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ईद पर कन्नौज में लगे ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ के नारे, वीडियो वायरल होने पर मौलाना समेत चार गिरफ्तार

उत्तर प्रदेश के कन्नौज में ईद पर ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ के नारे लगाने की घटना सामने आने के बाद मौलाना समेत चार कट्टरपंथियों को गिरफ्तार कर लिया गया। पुलिस ने ये कदम घटना का वीडियो सोशल मीडिया में वायरल होने के बाद उठाया।

दरअसल, जब ये कट्टरपंथी देशविरोधी नारे लगा रहे थे, उसी दौरान किसी ने अपने घर के भीतर से इसका वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर वायरल कर दिया। इस वीडियो में स्पष्ट तौर “पाकिस्तान जिंदाबाद” के नारे लगाने की आवाज सुनी जा सकती है।

घटना कन्नौज स्थित गुरसहायगंज कोतवाली क्षेत्र के जलालाबाद कस्बे की है, जहाँ ईद का चाँद देखने के बाद एक दिन पहले इमाम चौक पर इकट्ठे हुए कुछ लोगों ने पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाए। जिले के एसपी के आदेश पर पुलिस ने जलालाबाद निवासी सलमान, साहिद, मेराज उर्फ छोटू को उनके घर से गिरफ्तार कर लिया। साथ ही पेशे से इमाम मोहम्मद अफजल निवासी ग्राम फत्तेपुर थाना मूसानगर जनपद कानपुर देहात को भी उसके आवास से पकड़ लिया जबकि बाकियों की तलाश की जा रही है।

पुलिस ने इन सभी के खिलाफ धारा 153 (B) व 505 (2) के तहत मुकदमा दर्ज किया है। गिरफ्तार किए गए चारों आरोपियों को मंगलवार (18 मई) को जेल भेज दिया गया।

देश विरोधी नारे लगाए जाने को लेकर प्रभारी निरीक्षक राजा दिनेश सिंह ने कहा है कि केस में 10 अज्ञात लोगों के खिलाफ भी मामला दर्ज किया गया है। उन्हें गिरफ्तार करने की कोशिशें की जा रही हैं। इस मामले में जिले के एसपी प्रशांत वर्मा ने कहा है कि पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाते हुए एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ है। टीम ने चार लोगों को गिरफ्तार कर लिया है और कार्रवाई का जा रही है।

हिंदू जागरण मंच की सक्रियता से पकड़े गए आरोपित

जलालाबाद में पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाए जाने की घटना सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद हिंदू जागरण मंच ने मामले को सक्रियता से उठाया। संगठन के प्राँतीय मंत्री राजेश कटियार ने इस मामले में पुलिस को आमरण अनशन करने की चेतावनी भी दी थी। हालाँकि, मामले में चार आरोपितों के गिरफ्तार होने के बाद उन्होंने पुलिस की तारीफ भी की है।

मंदिर के पैसों से चलने वाला 1000+ साल से भी पुराना अस्पताल: जहाँ थे डॉक्टर, सर्जन, नर्स… दीवार पर लिखी उपचार विधियाँ

आज जब पूरी दुनिया कोरोना वायरस संक्रमण की मार झेल रही है और भारत में इस महामारी की दूसरी लहर तबाही मचा रही है, अस्पतालों में बेड्स की किल्लत से मरीज परेशान हैं। ऑक्सीजन, वेंटिलेटर्स और बेड्स की व्यवस्था करने में सरकारों के पसीने छूट रहे हैं। इन सबके बीच हमें किसी और से नहीं, खुद के ही इतिहास से सीखने की ज़रूरत है। इसे समझने के लिए हमें चलना पड़ेगा अप्पन वेंकटेश पेरुमल मंदिर।

ये मंदिर तमिलनाडु से 70 किलोमीटर की दूरी पर स्थित कांचीपुरम में स्थित है, जो एक प्राचीन शहर है। इस मंदिर को चोल राजाओं ने बनवाया था। इसकी दीवारों पर अब भी उस अस्पताल के सबूत मौजूद हैं, जो 1000 वर्ष पहले संचालित किए जाते थे। 1100 वर्ष से भी पूर्व संचालित होने वाले 15 बेड्स के इस अस्पताल में कई डॉक्टर और सर्जन हुआ करते थे। दूरद्रष्टा हिन्दू राजाओं ने नागरिकों की स्वास्थ्य सुविधाओं का भी पूरा ख्याल रखा था।

दीवार पर ये भी खुदा हुआ है कि कैसे उस समय विभिन्न मेडिकल प्रक्रियाओं और सर्जरी के जरिए लोगों का इलाज किया जाता था। डॉक्टरों को उनका वेतन अनाज के रूप में दिया जाता था। मरीजों को भोजन किस तरह से और कैसा दिया जाता है, ये भी अंकित है। डॉक्टर को उनके कार्य के हिसाब से वेतन दिया जाता था। साथ ही उन आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियों के भी विवरण हैं, जिनसे मरीजों का इलाज किया जाता था।

ग्रेनाइट की दीवार पर ये नक्काशी कमाल की है, जो उस समय की उन्नत तकनीक की ओर इशारा करती है। इस अस्पताल को वीरराजेन्द्र चोल ने बनवाया था, जो दक्षिण भारत के महान राजा राजेंद्र चोल के बेटे थे। वो अपने बड़े भाइयों राजाधिराज चोल और राजेंद्र चोल II के सहयोगी के रूप में शासन करते थे। वेदों, शास्त्रों और व्याकरण के अध्ययन के लिए उन्होंने विद्यालय और छात्रावास भी बनवाया था।

इस अस्पताल को 1069 AD में चेयर, वेगवती और पलर नदी के संगम स्थल पर बनवाया गया था। थिरुमुकुड्डल में स्थित वेंकटेश मंदिर को भगवान विष्णु के भक्त सबसे प्रमुख मंदिरों में से एक मानते हैं। इस अस्पताल में 2 फिजिशियन, 2 डॉक्टर, और एक नाई हुआ करता था जो छोटे-छोटे ऑपरेशन्स करता था। 2 ऐसे कर्मचारी थे, जो आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियाँ जुटाते थे। साथ ही मरीजों की देखभाल के लिए नर्स और अन्य कर्मचारी भी थे।

