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नीरज प्रजापति की हत्या के मामले में 16 गिरफ्तार, CAA समर्थन रैली के समय मुस्लिम कॉलोनी में हुआ था हमला

झारखंड के लोहरदगा में 23 जनवरी को सीएए के समर्थन में आयोजित हुई रैली पर मुस्लिमों के हमले में घायल होने के बाद नीरज प्रजापति की मृत्यु हो गई थी। झारखंड पुलिस ने इस मामले की जाँच में 16 ऐसे लोगों को गिरफ्तार कर लिया है, जो इस हत्या में शामिल हो सकते हैं।

नीरज प्रजापति का इलाज लोहरदगा सदर अस्पताल, राँची ऑर्किड हॉस्पिटल और फिर (RIMS) रिम्स में चला, लेकिन उन्हें बचाया नहीं जा सका। वो देवी-देवताओं की मूर्तियाँ व अन्य पेंटिंग्स बना कर अपना व परिवार का गुजर-बसर करते थे। बेटे की मृत्यु की ख़बर सुन कर नीरज के पिता को भी गहरा सदमा लगा है, जिसके बाद उन्हें रिम्स के आईसीयू में भर्ती कराया गया था। फ़िलहाल वो घर पर हैं लेकिन उनकी स्थिति ठीक नहीं है।

नीरज प्रजापति की मृत्यु तब हुई जब उनके सर पर CAA के समर्थन में लोहे की रॉड से हमला किया गया। पुलिस का कहना है कि उनकी मृत्यु इस चोट की वजह से अत्यधिक खून बहने और घाव पर सेप्टिक होने से हुई। सीएए के समर्थन में रैली निकाल रहे कुछ लोगों पर पूर्व-नियोजित तरीके से मुसलमानों ने अपने घरों की छतों पर ईंट-पत्थर फेंककर हमला किया था।

मुस्लिम मोहल्ले में पहुँचते ही नारा-ए-तकबीर के साथ जुलूस का स्वागत किया गया और मुस्लिमों की भीड़ उन पर टूट पड़ी। हालाँकि, रैली विश्व हिन्दू परिषद् के बैनर तले निकाली जा रही थी लेकिन इसमें ज्यादातर आम नागरिक शामिल थे, जिनका ताल्लुक किसी संगठन से नहीं रहा है।

ऑपइंडिया से बातचीत में नीरज के परिवार ने बताया था कि लोहरदगा में अधिकारीगण दोनों समुदायों के वरिष्ठ लोगों के साथ बैठक पर बैठक कर रहे हैं लेकिन जो पीड़ित हैं, उनकी बातें नहीं सुनी जा रही। ज्ञात हो कि नीरज प्रजापति के अंतिम संस्कार को भी जल्दी-जल्दी में निपटाया गया और लोगों को उनकी अंतिम यात्रा में शामिल होने से रोका गया था। लोग इसे झारझंड में सरकार बदलने का दुष्प्रभाव बता रहे हैं। झारखण्ड की हेमंत सोरेन सरकार मुस्लिम तुष्टिकरण की नित नई इबारत गढ़ रही है।

जामिया में हुई फायरिंग पर बोले गृहमंत्री अमित शाह- घटना बर्दाश्त नहीं, सख्त कार्रवाई के निर्देश

जामिया में सीएए के खिलाफ़ हो रहे प्रदर्शन के बीच हुई फायरिंग की घटना पर देश के गृहमंत्री अमित शाह ने नाराजगी जाहिर की है। अमित शाह ने कहा है कि इस तरह की घटना कहीं भी बर्दाश्त नहीं की जाएगी। इतना ही नहीं उन्होंने कहा है कि दोषियों के ख़िलाफ कड़ी से कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

दिल्ली के जामिया में हुई फायरिंग की घटना पर केंद्र की सियासत तेज हो गई है। एक तरफ जहाँ विपक्षी पार्टी कॉन्ग्रेस ने घटना को लेकर मोदी सरकार पर सवाल खड़े किए हैं। वहीं गृहमंत्री अमित शाह ने घटना को गंभीरता से लेते हुए मामले पर दिल्ली पुलिस कमिश्नर से बात की है और कमिश्नर को कठोर कार्रवाई के निर्देश दिए हैं। शाह ने ट्वीट करते हुए कहा कि सरकार इस तरह की किसी भी घटना को बर्दाश्त नहीं करेगी। घटना में शामिल दोषियों के ख़िलाफ़ गंभीरता के साथ कठोर कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

वहीं केंद्रीय मंत्री किरन रिजिजू ने फायरिंग की घटना पर कहा कि कानून तोड़ने वाले किसी भी व्यक्ति पर कार्रवाई की जानी चाहिए। जो कोई भी ऐसा करता है उसके खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए। कोई भी कानून से बड़ा या देश से बड़ा नहीं हो सकता। हालाँकि, पुलिस ने आरोपित युवक को गिरफ्तार कर लिया है, जिससे दिल्ली पुलिस लगातार पूछताछ कर यह पता लगाने की कोशिश में जुटी है कि वह छात्र हथियार लेकर मार्च में क्यों शामिल हुआ और वह अपनी गोली से किसे निशाना बनाना चाहता था।

आपको बता दें कि गुरुवार दोपहर को महात्मा गांधी की पुण्यतिथि पर जामिया से लेकर राजघाट तक सीएए के खिलाफ विरोध मार्च निकालने के दौरान रामभक्त गुलशन (बदला हुआ नाम) नाम के शख्स ने अचानक से मीडिया कर्मियों के सामने आकर पिस्तौल से गोली चला दी थी। जिसमें मौजूद जामिया के छात्र शादाब के हाथ में गोली लगी, जिसे अस्पताल में भर्ती कराया गया है। गौरतलब है कि इस दौरान भारी पुलिस फोर्स और मीडिया कर्मियों की मौजूदगी थी, लेकिन किसी को कुछ समझ नहीं आया कि आख़िर अचानक से हुआ क्या।

अपडेट: नई सूचनाओं के आने से हमें पता चला है कि जामिया में गोली चलाने का आरोपित नाबालिग है, अतः सम्बद्ध कानूनों के अनुसार उसका नाम बदल दिया गया है।

दिल्ली में CAA प्रदर्शनकारियों ने किया Zee न्यूज़ के पत्रकारों पर हमला

CAA विरोध धीरे-धीरे अपने वास्तविक स्वरूप में आने लगा है। हाल ही में न्यूज़ नेशन के संपादक दीपक चौरसिया पर शाहीन बाग़ में हुए हमले के बाद दिल्ली में ही प्रदर्शनकारियों ने ज़ी न्यूज़ के पत्रकारों पर हमला कर दिया। प्रदर्शनकारियों ने बैरकेडिंग तोड़कर पत्रकारों को घेरकर पीटा, यही नहीं उन्हें लात-घूँसे मारे गए।

समाचार चैनल ज़ी न्यूज़ के एडिटर सुधीर चौधरी ने यह जानकारी ट्विटर पर शेयर करते हुए लिखा है- “इतनी असहनशीलता?”

