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गुरुजी के बेटे का गणित बिगाड़ने वाली शिक्षिका, झारखंड की राजनीति में यूँ हुआ ‘तेजस्विनी’ का उदय

2014 में जब झारखंड में विधानसभा चुनाव हुआ, तब हेमंत सोरेन राज्य के मुख्यमंत्री थे। दुमका उनके पिता और
झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री शिबू सोरेन का गढ़ भी रहा है, जहाँ से ‘गुरुजी’ 8 बार सांसद रह चुके हैं। 2014 के चुनाव में झारखंड की राजनीति में एक ऐसी महिला का उदय हुआ, जिन्होंने संगठन में ख़ुद को पहले ही साबित कर दिया था। अपने ही गढ़ में हेमंत सोरेन को मुख्यमंत्री रहते इस महिला से हार का सामना करना पड़ा था। हेमंत को 65,105 वोट मिले थे। लुइस मरांडी ने 70,367 पाकर मुख्यमंत्री को ही हरा दिया।

लुइस मरांडी ही दुमका में बड़ा उलटफेर करने वाली महिला थीं। उन्हें रघुवर मंत्रिमंडल में महिला एवं बाल विकास, अल्पसंख्यक कल्याण और सामाजिक कल्याण जैसे मंत्रालय दिए गए। वो झारखंड महिला आयोग की सदस्य रह चुकी हैं। उनके नेतृत्व में झारखंड भाजपा की महिला प्रकोष्ठ ने नई ऊँचाइयों को छुआ। मंत्री रहते उनकी ‘तेजस्विनी’ योजना की ख़ूब चर्चा हुई, जिसमें 14 से 24 वर्ष तक की किशोरियों को शिक्षा के साथ-साथ रोज़गार प्रशिक्षण का भी प्रावधान किया गया है।

लुइस मरांडी ने 2014 में जो करामात किया था, वो 5 वर्षों बाद 2019 में उसे फिर से दोहराती हुई नज़र आ रही हैं। चुनाव आयोग के आधिकारिक आँकड़ों के अनुसार, उन्हें अब तक 22019 वोट मिले हैं, जबकि 19592 वोटों के साथ हेमंत सोरेन उनसे काफ़ी पीछे चल रहे हैं। लुइस को फ़िलहाल 48.79 % वोट मिले हैं, वहीं हेमंत सोरेन 43.41 % मतों के साथ पीछे चल रहे हैं। दोनों के मतों के बीच के अंतर की बात करें तो ये 2427 (5.38%) है। हेमंत को लगातार दूसरी बार लुइस उनके ही गढ़ में पटखनी देने की ओर बढ़ रहीं हैं।

1995 में भाजपा की सदस्य बनी लुइस को राजनाथ सिंह ने भाजपा अध्यक्ष रहते पार्टी का राष्ट्रीय सचिव बनाया था। ये पार्टी का उन पर भरोसा ही था कि 2009 में चुनाव हारने के बावजूद उन पर 2014 में दोबारा भरोसा जताया गया। बनारस काशी विद्यापीठ से शिक्षा ग्रहण करने के बाद उन्होंने राँची विश्वविद्यालय से पीएचडी की उपाधि ली। गौर करने वाली बात ये है कि पूरे झारखण्ड में दो ही पीएचडी उम्मीदवार हैं और लुइस मरांडी उनमें से एक हैं। जिस दुमका में कभी वह सहायक शिक्षिका के रूप में कार्यरत थीं, उसी दुमका से जीत कर वह मंत्री बनीं।

जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भाजपा ने 2014 में प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया, तब लुइस मरांडी झारखंड में भाजपा की चुनावी रणनीति की सूत्रधार रहीं। पार्टी ने 14 में से 12 लोकसभा सीटों पर जीत दर्ज की और इस तरह से उनका क़द पार्टी और राज्य की राजनीति में और बढ़ गया।

BJP की बढ़त पर युवाओं को ही कोसने लगे रवीश कुमार, सीटों के साथ बदल रहा NDTV स्टूडियो का माहौल

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झारखंड विधानसभा चुनाव के अब तक के रूझानों में भाजपा और झामुमो गठबंधन के बीच काँटे की टक्कर दिख रही है। जब भाजपा की सीटें बढ़नी लगती है तब रवीश कुमार जनता को कोसने लगते हैं। वहीं जब झामुमो गठबंधन आगे निकल जाता है तो रवीश का चेहरा खिल उठता है। एनडीटीवी के स्टूडियो में एक अलग ही माहौल है, जहाँ ख़ुशी और गम इस आधार पर तय हो रहा है कि भाजपा हारती दिख रही है या फिर आगे निकलते। रवीश कुमार ने जैसे ही देखा कि भाजपा आगे बढ़ रही है, उन्होंने युवाओं को कोसते हुए कहा कि उन्हें अब रोज़गार से कोई मतलब नहीं रह गया है।

सुबह के रुझानों में कॉन्ग्रेस-झामुमो-राजद गठबंधन को बढ़त मिलती दिख रही थी, तब NDTV के स्टूडियो में एक अलग माहौल था। लेकिन जैसे ही भाजपा की तरफ काँटा बढ़ना शुरू हुआ, रवीश ने सुर बदल लिया और मतदाताओं के विवेक पर ही सवाल उठाने लगे।

