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मुस्लिमों इतनी हैसियत भी नहीं कि शहरों को बंद कर सको: लोगों को उकसा रहे युवक का देखें Video

नागरिकता संशोधन कानून के विरोध की आड़ में जगह-जगह पर प्रदर्शन और हिंसा हो रही है। 14 और 15 दिसंबर को भी दिल्ली में जामिया समेत कई जगहों पर आगजनी, भीड़ हिंसा और बर्बरता हुई। प्रदर्शनकारियों ने बसें जला दी। निजी वाहनों को क्षतिग्रस्त कर दिया। अब सोशल मीडिया पर सामने आ रहे कई वीडियो से साफ हो रहा है कि किस तरह कुछ लोगों ने हिंसा भड़काने की साजिश रची।

सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हो रहा है, जिसमें एक शख्स मुस्लिमों को सड़कों पर आने और दिल्ली में चक्का जाम करने के लिए उकसाता हुआ दिखाई दे रहा है। बताया जा रहा है कि ये वीडियो दिल्ली का ही है। वह आदमी कहता है, “हमारी ख्वाहिश और हमारी आरजू ये है कि दिल्ली में चक्का जाम हो। सिर्फ दिल्ली में ही नहीं, पूरे देश में, जहाँ मुस्लिम कर सकता है। मुस्लिम हिन्दुस्तान के 500 शहरों में चक्का जाम कर सकता है। अब उसमें रोड ब्लॉक कौन है? वो भाजपा नहीं है, वो कॉन्ग्रेस नहीं है, वो है जमीयत जमीयत उलेमा-ए-हिंद, वो है जमात-ए-इस्लामी।”

आगे वीडियो में शख्स को कहते हुए सुना जा सकता है, “क्या मुस्लिमों की इतनी हैसियत भी नहीं कि उत्तर भारत के शहरों को बंद किया जा सके। यूपी में शहरी मुस्लिमों की आबादी 30 फीसदी से ऊपर है। क्या आपको शर्म नहीं आती? अरे भाई शर्म करो, आप यूपी में चक्काजाम क्यों नहीं कर सकते? कैसे चल रहा है वह शहर? बिहार का वह इलाका जहाँ से मैं आता हूँ, वहाँ ग्रामीण मुस्लिम आबादी 6% है, जबकि शहरी मुस्लिम आबादी 24% है। हिन्दुस्तान का मुस्लिम शहरी है। वो शहर में रहता है। शहर बंद कीजिए और जो रास्ते में आता है, उसे मना कीजिए, उसे भगाइए।”

यह वीडियो सोशल मीडिया में वायरल हो रहा है। हालाँकि ऑपइंडिया स्वतंत्र रूप से यह सत्यापित नहीं कर सका कि इसे कहाँ पर शूट किया गया है, लेकिन वीडियो को देखकर यह साफ जाहिर हो रहा है कि छात्रों और आम जनता को हिंसक विरोध-प्रदर्शन करने और नुकसान पहुँचाने के लिए उकसाया जा रहा है।

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‘जामिया में जो हुआ वो जलियाँवाला बाग़ जैसा’ – हिंदुत्व नहीं छोड़ूँगा वाले उद्धव ठाकरे का सेक्युलर राग

‘पेंडुलम हिंदुत्व’ या ‘पेंडुलम-त्व’ के शिकार उद्धव ठाकरे का पेंडुलम एक बार फिर डोल कर हिंदुत्व से कॉन्ग्रेस-छाप सेक्युलरता के सिरे पर पहुँच गया है। उद्धव ठाकरे ने जामिया में हिंसा के ख़िलाफ़ प्रदर्शन की तुलना जलियाँवाला बाग़ हत्याकांड से कर दी है। 1919 में हुआ यह हत्याकाण्ड जनरल डायर की ब्रिटिश-हिंदुस्तानी फ़ौज द्वारा निहत्थे भारतीयों पर लोहड़ी के दिन किया गया लोमहर्षक अत्याचार था।

गौरतलब है कि नागरिकता विधेयक में संशोधन के खिलाफ चल रहे प्रदर्शन के नाम पर जामिया मिलिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी के छात्रों के हिंसा पर उतर आने पर दिल्ली पुलिस ने उन पर बल प्रयोग किया। इससे बिफरे लिबरल गिरोह ने जहाँ संसद सत्र के अंतिम दिन से लेकर ट्विटर और सड़क तक इस पर बवाल काटने की असफल कोशिश की है, वहीं भारत के मुख्य न्यायाधीश एसए बोबडे ने उनकी हिमायत में दायर की गई याचिका को साफ नकार दिया और कहा कि छात्र होने भर से किसी को हिंसा करने का अधिकार नहीं मिल जाता। साथ ही चेतावनी भी दी कि अगर छात्र अगर इस तरह की हरकत करेंगे तो फिर पुलिस क्या करेगी?