ज़ी न्यूज़ के पत्रकारों पर हमले की यह घटना दिल्ली के सुखदेव विहार की बताई जा रही है। पत्रकारों पर हमले की इस तरह की घटनाएँ अब आए दिन घटने लगी हैं। खासतौर से उन पत्रकारों पर सुनियोजित तरीके से हमला किया जा रहा है जो प्रदर्शनकारियों की बातों से इत्तेफाक नहीं रखते। या उनसे अलग बात प्रस्तुत करते हैं।

नीरज के परिवार के लिए ऑपइंडिया का अभियान, 1 दिन में जुटे ₹15 लाख: CAA का समर्थन करने पर मिली थी मौत

जैसा कि आपने ऑपइंडिया में लगातार आ रही ख़बरों में पढ़ा होगा, लोहरदगा में 23 जनवरी को सीएए के समर्थन में आयोजित हुई रैली पर मुस्लिमों के हमले में घायल होने के बाद नीरज प्रजापति की मृत्यु हो गई थी। लोहरदगा सदर अस्पताल, राँची ऑर्किड हॉस्पिटल और फिर रिम्स में उनका इलाज चला, लेकिन उन्हें बचाया नहीं जा सका। वो देवी-देवताओं की मूर्तियाँ व अन्य पेंटिंग्स बना कर अपना व परिवार का गुजर-बसर करते थे। बेटे की मृत्यु की ख़बर सुन कर नीरज के पिता को भी गहरा सदमा लगा है, जिसके बाद उन्हें रिम्स के आईसीयू में भर्ती कराया गया था। फ़िलहाल वो घर पर हैं लेकिन उनकी स्थिति ठीक नहीं है।

चूँकि, परिवार की माली हालत ठीक नहीं है और दिवंगत नीरज द्वारा बनाई गई माँ सरस्वती की प्रतिमाएँ बिक नहीं पाईं, ऑपइंडिया ने परिवार की मदद के लिए क्राउडफंडिंग अभियान चलाया। दिवंगत नीरज राम प्रजापति की पत्नी के बैंक अकाउंट डिटेल को जारी किया गया और सार्वजनिक रूप से हमनें जनता से अपील करते हुए कहा कि वे अपनी-अपनी क्षमतानुसार सहयोग करें। नीरज प्रजापति की एक 9 साल की बेटी है और 3 वर्ष का बेटा है, जिनके भरण-पोषण हेतु लोगों द्वारा सहयोग स्वरूप दी गई राशि का अहम योगदान होगा।

ऑपइंडिया के संपादक अजीत भारती ने एक वीडियो के जरिए लोगों को दिवंगत नीरज के परिवार की व्यथा बताई और उनकी पत्नी दिव्या कुमारी के बैंक अकाउंट डिटेल्स सार्वजनिक करते हुए सहयोग की अपील की। हालाँकि, नीरज प्रजापति की पत्नी दिव्या के पास पैन कार्ड नहीं है लेकिन परिवार ने इसके लिए अप्लाई कर दिया है। एक और चिंता वाली बात ये थी कि बैंक अकाउंट में दोनों के लगातार आ रहे डोनेशन के कारण खाते को बैंक प्रशासन संदिग्ध पा सकता है। ऑपइंडिया को परिजनों द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, सम्बंधित बैंक के मैनेजर ने समस्या को समझा है और पूर्ण सहयोग का आश्वासन दिया है।

ऑपइंडिया ने ‘बैंक ऑफ इंडिया’ के चीफ एरिया मैनेजर रविकांत सिन्हा से बातचीत की, जिन्होंने ब्रांच मैनेजर से बात कर के पूर्ण सहयोग का आश्वासन दिया है। इसके अलावा हम क्राउडफंडिंग वेबसाइट ‘CROWDKASH’ पर भी नीरज के परिवार की सहायता के लिए धन जुटा रहे हैं। वेबसाइट पर घटना के विवरण के साथ लोगों से सहयोग की अपील की गई है। अब तक इस वेबसाइट पर लोगों के सहयोग के जरिए सवा 3 लाख रुपए जुटाए जा चुके हैं।

दिवंगत नीरज प्रजापति की पत्नी का बैंक अकाउंट विवरण

ये राशि अंतिम नहीं है क्योंकि लोग लगातार रुपए डोनेट कर रहे हैं। एक प्रबुद्ध जन ने दिवंगत नीरज के दोनों बच्चों की शिक्षा-दीक्षा का भार वहन करने की इच्छा जताई है, जिसके लिए परिवार से बातचीत की जा रही है। दोनों माध्यमों से कुल मिला कर अभी तक 15 लाख रुपए जुट चुके हैं।

इतना सब कुछ होने के बावजूद अभी तक न तो झारखण्ड सरकार और न ही प्रशासन की आँखें खुली हैं। ऑपइंडिया ने जब लोहरदगा की डिप्टी कमिश्नर आकांक्षा रंजन से पूछा कि पीड़ित परिवार की सहायता के लिए प्रशासन क्या कर रहा है, उन्होंने कहा कि हेमंत सोरेन सरकार ने ‘नियमानुसार कार्रवाई करने’ का आदेश दिया है। हालाँकि, ये आदेश क्या है और इसके तहत क्या किया जाएगा, इस सम्बन्ध में वो कुछ स्पष्ट नहीं बता पाईं। उन्होंने तो इस बात से भी इनकार कर दिया कि नीरज प्रजापति की मौत लोहरदगा में हुई हिंसा की वजह से हुई है। उनका कहना था कि कार्डियक अरेस्ट की वजह से उनकी मौत हुई, जैसा रिम्स की रिपोर्ट में कहा गया है।

डीसी आकांक्षा रंजन से जब हमने परिवार का पक्ष रखना चाहा तो उन्होंने इसे ‘अफवाह’ और ‘सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने’ वाली ख़बर करार दिया। बता दें कि नीरज राम प्रजापति की पत्नी ने मुख्यमंत्री को भेजे पत्र में स्पष्ट लिखा है कि उनके पति के सिर पर लोहे की रॉड से वार किया गया, जब वो सीएए समर्थन रैली में हिस्सा ले रहे थे। एफआईआर कॉपी में भी यही बात लिखी है। एक नेशनल मीडिया के स्थानीय पत्रकार ने हमें सूचना दी है कि प्रशासन को सरकार का आदेश है कि वो अपने स्टैंड पर कायम रहे और परिजनों की माँगों के सामने न झुके। स्थानीय पत्रकार ने बताया कि कुछ घंटों की छूट के साथ इलाक़े में कर्फ्यू अभी भी जारी है।

लोहरदगा में अधिकारीगण दोनों समुदायों के वरिष्ठ लोगों के साथ बैठक पर बैठक कर रहे हैं लेकिन जो पीड़ित हैं, उनकी बातें नहीं सुनी जा रही। याद हो कि नीरज प्रजापति के अंतिम संस्कार को भी जल्दी-जल्दी में निपटाया गया और लोगों को उनकी अंतिम यात्रा में शामिल होने से रोका गया था। लोग इसे झारझंड में सरकार बदलने का दुष्प्रभाव बता रहे हैं। झारखण्ड की हेमंत सोरेन सरकार मुस्लिम तुष्टिकरण की नित नई इबारत गढ़ रही है।

रामभक्त गुलशन नाम, फेसबुक ID, पत्रकार, नारे, गोली… कितना आसान है ये सब! सवाल बहुत हैं!

