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‘लव जिहाद एक सच्चाई, इसमें सेक्स स्लेव बनाई जाती हैं लड़कियाँ’ – चर्च ने वामपंथी सरकार को घेरा

केरल में कैथोलिक चर्च के एक वरिष्ठ पादरी ने राज्य की वामपंथी सरकार पर लव जिहाद को मूक सहमति देने का आरोप लगाया है। पादरी का कहना है कि राज्य सरकार लव जिहाद के मामलों की अनदेखी कर रही है। लव जिहाद में लड़कियों को फँसाकर उन्हें युद्धग्रस्त देशों में भेजा जा रहा है और जहाँ उनका ‘सेक्स स्लेव’ की तरह इस्तेमाल किया जाता है।

बता दें कि कुछ दिन पहले केरल के सबसे बड़े चर्च साइरो मालाबार ने लव जिहाद का मामला उठाया था। साइरो मालाबार मीडिया कमीशन की रिपोर्ट में कहा गया था कि लव जिहाद के नाम पर ईसाई लड़कियों को निशाना बनाया जा रहा है। उनकी हत्याएँ हो रही है। मगर राज्य सरकार ने इसे खारिज कर दिया था। अब राज्य सरकार के इस रवैये की केरल कैथोलिक बिशप काउंसिल (KCBC) ने आलोचना की है। KCBC के प्रवक्ता फादर वर्गीज वल्लिकट्ट ने आरोप लगाया है कि राज्य से ‘लापता महिलाओं और बच्चों’ के मामलों की राज्य और केंद्र सरकारें सही तरीके से जाँच नहीं करा रही है।

टाइम्स ऑफ इंडिया के मुताबिक वल्लिकट्ट ने रविवार (जनवरी 26, 2020) को एक वीडियो जारी करते हुए कहा कि लव जिहाद सच्चाई है और ऐसी घटनाओं को नजरअंदाज करना इन्हें ‘मूक मंजूरी देने के समान’ है। वीडियो में पादरी कह रहे हैं कि प्रेम के जाल में फँसाकर भगाई गई लड़कियों का पता लगाने के लिए कोई भी सरकार प्रभावी तरीके से जाँच नहीं करा रही है।

उन्होंने मीडिया की खबरों का हवाला देते हुए कहा कि बाद में लापता हुए लोगों के बारे में जानकारी मिली कि वे अन्य देशों में हैं जहाँ उनका इस्तेमाल सेक्स स्लेव और आतंकवादी के तौर पर किया जा रहा था। उन्होंने कहा कि कुछ ईसाई लड़कियों को प्रेम के जाल में फँसाकर सीरिया और अफगानिस्तान में भेजा गया है। वहाँ उन्हें बंधक बनाकर रखा गया है और उनका यौन उत्पीड़न किया जा रहा है। वल्लिकट्ट ने सरकारों पर लव जिहाद के मामलों का डेटा नहीं रखने का भी आरोप लगाया।

वहीं केरल के वित्त मंत्री थॉमस इसाक ने इन आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि यदि ठोस मामले या आरोप हैं, तो उन पर ध्यान दिया जाएगा। लेकिन केरल सरकार नहीं मानती कि इस तरह के आरोप का कोई आधार है।

वैसे यह पहला मौका नहीं है, जब ईसाई लड़कियों को लेकर इस तरह की बात सामने आई है। इससे पहले पिछले वर्ष राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के उपाध्यक्ष जॉर्ज कुरियन भी ईसाई लड़कियों के प्रति चिंता व्यक्त करते हुए केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को पत्र लिख चुके हैं। अपने पत्र में उन्होंने गृहमंत्री का ध्यान ईसाई लड़कियों के साथ हो रही लव जिहाद की घटनाओं की तरफ दिलाया था।

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‘शरजील इमाम के खिलाफ सभी केस वापस लो’ – बरखा दत्त की Sheroes उतरीं ‘देशद्रोही’ के समर्थन में

नागरिकता संशोधन कानून के ख़िलाफ़ देश भर में विरोध कर रहे लोगों की मंशा धीरे-धीरे अब साफ हो चुकी है। शरजील इमाम की वायरल स्पीच ने इन लोगों के मनसूबों का खुलासा कर दिया है। इस बीच जामिया की उस आयशा रेना और लदीदा की सच्चाई से भी पर्दा उठ गया है, जिसे पिछले महीने तक बरखा दत्त असली शीरो (Shero, हीरो की स्त्रीलिंग) के रूप में पेश कर रही थीं और उसके कट्टरपंथी रवैये का खुलकर समर्थन कर रहीं थीं।

दरअसल, भारत से असम को काटने की बात करने वाले शरजील इमाम पर दर्ज हुए केसों को आयशा ने वापस लेने की माँग उठाई है। आयशा का मानना है कि शरजील के ख़िलाफ़ असम और उत्तर प्रदेश की पुलिस ने जो एफआईआर दर्ज की है, वो निंदाजनक है।

बरखा दत्त की इस शीरो के अनुसार शरजील सिर्फ़ नागरिकता संशोधन कानून का मौख़िक आलोचक है और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में जो उसने असम के बारे में बयान दिया, उसे संघ के लोग और भाजपा प्रवक्ता गलत तरह से पेश कर रहे हैं।

