Home Blog Page 4541

फाइनल ईयर की परीक्षा पर सुप्रीम कोर्ट की मुहर, कहा- इसके बिना छात्रों को पास नहीं किया जा सकता

देश में कोरोना वायरस की वजह से विश्वविद्यालय और कॉलेज में पढ़ने वाले छात्रों की परीक्षा को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुना दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने आदेश में कहा कि अंतिम वर्ष और अंतिम सेमेस्टर के छात्रों की परीक्षा होगी। न्यायालय ने यह भी कहा अगर किसी राज्य को ऐसा लगता है कि वह परीक्षाएँ नहीं करवा सकते हैं तो वह इस संबंध में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) से संपर्क कर सकते हैं। लेकिन कोई भी राज्य बिना परिक्षा लिए अंतिम वर्ष के छात्रों को प्रमोट नहीं कर सकते हैं।   

मामले की सुनवाई करते हुए न्यायाधीश अशोक मूर्ति, न्यायाधीश आर सुभाष रेड्डी और न्यायाधीश ने एम आर शाह की खण्डपीठ ने इस मुद्दे पर फैसला सुनाया। पीठ ने अपने निर्णय में कहा चाहे राज्य हों या केंद्र शासित प्रदेश उनके पास छात्रों को बिना परीक्षा लिए आगे बढ़ाने का अधिकार नहीं है। खंडपीठ ने कहा कि यूजीसी के दिशा-निर्देशों को ख़त्म करने का निवेदन अस्वीकार कर दिया गया है। किसी भी राज्य में परीक्षाओं को रद्द करने के मामले में आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के आदेश यूजीसी से ऊपर होंगे।    

लेकिन आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के पास छात्रों को परीक्षा में पास करने का अधिकार नहीं है। इसके बाद खंडपीठ ने कहा कि अगर किसी राज्य में महामारी के विपरीत हालातों के चलते परीक्षा संभव नहीं है तो वहाँ की राज्य सरकार यूजीसी से निवेदन कर सकती है कि परीक्षाओं का समय बढ़ा दिया जाए। न्यायालय का बेहद स्पष्ट तौर पर कहना है कि परीक्षाओं की तिथियों में बदलाव हो सकता है, लेकिन परीक्षाएँ टाली नहीं जा सकती हैं।  

सर्वोच्च न्यायालय में आदित्य ठाकरे समेत अन्य कई लोगों ने इस मुद्दे पर याचिका दायर की थी। याचिका में उनका कहना था कि कोरोना वायरस महामारी को देखते हुए परीक्षाएँ रद्द कर दी जाएँ। याचिका में दलील दी गई थी कि कॉलेज और विश्वविद्यालय बंद होने की वजह से पढ़ने वाले छात्रों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। उनका कहना था जिन छात्रों का अंतिम वर्ष या अंतिम सेमेस्टर है उनका Cumulative Grade Point Average or CGPA होता है। उसे आधार बना कर छात्रों को अंतिम परीक्षा में अंक दिए जा सकते हैं।

महाराष्ट्र, ओडिशा, दिल्ली और पश्चिम बंगाल समेत कुछ केंद्र शासित प्रदेशों ने भी इसका समर्थन किया था। इनके अलावा राहुल गाँधी ने भी परीक्षा रद्द करने की माँग उठाई थी।    

दरअसल विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने 6 जुलाई को राज्यों को 30 सितंबर तक परीक्षा कराने का आदेश दिया था। इस आदेश को जारी करते हुए यूजीसी ने कहा कि आदेश छात्रों के शैक्षणिक भविष्य को देखते हुए जारी किया गया है। यह भी कहा कि अंतिम वर्ष के छात्रों को बिना डिग्री दिए प्रमोट नहीं किया जा सकता है। सर्वोच्च न्यायालय में सुनवाई के दौरान यूजीसी ने यह भी कहा राज्य यह तय नहीं कर सकते हैं कि अंतिम वर्ष के छात्रों को बिना परीक्षा आगे बढ़ाया जा सकता है। हालाँकि एक बात पहले भी कही गई थी कि राज्य 30 सितंबर की तारीख आगे बढ़ा सकते हैं। इस बात पर सर्वोच्च न्यायालय ने भी अपने आदेश में सहमति जताई है।     

‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ में हेराफेरी चीन की, मोदी घृणा में भारत का नाम जोड़ रहे लिबरल

वॉल स्ट्रीट जर्नल ने एक रिपोर्ट में बताया है कि वर्ल्ड बैंक ने अपनी सालाना ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ रैंकिंग के प्रकाशन पर रोक लगा दी है। ऐसा आँकड़ों में अनियमितताओं के चलते किया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक चार देशों- चीन, यूएई, आज़रबाइजान और सऊदी अरब ने संभवत: यह हेराफेरी की है। जॉंच के दायरे में आने वाले इन चारों देशो की रैंकिंग 2019 में वर्ल्ड बैंक की तरफ से जारी ईज ऑफ डूइंग बिजनेस लिस्ट में भारत से ऊपर थी।

विश्व बैंक के एक बयान में कहा गया है कि अक्टूबर 2017 और 2019 में प्रकाशित ‘डूइंग बिजनेस 2018’ और ‘डूइंग बिजनेस 2020’ रिपोर्ट में डेटा में बदलाव के बारे में कई अनियमितताएँ पाई गई हैं और ये बदलाव ‘डूइंग बिजनेस’ कार्यप्रणाली के साथ मेल नहीं खाते।

रिपोर्ट के अनुसार, कयास लगाए जा रहे हैं कि शायद चार देशों – चीन, अजरबैजान, संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब के आँकड़ों को अनुचित रूप से बदल दिया गया। यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि विश्व बैंक द्वारा ‘2019 ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ रैंकिंग में जारी रिपोर्ट में जाँच के दायरे में आए इन सभी 4 देशों को भारत की तुलना में अधिक रैंकिंग दी गई है।

इस प्रकार रिपोर्ट में बताया गया कि 4 देशों – चीन, आज़रबाइजान, संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब की रैंकिंग को उनकी वास्तविक स्थिति से ऊपर दिखाने के लिए जोड़-तोड़ किया गया होगा। इस बात की सम्भावनाएँ भी अधिक हैं कि विश्व बैंक द्वारा पिछले 5 वर्षों में जारी की गई रिपोर्ट्स के ऑडिट के बाद, भारत की वर्तमान रैंकिंग में वास्तव में और सुधार हो सकता है।

हालाँकि, ‘लिबरल्स’, जिन्होंने भारत से घृणा करने के लिए प्रधानमंत्री मोदी से घृणा करने का रास्ता चुना है, ने तुरंत इस बात पर ज़ोर देना शुरू कर दिया कि भारत की रैंकिंग में दर्ज सुधार भी शायद हेरफेर का ही नतीजा रहा होगा, क्योंकि विश्व बैंक के अनुसार रैंकिंग के डेटा में हेरफेर किया गया था।

गौरतलब है कि अक्टूबर 2019 की इज़ ऑफ़ डूइंग बिजनेस रिपोर्ट जारी होने के बाद, वाणिज्य मंत्रालय ने एक बयान में कहा था, “भारत ने 2019 में अपनी 77वीं रैंक से 14 अंकों की छलांग दर्ज की है, जिसे अब विश्व बैंक द्वारा मूल्याँकन किए गए 190 देशों में 63वें स्थान पर रखा गया है। ईज ऑफ डूइंग बिजनेस रैंकिंग में भारत की 14 रैंक की छलांग महत्वपूर्ण है, यह देखते हुए कि 2015 के बाद से लगातार सुधार हुआ है और लगातार तीसरे वर्ष के लिए भारत शीर्ष 10 सुधारकों में शामिल है।”

सुहासिनी हैदर, जो भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी की बेटी भी हैं, ने वॉल स्ट्रीट जर्नल की रिपोर्ट को एकदम गलत संदर्भ में सामने रखा और इस सम्बन्ध में 2 ट्वीट किए। पहले ट्वीट में उन्होंने लिखा कि विश्व बैंक ने ईज़ ऑफ़ डूइंग बिजनेस की रिपोर्ट पर रोक लगा दी है, जिसमें कि सबसे बेहतरीन प्रदर्शन करने वालों में टोगो, बहरीन, नाइजीरिया, तजाकिस्तान, पाकिस्तान, चीन और भारत शामिल थे।

हालाँकि, दूसरे ट्वीट में सुहासिनी हैदर ने लिखा कि विश्व बैंक ने डेटा के साथ छेड़खानी की आशंका के चलते अपनी ही रिपोर्ट पर रोक लगा दी है, और सरकार ने 2014-2018 के बीच रैंकिंग को बेहतर दिखाने के लिए लॉबी का इस्तेमाल किया, गेम किए और प्राथमिकताओं से समझौता किया।

लेकिन दिलचस्प बात यह है कि वॉल स्ट्रीट जर्नल की रिपोर्ट में भारत का उल्लेख कहीं नहीं है। डेटा यानी, लेखा-जोखा की अनियमितताओं का जिक्र करती इस रिपोर्ट में उन सभी देशों का उल्लेख है, जो सुहासिनी ने अपने ट्वीट में लिखे हैं, जैसे टोगो, बहरीन, ताजिकिस्तान, पाकिस्तान, कुवैत, भारत और नाइजीरिया।

जबकि, रिपोर्ट उन देशों पर सवाल नहीं उठा रही है, जिनकी रैंकिंग में उल्लेखनीय सुधार हुआ है। इसमें सिर्फ 4 देश – चीन, आज़रबाइजान, संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब के नाम शामिल हैं, जिन पर कथित हेरफेर का संदेह जताया गया है।