‘सेक्युलर’ कॉन्ग्रेस और एनसीपी के साथ सरकार चला रहे उद्धव ठाकरे लगातार नागरिकता विधेयक पर अपना स्टैंड बदलते आए हैं। लोक सभा में उनकी पार्टी ने बिना कॉन्ग्रेस से कोई सलाह-मशविरा किए विधेयक को समर्थन दे दिया। लेकिन फिर कॉन्ग्रेस के आँख दिखाने पर अपना स्टैंड बदलते हुए ठाकरे राज्य सभा में इसके समर्थन के लिए तीन-पाँच करने लगे। और उस पर भी कोर वोटबैंक की प्रतिक्रिया नकारात्मक होने पर अंततः उनकी पार्टी ने वॉक आउट कर बीच का रास्ता अपनाया- ताकि न ही विधेयक की खुल कर मुख़ालफ़त करनी पड़े, न ही इसके समर्थन से कॉन्ग्रेस का महाराष्ट्र राज्य सरकार को समर्थन छूट जाए।

इस बीच खबर यह भी आ रही है कि शिवसेना ने सभी विपक्षी दलों को झटका देते हुए राष्ट्रपति से मिलने जाने वाले प्रतिनिधिमंडल का हिस्सा बनने से इनकार कर दिया है। मंगलवार (दिसंबर 17, 2019) को शाम साढ़े 4 बजे ‘ऑल पार्टी डेलीगेशन’ की राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद से मुलाक़ात होगी। कॉन्ग्रेस समेत सभी विपक्षी दल राष्ट्रपति के समक्ष सीएए को लेकर अपनी चिंताएँ जाहिर करेंगे।

शिवसेना नेता संजय राउत ने कहा कि उनकी पार्टी के नेतागण फ़िलहाल नागपुर में व्यस्त हैं और इसीलिए राष्ट्रपति से मुलाक़ात का हिस्सा नहीं बनेंगे। उन्होंने पूछा कि आख़िर ये विरोध प्रदर्शन क्यों हो रहे हैं और इसके पीछे कौन लोग हैं? राउत ने कहा कि सीएए लागू होने से पहले से ही तय था कि इस क़ानून को लेकर विरोध प्रदर्शन होगा।

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एक पोस्ट…

“स्टेशन पर ट्रेन जैसे ही रुकी, जुमे की नमाज़ के बाद 700 मुस्लिमों की भीड़ बगल की एक मस्जिद से निकली। असामाजिक तत्वों ने रेलवे लाइन को पूरी तरह ब्लॉक कर दिया। उनके हाथों में कैब और एनआरसी विरोधी पोस्टर्स थे। दंगाइयों में अधिकतर युवा थे, कई तो 7-8 साल के बच्चे भी थे। उनके हाथों में डंडे, पत्थर और रॉड थे। सबसे पहले उन्होंने ‘हमसफ़र एक्सप्रेस’ की खिड़कियों को तोड़ा। इसके बाद हमारे ट्रेन पर पत्थरबाजी शुरू की। दंगाई भीड़ रॉड से खिड़कियों को तोड़ते हुए यात्रियों को डरा-सहमा देख कर ठहाके लगा रही थी।”

ये वकील शंखदीप सोम के शब्द हैं। वे शुक्रवार (दिसंबर 13, 2019) को हावड़ा-चेन्नई एक्सप्रेस में सवार थे। ट्रेन जब पश्चिम बंगाल के उलूबेरिया स्टेशन पर पहुॅंची तो जो कुछ हुआ वह उन्होंने फेसबुक पर लिखा है। इसे आप भक्त की भड़ास समझें इससे पहले बता दूॅं कि ट्रेन पर पत्थरबाजी से चंद घंटे पहले ही सोम ने सोशल मीडिया में पीएम मोदी का मजाक उड़ाते हुए कथित स्टैंड-अप कॉमेडियन कुणाल कमरा का पोस्ट शेयर किया था। दंगाइयों से बचने के कुछ घंटे बाद ही सोम दोबारा से लिबरल भी हो गए।