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बरखा दत्त की शीरोज़

आयशा अपने फेसबुक पर शरजील इमाम के साथ एकजुटता में खड़े करीब 30 लोगों का नाम उल्लेख करके लिखती हैं, “हम, जागरूक कार्यकर्ता, छात्र और शिक्षाविद्, शरजील इमाम के साथ एकजुटता में खड़े हैं और उनके खिलाफ सभी मामलों को तुरंत रद्द करने की माँग करते हैं। हम सीएए-विरोधी प्रदर्शनकारियों के खिलाफ मीडिया और पुलिस के इस्लामोफोबिक व्यवहार की कड़े शब्दों में निंदा करते हैं। हम देश भर में चल रहे एंटी-सीएए विरोध प्रदर्शनों के दौरान राज्य दमन के सभी पीड़ितों के लिए बिना शर्त समर्थन और एकजुटता प्रदान करते हैं।”

सोशल मीडिया पर शरजील के ख़िलाफ़ दर्ज केसों को वापस लेने की माँग उठाते हुए आयशा ये भी कहती है कि ये सब राज्य सरकार और संघ परिवार की कोशिशें हैं ताकि इस प्रोटेस्ट को खत्म किया जा सके। आयशा जब अपने इस्लामी ‘भाईजान’ शरजील के लिए खुल कर लिखती है तो लदीदा पीछे कैसे रहती! लदीदा ने इसके लिए ट्विटर का सहारा लिया। बातें वही लिखी, अपनी मानसिकता के अनुसार।

गौरतलब है कि बीते दिनों ऑपइंडिया ने शाहीन बाग के प्रोटेस्ट में कट्टरपंथी इस्लामी मानसिकता की भूमिका की पड़ताल की थी। जिसमें साफ हुआ था कि शाहीन बाग का प्रोटेस्ट कोई आम प्रोटेस्ट नहीं है। बल्कि ये सोची-समझी साजिश है, जिसे रचने वाले शरजील जैसे कट्टरपंथी लोग हैं। और अब इन जैसे ‘देशद्रोहियों’ को समर्थन किससे मिल रहा है? उनसे जो ला इलाहा इल्ललाह का नारा बुलंद करती है और जो ऐसा नहीं करता है, उसे काफिर मानती है।

बता दें कि इससे पहले आयशा रेना 25 जनवरी को भी शरजील इमाम और शरजील उस्मानी के समर्थन में आवाज उठा चुकी है। इस दौरान आयशा ने दोनों को अपना भाई बंधु बताते हुए कहा था कि वे केवल फासीवादी सरकार से लड़ रहे हैं। इसलिए उनके ख़िलाफ़ आवाज़ उठाना बंद हो जाना चाहिए।

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मुस्लिम बन कर मत करो विरोध-प्रदर्शन, वरना… द वायर की आरफा शेरवानी ने समुदाय विशेष को समझाई रणनीति

CAA के विरोध में देश भर में हो रहे प्रदर्शन पर वामपंथी प्रोपेगेंडा वेबसाइट ‘द वायर’ की एडिटर आरफ़ा ख़ानम शेरवानी ने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (AMU) में अपनी स्पीच देते हुए मुस्लिमों को कुछ नसीहतें दी हैं। हाल ही में अपनी फोटोशॉप्ड तस्वीरों के कारण चर्चा में आई आरफा खानम ने इस भाषण में मुस्लिमों को एकसाथ आकर विरोध करने की राय दी।

शेरवानी ने CAA-विरोध को आगे बढ़ाने के लिए नुस्खे देते हुए कहा कि उनके कितने ही परिचित ‘मुस्लिम’ बनकर विरोध करना चाहते हैं। आरफा शेरवानी अपने मुस्लिम परिचितों के विरोध करने की इच्छा का हवाला देते हुए कहती हैं, “क्योंकि यह हमारे धर्म पर हमला है और हमारे धर्म पर हमला किया जाता है, इसलिए हम मुस्लिमों के रूप में विरोध करना चाहते हैं।”

आरफा शेरवानी कहती हैं, “मैं इस भावना को बहुत अच्छी तरह से समझती हूँ। जब हमला ही दाढ़ी, टोपी, बुर्का पर होता है, तो यह दाढ़ी, टोपी और बुर्का में वापस जवाब देने के लिए एक वाजिब और स्वाभाविक प्रतिक्रिया है कि आप मुस्लिमों के रूप में ही विरोध प्रदर्शन में भाग लेते हैं।” आरफा ने कहा कि वो इस भावना को समझती हैं और उन्हें इसके खिलाफ कोई आपत्ति नहीं है।

“लेकिन अगर केवल मुस्लिम ही विरोध करते रहे… अगर केवल 20 करोड़ लोग विरोध करते हैं, तो क्या शेष 100 करोड़ लोग… यदि आप मजहबी नारे लगा रहे हैं, तो क्या वे आपका हिस्सा बनने के लिए तैयार होंगे? मैं एक आदर्श दुनिया की बात कह रही हूँ, एक आदर्श भारतीय समाज में, हर किसी को अनुमति दी जानी चाहिए, उनका स्वागत किया जाना चाहिए और वे जो भी कहना चाहते हैं, उन्हें कहने दिया जाना चाहिए। वे कुछ भी कहकर विरोध कर सकते थे, ‘जय श्री राम’, ‘वंदे मातरम’, ‘भारत माता की जय’ या खालसा या ईसाई नारों के नाम पर विरोध कर सकते हैं, लेकिन हम एक आदर्श समाज नहीं हैं।”

