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चोट हलाला, पॉलीगेमी, तलाक पर की जाती है, दर्द इन्हें होता है: मिलिए ‘The Wire’ की आरफा खानम जी से

प्रोपेगंडा पोर्टल ‘द वायर’ की आरफा खानम शेरवानी के ताज़ा आर्टिकल्स और न्यूज़ आइटम्स को आप देखेंगे तो पाएँगे कि पिछले दो महीने से ख़ुद को पत्रकार बताने वाली इस महिला का एक ही उद्देश्य है और वो है शाहीन बाग़ के उपद्रवियों का महिमामंडन करना। वीडियो और आर्टिकल्स के जरिए आरफा ने शाहीन बाग़ के एक-एक दंगाई को देवता तुल्य साबित करने के लिए जो परिश्रम किया है, उससे साफ़ दिखता है कि सीएए विरोध के नाम पर कुछ और हो रहा है। अभी ख़बर आई है कि 120 करोड़ रुपए इस्लामिक कट्टरवादियों ने इस विरोध प्रदर्शन में लगाए। मोदी के विरोध के लिए अमेरिकी उद्योगपति जॉर्ज सोरोस भी 100 करोड़ डॉलर दे रहे हैं।

वित्तीय संसाधन को भाजपा विरोधियों तक पहुँचा कर उन्हें देश विरोध के लिए उकसाना अब एक नई रणनीति दिख रही है, जिसकी पल-पल पोल भी खुल रही है। जिस शाहीन बाग़ का महिमामंडन करके आरफा ने पिछले 2 महीने गुजारे हैं, उसी शाहीन बाग़ का मुख्य साज़िशकर्ता शरजील इमाम भारत के टुकड़े-टुकड़े कर के पूरे उत्तर-भारत को अलग-थलग करने की मंशा रखता है। ये तो एक बानगी भर है। आरफा और शरजील जैसे हज़ारों लोग जुड़े हैं इस दंगे से, जिनकी मंशा इसी तरह खतरनाक है।

आरफा खानम शेरवानी उन लोगों में से एक है, जो आज के दौर की तुलना जर्मनी की नाज़ी सरकार से करते हैं। और हाँ, मोदी और हिटलर के बीच समानताएँ ढूँढ़ते-ढूँढ़ते तो ये उस मामले में पीएचडी कर चुके हैं। आरफा जैसों की नज़रों में 2014 का चुनाव विश्व युद्ध-1 था और 2019 के चुनाव विश्व युद्ध-2। नाजी से तुलना करने वाले ये भी ख़ूब समझते हैं कि वो रोज 5 बार मोदी को गाली देकर भी चैन से घर में बैठ सकते हैं क्योंकि लोकतंत्र पहले से ज्यादा मजबूत हुआ है, कमजोर नहीं। अनुराग कश्यप सरीखे तो गालियाँ बक कर भी आराम कर रहे होते हैं।फिर भी, आरफा ने मोदी और हिटलर की तुलना करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है।

आरफा खानम शेरवानी हाल ही में इसीलिए चर्चा में आई हैं, क्योंकि उन्होंने दंगाइयों को सलाह दी है कि वो लक्ष्य सफल होने तक अपनी मुस्लिम पहचान को सामने न लाएँ। यानी, अभी आम आदमी बन कर प्रदर्शन करें और समय आते ही अपना असली कट्टरपंथी चेहरा ले कर हाजिर हो जाएँ। मुस्लिमों को उनकी सलाह है कि घर पर खूब मजहबी व कट्टरवादी नारे पढ़ कर आएँ क्योंकि उनसे इन्हें ऊर्जा मिलती है। लेकिन, बाहर में मुस्लिम ऐसा दिखाएँ जैसे कि वो आम आदमी हैं ताकि अन्य लोग भी उनके प्रदर्शन में जुड़ सकें। जाहिर है, समय आते ही हर दंगाई को शरजील इमाम बन कर अपना असली चेहरा सामने लाने को कहा जाएगा।

जब मुस्लिमों की कुरीतियों के बारे में बात की जाती है तो आरफा खानम शेरवानी को मिर्ची लग जाती है और वो एक पल भी नहीं लगाती अपने मजहब और समाज की कुरीतियों को जायज ठहराने में। जब जायरा वसीम ने अल्लाह और इस्लाम का रोना रोते हुए एक्टिंग को अलविदा कहा था, तब कॉन्ग्रेस नेता व वरिष्ठ वकील मनु सिंघवी ने पूछा था कि हलाला जायज और एक्टिंग हराम, क्या ऐसे तरक्की करेगा हिंदुस्तान? जायरा वसीम को क्या जबरदस्ती अभिनय में लाया गया था? वो आई तब उन्हें ‘अल्लाह और इस्लाम’ का ख्याल नहीं रहा। सिंघवी के इस जायज सवाल पर भड़की आरफा ने पूछा कि क्या राहुल गाँधी अपनी पार्टी के एक वरिष्ठ नेता के इस बयान का समर्थन करते हैं?

