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Interview: ‘पंचायत चुनावों ने की गाँवों की हत्या, नए लेखकों ने रखा लव जिहाद जैसे विषय को साहित्य से अछूता’

ऑपइंडिया ने बीते दिनों युवा साहित्यकारों की श्रृंखला पर काम करना शुरू किया है। इसका उद्देश्य डिजीटल प्लैटफॉर्म पर संजीदगी से उन नए लेखकों को एक मंच देना है। जिन्होंने सोशल मीडिया के जरिए अपनी पहचान बनाई और खुद को बतौर साहित्यकार उभारा। इस कड़ी में सबसे पहला हिस्सा सर्वेश तिवारी ‘श्रीमुख’ बने। जिनकी अभी हाल ही में पहली किताब ‘परत’ आई है।

ऑपइंडिया संपादक अजीत भारती से बात करते हुए सर्वेश ने बड़ी शालीनता से सभी सवालों के जवाब दिए। बिहार के गोपालगंज से आने वाले परत के लेखक ने बताया कि कैसे उनके बाबा द्वारा तोहफे में दिए प्रेमचंद्र के पहले उपन्यास ‘सेवा सदन’ ने उनकी रूचि साहित्य में जगाई और बाद में उन्हें उनके एक शिक्षक ने उनका इस दिशा में मार्गदर्शन किया।

“पिछले 30 साल लेखकों के नाम अंधकार में रहे। हम मान चुके थे कि जो प्रेमचंद्र ने लिखा वही साहित्य है।”

वर्तमान में एक प्राथमिक विद्यालय में शिक्षक के तौर पर कार्यरत सर्वेश तिवारी ने अपने स्कूल की शिक्षा को महत्तवपूर्ण बताया। साथ ही आधुनिक हिंदी के लेखकों को लेकर कहा कि जब वे छात्र थे उस समय प्रेमचंद्र, रेणु जैसे चुनिंदा लेखक ही थे जिन्हें वे जानते थे, उन्हें मालूम ही नहीं था कि उनकी पीढ़ी में कौन लोग लिख रहे हैं। वे पिछले 30-40 सालों को नए लेखक के लिए अंधकार का समय मानते हैं। साथ ही कहते हैं कि सोशल मीडिया के आ जाने के बाद मालूम हुआ कि उनकी पीढ़ी के कौन लोग लिख रहे हैं। उनके मुताबिक स्कूली समय में वे और उनके साथी मान चुके थे कि साहित्य लिखना बंद हो चुका है और जो चीजें प्रेमचंद्र ने लिखीं, वही सब सिर्फ़ साहित्य है।

सर्वेश तिवारी की पहली किताब ग्रामीण राजनीति और प्रेम के नाम पर किए जा रहे छल पर आधारित है। वे कहते हैं कि अभी तक गाँव को शहर में बैठकर लिखा जाता रहा। लेकिन वास्तविकता में गाँव बहुत बदल चुके हैं। वे ‘परत’ को परिभाषित करते हुए कहते हैं कि उन्होंने गाँव में बैठकर गाँव को लिखा है। जोकि इस किताब की खासियत है।

वे ग्रामीण राजनीति पर बातचीत करते हुए कहते हैं कि उन्होंने पंचायत चुनावों के कारण गाँवों की हत्या होते देखी हैं। भाई-भाई को लड़ते देखा है। इसलिए उनका मानना हैं कि गाँव टूटे हैं और बदले हैं।

अपनी किताब की विषय सामग्री पर बात करते हुए सर्वेश खुद को साहित्यकार कहने वाले लोगों पर भी टिप्पणी करते हैं। वे मानते हैं कि पिछले कुछ समय में कुछ लेखकों ने लव जिहाद जैसे महत्तवपूर्ण विषयों को अछूतों की तरह छाँट दिया है। वे इस पर बात ही नहीं करना चाहते। ऐसे लेखकों के लिए वे तल्ख होते हुए ये भी कहते हैं कि अगर आप अपने समय के मुद्दों पर चुप रह जाते हैं, तो आप कुछ भी हों, लेकिन साहित्यकार नहीं हो सकते।

इस बातचीत में सर्वेश बौद्धिक लोगों द्वारा कई मुद्दों पर चुप्पी साधने को लेकर भी निराशा जताते हैं। साथ ही दावा करते हैं कि चाहे कोई भी वर्ग हो वो उनकी किताब की चाहकर भी नकारात्मक आलोचना नहीं कर सकता, क्योंकि उन्होंने अपनी किताब में सिर्फ़ सच्चाई लिखी है। वे कहते हैं कि किताब में मौजूद कहानियों को पाठक अपने से जोड़कर महसूस कर पाएगा और उसे ये भी लगेगा कि अगर वो इन मुद्दों पर लिखता तो वैसा ही लिखता जैसे श्रीमुख ने उन्हें पेश किया।

श्रीमुख अपनी किताब के बेस्टसेलर होने के पीछे फेसबुक को बड़ी वजह बताते हैं। वे कहते हैं कि बिना फेसबुक के बिहार के एक सुदूर क्षेत्र में पढ़ाने वाले शिक्षक को कोई नहीं पूछता। वे इस बातचीत में किताब बनने की पूरी प्रक्रिया पर बात करते हैं और बताते हैं कि कैसे उनका लेखन देखकर प्रकाशक द्वारा उन्हें खुद संपर्क किया गया।

साहित्यकार श्रृंखला में युवा साहित्यकार सर्वेश तिवारी ‘श्रीमुख’ से बातचीत यहाँ सुनें।

फाँसी के फँदे तक पहुँचा सलीम-शबनम का प्यार, 12 साल पहले कुल्हाड़ी से काटा था पूरे परिवार का गला

