कोरोना वायरस के संक्रमण के कारण देशभर में जारी बंद (Lockdown) के दौरान मुस्लिम समुदाय के कई लोग सोशल मीडिया पर निरंतर ऐसे वीडियो बनाकर पोस्ट करते हुए देखे गए, जिनमें उन्होंने या तो कोरोना को अल्लाह की एनआरसी बताया, या फिर कहा कि नमाजियों को कोरोना से कुछ नहीं हो सकता और उन्हें खुलकर बाहर निकलना चाहिए।
ऐसे ही कासिफ़ अली नाम का एक युवक का कुछ दिन पहले सोशल मीडिया पर एक ऐसा वीडियो वायरल हुआ था, जिसमें वो शकूर नगर, मेरठ (जैसा कि ट्विटर पर इस वीडियो के साथ बताया गया था) के अलग-अलग बाजार में जाकर यह साबित करते हुए देखा गया कि लॉकडाउन का उनके ऊपर कोई फर्क नहीं पड़ने वाला और सब कुछ सामान्य तरीके से चलता रहेगा।
— Tajinder Pal Singh Bagga (@TajinderBagga) April 19, 2020
कासिफ़ अली इस वीडियो में अस्सलाम वालेकुम कहते हुए कहता नजर आता है कि किसी को मुर्गा चाहिए या चूड़ियाँ चाहिए, किस चीज की कोई कमी नहीं है और बाजारों में खूब भीड़ है कौन कहता है कि लॉकडाउन रहेगा? यह वीडियो आज दिन में ही भाजपा नेता तजिंदर पाल सिंह बग्गा ने ट्विटर पर शेयर करते हुए उत्तर प्रदेश पुलिस और मेरठ पुलिस को टैग किया था।
इसके कुछ ही घंटों बाद मेरठ पुलिस ने अपने ट्विटर हैंडल से एक वीडियो शेयर किया है, जिसमें यही युवक एकदम अलग अंदाज में अपने कर्मों की माफ़ी माँगता हुआ नजर आ रहा है। उसका कहना है कि कुछ दिन पहले लॉकडाउन के दौरान उसके भाई की दुकान को पुलिस ने जबरन बंद करवा दिया था और इसी कारण भावनाओं में बहकर उसने यह वीडियो बनाया था।
आज जारी किए गए नए वीडियो में कासिफ़ अली के सुर एकदम बदले हुए नजर आए। नमस्कार दोस्तों कहते हुए उन्होंने आज के वीडियो की शुरुआत की और वीडियो देखकर यह स्पष्ट पता चल रहा है कि कासिफ़ अली अपनी हरकत पर वास्तव में शर्मिंदा हैं और उन्हें मुर्गे की दुकान वाला वीडियो नहीं बनाना चाहिए था। उन्हेओं अपनी इस हरकत के लिए माफ़ी माँगी है।
ज्ञात हो कि इसी तरह से सोशल मीडिया पर बॉलीवुड कलाकार एजाज खान अक्सर भड़काऊ बातें करते हुए देखे जाते हैं। कल ही उन्हें मुंबई पुलिस ने गिरफ्तार किया है।
कोरोना वायरस के संक्रमण का सबसे बड़ा स्रोत बन चुके तबलीगी जमात पर बाबरी मस्जिद के पक्षकार रहे इकबाल अंसारी का कहना है कि तबलीगी जमात पर देशद्रोह का मुकदमा दर्ज होना चाहिए।
इकबाल अंसारी का आरोप है कि तबलीगी जमात के लोगों ने देश में कोरोना वायरस के संक्रमण को फैलाया है। उन्होंने कहा कि सरकार ने तबलीगी जमात के लोगों को पहले ही चेतावनी दी थी कि वह भीड़ न इकट्ठा करें, फिर भी जमात के लोगों ने एज्तेमा आयोजित किया और इसके बाद पूरे देश में कोरोना संक्रमण को फैलाया।
घुमंतू होते हैं तबलीगी, जहाँ जगह मिले वहीं सोते हैं
इकबाल अंसारी रविवार (अप्रैल 19, 2020) को लखनऊ में संवाददाताओं से बातचीत करते हुए कहा- “हम देश के प्रति वफादार हैं। जमाती घुमंतू होते हैं। जगह-जगह घूमते रहते हैं। जहाँ जगह मिली, वहीं सो जाते हैं। जहाँ खाना मिला, वहाँ खा लेते हैं। लेकिन, मौजूदा समय में यही जमाती कोरोना फैलने की वजह बन रहे हैं। यह बीमारी खासतौर पर जमातियों में पाई जा रही है।”
अयोध्या विवाद में बाबरी मस्जिद के पक्षकार रहे इकबाल अंसारी ने कहा है कि तबलीगी के जमाती देश के गद्दार हैं, वे देश में कोरोना जैसी महामारी को फैलाने की साजिश रच रहे हैं। उनका कहना है कि कोरोना संक्रमण किसी जाति धर्म को देख कर नही संक्रमित कर रहा है। ऐसे में जमात के लोगों को देश के बारे में सोचना चाहिए था। लेकिन जमात के लोगों ने जो किया वह देशद्रोह है।
इकबाल अंसारी का कहना है कि सरकार ने जमात के लोगों को इलाज के लिए बुलाया लेकिन उसके बाद भी जमात के लोग सामने नहीं आए। आज पूरे देश में जमात की वजह से संक्रमण फैला है। ऐसे लोगों के खिलाफ सरकार को देशद्रोह का मुकदमा दर्ज करना चाहिए।
‘हम देश के वफादार हैं, हम कोरोना नहीं फैलने देंगे’
धर्म और मजहब को बीच में ना लाने की सलाह देते हुए उन्होंने कहा कि देश बचाने के लिए मजहब की दीवारें नहीं आनी चाहिए। सभी धर्मों के लोगों को एक साथ जुड़कर कोरोना जैसी महामारी से निपटने के लिए प्रयत्न करना चाहिए। इकबाल अंसारी ने कहा कि हम देश के वफादार हैं और हम कोरोना का संक्रमण अपने देश में नहीं होने देंगे।
उन्होंने कहा कि जमाती अगर गलत कर रहे हैं, तो हम उनका समर्थन बिल्कुल भी नहीं करते। आए दिन जमातियों के संक्रमित होने के मामले सामने आ रहे हैं। सरकार के निर्देशों का उल्लंघन कर ये लोग देश विरोधी काम कर रहे हैं।
कोरोना के खिलाफ मोदी-योगी सरकार ने लगा रखी है पूरी ताकत
इकबाल अंसारी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सरकार की तारीफ की। इकबाल का कहना है कि कोरोना संक्रमण के खिलाफ सरकार ने पूरी ताकत लगा रखी है और कोरोना संक्रमण देश से जल्दी ही समाप्त होगा।
इकबाल अंसारी का यह बयान आप इस लिंक पर देख सकते हैं –
अंसारी ने तबलीगी के जमातियों को इंसानियत का दुश्मन बताते हुए कहा कि ऐसे जमातियों पर कड़ी कार्रवाई की जानी चाहिए, ये जहाँ भी मिलें, इन्हें सजा दी जानी चाहिए।
गोवा के मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत ने ऐलान किया है कि राज्य अब कोरोना से मुक्त हो गया है क्योंकि वहाँ एक भी नेगेटिव मामला नहीं है। अर्थात, गोवा में अब कोरोना वायरस से संक्रमण का कोई भी सक्रिय केस नहीं है। मुख्यमंत्री डॉक्टर सावंत ने कहा कि ये गोवा के लिए संतुष्टि और राहत की बात है। उन्होंने जानकारी दी कि सभी कोरोना पॉजिटिव मरीज का टेस्ट नेगेटिव आया है। उन्होंने सभी डॉक्टरों, मेडिकल और पैरा मेडिकल कर्मचारियों को बधाई देते हुए कहा कि वो इन सभी का धन्यवाद करते हैं।
गोवा में पिछले 16 दिनों से कोरोना वायरस का कोई भी नया मामला नहीं आया है। सीएम सावंत ने बताया कि 3 अप्रैल से लेकर अब तक गोवा में कोरोना का कोई केस नहीं निकला है। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी टैग कर के इस बात की जानकारी दी और ‘गोवा फाइट्स कोरोना’ का नारा दिया। कई लोगों ने भी डॉक्टर सावंत को धन्यवाद दिया और कहा कि उन्होंने राज्य के रक्षक की तरह 24 घंटे लग कर राज्य को ये उपलब्धि दिलाई है। कइयों ने लिखा कि इन परिस्थितियों में ये काफ़ी अच्छी ख़बर है।
बता दें कि अब तक वामपंथियों द्वारा केरल मॉडल की खूब चर्चा होती थी, जबकि जनसंख्या और मरीजों के अनुपात को देखें तो उत्तर प्रदेश कोरोना से निपटने में बेहतर कर रहा है। लेकिन, महाराष्ट्र और केरल की सरकारों की वाहवाही के लिए दोनों राज्यों का मॉडल रचा गया, जिसमें सेलेब्रिटीज से ट्वीट करवाए गए। अनजाने में अभिनेत्री उर्वशी रौतेला के खुलासे के बाद महाराष्ट्र की पोल खुल गई क्योंकि ये साबित हो गया कि सभी ट्वीट्स ठाकरे सरकार ने करवाए थे। केरल सरकार का गुणगान शुरू कर दिया गया, ताकि योगी सरकार के कामकाज की चर्चा न हो।