इनकी हिटलरवादी सोच देखिए। दूसरों को हिटलर कहने वाली आरफा का मानना है कि किसी नेता को एक शब्द भी बोलने के लिए अपनी पार्टी के मुखिया से अनुमति लेना आवश्यक है वरना उसे मुँह खोलने का अधिकार नहीं। क्या किसी पार्टी का नेता तभी बोलेगा जब उसकी पार्टी का अध्यक्ष उसे अनुमति देगा? असली तानाशाही तो यही है, जिसे आरफा जैसे लोग बढ़ावा देते हैं। सिंघवी के जवाब से आरफा को और मिर्ची लगी। वरिष्ठ कॉन्ग्रेस नेता ने लताड़ते हुए कहा कि जब तक आरफा जैसे लोग मुस्लिम समाज में प्रभावी रहेंगे, तब तक मुस्लिम पिछड़े के पिछड़े ही रहेंगे। बात सही है। आरफा और शरजील जैसों की बातों पर ‘इंशाअल्लाह’ कहने वाला समाज आगे नहीं बढ़ सकता।

और हाँ, लिबरल गैंग का सबसे पहला कर्त्तव्य यही होता है कि किसी मंदिर, संत, देवता और हिंदुत्व को बदनाम करना। आरफा खानम शेरवानी ने इस काम के लिए गोरखनाथ मंदिर को चुना। क्योंकि इस क़दम से देश के सबसे ज्यादा जनसंख्या वाले राज्य के मुख्यमंत्री को बदनाम किया जा सकता है और साथ ही भाजपा, हिंदुत्व और मंदिर को भी बदनाम किया जा सकता है। आरफा ने झूठ फैलाते हुए लिखा कि फलाँ नवाब ने गोरखनाथ मंदिर के लिए ज़मीन दी थी। आरफा भूल गईं कि गोरखनाथ मंदिर का 800 वर्षों का इतिहास रहा है, जब उनके फलाँ नवाब के दादा भी पैदा नहीं हुए थे।

आरफा जैसों को पहचानने का एक और तरीका ये है कि वो इस्लामी मजहबी नारों का महिमामंडन करते रहते हैं और हिंदुत्व के प्रतीकों का जी भर अपमान करते हैं। जैसे, आरफा ने ‘ला इलाहा इल्लल्लाह’ को ऊर्जा देने वाला स्लोगन बताया था और इसी आरफा ने हनुमान जी के पोस्टर को ‘डर फैलाने वाला’ करार दिया था। सीएए विरोधी प्रदर्शन में ‘ला इलाहा इल्ललाह’ का इस्तेमाल क्यों हुआ, ये छिपा नहीं है। ख़ुद जामिया की हिजाबी छात्राएँ आयशा और लदीदा ने कहा था कि अब समय आ गया है जब सेक्युलर नारों से तौबा किया जाए और इस्लामी नारे लगाए जाएँ। उनकी नज़र में जिन्हें ये नारे पसंद नहीं, वो मुस्लिमों के साथ नहीं हैं।

यही तो उस शरजील इमाम की भी सोच है, जिसके पीछे असम की पुलिस, ईटानगर का क्राइम ब्रांच और केंद्रीय जाँच एजेंसियाँ लगी हुई हैं। वो भी तो कहता है कि अब मुस्लिमों के साथ कौन है और कौन नहीं, ये मुस्लिम अपने शर्तों पर तय करेंगे। अर्थात, मुस्लिम बोलेंगे कि तुम फलाँ नारे लगाओ और फलाँ काम करो, तभी हमारे साथ माने जाओगे। वहीं सदियों से चले आ रहे ‘जय श्री राम’ से उन्हें दिक्कत है। आरफा और शरजील जैसों के बयानों में आयशा और लदीदा जैसों के जहर का छौंक लग जाता है तो स्पष्ट दिख जाता है कि न तो ये ‘आंदोलन’ है और न ही सीएए या एनआरसी से इनका कोई लेना-देना है। इन्हें बस इस्लामी मजहबी कट्टरता स्थापित करनी है, अराजकता फैलानी है।

जब कोई मुस्लिम नेता कुछ गलतबयानी करता है, तब उनका बचाव करने के लिए सबसे पहले आरफा जैसी कथित ‘Muslim Influencer’ ही आगे आती है। एक महिला होकर आरफा ने आज़म ख़ान की महिलाविरोधी टिप्पणी का बचाव किया, जो ये दिखाता है कि ये वामपंथी अथवा इस्लामिक कट्टरवादी महिलाधिकार का सिर्फ़ ढोंग रचाते हैं। इन्हें महिलाओं की कोई चिंता नहीं। आज़म ने जया प्रदा के लिए ‘खाकी चड्डी’ जैसी घृणित टिप्पणी की और आरफा ने इसका बचाव किया। बचाव में आरफा ने कहा कि आज़म ने अमर सिंह को भी तो बोला। यही लोग जब कैंडल लेकर महिलाओं के हित की बात करते हुए सड़क पर उतरते हैं, तो उनके इस कृत्य को ढोंग नहीं तो और क्या कहा जाए?

जेएनयू और जामिया में छात्रों के हितों की बात करने का दावा करने वाली इसी आरफा ने बीएचयू के छात्रों को बदनाम करने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी थी। फरहान अख्तर जैसों का साथ देते हुए उन छात्रों को बदनाम किया गया था। इससे पता चलता है कि ये वामपंथी और कट्टरवादी इस्लामी एक्टिविस्ट्स छात्रों और युवाओं के भी पक्षधर नहीं हैं, अपने सहूलियत के हिसाब से सिर्फ़ उनका इस्तेमाल करते हैं। अब जब उनका दिखावटी चोला पूरी तरह उतर चुका है, वो तिरंगा झंडा और संविधान का सहारा लेकर ख़ुद को पाक-साफ़ साबित करने को जुटे हैं। वही संविधान, जिसके बारे में शरजील कहता है कि उससे मुस्लिमों को कोई उम्मीद नहीं है।

ममता के बंगाल में सरस्वती पूजा को लेकर हिन्दू छात्रों को पीटा गया, शिक्षक ने टॉयलेट में छिपकर बचाई जान