सुहासिनी हैदर ने भारत को भी इस हेरफेर में घसीटने का कारनामा किया है और केवल इस तथ्य की ओर इशारा किया कि वह वास्तव में लोगों को यह बताए बिना एक एजेंडे को दबाने की कोशिश कर रही है कि भारत की रैंकिंग के बारे में यह रिपोर्ट वास्तव में क्या कहती है।

इसके अलावा, रूपा सुब्रह्मण्यम ने भी इस बहती गंगा में हाथ धोने की कोशिश की और वॉल स्ट्रीट जर्नल पर प्रकाशित विश्व बैंक की इस रिपोर्ट का वास्तविकता से भिन्न अर्थ ही सामने रखा –

स्वघोषित अर्थशास्त्री रूपा सुब्रह्मण्यम का ट्वीट

अर्थशास्त्री होने का दिखावा करने वाली रूपा सुब्रह्मण्यम ने विश्व बैंक के स्टेटमेंट का जिक्र करते हुए यहाँ तक लिखा है कि यह मोदी सरकार के लिए बड़ा झटका है और सवाल किया है कि अब मोदी सरकार क्या करेगी? बेशक नरेंद्र मोदी सरकार इस पर कुछ नहीं करेगी, क्योंकि भारत उन देशों में शामिल है ही नहीं जिनकी रैंकिंग पर विश्व बैंक ने हेरफेर की आशंका व्यक्त की है।

एक सामान्य सी रिपोर्ट का एकदम गलत अर्थ निकालकर लोगों के सामने पेश करने का हौसला रखने वाले ये लिबरल्स यहाँ तक कहते देखे गए हैं कि इसका भारत पर बहुत गलत असर पड़ेगा। जबकि इस रिपोर्ट में भारत का जिक्र नहीं, बल्कि सिर्फ 4 देशों पर संदेह जताया गया है।

हैरानी नहीं होती है कि यह वही विचारक वाम-उदारवादी वर्ग है जो हाल ही में चीन के साथ लद्दाख सीमा क्षेत्र में हुए गतिरोध के दौरान अपनी ही सरकार के खिलाफ प्रोपेगेंडा करने में सिर्फ इस कारण व्यस्त रहा, क्योंकि केंद्र में इस समय उनके मन मुताबिक़ नेतृत्व नहीं है। ये सिर्फ इसीलिए सरकार और देश विरोधी हर उस एजेंडा को दिशा देने का प्रयास करते देखे जाते हैं, जिससे ये लोगों की अटेंशन के साथ ही अपनी मोदी घृणा को भी प्रदर्शित कर सकें।

कट्टरपंथी इस्लामी उन्माद और हिंसक वामपंथी मनोवृत्ति से लड़ता निहत्था, असहाय हिन्दूः कानून की नैतिक दीवार के सहारे का सत्य

  1. संघी सिर्फ अपने जैसे डरपोक पैदा कर सकते हैं।
  2. यह इकलौता ऐसा संगठन है जो पुलिस के पीछे छुपकर रहता है। अदालतों का सहारा लेकर लड़ाइयाँ लड़ता है।
  3. चार लाठियाँ पड़ीं नहीं कि बाप-बाप कहकर भाग जाता है।
  4. एक आदमी ज़ोर से डाँट दे तो दुबक कर छुप जाता है।
  5. फेसबुक पर किसी ने एक धमकी दी और अकाउंट डिलिट करके अंडरग्राउंड हो जाता है।
  6. ये क्लीव हैं, डरपोक हैं, इनमें जिगरा नहीं है। किसी से लड़ने की हिम्मत नहीं है।
  7. हर दूसरी बात पर लिबरल्स, तो मार्क्सवादी, तो यह तो वह कहकर रोते हैं, डरपोक कहीं के।
  8. अभी कॉग्रेस की सरकार बन जाए तो घर में दुबक जाएँगे अथवा चुपचाप भीगी-बिल्ली बनकर अपने-अपने काम करेंगे।
  9. इन्हें पहचान लीजिए, कल जब हमारी सरकार आएगी, तब अगर ये कोई मदद माँगने आएँ तो जूतों से आरती की जाएगी। इन्हें सबक सिखाया जाएगा। इन्हें इनकी औकात दिखाई जाएगी।
  10. दाँत निपोरू, चमचे, डरपोक कहीं के।
  11. सबकुछ याद रखा जाएगा।


नहीं, नहीं उपर्युक्त बयान मेरे नहीं हैं। यह एक मार्क्सवादी लेखक मित्र का फेसबुक स्टेट्स है जिसकी मुख्य बातों और निहितार्थों को मैंने आपकी सुविधा के लिए साफ-साफ और बिंदुओं में प्रकट कर दिया है। इनकी दिक्कतों को समझिए। इसकी पड़ताल ज़रूरी है। यह जो भाषा है वह लोकतंत्र की भाषा तो कतई नहीं है। कानून की जगह शरीरबल को महत्त्व देने वाली दृष्टि के ये पुरोधा संघियों का नहीं लोकतंत्र का तिस्कार कर रहे हैं, मज़ाक उड़ा रहे हैं।

अगर कोई व्यक्ति कानून की मदद से, व्यवस्था के नियमों के तहत लोकतांत्रिक लड़ाई लड़ता है तो वह इनकी नज़र में डरपोक है, क्लीव है, कायर है, मुर्गी है। कुलमिलाकर वह कम-से-कम मर्द नहीं है। और इनकी नज़र में मर्द कौन है? 

वह जो झगड़ा होने पर मुँह तोड़ दे, शहर जला दे, सिर काटने वालों को 51 लाख देने की घोषणाएँ कर दे, शाहीन-बाग करके देश के रोज़मर्रा के जीवन को ठप्प कर दे, पुलिस को पीट दे, गो हत्या करके मुँह चिढ़ाए, सुप्रीम कोर्ट के लोकतांत्रिक फैसले पर आँखें दिखाए और कहे कि जब आबादी बढ़ेगी तो सबक सिखाएँगे, आतंकवादियों के जनाजों में लाखों की संख्या में शिरकत करे, जो कार्टून बनाने वालों को मार डालने के लिए एकजुट हो जाए जो दूसरे के धर्म की देवी-देवताओं की अश्लील तस्वीरें बनाए और दूसरे जवाब दें तो उसे भीड़ बनकर मार डालने की लिए जुट जाएँ। यही मर्दानगी है न?

यह कैसी भाषा है? एक लोकतंत्र में, एक लेखक को, एक लोकतांत्रिक माध्यम (फेसबुक) पर इस तरह की भाषा बोलनी चाहिए? इस भाषा के मायने क्या हैं?  ऐसी भाषा कौन बोलता है? यह तो जंगल की भाषा है? ऐसी भाषा कि जिसमें ताकत होती है वह पुलिस से मदद नहीं माँगता, तो जंगल में चलता है। 

जिसकी लाठी उसकी भैंस, अथवा जिसमें ताकत हो वह फैसला करे, अर्थात् कानून की जगह शरीरबल से फैसला, यह तो जंगल में होता है और इसी को तो जंगल-राज कहते हैं। तो मार्क्सवादी लेखक मित्र भारत के लोकतंत्र से ऊब गए? अथवा उन्हें लोकतंत्र की जगह माओ की विचारसरणी का देश चाहिए? 

क्या उन्हें जंगल राज चाहिए? या हिन्दूवादियों की बढ़ती ताकत बर्दाश्त नहीं हो रही इसलिए भाषा का संयम जाता रहा है? हिन्दूवादियों के सत्ता में आते ही शायद 70 सालों से चाट रही मलाईयों के लाले पड़ गए होंगे तो मन विपरीत दिशा में भाग रहा हो कि जब सत्ता में रह ही नहीं सकते तो व्यवस्था को ही चौपट कर दो। ‘जो हमारा नहीं, वह किसी का नहीं’ टाइप।

मैं इस मसले में बहुत साफ कह दूँ कि भारत न अरब होने जा रहा है और न चीन। यह हिन्दूवादी विचारसरणी का देश है एक ऐसी विचारसरणी जिसकी भित्ती ही आलोचनात्मक और लोकतांत्रिक है। वह प्रकृत्या लोकतांत्रिक है। 

हिन्दू अपने जीवन में न भगवान को, न माता-पिता को और न ही राष्ट्र- किसी को भी आलोचना के परे नहीं मानते। हिन्दूवादी विचारसरणी स्वभाव से ही लोकतांत्रिक है। अतः भारत को और हिन्दुओं को अलोकतांत्रिक होने का पाठ पढ़ाना असंभव है। हिन्दू एक उदार और भव्य विचारसरणी के लोग हैं इनसे क्रूर और हिंसक प्रवृत्तियों की चाहना एक दुस्साहस है, एक दुरभिसन्धि है, एक नाकाम चाहत है।


लेकिन मैं संघियों और हिन्दुओं को डरपोक कहे जाने को गंभीरता से लेना चाहूँगा और इस तिरस्कार के पीछे से लेकिन एक जलता हुआ सत्य भी प्रकट करना चाहूँगा। भले उपर्युक्त बयान संघियों को अपमानित करने के लिए दिया गया हो लेकिन समझने का प्रयत्न करना होगा कि जिस इस्लामिक-मर्दवाद के आलोक में संघियों को डरपोक कहा जा रहा है उसकी तुलनात्मक पड़ताल ज़रूरी है।