रवीश बार-बार यह बात भूल जाते हैं कि लोकतंत्र में एक आम आदमी के वोट की कीमत वही होती है जो उनके जैसे परम ज्ञानियों के वोट की है। शायद यही अभिजात्यता और घमंड उन्हें हर मतदान के बाद यह कहने पर मजबूर कर देता है (भाजपा की जीत की स्थिति में) कि युवाओं को रोजगार से मतलब नहीं। उनका पूरा एजेंडा पूरे लोकतंत्र में चुनावी प्रक्रिया और एक वोट के महत्व को बेकार साबित करने पर टिका हुआ है।

परिणाम जब भाजपा के खिलाफ जाते हैं तब रवीश को यह याद आता है कि युवाओं ने समझदारी दिखाई है। इससे सीधा दिखता है कि रवीश और रवीश जैसों के लिए गैरभाजपा सरकार कितनी आवश्यक दिखती है। यह विचित्र बात है कि जब जनता भाजपा के खिलाफ जाती है तभी वो रवीश को समझदार दिखती है अन्यथा वो मजे लेने लगते हैं कि युवाओं को तो मतलब ही नहीं, वो तो भावनात्मक मुद्दों पर वोट दे रहे हैं।

सवाल यह है कि बदलते रुझानों के साथ रवीश-छाप लोगों के लिए जनता की प्रकृति और प्रवृत्ति भी मिनट-दर-मिनट क्यों बदलती जाती है? क्या लोकतंत्र का हर पहलू रवीश कुमार के लिए बेकार हो चुका है।

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1 लाख की भीड़ जमा कर अमित शाह को कोलकाता में घुसने नहीं दूँगा: ममता के मंत्री सिद्दीकुल्ला चौधरी

तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) के नेता और ममता बनर्जी के मंत्री सिद्दीकुल्ला चौधरी ने रविवार (दिसंबर 22, 2019) को धमकी दी कि अगर नागरिकता संशोधन कानून (CAA) को फौरन वापस नहीं लिया गया तो जब भी केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह कोलकाता दौरे पर आएँगे, तो उन्हें एयरपोर्ट से बाहर कदम नहीं रखने दिया जाएगा। बता दें कि सिद्दीकुल्ला चौधरी जमीयत-उलेमा-ए-हिंद के प्रदेश अध्यक्ष भी हैं।

टीएमसी नेता का कहना है कि कानून मानवता और देश के नागरिकों के खिलाफ है, जो सदियों से यहाँ रह रहे हैं। CAA के विरोध में जमीयत-उलेमा-ए-हिंद की रैली के दौरान उन्होंने कहा, ”अगर जरूरत पड़ी तो हम लोग उन्हें (शाह को) शहर के हवाई अड्डे के बाहर कदम नहीं रखने देंगे। उन्हें रोकने के लिए हम लोग एक लाख लोगों को वहाँ जमा कर सकते हैं।”

हालाँकि चौधरी ने दावा किया कि संगठन का प्रदर्शन लोकतांत्रिक और शांतिपूर्ण होगा। उन्होंने कहा, “हम लोग हिंसक प्रदर्शनों में यकीन नहीं करते। लेकिन निश्चित रूप से हम लोग CAA और राष्ट्रीय नागरिक पंजीकरण (NRC) का जी जान से विरोध करेंगे।” चौधरी ने कहा कि बीजेपी को लोगों ने पहले ही नकार दिया है। अभी कोलकाता समेत पूरे देश में चल रहा विरोध-प्रदर्शन इसका गवाह है।

सिद्दीकुल्ला चौधरी ने रानी रासमोनी एवेन्यू में रैली को संबोधित करते हुए पीएम मोदी पर भी निशाना साधा। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के “56 इंच के सीने” ने देश के लोगों को निराश किया है, क्योंकि वो “नफरत और विभाजन की राजनीति” कर रहे हैं। ममता के मंत्री ने कहा, “वे (मोदी और शाह) क्या कर रहे हैं, लोगों पर एक के बाद एक करके अपना एजेंडा थोप रहे हैं। वे चर्चा में विश्वास नहीं करते हैं, वे बातचीत में विश्वास नहीं करते हैं। हम उन्हें ऐसा नहीं करने देंगे।” साथ ही रैली में वक्ताओं ने CAA और NRC के विरोध में सड़कों पर उतरने के लिए मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का शुक्रिया अदा किया।

सिद्दीकुल्ला चौधरी के इस बयान पर बीजेपी की पश्चिम बंगाल इकाई के अध्यक्ष दिलीप घोष ने कहा कि चौधरी पहले भी ‘मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के मौन समर्थन’ से इस तरह का ‘भड़काऊ बयान’ दे चुके हैं। घोष ने कहा, “राज्य का कोई मंत्री कैसे इस तरह धमकी दे सकता है?”

