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खेलो इंडिया: बारी-बारी से शीतकालीन खेलों की मेजबानी करेंगे लद्दाख और J&K, रिजिजू ने किया ऐलान

केंद्रीय खेल मंत्री किरेन रिजिजू ने बृहस्पतिवार (फरवरी 13, 2020) को घोषणा करते हुए बताया कि केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख इस महीने पहले ‘खेलो इंडिया’ (Khelo India) शीतकालीन खेलों की मेजबानी करेगा, जबकि मार्च में इस तरह की प्रतियोगिता जम्मू-कश्मीर में आयोजित की जाएगी।

इस महीने लद्दाख और मार्च में जम्मू कश्मीर अपने पहले ‘खेलो इंडिया’ शीतकालीन खेलों की मेजबानी करेगा। खेलो इंडिया शीतकालीन खेलों की दोनों प्रतियोगिताओं का खर्चा खेल मंत्रालय उठाएगा। पहली प्रतियोगिता लद्दाख में फरवरी के तीसरे हफ्ते, जबकि दूसरी प्रतियोगिता जम्मू-कश्मीर में मार्च के पहले हफ्ते में होगी।

1,700 खिलाड़ी लेंगे हिस्सा

खेलो इंडिया लद्दाख शीतकालीन खेलों में आईस हॉकी चैंपियनशिप, फिगर स्केटिंग और स्पीड स्केटिंग स्पर्धाएँ होंगी और इस प्रतियोगिता का आयोजन ब्लॉक, जिला और केंद्र शासित स्तर पर किया जाएगा। इन खेलों में लगभग 1,700 खिलाड़ियों के हिस्सा लेने की उम्मीद है।

खेलो इंडिया जम्मू-कश्मीर शीतकालीन खेल गुलमर्ग के कोंगडोरी में लड़के और लड़कियों के लिए चार आयु वर्ग में होंगे। इन खेलों में 19 से 21, 17 से 18, 15 से 16 और 13 से 14 साल के आयु वर्ग के खिलाड़ी अल्पाइन स्कीइंग, क्रास कंट्री स्कीइंग, स्नो बोर्डिंग और स्नोशूइंग स्पर्धाओं में हिस्सा लेंगे।

केंद्रीय खेल मंत्री रिजिजू ने कहा कि युवाओं की ऊर्जा को सही स्थान पर लगाने के लिए खेलों से अच्छा कोई विकल्प नहीं है। उन्होंने कहा कि यह एक साल में तीसरे खेलो इंडिया खेल होंगे और सरकार ने स्वदेशी खेलों के लिए भी एक प्रतियोगिता के आयोजन की योजना बनाई है।

गौरतलब है कि भारत सरकार ने बीते साल 5 अगस्त को आर्टिकल 370 के प्रावधानों को निष्क्रिय कर दिया था। राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों में विभाजित कर दिया था। 31 अक्टूबर को जम्मू-कश्मीर विधानसभा के साथ और लद्दाख बगैर विधानसभा के केंद्र शासित प्रदेश बना।

20 साल बाद भारत लाया गया अजहर का नाम लेने वाला संजीव चावला, अगला नंबर विजय माल्या का!

क्रिकेट जगत को हिलाकर रख देने वाले साल 2000 के चर्चित मैच फिक्सिंग मामले के प्रमुख आरोपी संजीव चावला गुरुवार को भारत लाया गया। दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच की टीम उसे लंदन से लेकर आई है। 50 वर्षीय चावला को ब्रिटेन से प्रत्यर्पित कर लाया गया है।

ब्रिटेन की एक अदालत ने पिछले महीने चावला की याचिका को खारिज करते हुए उसके प्रत्यपर्ण का आदेश दिया था। मैच फिक्सिंग के इस मामले में दक्षिण अफ्रीका के पूर्व कप्तान हैंसी क्रोनिए का नाम भी सामने आया था। उनकी बाद में एक विमान हादसे में मौत हो गई थी। चावला और क्रोनिए के बीच बातचीत को इंटरसेप्ट करने के बाद दिल्ली पुलिस ने मार्च 2000 में प्राथमिकी दर्ज की थी। बातचीत के दौरान चावला ने भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान और कॉन्ग्रेस के सांसद रहे मोहम्मद अजहरुद्दीन का नाम भी लिया था।

चावला 1996 में बिजनेस वीजा पर ब्रिटेन चला गया था। 2000 में उसका भारतीय पासपोर्ट रद्द कर दिया गया।2005 में उसे ब्रिटेन की नागरिकता मिल गई। पिछले साल मार्च में ब्रिटेन के गृह मंत्री ने उसके प्रत्यर्पण का आदेश दिया था। इसके खिलाफ वह कोर्ट चला गया था। लेकिन 16 जनवरी को लंदन की वेस्टमिंस्टर कोर्ट ने उसके प्रत्यर्पण को मंजूरी दे दी।

1992 की भारत-ब्रिटेन के बीच हुई प्रत्यर्पण संधि के तहत चावला का प्रत्यर्पण हुआ है। यह इस संधि के तहत पहला हाई प्रोफाइल प्रत्यर्पण है। वर्ष 2000 में 16 फरवरी और 20 मार्च को खेले गए भारत-दक्षिण अफ्रीका क्रिकेट मैच फिक्स करने के लिए दिल्ली पुलिस ने साउथ अफ्रीका टीम के कैप्टन रह चुके दिवंगत हैंसी क्रोनिए और पांच अन्य के खिलाफ चार्जशीट दायर की थी। साउथ अफ्रीका के हर्शल गिब्स और निकी बोए के खिलाफ फिक्सिंग से जुड़े होने के पर्याप्त साक्ष्य न मिलने पर उनका नाम चार्जशीट से हटा दिया गया था। इस संबंध में पुलिस ने 2013 में चार्जशीट दाखिल की थी।