उत्तर प्रदेश के अमरोहा में अपने प्रेमी सलीम के साथ मिलकर अपने पूरे परिवार का सिर कलम करने वाली शबनम की खूनी दास्तां अब अंत के कगार पर है। निचली अदालत द्वारा फाँसी की सजा पाने के बाद शबनम और सलीम ने सुप्रीम कोर्ट में फाँसी माफी के लिए पुनर्विचार याचिका दायर की थी। इस पर चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया एसए बोबडे, जस्टिस एस अब्दुल नजीर और जस्टिस संजीव खन्ना की पीठ ने गुरुवार (23 जनवरी) को सुनवाई पूरी करके अपना फैसले को सुरक्षित रख लिया

जानकारी के मुताबिक, सुनवाई के दौरान शबनम की वकील ने उसके अपराध को जस्टिफाई करने का पूरा प्रयास किया। उन्होंने जजों के आगे दलील रखी कि उसका जेल में बर्ताव अच्छा है। वह जेल के स्कूल के बच्चों को पढ़ाती है, साथ ही जेल के कई सामाजिक कार्यक्रमों में शामिल होती है। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने उनसे कहा कि आप कह रही हैं कि 10 महीने के बच्चे को मारने के बाद उसके व्यवहार में बदलाव आया है? चीफ जस्टिस ने कहा कि हम समाज के लिए न्याय करते हैं। हम ऐसे अपराधी, जिसको दोषी ठहराया जा चुका है, उसे इसलिए माफ नहीं कर सकते क्योंकि दूसरे अपराधियों के साथ उसका व्यवहार अच्छा है। बता दें सुप्रीम कोर्ट ने इस दौरान याचिकाकर्ता की वकील को हड़काते हुए ये भी कहा कि वे सुप्रीम कोर्ट का कोई फैसला दिखाएँ, जिसमें जेल के अच्छे आचरण के कारण फाँसी की सज़ा को कम किया गया हो।

सलीम-शबनम के प्रेम की खूनी दास्तां

साल 2018 में 14-15 अप्रैल को उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद के अमरोहा में एक सनसनीखेज मामला सामने आया था। यहाँ जिले के बावनखेड़ी गाँव के मास्टर शौकत अली की बेटी शबनम ने अपने प्रेमी सलीम के साथ मिलकर अपने ही परिवार के 7 सदस्यों को बेरहमी से मौत के घाट उतार दिया था। एमए पास शबनम उस समय गाँव के स्कूल में शिक्षा मित्र थीं। मास्टर शौकत उसकी शादी किसी पढे़-लिखे लड़के से करना चाहते थे। लेकिन, शबनम का दिल अपने गाँव के 8वीं पास सलीम पर आ चुका था। दोनों का प्यार इतना परवान चढ़ा कि शबनम ने अपने घरवालों को नशे की दवाई देकर सलीम को हर रात घर पर बुलाना शुरू कर दिया। कुछ दिनों में दोनों ने परिवार को बाधा मानकर उन्हें खत्म करने की साजिश रची और फिर एक रात इस खौफनाक वारदात को अंजाम दे दिया।

14 अप्रैल, 2008 की रात को शबनम ने प्रेमी सलीम को घर बुलाया। इससे पहले उसने परिवार के सदस्यों को खाने में नींद की गोली खिलाकर सुला दिया था। उस दिन शबनम की फुफेरी बहन राबिया भी उनके घर आई हुई थी। रात में शबनम व सलीम ने मिलकर नशे की हालत में सो रहे पिता शौकत, माँ हाशमी, भाई अनीस, राशिद, भाभी अंजुम, फुफेरी बहन राबिया व दस माह के भतीजे अर्श का गला काट कर सबको मौत की नींद सुला दिया था।

इस घटना को अंजाम देने के बाद सलीम वहाँ से फरार हो गया, लेकिन शबनम पूरी रात लाशों के बीच रही। सुबह होते ही उसने शोर मचा दिया कि उनके घर में बदमाश आ गए। जब हल्ला सुनकर गाँव वाले उसके घर पहुँचे तो सबके पैरों तले जमीन खिसक गई। 10 महीने के बच्चे के शव के साथ शौकत अली और उनका पूरा परिवार कटे सिर के साथ जमीन पर पड़ा था। दिन निकलने तक ये मामला गाँव बावनखेड़ी देशभर में छा गया। तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती भी गाँव पहुँची थीं। मामले की जाँच में घटना के हालात देखते हुए शबनम पर ही शक की सुई गई।

इसके बाद घटना के चौथे दिन पुलिस ने शबनम व सलीम को हिरासत में लिया और उनसे पूछताछ की। उनकी मोबाइल की कॉल डिटेल से सारा मामला साफ हो गया। दोनों ने बाद में कबूल किया कि हत्या की इस खौफनाक वारदात को उन्होंने ही अंजाम दिया था। हत्या में इस्तेमाल की गई कुल्हाड़ी भी गाँव के तालाब से बरामद कर ली गई थी। इसके बाद सभी सबूतों के आधार पर स्थानीय अदालत ने दोनों को फाँसी की सजा सुनाई थी।

गौरतलब है कि सलीम और शबनम के चुपके-चुपके मिलने के दौरान कई बार उनके बीच शारीरिक संबंध बन चुके थे। जिस दिन दोनों ने इस वीभत्स घटना को अंजाम दिया उस समय शबनम दो माह की गर्भवती थी। बाद में शबनम ने जेल में ही बेटे को जन्म दिया। उसका नाम मुहम्मद ताज रखा गया। आज उस बच्चे की देखभाल शबनम का एक दोस्त कर रहा है। बच्चे को उसकी माँ से मिलाने के लिए अक्सर उसे जेल लाया जाता है।

शबनम-सलीम की वो प्रेम कहानी जिसने एक ही परिवार के 7 लोगों की जान ले ली

‘5 बंदूकें और दो फिर खेल देखो’: 7 लोगों का सिर कलम करवाने वाले का ‘संविधान’ सुनते रहे अधिकारी

