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जिसे कॉन्ग्रेसी CM ने भी माना था माओवादी, उस अखिल गोगोई के मेधा पाटेकर से क़रीबी संबंध

ख़ुद को असम के किसानों के नेता बताने वाले अखिल गोगोई को एनआईए की विशेष अदालत ने गुवाहाटी में 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में भेज दिया। इससे पहले दिसंबर 17 को उसे 10 दिनों के लिए पुलिस कस्टडी में भेजा गया था। सीएए के विरोध की आड़ में हिंसा करने वाले गोगोई को यूएपीए (ग़ैर-क़ानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम) के तहत गिरफ़्तार किया गया है। उसके ख़िलाफ़ आईपीसी व यूएपीए की जिन धाराओं में मुक़दमा दर्ज किया गया है, उसपर एक नज़र आप भी डाल लीजिए:

  • धारा 120 बी (आपराधिक षड्यंत्र रचना)
  • धारा 124 ए (देशद्रोह का अपराध)
  • धारा 153 ए (धर्म, नस्ल, भाषा इत्यादि के आधार पर लोगों में नफ़रत फैलाना)
  • धारा 153 बी (राष्ट्रीय अखंडता पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाला कार्य करना)
  • यूएपीए धारा 18 (आतंकी या उसके सदृश घटना की साज़िश रचना), और
  • यूएपीए धारा 39 (आतंकी गतिविधियों के लिए बैठक करना, समर्थन जुटाना)

इन धाराओं को देखने के बाद आप समझ गए होंगे कि मामला कितना गंभीर है और अखिल गोगोई पर देशद्रोह व आतंकी साज़िश के आरोप लगे हैं। उसे दिसंबर 12 को असम पुलिस ने गिरफ़्तार कर के एनआईए को सौंप दिया था। उसके संगठन का नाम है- किसान मुक्ति संग्राम समिति (KMSS), जो ख़ुद को किसानों के लिए लड़ने वाला संगठन बताता है। एनआईए ने उसके घर पर छापा मारा, जहाँ से कई आपत्तिजनक डाक्यूमेंट्स व पुस्तकें बरामद हुईं। उसके पर्सनल लैपटॉप को भी जाँच एजेंसी ने अपने कब्जे में ले लिया है। उसे लेकर अभी और खुलासे हो सकते हैं।

अब आते हैं उसे मिल रहे अर्बन नक्सलियों के समर्थन पर। अगर पूर्व के इतिहास को देखें तो पता चलता है कि ‘नर्मदा बचाओ आंदोलन’ की नेता और ख़ुद को सामाजिक कार्यकर्ता बताने वाली मेधा पाटेकर के साथ गोगोई के क़रीबी सम्बन्ध हैं। मेधा पाटेकर भी आजकल सीएए विरोधी उपद्रव में लगी हुई हैं। उन्होंने जामिया के छात्रों के साथ भी विरोध प्रदर्शन किया। कुछ दिनों पहले उन्हें पाकिस्तानी हिन्दू शरणार्थियों ने खदेड़ दिया था। मेधा पाटेकर की बात करने से पहले ये जानना ज़रूरी है कि आख़िर ये केएमएसएस है क्या और ये अखिल गोगोई है कौन?

42 वर्षीय अखिल गोगोई ने 2005 में केएमएसएस की स्थापना की थी। वह पहले आरटीआई एक्टिविस्ट के रूप में काम करता रहा है। उसे पब्लिक कॉज रिसर्च फाउंडेशन (PCRP) ने नेशनल आरटीआई अवॉर्ड ने नवाजा था। पीसीआरपी किसका संगठन था? इसकी स्थापना 2006 में अरविन्द केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और अभिनन्दन शेखरी ने मिल कर की थी। केजरीवाल आज दिल्ली के मुख्यमंत्री हैं और सिसोदिया उनके डिप्टी। वहीं अभिनन्दन शेखरी न्यूज़लॉन्ड्री नामक प्रोपेगंडा पोर्टल के संपादक हैं। पीसीआरएफ भी एक संदिग्ध संस्था थी, जिसपर इनकम टैक्स के कई मामले चल रहे थे। प्रशांत भूषण भी इसके ट्रस्टी थे।

जनवरी 2011 में अखिल गोगोई ने आरोप लगाया था कि तत्कालीन मुख्यमंत्री तरुण गोगोई ने लंदन में संपत्ति ख़रीदी है। उसने कुछ फोटो भी शेयर किए थे। लेकिन, वो सारे फोटो कैम्ब्रिज के एमआईटी के निकले, जहाँ गोगोई के बेटे पढ़ाई के लिए गए हुए थे। आज भाजपा का विरोध कर रहा अखिल कभी कॉन्ग्रेस को वोट न देने की अपील करता था। असम और अरुणाचल प्रदेश में बाँध प्रोजेक्ट्स को बंद कराने के लिए अखिल गोगोई ने लोगों को जम कर भड़काया था। उसके कारण नेशनल हाइड्रोइलेक्ट्रिक पॉवर कारपोरेशन (NHPC) के कई डैम प्रोजेक्ट्स में रुकावट आई थी।

असली खेल जुलाई 2010 में तब शुरू हुआ, जब मेधा पाटेकर गुवाहाटी पहुँचीं और उन्होंने अखिल गोगोई के साथ मिल कर पूरे शहर को एक तरह से दिन भर बंधक बनाए रखा। बाँध प्रोजेक्ट्स के विरोध के नाम पर पाटेकर और गोगोई ने हज़ारों लोगों के साथ डीसी के दफ्तर तक मार्च किया और हज़ारों लोगों के साथ विरोध प्रदर्शन किया था। ये विरोध प्रदर्शन भी केएमएसएस के बैनर तले ही किया गया था। उपद्रवियों ने डीसी दफ्तर की और चप्पल भी फेंके थे। उस रैली में मेधा पाटेकर ने चेतावनी दी थी कि उनकी माँगें नहीं माने जाने पर पूरे राज्य में बड़े पैमाने पर विद्रोह होगा।

फ़रवरी 2012 में भी मेधा पाटेकर ने असम पहुँच कर अखिल गोगोई का समर्थन किया था। समय-समय पर अखिल और केएमएसएस के आन्दोलनों को राष्ट्रीय पहचान देने के लिए मेधा पाटेकर की उपस्थिति का सहारा लिया जाता रहा है। यहाँ आप उन तस्वीरों को देख सकते हैं, जिसमें मेधा पाटेकर और अखिल गोगोई साथ में रैलियों को सम्बोधित करते दिख रहे हैं। इस संगठन व अखिल के बारे में वरिष्ठ कॉन्ग्रेस नेता और 15 सालों तक असम के मुख्यमंत्री रहे तरुण गोगोई ने कहा था:

“किसान मुक्ति संग्राम समिति के आंदोलन के पीछे माओवादियों का हाथ है। राज्य के भूमिहीनों को बरगला कर माओवादी अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं। ओडिशा में माओवादियों के केएमएसएस के कार्यकर्ताओं को ट्रेनिंग दी है। ऐसे दो कार्यकर्ताओं को हमनें गिरफ़्तार किया है। मेरे पास इस बात के सबूत हैं कि अखिल गोगोई का माओवादियों से डायरेक्ट लिंक है। केएमएसएस ऐसे 2संगठनों के साथ मिल कर भी काम कर रहा है, जो असम को भारत से अलग करने की माँग करते हैं और प्रतिबंधित हैं। हिंसा पर उतारू केएमएसएस से कोई बातचीत नहीं होगी।”

गोगोई ने ये बयान जून 2011 में दिया था। तब केएमएसएस ने राज्य भर में हिंसा की थी। इसके बाद अखिल गोगोई को गिरफ़्तार कर के जुडिशल कस्टडी में भेज दिया गया था। अखिल गोगोई अनशन पर भी बैठा था और तब अन्ना हज़ारे के संरक्षण में चलने वाले ‘इंडिया अगेंस्ट करप्शन’ ने उसके आंदोलन को पूर्ण समर्थन दिया था। जहाँ तक मेधा पाटेकर की बात है, वो जनवरी 2013 में भी गुवाहाटी पहुँची थीं, जहाँ उन्होंने न सिर्फ़ विरोध प्रदर्शन किया था बल्कि अखिल के समर्थन में रैली भी की थी। उन्होंने लोगों को भड़काते हुए कहा था कि अरुणाचल प्रदेश में बनने वाले 168 बाँधों से ग़रीबों को कुछ नहीं मिलेगा, ये सब अमीरों के लिए है। उन्होंने तत्कालीन सीएम तरुण गोगोई पर हज़ारों करोड़ के भ्रष्टाचार के आरोप लगाए थे।

अब सवाल ये उठता है कि क्या केएमएसएस एक माओवादी संगठन है? एक बार विरोध प्रदर्शन के दौरान एक गर्भवती महिला के एम्बुलेंस को घेर लिया गया और ड्राइवर की पिटाई की गई। ये करतूत केएमएसएस के कार्यकर्ताओं की ही थी। गर्भवती महिला पर भद्दे कमेंट्स किए गए और एम्बुलेंस के शीशे को तोड़ डाला गया। ऐसा तब हुआ था, जब फ़रवरी 2012 में संगठन ने गोगामुख-ठेकेरागुरी मार्ग को अपने कब्जे में ले रखा था। पुलिस को रोकने के लिए जगह-जगह पेड़ काट कर गिरा दिए गए, टायर में आग लगा दिया गया और ट्रकों को रोड पर खड़ा कर दिया गया था।