20 साल बाद संजीव चावला के प्रत्यर्पण से अन्य वांछितों को भारत लाने की उम्मीदें बढ़ी है। खासकर, भगोड़े विजय माल्या को देश लाने के मामले में कामयाबी की उम्मीद जताई जा रही है। उसके मामले में फिलहाल लंदन के कोर्ट में सुनवाई जारी है।

मदर टेरेसा की मिशनरी में लाई गई 450 गर्भवती औरतें, 280 के बच्चों का पता नहीं: बाल आयोग पहुँचा SC

मदर टेरेसा द्वारा स्थापित ‘मिशनरी ऑफ चैरिटी’ कथित तौर पर बच्चों के ख़रीद-फरोख्त में लगी हुई है। राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) ने सुप्रीम कोर्ट से निवेदन किया है कि ईसाई मिशनरी संस्थाओं द्वारा बच्चों को बेचे जाने की जाँच हेतु एक एसआईटी का गठन किया जाए। आयोग की माँग है कि ये एसआईटी सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में जाँच करे। साथ ही झारखंड में बच्चों के हितों की रक्षा के लिए जाँच हेतु एक समयावधि भी तय करने की भी माँग की गई है। ह्यूमन ट्रैफिकिंग को लेकर सजग एनसीपीसीआर पहले बार सुप्रीम कोर्ट पहुँचा है।

सीजेआई एसए बोबडे की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने इस मामले में झारखंड, अरुणाचल प्रदेश, पश्चिम बंगाल, असम, पंजाब, बिहार, मध्य प्रदेश, केरल और महारष्ट्र की सरकारों को नोटिस जारी किया है। आरोप है कि झारखंड में मिशनरियों द्वारा बच्चों को बेचे जाने के सम्बन्ध में सरकारी अधिकारियों ने काफ़ी ढुलमुल रवैया अपनाया है। मदर टेरेसा का संगठन कई ‘चिल्ड्रेन होम’ चलता है, जहाँ से इन बच्चों को कथित तौर पर बेचा जा रहा है। इस मामले में झारखंड सरकार को आगाह किया गया था लेकिन जाँच को रोकने के प्रयास होते रहे।

आयोग ने झारखंड के मुख्य सचिव को पत्र लिख कर इन चिल्ड्रेन होम्स में रह रहे सभी बच्चों की जानकारी और अन्य विवरण माँगे थे। साथ ही ऐसे सभी शेल्टर होम्स की भी जानकारी माँगी गई थी। आयोग ये देखना चाहता था कि इनमें से कितने रजिस्टर्ड हैं। शेल्टर होम्स में रह रहे बच्चों की एक ‘वैधानिक स्थिति’ होती है, जिसके अनुसार पता चलता है कि वो अनाथ हैं, छोड़ दिए गए हैं या फिर आत्मसमर्पण करने वाले हैं। जुलाई 2018 में आयोग ने राँची स्थित एक ऐसे ही शेल्टर होम का दौरा किया था, जहाँ बड़ी गड़बड़ियाँ पाई गई थीं। इस बारे में झारखंड के पुलिस व प्रशासन को सारी जानकारी दे दी गई थी।

ज्ञात हो कि 2018 में ‘मिशनरीज ऑफ चैरिटी’ की 2 सिस्टर्स बच्चों को बेचने के मामले में गिरफ्तार की गई थीं। 2015 से 2018 के बीच 450 गर्भवती महिलाएँ यहाँ भर्ती की गई थी। किया गया था। सबसे चौंकाने वाली बात ये है कि इनमें से सिर्फ़ 170 बच्चों का ही रिकॉर्ड दर्ज है। बाकी 280 शिशुओं के बारे में कोई जानकारी उपलब्ध नहीं कराई गई है। उनका क्या हुआ? बच्चों को बेचे जाने की पुष्टि हुई थी। वरिष्ठ अधिकारीगण इस बात की तस्दीक में जुटे हैं कि इसके तार कहाँ-कहाँ तक जुड़े हैं।

इस संबंध में एनसीपीसीआर ने कई पीड़ितों से बातचीत भी की है, जिन्होंने कई बड़े खुलासे किए हैं। इसी से मदर टेरेसा की मिशनरी द्वारा की गई गड़बड़ियों के बारे में पता चला था। लेकिन, राज्य सरकारों की नज़रअंदाज़ी के चलते कुछ कार्रवाई नहीं हुई।

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‘किसी ने यह नहीं पूछा कि देश की इकोनॉमी को 3 ट्रिलियन डॉलर तक पहुँचने में 70 साल क्यों लगे’

बुधवार (फरवरी 12, 2020) को टाइम्स नाउ समिट 2020 के पहले दिन अलग-अलग वक्ताओं ने सरकार की खूबियों और खामियों को देश की जनता के सामने पेश किया। किसी को देश तरक्की के रास्ते पर नजर आया तो किसी को लगा कि यह सरकार विभाजनकारी एजेंडे पर काम कर रही है।

इस समिट में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि भारत को तीन ट्रिलियन डॉलर की इकोनॉमी बनने में 70 साल लग गए और आश्चर्य है कि किसी ने भी यह सवाल नहीं पूछा कि इसमें इतना लंबा वक्त क्यों लग गया? प्रधानमंत्री मोदी ने पिछले 70 सालों में देश की सुस्त आर्थिक रफ्तार पर चुप्पी को लेकर भी सवाल उठाए।

‘जो लक्ष्य तय करते हैं, उन्हें आलोचनाओं का सामना करना पड़ता है’

कार्यक्रम के दौरान पीएम नरेंद्र मोदी ने सरकार के महत्वपूर्ण फैसलों को बताते हुए कहा कि जो लक्ष्य तय करते हैं, आलोचनाओं का सामना भी उन्हें ही करना पड़ता है। उन्होंने कहा कि वो अपने कर्तव्य को समझने के साथ-साथ उन लोगों से भी अपेक्षा करते हैं, जो सिर्फ अधिकारों की बात करते हैं।

