरण अभियान के बीच इन दिनों सोशल मीडिया पर एक फैक मैसेज वायरल हो रहा है। मैसेज में दावा किया गया है कि मोदी सरकार ने 12 साल से ऊपर के बच्चों के लिए भारत बायोटेक की कोवैक्सीन को मंजूरी दे दी है।

व्हाट्सएप मैसेज का स्क्रीनशॉट

यह मैसेज सोशल मीडिया पर वायरल हो गया है। हालाँकि, इस अफवाह पर सरकार ने आधिकारिक बयान दिया है। प्रेस सूचना ब्यूरो (पीआईबी) के एक ट्वीट में यह स्पष्ट किया गया है, “यह दावा #Fake है और इसमें कोई सच्चाई नहीं है। सरकार ने ऐसे किसी टीकाकरण अभियान को मंजूरी नहीं दी है। हाल ही में केवल 18 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों को ही कोविड-19 वैक्सीनेशन के लिए अनुमति दी गई है।”

मालूम हो कि सरकार ने 1 मई से 18 साल से ऊपर के सभी लोगों को कोविड-19 वैक्सीनेशन की अनुमति दी थी। हाल ही में, डीसीजीआई (DGCI) ने इमरजेंसी इस्तेमाल के लिए डीआरडीओ-विकसित एंटी-कोविड दवा को भी मंजूरी दी है। रक्षा मंत्रालय ने शनिवार (8 मई, 2021) को मुँह के जरिए ली जाने वाली इस दवा को कोरोना के गंभीर मरीजों के इलाज में इस्तेमाल करने की अनुमति दी, ताकि वे जल्दी से ठीक हो सकें।

मंत्रालय के मुताबिक, क्लिनिकल टेस्ट में सामने आया है कि 2-डीऑक्सी-डी-ग्लूकोज (2-डीजी) दवा कोरोना की चपेट में आए मरीजों को जल्द ठीक होने में मदद कर रही है। साथ ही यह दवा अतिरिक्त ऑक्सीजन की निर्भरता को भी कम करती है। इस दवा को रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) की प्रतिष्ठित प्रयोगशाला नामिकीय औषधि तथा संबद्ध विज्ञान संस्थान (आईएनएमएएस) ने हैदराबाद के डॉ.रेड्डी लेबोरेटरी के साथ मिलकर विकसित किया है।

गौरतलब है कि मोदी सरकार द्वारा कोविशिल्ड और कोवैक्सीन के इमरजेंसी इस्तेमाल को मंजूरी देने के बाद 16 जनवरी को भारत में टीकाकरण अभियान शुरू किया गया था। पहले सरकार ने केवल फ्रंटलाइन श्रमिकों और 45 से ऊपर के लोगों के लिए टीकाकरण की अनुमति दी थी। लेकिन अब देश भर में 18 से ज्यादा की उम्र के लोगों का भी वैक्सीनेशन शुरू हो गया है। केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के अनुसार, सोमवार को (10 मई 2021) कुल 17,01,76,603 लोगों को वैक्सीन की खुराक दी गई है।

हिमंत बिस्वा सरमा और शुभेंदु अधिकारी को कमान दे BJP ने खींची नई लकीर, कॉन्ग्रेस अब भी अधर में लटकी

2021 की 10 मई भारतीय राजनीति में एक नई लकीर खींच गया। असम में हिमंत बिस्वा सरमा ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। उसके पड़ोस के पश्चिम बंगाल में शुभेंदु अधिकारी को बीजेपी ने अपने विधायक दल का नेता चुन लिया। इन फैसलों खासकर सरमा की ताजपोशी से बीजेपी ने झटके में वो धारणा खत्म कर दी, जिसके आधार पर अब तक माना जाता रहा था कि पार्टी बाहरी नेताओं को शीर्ष नेतृत्व की भूमिका नहीं देगी।

ऐसा नहीं है कि इस सोमवार को केवल सियासी पिच पर बीजेपी में ही हलचल रही। कॉन्ग्रेस की कथित शीर्ष नीति निर्धारक ईकाई सीडब्ल्यूसी (CWC) की बैठक भी हुई। पार्टी की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गाँधी ने कहा, “समझना होगा कि हम केरल और असम में मौजूदा सरकारों को हटाने में विफल क्यों रहे? बंगाल में हमारा खाता तक क्यों नहीं खुला?” लेकिन, इन पराजयों से सीख की बजाए सोनिया ने पराजय के हर पहलू पर गौर करने के लिए एक छोटे समूह के गठन की बात कही। जैसा कि कॉन्ग्रेस की परंपरा रही है ऐसी किसी भी कमिटी की रिपोर्ट पर शायद ही कभी गौर किया जाता है। अमल तो दूर की बात है। इतना ही नहीं, कॉन्ग्रेस को उसका पूर्णकालिक अध्यक्ष कब तक मिल जाएगा इसको लेकर भी यह बैठक स्पष्ट तस्वीर खींचने में नाकामयाब ही रही।

