सुप्रीम कोर्ट ने प्रशांत किशोर को पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह का ‘प्रधान सलाहकार’ नियुक्त किए जाने के विरोध में दायर याचिका को लेकर गुरुवार (मई 6, 2021) को पंजाब सरकार को नोटिस जारी किया। याचिका में प्रशांत किशोर की नियुक्ति और उन्हें सरकारी खजाने से वेतन तथा सुविधाएँ दिए जाने पर आपत्ति जताई गई है।
कुछ दिन पहले इसी याचिका को पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने ये कहते हुए खारिज कर दिया था कि सीएम को पूरा अधिकार है कि वे जिसे चाहें उसे अपना सलाहकार चुने। इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है।
SC में मामले की सुनाई जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस हेमंत गुप्ता की बेंच ने की। पंजाब सरकार समेत सभी पक्षकारों को नोटिस जारी कर 4 हफ्ते में जवाब माँगा गया है। याचिकाकर्ता के वकील ने अपनी दलील में कहा कि पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने उनके केस में तथ्यों को ठीक से नहीं सुना और उनकी याचिका खारिज कर दी गई।
याचिका में क्या कहा गया?
इस केस में लभ सिंह और सतिंदर सिंह ने पंजाब हरियाणा हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी। इस याचिका में प्रशांत किशोर की प्रधान सलाहकार पद पर नियुक्ति को निरस्त करने की अपील की गई थी।
अपनी याचिका में याचिकाकर्ताओं ने अनुच्छेद 16(1) का हवाला देते हुए कहा था कि राज्य सरकार के कार्यालय में कोई भी अपॉइंटमेंट, इससे (अनुच्छेद में निहित प्रावधानों) अलग नहीं हो सकता। इस आर्टिकल में हर नागरिक को रोजगार में अवसर की समानता और नियुक्ति का अधिकार है। याचिकाकर्ताओं ने दलील दी थी कि राज्य सरकार के लिए ये जरूरी है कि वो ऐसी नियुक्ति के लिए कोई विज्ञापन निकाले, क्योंकि याचिकार्ता समेत भारी तादाद में पढ़े-लिखे समझदार लोग राज्य में बैठे हैं।
याचिका में ये भी कहा गया था कि किशोर की नियुक्ति मुख्यमंत्री के प्रधान सलाहकार पद पर होगी। इस तरह उन्हें कैबिनेट मंत्री का पद मिल जाएगा। उन्हें वेतन और अन्य सुविधाएँ राज्य के खजाने से दिया जाएगा।
प्रशांत किशोर को क्या मिलेंगी सुविधाएँ?
कुछ समय पहले पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर को अपने प्रमुख सलाहकार के तौर पर नियुक्त किया था। पंजाब सरकार की ओर से जारी आदेश में बताया गया था कि प्रशांत किशोर अपनी सैलरी के तौर पर सिर्फ एक रुपया लेंगे। इसके अलावा उन्हें प्राइवेट सेक्रेटरी, पर्सनल असिस्टेंट, डाटा एंट्री ऑपरेटर, एक क्लर्क और दो चपरासी दिए जाएँगे। किशोर को राज्य ट्रांसपोर्ट कमिश्नर की ओर से वाहन मुहैया कराया जाएगा और उनके आतिथ्य के लिए प्रति माह 5000 रुपए खर्च किए जाएँगे।
1995 में सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक आदेश में हिंदुत्व की व्याख्या ‘जीवनशैली’ के तौर पर की थी। दो दशक बाद शीर्ष अदालत ने इस पर पुनर्विचार का फैसला किया। अब मद्रास हाई कोर्ट का एक फैसला आया है। उस फैसले पर गौर करने से पहले एक परिस्थितिजन्य सवाल। ऐसी परिस्थिति जो आपमें से बहुतों के लिए काल्पनिक होगी। ठीक उसी वक्त आप जैसे बहुतों के लिए हकीकत।