पीएम ने कहा कि उन्होंने अब एक लक्ष्य तय किया है, तो उनसे सवाल पूछे जा रहे हैं। पीएम ने कहा कि उनकी सरकार इस लक्ष्य को पाने के लिए कड़ी मेहनत कर रही है। पीएम ने कहा कि एक कठिन लक्ष्य चुनना और उस पर काम करना बेहतर होता है।

पीएम नरेंद्र मोदी कहा कि दुनिया का सबसे युवा देश अब खेलने के लिए तैयार है और सरकार ने इस देश के आम लोगों की आवाज को सुना है। इसके साथ ही उन्होंने अपनी सरकार के उन महत्वपूर्ण फैसलों का जिक्र किया जो पूरे किए जा चुके हैं। पीएम नरेंद्र मोदी ने कहा कि सरकार ने तीन तलाक, अनुच्छेद 370, सीएए जैसे विषयों पर मसलों पर फैसले किए हैं। पीएम मोदी ने कहा कि देश के सामने चुनौतियाँ हैं, लेकिन हम उम्मीद करते हैं कि पाँच ट्रिलियन के अर्थव्यस्था को जरूर हासिल करेंगे।

दिल्ली में बीजेपी की हार के पीछे छिपी है एक जीत, 63 सीटों पर बढ़ा पार्टी का वोट प्रतिशत

भले ही दिल्ली विधानसभा चुनावों में बीजेपी को करारी हार का सामना करना पड़ा हो, लेकिन पार्टी के खाते में वोट प्रतिशत बढ़ा है। इतना ही नहीं पिछले दिल्ली में चली केजरीवाल की आँधी और पिछले चुनावों में 3 सीटें पाने वाली बीजेपी को इस बार 8 सीटों पर जीत मिली है।

दिल्ली चुनाव परिणामों का शोर थम सा गया है सभी पार्टियाँ अपनी जीत और हार का विश्लेषण करने में लगी हुई हैं। तो वहीं अरविंद केजरीवाल फिर से मुख्यमंत्री पद के शपथ ग्रहण समारोह के कार्यक्रम की तैयारी में जुट गए हैं। दूसरी ओर बीजेपी अपनी हार पर गहन मंथन में जुटी हुई है, तो कॉन्ग्रेस पार्टी में आरोप-प्रत्यारोप के साथ छिड़े घमासान के बीच पार्टी पदाधिकारियों द्वारा इस्तीफा दिए जाने का सिलसिला जारी है।

दिल्ली चुनाव परिणामोंं में सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि बीजेपी की करारी हार में भी उसकी एक बड़ी जीत छिपी हुई है। ऐसा इसलिए कि इस 70 विधानसभा सीटों में से 8 सीटों पर बीजेपी ने जीत हासिल की है, जोकि पिछले चुनावों में यह आँकड़ा 3 सीटों पर सिमटा हुआ था। वहीं इसमें गौर करने वाली बात यह कि बीजेपी का इस बार करीब 63 सीटों पर वोट शेयर बढ़ा है। कुल मिलाकर दिल्ली में 38.51% के साथ पार्टी का वोट प्रतिशत बढ़ा है। इतना ही नहीं 20 सीटों पर बीजेपी ने 2015 चुनाव की तुलना में 10 फीसदी से ज्यादा वोट शेयर बढ़ाया है। बीजेपी ने सबसे ज्यादा वोट शेयर नजफगढ़ सीट पर बढ़ाया है। यहाँ पिछली चुनाव की तुलना में उसका वोट शेयर 21.5 फीसदी बढ़ा है। इन्हीं आँकड़ों के साथ बीजेपी की हार के पीछे पीर्टी की एक जीत भी देखी जा रही है।

चुनाव परिणामों के बाद आए आँकड़ों के मुताबिक चुनाव में 53.57% के साथ आम आदमी पार्टी का वोट शेयर घटा है, वहीं 4.26% के साथ कॉन्ग्रेस का भी वोट प्रतिशत भी घटा है। तो वहीं करावल नगर सीट पर आप का सबसे अधिक वोट शेयर घटा है। अग़र बात करें अन्य राजनीतिक दलों की तो, COI, COIM और NCP को चुनावों में नोटा से भी कम (0.46%) वोट प्रतिशत मिला है।

दिल्ली के लोगों ने आप को जमकर समर्थन दिया है। उसे कुल पड़े मत में 49,74,522 लोगों का समर्थन मिला है। बीजेपी को 35,75,430 एवं कॉन्ग्रेस को 3,95,924 लोगों का समर्थन मिला है। गौरतलब है कि 16 फरवरी को अरविंद केजरीवाल रामलीला मैदान में पूरी कैबिनेट के साथ एक बार फिर से दिल्ली मुख्यमंत्री पद की शपथ लेंगे।

जवाब दो कि आपराधिक छवि वालों को क्यों दिया टिकट: सभी दलों को सुप्रीम कोर्ट ने दिया निर्देश

राजनीति के आपराधीकरण को लेकर गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है। कोर्ट ने राजनीति के अपराधीकरण पर चिंता जताते हुए तमाम राजनीतिक पार्टियों को निर्देश दिया है कि आपराधिक बैकग्राउंड वाले उम्‍मीदवारों को चिह्नित कर के 48 घंटों के भीतर उनकी पूरी प्रोफाइल पार्टी की वेबसाइट पर अपलोड करें।

कोर्ट ने कहा,’पिछले चार लोकसभा चुनावों में इसमें काफी वृद्धि हुई है। इस क्रम में सभी राजनीतिक पार्टियां आपराधिक पृष्ठभूमि के उम्मीदवार का नामांकन स्‍पष्‍ट होने के 48 घंटे के भीतर उम्मीदवार का आपराधिक रिकॉर्ड अपनी वेबसाइट पर प्रकाशित करें।‘ राजनीतिक क्षेत्र में बढ़ते आपराधीकरण को रोकने के प्रयास काफी समय पहले से किये जा रहे हैं।