बता दें कि ममता बनर्जी और उनकी पार्टी TMC राष्ट्रीय स्तर पर NRC को लागू करने के सबसे मुखर आलोचकों में से एक है। यहाँ तक कि बंगाल की सीएम ने CAA और NRC पर संयुक्त राष्ट्र की निगरानी वाले जनमत संग्रह की भी माँग की है। नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में पश्चिम बंगाल में उग्र प्रदर्शन हुआ, कई रेलवे स्टेशन और ट्रेनों पर हमला गया।

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झारखंड: गढ़ में हार की ओर बढ़ रहे विपक्ष के CM उम्मीदवार हेमंत सोरेन, भाभी भी चल रहीं पीछे

झारखंड में विपक्ष को बड़ा झटका लगता दिख रहा है। झामुमो-कॉन्ग्रेस-राजद गठबन्धन के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार हेमंत सोरेन अपने ही गढ़ से हारने की ओर अग्रसर हैं। अगर अभी तक के रुझानों की बात करें तो उन्हें भाजपा की लुइस मरांडी के हाथों हार का सामना करना पड़ सकता है। हेमंत सोरेन झामुमो के कार्यकारी अध्यक्ष भी हैं, ऐसे में उनका हारना पार्टी के लिए मुसीबत का सबब बन सकता है। न सिर्फ़ झामुमो, बल्कि कॉन्ग्रेस के लिए भी इसे एक बड़े झटके के रूप में देखा जाएगा।

ताज़ा आँकड़ों पर नज़र डालें तो हेमंत सोरेन को महज 3492 वोट मिले हैं, वहीं लुईस मरांडी 9821 वोटों के साथ उनसे काफ़ी आगे दिख रही हैं। दुमका में सोरेन परिवार की प्रतिष्ठा दाँव पर है, क्योंकि ये ‘गुरुजी का गढ़’ भी कहा जाता है। हेमंत सोरेन के पिता और झामुमो सुप्रीमो शिबू सोरेन यहाँ से 8 बार सांसद रह चुके हैं। चुनाव आयोग की आधिकारिक आँकड़ों के अनुसार, अभी तक सोरेन को 24.97% मत मिले हैं, वहीं 70.23% मतों के साथ लुइस मरांडी एकतरफा जीत की ओर बढ़ रही हैं।

दुमका लोकसभा क्षेत्र की एक और सीट जामा से भी सोरेन परिवार की प्रतिष्ठा दाँव पर लगी है, क्योंकि यहाँ से पूर्व मुख्यमंत्री शिबू सोरेन की बहू और हेमंत सोरेन की भाभी सीता सोरेन चुनाव लड़ रही हैं। सीता सोरेन भी पीछे चल रही हैं। उन्हें अब तक के रुझानों के अनुसार 2277 वोट मिले हैं, जबकि भाजपा के सुरेश मुर्मू 4470 वोटों के साथ उनसे आगे हैं। सोरेन को अब तक 28.02% वोट मिले हैं तो मुर्मू 55.02% मतों के साथ आगे हैं।

दुमका और जामा से सोरेन परिवार के हार के बाद इन चर्चाओं को काफ़ी बल मिलेगा कि शिबू सोरेन का गढ़ उनके हाथ से फिसलता जा रहा है। अगर पूरे राज्य के रुझानों की बात करें तो चुनाव आयोग की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार भाजपा 22 और झामुमो 21 सीटों पर आगे चल रही है। कॉन्ग्रेस की 10 और राजद की 5 सीटों को मिला दें तो विपक्षी गठबंधन 36 सीटों पर आगे है।

जामिया में दंगाइयों ने ही लगाई थी बसों में आग: CCTV फुटेज जारी होने के बाद माफ़ी माँगेंगे सिसोदिया?

आपको याद होगा कि जामिया नगर में कुछ दिनों पहले 4 सार्वजनिक बसों को आग के हवाले कर दिया गया था। इसके अलावा 100 से भी अधिक प्राइवेट वाहनों को भी फूँक दिया गया था। जिस जगह पर ये वारदात हुई, वहाँ जामिया मिल्लिया इस्लामिया के छात्र विरोध-प्रदर्शन कर रहे थे। वहाँ पर आम आदमी पार्टी के विधायक अमनतुल्लाह ख़ान को भी भीड़ का नेतृत्व करते देखा गया था। हिंसा होने के बाद पुलिस को जामिया कैम्पस में घुस कर स्थिति को नियंत्रित करना पड़ा था। इसके बाद जामिया व जेएनयू के छात्रों ने पुलिस पर बर्बरता का आरोप मढ़ा था।

अब पुलिस ने सीसीटीवी फुटेज जारी कर दूध का दूध और पानी का पानी कर दिया है। दिल्ली के उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने कुछ फोटो शेयर कर आरोप लगाया था कि पुलिस ने ही बसों में आग लगाई और छात्रों को फँसा दिया। हालाँकि सिसोदिया ने जो फोटो शेयर किए थे, उनमें पुलिस आग बुझाती हुई दिख रही है। अब दिल्ली पुलिस द्वारा सीसीटीवी फुटेज जारी करने के बाद लोग आप नेता सिसोदिया माफ़ी की माँग कर रहे हैं।

ऊपर संलग्न किए गए वीडियो में देखा जा सकता है कि दंगाई बाइकों पर पेट्रोल डाल कर उन्हें आग के हवाले कर रहे हैं। ये वीडियो फुटेज 15 दिसंबर के हैं। दंगाइयों को वीडियो में पत्थरबाजी करते हुए भी देखा जा सकता है। उन्होंने मास्क पहन कर अपनी पहचान छिपाने का प्रयास किया और कई वाहनों को आग के हवाले किया।

वीडियो में आप देख सकते हैं कि मोटरसाइकिलों में से पेट्रोल भी निकाल लिया गया। पीछे हिंसक भीड़ को पत्थरबाजी करते हुए देखा जा सकता है। इस घटना के बाद भाजपा नेता कपिल मिश्रा ने आशंका जताई थी कि ये दिल्ली में गोधरा दोहराने की साज़िश है। वहीं मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने कहा था कि विरोध-प्रदर्शन शांतिपूर्ण होने चाहिए और इस तरह की हिंसा स्वीकार्य नहीं है। इससे भी अधिक हिंसक वारदातें सीलमपुर में हुईं, जहाँ दंगाइयों ने पुलिस पर पत्थरबाजी की और आमजनों को भी घायल कर दिया।

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शुरुआती रुझानों में भाजपा और जेएमएम के बीच कड़ी टक्कर, क्या मिथक तोड़ पाएँगे रघुवर दास?

