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जानिए कैसे ‘निकाला’ जाता है एग्जिट पोल, और क्यों होते हैं ये अक्सर गलत

प्राचीन काल की बात है। 40-50 साल पहले शताब्दी ही दूसरी थी तो प्राचीन काल ही कहेंगे ना! खैर तो हुआ यूँ कि उस समय ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी का एक छात्र यूनिवर्सिटी की लाइब्रेरी में चुनाव नतीजों से सम्बंधित दस्तावेजों के पन्ने पलट रहा था। वो खोजने की कोशिश कर रहा था कि सांख्यिकी के आधार पर चुनावी नतीजों की भविष्यवाणी हो सकती है या नहीं। उससे पहले भी कई गणितज्ञ सूरमा ऐसा करने के प्रयासों में असफल हो चुके थे इसलिए उसे कामयाबी ना मिलना कोई अनूठी बात नहीं होती।

इस छात्र का नाम था- डेविड बटलर। उन्हें अचानक से कठिन गणित समीकरणों के बीच एक आसान सा फार्मूला दिखा। उसने पाया कि दो पार्टियों के मत प्रतिशत में अगर A:B का सम्बन्ध हो तो “टू द पॉवर थ्री” पर उनकी सीटों की गिनती निकल रही है! यानी (A x A x A) : (B x B x B) पर सीटों की भविष्यवाणी की जा सकती है! जब उसने ब्रिटिश चुनाव नतीजों पर इस फॉर्मूले को बिठाकर देखा तो नतीजे बिलकुल सटीक निकल आए। फिर क्या था! थोड़े ही समय में इस छात्र की ख्याति चारों ओर फैल गई। जब चर्चिल ने डेविड बटलर को खाने पर आमंत्रित किया था, तो वो उस समय छात्र ही थे।

डेविड बटलर के इस नियम को “क्यूब लॉ” कहते हैं। इससे दो दलों वाले लोकतांत्रिक चुनावों में बिलकुल सटीक व्याख्या की जा सकती है। ये तीन पार्टियों तक भी चल जाता है मगर जहाँ भारत की तरह कई राजनैतिक दल (और निर्दलीय भी) चुनाव मैदान में हों वहाँ ये फार्मूला पूरी तरह बेकार है। ऐसे नियमों के बारे में खुद बटलर कहते हैं कि किसी एक देश में बना ऐसा कोई नियम 10 साल टिक सकता है लेकिन हर देश में यही नियम लगाना, या कई दलों वाले चुनाव में इसे इस्तेमाल करना वैज्ञानिक तरीका नहीं होगा।

अगर इसी फॉर्मूले को दिल्ली चुनावों पर इस्तेमाल करके देखें तो पिछले चुनावों में AAP के करीब 54%, कॉन्ग्रेस के करीब 9% और भाजपा के 34% के लगभग वोट थे। 70 सीट में इनका बँटवारा किया जाए तो भाजपा को 14-15 आती हैं, AAP को 55-56 मिलेंगी और आखरी बचे कॉन्ग्रेसी, तो उन्हें 0-1 सीट पर संतोष करना पड़ेगा। अधिकांश चैनल पर आए पूर्वानुमानों में आपको करीब यही आँकड़े दिखेंगे। समस्या वही है जो बटलर ने पहले ही बता दी है। ये तीन पार्टियों का चुनाव नहीं था, इसमें और भी दावेदार शामिल हुए थे। इसलिए ये पूर्वानुमान गलत साबित होने वाला है।

चूँकि ये फॉर्मूले धंधे के अन्दर की बात है। इसलिए इनके बारे में पेड मीडिया पर बात नहीं होती। जिन्हें ये फॉर्मूले पता है, वो लोग इनका इस्तेमाल नेताओं से “नजदीकी सम्बन्ध” गाँठने में करेंगे। आपको ये सिखाकर भला क्या फायदा? इसलिए प्रणय रॉय और अशोक लाहिरी के आमंत्रण पर डेविड बटलर भारत आए तो थे लेकिन उनका नाम भी अधिकतर लोगों ने नहीं सुना है। अधिकांश भारतीय लोगों ने चुनाव विश्लेषण बस टीवी पर ही देखा होता है। इन विषयों पर काम करने वाले डॉ एन भास्कर राव भी लगभग अज्ञात जीव हैं।

वो क्या है न कि जानकारी न हो तो ठगने में आसानी रहती है। ये गणित तीन पार्टी वाले चुनाव तक चलता है, मगर कई पार्टियों के बीच होने वाले चुनावों में नहीं, ऐसा बताए बिना अगर विश्लेषण सुनाए जाएँ तभी तो लोग देखेंगे-सुनेंगे! अगर पता हो कि इसके नाकाम होने की ही संभावना ज्यादा है तो भला न्यूज़ बेचने वाले पर भरोसा कौन करेगा? इसके नाकाम होने पर आगे चलकर राग EVM के जरिए समाचार बेचने वाले एवं हारे हुए नेतागण और कुछ दिन मनोरंजन कर पाएँगे। एक मामूली से क्यूब और रेश्यो के फॉर्मूले से 15 दिन का धंधा डूबता है।

बाकी भारत देश में चुनाव करीब-करीब हर समय चलते ही रहते हैं और पोस्टर छापने, चुनाव प्रचार के लिए टेंट-लाउडस्पीकर, कुर्सियाँ किराए पर देने से लेकर, कई छुपे हुए उपहारों की खरीद बिक्री के लिहाज से चुनाव फायदे का धंधा है। कुछ चुनावी चकल्लस चले और चंचला लक्ष्मी उनके घर से निकलकर हमारे घर भी आए तो अच्छा लगता है! चुनाव होते रहने चाहिए मित्रों!

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SC/ST एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट ने पलटा अपना फैसला, केंद्र सरकार के संशोधन को मंजूरी: मूल रूप में बना रहेगा कानून

अनुसूचित जाति-जनजाति के उत्पीड़न से जुड़े कानून (एससी-एसटी एक्ट) के प्रावधानों में पिछले साल केंद्र सरकार द्वारा किए गए संशोधनों को सुप्रीम कोर्ट ने मान लिया है। अर्थात यदि किसी के खिलाफ इस कानून के तहत केस दर्ज किया जाता है, तो बगैर जाँच के उसकी गिरफ्तारी हो सकेगी। इस कानून के तहत एससी/एसटी के खिलाफ अत्याचार के आरोपितों के लिए अग्रिम जमानत के प्रावधान को खत्म कर दिया गया है।

जस्टिस अरुण मिश्र, जस्टिस विनीत सरन और जस्टिस रवींद्र भट्ट की तीन जजों वाली बेंच इस मामले की सुनवाई कर रही थी। रिपोर्ट्स के अनुसार बेंच ने सोमवार को इस मामले में 2-1 से अपना फैसला दिया, यानी दो जजों ने निर्णय के पक्ष में जबकि तीसरे जज ने फैसले से अलग राय रखी। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि केस दर्ज करने के लिए प्राथमिक जाँच आवश्यक नहीं है।

कोर्ट ने पहले ही दे दिए थे संकेत

ध्यातव्य है कि पिछले साल अक्टूबर में ही जजों की पीठ ने संकेत दे दिया था कि वह तत्काल गिरफ्तारी और अग्रिम जमानत पर रोक लगाने के लिए एससी/एसटी अधिनियम में केंद्र द्वारा किए गए संशोधनों को बरकरार रखेगा। कोर्ट ने इस दौरान सुनवाई करते हुए कहा था, “हम किसी भी प्रावधान को कम नहीं कर रहे हैं। इन प्रावधानों को कम नहीं किया जाएगा। कानून वैसा ही होना चाहिए, जैसा वह था।”