निर्वाचन आयोग को कोर्ट का निर्देश

मीडिया के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को राजनीतिक पार्टियों को निर्देश दिया है कि आपराधिक पृष्‍ठभूमि वाले उम्‍मीदवारों के चयन का कारण अपनी वेबसाइटों पर अपलोड करें। साथ ही, कोर्ट ने निर्वाचन आयोग को भी चेताया है कि इन निर्देशों का पालन नहीं किए जाने को अदालत की अवमानना माना जाएगा। ऐसे में यदि पार्टियों ने कोर्ट के निर्देश का पालन नहीं किया तो निर्वाचन आयोग इस मामले को कोर्ट तक ले आएगी।

सियासी पार्टियों के लिए गाइडलाइन

कोर्ट ने सियासी पार्टियों के लिए गाइडलाइन जारी की हैं। कोर्ट ने कहा है कि पिछले चार आम चुनावों से राजनीति में आपराधीकरण तेजी से बढ़ा है। इसके अनुसार, यदि राजनीतिक दलों द्वारा आपराधिक पृष्ठभूमि के व्यक्ति को टिकट दिया जाता है तो उसका आपराधिक विवरण पार्टी की वेबसाइट पर और सोशल मीडिया पर देना होगा। साथ ही, उन्‍हें यह भी बताना होगा कि किसी बेदाग को टिकट क्यों नहीं दिया गया।

सोशल मीडिया पर भी देना होगा डिटेल

जस्टिस एफ नरीमन की अध्‍यक्षता वाली संवैधानिक पीठ ने राजनीतिक पार्टियों को यह भी निर्देश दिया है कि राजनीतिक पार्टियां ऐसे उम्‍मीदवारों के विवरण को फेसबुक और ट्विटर जैसे विभिन्न सोशल मीडिया प्‍लेटफार्म पर भी शेयर करें। इसके अलावा एक स्‍थानीय व एक राष्‍ट्रीय अखबार में भी इस विवरण को प्रकाशित किया जाए। शीर्ष कोर्ट ने आगे कहा कि ऐसे उम्‍मीदवारों के चयन के बाद 72 घंटों के भीतर उनके खिलाफ लंबित आपराधिक मामलों को लेकर राजनीतिक पार्टियों को इस बारे में चुनाव आयोग को सूचित करना होगा।

पटेल को कैबिनेट में नहीं लेना चाहते थे नेहरू: खुलासे के बाद बिफरे गुहा को विदेश मंत्री ने लताड़ा

केंद्रीय विदेश मंत्री एस जयशंकर ने बुधवार (फरवरी 12, 2020) को एक पुस्तक का विमोचन किया। ये पुस्तक स्वतंत्र भारत के पहले गृह सचिव वीपी मेनन की जीवनी है। इसे इतिहासकार नारायणी बसु ने लिखा है। जयशंकर ने इस दौरान कहा कि ये पुस्तक ‘नेहरू के मेनन’ और ‘पटेल के मेनन’ के बीच के अंतर को बयाँ करती है। बता दें कि सरदार पटेल देश के पहले गृहमंत्री थे, जिनके अंतर्गत वीपी मेनन ने काम किया था। जूनागढ़ और हैदराबाद को भारत में मिलाने वाले कार्य में भी मेनन ने पटेल का सहयोग किया था।

जम्मू कश्मीर को लेकर भी मेनन उस वक्त नेहरू और पटेल को सलाह दिया करते थे। विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कहा कि नारायणी बसु द्वारा लिखी गई पुस्तक में एक ऐतिहासिक हस्ती के साथ न्याय किया गया है, जो काफ़ी पहले हो जाना चाहिए था। इस किताब में एक और बड़ा खुलासा हुआ है। इससे पता चलता है कि जवाहरलाल नेहरू नहीं चाहते थे कि सरदार पटेल उनके मंत्रिमंडल में शामिल हों। वो पटेल को पहले केंद्रीय मंत्रिमंडल में लेना ही नहीं चाहते थे। एस जयशंकर ने किताब के इस अंश को उद्धृत किया।

विदेश मंत्री ने कहा कि राजनीतिक मामलों से जुड़ा इतिहास लिखने वाला कार्य ईमानदारी के साथ किया जाना चाहिए, पूर्व में हुए राजनीतिक घटनाक्रमों को समझाते हुए। उन्होंने बताया कि वीपी मेनन ने कहा था कि जब सरदार पटेल की मृत्यु के बाद उनके द्वारा किए गए ऐतिहासिक बड़े कार्यों व उनकी यादों को मिटाने के लिए जानबूझ एक एक कुत्सित अभियान चलाया गया। मेनन कहते थे कि उन्होंने इस अभियान को देखा था और कई बार वो इसका निशाना भी बन गए थे।

देश के प्रथम कैबिनेट की सूची जब बनी थी, तब नेहरू ने पटेल को उस सूची से हटा दिया था। जयशंकर ने कहा कि ये चर्चा का विषय है। इस पर बहस होनी चाहिए कि आखिर नेहरू क्यों पटेल को मंत्री नहीं बनाना चाहते थे? बकौल केंद्रीय विदेश मंत्री, लेखिका ने इस विषय पर विस्तार से लिखा है और वो भी सबूत के साथ। हालाँकि, कथित इतिहासकार रामचंद्र गुहा को ये सब पसंद नहीं आया।