भाषण के दौरान प्रोपेगैंडा पत्रकार आरफा ने कहा कि सैफ अली खान जैसे फिल्म इंडस्ट्री वालों को, जिन्हें कि किसी बात की कोई जानकारी भी नहीं होती, वो लोग भी CAA के विरोध में उतर आए हैं।

“आपको इन विरोधों को उतना ही समावेशी बनाना होगा, जितना आप कर सकते हैं और इसके आधार को मजबूत बना सकते हैं। आप अपना कलमा पढ़ते हैं, इबादत करिए, और भारतीय संविधान तब भी आपको अधिकार देता है। लेकिन जब आप जनता के बीच आते हैं… आप एक मुस्लिम हैं, इसमें कोई संदेह नहीं है… और आप पर हमला किया जा रहा है, जो सच भी है। लेकिन यह समझें कि ये विरोध भारत की धर्मनिरपेक्षता, भारतीय संविधान और इसकी मूल संरचना को बचाने के लिए है। हमें इसे समावेशी बनाना होगा। इसका केवल मुस्लिम बनकर विरोध नहीं करना है। मैं उन सभी से माफी माँगती हूँ, जिनकी भावनाएँ आहत हुई हैं… लेकिन मैं चाहती हूँ कि इस बात पर आम सहमति बने कि जब तक एक आदर्श समाज का निर्माण नहीं हो जाता है, और जब तक हमारी धार्मिक पहचान, धार्मिक विश्वास और नारे स्वीकार नहीं किए जाते हैं, हमें एक समावेशी विरोध करना चाहिए।”

‘घर पर खूब मजहबी नारे पढ़कर आइए, उनसे आपको ताकत मिलती है’

“हम अपनी विचारधारा से समझौता नहीं कर रहे बल्कि अपने तरीके और स्ट्रेटेजी बदल रहे हैं। सभी जाति, धर्म के लोग साथ आएँ। घर पर खूब मजहबी नारे पढ़कर आइए, उनसे आपको ताकत मिलती है। सबके अलग-अलग तरीके हो सकते हैं अपनी ताकत को बढ़ाने के, जैसे किसी को गाने सुनने से ताकत मिलती है, किसी को पढ़ने से मिलती है, वैसे ही हमें मजहबी नारों से मिलती है। सबके अलग तरीके हैं, और यही हमारी लड़ाई है। लेकिन जब आप सिर्फ मुस्लिम बनकर विरोध करने का फैसला लेते हैं, तब आप लड़ाई हार जाते हैं।”

‘कॉन्ग्रेस ने हमें कभी ढंग से नागरिक नहीं बनने दिया, आज हम अपने अधिकारों के लिए सड़कों पर आए हैं’

मुस्लिमों को आगे की रणनीति समझाते हुए प्रोपेगैंडा पत्रकार आरफा अपने भाषण में कहती हैं कि कॉन्ग्रेस ने उन पर इतने साल राज किया लेकिन उन्हें कभी ढंग से नागरिक नहीं बनने दिया। उन्होंने कहा कि वो लोग सिर्फ प्रजा बनते आए हैं, और पिछले कुछ सालों में उपभोक्ता बनकर रह गए हैं। साथ ही उन्होंने कहा कि पिछले 5-6 साल में वो सिर्फ सब्जेक्ट बनकर रह गए हैं।

हाल ही में ट्विटर पर कुछ फोटोशॉप्ड तस्वीरों को लेकर चर्चा में आई आरफा शेरवानी ने कहा- “हम अब तक ऐसे रहते आए हैं, जैसे हमने अपना एक बादशाह चुन लिया और हम बस एक ‘रियाया’ (प्रजा) बनकर रह गए, आज यही प्रजा अपने अधिकारों के लिए सड़कों पर निकल आई है। यह इस मुल्क का शहरी है, आज वह संविधान की रक्षा के लिए सड़कों पर आया है। जो लोग सड़कों पर आए हैं, वो अब वापस नहीं जाएँगे। यह अब सिर्फ CAA के खिलाफ नहीं है, अब एक मुद्दे से दूसरा मुद्दा जुड़ता जाएगा। यह अब चाहे फाँसी की सजा के खिलाफ, चाहे महिलाओं को ज्यादा अधिकार दिए जाने के खिलाफ हो, वह नागरिक सड़क पर सरकार के खिलाफ आ चुका है। थोड़ी बातें ध्यान में रखनी जरूरी हैं कि यह विरोध किस रूप में आगे बढ़ते रहना चाहिए।”

बिना कोई तथ्य और तर्क देते हुए आरिफा शेरवानी ने इस पूरे भाषण में जर्मनी और हिटलर को भी याद किया और अपने भाषण का अंत एक उर्दू शेर से ये कहते हुए किया कि उन्हें इससे ताकत मिलती है।

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पल्स पोलियो की महिला स्टाफ को बंधक बनाकर अभद्रता, शक NRC डेटा कलेक्शन का: आस मो. सहित 4 पर FIR