पश्चिम बंगाल के बसीरहाट उपमंडल के चौहट्टा गाँव में बुधवार (22 जनवरी) को छात्रों के एक समूह ने पिछले 8 सालों से आदर्श विद्यापीठ के स्कूल अधिकारियों द्वारा बंद की गई सरस्वती पूजा को फिर से शुरू करने की माँग की। दरअसल, इससे पहले भी कई बार इस तरह का अनुरोध किया जा चुका है, लेकिन स्कूूल प्रशासन ने छात्रों की इस माँग पर कभी कोई गंभीरता नहीं दिखाई। इस सन्दर्भ में स्कूल के छात्रों ने अब वर्तमान हेडमास्टर, हिमांशु शेखर मंडल को एक प्रस्ताव पेश किया। इसमें उन्होंने सरस्वती पूजा की व्यवस्था करने को कहा था। 

ख़बर के अनुसार, छात्रों ने स्कूल के गेट पर भी ताला लगा दिया और बोयलघट्टा-कोलूपुकुर रोड पर जाम लगा दिया। इस दौरान, कम से कम पाँच छात्रों के साथ कथित तौर पर मारपीट की गई। चश्मदीदों के मुताबिक़, चोट लगने की वजह से दो छात्रों की नाक से ख़ून निकल रहा था और उन्हें प्राथमिक इलाज दिया गया। वहीं, इंग्लिश के एक अध्यापक गणेश सरदार ने आरोप लगाया कि भीड़ उन्हें ढूँढ रही थी, उन्हें टॉयलेट के अंदर छिपा दिया गया था। उन्होंने बताया कि अगर ज़िला प्रशासन समय पर आकर कार्रवाई न करता तो स्थिति और बिगड़ सकती थी। हारो पुलिस स्टेशन के प्रभारी अधिकारी ने उन्हें बचाया।  

अध्यापक ने बताया कि उन्हें भीड़ ने निशाना बना रखा था इस की एक वजह यह भी है कि वो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संबद्ध एक शिक्षक निकाय के ज़िला महासचिव हैं। उन्होंने बताया कि वो नबी दिवस और सरस्वती पूजा दोनों की सहमति दे चुके हैं। लेकिन, इस मामले में सत्तारूढ़ तृणमूल कॉन्ग्रेस की राज्य मंत्री और जिला अध्यक्ष ज्योति प्रिया मल्लिक को कुछ नहीं मालूम। यहाँ तक कि ममता बनर्जी भी इस मुद्दे पर मौन हैं।

उन्होंने कहा, “इस पर कुछ बोलने से पहले मुझे इसके बारे में जानकारी इकट्ठा करनी होगी। कथित तौर पर स्थानीय लोगों के दबाव में पूजा को 2009 में रोक दिया गया। स्कूल के 1700 छात्रों में से लगभग 75% छात्र मुस्लिम हैं, जबकि अधिकांश शिक्षक हिन्दू हैं।”

जानकारी के अनुसार, स्कूल के पूर्व हेडमास्टर, अशोक चंद्र सरकार ने पिछले कई वर्षों से सरस्वति पूजा पर रोक लगा रखी थी। उनके बाद, श्री मंडल, जिन्होंने छ: महीने पहले ही स्कूल ज्वॉइन किया है उन्होंने इस सबके लिए स्कूल प्रबंधन समिति को दोषी ठहराया है। स्कूल में छात्रों के विरोध के कारण, जिसमें लगभग 1700 छात्र हैं, वार्षिक खेल बैठक को भी रद्द करना पड़ा।

बता दें कि स्कूल में अंतिम बार सरस्वती पूजा का आयोजन 2012 में किया गया था। इसके बाद हुई झड़पों के बाद पूजा बंद कर दी गई थी। हर साल छात्र शिक्षा की देवी को समर्पित सरस्वति पूजा के आयोजन की माँग करते हैं, लेकिन हर साल स्कूल प्रबंधन समिति द्वारा इस अनुरोध को अस्वीकार कर दिया जाता है। हेडमास्टर हिमांशु शेखर मंडल ने इस बात की पुष्टि की है कि उन्हें स्कूल में सरस्वति पूजा के आयोजन करने के लिए इच्छुक छात्रों का अनुरोध प्राप्त हुआ है। इस पर कार्रवाई करते हुए उन्होंने इस प्रस्ताव को प्रबंधन समिति को भेज दिया है, लेकि इस बारे में अभी तक उन्हें कोई जवाब नहीं मिला है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, सरस्वती पूजा को लेकर इलाक़े में रहने वाले समुदाय विशेष के लोगों ने आपत्ति जताई थी, जिसके बाद से स्कूलों में सरस्वती पूजा बंद कर दी गई। समुदाय विशेष ने माँग की थी कि स्कूलों में अगर सरस्वती पूजा का आयोजन किया जाएगा, तो स्कूल प्रशासन को नबी दिवस (पैगंबर दिवस) भी आयोजित करना होगा। इसके बाद, स्कूल प्रबंधन समिति ने फ़ैसला किया था कि स्कूल में न तो सरस्वति पूजा का आयोजन होगा और न ही नबी दिवस आयोजित किया जाएगा।

2017 में मुस्लिम ग्रामीणों ने एक स्थानीय स्कूल को सरस्वती पूजा मनाने से रोक दिया था। उन्होंने कथित तौर पर स्कूल अधिकारियों को नबी दिवस (पैगंबर दिवस) मनाने के लिए कहा था। मुस्लिम समुदाय द्वारा की गई माँगों को अस्वीकार करने के बाद स्कूल को 26 दिनों के लिए बंद करना पड़ा था।

ग़ौरतलब है कि नुसरत जहाँ बशीरहाट निर्वाचन क्षेत्र से मौजूदा संसद सदस्य हैं, जहाँ की मुस्लिम आबादी लगभग 54% है। ऐसा पहली बार नहीं है जब बशीरहाट से कोई विवादास्पद घटना सामने आई हो। यह क्षेत्र हमेशा से साम्प्रदायिक हिंसा का केंद्र रहा है। 3 साल पहले, एक किशोरी के फेसबुक पोस्ट पर कट्टरपंथी मुस्लिम संगठन ने उसके साथ हिंसात्मक गतिविधि को अंजाम दिया था।