A moment of satisfaction and relief for Goa as the last active Covid-19 case tests negative. Team of Doctors and entire support staff deserves applause for their relentless effort. No new positive case in Goa after 3rd April 2020.#GoaFightsCOVID19@narendramodi
गोवा के स्वास्थ्य मंत्री विश्वजीत राणे ने भी डॉक्टरों और सभी कोरोना वारियर्स की प्रशंसा करते हुए राज्य के कोरोना फ्री होने की घोषणा की। उन्होंने कहा कि शून्य की भी अपनी ही महत्ता होती है, गोवा में कोरोना के सक्रिय मरीजों की संख्या शून्य पर है। हालाँकि, उन्होंने कहा कि कोरोना का एक भी मामला होने का मतलब ये नहीं कि लॉकडाउन का फिर सोशल डिस्टेन्सिंग का ख्याल नहीं रखा जाएगा। ये सब चलता रहेगा। यानी, राज्य व केंद्र सरकार द्वारा जारी दिशा-निर्देशों का पालन यूँ ही जारी रहेगा।
Zero indeed has great value! Immensely happy to announce that all the COVID-19 positive cases in the state are now NEGATIVE. Very grateful to our Doctors & frontline workers who worked tirelessly & risked their lives to save others. #GoaFightsCovid19#COVIDfreepic.twitter.com/ZiUlAmDh25
बता दें कि गोवा में कोरोना वायरस के कुल 7 मामले आए थे। राहत की बात ये है कि इनमें से किसी की भी मौत नहीं हुई और अब होकर घर जा चुके हैं। केरल में कोरोना वायरस के अब तक 400 मामले आए हैं, जिनमें से 2 की मौत हो गई। हालाँकि, वहाँ 257 लोग ठीक हो चुके हैं, जो कि काफी राहत की बात है। 140 सक्रिय मामले भी भी बचे हुए हैं, जिनका इलाज जारी है। महारष्ट्र अभी भी टॉप पर बना हुआ है, जो गोवा के पड़ोस में ही है।
महाराष्ट्र के पालघर के दहानु तालुका के एक आदिवासी बहुल गडचिंचले गाँव में सैकड़ों लोगों की भीड़ द्वारा जूना अखाड़ें के दो संतों और उनके ड्राइवर की पुलिस के सामने ही बड़ी बेरहमी से पीट-पीट कर हत्या कर दी गई। घटना गुरुवार (अप्रैल 16, 2020) के देर रात की है। घटना की जानकारी होते ही संत समाज में गहरा आक्रोश व्याप्त है कि कैसे महाराष्ट्र पुलिस के सामने दो महात्माओं और उनके ड्राइवर की इस तरह से हत्या कर दी जाती है और पुलिस मूक दर्शक बनी रहती है।
भीड़तंत्र का ऐसा भयंकर रूप।पालघर में जूना अखाड़े के दो साधुओं की निर्मम हत्या पर अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद ने सख़्त कार्यवाई की माँग की है।कोरोना संकट के बीच भी लिंचिंग! इनको लाठी डंडों के साथ खून की प्यासी भीड़ के बीच क्यों छोड़ा गया? pic.twitter.com/fxbFFDlzmr
महाराष्ट्र के पालघर जिले के दहानु तालुका (Dahanu taluka) का गडचिनचिले गाँव (Gadchinchale Coordinates: 20.0843517°N 73.0611882°E)
क्या है पूरा मामला
जूना अखाड़ा के 2 महंत कल्पवृक्ष गिरी महाराज (70 वर्ष), महंत सुशील गिरी महाराज (35 वर्ष) अपने ड्राइवर निलेश तेलगडे (30 वर्ष) के साथ मुंबई से गुजरात अपने गुरु भाई को समाधि देने के लिए जा रहे थे। दरअसल, श्री पंच दशनाम जूना अखाड़ा 13 मढ़ी मिर्जापुर परिवार के एक महंत राम गिरी जी गुजरात के वेरावल सोमनाथ के पास ब्रह्मलीन हो गए थे। दोनों संत महाराष्ट्र के कांदिवली ईस्ट के रहने वाले थे और मुंबई से गुजरात अपने गुरु की अंत्येष्टि में शामिल होने जा रहे थे।
गुरु के देहावसान के बाद अचानक से मिर्जापुर परिवार के कुछ सन्तों को वहाँ बुलाया गया था ताकि महात्मा जी की समाधि लगाई जा सके। जिनमें से उसी परंपरा के दो संत महंत कल्पवृक्ष गिरी जी महाराज और दूसरे महंत सुशील गिरी जी महाराष्ट्र से गुजरात के वेरावल के लिए रवाना हुए रास्ते में उन्हें महाराष्ट के पालघर जिले में स्थित दहानु तहसील के गडचिंचले गाँव में पालघर थाने के पुलिसकर्मियों ने पुलिस चौकी के पास रोका।
How can people be so inhumane? Have you ever seen Police handing over a man to crowd to lynch & beat to death? Here is @Palghar_Police doing that. Case of 3 Brahmin men’s murder by mob is smartly shut & covered by @OfficeofUT Govt. Why no media reported? @republic@Dev_Fadnavispic.twitter.com/J9OWohxhOw
ड्राइवर के साथ दोनों संतों को भी गाड़ी से बाहर निकलने के लिए कहा गया और उन लोगों को पुलिस वालों ने, सड़क के बीच में ही बैठा दिया, कहा जा रहा है वहाँ गाँव के करीब 200 के आस पास लोग अचानक ही इकट्ठे हो गए। यह गाँव और इलाका आदिवासी बहुल है और ग्रामीणों में ज़्यादातर ईसाई और कुछ के मुस्लिम समुदाय का होने का दावा भी संत समाज के कुछ लोगों द्वारा किया गया है।
यह भी कहा जा रहा है कि जूना अखाड़े के उन दोनों सन्तों और ड्राइवर को, पुलिस वालों ने डर के कारण एक तरह से उन आदिवासियों के हवाले कर दिया और इस भीड़ ने, पुलिस वालों के सामने ही डंडे और पत्थरों से मार-मार कर दोनों सन्तों और ड्राइवर की बेरहमी से हत्या कर दी। अभी तक जो वीडियो फुटेज उपलब्ध हैं उसमें आप पुलिस वालों की मौजूदगी देख सकते हैं। मॉब लिंचिंग होता देख पुलिस खुद ही चिहुँक रही है। ऐसे में महाराष्ट्र पुलिस की भूमिका भी संदिग्ध मानी जा रही है।
स्थानीय सूत्रों के अनुसार
कुछ लोकल मीडिया रिपोर्टों और स्थानीय सूत्रों के हवाले से यह भी कहा जा रहा है कि संतों की इस यात्रा के दौरान आदिवासी बहुल इस गाँव में पुलिस ने गाड़ी को रोका और साधुओं को सड़क पर बैठा कर पूछताछ करने लगी और इसी दौरान गाँव में संदिग्ध हालत में यह अफवाह उड़ा दी गई कि ये सब बच्चा चोर हैं l बस इतनी सी बात थी कि गाँव वाले इन संतों पर लाठी डंडे, भाले, फरसे लेकर टूट पड़े।
जब ‘धर्म विशेष’ बहुल आदिवासियों ने इन साधुओं को मारना शुरू किया तो महाराष्ट्र पुलिस वहाँ से भाग खड़ी हुई और साधुओं को मरता हुआ छोड़ दिया। बाद में खाना पूर्ति के लिए इन मरणासन्न साधुओं को अस्पताल ले जाया गया जहाँ उन्हें डॉक्टरों द्वारा मृत घोषित कर दिया गया। ये भी कहा जा रहा है की इस घटना को लूटपाट के उद्देश्य से भी अंजाम दिया गया। एक वीडियो फुटेज में भी भीड़ संतों की गाड़ी में चढ़ी और कुछ तलाशती नजर आ रही है।
पुलिस और ग्रामीणों की भूमिका संदिग्ध
जैसा कि आप वीडियो में भी देख सकते हैं कि जब भीड़ द्वारा उन्हें बेरहमी से पीटा जा रहा है तो न सिर्फ पुलिस वहाँ मौजूद है बल्कि एक वीडियो में तो खुद ही पुलिस संत कल्पवृक्ष गिरी महराज को पुलिस चौकी से बाहर लाते और फिर भीड़ के सामने यूँ ही असहाय हालत में छोड़ती नजर आ रही है। भीड़ को पीटते देख भी पुलिस की कोई कार्रवाई नजर नहीं आ रही है। अलबत्ता पुलिस वाला खुद ही बचता नजर आ रहा है। नहीं तो पुलिस की मौजूदगी में कम से कम संतों की इस तरह से बर्बर हत्या नहीं हुई होती।
दूसरा बच्चा चोर का आरोप भी मीडिया के एक धड़े द्वारा फैलाया नजर आ रहा है। रात के अँधेरे में लॉकडाउन के समय वहाँ सड़क पर इतनी बड़ी भीड़ अचानक इकट्ठी नहीं हो सकती थी। अगर इकट्ठी हुई भी तो पुलिस ने जिन्हें पूछताछ के लिए रोका और वो बाकायदा अपना परिचय बता रहे हैं तो पुलिस ने भीड़ को न रोककर चौकी से निकालकर संत को भीड़ के बीच क्यों ले गई?