81 सदस्यीय झारखंड विधानसभा चुनाव के नतीजे अगले कुछ घंटों में स्पष्ट हो जाएँगे। शुरुआती रुझानों में झामुमो-कॉन्ग्रेस-राजद गठबंधन को बढ़त दिख रही है। यदि अंतिम नतीजे भी इसी तरह के रहे तो एक और राज्य भाजपा के हाथ से निकल सकता है। हालॉंकि पोस्टल बैलेट की गिनती पूरी होने के बाद रुझानों में भाजपा की सीटें धीरे-धीरे बढ़ रही है। इन सबके बीच एक सीट जिसके नतीजे को लेकर सबसे ज्यादा उत्सुकता है वह है जमशेदपुर पूर्वी सीट। यह सीट भाजपा का गढ़ रहा और खुद मुख्यमंत्री रघुवर दास यहॉं से मैदान में हैं। बावजूद इसके दो कारणों से इस बार यहॉं भाजपा की राह मुश्किल मानी जा रही है।

पहला, रघुवर दास को चुनौती केवल कॉन्ग्रेस के गौरव वल्लभ से ही नहीं मिली है। इस सीट से रघुवर कैबिनेट में मंत्री रहे सरयू राय भी मैदान में हैं। राय झारखंड भाजपा के कद्दावर नेताओं में से रहे हैं और चुनाव से ऐन पहले उन्होंने अलग राह पकड़ी थी। इस इलाके में उनकी भी जबर्दस्त पकड़ मानी जाती है।

दूसरा, मुख्यमंत्रियों से झारखंड की जनता का पुराना वैर। यह दिलचस्प है कि झारखंड के 19 साल के राजनीतिक सफर में जो भी मुख्यमंत्री रहा है उसे चुनावी हार का स्वाद चखना पड़ा है। राज्य में अब तक छह मुख्यमंत्री हो चुके हैं। बाबूलाल मरांडी, अर्जुन मुंडा, शिबू सोरेन, मधु कोड़ा, हेमंत सोरेन और रघुवर दास। रघुवर एकमात्र ऐसे नेता हैं, जिन्होंने बतौर मुख्यमंत्री पॉंच साल का कार्यकाल पूरा किया है। लेकिन, एक मिथक यह भी है कि मुख्यमंत्री के तौर पर जो भी चुनाव मैदान में गया है उसे हार भी मिली है।

शिबू सोरेन तो मुख्यमंत्री बनने के बाद विधायक तक नहीं बन पाए थे। तमाड़ में राजा पीटर ने उन्हें पटखनी दे दी थी। पिछला विधानसभा चुनाव तो पूर्व मुख्यमंत्रियों के लिए कब्रगाह ही साबित हुआ था। चार-चार पूर्व मुख्यमंत्री चुनाव हार गए थे। मधु कोड़ा और हेमंत सोरेन चुनाव हार गए थे। राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी और फिलहाल केंद्र में मंत्री और तीन राज्य के मुख्यमंत्री रह चुके अर्जुन मुंडा भी जीत नहीं पाए थे। माना जाता है कि खरसांवा से मुंडा की हार ने ही रघुवर दास के रूप में राज्य को पहला गैर आदिवासी मुख्यमंत्री मिलने का रास्ता खोला था।

ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि क्या इस इतिहास को रघुवर दास बदल पाएंगे? जानकार उनकी राह मुश्किल मानते हैं। जैसा कि राजनीतिक विश्लेषक और जन की बात के सीईओ प्रदीप भंडारी ने ऑपइंडिया को बताया- “राज्य में एंटी इंकंबेंसी महत्वपूर्ण फैक्टर है। यदि खुद मुख्यमंत्री चुनाव हार जाएँ या बेहद मामूली अंतर से ही जीत पाएँ तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए।”

घर में घुस कर मार रहे हैं RSS कार्यकर्ता और UP पुलिस: राणा अयूब का झूठ बेनकाब

प्रोपेगेंडा पत्रकार राणा अयूब ने उत्तर प्रदेश में नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) विरोधी प्रोटेस्ट की आड़ में झूठ फैलाया। अंतरराष्ट्रीय मीडिया में लेख लिख भारत की नकारात्मक छवि बनाने का प्रयास करने वाली राणा अयूब वेस्टर्न मीडिया के लिए नई अरुंधति राय बन बनती जा रही हैं। सोशल मीडिया के माध्यम से वो झूठ और अफवाहों का ऐसा जाल बिछाती हैं कि लोगों को उनकी बातें सच लगने लगती हैं। अबकी उन्होंने यूपी पुलिस पर गंभीर आरोप लगाए हैं। राणा अयूब ने लिखा कि मुज़फ्फरनगर और कानपुर से कुछ हृदय विदारक ख़बरें आ रही हैं।