एक वीडियो…

फरहाद हकीम पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता के मेयर हैं। सत्ताधारी तृणूमल कॉन्ग्रेस के नेता हैं। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के करीबी बताए जाते हैं। मुस्लिम दंगाई भीड़ से सरकारी संपत्ति को नुकसान नहीं पहुॅंचाने की अपील करते हुए उनका एक वीडियो आया है। इसमें वे कहते सुनाई पड़ रहे हैं, “राज्य में NRC और CAA लागू नहीं किया जाएगा। हमें बंगाल के लोगों की सार्वजनिक सम्पत्ति को नुक़सान नहीं पहुँचाना चाहिए। अगर ऐसा किया जाएगा तो फिर वो लोग अमित शाह का समर्थन करना शुरू कर देंगे। अगर उनमें से 70% लोग अमित शाह का समर्थन करते हैं, तो जब बीजेपी यहाँ सत्ता में आ जाएगी तो आप अपना सिर नहीं उठा सकेंगे जैसा वो (बीजेपी) उत्तर प्रदेश में करते हैं।”

एक फैक्टर…

हैदराबाद के सांसद असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम ने 2021 बंगाल विधानसभा चुनाव लड़ने की घोषणा की है। पार्टी प्रवक्ता असीम वक़ार ने पिछले दिनों ममता बनजी को को चेताते हुए कहा था, “ये सही है कि हम संख्या में कम हैं लेकिन लेकिन कोई हमें छूने की भी हिम्मत न करे। हमलोग एटम बम हैं। दीदी (ममता बनर्जी), हमें आपकी दोस्ती भी पसंद है और हम आपकी दुश्मनी का भी स्वागत करते हैं। अब ये आपके ऊपर है कि आप हमें अपना दोस्त समझती हैं या फिर दुश्मन।”

माना जा रहा है कि बंगाल में दंगाइयों से ममता की नरमी का एक कारण यह भी है। ऐसा कर ममता विधानसभा चुनाव से पहले मुस्लिम वोट बैंक को रिझाना चाहती हैं। लेकिन, उनका खेल बिगाड़ने के लिए ओवैसी को पूरे मुस्लिम वोट बैंक की ज़रूरत नहीं है। माना जा रहा है कि यदि वे 5% के आसपास वोट शेयर हासिल करने में कामयाब रहे तो भी भाजपा को बड़ा फायदा मिलेगा।

एक सवाल…

क्या नागरिकता संशोधन कानून यानी CAA और नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजंस यानी NRC का विरोध ममता बनर्जी केवल मुस्लिम वोट बैंक को बचाने के लिए कर रही हैं? बांग्लादे​शी घुसपैठियों को बाहर निकालने के लिए कुछ साल पहले वे संसद में भी आवाज बुलंद कर चुकी हैं। फिर आज उनकी ढाल क्यों बनना चाहती हैं? क्या वह मुस्लिम वोटों में विभाजन से डरी हैं? या इसकी कुछ और भी वजहें हैं?

ठाकुरबाड़ी का जवाब…

कोलकाता से करीब 76 किलोमीटर दूर उत्तर 24 परगना जिले में बांग्लादेश की सीमा से सटे बनगांव स्थित ठाकुरनगर की ठाकुरबाड़ी में इसका जवाब छिपा है। CAA से यहाँ जश्न है और ‘हर-हर मोदी’ की गूँज सुनाई पद रही है।

आखिर यहाँ CAA से इतना हर्षोल्लास क्यों है? दरसअल, ठाकुरबाड़ी में मतुआ समुदाय के लोग रहते हैं। 1971 से लेकर अब तक कोई सरकार उन्हें भारतीय नागरिकता नहीं दिलवा पाई। उनके सिर पर बांग्लादेशी हिंदू शर्णार्थियों का टैग चिपका रहा। CAA ने उनका यह मलाल दूर कर दिया है। रहा।

 उसके पहले मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी वीणापाणि देवी की 100वीं जन्मदिन पर एक कार्यक्रम आयोजित किया था, जहां उन्होंने महारानी से आशीर्वाद लेकर कार्यक्रम की शुरुआत की थी.
मतुआ समुदाय की बड़ी माँ के साथ ममता बनर्जी(साभार: न्यूज18)