झारखंड में ऐसा लग रहा है जैसे हेमंत सोरेन के मुख्यमंत्री बनते ही वहाँ अपराधियों को एक तरह की छूट सी मिल गई है। राज्य के पश्चिमी सिंहभूम जिले के गुदड़ी प्रखंड के बुरुगुलीकेरा गॉंव में उप मुखिया समेत 7 लोगों के सिर धड़ से अलग कर दिए गए। इस मामले का मुख्य आरोपित रांसी बुढ अब भी खुलेआम घूम रहा है। उसके आगे प्रशासन बेबस नजर आ रहा है।

उसका कहना है कि मारे गए सभी लोग उत्पात मचा रहे थे। उनकी हत्या जायज है। 7 लोगों की हत्या का आदेश देना बाला बुढ जब शेखी बघार रहा था, तब डीसी और एसपी उसके सामने झुक कर खड़े थे। पुलिस बल के साथ पहुँचे एसपी इंद्रजीत महथा और डीसी अरवा राजकमल के सामने पत्थलगड़ी नेता व हत्या का मुख्य आरोपी पूर्व मुखिया का पति रांसी बुढ़ ने कहा– “ये सातों मारे गए लोग उत्पाती थे। हमें पाँच बंदूकें और दे दो, फिर खेल देखो।” हत्या को जायज ठहराते हुए पत्थलगड़ी के नेता ने पुलिस से कहा कि जिन्हें मारा गया, वो उनके घरों में आकर उपद्रव करते थे, इसीलिए ग्राम सभा से सज़ा सुना दी। उसने सीधा कहा कि आपलोग आते नहीं हैं, इसीलिए हमने ही उन्हें मार डाला। पुलिस इस मामले में अब तक केवल तीन लोगों को ही गिरफ्तार कर पाई है।

भारी पुलिस बल के साथ पहुँची पुलिस किसी को भी गिरफ़्तार करने में कामयाब नहीं हो पाई। लापरवाही के आरोप में गुदड़ी थाना के थाना प्रभारी सब इंस्पेक्टर अशोक कुमार को निलंबित कर दिया गया है। एडीजी मुरारी लाल मीणा ने कहा कि सीएम हेमंत सोरेन के आदेश के अनुसार जल्द ही एसआईटी बनाकर इस घटना के पीछे के जिम्मेदार लोगों का पता लगा लिया जाएगा। बता दें कि पत्थलगड़ी के उपद्रवियों का मनोबल बढ़ा हुआ है क्योंकि कई संगीन अपराधों में उनके ख़िलाफ़ दर्ज किए मामलों में नै सरकार ने किसी भी कार्रवाई से रोक लगा दी है।

घटना 19 जनवरी के शाम की ही है। पुलिस को इसकी भनक मंगलवार को लगी। शव बुधवार को बरामद किए गए थे। मीडिया रिपोर्टों के बाद पत्थलगड़ी समर्थकों ने सातों युवकों की ग्रामसभा में पहले जमकर पिटाई की। अधमरे हालत में उन्हें घसीटकर करीब दो किमी जंगल में ले गए। वहॉं सभी के हाथ-पैर बॉंध कर सिर कलम कर दिया गया। दरअसल, घंटा कुछ यूँ है कि पथलगड़ी समर्थकों ने पश्चिमी सिंहभूम के गुलीकेरा गाँव से 7 ग्रामीणों को अपहृत कर मार डाला था।

इस घटना के बाद से हेमंत सोरेन की अगुवाई वाली झामुमो, कॉन्ग्रेस और राजद की सरकार निशाने पर है। असल में, शपथ लेने के बाद हेमंत सोरेन ने चार घंटे के भीतर ही पहली कैबिनेट बैठक में पत्थलगड़ी आंदोलन के दौरान दर्ज एफआईआर वापस लेने का फैसला किया था। पिछली बार भी इस आंदोलन के दौरान जमकर हिंसा हुई थी। अपहरण, गैंगरेप जैसी घटनाओं को अंजाम दिया गया था।

गौरतलब है कि पत्थलगड़ी आंदोलन की शुरुआत खूँटी से ही हुई थी। झारखंड में आदिवासी हितों के नाम पर राजनीति करने वाले हेमंत सोरेन ने चुनाव से पूर्व ही स्पष्ट कह दिया था कि उनकी सरकार बनते ही पत्थलगड़ी हिंसा के आरोपितों पर से सभी केस हटा लिए जाएँगे और उन्होंने किया भी। मसलन वो दोपहर 2:19 पर शपथ लेते हैं और 5: 45 शाम में कैबिनेट की पहली मीटिंग में ही FIR वापसी का फैसला लेते हैं।

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सरकार बनने के 4 घंटे के भीतर केस वापस लेने का फैसला, 21 दिन बाद हत्या कर 7 को जंगल में फेंका

3 म​हीने पुराने फेसबुक पोस्ट पर 5 घंटे उपद्रव, विहिप कार्यकर्ता के मोहल्ले में हरवे-हथियार ले घुसे

पेन पर लिखा था ‘WE SUPPORT CAA & NRC’, दुकान के मालिक को मिली जान से मारने की धमकी

देशभर में एक तरफ़ तो नागरिकता संशोधन क़ानून (CAA) और NRC के ख़िलाफ़ जमकर विरोध-प्रदर्शन हो रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ इसके समर्थन में भी लोग अपनी बात रखने से नहीं चूक रहे हैं। लेकिन, ऐसे लोगों की जान पर मुसीबत मँडराने लगती है जब किसी विरोधी समर्थक की नज़र ऐसी किसी गतिविधि पर पड़ जाए। ताज़ा मामला चेन्नई का है जहाँ रिची स्ट्रीट की एक दुकान पर मुस्लिम भीड़ इसलिए जुट गई क्योंकि वहाँ पर CAA-NRC के समर्थन का लेबल वाला पेन बिक रहा था।

सोशल मीडिया पर वायरल हुए एक वीडियो में, दुकान पर मुस्लिम भीड़ इकट्ठा थी जिन्हें CAA के ख़िलाफ़ नारे लगाते देखा व सुना जा सकता है।