पुलिस की मौजूदगी में सीएए के खिलाफ चल रहे प्रदर्शन में एक युवक हथियार लेकर जाता है और फिर मीडिया कर्मियों के कैमरे को देखते हुए हाथ में पिस्तौल लहराए पुलिस की ओर उल्टे कदम बढ़ता चला जाता है। इसके बाद यह कहते हुए गोली चला देता है कि ‘तुमको आज़ादी चाहिए… ये लो आज़ादी’। यह सब कितना आसान हो गया है… क्योंकि यह सब सुनियोजित तरीके से किया जाता है।

आप वह वीडियो देखिए और खुद ही समझिए… बीते दिनों शाहीन बाग के सरगना शरजील इमाम को बिहार से गिरफ्तार किया जाता है। इसके बाद हुई पुलिस पूछताछ में वह अपनी गिरफ्तारी पर कोई अफ़सोस नहीं जताते हुए कहता है कि वह भारत को इस्लामिक देश बनाना चाहता है।

अब इसके बाद गुरुवार को मौका था महात्मा गांधी की पुण्यतिथि पर जामिया से लेकर राजघाट तक सीएए के विरोध मार्च निकालने का। इस मार्च में कुछ युवा इकट्ठा होते हैं। इसी के साथ भारी पुलिस फोर्स और मीडियाकर्मियों की मौजूदगी होती है। इसी बीच कुछ ऐसा होता है, जो दिखाई तो सभी को देता है, लेकिन समझ में हर किसी को नहीं आता।

सड़क पर एक लड़का अचानक से हाथ में पिस्टल लेकर रोड पर लहराने लगता है। इसमें ध्यान देने वाली बात यह है कि सीधे रोड पर आते ही छात्र ने मीडियाकर्मियों के कैमरे की ओर देखते पिस्टल को ताना और उल्टे कदम पुलिस की ओर बढ़ता रहा। सोचने वाली वात यह भी कि छात्र के सीधे पिस्तौल तानने के बाद कोई भी सामने से पीछे नहीं हटा और बेखौफ एक मीडियाकर्मी उससे पूछता है तुम्हारा नाम क्या है? तो जवाब मिलता है रामभक्त गुलशन (बदला हुआ नाम)

एक दूसरे वीडियो में एक चश्मदीद यह कहते हुए सुनाई पड़ता है कि छात्र बोल रहा है, ‘दिल्ली पुलिस ज़िंदाबाद, हिंदुस्तान ज़िंदाबाद…’ यहाँ तक कि उसने ‘जय श्री राम’ का भी नारा लगाया। वहीं अमर उजाला की रिपोर्ट के मुताबिक एक चश्मदीद ने बताया कि लड़के ने पूछा कि ‘तुमको आज़ादी चाहिए?’ इसके बाद उसने गोली चलाई और कहा… ‘ये लो आज़ादी’। इसके बाद ही पुलिस द्वारा छात्र को गिरफ्तार कर लिया जाता है।

पिस्टल के सामने बड़ी संख्या में मीडियाकर्मी कैमरा लिया कवरेज कर रहे हैं। इसी बीच सीधे गोली चलती है और वह सीधे शादाब नाम के मुस्लिम छात्र के लगती है। मानो ये वास्कोडिगामा की गन है, जिससे नाम लेकर गोली चलाई गई हो! अब आप गौर करिए सब कुछ कितनी आसानी से खिचड़ी पकाई जाती है। पूरा स्टेज तैयार है… पुलिस फोर्स जमा है… पत्रकार मार्च निकलने से पहले ही कैमरा लेकर तैयार खड़े हुए हैं… और कहने को पदयात्रा की तैयारी चल रही है।

पत्रकार नहीं भागते, वो पुलिस से सवाल पूछ रहे हैं कि वो कुछ क्यों नहीं कर रहे? पुलिस किसी भी गोली चलाने वाले से बचेगी ही, वो उसके कट्टे की एक गोली ख़त्म होने का इंतज़ार कर रही थी क्योंकि उन्हें नहीं पता था कि गोली कहाँ और किसे लग सकती है। मीडिया वालों को शायद पता था इसलिए वो पिस्तौल की ही तरफ बढ़ रहे थे। ये सब सहजता से हो गया क्योंकि मीडिया को मौका मिल सके ‘गांधीजी की पुण्यतिथि पर दूसरा गोडसे पैदा’ करके खबर चलाने का। इसके बाद पत्रकारों की एक लॉबी को संघी आतंकी, नया गोडसे, मासूम शादाब को गोली मारने जैसी बातों को लेकर सरकार और दक्षिणपंथियों पर निशाना साधने का मौका मिला सके।

खैर, अब आप इस लड़के के बारे में भी जान लीजिए। आरोपित की पहचान गुलशन के रूप में हुई है, जो कि ग्रेटर नोएडा के जेवर का रहने वाला है। शख्स ने रामभक्त गुलशन के नाम से फेसबुक पर आईडी बनाई हुई है, जिसमें जनवरी से ही लगातार पोस्ट की जा रही हैं और इन सभी पोस्टों में ‘हिंदू खतरे में है’, इस तरह से प्रदर्शित किया गया है। वहीं पिछले वर्ष अक्टूबर माह में इसके कवर पेज को बदला गया था। इतना ही नहीं, इसमें गौर करने वाली बात यह है कि शख्स ने अपनी आईडी से एजाज़ ख़ान और भीम आर्मी का शेर जैसे पेजों को लाईक किया हुआ है। और, ताज़ा समाचार मिलने तक वो ID डिलीट कर दी गई है, और नई सामने आ गई।

फेसबुक प्रोफाइल से पता चलता है कि युवक कुछ समय से इस घटना को अंजाम देने की तैयारी में लगा हुआ था, जिसने लगातार कई तरह की पहले तो पोस्ट की और फिर फेसबुक पर लाईव भी आया था। उसने अपनी प्रोफाइल पर एक फोटो पोस्ट की, जिसमें कैप्शन लिखा हुआ है, ‘चंदन भाई ये बदला आपके लिए’। ये वही कासगंज के चंदन गुप्ता हैं जिनकी तिरंगा यात्रा के दौरान हुई हिंसा के दौरान मौत हो गई थी।

वहीं जो छात्र हमले में घायल हुआ है उसकी पहचान जामिया के मास कॉम के छात्र शादाब आलम के रूप में हुई है। अब पुलिस इस पूछताछ में जुटी है कि शख्स पैदल मार्च में हथियार लेकर क्यों आया था और इस तरह घटना को अंजाम देने के पीछे उसका उद्देश्य क्या था। हालाँकि, घटना के चंद घंटों बाद ही फेसबुक प्रोफाइल को डिलीट कर देना यह साबित करता है कि चोर की दाढ़ी में तिनका नहीं पूरा बाँस है।

अपडेट: नई सूचनाओं के आने से हमें पता चला है कि जामिया में गोली चलाने का आरोपित नाबालिग है, अतः सम्बद्ध कानूनों के अनुसार उसका नाम बदल दिया गया है।

‘चंदन भाई ये बदला आपके लिए’ गोली चलाने से पहले गुलशन ने किया फेसबुक पर पोस्ट, मामला संदिग्ध