बेचैनी की वजह

अब ऐसी स्थिति में जब भाजपा ने ठान लिया है कि वो दूसरे देश के अल्पसंख्यकों को पहचान देंगे, उस समय ममता बनर्जी द्वारा विरोध बताता है कि वो इस कानून के समर्थन में वे कभी नहीं थीं। वे बस इस समुदाय का फायदा उठाकर राज्य में अपनी सरकार खड़ी करना चाहतीं थीं जो उन्होंने किया भी। लेकिन अब उनकी ये नीति नहीं चल पाएगी, क्योंकि सीएए के आने के बाद ठाकुरबाड़ी में नरेंद्र मोदी के नारों ने 2021 के चुनावों की तस्वीर साफ कर दी। इसस पहले बता दें कि परिसीमन के बाद वर्ष 2009 में वजूद में आई इस सीट पर शुरू से ही तृणमूल कांग्रेस का कब्जा रहा है। यहाँ मतुआ समुदाय के वोट निर्णायक हैं। मतुआ समुदाय की कुलमाता कही जाने वाली वीणापाणि देवी का आदेश यहाँ पत्थर की लकीर मानी जाती है। बीते दिनों उनकी मौत के बाद पारिवारिक मतभेद सतह पर आ गए और मतुआ वोट दो हिस्सों में बँट गए।इसका फायदा लोकसभा में भाजपा को हुआ और ठाकुरबाड़ी के शांतनु ठाकुर ने यहाँ से जीत दर्ज कराई। अब फिर वहीं परिस्थितियाँ बनती नजर आ रही हैं।

 21 फरवरी की रात महारानी की तबीयत बिगड़ गई थी. तुरंत उन्हें जवाहरलाल नेहरू मेमोरियल अस्पताल में भर्ती किया गया था. वे फेफड़े में संक्रमण समेत उम्र जनित कई बीमारियों से पीड़ित थीं.

मतुआ समुदाय की बड़ी माँ का आशीर्वाद लेने पहुँचे नरेंद्र मोदी (साभार: न्यूज18)

मतुआ का प्रभाव

मतुआ समुदाय मूल रूप से पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) का है। विभाजन के बाद धार्मिक शोषण से तंग आकर 1950 की शुरुआत में ये लोग यहाँ आए थे। हालाँकि,इस समुदाय को लेकर कोई आधिकारिक आँकड़ा नहीं है, लेकिन इस संप्रदाय के बारे में कहा जाता है कि ये बंगाल में 70 लाख की जनसंख्या के साथ बंगाल का दूसरा सबसे प्रभावशाली अनुसूचि जनजाति समुदाय है। उत्तर व दक्षिण 24 परगना तथा नदिया जिलों की कम से कम 6 संसदीय सीटों पर यह निर्णायक स्थिति में हैं। अनुमान के मुताबिक राज्य के विभिन्न जिलों में इनकी आबादी लगभग 1 करोड़ हैं, जिसके अनुसार 294 विधानसभा में से कम से कम 74 सीटों पर यह निर्णायक भूमिका निभाते हैं। यही वजह है कि मोदी ने फरवरी की अपनी रैली के दौरान वीणापाणि देवी से मुलाकात कर उनका आशीर्वाद लिया था। यह समुदाय पहले लेफ्ट को समर्थन देता था और बाद में वह ममता बनर्जी के समर्थन में आ गया। लेकिन अब पासा फिर पलटने के आसार हैं। माना जाता है कि पिछली बार ममता बनर्जी के सत्ता में आने के पीछे मतुआ समुदाय के वोटर्स का बड़ा हाथ था।

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जामिया नगर से गिरफ्तार हुए 10 लोगों का पहले से है आपराधिक रिकॉर्ड, पुलिस ने नहीं चलाई एक भी गोली

नागरिकता संशोधन विधेयक आने के बाद दिल्ली के जामिया नगर में खूब बवाल हुआ। छात्रों और पुलिस के बीच टकराव की खबरें सैलाब की तरह सोशल मीडिया पर फैल गई। उपद्रवियों के ख़िलाफ पुलिस के एक्शन को छात्रों पर हमला बताया गया और जगह-जगह उनकी कार्रवाई की निंदा हुई। बावजूद इसके पूरे मामले के मद्देनजर 10 लोग गिरफ्तार हुए। पुलिस ने बताया कि उनके द्वारा किसी छात्र को गिरफ्तार नहीं किया गया है और न ही उन्होंने इस टकराव में एक भी गोली चलाई है।

पुलिस के मुताबिक, इस पूरे मामले में गिरफ्तार किए गए सभी 10 लोग के बारे में जाँच की जा रही है। साथ ही अन्य लोगों की भी पकड़ने की कोशिश जारी है। गिरफ्तार आरोपितों की जाँच में पुलिस ने पाया है कि इन लोगों का पहले भी आपराधिक रिकॉर्ड रह चुका है। जिसके बाद पुलिस ने इस पूरे मामले में सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाने के लिए 2 एफआईआर दर्ज की हैं।