अब सवाल उठता है कि उपर्युक्त बयान के आलोक में संघ या प्रकारांतर से कहें तो हिन्दुओं की इस डरपोक मनःस्थिति का गंभीर विश्लेषण हो अथवा एक बड़े परिप्रेक्ष्य में तुलनात्मक अध्ययन द्वारा बयान के निहितार्थों के आलोक में वस्तुस्तिथि की विवेचना की जाए।

यहाँ संघ और हिन्दुओं को कायर क्यों कहा जा रहा है और अगर कहा भी जा रहा है तब भी दो सवाल हैं, पहला उनकी किस तरह की अवस्थिति के कारण यह रिमार्क दिया जा रहा है और दूसरा सवाल किनके आलोक में उन्हें इस विशेषण से विभूषित किया रहा है। तो यह ज़ाहिर सी बात है तीसरे सवाल का जवाब संप्रदाय विशेष का जनमानस है क्योंकि मार्क्सवादी उन्हें ही बहादुर और मर्द कह रहे हैं जबकि हुन्दुओं को डरपोक और क्लीव।

इन्हीं सवालों में वह उत्तर और सामाजिक भविष्य के गूढ़ संकेत छिपे हुए हैं, इसलिए मैं इन रिमार्क्स को हलके में लेने को प्रस्तुत नहीं हूँ। यह बयान भारत की सामाजिक-राजनीतिक अवस्थिति को भी प्रकट करने वाला है कि एक पक्ष बहुसंख्यक होने के बावजूद डरपोक कहा जा रहा है यानी उनकी ऐसी गतिविधियाँ ज़रूर हैं जिनके आलोक में उन्हें डरपोक कहा जाए और दूसरा पक्ष 16 प्रतिशत की जनसंख्या लेकर भी बहादुर, साहसी और मर्द है।

जंगल की भाषा में सोचें तो यह सही बयान है, मतलब गर्व करने लायक लेकिन सभ्यता, मनुष्यता, लोकतंत्र, मानवता, न्याय और व्यवस्था के आलोक में देखें तो यह एक तिरस्कारपूर्ण, घटिया, अलोकतांत्रिक, हिंसक, क्रूर और आपत्तिजनक बयान तथा दृष्टि है। लोकतंत्र की बुनियाद सभ्यता में है, अनुशासन में है, संविधान के वर्चस्व और उच्चता में है। एक देश को सभ्य और संस्कृत तभी कहा जा सकता है जब वहाँ के लोग कानून का शासन मानें, अपने झगड़े और विवादों को पुलिस और अदालतों के माध्य से सुलझाएँ, सिर फोड़ देना, हत्या कर देना, शरीरबल का प्रदर्शन करके फैसला करना न न्याय है और न उचित।

हिन्दू जनमानस और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लोग अगर झगड़ों और विवादों और समस्याओं को कानून के ज़रिए हल करना चाहते हैं तो मैं या दुनिया का कोई भी सभ्य और लोकतांत्रिक व्यक्ति उसे सही कहेगा। उसकी प्रशंसा करेगा लेकिन जो व्यक्ति मन से हिंसक हो, शोषक हो, भ्रष्ट हो, शरीर की, जंगल की मनोवृत्ति वाला हो वह ही इसे कायरता या डरपोक मनोवृत्ति कहेगा।

लेकिन, मैं एक स्तर आगे जाकर उनके बयान को और सूक्ष्मता से खोलना चाहूँगा। इस बयान को ठीक से पढ़ा जाए तो इसमें सत्ता की भाषा की बू आ रही है। यानी कोई एक पक्ष ऐसा है जो शरीरबल से फैसले कर रहा है और अपने मुताबिक जी रहा है, तभी उसके आलोक में न्यायशील पक्ष डरपोक दिख रहा है। आज हिन्दुओं की ऐसी दयनीय और हेय स्थिति हो गई है कि लोग उनपर हँस रहे हैं। विश्व की सबसे महान संस्कृति, सबसे उदात्त साहित्य देने वाले, सबसे अहिंसक और भव्य धर्म के लोगों की इस दयनीयता की पूरी चाभी इन्हीं मूलभूत कारणों में बंद है।

उसके लिए इस देश की इस मनःस्थिति की पड़ताल ज़रूरी है। पहले तो मैं बहुत साफ-साफ कहना चाहता हूँ कि हिन्दुओं को पहले तो यह मान लेना चाहिए कि उनकी अवस्थिति कायरों वाली है और वे सच में दयनीय हैं। उनकी भव्यता और विराटता के प्रदर्शन के सारे रास्ते बंद हो गए हैं।

एक बात सदैव स्मरण रखनी चाहिए कि व्यक्ति अपनी कला और विशेषताओं का प्रकटीकरण तभी कर सकता है जब उसे स्वतंत्र और सहज वातावरण मिले। डर और आतंक के साए में रहकर वह कभी अपने आत्म की स्वाभाविक अभिव्यक्ति नहीं कर सकता। 

दुनिया की हर संभावना, हर विशेषता की मृत्यु डर और आतंक से हो जाती है। अगर आपको एक स्वस्थ समाज बनाना है तो सबसे पहले उस समाज को भयमुक्त करना पड़ेगा। जबतक भय और आतंक का वातावरण रहेगा, तबतक दुनिया में कोई भी स्वस्थ निर्माण संभव नहीं हो सकता।

ऋग्वेद में आत्म-साक्षात्कार में, व्यक्ति-चेतना के उत्थान में भय को बाधक माना गया है। उपनिषदों में व्यक्ति को हर स्थिति में निडर रहने की सलाह ही नहीं बल्कि ज्ञान प्राप्ति में सबसे आवश्यक बताया गया है। आचार्य हज़ारीप्रसाद द्विवेदी ने अपने उपन्यास ‘बाणभट्ट की आत्मकथा’ में लिखा है, “किसी से भी न डरना, गुरु से भी नहीं, मंत्र से भी नहीं, लोक से भी नहीं, वेद से भी नहीं।” इसी तरह रवींदनाथ ठाकुर ने ‘गीतांजलि’ में लिखा है कि वे एक ऐसे समाज की कल्पना करते हैं जहाँ का वातावरण भयमुक्त हो। सुभाषचंद्रबोस अपनी माँ को लिखे पत्र में एक ऐसे भारत के स्वप्न की बात करते हैं जहाँ शोषण न हो, भूख न हो और सबसे बड़ी बात कि मनुष्य को कोई भय न हो। महर्षि अरविंन्द भी डरे मन को समाज के निर्माण में बाधक मानते हैं।

आखिर ज्ञान के केंद्रों और मनीषियों ने डरे समाज को इतना बुरा क्यों कहा है, कोई तो वज़ह होगी। क्या इसका यह अर्थ नहीं कि एक स्वस्थ समाज के लिए व्यक्ति में स्वाभाविक स्वतंत्रता होनी चाहिए और स्वतंत्रता बंधनमुक्त अवधारणा है, एक ऐसी स्थिति जहाँ किसी प्रकार का कोई दबाव न हो।

हिन्दुओं का धार्मिक-सेटअप ऐसे ही मूल्यों को धारण करने योग्य विशेषताएँ लिए हुए है। वह मनुष्य की आत्मिक उन्नति को सबसे बड़ा गुण मानता है इसलिए वह वैयक्तिक चेतना को महत्त्व देता है। वह व्यक्ति की अवचेतनात्मक और मानसिक स्वतंत्रता का हिमायती है। इसीलिए हिन्दू धार्मिक ग्रंथ निर्देशों के नहीं संवाद के पुंज होते हैं। वे व्यक्ति को बाँधते नहीं बल्कि उन्हें मुक्त करते हैं। उन्हें अपने तरीके से सोचने और जीने का वातावरण देते हैं। उन्हें प्रश्न करने, मुक्त होने, असहमत होने, आलोचना करने, निर्माण करने, विध्वंस हो जाए तो पुनर्निर्माण करने को प्रेरित करते हैं।

हिन्दू जनमानस ऐसे धार्मिक संस्कारों की निर्मिति है, वह प्रकृत्या स्वतंत्र और उदार होता है। वह न समूह में सोचता है और न किसी हिंसक स्थिति की कल्पना कर पाता है। वह वैयक्तिक उन्नति में कृपणता और अनुदार मूल्यों की कल्पना तक से कोसों दूर है।

ऐसे हिन्दू जनमानस का मध्यकाल में इस्लाम नामक एक ऐसे संप्रदाय से साबका पड़ा जो ठीक इसके विपरीत था। संप्रदायगत संकीर्णताओं से भरा, वैयक्तिक स्वतंत्रता का शत्रु, समूहवादी झुंड जिसमें संस्कृति और सभ्यता का नामोंनिशान नहीं था। ऐसी एक असभ्य, बर्बर जाति की राजनीतिक उपस्थिति ने हिन्दू अवचेतन को झकझोर कर रख दिया। 

इस भीड़वादी सम्प्रदाय ने उसके मूल्यों, नैतिकताओं और जीवनशैली को तहस-नहस कर दिया जिसके कारण वह अपने धार्मिक लक्ष्यों से च्युत हो गया और हर समय अपने जीवन को बचाने के उपक्रम में लग गया क्योंकि इस सम्प्रदाय के आगमन ने उसके समक्ष जीवन-मरण का प्रश्न उपस्थित कर दिया।

जो हिन्दू जनमानस सदियों से आत्मिक उन्नति के लिए संस्कारित था वह अब क्षुद्र सामाजिक आवश्यकताओं की पूर्ति में जीने लगा। उसका जीवन डर और अपमान के साये में बीतने लगा। ऐसे ही हिन्दू जनमानस का एक लंबा अपमानित और परतंत्र इतिहास रहा है।

