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50 साल बाद हाई स्कूल में हुई सरस्वती पूजा, मुस्लिम छात्रों के कारण गाँव में पैदा हो जाता था तनाव

झारखंड के गिद्धौर में गुरुवार (जनवरी 30, 2109) को एक हाई स्कूल में लगभग 50 साल बाद धूमधाम से सरस्वती पूजा मनाई गई। इस दौरान भारी संख्या में पुलिस बल मौजूद थी। बता दें कि मंझगांवातरी हाई स्कूल की स्थापना 1972 में प्राथमिक विद्यालय के तौर पर हुई थी। 2006 में इसे मध्य विद्यालय का दर्जा दिया गया। फिर 2010 में उच्च विद्यालय का दर्जा प्राप्त हुआ।

इस विद्यालय में सालों से सरस्वती पूजा को लेकर दो समुदायों के बीच विवाद चल रहा था। स्कूल में पढ़ने वाले अधिकांश छात्र मुस्लिम थे। इस वजह से हिंदू छात्र सालों तक सरस्वती पूजा नहीं मना सके। दैनिक जागरण की खबर के मुताबिक इस साल यहाँ धूमधाम से पूजा की गई।

इस मौके पर प्रखंड विकास पदाधिकारी पूनम कुजूर, मजिस्ट्रेट स्कूटिव अजय भगत, डीएसपी वचन देव कुजूर, थाना प्रभारी सुशील कुमार, पंचायती राज पदाधिकारी मोहम्मद नसीमउद्दीन अंसारी, प्रतिनियुक्त दंडाधिकारी रूपेश महतो समेत जिला पुलिस बल के जवान तैनात थे।

जानकारी के मुताबिक इस विद्यालय में पहले अधिकतर मुस्लिम छात्र ही पढ़ते थे, लेकिन उत्क्रमित मध्य व उच्च विद्यालय बनने के साथ ही इस विद्यालय में हिदू समुदाय के बच्चे भी पढ़ने लगे। जिसके बाद विद्यालय में सरस्वती पूजा करने की माँग उठने लगी। मगर मुस्लिम बच्चों की बच्चों की वजह से कई वर्षों से सरस्वती पूजा को लेकर गाँव में तनाव की स्थिति भी उत्पन्न हो जाती थी और पूजा नहीं हो पाती थी।

इस बार विद्यालय के बच्चों ने सरस्वती पूजा मनाने को लेकर 28 जनवरी 2020 को ब्लॉक ऑफिस और स्थानीय पुलिस स्टेशन में आवेदन दिया। जिसके बाद प्रशासन ने सरस्वती पूजा के एक दिन पहले ही विद्यालय में पुलिस के जवान तैनात कर दिया। फिर गुरुवार के छात्रों ने विद्या की देवी माँ सरस्वती की प्रतिमा स्थापित कर पूजा-अर्चना की और पूजा संपन्न होने के बाद पूरे विधि-विधान के साथ प्रतिमा का विसर्जन किया गया।

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महिला ने पूर्व क्रिकेटर से कहा- इस्लाम कबूल कर लो, इनकार किया तो बोली- पेशाब पीने वाले…

पाकिस्तान के पूर्व क्रिकेटर दानिश कनेरिया एक बार फिर अपने हिंदू धर्म के कारण चर्चा में हैं। पिछले दिनों हिंदू होने की वजह से पाकिस्तानी क्रिकेट टीम में उनके साथ भेदभाव होने की बात सामने आई थी। अब सोशल मीडिया के जरिए एक मुस्लिम महिला ने उनसे इस्लाम कबूल करने की अपील की है। जब कनेरिया ने इससे इनकार कर दिया तो महिला ने कहा कि पेशाब पीने वालों को कौन समझाएँ।

खुद को कनेरिया की गेंदबाजी का प्रशंसक बताने वाली यह महिला है आमना गुल। उसने ट्वीट कर ने कनेरिया से कहा, “आप प्लीज इस्लाम कबूल कर लीजिए। इस्लाम सोना है। इस्लाम के बगैर कुछ भी नहीं है। आप की जिंदगी मौत की तरह है। आप इस्लाम कबूल कर लीजिए।”

कनेरिया ने इस पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा, “आप जैसे कई लोगों ने मेरा धर्म बदलवाने की कोशिश की, लेकिन किसी को कामयाबी नहीं मिली।” लेकिन इस जवाब के बाद महिला भड़क गई और हिंदुओं पर निशाना साधते हुए लिखा, “मैं पेशाब पीने वालों को नहीं समझा सकती। तुम लोग जीते। मैं हारी।”

दानिश और महिला फैन के बीच हुई इस बातचीत के बाद कई पाकिस्तानियों ने दानिश के ट्वीट पर कमेंट किया और कहा कि इस्लाम कबूल करना या नहीं करना आपका फैसला है। लेकिन वो (महिला फैन) सिर्फ़ आपको धर्म बदलने का न्योता दे रही हैं। बाकी और कुछ नहीं। लेकिन आपसे इस तरह के रिप्लाई की हमें उम्मीद नहीं थी।

गौरतलब है कि #ASKDANISH सेशन में एक अन्य यूजर ने भी दानिश से सवाल किया कि पाकिस्तान में उनपर धर्म परिवर्तन का दबाव है तो क्या वे पाकिस्तान में सेफ महसूस नहीं करते? जिस पर कनेरिया ने लिखा- “मैं सेफ हूँ। मैंने पहले भी कहा कि कुछ लोगों ने कोशिश की थी। शब्दों के साथ न खेलें।”

बता दें दानिश ने इस सेशन में कई लोगों के सवालों के जवाब दिए। लेकिन अमाना गुल द्वारा की गई अपील ने दानिश को फिर से सुर्खियों में ला दिया। एक यूजर के सवाल के जवाब में उन्होंने कहा भी उन्हें सबसे ज्यादा धार्मिक भेदभाव से डर लगता है।

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शाहीन बाग के टुकड़े-टुकड़े! देर रात चला ड्रामा… मीडिया से बात करने पर बँटे प्रदर्शनकारी

नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के विरोध में शाहीन बाग में बैठे प्रदर्शनकारियों के बीच मतभेद की ख़बरें आ रही है। गुरुवार की रात इसकी झलक दिखाई पड़ी। जानकारी के अनुसार, देर रात प्रदर्शनस्थल पर मीडिया से बातचीत करने को काफी ड्रामा हुआ। पहले सोशल मीडिया पर खबर आई कि वहाँ प्रदर्शनकारी प्रेस कॉन्फ्रेंस करने वाले हैं और जब सभी मीडियाकर्मी उसे कवर करने पहुँचे तो मालूम चला कि ये अफवाह है। इतना ही नहीं, मौक़े पर पहुँची मीडिया को वहाँ रिकॉर्डिंग भी नहीं करने दिया और फौरन चले जाने को कहा जाने लगा। स्थिति देखकर स्पष्ट हो गया कि कुछ लोग वहाँ मीडिया से बात करना चाहते थे, लेकिन कुछ प्रदर्शनकारियों के कारण ऐसा मुमकिन नहीं हो पाया।

गुरुवार की रात करीब 9:30 बजे तक शाहीन बाग में होने वाली प्रेस कॉन्फ्रेंस की सूचना पूरे सोशल मीडिया पर फैल चुकी थी। साहिल मुर्ली मेंघानी नामक पत्रकार, जो कि शाहीन बाग के प्रदर्शन को लगातातर कवर कर रहे हैं, ने 9:26 पर अपने ट्विटर पर लिखा कि शाहीन बाग में गुरुवार को रात 11 बजे एक अर्जेंट प्रेस कॉन्फ्रेंस होने वाली है। इसके बाद उन्होंने ट्वीट कर बताया कि प्रेस कॉन्फ्रेंस उस सड़क को लेकर होगी जिसे प्रदर्शनकारियो ने ब्लॉक नहीं किया, बल्कि वो पुलिस बैरिकेडिंग के कारण बंद है।

कई मीडिया संस्थानों के अनुसार वे शाहीन बाग में प्रेस कॉन्फ्रेंस के लिए बिलकुल तैयार थे। कयास लग रहे थे कि प्रेस कॉन्फ्रेंस जामिया के नजदीक हुए वाकये पर होगा या राजनेताओं के बयान को लेकर। मगर, उन्हें क्या पता था कि यह शाहीन बाग ड्रामे की शुरुआत है। कुछ ही देर में साहिल का एक और ट्वीट आया और उन्होंने कहा कि शाहीन बाग में कोई प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं होने वाली, क्योंकि प्रदर्शनकारियों का कहना है कि किसी ने फेक न्यूज फैलाई है।

इसके बाद साहिल ने ये भी बताया कि शाहीन बाग पर कुछ प्रदर्शनकारी प्रेस कॉन्फ्रेंस करना चाहते हैं, जबकि कुछ इससे मना कर रहे हैं। इसके बाद पता चला कि शाहीन बाग के कुछ प्रदर्शनकारी सड़क को खुलवाना चाहते हैं, क्योंकि वे उसका इस्तेमाल नहीं कर रहे। जबकि कुछ इसका विरोध कर रहे हैं। उनका मानना है कि अगर उन्होंने वो साइड खोल दी तो जैसे मार्च के दौरान गोली चली वैसे उन पर भी कोई हमला कर सकता है।

इतने ड्रामे के बाद शाहीन बाग में कोई प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं हुई। जो रोड बंद थी, वो बंद रही और प्रदर्शनकारी दो गुटों में बँटे दिखाई दिए। मीडिया को वहाँ से फौरन जाने को कहा गया। साथ ही ये भी कहा गया कि उन्हें वहाँ रिकॉर्डिंग करने की अनुमति नहीं है। इसलिए वो कैमरा बंद कर दें और मोबाइल से भी कोई रिकॉर्डिंग न करें।

उल्लेखनीय है कि कल रात शाहीन बाग में मीडिया से बातचीत को लेकर हुए प्रदर्शनकारियों में मतभेद के बाद वहाँ एक-दूसरे पर स्टेज से चप्पलें फेंकी जाने की भी सूचना है। लेकिन इस वाकये के पुख्ता सबूत न होने के कारण ऑपइंडिया इस खबर की पुष्टि नहीं करता।

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मेरठ से लापता किशोरी शाहीन बाग में मिली, शहजाद पर अगवा करने और धर्म परिवर्तन की कोशिश का आरोप

यूपी के मेरठ से लापता हुई किशोरी को पुलिस ने ढूँढ लिया है। किशोरी दिल्ली के शाहीन बाग से बरामद की गई। यह इलाका आजकल सीएए के खिलाफ विरोध और अपने कट्टरपंथी एजेंडे को लेकर चर्चा में है। पुलिस ने आरोपित शहजाद को भी गिरफ्तार कर लिया है। उस पर किशोरी को बहला-फुसलाकर ले जाने का आरोप है। यह भी कहा जा रहा है कि वह किशोरी का धर्म परिवर्तन कराना चाहता था। लेकिन उससे पहले ही यूपी पुलिस ने उसे दबोच लिया।

किशोरी मेरठ के परतापुर के सोरखा गाँव की रहने वाली है। कुछ दिनों पहले ही उसकी मुलाकात शहजाद से हुई थी और फिर 25 जनवरी को वह गायब हो गई। किशोरी के परिजनों ने आरोपित के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी। किशोरी के परिजनों ने शिकायत में आरोप लगाया कि शहजाद उसे अगवा कर जबरन उसका धर्म परिवर्तन करना चाहता है। इसके बाद पुलिस ने कार्रवाई करते हुए अपहृत किशोरी को मंगलवार (जनवरी 28, 2020) को दिल्ली के शाहीन बाग से बरामद किया। किशोरी से पूछताछ के बाद आरोपित शहजाद को गिरफ्तार किया।

दैनिक जागरण के मेरठ संस्करण में 29 जनवरी 2020 प्रकाशित खबर

इस घटना को लेकर हिंदू संगठनों के लोगों ने भी विरोध जताया है। परतारपुर के इंस्पेक्टर आनंद कुमार मिश्रा के हवाले से दैनिक जागरण की रिपोर्ट में बताया गया है कि शहजाद ने शनिवार को फोन कर किशोरी से संपर्क किया और उसे झॉंसे में लेकर दिल्ली चला गया। देर रात किशोरी के घर न लौटने पर परिजनों ने थाने में शिकायत की थी। एसपी सिटी डॉ. एएन सिंह का कहना है कि युवक से पूछताछ की जा रही है जबकि किशोरी के बयान दर्ज किए गए हैं। सीओ ब्रह्मपुरी चक्रपाणि त्रिपाठी का कहना है कि यह मामला अपहरण का है या नहीं, इसकी जाँच की जा रही है।