कायदे से इस बैठक में कॉन्ग्रेस को असम में सरमा की ताजपोशी से मिली सीख पर चर्चा करनी थी। सरमा कुछ साल पहले तक कॉन्ग्रेसी ही थे। राजनीति में उनकी एंट्री असम के कॉन्ग्रेसी मुख्यमंत्री रहे हितेश्वर सैकिया ने कराई थी। पहला विधानसभा चुनाव हारने वाले सरमा तरुण गोगोई के नेतृत्व वाली कॉन्ग्रेसी सरकार में मंत्री रहे। इसी दौरान असम की राजनीति में उनका उभार हुआ।

कहा जाता है कि कॉन्ग्रेस के दुर्दिन शुरू होने पर सरमा नेतृत्व की भूमिका की आस लेकर पार्टी के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी के पास गए थे। लेकिन, कथित तौर उन्होंने सरमा की बात सुनने से ज्यादा तवज्जो अपने कुत्ते के साथ खेलने को दी। आहत सरमा बीजेपी में चले गए। 2016 के असम विधानसभा चुनावों के वक्त प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नारा दिया, ‘असम का आनंद, सर्बानंद’ और उस चुनाव का संयोजक बनाया गया सरमा को। उन चुनावों में बीजेपी को पहली बार असम की सत्ता मिली और सरमा मंत्री बने। लगातार 5 सालों तक उत्तर-पूर्व में वे बीजेपी के चेहरे बने रहे और पार्टी को कई राज्यों में सत्ता में लाने में अहम भूमिका निभाई। 2021 के चुनावों में बीजेपी ने जब सत्ता बरकरार रखी तो पार्टी ने सर्बानंद सोनोवाल की जगह उन्हें राज्य की कमान सौंप दी है।

ऐसा नहीं है कि सरमा ऐसे पहले नेता हैं जो दूसरे दल से आकर भी बीजेपी में खुद को साबित करने में सफल रहे हैं। ऐसे नेताओं की फेहरिस्त लंबी है। ऐसे में सरमा को आगे कर बीजेपी ने तमाम राज्यों में विपक्ष के उन संभावनाशील चेहरों को एक संदेश दिया है, जो अपनी पार्टी में छटपटा रहे हैं।

मसलन, सचिन पायलट जैसे नेताओं को एक तरह से संदेश दिया गया है कि आप हमारे साथ आइए। खुद को साबित करिए और नेतृत्व की भूमिका लेकर जाइए। मार्च 2020 में बीजेपी का हिस्सा बने ज्योतिरादित्य सिंधिया जैसे नेताओं को जो महत्वपूर्ण जिम्मेदारी पाने की प्रतीक्षा में हैं, उन्हें भी बताया गया है कि खुद को साबित करने वालों को कमान देने से अब पार्टी को गुरेज नहीं रही।

सरमा से पहले एन बिरेन सिंह जैसे कुछेक नाम हैं जो बीजेपी में आकर मुख्यमंत्री बनने में कामयाब रहे। लेकिन, इन राज्यों में बीजेपी के पास न तो वैसा संगठन था और न वैसे नेता। असम या बंगाल जैसे राज्य में बीजेपी अरसे से संघर्षरत रही है। उसके पास संगठन और अपनी रीति-नीति वाले नेता भी रहे हैं। ऐसे में सरमा और अधिकारी को आगे कर बीजेपी ने उन तमाम राज्यों को भी संदेश दिया है जहाँ उसका संगठन बेहद मजबूत है और उसके पास नेताओं की लंबी कतार है। इससे पार्टी को फैलाव में और मदद मिल सकती है।

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों से पहले जब तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) छोड़ बीजेपी में आने की भगदड़ मची थी, तब शायद ही किसी ने ये अंदाजा लगाया था कि बीजेपी का राज्य में आने वाले समय में चेहरा टीएमसी से आया नेता होगा। राज्य में हालाँकि 3 से 77 सीटों पर पहुँचने के बावजूद बीजेपी अपेक्षित परिणाम हासिल करने में सफल नहीं रही। लेकिन, नंदीग्राम के मैदान में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को परास्त करने वाले अधिकारी को आगे कर उसने बता दिया है कि टीएमसी के लिए सत्ता के 5 साल आसान नहीं रहने वाले हैं। ध्यान रहे कि अधिकारी चुनावों से पहले तक ममता की कैबिनेट में थे। जिस नंदीग्राम ने टीएमसी को सत्ता का रास्ता दिखाया, वहाँ ममता को ले जाने और ताकत देने वाले भी अधिकारी ही थे।

इसमें कोई दो मत नहीं है कि 2014 के बाद बीजेपी ने कई धारणाओं को तोड़ा है। राष्ट्रीय राजनीतिक फलक पर मोदी-शाह के उदय के बाद से वह हर चुनाव एक युद्ध की तरह लड़ती दिखी है। इसने भारतीय राजनीति के समीकरण और मायने उलटपुलट कर रख दिए हैं। ऐसे में सरमा और अधिकारी जैसों को आगे करना एक ऐसे राजनीतिक दल के लिए जो राष्ट्रव्यापी फैलाव के लिए हर सेकेंड जोर लगा रही हो, जो पूरे भारत पर छाने के लिए मिशन मोड में हो और जो इस सपने को पूरा करने के लिए एक पल भी विश्राम करने को तैयार नहीं दिखती, इससे बेहतरीन फैसला इन चुनावों के बाद शायद ही कुछ होता।