जब देश आज़ाद हुआ तब वह नए देश को नैतिक और सामाजिक नियमों के तहत फ्रेम्ड करने लगा जिसके लिए एक नई व्यवस्था की नींव रखी गई। उसे लगा कि मध्यकालीन बर्बर इस्लामिक मनोवृत्तियों के स्थान पर अब लोकतांत्रिक मूल्यों वाला समाज बन सकेगा, इसी के कारण वह लोकतंत्र की स्थापना और संविधान निर्माण को लेकर आशान्वित और उत्साहित हो गया। यह व्यवस्था संविधान के नाम पर तैयार की गई। जहाँ मनुष्य के लिए नियम तय किए गए। भारतीय संविधान ने लोकतंत्र और वैयक्तिक स्वतंत्रता को मूल्यों की तरह ग्रहण किया और अपने स्वभाव के अनुरूप हिन्दू जनमानस ने यह मान लिया कि अब समाज ऐसे ही चलेगा जैसा वह सोच रहा है, नियम से, न्याय से लेकिन वह ग़लत था।

वह जिस समूहवादी संप्रदाय के साथ इस देश के लोकतंत्र को शेयर करने वाला था वह बेहद अलोकतांत्रिक और सुल्तानी संस्कृति का था। उसे अपने ‘ख़ुदा’ होने का गुमाँ था और यह कि वह इस मुल्क का शासक है उसने 800 सालों तक यहाँ शासन किया है, तो यह मुल्क उसका है, वह यहाँ मध्यकालीन शासक की तरह रहेगा। ताजमहल उसने बनाया, लालकिला उसका है और इनके अतिरिक्त भारत के पास दुनिया को दिखाने लायक और कुछ नहीं है।

उसे आधुनिक लोकतांत्रिक मूल्यों की रत्तीभर भी परवाह नहीं थी वह अपने ही संप्रदायगत नियमों के तहत मध्यकालीन समय को जीने की लालसा लिए गैरकानूनी सेटअप को समानान्तर जीता रहा। तो इस देश में दो-दो संस्कृतियाँ एकसाथ जीती रहीं एक वह जो कानून को मानती थी, दूसरी वह जो कानून को ठेंगे पर रखती थी।

इस्लाम केवल भारत में रहने वाली अवधारणा नहीं है। जिस प्रकार हिन्दू केवल भारत में हैं इस्लाम केवल भारत में नहीं है। मेरे कहने का आशय है कि हिन्दुओं का हिन्दूवाद भारतीय सीमा तक केन्द्रित है जबकि संप्रदाय विशेष के लोगों का कोई देसी रूप नहीं है। वे खुद को मुस्लिम-ब्रदरहुड के तहत एक अन्तरराष्ट्रीय अवधारणा के रूप में देखते हैं और किसी भी देश की सीमा को इस्लाम के सामने कुछ नहीं समझते। वे इस्लाम के नियमों के तहत एक अलग दुनिया में रहते हैं और उनके अवचेतन के स्वप्न की बात करें तो दुनिया में इस्लाम का प्रचार उनका मुख्य स्वप्न है। 


इस्लाम के हिंसक एग्रेसिव रूप ने एक अलग दुनिया बना रखी है इसे अंडरवर्ल्ड कह सकते हैं। दुनियाभर में इस्लाम के प्रचार के लिए अतिवादी संगठन बने हुए हैं जो हिंसा के बल पर सिविल सोसाइटी के लिए जहन्नुम बन चुके हैं। दुनिया में इन संगठनों के लोग गैर-इस्लामिक लोगों पर कहर की तरह टूटते हैं, कमलेश तिवारी का मसला हो, अथवा अभी बेंगलुरु का, दोनों ही जगहों पर इस्लाम का हिंसक रूप सामने आया जहाँ वे देश के कानून को ताक पर रखकर अपनी मनमानी करने पर उतारू थे।

तो ज़ाहिर सी बात है कि ऐसी मनोवृत्ति के सामने हिन्दू डरपोक दिखेंगे ही, कायर होंगे ही, क्लीव और कानून की पीठ के पीछे छुपे दिखेंगे ही क्योंकि वे भीड़ या हिंसा की भाषा में बात नहीं करते।
भारत में तुष्टीकरण की फ्रेमिंग ने एक अज़ीब माहौल तैयार किया है। इसने उन्हें एक अभयदान दे रखा है तथा इसके साथ ही उनकी समूहगत एकता तथा विश्व के इस्लामिक स्ट्रक्चर ने उन्हें एक मज़बूत मनोबल दे रखा है। वे किसी भी सरकार या व्यवस्था को विलोम की तरह देखते हैं। भारत में ऐसे कई प्रसंग हो चुके जहाँ वे लज्जाजनक तरीके से देश के कानून को ताक पर रखते हुए अव्यवस्था के सूत्रधार रहे हैं।

यह भीड़ जब-जब सामने आती है तब शहर को तहस-नहस करती है, सार्वजनिक वस्तुओं का नुकसान करती है और सबसे ज़रूर कि सरकारी तंत्र जिनमें पुलिस और प्रशासन प्रमुख हैं, के साथ हिंसा करती है, उन्हें अप्रासंगिक बना देती है। पुलिस पर हमला स्टेट पर हमला तो है ही लेकिन साथ ही यह हिन्दू अवचेतन पर भी मनोवैज्ञानिक हमला होता है कि देखो जिस पुलिस या नियम या कानून के बूते तुम सुरक्षित होने की मनःस्थिति में हो वह एक भ्रम है अर्थात तुम सुरक्षित नहीं हो या तुम तभी तक सुरक्षित हो जबतक हम तुम्हें रहने दे रहे हैं।

पुलिस पर हमला हिन्दू सुरक्षा के नैतिक आदर्श और मनःस्थिति पर हमला होता है। वे स्टेट पर हमला करके असल में अपनी शक्ति का प्रदर्शन और हिन्दू उदार तथा सज्जन स्वभाव को रणनीतिक चोट देकर बैकफुट पर धकेलना चाहते हैं। अपनी हिंसा को वे धार्मिक भावनाओं या संप्रदाय पर बहुसंख्यक द्वारा हमले के नैरेटिव के पीछे छुपाकर अंजाम देते हैं।

मार्क्सवादी एकेडेमिक्स ने हिन्दू अत्याचार का जो विराट रूपक गढ़ा है उसे सामने कर यह सम्प्रदाय हिंसा का महाकाव्य रचकर भी अल्पसंख्यक और निरीह विशेषणों से विभूषित है। इसीलिए मैंने लेख के शीर्षक में कानून की सुरक्षा के भ्रम की ओर इशारा किया है।

जो भीड़ विधायक के घर हमला कर सकती है, 60-60 पुलिस वालों को घायल कर सकती है, प्रोफेट पर बोलने वाले (कमलेश तिवारी) के खिलाफ विधानसभा (उत्तर-प्रदेश) में हिंसक बयान दे सकती है, राष्ट्रीय स्तर का नेता (असददुद्दीन ओवैसी) कह सकता है, “वो(कमलेश तिवारी) ज़ालिम, वो कुत्ता जिसने उत्तर प्रदेश में बैठकर अल्लाह की शान में गुस्ताखी की, तू याद रख, तू अभी जेल में है, मगर दुनिया तेरे लिए चूहे की बिल की तरह बन गई है इंशाल्लाह। तेरी गुस्ताखी ने तेरी बर्बादी को न्यौता दिया है।”

संप्रदाय विशेष की जो भीड़ इतनी असहिष्णु है कि शरीरबल पर सारे फैसले करना चाहती हो उसके बरअक्स हिन्दू सीधी गाय या उपर्युक्त उद्धरण की भाषा में कहें तो डरपोक दिखेंगे ही।

ऐसे में हिन्दुओं के पास दो ही रास्ते बचते हैं या तो वे इस समूह के द्वारा मारा जाना स्वीकार करें अथवा प्रतिउत्तर में रिएक्ट करे। कहते हैं जब व्यक्ति हद से ज़्यादा डर जाता है तब बहादुर हो जाता है। आशय है कि जब व्यक्ति के पास खोने को कुछ नहीं होता, जान पर बन आती है तब वह कैसा भी जोखिम उठाने को प्रस्तुत हो जाता है। क्योंकि एकबात साफ है कि कानून और पुलिस की दीवार कागज की बनी हुई है, हिन्दू उसके पीछे सुरक्षित नहीं है। भारत में आरएसएस (सावरकर) का हिन्दुत्त्व असल में ऐसी ही हिंसक और क्रूर स्थितियों के रिएक्शन में एक नैतिक ध्रुवीकरण का प्रयास है।

लेकिन फिर भी पेट्रोल बम, एके-47, मानव बम और अत्याधुनिक हथियारों के बरअक्स एक स्वयंसेवक की लाठी यकीनन नाकाफी है, भले उसके मन में पहाड़ों सा साहस है लेकिन व्यवहारवाद यही कहता है कि बंदूक के आगे लाठी काम नहीं आती। इसलिए इस संकट की घड़ी को मज़ाक में नहीं लेना चाहिए। 

यह अति गंभीर और सावधान रहने का समय है। बेहद सतर्क और मुस्तैद रहने का समय। हिन्दू जबतक मुहल्ला स्तर पर मज़बूत नहीं होंगे, किसी भी प्रकार के समूहगत हिंसात्मक मनोवृत्ति के काउंटर में आक्रामक गोलबंदी नहीं करेंगे तबतक इस समस्या का समाधान संभव नहीं है। एक मज़बूत हिन्दू ही संकट को ख़त्म कर सकता है। तुलसीदास ने ‘रामचरितमानस’ में यूँ ही नहीं लिखा है कि ‘भय बिनु होइ न प्रीति।’