55 फ़ीट लम्बा ये अभिलेख 33 पंक्तियों में लिखा गया है। ऊपर से नीचे तक 540 स्क्वायर फ़ीट क्षेत्र में इसे अंकित किया गया है। इसे भारतीय उपमहाद्वीप के सबसे विस्तृत अभिलेख के रूप में जाना जाता है। इसका 95% हिस्सा तमिल में है, जबकि 5% ग्रन्थ लिपि में अंकित है। बुखार, फेफड़ों की गड़बड़ी और जलशोथ जैसी बीमारियों से लड़ने के उपचार और दवाओं का विवरण इसमें उपलब्ध है। ऐसी 19 दवाओं के बारे में बताया गया है।

इस अस्पताल का इस्तेमाल मुख्यतः मंदिर के कर्मचारियों और छात्रावास के छात्रों के इलाज के लिए किया जाता था। आम जनता को भी यहाँ इलाज की सुविधा दी जाती थी। करीब 100 वर्ष पूर्व इस अभिलेख को डिकोड किया गया था। ये आयुर्वेदिक के साथ साथ ‘सिद्ध तकनीक’ के इलाज की ओर भी इशारा करता है। इस अस्पताल को राजा द्वारा मंदिर को दिए जाने वाले दान से संचालित किया जाता था।

प्राचीन भारत या मध्यकाल में संचालित होने वाला ये अकेला भारतीय अस्पताल नहीं है। इसके अलावा थिरुवक्कम, तंजावुर और श्रीरंगम में भी ऐसे अस्पताल चलाए जाते थे। अस्पतालों को तब ‘अतुलार सलाई’ कहा जाता था। ASI भी योजना बना रहा है कि 9वीं सदी के इस मंदिर के प्रांगण में अभिलेख में वर्णित किए गए आयुर्वेदिक पेड़-पौधे लगाए जाएँ। आज वामपंथी जब ‘मंदिर की जगह अस्पताल’ वाला नैरेटिव फैलाते हैं, तब उन्हें जानना चाहिए कि पहले दोनों अलग नहीं हुआ करते थे।

अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत को लज्जित करने के उद्देश्य के पीछे केजरीवाल की मंशा क्या है?

अरविन्द केजरीवाल ने अचानक कोरोना का एक सिंगापुरी वैरिएंट खोजा और मन ही मन आर्किमिडीज की तरह यूरेका यूरेका चिल्लाते हुए घोषणा कर दी कि यह वैरिएंट “हमारे बच्चों” के लिए बहुत खतरनाक है। उन्होंने केंद्र सरकार से माँग की कि सिंगापुर से आने वाली उड़ानें तुरंत बंद कर देनी चाहिए। उन्हें पता था कि इसका असर होगा इसीलिए उन्होंने यह बयान दिया था। असर हुआ भी।

सिंगापुर सरकार की ओर से तीखी प्रतिक्रिया आई। सिंगापुर के विदेश मंत्रालय ने भारतीय राजदूत से अपना विरोध दर्ज कराया। वहाँ के विदेश मंत्री की ओर से वक्तव्य जारी किया गया। मेरे व्हाट्सएप ग्रुप में सिंगापुर में रहने वाले एक मित्र ने बताया कि केजरीवाल के बयान को लेकर वहाँ सेलेब और यू-ट्यूबर्स से भी बहुत तीखी प्रतिक्रिया आ रही है। ऐसे में अनुमान लगाया जा सकता है कि एक आम सिंगापुरी की प्रतिक्रिया कैसी होगी?

भारत का विदेश मंत्रालय भी तुरंत हरकत में आया। मंत्रालय के प्रवक्ता ने वक्तव्य जारी करके बताया कि कोरोना का सिंगापुरी वैरिएंट जैसा कुछ नहीं है। साथ ही यह भी बताया गया कि कैसे भारत और सिंगापुर के रिश्ते हर तरह से अच्छे रहे हैं और कोरोना की दूसरी तीव्र लहर से लड़ने में भारत की मदद करने वाले देशों में सिंगापुर सबसे पहले आगे आया। ऐसे में यह सबके लिए आवश्यक है कि बिना जानकारी के ऐसे बयान न दें। बाद में खुद विदेश मंत्री को वक्तव्य जारी करके कहना पड़ा कि अरविन्द केजरीवाल के वक्तव्य को भारत का वक्तव्य न माना जाय।

परिस्थिति काबू में आते-आते काफी नुकसान हो चुका है, जिसका असर शायद कुछ दिनों बाद पता चले। सोशल मीडिया पर आई प्रतिक्रियाओं से लगा कि आम भारतीय के साथ-साथ पत्रकारों और संपादकों तक ने माना कि केजरीवाल को ऐसा बयान नहीं देना चाहिए था। पत्रकारों और संपादकों द्वारा ऐसा कहा जाना एक अनूठी घटना है जो शायद दशकों में एक बार ही हो सकती है।

वैसे कुछ पत्रकारों ने अपनी सशर्त आलोचना में कुछ ऐसा भी कहा जिसका अर्थ था; माना कि केजरीवाल द्वारा दिया गया यह बयान सही नहीं था पर विदेश मंत्रालय को दूसरे देश के सामने उनके बारे में ऐसा नहीं कहना चाहिए था। इनमें कुछ वे लोग भी थे, जिन्होंने एक समय भारतीय सांसदों द्वारा अमेरिका को पत्र लिखकर गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री और वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को वीजा न दिए जाने को न केवल उचित ठहराया था बल्कि काफी हद तक सेलिब्रेट भी किया था। 