नागरिकता संशोधन कानून के ख़िलाफ़ जामिया से लेकर राजघाट तक हुए पैदल मार्च के दौरान एक युवक ने बीच सड़क पर आकर गोली चला दी। युवक ने खुद का नाम गुलशन (बदला हुआ नाम) बताया। हालाँकि, इससे पहले ये मालूम चल पाए कि गुलशन ने ऐसा किसी के कहने पर किया या फिर अपनी मर्जी से। सोशल मीडिया पर लिबरल गिरोह सक्रिय हो गया और तुरंत गुलशन को पहले संघी आतंकी करार दिया गया और फिर भाजपा को घेरा जाने लगा।

इसी बीच गुलशन के फेसबुक अकॉउंट के पोस्ट भी वायरल होने लगे। इसलिए हमने भी गुलशन के अकॉउंट की पड़ताल की, जिसे देखकर कई चीजें पता चलीं। गुलशन के फेसबुक अकॉउंट पर दावा किया गया कि उसने ये हरकत चंदन गुप्ता की मौत का बदला लेने के लिए की। वही चंदन गुप्ता, जिसे कुछ समय पहले तिरंगा यात्रा के दौरान मुस्लिमों ने मार दिया था। गुलशन ने मार्च में शामिल में ये हरकत करने से पहले फेसबुक पर लिख दिया था, “चंदन भाई ये बदला आपके लिए है।”

इसके अलावा वो आज सुबह 11 बजे से ही फेसबुक पर सक्रिय था। वो उसने अपने मित्र सूची में सभी को उसे सी फर्स्ट करने के लिए कह रहा था। उसने शाहीन बाग पर जाकर सबसे पहले एक बुजुर्ग सीएए समर्थक की तस्वीर शेयर की थी और फिर वहाँ के माहौल को फेसबुक लाइव किया।

उसने अपनी फेसबुक पर लिखा था कि उसके घर का ध्यान रखा जाए और उसकी अंतिम यात्रा में उसे भगवे में लेकर जाया जाए। फेसबुक लाइव के अलावा उसने अपने आखिर पोस्ट में शाहीन बाग का खेल खत्म लिखा था। उसने लिखा था कि मार्च में कोई हिंदू मीडिया नहीं है।

लेकिन, इन सब पोस्टों के अलावा यहाँ गौर करने वाली बात ये है कि गुलशन के नाम के इस ऑउंट को इसी साल जनवरी से एक्टिव किया गया है। इससे पहले साल 2019 में एक कवर फोटो अपलोड हुई थी। और साल 2018 का कोई भी पोस्ट विजिबल नहीं हैं। जिससे इस पूरी प्रोफाइल पर संदिग्धता बनी हुई हैं।

हालाँकि सारा सच क्या है, इसका खुलासा पूछताछ के बाद ही होगा। लेकिन जिस तरह से भाजपा पर निशाना साधने के लिए गुलशन के फेसबुक पोस्टों का सहारा लिया जा रहा है। उन पोस्टों से यही पता चलता है कि उसने ये कदम आवेश में आकर उठाया।

एक तरह से देखा जाए तो ये पूरा मामला संदिग्ध लग रहा है। इसकी सबसे बड़ी वजह है जब वह हवा में पिस्तौल लहरा रहा था तो उस समय मीडिया के कई लोग बेख़ौफ़ उसका वीडियो बनाने के लिए वहाँ मौजूद हैं। मानो सबकुछ पहले से प्लान है। हालाँकि, पुलिस ने उसे तुरंत गिरफ्तार कर लिया लेकिन पुलिस की कस्टडी में उसके होने के बावजूद उसकी फेसबुक प्रोफाइल डिलीट कर दी गई। जिससे इस बात का संदेह और पुख्ता हो जाता है कि गुलशन का फेसबुक पेज कोई और चला रहा था।

अपडेट: नई सूचनाओं के आने से हमें पता चला है कि जामिया में गोली चलाने का आरोपित नाबालिग है, अतः सम्बद्ध कानूनों के अनुसार उसका नाम बदल दिया गया है।

रामभक्त गुलशन की फेसबुक ID डिलीट… पुलिस कस्टडी में? कौन चला रहा है?

जामिया प्रदर्शन के दौरान बन्दूक लहराते हुए गोली चलाने वाले कथित ‘रामभक्त गुलशन’ का फेसबुक अकाउंट गायब हो चुका है। दरअसल, गुलशन द्वारा नारे लगाने के बाद उसकी एक फेसबुक ID सामने आई थी, जिसमें उसने चंदन गुप्ता की मौत का बदला लेने की बात कही थी।

साथ ही पत्रकारों द्वारा जब गिरफ्तारी के समय गुलशन से नाम पूछा गया तो उसने सिर्फ गुलशन न कहकर अपना नाम ‘रामभक्त गुलशन’ बताया। यह भी चर्चा करते देखे जा रहे हैं कई शायद गुलशन जानता था कि उसे ‘रामभक्त गुलशन’ के नाम से आसानी से सोशल मीडिया पर सर्च किया जा सकता है।

ज्ञात हो कि गुलशन की गिरफ्तारी के बाद उसके फेसबुक अकाउंट के सामने आने के बाद लिबरल मीडिया और लिबरल गिरोह ने सॉइल मीडिया पर गुलशन की गिरफ्तारी को हिन्दू आतंकवाद जैसे शब्दों से जोड़ना शुरू कर दिया था। इसके बाद गुलशन की फेसबुक ID के गायब हो जाने से यह सारा प्रकरण सन्देश में आ गया है।

लोग संदेह जता रहे हैं कि आखिर पुलिस की कैद में होने के बाद यह अकाउंट अपने आप कैसे गायब हो गया। इस अकाउंट में की गयी सभी गतिविधियाँ मात्र जनवरी 2020 के बाद ही देखी गईं हैं। इससे पहले अक्टूबर 2020 में गुलशन के इस अकाउंट से सिर्फ एक कवर फोटो ही अपडेट की गई है और बाकी अन्य जानकारियाँ छुपाई गई थी।

गुलशन के स्क्रीनशॉट सार्वजानिक होने के बाद यह अकाउंट ही गायब हो गया है। सोशल मीडिया पर गुलशन के जरिए हिन्दुओं की साजिश और गाँधी-गोडसे जैसी बहस तेज हो गई हैं। ऐसे में गुलशन के अकाउंट का ही गायब पूरे नाटकीय घटनाक्रम पर सवाल उठा रहा है। साथ ही, कुछ लोग यह भी पूछ रहे हैं कि उसने अपने प्रोफाइल से जो पेज लाइक किए हुए थे उसमें ‘एजाज़ खान’ और ‘भीम आर्मी का शेर’ शामिल हैं।

गज़ब की बात यह है कि एक ID डिलीट होने के बाद दूसरी ID सामने आ गई है।

अपडेट: नई सूचनाओं के आने से हमें पता चला है कि जामिया में गोली चलाने का आरोपित नाबालिग है, अतः सम्बद्ध कानूनों के अनुसार उसका नाम बदल दिया गया है।

मोहल्ला क्लीनिक पर घिरे केजरीवाल, शाह ने कहा- पाप का AAP को देना होगा जवाब

दिल्ली विधानसभा चुनावों के मद्देनजर भाजपा लगातार आम आदमी पार्टी के झूठों का पर्दाफाश कर रही है। बुधवार को पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने महिला सुरक्षा मामले पर केजरीवाल सरकार की पोल खोलते हुए उनकी मंशा पर सवाल उठाए थे। अब स्वास्थ्य मामले पर नड्डा और केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने केजरीवाल सरकार को घेरा है। साथ ही कहा है कि दिल्ली में ओछी राजनीति करने के लिए केजरीवाल ने जो किया उसका उन्हें जवाब देना होगा

