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पुलवामा हमले की पहली बरसी: वीरगति की 11 कहानियाँ, कोई जन्मदिन मनाकर लौटा था तो किसी की थी सालगिरह

14 फरवरी 2019। जम्मू-श्रीनगर राष्ट्रीय राजमार्ग पर सीआरपीएफ का काफिला सामान्य दिनों की तरह ही गुजर रहा था। अचानक एक कार ने सड़क की दूसरी तरफ से आकर काफिले के साथ चल रहे वाहन में टक्‍कर मार दी। इसके साथ ही एक जबरदस्‍त धमाका हुआ। मौके पर ही सीआरपीएफ के करीब 40 जवान वीरगति को प्राप्त हो गए। हमले की पहली बरसी पर पूरा देश उन वीर जवानों को याद कर रहा है। हम आपके लिए लेकर आए हैं हमले में वीरगति को प्राप्त करने वाले जवानों की कुछ चुनिंदा कहानियॉं,

जन्मदिन मनाकर लौटे ही थे नसीर अहमद

पुलवामा में बलिदान हुए नसीर अहमद फिदायीन हमले से एक दिन पहले ही अपना 46 वाँ जन्मदिन मनाकर ड्यूटी पर वापस लौटे थे। 22 साल सेना को दे चुके नसीर उस बस के कमांडर थे, जिसे आत्मघाती हमले में निशाना बनाया गया। नसीर का पार्थिव शरीर जब उनके गाँव पहुँचा तो दोदासन देशभक्ति के नारों से गूँज उठा था। वहाँ मौजूद हर शख्स के चेहरे पर आतंकियों को लेकर गुस्सा था। नसीर का बेटा बार-बार बस यही दोहरा रहा था कि पहले वो पापा की मौत का बदला लेगा फिर अपना जन्मदिन मनाएगा।

संजय ने खुद बढ़वाई थी नौकरी के 5 साल

पुलवामा में वीरगति को प्राप्त हुए संजय राजपूत 20 साल की सेवा पूरी करने के बाद भी देश के लिए अपनी सेवा को पाँच वर्ष के लिए आगे बढ़वाया था। मगर उन्हें क्या मालूम था उनका यह फ़ैसला उन्हें हमेशा के लिए परिवार से दूर कर देगा। संजय के दो बच्चे हैं, जिनकी उम्र 13 और 10 साल है। उनके परिवार में चार भाई और एक बहन हैं। एक भाई को पहले ही परिवार एक्सिडेंट में खो चुका है।

‘बेटे को करूँगी सेना को समर्पित’

अपने घर के इकलौते कमाने वाले नितिन राठौर 14 फरवरी को हुए आत्मघाती हमले में वीरगति को प्राप्त हो गए। महज 23 की उम्र में साल 2006 में सीआरपीएफ में शामिल होने वाले नितिन के घर में उनकी पत्नी वंदना, बेटा जीवन, बेटी जीविका माँ सावित्री बाई, पिता शिवाजी, भाई प्रवीण समेत दो बहनें हैं। नितिन के वीरगति के प्राप्त होने की ख़बर सुनने के बाद गाँव के लोगों ने अपने घरों में खाना नहीं बनाया। वहीं वीर की पत्नी ने हिम्मत दिखाते हुए कहा था कि वो अपने बेटे को भी सेना को समर्पित करेंगी क्योंकि यह उनके पति (नितिन) का सपना था।

वीर कुलविंदर की अंतिम यात्रा में पहुँचीं थी मंगेतर

कुलविंदर सिंह 14 फरवरी 2019 को पुलवामा में आतंकियों के कायरतापूर्ण हमले में वीरगति को प्राप्त हो गए। कुलविंदर अपने माता-पिता के इकलौती संतान थे। कुलदीप की आठ नवंबर को शादी होनी तय थी। इस खबर को सुनकर उनकी मँगेतर अमनदीर कौर ससुराल आई और भारत माता के वीर सपूत की अंतिम यात्रा में शामिल हुई। उन्होंने वीरगति को प्राप्त अपने मंगेतर के पार्थिव शरीर को सैल्यूट ठोक शत्-शत् नमन किया। कुलविंदर सिंह के पिता दर्शन सिंह यह मानने को तैयार ही नहीं थे कि उन्होंने अपने जवान बेटे को सदा के लिए खो दिया है। उन्होंने हमले वाले दिन से ही अपने बेटे की वर्दी पहन रखी थी। उनके इस जोश को देख कर अन्य लोग भी अभिभूत थे।

छिन गया सबसे छोटा बेटा

अश्वनी कुमार काछी भी पुलवामा में हुए हमले में वीरगति को प्राप्त हो गए। अश्वनी कुमार काछी परिवार के सबसे छोटे बेटे थे। चार भाइयों में सबसे छोटे अश्वनी की पहली पोस्टिंग साल 2017 में श्रीनगर में हुई थी। उनके बुज़ुर्ग पिता ने कहा कि उन्हें अपने बेटे की मृत्यु पर गर्व है, लेकिन यक़ीन नहीं होता कि वो अब इस दुनिया में नहीं है। अश्वनी कुमार घर के एकमात्र कमाऊ पूत थे। अश्वनी की माँ अपने पाँचों बच्चों के भरण-पोषण के लिए बीड़ी बनाने का कार्य किया करती थी। जब अश्विनी की नौकरी लगी, तब उन्होंने अपनी माँ से बीड़ी बनाने वाला कार्य छुड़वा दिया था।

बेटी की शादी के लिए लड़का देखने जाने वाले थे संजय

पुलवामा आतंकी हमले में वीरगति को प्राप्त बिहार के संजय कुमार सिन्हा को अपनी बड़ी बेटी रूबी की शादी की फ़िक्र सता रही थी। वापस ड्यूटी पर जाते वक़्त उन्होंने घरवालों से दोबारा आने का वादा किया था। संजय ने कहा था कि वह घर लौटते ही बेटी के लिए लड़का देखने जाएँगे। घरवाले भी उनका बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे। लेकिन जब उनके वीरगति को प्राप्त होने की सूचना मिली, पूरा परिवार ही स्तब्ध रह गया और गाँव में मातम पसर गया। जब उनकी मृत्यु का समाचार आया, तब उनकी पत्नी बबीता भोजन कर रही थी। यह दुःखद सूचना मिलते ही थाली उनके हाथों से गिर पड़ी और वह दहाड़ मार कर रोने लगी।

सालगिरह के दिन वीरगति को प्राप्त हुए थे तिलक राज

हिमाचल प्रदेश स्थित कांगड़ा के सीआरपीएफ जवान तिलक राज 14 फ़रवरी को पुलवामा हमले में वीरगति को प्राप्त हो गए। जिस दिन उन्होंने मातृभूमि के लिए प्राण न्योछावर किए, उसी दिन उनकी चौथी मैरिज एनिवर्सरी भी थी। जब तत्कालीन केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जगत प्रकाश नड्डा तिलक के परिजनों से मिलने पहुँचे, तब सावित्री ने उनसे कहा- ‘साहब, मुझे भी सीआरपीएफ की नौकरी दे दो।‘ एक माह से भी कम उम्र के बच्चे को अपनी गोद में लेकर बैठी सावित्री की आवाज़ में गज़ब की दृढ़ता थी।