गौरतलब है कि बीते दिनों मोदी सरकार, उनकी नीतियों और नए कानून के विरोध में दिल्ली के जामिया नगर में विरोध प्रदर्शन करने के लिए बड़ी तादाद में लोग इकट्ठा हुए। जिसमें जामिया मिलिया इस्लामिया के छात्र भी शामिल थे। इसी दौरान कुछ अराजक तत्वों ने विरोध को दंगे का रूप देने के लिए बसों में आग लगा दी और पुलिस पर पत्थरबाजी करनी शुरू कर दी। स्थिति इतनी बिगड़ गई कि पुलिस को लाठीचार्ज करना पड़ा और आँसू गैस छोड़ने पड़े, ताकि भड़की भीड़ को रोका जा सके।

बता दें कि सोमवार को ये मामला हल्का पड़ने के बाद आज इस मामले में एक और बड़ा खुलासा हुआ है। जिसके बारे में जामिया यूनिवर्सिटी के प्रशासन ने खुद जानकारी देते हुए बताया है कि उसके कैम्पस में 750 फेक आईडी कार्ड मिले हैं। कहा गया है कि यूनिवर्सिटी में बड़ी संख्या में बाहरी लोग घुसपैठ कर रहे हैं और 750 फ़र्ज़ी आईडी कार्ड का मिलना संदेह पैदा करता है। जामिया के प्रॉक्टर ने हिंसा के लिए इसी घुसपैठ को जिम्मेदार ठहराया है। जामिया की कुलपति नज़मा अख्तर ने भी इसकी पुष्टि करते हुए बताया कि यूनिवर्सिटी कैम्पस में बाहर से लोग आ रहे हैं और वो फ़र्ज़ी आईडी कार्ड बना कर रह रहे हैं।

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‘लीगल एक्सपर्ट’ जावेद अख्तर की बोलती बंद, जामिया पर IPS अधिकारी ने पूछा- हमें भी बताएँ एक्ट

नागरिकता संशोधन कानून को लेकर जामिया मिलिया इस्लामिया में हिंसक प्रदर्शन किया गया। प्रदर्शनकारियों ने चार सरकारी बसों को आग लगा दी गई और सौ से अधिक निजी वाहनों को क्षतिग्रस्त कर दिया। हालात पर काबू पाने के लिए पुलिस को कार्रवाई करनी पड़ी। इस पर वामपंथी बुद्धिजीवी जावेद अख्तर ने प्रतिक्रिया जाहिर करते हुए पुलिस के यूनिवर्सिटी में प्रवेश करने पर सवाल उठाया है। उनका कहना है कि पुलिस ने बिना अनुमति के यूनिवर्सिटी कैंपस के अंदर घुसकर ‘लॉ ऑफ लैंड’ का उल्लंघन किया है।

दरअसल, जामिया में प्रदर्शन को कवर करते वक्त एक हिंदी चैनल के महिला पत्रकार के साथ बदसलूकी की गई। एक यूजर ने ABP न्यूज की महिला पत्रकार के साथ छात्रों की बदतमीजी का वीडियो शेयर करते हुए ट्वीट किया। इस विडियो में यूजर ने जावेद अख्तर समेत अन्य कुछ लोगों को टैग करते हुए लिखा, “जामिया के छात्र उस मीडिया पर अटैक कर रहे हैं, जो उन्हें उनके द्वारा किए जा रहे शांतिपूर्ण विरोध का आईना दिखा रहे हैं। लेकिन ऐंटी-नेशनल और सेक्युलर लोग इसकी निंदा नहीं करेंगे। ये शहरी आतंकवादी हैं।”

इसका जवाब देते हुए जावेद अख्तर ने ट्वीट किया, “लॉ ऑफ लैंड के मुताबिक, किसी भी परिस्थिति में पुलिस किसी भी यूनिवर्सिटी के कैंपस में यूनिवर्सिटी के अधिकारियों की इजाजत के बिना नहीं घुस सकती। जामिया कैंपस में बिना इजाजत घुसकर पुलिस ने एक ऐसी मिसाल कायम की है जो हर यूनिवर्सिटी के लिए एक खतरा है।”