बार बार वृद्ध साधु पुलिस का हाथ पकड़ते और बार बार पुलिस वाला हाथ झटक कर उन्हें भीड़ को सौंप देता। पुलिस स्पॉन्सर्ड लिंचिंग पर बॉलीवुड की कोई धरा, कोई धनुराग सन्नाटा तोड़ेगा? वैसे दबाव में एक निंदा ट्वीट और स्वत: कुछ मामलों पर बहते अश्रुधारा में फर्क है। https://t.co/XuDbfX8DeZpic.twitter.com/dGkJUb6ZbD
जनसत्ता सहित मीडिया के कुछ रिपोर्टों में सवाल ये भी उठाया गया है कि लॉकडाउन के बावजूद ये तीनों लोग मुंबई से लगभग 120 किमी तक जाने में कैसे कामयाब रहे? पालघर जिले से इस गडचिंचले गाँव की दूरी 110 किलोमीटर बताया जा रहा है। साथ ही बचाव में ये भी जोड़ दिया जा रहा है कि इस पूरे इलाके में कुछ दिनों से बच्चा चोर गिरोह की अफवाह फैली हुई थी। अगर ऐसी कोई अफवाह थी जो बिना वहाँ गए मीडिया गिरोह के लोगों को साफ-साफ पता है। और इसी अफवाह की आड़ लेकर इस बहसी भीड़ के कृत्य को हल्का करने कि कोशिश में कहा जा रहा है कि बस लोगों ने इन्हें इसी बच्चा चोर गिरोह से संबंधित समझ लिया और बिना सोचे-समझे हमला करना शुरु कर दिया। बाद में मौके पर पहुँची पुलिस की टीम ने इन्हें बचाया लेकिन अस्पताल में तीनों की मौत हो गई।
महाराष्ट्र के पालघर जिले में हुई जूना अखाड़े के दो संतो और उनके ड्राइवर की मॉब लिंचिंग
यहाँ फिर ध्यान दीजिए कि यह नैरेटिव गढ़ी तो बड़ी चालाकी से गई है लेकिन लॉकडाउन क्या सिर्फ उन संतों के लिए था? खून की प्यासी इस आक्रामक और वहशी भीड़ के लिए नहीं। जिस सड़क के रास्ते जा रहे हैं ये लोग वहाँ पुलिस चौकी मौजूद है और महाराष्ट्र पुलिस के रोकने पर संत बाकायद अपनी पहचान और इस तरह जाने का कारण बताते हैं। पुलिस उन्हें सड़क के बीच पहले बैठाती है फिर वीडियो में दिख रहा है कि दोनों में से एक महंत चौकी से बाहर निकल रहे हैं और वहाँ भारी संख्या में लाठी-डंडों-हथियारों से लैश भीड़ पहले से मौजूद है। देर रात को इतनी भीड़ इस तरह आक्रामक होकर वहाँ कैसे इकठ्ठा हो गई और वो भी पुलिस चौकी होते हुए?
लॉकडाउन में संतों को क्यों जाना पड़ा
नागा सम्प्रदाय में जब कोई कोई संत-महात्मा का देहावसान होता है तो उनको समाधि सिर्फ उनके परम शिष्य देते आए हैं। नागा समाज में गुरु शिष्य सम्बन्ध बहुत करुणामय और प्रगाढ़ होता है। ये सब आपस में ममता के बंधन से जुड़े होते हैं। किसी का अहित नहीं सोचने वाले ये साधू जीवन भर साधना के साथ गरीब, दलित और पिछड़े लोगों की सेवा में रत रहते हैं। ये संन्यासी अपना सर्वस्व त्याग कर जाति और वर्ण के बंधनों से मुक्त होकर निराकार की आराधना करते हैं। इसलिए ये निर्लिप्त, अघोर, निरपेक्ष होते हैं और अपने इसी परंपरा का निर्वाह करने के लिए अपने पूजनीय गुरू के देहावसान की खबर सुनकर ये साधू अपने गुरु को समाधि देने किसी तरह गुजरात जा रहे थे। इस दौरान गुजरात और महाराष्ट्र की सीमा पर पालघर जिले के गडचिंचले गाँव से गुजरते हुए देर रात ये घटना घटी।
संत समाज के इन महात्माओं की गलती बस इतनी थी कि इन्होनें सोचा लॉकडाउन है तो जाना मुश्किल होगा और क्या पता पुलिस हमें जाने दे या न जाने दे हमारे गुरु की समाधि लगाने के लिए इसलिए भावनाओं और कर्तव्य पालन के वशीभूत हो बॉर्डर वाले गाँव के अंदर से जो रास्ता था, उसी रास्ते से जाने की सलाह बनाई गई मालूम पड़ती है लेकिन उनको क्या पता कि अंदर क्या होने वाला है और ये बड़ी और वीभत्स घटना सामने आई।
नागा साधु, इनका इतिहास और फेक मीडिया नैरेटिव
आज जिस जूना अखाड़े के संतों की हत्या पर मीडिया गिरोह लीपापोती पर उतारू है और उसे बच्चा चोरी जैसे नैरेटिव की आड़ में मॉबलिंचिंग को एक सामान्य घटना बनाकर पेश करते हुए उन हत्यारों का बचाव कर रही है और कइयों को अभी तक ये पता भी नहीं चला है कि किन तीन लोगों की हत्या हुई? वे कौन थे? बल्कि उसे और हलका करने के लिए यह लिखा जा रहा है कि आक्रोशित भीड़ ने बच्चा चोर समझ कर तीन लोगों को पीट दिया जिससे बाद में उनकी मृत्यु हो गई। इस नैरेटिव की आड़ में आज घटना घटे दो दिन होने के बाद भी हर छोटी बात पर बवाल काटने वाली वामपंथी लिबरल गैंग मौन है।
अपने गुरु भाई की समाधि के लिए भावुक होकर निकले जूना अखाड़ा के इन संतो ने कभी कल्पना में भी नहीं सोचा होगा कि कुम्भ के महीने में जब ये करोड़ों लोगों को बिना किसी भेदभाव के एक ही संगत में बैठा कर भोजन कराते हैं। उन साधुओं की हत्या उस इलाके में कर दी जाएगी जिस नासिक महाराष्ट्र के क्षेत्र में नागा साधुओं की संख्या बहुत ज़्यादा है और लोग उनसे परिचित भी हैं। इन नागा साधुओं ने अंग्रेजों और मुगलों के खिलाफ भी बड़ी-बड़ी लड़ाइयाँ लड़ी है। दशकों तक चलने वाले संन्यासी विद्रोह का भी इन्हीं नागा संन्यासियों ने नेतृत्व किया था। यहाँ तक कि 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की रूप रेखा भी इन्हीं नागा साधुओं के अखाड़े में बनी थी।
आज अचानक देश का यह हिस्सा जहाँ बहुतायत में नागा संन्यासी हैं। इन साधुओं के प्रति इतना असंवेदनशील हो गया हैl कि भेषभूसा, बातचीत, पूछताछ के बाद भी कोई उनके बारें में अफवाह फैला रहा है तो महाराष्ट्र पुलिस सच जानने के बाद भी उन्हें भीड़ के हवाले कर दे रही है और भीड़ 70 वर्षीय वृद्ध और संत के रूप में देखकर भी जूना अखाड़े के कल्पवृक्ष गिरी, उनके गुरु भाई और ड्राइवर को पीटकर मार डालती है। और फेक नैरेटिव गढ़ने वाले लोग हत्यारों और सरकार का बचाव करने लगते हैं क्योंकि वहाँ शासन में कॉन्ग्रेस हिस्सेदार है और शिवसेना अपने लिबरल भूमिका में है।
जानकारी के लिए बता दूँ कि मीडिया की गढ़ी थ्योरी और पुलिस की भूमिका दोनों इसलिए संदिग्ध मानी जा रही है क्योंकि ठीक इसी तरह 2008 में कंधमाल में माओवादियों ने स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती सहित तीन और साधुओं की हत्या गोली मार कर दी थी। लक्ष्मणानंद सरस्वती की हत्या इसलिए हुई थी क्योंकि स्वामी जी कंधमाल में निर्दोष आदिवासियों के धर्म परिवर्तन का विरोध कर रहे थेl आज यह हत्या उसी घटना की याद दिलाती है। और कहीं न कहीं इसकी आड़ में भी किसी साजिश या हत्यारों को बचाने की बू आ रही है।