सबको सिसकियाँ भरने के लिए छोड़ गए विजय

पुलवामा आतंकी हमले में जान गँवा बैठे जवानों में एक नाम देवरिया के सीआरपीएफ जवान विजय कुमार मौर्य का भी है। विजय के इस हमले में शिकार होने के बाद उनके कई रिश्ते ताउम्र सिसकियाँ भरने के लिए पीछे छूट गए। इस हमले में सिर्फ़ देश की सेना का एक जवान ही नहीं बलिदान हुआ बल्कि बुजुर्ग पिता ने विजय के रूप में अपने घर के सबसे होनहार बेटे को गवाँ दिया। उस पत्नी का सुहाग भी उजड़ गया जिसके पास विजय की तीन साल की मासूम बच्ची है, जो अभी अपने पिता को ढंग से जान भी नहीं पाई थी। इसके अलावा दो भतीजियों की आस भी टूट गई, जिनकी जिम्मेदारी उनके पिता की मौत के बाद विजय ने ही उठाई हुई थी।

गर्भवती पत्नी को अकेला छोड़ गए वीर रतन ठाकुर

14 फरवरी को पुलवामा आतंकी हमले में वीरगति को प्राप्त हुए रतन ठाकुर अपनी गर्भवती पत्नी को अकेला छोड़कर चले गए थे। रतन के पिता निरंजन ने बताया कि दोपहर डेढ़ बजे रतन ने पत्नी राजनंदनी को फोन करके यह बताया था कि वो श्रीनगर जा रहे हैं और शाम तक वहाँ पहुँच जाएँगे। रतन ठाकुर ने अपनी पत्नी से होली पर आने का वादा किया था और इसी इंतज़ार में उनकी पत्नी के दिन कट रहे थे। बता दें कि रतन सिंह का चार साल का बेटा भी है जो कहता है कि उसके पिता ड्यूटी पर हैं। चार साल के इस बच्चे को हर पल अपने पिता का इंतज़ार रहता है।

4 दिन पहले ही ड्यूटी पर लौटे थे वीर अजीत कुमार

14 फरवरी को हुए आतंकी हमले में अजीत कुमार को उनके घरवालों ने हमेशा के लिए खो दिया। अजीत की उम्र मात्र 38 साल थी। चार दिन पहले ही अजीत अपनी छुट्टियाँ बिताकर ड्यूटी पर वापस लौटे थे। अजीत कुमार सीआरपीएफ की 115वीं बटालियन में तैनात थे। अजीत के वीरगति के प्राप्त होने की सुनने के बाद घर में कोहराम मच गया। अजीत के भाई रंजीत ने बताया कि एक महीने पहले ही उनके बड़े भाई अजीत छुट्टियों में घर आए थे, लेकिन 10 फरवरी को छुट्टी समाप्त होने पर वो जम्मू वापस लौट गए थे। किसे मालूम था कि अजीत के घरवालों की मुलाकात उनसे आखिरी है, इसके बाद वो तिरंगे में लिपट कर ही वापस आएँगे।

वीरगति को प्राप्त हुआ बनारस का लाल, माँ को है कैंसर

इस आतंकी हमले में अवधेश यादव भी वीरगति को प्राप्त हो गए थे। अवधेश यादव की माँ को कैंसर है। उनके बलिदान की सूचना पाकर तो जैसे परिजनों पर दुःखों का पहाड़ टूट पड़ा। अवधेश साल 2006 में सीआरपीएफ की 145वीं बटालियन में शामिल हुए थे। उनकी शादी तीन साल पहले ही हुई थी। उनकी पत्नी शिल्पी यादव ने बताया कि अवधेश तीन दिन पहले ही जल्दी लौटने का वादा कर ड्यूटी के लिए रवाना हुए थे। शिल्पी अपने तीन वर्ष के बेटे निखिल को कलेजे से लगा कर रो रही थी। रोती बिलखती शिल्पी यादव का रोते-रोते इतना बुरा हाल था कि वो बार-बार बेहोश हो रही थी। उनका बार-बार यही कहना था कि उन्हें विश्वास नहीं हो रहा कि उनके पति अब इस दुनिया में नहीं रहे।

हमले के बरसी पर केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने श्रद्धांजलि देते हुए कहा, “मैं पुलवामा हमले के शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ। भारत हमेशा हमारे बहादुरों और उनके परिवारों का आभारी रहेगा जिन्होंने हमारी मातृभूमि की संप्रभुता और अखंडता के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया।”

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ये लोग किस बात पर विरोध कर रहे हैं मुझे किसी ने बताया ही नहीं: अमित शाह

दिल्ली विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी की जीत और भाजपा को मिली हार के बाद अमित शाह ने कहा कि उनका आकलन इस बार गलत हो गया। ‘टाइम्स नाउ समिट’ कार्यक्रम के दौरान केंद्रीय गृह मंत्री ने कहा कि हम चुनाव सिर्फ जीत या हार के लिए नहीं लड़ते हैं। भाजपा एक ऐसी पार्टी है जो अपनी विचारधारा का विस्तार करने में विश्वास करती है। साथ ही शाह ने कहा कि दिल्ली चुनाव परिणाम CAA और NRC का जनादेश नहीं है।

दिल्ली विधानसभा चुनावों के दौरान भाजपा नेताओं के गोली मारो और भारत-पाकिस्तान मैच जैसे बयानों पर अमित शाह ने कहा, ऐसी बातें नहीं की जानी चाहिए। उन्होंने आगे कहा कि पार्टी ने ऐसे बयानों की हमेशा निंदा की है, इस बार भी इन बयानों से दूरी बना ली थी। अमित शाह ने आरोप लगाया कि देश को हिंदू-मुस्लिम में बाँटने का कम हमेशा से कॉन्ग्रेस ने ही किया है।

दरअसल, दिल्ली में चुनाव प्रचार के दौरान केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर ने ‘गोली मारो’ वाला बयान दिया था। वहीं, ‘भारत-पाकिस्तान मैच’ वाला बयान आम आदमी पार्टी से बीजेपी में शामिल हुए कपिल मिश्रा का था। कपिल मिश्रा मॉडल टाउन से उम्मीदवार थे।

गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि मुद्दा आज भी यह है कि विरोध किस प्रकार से और किस चीज के लिए होना चाहिए। जिस प्रकार से शाहीन बाग का समर्थन करने वालों को अपने विचार रखने का अधिकार है, उसी प्रकार हमें भी हमारे विचार व्यक्त करने का अधिकार है और हमने वो किया।

शाह ने कहा कि पत्रकारों को विरोध-प्रदर्शन का कारण भी देखना चाहिए। शाहीन बाग़ में चल रहे विरोध-प्रदर्शन पर अमित शाह ने कहा उन्हें किसी के द्वारा इसका कारण नहीं बताया गया है? उन्होंने पूछा कि यह अधिनियम मुस्लिम विरोधी या अल्पसंख्यक विरोधी कैसे है?