जो कुछ भी हुआ उससे अनेकों प्रश्न उठते हैं। प्रश्न यह है कि अचानक केजरीवाल को ऐसा बयान देने की आवश्यकता क्यों पड़ गई? क्या यह बयान देने से पूर्व उन्होंने विदेश मंत्रालय या केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय को कोई पत्र लिखा था या प्रधानमंत्री के साथ किसी मीटिंग में अपनी चिंता व्यक्त की थी? उनके पास यह रिपोर्ट कहाँ से आई कि सिंगापुर में कोरोना का कोई नया वैरिएंट मिला है जो केवल बच्चों को संक्रमित कर रहा है? यह किसी वैज्ञानिक पत्रिका में छपा था या किसी और देश के विशेषज्ञों ने इस बात को उठाया था? और यदि इस तरह की रिपोर्ट थी तो केवल केजरीवाल को कैसे पता चला? यह रिपोर्ट भारत सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय तक क्यों नहीं पहुँची? ये कुछ ऐसे प्रश्न हैं जो उठाए जाने चाहिए और यह केजरीवाल की जिम्मेदारी है कि यदि वे अपने दावों या बयानों को गंभीर मानते हैं तो आगे आकर इन प्रश्नों का उत्तर दें। 

विदेश मंत्रालय से जारी हुई विज्ञप्ति के बाद भी दिल्ली सरकार की ओर से इस मामले को समाप्त करने की मंशा नहीं देखी गई। केजरीवाल के बचाव में उनके डिप्टी मनीष सिसोदिया उतरे और उन्होंने बाकायदा प्रेस कॉन्फ्रेंस करके अपने मुख्यमंत्री का बचाव किया। बचाव तो क्या किया, कहा जा सकता है कि वही सारी बातें की जो केजरीवाल ने की थी।

मनीष सिसोदिया ने भी “अपने बच्चों” को लेकर चिंतित होने का दावा ठोंका और बताया कि; मोदी जी को सिंगापुर की चिंता है पर हमें हमारे बच्चों की चिंता है। इस बयान से सिसोदिया यह बात गोल कर गए कि केंद्र सरकार को सिंगापुर की नहीं बल्कि भारत-सिंगापुर संबंधों की चिंता है। 

इन नेताओं के सलाहकारों को चाहिए कि वे इन्हें बताएँ कि लोकतंत्र या राजनीति में वाक्पटुता का महत्व है पर हर कदम पर इसका इस्तेमाल करना नेतृत्व की अक्षमता दर्शाता है। सिसोदिया के प्रेस कॉन्फ्रेंस का सबसे निम्न बिंदु यह रहा कि उन्होंने भारतीय विदेश मंत्रालय से जारी विज्ञप्ति के बावजूद केंद्र सरकार पर आरोप लगाते हुए यह कहा कि; ये लोग हमें ब्रिटिश वैरिएंट से भी आगाह नहीं कर पाए थे। इन्हें पता है कि सिंगापुर सरकार कोरोना के किसी वैरिएंट को सिंगापुर वैरिएंट कहे जाने से नाराज है, उसके बावजूद सिसोदिया ब्रिटिश वैरिएंट की बात कर रहे हैं। सुनकर लगा जैसे यह काम जानबूझ कर किया जा रहा है ताकि भारत के और देशों से सम्बन्ध पर बुरा असर हो। प्रश्न यह भी उठता है कि सिसोदिया के इस बयान के पीछे मंशा क्या थी? आखिर संवैधानिक पद पर बैठा एक जिम्मेदार नेता ऐसे बयान क्यों दे रहा है जो दो देशों के बीच सम्बन्ध बिगाड़ सकते हैं?             

कोरोना से हर राज्य लड़ रहा है। राज्यों के मुख्यमंत्री उपलब्ध संसाधनों को बढ़ाने में लगे हैं ताकि महामारी से लड़ाई में आसानी हो। सबकी कोशिशें जारी हैं ताकि इस पर जल्दी काबू पाया जा सके। इस लड़ाई में और मुख्यमंत्री तो अपने अफसरों से मीटिंग करते या सुविधाओं की निरीक्षण करते दिखते हैं पर केजरीवाल ऐसे मुख्यमंत्री हैं, जिनकी मीटिंग न्यूज़ एजेंसी के कैमरे और माइक के साथ होती है। वे सुबह से ही कैमरे के सामने बैठ जाते हैं और कोरोना के विरुद्ध दिल्ली की लड़ाई को अपने बयानों से नेतृत्व देते हैं। उनके बयानों के साथ उनके जो पोज दिखाई देते हैं उनमें वे बिल्कुल किसी दर्शनशास्त्री से लगते हैं, जो इस लड़ाई में नेतृत्व क्षमता और वैज्ञानिक तरीकों में कम और दर्शनशास्त्र और बयानशास्त्र में अधिक विश्वास रखता है।   

बयानों से कोरोना की रोकथाम के इस केजरीवाली दर्शन ने तबसे और जोर पकड़ा है जबसे दिल्ली में ऑक्सीजन ऑडिट की बात उठी है। जबसे यह बात उच्चतम न्यायलय में उठी, उन्होंने अपने बयानों को एक अलग ही स्तर पर पहुँचा दिया है। प्रश्न यह है कि इन बयानों से घरेलू राजनीति में उद्देश्य के अनुसार विमर्श करवाने की मंशा समझ आती है पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत को लज्जित करने के उद्देश्य के पीछे क्या मंशा है?