आप एक गाँव/कस्बे/शहर में रहते हैं। बचपन से आप देख रहे थे कि राम जानकी मोहल्ले से रामनवमी की जुलूस हर साल निकलती है। विभिन्न इलाकों से गुजरते हुए जिला स्कूल मैदान में समाप्त हो जाती है। कभी कोई बवाल नहीं। अचानक से एक बार यात्रा मार्ग में पड़ने वाले इस्लाम नगर के लोग आपके जुलूस पर आपत्ति जताते हैं। इसके बाद उनकी भावनाओं का हवाला दे आपकी धार्मिक यात्रा का मार्ग बदल/छोटा कर दिया जाता है। सालों से चली आ रही एक परंपरा पर विराम लग जाता है, क्योंकि एक खास इलाके के बहुसंख्यकों को आपके धार्मिक आयोजन से दिक्कत है।।
ऐसी किसी भी स्थिति के लिए मद्रास हाई कोर्ट का एक फैसला जो हाल में चुनाव आयोग पर तल्ख टिप्पणी के लेकर चर्चा में रहा है, नजीर बन सकता है। सरल शब्दों में कहें तो हाई कोर्ट ने कहा है;
मजहबी असहिष्णुता की अनुमति दिया जाना एक धर्मनिरपेक्ष देश के लिए अच्छा नहीं है। किसी भी मजहबी समूह के किसी भी तरह की असहिष्णुता पर रोक लगनी चाहिए
भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है। यदि क्षेत्र विशेष में एक मजहबी समूह बहुसंख्यक है तो यह उस क्षेत्र में अन्य धर्म के लोगों के त्योहारों या जुलूस की अनुमति नहीं दिए जाने का आधार नहीं हो सकता
प्रत्येक समुदाय को दूसरे धर्मों की भावनाओं का अपमान किए बिना धार्मिक जुलूस निकालने का मौलिक अधिकार है
क्षेत्र विशेष का बहुसंख्यक समूह दूसरे धर्म के लोगों को धार्मिक जुलूस निकालने या त्योहार मनाने से नहीं रोक सकते
यदि इसे स्वीकार किया गया तो वह दिन भी आ सकता है जब क्षेत्र विशेष के बहुसंख्यक अपने इलाके में अन्य धार्मिक समूह के लोगों को सड़कों पर आवाजाही, परिवहन या अन्य सामान्य गतिविधियों से भी रोक सकते हैं
क्षेत्र विशेष के मजहबी बहुसंख्यकों के इस रवैए के विरोध में अन्य धार्मिक समूह भी इसी तरह का रुख दिखाएँ तो अराजकता फैल सकती है। दंगे हो सकते हैं। इसे जानमाल का नुकसान होगा। हमारे देश के धर्मनिरपेक्ष चरित्र को नुकसान हो सकता है
अब यह जानते हैं कि मद्रास हाई कोर्ट को आखिरकार ये टिप्पणियाँ क्यों करनी पड़ी?
जस्टिस एन किरुबाकरण (N. Kirubakaran) और जस्टिस पी वेलुमुरुगन (P. Velumurugan) की खंडपीठ ने एक गाँव में कुछ हिंदू त्योहारों/धार्मिक जुलूसों को लेकर मुस्लिमों की आपत्ति को लेकर लंबे समय से चल रहे विवाद पर सुनवाई के दौरान ये बातें कही। लाइव लॉ की रिपोर्ट बताती है कि सरकारी जमीन के इस्तेमाल को लेकर 1951 से ही हिंदुओं और मुस्लिमों के बीच विवाद चल रहा था। इसके कारण कई सांप्रदायिक विवाद हुए और दोनों पक्षों की ओर से कई मामले भी दर्ज किए गए।
बावजूद इसके 2011 तक हिंदुओं के कुछ त्योहारों के आयोजन को लेकर कोई विवाद नहीं रहा। तीन मंदिरों का तीन दिवसीय आयोजन शांति से 2011 तक निपटता रहा। 2012 में मुस्लिमों ने इन आयोजनों को ‘पाप’ करार देते हुए विरोध किया। वे इलाके में खुद के बहुसंख्यक होने और अपनी भावनाओं का भी हवाला दे रहे थे। इसकी वजह से 2012 के बाद ये आयोजन कई तरह के प्रतिबंधों के साथ होने लगे। 2018 में रेवेन्यू डिवीजनल आफिसर ने कुछ शर्तों के साथ आयोजन को अनुमति दी थी। इसे मद्रास हाई कोर्ट में चुनौती दी गई थी। हाई कोर्ट का ताजा फैसला इसी आलोक में आया है।
ऊपर जो परिस्थितिजन्य सवाल है उस तरह के हालात में अमूमन देखने को मिलता है कि हिंदू मन मसोस कर रह जाते हैं। या फिर उनके साथ वही होता है जो चंदन गुप्ता या अनुराग पोद्दार के साथ हुआ। अब इनसे इतर मद्रास हाई कोर्ट ने एक रास्ता दिखाया है, जो मौजूँ है!