जावेद अख्तर के इस ट्वीट पर आईपीएस अधिकारी संदीप मित्तल ने अपनी प्रतिक्रिया देते हुए पूछा कि वो पुलिस के जिस लैंड ऑफ लॉ के बारे में बात करते हुए कह रहे हैं कि पुलिस ने कैंपस के अंदर घुसकर कानून का उल्लंघन किया है। वो जरा उस लैंड ऑफ लॉ, उस सेक्शन और उस ऐक्ट के बारे में बताएँ। उन्होंने जावेद अख्तर को ‘लीगल एक्सपर्ट’ कहकर तंज कसते हुए ट्वीट किया, “प्रिय लीगल एक्सपर्ट, प्लीज लॉ ऑफ लैंड, सेक्शन नंबर और ऐक्ट आदि के नाम को थोड़ा विस्तार से समझाएँ ताकि हम भी इसके बारे में अच्छे से जान सकें।”

आईपीएस अधिकारी के इस ट्वीट के बाद जावेद अख्तर ने चुप्पी साध ली। इस ट्वीट पर उनका कोई जवाब नहीं आया। वैसे जावेद अख्तर का ट्वीट करना कई सोशल मीडिया यूजर को रास नहीं आया और उन्होंने उन्हें ट्रोल कर दिया। एक यूजर ने लिखा, “सर तो शायर हैं, उन्हें कानून वानून का कहाँ पता होगा… व्हाट्सऐप पे आया होगा, कॉपी कर के चिपका दिए।”

एक ने लिखा, “जावेद साहब लॉ की जानकारी बराबर रखना मँह से थूकने जितना सरल नहीं है।”

एक ट्विटर यूजर ने लिखा, “चचा जिहादी बसों में आग लगाते रहें, सड़कों को जाम कर दें, ईंट-पत्थर फेकें, पुलिस चुपचाप शान्ति से देखे और फूल बरसाएँ ये चाहते हो।”

इसके अलावा एक अन्य यूजर ने लिखा, “क्या आप कहना चाहते हैं कि यदि कोई व्यक्ति किसी को मारकर परिसर या मस्जिद के अंदर छिप जाता है, तो पुलिस बिना अनुमति के अंदर प्रवेश नहीं कर सकती है?”

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सीजेआई एसए बोबडे की अध्यक्षता वाली पीठ ने मंगलवार (दिसंबर 17, 2019) को जामिया मिलिया इस्लामिया के प्रदर्शनकारी छात्रों के ख़िलाफ़ हुई कथित हिंसा को लेकर सुनवाई की। अधिवक्ता महमूद पाशा ने जामिया के छात्रों की तरफ़ से पैरवी की। सीजेआई बोबडे ने उनसे पूछा कि वो सुप्रीम कोर्ट से क्या चाहते हैं? इस पर जामिया के वकील ने कहा कि सशस्त्र पुलिस ने निहत्थे और निर्दोष छात्रों पर हमला किया। उन्होंने दावा किया कि पूरा देश में घेराबंदी जैसा माहौल है और हर जगह विरोध-प्रदर्शन हो रहे हैं। उन्होंने छात्रों को ‘गाइडिंग लाइट’ बताया।

जामिया के वकील ने माँग करते हुए कहा कि शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन के अधिकार की रक्षा होनी चाहिए। इस पर सीजेआई ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट क्या कर सकता है? उन्होंने कहा कि ऐसी हिंसा विभिन्न हिस्सों में हो रही हैं, जहाँ अलग-अलग सरकारें हैं और अलग-अलग प्रशासन है। उन्होंने पूछा कि क्या सुप्रीम कोर्ट उन सभी के लिए अलग-अलग क़दम उठाए? सीजेआई बोबडे ने कहा कि ये कोई ट्रायल कोर्ट नहीं है, सुप्रीम कोर्ट है। उन्होंने वकील से पूछा कि कितनी बसें जलाई गईं, जिसका जवाब देने में वे असफल रहे। महमूद ने बताया कि इसके लिए जाँच हो रही है।

इसके बाद सीजेआई बोबडे ने जामिया के छात्रों के वकील को फटकार लगाते हुए कहा कि आपको फैक्ट्स पता होने चाहिए, क्योंकि यहाँ सुप्रीम कोर्ट में बैठ कर वो फैक्ट्स का पता नहीं लगा सकते। उन्होंने पूछा कि वो लोग सुप्रीम कोर्ट के पास क्यों आए हैं? सीजेआई ने कहा- “आप ऐसी अदालत में जाइए जहाँ फैक्ट्स का पता लगाया जा सके और फिर सुनवाई हो। आप हमारे पास क्यों आए हैं?” वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंह ने आरोप लगाया कि छात्रों के ख़िलाफ़ सैंकड़ों एफआईआर दर्ज की गई है। उन्होंने कहा कि छात्रों को इस तरह से जेल में नहीं ठूँसा जा सकता है।