कोर्ट ने क्या कहा था

कोर्ट ने इस दौरान यह भी स्पष्ट किया था कि एससी/एसटी कानून के तहत किसी भी शिकायत पर कोई कार्रवाई करने से पहले पुलिस प्राथमिक जाँच कर सकती है लेकिन तभी अगर प्रथम दृष्टया में उसे शिकायतें झूठी लगती हैं तो।

दोबारा पुराना कानून लागू

20 मार्च, 2018 को अपने निर्णय में सुप्रीम कोर्ट की दो जजों की पीठ ने इस कानून के तहत शिकायत पर अग्रिम जमानत का प्रावधान जोड़ने के साथ-साथ स्वत: गिरफ्तारी के प्रावधान पर भी रोक लगा दी थी। इसके बाद पुराने कानून को सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय पीठ ने 30 सितंबर, 2019 को बहाल कर दिया था। केंद्र सरकार द्वारा कानून में संशोधन करके सुप्रीम कोर्ट के 20 मार्च 2018 के फैसले को पलटकर दोबारा पुराने कानून को लागू कर दिया था।

सुप्रीम कोर्ट ने मार्च, 2018 में में एससी-एसटी कानून के दुरुपयोग की शिकायतों के बाद स्वत: संज्ञान लेकर निर्णय दिया था कि एससी/एसटी एक्ट के तहत आरोपी की सीधे गिरफ्तारी नहीं हो सकेगी। इस आदेश के अनुसार, मामले में अंतरिम जमानत का प्रावधान किया गया था और गिरफ्तारी से पहले पुलिस को एक प्रारंभिक जाँच करनी थी। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद एससी/एसटी समुदाय के लोगों ने देशभर में व्यापक प्रदर्शन किए थे।

व्यापक विरोध प्रदर्शन के बीच केंद्र ने पलटा था कोर्ट का फैसला

व्यापक प्रदर्शन को देखते हुए केंद्र सरकार ने कोर्ट में एक याचिका दायर की थी और बाद में संसद ने अदालत के आदेश को पलटने के लिए कानून में संशोधन किया था। संशोधित कानून के लागू होने पर कोर्ट ने किसी प्रकार की रोक नहीं लगाई थी। सरकार के इस फैसले के बाद कोर्ट में कई याचिकाएं दायर की गई। इसमें आरोप लगाया गया था कि संसद ने मनमाने तरीके से इस कानून को लागू कराया है।

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‘जो मोदी-शाह के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाएगा वो मर्द-ए-मुजाहिद कह लाएगा’ – ओवैसी ने CAA को जिहाद से जोड़ा

एआईएमआईएम के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने एक बार फिर सीएए और एनआरसी को लेकर मोदी सरकार पर निशाना साधा है। औवेसी ने कहा कि मोदी-शाह के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने वाले ही असली मर्द है और वो वतन में तो रहेंगे, लेकिन कागज नहीं दिखाएँगे।

हैदराबाद के सांसद और AIMIM के प्रमुख ने सीएए और एनआरसी के ख़िलाफ़ लोगों को संबोधित करते हुए कहा, “जो मोदी-शाह के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाएगा वो सही मायने में मर्द-ए-मुजाहिद कह लाएगा। मैं वतन में रहूँगा, पर कागज नहीं दिखाऊँगा। कागज अग़र दिखाने की बात होगी, तो सीना दिखाएँगे कि मार गोली। मार दिल पे गोली मार, क्योंकि दिल में भारत की मोहब्बत है।”

असदुद्दीन ओवैसी रविवार को आंध्र प्रदेश के करनाल ज़िले में सीएए और एनआरसी के ख़िलाफ आयोजित विरोध प्रदर्शन में लोगों को सम्बोधित कर रहे थे। जहाँ ओवैसी ने सीएए को लेकर मोदी सरकार के ख़िलाफ लोगों को खूब भड़काया। इतना ही नहीं ओवैसी ने लोगों को कागज न दिखाने की भी बात कही।

आपको बता दें कि यह पहला मौका नहीं कि जब असदुद्दीन ओवैसी ने सीएए और एनआरसी को लेकर मोदी सरकार पर निशाना साधा हो। इससे पहले भी कई बार वो इस क़ानून को लेकर सरकार पर सवाल खड़ा कर चुके हैं। उन्होंने यहाँ तक कह दिया था कि यह कानून समुदाय विशेष के हित में नहीं है। वहीं पिछले दिनों ओवैसी ने कहा था कि दिल्ली चुनाव के बाद मोदी सरकार शाहीन बाग को जलियाँवाला बाग बना देगी। यह बयान उन्होंने बीजेपी नेता अनुराग ठाकुर द्वारा दिए गए एक बयान पर पलटवार करते हुए दिया था।

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हनुमान चालीसा के वितरण से किसी को क्या दिक्कत! ममता सरकार की पुलिस ने पुस्तक मेले में लगाया प्रतिबंध

पश्चिम बंगाल के कोलकाता में चल रहे पुस्तक मेले में विश्व हिंदू परिषद के कार्यकर्ताओं द्वारा बाँटी जा रही हनुमान चालीसा की पुस्तकों पर पुलिस ने अचानक से रोक लगा दी। पुलिस ने बताया कि इसके वितरण से बाहरी लोग भावनाओं में बह सकते हैं, जिससे माहौल खराब भी हो सकता है। इसके बाद दोनों पक्षों में विवाद शुरू हो गया।

कोलकाता के सेंट्रल पार्क में चल रहे 44वें अंतरराष्ट्रीय पुस्तक मेले में रविवार को विश्व हिंदू परिषद द्वारा हनुमान चालीसा की पुस्तकें लोगों को वितरित की जा रही थीं। इस बात की जानकारी जैसे ही ममता सरकार की पुलिस को हुई, उन्होंने तत्काल मौके पर पहुँचकर हनुमान चालीसा के वितरण पर रोक लगा दी। उन्होंने बताया कि हनुमान चालीसा के वितरण से शहर में कानून व्यवस्था की समस्या पैदा हो सकती है, पुस्तक मेले में आने वाले लोग भावनाओं में बह सकते हैं।

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पुलिस के इस आदेश के बाद दोनों पक्षों में विवाद शुरू हो गया। विहिप के अधिकारियों ने पुलिस की कार्यशैली पर सवाव खड़ा करते हुए कहा कि जब मेले में कुरान और बाइबिल की पुस्तकें बाँटी जा सकती हैं तो हनुमान चालीसा की क्यों नहीं? माहौल में गर्मी पैदा होते देख कोलकाता पुलिस कुछ ही देर में बैकफुट पर आ गई और हनुमान चालीसा के वितरण से रोक को हटा लिया गया। इसके बाद विहिप के कार्यकर्ता फिर से हनुमान चालीसा की पुस्तकें लोगों को वितरित करने में जुट गए।

आपको बता दें कि कोलकाता के सेंट्रल पार्क में 29 जनवरी से 44वाँ अंतरराष्ट्रीय पुस्तक मेले का आयोजन किया गया। इसका शुभारंभ पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने किया था। इस मेले का 9 फरवरी को अंतिम दिन था और मेले के आखिरी दिन ही हनुमान चालीसा के वितरण को लेकर दोनों पक्षों में विवाद हो गया। इस मेले में इस बार करीब 600 स्टॉल लगाए गए, जिनमें से करीब 200 स्टॉल लिटिल मैगजीन और विदेशी प्रकाशकों के थे।

गौरतलब है कि पिछले वर्ष इस मेले में करीब 2.4 मिलियन लोगों ने शिरकत की थी। वहीं करीब 22 करोड़ पुस्तकों की बिक्री हुई थी।

मुझे खुशी है कि भारत का बँटवारा हुआ, नहीं होता तो कई डायरेक्ट एक्शन डेज देखने पड़ते: कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता

कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व विदेश मंत्री नटवर सिंह ने भारत के विभाजन पर खुशी जाहिर की और कहा कि उन्हें खुशी है कि भारत-पाकिस्तान का बँटवारा हुआ। उन्होंने रविवार (फरवरी 9, 2020) को एक कार्यक्रम में कहा, “मुझे खुशी है कि भारत का बँटवारा हुआ। ऐसा नहीं होता तो मुस्लिम लीग देश को चलने नहीं देती।”

बता दें कि नटवर सिंह ने रविवार को राज्यसभा सांसद एमजे अकबर की नई किताब ‘गाँधी हिंदुइज्म: द स्ट्रगल अगेंस्ट जिन्नाह इस्लाम’ की लॉन्चिंग के कार्यक्रम में शिरकत की थी। इसी दौरान उन्होंने भारत के बँटवारे के इतिहास को याद किया और ये बातें कहीं। एमजे अकबर के इस किताब का लोकार्पण पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के निवास स्थान पर किया गया था।

नटवर सिंह ने कहा, “मुझे खुशी है कि भारत का बँटवारा हुआ क्योंकि अगर भारत का बँटवारा नहीं होता तो हमें कई ‘डायरेक्ट एक्शन डेज’ देखने पड़ते। ऐसी पहली कार्रवाई हमने जिन्ना के जीवित रहते 16 अगस्त (1946) को देखी थी, उस समय कोलकाता (तब कलकत्ता) में हजारों हिंदुओं को मार दिया गया था। इसके बाद की प्रतिक्रिया में बिहार में हजारों मुस्लिमों को मार दिया गया।” उन्होंने कहा, “बँटवारे के पीछे का एक सीधा सा कारण है कि मुस्लिम लीग देश को सही ढंग से चलने नहीं देती।”

मुस्लिम लीग के बारे में अपनी राय के पक्ष में नटवर सिंह ने दो सितंबर 1946 में गठित भारत की अंतरिम सरकार का उदाहरण दिया। उन्होंने बताया कि किस तरह से मुस्लिम लीग ने शुरुआत में वायसराय की कार्यकारिणी परिषद के उपाध्यक्ष जवाहरलाल नेहरू की कैबिनेट में शामिल होने से इनकार कर दिया था। बाद में वह केवल प्रस्तावों को खारिज करने के लिए इसका हिस्सा बनी। 

उन्होंने आगे कहा, “इसलिए व्यापक स्तर पर आप यह कल्पना कीजिए कि अगर भारत का बँटवारा नहीं होता तो मुस्लिम लीग अंतरिम सरकार का कामकाज बहुत ही मुश्किल कर देती। उस समय एक हफ्ते में ही सरकार की स्थिति कमजोर हो जाती।”

कार्यक्रम में मौजूद राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल ने पुस्तक की सराहना करते हुए कहा कि गाँधी जी ने बयान दिया था कि वह 15 अगस्त को पाकिस्तान जाना चाहेंगे, यह उस बड़े दर्द का सांकेतिक प्रकटीकरण था, जो वह उस समय महसूस कर रहे थे। उन्होंने कहा, ‘‘यह महज बँटवारा नहीं था लेकिन गाँधी जी ने बँटवारे के बाद की इस स्थिति को महसूस किया कि रिश्ते (भारत और पाकिस्तान के बीच) ऐसे होंगे, जो संभवत: दोनों देशों को दर्द और दुख देंगे, जो सही साबित हुआ।”

क्या है ‘डायरेक्ट एक्शन डेज’ ?

बता दें कि उस समय मोहम्मद अली जिन्ना के नेतृत्व वाली मुस्लिम लीग ने अलग देश की माँग की थी, जिसके तहत उन्होंने सीधी कार्रवाई (हिंदुओं को टारगेट कर हिंसा करना) करनी शुरू कर दी थी। इस दौरान 16 अगस्त 1946 को कोलकत्ता में सांप्रदायिक दंगे भड़के थे, जिसमें हजारों लोगों ने अपनी जान गँवा दी। इस घटना को ही ‘डायरेक्ट एक्शन डेज’ या ‘कलकत्ता नरसंहार’ के नाम से जाना जाता है।

‘कॉन्ग्रेस नेताओं के कारण हुआ देश का बँटवारा, देशभक्ति दिवस के रूप में मनाई जाए नेताजी की जयंती’

अय्याश था नेहरू और उसका खानदान, अंग्रेजों के चक्कर में देश का बँटवारा कर दिया: BJP विधायक

इस ‘शिकारा’ का डूबना आवश्यक था, बॉलीवुड के मजहबी आतंक प्रेम की पराकाष्ठा है ये

एक फिल्म बनी, पोस्टर छपे, लोगों में जिज्ञासा जगी, एक आशा बलवती हुई कि किसी ने तो अनकही कहानी (शब्दशः ‘अनटोल्ड स्टोरी’) कहने की हिम्मत की। तीस साल पूरे हुए उस नरसंहार के जिसे कश्मीरी पंडितों का पलायन बता कर सामान्य कर दिया जाता है। इस नरसंहार की बीस नृशंस कहानियों को मैंने पहले भी आप तक पहुँचाया है, और मैं चाहूँगा कि आप उन्हें फिर से एक बार दोहरा लें।

कश्मीर के हिन्दू नरसंहार की 20 नृशंस कहानियाँ जो हर हिन्दू को याद होनी चाहिए

इन्हें जानना नहीं, याद करना आवश्यक है। हमारे देश में एक विलक्षण प्रवृत्ति रही है अपने ऊपर हुए अत्याचारों और अन्यायों के दौर को ही नहीं, अत्याचारियों और आतंकियों को भी भुला देने का। ऐसा नहीं है कि हमें याद था और हम भूल गए। नहीं, ये कहानियाँ हम तक पहुँचने ही नहीं दी गईं। किसी ने ये बताया ही नहीं कि जिस नरसंहार को ‘पलायन’ कह कल सामान्यीकृत किया जाता है, उसमें हुआ क्या था?

हमें इंटरनेट के दौर में भी उन कहानियों के बाहर आने की प्रतीक्षा करनी पड़ी। 2010 वाले दशक में तो इंटरनेट आ चुका था, 2015-16 तक तो हमारे हाथों में 4G आ गया था, फिर भी हम तक वो कहानियाँ क्यों नहीं आईं! क्योंकि हम एनिवर्सरी का, सालगिरह की प्रतीक्षा करते हैं या फिर हमारे इंतजार का कारण हमारी सामूहिक विस्मृति है, जिसे तारीखों का भान सिर्फ वर्तमान को जी लेने भर के लिए ही रहता है।

हम भूल जाते हैं कि इतिहास भी कभी वर्तमान था, और आज का वर्तमान भी किसी के लिए इतिहास होगा। स्कूलों में जब आतंकवादी मुगलों को शहंशाह और आलमगीर जैसे विशेषणों के साथ पढ़ाया गया, महान भारतीय चक्रवर्ती सम्राटों को अनुच्छेदों में समेट कर बलात्करियों और मूर्तिभंजक मुगलों के समक्ष बौना कर दिया गया, तो कश्मीरी हिन्दुओं का रक्तिम वर्तमान, जिस घाव के ऊपर अभी भी पपड़ी सूखी नहीं है, नाखून धँसाने से रिसने लगती है, उसे कैसे बताया जाता!