पश्चिम बंगाल के राज्यपाल जगदीप धनखड़ ने रविवार (9 मई) को नारद स्टिंग टेप मामले में तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) के शीर्ष नेताओं पर मुकदमा चलाने के लिए केंद्रीय जाँच ब्यूरो (CBI) को मंजूरी दे दी। राजभवन ने कहा, पश्चिम बंगाल के गवर्नर जगदीप धनखड़ ने फिरहाद हाकिम, सुब्रत मुखर्जी, मदन मित्रा और शोवन चटर्जी के खिलाफ एक घोटाले में सीबीआई को मुकदमा चलाने की अनुमति दे दी है।
ये आदेश सीबीआई द्वारा पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की सरकार में मंत्री के रूप में कर चुके चार टीएमसी नेताओं के खिलाफ जाँच की अनुमति दिए जाने का निवेदन करने के बाद दिया गया है।
West Bengal Governor Jagdeep Dhankhar sanctions prosecution of Firhad Hakim, Subrata Mukherjee, Madan Mitra & Sovan Chatterjee in a scam being investigated by CBI, says Raj Bhavan pic.twitter.com/bMzeNNNsVT
एक प्रेस विज्ञप्ति में, राजभवन ने कहा, “माननीय राज्यपाल कानून के संदर्भ में अनुमोदन देने के लिए सक्षम प्राधिकारी हैं क्योंकि वे संविधान के अनुच्छेद 164 के तहत ऐसे मंत्रियों के लिए नियुक्ति प्राधिकारी होते हैं।”
बयान में कहा गया है कि चार नेताओं के खिलाफ मुकदमा चलाने की मंजूरी धनखड़ द्वारा दी गई है और ऐसा “सीबीआई द्वारा ऐसा अनुरोध किए जाने और माननीय राज्यपाल को मामले से संबंधित संपूर्ण दस्तावेज उपलब्ध कराए जाने के बाद किया गया” और इस तरह की मंजूरी देने के लिए सक्षम अधिकारी होने के नाते उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 163 और 164 के तहत अपनी शक्तियों का प्रयोग किया।”
2016 में सार्वजनिक किए गए थे नारद स्टिंग ऑपरेशन
सीबीआई अब फिरहाद हाकिम, सुब्रत मुखर्जी, मदन मित्रा और शोवन चटर्जी के खिलाफ कार्रवाई शुरू करेगी। ये सभी तब ममता बनर्जी मंत्रिमंडल में मंत्री थे जब 2014 में कथित रूप से नारद स्टिंग टेप बनाए गए थे।
हाल ही में संपन्न पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में हाकिम, मुखर्जी और मित्रा को टीएमसी विधायक के रूप में फिर से चुना गया है, जबकि बीजेपी में शामिल होने के लिए टीएमसी छोड़ चुके चटर्जी ने चुनाव के बाद दोनों दलों से संबंध तोड़ लिए हैं।
पश्चिम बंगाल 2016 विधानसभा चुनावों से पहले सार्वजनिक किए गए नारद स्टिंग टेप में दावा किया गया था कि 2014 में टीएमसी के मंत्रियों, सांसदों और विधायकों से मिलते-जुलते लोग कथित रूप से वादा किए गए अहसान के बदले में एक काल्पनिक कंपनी के प्रतिनिधियों से पैसे लेते नजर आए थे।
यह स्टिंग ऑपरेशन कथित तौर पर नारद न्यूज पोर्टल के मैथ्यू सैमुअल द्वारा किया गया था। कलकत्ता हाई कोर्ट ने मार्च, 2017 में स्टिंग ऑपरेशन मामले में सीबीआई जाँच का आदेश दिया था।
देश फिलहाल कोरोना वायरस संक्रमण की दूसरी लहर से लड़ रहा है लेकिन अब एक नया खतरा सामने आ रहा है। यह खतरा है ब्लैक फंगस (Black Fungus) या म्यूकरमाइकोसिस (Mucormycosis) का। यह एक दुर्लभ लेकिन खतरनाक फंगस इन्फेक्शन है। गुजरात और महाराष्ट्र में ब्लैक फंगस के कई मरीज सामने आ रहे हैं। चिंता की बात यह है कि यह फंगल इन्फेक्शन कोरोना वायरस संक्रमण से ठीक हुए मरीजों को फिर से बीमार कर रहा है।
गुजरात में ब्लैक फंगस (Black Fungus) से पीड़ित मरीजों की संख्या बढ़ रही है। राज्य में इस इन्फेक्शन से पीड़ित मरीजों की संख्या 100 से अधिक हो चुकी है। इंडिया टुडे की रिपोर्ट के अनुसार अकेले सूरत में ही ब्लैक फंगस या म्यूकरमाइकोसिस के कारण 8 मरीजों की आँखों की रोशनी चली गई। ये सभी मरीज हाल ही में कोरोना वायरस संक्रमण से ठीक हुए थे। गुजरात सरकार ने इस पर संज्ञान लेते हुए सभी सिविल अस्पतालों में इस इन्फेक्शन से पीड़ित मरीजों के लिए अलग वार्ड बनाने का आदेश दिया है।
महाराष्ट्र में भी ब्लैक फंगस के मामले बढ़ते जा रहे हैं। राज्य में इस इन्फेक्शन से पीड़ित 8 मरीजों की मौत हो गई है लगभग 200 मरीजों का इलाज चल रहा है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार महाराष्ट्र में 200 में से 8 मरीजों का इलाज किया जा चुका है। हालाँकि, विशेषज्ञों का कहना है कि ब्लैक फंगस या म्यूकरमाइकोसिस का इलाज संभव है लेकिन यदि इलाज में देरी की गई तो यह खतरनाक साबित हो सकता है। इस इन्फेक्शन के कारण मरीजों की आँखों की रोशनी जा सकती है और सबसे बुरे केस में मौत भी हो सकती है। कमजोर रोग प्रतिरोधक क्षमता (इम्यूनिटी) इसके पीछे एक बड़ा कारण है।
नीति आयोग के सदस्य (स्वास्थ्य) वीके पाल ने शुक्रवार को पीटीआई से चर्चा करते हुए कहा कि म्यूकरमाइकोसिस इन्फेक्शन म्यूकर नाम के फंगस के कारण होता है। यह फंगस नम सतह पर पाया जाता है। पाल ने बताया कि कोरोना वायरस से संक्रमित मरीज को जो ऑक्सीजन सपोर्ट दिया जाता है उसमें ह्यूमिडिफायर होता है जिसमें पानी की मात्रा होती है। इससे उत्पन्न नमी के कारण मरीज ब्लैक फंगस का शिकार हो सकता है। सरदर्द, बुखार, आँखों के नीचे दर्द और कम दिखाई देना इस इन्फेक्शन के प्रमुख लक्षण हैं जो कोरोना वायरस संक्रमण से स्वस्थ हुए मरीज में उभर सकते हैं।