बकौल राणा अयूब, इन दोनों जिलों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और और पुलिस साथ मिल कर मुस्लिम बहुल इलाक़ों में हमला कर रही है। घरों में घुस कर कथित अल्पसंख्यकों को मारा जा रहा है। राणा अयूब ने दावा किया कि ऐसा ख़ुद स्थानीय लोगों ने उन्हें बताया है। उन्होंने आगे आरोप लगाया कि मजहब विशेष के लोगों के घर और गाड़ियों को आग के हवाले किया जा रहा है। साथ ही उन्होंने आरोप लगाया कि पुलिस व संघ कार्यकर्ताओं की क्रूरता के कारण कथित अल्पसंख्यक समुदाय के लोग पलायन करने को मजबूर हो रहे हैं। राणा अयूब ने इस घटना की तुलना 2002 के गुजरात दंगों से की।

साथ ही राणा अयूब ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रामलीला मैदान में हुई विशाल रैली पर भी तंज कसा। उन्होंने पूछा कि क्या धारा-144 सिर्फ़ प्रदर्शनकारियों के लिए है? बाद में लोगो ने उन्हें याद दिलाया कि न तो दिल्ली के सभी क्षेत्रों में धारा-144 लागू है और न ही रामलीला मैदान या उसके आसपास वाले इलाक़ों में।

इसके बाद राणा अयूब को यूपी पुलिस ने फटकार लगाई। उत्तर प्रदेश पुलिस ने साफ़ कहा कि वो ऐसे किसी को आरोप का खंडन करती है। साथ ही पुलिस ने अयूब को एक ‘जिम्मेदार रिपोर्टर’ की परिभाषा भी समझाई और कहा कि वो अपने बयान की पुष्टि के लिए सबूत पेश करें। इसके बाद राणा अयूब ने दावा किया कि खंडन करने से कुछ नहीं होगा। उन्होंने पुलिस को कोई सबूत नहीं दिया और कहा कि उनकी टाइमलाइन पर सबूत पड़े हुए हैं। अयूब ने कहा कि और नए एविडेंस भी आएँगे।

हालाँकि, यूपी पुलिस ने जब राणा अयूब की टाइमलाइन को खँगाला तो उसमें ऐसा कुछ भी नहीं मिला, जिससे पता चल सके कि उन्होंने पुलिस व आरएसएस पर जो आरोप लगाए हैं, वो सही हैं। यूपी पुलिस ने कहा कि राणा अयूब की टाइमलाइन पर जो भी है, वो दिखाता है कि पुलिस क़ानून-व्यवस्था कायम करने के लिए कार्रवाई कर रही है और इसमें कुछ भी ग़लत नहीं है। यूपी पुलिस ने कहा:

“आपकी टाइमलाइन को देख कर ये पता चलता है कि उपद्रवियों की भीड़ ने एक पुलिस चौकी और कई वाहनों को आग के हवाले कर दिया है। अगर आप कोई स्पष्ट सबूत दे पाती हैं तो आपका स्वागत है।”

जैसा कि अपेक्षित था, राणा अयूब के पास अपने झूठे बयान की पुष्टि के लिए कोई सबूत नहीं था। फिर भी, हारून रियाज सहित कई बुद्धिजीवियों ने उनकी बातों का समर्थन किया और इस अफवाह को आगे बढ़ाया। हारून ने तो यहाँ तक दावा किया कि यूपी में भाजपा सांसद संजीव बालियान ने ही मुस्लिमों के ख़िलाफ़ हिंसा की शुरुआत की है।

राणा अयूब ने विदेशी पत्रकार को J&K में अवैध रूप से घुसाया, भारत-विरोधी प्रचार किया: देश के साथ गद्दारी!

अयोध्या पर फैसले से पहले राणा अयूब ने उगला जहर, कहा- आज जो सत्ता में हैं, उन्होंने ही बाबरी गिराया था

PM मोदी से मिलूँगी: अमेरिका की पहली हिंदू सांसद तुलसी गबार्ड ने राणा अयूब को लताड़ा

त्रिशंकु दिख रहे झारखंड का कौन होगा ‘दुष्यंत’: बाबूलाल मरांडी या सुदेश म​हतो?

81 सदस्यीय झारखंड विधानसभा चुनाव के नतीजे सोमवार (23 दिसंबर 2019) को आएँगे। नतीजे भाजपा के उस प्रयोग के लिए लिटमस टेस्ट साबित हो सकता है जो उसने 2014 के आम चुनावों की शानदार जीत के बाद शुरू किया था। उस साल महाराष्ट्र, हरियाणा और झारखंड के विधानसभा चुनावों के बाद भाजपा ने मुख्यमंत्री के तौर पर जिन चेहरों को आगे बढ़ाया, वह उन राज्यों की परंपरागत राजनीति से हटकर था। हरियाणा में किसी जाट चेहरे की बजाए मनोहर लाल खट्टर को वरीयता दी। महाराष्ट्र की राजनीति में मराठों का दबदबा होने के बावजूद ब्राह्मण देवेंद्र फडणवीस को आगे बढ़ाया। झारखंड को रघुवर दास के रूप में पहला गैर आदिवासी मुख्यमंत्री दिया।

2019 के आम चुनावों में भाजपा ने 2014 से भी बड़ी जीत हासिल की। लेकिन, इस साल महाराष्ट्र और हरियाणा विधानसभा चुनाव के नतीजे वैसे नहीं आए। हरियाणा में वह बहुमत से दूर रह गई और दुष्यंत चौटाला की जजपा के साथ सरकार चला रही है। महाराष्ट्र में नतीजों के बाद उसे साझेदार शिवसेना ने झटका दे दिया। झारखंड में भी एग्जिट पोल बता रहे हैं कि भाजपा का प्रदर्शन 2014 के मुकाबले कमतर होने जा रहा है।