वो भी इस दौर में जहाँ कश्मीर को डल झील की जमी हुई बर्फ पर क्रिकेट खेलते बच्चों की सालाना तस्वीर में ही निपटा दिया जाता है। हमें तो बताया ही नहीं जाता कि फ़ेरन के नीचे की काँगड़ी में बारूद किसने रखा! हमें तो उस त्रासदी को ‘कश्मीरी पंडितों के पलायन के इतने साल’ जैसे वाक्यांशों में समेटने लायक ही जानकारी दी जाती रही है।

ये तो बताया ही नहीं गया कि मंदिरों पर लाउडस्पीकर लगा कर नमाज क्यों पढ़ रहे थे वो लोग? ये तो कहा ही नहीं गया कि उन्हीं लाउडस्पीकरों से ‘हमें कश्मीरी हिन्दू औरतें और लड़कियाँ चाहिए’ की भी आवाज़ें आ रही थीं! आठ लाख लोगों को घर छोड़ कर निकलना पड़ा क्योंकि उनके मंदिरों में एके सैंतालीस नहीं बाँटे गए, न ही मंगलवार को पत्थरबाजी की, महिलाओं के बलात्कार की, पुरुषों की हत्या की, पड़ोसियों को आतंकियों के हवाले करने का प्रशिक्षण दिया गया था।

कश्मीरी हिन्दू बस चार सौ सालों के इस्लामी शासन में शिव, शारदा और बौद्ध दर्शन के मुख्य केन्द्रों से बलात्कारी और हिंसक कट्टरपंथियों के ठिकाने में बदल दिए गए। तो क्या 1990 का नरसंहार और पलायन पहला था? एक पूरा इलाका इस्लामी ही नहीं बना, बल्कि समुदाय विशेष की जनसंख्या 96% हो गई। ऐसा सिर्फ अपने बच्चे पैदा करने से नहीं होता, बल्कि दूसरों के कत्ल, उनकी आस्था पर चोट और हिंसा से संभव होता है। वो इतिहास तो हम तक अभी भी नहीं पहुँचा है। हमें तो उस दौर के पन्ने दिखाए भी नहीं गए हैं।

बॉलीवुड के धूर्त लोग

तीस साल जब बीते, तब कहीं-कहीं चर्चा शुरू हुई। श्रद्धांजलि सभाएँ, सालाना ‘कश्मीरी पंडितों के पलायन के तीस साल’ वाले कॉपी-पेस्ट लेख और श्वेत-श्याम तस्वीरें, कुछ भाषण, कुछ बयान आदि आए और चले गए। लेकिन इसके साथ एक बात और हुई। एक पोस्टर आया जिसमें विधु विनोद चोपड़ा ने ‘कश्मीरी पंडितों के पलायन की अनकही कहानी’ पर फ़िल्म बनाने की बात की।

अपने ही घर से बेघर कश्मीरी हिन्दुओं ने सोचा कि चलो किसी को तो सुधि आई, किसी ने तो इतना सोचा। लेकिन कुछ लोग विधु विनोद चोपड़ा को लेकर सशंकित थे। ट्रेलर आया तो चोपड़ा जी की करतूत का थोड़ा भेद खुला। उसके बाद जैसे-जैसे प्रमोशन होने लगा, फिर शाहीन बाग उसमें जुड़ने लगा, फिर निर्देशक और लेख आदि जैसे-जैसे पोलिटिकली करेक्ट बातें करने लगे, सारा खेल समझ में आने लगा कि इसमें क्या हुआ होगा।

फिर भी, लोगों ने इंतजार करना बेहतर समझा। हालाँकि, रवीश कुमार जैसे प्रपंचियों ने ‘मैंने सबको सॉरी कहा’ कह कर मानवता की अप्रतिम मिसाल बन कर सामने आने की कोशिश की, और विधु विनोद चोपड़ा सहित, कई लोग जो इस फिल्म से जुड़े थे, सेकुलर बनने के रोग से ग्रस्त हुए। बातें कही जाने लगीं कि हमें नफरत नहीं फैलाना चाहिए, एक दूसरे को सॉरी बोल कर आगे बढ़ना चाहिए, दो बिछड़े दोस्तों की तरह मिलना चाहिए…

मतलब? हिन्दू किस बात के लिए कट्टरपंथियों को सॉरी बोले? क्या वो इसलिए सॉरी बोले कि उसकी एक बेटी का रेप हुआ, दूसरी को बचा कर भाग आया? क्या पति के खून से सने चावल खाने को मजबूर बीके गंजू की पत्नी को सॉरी बोलना चाहिए कि आतंकियों से बचने के लिए वो चावल के कनस्तर में छुप रही थी, उन्हें खोजने में समस्या हुई होगी! क्या भूषण लाल रैना के परिवार वाले (अगर ज़िंदा हैं कहीं तो) कट्टरपंथियों से माफी माँगे कि जब उनके सर में रॉड घुसाने के बाद, उन्हें नग्न कर के, पेड़ में कीलों से ठोका जा रहा था तब उन्होंने अपने बेजान हाथों से उन्हें दूसरी कील नहीं थमाई?

ये जो सेकुलरिज्म है, जहाँ हमें इतिहास को जीभ से चाट कर प्लेट को साफ करने की तरह बताने की कोशिश की जा रही है, वो सर्वथा गलत है, एक पाप है जो हम अपने साथ कर रहे हैं। कश्मीर का समुदाय विशेष और वो तमाम लोग जो इस पर चुप रहते हैं, किसी भी तरह की माफी के लायक नहीं हैं। हर भारतीय हिन्दू को, और गैर-मुस्लिम अल्पसंख्यकों को कश्मीर याद रहना चाहिए।

क्या हिटलर द्वारा यहूदियों के नरसंहारों के लिए नाज़ी सैनिकों को माफ कर दिया विश्व ने? या आज भी अगर वो 94 साल का व्हीलचेयर से बँधा रैनहोल्ड हैनिंग भी हो, जो उसी ऑश्विट्ज़ मृत्यु शिविर का गार्ड था जहाँ 1,70,000 लोगों की हत्या की गई थी, उसे भी खोज कर न्यायिक प्रक्रिया से गुजार कर एक राष्ट्र उस अपराध को स्वीकार रहा है जो किसी और ने उसी सत्ता की कुर्सी पर आसीन हो कर किया था?

उन्हें माफ कैसे कर दिया जाए जिन्होंने गिरिजा टिक्कू का सामूहिक बलात्कार किया, और जीवित अवस्था में ही बढ़ई की आरी से उसे चीर दिया? और क्यों माफ कर दें? क्योंकि वो ख़ास मजहब से हैं? क्योंकि यह समुदाय इस देश की दूसरी सबसे बड़ी आबादी हो कर भी अल्पसंख्यकों का दर्जा लिए पीड़ित होने का स्वाँग रचता है? क्योंकि ये लोग जहाँ भी हैं, उसने वहाँ के दूसरे समुदायों ने निशाना बना रखा है?

कश्मीर के कट्टरपंथियों ने वहाँ ख़िलाफ़त खड़ा किया हुआ था, और आज भी है। यही क्रूर सत्य है। इन दरिंदों को माफ़ करना उन तमाम मृत शरीरों को आरी से काटने जैसा है, उनके गालों को चाकू से छीलने जैसा है, नग्नावस्था में पेड़ पर कील से ठोकने जैसा है, जिनकी आत्मा शायद आज भी न्याय के लिए भटक रही होगी। इन दरिंदों को माफ़ कैसे कर दें! जिन कहानियों को सुन कर हृदय काँप उठता है, उनके हत्यारों की ‘सॉरी’ सुन कर ‘मूव ऑन’ कैसे कर जाएँ?