यहाँ तक कि पुलिस पर जम कर पत्थरबाजी भी की गई थी। तरुण गगोई यूँ ही नहीं बार-बार कहते रहे हैं कि अखिल गोगोई एक माओवादी है। जनवरी 2011 में एक केएमएसएस कार्यकर्ता ने कोर्ट में स्वीकार किया था कि उसे ट्रेनिंग के लिए ओडिशा के माओवादियों के पास भेजा गया था। ‘इंडिया टुडे’ से बातचीत के दौरान भी उसने इस बात को कबूल किया था। इसके अलावा मई 2011 की एक रैली में माओवादी शरत साइका की उपस्थिति भी चर्चा का विषय बनी थी। उस रैली को अन्ना हज़ारे और स्वामी अग्निवेश ने भी सम्बोधित किया था। साइका ओडिशा में हथियारों का प्रशिक्षण ले चुका था।

अखिल गोगोई के ख़िलाफ़ ऑन ड्यूटी पुलिस अधिकारी पर हमला करने को लेकर एफआईआर भी दर्ज किया गया था लेकिन कॉन्ग्रेस सरकार के दौरान उसपर कोई कार्रवाई नहीं की गई। उसके संगठन का एक व्यक्ति इसी आरोप में गिरफ़्तार हुआ था लेकिन अगले ही दिन उसे विवादस्पद परिस्थितियों में रिहा कर दिया गया। एक पुलिस अधिकारी ने स्वीकार किया था कि सरकार अखिल को छूना भी नहीं चाहती है क्योंकि वो राज्य में ‘वन मैन अपोजिशन’ के रूप में काम कर रहा था और सरकार को डर था कि उस पर कार्रवाई करने से ‘बदले की भावना’ का आरोप लगेगा।

दिसंबर 2016 को मेधा पाटेकर ने अखिल के समर्थन में इस पोस्ट को शेयर किया था

ऐसा भी प्रतीत होता है कि पूर्व मुख्यमंत्री तरुण गोगोई केएमएसएस और अखिल पर कार्रवाई करना चाहते थे लेकिन मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और अर्बन-नक्सल के नेक्सस के कारण ऐसी जहमत नहीं उठाई। फरवरी 2014 में दिए एक बयान में उन्होंने ह्यूमन राइट्स एक्टिविस्ट्स का डर जताया था। उन्होंने कहा था कि कार्रवाई के लिए सबूत जुटाना होता है। यह सवाल भी उठता है कि के कॉन्ग्रेस आलाकमान अर्बन-नक्सलियों पर कार्रवाई नहीं चाहती थी? गोगोई लगातार माँग करते रहे कि असम के जिलों को माओवादी प्रभाव वला घोषित किया जाए लेकिन उनकी अपनी ही सरकार ने ऐसा क्यों नहीं किया?

तरुण गोगोई ने 2014 में केंद्र से माँग की थी कि असम के 9 जिलों को नक्सल प्रभावित घोषित किया जाए। वो कहते रहे, किसी ने ध्यान नहीं दिया। उन्होंने बताया था कि इसके 5 वर्ष पूर्व जब उन्होंने असम में माओवादी धमक की बात की थी, तब किसी ने उन पर विश्वास नहीं किया था। मुख्यमंत्री बार-बार आरोप लगाते रहे कि केएमएसएस और माओवादी मिल कर भारतीय लोकतंत्र की जड़ों को खोदना चाहते हैं लेकिन कार्रवाई नहीं की गई। क्यों? अब देखना है कि एनआईए की ताज़ा कार्रवाई के बाद क्या निकला कर आता है।

ऑपइंडिया टॉप 10: वो नेगेटिव चेहरे जिन्होंने 2019 में केवल ग़लत वजहों से बनाई सुर्खियाँ

वर्ष 2019 कई कारणों से सुर्ख़ियों में रहा और कई लोग अच्छे व बुरे कारणों से सुर्ख़ियों में रहे। जहाँ अच्छे कारणों से चर्चा बटोरने वाले लोगों की चर्चा हो ही रही है, हमें उन लोगों को भी याद करने की आवश्यकता है, जो बुरे कारणों से मीडिया में बने रहे। नकारात्मकता फैलाने वाले लोगों और उनकी करतूतों को याद किए बिना हम सबक नहीं ले सकते। ऑपइंडिया ने उन 10 लोगों की सूची जारी की है, जो वर्ष 2019 में ग़लतबयानी और अन्य ग़लत वजहों से सुर्ख़ियों में रहे। हो सकता है कि इनमें से कई की करतूतों को आप भूल गए हों, लेकिन हम उन्हें फिर से याद दिला रहे हैं।

10. नवजोत सिंह सिद्धू: बोलते-बोलते बोलती हो गई बंद

नवजोत सिंह सिद्धू। अर्थात, कॉन्ग्रेस के सिद्धू। वो पाकिस्तान के प्रधानमंत्री के भी फेवरिट हैं, जिन्होंने करतारपुर कोरिडोर के उद्घाटन के दौरान उन्हें ‘हमारा सिद्धू’ कह कर सम्बोधित किया था। सिद्धू पाकिस्तान को इतना चाहने लगे कि उन्होंने कह दिया कि परमिशन न मिलने पर वो वाघा बॉर्डर से ही पाक निकल जाएँगे। उनकी पत्नी को कॉन्ग्रेस ने किनारे कर दिया, जिसके बाद उन्होंने कॉन्ग्रेस से इस्तीफा दे दिया। पंजाब के सीएम अमरिंदर सिंह से उनकी लगातार लड़ाई होती रही। कैप्टेन से कलह के कारण सिद्धू ने मंत्री पद से भी इस्तीफा दे दिया। ‘द कपिल शर्मा शो’ से भी उन्हें हटना पड़ा।

वैष्णो देवी में एकांतवास में लीन होने चले गए थे नवजोत सिद्धू

ख़बर आई कि सिद्धू के स्पाइनल कॉर्ड में समस्या आ गई है, जिसके बाद डॉक्टर ने उन्हें कम बोलने की सलाह दी हैं। उसके बाद ख़बर आई कि वो वैष्णो देवी मंदिर में एकांतवास काट रहे हैं। राहुल गाँधी को तोप और ख़ुद को एके-47 बताने वाले सिद्धू ने अमेठी से राहुल के हारने पर राजनीति छोड़ने की बात कही थी। अमेठी से राहुल की बुरी हार हुई। कॉन्ग्रेस में साइडलाइन किए गए सिद्धू हमारी सूची में इस साल नकारात्मकता फैलाने वाले लोगों में शामिल हैं।

9. स्वरा भास्कर, शेहला रशीद: Twitter के वामपंथियों की पूज्य देवियाँ

स्वरा भास्कर की 2018 में एक ही फ़िल्म आई ‘वीरे दी वेडिंग’ और उसमें भी उन्हें बड़ा रोल नहीं मिला। स्वरा की कई साड़ियाँ बेकार हो गईं, कई ब्लाउज बेकार हो गए, जो उन्होंने आम चुनाव के दौरान मोदीविरोधियों के कैम्पेनिंग के लिए खरीदी थीं। वो जहाँ-जहाँ गईं, उनके समर्थन वाले उम्मीदवारों की हार हुई। जामिया हिंसा के दौरान उन्होंने दिल्ली पुलिस की आलोचना की। सीएए क़ानून बनने के बाद उन्होंने भारत को ‘हिन्दू पाकिस्तान’ बताया। एक 4 साल के बच्चे को ‘चु*#या’ कहने वाली स्वरा मोदी की जीत के लिए हिन्दुओं को जिम्मेदार ठहराते हुए कहा कि भारत का भविष्य हिंसा और नफरत है।

स्वरा और शेहला जैसी वामपंथनियों के लिए ये साल मायूसी भरा रहा लेकिन उन्होंने नकारात्मकता फैलानी नहीं छोड़ी

वहीं शेहला रशीद जम्मू कश्मीर में शाह फैसल के साथ जुड़ कर राजनीति की शुरुआत करना चाहती थीं लेकिन फैसल भारत से भागते हुए पकड़े गए और जम्मू कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश बन गया। शेहला की उम्मीदें धूमिल हो गईं। लोकतंत्र की दुहाई देकर राजनीति छोड़ने वाली शेहला ने पीएम मोदी को चुनौती दी थी कि अनुच्छेद 370 हटा कर दिखाएँ और राम मंदिर बना कर दिखाएँ। उनकी दोनों चुनौतियाँ कबूल हो गईं। केंद्रीय मंत्री बाबुल सुप्री के साथ धक्का-मुक्की करने वाले जाधवपुर यूनिवर्सिटी के छात्रों का भी शेहला ने समर्थन किया। सेना पर झूठे आरोप लगाने के लिए उन पर देशद्रोह का भी मुक़दमा दर्ज हुआ।