ख़ुद को मातम गाँधी मामलों का विशेषज्ञ बताने वाले गुहा ने प्रोपेगंडा पोर्टल ‘द प्रिंट’ में प्रोफेसर श्रीनाथ राघवन द्वारा लिखे गए एक लेख का जिक्र करते हुए कहा कि नेहरू द्वारा सरदार पटेल को मंत्री न बनाने वाली बात झूठ है, मिथक है। उन्होंने कहा कि उक्त लेख में इस सम्बन्ध में विस्तारपूर्वक बताया गया है। उन्होंने आरोप लगाया कि देश के विदेश मंत्री फेक न्यूज़ का प्रसार कर रहे हैं और आधुनिक भारत के दो निर्माताओं के बीच की ‘दुश्मनी’ की झूठी बातें कर रहे हैं। उन्होंने जयशंकर को सलाह दी कि उन्हें ये चीजें भाजपा आईटी सेल के लिए छोड़ देना चाहिए क्योंकि ये भारत के विदेश मंत्री का कार्य नहीं होता है।

विदेश मंत्री एस जयशंकर ने फर्जी इतिहासकार रामचंद्र गुहा के इस आरोप का करारा जवाब दिया। उन्होंने उन्हें कहा कि कुछ विदेश मंत्री ढेर सारी किताबें पढ़ते हैं और प्रोफेसरों के लिए भी ये अच्छी आदत हो सकती है। उन्होंने गुहा को सलाह दी कि वो नारायणी बसु द्वारा लिखित वीपी मेनन की जीवनी पढ़ें, जिसका उन्होंने विमोचन किया है।

BJP MLA जो 30000 की बढ़त के बाद भी हार गए: दिल्ली में मुस्लिम ध्रुवीकरण का सबसे बड़ा सबूत

रिपोर्ट की शुरुआत एक सवाल से करते हैं। अगर रैंडम चुना जाए नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर कुछ 7000 लोगों को, तो उनमें से कितने भाजपा समर्थक निकलेंगे? हालिया आम चुनाव में भाजपा को मिले 38.5% वोटों को दृष्टिगत रखा जाये , तो यह संख्या लगभग 2700 होनी चाहिए। वास्तविक संख्या इससे कुछ कम या कुछ ज्यादा हो सकती है। लेकिन अगर यह संख्या 6000 या 1000 हो फिर? अचरज होगा, है न!

अब अगर यह संख्या मात्र 5 निकले फिर? लगभग असम्भव लग रहा.. है न ?

पर ऐसा हुआ दिल्ली की मुस्तफाबाद विधानसभा मतगणना के दौरान। .

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मुस्तफाबाद मतगणना राउंड 14

दोनों दलों को मिले वोटों की स्थिति इस राउंड तक इस प्रकार थी कि भाजपा उम्मीदवार और सिटिंग विधायक जगदीश प्रधान अपने आम आदमी पार्टी प्रतिद्वंद्वी के ऊपर 30000 मतों से ज्यादा की बढ़त बना चुके थे, और असेम्बली चुनाव में 30000 मतों की बढ़त अमूमन निर्णायक सिद्ध होती है।

लेकिन इसके बाद कुछ आश्चर्यजनक घटित हुआ, बतौर उदाहरण राउंड 19 की मतगणना के आंकड़ें ये रहे :

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मुस्तफाबाद मतगणना राउंड 19

इस राउंड में आप के हाजी यूनुस को 7904 और भाजपा को केवल 36 वोट मिले। यह पैटर्न राउंड 14 से 23 तक लगातार कंटिन्यू रहा। हर बार AAP के प्रत्याशी को मिलते हजारों वोटों की तुलना में भाजपा तिहाई की संख्या तक पहुँचने के लिए भी संघर्ष करती नजर आई।

अंततः राउंड 23 तक आते आते भजपा के लिए खेल समाप्त हो चुका था। कैसे और क्यों हुआ ये?

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Round 23 in Mustafabad

इस राउंड में हाजी को 6878 वोट मिले वहीं बीजेपी को मात्र 5! और इस तरह हाजी 20000 वोटों की बढ़त बना, चुनाव जीतने की तरफ बढ़ गए।

क्या वोटिंग का यह पैटर्न किसी तकनीकी खराबी के कारण था या बिल्कुल अपेक्षित, जिस कारण बीजेपी ने चुपचाप बिना किसी भारी मन या शिकवे शिकायत के इसको स्वीकार कर लिया।

जी.. यह बिल्कुल अपेक्षित था, उस क्षेत्र की डेमोग्राफी को देखते हुए।

आम आदमी पार्टी की जीत के पीछे मचते सारे हल्ले और दिए जा रहे सारे ज्ञान की चकाचौंध में जो बातें मिस हो रहीं, मुस्तफाबाद की वोटिंग का यह पैटर्न उन सबको हाईलाइट में लाने का काम कर सकता है बशर्ते हम इस आँकड़े के पीछे छुपी इबारत पढ़ने-समझने के प्रति इच्छुक हों।

सैद्धांतिक तौर पर देखें तो वोट देते समय मुद्दे के आधार पर वोट करें, या कैंडिडेट के आधार पर, मुख्यमंत्री/प्रधानमंत्री की सीट पर कौन बैठेगा इसको सोच कर वोट करें या सांसद/विधायक कौन बनने जा रहा, इस आधार पर वोट करें, यह हमेशा ही एक कठिन पहेली हो सकती है।

फिर कुछ आयाम और विषय उस वक्त अँधेरे में भी हो सकते हैं, जिस समय हम वोट डाल रहे होते हैं!

जैसे महाराष्ट्र में शिव सेना को वोट करते वक़्त मतदाता को नहीं पता था कि उसका वोट कॉन्ग्रेस को जा रहा!