विपक्षी दलों और मीडिया द्वारा फैलाए गए CAA और NRC के भ्रम का असर सामने नजर आने लगा है। केंद्र सरकार ने देश में नागरिकता संशोधन कानून (CAA) लागू कर दिया है। बावजूद इसके इस कानून का देशभर में जमकर विरोध हो रहा है। CAA और NRC का विरोध करने वालों द्वारा इतने भ्रामक तथ्य सामने लाए जा रहे हैं कि लोग गली-मोहल्लों में आने वाले किसी भी बाहरी व्यक्ति को संदेह की नजर से देखने लगे हैं।

उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले में पल्स पोलियो अभियान की टीम के साथ मारपीट का मामला प्रकाश में आया है। रिपोर्ट्स के अनुसार, वहाँ के स्थानीय लोगों द्वारा पल्स पोलियो की टीम को NPR और NRC का डाटा तैयार करने वाली टीम समझकर पहले उनके साथ मारपीट की गई और फिर स्टाफ की एक महिला के साथ अभद्रता भी की गई। यही नहीं, इसके बाद दोनों कर्मचारियों को करीब एक घंटे तक घर में बंधक बनाकर रखा गया।

बंधक बनाकर महिला स्टाफ के साथ की गई अभद्रता

इंस्पेक्टर कपिल प्रशांत के अनुसार, पल्स पोलियो की टीम में दीपक और एक महिला स्टाफ थी। इनके साथ मारपीट और अभद्रता की गई है। इंस्पेक्टर का कहना है कि तहरीर ले ली गई है। सभी आरोपितों के खिलाफ मारपीट, अभद्रता और कई संगीन धाराओं में कार्रवाई की जाएगी। वहीं एक आरोपित आस मोहम्मद का नाम सामने आया है।

लिसाड़ीगेट थाना क्षेत्र के लक्खीपुरा में यह घटना उस समय घटी, जब शुक्रवार (जनवरी 24, 2020) को पल्स पोलियो अभियान की टीम बच्चों को दवा पिलाने गई थी। जैसे ही यह दल अली बाग कॉलनी पहुँचा तो वहाँ दवा पिलाने को लेकर एक परिवार के लोगों से इनकी बहस हो गई। तभी वहाँ एक व्यक्ति पहुँचा और उसने यह कहते हुए शोर मचाना शुरू कर दिया कि यह एनपीआर और एनआरसी का डाटा तैयार कर रहे हैं।

माहौल गड़बड़ होता देख और वहाँ भीड़ इकट्ठी होते देख प्लस पोलियो पिलाने वाली टीम के सदस्य वहाँ से जाने लगे तो भीड़ ने उन्हें पकड़कर बंधक बना लिया। इसके बाद किसी तरह वे वहाँ से जान बचाकर भागे। पीड़ित लोगों ने शनिवार को पूरी टीम के साथ लिसाड़ीगेट थाना पहुँचकर घटना की पूरी जानकारी दी। रिपोर्ट्स में बताया गया कि उनके साथ मारपीट व अभद्रता की गई है।

पुलिस अधिकारी के अनुसार, IPC की धारा 354, 342 और 390 के तहत रिपोर्ट दर्ज की गई है। साथ ही, पाँच व्यक्तियों के खिलाफ FIR दर्ज की गई है जिनमें दो नामजद हैं। पुलिस पाँचों आरोपितों को पकड़ने की कोशिश कर रही है।

26 जनवरी पर काला झंडा और ‘वीसी गो बैक’ के नारे: AMU के उपद्रवी छात्रों को पुलिस दौड़ा-दौड़ा कर पकड़ी

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में गणतंत्र दिवस CAA-विरोधी छात्रों के हंगामे की भेंट चढ़ गया। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (AMU) में 71वें गणतंत्र दिवस समारोह के दौरान कुछ छात्रों ने परिसर में हंगामा कर व्यवस्था बिगाड़ने की कोशिश की। इस दौरान हंगामा कर रहे छात्रों ने कुलपति वापस जाओ (VC Go Back) के नारे लगाए और उन्हें अपना भाषण देने से रोका। इसके बाद वहाँ मौजूद सुरक्षाकर्मियों ने उपद्रवी छात्रों को पकड़कर समारोह स्थल से बाहर कर दिया।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, गणतंत्र दिवस के समारोह के दौरान कुछ AMU के कुछ छात्रों ने बाधा डालने की कोशिश की और हंगामा किया। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि यूनिवर्सिटी के कुलपति तारिक मंसूर स्ट्रेटची हॉल पहुँचे थे। उनके साथ रजिस्ट्रार अब्दुल हमीद सहित यूनिवर्सिटी के अन्य लोग भी वहाँ मौजूद थे।

इस कार्यक्रम में ध्वजारोहण के बाद जैसे ही कुलपति तारिक मंसूर ने बोलना शुरू किया, छात्रों के एक गुट ने उनके भाषण को बाधित करते हुए काले झंडे दिखाकर ‘वीसी गो बैक’ के नारे लगाने शुरू कर दिए। कड़ी सुरक्षा के बीच यूनिवर्सिटी में आयोजित कार्यक्रम के दौरान कुलपति तारिक मंसूर जब अपना भाषण समाप्त कर रहे थे, तभी कुछ छात्रों ने उन्हें हटाने की माँग करते हुए उनके खिलाफ नारेबाजी शुरू कर दी। इस दौरान छात्रों के दो गुटों के बीच धक्का-मुक्की भी हुई।