#ScientistSisodia ने ‘द लल्लनटॉप’ को दिया फिजिक्स का ज्ञान, कहा- पानी तो गंदा ही आएगा

दिल्ली विधानसभा चुनावों में एक बार फिर ऐतिहासिक जीत हासिल करने के लिए आम आदमी पार्टी ने अपना दम-खम झोंक दिया है। रिपोर्ट कार्ड जारी करके दिल्लीवासियों को काम गिनवाए जा रहे हैं। बिजली-पानी-शिक्षा के मुद्दों के साथ विपक्ष को एक बार फिर भ्रष्टाचारी बताया जा रहा है। हालाँकि, ये बात और है कि इस बीच प्रदेश की जनता उन्हें उनके अधूरे वादों के लिए लगातार कोस रही है और सोशल मीडिया पर उनके नेताओं द्वारा किए कामों पर उनका मजाक भी उड़ा रही है।

इसी क्रम में प्रदेश के उप-मुख्यमंत्री एवं शिक्षा मंत्री मनीष सिसोदिया का एक वीडियो भी सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। वैसे तो ये वीडियो द लल्लनटॉप को दिए एक साक्षात्कार की क्लिप है, जिसे लोकसभा चुनावों के मद्देनजर रिकॉर्ड किया गया था। लेकिन किसे पता था कि इस वीडियो में 18 मिनट से लेकर 19 मिनट के स्लॉट में हुई बातचीत पर उनके उपमुख्यमंत्री की फजीहत तब होगी, जब चुनाव विधानसभा चुनाव की तारीख नजदीक होंगे।

इस साक्षात्कार में द लल्लनटॉप के पत्रकार नीरज भट्ट मनीष सिसोदिया से मंडावली क्षेत्र में लोगों के घर के नल से आ रहे गंदे पानी पर सवाल करते दिख रहे हैं। वे पूछते हैं कि जब वो मंडावली गाँव में रिपोर्ट करने गए थे तो वहाँ पानी की समस्या से परेशान लोग अचानक से बाहर आए और नलों से निकलते गंदे पानी को दिखाने लगे। नीरज ने अपनी बात को सत्यापित करने के लिए ये भी कहा कि उनके पास इसकी बाकायदा वीडियो है।

अब सवाल सुनने के बाद मनीष सिसोदिया ने समस्या के समाधान की बजाय अपने जवाब में बताना शुरू किया कि आखिर ऐसा क्यों होता है। आसान भाषा में कहें तो उन्होंने नलों में आ रहे कीचड़ को जस्टिफाई करने की कोशिश की… सिसोदिया ने बताया, जिस वक्त पानी आता है उस वक्त आप अपनी मोटर चलाएँगे, तो आपको पानी साफ मिलेगा। लेकिन जिस वक्त पानी नहीं आता है, उस वक्त आप मोटर चलाएँगे, तो वो आस-पास की गंदगी को खींचेगा और वो गंदगी पानी के साथ बाहर आएगी।

सिसोदिया के अनुसार पाइपलाइन में कचरा और धूल होता ही होता है। इसलिए अगर आप मोटर पानी सप्लाई वाले समय के बाद चलाएँगे, तो उसमें कचड़ा खिंच कर आएगा। लेकिन अगर सप्लाई के समय मोटर चलाएँगे तो उसका फायदा आपको आगे के लिए भी मिलेगा। अगर आप ऐसा नहीं करते और एक बार मोटर चलाकर डस्ट पाइप में खींच लेते हैं, तो अगली बार आपको 10 मिनट लगेंगे ही लगेंगे कीचड़ साफ करने में। सिसोदिया का कहना है कि वैज्ञानिक तौर पर और फिजिक्स के मुताबिक ये बिलकुल भी संभव नहीं है कि कचड़ा न आए।

पूरे साक्षात्कार के दौरान सिसोदिया को पत्रकार अपनी बात समझाने की पूरी कोशिश कर रहे हैं। लेकिन शायद सिसोदिया अपनी पढ़ी हुई फिजिक्स से उन्हें समझाने में इतने व्यस्त हैं कि वो सुनना ही नहीं चाहते। वायरल वीडियो में देख सकते हैं कि नीरज अपनी बात को कहने की पूरी कोशिश करते हैं लेकिन सिसोदिया अपनी फिजिक्स उन पर इस प्रकार मढ़ते हैं कि आगे इस विषय पर नीरज सुनने के अलावा कुछ नहीं कह पाते।

गौरतलब है कि अब इस वीडियो की क्लिप को लेकर सोशल मीडिया पर मनीष सिसोदिया को घेरा जा रहा है। उनका मजाक उड़ाया जा रहा है। उनके फिजिक्स ज्ञान पर सवाल उठ रहे है। भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा ने इस वीडियो को शेयर किया है और लिखा है, “ओह हो भारी गलती हो गई… अब ये सब मिल के मोदी जी को कोसेंगे कि मोदी जी की सरकार ने ऐसे होनहार व्यक्ति को पद्मश्री तक नहीं दिया।”

कोलकाता के मेयर फिरहाद हकीम ने भारत के नक्शे से हटाया POK और अक्साई चीन का हिस्सा, बवाल