अन्य राज्यों के चुनाव परिणामों पर शाह ने कहा कि मोदी जी अभी कुछ ही समय पहले सबसे बड़े बहुमत के साथ विजयी रहे। अब सही बात है कि कुछ राज्यों में सफलता नहीं मिली लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि भाजपा से लोगों का विश्वास उठा है। महाराष्ट्र में हम चुनाव जीते हैं। हरियाणा में केवल 6 सीटें कम हुईं हैं। झारखंड में हम चुनाव हारे और दिल्ली में पहले से हारे हुए थे बावजूद इसके सीट और वोट पर्सेंट बढ़ा है। 

अमित शाह ने कहा, “मैं 13 साल की आयु से राजनीति में हूँ, मेरा व्यक्तिगत कुछ नहीं है, जो देश के लिए अच्छा है, वही मेरा है। 1980-81 में जब मैंने भाजपा ज्वाइन की थी उस वक्त हमारी मात्र दो सीटें थी। आज एक लंबा सफर तय करके हम यहाँ पहुँचे हैं। किसी ने आज तक मुझे ऐसा प्रावधान नहीं बताया कि सीएए के किस प्रावधान के तहत वो ये मानते हैं कि ये एंटी-मुस्लिम है। अगर भाजपा का विरोध ही करना है तो फिर कुछ भी हो सकता है।”

शाह ने आगे कहा कि 30 मार्च 1964 को, गृह मंत्रालय ने भारत में हिंदुओं और सिखों को दीर्घकालिक वीजा पर रहने की अनुमति दी थी। अतीत में कई मौकों पर कॉन्ग्रेस सरकार ने कहा है कि हिंदुओं और सिखों को भारत में रहने में मदद करने के लिए दीर्घकालिक वीजा दिया जाना चाहिए।

जगमगाती दिल्ली: फ्री पॉलिटिक्स के लिए टिहरी जैसी सभ्यताओं का डूबना जरूरी क्यों?

दिल्ली के विधानसभा चुनाव आखिरकार निपट ही गए। इसके नतीजे जो भी रहे हों, लेकिन राजनीतिक दलों के चुनावी मैनिफेस्टो और वायदों ने फ्री वाली लुभावनी स्कीम पर सोचने को एक बार फिर मजबूर कर दिया है। यह अच्छी बात है। जनता को अगर फ्री का मिल रहा है तो आखिर किसे समस्या हो सकती है?

जब सभी कुछ मुफ्त मिल रहा है तो बिजली भी फ्री मिलनी चाहिए। यह आज के आम आदमी की सबसे बड़ी जरूरतों में से है। लेकिन मुफ्त की रेहड़ी लगाने वाले राजनीतिक दलों को यह भी साफ करना चाहिए कि उनकी इस फ्री पॉलिटिक्स का भुगतान दूसरे राज्य की जनता क्यों करें।

कुछ वर्षों से देश की राजधानी दिल्ली में मुफ्त में बाँटी जा रही बिजली की भारी कीमत उत्तराखंड वर्षों से अदा कर रहा है। दुख की बात यह है कि खुद उत्तराखंड इस बात से बेखबर, मस्ती में सोया हुआ नजर आता है।

उत्तराखंड में कुछ कहावतें काफी लोकप्रिय हैं। जैसे- पहाड़ की जवानी और पहाड़ का पानी, कभी पहाड़ के काम नहीं आती। यह विशेषतः पहाड़ों से होते आ रहे पलायन के सम्बन्ध में है। स्थानीय गढ़वाली बोली में एक और कहावत है- ‘उत्तराखंड यूँ डामुन डाम्याली।’ इसका मतलब है कि उत्तराखंड को इन बाँधों ने दाग दिया है।

हर दूसरे दिन स्वीकृत होने वाली छोटी-बड़ी नदी घाटी परियोजनाएँ उत्तराखंड की एक कड़वी दास्तान बनते जा रहे हैं। इनके लिए टिहरी जैसी प्राचीन और ऐतिहासिक सभ्यता को डूबना पड़ता है, ताकि दिल्ली को मुफ्त की बिजली मुहैया कराई जा सके।

टिहरी बाँध जैसे अनेकों छोटे-बड़े हाइड्रो-इलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट; जैसे कि आसन बैराज, मनेरी, कोटेश्वर, किशाऊ, रामगंगा, विष्णुगाड, लोहारीनाग, धौलीगंगा परियोजना, भीमगोड़ा, पशुलोक और डाकपत्थर बैराज के लिए उत्तराखंड के लोगों ने न जाने कितनी कुर्बानियाँ दी हैं। लेकिन बदले में उत्तराखंड को क्या मिलता है? ले-देकर टूरिज्म के नाम का झुनझुना।

उदाहरण के लिए सबसे बड़ी परियोजना ‘टिहरी बाँध’ की बात करते हैं। इसी टिहरी बाँध को श्रीदेव सुमन सागर नाम से भी जाना जाता है। गौरतलब है कि भागीरथी नदी पर 260.5 मीटर की ऊँचाई पर बना यह टिहरी बाँध भारत का सबसे ऊँचा और विशालकाय और दुनिया का आठवाँ सबसे बड़ा बाँध है।

THDC की वेबसाइट ही बताती है कि टिहरी बाँध से उत्पादित होने वाली बिजली से आठ अन्य राज्यों- उत्तर प्रदेश, हरियाणा, हिमाचल, दिल्ली, पंजाब, जम्मू-कश्मीर, चंडीगढ़ और राजस्थान को फायदा मिलता है। इस बाँध से पड़ोसी उत्तर प्रदेश राज्य में सिंचाई और यूपी-दिल्ली में पीने के पानी की सप्लाई की जाती है।

अब बात करते हैं कि इस टिहरी बाँध से उत्तराखंड को क्या मिलता है। THDC की वेबसाइट के अनुसार, इस बाँध से कुल बिजली उत्पादन का 12% ही उत्तराखंड को फ्री मिलता है। हो सकता है कि सरकार को मिलता हो, लेकिन टिहरी या उत्तराखंड की जनता को इसमें से कितनी बिजली फ्री या सस्ती मिलती है, इस बात का कोई साक्ष्य अभी तक उपलब्ध नहीं हैं। हाँ, उत्तराखंड से दिल्ली को मिलने वाली फ्री बिजली अब जरूर इस प्रश्न पर नए सिरे से सोचने पर मजबूर करती है।

कारण? क्या आप जानते हैं कि पुराने टिहरी शहर के डूबने से टिहरी और उत्तराखंड की जनता ने एक विरासत, एक सभ्यता को खो दिया? क्या दिल्ली में मुफ्त की बिजली पाने वाले उस दर्द को महसूस कर सकते हैं, जो अपने खेत-खलिहान को आँखों के सामने डूबते देखने में होता है? वह दर्द जो अपने बाप-दादाओं के पुश्तैनी घर और अपने आम के बगीचों को डूबते देखने में होता है? ये वह दर्द है जो पुरखों की विरासत और आँगन में गाई जाने वाली माँगलों (मंगल गीत) के खो जाने के एहसास से ही चुभने लगता है। दर्द जो टिहरी की नथ और सिंगोरी की मिठास के खो जाने से होता है। आँसू जो बहते हैं, दूर किसी पहाड़ से आप जब अपने घर और खेतों को तबाह होते देखते हैं। डूबे हुए शहर में अंदाजा लगाते हैं कि ‘शायद यहीं कहीं आपका घर रहा होगा।