संतों द्वारा अभी के हत्या के तरीकों और उस क्षेत्र में मुस्लिम और नक्सल गतिविधियों को देखते हुए सिर्फ चोरी की अफवाह को कारण मानने को तैयार नहीं है। कहा यह भी जा रहा है कि पिछले दिनों में गुजरात महाराष्ट्र के सीमा पर स्थित इन जिलों में माओवादी गतिविधि में बढ़ोतरी दर्ज की गई है। और माओवादी नक्सली भी लूटपाट के इरादे से गलती से उधर आई किसी गाड़ी को रोककर, हत्या की घटनाओं को अंजाम दे रहे हैं। इस घटना के ठीक तीन दिन पहले भी उस इलाके में ऐसी ही एक घटना की खबर है। लेकिन लॉकडाउन की वजहों से या हमलावरों को बचाने के उद्देश्य से वह भी मीडिया में रिपोर्ट नहीं हुई। उस घटना का जिक्र हिन्दुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट में बहुत ही संक्षेप में है।
इसके अलावा दो-तीन दिन पहले कई दूसरे जगहों से भी ये रिपोर्ट आई थी कि लॉकडाउन के कारण भोजन आदि जुटाने के लिए नक्सली ग्रामीणों को के साथ इक्का-दुक्का राहगीरों को परेशान और लूटपाट कर रहे हैं।
अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष ने की निंदा और उठाई कठोर कार्रवाई की माँग
ऑपइंडिया ने सभी 13 अखाड़ों के परिषद के अध्यक्ष महंत नरेंद्र गिरी से बात की तो उन्होंने साफ़ शब्दों में इसका घटना में शामिल संभावितों की तरफ इशारा किया और कहा, “महाराष्ट्र में कोरोना के नाम पर धर्म विशेष के लोगों द्वारा जूना अखाड़े के दो संतों की हत्या किए जाने की अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद कड़े शब्दों में निंदा करता है।”
अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत नरेंद्र गिरि ने केंद्र और महाराष्ट्र सरकार से दोनों संतों की हत्या की जाँ और दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की माँग की है। साथ ही माहौल को देखते हुए महंत नरेंद्र गिरी ने संत समाज के संन्यासियों से अपील भी की कि लॉकडाउन चल रहा है ऐसे में अगर कोई संत महात्मा ब्रह्मलीन होते हैं तो उस इलाके के ग्रामीण और आसपास के साधु संत ही उनकी समाधि में शामिल हों। उन्होंने कहा है कि बाहरी जिले से साधु-संतों को समाधि में जाने की फिलहाल लॉकडाउन तक कोई आवश्यकता नहीं है।
जूना अखाड़ा द्वारा जारी किया गया पत्र
उनके इस अपील में भी इस बात पर जोर है कि महाराष्ट्र के पालघर जिले के दहानु तहसील में जूना अखाड़े के दो संत महात्माओं की पुलिस की मौजूदगी में लाठी डंडों से पीट-पीटकर धर्म विशेष के लोगों ने हत्या कर दी। इस घटना के बाद से साधु संतों में काफी नाराजगी है। साधु संतों की सर्वोच्च संस्था अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद ने दोषियों के खिलाफ जाँच के बाद सख्त कार्रवाई की माँग की है। महंत नरेंद्र गिरी ने आरोप लगाया है कि कोरोना के बहाने धर्म विशेष के लोग साधु-संतों से बदला ले रहे हैं।
लॉकडाउन के खत्म होने के बाद बड़ी संख्या में संत महात्मा महाराष्ट्र सरकार का घेराव करेंगे और इस मामले में कार्रवाई के लिए दबाव भी बनाएँगे। महंत नरेंद्र गिरी ने महाराष्ट्र के सीएम उद्धव ठाकरे से दोषी पुलिस कर्मियों के खिलाफ भी कार्रवाई की माँग की है। जो वहाँ मौजूद थे लेकिन संतों को बचाने का उन्होंने कोई प्रयास नहीं किया।
संत समुदाय ने की कार्रवाई की माँग
हालाँकि जिस तरह से भीड़ द्वारा हत्या की गई इसे लेकर संत समाज आक्रोशित है। ऑपइंडिया ने अखाड़ों के कई संतो से बात की तो उन्होंने अंदेशा जताया कि यह कृत्य सामान्य ग्रामीणों का नहीं है बल्कि इसमें नक्सल और मुस्लिम पक्ष की मौजूदगी का दावा किया जा रहा है। गंगा सेना के संत श्री आनंद गिरी ने तो साफ कहा कि संत समाज के दो संतों को बेरहमी से मारकर कहीं न कहीं तबलीगी जमात का बदला लिया गया है। उनका दावा है कि उन इलाकों में मुस्लिम समुदाय के लोगों की भी उपस्थिति है।
अतः इस आशंका से भी इंकार नहीं किया जा सकता और हम महाराष्ट्र सरकार से इसकी सघन जाँच और दोषियों पर कार्रवाई की माँग करते हैं नहीं तो हम संत समाज के लोग लॉकडाउन ख़त्म होने के बाद सड़कों पर आएँगे ताकि प्रशासन इस तरह की हत्याओं को खुली छूट देने से रोक लगाए। उनका का भी आक्रोश वहाँ पुलिस के मौजूद होने और कुछ न करने को लेकर था। उन्होंने तो यहाँ तक कहा कि जो शिवसेना हिन्दुओं की हिमायती बनती रही वही आज कॉन्ग्रेस के साथ मिलकर संतों की भीड़ द्वारा हत्या को खुली छूट दे रही है।
वहीं स्वामी अविनाश जंगम (प्रयागराज) ने कहा, “जूना अखाड़े के जिन निर्दोष साधुओं की हत्या हुई है। वो गुजरात-महारष्ट्र सीमा पर आदिवासी बहुल इलाके में हुई है। इन लोगों ने अक्षम्य अपराध किया है। ऐसा लगता है कि ग्रामीणों ने किसी बहकावे में आकर हत्या कर दी है। मेरा सरकार से अनुरोध है कि इन अपराधियों को आजीवन कारावास हो और सरकार को बिना देर किए न्याय करना चाहिए। आज सम्पूर्ण देश का संत समाज इस घटना से हतप्रभ है औऱ लॉकडाउन के बाद इसपर कोई निर्णायक कदम उठाया जाएगा।”
प्रशासन का बयान
संत समाज के आक्रोश को देखते हुए वहीं महाराष्ट्र प्रशासन की तरफ से जारी बयान में डीएम कैलास शिंदे कहते हैं कि पुलिस को जैसे ही घटना की जानकारी मिली पुलिस वहाँ पहुँची लेकिन हमलावर ग्रामीणों की संख्या इतनी अधिक थी कि हम पीड़ितों को बचा नहीं सके। पुलिस अधिकारियों का दावा है कि हमलावरों ने पुलिस वाहनों को भी नुकसान पहुँचाया और पुलिस मौके पर पहुँचकर उन्हें अस्पताल ले गई थी लेकिन डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया गया था। लगभग 110 ग्रामीणों को पूछताछ के लिए पुलिस थानों में लाया गया है। और आगे की जाँच चल रही है।
सोशल मीडिया पर आक्रोश
संतों की हत्या हुए आज तीसरा दिन है और जिस तरह से मीडिया गिरोह इसकी लीपापोती में लगा है। बल्कि इस पूरे घटना को ही हवा में उड़ा देने के लिए या तो पूरी तरह मौन है या फेक नैरेटिव की आड़ में दोषियों और महाराष्ट्र सरकार पर कोई सवाल नहीं उठा रहा है। आपको याद होगा जब तबरेज़ अंसारी की चोरी करने के कारण मॉब लिंचिंग हुई थी तब मीडिया ने ना सिर्फ तबरेज को निर्दोष साबित किया बल्कि इस हत्या के सारे आरोप हिंदुओं पर मढ़ दिए।
#Palghar में साधुओं की #moblynching पर केजरीवाल ने कोई Tweet किया ?ममता दीदी ने कुछ कहा ?अखिलेश/राहुल/प्रियंका/ओवैशि ने कुछ बोला ? रविश/राजदीप/अरफ़ा/राणा अयूब/बरखा/जावेद साहब/Wire/BBC ने कुछ लिखा ? सबकी ज़ुबान के लकवा मार गया है,पेन की स्याही सूख गई ! दोस्तों,आप ही आवाज़ उठाओ? pic.twitter.com/26eI4IUWn7