इसकी वजह क्या है? जैसा कि राजनीतिक विश्लेषक और जन की बात के सीईओ प्रदीप भंडारी ने ऑपइंडिया को बताया- एंटी इंकबेंसी फैक्टर। उन्होंने कहा, “राज्य में एंटी इंकंबेंसी महत्वपूर्ण फैक्टर है। यदि खुद मुख्यमंत्री चुनाव हार जाएँ या बेहद मामूली अंतर से ही जीत पाएँ तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए।” जन की बात के सर्वे के अनुसार भाजपा 22 से 30 सीटें जीत सकती है। झामुमो, कॉन्ग्रेस और राजद गठबंधन को 37 से 46 सीटें मिलने का अनुमान लगाया गया है।

सी-वोटर और एबीपी न्यूज़ के सर्वे में भाजपा को 32 और झामुमो गठबंधन को 35 सीटें मिलने का अनुमान लगाया गया है। इंडिया टुडे और एक्सिस माय इंडिया के एग्जिट पोल में भाजपा को 22 से 32 तो जेएमएम की अगुवाई वाले गठबंधन को 38 से 50 सीटों तक मिलने का अनुमान जताया गया है।

एग्जिट पोल से एक चीज तो स्पष्ट है कि भाजपा पर विपक्षी गठबंधन को बढ़त हासिल है। लेकिन, छोटे राज्यों में एक-दो फीसद वोट भी इधर-उधर होने पर अंतिम नतीजे अनुमान से बिल्कुल अलग हो जाते हैं। ऐसी सूरत में किसी एक पक्ष को स्पष्ट बहुमत मिल सकता है। लेकिन इसकी संभावना कम दिखती है, क्योंकि 2014 में भी भाजपा अकेले दम पर 41 सीटें जीतने में सफल नहीं हो पाई थी। उस समय 72 सीटों पर चुनाव लड़कर भाजपा 37 सीटें जीतने में कामयाब रही थी। उसकी सहयोगी आजसू को उस चुनाव में पॉंच सीटे मिली थी। बाद में राज्य के पहले मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी की पार्टी जेवीएम के भी आठ में से छह विधायक भाजपा के साथ आ गए थे। यहॉं गौर करने वाली बात यह है कि 2014 में भाजपा इतनी सीटें तब जीत पाई, जब उसकी स्थिति बेहद मजबूत बताई जा रही थी और विपक्ष को पस्त।

भाजपा के कमजोर होने की सूरत में जिस राजनीतिक हालात की सबसे ज्यादा उम्मीद दिखती है, वह है त्रिशंकु विधानसभा। राज्य का राजनीतिक इतिहास भी इसकी तस्दीक करता है। यही कारण है कि बिहार से अलग होकर अस्तित्व में आया झारखंड 19 साल के सफर में ही राजनीति के इतने मोड़ देख चुका है कि उसकी सियासी चालों पर हमेशा पूरे देश की नजर बनी रहती है। 2000-14 के बीच 9 मुख्यमंत्री और 3 बार राष्ट्रपति शासन देख चुके इस राज्य ने रघुवर दास के तौर पर पहली बार कार्यकाल पूरा करने वाला सीएम देखा है। इस राज्य में निर्दलीय सीएम रह चुका है। अलग राज्य आंदोलन की वजह से ‘गुरुजी’ कहलाने वाले शिबू सोरेन मुख्यमंत्री रहते एक राजनीतिक नौसिखिए से परास्त हो चुके हैं। इस राज्य ने राजनीति का वह थ्रिलर भी देखा है, जब विधायकों को दिल्ली लेकर जा रहे विमान को रोकने के लिए खुद डिप्टी सीएम एयरपोर्ट तक दौड़ गया था।

सो, त्रिशंकु नतीजे होने पर यह राज्य सियासत का नया पन्ना खोल सकता है। इस स्थिति में जो दो चेहरे बेहद महत्वपूर्ण होंगे वे हैं- बाबूलाल मरांडी और राज्य के उप मुख्यमंत्री रह चुके आजसू प्रमुख सुदेश महतो। सी-वोटर के सर्वे में जेवीएम को 3 और आजसू को 5 सीटें मिलने का अनुमान लगाया गया है। एक्सिस माय इंडिया का पोल जेवीएम को 2 से 4 तो आजसू को 3 से 5 सीटें दे रहा है।

एग्जिट पोल के बाद से ही इन दोनों नेताओं के अगले कदम को लेकर कई तरह की अटकलें लगाई जा रही है। पहले बात आजसू की। रघुवर सरकार में शामिल रही आजसू बात नहीं बनने पर इस बार अकेले चुनावी मैदान में उतरी थी। सुदेश महतो पहले ही कह चुके हैं कि अलग चुनाव लड़ने का मतलब यह नहीं है कि भविष्य में भाजपा के साथ गठबंधन नहीं होगा। वैसे भी झारखंड के सियासत में आजसू ज्यादातर वक्त भाजपा के साथ ही रही है। तो क्या आजसू का समर्थन भाजपा के पक्ष में तय माना जाए? यह इस बात पर निर्भर करेगा कि भाजपा बहुमत से कितनी दूर रहती है। विपक्षी गठबंधन के मजबूत दिखाई पड़ने की सूरत में आजसू उसके साथ भी उसी तरह जा सकती है, जैसे वह निर्दलीय मधु कोड़ा के नेतृत्व वाली सरकार में शामिल हुई थी। उस वक्त पार्टी विधायक चंद्रप्रकाश चौधरी कोड़ा कैबिनेट में मंत्री थे, तो खुद सुदेश विपक्ष में बैठते थे।