8. गीतकार से ट्रोल बने जावेद अख्तर: बीवी और बेटे भी उसी राह पर

अख्तर परिवार बॉलीवुड में एकसूत्री कार्यक्रम पर निकल आया है- झूठी ख़बरें फैलाना और लोगों से लड़ाई-झगडे करना। जावेद अख्तर ने जामिया हिंसा मामले में ट्विटर पर क़ानूनी ज्ञान बघारा तो एक पुलिस अधिकारी ने उन्हें खरी-खरी सुनाई। उन्होंने साध्वी प्रज्ञा की तुलना रावण से कर दी। बुर्के की तुलना घूँघट कर के उन्होंने इस्लामिक कुरीति का बचाव किया। उनकी दूसरी बीवी शबाना आजमी भी पीछे नहीं रहीं। उन्होंने भगवान गणेश की मूर्ति बनाने वालों की ‘ग़रीबी’ का जिक्र किया। गिरिराज सिंह को हराने के लिए उन्होंने बेगूसराय में कन्हैया कुमार के लिए चुनाव प्रचार किया।

अख़्तर परिवार ने फेक न्यूज़ फैलाने से लेकर सोशल मीडिया में लोगों से लड़ने तक, सब कुछ किया

जावेद के बेटे फरहान अख़्तर ने सीएए को लेकर भारत का ग़लत नक्शा शेयर किया और दावा किया कि महिलाओं व आदिवासियों को देश से बाहर निकाल दिया जाएगा। करणी सेना को आतंकी बताने वाले फरहान ने बीएचयू के छात्रों को कलंक बता दिया। साध्वी प्रज्ञा को हराने के लिए फरहान ने चुनाव के बाद अपील करते हुए लिखा कि उन्हें वोट न दें। उनका ख़ूब मजाक बना। कुल मिला कर ये तिकड़ी किसी भी सकारात्मक चीज के लिए इस साल ख़बर में नहीं रही।

7. ममता बनर्जी: मोदी विरोध में ‘दीदी’ की दादागिरी

पश्चिम बंगाल में सीबीआई और पुलिस के बीच झड़प हुई। अपने क़रीबी पुलिस कमिश्नर को बचाने के लिए ममता ने सरकारी एजेंसी के कामकाज में व्यवधान डाला और धरना भी दिया। सीबीआई अधिकारियों को ही गिरफ़्तार कर लिया गया। लोकसभा चुनाव से पहले कोलकाता में एक बड़ी रैली कर ममता ने विपक्षी एकता का शक्ति-प्रदर्शन किया लेकिन बंगाल में भाजपा ने दस्तक दी और उनकी सीटें घट गईं। राज्यपाल जगदीप धनखड़ के साथ उनका अभी भी झगड़ा चल रहा है। सीएए लागू होने के बाद मुस्लिमों की भीड़ ने क़ानून-व्यवस्था चौपट कर हिन्दुओं के घरों को जला डाला पर ‘दीदी’ ने एक्शन नहीं लिया।

ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल में असली ‘तानाशाही’ का नमूना दिखाया

पश्चिम बंगाल में भूख हड़ताल पर बैठे शिक्षकों पर रात में ही लाठियाँ बरसाई गईं। केंद्र सरकार ने तीन तलाक़ को खत्म करने का ऐतिहासिक निर्णय लिया लेकिन ममता बनर्जी की सरकार ने इसे इस्लाम पर हमला बताया। उनके भतीजे अभिषेक भी फ़र्ज़ी डिग्री विवाद के कारण सुर्ख़ियों में रहे। राज्य में डॉक्टरों की हड़ताल हुई और ममता पर तानाशाही का आरोप लगा। उनकी फोटोशॉप तस्वीर शेयर करने पर एक महिला को जेल तक हो गई। ममता ने पीएम मोदी को थप्पड़ मारने की बात कही। सुरक्षा बलों तक को भी उन्होंने धमकी दी। कुल मिला कर वह एक बार भी अच्छे कारणों से चर्चा में नहीं रहीं।

6. एचडी कुमारस्वामी: रोते-रोते गँवा दी सरकार, एक्सपेरिमेंट फेल

भाजपा को सत्ता में आने से रोकने के लिए एचडी कुमारस्वामी कॉन्ग्रेस के समर्थन से मुख्यमंत्री बने थे। इस साल उनकी सरकार चली गई। लेकिन, कुमारस्वामी ने सत्ता में रहते कोई ऐसा मौक़ा नहीं छोड़ा, जब उन्हें रोने का मौक़ा मिला हो। उनकी सरकार के दौरान हुई फोन टैपिंग का मामला अभी भी ख़बरों में है। अगस्त में उन्होंने बयान दिया कि वो ‘ग़लती से’ मुख्यमंत्री बन गए थे और वो राजीनीति से संन्यास लेना चाहते हैं। मुख्यमंत्री रहते जब लोग उनके पास समस्याएँ लेकर आएँ तो उन्होंने लोगों को फटकारते हुए मोदी के पास जाने की सलाह दी। सरकारी बस से यात्रा करने और चटाई पर सोने के बावजूद उनके ‘विलेज स्टे’ में करोड़ों ख़र्च हुए।

एचडी कुमारस्वामी अपने आँखों में आँसू लेकर ही घूमते रहे

उनके राज में स्थिति ये रही कि देवगौड़ा परिवार के बारे में लिखने पर पत्रकारों पर पुलिसिया कार्रवाई की गई। उन्होंने अपने एक बयान में वंशवादी राजनीति को देश के विकास के लिए सही ठहराया। सेना का अपमान करते हुए उन्होंने कहा कि जिनके पास खाने के लिए नहीं होता है, वो भी सेना में चले जाते हैं। पीएम मोदी और अपने चेहरे की तुलना को लेकर भी उन्होंने अजीबोगरीब बयान दिए। जब वो मुख्यमंत्री थे, तब कहते थे कि वो कॉन्ग्रेस के दबाव में क्लर्क बन गए हैं। रोते-रोते उनका ये साल भी बीत गया।

5. बेहाल बिहार में विकल्पहीनता के दो चेहरे: एक छत पर, दूसरा Twitter पर

पटना में जलजमाव का आलम ऐसा रहा कि उप-मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी तक को रेस्क्यू करने के लिए एसडीआरएफ की टीम को जाना पड़ा। नीतीश कुमार छत पर छाता लेकर मंद-मंद मुस्कुराते हुए बारिश का आलम देखते रहे। जब पजामा ऊँचा कर निरीक्षण के लिए निकले, तब पूछ डाला कि क्या अमेरिका और मुंबई में बाढ़ नहीं आता? कभी आँगनबाड़ी सेविकाएँ, कभी शिक्षक, कभी छात्र तो कभी विपक्षी कार्यकर्ता- पटना की सड़कों पर पुलिस के डंडों का शिकार कौन नहीं बना? उधर सुशील मोदी ट्विटर पर अख़बारों की कतरन शेयर कर के अपने ऑपरेशन का हालचाल देते रहे। राबड़ी को बिहार का नेहरू बनाते रहे।

बिहार में विचित्र स्थिति है: ‘सुमो’ के साथ बैठे नीतीश शायद ऐसा ही कुछ कह रहे हैं

राजगीर में बलात्कार की घटना हुई। राज्य के कई अन्य हिस्सों में भी अपराध की घटनाएँ घटीं। नीतीश कुमार ‘ठीक’ से ‘ठीके’ हो गए लेकिन अफ़सोस, राज्य में सवाल पूछने वाले नहीं बचे हैं। बाढ़, चमकी, बेरोजगारी, मर्डर, बलात्कार… नीतीश के बिहार में अब यही सब चल रहा है। मुजफ्फरपुर में जापानी इंसेफ्लाइटिस से सैंकड़ों बच्चे मर गए। नीतीश आरएसएस कार्यकर्ताओं की कुंडली निकलवाते रहे। चमकी बुखार से निपटने में नाकामयाब नीतीश सरकार विधानसभा में आम बाँटने में पीछे नहीं रही। इस साल ‘नीकु-सुमो’ की जोड़ी बिहार की विकल्पहीनता का चेहरा बन कर उभरी।

4. नहीं काम आया ‘रा-फ़ेल’ मुद्दा: न अध्यक्ष रहे, न बने पीएम

इस वर्ष लोकसभा चुनावों के दौरान ‘राफेल में चोरी हुई है’ और ‘चौकीदार चोर है’ जैसे नारों के साथ सियासी समर में उतरे राहुल गाँधी की नैया ऐसी डूबी कि कॉन्ग्रेस का उद्धार होना तो दूर, वो ख़ुद अमेठी से हार गए। हार से निराश राहुल ने कॉन्ग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया और उनकी माँ अंतरिम अध्यक्ष बनीं। हाल ही में जिस तरह से दिल्ली में हुई रैली में उनके पोस्टर-बैनर दिखे और प्रियंका ने उन्हें अपना नेता बताया, सम्भावना है कि वो फिर से अध्यक्ष पद पर वापसी करें। ‘सुप्रीम कोर्ट ने भी कह दिया है कि चौकीदार चोर है’- इस बयान के लिए देश की उच्चतम अदालत ने उन्हें फटकार लगाई, जिसके बाद उन्हें माफ़ी माँगनी पड़ी

राहुल गाँधी: न सत्ता मिली, न कॉन्ग्रेस अध्यक्ष रहे, कोर्ट का चक्कर लगाते बीता साल