नड्डा ने एक वीडियो ट्वीट करते हुए कहा कि केजरीवाल सरकार ने हर साल 1000 मोहल्ला क्लीनिक खोलने का वादा किया था। 1000 क्लीनिक खोलना तो दूर, जो क्लीनिक खोले उनमें भी न दवाएँ हैं और न पर्याप्त सुविधाएँ।

भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष ने वीडियो को शेयर करते हुए केजरीवाल पर आरोप लगाया कि ‘आप’ की ओछी राजनीति ने दिल्ली के गरीबों को सालाना 5 लाख रुपए तक मुफ्त इलाज देने वाली मोदी जी की ‘आयुष्मान भारत योजना’ से भी वंचित रखा।

अब इसी ट्वीट और वीडियो को शेयर करते हुए गृहमंत्री अमित शाह ने केजरीवाल को घेरते हुए कहा कि शिक्षा की क्रांति के बाद अब केजरीवाल सरकार के स्वास्थ्य क्रांति की पोल खुल गई है। उन्होंने नड्डा के वीडियो को आधार बनाकर पूछा कि क्या इसमें दिल्ली का गरीब अपना ऑपरेशन करवाएगा?

उन्होंने कहा, “अपनी स्वार्थी राजनीति के लिए दिल्ली के गरीब को मोदी जी की ‘आयुष्मान योजना’ से दूर रख उसके जीवन से खेलने का जो पाप आपने किया है उसका जवाब आप को देना होगा।”

दिल्ली में ‘मुफ्त बिजली’ का सच: चुनाव बाद लगेंगे पैसे… खुद देखिए केजरीवाल सरकार का ऑर्डर

जिससे थी उम्मीदें, वो बेवफा निकला: ‘सरजी’ के गले का फाँस बना शाहीन बाग़, बिगड़ा चुनावी गणित

मोदी की रैली ने बदले समीकरण! दिल्ली में AAP से आगे निकली BJP, 70 में से 40 सीटें मिलने का अनुमान

CAA-विरोधियों द्वारा मार दिए गए नीरज की मृत्यु में शादाब नाम वाला सेकुलर ग्लैमर नहीं है

ऐसे समय में, जब कि शाहीन बाग़ का मास्टर माइंड शरजील इमाम गिरफ्तारी के बाद भारत को एक इस्लामी राज्य बनाने का सपना देखने की बात स्वीकार कर चुका है, लिबरल मीडिया गिरोह अपना एक नया सिपाही मैदान में लेकर आती है। मीडिया में अचानक कहीं से बन्दूक लहराते हुए किसी ‘रामभक्त गुलशन’ (बदला हुआ नाम) की बहस छिड़ जाती है। इंटरनेट लिबरल्स को मानो अपना मुख्य मुद्दा देर-सबेर किसी ने लाकर उनके हाथ में थमा दिया।

आज ही एक युवक ने तब गोली चला दी जब जामिया में मार्च निकाला जा रहा था। गोली चलते ही मार्च में अफरा-तफरी मच गई। हालाँकि गोली चलने से पहले उसका पीछा करते हुए कुछ रिपोर्टर वीडियो में उसका नाम पूछते सुने गए, इसके बाद गोली चलने की एक आवाज भी सुनाई दी।

इस फायरिंग में शादाब नाम के एक युवक को गोली लगी है, जिसे अस्पताल भी भर्ती करवा लिया गया है। लेकिन नीरज को इतना मौका नहीं मिल पाया। वही नीरज प्रजापति, जिन्हें झारखंड में मुस्लिम भीड़ ने मार डाला। नीरज प्रजापति को निर्ममता से मार दिए जाने के बावजूद भी मेनस्ट्रीम मीडिया की बहस बनने तक का अधिकार नहीं है क्योंकि नीरज का नाम शादाब नहीं है और ना ही नीरज शाहीन बाग़ वालों की तरह फैज़ की नज़्म पढता था।

नीरज मूर्तियाँ बनाते थे और CAA के मुद्दे पर सरकार के समर्थन में खड़े थे। CAA समर्थन में निकाली जा रही रैली में नीरज के सर पर पीछे से लोहे की रॉड से हमला किया गया, जिससे उनकी मृत्यु हो गई। नीरज प्रजापति JNU से नहीं थे, वो मूर्तियाँ बनाते थे और उसी से अपने घर का पेट पालते थे। लेकिन मृतक नीरज का परिवार आज भी आतंकवादी अफजल गुरु की यादों में खून रोने वाली मीडिया और लिबरल गिरोह की संवेदनाओं के इन्तजार में है।

लेकिन बौड़म लिबरल नीरज प्रजापति की बात नहीं करता है, उसी तरह से जिस तरह से ठीक एक साल पहले लाल चौक पर तिरंगा फहराने गए चंदन गुप्ता के बारे में बात नहीं की जाती है। लिबरल गिरोह का नया शगल आज बन्दूक लहराते हुए फायरिंग करने वाला ‘रामभक्त गुलशन’ है। रामभक्त गुलशन के नाटकीय तरीके से बन्दूक लहराते ही CAA और NRC के मुद्दे अनाथ हो गए हैं। क्योंकि अनुराग कश्यप, ध्रुव राठी और पूरे गिरोह ने लौटकर मोदी-शाह के मुद्दे को पकड़ लिया है।

कथित रामभक्त गुलशन की सोशल मीडिया की हकीकत संदेहास्पद है। लड़के के हाथ में पिस्टल है और कैमरा लिए पत्रकार उसके पीछे भागते हुए उससे पूछते हैं “नाम क्या है तुम्हारा?”
लड़का फायर कर के जवाब देता है- “रामभक्त गुलशन”
तुरंत एक गोली जाकर ‘शादाब’ को लगती है।

पूरा प्रकरण शांत होते ही एक बार सोचने पर मजबूर होता है कि इससे ज्यादा स्क्रिप्ट तो सलमान खान की फिल्मों में हुआ करती है। अभी इस पूरे घटनाक्रम की पोल खुल जाने तक हम और आप बैठकर लिबरल गिरोह को स्खलित होते देख सकते हैं। हम सभी जानते हैं कि इस गिरोह और मीडिया के लिए गुरमेहर कौर और ताजातरीन इस्लामिक जिहादन लदिदा फरजाना जैसों को रातों रात अपना नायक बना देना कितना आसान है। इसी तरह अभी सिर्फ क्रोनोलॉजी समझने का इन्तजार किया जाना चाहिए।

लेफ्ट लिबरल गिरोह की सबसे अच्छी बात यह है कि इनके को एक्सपोज करते आए हैं और वो अपने बनाने वालों को इतना भी मौका नहीं देते कि वो इस पर दो मिनट आराम से जश्न मना सकें। अनुराग कश्यप, स्वरा भास्कर और शेहला रशीद जैसे हिन्दू आतंकवाद शब्द को स्थापित करने के लिए छटपटाने वाले लोग बिलों से बाहर निकलकर कथित रामभक्त गुलशन पर अपनी कैलोरी खर्च कर रहे हैं। शाहीन बाग़ के साथ सौतेला व्यवहार हो रहा है, पहले यह काम शरजील इमाम ने किया और अब यह बंदूकधारी कर चुका है।

अपडेट: नई सूचनाओं के आने से हमें पता चला है कि जामिया में गोली चलाने का आरोपित नाबालिग है, अतः सम्बद्ध कानूनों के अनुसार उसका नाम बदल दिया गया है।

सुधीर चौधरी और दीपक चौरसिया से डरे हुए क्यों हैं शाहीन बाग के सफेदपोश?