कुलपति ने अपने भाषण में कहा कि वह अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (AMU) के दर्जे को संरक्षित करने की कसम लेते हैं। उन्होंने कहा कि परिसर में हाल में हुई घटनाएँ दुर्भाग्यपूर्ण थीं लेकिन वह हमेशा अपने छात्रों के साथ रहे हैं और आगे भी रहेंगे।

बताया जा रहा है कि छात्रों ने यह नारेबाजी तब शुरू की जब कुलपति ने अपने भाषण के दौरान विश्वविद्यालय परिसर में गत 15 दिसंबर को संशोधित नागरिकता कानून (CAA) के खिलाफ प्रदर्शन के मामले में जामिया मिलिया इस्लामिया के छात्रों पर हुई पुलिस कार्रवाई के विरोध में AMU के छात्रों के उग्र प्रदर्शन को दुर्भाग्यपूर्ण बताया।

कार्यक्रम में हंगामा करने और काले झंडे दिखाने की कोशिश करने वाले छात्रों को यूनिवर्सिटी की प्रोक्टोरियल टीम ने दौड़कर पकड़ा। सभी विरोध कर रहे छात्रों को टीम अपनी गाड़ियों में भरकर ले गई। इस मामले पर कुलपति तारिक मंसूर से जब इस विरोध प्रदर्शन के बारे में सवाल किए गए, तो उन्होंने इस पर कुछ न बोलते हुए सिर्फ सभी को 71वें गणतंत्र दिवस की बधाई दी।

स्टूडेंट्स कोआर्डिनेशन कमेटी के प्रवक्ता अनसब आमिर ने संवाददाताओं को बताया कि कुलपति के भाषण के दौरान विरोध जताने वाले छात्रों को विश्वविद्यालय के सुरक्षा स्टाफ ने पकड़ कर जबरन पुलिस थाना पहुँचा दिया। हालाँकि ताहिर आजमी, रफीउद्दीन, सुधीर गुलाटी और एएम फराज नाम के छात्रों को अब रिहा कर दिया गया है।

बता दें कि कल ही AMU में शरजील इमाम को देशद्रोही बयान देने के लिए देश के विभिन्न राज्यों में देशद्रोह का केस दर्ज किया गया है। उसने असम और नार्थ-ईस्ट को भारत से अलग कर देने की बात कही थी। नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में 15 दिसंबर को एएमयू में जमकर हिंसा हुई थी। तब से छात्रों का एक समूह परिसर में धरना दे रहा है। पुलिस कार्रवाई के विरोध में छात्र कुलपति के इस्तीफे की माँग कर रहे हैं।

शरजील इमाम के बिहार कनेक्शन पर छापेमारी, उसके अब्बा को नीतीश की पार्टी ने दिया था टिकट

जेएनयू छात्र शरजील इमाम के घर पर पुलिस पहुँची लेकिन वो नहीं मिला। वो अपने बयान पर सफाई देने के लिए मीडिया में भी नहीं आ रहा है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या भारत के ‘टुकड़े-टुकड़े करने’ के ख्वाब देखने वाला शाहीन बाग़ का मुख्य सरगना फरार हो गया है? डिबेट-डिबेट चिल्लाने वाले वामपंथी अगर आज चर्चा से भाग रहे हैं तो सवाल उठना लाजिमी है। केंद्रीय एजेंसियों ने उसके बिहार के जहानाबाद स्थित आवास पर छापेमारी की लेकिन वो नहीं मिला। शरजील का पैतृक आवास जिले के काको क्षेत्र में स्थित है।

इस छापेमारी में जहानाबाद पुलिस ने भी केंद्रीय एजेंसियों का साथ दिया। उसके घर से तीन लोगों को हिरासत में लेकर उनसे पूछताछ की गई। हिरासत में लिए गए लोगों में से दो उसके रिश्तेदार हैं। जहानाबाद के एसपी मनीष कुमार ने इस कार्रवाई की पुष्टि की है। हालाँकि, ऑपइंडिया ने जब एसपी मनीष कुमार से बात की तो उन्होंने उन मीडिया रिपोर्ट्स को नकार दिया, जिनमें तीन लोगों को हिरासत में लिए जाने की बात कही गई।

ऑपइंडिया से बातचीत करते हुए एसपी ने कहा कि ये बिहार पुलिस का केस नहीं है, पुलिस केवल अन्य एजेंसियों का सहयोग कर रही है। उन्होंने कहा कि तीन लोगों से पूछताछ की जा रही है लेकिन हिरसत में नहीं लिया गया है। हालाँकि, स्थानीय थाना ने ऑपइंडिया से बताया कि वो न तो इस ख़बर को नकार सकते हैं और न ही इसकी पुष्टि कर सकते हैं कि तीन लोग हिरासत में लिए गए हैं। हाँ, छापेमारी ज़रूर हुई है और केंद्रीय एजेंसियों ने बिहार पुलिस का सहयोग माँगा था।

शरजील इमाम ने अपने भड़काऊ भाषण में पूरे नॉर्थ-ईस्ट को शेष भारत से अलग-थलग करने की बात कही थी। उसने देश के संविधान, न्यायपालिका, महात्मा गाँधी और सरकार, सभी को भला-बुरा कहा था और मुस्लिमों को देश भर में अराजकता फैलाने के लिए भड़काया था। उसके ख़िलाफ़ असम और ईटानगर में केस दर्ज किया गया है। ईटानगर क्राइम ब्रांच भी उस पर कार्रवाई कर रही है।