‘सारे मोदी चोर हैं’- इस बयान के लिए भी उन्हें कोर्ट का चक्कर लगाना पड़ा। नेशनल हेरलड मामले में वो जमानत पर बाहर हैं। उधर उनके जीजा रॉबर्ट वाड्रा भी बीकानेर से लेकर लंदन तक की सम्पत्तियों को लेकर जाँच का सामना कर रहे हैं। संसद में आँख मारना हो या पीएम मोदी को हास्यास्पद ढंग से गले लगाना, राहुल गाँधी मजाकिया कारणों से चर्चा में रहे। साल का अंत होते-होते असली मुद्दों पर मोदी सरकार को घेरने के बजाय सावरकर पर बयान देकर एक बार फिर उन्होंने कॉन्ग्रेस की नैया डाँवाडोल कर दी। झारखण्ड व महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के दौरान भी वो उतने सक्रिय नहीं रहे और न ही टिकट वितरण में दिलचस्पी दिखाई। शायद ‘जस्ट Chill-Chill’ उनका नया मोटो है।

3. कट्टरपंथियों की हिजाबी जोड़ी: जामिया के उपद्रवियों की ‘नायिकाएँ’

आयशा रेना और लदीदा फरज़ाना को मीडिया के एक बड़े वर्ग ने सूडान आंदोलन के दौरान लोकप्रिय हुई आला सलाह की तरह पेश करना चाहा। जामिया के छात्रों के उपद्रव को ढकने और भारत सरकार को बदनाम करने के लिए अंतरराष्ट्रीय प्रोपेगंडा चलाया गया। दोनों युवतियों को पुलिस से भिड़ते हुए दिखाया गया। सब कुछ सुनियोजित तरीके से किया गया और वीडियो शूट कर वायरल किया गया। आयशा आतंकी याकूब मेमन की समर्थक हैं और भारत को फासिस्ट देश मानती हैं। वहीं लदीदा ‘अल्लाहु अकबर’ नारे का बचाव करते हुए बाकी नारों को सेक्युलर बताती हैं और कहती हैं उन्होंने उन नारों को छोड़ दिया है।

हैदराबाद में ओवैसी से मिलतीं आयशा और लदीदा

लदीदा ने एक लम्बे-चौड़े फेसबुक पोस्ट में आज़ादी से पहले हिन्दुओं का नरसंहार करने वाले इस्लामी कट्टरपंथी नेताओं को अपना आदर्श बताया, अपना पिता बताया। केरल से शाहीन अब्दुल्लाह को उठा कर लाया गया, जो पुलिस से बचते हुए इन युवतियों के पास पहुँचा और इन दोनों से उसे बचाते हुए वीडियो शूट कराया। बरखा दत्त को इन दोनों के साथ देखा गया, तभी कई लोगों को भनक लग गई कि इन्हें उभारा जाना एक पूर्व-नियोजित साज़िश है। दोनों युवतियों को एक दीवार पर खड़ा किया गया, जैसे सूडान की आला सलाह कर पर खड़ी हुई थी। रवीश के शो से लेकर ओवैसी से मिलने तक, दोनों चर्चा में रहीं।

2. नकारात्मकता का बेताज बादशाह: ‘डर के माहौल’ का शहंशाह

नाम ही काफ़ी है। एनडीटीवी के धरोहर। भारत में ‘डर का माहौल’ दिखा कर लोगों को भड़काने वाले रवीश कुमार। इस पर चर्चा करना ही बेकार है कि इन्होने इस साल क्या-क्या किया, बल्कि सवाल तो ये है कि इन्होंने इस साल क्या-क्या नहीं किया? हाल ही में जब झारखण्ड विधानसभा चुनाव परिणाम के दौरान कुछ देर के लिए भाजपा की स्थिति सुधरती दिखर ही थी तो इन्होने युवाओं को ही कोसना शुरू कर दिया। ऑरिजनल आर्टिकल पढ़े बिना इन्होने ‘विशेषज्ञों के हवाले से’ ख़ूब फर्जीवाड़ा फैलाया। मोदी से कठिन सवाल पूछने की चाह रखने वाले ‘पत्रकारिता के एकमात्र झंडाबरदार’ रवीश सपा-बसपा के मंच पर देखे गए। मैग्सेसे अवॉर्ड लिया लेकिन विदेश में जाकर अंग्रेजी में कहा कि भारत में अब लोकतंत्र नहीं रहा।

नकारात्मक पत्रकारिता का एक ही सरताज: एनडीटीवी के रवीश कुमार

रवीश ने यहाँ तक कह दिया कि भारत का दिल छोटा है। कारवाँ, क्विंट और वायर के हवाले से उन्होंने जनता को बरगलाने में कसर नहीं छोड़ी। रवीश ने न्यूज़लॉन्ड्री के एक लेख को शेयर कर सीधा ऑपइंडिया पर निशाना साधा। उन्हें रेप में जात तो दिख गया लेकिन मजहबी अपराधों पर उनकी खतरनाक चुप्पी कायम रही। अपने गृह जिले चम्पारण पहुँच कर उन्होंने अपने विरोधियों को ‘लबरा’ बता दिया। अयोध्या दीपोत्सव को कवर करने पर एक रिपोर्टर को ही भला-बुरा कह दिया। कमलेश तिवारी की हत्या पर वो चुप रहे, उस दिन वो मेक्सिको-अमेरिका का झगड़ा दिखाते रहे। कुल मिला कर इस साल ‘रवीश अनंत, रवीश की नकारात्मकता अनंता’ वाली स्थिति रही।

1. जातिवादी ज़हर बोने वाला मंडल, विषैले नाग से भी ख़तरनाक

राजनीति में जातिवाद। सोशल मीडिया में जातिवाद। शिक्षण संस्थानों में जातिवाद। दिलीप ‘सी’ मंडल एक ऐसा नाम है, जो देश में विभाजन पैदा करने की क़सम खा कर अपने घर से बाहर निकलता है। उसने ब्लू टिक के लिए ट्विटर को घेरा और कहा कि दलितों के एकाउंट्स को वेरिफाई नहीं किया जा रहा। उसने ‘जय भीम ट्विटर’ अभियान चलाया। माखनलाल यूनिवर्सिटी में उसने छात्रों को उनकी जाति पूछ कर प्रताड़ित किया। विरोध के स्वर उठे तो 23 छात्रों को निष्काषित कर दिया गया। उसके करतूतों के विरोध की ऐसी सज़ा मिली कि छात्रों को कड़ाके की ठण्ड वाली रात में कपड़े उतरवा कर 20 किलोमीटर घुमाया गया। वो छात्रों में जातिवादी ज़हर बो कर विभाजन पैदा कर रहा है।

टीवी चैनलों से लेकर सोशल मीडिया पर, जातिवादी जहर का कारोबारी है दिलीप सी मंडल

फेसबुक पर लगातार जातिवादी पोस्ट लिख कर लोगों को भड़काने वाले दिलीप मंडल को हर चीज में ब्राह्मणों को दोष देने में विशेष प्रकार का मजा आता है। उसका पूरा साल यही करते हुए बीता। लोगों का मानना है कि ऐसे जातिवादी जहर फैलाने वाले का शिक्षण संस्थानों में घुसना, राजनीतिक संरक्षण मिलना और सोशल मीडिया में समर्थन मिलना देश के भविष्य के लिए सही नहीं है। वह शिक्षण संस्थानों में अपने जैसे ऐसे कितने दिलीप मंडल पैदा करने में लगा हुआ है, इसे भी देखना चाहिए। कुल मिला कर इस साल ये व्यक्ति सबसे ज़्यादा ज़हर फैलाने के मामले में अव्वल रहा।

CAA-NRC समर्थकों को हराने के लिए लाखों फर्जी अकाउंट्स सक्रिय: 40 सर्वर के साथ Reddit यूजर ने किया दावा

सीएए, एनआरसी और एनपीआर पर बहस सड़क से लेकर सोशल मीडिया तक जारी है। इन विरोधों को चलाने के तरीकों के बारे में अब यह सच सामने आया है कि भारी मात्रा में धनराशि खर्च कर सरकार के इस पहल के खिलाफ जनमत सर्वेक्षण और जनता की राय कायम करने की जा रही है। एक Reddit उपयोगकर्ता, जिसका यूजर नाम onosmosis है, ने केंद्र में भाजपा सरकार के खिलाफ अभियान चलाने के लिए इंटरनेट पर दर्जनों वेब सर्वर चलाने का दावा किया है।

Reddit यूजर ने r / india subreddit पर निम्न सूचनाएँ पोस्ट किया, जो उसके ‘प्रोजेक्ट’ के बारे में सूचित करता है:

मैं, पिछले तीन महीनों से, सोशल मीडिया, विशेष रूप से 2 लाख से अधिक फर्जी एकाउंट्स (bot accounts) से किए जा रहे ट्वीट्स का विश्लेषण कर रहा हूँ जिन्हें खासतौर से वर्तमान शासन के आईटी सेल के खिलाफ एक अभियान चलाने के लिए एडब्ल्यूएस पर 40 से अधिक सर्वर चला रहा हूँ। यह एक कठिन कार्य है, और जैसा कि आप संलग्न स्क्रीनशॉट में देख सकते हैं, यह महँगा भी है। लेकिन अभियान की रिपोर्ट और परिणाम आप देख सकते हैं। यह लगातार IT सेल के ट्विटर पोल को लगातार हरा रहा है और इस कानून का विरोध कर रहे लोगों को अधिक ऊर्जा /आवाज दे रहा है। मैं इस पर अपने व्यापक रिपोर्ट को कल आप सभी के लिए अपने ब्लॉग पर प्रकाशित करूँगा। मुझे जो खुशी होती है, वह यह है कि इतनी शक्ति और धन वाली सरकार एक ऐसा काम करने में सक्षम नहीं है। विरोध करते रहिए मैं अपनी प्रौद्योगिकी कौशल के साथ अपना योगदान दे रहा हूँ।