ख़बर के अनुसार, दुकान के मालिक दिनेश कुमार को कल (23 जनवरी) से ही लगातार धमकियाँ मिल रही हैं। इस मामले पर दिनेश कुमार ने बताया:

“मुझे इस बात की जानकारी नहीं थी कि ऐसे शब्द पेन पर छपे थे। जब दूकानदार दुकान पर पहुँचे, तो एक मुस्लिम लड़के ने पेन देखा और वहाँ से चला गया। एक अन्य व्यक्ति दुकान पर आया, उसने उस पेन की तस्वीर ली और उसे सोशल मीडिया पर अपलोड कर दिया।”

उन्होंने बताया, “कल से, मुझे कई स्थानों से कॉल के माध्यम से धमकी मिल रही है, लेकिन, फ़िलहाल दुकान खुली हुई है और पुलिस  की सुरक्षा भी मिली हुई है।”इस मामले में दिनेश कुमार ने पुलिस में FIR भी दर्ज कराई है।

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स्टार कैम्पेनर्स की लिस्ट से बाहर शीला के बेटे संदीप दीक्षित, कहा- ये वरिष्ठ नेताओं की करतूत

दिल्ली विधानसभा चुनाव के बीच एक बार फिर कॉन्ग्रेस नेताओं की आपसी लड़ाई सतह पर आती दिख रही है। महाराष्ट्र और हरियाणा के बाद अब दिल्ली विधानसभा चुनाव में भी कॉन्ग्रेस के नेताओं ने एक दूसरे पर आरोप लगाना शुरू कर दिया है। दिल्ली यूनिट के दिग्गज नेता और पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के बेटे संदीप दीक्षित ने बिना नाम लिए पार्टी के कुछ सीनियर नेताओं पर अपनी भड़ास निकाली।

दरअसल, दिल्ली में कॉन्ग्रेस के स्टार प्रचारकों में नाम नहीं होने पर संदीप दीक्षित ने कड़ी नाराजगी जताई है। बता दें कि कॉन्ग्रेस पार्टी अपने 40 स्टार प्रचारकों की लिस्ट जारी कर चुकी है। इस लिस्ट में पार्टी के दिग्गज नेता संदीप दीक्षित का नाम शामिल नहीं है। इस पर उन्होंने कॉन्ग्रेस के ऊपर तंज कसा है और कहा है कि वह पार्टी के बड़े नेता नहीं हैं।

संदीप दीक्षित ने कहा, “मैं कॉन्ग्रेस का स्टार प्रचारक नहीं हूँ। मैं दिल्ली के मुद्दों को बहुत करीबी से नहीं जानता हूँ। मैं पार्टी का बड़ा नेता नहीं हूँ।” आगे उन्होंने कहा, “अखिल भारतीय कॉन्ग्रेस कमेटी (AICC) से लेकर दिल्ली कॉन्ग्रेस को संभालने वालों से मेरा गहरा विवाद है। मैं सुभाष चोपड़ा के बारे में बात नहीं करता हूँ, इसलिए मुझे नहीं लगता कि मुझे वहाँ से फोन आएगा, लेकिन मैंने हमेशा कॉन्ग्रेस के लिए काम किया है और जरूरत पड़ने पर काम करता रहूँगा।” संदीप दीक्षित ने कहा कि उनकी माँ और दिल्‍ली की पूर्व मुख्‍यमंत्री शीला दीक्षित के पार्टी और दिल्‍ली को दिए गए योगदान को भुलाया नहीं जा सकता। दिल्‍ली और कॉन्ग्रेस के लिए शीला दीक्षित ने बहुत कुछ किया है।

बता दें कि दिल्ली में कॉन्ग्रेस की जीत सुनिश्चित करने के लिए गाँधी परिवार के तीनों दिग्गज सोनिया, राहुल और प्रियंका मैदान में उतरेंगे। वहीं दिल्ली कॉन्ग्रेस के नेताओं में सुभाष चोपड़ा, पीसी चाको, उदित राज, कीर्ति आजाद, अजय माकन को भी स्टार प्रचारकों की लिस्ट में शामिल किया गया है। पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह, मध्यप्रदेश के सीएम कमलनाथ, राजस्थान के सीएम अशोक गहलोत और छत्तीसगढ़ के सीएम भूपेश बघेल भी दिल्ली चुनाव के लिए प्रचार करेंगे। इसके अलावा पूर्व क्रिकेटर-सांसद और मौजूदा विधायक नवजोत सिंह सिद्धू समेत कई मशहूर नेता शामिल हैं।

उल्लेखनीय है कि कॉन्ग्रेस 70 सदस्यीय विधानसभा में 66 सीटों पर चुनाव लड़ेगी चार सीटें उसने सहयोगी राजद के लिए छोड़ी हैं। दिल्ली विधानसभा चुनावों के लिए 8 फरवरी को मतदान होना है। इसके लिए सभी पार्टियाँ जोर-शोर के साथ नामांकन के लिए जुट गई हैं। वहीं 11 फरवरी को नतीजे आने के बाद ये साफ हो जाएगा कि दिल्ली की सत्ता किस पार्टी के हाथ में जाने वाली है।   

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चेहरे पर नकाब, होंठों पर आजादी के नारे, जॉइंट फूँककर हवा में उड़ता है अपना ‘काम’रेड KK

कॉमरेड क्रांति काम नहीं करता था, उसके पास कागज़ नहीं थे सो मनरेगा से भी लाभ न ले सका। इस तरह से क्रांति कुमार सर्वहारा होने के साथ साथ गरीब सर्वहारा क्रांति कुमार भी था। क्रांति पुस्तैनी खेत बेचता, कच्ची पीता, अपनी स्वैण (बीवी) को पीटता, फिर भी क्रांति कुमार सर्वहारा ही रहा कभी अपने नाम के साथ बुजुर्वा न जोड़ सका। क्रांति इस तरह से व्यवस्थाओं से हर वक़्त खिसियाया ही रहता था। इस तरह क्रांति कुमार, उर्फ़ केके के अंदर हर वक़्त एक ‘एनार्किस्ट’ मौजूद था।