मजे की बात यह है कि ऐसे बयान देते हुए उनके पास तथ्यों की जानकारी भी नहीं रहती। तथाकथित सिंगापुर वैरिएंट पर बयान के साथ वहाँ से आने वाली उड़ानों को रद्द करने के केजरीवाल के बयान को ही ले लें। ऐसा बयान देने से पहले उन्हें यह पता क्यों नहीं है कि सिंगापुर से आने वाली उड़ानें मार्च महीने के तीसरे सप्ताह से ही बंद हैं? यह बात अपने बयानों के प्रति उनकी गंभीरता को दर्शाती है। ऐसा नहीं कि भारत को लज्जित करने का बयान केजरीवाल ने पहली बार दिया है।  इससे पहले वे बालाकोट स्ट्राइक को लेकर बयान दे चुके हैं जिसका पाकिस्तानी सरकार और मीडिया ने अपने घरेलू और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इस्तेमाल किया।  

समय आ गया है कि किसी को जवाब न देने वाले केजरीवाल प्रश्नों से दो-चार हों और उनके जवाब दें। जवाब न देने से प्रश्न खत्म नहीं होते। उन्हें यह विचार करने की आवश्यकता है कि उनके ऐसा बार-बार करने से क्या केवल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्र सरकार या भारत की छवि पर ही बुरा असर पड़ रहा है? साथ ही उन्हें यह समझने की आवश्यकता है कि जीवन में सब कुछ राजनीति के बारे में नहीं होता। किसी भी नेता का यह विश्वास कि सब कुछ ‘मैनेज’ किया जा सकता है, एक दिन अचानक गायब हो जाता है। यदि आज नहीं तो कल व्यवस्था और अव्यवस्था पर उठते प्रश्नों के सामने केजरीवाल को आना ही होगा पर शायद तब तक बहुत देर हो चुकी होगी।

नेवी ने डूबे जहाज पी-305 से 186 लोगों को बचाया, लापता लोगों की तलाश में रेस्क्यू ऑपरेशन जारी

Tauktae तूफान आखिरकार गुजर गया है, लेकिन अपने पीछे यह तबाही का मंजर छोड़ गया। तूफान में फंसकर अरब सागर में डूबे चलते जहाज पी-305 बार्ज पर मौजूद 273 लोगों में से अब तक 188 लोगों को भारतीय नौसेना (Indian Navy) ने बचा लिया है, 37 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि 50 लोग अभी भी लापता बताए जा रहे हैं।

नौसेना के एक अधिकारी के मुताबिक, यह छोटा जहाज था जो मुंबई से करीब 70 किलोमीटर की दूरी पर खड़ा था, चक्रवात में फंसने के बाद यह डूब गया था। इस बीच इंडियन नेवी ने जानकारी दी है कि युद्धपोत आईएनएस कोच्चि पी-305 से बचाए गए 186 लोगों में से 125 लोगों को लेकर बुधवार (19 मई 2021) सुबह मुंबई पहुँचा। उसके साथ 22 लोगो के शवों को भी साथ लाया गया।

नौसेना के प्रवक्ता के मुताबिक, आईएनएस तेग, आईएनएस बेतवा, आईएनएस ब्यास, पी8I विमान और हेलीकॉप्टरों की मदद से सर्च ऑपरेशन चलाया जा रहा है। हालाँकि, समय बीतने के साथ ही लोगों के बचने की उम्मीदें भी कम होती जा रही हैं। दूसरी ओर नौसेना और कोस्ट गार्ड की टीम ने गाल कंस्ट्रक्टर में फंसे 137 लोगों को मंगलवार ( 18 मई 2021) को सुरक्षित बचा लिया था।

अधिकारियों ने जानकारी दी है कि बार्ज एसएस-3 पर मौजूद 196 लोग और ऑयल रिग (तेल का कुँआ) सागर भूषण पर मौजूद 101 लोग सुरक्षित हैं। सभी को तट तक लाया जा रहा है। इंडियन नेवी के उप प्रमुख वाइस एडमिरल मुरलीधर सदाशिव ने इस बचाव अभियान को बीते 4 दशक का सबसे कठिन अभियान बताया है।

पी-305 से रेस्क्यू किए गए लोगों ने बताया है कि इस बार्ज की हालत पहले से ही खराब थी। बीते 8 मई, 2021 को ही कुछ दूसरे बार्ज की नावों से यहाँ से बाहर चले गए थे। तूफान (Tauktae) शुरू होने से पहले यह ऑयल रिग के पास खड़ा था, लेकिन तूफान के कारण इसका लंगर छूट गया, जिससे यह बहने लगा। माना जा रहा है कि लाइफ जैकेट पहने होने के कारण लोग लहरों के साथ दूर बह गए होंगे।

रेस्क्यू किए गए लोगों की आपबीती

नौसेना द्वारा रेस्क्यू किए गए एक व्यक्ति ने बताया कि वो रातभर पानी में तैरता रहा, उसे ये भी नहीं पता कि नौसेना ने उसे कब रेस्क्यू किया। पता ही नहीं चला। वहीं कोल्हापुर, महाराष्ट्र के रहने वाले मनोज गीते ने बताया कि वह केवल इस उम्मीद में 7-8 घंटे तक तैरते रहे कि कोई तो उन्हें बचाएगा और आखिरकार इंडियन नेवी ने उन्हें बचा लिया। पी-305 से जिन लोगों ने समुद्र छलाँग लगाई थी वो बचाए जाने से पहले करीब 17-18 घंटे तक समुद्र में ही तैरते रहे।

रेस्क्यू किए गए लोगों में से एक व्यक्ति ने बताया कि 12 लोगों का एक ग्रुप एक साथ समुद्र में कूदा था, जिसमें से 10 को बचा लिया गया है, लेकिन 2 लोग अभी भी लापता हैं।

प्रोपेगंडा फैलाने के लिए 5 ‘दोस्त’ मीडिया संस्थान, बॉलीवुड से मदद: कॉन्ग्रेस के टूलकिट का वो हिस्सा, जिस पर नहीं गया आपका ध्यान

सोशल मीडिया पर एक ‘टूलकिट’ खासा वायरल हुआ, जिसके बारे में बताया गया कि ये कॉन्ग्रेस पार्टी द्वारा अपने नेताओं को दी गई निर्देशावली है जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, हिंदुत्व, कुम्भ और देश को बदनाम करने का पूरा खाका है। ‘इस टूलकिट’ का एक हिस्सा ऐसा भी है, जिस पर ज्यादा बात नहीं हुई। इसमें उन मीडिया संस्थानों के बारे में बताया गया है, जिनकी मदद लेकर कॉन्ग्रेस नेताओं को प्रोपेगंडा फैलाना है।