Reddit यूजर का दावा है कि सरकार के खिलाफ अभियान चलाने के लिए अमेज़ॅन वेब सेवाओं पर 40 से अधिक सर्वर चलाकर, वह लगातार ‘आईटी सेल के ट्विटर पोल” को हराने में सक्षम है। इसका मतलब है कि आईटी सेल को हराने के लिए पोल्स में वोट देने के लिए तकनीकी संसाधनों का उपयोग किया जा रहा है। उपयोगकर्ता ट्विटर पर 2 लाख से अधिक बॉट खातों को चलाने या हेरफेर करने का दावा करता है, जो कि यदि सही है, तो किसी भी ट्विटर पोल पर धाँधली करने के लिए पर्याप्त है।

इसके आगे की पोस्ट में, उपयोगकर्ता का कहना है कि जैसा कि हम बहुत ही आदर्श परिदृश्य में नहीं रह रहे हैं, उन्होंने बीजेपी के आईटी सेल द्वारा संचालित बॉट के ट्विटर खातों की निगरानी और हेरफेर करने का फैसला किया। वह कहता है कि इसमें बहुत पैसा और ऊर्जा लगी, लेकिन यह इसके लायक था। उसने अपने हेरफेर के परिणामों को जल्द ही अपने ब्लॉग पर जारी करने का वादा किया है।

उसने अपने द्वारा किराए पर लिए गए 40 सर्वरों के लिए अमेज़न वेब सर्विसेज के साथ लेनदेन की एक प्रति भी संलग्न की। यह दर्शाता है कि 20 नवंबर को, 2,00,361.42 की राशि का भुगतान किया गया था, और। 2,11,869.90 की एक और राशि का भुगतान किया जाना है। इसका मतलब है कि लोगों को सीएए और एनआरसी का समर्थन नहीं करने के लिए ट्विटर पोल में हेरफेर करने के लिए केवल दो महीनों में चार लाख रुपए से अधिक खर्च किए गए हैं।

पोस्ट ने कई रेडिट यूजर से रेस्पॉन्स प्राप्त कीं, जिन्होंने प्रौद्योगिकी का उपयोग करके ‘बीजेपी आईटी सेल को हराने’ में उनकी मदद की। उनमें से कई डेटा विज्ञान, प्रोग्रामिंग, क्लाउड कंप्यूटिंग, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट, और सूचना प्रौद्योगिकी के अन्य क्षेत्रों में उच्च योग्य होने का दावा करते हैं, जो इस ‘प्रोजेक्ट’ में सहयोग करने में मदद करते हैं। उनमें से कई ने चर्चा को स्लैक या टेलीग्राम में स्थानांतरित करने का सुझाव दिया ताकि यह दूसरों द्वारा नहीं देखा जा सके। कुछ यूजर ने AWS बिल को कम करने में मदद की पेशकश की, और कई ने बिलों का भुगतान करने के लिए एक फण्ड रेज़र अभियान चलाने का सुझाव दिया।

रेडिट पोस्ट और बड़ी संख्या में उस पर की गई टिप्पणियों को देखते हुए, यह कहा जा सकता है कि इंटरनेट पर बीजेपी को हराने के लिए जोरदार अभियान चलाए जा रहे हैं। जब कई ऑनलाइन पोल में लोगों को सीएए या एनआरसी के खिलाफ वोट करने के बारे में पता चलता है, तो इसका कारण हो सकता है कि 2 लाख से अधिक फर्जी एकाउंट्स से उनके खिलाफ मतदान किया गया, न कि वास्तविक व्यक्तियों द्वारा वोट डाला गया। और यह सिर्फ एक यूजर है, ऐसे कई ऑनलाइन संसाधन हो सकते हैं जो पर्दे के पीछे से सरकार के खिलाफ माहौल बनाने के लिए समर्पित हैं।

जामिया का पुलिस को CCTV फुटेज देने से इनकार, उपद्रवी छात्रों का गुनाह छिपाने की कोशिश?

अब सीसीटीवी फुटेज को लेकर जामिया मिलिया इस्लामिया प्रशासन और दिल्ली पुलिस के बीच ठन गई है। जहाँ एक तरफ़ यूनिवर्सिटी ने आरोप लगाया था कि दिल्ली पुलिस ने कैम्पस में बिना अनुमति घुस कर तोड़फोड़ मचाई, वहीं पुलिस ने कहा था कि नियंत्रण से बाहर होने पर पुलिस को एक्शन लेना पड़ा। सीएए विरोध प्रदर्शन के नाम पर हिंसा, आगजनी और दंगे करने वाले जामिया के छात्रों ने पुलिस पर पत्थरबाजी भी की थी। जाँच में सीसीटीवी फुटेज का अहम रोल होगा, लेकिन अभी तक दिल्ली पुलिस को सीसीटीवी फुटेज नहीं मिला है। ये घटना दिसंबर 15 को हुई थी।

एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि सीसीटीवी फुटेज लेने के लिए जामिया नगर के एसएचओ को यूनिवर्सिटी प्रशासन के पास भेजा गया था। जब पुलिस वहाँ पर पहुँचीं, तब भारी संख्या में जामिया के छात्र जमा हो गए और उन्होंने पुलिस का विरोध किया। छात्रों ने सीसीटीवी फुटेज देने से इनकार कर दिया। हालाँकि, अभी तक ये नहीं पता चल सका है कि छात्र सीसीटीवी फुटेज पुलिस के पास क्यों नहीं पहुँचने देना चाहते हैं? सवाल ये है कि क्या वो कुछ छिपा रहे हैं? मजबूरन एसएचओ को खाली हाथ वापस लौटना पड़ा।

हालाँकि, जामिया मिलिया इस्लामिया प्रशासन ने पुलिस के साथ बैठक के दौरान लिखित में वादा किया था कि सीसीटीवी रिकॉर्डिंग्स को पुलिस को सौंपा जाएगा, ताकि घटना की सही तरीके से जाँच हो सके। अब यूनिवर्सिटी प्रशासन अपने वादे से पलटता दिख रहा है। अगर उन रिकॉर्डिंग्स के साथ कुछ भी होता है तो पुलिस इसे ‘सबूतों के साथ छेड़छाड़’ मान कर आगे की कार्रवाई करेगी, ऐसा वरिष्ठ अधिकारियों का कहना है। जामिया के चीफ प्रॉक्टर वसीम अहमद ने यूनिवर्सिटी का पक्ष रखते हुए कहा:

“15 दिसंबर को दिल्ली पुलिस ने जामिया के कई छात्रों को हिरासत में लिया था। उसी समय पुलिस ने हमसे उस दस्तावेज पर हस्ताक्षर करा लिए थे, जिसमें कहा गया था कि हमें जाँच के लिए सीसीटीवी फुटेज पुलिस को सौंपनी पड़ेगी। उन्होंने फुटेज की माँग की है और हम इस पर अभी सोच-विचार कर रहे हैं। एक पुलिस अधिकारी इसके लिए आया था लेकिन जैसे ही छात्र आए, वो यहाँ से चला गया।”

जामिया मिलिया इस्लामिया ने मानव संसाधन मंत्रालय से माँग की है कि इस पूरे मामले की न्यायिक जाँच कराई जाए। इसीलिए, वो सीसीटीवी फुटेज पुलिस को नहीं सौंपना चाह रहे। जामिया प्रशासन ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग से भी इस मामले की शिकायत की है।

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इस्लामी संगठन PFI पर लगेगा बैन: DGP की सिफारिश पर डिप्टी सीएम केशव मौर्य का स्पष्ट बयान

उत्तर प्रदेश सरकार ने उग्र इस्लामिक संगठन PFI पर पाबंदी लगाने का फ़ैसला किया है। पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) पर नागरिकता संशोधन क़ानून के ख़िलाफ़ हुए विरोध-प्रदर्शनों के दौरान हिंसा भड़काने का आरोप लगा था। इस संबंध में यूपी पुलिस जाँच कर रही थी। जाँच के बाद ही उत्तर प्रदेश के डीजीपी ओपी सिंह ने गृह विभाग को चिट्ठी लिखकर PFI पर बैन लगाने की सिफारिश की थी।

पुलिस की सिफारिश के बाद डिप्टी सीएम केशव मौर्य ने आज (31 दिसंबर 2019) PFI पर प्रतिबंध लगाने की सरकार की मंशा की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि यूपी में हिंसा फैलाने में PFI का हाथ था। केशव मौर्य ने कहा,

यूपी में हिंसा फैलाने में PFI का हाथ था। सिमी के लोग ही PFI में थे, जिन्होंने यूपी में हिंसा फैलाई। सरकार की तरफ़ से इस संगठन पर प्रतिबंध लगाया जाएगा और सरकार की ओर से प्रस्ताव लाकर इसे प्रतिबंधित किया जाएगा।

डिप्टी सीएम ने तल्ख़ अंदाज़ में कहा कि सिमी जैसे आतंकी संगठन चाहे किसी भी रूप में सामने आएँगे, उन्हें कुचल दिया जाएगा और जल्द ही PFI जैसे आतंकी इस्लामी संगठनों को भी प्रतिबंधित किया जाएगा।