गौरतलब है कि बीते साल मेरठ की एक हिंदू युवती के इसी तरह झॉंसे में आकर दुबई चली जाने की खबर सामने आई थी। मेरठ के कंकड़खेड़ा के एक व्यापारी की बेटी पाकिस्तानी युवक नदीम ख़ान के चंगुल में फँस कर दुबई भागी थी। हालॉंकि करीब एक महीने बाद दिसंबर में वह घर लौट आई थी। 8 नवंबर को घर से कुछेक हज़ार रुपए लेकर निकली युवती ने बताया था, “मुझे नौकरी का झाँसा देकर पाकिस्तानी युवक नदीम इक़बाल ने बुलाया था, लेकिन वो मुझे दुबई में नहीं मिला। भारतीय दूतावास और केरल की एक फैमिली की मदद से मैं अपने घर लौट सकी हूँ।”

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CAA के लिए मोदी को सलाम, विरोधी सत्ता के लिए फैला रहे गलतफहमी: हैदराबाद उर्दू यूनिवर्सिटी के चांसलर

नागरिकता संशोधन कानून (CAA) का हैदराबाद के मौलाना आजाद राष्ट्रीय उर्दू विश्वविद्यालय (MANUU) के चांसलर फिरोज बख्त अहमद ने समर्थन किया है। उन्होंने कहा है कि सत्ता के लिए इसका विरोध किया जा रहा है। अहमद ने कहा है कि सीएए और राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (एनआरसी) के बीच कोई संबंध नहीं है। बावजूद कुछ लोग सत्ता के लिए दोनों को जोड़कर गलतफहमी फैला रहे हैं।

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उनके अनुसार इन सबके पीछे कुछ विपक्षी दल और नेता शामिल हैं। अहमद ने सीएए पारित कराने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रशंसा की। उन्होंने कहा, मोदी और उनके साथियों इस बात के लिए सलाम कि उन्होंने ऐसे लोगों (पाकिस्तान, बांग्लादेश व अफगानिस्तान में प्रताड़ित अल्पसंख्यकों) को नागरिकता देने का निर्णय लिया है।

गौरतलब है कि बीते दिनों सोशल मीडिया से लेकर देश के कोने-कोने में सीएए और एनआरसी के विरोध में प्रदर्शन देखने को मिल रहे हैं। हालाँकि, ये बात सरकार स्पष्ट कर चुकी है कि सीएए का भारतीय नागरिकों से कोई लेना-देना नहीं है। लेकिन फिर भी दिल्ली के शाहीन बाग, लखनऊ के घंटाघर समेत कई अन्य जगहों पर लोग इसे रोल बैक करवाने के लिए चक्का जाम करके बैठे हैं। कुछ राजनेता इन विरोध प्रदर्शनों को अपना पूरा समर्थन दे रहे हैं। साथ ही मोदी सरकार को घेरने के लिए लोगों को भड़का भी रहे हैं।

सीएए विरोध के नाम पर देश के कई शहरों में हिंसा भी हो चुकी है। हिंदुओं के खिलाफ नारे लगे हैं। हिंदू घृणा से सने पोस्टर और वीडियो सामने आए हैं। इन सबसे विरोध-प्रदर्शन के मंसूबों पर सवाल उठते हैं। देशद्रोह में आरोप में गिरफ्तार किए गए शाहीन बाग के मास्टरमाइंड शरजील इमाम के देश तोड़ने के लिए समुदाय विशेष को उकसाने वाले वीडियो भी सामने आ चुके हैं।

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सभी बच्चे महफूज, मारा गया सिरफिरा, पत्नी की भी मौत: फर्रुखाबाद बंधक संकट की पूरी कहानी

उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद जिले का बंधक संकट खत्म हो गया है। पुलिस और एटीएस की टीम ने बच्चों को बंधक बनाने वाले सुभाष बाथम को देर रात मार गिराया। बंधक संकट करीब 8 घंटे चला। जिले के मोहम्मदाबाद के कठरिया गॉंव में सुभाष ने बच्चों को बंधक बना लिया था। उसे मार गिराने के बाद पुलिस ने सभी बच्चों को उसके घर से सुरक्षित निकाल लिया। घटना से नाराज लोगों की पिटाई से जख्मी हुई सुभाष की पत्नी ने भी अस्पताल मे दम तोड़ दिया।

यूपी पुलिस ने रात के करीब एक 1 बजे सिरफिरे को ढेर कर सभी बच्चों को सकुशल छुड़ा लिया। सुभाष पर हत्या का केस चल रहा था। वह हाल ही में जमानत पर बहार आया था। करीब 8 घंटे चले ऑपरेशन के बाद यूपी पुलिस 24 बच्चों की जिंदगी बचाने में कामयाब रही। गुरुवार (जनवरी 30, 2019) दोपहर करीब ढाई बजे से शुरू हुआ ये खौफनाक खेल सिरफिरे सुभाष बाथम की मौत के साथ खत्म हुआ। जानिए पूरा घटनाक्रम-