सीजेआई ने इंदिरा जयसिंह से पूछा कि अगर छात्र पत्थरबाजी करते हैं तो क्या उनके ख़िलाफ़ एफआईआर नहीं होगी? इसके जवाब में इंदिरा जयसिंह ने कहा कि वो शांति स्थापित करने के उपायों को लागू करने की माँग करती हैं। सीजेआई बोबडे ने पूछा कि छात्र अगर इस तरह की हरकत करेंगे तो फिर पुलिस क्या करेगी? इसके बाद जयसिंह ने यूनिवर्सिटी और वीसी की अनुमति की बातें कहनी शुरू कर दी। उन्होंने छात्रों के घायल होने का रोना रोया। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने उनकी बात को काटा और कहा कि एक भी छात्र को गिरफ़्तार नहीं किया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस मामले में हाई कोर्ट के निर्णय का इंतजार करना चाहिए, यही अच्छा रहेगा।

दरअसल, इंदिरा जयसिंह चाहती थीं कि जैसे हैदराबाद एनकाउंटर मामले में सुप्रीम कोर्ट ने एक आयोग का गठन कर जाँच सौंपी थी, वैसा ही इस मामले में भी किया जाए। लेकिन, सीजेआई बोबडे न बताया कि तेलंगाना एक राज्य का मामला था, जबकि छात्रों का विरोध-प्रदर्शन कई राज्यों का मामला है। ऐसे में एक आयोग से कुछ नहीं होगा। साथ ही सीजेआई बोबडे ने मीडिया रिपोर्ट्स को देखने से भी इनकार कर दिया और कहा कि वो उस पर कोई टिप्पणी नहीं करेंगे।

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जामिया हिंसा में हाथ सेंकने ट्विटर पर लौट आए अनुराग कश्यप, स्वरा भास्कर ने भी उगला जहर

तारीख थी 9 अगस्त 2019 की। ‘डरा हुआ शांतिप्रिय नैरेटिव’ गढ़ने में शुमार रहे फिल्मकार अनुराग कश्यप ने अपना ट्विटर अकाउंट डिलीट कर दिया था। यह कहते हुए कि “आप सभी की ख़ुशी और सफलता की कामना करता हूँ। यह मेरा आख़िरी ट्वीट है क्योंकि मैं ट्विटर अकाउंट डिलीट कर रहा हूँ। जब मुझे मेरे दिमाग में जो चल रहा है वो बिना डर के बोलने नहीं दिया जाएगा तो बेहतर है मैं कुछ भी ना बोलूँ। गुड बॉय।” यह कदम उन्होंने नेटफ्लिक्स पर सेक्रेड गेम्स का दूसरा सीजन रिलीज होने से पहले उठाया था।

लेकिन, जामिया मिलिया इस्लामिया में हिंसा होते ही उन्होंने ट्विटर से अपना स्वयंभू निर्वासन समाप्त कर दिया है। आते ही अपने मनपसंद काम में जुट गए हैं। ‘डरा हुआ शांतिप्रिय’ को बचाने के लिए मोदी सरकार और दिल्ली पुलिस पर भड़ास निकाली है। उनके साथ स्वरा भास्कर सहित बॉलीवुड का पूरा सिकुलर गैंग मोर्चे पर लग गया है।

जामिया के छात्रों को रोकने के लिए पुलिस द्वारा उठाए गए कदमों की निंदा करते हुए अनुराग कश्यप लिखते हैं, “अब बहुत हो चुका… और ज्यादा खामोश नहीं बैठ सकता। ये बहुत फासीवादी सरकार है… मुझे बहुत गुस्सा आता है इस बात पर कि वो लोग जो बदलाव ला सकते हैं वे खामोश बैठे हैं।”

सोशल मीडिया पर वायरल होती तस्वीरों और वीडियोज़ से आहत तापसी पन्नू ने पूछा है ये शुरुआत है या अंत। वे लिखती हैं, “आश्चर्य है कि यह एक शुरुआत या अंत है। चाहे जो भी हो, निश्चित तौर पर इससे कानून के नए नियम लिखे जा रहे हैं, जो इसमें फिट नहीं है वह बहुत अच्छे से इसका परिणाम देख सकता है। इस वीडियो ने सबका दिल और उम्मीद एक साथ तोड़ा है। अपरिवर्तनीय क्षति, और मैं सिर्फ जीवन और संपत्ति के बारे में बात नहीं कर रही हूँ।”