विधु विनोद चोपड़ा हमारे बॉलीवुड के निर्देशक हैं। उनको पैसा कमाना है। कश्मीरी हिन्दुओं की व्यथा के नाम पर प्रमोशन भी करना है, और वैलेंटाइन वीक में प्रेमी युगलों को बर्फ और वादी में सिमटते देहों का प्रेम भी दिखाना है। उन्हें यह भी दिखाना है कि कैसे हिन्दू का वो बच्चा रेडिकलाइज्ड है जो कहता है ‘मंदिर वहीं बनाएँगे’, और उन ‘शांतिप्रियों’ को सेकुलर भी कहना है जिन्होंने मंदिरों को मस्जिद बना दिया… इतनी मेहनत की है चोपड़ा साहब ने, बधाई तो देना ही चाहिए!

पॉपुलर कल्चर में नरसंहार को प्रेम कहानी बनाने की चाह

विधु विनोद चोपड़ा की पिछली फ़िल्म ‘संजू’ थी, जिसमें संजय दत्त की ‘माँ कसम सच्ची कहानी’ बताई गई थी। बायोपिक कह कर दर्शकों के सामने एक निर्दोष इन्सान की कहानी परोसी गई, अच्छी चली फिल्म। अब किसी को उस समय के अखबारों की कवरेज, कोर्ट के केस, पुलिस का पक्ष आदि जानने की आवश्यकता नहीं, फिल्म देख लीजिए और इतिहास समझ जाइए क्योंकि ये तो बायोपिक है।

उसी तरह, यह भी एक बायोपिक है, लेकिन यहाँ किसी एक व्यक्ति की कहानी नहीं बेची जा रही, बल्कि एक समूह की है। चोपड़ा साहब कर्ता-धर्ता हैं तो आशानुरूप सच्चाई को फ़ेरन में छुपा कर, शिकारे के ऊपर बने कमरे में छुपा दिया गया और झील दिखा कर, संगीत बजा कर, कह दिया गया कि सब प्रेम है, कश्मीर में तो बस प्रेम ही था, वो तो हिन्दुओं को पता नहीं क्या सूझी कि एक रात भाग गए… मुझे लगता है इस्लामोफोबिक हैं सारे कश्मीरी हिन्दू!

ऐसा कर पाना कि इतिहास को पूरी तरह से मरोड़ कर दिखाने के बाद, उन्हीं लोगों को नीचा दिखाना जिन पर अत्याचार हुए, एक अलग स्तर का कौशल माँगता है। विधु जी में वो कौशल है, राहुल पंडिता में वो कौशल है! आश्चर्य की बात यह है कि इस त्रासदी में भी प्रेम खोज लेना, और उसे ऐसे दिखा देना कि थोड़े-बहुत दंगे भी हो गए, लाउडस्पीकर पर ऐलान भी हो गया, जलते घर भी दिखा दिए, फिर ‘कम ऑन बेबी, डॉन्ट बी मीन’ कर देना, टैलेंट तो माँगता है भाई!

पोस्टर पर लिखा है ‘द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ कश्मीरी पंडित्स’। इसके एक-एक शब्द को ध्यान से समझिए। यह ‘एन अनटोल्ड स्टोरी’ नहीं है, जिसका मतलब होता है ‘एक अनकही कहानी’, बल्कि ‘द अनटोल्ड स्टोरी’ है, जिसका मतलब है ‘वो अनकही कहानी’। यहाँ ‘एक’ कहानी होती तो, समझ में आता कि किसी एक जोड़े की कहानी हो सकती है, लेकिन जब ‘द’ नामक आर्टिकल का प्रयोग होता है तो वो इस संदर्भ में एक पूरे घटनाक्रम, एक सामूहिक परिस्थिति, एक सार्वजिनक कहानी की बात करता है।

‘अनटोल्ड’ का अर्थ होता है ‘अनकही’, जिसे कहा नहीं गया हो। इस पोस्टर और फिल्म के संदर्भ में इसका अर्थ यह है कि वह कहानी जिसके बारे में सब जानते तो हैं, लेकिन उसे विस्तार से, एक नए माध्यम से, समुचित ट्रीटमेंट के साथ कभी प्रस्तुत नहीं किया गया हो। आप ऐसी कहानी कहने का दावा कर रहे हैं जो सबको जाननी चाहिए, लेकिन कोई जानता नहीं। कश्मीरी पंडितों के संदर्भ में, वो कहानी प्रेम की हो ही नहीं सकती, त्रासदी थी वो, त्रासदी है वो, और जितनी कोशिशें कर लो, त्रासदी ही रहेगी।

और, ये कहानी है किसकी? ‘ऑफ़ कश्मीरी पंडित्स’। यह भी एक अद्भुत बात है कि जिन लोगों को कश्मीर से भगाया गया, उन्हें सिर्फ और सिर्फ उनके धर्म के कारण भगाया गया, उन्हें भी एक जातीय नाम में बाँध कर सीमित किया जाता रहा है। क्या कश्मीरी हिन्दुओं को उनकी जाति के कारण मारा गया, बलात्कार किया गया? क्या उनके मंदिर जातियों के लिए बने थे, जिन्हें तोड़ा गया? फिर उनके इस नरसंहार और पलायन में ‘पंडित’ होने का प्रमुखता क्यों दी जाती है?

वामपंथियों का यह खेल बहुत पुराना है। अवचेतन स्तर पर यह हिन्दू समाज को बाँटने की निंजा तकनीक है। यहाँ ‘पंडित’ लगाते ही उनके साथ हुए इस नृशंसता की लिए स्वानुभूति जातिगत हो जाएगी, सीमित हो जाएगी, बँट जाएगी। ब्राह्मणों का नाम आते ही यहाँ सवर्ण-बनाम-दलित वाली चर्चा में इसे हेय दृष्टि से देखा जाएगा, और लोगों से कहा जाएगा कि जो हुआ, सही हुआ क्योंकि वो तो ब्राह्मण थे, जिन्होंने पाँच हजार सालों तक तुम्हें घोड़े में बाँध कर घसीटा है। हालाँकि, पाँच हजार साल तो छोड़िए, मुगल आतंकवादियों और अंग्रेज लुटेरों के आने के पहले जातिगत भेदभाव का एक जिक्र कोई दिखा दे मुझे!

शब्द बहुत मनन-चिंतन के बाद चुने जाते हैं। वामपंथी आपकी त्रासदी पर हमेशा ही हँसेंगे, और उसके लिए वो शब्द, कहानी और फिल्म गढ़े लेंगे। हिन्दू को पंडित बता कर समेट लिया जाएगा, नरसंहार की सामूहिक त्रासदी पर वैयक्तिक प्रेम कहानी को भारी बना दिया जाएगा। दो मुस्लिम अदाकारों से कश्मीरी हिन्दुओं का किरदार निभाता दिखाया जाएगा जैसे ये कोई अहसान किया जा रहा हो कि वो समुदाय विशेष से हैं फिर भी देखो हिन्दू बन रहे हैं! सही बात है, विश्व शांति के लिए नोबेल पुरस्कार दे दिया जाए इन्हें क्योंकि अहसान तो है ही कि… ख़ैर, रहने दीजिए!

कश्मीरी हिन्दुओं की चेतना पर प्रहार

यह एक सामान्य घटना नहीं है। जब बलात्कारी बाबर और आतंकवादी औरंगजेब जैसों के नाम पर सड़कें और इमारतें अभी भी इस राष्ट्र की राजधानी की शोभा बढ़ा रही हैं, तो फिर कश्मीरी हिन्दुओं के नरसंहार करने वालों को भारत रत्न भी दिया जा सकता है। कश्मीर के तो वो रत्न होंगे ही। जिन लोगों ने तीस हज़ार से ज़्यादा मंदिर तोड़े, हजारों गाँवों को जलाया, लाखों हिन्दुओं को काटा, मतपरिवर्तन कराया, उनकी बच्चियों को हरम में डाला, हिन्दू शासकों की राजकुमारियों को मुस्लिमों को उपहार में बँटवाया, जब हम उनका गुणगान कर सकते हैं, तो कश्मीरी मुस्लिम तो उनके सामने बहुत छोटे हैं!