भारतीय टेलीविजन पत्रकारिता के इतिहास में 27 जनवरी की तारीख को याद रखा जाएगा। आने वाले समय में यह तारीख पत्रकारिता के शोधार्थियों के लिए अध्ययन का एक महत्वपूर्ण पड़ाव होगा कि कैसे सामाजिक सरोकार के लिए राष्ट्रीय खबरिया चैनलों के दो बड़े पत्रकार आपसी प्रतिद्वंद्विता भूल एक साथ मैदान में उतरे।

एक तरफ शाहीन बाग के कथित प्रदर्शनकारी कह रहे थे कि हमारी आवाज सुनी नहीं जा रही। वे कह रहे थे कि हमारा प्रोटेस्ट लोकतांत्रिक है। उसी कथित विरोध को कवर करने के लिए दीपक चौरसिया और सुधीर चौधरी जब शाहीन बाग पहुँचे तो उन्हें कवर करने से रोका गया। ऐसा कौन सा लोकतांत्रिक प्रदर्शन होगा जिसमें शामिल होने वालों को रोका जाता हो?

चौधरी ने लिखा, “आज मैं और दीपक चौरसिया शाहीन बाग गए। प्रदर्शनकारियों ने कहा कि हम शाहीन बाग में ‘अलाउड’ नहीं हैं। रोकने के लिए पहली पंक्ति में महिलाओं को खड़ा कर दिया। पुरुष पीछे खड़े हो गए। नारेबाज़ी हुई। राजधानी में ये वो जगह है जहाँ पुलिस भी नहीं जा सकती। लोकतंत्र का मज़ाक़ है ये।”

देश की राजधानी दिल्ली में जब मुट्ठी भर समुदाय विशेष के गुंडा तत्वों ने ऐसा माहौल बना दिया है, सोचिए छोटे शहरों में समुदाय विशेष के कट्टरपंथियों ने जो घेटोज बनाए हैं, वहाँ क्या हाल होता होगा? इसी का परिणाम है कि धीरे-धीरे दिल्ली वालों की सहानुभूति जामिया नगर और शाहीन बाग के प्रति कम होती जा रही है। शांतिपूर्ण प्रदर्शन के पक्ष में समाज हो सकता है, लेकिन गुंडा तत्व जब आंदोलन में घुल-मिल जाए तो ऐसे कथित आंदोलनों को खत्म ही कर देना चाहिए। इस कथित आंदोलन की वजह से लाखों लोगों की जिन्दगी प्रतिदिन ऐसी उलझी हुई है कि बच्चे ना स्कूल जा पा रहे है और ना बच्चे के पापा समय पर दफ्तर पहुँच पा रहे हैं।

24 जनवरी को शाहीन बाग के आयोजकों से बातचीत करके दीपक चौरसिया अपनी टीम के साथ प्रदर्शन स्थल पर कवरेज के लिए पहुँचे। वहा उनके साथ मारपीट हुई। इसमें उन्हें चोट आई। उनका एक कैमरा प्रदर्शनकारियों ने गायब कर दिया। इसकी शिकायत उन्होंने पुलिस के पास की। दीपक शाहीन बाग के लोगों की आवाज पूरे देश में पहुँचाना चाहते थे और वे खुद मॉब लिंचिंग के शिकार हो गए।

दीपक ने हार नहीं मानी। उन्होंने एक प्रयास और किया। इसमें उनका साथ वरिष्ठ पत्रकार सुधीर चौधरी ने दिया। इस बार भी शाहीन बाग के आयोजक खुद को ‘सच्चा मुसलमान’ साबित करने में चूक कर गए। जबकि दीपक चौरसिया का किरदार इस मामले में पूरे देश ने देखा और लेफ्ट लिबरल पत्रकारों को छोड़कर हर तरफ उनकी तारीफ हुई।

मोहम्मद साहब और क्रोधी स्वभाव वाली बुढ़िया की कहानी दुहराता तो हर मुसलमान है, लेकिन मानो इस कहानी से प्रेरणा दीपक ने ली और पूरा शाहीन बाग उस कर्कश बुढ़िया की भूमिका में था जो नमाज पढ़ने के लिए जब मोहम्मद साहब जाते तो वह घर की सारी गंदगी उनके ऊपर उड़ेल देती थी। मोहम्मद साहब कभी बुढ़िया पर नाराज नहीं हुए। दीपक भी बातचीत में शाहीन बाग में नाराज नहीं दिखे। वे बार-बार यही निवेदन करते रहे कि मैं आपसे बात करना चाहता हूँ। इसके बावजूद उनकी बात को अनसुना करने वाला मोहम्मद साहब का अनुयायी तो नहीं हो सकता।

बूढ़ी औरत और मोहम्मद साहब की कहानी कूड़ा फेंकने पर खत्म नहीं होती। एक दिन जब उस राह से मोहम्मद गुजरे तो उन पर कूड़ा आकर नहीं गिरा। वे थोड़े हैरान हुए। फिर आगे बढ़ गए। अगले दिन फिर ऐसा ही हुआ। मोहम्मद साहेब को कुछ अंदेशा हुआ। वे उस बूढ़ी महिला के घर चले गए। दरवाजा खोलकर जब अंदर गए तो देखते हैं कि बूढ़ी महिला दो दिनों की बीमारी में ही बेहद कमजोर हो गई है। इस हालत में देखकर मोहम्मद साहब दुखी हुए। उन्होंने डॉक्टर बुलाया। उस बूढ़ी महिला की सेवा सुश्रुषा तब तक की जब तक वह स्वस्थ नहीं हो गई।

अब जो लोग खुद को मोहम्मद साहब का अनुयायी कहते हैं और उनके किरदार में इतना छिछोरापन नजर आए कि देश के दो पत्रकार आपके दरवाजे पर खड़े हों और आप दरवाजा बंद कर दें। ऐसे में दरवाजा बंद करने वाले किस मुँह से खुद को मुसलमान कहलाने का दावा पेश करेंगे?