कोलकाता के मेयर फिरहाद हकीम ने गणतंत्र दिवस (26 जनवरी 2020) के अवसर पर देश को संदेश देते हुए भारत का नक्शा पोस्ट किया। फरहाद हकीम ने इस नक्शे में से पाक अधिकृत कश्मीर (POK) और अक्साई चीन का हिस्सा हटा दिया था। उन्होंने यह गलत नक्शा Kolkata Municiple Corporation नाम के ऑफिसियल फेसबुक पेज पर पोस्ट किया था। इस पोस्ट के बाद उनकी काफी फजीहत हुई और शर्मनाक स्थिति का सामना करना पड़ा। लोगों ने इसे भारत का अपमान बताया। 

फिरहाद हकीम द्वारा फेसबुक पर शेयर किए गए पोस्ट का स्क्रीनशॉट

फिरहाद के इस पोस्ट पर बीजेपी बंगाल ने कड़ा रूख अपनाते हुए ट्वीट किया। बीजेपी बंगाल के आधिकारिक ट्विटर हैंडल से टिवीट करते हुए पूछा गया कि क्यों फिरहाद हकीम भारत के ऐसे नक्शे को बढ़ावा दे रहे हैं, जिसमें POJK और अक्साई चीन नहीं है। क्या ममता बनर्जी पाकिस्तान के रूख का समर्थन करती हैं? ट्वीट में आगे लिखा गया है, “हमारे गृह मंत्री अमित शाह ने संसद में कहा, जान दे देंगे हम कश्मीर के लिए।” 

पश्चिम बंगाल के बैरकपुर से भाजपा सांसद अर्जन सिंह ने भी इस पर कड़ी आपत्ति जताते हुए शर्मनाक कदम बताया। उन्होंने ट्वीट में लिखा, “फिरहाद हकीम और ममता बनर्जी, आपको हमारे नक्शे में से POK और अक्साई चीन को हटाने के लिए शर्म आनी चाहिए।” 

इसके साथ ही भाजपा महासचिव सायंतन बसु ने मामले की जाँच करने के साथ ही हकीम के इस्तीफे की माँग की है। उन्होंने कहा, “पश्चिम बंगाल सरकार हमेशा पाकिस्तान के प्रधानमंत्री के रुख का समर्थन करती है, न कि उसके भारतीय प्रधानमंत्री का। यह ताजा उदाहरण है। हम KMC मेयर के इस्तीफे और एक निष्पक्ष एजेंसी द्वारा जाँच की माँग करते हैं। साथ ही मुख्यमंत्री को भी इस मुद्दे पर बयान देना चाहिए।” हालाँकि बाद में इस पोस्ट को डिलीट कर दिया गया।

आपको बता दें कि कोलकाता के मेयर फिरहाद हकीम ने एक बार पाकिस्तानी अखबार को दिए इंटरव्यू में अपने क्षेत्र के मुस्लिम बहुल इलाके में उर्दू वाले साइनबोर्ड को दिखाते हुए गर्व से बताया था कि इसे आप मिनी पाकिस्तान कह सकते हैं।

मौलवी अब्बास सिद्दीक़ी ने दी धमकी, कहा- CAA को रद्द करो वर्ना कोलकाता हवाई अड्डे को ब्लॉक कर दूँगा

कोलकाता में RSS कार्यकर्ता को मारी गोली, TMC के मंत्री ने कहा था- ये मिनी पाकिस्तान है

EU की संसद में CAA के खिलाफ प्रस्ताव लाने में POK मूल के शफ्फाक मोहम्मद का हाथ, भारत ने जताई आपत्ति

नागरिकता संशोधन कानून (CAA) का विरोध भारत में कई स्थानों पर हो रहा है, लेकिन अब दूसरे देश भी इसमें दखल देने की कोशिश करने लगे हैं। यूरोपीय संघ की संसद में CAA के खिलाफ प्रस्ताव पेश हुआ है। इस पर 29 जनवरी को बहस होगी और 30 जनवरी को वोटिंग भी होगी।

जानकारी के मुताबिक इसके पीछे यूके के सांसद शफ्फाक मोहम्मद का दिमाग है, जो कि मूल रूप से पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (POK) का रहने वाला है। बता दें कि POK में मीरपुर का निवासी शफ्फाक मोहम्मद 2019 से यूरोपियन पार्लियामेंट का सदस्य है। उसे शेफिल्ड सिटी काउंसिल के काउंसिलर के तौर पर ‘राजनीतिक सेवा’ के लिए 2015 में मेंबर ऑफ द ऑर्डर ऑफ द ब्रिटिश एंपायर का खिताब दिया गया था। यूरोपियन पार्लियामेंट में कुल 751 सांसद हैं। बताया जा रहा है कि इनमें से 154 सांसदों ने प्रस्ताव का समर्थन किया है। हालाँकि, यूरोपियन पार्लियामेंट के प्रस्ताव यूरोपियन कमिशन के लिए बाध्यकारी नहीं होते हैं।

इससे पहले यूरोपीय संघ की संसद में CAA के खिलाफ प्रस्ताव लाने की रिपोर्टों पर भारत ने कड़ी प्रतिक्रिया जाहिर करते हुए कहा था कि यह हमारा आंतरिक मामला है। इस कानून को संसद के दोनों सदनों में बहस के बाद उचित प्रक्रिया और लोकतांत्रिक तरीके से लागू किया गया है। इसलिए यूरोपीय संघ की संसद को ऐसे कोई कदम नहीं उठाने चाहिए, जो लोकतांत्रिक रूप से चुने गए सांसदों के अधिकारों एवं प्रभुत्व पर सवाल खड़े करे। हम उम्मीद करते हैं कि CAA को लेकर आगे बढ़ने से पहले एक बार फिर विचार करेंगे और हमसे संपर्क करेंगे, ताकि उन्हें तथ्यों की पूर्ण और सटीक जानकारी मिल सके।