वर्ल्ड बैंक के ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ रैंकिंग में ऊपर चढ़ सकता है भारत, चीन समेत 4 देशों ने की ‘हेराफेरी’

वॉल स्ट्रीट जर्नल ने अपनी एक रिपोर्ट में चौंकाने वाला खुलासा किया है। इसके मुताबिक़ वर्ल्ड बैंक ने ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ रैंकिंग पर कुछ समय के लिए रोक लगा दी है। ऐसा 4 देशों की तरफ से तथ्यों में हेरफेर करने के संदेह के कारण किया गया है।

रिपोर्ट के मुताबिक़ ये 4 देश हैं- चीन, यूएई, आज़रबाइजान और सऊदी अरब शामिल हैं। उल्लेखनीय है कि ये सभी देश साल 2019 में जारी की गई इज़ ऑफ़ डूइंग बिज़नेस लिस्ट में भारत से ऊपर थे। फिलहाल इन सभी देशों को निगरानी के दायरे में रखा गया है।    

वॉल स्ट्रीट जर्नल में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक़ आँकड़ों में हेरफेर किए जाने की आशंका को देखते हुई सूची पर रोक लगाई गई है और विश्व बैंक पिछले पॉंच साल के आँकड़ों की समीक्षा कर रहा है। बताया जा रहा है कि चीन, आज़रबाइजान, यूएई और सऊदी अरब जैसे देशों ने यह हेराफेरी की ताकि लिस्ट में इनका स्थान और ऊपर दिखाया जा सके। रिपोर्ट के अनुसार, “यह तथ्यों की सुचारू समीक्षा की शुरुआत है। स्वतंत्र रूप से तथ्यों का लेखा-जोखा रखने पर सही जानकारी सामने आएगी। इसकी मदद से दुनिया के तमाम देशों की वास्तविक स्थिति का अनुमान लगेगा।”

विश्व बैंक ने भी इस संबंध में कुछ अहम बातें कही हैं। विश्व बैंक ने कहा अक्टूबर 2017 और अक्टूबर 2019 में जारी की गई सूची की जानकारी प्रभावित हो सकती है। ऐसा बताया जा रहा है कि इनका लेखा-जोखा (ऑडिट) सही से तैयार नहीं किया गया था। इसलिए अक्टूबर 2020 में जारी की जाने वाली इज़ ऑफ़ डूइंग बिज़नेस की सूची देर से जारी की जाएगी।

वहीं वॉल स्ट्रीट जर्नल ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है, “पिछले कुछ साल में चीन, आज़रबाइजान और यूएइ की रैंकिंग में गजब का उछाल आया है। 5 साल पहले चीन 90 स्थान पर था और पिछले साल वह 31वें स्थान पर पहुँच गया। आज़रबाइजान भी इस दौरान 80 से 34वें स्थान पर आ गया। यूएई भी पाँच साल पहले इस सूची में 22वें स्थान पर था और 16वें पायदान पर आया। इनके विपरीत सऊदी अरब 49वें स्थान से 62वें स्थान पर चला गया।”     

ग्लोबल डेवलपमेंट के सीनियर फेलो जस्टिन सैंडफर ने बताया, “यह रैंकिंग तब विवादित (जब निर्णय निजी रूचि से प्रभावित हों) होगी जब उन देशों को अच्छा पायदान मिलता है जिन्होंने विश्व बैंक से क़र्ज़ लिया हो। इसका साफ़ मतलब है कि या तो किसी देश का प्रदर्शन बहुत अच्छा दिखाने का दबाव है या बहुत बुरा।” उन्होंने कहा कि वर्ल्ड बैंक की इस रिपोर्ट को खारिज कर देना चाहिए।    

वॉल स्ट्रीट जर्नल की रिपोर्ट में जिन 4 देशों के नाम का जिक्र है वे अक्टूबर 2019 में जारी की गई इज़ ऑफ़ डूइंग बिज़नेस की सूची में भारत से ऊपर थे। सूची में भारत 63वें पायदान पर था, चीन 31वें, आज़रबाइजान 24वें, यूएई 16वें और सऊदी अरब 62वें स्थान पर था।    

इज़ ऑफ़ डूइंग बिज़नेस की सूची

चीन की रैंकिंग में कुछ ज़्यादा ही बड़े पैमाने पर सुधार हुआ था।

चीन की रैंकिंग में हुआ अप्रत्याशित सुधार

गौर से देखने पर समझ आता है कि साल 2018 तक चीन की रैंकिंग की स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी। साल 2019 में अचानक से चीन 31वें स्थान पर आ गया। भारत की रैंकिंग 77 थी। बाद की रैंकिंग में उसे साल 2018 में 14 पायदान का फायदा हुआ। इसके बाद भारत को लगभग 23 पायदान का फायदा हुआ। यह सुधार बेशक उल्लेखनीय था, लेकिन 2019 में भारत 50 देशों की सूची में नहीं आ पाया था। विश्व बैंक के सर्वेक्षण के अनुसार भारत का स्कोर पहले 67.3 था और सुधार के बाद अब 71.0 हो गया।    

हाल के कुछ वर्षों में भारत की रैंकिंग में हुआ सुधार (साभार : ऑल इंडिया रेडियो)

रैंकिंग के संबंध में किए गए बदलाव के दावों के आधार पर भारत की रैंकिंग सराहनीय है। इतना ही नहीं भारत की रैंकिंग भले 4 देशों से कम थी लेकिन सूची की समीक्षा होने के बाद इस बात की पूरी उम्मीद है कि भारत की रैंकिंग में काफी सुधार हो।  

राजदीप की तरह ही रवीश भी दे रहे थे ज्ञान, पर खुद के चैनल पर भी सुशांत ही चल रहा

पहले तो राजदीप सरदेसाई ने यह राग अलापा कि सुशांत सिंह राजपूत इतने बड़े कलाकार नहीं थे कि उनकी मौत की जॉंच के लिए मुंबई पुलिस पर दबाव बनाया जाए। फिर दूसरे मीडिया संस्थानों की लगातार इस बात को लेकर आलोचना करते रहे कि वे वास्तविक मुद्दों की अनदेखी कर सुशांत मामले को उछाल रहे हैं। कुछ ऐसे ही विचार कभी उनके ‘शागिर्द’ रहे रवीश कुमार के भी थे।

कुछ समय तक सुशांत कवरेज की आलोचना करते रहने के बाद राजदीप अचानक से रिया-रिया करने लगे। सत्यान्वेषी पत्रकार और NDTV के प्रोपेगेंडा प्रमुख रवीश कुमार ने तो सुशांत सिंह राजपूत की मौत पर जुबान तक नहीं खोली। हो सकता है ऐसा करने में रवीश कुमार की निजी गरिमा आहत हो रही हो या फिर उन्हें यह भय हो कि ऐसा कर वो अपनी बची हुई ऑडियंस को भी खो बैठेंगे।

आखिरकार रवीश कुमार ने सुशांत सिंह राजपूत की मौत का जिक्र किया, लेकिन साथ ही यह भी कहा कि इस मामले पर मीडिया द्वारा बातचीत करना शर्मनाक है। लेकिन राजदीप सरदेसाई और रवीश कुमार के अपने ही चैनल की वास्तविकता उनके द्वारा कही जाने वाली बातों से एकदम उलट है। कुछ ही समय पहले रवीश कुमार ने इसी राजदीप सरदेसाई को ‘दुकानदार’ भी कह दिया था।

हिंदी मीडिया चैनल्स को कूड़ा बताते हुए उसे ना देखने की अपील करने वाले रवीश कुमार शायद अपने ही चैनल को नहीं देखते या फिर NDTV की वेबसाइट पर भी नहीं जाते। अगर वो ऐसा करते तो शायद सुशांत सिंह राजपूत की मौत के कवरेज पर यह ज्ञान नहीं दे रहे होते कि मीडिया चैनल्स सुशांत सिंह राजपूत को कवर कर रहे हैं।

एनडीटीवी के आधिकारिक यूट्यूब चैनल के होमपेज पर दिख रहे इस 18 वीडियो में से 10 सुशांत मामले को ही समर्पित हैं

इस मामले में रवीश कुमार को इंडिया टुडे के प्रोपेगेंडा पत्रकार राजदीप सरदेसाई बहुत पीछे छोड़ते जा रहे हैं। राजदीप सरदेसाई भी निरंतर सुशांत सिंह राजपूत की मौत के कवरेज को पत्रकारिता के खिलाफ बताते रहे, लेकिन खुद उनके चैनल का भविष्य और वर्तमान रिया चक्रवर्ती के प्रायोजित इंटरव्यू के इर्द-गिर्द ही घूम रहा है।

रिया चक्रवर्ती के इर्द-गिर्द घूम रहा है इंडिया टुडे का वर्तमान और भविष्य

कल ही राजदीप सरदेसाई ने रिया चक्रवर्ती का एक इंटरव्यू लिया है, जिसे लेकर राजदीप की हर तरफ आलोचना ही हो रही है। ज्ञात हो कि रिया चक्रवर्ती सुशांत सिंह राजपूत की मौत या आत्महत्या के मामले में उनके परिवार द्वारा मुख्य आरोपित बताई गई है। रिया ने राजदीप के साथ बातचीत में दिवंगत अभिनेता सुशांत सिंह पर कई प्रकार के भ्रामक आरोप लगाए हैं।

यही नहीं, सुशांत सिंह की मौत के बाद रिया द्वारा उनके पैसे इस्तेमाल किए जाने और उनके ड्रग्स कनेक्शन के सामने आने के बाद यह इंटरव्यू लिया गया और सभी लोग यही सवाल उठा रहे हैं कि क्या राजदीप ने यह इंटरव्यू रिया चक्रवर्ती को क्लीनचिट देने के लिए आयोजित किया है?