  • यह सनसनीखेज वारदात जिला मुख्यालय से करीब 45 किलोमीटर दूर मोहम्मदाबाद कोतवाली क्षेत्र के बरेली-इटावा हाईवे स्थित गाँव कठरिया में हुई।
  • यहाँ का 40 वर्षीय सुभाष बाथम अपने मौसा मेघनाथ की हत्या के आरोप में उम्रकैद की सजा पा चुका है।
  • घर में चोरी की शिकायत पर उसने 2001 में मौसा की हत्या की थी।
  • 2005 में उसे उम्रकैद हुई। 10 साल जेल में रहने के बाद हाई कोर्ट से उसे जमानत मिल गई।
  • करीब 3 महीने पहले एसओजी ने फतेहगढ़ में हुई चोरी के आरोप में उसे जेल भेज दिया।
  • वहाँ से डेढ़ माह पूर्व जमानत पर छूटा। खुद को फँसाने के शक में उसने पुलिस व ग्रामीणों से बदला लेने की योजना बना डाली।
  • गुरुवार दोपहर अपनी एक साल की बेटी के जन्मदिन के बहाने गाँव के करीब दो दर्जन बच्चों को घर पर बुलाया और सभी को बंधक बना लिया।
  • देर तक बच्चों के घर न लौटने पर पड़ोसी जब सुभाष के घर पहुँचे तो उसने फायरिंग कर दी। उसने चिल्ला-चिल्लाकर गाँव वालों पर फँसाने का आरोप लगाया।
  • बच्चों को छुड़ाने पहुँचे थाना प्रभारी राकेश कुमार व यूपी 112 की टीम पर उसने घर के भीतर से बम फेंक दिया।
  • इसमें थाना प्रभारी राकेश कुमार, यूपी-112 के दीवान जयवीर सिंह व सिपाही अनिल कुमार घायल हो गए। इसके बाद पुलिस व स्वाट टीम ने कई घरों की छतों की घेराबंदी की।
  • क्षेत्रीय विधायक नागेंद्र सिंह व एसपी डॉ अनिल कुमार मिश्र ने लाउडस्पीकर से बाहर आने को कहा तो वह गालियाँ देने लगा।
  • इस बीच सुभाष का एक दोस्त उसे समझाने गया तो उसने दरवाजे के नीचे से गोली चला दी। गोली उसके के पैर में लगी। 
  • मामला बढ़ता देख डीएम-एसपी भी मौके पर पहुँचे। पुलिस ने सुभाष के घर को घेर रखा था। गाँव वाले भी पुलिस वालों की मदद में लगे हुए थे। लेकिन सुभाष के घर से ना ही कोई डिमांड आ रही थी और ना ही वो बातचीत करने को तैयार था।
  • रात करीब सवा 9 बजे एटीएस की टीम पहुँची और रेस्क्यू ऑपरेशन शुरू किया। ड्रोन के जरिए घर के अलग-अलग हिस्सों की तस्वीरें ली गईं। इन तस्वीरों में पाया गया कि अपराधी के पास मौजूद भारी मात्रा में हथियार और गोला-बारूद मौजूद थे।
  • घर में बच्चों के होने की वजह से पुलिस और एटीएस कोई रिस्क नहीं लेना चाहती थी। मामले की गंभीरता को देखते हुए दिल्ली से एनएसजी की टीम भी फर्रुखाबाद के लिए रवाना हुई।
  • रात करीब 11 बजे सुभाष ने करीब 2 साल के एक बच्चे को पत्र लेकर घर से बाहर भेजा। यह पत्र टाइप किया हुआ था। जिससे यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि सुभाष ने अच्छे से प्लान करके यह हाई वोल्टेज ड्रामा रचा था। पत्र में उसने बताया कि वो काफी समय से सरकारी योजना के तहत घर और शौचालय की माँग कर रहा था, लेकिन अभी तक उसकी माँग पर कोई सुनवाई नहीं हुई।
  • देर रात गाँव वालों ने सुभाष के घर पर पथराव शुरू कर दिया। पुलिस भी पूरी तरह से मुस्तैद थी। पुलिस ने बातचीत में सुभाष को व्यस्त रखा। जबकि एक टीम पीछे से गेट पर तैयार खड़ी थी। रात करीब सवा एक बजे गाँव वालों ने घर पर हमला बोल दिया और घर का मुख्य दरवाजा तोड़ दिया। इसके बाद पुलिस भी घर में घुस गई और एनकाउंटर में सुभाष को ढेर कर दिया।
  • पुलिस कार्रवाई में सुभाष की मौत होने के बाद डाक्टरों की टीम ने सभी बच्चों का स्वास्थ्य परीक्षण किया। इस दौरान किसी को सुभाष के घर के अंदर नहीं जाने दिया। सभी अपने बच्चों को सकुशल देखने को परेशान थे।जब सभी बच्चों को स्वास्थ्य परीक्षण हो गया और सभी स्वस्थ्य थे तब बच्चों को पुलिस कर्मियों ने बाहर निकालकर एक-एक कर उनके माता पिता को सौंपा तो परिजनों ने अपने लाडले को सीने लगा लिया।

इस मामले पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ खुद नजर रख रहे थे और उन्होंने वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की बैठक कर उन्हें घटनास्थल पर रहने का निर्देश दिया था। यूपी अडिशनल चीफ सेक्रटरी और प्रिंसिपल सेक्रटरी (गृह) अवनीश अवस्थी ने बताया कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने ऑपरेशन को सफलतापूर्वक अंजाम देने के लिए यूपी पुलिस और उनकी टीम के लिए 10 लाख रुपए के इनाम का ऐलान किया है। ऑपरेशन में शामिल हर पुलिसकर्मी को प्रशस्ति-पत्र भी दिया जाएगा।

शाहीन बाग की महान उपलब्धि: एक बच्चे से कट्टरपंथियों ने कलम की जगह बंदूक चलवा दी

जामिया में गोली चल गई, किसी शादाब को लग गई। खून बह गया। एक युवा ने दूसरे युवा पर गोली चला दी। क्या ये एक सामान्य बात है? क्या आज का युवा इतना उन्मादी हो गया है कि वो पुलिस की मौजूदगी में पिस्तौल तान दे और ट्रिगर दबा दे? एक कच्ची उम्र का नाबालिग आखिर ऐसा क्या देख लेता है, उसने ऐसा क्या महसूस कर लिया, कि वो कैराना से तीन हजार रुपए में एक तमंचा खरीद लाता है, और मीडिया की मौजूदगी में घोड़े पर उँगली रख कर दबा देता है?

ये बातें आपको सामान्य तरीके से समझ में नहीं आएँगी, क्योंकि ये घटना सामान्य नहीं है। गोली चलाने वाला एक नाबालिग है। हमने उसके दोस्त से बात की, उसके शिक्षक से बात की। वो पढ़ने में एक सामान्य छात्र की तरह है। दो साल पहले तक वो भी किसी के दिल में बसने के लिए फुलझड़ियों वाली शायरी किया करता था। कच्ची उम्र का प्यार अक्सर ऐसे ही अपनी अभिव्यक्ति पाता है, कभी शायरी से, कभी किसी और तरीके से।

उसने भी प्रेम करना चाहा होगा, वो भी बड़ा हो कर पुलिस, डॉक्टर, इंजीनियर या फौजी बनना चाहता होगा। वो भी वही सब करना चाहता था जो एक आम छात्र चाहता है। फिर पिछले कुछ समय में ऐसा क्या हो गया कि वो देसी कट्टा खरीद कर घूमने लगा? आखिर क्या बदल गया पिछले कुछ समय में कि फेसबुक पर उसके पोस्टों का लहजा ऐसा हो गया मानो उसने कुछ विचित्र सा देख लिया हो, या उसे कुछ ऐसा समझ में आने लगा हो, जो पहले भी था, लेकिन उसने कभी महसूस न किया हो?