साथ वामपंथी-लिबरल गिरोह पूरी दुनियाँ मे हिंदुओं और देश का नाम खराब करने में पूरी तरह सक्रिय हो गई थी तुरंत ही बिना ये जाने कि मामला क्या है? क्योंकि वहाँ जिसे पीटा गया था वह एक मुस्लिम था। यही इस गिरोह के नैरेटिव के लिए पर्याप्त है वह क्या कर रहा था, चोर था आदि, इसे मीडिया ने ख़ारिज कर दिया था लेकिन अब जब दो निर्दोष साधुओं की हत्या हुई जिसमें कहा जा रहा है कि लूट-पाट का विरोध करना भी एक कारण है तो उल्टा खबरों में यह चलाया गया कि चोरी की शक में हत्या हुई है। और ना जाने क्या क्या आरोप लगाए जा रहे हैं ताकि लोगों को न सिर्फ सच से दूर रखा जाए बल्कि आरोपितों को बचाने में सक्रीय है यहाँ यह गिरोह।
महाराष्ट्र के पालघर में पुलिस की उपस्थिति में जूना अखाड़ा के 2 संत जिनका नाम कल्पवृक्ष गिरि , सुशील गिरि सहित उनके ड्राइवर की लोगों ने घेरकर हत्या कर दी ! लगता है महाराष्ट्र सरकार ने गुड़ों को छूट देदी है राज्य में से साधु संतो को ख़त्म करो ये है @OfficeofUT का हिन्दुत्व pic.twitter.com/JnrDHLnwvM
सोशल मीडिया पर संतों के शवों को बेकदरी से डम्पर में डालकर ले जाने पर भी आक्रोश व्यक्त किया जा रहा है। सोशल मीडिया पर जारी तस्वीरों में देखा जा सकता है कि किस तरह से बिना कफ़न या किसी कपड़े के लावरिशों की तरह यूँ ही उनका शरीर लोड कर पोस्टमॉर्टम के लिए ले जाया गया।
दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को रविवार (अप्रैल 19, 2020) को मीडिया को संबोधित करते हुए यह कहना भारी पड़ गया कि निजामुद्दीन मरकज में तबलीगी जमात के मजहबी आयोजन की वजह से, खासकर उनमें शामिल विदेशी नागरिकों के कारण आज दिल्ली इन विकट परिस्थितियों से जूझ रहा है। उनके इस बयान के बाद से वे कट्टरपंथियों के निशाने पर आ गए।
उनके बयान के तुरंत बाद इस्लामी कट्टरपंथियों ने ट्विटर पर उन पर हमला बोल दिया, क्योंकि वो निजामुद्दीन में तबलीगी जमातियों के गैर जिम्मेदाराना रवैया के लिए उन्हें जिम्मेदार ठहराने से खुश नहीं थे।
Dear CM @ArvindKejriwal ..We know your focus on particular community in every Interview and agenda behind it.. You r the first person who communalise this Health crisis to divert your failure but gain sympathy of ur target voters..!! Time will Expose you more !! https://t.co/BTfIGRgFsJ
No. It’s paying the price of your master’s delayed response. Its paying the price of electing you Kejriwal. What a disappointment of a human being. https://t.co/Zaw4fp0yNt
सिर्फ सच्चाई को बताने के लिए उनके ऊपर इस्लामोफ़ोबिया तक का भी आरोप लगाया गया।
U r bigot Islamophobic hypocrite @ArvindKejriwal India is bleeding coz f CM lik u Mr. Kejriwal and PM lik Mr. Modi Indian Muslims are facing open state sponsored hatred & terrorism in this epidemic@cjwerlemanhttps://t.co/21OjdaEqPy
इसका मतलब है कि दिल्ली में कुल कोरोना वायरस पॉजिटिव मामलों में से 63.27% तबलीगी जमात से जुड़े हुए हैं। इन आँकड़ों को देखते हुए यह कहना गलत नहीं होगा कि दिल्ली ने निजामुद्दीन मरकज में आयोजित मजहबी सभा के लिए एक बड़ी कीमत चुकाई है।
तबलीगी जमात
तब्लीगी जमात का आयोजन मार्च के दूसरे सप्ताह में हुआ था, जिसमें भारत और देश के अन्य हिस्सों के साथ ही विदेशों से आए लोग शामिल हुए थे। यह भारत में कोरोना वायरस का मेगा-स्प्रेडर बन गया है, क्योंकि भारत में एक-तिहाई से अधिक मामले अब उस घटना से जुड़े हैं। जो लोग इस कार्यक्रम में शामिल हुए थे, वो और उनके परिवार के सदस्य एवं उनके संपर्क में आए लोगोंं का परीक्षण किया जा रहा है। इसमें से अधिकतर लोग कोरोना पॉजिटिव पाए गए। इस कारण देश में कोरोना वायरस के मामलों में बड़ी तेजी से वृद्धि हुई है।
जमशेदपुर में गाँजा बेचने से मना करने पर एक व्यक्ति ने अपने साथियों के साथ उसके घर जाकर हमला कर दिया। यह घटना आजादनगर ओल्ड पुरुलिया रोड नम्बर एक की है, जहाँ तनवीर रहमत को गाँजा बेचने का विरोध करना महँगा पड़ गया।
गाँजा बेचने का विरोध करने पर नुरुल हक़ ने अपने कुछ साथियों के साथ तनवीर रहमत के घर जाकर उस पर हमला किया। वो अपने पाँच-सात साथियों के साथ जब तनवीर के घर पहुँचा तो शोर करने पर वह भाग खड़े हुए।
इस हमले में घायल तनवीर का इलाज एमजीएम अस्पताल में चल रहा है। उन्होंने बताया कि इस हमले के बाद वहाँ पुलिस भी पहुँची। हमलावरों में से एक को पुलिस पकड़कर भी ले गई हालाँकि, बाद में उसे छोड़ दिया गया।
दैनिक भास्कर में प्रकाशित रिपोर्ट
तनवीर के अनुसार, देशव्यापी बन्द के बावजूद भी नुरूल हक़ अपनी दुकान से गाँजा बेच रहा है। उन्होंने इस बारे में विरोध के बाद नजदीकी थाने में शिकायत भी की थी। इसके बाद शनिवार (अप्रैल 09, 2020) रात 9 बजे तनवीर जब अपने घर से निकले, नुरुल हक़ ने अपने साथियों के साथ लाठी-डंडों से उन पर हमला कर दिया।
लॉकडाउन के बाद भी झारखंड में गाँजे का व्यापार पुलिस के लिए सरदर्द बना हुआ है। गत माह ही बहरागोड़ा थाना क्षेत्र के कालियाडिंगा चौक पर एनएच-18 पर पुलिस ने करीब पाँच लाख रुपए का 81 किलोग्राम गाँजा बरामद किया था।
पुलिस ने बताया कि वाहन चेंकिंग के दौरान एक स्कॉर्पियो को रोका गया, जिसमें से 62 पैकेट में कुल 81 किलो गाँजा बरामद किया गया। इस दौरान स्कॉर्पियो सवार तीन तस्करों को भी गिरफ्तार किया गया है।
पकड़े गए तीनों तस्कर अंतरराज्यीय गाँजा तस्कर गिरोह के सदस्य थे, जो बिहार के पटना जिला अंतर्गत फतूहा के रहने वाले हैं।
कॉन्ग्रेस पार्टी विरोधाभासों की जननी है। पार्टी जहाँ एक तरफ केंद्र सरकार से कुछ और माँग करती है, वहीं दूसरी तरफ राज्यों में उसकी सरकारें अपनी ही पार्टी की माँगों के विपरीत काम करती है। कोरोना वायरस के बीच भी पार्टी राजनीति करने से बाज नहीं आ रही है। अब इ-कॉमर्स कंपनियों द्वारा सामानों की डिलीवरी को लेकर पार्टी ने राजनीति की है। पूर्व केंद्रीय मंत्री अजय माकन ने कहा था कि केंद्र सरकार को इ-कॉमर्स वेबसाइटों को केवल ज़रूरी सामग्रियों के वितरण की ही अनुमति देनी चाहिए। शनिवार (अप्रैल 18, 2020) को अजय माकन ने ये कहा था।
माकन ने गृह मंत्रालय से ये स्पष्ट करने को कहा था कि क्या 20 अप्रैल के बाद से लॉकडाउन में ढील के दौरान इ-कॉमर्स वेबसाइट सिर्फ़ ज़रूरी सामग्रियों का वितरण करेंगे, या फिर अन्य चीजें भी डिलीवर हो सकेंगी। उन्होंने रिटेल ट्रेडरों का दुःख सरकार के समक्ष रखने का दावा किया था। उन्होंने दावा किया था कि छोटे व्यापारियों के लिए मोदी सरकार के दिशा-निर्देशों ने चिंता खड़ी कर दी है। उन्होंने कहा कि दुकानदारों को सिर्फ़ ज़रूरी सामग्रियाँ बेचने की इजाजत दी गई है तो फिर ऑनलाइन ट्रेडर्स अन्य आइटम्स कैसे बेच सकते हैं?