उत्तर प्रदेश के सीतापुर जेल में बंद समाजवादी पार्टी के नेता एवं रामपुर के सांसद आजम खान की तबीयत अचानक बिगड़ने के कारण उन्हें लखनऊ के मेदांता अस्पताल में भर्ती कराया गया। आजम खान सीतापुर में अपने बेटे अब्दुल्ला के साथ जेल में बंद थे। दोनों ही कोरोना वायरस से संक्रमित हैं। आजम खान को उनके बेटे अब्दुल्ला के साथ ही मेदांता में शिफ्ट किया गया है।
सीतापुर जेल प्रशासन के अनुसार Covid-19 से पीड़ित आजम खान कई दिनों से बीमार थे लेकिन शनिवार रात से ही उनका ऑक्सीजन लेवल 90 तक पहुँच गया और दोपहर होते-होते उनकी तबीयत बिगड़ने लगी। हालाँकि, कई दिनों से बीमार चल रहे आजम खान ने संक्रमित पाए जाने पर जेल से बाहर निकलने से मना कर दिया था। उनकी माँग थी कि उनका इलाज जेल में ही कराया जाए।
आजम खान द्वारा इलाज के लिए जेल से बाहर जाने से मना करने की खबर जब प्रशासनिक अधिकारियों तक पहुँची तो उन्होंने आजम खान को लखनऊ के ही पीजीआई में भर्ती कराने के लिए कहा लेकिन आजम खान इसके लिए भी राजी नहीं हुए। हालाँकि, इसके बाद आजम खान लखनऊ के मेदांता अस्पताल में उपचार कराने के लिए तैयार हो गए जिसके बाद उन्हें बेटे अब्दुल्ला के साथ एम्बुलेंस के माध्यम से लखनऊ ले जाया गया।
सपा सांसद आजम खान, बेटे व पत्नी सहित फरवरी 2020 से ही जेल में हैं। उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिला कारागार में बंद अखिलेश सरकार के पूर्व मंत्री आजम खान 29 अप्रैल को कोरोना वायरस से संक्रमित पाए गए। इसके बाद उन्हें बेहतर इलाज के लिए लखनऊ के केजीएमयू ले जाने के लिए पुलिस अधिकारियों के साथ एंबुलेंस जेल के गेट पर पहुँची थी लेकिन आजम खान ने सड़क के रास्ते जाने से साफ इनकार कर दिया था। हालाँकि, इस बार आजम खान लखनऊ के मेदांता अस्पताल जाने के लिए तैयार हो गए।
टीकरी बॉर्डर पर जारी किसान आंदोलन में शामिल होने आई पश्चिम बंगाल की 25 वर्षीय युवती की 30 अप्रैल को टीकरी बॉर्डर के ही एक निजी अस्पताल में मृत्यु हो गई थी। युवती कोरोना वायरस से संक्रमित थी। इस मामले ने अब नया मोड़ लिया है। खबर आ रही है कि युवती के साथ रेप सहित अन्य धाराओं में 6 लोगों के विरुद्ध मामला दर्ज किया गया है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार इन 6 लोगों में 2 किसान नेता, 2 आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ता और किसान आंदोलन से जुड़ी 2 महिला वॉलंटियर शामिल हैं।
पश्चिम बंगाल से आंदोलन में शामिल होने आई इस युवती की मृत्यु कोरोना वायरस के संक्रमण से हुई थी लेकिन अब युवती के पिता के बयान के आधार पर बहादुरगढ़ शहर थाना क्षेत्र में रेप का मामला दर्ज हुआ है। आरोपित किसान सोशल आर्मी से जुड़े थे। आरोपितों में अनिल मलिक, अनूप सिंह, अंकुश सांगवान, जगदीश बराड़, कविता आर्य और योगिता सुहाग शामिल हैं।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार आरोपित अनूप सिंह हिसार क्षेत्र का है और आम आदमी पार्टी (AAP) का सक्रिय कार्यकर्ता भी है जिसकी पुष्टि आप सांसद सुशील गुप्ता ने की। अनिल मलिक भी दिल्ली में AAP का कार्यकर्ता बताया जा रहा है।
आरोपितों पर रेप के अलावा अपहरण, ब्लैकमेलिंग और धमकी देने की धाराएँ भी लगाई गई हैं। युवती की मौत के बाद से ही अनूप सिंह गायब है। हालाँकि, युवती के माता-पिता टीकरी और सिंघू बॉर्डर पर आए थे। उन्होंने शनिवार रात ही बहादुरगढ़ शहर थाना क्षेत्र में मामला दर्ज करवाया।
इसके बाद ही संयुक्त किसान मोर्चा ने अनूप सिंह से अपना पल्ला झाड़ लिया था। थाना प्रभारी विजय कुमार के अनुसार महिला थाना प्रभारी को इस मामले की जाँच सौंप दी गई है। हालाँकि, युवती कोरोना वायरस से संक्रमित थी, मगर किसानों का कहना था कि उन्हें बदनाम करने के लिए दुष्कर्म होने जैसी बातें की जा रही हैं।
इस घटना के बाद से लगातार किसान आंदोलन पर सवाल उठ रहे हैं। हालाँकि, किसान आंदोलन के नेता यही दावा करते रहे कि युवती की मौत फेफड़ों में संक्रमण के कारण हुई है लेकिन संदीप सिंह नाम के एक पत्रकार ने ट्विटर पर यह पुष्टि की थी कि युवती की मौत कोरोना वायरस के संक्रमण के कारण हुई है। अब इस मामले में युवती के साथ दुष्कर्म होने की बात भी सामने आ रही है। फिलहाल अभी तक किसी आरोपित के गिरफ्तार होने की बात सामने नहीं आई है।
First confirmed case of death due to COVID at Tikri border protest site. Momita Basu from Bengal has died. She was protesting since 11th of April. Farm unions have not publicly acknowledged that she died due to corona.