टूलकिट के इस हिस्से में बताया गया है कि ‘द प्रिंट’, ‘द वायर’, ‘द क्विंट’ और ‘आउटलुक’ जैसे मीडिया संस्थानों में कोविड-19 को लेकर जो भी लेख प्रकाशित होते हैं, उन्हें शेयर किया जाए और वायरल किया जाए। ऐसे मीडिया भाजपा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार को बदनाम करने के लिए किस हद तक गिरते हैं, ये किसी से छिपा नहीं है। इन संस्थानों ने महाराष्ट्र और केरल की सरकारों के खिलाफ कुछ नहीं लिखा, जहाँ कोरोना सबसे ज्यादा बेकाबू है।

इस ‘टूलकिट’ में कॉन्ग्रेस नेताओं को निर्देश दिया गया है कि वो इन मीडिया संस्थानों में लिखे कोरोना सम्बंधित लेखों को खूब प्रचारित करें और उन्हें हाइलाइट करें। दो मीडिया संस्थान ऐसे भी हैं, जिन्हें इनसे भी ज्यादा प्राथमिकता दी गई है। इसमें लिखा है कि अगर कोई स्टोरी अन्य मीडिया संस्थानों में प्रकाशित नहीं होती है तो उन्हें ‘कारवाँ’ या पार्टी के मुखपत्र ‘नेशनल हेराल्ड’ को भेजा जाए। यानी, कॉन्ग्रेस की साँठगाँठ से इन मीडिया संस्थानों में नकारात्मक लेख प्रकाशित किए जा रहे थे।

इस ‘टूलकिट’ के एक पॉइंट में ‘समान विचारधारा’ वाले बॉलीवुड सेलेब्स से मदद लेने की बात भी की गई है। उनसे ट्वीट्स, मीम्स, कॉमिक वीडियोज और कार्टून्स के अलावा अन्य ऐसे वायरल पोस्ट्स को शेयर करवाने की बात की गई है, जिसमें मोदी सरकार को निशाना बनाया गया हो। समय-समय पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिख कर कुछ ‘कॉम्स सेन्स सलाह’ देने का भी निर्देश दिया गया है। ऐसा दिखाने को कहा गया है, जैसे मोदी सरकार और इसके मंत्रीगण मूर्ख हों।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि बिगाड़ने के लिए किस तरह से विदेशी मीडिया के साथ हाथ मिलाया गया था, वो भी देखिए। भारत में विदेशी मीडिया संस्थानों के कॉरेस्पोंडेंट्स के माध्यम से पीएम मोदी को सभी समस्याओं के लिए जिम्मेदार ठहराया गया। विदेशी मीडिया में लेख लिखने वाले भारतीय प्रोपेगंडा पत्रकारों को पॉइंट्स दिए गए, ताकि वो मोदी सरकार को बदनाम कर सकें। स्थानीय पत्रकारों को जलती चिताओं और लाशों की तस्वीरें देकर रिपोर्ट बनवा उसे वायरल करवाने की भी साजिश थी।

भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा ने दावा किया है कि ये ‘टूलकिट’ सौम्या वर्मा ने तैयार किया है। वो प्रोफेसर राजीव गौड़ा के दफ्तर में कार्यरत हैं। MV राजीव गौड़ा कॉन्ग्रेस के सांसद रहे हैं और UPA काल में कई संसदीय समितियों के सदस्य भी रहे हैं। कर्नाटक कॉन्ग्रेस कमिटी ने उन्हें प्रवक्ता और घोषणापत्र समिति का अध्यक्ष बनाया था। फ़िलहाल वो IIM बेंगलुरु में प्रोफेसर हैं। कॉन्ग्रेस की विचारधारा को फैलाने के लिए वो कई ऑनलाइन कार्यक्रम चलाते हैं।

सरकार लाएगी इंटरनेशनल चैनल, भारत का दृष्टिकोण रखने में मिलेगी मदद, विदेशी मीडिया के ‘प्रोपेगेंडा’ की होगी काट

नेशनल ब्रॉडकास्टर दूरदर्शन ने एक इंटरनेशनल चैनल लॉन्च करने का फैसला किया है। सरकार ने ये कदम कोविड की दूसरी लहर के दौरान कई बड़े अंतराराष्ट्रीय मीडिया संस्थानों द्वारा भारत के बारे में नकारात्मक और भ्रामक खबरें प्रकाशिक करने के बाद उठाया है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, दूरदर्शन ने पिछले हफ्ते डीडी इंटरनेशनल के लिए एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट (ईओआई) जारी किया, जिसमें निजी कंपनियों से नए चैनल के लिए एक विस्तृत परियोजना रिपोर्ट का मसौदा तैयार करने के लिए टिप्पणियां माँगी गईं। परियोजनाओं पर अंतरराष्ट्रीय प्रसारकों/मीडिया घरानों को सलाह देने के अनुभव के साथ प्रतिष्ठित वैश्विक सलाहकारों से बोलियां आमंत्रित की गईं।

डीडी इंटरनेशनल की 24×7 वर्ल्ड सर्विस शुरू करने की योजना

प्रसार भारती के सीईओ एस. एस. वेम्पति ने कहा कि इस तरह की एक परियोजना पिछले कुछ समय से चल रही थी। उन्होंने कहा, “दूरदर्शन के लिए अंतरराष्ट्रीय उपस्थिति स्थापित करना लंबे समय से लंबित रणनीतिक उद्देश्य रहा है। प्रसार भारती बोर्ड ने अपनी पिछली बैठक (मार्च) में एक उपयुक्त रणनीति सलाहकार को शामिल करके इसके लिए एक परियोजना रोडमैप विकसित करने की अनुमति दी थी। यह ईओआई उसी दिशा में एक कदम है।’

डीडी इंटरनेशनल के तहत वैश्विक स्तर पर ब्यूरो स्थापित किए जाएंगे जिनकी वर्ल्ड सर्विस स्ट्रीमिंग चौबीसों घंटे होंगी।