कोई कहता रे क्रांति! दिन भर छत पर पड़ा धूप सेंकते कान का मेल निकालता है, कच्ची पी-पीकर तो मर ही जाएगा, तो केके तुरंत फैज़ या ग़ालिब का कोई शेर पढ़कर अपनी पढ़ाई-लिखाई को जस्टिफाई करता। सामने वाला भी ये सोचकर चुप हो जाता कि उर्दू में कहा है तो ठीक ही कहा होगा। कोई उसकी बेवजह बीच में लाई हुई नज़्म पर सवाल करता भी, तो क्रांति कुमार फ़ौरन उसको अनपढ़ और ट्रोल कह देता। कॉमरेड केके दिनभर दैनिक सस्ते इंटरनेट से कुणाल कामरा जैसे सस्ते कॉमेडियंस के यूट्यूब वीडियो देखता था। संविधान उसने फेसबुक पर पढ़ा था और बोल्शेविकों की कहानियाँ व्हाट्सएप्प यूनिवर्सिटी पर।

क्रांति की कविताएँ पढ़-पढ़कर बोर हो चुके क्रांति ने एक दिन निर्णय ले लिया कि अब कोई ऐसा कदम उठाएगा जिससे एक झटके में क्रांति हो सके। हालाँकि क्रांति कुमार जनता था कि फैज़ और अल्ताफ राजा इतना कुछ लिखकर गए हैं कि अगर वो सालभर भी क्रांति की ही माँग करता रहे, तब भी उसके लिए क्रांति के नारे कम नहीं पड़ेंगे।

क्रांति ने फैसला लिया कि अब वापस दिल्ली जाकर किसी वामपंथी गुट का चेहरा बन जाएगा और सब कुछ फिर से शुरू करेगा। गाँव लौटकर नहीं आएगा और जिंदगी की सारी समस्याओं का समाधान हो जाएगा। क्रांति उर्फ़ केके ने अपने फैसले की शुरुआत बाकी के बचे हुए खेतों का सौदा करके की। उसने घर बेच दिया, खेत बेच दिया बोला दिल्ली जा रहा, वहाँ क्रांति हो रही। लेकिन क्रांति बैलों की जोड़ी का सौदा न कर पाया और दिल्ली निकल लिया।

दिल्ली जाकर केके ने पुराने यार को फोन लगाया। बोला- रियूनियन करनी है। साथी बोले- शाहीन बाग़ चले आओ यहाँ आजकल सब इकट्ठे हुए हैं। खाना-पीना सब मुफ्त है और मीडिया कवरेज भी ऐसा, जैसा आज तक नहीं मिला। शाहीनबाग पहुँचते ही केके ने जो देखा उसकी पतलून भीग गई। दो कॉमरेड्स महँगी सिगरेट को लेकर भिड़ गए। एक कॉमरेड ने हाथ में जूता लिया और दूसरे कॉमरेड की कनपट्टी पर रसीद दिए। इतने में देखते ही देखते दोनों गुट भिड़ गए। केके ने देखा अब मामला बहुत बदल गया है, उसकी उम्र में सिर्फ बीड़ी बाँटकर काम चल जाता था। केके ने फ़ौरन अपनी बीवी को फोन घुमाया। केके बोला- “अरे कम्बख्त सुन, तूने वो बैलों की जोड़ी बेची तो नहीं? उसे मत बेचना, मैं घर लौट रहा हूँ। फुन्डू फुक्क… कै की क्रान्ति, कै कू कुछ!!”

जब से क्रांति कुमार उर्फ़ केके दिल्ली के मशहूर ‘विष-विद्यालय’ से अपनी सदियों से चली आ रही पीएचडी पूरी कर गाँव लौटा था, तब से वो बुझा-बुझा सा रहने लगा था। गाँव में न गंगा ढाबा का सस्ता किन्तु लजीज खाना था, ना ही सस्ते हॉस्टल और ना ही ढपली बजाने के लिए किसी तरह की कोई सब्सिडी।

लेकिन CAA और NRC के बवाल ने तो मानों उसके डूबते क्रांति के करियर में फिर से जान ही फूँक दी। कुछ साल पहले ही जो क्रांति कुमार जंतर-मंतर पर “मैं भी अन्ना” की टोपी पहने खुद को “एनार्किस्ट” की संज्ञा देने लगा था, वो आजकल शाहीन बाग़ जाकर “सेव डेमोक्रेसी” के नारे लगता नजर आ रहा है।

जो कॉमरेड केके कभी भारत को एक देश मानने को राजी नहीं हुआ था, वो भी आजकल इस देश की मिटटी में किस-किस का खून शामिल है उसकी डीएनए रिपोर्ट दिखाता फिर रहा है। वो कह रहा है कि वो इस देश के साथ खिलवाड़ नहीं होने देंगे।

आज की क्रांति को देखकर सात-आठ साल पहले का जंतर-मंतर वाला ‘एनार्किस्ट क्रांति कुमार’ फूट-फूटकर जरूर रोता। कहाँ वो क्रांति कुमार, व्यवस्था और तिरंगा जिसके ठेंगे पर रहा करती थी, उसी क्रांति कुमार की जुबान पर आज व्यवस्थाओं का रोना है और हाथों में तिरंगा। आज उसकी जुबान केसरी है और मुँह में राष्ट्रगान।