भारत और यूरोपियन यूनियन के बीच अगला सम्मेलन जल्द ही ब्रसल्स में होने वाला है। भारत-पाकिस्तान मामलों एवं यूके की राजनीति के जानकार शफ्फाक मोहम्मद के पीछे पाकिस्तान सरकार का हाथ होने से भी इनकार नहीं कर रहे हैं। यूरोपीय संसद के 154 सांसदों ने प्रस्ताव में कहा है कि CAA के कारण दुनिया में नागरिकता का सबसे बड़ा संकट पैदा हो जाएगा और बड़े पैमाने पर लोगों को इसका दंश झेलना पड़ेगा।

वहीं भारत सरकार का कहना है कि नया कानून किसी की नागरिकता छीनता नहीं है, बल्कि इसे पड़ोसी देशों में उत्पीड़न का शिकार हुए अल्पसंख्यकों की रक्षा करने और उन्हें नागरिकता देने के लिए लाया गया है।

शाहीन बाग में ₹120 करोड़ का खेल: इस्लामी कट्टरपंथी PFI का पैसा, सिब्बल और इंदिरा जयसिंह का योगदान – ED

अभी तक नागरिकता संशोधन कानून के ख़िलाफ़ हो रहे विरोध प्रदर्शनों में केवल कयास लगाए जा रहे थे कि हिंसा भड़काने में इस्लामिक कट्टरपंथियों और विपक्षी राजनैतिक दलों का हाथ है। लेकिन टाइम्स नाऊ की ताजा खबर के अनुसार ईडी ने अपनी जाँच के बाद दावा किया है कि सीएए के ख़िलाफ़ प्रदर्शनों में हिंसा भड़काने, आगजनी करवाने के लिए इस्लामिक कट्टरपंथी पीएफआई ने ही अपना पैसा लगाया है। जबकि कपिल सिब्बल और इंदिरा जय सिंह जैसे कॉन्ग्रेसियों एवं सुप्रीम कोर्ट के वकीलों ने इसमें अपना पूरा योगदान दिया।

खबर के अनुसार, 73 सिंडिकेट बैंक अकॉउंट की पड़ताल से खुलासा हुआ है कि पूरी हिंसा को भड़काने में इनमें 120 करोड़ रुपए डाले गए। लेकिन बाद में इन अकॉउंटों को कुछ राशि खाली छोड़कर खाली कर दिया गया। बता दें कि इससे पहले यूपी पुलिस को भी राज्य में भड़की हिंसा संबंधी अपनी जाँच में पीएफआई के हाथ होने के सबूत मिले थे।

रिपोर्ट्स से बताया जा रहा है कि पीएफआई ने दंगों से पहले 27 बैंक अक़ॉउंट ख़ोले थे। 9 बैंक अकॉउंट रेहाब फाउंडेशन के नाम पर खोले गए थे, जिसका संबंध भी पीएफआई से है। जबकि 37 अन्य अकॉउंट भी इसी संगठन ने 17 अलग-अलग लोगों के नाम और संगठनों के नाम पर पर खोले थे।

इन अकॉउंटों की ट्रांजैक्शन जानकारी मिलने के बाद ईडी ने ये बड़ा खुलासा किया है। जानकारी के मुताबिक 73 अकॉउंटों में 120 करोड़ रुपए जमा करवाए गए थे और इनमें से 15 में हुई ट्रांजैक्शन की तारीख दंगों की तारीख से मेल खा रही है। इसे देखते हुए ही दावा किया गया है कि पीएफआई का ही इस हिंसा में सीधा संबंध हैं।

मास्टरमाइंड शरजील के नंगे हो जाने के बाद शाहीन बाग वाले जोर-शोर से अपनी देशभक्ति जताने में जुटे

वो 6 ‘बड़े’ पत्रकार जो दीपक चौरसिया पर शाहीन बाग में हुए हमले से हैं खुश!

संविधान और शरीयत में से शरीयत को चुन चुका है शाहीन बाग़

‘ला इलाहा इल्लल्लाह’ वाली आयशा को ‘शेरनी’ बता रही जावेद अख्तर की बेटी जोया, खुलकर कर रही प्रोमोट

नागरिकता संशोधन कानून के ख़िलाफ जामिया के समर्थन में पुलिस को कानून समझाने पर अपनी फजीहत करवाने वाले संगीतकार जावेद अख्तर इन दिनों चुप हैं। लेकिन उनकी बेटी और भारतीय फिल्म निर्देशक जोया अख्तर गुप-चुप तरह से जामिया हिंसा में उभर के आई कट्टरपंथी आयशा रेना को समर्थन दे रही हैं और साथ ही अपने प्रोडक्शन हाउस ‘टाइगर बेबी फिल्म्स’ के जरिए उसकी पब्लिसिटी भी कर रही हैं।

जी हाँ। जोया अख्तर के प्रोडक्शन हाउस टाइगर बेबी फिल्म के इंस्टाग्राम पर आयशा का एक पोस्टर कुछ दिनों पहले यानी 13 जनवरी को अपलोड किया गया था। जिसमें उसे टायगरेस आयशा रेना (शेरनी आयशा रेना) बताया गया। इस पोस्टर के कैप्शन में टाइगर बेबी फिल्म की ओर से शरजील इमाम का समर्थन करने वाली आयशा को निर्भीक, दृढ़ निश्चयी, अजेय बताया गया।

साथ ही उसकी तारीफ में जोया के प्रोडक्शन हाउस की ओर से लिखा गया कि जामिया मिलिया इस्लामिया में एक इतिहास की छात्रा एक युवक को बचाने के लिए कवच की तरह खड़ी हुई और बर्बर सेना से उसे बचाया। बिलकुल शीरो (हीरो का स्त्रीलिंग) की तरह। उसकी दहाड़ एक दम साफ और स्पष्ट थी।