क्या यह बीबीसी या अलजजीरा जैसे चैनलों के भारतीय वर्जन की तरह होगा? इस पर वेम्पति ने कहा कि “अभी यह बीबीसी वर्ल्ड सर्विस की तरह समाचार पर अधिक आधारित होगा” लेकिन बाद में यह “विकसित” हो सकता है क्योंकि भारत में बहुत से अंतर्राष्ट्रीय हित सांस्कृतिक हैं।

हालाँकि, लगभग एक दशक से इस परियोजना के विभिन्न पदों से जुड़े रहे एक अधिकारी ने बताया किया यह विचार 10 वर्षों से अधिक समय से अस्तित्व में है, और “हर बार जब प्रसार भारती के नेतृत्व में बदलाव होता है, तो कुछ कार्रवाई होती है।” अधिकारी ने कहा कि जब दूरदर्शन इंडिया को अंग्रेजी चैनल बनाया गया था, तब चर्चा हुई थी कि इसे “एक अंतरराष्ट्रीय चैनल बनाया जाएगा”। लेकिन दूरदर्शन समाचार के केवल अंग्रेजी संस्करण को दिखाने से इसने कंटेंट के “डुप्लीकेशन” को ही जन्म दिया।

‘पार्टनर के बिना फील करती थी अकेला तो पापा को ही बना लिया था बॉयफ्रेंड’: विवियन रिचर्ड्स की एक्स गर्लफ्रेंड नीना गुप्ता

आयुष्मान खुराना अभिनीत फिल्म ‘बधाई हो (2018)’ से सुर्ख़ियों में आईं अभिनेत्री नीना गुप्ता ने अपने जीवन और अकेलापन को लेकर कुछ राज़ खोले हैं। नीना गुप्ता उक्त फिल्म में एक बुजुर्ग गर्भवती महिला का किरदार निभा कर कई अवॉर्ड बटोर ले गई थीं। नीना ने कहा है कि उनके जीवन में एक समय वो इतना अकेलापन महसूस करती थीं कि अपने पिता को ही अपना बॉयफ्रेंड समझने लगी थीं।

नीना गुप्ता का कहना है कि उनके जीवन में लम्बे समय तक न कोई बॉयफ्रेंड आया और न ही पति, जिस कारण उनका अकेलापन बढ़ता ही जा रहा था। इन सबसे बहार निकलने के पीछे का राज़ बताते हुए उन्होंने बताया कि वो पिछली बातों में अटकी नहीं रहीं, जिससे इन समस्याओं से उन्हें मुक्ति मिली। काम के दौरान उन्हें जब अपमानित किया जाता था, तब वो खुद को अकेला महसूस करती थीं। हाल ही में नीना गुप्ता को ‘सरदार का ग्रैंडसन’ फिल्म में देखा गया।

इस फिल्म में अर्जुन कपूर और रकुल प्रीत सिंह मुख्य किरदारों में हैं। नीना गुप्ता ने RJ सिद्धार्थ कन्नन को दिए गए इंटरव्यू में बताया, “मैंने काफी बार खुद को अकेला महसूस किया है। पूरी ज़िंदगी ऐसा मेरे साथ हुआ है। मेरे जीवन में लम्बे समय तक कोई बॉयफ्रेंड या पति नहीं था। वस्तुतः मेरे पिता ही मेरे बॉयफ्रेंड थे। मेरे घर में वही मुख्य पुरुष थे। मेरे साथ ऐसा इसीलिए होता था क्योंकि काम के समय मुझे अपमानित किया जाता था।”

बता दें कि नीना गुप्ता वेस्टइंडीज के सर्वश्रेष्ठ क्रिकेटरों में से एक सर विवियन रिचर्ड्स के साथ रिलेशनशिप में हुआ करती थीं। इन दोनों की बेटी मशाबा गुप्ता पेशे से फैशन डिजाइनर हैं। नीना फ़िलहाल विवेक मेहरा के साथ शादीशुदा जीवन का लुत्फ़ उठा रही हैं। उन्होंने कहा कि लॉकडाउन के दौरान उन्हें पहली बार ऐसा लगा कि वो एक शादीशुदा जोड़े की तरह रह रहे हैं। नीना और विवेक दो दशक पहले मुंबई से लंदन की एक फ्लाइट में मिले थे।

RJ सिद्धार्थ कन्नन ने ‘ग्रैंडसन’ के एक्टर्स का लिया इंटरव्यू

तब से ये दोनों साथ ही हैं। लॉकडाउन के दौरान 6 महीने तक दोनों उत्तराखंड के नैनीताल स्थित मुक्तेश्वर गाँव में थे। जहाँ विवेक सामान्यतः दिल्ली में रहते हैं, नीना को काम के सिलसिले में मुंबई में रहना पड़ता है। नीना ने कहा कि लॉकडाउन के दौरान पहली बार दोनों को एक-दूसरे को जानना-समझने का मौका मिला। नीना गुप्ता 1994 की फिल्म ‘वो छोकरी’ में एक युवा विधवा महिला का किरदार निभा कर पहली बार सुर्ख़ियों में आई थीं। तब उन्हें नेशनल अवॉर्ड से नवाजा गया था।

13 साल की बच्ची को अश्लील तस्वीर और गंदे वीडियो से ब्लैकमेल: बाल-दाढ़ी बनाने वाला मो. आमिर UP से गिरफ्तार

दिल्ली पुलिस ने 13 साल की बच्ची से इंस्टाग्राम के जरिए दोस्ती करने के बाद उसकी अश्लील तस्वीर बनाकर उसे ब्लैकमेल करने के मामले में मोहम्मद आमिर (21 साल) नाम के एक आरोपित को गिरफ्तार किया है।

पुलिस ने उस पर पॉक्सो एक्ट के तहत कार्रवाई की है। इस मामले में पीड़ित बच्ची के पिता ने अलीपुर थाने में शिकायत दर्ज कराई थी कि कोई उनकी बच्ची को अश्लील तस्वीरें और वीडियो भेजकर उसे ब्लैकमेल करने की कोशिश कर रहा है। उन्होंने पुलिस को बताया कि किसी ने उनकी बेटी के इंस्टाग्राम पर उसे फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजी थी, जिसे एक्सेप्ट करने के बाद आरोपित उनकी बेटी को लगातार अश्लील वीडियो और इमेज भेजकर ब्लैकमेल करने लगा।