मैं पूछता हूँ कि क्या हमें उस महान फासीवादी, मनुवादी सरकार को शुक्रिया कहना चाहिए या नहीं कहना चाहिए भाइयों-बहनों जिसने एक अराजकतावादी को भी संविधान का प्रहरी बनने के लिए प्रेरित कर दिया है? हर हाल में हमें उस सरकार को शुक्रिया कहना चाहिए। लेकिन सवाल ये है कि अगर वाकई में यह सरकार फासीवादी होती और इसका लीडर हिटलर होता तो क्या अब तक शाहीन बाग़ को पोलैंड ना बना दिया गया होता?क्या देश के ‘वोक लिबरल्स’ और उनके ‘जर्मन होलोकॉस्ट’ को लेकर देखे हर हसीन सपने को अब तक सपनों की दुनिया से उठाकर जमीन पर ना उतार दिया गया होता? लेकिन वह ऐसा नहीं कर रहा है, क्रांति कुमार इस बात से भी दुखी हैं।

क्रांति कुमार एक ‘सेडिस्ट’ भी है और ‘होपलेस रोमेंटिक’ भी। वह चाहता है कि किसी भी क्रांति की हर बुरी याद से वो ‘काश’ जुड़ा होता। यह ‘काश’ ही क्रांति कुमार की सबसे बेहतरीन रूमानी फंतासी भी है। कम से कम जिस तरह उसका यह ‘काश’ 2014 के चुनावों से ‘काश’ की ही अवस्था में है, उससे तो यही साबित होता है। उसने नारे लगाए, मनुवाद के खिलाफ, आजादी के खिलाफ, ब्राह्मणों के खिलाफ, और अब किसी कथित गैस चैंबर के खिलाफ भी वो नारेबाजी कर रहा है, लेकिन ‘शासक’ हैं कि यह सब वास्तविकता के धरातल पर उतरते ही नहीं।

महान सेक्युलर गायक अल्ताफ राजा इसी दिन के लिए एक सुंदर सी ‘नज़्म’ गा चुके थे- “दुश्मनी में दोस्ती का सिला रहने दिया, उसके सारे खत जलाए और पता रहने दिया….”

कबीरा इस संसार में भाँति-भाँति के कामरेड्स: कथा कामरेड क्रांति कुमार की

कमलेश तिवारी के वकील सुशील कुमार वाजपेयी को मिली जान से मारने की धमकी, FIR दर्ज

हिन्दू समाज पार्टी के अध्यक्ष रहे कमलेश तिवारी के वकील सुशील कुमार वाजपेयी को जान से मारने की धमकी मिली है। इस सन्दर्भ में उन्होंने वजीरगंज कोतवाली में FIR दर्ज कराई है।

नाका के मोती नगर इलाक़े में कमलेश तिवारी के वकील सुशील कुमार वाजपेयी अपने परिवार के साथ रहते हैं। फ़िलहाल, वो दिवंगत कमलेश कुमार की पत्नी किरण तिवारी की तरफ से इस मामले की पैरवी कर रहे हैं। 18 जनवरी को इस मामले की डेट लगी थी। इस दौरान सभी आरोपितों को ज़िला एवं सत्र न्यायालय प्रथम कोर्ट में पेश किया गया। सुनवाई के बाद सभी आरोपित बाहर निकल गए, तभी उनके कुछ जानने वाले वहाँ पहुँच गए। इनमें एक महिला भी शामिल थी।

ख़बर के अनुसार, वकील सुशील कुमार का कहना था कि उन लोगों ने उनकी तरफ़ देखते हुए कुछ इशारा किया, जैसे उनकी पहचान कराई जा रही हो। इस बीच, आरोपितों ने अपने परिचितों से बात करने के लिए मोबाइल फोन की माँग की। मोबाइल फोन न दिए जाने पर विरोध-स्वरूप आरोपित लोगों पर भड़क गए और धमकी देने लगे। विरोध के दौरान उन्होंने लोगों से कहा कि वो उन्हें भी देख लेंगे।

इसके बाद कमलेश तिवारी के वकील ने तुरंत पुलिस कंट्रोल रूम में फोन किया और मामले की जानकारी दी। मामले को गंभीरता से लेते हुए पुलिस ने तुरंत कार्रवाई की और घटना-स्थल पर पहुँच कर आरोपितों को लॉकअप में भेज दिया और फिर बाद में उन्हें वापस जेल भेजा गया। बता दें कि सुशील कुमार की सुरक्षा में पहले से ही एक गार्ड को तैनात किया जा चुका है।

इससे पहले, 15 नवंबर 2019 को नाका के खुर्शीदाबाद स्थित पार्टी दफ़्तर पर उर्दू में लिखा धमकीभरा पत्र उन्हें पहले भी मिल चुका है। इस पत्र में पार्टी के महासचिव समेत अन्य हस्तियों को भी कमलेश तिवारी की तरह मार देने की धमकी दी गई थी। इस मामले में कमलेश तिवारी की पत्नी किरण तिवारी ने एक व्यक्ति पर शक़ जताते हुए नाका कोतवाली में शिक़ायत दर्ज कराई थी।

ग़ौरतलब है कि लखनऊ के नाका के खुर्शीदबाग की तंग गलियों में रहने वाले हिंदू समाज पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष कमलेश तिवारी की 18 अक्टूबर को दो बदमाशों ने बेरहमी से हत्या कर दी थी। दोनों बदमाश मिठाई के डिब्बे में पिस्टल व चाकू छिपाकर कमलेश के घर की पहली मंजिल पर स्थित दफ्तर पहुँचे थे। आरोपितों ने पहले कमलेश की गर्दन पर गोली मारी। फिर चाकू से ताबड़तोड़ वार करने के बाद गला रेत दिया था। पुलिस ने मौके से एक पिस्टल व एक खोखा बरामद किया था।

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इस्लामोफोबिक है सचिन साहनी, उसके कारोबार का बहिष्कार करो: पूर्व पत्रकार इरेना अकबर

इंडियन एक्सप्रेस की पूर्व पत्रकार इरेना अकबर के ख़िलाफ़ लखनऊ पुलिस में शिकायत दर्ज की गई है। उन्होंने एक स्थानीय व्यापारी की आजीविका को बर्बाद करने की कोशिश करते हुए उसे “इस्लामोफ़ोबिक” के तौर पर पेश किया था।