इसी तरह का अपने मित्र अहमद सुल्तान से जुड़ा एक वाकया इस्लाम के बड़े जानकार मौलाना वहिदुद्दीन खान साहब सुनाते हैं- एक मोहल्ले में फसाद होने वाला था। मानों दोनों तरफ से इसकी तैयारी पूरी हो चुकी थी। एक जुलूस निकल कर आने वाला था, उससे मुसलमानों का टकराव होता और फिर फसाद होता। अहमद सुल्तान साहब को जब इस पूरे मामले की जानकारी हुई तो वे मोहल्ले की मस्जिद में गए और इमाम साहब से मिले।

सुल्तान साहब ने कहा- जब उनका जुलूस आए तो आप रोक-टोक मत कीजिए। आप सिर्फ इतना कीजिए कि बाजार से दस हार मँगवा लीजिए। जब जुलूस आए उस वक्त ट्रे में हार लेकर आप सड़क पर खड़े हो जाइए और जो भी आगे चलकर आ रहे हों। जुलूस के नेता हों, उन्हें हार पहना दीजिए और उनका स्वागत कीजिए। इमाम ने ऐसा किया और जो साम्प्रदायिक दंगा होना तय था, वह ना सिर्फ टला बल्कि दोनों समुदायों के बीच एक मजबूत रिश्ते की उस दिन नींव पड़ी।

वैसे सच यह भी है कि शाहीन बाग का आंदोलन सिर्फ शाहीन बाग के लोगों से नहीं चल रहा। इसके कुछ स्टेक होल्डर बाहर भी हैं। जिस तरह इस पूरे मामले में एनडीटीवी रूचि ले रहा है, ऐसा लगता है कि वह भी इस कथित आंदोलन में एक स्टेक होल्डर है। संभव है इसलिए एनडीटीवी के एक स्टार एंकर ने चौरसिया के साथ शाहीन बाग में पिछले दिनों जो गलत व्यवहार हुआ उसकी सुध लिए बिना उलटा उनकी पत्रकारिता को लेकर सवाल पूछा। एनडीटीवी के एंकर के बयान की आईसा-एसएफआई की वैचारिक पत्रकारिता स्कूल से निकले पत्रकारों को छोड़कर हर तरफ आलोचना हुई और यह सवाल भी सामने आया कि एनडीटीवी का इतना महत्वपूर्ण चेहरा जब कोई बात लिख रहा है तो उसे निजी राय नहीं माना जा सकता।

यहाँ गौरतलब है कि एनडीटीवी के पत्रकारों को शाहीन बाग में आसानी से जाने का रास्ता मिल जाता है। जामिया में हुई हिंसा और आगजनी के दौरान सहायता के लिए जिन लोगों के मोबाइल नंबर छात्रों के बीच वाट्सएप पर शेयर किए जा रहे थे, उसमें भी एक एनडीटीवी का पत्रकार था और दूसरी पत्रकार का ताल्लुक वायर नाम की एक वेबसाइट से था। यह भी एक संयोग है कि देशद्रोह का आरोपी शरजील इमाम भी वायर नाम की वेबसाइट से जुड़ा रहा है।

एनडीटीवी और वायर की पूरे मामले में जो भूमिका दिखाई पड़ी, उसे देखकर उनपर संदेह होना स्वाभाविक है। एनडीटीवी और वायर दूसरे चैनलों के साथ वहाँ हो रहे दुर्व्यवहार के सवाल को क्यों नहीं उठाते? आज एनडीटीवी-वायर, शाहीन बाग में न्यूज नेशन और जी न्यूज को रोके जाने पर उत्सव मना रहे हैं। वह नहीं जानते कि अगला नंबर उनका भी हो सकता है और फिर उनके पत्रकार किस मुँह से लोकतंत्र की दुहाई देंगे?

इस पूरे प्रकरण में एनडीटीवी और वायर ने अपने लिए यह मुसीबत जरूर मोल ले ली कि उनके पत्रकारों पर भी लोग इस तरह का दबाव बना सकते हैं। उनसे भी लोग सवाल पूछ सकते हैं- पहले बताओ कि तुमने पत्रकारिता के लिए क्या किया है? या फिर उनका माइक देखते ही कोई कह सकता है कि जो रिपोर्ट करना है सामने करो। मेरे मन का करो। अब सोचिए जब एनडीटीवी के पत्रकार के साथ यह हो रहा होगा तो वे किस मुँह से इसकी शिकायत कर पाएँगे। जबकि शाहीन बाग की अराजक भीड़ के पक्ष में वे लगातार रिपोर्ट कर रहे हैं।

इस संबंध में पत्रकारिता के पूर्व छात्र रहे चंदन श्रीवास्तव लिखते हैं, “एनडीटीवी के एक पत्रकार शाहीन बाग में दीपक चौरसिया पर हुए हमले की निन्दा करते हुए, उसे जस्टिफाई कर रहे हैं। वह पूछते हैं कि दीपक चौरसिया का पत्रकारिता में क्या योगदान है? इसमें कोई शक नहीं कि दीपक चौरसिया अपनी महात्वाकांक्षा की वजह से वह दीपक चौरसिया नहीं रह गए जो वह कुछ सालों पहले तक होते थे। लेकिन उनके आज की वजह से उनके कल की उपेक्षा करना तो उनके साथ अन्याय होगा।

एनडीटीवी के पत्रकार रवीश कुमार जिनके पूरे पत्रकारिता के करियर में एक भी खोजी रिपोर्ट दर्ज नहीं है, वह दीपक चौरसिया के लिए पूछते हैं कि उनका पत्रकारिता में, इस देश के जनतंत्र में क्या योगदान है। जिस समय रवीश कुमार ‘रवीश की रिपोर्ट’ नाम से औसत डॉक्यूमेंट्री बनाया करते थे, उस समय शाहीन बाग में पिटने वाला यह पत्रकार इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की पत्रकारिता का सिरमौर हुआ करता था और कई वर्षों तक रहा भी।

पत्रकारिता की पढाई करने वाले हर छात्र इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में जाने का सपना पालते थे, तब वे दीपक चौरसिया बनने का ही ख्वाब देखते थे, रवीश बनने का नहीं। 2004-06 में हिन्दी पत्रकारिता एवं जनसंचार की पढ़ाई के दौरान हमने भी देखा कि गेस्ट लेक्चर के लिए आने वाले सक्रिय बड़े पत्रकार हमें दीपक चौरसिया के पत्रकारिता की बारीकियाँ सिखाया करते थे। मुझे याद है कि 26/11 के वक्त मुम्बई से लाइव करते हुए, दीपक चौरसिया बताते कि अभी-अभी मुझे दिल्ली में हुए अमुक डेवलपमेंट का पता चला है। हम लोग आश्चर्यचकित होते कि ये शख्स एक-दो मिनट के ब्रेक में कैसे दिल्ली की इतनी महत्वपूर्ण सूचनाएँ मुम्बई में रहकर संकलित कर रहा है। ये उनके सूत्रों के मजबूत तंत्र का कमाल था।

पत्रकारिता में सूत्रों का महत्व होता है न कि एजेन्डा सेट करने की आपकी काबिलियत का। आखिर रवीश कुमार पत्रकारिता कहते किसे हैं? ढकी, लुकी-छिपी जानकारियों को निकाल कर जनता के सामने रख देने को या वह जो वे करते हैं, एजेन्डा पत्रकारिता। पत्रकार अपने सीवी में अपने खोजी रिपोर्ट्स को प्रमुखता से स्थान देता है। क्या रवीश की सीवी में ऐसी एक भी रिपोर्ट है, जिसे खोजी कहा जा सके? इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट्स का हिन्दी अनुवाद करके एक घंटे लेक्चर छाँटना, कुछ भी हो पत्रकारिता तो नहीं है ना!