बता दें कि शरजील इमाम दिवंगत जदयू नेता अकबर इमाम का बेटा है। हालाँकि, अभी उसका पूरा परिवार पटना रह रहा है। शारजील इमाम आईआईटी मुंबई से कंप्यूटर साईंस में ग्रेजुएट है। उसके पिता अकबर इमाम जेडीयू की ओर से विधानसभा चुनाव में उतरे थे, लेकिन उन्हें चुनाव में हार का सामना करना पड़ा था।

‘हम असम को हिंदुस्तान से परमानेंटली काट देंगे’ – शाहीन बाग के ‘मास्टरमाइंड’ की खुलेआम धमकी, वीडियो Viral

मास्टरमाइंड शरजील के नंगे हो जाने के बाद शाहीन बाग वाले जोर-शोर से अपनी देशभक्ति जताने में जुटे

पुराना Pak परस्त है संविधान और ‘भारत’ से घृणा करने वाला शरजील इमाम, हिन्दुओं को निकालना चाहता है

‘भारत माता की पूजा’ से ममता बनर्जी की पुलिस को दिक्कत! BJP कार्यकर्ताओं को मारा, लिया हिरासत में

पश्चिम बंगाल में राज्य सरकार और भाजपा के बीच तनातनी की खबरें रुकने का नाम नहीं ले रही हैं। आज 71वें गणतंत्र दिवस के मौके पर पश्चिम बंगाल के हावड़ा में पुलिसकर्मियों और भाजपा युवा विंग के कार्यकर्ताओं के बीच तब झड़प हो गई, जब पुलिस ने उन्हें भारत माता की पूजा करने से रोक दिया।

भारत माता की पूजा करना चाहते थे भाजपा कार्यकर्ता

रिपोर्ट्स के अनुसार, भाजपा ने पुलिस पर आरोप लगाया है कि पुलिस ने गणतंत्र दिवस के मौके पर प्रत्येक थाने के आगे भारत माता की पूजा करने की भाजपा की योजना में गतिरोध उत्पन्न किया। भाजपा का कहना है कि उन्होंने तय किया था कि 26 जनवरी के दिन वो पार्टी की ओर से शहर के सभी पुलिस थानों के आगे भारत माता की प्रतिमा रखकर पूजा-अर्चना करेंगे। इस संबंध में सभी थानों को चिट्ठी भेजकर अनुमति भी माँगी गई थी। भाजपा ने आरोप लगाया है कि इस मामले में पुलिस प्रशासन की ओर से सहयोग करने की जगह इस कार्यक्रम को रोकने की कोशिश की जा रही है।

भाजपा ने पुलिस की इस हरकत को अलोकतांत्रिक बताया है। पुलिस द्वारा रोके जाने पर बीजेपी कार्यकर्ताओं ने इसका विरोध किया, जिसके बाद देखते ही देखते दोनो पक्षों में झड़प शुरू हो गई। हालाँकि, कार्यकर्ताओं को अभी तक यह पता नहीं चल पाया है कि पुलिस उन्हें भारत माता की पूजा करने से क्यों रोक रही थी। झड़प होने के बाद पुलिस ने बीजेपी युवा विंग के कुछ कार्यकर्ताओं को हिरासत में भी लिया है।

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आज शरजील है, तब मुहम्मद शफी था: उस समय भी हिंदू भेंट चढ़े थे, आज भी निशाना वही हैं

इतालवी दार्शनिक सिसरो ने कहा है कि यह न जानना कि आपके जन्म से पहले क्या हुआ, हमेशा शिशु बना रहना है।

जब आप अतीत को खॅंगालते हैं तो दिल्ली के शाहीन बाग में एक महीने से ज्यादा वक्त से जो कुछ चल रहा है वह नया नहीं लगता है। झारखंड के लोहरदगा में एक शांतिपूर्ण जुलूस पर हमले में भी कुछ नया नहीं दिखता। न हिंदुत्व की कब्र खुदने के नारों में नयापन है और न शरजील इमाम के जहर उगलते वीडियो में। राजनीतिक रोटी सेंकने के लिए समुदाय विशेष को उकसाना और उनके घृणा उगलते जुबान पर कॉन्ग्रेस का होठ सिलना भी नया नहीं है।

पन्ने पलटते चलिए और तार जुड़ते जाएँगे। आज नागरिकता संशोधन कानून (CAA) की विरोध की आड़ में देश को अराजकता की आग में ढकेलने की और असम के बहाने देश के टुकड़े-टुकड़े करने के जो मॅंसूबे नजर आ रहे हैं, ऐसा ही कुछ अस्सी के दशक में कश्मीर में दिखा था। उस समय की चुप्पी 90 का दशक आते-आते कितनी भारी पड़ी यह पूरी दुनिया ने देखा। करीब 4 लाख कश्मीरी पंडित रातोंरात अपना घर और अपनी संपत्ति छोड़ जान बचाकर भागने को मजबूर हुए। कश्मीर को आजाद कराने का षड्यंत्र रचा गया। उसे आतंकवाद की आग में झोंक दिया गया।