बच्ची को ब्लैकमेल करने की जानकारी मिलने के बाद पुलिस ने मामले की जाँच के लिए एक एसआई और दो कॉस्टेबल की टीम गठित कर दी, जिसे अलीपुर थाने के एसएचओ ने लीड किया। साइबर क्राइम डिपार्टमेंट ने आरोपित की लोकेशन पता लगाने के बाद पहले उसके खिलाफ सबूत इकट्ठा किया। इसके बाद पुलिस की टीम ने यूपी के बिजनौर जिले के नेहटौर गाँव से उसे धर दबोचा।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, मोहम्मद आमिर अपने गाँव में एक सैलून की दुकान में काम सीख रहा था। वह सोशल मीडिया पर खुद को एक अच्छे पारिवारिक बैकग्राउंड का बताकर लड़कियों से दोस्ती करता था।

पुलिस ने बताया कि आरोपित ने लड़की को ब्लैकमेल करके उससे 5,000 रुपए माँगे थे, जिसमें से लड़की ने उसे ऑनलाइन 2000 रुपए दे भी दिया था, लेकिन, आरोपित बाकी के पैसे के लिए उसे धमका रहा था।

आमिर ऐसी कई सारी लड़कियों को इसी तरीके से ब्लैकमेल कर चुका है। इस मामले में डीसीपी आउटर नॉर्थ दिल्ली, राजीव रंजन सिंह ने कहा, “आरोपित पर आईपीसी की धारा 387 (जबरन वसूली) के तहत मामला दर्ज किया गया है। साथ ही उस पर पॉक्सो एक्ट के तहत भी केस दर्ज किया गया है।”

AltNews ने उठाया टूलकिट पर कॉन्ग्रेस को बचाने का जिम्मा, पोल खुलते बदल डाली ट्वीट… अब इस पर भी फँसा

कॉन्ग्रेस पार्टी का टूलकिट जैसे ही मंगलवार (मई 18, 2021) को लीक हुआ, पार्टी को बचाने के लिए उसका एक अघोषित मुखपत्र सामने आ गया। इस टूलकिट में कुम्भ को बदनाम कर हिन्दू धर्म को नीचा दिखाने, ईद का महिमामंडन करने, PM मोदी की छवि धूमिल करने और जलती चिताओं व लाशों की तस्वीरों के जरिए भारत का नाम बिगाड़ने का पूरा खाका था। इसके बाद AltNews ने फैक्ट-चेक के नाम पर झूठ परोसा और फिर उस पर लीपापोती की।

यह खेल कैसे खेला गया, उसकी क्रोनोलॉजी समझते हैं। कॉन्ग्रेस के लीक हुए टूलकिट में स्पष्ट लिखा था कि पार्टी के नेता कोरोना महामारी के बीच सोशल मीडिया पर किसी भी पीड़ित को मदद करने से पहले उसे कहें कि वो कॉन्ग्रेस पार्टी और इसके नेताओं के हैंडल्स को टैग करें। इसके बाद ‘दोस्त पत्रकारों’ की मदद से उस गुहार को वायरल करने की सलाह दी गई थी। फिर कॉन्ग्रेस नेता ‘मदद’ करते। इसमें भी पत्रकारों और प्रभावशाली लोगों को प्राथमिकता देने को कहा गया था।

AltNews इस बात को झूठ साबित करने निकल पड़ा और उसने दावा किया कि कॉन्ग्रेस के नेता उन लोगों की भी मदद कर रहे थे, जिन्होंने उन्हें या उनकी पार्टी को टैग नहीं किया था। प्रतीक सिन्हा और मोहम्मद जुबैर के पोर्टल ने दावा किया कि एक फर्जी लेटरहेड पर ये कॉन्ग्रेस का टूलकिट उसके विरोधियों ने तैयार किया है, पार्टी को बदनाम करने के लिए। साथ ही साक्षी नाम की एक महिला का ट्वीट सबूत के रूप में दिखाया।

प्रोपेगंडा पोर्टल AltNews ने दावा किया कि साक्षी ने कॉन्ग्रेस पार्टी या इसके नेताओं को टैग तक नहीं किया था, लेकिन फिर भी ‘इंडियन यूथ कॉन्ग्रेस (IYC)’ के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्रीनिवास BV ने उसकी मदद की। ये ट्वीट सोमवार का है, अर्थात टूलकिट लीक होने से एक दिन पहले का। इस ट्वीट में उन्होंने एक मरीज के लिए प्लाज्मा की गुहार लगाई थी। इसके बाद श्रीनिवास और साक्षी में बात हुई कि प्लाज्मा थेरेपी को सरकार ने कोरोना के इलाज से हटा दिया है या नहीं।

फिर श्रीनिवास ने साक्षी को मैसेज से एक नंबर भेजा और ‘SOS टीम’ से संपर्क करने को कहा। अब सवाल उठता है कि क्या सचमुख IYC के अध्यक्ष ने टूलकिट के हिसाब से काम नहीं किया और बिना खुद को या अपनी पार्टी को टैग किए ही मदद के लिए हाथ बढ़ा दिया। दरअसल, ऐसा नहीं है। साक्षी ने SOS वाले हैशटैग्स के साथ उस ट्वीट को कोट करते हुए एक और ट्वीट किया था, जिमसें उन्होंने कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी समेत कई बड़े नेताओं को टैग किया था।

जिस लेख में ‘तुलनात्मक अध्ययन’ की बातें कर कॉन्ग्रेस के टूलकिट को विरोधियों की साजिश बताई गई, उसी लेख में ये झूठ फैलाया गया कि कॉन्ग्रेस नेता ने बिना टैग हुए एक महिला की मदद की। जब पोल खुल गई तो AltNews ने चुपके से साक्षी के ट्वीट को अपने लेख से हटा दिया और उसकी जगह पत्रकार आदित्य राज कौल का ट्वीट लगा दिया और साथ ही लेख में भी साक्षी के नाम की जगह कौल का नाम एडिट कर के डाल दिया गया।