किंग मेकर की स्थिति में जो दूसरा शख्स हो सकता है वह हैं, बाबूलाल मरांडी। मरांडी का राजनीतिक सफर भाजपा से ही शुरू हुआ था। रिश्तों में दरार पड़ने के बाद 2006 में उन्होंने अपनी पार्टी जेवीएम बना ली। इसके बाद से ही वे राज्य में भाजपा के विकल्प के तौर पर उभरने की कोशिश में लगे हैं। लेकिन, अब तक कामयाबी नहीं मिल पाई है। वे भाजपा के खिलाफ विपक्ष का व्यापक महागठबंधन बनाने की असफल कोशिश भी कर चुके हैं। अब तक जेवीएम ने जितने भी विधानसभा चुनाव लड़े हैं वह 10 फीसद के करीब वोट लाने में कामयाब रही है। पिछला ​लोकसभा चुनाव जेवीएम ने कॉन्ग्रेस गठबंधन के साथ लड़ा था। लेकिन, सीटों पर पेंच फॅंसने के बाद विधानसभा चुनाव में रास्ते अलग हो गए। मोटे तौर पर अनुमान लगाया जा रहा है कि मरांडी का झुकाव जेएमएम गठबंधन की तरफ हो सकता है। लेकिन, काबिलेगौर यह है कि अब तक ऐसा देखा गया है कि चुनाव के बाद मरांडी की पार्टी के ज्यादातर विधायक भाजपा के साथ चले जाते हैं। इस बार भी ऐसी किसी संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

मौजूदा हालातों से ऐसा लगता है कि चुनाव से पहले सुदेश और बाबूलाल भले मनमाफिक समझौते करने में नाकामयाब रहें हो, नतीजों के बाद उनकी लॉटरी लग सकती है। उनका रुख ही तय करेगा कि झारखंड में भी भाजपा को हरियाणा की तरह सत्ता तक पहुॅंचाने वाला ‘दुष्यंत’ मिलेगा या फिर महाराष्ट्र खुद को दोहराएगा!

हिंदुस्तान की पहली घटना! अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के छात्रों ने ही वाइस चांसलर को किया ‘निष्कासित’

रविवार (22 दिसंबर) को अलीगढ़ में इंटरनेट सेवाओं की बहाली के तुरंत बाद, शिक्षकों, छात्रों और ग़ैर-शिक्षण कर्मचारियों ने अपने वाइस चांसलर को निष्कासित कर दिया। बाक़ायदा एक नोटिस जारी करते हुए, यह कहा गया कि उन्होंने अपने वाइस चांसलर प्रोफ़ेसर तारिक मंसूर और विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार एस अब्दुल हामिद को निष्कासित कर दिया है। उन्होंने कहा कि वाइस चांसलर और रजिस्ट्रार से अनुरोध है कि वे वीसी लॉज और रजिस्ट्रार के लॉज को खाली कर दें। नोटिस में घोषित किया गया है कि सभी लोग तब तक विश्वविद्यालय प्रशासन का बहिष्कार करेंगे, जब तक यह दोनों अपना इस्तीफ़ा नहीं दे देते और कैंपस छोड़कर चले नहीं जाते।

AMU के वाइस चांसलर और रजिस्ट्रार को निष्कासित किए जाने का नोटिस (साभार: रिपब्लिक टीवी)

इन सबके मद्देनज़र ध्यान देने वाली बात यह है कि नागरिकता संशोधन क़ानून के विरोध में उतरे AMU छात्रों को यह तक नहीं मालूम कि केंद्रीय विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर की नियुक्ति राष्ट्रपति करते हैं और वाइस चांसलर को पद से हटाने की भी एक निर्धारित प्रक्रिया होती है। इस प्रक्रिया में भी राष्ट्रपति को ही निर्णय लेना होता है। लेकिन, AMU के छात्रों-शिक्षकों ने मिलकर (वैसे कितने शिक्षक इसमें शामिल हैं, इस पर संशय है क्योंकि जिस लेटर हेड पर यह सूचना आई है, वो छात्रों का है, न कि शिक्षक संघ का) अपनी मर्ज़ी से वाइस चांसलर और रजिस्ट्रार को निष्कासित कर दिया। इसी से पता चलता है AMU के छात्रों का स्टैंडर्ड! जहाँ के छात्रों को अपनी यूनिवर्सिटी के नियम-कानून का अता-पता नहीं है, वो CAA-NRC को क्या खाक समझ पाएँगे!