शरजील इमाम के जो वीडियो सामने आए हैं उनमें वह गॉंधी को 20वीं सदी का सबसे बड़ा फासिस्ट नेता बताता है। आपको यह जानकर ताज्जुब होगा कि 80 के दशक में कश्मीर में भी गॉंधी को लेकर ऐसे ही भाव थे। कश्मीर: समस्या और समाधान में जम्मू-कश्मीर के पूर्व राज्यपाल जगमोहन ने इस घटना का​ विस्तार से जिक्र किया है। साल 1988 का था। दो अक्टूबर यानी गॉंधी जयंती पर श्रीनगर हाई कोर्ट में राष्ट्रपिता की प्रतिमा स्थापित की जानी थी। देश के मुख्य न्यायाधीश आरएस पाठक को प्रतिमा की स्थापना करनी थी। कुछ मुस्लिम वकीलों ने इसका विरोध किया। अव्यवस्था फैलाने की धमकी दी। सरकार झुक गई और कार्यक्रम स्थगित कर दिया गया।

इसका नतीजा क्या निकला? बकौल जगमोहन धर्मनिरपेक्ष देश के एक धर्मनिरपेक्ष राज्य की अदालत में गॉंधी की प्रतिमा स्थापित नहीं हो पाई। विरोध कर रहे वकीलों का अगुआ था जम्मू-कश्मीर हाई कोर्ट का वकील मुहम्मद शफी बट्ट। वह नेशनल कॉन्फ्रेंस से जुड़ा था और इस घटना के अगले ही साल 1989 में उसे श्रीनगर से लोकसभा का टिकट भी मिल गया। उस समय राज्य की सत्ता में कॉन्ग्रेस भी साझेदार थी। लेकिन, राजनीतिक फायदे के लिए उसने भी चुप्पी साधी रखी।

अब आप समझ सकते हैं कि बीते साल जब राज्य में आर्टिकल 370 के प्रावधानों को निरस्त किया गया तो जम्मू-कश्मीर के पारिवारिक राजनीतिक दलों के साथ-साथ कॉन्ग्रेस भी क्यों हाय-तौबा मचा रही थी। जो कॉन्ग्रेस गोडसे का नाम लेकर गॉंधी की विरासत पर दावा करती है, उसने मुहम्मद शफी बट्ट के सामने घुटने टेक दिए थे।

केवल राजनीतिक दल ही नहीं, बकौल जगमोहन- जो लोग राज्य में महत्वपूर्ण पदों पर बैठे थे उनकी भी मानसिकता ऐसी ही थी। मसलन, जम्मू-कश्मीर हाई कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस मुफ्ती बहाउद्दीन फारूकी अपनी विचारार्थ याचिका में कहते हैं- 42 वर्ष पूर्व जम्मू-कश्मीर राज्य के लोगों की इच्छा के विरुद्ध भारत ने चालबाजी, धोखे और जबरदस्ती से अपने में विलय कर लिया।

साभार: कश्मीर: समस्या और समाधान

अब आज के हालात पर गौर करिए। वैसे ही नारें, वैसी ही साजिशें दिखेंगी। मजहबी उन्माद के वहीं चेहरे नजर आएँगे। उनकी कारगुजारियों पर दम साधी कॉन्ग्रेस उसी तरह खड़ी दिखेगी। शायद इसलिए, जर्मन दार्शनिक वाल्टर बेंजामिन ने कहा था- पिछली पीढ़ियों और वर्तमान पीढ़ियों के बीच एक गुप्त सहमति है।

सो, इस नापाक सहमति पर चुप्पी तोड़ने का वक्त आ गया है।

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‘देशद्रोही’ शरजील के साथ कौन? JNU की BAPSA, कहा- ब्राह्मणवादी भाजपा मुस्लिमों को पकड़ रही

असम को भारत से अलग करने की बात कहने वाले शरजील इमाम पर देशद्रोह का मुकदमा दायर होते ही JNU के कुछ छात्र संगठन शरजील के साथ खड़े देखे जा रहे हैं। इनमें से एक नाम जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी यानी जेएनयू की राजनीति में कुछ समय पहले ही कदम रखने वाले बिरसा आंबेडकर फुले स्टूडेंट्स असोसिएशन यानी BAPSA का है।

BAPSA ने अपने फेसबुक अकाउंट पर शरजील इमाम के साथ देने के सम्बन्ध में सूचना शेयर की है। दिलचस्प बात यह है कि स्वयं ‘शाहीन बाग़’ ने आधिकारिक रूप से शरजील इमाम के बयान को विवादास्पद बता कर उससे किनारा कर लिया है। ऐसे में यह देखना हास्यास्पद है कि जब इस CAA-NRC विरोध प्रदर्शन को शुरू करने वाला शाहीन बाग ही शरजील इमाम से पीछा छुड़ाना चाह रहा है, तब यहाँ जेएनयू में अपनी पहचान तलाश रहा बापसा (BAPSA) शरजील के मुस्लिम होने और सताए जाने की बात करते हुए इसमें ब्राह्मणवाद और लहसुनवाद निकाल कर ले आया है।

फेसबुक पर BAPSA द्वारा शेयर किए गए इस पत्र में लिखा है कि ब्राह्मणवादी भाजपा की आईटी सेल ने JNU के मुस्लिम रिसर्च स्कॉलर शरजील इमाम के भाषण की गलत व्याख्या की है। साथ ही, पत्र में यह भी लिखा गया है कि ब्राह्मणवादी भाजपा सरकार के निशाने पर मुस्लिम आसानी से आ जाते हैं। इस पत्र में BAPSA ने मीडिया को भी ब्राह्मणवादी बताया है।