इससे पहले भी किसान आंदोलन से जुड़े कार्यकर्ताओं पर यौन उत्पीड़न के आरोप लगते आए हैं। इनमें मोहम्मद जुबेर, वरुण चौहान (ट्रॉली टाइम्स का सदस्य), अंतरप्रीत सिंह (स्टूडेंट फॉर सोसायटी का नेता) और स्वराज फॉर यूथ का अध्यक्ष मनीष कुमार भी शामिल है।
एक ओर जहाँ देश में लगातार बढ़ रहे कोरोना वायरस के संक्रमण के बावजूद भी किसान आंदोलन में भीड़ बढ़ रही है, वहीं अब किसान आंदोलन के कार्यकर्ताओं द्वारा यौन शोषण की खबरें भी आ रही हैं। ऐसे में लगातार किसान आंदोलन पर प्रश्न उठ रहे हैं।
उत्तर प्रदेश के बागपत जिले से लाशों के कफन चोरी करके उन्हें दोबारा बेचने का मामला सामने आया है। इस पूरे मामले से जुड़े एक बड़े गैंग का पर्दाफाश हुआ है जो कब्रिस्तान और श्मशान जैसी जगहों से कफन चुराकर उनकी धुलाई और प्रेस करके उन पर ब्रांडेड स्टीकर लगाकर उन्हें दोबारा बाजार में बेच देता था। बड़ौत पुलिस ने इस मामले में 7 लोगों को गिरफ्तार किया है।
बड़ौत पुलिस के इंस्पेक्टर आज शर्मा ने बताया कि पुलिस लॉकडाउन के कारण तलाशी अभियान में जुटी हुई थी तब ब्रांडेड कपड़ों से लदी एक गाड़ी पकड़ी गई। कपड़ों का बिल न होने पर आरोपितों से सख्ती से पूछताछ की गई तब इस पूरे राज का भंडाफोड़ हुआ। पुलिस के अनुसार आरोपित कब्रिस्तान और शमशान से शवों के वस्त्रों और कफन की चोरी कराते थे। इसके लिए बाकायदा 300-400 रुपए की दिहाड़ी पर मजदूर रखे गए थे जो शवों के कफन और अन्य वस्त्रों की चोरी किया करते थे।
आरोपित शवों से उतारे गए वस्त्रों और कफन की धुलाई करके उस पर प्रेस करते थे। इसके बाद इन कपड़ों पर ग्वालियर की ब्रांडेड कंपनी का स्टीकर लगा दिया जाता था और इन कपड़ों को महँगे दामों पर बेच दिया जाता था। आरोपितों के अनुसार एक कफन की कीमत 400 रुपए तक होती थी। इस मामले में यह भी सामने आया है कि कई कपड़े कोरोना संक्रमित मरीजों के शवों के भी होते थे। सभी आरोपितों के खिलाफ धारा 144 के उल्लंघन और महामारी अधिनियम की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज कर लिया गया है।
गिरफ्तार किए गए आरोपितों के पास से पास से 520 कफन, 127 कुर्ते, 140 कमीज, 34 धोती, 12 गर्म शॉल, 52 साड़ी, तीन रिबन के पैकेट, 1 टेप कटर और 158 ग्वालियर की कंपनी के स्टीकर बरामद हुए हैं। आरोपितों में शाहरुख खान, बबलू, राजू शर्मा, श्रवण कुमार शर्मा, प्रवीण कुमार जैन, आशीष जैन और ऋषभ जैन शामिल हैं। सभी आरोपित बागपत के बड़ौत के ही रहने वाले हैं। आरोपितों ने स्वीकार किया है कि वो कई सालों से यह काम करते आ रहे हैं।
मेडिकल क्षेत्र के जर्नल लैंसेट ने शनिवार (08 मई) को एक लेख प्रकाशित किया जहाँ भारत में कोरोना वायरस संक्रमण के बढ़ते संक्रमण का पूरा ठीकरा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर फोड़ दिया गया। हालाँकि, यह पहली बार नहीं है जब लैंसेट ने भारत की वर्तमान सरकार का विरोध किया हो। इसके पहले लैंसेट कश्मीर से अनुच्छेद 370 के उन्मूलन का विरोध भी कर चुका है।
अपने लेख में लैंसेट जर्नल ने भारत सरकार से यह माँग की है की सरकार कोरोना वायरस से संबंधित सभी आँकड़े सत्यता के साथ प्रकाशित करें और संक्रमण को रोकने के लिए सम्पूर्ण लॉकडाउन जैसे उपायों पर विचार करे। हालाँकि संक्रमण की रफ्तार पर लॉकडाउन का कितना असर होता है, यह निश्चित तौर पर कहा नहीं जा सकता है।
भारत में इस समय अधिकांश आबादी या तो आंशिक लॉकडाउन या पूर्ण लॉकडाउन में पहले से ही है। विशेषज्ञ भी इस बात से सहमत नहीं हैं कि लॉकडाउन के कारण संक्रमण में बहुत ज्यादा कमी आ सकती है। उदाहरण के लिए 19 अप्रैल को दिल्ली में लॉकडाउन किया गया। 1 मई को दिल्ली में संक्रमण की दर 31.10% थी जो शनिवार (08 मई) को 23.34% पहुँच गई। हालाँकि विशेषज्ञों का मानना है कि दिल्ली में संक्रमण में कमी का प्रमुख कारण हो सकता है दूसरी लहर की पीक का आना जो कि दिल्ली में आ चुकी है।