इससे पहले उत्तर प्रदेश के डीजीपी ओपी सिंह ने गृह विभाग को चिट्ठी लिखकर PFI पर बैन लगाने की सिफारिश की थी। उनके मुताबिक जाँच में पता चला है कि हिंसक विरोध-प्रदर्शन में PFI का हाथ था। उन्होंने बताया कि उपद्रवियों के पास से आपत्तिजनक सामग्री बरामद किया गया था।

हिंसा के दौरान PFI के कई सदस्य पकड़े गए थे। यह सदस्य हिंसा में शामिल होने के साथ हिंसा फैलाने वालों की मदद भी कर रहे थे। लखनऊ में प्रदर्शन के दौरान भड़की हिंसा मामले में पुलिस ने PFI के तीन सदस्यों को गिरफ़्तार भी किया था। गिरफ़्तार किए गए आरोपितों की पहचान PFI अध्यक्ष वसीम अहमद, कोषाध्यक्ष नदीम, मंडल अध्यक्ष अशफाक के रूप में हुई थी।

PFI एक उग्र इस्लामी कट्टरपंथी संगठन है, जो कि दक्षिण भारत के राज्यों में काफ़ी सक्रिय होने के साथ-साथ चुनाव भी लड़ता रहा है। यह कट्टर संगठन उत्तर प्रदेश में बड़ी तेज़ी से फैल रहा है। पुलिस का कहना है कि PFI के गुंडों ने यूपी में हुई हिंसा के दौरान सोशल मीडिया के ज़रिए लोगों को उकसाने और दंगा भड़काने का काम किया था। पुलिस ने बताया कि उन्हें ऐसे दस्तावेज़ भी बरामद हुए थे जिनमें माहौल बिगाड़ने की बातें कही गई थीं।
पुलिस ने बताया था कि नागरिकता संशोधन के नाम पर देश भर में भड़की हिंसा में कई जगहों पर इस PFI संगठन के उपद्रवी शामिल थे। इससे से जुड़े लोगों ने उत्तर प्रदेश के कई ज़िलों में बैठक की थी।

ग़ौरतलब है कि दिल्ली पुलिस और ख़ुफ़िया एजेंसियों ने साथ मिलकर दिल्ली के जामिया मिलिया इस्लामिया में हुए दंगों के कारणों की जाँच की थी। इस पूरे मामले में दिल्ली पुलिस ने इस्लामिक संगठन PFI की तरफ़ इशारा किया था। पुलिस के अनुसार, जामिया मिलिया इस्लामिया में हिंसा से दो दिन पहले 13 दिसंबर को कट्टरपंथी इस्लामी संगठन PFI के लगभग 150 सदस्यों ने विभिन्न राज्यों से दिल्ली में प्रवेश किया था। पुलिस और ख़ुफ़िया एजेंसियों के मुताबिक़, जामिया इलाक़े में हिंसा भड़कने से पहले वो कहीं छिप गए थे।

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11 साल का बच्चा, 1000 से अधिक बार यौन शोषण… अपने ‘कनेक्शन’ वाले पादरी को मदर टेरेसा ने ऐसे बचाया

शिकागो में मदर टेरेसा के आध्यात्मिक सलाहकार जेसुइट पादरी डोनल्ड जे मग्वायर (Donald J. McGuire) ने एक अमेरिकी लड़के का यौन शोषण किया था। यह बात जानकर हैरानी होगी कि पादरी ने ऐसा एक बार नहीं बल्कि हजारों बार किया, कई राज्यों और कई देशों में घूम-घूम कर किया। मतलब जहाँ भी वो पादरी जाता था, उस बच्चे को अपने साथ ले जाता था और वहाँ उसका यौन शोषण करता था। इस मामले में सोमवार (30 दिसंबर) को सैन फ्रांसिस्को में कैलिफोर्निया राज्य अदालत में पादरी के ख़िलाफ़ मुक़दमा दर्ज किया गया।

उस बच्चे का नाम है रॉबर्ट जे गोल्डबर्ग (Robert J. Goldberg) और अब वो 61 साल का हो चुका है। इस मुक़दमे के बारे में एसोसिएटेड प्रेस को दिए साक्षात्कार में 61 वर्षीय गोल्डबर्ग ने अपने साथ हुए यौन शोषण की पूरी कहानी बताई। उन्होंने बताया कि वह 11 साल की उम्र से यौन शोषण का शिकार हो रहे थे, जब वो पादरी डोनल्ड जे मग्वायर (अब मर चुका है) के लिए काम करते थे।

मग्वायर की मौत 2017 में जेल में हुई थी। उसे गोल्डबर्ग के अलावा अन्य लड़कों के यौन शोषण के लिए 25 साल की सज़ा सुनाई गई थी। जेल में सजा काटने के दौरान ही वो मर गया।

ख़बर के अनुसार, गोल्डबर्ग का कहना है कि उन्होंने 40 साल से अधिक समय तक जेसुइट पादरी मग्वायर की दासता में जीवन गुजारा। सोमवार को दायर किए गए मुक़दमे में फिलहाल प्रतिवादियों के नाम नहीं है, लेकिन गोल्डबर्ग के वकीलों का कहना है कि अमेरिकी जेसुइट और वेटिकन के इस संबंध में आदेश को प्रतिवादियों में शामिल किया जाएगा। ऐसा इसलिए क्योंकि तब गोल्डबर्ग और अन्य बच्चों के साथ हो रहे यौन शोषण के बारे में कैथोलिक के शीर्ष अधिकारियों को पता था। वो जानते थे कि मग्वायर पर बार-बार लड़कों के यौन शोषण का आरोप लग रहा है, लेकिन उनके अपराधों को छिपाने के लिए वेटिकन की ओर से ही पर्दा डाला गया।

कैथोलिक दुर्व्यवहार कांड के लगभग दो दशकों बाद तक, हज़ारों पीड़ित लोगों ने अपनी दर्दनाक आपबीती सुनाई। इस साल की शुरुआत में सैकड़ों लोगों ने मुक़दमों में ख़ुद के साथ हुए शोषण के बारे में तब ख़ुलासा किया, जब न्यूयॉर्क में एक साल के लिए इस संबंध में मुकदमों को दर्ज करने की अनुमति (one year window) दी गई। गोल्डबर्ग की तरह अन्य सैकड़ों पीड़ित भी ख़ुद के साथ हुए यौन शोषण के ख़िलाफ़ आवाज़ उठा सकते हैं, जब 1 जनवरी से न्यू जर्सी और कैलिफोर्निया में भी one year window खुलेगी।

हालाँकि कई पीड़ित अभी भी चुप्पी साधे हुए हैं। गोल्डबर्ग के बारे में बता दें कि जब वो 11 साल के थे, तब वे 1970 में मग्वायर से मिले थे। मग्वायर ने उनकी माँ को रहने के लिए एक घर दिया। फिर उसने गोल्डबर्ग की माँ को इस बात के लिए राज़ी किया कि उनका बेटा उनकी (खुद मग्वायर की) देखरेख में सही रहेगा।

इस दौरान, तय हुआ कि गोल्डबर्ग, मग्वायर के रहने वाले क्वार्टर में शाम बिताएँगे या मग्वायर के साथ घर लौटेंगे, उनके साथ उनके बिस्तर पर सोएँगे। इस बीच, गोल्डबर्ग की माँ ने इस बात की पुष्टि की कि मग्वायर ने गोल्डबर्ग को अपने सहायक के रूप में काम करने के लिए प्रति सप्ताह $300 से $500 तक भुगतान करता था।

गोल्डबर्ग ने बताया, “वह बहुत सख़्त था, मैंने कोई बात नहीं कही थी। उसने जो कुछ भी मेरी माँ को बताया, वह चाहता था कि मैं वैसा करूँ और मुझे वैसा करना पड़ा।”

गोल्डबर्ग ने बताया कि अगर वो अपने दोस्तों के साथ भागने या मग्वायर के साथ सेक्स करने से इनकार कर देता था, तो वो उसे घंटों एक कमरे में बंद करके सज़ा देता था। दर्दनाक यह कि सज़ा के तौर पर वो उसका यौन शोषण करता था।

गोल्डबर्ग और उनका परिवार मग्वायर के साथ 1976 तक रहे। इसके बाद मग्वायर को सैन फ्रांसिस्को के विश्वविद्यालय में शिक्षण की नौकरी मिली तो वो कैलिफोर्निया चला गया। यह वही समय था, जब मग्वायर ने मदर टेरेसा के साथ रिश्ता बनाया। वह मदर टेरेसा का आध्यात्मिक सलाहकार बन गया था।

गोल्डबर्ग ने बताया कि शिकागो में पादरी मग्वायर के आपराधिक मुक़दमे में पीड़ितों की गवाही के बाद उनकी भावनाएँ बदलने लगीं। पूरे मुकदमे के दौरान मग्वायर को इस बात का बिल्कुल पछतावा नहीं था कि उसने गोल्डबर्ग और अन्य पीड़ितों के साथ यौन शोषण किया था।

ऐसा नहीं है कि पादरी मग्वायर के बारे में चर्चा (यौन शोषण वाली) आज या मुकदमा शुरू होने के समय हुई हो। यह 1960 के दशक की शुरुआत में शुरू हो चुकी थी। तब वह यूरोप में रहा करता था और जर्मनी तथा ऑस्ट्रिया में चर्च के अधिकारियों ने युवा लड़कों के साथ उसके यौन संबंधों के बारे में चौंकाने वाली रिपोर्ट भेजी थी।