फराह खान ने खुलेआम की मोदी समर्थकों की मौत की कामना- माँगी दुआ, पहले भी कर चुकी हैं RSS की ISIS से तुलना

कोरोना महामारी के प्रकोप के बीच रविवार (मई 9, 2021) को ज्वेलरी डिजाइनर फराह खान अली ने ट्विटर पर मोदी समर्थकों और उनके परिजनों के लिए मृत्यु की कामना की। मोदी सरकार की बुराई न करने वालों पर अपना गुस्सा निकालते हुए फराह खान ने कहा कि वह दुआ करती हैं कि भक्तों का कोई परिजन मरे ताकि उनका भी खून सरकार के विरुद्ध खौल सके।

अपने ट्वीट में फराह खान ने लिखा, “कोरोना वायरस महामारी से निपटने में पीएम की विफलता के मद्देनजर हर भक्त के लिए, मैं दुआ करती हूँ कि तुम्हारा कोई परिजन मरे ताकि तुम्हें वो गुस्सा महसूस हो जो कुप्रबंधन और सत्ता की भूखे एजेंडे के कारण अपनों को न बचा पाने की वजह से पैदा होता है।”

बता दें कि ट्विटर पर 7 लाख से ज्यादा फॉलोवर्स वाली फराह अली खान उन्हीं संजय खान की बेटी हैं, जिन्होंने एक टीवी सीरिज में टीपू सुल्तान की भूमिका निभाई। वह फिरोज खान की भतीजी और ऋतिक रौशन की पूर्व पत्नी सुजैन खान की बहन हैं।

लोगों का इस ट्वीट को देखकर कहना है कि जब मोदी सरकार से भरोसा उठने लगता है वैसे ही ऐसे लोग आकर ऐसी बातें कर देते हैं कि दोबारा उनपर विश्वास बन जाता है। एक यूजर ने फराह खान के साथ ट्वीट पर हुई बातचीत के स्क्रीनशॉट शेयर किए हैं।

वघीशा नाम की ट्विटर यूजर का कहना है कि इस बातचीत के बाद ही फराह ने अपना ट्वीट डिलीट कर दिया। इस ट्वीट में वघीशा ने पूछा था कि आखिर वो ऐसी दुआ कैसे कर सकती हैं जो कोई दुश्मनों के लिए भी न करें।

फराह ने वघीशा के ट्वीट के जवाब में लिखा, “जब मैंने ट्वीट किया मैं बहुत ज्यादा परेशान थी क्योंकि कई लोग हैं जिन्हें मैं जानती थी और खो दिया। मुझे अफसोस है कि मैंने क्या ट्वीट किया और ये स्पष्ट भी किया है कि किसी की मौत की कामना नहीं करनी चाहिए। मैंने जो भी कहा वो गुस्से और पीड़ा में कहा।”

उल्लेखनीय है कि कोरोना के कारण मोदी समर्थकों या फिर संघियों की मौत की कामना पहली बार नहीं की गई। इससे पहले बंगाल में हिंसा के वक्त कई लोगों ने भाजपा कार्यकर्ताओं की मौत या फिर संघियों पर हो रही बर्बरता पर अपनी खुशी खुलकर मनाई थी। अब भी कई लिबरल आज अपनी कुंठा संवेदनाओं की आड़ में निकाल रहे हैं और खुलेआम उन लोगों की मृत्यु की कामना कर रहे हैं जिन्हें वह जानते तक नहीं।

जाहिर है कि कोई इस बात से इंकार नहीं कर सकता कि हमारा प्रशासन कोविड की दूसरी लहर को संभालने में असमर्थ रहा और स्वास्थ्य असुविधाओं के कारण असमय लोगों की जानें गईं। लेकिन, इस दौरान ऐसे संदेश जिनमें संघियों और उनके प्रियजनों की मौत की कामना की गई हो, वह भी कहीं से कहीं तक इंसानियत की मिसाल पेश नहीं कर रहे। किसी की जान जाने पर खुशी मनाना या फिर किसी की मरने की ही कामना कर लेना, इस बात को बताता है कि महामारी के समय भी एक निश्चित विचाराधारा के प्रति लिबरलों, वामपंथियों और कट्टरपंथियों में गुस्सा उतना भरा हुआ है जितना की इस महामारी से पहले था।

फराह खान अली के बारे में मालूम हो कि वह पहले भी आरएसएस की ISIS आतंकी संगठन के साथ तुलना कर चुकी हैं। इसके अलावा वह महाराष्ट्र की बदहाली के बावजूद उद्धव सरकार की तारीफ करती रही हैं।