लैंसेट जर्नल के प्रकाशित किए गए लेख की एक सबसे बड़ी समस्या है उसके द्वारा दिए गए आँकड़ों के सोर्स। भारत में होने वाली मौतों के संबंध में अनुमान व्यक्त करने के लिए लैंसेट द्वारा इंस्टिट्यूट ऑफ हेल्थ मैट्रिक्स एण्ड इवैल्यूएशन (IHME) के आँकड़ों का उपयोग किया गया है जिसने 1 अगस्त तक भारत में 1 मिलियन से अधिक मौतों का अनुमान लगाया है।
सोर्स : IHME
IHME के आँकड़े बिल्कुल भी विश्वसनीय नहीं दिखते है क्योंकि IHME ने अनुमान लगाया की भारत में Covid-19 के कारण सितंबर 2020 में 195,135 मौतें हो चुकी हैं जबकि वास्तविकता में मौतों की संख्या लगभग 66,000 ही थी। वर्तमान आँकड़ों की बात करें तो IHME के अनुसार कोरोना वायरस के संक्रमण के कारण होने वाली मौतें 734,238 हैं जबकि अधिकारिक आँकड़ों के अनुसार यह संख्या 242,362 ही है।
इसका मतलब यह है कि IHME का अनुमान तीन गुना है। इस हिसाब से IHME ने अगस्त तक भारत में सबसे बुरी स्थिति में 1.6 मिलियन मौतों, सबसे अच्छी स्थिति में 1.3 मिलियन मौतों और वर्तमान परिस्थितियों के हिसाब से 1.46 मिलियन मौतों का अनुमान लगाया है। IHME ने तो नवंबर 2020 में रोजाना 1000 मौतों का अनुमान व्यक्त किया था जबकि उस समय भारत में संक्रमण की दर कम हो रही थी।
लैंसेट जर्नल में प्रकाशित लेख के लिए पत्रकार अनु भूयन के लेख को भी आधार माना गया है। भूयन के उस लेख में प्रधानमंत्री मोदी द्वारा की गई रैलियों का जिक्र था लेकिन बाकी रैली करने वालों का कोई वर्णन नहीं था। हालाँकि, भूयन के लेख में स्पष्ट तौर पर प्रधानमंत्री मोदी या केंद्र सरकार को भारत में कोरोना वायरस के संक्रमण के लिए दोषी नहीं ठहराया गया लेकिन उस लेख में यह जरूर कहा गया की 2021 के प्रारंभ में भारत में यह धारणा प्रबल रूप से प्रचारित हुई थी कि भारत ने कोरोना वायरस संक्रमण पर जीत हासिल कर ली है और लोगों में हर्ड इम्यूनिटी विकसित हो गई है।
लैंसेट जर्नल ने अनु भूयन के इस लेख को भी एक सोर्स के रूप में प्रकाशित किया और बताया कि यदि भारत में इस प्रकार के विचार प्रचारित हो रहे थे तो मोदी सरकार ही इस राष्ट्रीय आपदा की जिम्मेदार होगी।
लैंसेट जर्नल में दूसरे सोर्स के तौर पर ब्लूमबर्ग के लेख का जिक्र किया गया है। ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के तीन पहलू हैं। पहला है कि इस लेख में 18 से 45 वर्ष की आयु के लोगों के लिए टीकाकरण कार्यक्रम शुरू करने से भीड़ की स्थिति निर्मित हो गई है। हालाँकि की मीडिया समूहों द्वारा यह माँग की जा रही थी कि भारत में 18 से 45 वर्ष की आयु के लोगों के लिए टीकाकरण शुरू कर देना चाहिए लेकिन जब यह शुरू कर दिया गया तो अब यह आरोप लगाया जा रहा है कि इससे भीड़ उत्पन्न हो रही है।
लेख का दूसरा पहलू यह है कि इसमें विपक्षी पार्टियों द्वारा शासित राज्यों की शिकायत है कि महामारी से सीधे निपटने की बजाय सारा भार राज्यों पर स्थानांतरित कर दिया गया है। जबकि सच तो यह है कि यही राज्य महामारी से निपटने के लिए अधिक शक्तियों की माँग कर रहे थे।
ब्लूमबर्ग के लेख का तीसरा पहलू हरिद्वार के कुम्भ मेला से जुड़ा हुआ है। ब्लूमबर्ग ने भीड़ इकट्ठी करने के लिए कुम्भ मेला का तो जिक्र किया लेकिन महीनों से चल रहे किसान आंदोलन पर कुछ भी कहने से बचता रहा। हालाँकि, यह सभी को ज्ञात है कि ब्लूमबर्ग मात्र एक प्रोपेगेंडा फैलाने वाला मीडिया हाउस है।