मग्वायर के खिलाफ शिक़ायतें जारी रहीं लेकिन वह तीन दशक से भी ज्यादा समय तक पादरी बना रहा। 1994 में, मदर टेरेसा ने मग्वायर के ऊपर अपने “आत्मविश्वास और विश्वास” को व्यक्त करने के लिए जेसुइट के आदेश का समर्थन किया था। तब मदर टेरेसा ने कहा था कि उनका मानना ​​है कि मग्वायर के ख़िलाफ़ लगाए गए सारे आरोप असत्य थे।

2012 में, शिकागो जेसुइट के अधिकारी ब्रैडली एम शेफ़र, जिन्हें मदर टेरेसा का पत्र प्राप्त हुआ था, उन्होंने एक बयान जारी कर मग्वायर पर लगाम लगाने में विफल रहने के लिए माफ़ी माँगी थी। पिछले साल मिडवेस्ट जेसुइट्स ने एक सूची जारी की थी। इसमें उन 55 अभियुक्तों का नाम था, जिन्हें जेसुइट्स नाम दिया गया था, उसमें मग्वायर का भी नाम था, और इसके लिए माफ़ी माँगी थी। इसमें कहा गया था, “हम स्पष्ट रूप से जानते हैं कि पहले के दशकों में, कुछ मिडवेस्ट जेसुइट्स को मंत्रालय से जल्दी से नहीं हटाया गया था, इस बात का हमें दुख है।”

टेरेसा ‘मदर’ नहीं, कलकत्ता की ‘पिशाच’: भोपाल गैस त्रासदी का समर्थन, करोड़ों रुपयों की हेराफेरी

धर्मान्तरण का ‘ईसाई’ आतंक: यूपी के मऊ में तीन पादरी गिरफ्तार, बीमारी ठीक होने के नाम पर किया सहमत

25000 संडे स्कूल के छात्र: चर्च पर कब्ज़े की लड़ाई में बच्चों से अपने खून से ‘Sathyam’ लिखवा रहे केरल के ईसाई?

हिजाब पहन कर PM मोदी का विरोध कर रही हैं मिया खलीफा? Pak सीनेटर मलिक के ट्वीट का उड़ा मजाक

पाकिस्तान के सीनेटर रहमान मलिक ने पोर्न स्टार मिया खलीफा के भले के लिए प्रार्थना की है। पाकिस्तानी सीनेटर को लगता है कि अंतरराष्ट्रीय पोर्न स्टार मिया खलीफा भारत की क्षेत्रीय अभिनेत्री हैं और वो नागरिकता संशोधन क़ानून के विरोध में उत्तरी हुई हैं, इसीलिए रहमान मलिक ने उनके प्रति सहानुभूति जताई। हालाँकि, असलियत कुछ और है। दरअसल, यह सब शुरू हुआ एक व्यक्ति द्वारा कुछ फोटोज ट्वीट करने से। उसने दावा किया कि भारत में कई क्षेत्रीय सिने इंडस्ट्रीज की प्रभावशाली अभिनेत्रियाँ प्रदर्शनकारी मुस्लिमों के साथ खड़ी हैं और सीएए का विरोध कर रही हैं।

उसने अपने ट्वीट में पाकिस्तान के पूर्व इंटीरियर मिनिस्टर रहमान मलिक को भी टैग किया। साथ ही उसने लिखा कि विरोध दर्ज कराने के लिए ही इन अभिनेत्रियों ने हिजाब पहन रखा है। इसके बाद उक्त ट्विटर यूजर ने आशा जताई कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को तुरंत ही इस्तीफा देना पड़ेगा। ये ट्वीट अक्षय नामक यूजर ने किया था। उसने जानबूझ कर सीनेटर रहमान मलिक को टैग कर के ट्रैप किया था। रहमान मलिक जाल में फँस गए और उन्होंने इस झूठी कहानी को सच मान लिया। उन कथित ‘क्षेत्रीय अभिनेत्रियों’ में मिया खलीफा की फोटो भी थी, जिसे मलिक पहचान ही नहीं पाए।

सीनेटर रहमान मलिक ने मिया खलीफा के लिए लिखा- “गॉड ब्लेस हर।” पाकिस्तानी पत्रकार नायला इनायत ने रहमान मलिक की इस कारस्तानी को ट्विटर पर शेयर किया, जिसके बाद लोगों ने जम कर ठहाके लगाए। रहमान मलिक ने आगे ये भी लिखा कि वो भारत सरकार को ‘देख लेंगे’ क्योंकि सीएए यूएन के नियमों के भी ख़िलाफ़ है। नायला ने पूछा कि क्या पाकिस्तानी सीनेटर ये सोचते हैं कि अब वो पोर्न स्टार्स की मदद से भारत के साथ युद्ध करेंगे? कुछ ट्विटर यूजर ने लिखा कि पाकिस्तान में कई जगह इंटरनेट बंदी के कारण नेतागण भी देश-दुनिया से अनजान बने बैठे हुए हैं।

वैसे ये पहली बार नहीं है, जब किसी पाकिस्तानी नेता ने ऐसी हरकत की हो। ट्विटर पर अब्दुल बासित ने एक ऐसा ट्वीट रीट्वीट किया था, जिसमें अडल्ट फिल्म कलाकार जॉनी सीन्स को कश्मीर में अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद वहाँ की पीड़ित जनता बताकर दिखाया जा रहा है। इस तस्वीर में दिखाया गया था कि यूसुफ़ अनंतनाग का रहने वाला है, जिसकी आँखों की रौशनी पेलेट गन्स की वजह से चली गई।

फिल्म, गाँजा और समलैंगिक सेक्स: तनवीर कुरैशी की तीसरी डिमांड पूरी नहीं करने पर शुभांकर की हत्या

पश्चिम बंगाल के 24 परगना फलदा निवासी शुभांकर हलधर द्वारा समलैंगिक रिश्ते बनाने से इंकार करने पर झारखण्ड के जमशेदपुर में एक मुस्लिम युवक मोहम्मद तनवीर ने उसकी हत्या कर दी। पुलिस ने अपनी जाँच के बाद तनवीर को गिरफ्तार किया। साथ ही उसके पास से हत्या में इस्तेमाल चाकू, उसका मोबाइल, शुभांकर का मोबाइल, स्कूटी, खून से सने कपडों को बरामद किया।

सोमवार को पूरी वारदात का खुलासा करते हुए एसएसपी अनूप बिरथरे ने बताया कि शुभांकर कोलकाता की प्रदूषण जाँच करने वाली कंपनी में सुपरवाइजर था। वह साकची स्थित मानसूर्या होटल में अपने सहयोगी के साथ 19 दिसंबर से ठहरा हुआ था। लेकिन, 22 दिसंबर की रात शुभांकर हलधर मानगो स्थित आइलेक्स में फिल्म देखने के लिए होटल से निकला और शीतला मंदिर के पास शुभांकर टेंपो का इंतजार करते हुए उसकी मुलाकात मोहम्मद तनवीर से हुई।

तनवीर ने शुभांकर को अकेला देख उसे अपने जाल में फँसाया। उसने पहले शुभांकर से दोस्ती की और फिर उसे टॉकिज तक पहुँचाने का भरोसा दिलाया। टॉकिज पहुँचने पर तनवीर ने भी उसके साथ फिल्म देखने की इच्छा जताई। जिसके बाद शुभांकर ने तनवीर की टिकट खरीदकर उसे भी फिल्म दिखाई।

टॉकिज से निकलने के बाद गाँजा पीने के लिए दोनों स्वर्णरेखा नदी किनारे गए। यहाँ नशा करने के बाद तनवीर ने शुभांकर के साथ अप्राकृतिक संबंध बनाने का दबाव बनाया। मगर, जब उसने ऐसा करने से मना किया, तो तनवीर ने उसपर चाकू से हमला कर हत्या कर दी। शुभांकर की हत्या को अंजाम देने के बाद तनवीर उसकी जेब में पड़े रुपए, उसके 2 स्मॉर्टफोन लेकर वहाँ से भाग गया।

घटना का खुलासा होने के बाद सिटी डीएसपी अनुदीप सिंह के नेतृत्व में वारदात से जुड़ी हर परत खोलने के लिए 10 अधिकारियों की एक टीम बनाई गई। इस टीम ने तहकीकात के दौरान शुभांकर के मोबाइल की लोकेशन जुटाने से अपनी जाँच शुरु की, जो कि पुलिस को जमशेदपुर के आजादनगर और कपाली में मिली।

इसके बाद साकची थाना प्रभारी कुणाल कुमार ने घटना के बाद सीसीटीवी फुटेज देखे। पुलिस को कई फुटेज मिले जिससे पता चला कि शुभांकर के साथ एक अन्य युवक था, जो उसे स्कूटी से स्वर्णरेखा नदी किनारे लाया था। कई फुटेज देखते-देखते पुलिस ने आखिरी फुटेज आइलेक्स का देखा तो पता चला कि दूसरे युवक ने भी शुभांकर के साथ फिल्म देखी थी। इसके बाद मुखबिरों को लगाया गया तो पता चला कि ये युवक कपाली निवासी तनवीर है।