इरेना अकबर ने गुरुवार (23 जनवरी) को हेल्थकेज़ जिम और ब्यूटी पार्लर के बहिष्कार की अपील करते हुए ट्वीट किया। इसमें उन्होंने आरोप लगाया कि इसके मालिक सचिन साहनी सोशल मीडिया पर ‘इस्लामोफोबिया’ फैला रहे हैं। हालाँकि, इरेना ने अब अपना ट्वीट डिलीट कर दिया है।

इरेना ने अपने ट्विटर थ्रेड में साहिनी के कथित इस्लामोफोबिक फेसबुक पोस्ट के स्क्रीनशॉट शेयर किए थे। इसमें उन्होंने दावा किया था कि साहनी ने उनका अपमान किया है जो नागरिकता संशोधन क़ानून का विरोध कर रहे हैं।
ख़बर के अनुसार, इरेना ने दावा किया कि हेल्थज़ोन के लगभग 50 प्रतिशत ग्राहक मुस्लिम हैं और ऐसा करके उन्होंने (साहनी) अपनी कमाई को बहुत नुक़सान पहुँचाया है।

ट्विटर पर कई यूजर्स ने इरेना के पोस्ट को देखकर उस पर कड़ी प्रतिक्रिया दर्ज की। उन्होंने साहनी के पोस्ट पर अपना तर्क देते हुए लिखा कि उनके सोशल मीडिया पोस्ट्स में तथाकथित इस्लामोफोबिया को उजागर नहीं किया गया है।

कई यूज़र्स ने हेल्थज़ोन और इसके मालिक सचिन साहनी के साथ अपनी एकजुटता दिखाई और लोगों से इसकी सदस्यता के लिए साइनअप करने की अपील की और माँग की कि यूपी पुलिस इरेना अकबर के ख़िलाफ़ हिंसा भड़काने के प्रयास के तहत कार्रवाई करे।

Legal Rights Observatory (LRO) ने अपने ट्विटर हैंडल से जानकारी शेयर की कि इरेना अकबर के ख़िलाफ़ लखनऊ में शिक़ायत दर्ज करने की माँग की गई है। अपनी शिक़ायत में LRO ने यूपी पुलिस से अपील की कि वह इरेना पर भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा-153A, 295 और 295A के तहत मामला दर्ज करे।

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शरिया कानून पर टिप्पणी सुन भड़के कट्टरपंथी, मधुर सिंह को दी कमलेश तिवारी की तरह मारने की धमकी

नागरिकता संशोधन कानून आने के बाद देश में कई तथाकथित सेकुलरों और इस्लामिक कट्टरपंथियों का चेहरा उजागर हुआ। हिंदुओं के साथ हमेशा भाईचारे का दावा करने वाले खुलकर हिंदुत्व का विरोध करने लगे। सोशल मीडिया पर शांत लोगों को भी भड़काया जाने लगा। सीएए का समर्थन करने वालों लोगों को या तो भक्त या फिर हिंदू आतंकी करार दे दिया गया। इसी बीच पोस्टर्स के जरिए अक्सर देश से जुड़े राजनैतिक और सामाजिक मुद्दों पर बोलने वाले प्लेकार्ड ब्वॉय मधुर सिंह को कमलेश तिवारी की तरह जान से मारने की धमकी मिली। इस धमकी की वजह अभी हाल ही में उनके द्वारा शरिया पर की गई एक टिप्पणी है।

दरअसल, दो दिन पहले सोशल मीडिया पर मधुर ने सीएए के विरोधी में बोल रही एक मुस्लिम लड़की का वीडियो शेयर किया था। जिसमें वे ट्रिपल तलाक जैसी चीजों का हवाला देकर एनडीए सरकार पर इल्जाम लगा रही थी कि सरकार उनके इस्लामी कानून में दखलअंदाजी करने का प्रयास कर रही है लेकिन मुस्लिम इस्लामी कानून के हिसाब से ही रहते हैं।

लड़की का यह वीडियो शेयर करते हुए मधुर ने इस पर अपनी राय दे दी। उन्होंने लिखा कि यही कारण है कि आखिर क्यों ये लोग डरे हुए है और इतना हंगामा कर रहे हैं। ये जानते हैं कि मोदी यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू करने वाला है। जिससे, देश में शरिया लागू करने के इनके मंसूबों पर पानी फिर जाएगा।

अब हालाँकि, अगर बात देश में अभिव्यक्ति की आजादी की है, तो मधुर की राय से किसी को कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। लेकिन कट्टरपंथी फौरन ये टिप्पणी और शरिया शब्द देखकर मधुर को गाली देने लगे। इमाद नाम के शख्स ने उन्हें पर्सनल मैसेज किया कि अगर मुस्लिम शरिया लॉ फॉलो करते हैं, तो इसमें मधुर को क्या दिक्कत है। इतना बोलने के बाद ये मुस्लिम युवक मधुर को गाली देता है और धमकी देता है। इमाद लिखता है, “और वैसे तुम अपनी जान की परवाह करो, मुझे आशा है तुम्हें कमलेश तिवारी की तरह गला काटने की धमकियाँ न मिलती हों।”

इस धमकी के बाद मधुर ने ये स्क्रीनशॉट सोशल मीडिया पर शेयर किया और बाकी कट्टरपंथियों की प्रतिक्रिया भी देखने लगे। इसी बीच फरदीन नाम का मुस्लिम युवक मधुर को मैसेज में गाली-गलौच करने लगा और साथ ही उनके घर की महिलाओं पर भी आपत्तिजनक शब्दों का इस्तेमाल किया।