लैंसेट जर्नल में अल-जजीरा और न्यूयॉर्क टाइम्स का भी जिक्र किया गया है। अल-जजीरा ने जहाँ यह कहकर उत्तर प्रदेश सरकार की आलोचना की कि सरकार उन अस्पतालों को धमका रही है जो ऑक्सीजन की कमी पर आवाज उठाना चाहते हैं। हालाँकि उत्तर प्रदेश सरकार ने ऐसी ही खबरों के बारे में कहा था कि अफवाह फैलाने वालों पर कार्रवाई की जाएगी। इसके अलावा जब मोदी सरकार ने ट्विटर से फेक न्यूज हटाने के लिए कहा था तब न्यूयॉर्क टाइम्स ने प्रोपेगंडा चलाया था कि मोदी सरकार महामारी पर नियंत्रण करने के स्थान पर आलोचना को दबा रही है।
इससे यह साफ पता चलता है कि लैंसेट ने बिना भारतीय शासन व्यवस्था को समझे एक ऐसा लेख प्रकाशित किया है जो वर्तमान मोदी सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आलोचना के उद्देश्य से ही लिखा गया है। लैंसेट जर्नल द्वारा प्रकाशित यह लेख सीधे तौर पर राजनैतिक उद्देश्यों से प्रेरित दिखता है न कि चिकित्सकीय।
उत्तर प्रदेश के बदायूँ जिले के काजी हजरत अब्दुल हमीद मोहम्मद सालिमुल कादरी (सालिम मियाँ) का इंतकाल हो गया है। रमजान के महीने में शनिवार (8 मई 2021) की देर रात 3:51 बजे उन्होंने अंतिम साँस ली। काजी मोहम्मद सालिमुल कादरी के इंतकाल के बाद उनके पार्थिव शरीर के अंतिम दर्शन और जनाजे के लिए कोरोना प्रोटोकॉल का उल्लंघन करते हुए भारी भीड़ उमड़ पड़ी।
उत्तर प्रदेश में कोरोना वायरस के कहर के बीच सरकार ने कड़े आदेश दे रखे हैं कि अंतिम संस्कार में किसी भी सूरत में अधिकतम 20 लोग ही शामिल हो सकेंगे। लेकिन, काजी की मौत के बाद हजारों की संख्या में मुस्लिम बेकाबू भीड़ शामिल थी। सोशल डिस्टेंसिंग तो पूरी तरह से नदारद रही। लोगों के बीच एक इंच की भी दूरी नहीं दिखी।
यही नहीं वीडियो में स्पष्ट देखा जा सकता है कि अधिकतर लोगों ने मास्क नहीं पहन रखे थे। इस दौरान पूरी तरह से कोरोना के प्रोटोकॉल की धज्जियाँ उड़ाई गई। कोरोना के इस दौरान जनाजे के दौरान लापरवाही बरतने से प्रदेश में कोरोना विस्फोट होने का खतरा बढ़ गया है।
वीडियो के वायरल होने के बाद भी मीडिया गिरोह और वामपंथी समूह के मुँह से एक शब्द नहीं निकल रहा है। यही लोग पहले भी सेलेक्टिव आउटरेज दिखाते और अपने चहेतों पर आँख मूँदते नजर आए हैं।
उत्तर प्रदेश सरकार के नियम के मुताबिक, सार्वजिनक स्थानों पर कोई भी व्यक्ति बिना मास्क के घूमता-फिरता मिलता है, तो उस पर एक हजार रुपए तक का जुर्माना लगाया जाएगा। साथ ही दोबारा ऐसा करने पर 10 हजार रुपए तक का जुर्माना लगाया जा सकता है।
इससे पहले राजस्थान के सीकर स्थित खीरवा गाँव में एक व्यक्ति के जनाजे में लापरवाही होने के कारण अब तक 21 लोगों की जान जा चुकी है। पिछले 21 दिनों में इस गाँव के 21 घरों से जनाजे उठ चुके हैं। पहले तो गाँव के ही लोग इसे गंभीरता से नहीं ले रहे थे, लेकिन लगातार होती मौतों से अब वो भी दहशत में हैं। प्रशासनिक अमला भी देर से सक्रिय हुआ और अब लोगों की जाँच कर के उन्हें क्वारंटाइन करने की प्रक्रिया चालू की गई है।
29 अक्टूबर 2017 का दिन था। सोशल मीडिया खासकर ट्विटर पर एक कुत्ते की चर्चा हो रही थी। नाम था पिद्दी। बात 4 साल पुरानी हो गई है। इसलिए पहले कुत्ते का फोटो देख लिया जाए। समझने में आसानी होगी।
बिस्कुट खाने की तैयारी करता पिद्दी
यह फोटो एक वीडियो से लिया गया है। वीडियो देख लेंगे तो इस कुत्ते के टैलेंट के आगे सिर झुका लेंगे। पिद्दी चुटकी बजाते ही बिस्कुट खा लेता है – लपक के। बिस्कुट खाने की इस कला को 29 अक्टूबर 2017 के दिन पूरे देश ने देखा नहीं था बल्कि दिखाया गया था।
बड़े-बड़े लोग, ‘निष्पक्ष’ पत्रकार तक इस कुत्ते के आगे ‘दुम’ हिलाने लगे। सोशल मीडिया पर लोगों ने इन सब को भला-बुरा भी कहा था। लेकिन क्या सभी दुम-हिलाव (ऊदबिलाव प्रजाति के ये लोग सोशल मीडिया में पाए जाते हैं, दूसरों को प्रायः ट्रोल्स कहते हैं) गलत थे? क्या इस महान राष्ट्र में एक कुत्ते को प्राथमिकता नहीं दी जा सकती?