इसके लिए तो वाक़ई एक फिल्म काफी होती अगर इस पर चर्चा शुरू न होती, और दिव्या राजदान जैसे लोग भरे थिएटर में निर्देशक और लेखक को जलील न करते। फिल्म इतनी बर्बाद बनी है कि सारे वामपंथी और आतंकियों के हिमायती मिल कर भी शायद लागत भी वसूल न पाएँ। रविवार को हर जगह खाली थिएटर इस बात का सबूत देते हैं कि लोगों में जागरूकता बढ़ी है। और ये जागरूकता उन लोगों में बढ़ी है जो नाम देख कर सिनेमा देखते थे, और ऐसे निर्देशकों को अरबपति बनाते रहे जिन्होंने हमेशा अजेंडा ढकेला है, सिनेमा नहीं बनाया।

इस गिरोह को प्रस्तर पर पटकनी देना आवश्यक है। इन्होंने वर्तमान में तो हमेशा ही अजेंडा बेचा है, लेकिन कश्मीरी हिन्दुओं के नरसंहार में ‘मंदिर वहीं बनाएँगे’ घुसेड़ देना बताता है कि ये इतिहास का पुनर्लेखन करने की मंशा रखते हैं। बीस साल पहले ऐसा करते, तो संभव भी था। संभव वैसे ही हो जाता जैसे बॉलीवुड के कारण हर साधु को प्रथमदृष्ट्या बहुरूपिया मान लिया जाता है, हर बनिया सूदखोर हो जाता है, हर ब्राह्मण व्यभिचारी दिखने लगता है, जबकि हर अब्दुल का बाप ‘मेरा एक और भी बेटा होता तो’ वाला भावुक संवाद बोलता है, और अनाथों को पालने का जिम्मा उठाता मिलता है।

नज़र घुमा कर देखिए कि कितने प्रतिशत साधु किसी को ठगते नजर आते हैं? कितने प्रतिशत ब्राह्मण व्यभिचार या अन्य कुकर्मों में संलिप्त दिखते हैं! कितने प्रतिशत लाला किसी के माँ के कंगन लेने को आतुर रहता है? लेकिन एक ही तरह के पात्र, एक ही तरह के गलत काम करते, कई फिल्मों में आपको दिखेंगे। फिर हर ब्राह्मण शक के दायरे में आ जाता है, और हम धीरे-धीरे पूरी जाति से ही घृणा करने लगते हैं। टोलियाँ बन जाती हैं, झंडे का रंग बदल जाता है, और समाज टूटने लगता है।

वही हाल यहाँ कश्मीरी हिन्दुओं का बनाने की कोशिश हुई है। कल को कोई डायरेक्टर उठेगा और कश्मीर घाटी में किसी असलम और सलमा को हिन्दुओं से प्रताड़ित होता दिखाएगा, फिर हम मान लेंगे कि ज़रूर हिन्दुओं ने ही कुछ किया होगा, ये तो बेचारे किसी तरह बकरी पाल कर गुजर-बसर कर रहे थे। कुछ लोग सवाल पूछने लगे हैं कि ‘कुछ तो किया होगा यार, पागल थोड़े ही थे कि एक रात उठे और भगा दिया?’

फिर आप वहीं से सोचना शुरू करते हैं। आप इस्लामी उम्माह और ख़िलाफ़त के संदर्भ को भुला देते हैं, आपको यह भी याद नहीं रहता कि रोहिंग्याओं ने म्यांमार में बौद्धों को हथियार उठाने पर मजबूर कर दिया। आप यह भूल जाते हैं कि जिन यूरोपीय देशों ने इस समुदाय को शरण दी, वहाँ के हर शहर में आतंकी घटनाएँ निरंतर होती रही हैं। आप यह भूल जाते हैं कि ‘शांतिप्रियों’ को शरण देते ही स्वीडन विश्व में बलात्कार के मामले में सबसे ऊपर चला जाता है! आप यह भूल जाते हैं कि शांतिप्रिय देशों में ऐसे लोगों के कैम्प और कई इलाके जहाँ इन ‘शांतिप्रियों’ को वर्चस्व है ‘नो गो ज़ोन’ बन चुके हैं।

इसलिए, कोई आपसे यह कह देगा कि ‘यार, कुछ तो किया होगा न, ऐसे ही थोड़े कोई भगा देगा किसी को’, तो उसे खींच कर ऐसा तमाचा मारिए कि उसका मस्तिष्क झंकृत हो उठे और वो सोचे कि यह प्रश्न कितना वाहियात था। हमें, जानने की आवश्यकता है कि वो कहानियाँ कौन-सी हैं, जो आज तक गायब हैं। आठ लाख लोगों को पलायन सिर्फ तीस साल पहले हुआ है, हर व्यक्ति के पास एक कहानी होगी।

ऐसे लोगों को खोजिए, और पूछिए उनसे कि उनका गुनाह क्या था। उनसे समझिए कि समुदाय विशेष की बस्ती में हिन्दू होने के क्या मायने हैं। जानने की हर संभव कोशिश कीजिए कि आपका पड़ोसी किसी आतंकवादी को आपका पता क्यों बता देगा। इस सोच को जाँचिए जो अपने दोस्त से मिलने का समय माँगता है, घर जाता है, लालचौक को जाती मेटाडोर में बैठता है, रास्ते में उसी दोस्त की छाती में गोली मारता है, शरीर को घसीटता है, और सबके देखने के लिए सड़क पर छोड़ देता है।

फिर आपको पता चलेगा कि ये जीवन नहीं है, युद्ध है इनके लिए जिसमें ये तब तक लड़ते रहेंगे, जब तक जीत न जाएँ। दस साल, बीस साल, पचास साल, सौ साल, हजार साल… चार सौ साल में कश्मीर से हिन्दू कैसे खाली हो गए कि पाँच सौंवे साल में, लोकतंत्र होते हुए भी, सरकार और सेना आठ लाख लोगों के पलायन को रोक न सकी?

सोचिए इस पर, वरना प्रेम कहानी के चुम्मे में वन्धामा की 23 लाशों की विद्रूपता छुपा दी जाएगी। शिकारे पर बैठी नायिका की काली जुल्फों में सिगरेट से पूरे शरीर को जलाने के बाद, सर्वानंद कौल और उनके पुत्र की आँखें निकाल लेने की इस्लामी कलाकृति गायब कर दी जाएगी। हताश नायक की अनवरत हिलती पुतलियों में जीवित अवस्था में पीएन कौल की चमड़ी उतार कर मरने के लिए छोड़ देने की घटना भुला दी जाएगी। बर्फ की वादियों में घुटनों में गोली खाए अशोक कुमार काज़ी के बाल उखाड़ने पर निकली चीख और नवीन सप्रू के शरीर में जानबूझकर मुख्य अंगों में गोली न मार कर उनकी तड़प को देखने वाले लोगों की हँसी गुम कर दी जाएगी।

इस फ़िल्म को मत देखिए, इसकी मंशा को समझिए कि वो आपको क्या दिखाना नहीं चाहते। खोजिए, पढ़िए, जानिए, और समझिए कि हिन्दुओं के साथ क्या हुआ था, और क्या हो रहा है।

शिकारा रिव्यू: 90 में इस्लाम ने रौंदा, 2020 में बॉलीवुड कश्मीरी हिंदुओं पर रगड़ रहा नमक

‘कश्मीरी हिन्दुओं पर थूकने का काम करती है शिकारा फिल्म, उल्टे हिन्दुओं को ही कम्युनल कहती है’