पत्र में देशद्रोह (124 A) को नफरत से भरी हुई सरकारों के द्वारा विरोधियों की आवाज दबाने का हथियार बताया गया है। BASPA ने ‘समझदार लोगों’ से निवेदन किया है कि वे साथ मिलकर UAPA और AFSPA जैसे ‘फासिस्ट’ कानूनों का भी विरोध करें।

मनुवाद और ब्राह्मणवाद की ढपली बजाने तक सीमित है BAPSA

छात्र राजनीति के नाम पर JNU में 2014 में अस्तित्व में आए BAPSA संगठन की हैसियत सिर्फ चुनावों के समय अपना समर्थन दूसरी पार्टी को देने तक सीमित है। यदि BAPSA के इतिहास पर नजर दौड़ाएँ तो पता चलता है कि इस दल ने वैसे तो अपने लिए कुछ भी उल्लेखनीय कार्य नहीं किया है, बस दूसरों को ऐसे ही बिना माँगे ‘समर्थन’ दे-दे कर किसी भी तरह चर्चा में बने रहना ही इनकी जिंदगी का पहला और आखिरी मकसद है। इस दल की पूरी राजनीति घोर जातिवादी होने और उमर खालिद और लिंगलहरी कन्हैया कुमार जैसे साम्प्रदायिक गुंडों को डिफेंड करने पर ही टिकी हुई है।

JNU में वर्ष 2019 के चुनावों में भी BAPSA की स्थिति यह थी कि 2018 के JNU चुनाव में जहाँ BAPSA संगठन का वोट शेयर 20.2% था, वह 2019 में 13% पर सिमट गया था। ऐसे में लगभग 8000 लोगों वाली यूनिवर्सिटी में महज नैतिक जीत से ही संतोष करने वाली यह ‘बापसा’ पार्टी कन्हैया कुमार और उमर खालिद जैसों के बीच ब्राह्मणों को पानी पी-पी कर कोसने के कारण ही दस-पाँच लोगों के बीच जाना जाती है और आज यही बापसा साम्प्रदायिक भाषण देकर सस्ती लोकप्रियता बटोर रहे लोगों के साथ खड़े होकर सिर्फ अपनी मौजूदगी दर्ज करवा रही है।

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शाहीन बाग़ में सीएए विरोध प्रदर्शन के नाम पर चले रहे उपद्रव के मुख्य साज़िशकर्ता शरजील इमाम के ख़िलाफ़ अरुणाचल प्रदेश पुलिस ने मामला दर्ज किया है। उत्तर-पूर्वी भारत को शेष भारत से अलग करने के ख्वाब देखने वाला शरजील अपने ही बयानों के कारण बुरा फँस गया है। उसने न सिर्फ़ सिलीगुड़ी कॉरिडोर (चिकेन्स नेक) को ठप्प करने के लिए लोगों को भड़काया था बल्कि पूरे देश में अराजकता का माहौल पैदा करने के लिए लोगों को उकसाया था। इसी क्रम में उसने जामिया, जेएनयू और शाहीन बाग़ से लेकर कोलकाता तक भड़काऊ बयान दिए थे।

अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री प्रेमा खांडू ने बयान जारी कर बताया कि क्राइम ब्रांच ईटानगर ने शरजील के ख़िलाफ़ मामल दर्ज किया है। खांडू ने कहा कि इस तरह के भड़काऊ बयान देकर भारत की क्षेत्रीय अखंडता और सम्प्रभुता को खंडित करने का कोई भी प्रयास बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। इससे पहले असम के मंत्री हेमंत विश्व शर्मा ने बताया कि वहाँ भी शरजील के ख़िलाफ़ मामला दर्ज किया गया है। साथ ही अलीगढ़ पुलिस में भी उसके ख़िलाफ़ शिकायत दर्ज कराई गई है।

उधर सोशल मीडिया पर कई इस्लामी कट्टरवादी शरजील के समर्थन में उतर आए हैं। वहीं शाहीन बाग़ का एक धड़ा उसे विरोध प्रदर्शन से अलग दिखाने में लगा है क्योंकि पूरे उपद्रव की पोल खुल गई है। शाहीन बाग़ में गणतंत्र दिवस के दिन जोर-शोर से तिरंगा झंडा फहराया गया और संविधान का पाठ किया गया। दाग धोने के लिए संविधान और राष्ट्रीय प्रतीकों का इस्तेमाल किया जा रहा है ताकि ऐसा लगे कि ये एक ‘आंदोलन’ है और ये देश के लिए किया जा रहा है।

शरजील इमाम ने महात्मा गाँधी को सबसे बड़ा फासिस्ट नेता बताया था क्योंकि वो ‘राम राज्य’ की बात करते थे। इमाम ने अपने बयानों में ‘अल्लाहु अकबर’ सहित अन्य इस्लामिक नारे की वकालत की थी और कहा था कि गैर-मुस्लिमों को ऐसे नारे लगा कर सबूत देना होगा कि वो मुस्लिमों के साथ हैं, तभी उन्हें अपने साथ खड़ा माना जाएगा।

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