इन सभी आयामों को अगर मिलजुला कर देखें तो समझ आता है कि डेमोक्रेसी कितनी संवेदनशील और क्षणभंगुर जैसी हो सकती है। और इसकी इन कमियों को सिंगल इशू वोटर्स किस आसानी से अपह्रत कर सकते हैं। जैसे मुस्तफाबाद से जीते हाजी को पता है कि उसको मिले 6878, बीजेपी और मिले 5 के पीछे की वजह स्कूली शिक्षा में हुए कथित सुधारों या फ्री हुए बिजली पानी बस मेट्रो के कारण नहीं, अपितु किन्हीं अन्य कारणों के कारण ही सम्भव हो पाया है।

इस नतीजे और वोटिंग पैटर्न से पता चलता है कि अपने मुद्दे के प्रति समर्पित सिंगल इशू वोटर्स किस तरह बहुसंख्यक वोटर्स पर भारी पड़ सकता है।

ओखला सीट से आप उम्मीदवार अमानतुल्ला खान की 1 लाख से अधिक की जीत के पीछे क्या ओखला की समृद्धि जिम्मेदार है? क्या ओखला में बेस्ट स्कूल्स और अस्पताल हैं? शायद नहीं।

यह फिनॉमिना सिर्फ दिल्ली तक नहीं सीमित है। हैदराबाद में पिछले 30 वर्षों से कब्जा जमाये ओवैसी परिवार की MIM पार्टी क्या हैदराबाद जैसे मेट्रोपोलिस में जीतनी चाहिए? शायह नहीं। लेकिन MIM वहां लगातार जीतती जा रही क्योंकि हैदराबाद के सबसे पिछड़े इलाके पुराने हैदराबाद शहर के सिंगल इशू वोटर्स पर ओवैसी परिवार का होल्ड है। वैसे क्या कभी आपने किसी लिबरल के मुँह से हैदराबाद में होते ध्रुवीकरण के बारे में सुना है?

चुनाव आते जाते रहते हैं। दिल्ली की इस मुस्तफाबाद सीट से अगर बीजेपी जीत भी जाती तब भी कुछ खास फर्क नहीं पड़ता। लेकिन अगर सिर्फ हार जीत से अलग हट वोटर्स के सोचने के तरीके पर गौर करें तो समझ आएगा कि जहाँ एक ओर सिंगल इशू वोटर्स जहाँ आज हैं वहीं कल होंगे, और इस प्रकार आज नहीं तो कल डेमोक्रेसी की कमियों का फायदा उठा अपनी मनमर्जी उन बहुसंख्यक वोटर्स पर थोप सकेंगे जो वोट करते समय कई तरह के मूडस्विंग से गुजरते रहते हैं।

बतौर उदाहरण शाहीन बाग़ की बात करते हैं। मीडिया ने अब उस पर बात करनी बंद कर दी है। लेकिन याद रहे कि किस तरह वहाँ 4 महीने के एक बच्चे की मौत का जश्न मनाया गया, जहाँ धीरे धीरे कतरा कतरा उससे साँसे छीनी गईं। पर न उसकी माँ को कोई अफ़सोस न बाकियों को! मानवता के खिलाफ इस बर्बर हमले को किस कदर सेलिब्रेट किया गया है वह यह दर्शाता है कि सिंगल इशू वोटर्स अपने मुद्दे के प्रति किस हद तक समर्पित हैं।

हो सकता है कि आप सिंगल इशू वोटर न हों। आपकी प्राथमिकताएँ अलग हो सकती हैं। हो सकता है कि आप फिलहाल के लिए इन सिंगल इशू वोटर्स के साथ समझौते करने को इच्छुक हों पर याद रहे समझौते हमेशा आपको ही करने होंगे! यदि कोई माँ अपने बच्चे को अपने मुद्दे के लिए मारने पर सहर्ष उतारू हो सकती है तो फिर ऐसी जमात से यह उम्मीद करना कि वो आपके मुद्दों पर किसी प्रकार के समझोतों को तैयार होगी, कभी भी… यह असम्भव है। सिंगल इशू वोटर्स एक इंच भी खुद के एजेंडे से पीछे हटने वाले नहीं हैं, न वो पूरा 100% जीतने तक रुकने ही वाले हैं। भले इसमें 5 वर्ष लगें या 100 वर्ष, लेकिन जीत सिंगल इशू वोटर्स की भी होगी।

दिसंबर में फेक न्यूज साबित हुई खबर को इंडिया टुडे ने वापस चलाया: दलितों ने नहीं अपनाया इस्लाम

‘इंडिया टुडे’ ने एक महीने पुरानी फर्जी ख़बर दोबारा चलाई है, जिसमें कहा गया है कि तमिलनाडु के कोयम्बटूर में दीवार गिरने से 17 दलितों की मौत के बाद 430 दलितों ने इस्लाम अपना लिया है। दिसंबर में धर्मान्तरण की ये फेक ख़बर ख़ूब शेयर हुई थी। उस समय 3000 लोगों के मजहबी धर्मान्तरण के आँकड़े दिए जा रहे थे। ‘इंडिया टुडे’ ने संगठन ‘तमिल पुलिगल कच्ची’ के हवाले से लिखा कि 430 दलितों ने इस्लाम अपना लिया है और कई अन्य इसी राह पर हैं। साथ ही ये भी लिखा गया कि क्षेत्र के दलितों ने भेदभाव की बात कही है। कुछ दलितों के बयान भी प्रकाशित किए गए हैं।

ऑपइंडिया ने दिसंबर में ही इसका ‘फैक्ट-चेक’ किया था, जिसमें बताया गया था कि कोयम्बटूर के दलितों ने इस ख़बर में किये गए दावों को ख़ारिज कर दिया है। उन्होंने इस्लाम अपनाने की बात से इनकार कर दिया था। उस समय भी ‘आजतक’ ने ये ख़बर चलाई थी।

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, तमिल पुलिगल काटची नामक संगठन के महासचिव इलवेनिल ने रविवार को उनसे बातचीत की थी। जिसमें उन्होंने कथित धर्म परिवर्तन को दलितों के साथ होते भेदभाव के ख़िलाफ़ एक जन-आंदोलन बताया था। उन्होंने कहा कि जाति की ‘दीवार गिराने’ के लिए अब उनके पास और कोई विकल्प नहीं है। लेकिन, जब इस ‘इस्लाम स्वीकारने’ के संबंध में गाँव के लोगों से बात की गई तो उन्होंने संगठन से बिलकुल हटकर जवाब दिया।

इसी क्रम में नांदुरा आदि द्रविड़ गाँव के 70 वर्षीय एम सुब्रमणियम ने बताया था कि उनके पास इस्लाम कबूल करने की कोई वजह नहीं हैं। उन्होंने कहा, “हर धर्म अच्छा है। इस्लाम उनके लिए अच्छा है, हिदूत्व हमारे लिए। हम क्यों परिवर्तित हों। घटना (दीवार गिरने से 17 लोगों की मौत) के बाद कई संगठनों ने हमसे संपर्क किया। जिसके लिए हमने उनका धन्यवाद दिया। लेकिन राजनीति के लिए हमारा इस्तेमाल क्यों हो?”