राजदीप ने रिया के साथ साक्षात्कार में सुशांत सिंह की कथित मानसिक बीमारी पर ज़ोर दिया है। उनकी बातों से ऐसा लग रहा है जैसे मानसिक बीमारी का आरोप वास्तविक तथ्य है। जबकि सुशांत सिंह का परिवार इस मुद्दे पर अपना पक्ष पहले ही रखा चुका है। उन्होंने कहा था कि पहले कभी सुशांत सिंह को इस तरह की कोई दिक्कत नहीं हुई थी। न ही किसी विशेषज्ञ ने उनके संबंध में ऐसा कुछ कहा था। सुशांत पर मानिसक रूप से बीमार होने का आरोप अभी तक सिर्फ और सिर्फ रिया चक्रवर्ती ने लगाया है, जिन पर खुद इस मामले के संबंध में जाँच चल रही है।

ये पतित गैंग कंगना की 2009 की तस्वीरें क्यों दिखा रहा है? ‘माह लाइफ माह रुल्ज’ का वोक नारा भी वामपंथियों के लिए ही है?

सुशांत सिंह राजपूत की मौत के बाद इसे ‘आत्महत्या’ साबित करने का प्रयास शुरू से ही जारी रहा। सुशांत सिंह की मौत की स्पष्ट जाँच और इसके सम्भावित कारणों पर सवाल उठाने वाले कुछ लोगों में से एक बॉलीवुड अभिनेत्री कंगना रनौत भी थीं। कंगना रनौत ने अपना उदाहरण देकर भी यह सन्देश देने का प्रयास किया कि बॉलीवुड वास्तव में कथित ‘बाहरी’ लोगों के लिए किस प्रकार का विषैला व्यवहार करता है।

ये कंगना रनौत ही थी, जिसने बिना बॉलीवुड में अपने भविष्य की चिंता किए ही इसके भीतर की उन तमाम विकृतियों के बारे में लिखना और बोलना शुरू किया, जिसका शिकार न जाने कितने ही चेहरे इसकी शुरुआत से ही होते आए हैं। उन्होंने बॉलीवुड में व्याप्त भाई-भतीजावाद यानी, नेपोटिज्म पर भी बहस छेड़ी जिस कारण उन्हें सबसे पहले बॉलीवुड निर्देशक और रिया चक्रवर्ती के करीबी महेश भट्ट की बेटी द्वारा भी निशाना बनाया गया।

यही कुछ वजहें हैं कि अब सोशल मीडिया का वह गैंग जो खुद के ‘लिबरल’ होने का दावा करता आया था, भी अब अपने केंचुली से बाहर निकलकर कंगना रनौत की छवि को उन्हीं आधारों पर धूमिल करने का प्रयास कर रहा है, जिन आधारों पर वह आज से पहले महिला अधिकारों के साथ खड़े होने का दिखावा करते आए थे।

कंगना रनौत के मुखर होते ही उन्हें अब मीडिया से लेकर इन्टरनेट का कथित वाम-उदारवादी वर्ग ‘स्लट शेमिंग’ की घटिया हरकत पर उतर आया है। इसमें सबसे नया नाम जुड़ा है इस्लामिक प्रोपेगेंडा वेबसाइट ऑल्टन्यूज़ के संस्थापक मोहम्मद जुबैर का!

मोहम्मद जुबैर और उसका गैंग, जिसकी पहली पहचान ही बच्चियों की तस्वीरों को सार्वजानिक करने, उन्हें सार्वजानिक ट्रोलिंग, गाली और धमकियों के लिए छोड़ देना है, अब कंगना रनौत की 2009 की तस्वीरें शेयर कर रहा है। इस तास्वीर में कंगना रनौत दिवंगत अभिनेता सुशांत सिंह की प्रेमिका रिया चक्रवर्ती के करीबी महेश भट्ट के साथ नजर आ रही हैं।

आर भादुरी ने कंगना रनौत की महेश भट्ट के साथ की कुछ तस्वीरें शेयर करते हुए लिखा है, “दक्षिणपंथी हेट एकोसिस्टम कुछ दिन पहले रिया चक्रवर्ती की महेश भट्ट के साथ की कुछ तस्वीरें शेयर कर रहा था। अब ये उन्हीं की शुद्ध संस्कारी कंगना रनौत की राज-2 की सक्सेज पार्टी की कुछ तस्वीरें हैं।” इस ट्वीट के साथ ही आर भादुरी ने ‘आँख मारने वाली इमोजी’ का भी इस्तेमाल किया है।

इसी ट्वीट पर इस्लामिक प्रोपेगेंडा वेबसाइट ऑल्टन्यूज़ के संस्थापक मोहम्मद जुबैर ने भी कुछ और तस्वीरें शेयर करते हुए लिखा है कि ये राज-2 फिल्म की सक्सेज पार्टी की तस्वीरें हैं।

सवाल ये है कि ऐसे समय में, जब कंगना रनौत रहस्यमयी परिस्थितियों में मृत पाए गए एक अभिनेता के पक्ष पर सिर्फ और अधिक जानकारी का मुद्दा उठा रही हैं, उन्हें ही निशाना बनाकर यह गैंग क्या साबित करना चाहता है? जबकि कंगना रनौत तो सिर्फ अपनी फिल्म के निर्देशक के साथ अपनी ही फिल्म की सक्सेज पार्टी में बैठी हुई हैं तो फिर इस फोटो को इसे शुद्ध संस्कारी जैसे विशेषणों से जोड़कर सामने रखने का क्या उद्देश्य हो सकता है?

जबकि, इन लोगों को तो उन तस्वीरों पर आश्चर्य प्रकट करना चाहिए, जिनमें ऑड-इवन की तर्ज पर महेश भट्ट को अपना पापा जैसा बताने वाली रिया चक्रवर्ती उनकी गोद में बैठी हुई या फिर उनके साथ बेहद आपत्तिजनक स्थिति में नजर आती हैं।

एक ओर रिया चक्रवर्ती मीडिया मैनेजमेंट और प्रायोजित इंटरव्यू का सहारा लेकर एक ऐसे व्यक्ति की छवि धूमिल करने का प्रयास कर रही है, जो कि अब उसके द्वारा कही गई बातों और आरोपों पर स्पष्टीकरण तक नहीं दे सकता, वहीं उसका पक्ष रखने वाले लोगों के कपड़ों, उसकी भाषा और उसके करियर पर सवाल खड़े कर उसे भी फ़िल्टर कर दिए जाने का षड्यंत्र रचा जा रहा है।

दूसरी बात, जो कि वाम-उदारवादियों के दोहरे चरित्र को भी स्पष्ट करता है, वो ये कि जो वाम-उदारवादी वर्ग ‘माय लाइफ माय रूल्स’ जैसे नारों का इस्तेमाल महिला अधिकारों के समर्थन में होने का दिखावा करते समय किया करते थे, वही आज कंगना रनौत के कपड़ों और उसकी बेहद अप्रासंगिक तस्वीर के जरिए उन पर ‘शुद्ध संस्कारी’ जैसे तंज कसने का प्रयास कर रहे हैं।

इन उदारवादियों के मसीहाओं को यह सवाल खुद से भी पूछना चाहिए कि क्या इन्हीं लिबरल्स द्वारा गढ़ा गया, इन्हीं के द्वारा सत्यापित किया गया महिला अधिकारों का स्लोगन ‘माय लाइफ माय रूल्स’ का ‘वोक’ प्रगतिशील नारा भी सिर्फ पादुकोण या कपूर परिवार की बेटियों के अधिकारों के लिए ही है?

यह दोहरा चरित्र ही सोशल मीडिया पर बैठे वाम-उदारवादियों की पहली पहचान है। कंगना रनौत के करियर के बारे में भी लोग यह कहते नजर आ रहे हैं कि वह लोकप्रियता के लिए इस विषय को भुना रही हैं। जबकि, कंगना रनौत बॉलीवुड के साथ अपने शुरूआती दिनों के कड़वे अनुभवों को खुद भी स्वीकार कर चुकी हैं और उन्होंने कहा है कि वह इन पर अभी खुलकर बात करने को भी राजी हैं।

इसके अलावा, कंगना रनौत के करियर और लोकप्रियता की ही अगर बात करें तो कंगना की पहचान भारतीय सिनेमा में सबसे ज्‍यादा फीस पाने वाली अभिनेत्री के अलावा 5 बार फोर्ब्स इंडिया की टॉप 100 सेलीब्रिटीज की लिस्‍ट में जगह पाने वाली सफल अभिनेत्री के रूप में भी रही है।

यह भी एक और हकीकत है कि कंगना को अपनी फिल्मों के लिए जितने राष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुके हैं, उतनी शायद उनकी निंदा करने और उनके करियर पर सवाल उठाने वालों के साथ ही ट्विटर ट्रोल और पार्ट टाइम अभिनेत्रियों के पास कुल फ़िल्में नहीं होंगी।

सुशांत सिंह राजपूत मामले में CBI के समन पर पूछताछ के लिए DRDO दफ्तर पहुँची रिया चक्रवर्ती, सैमुएल मिरांडा: कड़ी पूछताछ जारी