जानकारी जुटाने के बाद, साकची पुलिस ने शुभंकर के लूटे गए मोबाइल के लोकेशन की मदद से जमशेदपुर के कपाली के रोड नंबर पांच निवासी तनवीर कुरैशी को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया है।

पुलिस के मुताबिक तनवीर नशा का आदि है। इससे पहले वो पूर्व में बाइक चोरी के आरोप में जेल जा चुका है। मालूम हो कि 23 दिसंबर को साकची सुवर्णरेखा नदी किनारे शुभांकर हलधर का शव पुलिस ने बरामद किया था।

‘ऐसे राजनीतिक माहौल में मेरे जैसे MLA के लिए कोई जगह नहीं’ – कैबिनेट विस्तार के बाद ही ठाकरे-पवार को झटका

महाराष्‍ट्र में सोमवार को हुए मंत्रिमंडल विस्‍तार के बाद गठबंधन से बनी सरकार में बगावती सुर बुलंद होने लगे। राज्य के बीड़ जिले से एनसीपी विधायक प्रकाश सोलंके ने ऐलान किया कि वे आज न केवल अपनी विधायकी से इस्तीफा देंगे, बल्कि राजनीति से भी संन्यास ले लेंगे।

विधायक ने सोमवार को कहा, “मैं पार्टी के किसी नेता से नाखुश नहीं हूँ। मैंने एनसीपी नेताओं को अपने फैसले से अवगत करा दिया है। मैं मुंबई में मंगलवार दोपहर को विधानसभा अध्यक्ष से मिलूँगा और अपना इस्तीफा पत्र सौंप दूँगा।”

हालाँकि, प्रकाश सोलंके ने अपने बयान में साफ किया है कि वे मंत्री न बनाए जाने के चलते ये फैसला नहीं ले रहे हैं और न ही किसी पार्टी नेता से नाराज हैं। लेकिन, आजतक की रिपोर्ट के मुताबिक उनके बातचीच में उन्होंने कहा कि ऐसी राजनीतिक परिस्थिति बनी है, जिसके बाद अब उन जैसे लोगों के लिए सियासत में कोई जगह नहीं बची है।

सोलंकी ने कहा, “तीस साल से राजनीति कर रहा हूँ और अब इस तरह के राजनीतिक माहौल में हमारे लिए कोई जगह नहीं बची है।”

गौरतलब है कि सोमवार को उद्धव सरकार के कैबिनेट विस्‍तार में प्रकाश सोलंके को मंत्रिमंडल में जगह नहीं मिली, जबकि इससे पहले वे कॉन्ग्रेस-एनसीपी सरकार में राज्यमंत्री रहे चुके हैं। इसके अलावा वे चार बार से मजलगांव सीट से विधायक चुने जा चुके हैं।

ऐसे में मंत्रिमंडल विस्तार के बाद अचानक उनके फैसले से साफ है कि वो सरकार में मंत्री पद न पाने से नाराज हैं और इसी कारण वे मौजूदा राजनीति के लिए खुद को अयोग्य बताकर राजनीति से अलविदा ले रहे हैं।

गौरतलब है कि एनसीपी विधायक के अलावा मंत्रिमंडल विस्तार के बाद संजय राउत को लेकर भी बातें शुरू हो गई हैं। कार्यक्रम में उपस्थित न होने के कारण दबे सुर में ये भी बातें उठने लगी हैं कि उनके भाई और विक्रोली से विधायक सुनील राउत को मंत्रिमंडल में जगह न मिलने से वह नाराज हैं।

‘जो श्री राम का नहीं, वो किसी काम का नहीं’ – बाला साहेब के सैनिक ने उद्धव की सेना से दिया इस्तीफ़ा

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आगरा में हिंदू परिवार घर बेचने पर मजबूर: मर्डर केस वापस लेने का दबाव, बहू-बेटियों की इज्जत से खिलवाड़

मेरठ की तरह आगरा स्थित ताजगंज के तेलीपाड़ा में रविवार को करीब एक दर्जन घरों पर ‘मकान बिकाऊ’ का पोस्टर चिपका देख सनसनी फैल गई। मीडिया रिपोर्ट्स में बताया गया कि इसके पीछे का कारण इलाके में 3 महीने पहले 2 समुदायों के बीच हुआ एक बवाल है। इस मामले में ‘समुदाय विशेष’ के लोगों ने राठौर समाज के 20 वर्षीय युवक पप्पू की हत्या कर दी थी।

बताया जा रहा है कि इस घटना के बाद मामले में पुलिस की ओर से कोई ठोस कार्रवाई न होने और समुदाय विशेष के लोगों द्वारा आए दिन परेशान करने के कारण राठौर समाज के लोगों में दहशत है। आरोपित पक्ष लगातार उन पर समझौता करने का दबाव बना रहा है, लेकिन पीड़ित पक्ष इसके लिए तैयार नहीं है।

जानकारी के अनुसार, पप्पू की हत्या के मामले में 43 नामजद लोगों पर शिकायत दर्ज हुई थी। लेकिन पुलिस ने अपनी कार्रवाई में केवल पप्पू खां और हाशिम को जेल भेजा, जबकि अन्य सभी आरोपित अभी तक फरार हैं। पीड़ित पक्ष का आरोप है कि पुलिस द्वारा इस मामले में दबिश तो दी गई लेकिन इसके बाद कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई।

आए दिन आरोपित पक्ष की ओर से दबाव के बीच पीड़ित परिवारों ने अपने घर पर “मकान बिकाऊ” है, का पोस्टर लगा दिया। हालाँकि, मकानों पर लगे पोस्टरों की जानकारी मिलते ही पुलिस मौके पर पहुँची और दोनों पक्षों से बातचीत कर पोस्टर हटवा दिए। लेकिन इस दौरान यह पोस्टर सोशल मीडिया पर वायरल हो चुके थे और मामला तूल भी पकड़ चुका था।

पीड़ित पक्ष ने मीडिया को बताया कि उनके परिवारों में दहशत का माहौल बन गया है। उनके मुताबिक आरोपित युवक दर्जनों की संख्या में आकर उन पर मुकदमा वापसी के लिए दबाव बना रहे हैं।

उनका कहना है कि समुदाय विशेष के लोग उनसे समझौते के लिए आए दिन बात करते हैं। लेकिन, जब वह इससे इनकार करते हैं, तो उनके बच्चों के साथ मारपीट की जाती है। इस कारण से इलाके के दर्जनों परिवार मानसिक तनाव में हैं।

बता दें कि समुदाय विशेष की ये हरकतें यहीं नहीं रुकती। उनमें से कुछ युवक आए दिन पीड़ित पक्ष की महिलाओं के आने-जाने पर उन पर फब्तियाँ कसते हैं। जिस कारण वहाँ लड़कियों-महिलाओं का घरों से निकलना मुश्किल हो गया है। पीड़ित पक्ष के अनुसार वे इस संबंध में इलाका पुलिस से शिकायत कर चुके हैं। लेकिन पुलिकर्मी कभी-कभी ही इलाके में गश्त लगाने आते हैं। जबकि अधिकारियों द्वारा रात और दिन दो सुरक्षाकर्मियों की ड्यूटी लगाने के लिए कहा गया था। 

उल्लेखनीय है कि पीड़ित पक्ष के अनुसार तेलीपाड़ा में समुदाय विशेष बड़ी संख्या में है, जबकि राठौर समाज के करीब एक दर्जन परिवार ही हैं। इसलिए, इलाके की बहुसंख्यक आबादी से परेशान होकर राठौर समाज के लोग तेलीपाड़ा से पलायन करने को मजबूर हैं।

पूरा मामला:

इसी साल 28 सितंबर की रात रुपए लेने के बावजूद कोल्ड ड्रिंक की बोतल न देने के मामले को लेकर विवाद हो गया था। तब दोनों समुदाय के लोग आमने-सामने आ गए थे और उसी बीच पथराव हुआ था। पथराव में घायल तेलीपाड़ा निवासी पप्पू राठौर की 1 सप्ताह बाद इलाज के दौरान मौत हो गई थी। जिसके बाद युवक के चाचा निरंजन सिंह राठौर ने कुछ नामजद लोगों के ख़िलाफ़ मुकदमा कराया था। लेकिन पुलिस ने सिर्फ दो आरोपितो को गिरफ्तार कर जेल भेजा जबकि बाकी आरोपित अभी तक फरार हैं।

निरंजन सिंह का कहना है कि आरोपित पक्ष के लोग समझौते के लिए उन पर दबाव बना रहे हैं और राजीनामा नहीं करने पर बस्ती से मकान खाली कराने की धमकी दे रहे थे।

इसके अलावा उनका कहना है कि बीते 4 नवंबर को क्षेत्र निवासी राजेश राठौर के बेटे के साथ समुदाय विशेष के लोगों ने मारपीट भी की थी और पुलिस से शिकायत करने पर उन्हें जान से मारने की धमकी भी दी गई थी।

बता दें कि क्षेत्र में राठौर समाज के लोगों के 12 घर ही हैं और लगातार मिलती धमकियों से वे भी दहशत में जी रहे हैं। खबरों के अनुसार पुलिस की कार्रवाई न होने पर ही मकान बिकाऊ के पोस्टर लगाए गए हैं। अगर स्थिति ऐसी ही रही तो वह मकान बेचकर चले जाएँगे।

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