गौरतलब है कि जिस आयशा रेना को नायिका बनाने के लिए जावेद अख्तर की बिटिया जोया अख्तर ने अपना प्रोडक्शन हाउस का इस्तेमाल करके खुद की मंशा और पक्ष को पेश किया, वो निहायती कट्टपंथी विचारों में डूबी हुई लड़की है। जिसने एक समय में आतंकी याकूब मेमन के लिए इंसाफ की माँग उठाई थी और अब देश से असम को काटने की बात करने वाले उस शरजील इमाम के लिए आवाज़ उठा रही है, जिस पर देशद्रोह का केस दर्ज हुआ है।

जोया अख्तर से पहले बरखा दत्त सहित कई पत्रकारों ने आयशा के साथ उसकी सहेली लदीदा को हाइलाइट किया था। इसके लिए पूरा का पूरा ड्रामा रचा गया था, जिसमें एक उपद्रवी को बसाने के लिए दोनों युवतियों ने पुलिस से झड़प की थी और पूरी घटना को हाई क्वालिटी के कैमरे से शूट किया गया था।

‘शरजील इमाम के खिलाफ सभी केस वापस लो’ – बरखा दत्त की Sheroes उतरीं ‘देशद्रोही’ के समर्थन में

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एक और हिंदू मंदिर पर इस्लामी कट्टरपंथियों का हमला: मूर्तियाँ तोड़ी, कालिख पोती, ग्रंथों को नुकसान पहुँचाया

दुनिया भर में मानवाधिकारों की बात करने वाले पाकिस्तान में किस प्रकार अल्पसंख्यकों के साथ बर्बर व्‍यवहार किया जाता है, इसकी एक और ताजी तस्‍वीर वहाँ के सिंध प्रांत में देखने को मिली। सिंध प्रांत के थारपरकर के चाचरो इलाके में कट्टरपंथियों ने हिंदू में जमकर तोड़फोड़ की। कट्टरपंथियों ने मंदिर पर हमला किया, मूर्तियों को क्षतिग्रस्त किया और माता रानी भटियानी की मूर्ति भी तोड़ दी।

पाकिस्तान में हिंदू और अन्य धर्म स्थलों को नुकसान पहुँचाने का सिलसिला थम नहीं रहा। पाकिस्तान में ननकाना साहिब गुरुद्वारे पर हुए हमले के बाद अब उपद्रवियों ने हिंदू समुदाय के मंदिर को निशाना बनाया। प्रधानमंत्री इमरान खान आए दिन कश्मीर को लेकर भारत सरकार पर निशाना साधते रहते हैं जबकि खुद उनके देश में अल्पसंख्यकों के साथ उत्पीड़न की खबरें कम होती नहीं दिख रही हैं। 

पत्रकार नायला इनायत ने हिंदू मंदिर पर हुए हमले की तस्वीरें शेयर करते हुए ट्वीट किया, “सिंध में अब एक और हिंदू मंदिर में तोड़फोड़ की गई। थारपरकर के चाचरो में भीड़ ने माता रानी भातियानी मंदिर में पवित्र मूर्ति और ग्रंथों को नुकसान पहुँचाया।” नायला ने अपने ट्विटर हैंडल पर घटनास्थल की चार तस्वीरें भी शेयर की हैं। इसमें देखा जा सकता है कि उपद्रवियों ने मातारानी कू मूर्ति पर काला रंग पोत दिया है और इसके अलावा तोड़फोड़ भी की गई है। साथ ही मंदिर को भी तोड़ने की कोशिश की गई है।

गौरतलब है कि कुछ दिन पहले ही ननकाना साहिब गुरुद्वारे पर हुई पत्थरबाजी की निंदा पूरे विश्व में हुई थी। इससे पहले सितंबर 2019 में भी सिंध में ही एक और हिंदू मंदिर में कट्टरपंथियों ने तोड़फोड़ की थी। इसी महीने पाकिस्तान में ननकाना साहिब पर पत्थरबाजी का एक वीडियो वायरल हुआ था। इस वीडियो में एक प्रदर्शनकारी ने पवित्र धर्मस्थल का नाम बदलकर गुलाम अली मुस्तफा करने की धमकी भी दी थी। 

कट्टरपंथी यहाँ सिख विरोधी नारे लगा रहे थे। शुक्रवार (3 जनवरी, 2020) को सिखों के पवित्र धर्मस्थल ननकाना साहिब गुरुद्वारे पर मुस्लिम भीड़ ने पत्थरबाज़ी की, सिखों के साथ मारपीट की और उनके घरों में भी पत्थरबाज़ी की। बता दें कि इस घटना को अंजाम तब दिया गया था, जब मुस्लिम समुदाय के लोग जुमे की नमाज अता कर अपने घर लौट रहे थे।

…वो चर्च जिसकी सीढ़ियाँ जाती हैं स्वर्ग को, लेकिन महिलाओं को नहीं है चढ़ने की अनुमति!