रिया चक्रवर्ती सुशांत सिंह राजपूत मामले में पूछताछ के लिए मुंबई के डीआरडीओ दफ़्तर पहुँच चुकी हैं। सीबीआई आज इस मामले में रिया चक्रवर्ती से पूछताछ करेगी। केंद्रीय जाँच एजेंसी ने शुक्रवार (28 अगस्त 2020) को सुशांत सिंह राजपूत मामले में पूछताछ के लिए समन भेजा था। रिया चक्रवर्ती के अलावा उसके सहयोगी सैमुएल मिरांडा भी पूछताछ के लिए डीआरडीओ दफ्तर पहुँच चुके हैं।    

सीबीआई ने जाँच शुरू होने के ठीक 8 दिन बाद रिया चक्रवर्ती को पूछताछ के लिए समन भेजा है। इसके पहले सीबीआई ने रिया चक्रवर्ती के भाई शोविक चक्रवर्ती से काफी लंबी पूछताछ की थी। गुरूवार (27 अगस्त 2020) को सीबीआई ने इस मामले में पहली बार रिया चक्रवर्ती के भाई को पूछताछ के लिए तलब किया था। जिसके बाद रिया चक्रवर्ती को शुक्रवार को होने वाली पूछताछ के लिए समन भेजा गया था।    

इन घटनाओं के एक दिन पहले यानी 27 अगस्त 2020 को रिया चक्रवर्ती ने इंडिया टुडे से बात करते हुए सुशांत सिंह राजपूत मामले में अपना पक्ष रखा था। रिया ने कहा यूरोप यात्रा के दौरान उन्हें पता चला कि सुशांत मानसिक रूप से अस्वस्थ्य हैं। यह साक्षात्कार 27 अगस्त 2020 को शाम 7 बजे प्रसारित हुआ था। साक्षात्कार में साफ तौर पर समझा जा सकता है कि राजदीप सरदेसाई सुशांत सिंह की कथित मानसिक बीमारी पर ज़ोर दे रहे थे। 

उनकी बातों से ऐसा लग रहा है जैसे मानसिक बीमारी का आरोप वास्तविक तथ्य है। जबकि सुशांत सिंह का परिवार इस मुद्दे पर अपना पक्ष पहले ही रखा चुका था। उन्होंने कहा था कि पहले कभी सुशांत सिंह को इस तरह की कोई दिक्कत नहीं हुई थी। न ही किसी विशेषज्ञ ने उनके संबंध में ऐसा कुछ कहा था। सुशांत पर मानिसक रूप से बीमार होने का आरोप अभी तक सिर्फ और सिर्फ रिया चक्रवर्ती ने लगाया है, जिन पर खुद इस मामले के संबंध में जाँच चल रही है। 

वहीं दूसरी तरफ प्रवर्तन निदेशालय भी रिया चक्रवर्ती से मनी लॉन्ड्रिंग मामले में लंबी पूछताछ कर चुका है। क्योंकि इस मामले में ड्रग्स का पहलू भी सामने आया था। इसलिए नारकोटिक्स विभाग ने भी रिया चक्रवर्ती पर मामला दर्ज किया है। नारकोटिक्स विभाग भी जल्द ही रिया चक्रवर्ती को पूछताछ के लिए समन भेजने की तैयारी कर रहा है। इसके पहले सीबीआई सुशांत सिंह के नौकर नीरज सिंह, बावर्ची केशव और अकाउंटेंट रजत मेवाती से भी पूछताछ कर चुकी है। इन सभी से मुंबई स्थित डीआरडीओ गेस्टहॉउस में पूछताछ हुई थी।     

19 अगस्त को देश की सबसे बड़ी अदालत ने सुशांत सिंह राजपूत मामले में सीबीआई जाँच के आदेश दिए थे। इनके अलावा प्रवर्तन निदेशालय और नारकोटिक्स ब्यूरो भी इस मामले की जाँच कर रहा है। निदेशालय ने जाँच में रिया चक्रवर्ती का फोन जब्त किया था जिसमें कई व्हाट्सएप चैट सामने आई थी। उनके ज़रिए ड्रग्स के इस्तेमाल से जुड़ी कुछ बातें सामने आई थीं। इसके बाद नारकोटिक्स ब्यूरो ने भी प्राथमिकी दर्ज करके मामले की जाँच शुरू की थी।    

PFI के लीगल इंचार्ज मोहम्मद दिलशाद को यूपी पुलिस ने किया गिरफ्तार: सोशल मीडिया के जरिए सांप्रदायिक तनाव भड़काने का आरोप

उत्तर प्रदेश पुलिस ने लखनऊ में पॉपुलर फ्रंट ऑफ़ इंडिया (पीएफआई) पर बड़ी कार्रवाई की है। पुलिस ने पीएफआई और सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ़ इंडिया (एसडीपीआई) के उत्तर प्रदेश लीगल इंचार्ज मोहम्मद दिलशाद को गिरफ्तार किया है। उस पर सोशल मीडिया के माध्यम से समाज में भड़काऊ और नफ़रत फैलाने वाली बातें करने का आरोप लगा है। सामने आई जानकारी के मुताबिक़ वह सोशल मीडिया पर ऐसी चीज़ें ही साझा करता था जिससे सांप्रदायिक सद्भाव बिगड़े।  

पुलिस ने मोहम्मद दिलशाद को राजधानी लखनऊ के कृष्णा नगर क्षेत्र से गिरफ्तार किया था। उसकी गिरफ्तारी बुधवार (26 अगस्त 2020) को देर रात के आस-पास हुई थी। दिलशाद उत्तर प्रदेश में पीएफआई का लीगल इंचार्ज है। उस पर आरोप लगाया गया है कि वह व्हाट्सएप, फेसबुक और ट्विटर के ज़रिए माहौल बिगाड़ने वाली भड़काऊ विषय वस्तु साझा करता था। फ़िलहाल पुलिस उससे पूछताछ कर रही है।    

पुलिस द्वारा की गई पूछताछ में मोहम्मद दिलशाद ने बताया कि पिछले काफी समय से पीएफआई के लिए काम कर रहा है। इतना ही नहीं वह वह राजनीतिक दल एसडीपीआई का सक्रिय सदस्य भी है। इसके अलावा सुजीत पाण्डेय मंडलायुक्त लखनऊ ने भी इस बारे में जानकारी दी। उन्होंने बताया कि वह विज्ञान में स्नातक है लेकिन अभी कुछ नहीं कर रहा है। वह पीएफआई के प्रचार प्रसार का काम करता था।  

साथ ही उस पर यह ज़िम्मेदारी भी थी कि ज़्यादा से ज़्यादा नए लोगों को अपने संगठन में शामिल करे। पुलिस ने बीते कुछ दिनों से उसकी गतिविधियों पर नज़र रखी थी। जैसे ही मोहम्मद दिलशाद ने भड़काऊ बातें साझा की वैसे ही पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया। फिलहाल इस मामले में पुलिस उससे आगे की पूछताछ कर रही है।    

गौरतलब है कि हाल ही में कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरू में भड़की हिंसा के पीछे सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (SDPI) और पॉपुलर फ्रंट ऑफ़ इंडिया (PFI) का नाम सामने आया था। सूबे की येदियुरप्पा सरकार इस पर प्रतिबंध लगा सकती है। कर्नाटक के मंत्री केएस ईश्वरप्पा ने कहा कि SDPI एक बेकार संगठन है हम इसे बैन करने के बारे में विचार कर रहे हैं। एसडीपीआई इस्लामिक कट्टरपंथी संगठन पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएफआई) का राजनीतिक संगठन है। जो अक्सर देश विरोधी गतिविधियों में शामिल रहने की वजह से ख़बरों में बना रहता है। 

इसके पहले भी उत्तर प्रदेश के बहराइच से रामजन्मभूमि पूजन के दौरान एक घटना सामने आई थी। सोशल मीडिया पर लोगों को बरगलाने और उन्माद फैलाने के आरोप में पुलिस ने शुक्रवार (7 अगस्त, 2020) को पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) और सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (SDPI) से जुड़े एक डॉक्टर सहित तीन लोगों को गिरफ्तार किया था। पुलिस के अनुसार यह लोग अयोध्या राम मंदिर भूमिपूजन कार्यक्रम के दिन सोशल मीडिया पोस्ट जरिए समुदाय विशेष के लोगों में आक्रोश फैलाना चाह रहे थे। जिससे सांप्रदायिक हिंसा भड़क उठे।

जामिया के जिहादी: छवि ख़राब करने के लिए यूनिवर्सिटी ने की सुदर्शन टीवी और सुरेश चव्हाणके के खिलाफ कार्रवाई की माँग

‘जामिया के जिहादी’ विवाद पर जामिया मिलिया इस्लामिया ने बृहस्पतिवार (अगस्त 27, 2020) को केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय को पत्र लिखकर सुदर्शन न्यूज चैनल और इसके प्रधान संपादक सुरेश चव्हाणके के खिलाफ विश्वविद्यालय की छवि को धूमिल करने के लिए कार्रवाई करने को कहा है।

दरअसल, सुरेश चव्हाणके ने अपने आगामी शो का एक ट्रेलर ट्वीट किया था, जिसमें उन्होंने दावा किया कि सिविल सेवाओं में ‘संप्रदाय विशेष की घुसपैठ’ का ‘पर्दाफाश’ किया गया है। वीडियो में उन्होंने जामिया के रेजिडेंशियल कोचिंग अकादमी (RCA) से संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) में स्थान पाने वाले छात्रों को ‘जामिया के जिहादी’ कहा था।