छिपाया जा रहा कश्मीरी पंडितों का दर्द?: ‘शिकारा’ के कुछ पोस्टरों में इसे बताया गया ‘लव स्टोरी’

शाहीन बाग में फ्री लंगर का AIMIM कनेक्शन: AAP, कॉन्ग्रेस, PFI के बाद अब ओवैसी का भी साथ

दिल्ली के शाहीन बाग में CAA-NRC के खिलाफ पिछले लगभग 2 महीने से विरोध प्रदर्शन हो रहा है। यहाँ प्रदर्शन के नाम पर हिंदू विरोधी, देश विरोधी और आजादी के नारे लगाए जा रहे हैं। अब तक इस प्रदर्शन को आम आदमी पार्टी, कॉन्ग्रेस और PFI के समर्थन करने की बात सामने आई थी, लेकिन अब हैदराबाद के सांसद असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM के भी इसमें शामिल होने की बात सामने आई है। AIMIM के दिल्ली महासचिव पर अपना फ्लैट बेचकर शाहीन बाग में खाने-पीने का इंतजाम करने का आरोप है, जिसे मीडिया गिरोह ने ‘मुस्लिम-सिख एकता’ की चासनी में डूबो कर बेचा।

ट्विटर पर goyalsanjeev नाम के यूजर ने लिखा कि दिल्ली में AIMIM की एक रैली में मुस्लिमों को उकसाते हुए कहा गया था, “क्या मुस्लिमों के साथ भी हो सकता है 1984?” उन्होंने आगे लिखा कि इसके बाद इसमें कोई हैरानी कि बाद नहीं है कि वो शाहीन बाग प्रदर्शन का समर्थन कर रहे हैं और खाना उपलब्ध करा रहे हैं।

दरअसल इन दिनों एक खबर पूरी मीडिया में घूम रही है कि डीएस बिंद्रा ने शाहीन बाग के प्रदर्शनकारियों को लंगर खिलाने के लिए अपना फ्लैट तक बेच दिया। इसके लिए इन्हें काफी तारीफें भी मिल रही हैं। आपको बता दें कि ये डीएस बिंद्रा AIMIM के दिल्ली महासचिव हैं और बताया जा रहा है कि उन्होंने जो फ्लैट बेचा है, वो बिंद्रा ने AIMIM के पैसे से खरीदा था। जिसे बेचकर अब वो लंगर के पैसे जुटाने का नाटक कर रहे हैं।

एक यूजर ने लिखा कि एडवोकेट डी एस बिंद्रा AIMIM के अधिकारी हैं और उन्होंने ये काम खुद को धर्मनिरपेक्ष दिखाने के लिए नहीं बल्कि अपने राजनीतिक प्रोपेगेंडा को भुनाने के लिए किया है। उन्होंने अपना फ्लैट बेचकर शाहीन बाग को फंडिग दी है।

इससे पहले भी इस प्रदर्शन ने कई सवाल पैदा किए। प्रदर्शन के लिए फंडिंग कौन कर रहा है? प्रदर्शनकारियों के खाने-पीने का इंतजाम कहाँ से हो रहा है? उनका खर्च कौन उठा रहा है? जिस तरह के वीडियो सामने आए हैं, उससे यह भी सवाल पैदा हुआ है कि यह किसकी साजिश है? प्रदर्शनकारी किनके हाथों की कठपुतली हैं?

इसी दौरान एक वीडियो सामने आया था जिसमें आसिम तूफानी नाम के एक प्रदर्शनकारी से जब रिपोर्टर ने पूछा कि आखिर इस प्रदर्शन के लिए पैसा कहाँ से आ रहा है? तो आसिफ ने जवाब दिया कि उसे ये सब मालूम नहीं है। लेकिन, उनके लिए ये सब अल्लाह कर रहे हैं और उन्हें मिलने वाली सब सुविधा कुदरती मदद है। वे अल्लाह के बंदे हैं और उन्हें इंसान ने पैदा नहीं किया। सब ऊपर वाले ने किया।

हालाँकि इससे पहले भी ED ने शाहीन बाग में PFI के फंडिंग देने की बात कही थी, जिसमें कई दिग्गज कॉन्ग्रेस नेताओं के नाम शामिल थे। कॉन्ग्रेस के नेता मुकेश शर्मा ने खुद कबूला था कि शाहीन बाग के ‘प्रदर्शनकारियों’ को उनका समर्थन हासिल है। उन्होंने एक सभा को संबोधित करते हुए कहा था, “मैं गाँव का रहने वाला हूँ। मैं जब मदद करता हूँ तो मर्दानगी से करता हूँ। मैंने तो शाहीन बाग वालों की भी मदद कर रखी है। शाहीन बाग बाले मुझे रोज फोन करते हैं।” 

कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने भी कहा था कि राहुल गाँधी, केजरीवाल खामोश हैं, लेकिन उनके लोग खूब बोल रहे हैं। मनीष सिसोदिया बोलते हैं हम शाहीन बाग के साथ हैं। कॉन्ग्रेस के दिग्विजय सिंह और मणिशंकर अय्यर वहाँ जाकर क्या-क्या बोले हैं वो आप जानते हैं। इसके अलावा केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने भी आम आदमी पार्टी और कॉन्ग्रेस पर अल्पसंख्यकों के दिमाग में जहर घोलने का आरोप लगाया था।

वहीं  केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने शाहीन बाग पर कहा था कि शाहीन बाग में आम आदमी पार्टी और कॉन्ग्रेस, जो 2019 लोकसभा का चुनाव नही जीत पाईं, वो देश को तोड़ने की बातों का समर्थन कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि आम आदमी पार्टी के नेता मनीष सिसोदिया ने शाहीनबाग के प्रदर्शनकारियों को समर्थन दिया है। वहाँ देश विरोधी व संविधान विरोधी नारे लग रहे हैं। देश को बाँटने की बात की जा रही है। ये राजनीतिक दल 2019 के चुनाव में मिली हार को पचा नहीं पा रहे हैं। शाहीन बाग में अमानतुल्लाह खान के पोस्टर और पेम्फ्लेट्स बाँटते हुए देखे गए थे।

उल्लेखनीय है कि दिल्ली के शाहीन बाग में ‘जिन्ना वली आज़ादी ’के नारे लगाए गए थे। ये नारे शाहीन बाग के विरोधियों की मंशा की तरफ इशारा किया था, जो कि देश तोड़ना चाहते हैं। अब इसमें AAP, PFI और कॉन्ग्रेस के शामिल होने के साथ ही AIMIM का हाथ भी सामने आ गया है।

हिन्दुओं! उपकार मानो कि शाहीन बाग़ ने एक शव यात्रा के लिए रास्ता दिया है, वो चाहते तो…

बंद करो शाहीन बाग़ प्रदर्शन: ठंडे पड़े दारुल उलूम देवबंद के तेवर, विदेशी फंडिंग की खुल रही है पोल

शाहीन बाग़ में इस्लामी कट्टरपंथी PFI के पैसों का खेल: ED की छापेमारी से कॉन्ग्रेस-AAP का भी पर्दाफाश

‘इस्लाम कबूल नहीं, डर कर किया था निकाह’ – नाबालिग हिन्दू लड़की के लिए कट्टरपंथियों ने माँगी मौत की सजा

हिन्दू नाबालिग लड़की महक कुमारी ने कोर्ट में दिए गए अपने पूर्व के बयान को दबाव तथा भय का परिणाम बताया है। लेकिन बजाय उसे सुरक्षा प्रदान करने के, उसके बयान से मुकर जाने पर पाकिस्तान के इस्लामी कट्टरपंथियों ने उसे खुलेआम धमकियाँ देना शुरू कर दिया है।