दलितों के इस्लाम अपनाने की ख़बर फर्जी साबित हो चुकी है: ‘इंडिया टुडे’ ने फिर चलाया

वहीं, मनियम्मा नामक निवासी ने कहा था, “हमारे इलाके में बहुसंख्यक आबादी में लोग राम के भक्त हैं। यहाँ मरघाजी माह में तो हम माँस तक नहीं खाते। हमारे इलाके में एक भी मुस्लिम नहीं हैं और न ही किसी ने हमें धर्म परिवर्तन के लिए संपर्क किया है। सब एकदम झूठ है।”

एक बार ख़बर के झूठा साबित होने के बावजूद ‘इंडिया टुडे’ ने इसे दोबारा क्यों चलाया, ये समझ से पड़े है। फर्जी स्टिंग ऑपरेशन से लेकर राजदीप के स्टूडियो में नाचने तक, दिन प्रति दिन मीडिया संस्थान अपनी साख खोते जा रहा है। ऐसे में इससे यही अपेक्षित भी है।

CAA पर ताबड़तोड़ झूठ: लोगों को भड़का कर सरकारी कर्मचारियों पर हमले करवाने की फिराक में YoYa?

ख़ुद को किसान नेता बताने वाले योगेंद्र यादव ने सीएए और एनआरसी को लेकर एक बार फिर से झूठ फैलाया है। ये कथित बुद्धिजीवी जनता को बरगलाने में इतना व्यस्त हो गए हैं कि अब वो एक ही झूठ हज़ार बार बोल कर उसे जनता के मन में सच की तरह बिठाने में लग गए हैं। ‘स्वराज इंडिया’ के अध्यक्ष योगेंद्र यादव ने पाँच उँगलियों पर गिन कर सीएए और एनआरसी के ख़िलाफ़ जनता को भड़काया। योगेंद्र यादव ने कहा कि अप्रैल के महीने में कोई सरकारी कर्मचारी या स्कूली शिक्षक आएँगे, जो नाम, जन्मस्थान माता-पिता के जन्मस्थान, आधार नंबर, ड्राइविंग लाइसेंस वगैरह जैसी जानकारी माँगेंगे।

इस दौरान योगेंद्र यादव ने पहला झूठ तो ये बोला कि एनपीआर के दौरान किसी से उसके माता-पिता के जन्मस्थान के बारे में जानकारी माँगी जाएगी। ऐसा बिलकुल भी नहीं है। एनपीआर के द्वारा लोगों का एक ‘आइडेंटिटी डेटाबेस’ तैयार किया जाएगा। ख़बरों की मानें तो इसमें ये जानकारियाँ देनी होंगी- नाम, जन्मदिन, जन्मस्थान, माता-पिता का नाम, पतिपत्नी का नाम (शादीशुदा के लिए), पता, पेशा और शैक्षिक योग्यता। इनमें माता-पिता के जन्मस्थान संबंधी कोई जानकारी है ही नहीं।

इससे साफ़ पता चलता है कि योगेंद्र यादव जनता को भड़का कर जनगणना की रूटीन प्रक्रिया को बाधित करना चाह रहे हैं। ऐसे ही प्रयासों के कारण ‘नेशनल इकोनॉमिक सेन्सस’ के लिए डेटा इकठ्ठा कर रही राजस्थान के कोटा में एक महिला नज़ीरा बानो पर हमला कर दिया गया। जब उन्होंने भीड़ को बताया कि वो भी मुस्लिम हैं, तब जाकर लोगों ने उन्हें छोड़ा। नजीरा का मोबाइल फोन छीन लिया गया और सारे डेटा भी डिलीट कर दिए गए। इसी तरह पश्चिम बंगाल के बीरभूम में गूगल और टाटा के ‘इंटरनेट साथी’ के तहत महिलाओं के साक्षरता का डाटा इकठ्ठा कर रहीं चुमकी खातून का घर जला डाला गया। महिला को परिवार सहित पुलिस थाने में शरण लेनी पड़ी।

इन दोनों घटनाओं का शिकार मुस्लिम महिलाएँ बनीं। देश के अलग-अलग इलाक़ों की मुस्लिम महिलाएँ। एक तो मुस्लिमों में साक्षरता दर कम है, ऊपर से उनकी महिलाओं के मामले में ये आँकड़ा और भी भयावह है। और जब वो सरकार व प्राइवेट कंपनियों के लिए जनहित का काम कर रही हैं, तो उन पर हमला होता है। क्यों? क्योंकि लोगों ने समझा कि वो एनआरसी के लिए डेटा इकठ्ठा कर रही हैं। लोगों को तथाकथित बुद्धिजीवियों द्वारा इस कदर भड़का दिया है कि इस तरह की घटनाएँ हो रही हैं। फिर तो जन-कल्याणकारी योजनाओं के सारे सर्वे रुक जाएँगे और अराजकता का माहौल फ़ैल जाएगा।

यही तो ये बुद्धिजीवी चाहते हैं। योगेंद्र यादव ने भी यूँ ही जनता को भड़काने का काम किया है, ताकि जनगणना और एनपीआर जैसी रूटीन प्रक्रियाएँ बंद हो जाएँ, बाधित हों। और एनपीआर के लिए भाजपा तो दोषी है ही नहीं। इसे एनआरसी से कॉन्ग्रेस ने जोड़ा था। भाजपा सरकार ने तो हटाया है इसे एनआरसी से। सरकार कह चुकी है कि इसका एनआरसी से कोई जुड़ाव नहीं। एनपीआर के तहत जुलाई 2012 में तत्कालीन राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल रजिस्टर होने वाली पहली नागरिक बनी थीं। तब यूपीए-2 की सरकार थी। उस समय इन बुद्धिजीवियों ने हमला क्यों नहीं किया सरकार पर?