उसका एक करीबी दोस्त बताता है कि वो पिछले कुछ समय से, हिन्दू विरोधी प्रदर्शनों और कुछ लोगों की बयानबाजी से परेशान हो गया था। इस उम्र में ही वो ऐसे सोचने लगा मानो समाज पर कुछ लोग अपनी ही विचारधारा को थोप रहे हैं, और उसे अब कुछ तो करना ही होगा। दोस्त ने हमसे बात करते हुए कहा कि वो शरजील इमाम जैसों की बातों से, शाहीन बाग के इस उत्पाती प्रदर्शनों से, CAA पर चल रहे पोस्टरों की हिन्दू-घृणा से बहुत परेशान हो चुका था।

फिर उसने एक दिन योजना बनाई कि कोई अगर कुछ नहीं कर रहा, तो वो ही इस शाहीन बाग की नौटंकी को खत्म कर देगा। यह उसका बचपना था, और कुछ नहीं। आखिर शाहीन बाग में बैठे कट्टरपंथियों से एक नाबालिग, कच्ची उम्र का बच्चा कैसे जीत पाएगा? वहाँ तो ऐसे-ऐसे शातिर लोग हैं जो कश्मीरी पंडितों के साथ खड़े होने में भी ऐसे शब्दों के साथ खड़े होते हैं जैसे उनके जख्मों पर नमक रगड़ रहे हों। वो तो कश्मीरी पंडितों के दर्द को याद करते हैं, लेकिन दर्द देने वाली इस कौम के लिए एक शब्द नहीं निकलता।

इसलिए, एक किशोर वय का लड़का, जब शरजील इमाम जैसों के बारे में सुनता होगा कि वो असम में पाँच लाख कट्टरपंथियों की भीड़ के साथ भारत से पूर्वोत्तर को काटने की योजना बना रहा है, तो इस छोटे से जीवन में ‘वंदे मातरम्’ और ‘जन गण मन’ से अपना दिन शुरू करने वाला बालक परेशान नहीं होगा कि IIT और JNU जैसी जगह में पढ़ने वाले लड़के आतंकियों की जुबान बोल रहे हैं?

आज मीडिया में इस बच्चे को, जिसे काउंसलिंग की आवश्यकता है, जिसे बैठ कर यह समझाने की आवश्यकता है कि इस्लामी कट्टरपंथियों से सरकार और उसकी एजेंसियाँ निपट लेंगी, इसमें बच्चों को परेशान होने की जरूरत नहीं है, उस बालक को ‘टेररिस्ट’ कहा जा रहा है। यह कुछ ऐसा ही लग रहा है जैसे कुछ मीडिया वालों को इंतजार था कि एक हिन्दू नाम वाला किसी दिन पिस्तौल के साथ मिल जाए, फिर उनकी ‘हिन्दू आतंकी’ वाली थ्योरी सही साबित हो जाएगी।

अफजल गुरु, बुरहान वानी, याकूब मेमन जैसे आतंकवादियों के बापों और बच्चों के नाम और उनके लक्ष्य गिनाने वाले लोग यह भूल रहे हैं कि गोली चलाने वाला कौन है, और उसके ट्रिगर पर उँगली किसकी है। सनद रहे कि सत्तर साल के इतिहास में शायद यह पहला उदाहरण है जहाँ एक हिन्दू बच्चा कुछ कट्टरपंथियों की करतूतों से परेशान हो कर कानून अपने हाथ में लेता है, पुलिस की मौजूदगी में गोली चलाता है।

उसके दोस्त ने यह भी बताया कि वो शाहीन बाद को खत्म करने निकला था। आप ही सोचिए कि जिस शाहीन बाग में हर दिन हिन्दुओं के प्रति घृणा का भोजन पोस्टरों और नारों के रूप में मुक्तहस्त बाँटा जा रहा है, जहाँ हजारों की भीड़ है, स्वास्तिक जलाए जा रहे हैं, हिन्दू महिलाओं को बुर्के में दिखाया जा रहा है, जिसकी जड़ में ‘हिन्दुओं से आजादी’ के नारे हैं, जहाँ आठ साल की बच्चियाँ रेडिकलाइज हो चुकी हैं, जिन्हें दिल्ली पुलिस और सुप्रीम कोर्ट धरना करने से हिला नहीं सकी है, उसे एक नाबालिग, एक कट्टे की एक गोली से खत्म करने निकला था!

चाहे जितनी भी हास्यास्पद सोच रही हो उस बच्चे की, लेकिन उसे ऐसा बनाया किसने? क्या शरजील इमाम जैसे लोग इसके लिए जिम्मेदार नहीं? क्या शाहीन बाग में हिन्दूविरोधी जहर बाँटने वाले उसे ऐसा बनाने के लिए जिम्मेदार नहीं? आज जो लोग उसके फेसबुक पोस्ट को निकाल रहे हैं, बता रहे हैं कि वो तो इस रैली में जाता था, उस रैली में जाता था, इस पार्टी में था, उस संघ का सदस्य कहता था खुद को, वो यह भी तो जानने की कोशिश करें कि उसे किसी रैली में जाने की जरूरत क्यों पड़ी?

क्या कुछ इस्लामी कट्टरपंथियों ने इस तरह का घटिया माहौल बना दिया इस देश में कि एक नाबालिग कट्टा खरीदने को मजबूर हो गया? हमारा समाज कहाँ जा रहा है? हम इस देश को कहाँ ले जा रहे हैं? कहाँ गई वो गंगा-जमुनी तहजीब? क्या हिन्दुओं को गाली दे कर, उनके धार्मिक प्रतीकों का अपमान करके, उनकी स्त्रियों को बुर्के में दिखा कर, उनके खिलाफ आजादी के नारे लगा कर, उन्हें कैलाश भेजने की बातें करके ही इस देश का ताना-बाना बचाया जा सकता है जिसकी नींव सरदार पटेल, महात्मा गाँधी, बच्चों के अतिप्रिय चाचा नेहरू ने रखी थी?

हम अपने बच्चों को कैसा समाज देना चाह रहे हैं? आखिर वो अपने धर्म को इतना क्यों पकड़ रहा है? वो कट्टर क्यों प्रतीत होता है? आखिर हिन्दू धर्म को मानने वाला कट्टर क्यों बनना चाह रहा है? वो सोच क्या रहा है? क्या ऐसे बच्चे और भी हैं? क्या इस्लामी कट्टरपंथियों और आतंकियों के आतंक से इस समाज के बच्चे अब डरने लगे हैं? क्या अब हिन्दुओं के बच्चों में कट्टरपंथियों से बच कर रहने का डर घर कर चुका है?