अगर किसी भी तरह से आप टिहरी से विस्थापित लोगों का दर्द समझ पाने में सक्षम नहीं हैं तो कश्मीर घाटी से आज से तीस साल पहले नरसंहार के बाद अपने ही घरों को छोड़कर जाने को मजबूर कश्मीरी पंडितों के दर्द को महसूस कीजिए। अंतर बस इतना ही है कि कश्मीरी पंडितों पर अत्याचार करने वाले इस्लामिक बर्बर कट्टरपंथी थे और टिहरी के लोगों को खुद उनकी सरकार ने अपने घर खाली कर शहरों को चले जाने की राय दी।

पुराना टिहरी शहर तीन नदियों- भागीरथी, भिलंगना और घृत गंगा, जो विलुप्त हो गई थी से घिरा हुआ था, इसलिए इसको त्रिहरी नाम से जाना जाता था। बाद में इस शहर का नाम टिहरी रख दिया गया। इस शहर को राजा सुर्दशन शाह ने दिसम्बर, 1815 में बसाया था।

टिहरी बाँध तो सिर्फ उदाहरण है, क्योंकि मेरा बचपन इस शहर की गलियों में बीता था और इस शहर को मैं जानता था। ऐसे न जाने कितने गाँव और कस्बे हैं उत्तराखंड में, जो जनमानस की तरक्की के लिए चुपचाप जल समाधि ले चुके हैं। इतने वर्ष बीत गए, सवाल वहीं का वहीं है- इतनी कुर्बानियों के बाद उत्तराखंड को क्या मिला?

उत्तराखंड को मिला विकास के नाम पर सिर्फ टूरिज्म का झुनझुना, खाली होते गाँव, पलायन की मार, कोर्ट-कचहरियों के चक्कर काटते सरकारी नौकरियों के नोटिस, सरकारी दफ्तर के बाबुओं की दादागिरी, कुशासन की मार, छुटभैये ठेकेदारों की बड़े नेताओं में तब्दीली, कच्ची दारू की जगह ब्रैंडेड बोतल, वीकेंड पर शहरों से आकर पहाड़ों में कचरा करने और टूटी बोतलें फेंक जाने वाले सीजनल सैलानी… बस यही!

दिल्ली की फ्री (सस्ती नहीं) बिजली ने कई सवाल खड़े किए हैं। इसके लिए मैं दिल्ली की जनता को दोष नहीं दूँगा क्योंकि सभी राजनीतिक दलों ने फ्री की ऐसी कई योजनाओं का लालच दिया था। लेकिन सवाल यह है कि दूसरों की जरूरतों को पूरा करने वाला उत्तराखंड खुद के अधिकारों के लिए कब सचेत होगा?

जो राज्य उत्पादन करके दूसरों को फ्री बिजली दे सकता है, क्या उसके स्थानीय निवासियों को इतना भी अधिकार नहीं कि वे भी फ्री नहीं तो सस्ती बिजली के लिए ही अपनी आवाज बुलंद कर सकें? या उत्तराखंड इसी में खुश है कि सैलानी आएँगे तो कुछ सीजनल आमदनी का जुगाड़ हो ही जाएगा? खैर, बिजली आपकी, मुफ्तखोरी दिल्ली की। उत्तराखंड बस देना जानता है; जिन पहाड़ों से माँ गंगा पूरे देश का पेट सींचती है, वही गंगा राजनीतिक फायदे के लिए दिल्ली के साथ-साथ खुद को मुफ्त बिजली नहीं दे सकती?

कट्टरपंथियों ने हिंदू महिलाओं को माफी माँगने पर किया मजबूर, टिकटॉक वीडियो में डांस करती आईं थी नजर

बॉलीवुड के हिट नंबर ‘चोली के पीछे क्या है’ पर डांस करती दो महिलाओं का टिकटॉक वीडियो सोशल मीडिया में वायरल हुआ। इसके बाद समुदाय विशेष के कट्टरपंथियों ने इन महिलाओं को बुर्का पहन डांस करने के लिए माफी मॉंगने को मजबूर कर दिया। ट्विटर यूजर शाहनवाज अंसारी टिकटॉक वीडियो पोस्ट किया जिसमें दो महिलाएँ बुर्के में डांस करती दिख रही थीं।

शाहनवाज जिसका ट्विटर हैंडल ‘shanu_sab’ ने दावा किया कि इनमें से एक महिला कंचन यादव है। उसका कहना था कि ये औरतें बुर्का पहनकर अक्सर डांस करती रहती हैं। जिस टिकटॉक अकाउंट से इन महिलाओं का वीडियो शेयर किया गया था वह है ‘sanulala087796046’ जो अब शायद डिलीट किया जा चुका है।

‘shanu_sab’ ने जो दूसरा ​ट्वीट शेयर किया है उसमें डांस करने वाली महिलाओं में से एक बुर्का पहन कर डांस करने के लिए माफी मॉंग रही है।

वीडियो में एक महिला मुस्लिमों से बुर्का पहनने के लिए माफी माँग रही है। वह कह रही है कि वह किसी मजहब या किसी व्यक्ति का मजाक उड़ाना कभी नहीं चाहती थी। ‘कंचन यादव’ का यह वीडियो ‘sanulala1234’ अकाउंट से पोस्ट किया गया है। इस यूजर ने टिकाटॉक पर कई वीडियो पोस्ट किए हैं जिसमें बुर्का का ‘अपमान’ करने वाले वीडियो डिलीट करने की धमकी दी गई है। वह कहता है कि महिलाएं हिंदू है और बुर्का पहन कर उनका डांस करना बुर्का का ‘अपमान’ है। एक अन्य टिकटॉक वीडियो में वह अन्य लोगों को भी बुर्का में डांस कर रही महिलाओं का वीडियो डिलीट करने को कह रहा है।


कोरोना वायरस से अब तक 1360 मौतें, 20 लाख उइगर मुस्लिमों पर सफाए का खतरा

चीन में नए साल की छुट्टियाँ ख़त्म हो गई हैं। लोग काम के लिए दफ्तरों में जुट रहे हैं। ऐसे में कोरोना वायरस को लेकर भयावह आँकड़े आ रहे हैं। अब तक 1360 लोगों के मौत की ख़बर है। पूरी दुनिया में कोरोना वायरस के कुल 60,000 मामले आ चुके हैं। इनमें से 48,000 मरीज चीन के हुबेई में ही हैं। सबसे भयावह बात ये है कि अब तक इसका इलाज मार्केट में नहीं आया है। हालाँकि, डब्ल्यूएचओ मानता है कि वायरस का ऐसा व्यवहार नहीं दिख रहा कि वो आक्रामक होकर सेंट्रल चीन के हुबेई से निकल कर दूर-दूर तक फैले, जो कि एक राहत देने वाली बात है। हुबेई में एक ही दिन में 242 मौतें हुईं है।

कोरोना वायरस से चीन के शिनजियांग प्रान्त में डर का माहौल है। ये वही क्षेत्र है, जहाँ क़रीब 20 लाख उइगर मुस्लिमों को विभिन्न प्रताड़ना कैम्पों में बंद कर के रखा गया है। भले ही कोरोना वायरस से बुरी तरह प्रभावित इलाक़े वहाँ से दूर हों, लेकिन चीन के इस उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में भी अब तक 55 मामले सामने आ चुके हैं। उइगर कार्यकर्ताओं का कहना है कि अगर एक बार किसी कैम्प में कोरोना वायरस फ़ैल गया तो फिर इसका रुकना असंभव है। कई एनजीओ और विशेषज्ञ पता लगाने में जुटे हैं कि इन कैम्पों के भीतर कोरोना वायरस को रोकने के लिए क्या व्यवस्थाएँ हैं लेकिन किसी को भी कोई पुष्ट जानकारी नहीं मिल पा रही।