योगेंद्र यादव ने वीडियो में आगे कहा कि जब डेटा सरकारी दफ्तरों में पहुँचेगा तो उनमें से कुछ लोगों के आगे ‘चुपचाप’ सरकारी कर्मचारी ‘D’ लगा देंगे, यानी ‘Doubtful’ या संदेहास्पद, फिर इसके बाद उन्हें नोटिस जाएगा कि की साबित करें कि वो भारत के नागरिक हैं। फिर योगेंद्र यादव कहते हैं कि उन्हें भारत की नागरिकता साबित करने के लिए राशन कार्ड, आधार कार्ड कुछ भी दिखाने से काम नहीं चलेगा, उनसे सरकारी प्रमाण-पत्र माँगा जाएगा। इसके बाद वो असम का उदाहरण गिनाते हैं, जहाँ वोटर लिस्ट में नाम होने के बावजूद लोगों को भारत का नागरिक नहीं माना गया। यादव ने कहा कि 30 साल पहले के सरकारी प्रमाण-पत्र और संपत्ति का प्रमाण-पत्र जुटाना होगा। फिर वो पूछते हैं कि ग़रीब कहाँ से ये सब लेकर आएगा?

यहाँ योगेंद्र यादव ने एक साथ ताबड़तोड़ कई झूठ बोले। असम में एनआरसी लागू हुई है, वहाँ डाक्यूमेंट्स की दो सूचियाँ बनाई गई हैं। दोनों में से एक-एक ही दिखाने हैं। पहली सूची में 14 डॉक्युमेंट्स में से कोई एक और दूसरी सूची में 8 डाक्यूमेंट्स में से कोई एक। ये डाक्यूमेंट्स मार्च 1971 के कट-ऑफ डेट के पहले के होने चाहिए। ऐसा इसीलिए, क्योंकि असम एकॉर्ड में कॉन्ग्रेस सरकार के दौरान ही ये तारीख दी गई थी। पूरे भारत के लिए एनआरसी लागू ही नहीं हुई है और कोई नियम-क़ानून आया ही नहीं है इस सम्बन्ध में, फिर योगेंद्र यादव जैसे लोग पूरी प्रक्रिया मालूम होने के दावे कैसे कर रहे हैं?

योगेंद्र यादव ने सीएए, एनपीआर और एनआरसी को लेकर बोला ताबड़तोड़ झूठ

योगेंद्र यादव ने कहा कि कोई सरकारी कर्मचारी ‘चुपचाप’ नामों को संदिग्ध वाली सूची में डाल देगा। एनपीआर के 2003 के नियमों के अनुसार, ‘संदिग्ध नागरिक’ का प्रावधान तो है लेकिन इस बार ऐसा कुछ करने के बारे में सरकार ने कोई नोटिफिकेशन जारी नहीं किया है। इसीलिए बिना प्रक्रिया जाने, योगेंद्र यादव लोगों को भड़काने में लगे हुए हैं। असम के मामले में पूरी प्रक्रिया काफी अच्छे तरीके से परिभाषित की गई है और उसी अनुसार काम हो रहा है। सरकारी प्रक्रिया ‘चुपचाप’ पूरी नहीं की जाती, हर चीज के पीछे कारण बताए जाते हैं और पूर्व-निर्धारित नियम के अनुसार ही काम होता है।

इसके बाद योगेंद्र यादव का वही पुराना झूठ चालू हो जाता है- मुस्लिमों को नागरिक नहीं माना जाएगा क्योंकि यहाँ से सीएए का खेल शुरू हो जाएगा और हिन्दू बच जाएँगे। सरकार कई बार कह चुकी है कि सीएए और एनआरसी के बीच कोई सम्बन्ध नहीं है, फिर भी लगातार झूठ पर झूठ बोला जा रहा है। सीएए विदेशी अल्पसंख्यकों के लिए है, जो भारत में शरणार्थी बन कर वर्षों से रह रहे हैं और जिन पर मजहब के आधार पर अत्याचार किया गया है। जबकि एनआरसी अभी पूरे देश के लिए आई ही नहीं है। फिर हंगामा क्यों? क्या देश में होने वाली हर रूटीन सरकारी प्रक्रिया को भी एनआरसी से जोड़ा जाएगा।

दरअसल, योगेंद्र यादव सरीखे लोग विकास नहीं होने देना चाहते हैं। ‘उज्ज्वला’ के तहत हर घर में गैस पहुँचने और ‘सौभाग्य’ के द्वारा हर घर में बिजली पहुँचाए जाने से ये लोग मोदी सरकार से खफा हैं। ऐसी कई योजनाएँ हैं, जिनका सीधा लाभ जनता को मिल रहा है। साक्षरता से लेकर बच्चों के पोषण-कुपोषण तक, हज़ार तरह के सर्वे सरकार कराती रहती है और फिर उसी हिसाब से योजनाओं की रूपरेखा तैयार की जाती है। इसमें हजारों कर्मचारी, शिक्षक और आंगनवाड़ी कार्यकर्त्ता लगे रहते हैं। यादव जैसे लोगों के भड़काने के कारण कल को अगर इन लोगों पर एक भी हमले हों तो इन बुद्धिजीवियों पर कार्रवाई होनी चाहिए।