इस देश की दूसरी सबसे बड़ी आबादी को आज यह सोचने की आवश्यकता है कि वो देश की सबसे बड़ी आबादी से क्या चाहते हैं। समुदाय विशेष को यह सोचना होगा कि उनके समुदाय के कुछ लोग काँवरियों पर पत्थर क्यों फेंकते हैं हर साल? उन्हें जवाब देना होगा कि दुर्गा पूजा के दौरान पिछले कुछ सालों से मूर्तियों को तोड़ने की खबरें क्यों आ रही हैं? इस्लाम को शांति का मजहब बताने वाले यह भी बताएँ कि बीस महीने में बीस जगहों पर हिन्दुओं को मंदिर कैसे तोड़ दिए जाते हैं? गाय का मांस खा कर बोर न होने वाले मजहब के लोग यह भी बताएँ कि पिछले दो साल में उन्नीस हिन्दुओं की जान लेने वाले लोग संविधान के हिसाब से चलेंगे या गौरक्षकों की हत्या करते रहेंगे?

एक बच्चे ने बंदूक उठा ली। इससे खराब बात और क्या हो सकती है? मैं फिर से कहता हूँ कि एक बच्चे ने बंदूक उठा ली भाई साहब! उसके हाथों में तो कलम होनी चाहिए थी। उसे तो सुलेख पर मेहनत करनी थी, उसे तो अपनी उम्र की किसी लड़की से प्रेम की बातें करनी थी, लेकिन उसने समाज में आते हुए बदलाव को देखा और कलम की जगह बंदूक उठा गया।

कल कुछ लोग प्राइम टाइम में उसके फेसबुक, उसकी तस्वीरें शेयर करते हुए मुस्कुरा रहे थे मानो कह रहे हों कि तुमने शरजील पर बात करने की कोशिश की, ये लोग हमें तो हिन्दू आतंकी मिल गया। वो एक बच्चे को जहरीला कह रहे हैं, उसे आतंकवादी लिख रहे हैं। ये वही लोग हैं जिन्होंने आज तक यह नहीं बताया कि शाहीन बाग में हिन्दू स्त्रियों को बुर्के में दिखाने का क्या औचित्य है। वो यह नहीं बता पाए कि गाय को काट कर कमल पर क्यों दिखाया गया है? वो यह नहीं समझा पा रहे हैं कि स्वास्तिक को आग में क्यों दिखाया जा रहा शाहीन बाग में?

एक पूरी आवाम जहरीली हो गई है आँख के अंधों! एक कौम के पढ़े-लिखे जहीन लोग मंचों से इस्लामी निजाम की माँग कर रहे हैं कान के बहरों! समुदाय विशेष का नेता चिल्ला रहा है कि हिन्दुओं का बहिष्कार करो, उससे सामान मत खरीदो, उसका सिम फेंक दो। वो कौम की बात करते हुए गाँधी को फासीवादी कह रहे हैं। वो मंचों से लच्छेदार अंग्रेजी और फूलदार उर्दू में कह रहे हैं कि उनकी स्ट्रेटेजी क्या है, वो संविधान को नकारने की बात कर रहे हैं।

इस पर कितने प्राइम टाइम हुए? इस भीड़ में कितनी बार आतंकियों को खोजा गया? आखिर उस शाहीन बाग में एक ही तरह की मीडिया से, एक ही समूह से कुछ लोग बात क्यों करते हैं? मेट्रो स्टेशन से उतरने के बाद, तंग गलियों में हर दस मीटर पर घूरती कट्टरपंथियों की आँखों के बीच से क्यों गुजरना पड़ता है शाहीन बाग जाने के लिए? आखिर आँखों में सूरमा घिसे, डरावनी और खूँखार सूरत वाले लड़के तलाशी क्यों लेते हैं? एक समानांतर सरकार क्यों चल रही है शाहीन बाग में जहाँ पुलिस तक को बैरिकेड से आगे जाने पर अनकही मनाही है?

इसीलिए, एक बच्चा कलम की जगह बंदूक उठा लेता है। वो किसी संगठन के नाम पर नहीं आता, भले ही कितने फेसबुक पोस्ट निकाल दो। वो किसी दल या संघ का प्रतिनिधि नहीं है, न ही किसी धर्म के ध्वजवाहक बन जाता है, वो एक नाबालिग बच्चा है, जिसे कट्टरपंथी सोच ने अपनी सहिष्णुता त्यागने को मजबूर कर दिया। उसने अपनी नादानी में एक गलत कदम उठाया, लेकिन वो इसका जिम्मेदार नहीं। उसके इस अपराध का भागी शाहीन बाग है, शरजील इमाम जैसे दंगाई विचार वाले कट्टरपंथी हैं, और वो सारे लोग हैं जिन्हें लगता है कि शाहीन बाग की हिन्दूघृणा एक सामान्य घटना है।

हमारे सर शर्म से झुके होने चाहिए कि एक बच्चा आज सड़क पर कट्टा ले कर उतर गया, क्योंकि वो इस अनिश्चितकालीन विरोध से, एक मजहबी भीड़ के बर्ताव से, एक मजहब द्वारा दूसरे धर्म को सतत निशाना बनाते रहने से उदास और निराश था, हमें समझना होगा उसके बाल मन के क्रोध को। अभी तक बाल मन की चंचलता सुनते थे, उसके हठ पर बातें होती थीं, लेकिन हम एक ऐसे समय में रह रहे हैं जहाँ एक मजहब का कट्टरपंथी चेहरा बाल मन को क्रोध करने पर ढकेलता है।

शर्मिंदगी होनी चाहिए इस समाज को जो धरने के नाम पर कट्टरपंथियों के हौसलों को हवा दे रहा है। इस बेहूदगी का अंत होना चाहिए क्योंकि पढ़ने-लिखने वाले बच्चे, किशोरावस्था के प्रेम का पीछा करने वाले अल्पवयस्क और चंचल, चपल, नटखट नंद-गोपाल इन्हीं मजहबी उन्मादियों के कारण हाथ में बंदूक उठा लेते हैं। इसकी जिम्मेदारी और किसी की भी नहीं है।