दरअसल, AMU के छात्र नेताओं ने रविवार (15 दिसंबर) को AMU में हुए विरोध-प्रदर्शन के दौरान छात्रों के ख़िलाफ़ “पुलिस अत्याचार” और “राज्य दमन” की कड़ी निंदा करते हुए AMU के वाइस चांसलर और रजिस्ट्रार के इस्तीफ़े की माँग की थी।

ख़बर के अनुसार, छात्रों का आरोप था कि अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर तारिक मंसूर ने ही कैंपस में यूपी पुलिस को विरोध-प्रदर्शन के दौरान अंदर घुसने की अनुमति दी थी। उन्होंने हिंसा के बाद कहा था कि उग्र भीड़ से छात्रों की जान और विश्वविद्यालय सम्पत्ति को नुक़सान हो सकता था। इसके बाद स्थिति पर क़ाबू पाने के लिए पुलिस को लाठीचार्ज और आँसू गैस के गोले दागने पड़े थे।

बता दें कि नागरिकता संशोधन क़ानून के विरोध के बाद, अलीगढ़ में इंटरनेट कनेक्शन बंद होने के सात दिन बाद, अधिकारियों ने रविवार को सेवा बहाल कर दी। बंद के बारे में सूचित करते हुए ज़िला मजिस्ट्रेट ने 15 दिसंबर को कहा था, “छात्रों द्वारा अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में विरोध-प्रदर्शन के बाद, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि कुछ असामाजिक तत्व भड़काऊ संदेशों को प्रसारित करने के लिए इंटरनेट सेवाओं का उपयोग कर लोगों के बीच हिंसा भड़का सकते हैं। सोशल मीडिया पर हिंसात्मक सामग्री की रोकथाम के लिए इंटरनेट सेवाएँ रात 10 बजे से अगली रात 10 बजे तक बंद रहेगी।” 

ग़ौरतलब है कि नागरिकता संशोधन क़ानून के विरोध के नाम पर अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में 15 दिसंबर 2019 को जमकर बवाल कटा था। छात्रों ने एडमिशन ब्लॉक के बाहर निकलकर पुलिस पर पथराव और हवाई फायरिंग की। जवाब में पुलिस ने लाठीचार्ज कर रबर बुलेट दागी। यूनिवर्सिटी में माहौल बिगड़ता देख 5 जनवरी 2020 तक कॉलेज को बंद कर दिया गया और देर रात ही सभी हॉस्टल खाली करा लिए गए थे।

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…जिसने किया CAA का समर्थन, उस युवक पर चाकू व कुल्हाड़ी से हमला: हॉस्पिटल पहुँचे सांसद सूर्या

जहाँ एक तरफ सीएए के ख़िलाफ़ चल रहा विरोध प्रदर्शन जगह-जगह हिंसक हो उठा और कई पुलिसकर्मी घायल हुए, सीएए के समर्थन में आए लोगों पर हमले की ख़बर आ रही है। मोदी सरकार के इस क़ानून के समर्थन में न सिर्फ़ दिल्ली, बल्कि बंगलुरु और मुंबई सहित असम में भी लाखों लोगों से सड़कों पर उतर कर केंद्र सरकार के इस फ़ैसले को अपना समर्थन दिया। बंगलुरु में वरुण नाम के एक व्यक्ति को सीएए के समर्थन का खामियाजा तब भुगतना पड़ा, जब कुछ उपद्रवियों ने उन पर हमला कर दिया। वो फिलहाल हॉस्पिटल में भर्ती हैं।

31 वर्षीय वरुण पर सीएए के विरोधियों ने धारदार हथियार से हमला किया। पीड़ित वरुण जेपी नगर के रहने वाले हैं। बेंगलुरु साउथ के सांसद व युवा भाजपा नेता तेजस्वी सूर्या ने हॉस्पिटल में जाकर उनका हालचाल जाना। तेजस्वी सूर्या ने इस बारे में अधिक जानकारी देते हुए बताया:

“टाउन हॉल में सीएए के समर्थन में एक रैली का आयोजन किया गया था। हमारे कार्यकर्ता वरुण जब उस रैली में भाग लेकर लौट रहे थे, तब उन पर चाकू और कुल्हाड़ी से हमला किया गया। ये हमला काफ़ी क्रूर तरीके से किया गया। उनके सिर में गहरी चोट आई है लेकिन राहत की बात ये है कि अब वो ख़तरे से बाहर हैं। मैं सभी से निवेदन करता हूँ कि शांति बनाए रखें क्योंकि हिंसा किसी भी समस्या का समाधान नहीं है।”

वरुण पर ये हमला बम्बू बाजार में हुआ। उनके सिर पर चोट के अलावा शरीर के कई अन्य हिस्सों में भी चोटें आई हैं। सांसद तेजस्वी सूर्या ने माँग करते हुए कहा कि पुलिस को इस मामले की निष्पक्ष जाँच करनी चाहिए, जिससे इस हिंसा के गुनहगारों को सज़ा दिलाई जा सके। सूर्या ने हॉस्पिटल कर्मचारियों व मेडिकल सुपरिटेंडेंट से मुलाक़ात कर वरुण का अच्छी तरह इलाज करने को कहा। उन्होंने उनकी सुरक्षा व मामले की जाँच के लिए डीसीपी से भी फोन पर बातचीत की। सूर्या ने कहा कि लोग वरुण के साथ मज़बूती से खड़े हैं।

पुलिस ने बताया है कि वो सीसीटीवी फुटेज खँगाल कर दोषियों को धर-पकड़ने में लगी हुई है। जहाँ तक सीएए के समर्थन में हुई रैली की बात है, उसमें भारी संख्या में लोग तिरंगे के साथ दिखे। लोगों ने पीएम मोदी के समर्थन में नारे लगाए और विपक्षियों के भ्रमजाल की आलोचना की।

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