‘इन्डियन एक्सप्रेस’ की रिपोर्ट के अनुसार, जामिया के प्रो अहमद अज़ीम ने कहा, “हमने शिक्षा मंत्रालय को पूरे प्रकरण के बारे में सूचित करते हुए लिखा है और उनसे उचित कार्रवाई करने का अनुरोध किया है। हमने उन्हें बताया कि सुदर्शन चैनल ने न केवल जेएमआई और एक विशेष समुदाय की छवि को धूमिल करने की कोशिश की है, बल्कि यूपीएससी की छवि भी ख़राब की है।”

जामिया विश्वविध्यालय की वीसी नजमा अख्तर ने ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ को बताया कि विश्वविद्यालय इस मुद्दे पर अदालत नहीं जाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि चव्हाणके ने जिहादी की एक नई ‘धर्मनिरपेक्ष परिभाषा’ दी है। उन्होंने कहा, “हम उन्हें बहुत अधिक महत्व नहीं देना चाहते हैं। जहाँ तक ​​हमारे छात्रों का संबंध है, आरसीए के 30 छात्रों को इस बार चुना गया था, जिनमें से 16 मुस्लिम और 14 हिंदू हैं। चूँकि वे सभी जिहादी कहे गए, इसका मतलब 16 मुस्लिम जिहादी थे और 14 अन्य हिंदू जिहादी थे। भारत को जिहादियों की नई धर्मनिरपेक्ष परिभाषा दी गई है।”

जामिया टीचर्स एसोसिएशन ने माँग की है कि प्रशासन द्वारा ‘सुरेश चव्हाणके द्वारा भारतीय विरोधी और जेएमआई विरोधी टिप्पणी’ के खिलाफ आपराधिक मानहानि का मुकदमा दायर किया जाए। जामिया टीचर्स एसोसिएशन ने कहा कि सुदर्शन न्यूज के सीएमडी द्वारा कई अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल किया गया है, जो खुले तौर पर भड़काऊ है, नागरिकों के खिलाफ जहर उगलता है और लोगों को बाँटने की कोशिश करता है।”

इस विवाद पर सुरेश सुरेश चव्हाणके ने कहा है कि जिन लोगों को जिहादी शब्द पर आपत्ति है पहले वो ये बताएँ कि क्या जिहाद शब्द कोई गाली है? जामिया मिल्लिया इस्लामिया के पूर्व विद्यार्थियों ने इसकी निंदा करते हुए सुरेश चव्हाण के खिलाफ आपराधिक मुकदमा दर्ज कराने के लिए कानूनी विकल्प पर विचार कर रहे हैं।

गौरतलब है सुरेश चव्हाणके के सुदर्शन चैनल का एक प्रोमो सोशल मीडिया में वायरल हो रहा है। वह ‘जामिया के जेहादी’ नाम से एक कार्यक्रम शुक्रवार को शुरू करने वाले हैं। प्रोमो में कहा गया है ऐसे क्या कारण हैं कि बड़ी संख्या में जामिया के विद्यार्थी आईएएस और आईपीएस संवर्ग के लिए चुने जा रहे हैं। इसके पीछे क्या साजिश है। नौकरशाही में संप्रदाय विशेष के घुसपैठ का खुलासा करने का दावा किया जा रहा है।

योगी सरकार की बड़ी कार्रवाई: 2 दिन के भीतर बाहुबली नेता अतीक अहमद की ₹60 करोड़ की 7 संपत्तियाँ कुर्क, 13 और भी निशाने पर

उत्तर प्रदेश के प्रयागराज से पूर्व सांसद अतीक अहमद की कुल 7 संपत्तियाँ कुर्क की जा चुकी हैं। इन 7 संपत्तियों का कुल मूल्य लगभग 60 करोड़ रुपए बताया जा रहा है। गुरुवार 27 अगस्त 2020 को अतीक अहमद की 2 संपत्ति कुर्क की गई थीं। जिनकी कीमत 35 करोड़ बताई जा रही है। वहीं बुधवार (26 अगस्त 2020) को 5 सम्पत्तियाँ कुर्क की गई थीं। और इन संपतियों की कीमत लगभग 25 करोड़ बताई जा रही है।    

बुधवार को कार्रवाई की शुरुआत करते हुए प्रयागराज पुलिस ने सबसे पहले अतीक अहमद की 5 संपत्तियों को चिन्हित किया। इसके बाद उन संपत्तियों को कुर्क किया गया। दिन बीत जाने के कारण दो संपत्तियों की कुर्की नहीं हो पाई थी। अगले दिन यानी गुरुवार को प्रयागराज स्थित खुल्दाबाद की 2 संपत्तियों को कुर्क किया गया। जिसमें एक मकान चकिया में स्थित था और दूसरा करबला में। इस कार्रवाई में पुलिस के अलावा नगर निगम, प्रयागराज विकास प्राधिकरण और राजस्व विभाग भी शामिल था।      

इस संबंध में जिले के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक अभिषेक दीक्षित ने भी जानकारी दी। उन्होंने बताया कि पूर्व बाहुबली सांसद की कुल 7 संपत्तियाँ कुर्क की जा चुकी हैं। इनका संभावित मूल्य लगभग 60 से 65 करोड़ रुपए है। साथ ही प्रयागराज शहर में भू माफ़ियाओं द्वारा तमाम तरह के अपराधों के माध्यम से इकट्ठा की गई संपत्तियों को कुर्क करने की कार्रवाई जारी रहेगी। ख़बरों के मुताबिक़ अतीक अहमद की कुल 20 संपत्तियों की सूची बनाई गई है जिन्हें कुर्क किया जाना है। जिसमें 7 कुर्क की जा चुकी हैं और लगभग 13 संपत्तियों का मामला अदालत में लंबित है।    

प्रयागराज जिला प्रशासन के मुताबिक़ अतीक अहमद पर 31 मामले और 7 अन्य मामले दर्ज हैं। इसके अलावा अतीक अहमद और उसके रिश्तेदारों के 12 हथियारों के लाइसेंस रद्द करने की प्रक्रिया भी शुरू हो चुकी है। अतीक अहमद के बेटे अब्बास अहमद पर भी लखनऊ स्थित आवास पर 7 हथियारों के लाइसेंस लेने पर प्राथमिकी दर्ज की गई थी। जिसे बाद में दिल्ली स्थित आवास के पते पर स्थानांतरित किया जा चुका था। अभी तक ऐसे 16 हथियारों का पता चला है जो अतीक अहमद द्वारा इस्तेमाल किए जाते थे। अभी तक अतीक अहमद के कुल 6 प्लाट, 6 घर, 2 गाड़ियाँ जब्त की जा चुकी हैं। 6 बैंक एकाउंट भी बंद किए जा चुके हैं। अतीक के गैंग से जुड़े लोगों पर भी कार्रवाई जारी है।    

इस संबंध में प्रयागराज के जिलाधिकारी भानु चन्द्र गोस्वामी ने पहले ही आदेश जारी किया था। आदेश के मुताबिक़ उत्तर प्रदेश की बंद एवं समाज विरोधी क्रियाकलाप निवारण अधिनियम की धारा-14 (1) के अंतर्गत अतीक अहमद की कुल सात सम्पत्तियों (अवैध) को कुर्क करने का आदेश जारी किया था। इस आदेश में चकिया में स्थित तीन मकान, कालिंदीपुरम में स्थित एक मकान, ओमप्रकाश सभासद नगर में एक मकान, सिविल लाइन में एक मकान और कर्बला में एक मकान शामिल था।    

इन मकानों में मकान नं0-95 डी/1/3 चकिया थाना खुल्दाबाद, मकान नं0-3/6डी/1 कर्बला थाना खुल्दाबाद, मकान नं0-95 डी/4 चकिया थाना खुल्दाबाद, मकान नं0-95 सी/57के/1 चकिया थाना खुल्दाबाद, मकान नं0-24 एमआईजी कालिंदीपुरम थाना धूमनगंज, मकान नं0-197/39 महात्मा गाँधी मार्ग थाना सिविल लाइन्स, मकान नं0-95/51 ओम प्रकाश सभासद नगर शामिल थे। अतीक अहमद की संपत्तियों को कुर्क किए जाने की संस्तुति पहले ही जारी कर दी गई थी। एसएसपी अभिषेक दीक्षित ने अपनी रिपोर्ट में यह संस्तुति जारी की थी। संस्तुति की रिपोर्ट को आधार बनाते हुए जिलाधिकारी ने अतीक अहमद की अचल संपत्तियों को कुर्क करने का आदेश जारी किया था।  

जिलाधिकारी ने प्रभारी निरीक्षक थाना खुल्दाबाद को मकान नं0-95 डी/1/3, मकान नं0-95 डी/4, मकान नं0-95 सी/57के/1 और मकान नं0-3/6डी/1 की अचल सम्पत्तियों का प्रशासक नियुक्त किया था। इसके अलावा प्रभारी निरीक्षक थाना सिविल लाइन्स को मकान नं0-197/39 महात्मा गाँधी मार्ग की अचल सम्पत्ति का प्रशासक नियुक्त किया था। इसके बाद जिलाधिकारी भानु चंद्र गोस्वामी ने यह भी स्पष्ट किया था कि अतीक अहमद की इन संपत्तियों को कुर्क करने के आदेश का अनुपालन 28 अगस्त के पहले करना है। जिलाधिकारी ने अतीक अहमद के पास मौजूद हथियारों को लेकर भी अहम आदेश जारी किया था। उन्होंने अतीक अहमद समेत आपराधिक पृष्ठभूमि वाले कुल 23 लोगों के शास्त्र लाइसेंस रद्द करने का आदेश दिया था।