इसमें देखा जा सकता है कि कौल ने लिवर ट्रांस्पलांट कराने वाले एक कोविड नेगेटिव मरीज के लिए O ग्रुप ब्लड के लिए निवेदन पोस्ट किया था। श्रीनिवास ने उन्हें रिप्लाई देते हुए बताया कि ब्लड का इंतजाम कर दिया गया है और वो दो अन्य डोनर्स को भी भेज रहे हैं। क्या साक्षी वाला ट्वीट हटा कर आदित्य राज कौल का ट्वीट डालने से AltNews ने गलती सुधार ली? नहीं। क्योंकि, कौल का ट्ववीट टूलकिट के लीक होने के बाद किया गया था।

‘टीम भारत’ ने मंगलवार को सुबह 10:01 बजे टूलकिट को लीक किया था, जबकि आदित्य राज कौल के निवेदन का ट्वीट 11:04 बजे का है, यानी ठीक एक घंटे बाद का। कौल का ट्वीट लगाते हुए AltNews ये भी भूल गया कि इसी टूलकिट में पत्रकारों के निवेदन को प्राथमिकता देने की बात की गई थी। AltNews ने टूलकिट के लीक होने के बाद के एक ट्वीट को लेकर ये साबित करना चाहा कि ये टूलकिट फेक है और इसके हिसाब से काम नहीं हो रहा था।

‘मरने दूँगा बच्चों को, नहीं बचाऊँगा… उनकी मौत से दिखेगी इजरायली क्रूरता’: 36 सेकंड के कॉल से समझें इस्लामी फिलिस्तीनी मानसिकता

‘इजरायल बहुत गलत कर रहा है। कमजोर फिलिस्तिनियों को मार रहा है। फिलिस्तीनी बच्चों के शव मलबे से निकाले जा रहे हैं। उनके जूतों में खून लगा हुआ है। उनके बेजान लटके हाथ दिख रहे हैं।’ – यही 4-5 लाइन या 4-5 फोटो आपको सोशल मीडिया से लेकर अंतरराष्ट्रीय मीडिया खबरों में दिख रही होगी। लेकिन कहानी में ट्विस्ट है। पहले नीचे के ट्वीट को गौर से देखते हैं। इस वीडियो में अरबी में कही जा रही बातों का अंग्रेजी अनुवाद भी दिया गया है।

ये वीडियो है दो लोगों की बातचीत का। इनमें से एक ‘इजरायल डिफेंस फोर्सेज (IDF)’ का प्रतिनिधि है तो एक फिलिस्तीन की गाज़ा पट्टी स्थित एक इमारत के संचालक का। जैसा कि इजरायल दोहराता आया है, उसने किसी भी इमारत को ध्वस्त करने से पहले वहाँ के लोगों को बाहर निकलने के लिए पर्याप्त वक़्त और पूर्व-सूचना दी है। समाचार एजेंसी अल-जज़ीरा की इमारत को तबाह करने से पहले भी उन्हें बाहर निकलने को कह दिया गया था।

इसी तरह एक अन्य ठिकाने को निशाना बनाने से पहले इजरायल ने वहाँ फोन कॉल कर के आम लोगों को 1 घंटे में बाहर निकालने को कहा। इसमें फिलिस्तीन की तरफ से कहा जाता है कि वो हर व्यक्ति को इमारत से बाहर नहीं निकाल सकता और इसके लिए कम से कम 2 घंटे चाहिए होंगे। इस पर IDF उन्हें समझाता है कि इमारत पर बम गिरने वाली है, इसीलिए इसे खाली कराना ज़रूरी है। इस पर उधर से कहा जाता है कि तुम जहाँ मन हो बॉम्बिंग करो।

IDF इस रूखे से जवाब पर बड़े प्यार से समझाता है, “नहीं भाई। हम वो हर कुछ करेंगे जिससे आपकी जान बच जाए।” इस पर फिलिस्तीन का अधिकारी कहता है कि वो मरना चाहता है और इमारत में मौजूद सभी लोग मरना चाहते हैं। IDF उसे बार-बार समझाता है कि क्या कम से कम महिलाओं व बच्चों को बचाने की भी उसकी कोई जिम्मेदारी नहीं है? इस पर फिलिस्तीन की तरफ से कहा जाता है कि अगर बच्चों को मरने की ज़रूरत है तो उन्हें मरने दो।

अंत में व्यक्ति इसका कारण भी बता देता है। वो कहता है कि दुनिया को इजरायल की क्रूरता के बारे में बताने के लिए वो बच्चों को इमारत से बाहर नहीं निकालेगा, उन्हें नहीं बचाएगा और मरने देगा। बमबारी से पहले 1 घंटे का समय दिए जाने के बावजूद इस तरह की भाषा बताती है कि फिलिस्तीनी महिलाओं बच्चों को बचाने के लिए पर्याप्त वक़्त मिलने के बावजूद उन्हें जानबूझ कर मौत के मुँह में झोंक रहे हैं, ताकि इजरायल को बदनाम किया जा सके।

बता दें कि जहाँ एक तरफ इजरायल ‘आयरन डोम‘ से फिलिस्तीनी रॉकेट्स को रोक कर अपने लोगों की जान बचा रहा है, वहीं उसने अब पिछले 10 वर्षों से हमास के आतंकियों द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले एक मेट्रो टनल को तबाह कर दिया है। इसी टनल के माध्यम से आतंकी आवागमन, हथियारों की तस्करी और प्रशिक्षण का कार्य करते थे। मात्र 5 दिनों में इजरायल ने इसे नेस्तनाबूत कर दिया। वहीं हमास के कई रॉकेट्स मिसफायर होकर गाज़ा पट्टी में ही गिरे हैं।