एनडीटीवी और वायर की श्रृंखला में एक नाम कॉमरेड भाषा सिंह का भी जुड़ता है। शाहीन बाग में दीपक चौरसिया के साथ जब हाथापाई हो रही थी, उस वक्त वहाँ खड़ी तमाशबीनों में शामिल थी। यह बात उन्होंने अपने एक वीडियो में स्वीकार किया है। सिंह वीडियो में कहती हैं, “आखिर दीपक क्या दिखाना चाह रहे हैं? जो शाहीन बाग से रिकॉर्ड करेंगे वह या ये कुछ और दिखाएँगे? उसी वक्त मंच से दरख्वास्त होती है कि दीपक चौरसिया शाहीन बाग से लाइव शो करें। इसके पीछे आयोजकों की चिन्ता यह है कि उनका टीवी चैनल शाहीन बाग को जेहादियों के अड्डे के तौर पर पेश कर रहा है, इससे उन्हें गहरी नाराजगी थी।”

10 साल पुरानी बात है। जिसे मुख्यधारा का मीडिया कहते हैं, वहाँ आरएसएस के कामों की बहुत कम सकारात्मक रिपोर्टिंग मिलेगी। लेकिन क्या आरएसएस ने किसी पत्रकार को रिपोर्टिंग से रोका। देशभर के मीडिया संस्थानों का बड़ा हिस्सा आइसा और एसएफआई से निकले कैडर और वामपंथी रूझान वाले पत्रकारों के हिस्से था। यदि आरएसएस यही व्यवहार लेफ्ट के पत्रकारों के साथ करता, भाषा सिंह को लिखने से पहले बंधक बना लेता और कहता कि भाषा तुम ‘आउटलुक’ में जो लिखने वाली हो यहाँ लिखकर ‘आउटलुक’ भेजो क्योंकि तुम यहाँ कुछ और कहती हो और छापती कुछ और हो। क्या भाषा को यह स्वीकार होता?

वामपंथी जहर ने इनके दिमाग के एक हिस्से को मानो पक्षाघात का शिकार बना दिया है। यह बोलती हुए समझ नहीं पा रहीं कि इनकी यह सोच पत्रकारिता के लिए कितनी बड़ी खाई खोद रहा है। फिर रवीश, बरखा और राजदीप को अब कोई भी घेर के कह सकता है कि भैया तुम चैनल पर जाकर बकवास करते हो, अब जो रिपोर्ट करना है, हमारे सामने करो। फिर कहने के अधिकार का क्या होगा? फिर जिस आजादी की बात शाहीन बाग में हो रही है, वह झूठी और बेमानी ही साबित होगी, क्योंकि जब तक आप दूसरों की आजादी का सम्मान नहीं कर पाएँगे तब तक आपकी आजादी की डिमांड तो धोखा ही है।

हम सबने ‘न्यूज नेशन’ और ‘जी न्यूज’ की संयुक्त प्रस्तुति में देखा कि कैसे दोनों पत्रकारों ने मिलकर कथित आंदोलन का हिस्सा बने लोगों से संवाद स्थापित करने की कोशिश की। वास्तव में वहाँ मौजूद भीड़ को यह पता तक नहीं है कि वे एक झूठ के सहारे पर वहाँ खड़े किए गए हैं। दीपक चौरसिया और सुधीर चौधरी जैसे पत्रकारों के वहाँ मौजूद रहने से आयोजकों को डर रहा होगा कि उनका खेल खुल ना जाए। उनका झूठ बेपर्दा ना हो जाए।

शाहीन बाग में मीडिया रिपोर्टिग की जगह झूठ का कारोबार ही चल रहा है। साँच को आँच नहीं होता। लेकिन जिस तरह न्यूज नेशन और जी न्यूज के कैमरों से शाहीन बाग के कथित आंदोलनकर्मी भागते हुए नजर आए, उससे यही पता चल रहा था कि कोई सच है जिस पर वे पर्दा डालना चाहते हैं।

यूँ तो शाहीन बाग के मंच से एक नहीं दर्जनों झूठ बोले जा रहे थे। हो सकता है कि दीपक और सुधीर की मौजूदगी में वह झूठ बोलना मंच पर चढ़े लोगों के लिए सहज नहीं रह जाता। यह भेद देश के सामने जाहिर हो जाता। वहाँ गाँधी जी की तस्वीर लगाकर बोली जाने वाली हिंसक बातों से पर्दा हट जाता। उनके झूठ पर पर्दा पड़ा रहे इसलिए जरूरी था कि दीपक चौरसिया और सुधीर चौधरी उनके कथित आंदोलन से दूर रहे।

शाहीन बाग के मंच से एक झूठ डिटेंशन सेन्टर को लेकर भी लगातार बोला जा रहा है। यह भय फैलाया जा रहा है कि असम में जैसे डिटेंशन सेन्टर बनाया गया है, वैसा सेन्टर पूरे देश में बनाकर मुसलमानों को उसमें कैद किया जाएगा। यह उतना ही बड़ा झूठ है, जैसे इस्लाम में कोई मोहम्मद साहब को खुदा कह दे। मोहम्मद साहब मुसलमानों के पैगम्बर तो हैं, लेकिन वे खुदा नहीं।

वास्तव में वर्ष 2011 का साल एनआरसी के खिलाफ सड़क पर उतरे लोगों के लिए महत्वपूर्ण है। लेफ्ट यूनिटी की मीडिया किस तरह झूठ फैलाती है इस बात से जुड़ा है यह संदर्भ। 2011 वह साल था जब देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह थे और असम के मुख्यमंत्री तरूण गोगोई। मतलब केन्द्र और असम दोनों जगह कॉन्ग्रेसी डबल इंजन सरकार थी। भाजपा सरकार एनआरसी 24 मई 2016 को सर्बानंद सोनोवाल के मुख्यमंत्री बनने के बाद लाई। इसके पाँच साल पहले ही असम में तीन डिटेंशन सेन्टर कॉन्ग्रेस की सरकार बनवा चुकी थी। इससे यह साबित होता है कि डिटेंशन सेन्टर में घुसपैठिए रखे जरूर गए हैं, लेकिन उन सभी घुसपैठियों की पहचान कॉन्ग्रेस सरकार में हुई थी। जबकि एनआरसी में जिन लोगों का नाम नहीं आया है, वे लोग वहाँ नहीं डाले गए। प्रधानमंत्री मोदी ने जब डिटेंशन सेन्टर ना बनने की बात की तो उसका सीधा सा मतलब था कि उनकी सरकार ने ऐसा कोई सेन्टर नहीं बनवाया। या फिर यह मतलब था कि एनआरसी में जिन 19 लाख लोगों का नाम नहीं आया वे लोग वहाँ नहीं डाले गए हैं। अब डिटेंशन सेन्टर पर ‘चंदा मीडिया’ ने क्या रिपोर्ट किया है, वह पढ़िए और चंदे पर केन्द्रित इनकी निष्पक्षता को समझिए।

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9 महीने में 12 पत्रकारों पर जानलेवा हमला, मारपीट, गाली-गलौज: सब के सब सेक्युलर और ‘शांतिपूर्ण’ जगहों पर!

(लेखक आशीष कुमार ‘अंशु’ घूमंतु पत्रकार के तौर पर जाने जाते हैं। ग्रामीण पत्रकारिता के लिए नारद सम्मान से सम्मानित हो चुके हैं)