कुत्ता किसका है, यह मानवाधिकार के तहत छिपा लिया गया है
कुत्ते को आखिर प्राथमिकता हो भी क्यों न? ग्लोबल दुनिया में क्या हम अमेरिका से कुत्ता-कल्चर तक नहीं सीख सकते?
अमेरिका में फर्स्ट फैमिली का कॉन्सेप्ट है। कुत्ता वहाँ की फर्स्ट फैमिली के लिए आन-बान-शान की बात होती है। इतना कि फर्स्ट फैमिली के कुत्ते को इज्जत के साथ फर्स्ट डॉग बोला जाता है। चुनाव तक में उसकी चर्चा होती है। उस पर लेख लिखे जाते हैं।
अपने-अपने कुत्तों के साथ अमेरिकी राष्ट्रपति
अमेरिका की तरह क्या हम अपने देश में एक परिवार को फर्स्ट फैमिली का दर्जा नहीं दे सकते? आखिर किस कंजूस मानसिकता से गुजर रहा है यह देश? ऐसा क्यों नहीं हो सकता कि देश की एक फर्स्ट फैमिली हो, उस फर्स्ट फैमिली का एक कुकुर हो, जिसे फर्स्ट डॉग कहा जाए… कितना सुंदर और सभ्य होगा वह समाज, जरा सोचिए!
आखिर क्यों पिद्दी सिर्फ भारतीय कुकुर होकर रह जाए? क्या उसका मालिक इतना कमजोर है कि पिद्दी के चर्चे देश-विदेश तक में न करवा पाए? और अगर ऐसा न करवा सका तो कुत्ताधिकार संगठनों की आवाज क्या भारत के खिलाफ नहीं उठेंगी? – ऐसे बहुत सारे प्रश्न पहले से ही मालिक के दिमाग में उठ रहे होंगे… बस फैसला 29 अक्टूबर 2017 को लिया गया… और पिद्दी फेमस हो गया, करवा दिया गया।
न्यू यॉर्क टाइम्स का लेख है, मजाल है कि आप गलत बोल दें!
पिद्दी कुत्ते को लेकर 29 अक्टूबर 2017 के दिन ही एक और घटना घटी थी। किसी शख्स ने एक कहानी सुनाई थी… पुरानी कहानी। कहानी में कुत्ते को बिस्कुट खिलाने का जिक्र है। कहानी में असम से ज्यादा कुत्ते को प्राथमिकता दिए जाने का भी जिक्र है। लेकिन क्यों नहीं? क्या दिक्कत है?
असम नाम के किसी राज्य (पूरे उत्तर-पूर्वी भारत में कोई राज्य है भी क्या? होता तो अमेठी की तरह सड़क-रेल पहुँच चुका होता अब तक) की चर्चा बाद में भी तो की जा सकती है। दिल पे लेकर कहानी क्यों सुना दिए सरमा जी? और कहानी सुनाए तो सुनाए, चुनाव तक खेंच के काहे ले गए इस बात को?
कहानी सुनाने वाले शख्स का नाम है हेमंत बिस्वा सरमा
पिद्दी के मालिक से नहीं तो कम से कम पिद्दी से तो प्यार कर ही सकते थे। पिद्दी का मालिक तो शायद ही कभी असम की बात समझ पाए! कहाँ माथा पटकने गए थे आप? हाँ शायद पिद्दी के लिए बिस्कुट ले जाते तो बात बनती…
…लेकिन वो आपने किया नहीं! करते तो आज असम के मुख्यमंत्री का ताज भला कैसे पहनते! बधाई हो।
नोट: कुत्ते प्रेमी लोग कृपया इसे कुत्ता प्रजाति से नफरत भरा लेख मान कर न पढ़ें।