ऑपइंडिया से बातचीत में मधुर ने बताया कि उन्हें सोशल मीडिया पर बहुत सी धमकियाँ मिल रही हैं। उन्होंने अपने सोशल मीडिया अकॉउंट पर कुछ फीचर्स पर प्राइवेसी लगा रही ताकि उनकी स्टोरी या पोस्ट पर ऐसा कमेंट न आए। उन्हें लगता है कि कमलेश तिवारी वाली धमकी के बाद उन्होंने जो स्क्रीनशॉट शेयर किया उससे इमाद के दोस्त उन्हें धमका रहे हैं या उन्हें ये भी आशंका है कि वो इमाद के ही फेक अकॉउंट हों। बता दें इमाद ने शायद अपना अकॉउंट डिएक्टिवेट कर दिया है।

मधुर के मुताबिक उनके इंस्टाग्राम पर ज्यादा फॉलोवर नहीं थे। लेकिन जब से उन्होंने सोशल मीडिया पर सीएए के समर्थन में पोस्ट करना शुरू किया उनके फॉलोवर अचानक से बढ़ गए और फिर जब से फॉलोवर बढ़े उन्हें उनके राजनैतिक विचारों के लिए जान से मारने की धमकियाँ दी जानें लगीं। मधुर ने बातचीत में यह भी बताया कि वे इस मामले पर एफआईआर दर्ज कराने की सोच रहे हैं।

मधुर के अनुसार ट्विटर पर तो उन्हें 12 जनवरी से ही लॉक किया हुआ है। वे वहाँ किसी तरह का ट्वीट नहीं कर सकते। ऐसा इसलिए, क्योंकि बहुत सारे लोगों ने पिछले साल के ट्वीट्स की रिपोर्ट की थी। उनके मुताबिक पुलवामा हमले के बाद उन्होंने एक क्लिन द नेशन के नाम से एक शुरुआत की थी। जिसमें उन्होंने ईमेल अड्रेस मेंशन किया और लोगों ने उसे निजता का हनन बताकर रिपोर्ट कर दिया। हालाँकि उन्होंने आवाज उठाई, लेकिन कुछ भी फर्क़ नहीं पड़ा।

मधुर सिंह के बारे में बता दें वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के समर्थक हैं और उन्हें दोबारा चुनावों में लाने के लिए प्लेकार्ड कैंपेन की शुरुआत की। इस कैंपेन के दौरान पुरानी दिल्ली में मुस्लिम लोगों की भीड़ ने उन्हें एक बार घेर भी लिया था और साथ ही धमकी दी थी कि एक बार कॉन्ग्रेस को सत्ता में आ जाने दो, हम तुमको सबक सिखाएँगे।

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राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार पाने वाले 49 बच्चों से पीएम मोदी ने की मुलाक़ात, कहा- आपके साहसी कार्यों से प्रेरणा मिलती है

गणतंत्र दिवस से पूर्व राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार पाने वाले देश के 49 बच्चों से शुक्रवार को पीएम मोदी ने मुलाक़ात की। इस दौरान प्रधानमत्री मोदी ने कहा कि आप लाखों करोड़ों बच्चों के लिए प्रेरणादायी हैं, लेकिन नेशनल अवार्ड हासिल कर लेना और फ़िर फ़ोटो खिंचाना ही सब कुछ नहीं हो सकता। इससे भी आगे ज़िंदगी बहुत लंबी है।

शुक्रवार दोपहर को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बाल पुरस्कार पाने वाले सभी 49 बच्चों से दिल्ली में मुलाक़ात की। पीएम मोदी ने इस दौरान कहा कि आप सभी बच्चे दूसरे बच्चों के लिए प्रेरणा हैं। मोदी ने कहा, “हमारे देश में बच्चे जो अच्छे काम करते हैं, उन अच्छे कामों की तरंगे नीचे तक जाती हैं। सिर्फ नेशनल अवॉर्ड मिलना और फोटो छपना ही सब कुछ नहीं है। ज़िंदगी बहुत बड़ी है। इसलिए असल में जमीन पर पैर रखना ही सब कुछ है।”

पीएम मोदी ने संबोधन की शुरुआत करते ही अपनी भावनाओं को व्यक्त किया और कहा कि, थोड़ी देर पहले आप सभी का जब परिचय जब हो रहा था, तो मैं सच आपके बारे में जानकर हैरान था। इतनी कम आयु में जिस प्रकार आप सभी ने अलग-अलग क्षेत्रों में जो प्रयास और जो काम किया हैं, उसको करना तो दूर सोचने में भी लोगों के पसीने छूट जाते हैं। उन्होंने आगे कहा कि वो सभी की वीरता की कहानी को दुनियाँ को बताएँगे और सोशल मीडिया पर आपकी तस्वीरें भी साझा करेंगे, क्योंकि बच्चों के साहसी कार्यों को देखकर मुझे भी प्रेरणा मिलती है।

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पीएम नरेन्द्र मोदी ने इस दौरान मौजूद बच्चों को उनकी जिम्मदोरी का अहसास कराते हुए कहा कि आज देश की आज़ादी को पूरे 75 साल होने को हैं और हम आज भी अपने कर्तव्यों को भूलकर अपने अधिकारों की बात अधिक करते हैं। मैं चाहता हूँ कि आप अपने अंदर दूसरी तरह की आदतों को न आने दें और अधिकारों से अधिक अपने कर्तव्यों की ओर ध्यान दें।

आपको बता दें कि राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार 2019 की घोषणा 21 जनवरी की शाम को हुई थी। इसके लिए 12 राज्यों के 22 बच्चों का चयन किया गया था। इनमें 12 लड़के और 10 लड़कियाँ शामिल हैं। एक बच्चे को मरणोपरांत यह पुरस्कार दिया जाएगा। वहीं केरल के 15 वर्षीय आदित्य कुमार को परिषद की ओर से भारत अवॉर्ड दिया जाएगा। दरअसल आदित्य ने बस में सफर के दौरान 40 लोगों की जान बचाई थी। इन सभी बच्चों को गणतंत्र दिवस के अवसर पर सम्मानित किया जाएगा।