चीन कहता है कि ये कैम्प ‘वोकेशनल ट्रेनिंग सेंटर’ हैं, जो आतंकवाद और आतंकी व जिहादी विचारधारा को रोकने के लिए बनाए गए हैं। एक उइगर मानवाधिकार कार्यकर्ता ने बताया कि कैम्पों के भीतर खाने के लिए अच्छा भोजन मिलना ही दूर की बात है, तो इसकी उम्मीद ही नहीं है कि नज़रबंद लोगों को मास्क दिए गए होंगे। चेंज डॉट कॉम पर हज़ारों लोगों ने एक माँग पत्र पर हस्ताक्षर किया है, जिसमें कोरोना के कारण इन कैम्पों को तुरंत बंद किए जाने की बात कही गई है। ‘वायरस थ्रेट इन द कैम्पस’ नामक सोशल मीडिया ट्रेंड चला कर WHO से माँग की है कि वो एक प्रतिनिधिमंडल वहाँ भेजे।

इस याचिका में पूछा गया है कि क्या हम उस वक्त का इंतजार कर रहे हैं, जब इन कैम्पों में कोरोना वायरस फैलेगा और कुछ ही पलों में हज़ारों मुस्लिम काल के गाल में समा जाएँगे? आशंका जताई गई है कि अगर एक बार वुहान क्षेत्र से निकल कर वायरस का प्रभाव वहाँ तक पहुँचा तो फिर तबाही आ सकती है। ‘वर्ल्ड उइगर कॉन्ग्रेस’ का भी कहना है कि अगर समय पर एक्शन नहीं लिया गया तो हज़ारों मुस्लिम इसके शिकार बन जाएँगे। उनका कहना है कि चीनी अधिकारियों के ढुलमुल रवैये और नज़रअंदाज़ी के कारण ये लोग कोरोना से प्रभावित होने की आशंका से घिरे हैं।

उइगर कैम्पों में कुपोषण जोरों पर है। यहाँ मुस्लिमें के शरीर के अंग निकाल के बेच डाले जाते हैं। यौन शोषण के कई मामले सामने आ चुके हैं। ऐसे में लोगों के वायरस से प्रभावित होने की ज्यादा सम्भावना रहती है। अब देखना ये है कि अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संस्थाओं की चिंता का चीन कोई हल निकालता है या नहीं।

चीनियों ने पहले उइगर महिलाओं संग बिस्तर बाँटा, अब मुस्लिमों के घर ही बदल डाले

चीन में लिखा जाएगा फिर से बाइबल और क़ुरान! उइगर मुस्लिमों के शोषण के बाद नया फरमान

रेप, गर्भपात, गुप्तांगों में मिर्ची का पेस्ट: चीन में उइगर मुस्लिमों की स्थिति, सामने आया Video, पढ़ें आपबीती

इकोनॉमी में कॉन्ग्रेस का 6.30 लाख का योगदान, जमानत बचाने वाले 3 नेताओं को शो कॉज नोटिस!

दिल्ली विधानसभा चुनाव आखिरकार संपन्न हो चुके हैं और अरविन्द केजरीवाल एक बार फिर से मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने जा रहे हैं। चुनाव से पहले और चुनाव के बाद ‘मुफ्त-मुफ्त’ की रेहड़ी की चर्चा में गोदी मीडिया इतनी मशगूल थी कि इस बीच एक बड़ी खबर बड़ी शालीनता से दबी रह गई। वो खबर थी, कॉन्ग्रेस प्रत्याशियों द्वारा देश की अर्थव्यवस्था में किए गए योगदान की! हालाँकि, जो हालत कॉन्ग्रेस की दिल्ली चुनाव के दौरान रही, उससे यह योगदान कम और बलिदान ज्यादा नजर आ रहा है। लेकिन फिर भी, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि यह एक बड़ी पहल थी।

अगर देश की जनता को मनोज तिवारी और केजरीवाल पर चुटुकले बनाने से पहली फुरसत मिल गई हो, तो बता दें कि दिल्ली विधानसभा चुनाव में कॉन्ग्रेस के 66 उम्मीदवारों में से 63 की जमानत तक जब्त हो गई। इन सीटों पर कॉन्ग्रेस प्रत्याशियों को कुल वोटों के पाँच प्रतिशत से भी कम वोट मिले। दिल्ली में कॉन्ग्रेस ने 70 में से मात्र 66 सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारे थे।

66 में से कॉन्ग्रेस के बस तीन ही ऐसे नेता हैं, जो चुनाव में अपनी जमानत जब्त ना करवा पाने में नाकामयाब रहे और इस कारण पार्टी ने उन्हें कारण बताओ नोटिस भी जारी कर दिया है। इनमें गाँधी नगर से अरविंदर सिंह लवली, बादली से देवेंद्र यादव और कस्तूरबा नगर से अभिषेक दत्त अपनी जमानत जब्त ना करवाने में विफल रहे।

सॉल्ट न्यूज़ द्वारा सत्यापित एक गुप्त सूत्र ने ऑपइंडिया तीखी मिर्ची सेल को बताया है कि कॉन्ग्रेस ने चुनाव से पहले ही एक उच्चस्तरीय ख़ुफ़िया बैठक बुलाकर अपनी-अपनी जमानत जब्त करवाने के आदेश समस्त प्रत्याशियों को दे दिए थे। दरअसल, कॉन्ग्रेस ने यह ‘नेहरुवी फैसला’ देश की अर्थव्यवस्था में अपना योगदान करने के लिए लिया था।

देश में चल रही राहुल गाँधी की लहर को देखते हुए कॉन्ग्रेस की राजमाता गाँधारी-द्वितीय ने अपनी दिव्य दृष्टि से यह पहले ही भाँप लिया था कि दिल्ली में कॉन्ग्रेस की सरकार कम से कम इस बार तो नहीं बन सकती। इसलिए देशहित में यह निर्णय लिया गया कि जमानत जब्त करवाने से जो धन चुनाव आयोग के पास इकठ्ठा होगा, वह देश की अर्थव्यवस्स्था में योगदान देने के काम आएगा।

असल में चुनाव लड़ते वक्त उम्मीदवारों को 10 हजार रुपया डिपॉजिट करना पड़ता है। जो उम्मीदवार वैध मतों का छठवॉं हिस्सा नहीं ला पाते उनकी यह रकम जब्त कर ली जाती है। कॉन्ग्रेस के 63 उम्मीदवारों ने अपनी जमानत जब्त करवाई है। इस हिसाब से यह रकम छह लाख 30 हजार रुपए होती है।

हालाँकि, कुछ वामपंथी साथियों ने यह इच्छा भी प्रकट की थी कि उन्हें इस धन से बची सर्दियों का जुगाड़ कर चिलम-चखना खरीदना चाहिए। लेकिन आखिर में यही फैसला हुआ कि सस्ते नशे की कमी में किसी भी प्रकार की यदि कोई आपात स्थिति पैदा होती है, तो ऐसे में युवा एवं तेजस्वी नेता राहुल गाँधी का ही कोई भाषण कार्यकर्ताओं को सुना दिया जाएगा।