इस बच्चे से इसकी परेशानी पूछी जानी चाहिए, उसे उचित मनोवैज्ञानिक सलाह दी जानी चाहिए और जजों की मौजूदगी में इसके द्वारा इस अपराध का माध्यम बनने के पीछे के जिम्मेदार लोग या विचारधारा पर सख्त कदम उठाने चाहिए। क्योंकि अगर एक मजहब इस समाज के ताने-बाने में आग लगाने की फिराक में लगा रहेगा, तो दूसरी तरफ देश के नौनिहाल भयंकर मनोवैज्ञानिक दवाब में आ कर कुछ वैसा कर गुजरेंगे जो असंवैधानिक, गैरकानूनी और जानलेवा हो सकता है।

मीडिया का रोल

ये रक्तपिपासु टीवी मीडिया का काला दौर है। जिस तरह से एक अल्पवयस्क बच्चे को ले कर रिपोर्टिंग हुई है, और उसे एक आतंकवादी की तरह दिखाया जा रहा है, वो बताता है कि देश को सिर्फ बेहतर इंसान नहीं, बेहतर नागरिक चाहिए। क्या हम एक नागरिक के तौर पर असफल होते जा रहे हैं? क्या हमें यह पता नहीं कि शाहीन बाग में अगर कोई हिन्दूघृणा से सने पोस्टर लगाएगा, नारेबाजी करेगा, अलीगढ़ में कोई दंगाई विचारों वाला शरजील पूर्वोत्तर को काटने की बातें करेगा, तो उससे कोई प्रभावित हो सकता है?

आप सोचिए कि परचून की दुकान चलाने वाले घर की आर्थिक स्थिति क्या रही होगी? आपको सोचना होगा कि ऐसे परिवार में जब जद्दोजहद अगले दिन का भोजन हो, तो एक बच्चा अपने आसपास चल रहे प्रपंचों से कैसे उब जाता है, और एक दिन वो शाहीन बाग को खतम करने निकल पड़ता है! इस उम्र में भारत के आधे किशोर टिकटॉक पर विडियो बना कर मनोरंजन करने में लगे हैं, और एक किशोर बंदूक खरीदने निकल जाता है!

मीडिया में उसकी मानसिक स्थिति पर चर्चा नहीं हो रही। इस्लामी आतंकी ओसामा बिन लादेन को बेहतरीन पिता बताने वाले, आतंकवादी बुरहान वनी के बाप की जन्मकुंडली निकालने वाले, इस्लाम के जिहाद को आगे बढ़ाने वाले अफजल गुरु के बेटे के दसवीं की मार्कशीट दिखाने वाले, आज इस लड़के के अल्पवयस्क होने पर दुखी हैं कि अब तो इसे ‘वैसी’ सजा नहीं होगी जो रात के दो बजे सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खुलवाने वाले सोच रहे थे!

अब जबकि उसने स्वीकारा है कि वो किसी संगठन का प्रतिनिधित्व नहीं करता, क्या आज की शाम मीडिया में कल तक उसे भाजपा, संघ, हिन्दू आतंकवाद और धार्मिक उन्माद से जोड़ने वाले इस बच्चे के मनोमस्तिष्क पर पड़े उस जबरदस्त दबाव की बात करेंगे कि वो अकेला ही शाहीन बाग के दंगाइयों से लड़ने निकल पड़ा? क्या वही मीडिया, और ट्विटर वाले जो इस मासूम लड़के को, जिसे मनोचिकित्सा की आवश्यकता है, हिन्दू आतंकी बता रहे थे, वो आज यह कोशिश करेंगे कि स्टूडियो में एक मनोचिकित्सक को बैठा कर उससे पूछें कि एक सहिष्णु धर्म का बच्चा, कलम की जगह बंदूक कैसे उठा लेता है? क्या वो देश की जनता को बताना चाहेंगे ताकि ऐसे बच्चे इस्लामी कट्टरपंथ को लेकर प्रतिक्रियावादी न बन जाएँ?

सवाल कई हैं, जवाब बहुत कम क्योंकि हमने फैसला सुनाना शुरु कर दिया है। रवीश जैसे लोगों के चेहरे पर मुस्कान आ जाती है जब एक हिन्दू नाम उभरता है। वो ‘रामभक्त’ शब्द पर विशेष जोर देता है, वो मुस्कुराता है कि ये तो अपने काम की चीज है, वरना शरजील को डिफेंड करते-करते तो चेहरे पर नैसर्गिक मलिनता फैल रही थी। ये दिन इन गिद्धों की आँखों में बिल्लौरी चमक वाला दिन था।

जबकि, इन्हें यह समाज किस जगह जा रहा है, कुछ लोग इस समाज में कैसी वैमनस्यता फैलाना चाह रहे हैं, कुछ कट्टरपंथी नेता-पत्रकार-वक्ता अपनी पढ़ाई और पोजिशन का उपयोग कट्टरपंथियों के निजाम के लिए क्यों कर रहे हैं, ऐसे प्रश्नों को पूछे जाने की जरूरत है। आज एक समाज और देश के तौर पर हम असफल हो चुके हैं, क्योंकि एक बच्चे ने हाथों में बंदूक उठा ली है!

हमें शर्म आनी चाहिए कि हम शाहीन बाग, जामिया के दंगों, अलीगढ़ के बलवों, लखनऊ के फसादों को ‘प्रदर्शन’ के नाम पर सामान्यीकृत करने लगे हैं। हम एक नए तरह की प्रतिक्रिया को जन्म देना चाह रहे हैं, जहाँ इस्लामी कट्टरपंथ अपने मजहब वालों को तो छोड़िए, हिन्दुओं के बच्चों पर भी मानसिक दबाव बना रहा है कि वो ‘कुछ करें’। ये बहुत बुरा दौर है, अपने बच्चों को बचाइए।

हिन्दू आज खौफ में है, लेकिन वो क्या करे, इसका समाधान क्या है? वहाँ मारो जहाँ सबसे ज्यादा दर्द हो?