पूर्वी यूरोप में स्थित एक देश है जॉर्जिया। सन् 1991 तक यह जॉर्जियाई सोवियत समाजवादी गणतंत्र के रूप में सोवियत संघ के 15 गणतंत्रों में से एक था। यह देश ऊँची-ऊँची पर्वतमालाओं और बर्फ़ से ढकी चोटियों के लिए जाना जाता है। यहाँ कुछ पहाड़ों की चोटियाँ 15,000 फुट से ज़्यादा ऊँची हैं। इस देश के ख़ासतौर से दो हिस्से हैं, पूर्वी और पश्‍चिमी जॉर्जिया। दोनों हिस्से कई इलाकों से बने हैं और हर इलाके का अपना मौसम, अपने रीति-रिवाज़, संगीत, नृत्य और खान-पान है।

जॉर्जिया की राजधानी त्बिलिसी के पश्चिम में लगभग 200 किलोमीटर की दूरी पर कटक्शी स्तम्भ (Katskhi pillar) पर एक छोटा-सा चर्च है। इसे ईसाइयों के ‘स्तम्भ भिक्षुओं’ के रूप में जाना जाता है। इसकी ख़ासियत है कि यह एक प्राकृतिक चूना पत्थर से बना है और 130 फीट या 40 मीटर ऊँचा है, जिसके ऊपर बना चर्च शायद दुनिया का सबसे अलग चर्च है। 130 फीट ऊँचे स्तम्भ पर बने चर्च तक जाने के लिए सीढ़ियाँ बनी हुई हैं। वहाँ तक पहुँचने में लगभग 20 मिनट का समय लगता है। 2015 तक, फ़ादर मेक्सिम कव्वात्ज़ादे ने वहाँ सबसे अधिक समय (लगभग 20 साल तक) बिताया था। माना जाता है कि इतनी ऊँचाई पर चढ़कर चर्च तक पहुँचने वाला भगवान (जीजस, ईसा मसीह) के समीप पहुँच जाता है, स्वर्ग के नजदीक चला जाता है।

ख़बर के अनुसार, केवल पुरुष ही इस चर्च में प्रवेश कर सकते हैं, महिलाओं को इस चर्च में प्रवेश की अनुमति का कोई भी ऐतिहासिक संदर्भ नहीं है। इस सन्दर्भ में मठ के प्रमुख, नेता इलारियन का कहना है कि 2018 के बाद से जॉर्जियाई ऑर्थोडॉक्स चर्च के आध्यात्मिक गुरु पैट्रिआर्क इलिया-II के आदेश के बाद से चर्च के ऊपर जाने के लिए आम जनता को प्रतिबंधित कर दिया गया है।

इलियारियन ने बताया, “पैट्रिआर्क ने एक आदेश पारित किया, जिसमें कहा गया था कि केवल भिक्षु ही स्तम्भ के शीर्ष पर बने चर्च में प्रवेश कर सकते हैं। जब तक वो अपने उस आदेश को खारिज नहीं कर देते, तब तक हम किसी भी आगंतुक को ऊपर जाने की अनुमति नहीं दे सकते।” साथ ही इसके पीछे यह तर्क भी दिया जाता है कि इस तरह के प्रतिबंधों से कटाक्शी स्तम्भ की पवित्रता बनाए रखने में मदद मिलती है।

प्रतिबंधों से जुड़े तर्क पर त्सेत्स्वाद्ज़े नाम के शख़्स का कहा है, “केवल धार्मिक लोग ही ऊपर जा सकते हैं और हम उस निर्णय का सम्मान करते हैं। इसके पीछे आंशिक रूप से इमारतों की रक्षा करना है, साथ ही उस स्थान को पवित्र बनाए रखने के लिए ऐसा किया जाता है।”

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भारती को उसी की शादी के मंडप से किया किडनैप, जबरन धर्मांतरण और शाहरुख से करा डाला निकाह

पाकिस्तान के सिंध प्रांत में रविवार (जनवरी 26, 2020) को एक बार फिर हिंदू लड़की के अपरहरण, धर्म परिवर्तन और मुस्लिम युवक से निकाह करवाए जाने का मामला सामने आया है। लड़की का नाम भारती बाई कुमारी है। उसे दिनदहाड़े उसकी ही शादी के मंडप से अगवा कर लिया गया। कराची से करीब 215 किलोमीटर दूर मटियारी जिले में स्थित हाला शहर में हिंदू युवती के साथ यह घटना घटी।

लड़की के पिता किशोर दास के मुताबिक, जिस समय उनकी बेटी को किडनैप किया गया, उस वक्त उसकी शादी की रस्में निभाई जा रहीं थी। लेकिन, तभी वहाँ शाहरूख गुल नाम का युवक अपने कुछ साथियों और पुलिसवालों के साथ आया और दिन दहाड़े उनकी बिटिया को अगवा कर ले गया। बाद में भारती के इस्लाम धर्म में परिवर्तन और शाहरुख गुल से शादी के दस्तावेज के साथ एक तस्वीर सोशल मीडिया पर वायरल हुई।

वायरल वीडियो में दावा किया गया कि भारती ने 1 दिसंबर को इस्लाम कबूल कर लिया था। इसलिए उसे शादी के मंडप से उठाया गया। अब भारती का नया नाम बुशरा है। बता दें कि इन दस्तावेजों से ये बात साफ नहीं हो पाई है कि भारती का निकाह शाहरूख से कब करवाया गया। लड़की के माता-पिता उसकी वापसी माँग कर रहे हैं।

गौरतलब है कि इस मामले के सुर्खियों में आने के बाद दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के अध्यक्ष मनजिंदर सिंह सिरसा ने पाकिस्तान मीडिया की कुछ क्लिप जारी की हैं। उन्होंने अपने एक वीडियो में अपना बयान भी जारी किया है। जिसमें उन्होंने पूरे मामले की जानकारी देते हुए पाकिस्तान पर आरोप लगाया है कि पाकिस्तान का स्थानीय प्रशासन और सरकार भी इस तरह के मामलों में आरोपित युवकों की मदद करती है और भारती के केस में भी उसके इस्लाम कबूलने और निकाह करने के दस्तावेज एक महीने पुराने बनाकर दिखा दिए गए।

मनजिंदर सिंह सिरसा ने आरोप लगाया कि पिछले 75 दिनों में 53 हिंदू और सिख अल्पसंख्यक लड़कियों के नाम सामने आ चुके हैं, जिनके साथ जबरन धर्म परिवर्तन कर निकाह किया गया है।

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