फिलहाल पार्टी के वो तीन नेता पार्टी में अपनी स्थिति को लेकर संशय में हैं, जो अपनी जमानत जब्त करवाने में नाकाम रहे। 14 फरवरी तक उन्हें पार्टी हाईकमान को कारण बताओ नोटिस (Show Cause Notice) का जवाब देना है। बताया जा रहा है कि अगर वो जवाब देने में विफल रहते हैं, तो उन्हें राहुल गाँधी की अगली चार जनसभाओं में उनके भाषण सुनने के लिए बिठाया जा सकता है।

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पटेल ही नहीं राजेंद्र प्रसाद, टंडन, करियप्पा, राम… किसी को नहीं चाहते थे नेहरू

विदेश मंत्री एस जयशंकर का यह कहना कि नेहरू अपनी कैबिनेट में सरदार वल्लभभाई पटेल नहीं रखना चाहते थे, कथित इतिहासकार रामचंद्र गुहा से लेकर कॉन्ग्रेसियों तक को बेहद नागवार गुजरी है। जयशंकर ने इतिहासकार नारायणी बसु द्वारा स्वतंत्र भारत के पहले गृह सचिव वीपी मेनन की लिखी जीवनी का हवाला देते हुए यह बात कही। कॉन्ग्रेसी और वामपंथी भले इस पर छाती पीटे लेकिन कई तथ्य हैं जो बताते हैं कि देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू अपने समकालीनों के प्रति असुरक्षा की भावना से ग्रस्त थे। केवल पटेल ही नहीं राजेंद्र प्रसाद, राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन, जनरल केएम करियप्पा वगैरह को भी नेहरू उनकी जगह नहीं देखना चाहते थे। यहॉं तक कि उन्होंने आजाद भारत में अयोध्या की राम जन्मभूमि से रामलला को भी हटाने की कोशिश की थी।

डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद भारत के प्रथम राष्ट्रपति थे और संविधान सभा के अध्यक्ष भी थे। लेकिन, नेहरू नहीं चाहते थे कि चे राष्ट्रपति बनें। हालॉंकि नेहरू के विरोध के बावजूद वो 1950, 1952 और 1957 में लगातार तीन बार देश के राष्ट्रपति चुने गए। राजेंद्र प्रसाद ने जब दूसरी बार राष्ट्रपति का चुनाव लड़ने की इच्छा जाहिर की, तब नेहरू ने आपत्ति जताई। नेहरू चाहते थे कि एक बार 5 वर्ष का कार्यकाल पूरा करने वाला व्यक्ति दूसरी बार राष्ट्रपति न बने। ये अलग बात है कि खुद नेहरू ख़ुद 1947 से 1964 तक प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठे रहे।

डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद को दूसरी बार राष्ट्रपति बनाने के लिए जब हस्ताक्षर अभियान चल रहा था, तब नेहरू उनसे मिलने पहुँचे। उन्होंने ‘एक पुराने दोस्त होने के नाते’ उनसे आग्रह किया कि वो दूसरी बार राष्ट्रपति चुनाव न लड़ें। हालाँकि, डॉक्टर प्रसाद ने उन्हें किसी प्रकार का भरोसा नहीं दिया। वो चुप रहे। कॉन्ग्रेस की संसदीय समिति की बैठक हुई। इस बैठक में डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद की उम्मीदवारी का सिर्फ़ एक व्यक्ति ने विरोध किया और वो थे जवाहरलाल नेहरू। पार्लियामेंट्री बोर्ड के 6 सदस्यों में से नेहरू अकेले व्यक्ति थे, जो राजेंद्र प्रसाद को फिर से राष्ट्रपति बनाए जाने के ख़िलाफ़ थे।

इसी तरह देश के प्रथम सेनाध्यक्ष जनरल करियप्पा जो बाद में देश के पहले 5 स्टार जनरल बने वो भी देश के पहले सेनाध्यक्ष के रूप में प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू की पहली पसंद नहीं थे। दरअसल, नेहरू चाहते थे कि किसी अंग्रेज अधिकारी को सेनाध्यक्ष बनाया जाए। इस सम्बन्ध में नेहरू ने एक बैठक बुलाई थी जिसमें कई बड़े नेता व अधिकारी शामिल थे। बैठक को सम्बोधित करते हुए तत्कालीन पीएम ने कहा कि किसी भी भारतीय के पास सेना के नेतृत्व का अनुभव नहीं है, इसीलिए ये पद किसी अंग्रेज को ही देना चाहिए।

बैठक में सबने नेहरू की हाँ में हाँ मिलाई लेकिन लेफ्टिनेंट जनरल नाथू सिंह राठौड़ ने नेहरू से अलग मत रखते हुए कहा कि अगर किसी भारतीय के पास अनुभव नहीं है तो इसका अर्थ ये नहीं है कि भारत को गुलाम रखने वाले अंग्रेजों में से ही किसी एक को सेनाध्यक्ष की पदवी दे दी जाए। तब नेहरू ने उनसे ही सवाल दाग दिया कि क्या वो इस जिम्मेदारी का निर्वाहन करने को तैयार हैं? लेकिन सेनाध्यक्ष के पद को ठुकराते हुए उन्होंने कहा– “मैं कुछ कहना चाहता हूँ” और नेहरू के विचारों से आपत्ति जताते हुए भारत के पहले सेनाध्यक्ष के लिए किसी अंग्रेज की जगह करियप्पा का नाम सुझाया।

इस सूची में एक नाम राजर्षि पुरषोत्तम दास टंडन का भी है। राजर्षि ने उत्तर प्रदेश में कॉन्ग्रेस की जड़ें मजबूत करने में अपनी ज़िंदगी खपा दी। यूपी के गाँव-गाँव में घूम कर निःस्वार्थ भाव से जिस तरह उन्होंने पार्टी की सेवा की थी, उनका लोकतान्त्रिक तरीके से कॉन्ग्रेस अध्यक्ष बनना शायद ही किसी को अखरता। लेकिन, कॉन्ग्रेस पार्टी का शायद यह दुर्भाग्य ही था कि राजर्षि का अध्यक्ष बनना ‘किसी’ को रास नहीं आया और उन ‘किसी’ का नाम था- जवाहरलाल नेहरू। भारतीय राजनीतिक इतिहास की यह घटना उस समय की है जब नेहरू कॉन्ग्रेस के सबसे लोकप्रिय नेता थे।

किस्सा 1950 में कॉन्ग्रेस अध्यक्ष का चुनाव से जुड़ा हुआ है जब जवाहरलाल नेहरू के समर्थन में जेपी कृपलानी मैदान में उतरे। जेपी कृपलानी आज़ादी के समय भी कॉन्ग्रेस पार्टी के अध्यक्ष थे और नेहरू ने इस चुनाव को अपने स्वाभिमान पर ले लिया। कारण- जिस व्यक्ति को देश का सबसे ‘लोकप्रिय’ नेता कहा जाता था, उसके उम्मीदवार की पार्टी में ही हार होने से तरह-तरह की चर्चाओं को बल मिल सकता था। लेकिन उप-प्रधानमंत्री सरदार पटेल के समर्थन और गाँव-गाँव में अपनी मजबूत छवि के कारण टंडन इस चुनाव को जीतने में कामयाब रहे। बेदाग़ चरित्र और विवादों से दूर रहने वाले टंडन हिंदुत्व की तरफ़ झुकाव वाले नेता थे। इस चुनाव परिणाम को नेहरू ने अपने स्वाभिमान पर धक्का के रूप में लिया। यहाँ तक कि नेहरू ने प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा देने की भी धमकी दे डाली। अंततः देश और पार्टी के हित में टंडन ने कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया।