अब आते हैं केंद्र सरकार के ऑर्डर पर, जिसके बाद हम बात करेंगे कि ऑफलाइन ट्रेडर्स मोदी सरकार के बारे में क्या सोचते हैं। केंद्र सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि ऑनलाइन ट्रेडर्स केवल ज़रूरी वस्तुओं की डिलीवरी ही कर सकते हैं। दुकानदारों और इ-कॉमर्स कंपनियों, दोनों के लिए यही नियम हैं। यानी, जो वस्तुएँ ज़रूरी सामग्रियों के अंतर्गत नहीं आती, वो न तो बेची जा सकेगी और न ही उसकी ऑनलाइन डिलीवरी हो सकेगी। ऐसे में छोटे व खुदरा व्यापारियों के साथ अन्याय होने का सवाल ही नहीं है।
इसलिए, ऑनलाइन ट्रेडर्स एसोसिएशन ने मोदी सरकार के निर्णय के लिए उसकी भूरि-भूरि प्रशंसा की है। एसोसिएशन ने 7 करोड़ व्यापारियों की ओर से मोदी सरकार को धन्यवाद दिया है। उन्होंने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को भी लिखा है कि मंत्रालय ने छोटे व्यापारियों के हितों की रक्षा करने का काम किया है, जिसके लिए वो उनके आभारी हैं। एसोसिएशन ने कहा कि भारत सरकार का ये निर्णय दिखाता है कि किसी भी मल्टीनेशनल कम्पनी के आगे सरकार छोटे व्यापारियों के हितों को ज्यादा प्राथमिकता देती है। उनका ठेकेदार बन कर घूम रहे अजय माकन को इससे ज़रूर निराशा होगी।
अब आते हैं कॉन्ग्रेस शासित राज्यों पर। राजस्थान सरकार के आदेश में साफ़ लिखा है कि इ-कॉमर्स कंपनियाँ सभी वस्तुओं की डिलीवरी कर सकती है। इसमें ज़रूरी या अन्य चीजों का कोई जिक्र नहीं है। सीधा स्पष्ट लिखा है कि सभी सामग्रियों की होम डिलीवरी की अनुमति रहेगी। ऐसी कंपनियों को उनकी सेवाएँ देने की स्वतंत्रता रहेगी और उन्हें प्रोत्साहन देने की बात भी कही गई है। राजस्थान में कॉन्ग्रेस छोटे व्यापरियों की अनदेखी क्यों कर रही है?
राजस्थान सरकार और कॉन्ग्रेस पार्टी में विरोधाभास
महाराष्ट्र सरकार ने तो स्पष्ट कर दिया कि इलेक्ट्रॉनिक्स और इलेक्ट्रिकल वस्तुओं की डिलीवरी भी ऑनलाइन कंपनियों द्वारा की जा सकेगी। महाराष्ट्र में शिवसेना के नेतृत्व वाली अपनी गठबंधन सरकार के ख़िलाफ़ कॉन्ग्रेस क्यों नहीं आवाज़ उठा रही है? वहाँ छोटे व्यापारी नहीं हैं क्या? मोदी सरकार ने उनके हितों की रक्षा की तो कॉन्ग्रेस ने तरह-तरह के आरोप लगाए। अपने शासन वाले राज्यों में जब छोटे व्यापारियों के हितों की अनदेखी हो रही तो पार्टी चुप क्यों है?
महाराष्ट्र में ऑनलाइन सामानों की डिलीवरी की अनुमति दी गई
सार ये कि कॉन्ग्रेस पार्टी का मानना है कि इ-कॉमर्स वेबसाइटों को केवल ज़रूरी सामग्रियों की ऑनलाइन डिलीवरी की अनुमति देनी चाहिए, बाकी वस्तुओं की नहीं। केंद्र सरकार ने भी यही किया।लेकिन, कॉन्ग्रेस का निशाना फिर भी मोदी सरकार ही है। राजस्थान की कॉन्ग्रेस सरकार और महाराष्ट्र की शिवसेना-एनसीपी-कॉन्ग्रेस सरकार ने ऐसा नहीं किया, लेकिन फिर भी पार्टी उनके ख़िलाफ़ नहीं बोल रही तभी तो, कॉन्ग्रेस विरोधाभासों की जननी है।
अम्बेडकरनगर में बिस्किट लेने दुकान पर गए रिजवान (Rizwan) की पुलिस की पिटाई से मौत की खबर का अम्बेडकरनगर पुलिस ने खंडन किया है। पुलिस ने रिजवान का इलाज करने वाले डॉक्टर का वीडियो जारी किया है। इसमें डॉक्टर ने स्पष्ट किया है कि रिजवान की मौत पुलिस के मारने से नहीं बल्कि मोटरसाइकल से गिरने से हुई थी।
दावा: बिस्कुट लेने गए थे रिजवान जब पुलिस की पिटाई से हुई मौत
हाल ही में कुछ प्रमुख मीडिया संस्थानों ने एक खबर प्रकाशित की, जिसमें बताया गया था कि उत्तर प्रदेश के अम्बेडकरनगर जिले में 19 साल के रिजवान नाम के एक युवक की मौत हुई। उनके परिवार के लोगों का आरोप था कि रिजवान अपने घर से जरूरी सामान लेने के लिए निकले थे, जिसके बाद पुलिस ने उनकी पिटाई की थी।
यहाँ तक कि रिजवान की मौत के मामले में मृतक के पिता इसराइल (Israil) ने टांडा कोतवाली में अज्ञात पुलिसकर्मियों के खिलाफ तहरीर देकर कार्रवाई तक की माँग की थी।
मृतक रिजवान के पिता ने कहा कि अम्बेडकरनगर के छज्जापुर इलाके का निवासी रिजवान वहाँ के ताज टॉकीज के पास बिस्किट लेने गए था। इसी दौरान वहाँ पुलिसकर्मियों ने उनकी पिटाई कर दी, जिसके कारण उन्हें गंभीर चोट आई। उनके पिता का कहना था कि घायल अवस्था में ही युवक को हालत बिगड़ने पर तत्काल जिला अस्पताल शिफ्ट कर दिया गया था। जहाँ इलाज के दौरान ही शुक्रवार रात रिजवान की मौत हो गई।
क्या है सच्चाई
अम्बेडकरनगर पुलिस रिजवान के साथ ही उनके पिता इसराइल द्वारा पुलिस पर लगाए गए आरोपों की सच्चाई उनके परिवार के डॉक्टर के माध्यम से सामने लेकर आई है। अम्बेडकरनगर पुलिस ने ट्विटर पर एक वीडियो को तीन भागों में ट्वीट किया है, जिसमें रिजवान के घर के डॉक्टर ने खुद बताया है कि रिजवान चरस-भाँग का नशा करता था और उनकी मौत पुलिस की पिटाई से नहीं हुई।
अब्दुल हक़ीम ने बताया कि उनकी क्लीनिक छज्जापुर में है। रिजवान की फूफी उनके पास गई थीं, जिसने बताया कि रिजवान की मोटर साइकल से गिरने के बाद चोट आई है। जब डॉक्टर अगली सुबह रिजवान के घर उसे देखने गए तो उनके दाहिने पैर में जाँघ के हिस्से में चोट लगी थी, जबकि बाएँ पैर में सूजन थी।
— AMBEDKARNAGAR POLICE (@ambedkarnagrpol) April 19, 2020
डॉक्टर ने कहा कि उन्होंने चोट की गंभीरता को देखते हुए रिजवान और उनके परिवार को एक्स-रे लेने और पूरा इलाज कराने के लिए अस्पताल जाने की सलाह दी। लेकिन पुलिस के मारने की बात उन्होंने नहीं की। डॉक्टर ने कहा:
मैंने उनसे जब पूछा कि मोटरसाइकिल पर ऐसे क्यों बैठते हो कि ऐसी चोट लगी तो घर पर किसी ने भी पुलिस के मारने की बात नहीं कही, ना ही पुलिस के मारने जैसी बात के बारे में बाहर मोहल्ले में किसी को पता है। घर पर भी बस मोटरसाइकल से गिरने की ही बात थी।
इसके आगे इस वीडियो को बना रहे व्यक्ति ने डॉक्टर से मृतक रिजवान के आचरण के बारे में पुछा तो उन्होंने कहा- “लड़के को उसके बाप ने घर से निकाला हुआ था। वो ठेला चलाता था और मोहल्ले में रहता था, घर नहीं जाता था। उसके बारे में ये खबरें भी हैं कि चरस वगैरह भी पीता है, या जो इंजेक्शन होते हैं नशे के उन्हें भी लेता है। बहुत दुबला-पतला था। एक झापड़ मारो तो मर जाएगा।”