नाबालिग महक कुमारी ने कट्टरपंथियों पर जबरन इस्लाम कबूल करवाने का आरोप लगाते हुए इस्लाम छोड़ने की बात कही। इस पर इस्लामी कट्टरपंथियों ने उस पर इस्लाम को बेइज्जत करने का आरोप लगाते हुए उसके लिए मौत की सजा की माँग की है।

रिपोर्ट्स के अनुसार पाकिस्तान के स्थानीय चैनल से बात करते हुए एक मौलवी ने कहा कि उन सभी के लिए जिन्होंने अपने मजहब को छोड़ दूसरा मजहब कबूला है, हम सजा की माँग करेंगे। मौलवी ने मीडिया से बातचीत में आगे कहा कि वे सेशन कोर्ट की जाँच और प्रक्रियाओं को ख़ारिज करते हुए, मामले को हाईकोर्ट लेकर जा चुके हैं। तथा, जरूरत पड़ने पर इस मामले को सुप्रीम कोर्ट तथा शरीयत की अदालत तक भी लेकर जाएँगे यदि “मामले का निपटारा उनके मन मुताबिक नहीं हुआ तो।”

महक ने पहले के अपने कोर्ट को दिए बयान में स्वेच्छा से बिना किसी दबाव इस्लाम कबूल करने और अली रजा नामक मुस्लिम के साथ निकाह करने की बात कही थी। हालाँकि नाबालिग हिन्दू लड़की महक कुमारी के धर्मांतरण पर पाकिस्तान की माइनॉरिटी हिन्दू कम्युनिटी ने आए दिन होते इस तरह के जबरन धर्मांतरण, जहाँ हिन्दू लड़कियों को चुन-चुन कर निशाना बनाया जा रहा है, के पीछे प्रशासनिक अधिकारियों और मौलवियों की मिली भगत होने का आरोप लगाया था।

महक के कोर्ट में दिए गए बयान को उसके माँ बाप ने भी यह कहते अस्वीकार कर दिया था, “जब पाकिस्तान में नाबालिग को मताधिकार नहीं दिया जाता, जब नाबालिग को ड्राइविंग लाइसेंस नहीं दिया जाता, फिर कैसे एक नाबालिग को बिना उसके परिवार की रजामंदी के बिना धर्म बदल किसी मुस्लिम आदमी से शादी करने की इजाजत हो सकती है?”

याद रहे कि पिछली 15 जनवरी को पाकिस्तान के सिंध प्रान्त के जैकबाबाद से महक कुमारी का अपहरण कर लिया गया था। जिसका बाद में इस्लाम में धर्मांतरण कर एक, मुस्लिम आदमी से निकाह पढ़वा दिया।

मैं अली के साथ नहीं रहना चाहती, मुझे इस्लाम कबूल नहीं: 15 साल की लड़की ने कोर्ट में लगाई गुहार

15 साल की हिन्दू लड़की ने अमरोत शरीफ में क़बूल किया इस्लाम, 4 बच्चों के बाप से हुआ निक़ाह

मस्जिद के स्पीकर्स से होंगे बिजली बिल, सरकारी संदेशों की घोषणा: योगी सरकार का फैसला मंदिरों पर भी

अक्सर मंदिर-मस्जिदों के लाउडस्पीकर का इस्तेमाल धार्मिक कार्यक्रमों में ही होते देखा जाता है। लेकिन अब सरकार चाहती है कि इनका इस्तेमाल आम जनता के लिए और तरीकों से भी किया जाए। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मंदिरों और मस्जिदों से अब धार्मिक संदेशों के अलावा सरकारी विज्ञापन भी सुनाई देंगे।

यह योजना पश्चिमांचल विद्युत वितरण निगम लिमिटेड (PVVNL) ने बनाई है। पश्चिमांचल विद्युत वितरण निगम लिमिटेड (PVVNL) के अधिकार क्षेत्र में आने वाले पश्चिमी उत्तर प्रदेश के 14 जिलों, जिसमें मेरठ, बागपत, गाजियाबाद, बुलंदशहर, हापुड़, गौतम बुद्धनगर, सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, शामली, मुरादाबाद, संभल, अमरोहा, रामपुर और बिजनौर हैं, में यह योजना लागू की जाएगी।

उत्तर प्रदेश के पश्चिमी जिलों में बिजली के बकाया भुगतानों और नई योजनाओं को बताने के लिए मंदिर और मस्जिद में लगे लाउड स्पीकर्स का उपयोग किया जाएगा। विभाग चाहता है कि किसानों के लिए आसान किस्तों में ट्यूबवेल योजना के अलावा चल रही अन्य स्कीमों के बारे में जानकारी देने के लिए इसका इस्तेमाल किया जाए।

रिपोर्ट्स के अनुसार, निगम के प्रबंध निदेशक अरविंद मल्लप्पा बंगारी ने बताया कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के 14 जिलों में बिजली बिलों के भुगतान के लिए मंदिर और मस्जिदों से अपील की जाएगी। उन्होंने कहा कि लाउड स्पीकर्स का प्रयोग करने से इसका संदेश लोगों के बीच तेजी से पहुँचेगा, जिससे योजना का लाभ सभी लोग आसानी से उठा सकते हैं। उन्होंने बताया कि आसान किस्त योजना के तहत लोगों से बिजली बिलों की वसूली के लिए गाँव-गाँव में कैंप लगाए जाएँगे और लोगों को प्रेरित किया जाएगा।

पुलवामा में आतंकियों ने गोली मारकर की हत्या, अफजल गुरू की फाँसी की बरसी पर दी गई थी ‘धमकी’

जम्मू-कश्मीर के पुलवामा से अभी-अभी खबर आई है। पुलवामा के त्राल इलाके में आतंकियों ने एक आम कश्मीरी की गोली मारकर हत्या कर दी। बताया जा रहा है कि मृतक नबी मीर पेशे से ठेकेदार थे।

गौरतलब है कि आज अफजल गुरू की फाँसी की बरसी के चलते घाटी में जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (JKLF) ने बंद का ऐलान किया है। यह बंद 9 फरवरी और 11 फरवरी को बुलाया गया है। 11 फरवरी को नेशनल लिबरेशन फ्रंट के संस्थापक मकबूल भट्ट की भी बरसी है, जिसके चलते 11 फरवरी को इस बंद का ऐलान किया गया है। मकबूल भट्ट को 1984 में फाँसी पर लटकाया गया था।

इसके बाद रविवार फरवरी 09, 2020 सुबह ही पुलिस ने कश्मीर में हिंसा भड़काने और कानून-व्यवस्था को बाधित करने की कोशिशों के आरोप में प्रतिबंधित संगठन जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (JKLF) के खिलाफ मामला दर्ज किया। रिपोर्ट्स के अनुसार, पुलिस के एक प्रवक्ता ने कहा, ”पुलिस ने घाटी में हिंसा भड़काने और कानून-व्यवस्था को बाधित करने के जेकेएलएफ के प्रयासों को संज्ञान में लिया है।’’

पुलिस ने यह भी बताया था कि प्रतिबंधित कट्टरपंथी संगठन जेकेएलएफ से सम्बंधित संगठनों ने घाटी में आने वाले दिनों में हिंसा की घोषणा करते हुए पर्चे बाँटे हैं और वे एक गैरकानूनी संगठन के संदेशों और गतिविधियों का प्रचार कर रहे हैं।

आतंकी अफजल गुरु की बरसी पर फिदायीन हमले की आशंका: अलर्ट जारी, घाटी में इंटरनेट बंद

महिला IPS असलम खान ने की पुलवामा के आतंकी ‘जैसी बात’, खुलेआम गौमूत्र पर कसा तंज

पुलवामा में जैश, लश्कर और हिज़्बुल की गुप्त बैठक, Pak ने आतंकियों को सौंपे अलग-अलग टास्क