फर्रुखाबाद में मोहम्मदाबाद थाने के व्यक्ति ने बदला लेने के लिए 20 बच्चों को बनाया बंधक, पुलिस पर फेंका हथगोला

चोरी के आरोप में जेल गए युवक ने जमानत पर आने के बाद जेल भिजवाने वाले लोगों को सबक सिखाने के लिए गाँव के 20 बच्चों को बंधक बना लिया। देर तक घर नहीं पहुँचे बच्चों के चिंतित परिजन जैसे ही उसके गर पहुँचे तो आरोपित ने गोली चला दी। इसके बाद मौके पर कई थानों की पुलिस फोर्स बच्चों को आरोपित के बंधन से मुक्त कराने के लिए प्रयासरत है।

मामला फर्रुखावाद जिले के मोहम्मदाबाद थाने के गाँव करथिया की हैं। गाँव निवासी युवक सुभाष वाथम ने गुरुवार दोपहर को अपनी एक वर्ष की बेटी के जन्मदिन पर दावत खिलाने के बहाने मौहल्ले के 20 बच्चों को अपने घर बुला लिया। इसके बाद देर तक बच्चे घर नहीं पहुँचे तो परिजनों को इसकी चिंता हुई। कुछ परिजन जैसे ही सुभाष के गर पहुँचे वैसे ही कमरे में बच्चों के साथ बंद सुभाष ने गोली चला दी, जिससे बच्चों के परिजन बाल-बाल बच गए और दहशत में आ गए। घबराए परिजनों ने तत्काल क्षेत्रीय पुलिस को घटना की जानकारी दी।

सूचना पर जैसे ही क्षेत्रीय पुलिस मौके पर पहुँची वैसे ही आरोपित ने पुलिस पर हथगोला फेंक दिया, जिसमें इंस्पेक्टर सहित तीन पुलिस कर्मी घायल हो गए। इसके बाद पुलिस ने अपने अधिकारियों को सूचित किया तो कुछ ही देर में घटना स्थल पर अधिकारियों के साथ कई थानों का फोर्स इकठ्ठा हो गया। इस बीच आरोपित को क्षेत्रीय विधायक और गाँव से ही उसका दोस्त समझाने के लिए पहुँचे, लेकिन उसने फिर से फायर झोंक दिया, जिससे एक ग्रामीण घायल हो गया। इसके बाद से देर रात तक पुलिस बदमाश के चुंगल से बच्चों को बंधकमुक्त कराने का प्रयास करते रहे।

फर्रुखाबाद में बच्चों को बंधक बनाए बदमाश से निपटने का प्रयास करती पुलिस

दरअसल करथिया गाँव निवासी सुभाष बाथम एक शातिर बदमाश है, जो कि एक युवक की हत्या में कोर्ट से आजीवन कारावास की सजा पा चुका है, लेकिन कोर्ट से जमानत मिलने के बाद शातिर बदमाश खुले आम घूम रहा है। वहीं पिछले वर्ष एक चोरी के आरोप में बदमाश को फिर से जेल हो गई, जोकि करीब एक महीने पहले ही जेल से बाहर आया है। वहीं शातिर सुभाष तभी से उन लोगों को सबक सिखाने की बात कह रहा था, जिन्होंने उसे जेल भिजवाने में पुलिस की मदद की थी। उन सबको सबक सिखाने के लिए बदमाश ने 20 बच्चों को बहाने से बुलाकर घर में बंधक बना लिया। इसके बाद से बच्चों के परिजनों का रो-रोकर बुरा हाल है और ये सभी भगवान से अपने-अपने बच्चों की सलामती की दुआ माँग रहे हैं।

वहीं इस मामले में डीजीपी ओपी सिंह ने कहा कि पुलिस ने घेराबंदी कर ली है। बच्चों को नुकसान न पहुँचे, इसलिए संभलकर कार्रवाई कर रही है। युवक कमरे के अंदर से फायरिंग कर रहा है, जिसमें दो पुलिसकर्मी घायल हुए हैं। बंधक बनाने वाला सजायाफ्ता है। साथ ही हालात बिगड़ते देख लखनऊ से एटीएम कमांडो को रवाना किया गया है। यह प्रयास है कि जल्द से जल्द बच्चों को बचाया जा सके।

निकाह करने के लिए ईसाई से मुस्लिम बना अब्दुल हुनैन, घरवालों के इंकार के बाद पहुँचा मानवाधिकार आयोग

हैदराबाद में एक मुस्लिम लड़की से विवाह करने के लिए धर्मांतरण करने वाले अब्दुल हुनैन की दुखद कहानी सामने आई है। निकाह करने के लिए अपना धर्म बदलने वाले अब्दुल अब मानवाधिकार आयोग पहुँच चुका है।

दरअसल, अब्दुल हुनैन ने मुस्लिम महिला से शादी करने के लिए ईसाई धर्म त्यागकर इस्लाम अपनाया था लेकिन लड़की के घरवालों ने इस शादी के लिए मानने से मना कर दिया। इसके बाद अब्दुल हुनैन अब मानवाधिकार आयोग का सहारा ले रहे हैं।

नोट- ये एक डवलपिंग स्टोरी है, आगे जानकारी मिलने पर अपडेट किया जाएगा।

केजरीवाल को चुनाव आयोग का नोटिस, 31 जनवरी तक देना होगा जवाब

दिल्ली में चल रहे चुनाव प्रचार के बीच चुनाव आयोग ने केजरीवाल को एक नोटिस जारी किया है। आचार संहिता उल्लंघन मामले में जारी नोटिस का जवाब केजरीवाल को 31 जनवरी तक देना होगा।

बीते 13 जनवरी को मकरसंक्रांति के अवसर पर तीस हजारी कोर्ट में आयोजित एक कार्यक्रम में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने लोगों को संबोधित करते हुए कहा था कि हमें जगह मिले तो कोर्ट और बार में भी मोहल्ला क्लीनिक खोल देंगे। हम दिल्ली के सभी कोने में मोहल्ला क्लीनिक खोलने के लिए तैयार हैं, जिसके लिए 3-4 कमरों की आवश्यकता होती है। केजरीवाल द्वारा दिए गए इस बयान की बीजेपी ने अगले ही दिन 14 जनवरी को चुनाव आयोग से शिकायत कर दी और कहा कि केजरीवाल ने आचार संहिता का उल्लंघन किया है, जिस पर चुनाव आयोग को संज्ञान लेना चाहिए।

चुनाव आयोग द्वारा केजरीवाल को जारी किया गया नोटिस

चुनाव आयोग द्वारा केजरीवाल को जारी किया गया नोटिस

बीजेपी की शिकायत का संज्ञान लेते हुए चुनाव आयोग ने गुरुवार को अरविंद केजरीवाल को नोटिस जारी कर शुक्रवार शाम 5 बजे तक हर हाल में जवाब देने के लिए कहा है। वहीं किसी भी स्थित में नोटिस का जवाब ने देने पर आयोग फ़िर से आगे की कार्रवाई करेगा।