नेहरू को समस्या केवल समकालीनों से ही नहीं थी। हिंदुओं की बात करने वाले, तुष्टिकरण का विरोध करने वालों को वे देखना नहीं चाहते थे। उन्होंने तो बकायदा अयोध्या से राम की मूर्ति हटाने की भी कोशिश की थी। वरिष्ठ पत्रकार हेमंत शर्मा ने अपनी किताब ‘युद्ध में अयोध्या’ में ​विस्तार से उन घटनाओं का ब्यौरा दिया है, जब गर्भगृह से राम की मूर्ति हटाने पर नेहरू अमादा थे। लेकिन, केरल के रहने वाले आईसीएस अधिकारी केकेके नायर, जो उस समय फैजाबाद के जिलाधिकारी थे ने ऐसा करने से इनकार कर दिया।

हेमंत शर्मा लिखते हैं, “उत्तर प्रदेश के कुछ मुस्लिम नेताओं और देवबंद के उलेमाओं ने नेहरू को तार भेजकर उनका ध्यान अयोध्या की ओर दिलाया। नेहरू ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री गोविंद वल्लभ पंत और राज्य के गृह मंत्री लाल बहादुर शास्त्री को तत्काल मस्जिद से मूर्तियों को हटाने के निर्देश दिए। लगातर केंद्र से संदेश लखनऊ आते और वैसे ही तार लखनऊ से फैजाबाद भेजे जाते कि मूर्तियॉं तुरंत हटाई जाएँ।” शर्मा ने ​अपनी किताब में जिन घटनाओं और चिट्ठियों का जिक्र किया है, उनसे जाहिर होता है कि नेहरू मूर्तियॉं हटाकर धर्मनिरपेक्ष दिखना चाहते थे। लेकिन, नायर के अड़ने और पंत तथा पटेल के नरम रुख अपनाने के कारण वे अपने इस मंसूबे में यहाँ भी कामयाब नहीं हो पाए।

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अब सुषमा स्वराज के नाम से जाना जाएगा प्रवासी भारतीय केंद्र: जयंती से पहले मोदी सरकार की घोषणा

भारत सरकार ने प्रवासी भारतीय केंद्र और विदेशी सेवा संस्थान का नाम बदलकर दिवंगत सुषमा स्वराज के नाम पर रखने की घोषणा की है। 14 फरवरी को उनकी जयंती से ठीक पहले यह घोषणा की गई है। विदेश मंत्री एस जयशंकर ने आज घोषणा करते हुए कहा कि, सरकार ने प्रवासी भारतीय केंद्र का नाम सुषमा स्वराज भवन और विदेशी सेवा संस्थान का नाम सुषमा स्वराज इंस्टीट्यूट ऑफ फॉरेन सर्विस रखने का फैसला किया है। एक महान शख्सियत को दी गई श्रद्धांजलि हमें हमेशा प्रेरित करती रहेगी।

जयशंकर ने कहा, “हम सब सुषमा स्वराज को याद करते हैं, जो कल (14 फरवरी) 68 वर्ष की हो जाएँगी। विदेश मंत्रालय परिवार उन्हें विशेष रूप से याद करता है।” इस फैसले का स्वागत करते हुए केंद्रीय मंत्री स्मृति इरानी ने कहा कि मैं इस फैसले के लिए आपकी आभारी हूँ। वास्तव में यह सरकार द्वारा एक महिला को दी गई सच्ची श्रद्धांजलि है, उनको नेता के तौर पर हमेशा याद किया जाएगा।

गौरतलब है कि पीएम नरेंद्र मोदी ने अपने पहले कार्यकाल में ही सुषमा को विदेश मंत्री जैसा महत्वपूर्ण पद दिया था। इस पद पर रहते हुए सुषमा ने विदेश में रह रहे भारतीयों की मदद की दिशा में सराहनीय कार्य किए थे। वह लोगों से ट्विटर के जरिए जरिये कनेक्ट रहती थीं और उनकी समस्या का समाधान करती थीं। 6 अगस्त 2019 को उनका निधन हो गया था। स्वराज को गणतंत्र दिवस के मौके पर पद्म विभूषण सम्मान से नवाजा गया था। पिछले महीने हरियाणा सरकार ने अंबाला के बस अड्डे का नाम सुषमा स्वराज के नाम पर रखने की घोषणा की थी। परिवहन मंत्री मूलचंद शर्मा ने बताया था कि 14 फरवरी को बस अड्डे का नया नामकरण किया जाएगा। उल्लेखनीय है कि सुषमा स्वराज ने जीवन के शुरुआती साल अंबाला में बिताए थे।

‘गदहे हैं ये लोग’: शिकारा से कश्मीरी पंडितों के जख्म पर नमक रगड़ने वाला चोपड़ा बौखलाया

बतौर निर्देशक अपनी लगातार तीन फ़िल्में फ्लॉप होने के बाद विधु विनोद चोपड़ा बौखला गए हैं। झूठे आँकड़ों के जरिए आलोचकों को चुप कराने में जुट गए हैं। उन्होंने अपनी फ़िल्में ‘3 इडियट्स’ और ‘शिकारा’ को लेकर झूठ बोला है। बता दें कि वो ‘3 इडियट्स’ से बतौर निर्माता जुड़े हुए थे। यहाँ सवाल उठता है कि आलोचकों पर निशाना साधने के लिए उन्होंने ख़ुद की निर्देशित की हुई फ़िल्मों का आँकड़ा क्यों नहीं दिया? क्या इसीलिए, क्योंकि इससे उनकी और भी बेइज्जती हो जाती? उनके आँकड़ों की सच्चाई जानेंगे लेकिन पहले पढ़िए कि उन्होंने आख़िर कहा क्या?

कश्मीरी पंडितों का दर्द दिखाने के नाम पर उन्होंने ‘शिकारा’ बनाई। लेकिन, फिल्म में कट्टरपंथियों के अत्याचार को छिपा लिया गया और प्रेम-कहानी पर जोर दिया गया। चोपड़ा ने कहा कि कश्मीरी पंडित और कट्टरपंथी एक-दूसरे से सॉरी कहें और आगे बढ़ें। अत्याचार कश्मीरी हिन्दुओं पर हुआ तो वो मुस्लिमों से सॉरी क्यों बोलें, इस सवाल पर चोपड़ा भड़क जाते हैं। तभी कश्मीरी पंडित व पत्रकार दिव्या राजदान ने ‘शिकारा’ के स्क्रीनिंग के दौरान विधु विनोद चोपड़ा को जोर से डाँटा। राजदान ने पूछा कि उन्होंने फिल्म में कश्मीरी पंडितों पर हुए अत्याचार को छिपाया क्यों?