‘रिजवान को मोटरसाइकल से गिरने से जो चोट लगी थी, उससे वो मर सकता था’
पुलिस ने बाईट देते हुए कहा है- “स्थानीय डॉक्टर का बयान लिया गया है, CCTV भी जाँच की गई, लेकिन पुलिस द्वारा पिटाई की बात कहीं भी सामने नहीं आई है। मृतक की पोस्टमॉर्टेम रिपोर्ट भी आ चुकी है, जिसमें उनके शरीर पर कहीं भी चोट या लाठी का निशान नहीं था। उनके फेफड़े और दिल में इन्फेक्शन था और जो मोटरसाइकल से गिरने की बात आई थी, वह एकदम सही थी।”
— AMBEDKARNAGAR POLICE (@ambedkarnagrpol) April 19, 2020
The Hindu, The Telegraph और कश्मीर वाला ने लगाए पुलिस पर आरोप
रिजवान नाम के इस युवक की बात पर तत्परता से ‘संज्ञान’ लेने वाले द टेलीग्राफ और द हिन्दू ने इस खबर में पुलिस पर आरोप लगाए थे। उल्लेखनीय है कि ये वही टेलीग्राफ है, जिसे कल ही एक ऐसी खबर में आरएसएस को बदनाम करने की साजिश करते हुए देखा गया, जिसमें आरोपित एक मुस्लिम युवक था।
अक्सर देखा जाता है कि इस प्रकार की घटनाओं में महज मुस्लिम समुदाय का जिक्र होने के कारण टेलीग्राफ जैसे वामपंथी समाचार पत्र पुलिस से लेकर समाज के एक वर्ग को भी कटघरे में खड़े कर देते हैं। हालाँकि, हर बार इसी तरह से और इतनी जल्दी सच्चाई सामने नहीं आ पाती है।
रिजवान के पिता इजराइल ने पुलिस पर आरोप लगाते हुए विक्टिम कार्ड खेलने की कोशिश की, जिसमें उनका साथ देने के लिए वामपंथी मीडिया हमेशा तैयार बैठा रहता है। खासतौर पर देशव्यापी बंद के दौरान मीडिया ने पुलिस के आचरण को गलत साबित करने के अथक प्रयास किए हैं।
डॉक्टर पीयूष पुष्कर दिल्ली के हिन्दू राव हॉस्पिटल में रेजिडेंट डॉक्टर हैं। वे लगातार प्रताड़ना के शिकार हैं। उन्हें प्रताड़ित कोई और नहीं बल्कि उनका ही कॉलेज और नॉर्थ दिल्ली म्युनिसिपल कॉरपोरेशन कर रहा है। सोशल मीडिया पोस्ट्स को लेकर उनके ख़िलाफ हॉस्पिटल में साजिश रची जाती है। हालॉंकि सरकार के ख़िलाफ़ उन्होंने कुछ नहीं लिखा है।
डॉ. पीयूष पुष्कर का कहना है कि वे सरकार के साथ मिलकर काम करना चाहते हैं। कोरोना से निपटने में सरकार की मदद करना चाहते हैं। तमाम संघर्ष करते हुए उन्होंने पीपीई किट के लिए सीधा मैन्युफैक्चरर से संपर्क किया और अपने स्तर से जितना हो सकते ख़रीद कर डॉक्टरों की मदद की।
कथित तौर पर नॉर्थ दिल्ली म्युनिसिपल कॉरपोरेशन की कमिश्नर वर्षा जोशी उन्हें सार्वजानिक तौर पर ‘चोर’ और ‘धोखेबाज’ कह कर संबोधित करती हैं। एनबीई (नेशनल बोर्ड ऑफ एक्सामिनेशन्स) से क्लीनचिट मिलने के बावजूद उनके साथ ऐसा हो रहा। इसकी वजह से डॉ. पीयूष डिप्रेशन के शिकार रहे हैं। वे कई रातों से सोए तक नहीं हैं।
इस संबंध में बात करते हुए डॉ. पीयूष पुष्कर भावुक हो जाते हैं और रो पड़ते हैं। वे कोरोना से निपटने में सरकार की मदद कर रहे हैं, लेकिन प्रशासन उन्हें ही दुष्प्रचार करने वाला बताता है। उन्हें बार-बार अपमानित किया जाता है। क्लीनचिट मिलने के बाद वर्षा जोशी ने फिर से उनके लिए अभद्र भाषा का प्रयोग किया। हॉस्पिटल की एमएस (मेडिकल सुपरिटेंडेंट) उन्हें ‘गेट लॉस्ट’ कह कर बिना कुछ कहे-सुने भगा देती हैं।
डॉक्टर पीयूष पुष्कर हिन्दू राव हॉस्पिटल में डीएनबी ऑर्थोपेडिक सर्जरी रेजिडेंट हैं। वे ‘रेजिडेंट डॉक्टर्स ऑफ हिन्दू राव’ के अध्यक्ष भी हैं। कुछ दिनों पहले की बात है, जब एक एनजीओ ने हॉस्पिटल को कुछ पीपीई किट डोनेट किया। उन्होंने इसे रिसीव किया और डॉक्टरों के बीच वितरित किया।
लेकिन, वर्षा जोशी को यह पसंद नहीं आया। उन्होंने इसे अपने इगो का मामला बना लिया और हाथ धो के डॉक्टर पुष्कर के पीछे पड़ गईं। उन्हें सोशल मीडिया पर चोर तक कहकर सम्बोधित किया गया और हॉस्पिटल की गरिमा पहुँचाने का आरोप लगाया गया।
इसके बाद डॉक्टर पीयूष पुष्कर के टर्मिनेशन का ऑर्डर जारी कर दिया गया। लेकिन, वर्षा जोशी ने जैसा सोचा था, एकदम से वैसा नहीं हुआ। ‘दिल्ली मेडिकल एसोसिएशन’ सहित देश के कई अन्य हिस्सों में डॉक्टरों ने उनके इस क़दम का विरोध किया। इस मामले को केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉक्टर हर्षवर्धन के समक्ष भी उठाया गया।
‘नेशनल बोर्ड ऑफ एग्जामिनेशंस’ ने उनके टर्मिनेशन ऑर्डर को रद्द कर दिया। लेकिन, ऊपर से आदेश आने के बावजूद हॉस्पिटल उन्हें ड्यूटी ज्वाइन नहीं करने दे रहा है। नीचे आप ‘डॉक्टर मोनिका फाउंडेशन’ द्वारा डोनेट किए गए पीपीई किट से संबंधित कागज़ देख सकते हैं:
डोनेशन पूरे पारदर्शी तरीके से किया गया
डॉ. पीयूष पुष्कर के टर्मिनेशन का आदेश नॉर्थ दिल्ली म्युनिसिपल कॉरपोरेशन की तरफ से आया। इसमें लिखा है कि ऑर्थोपेडिक डिपार्टमेंट के डीएनबी छात्र डॉक्टर पीयूष पुष्कर को हॉस्पिटल की गरिमा को ठेस पहुँचाने के आरोप में उनकी सेवा से टर्मिनेट किया जाता है। आदेश के साथ ही उनके त्वरित टर्मिनेशन की बात लिखी हुई है। नीचे आप डीएमसी द्वारा जारी किए गए टर्मिनेशन ऑर्डर को देख सकते हैं, जिस पर हिन्दू राव हॉस्पिटल के मेडिकल सुपरिटेंडेंट का हस्ताक्षर हैं:
डीएमसी द्वारा जारी किया गया टर्मिनेशन का आदेश
इस आदेश को रिसीव करने वालों में डॉक्टर पीयूष का नाम इसीलिए है, क्योंकि वो DRA के अध्यक्ष भी हैं। इस पर अप्रैल 15, 2020 की तारीख अंकित है। डोनेशन वाले दस्तावेज पर भी डॉक्टर पुष्कर का नाम है। वो प्रक्रिया पूरे वैध तरीके से हुई थी।
हालाँकि, इसके बाद NBE ने इस टर्मिनेशन ऑर्डर को रद्द कर दिया। एनबीई ने लिखा कि डॉक्टर पुष्कर हिन्दू राव हॉस्पिटल में ‘स्पेशलिटी ऑफ ऑर्थोपेडिक सर्जरी’ में पोस्ट एमबीबीएस डीएनबी सीट मिली है। दिसंबर 2019 में उन्होंने फाइनल थ्योरी एग्जाम दी थी।
एनबीई ने हॉस्पिटल द्वारा दिए गए सारे दस्तावेजों की जाँच के बाद पाया कि इस मामले को टर्मिनेशन से पहले ‘ग्रीवांस रेड्रेसल कमिटी’ के पास नहीं ले जाया गया, जो कि इस प्रक्रिया की सबसे बड़ी खामी की ओर इशारा करता है। यानी, ‘प्रिंसिपल नेचर ऑफ़ जस्टिस’ को नज़रंदाज़ किया गया। इसी आधार पर उनका टर्मिनेशन ग़लत पाया गया और उन्हें फिर से बहाल कर दिया गया।
उन्हें 20 अप्रैल से फिर से अपनी ड्यूटी ज्वाइन करने को कहा गया। लेकिन, हॉस्पिटल ने अड़ंगा लगाना शुरू कर दिया और उन्हें ज्वाइन करने नहीं दिया जा रहा है।
यह भी कहा जा रहा है कि बिना जाँच के सीधा टर्मिनेट कर देना एक बहुत ही क्रूर निर्णय था। उन्हें रिजाइन करने को भी कहा जा सकता था। एनबीई के आदेश के बावजूद हॉस्पिटल उन्हें वापस नहीं ले रहा है, जो फिर से नियमों का उल्लंघन है। टर्मिनेट करने से पहले उनसे कोई स्पष्टीकरण भी नहीं माँगा गया था। न तो उन्हें अपनी बात रखने का मौका दिया गया और न ही उचित जाँच की गई।
वहीं वर्षा जोशी का आरोप है कि डॉ. पीयूष पुष्कर ने एनजीओ से हॉस्पिटल अथॉरिटी बनकर कांटेक्ट किया, जबकि मेडिकल सुपरिटेंडेंट पहले से ही संपर्क में थीं। उनके आरोप हैं कि पीपीई के स्टॉक का वितरण करना उनके अधिकार क्षेत्र में नहीं आता है।
एनबीई ने बीएमसी के आदेश पर लगाईं रोक, फिर से बहाल किया
एक वकील ने इस संबंध में मुख्य न्यायाधीश जस्टिस बोबडे को भी पत्र लिखा। उन्होंने सीजेआई से इस मामले में हस्तक्षेप की माँग की थी। इधर डॉक्टर पीयूष पुष्कर ने आरोपों का जवाब देते हुए कहा कि उस एनजीओ ने ही उनसे संपर्क किया था। उन्होंने इस सम्बन्ध में हॉस्पिटल के पदाधिकारियों को सूचित कर दिया था।
उन्होंने कहा कि अगर कोई एनजीओ उनके नाम पर कुछ डोनेट करता है तो क्या उन्हें उसके वितरण का अधिकार नहीं है? वर्षा जोशी का कहना है कि पहले पीपीई किट हॉस्पिटल स्टोर में जाना चाहिए था। वहीं डॉक्टर पुष्कर का कहना है कि रेजिडेंट डॉक्टरों ने ऐसा करने से मना किया था, क्योंकि स्टोर में जाने के बाद उसका ठीक से वितरण हो ही नहीं पाता है।
यहाँ बात ये है कि जब रेजिडेंट डॉक्टरों की यही राय थी, एनजीओ ने पीपीई किट डोनेट किया और वितरण के समय वहाँ मौजूद था, तो फिर कमिश्नर वर्षा जोशी को क्या दिक्कत आ गई? एक डॉक्टर के करियर के साथ क्यों खेला जा रहा है?
डॉक्टर पीयूष कहते हैं कि वो हॉस्पिटल के भले की सोच रहे हैं। अगर ऐसा नहीं होता तो वो अपने रुपयों से पीपीई किट नहीं ख़रीदते। उन्होंने इतना कुछ होने के बावजूद सार्वजनिक तौर पर कभी हॉस्पिटल के ख़िलाफ़ कुछ नहीं कहा, फिर उन्हें बदनाम क्यों किया जा रहा है?
उन्होंने पीपीई के बारे में पूरा अध्ययन किया। ‘कोरोना टास्क फोर्स’ में उन्होंने अपनी टीम के साथ ड्यूटी के इतर समय और संसाधन देकर जनसेवा की और सरकार की मदद करने का प्रयास किया।
डॉक्टर पीयूष ने बताया कि उन्हें 5 महीने से कोई सैलरी नहीं मिली है। वो घर से रुपए माँग कर काम कर रहे हैं। उनके घर पर उनकी माँ काफी परेशान है। बावजूद इसके लगातार उन्हें प्रताड़ित किया जा रहा है। उन्होंने बताया कि वो भले ही वापस ज्वाइन कर लें, लेकिन उन्हें फिर से प्रताड़ित किया जाएगा। उनके ख़िलाफ़ कुछ और मुद्दे खोज कर निकाले जाएँगे, ताकि उन्हें फिर से किसी बहाने बाहर निकाला जा सके। ‘ग्रिवांस एड्रेसल सेल’ में भी कमिश्नर, एमएस और उनके लोग ही बैठे हुए हैं। ऐसे में वहाँ से न्याय की उम्मीद ही नहीं है।
पूर्व कॉन्ग्रेस नेता मौलाना अबुल कलाम आज़ाद के पोते और मौलाना आज़ाद नेशनल उर्दू यूनिवर्सिटी (MANUU) के कुलपति फिरोज बख्त अहमद ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक पत्र लिखा है। इसमें पूरे रमज़ान महीने के लिए 24 मई तक लॉकडाउन का विस्तार करने का आग्रह किया है। फिरोज बख्त अहमद ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर 3 मई को लॉकडाउन नहीं हटाने का अनुरोध किया है, क्योंकि उन्हें डर है कि रमजान महीने के दौरान कोरोना वायरस तेजी से फैल सकता है।
उन्होंने पीएम को लिखे गए अपने पत्र में लिखा, “24 मई, 2020 तक पूरे रमजान महीने के लिए लॉकडाउन का विस्तार करने के लिए सरकार को यह एक सुझाव है। आपसे अनुरोध है कि सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए रमजान माह समाप्त होने के दिन यानी 24 मई तक लॉकडाउन को नहीं हटाना चाहिए। अगर इसे 3 मई को हटाया जाता है, तो ऐसे समय में कोरोना भारत में अपने चरम पर पहुँच जाएगा। बेकाबू मुस्लिम (जैसा कि तबलीगी जमात के अनुयायियों के मामले में देखा गया है) बाजारों में भीड़ लगाना शुरू कर देंगे और प्रधानमंत्री के निर्देशों की अवहेलना करते हुए इफ्तार पार्टियों और नमाज सभाओं को आयोजित करके कोरोना को फैलाएँगे।”
फिरोज बख्त अहमद द्वारा लिखा गया पत्र
उन्होंने अपने पत्र में आगे लिखा, “यह मेरा आपसे बहुत विनम्र निवेदन है। कानून-पालन करने वाले भारतीय मुस्लिम के रूप में, मैं भारत में क्वारंटाइन में रखे गए अपने समुदाय से संबंधित उन सभी लोगों की ओर से माफी माँगता हूँ, जो डॉक्टरों, नर्सों, स्वास्थ्यकर्मियों, पुलिस, सफाई कर्मचारियों आदि पर हिंसा करते हुए नजर आ रहे हैं। जब भी मैं थूकने जैसी अत्यधिक निंदनीय घटना, अस्पताल के कर्मचारियों (खासकर नर्सों) के साथ अभद्र व्यवहार, टॉयलेट की बोतलों को फेंकना और कोरोना वायरस के उपचार के लिए सहयोग ना देने जैसी बातों को देखता हूँ तो मेरा सिर शर्म से झुक जाता है।“
इन दिनों तबलीगी जमात के कई शर्मनाक कृत्य सामने आ रहे हैं, मगर इसके बावजूद कुछ मीडिया गिरोह इनके बचाव के लिए खड़ी है और कहती है कि इसे हिन्दू-मुस्लिम से जोड़कर न देखा जाए। मगर हाल ही में भारत रत्न मौलाना अबुल कलाम आजाद के पोते ने कहा कि उन्हें उनकी गतिविधियों के कारण मुस्लिम होने पर शर्म महसूस होती है।
उन्होंने यह भी कहा कि ये जमाती और कई और कई अन्य लोग प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा दिए गए गोल्डेन मंत्र-“जनता कर्फ्यू”, “लक्ष्मण रेखा” और “जान है तो जहान है” का उल्लंघन कर रहे हैं।उन्होंने तो यहाँ तक कह दिया कि एक सच्चे “तबलीग” को इन तीनों निर्देशों को मस्जिदों से दिन में पाँच बार अनाउंस करना चाहिए था। इससे पहले, उन्होंने मुस्लिमों से अपील की थी कि वे उन राजनेताओं के बहकावे में न आएँ, जो सीएए विरोधी प्रोपेगेंडा के नाम पर भारत को तोड़ना चाहते थे।