अब निर्देशक-निर्माता विधु विनोद चोपड़ा में अपने आलोचकों को गदहा कहा है। उन्होंने कहा कि उनकी फ़िल्म ‘3 इडियट्स’ ने पहले ही दिन 33 करोड़ रुपए की कमाई की थी। उन्होंने दावा किया कि उन्हें पता था कि शिकारा का पहले दिन का बॉक्स ऑफिस कलेक्शन 30 लाख रुपया ही होगा। साथ ही उन्होंने ये भी दावा किया कि उन्होंने ये फ़िल्म अपनी माँ की याद में बनाई है। बकौल चोपड़ा, कुछ लोग कहते हैं कि उन्होंने कश्मीरी पंडितों का दर्द बेच कर रुपए कमाने के लिए ”शिकारा’ बनाई, वो सभी गदहे हैं। वैसे चोपड़ा अपने आलोचकों को गदहा तभी कह रहे हैं, जब उनके पास सवालों के कोई जवाब नहीं हैं।

अब आते हैं ‘3 इडियट्स’ के पहले दिन के कलेक्शन पर। फ़िल्म समीक्षक और बॉक्स ऑफिस विशेषज्ञ सुमित कादेल ने विधु विनोद चोपड़ा की पोल खोलते हुए बताया कि क्रिसमस 2009 के मौके पर रिलीज हुई अमित ख़ान अभिनीत फिल्म की पहले दिन की कमाई 12.78 करोड़ रुपए थी। हालाँकि, इसके बाद आई सलमान ख़ान की ‘दबंग’ ने 3 इडियट्स के ओपनिंग रिकॉर्ड तोड़ डाले थे। ‘3 इडियट्स’ के लगभग 1 साल बाद आई सुपरस्टार रजनीकांत की तमिल मूवी ‘एंथिरन (रोबोट)’ ने दोनों ही फ़िल्मों के सारे रिकार्ड्स को तोड़ डाला था। ऐसे में, चोपड़ा ने झूठ बोला कि उनकी फ़िल्म ने उस वक्त 33 करोड़ रुपए कमाए थे।

वहीं ‘शिकारा’ के बॉक्स ऑफिस कलेक्शन को लेकर भी विधु विनोद चोपड़ा सही नहीं बोल पाए। वरिष्ठ फ़िल्म समीक्षक व बॉक्स ऑफिस ट्रैकर तरन आदर्श के इस ट्वीट को देखिए, जिसमें उन्होंने रिलीज के एक दिन बाद ही बताया था कि ‘शिकारा’ ने पूरे भारत में 1.2 करोड़ रुपए की नेट कमाई की है:

इससे पता चलता है कि जहाँ अपने पुराने फ़िल्म की कमाई को ढाई गुना ज्यादा बता कर चोपड़ा अपने ताज़ा फिल्म की कमाई कम बता कर शेखी बघारने के साथ-साथ ही सहानुभूति भी बटोरना चाहते हैं। दरअसल, उन्होंने अपने द्वारा निर्देशित की गई फ़िल्मों का नाम इसीलिए नहीं लिया, क्योंकि उनकी पिछली तीनों फ़िल्में फ्लॉप रही हैं। अप्रैल 2015 में ‘Broken Horses’ के जरिए वो हॉलीवुड में पाँव पसारने चले थे लेकिन फ़िल्म 25 लाख रुपए के लिए भी तरस गई। इसे इतिहास की सबसे बड़ी फ्लॉप फ़िल्मों में रखा जाता है। चोपड़ा की बौखलाहट का कारण लगातार तीसरी फ़िल्म का फ्लॉप होना तो नहीं?

क्या राजकुमार हिरानी के निर्देशन के बिना विधु विनोद चोपड़ा की इतनी भी हैसियत नहीं कि वो एक फ़िल्म भी हिट करा सकें? ‘3 इडियट्स’, ‘मुन्नाभाई’ सीरीज, ‘पीके’ और ‘संजू’- इन सभी फ़िल्मों के निर्देशक हिरानी ही थे। विधु विनोद चोपड़ा ने ‘एकलव्य’ के लिए 2007 में निर्देशक की टोपी पहनी थी, जो बुरी तरह फ्लॉप रही। अमिताभ बच्चन, सैफ अली खान, संजय दत्त और जिमी शेरगिल जैसे सितारों के रहते भी उनकी फ़िल्म नहीं बच पाई और अब शिकारा के साथ फ्लॉप फिल्मों की उन्होंने हैट्रिक पूरी कर ली है।

‘कश्मीरी हिन्दुओं पर थूकने का काम करती है शिकारा फिल्म, उल्टे हिन्दुओं को ही कम्युनल कहती है’

कट्टरपथियों से किस बात की माफ़ी माँगें कश्मीरी हिन्दू? कि उनकी लड़कियों का गैंगरेप हुआ, निर्मम हत्या की गई?

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केंद्र शासित J&K में पहली बार चुनावों का ऐलान, 8 चरणों में होंगे पंचायती चुनाव

जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटने के बाद पहली बार चुनाव आयोग ने राज्य में पंचायती चुनावों की तारीखों का ऐलान कर दिया है। घोषणा के मुताबिक राज्य में कुल आठ चरणों में चुनाव कराए जाएँगे। पहला चरण 5 मार्च, जबकि आखिरी चरण 20 मार्च को होगा।

जम्मू-कश्मीर के चुनाव आयुक्त शैलेंद्र कुमार ने घोषणा करते हुए बताया कि पंचायती चुनाव का पहला चरण 5 मार्च, दूसरा 7 मार्च, तीसरा 9 मार्च, चौथा 12 मार्च, 5वॉं 14 मार्च, छठा 16 मार्च, 7वाँ 18 मार्च और 20 मार्च को चुनाव का आखिरी चरण होगा। यह चुनाव प्रदेश की एक हजार से अधिक खाली पड़ी सरपंचों की सीटों के लिए होंगे। साथ ही चुनाव आयोग ने साफ किया है कि चुनाव बैलेट पेपर से ही कराए जाएँगे।

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चुनाव आयोग ने बताया कि प्रदेश में सरपंच की 1011 सीटें खाली हैं। इन पदों को भरने के लिए लंबे समय से चुनाव कराने की अटकलें लगाई जा रही थीं। आपको जानकर हैरानी होगी कि जम्मू-कश्मीर में जिन सीटों पर चुनाव होना है। यह वही सीटें है, जहां से आतंकवाद के डर से कोई उम्मीदवार ही खड़ा नहीं हुआ था और तभी से इन गॉंवों का विकास पूरी तरह से अफसरों के हाथों में है।  

एक रिपोर्ट के मुताबिक जम्मू-कश्मीर-लद्दाख के 22 जिलों की आबादी करीब 1 करोड़ 40 लाख लोगों की है, जिसमें से करीब 80 लाख लोग 6,900 गॉंवों में रहते हैं। अगर पंचायतों की बात करें तो जम्मू-कश्मीर प्रदेश में 4,483 पंचायत हैं, जिनमें 3500 पंच और 4500 सरपंच हैं।

गौरतलब है कि बीते साल केंद्र सरकार ने आर्टिकल 370 के प्रावधानों को निरस्त कर राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों में बॉंट दिया था। जम्मू-कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश में विधानसभा है जबकि लद्दाख बगैर विधानसभा के केंद्र शासित प्रदेश है।

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