जामिया में प्रदर्शनकारियों के खिलाफ़ हुई हिंसा के मुद्दों पर मनोज वाजपेयी ने ट्वीट कर कहा, “ऐसा वक्त हो सकता है जब हम अन्याय को रोकने के लिए शक्तिहीन होते हैं, लेकिन किसी भी समय ऐसा नहीं होना चाहिए जब हम विरोध करने में विफल हों। विरोध करने के लिए छात्रों और उनके लोकतांत्रिक अधिकारों के साथ हूँ! मैं प्रदर्शनकारी छात्रों के खिलाफ हिंसा की निंदा करता हूँ!!!”

फिल्म निर्देशक सुधीर मिश्र ट्वीट कर लिखते हैं, “साल 1987 में मैंने एक फिल्म बनाई थी, जिसका नाम ‘ये वो मंजिल तो नहीं’ था। इस फिल्म की पृष्ठभूमि थी कि क्लाइमेक्स में पुलिस कॉलेज कैंपस के अंदर प्रवेश करती है और बच्चों को मारती है। अब भी कुछ नहीं बदला। ये जानना भयावह है फूल मसल दिए गए हैं।” वहीं फिल्म एक्ट्रेस कोंकाणा सेन भी लिखती हैं कि वो छात्रों के साथ हैं और दिल्ली पुलिस को शर्म आनी चाहिए।

इधर, कम से समय में बॉलीवुड में अपनी अलग पहचान बनाने वाले राजकुमार राव लिखते हैं, “पुलिस ने छात्रों के साथ व्यवहार में जो हिंसा दिखाई, मैं उसकी कड़ी निंदा करता हूँ। लोकतंत्र में नागरिकों को शांतिपूर्वक विरोध करने का अधिकार है। मैं सार्वजनिक संपत्तियों के विनाश के किसी भी प्रकार के कार्य की निंदा करता हूँ। हिंसा किसी भी चीज का हल नहीं है।”

हाल ही में आर्टिकल 15 को लेकर चर्चा में रहे आयुष्मान खुराना लिखते हैं, “स्टूडेंट जिस दौर से गुजर रहे हैं, उसे देखकर मैं बहुत विचलित हूँ। मैं इसकी निंदा करता हूँ। हम सभी को प्रोटेस्ट करने का अधिकार है। पर किसी भी प्रकार से प्रोटेस्ट वायलेंट नहीं होना चाहिए और सार्वजनिक संपत्तियों का ख्याल रखना चाहिए। यह गलत है। प्यारे देश वासियों यह गाँधी की भूमि है। अहिंसा अपनी चीजों को एक्सप्रेस करने का तरीका होना चाहिए। डेमोक्रेसी में हमारी आस्था होनी चाहिए।”

अक्सर सरकार की नीतियों से असहमत रहने वाली स्वरा भास्कर इस विषय पर लिखती हैं कि दिल्ली के जामिया में आँसू गैस के गोले छोड़े गए। कई छात्रों के साथ अपराधियों के जैसा सलूक किया जा रहा है? हॉस्टलों में आँसू गैस छोड़ी जा रही है? दिल्ली पुलिस ये क्या चल रहा है? ये सब हैरान करने वाला और शर्मनाक है। आपको शर्म आनी चाहिए दिल्ली पुलिस।

अली फजल इस मुद्दे पर प्रतिक्रिया देते हुए लिखते हैं, ” मेरे बहुत सारे साथी हैं जो इस पर नहीं बोल रहे। लेकिन मैं दुआ करता हूँ कि हमें जल्द से जल्द एहसास हो कि इंसानियत से ऊपर कोई जॉब कोई करियर नहीं हैं। इसलिए अपनी राजनैतिक विचारधारों से परे अभी सोचो! और समय कम है इसलिए जल्दी प्रतिक्रिया दो।”

बता दें इस छात्रों के समर्थन में आकर दिल्ली पुलिस की निंदा करने वालों की सूची में विक्की कौशल भी शामिल हैं। जिन्होंने अपने ट्वीट के जरिए चिंता व्यक्त की है। उन्होंने लिखा, “जो हो रहा है वह ठीक नहीं है। जिस तरह से ये हो रहा है वो भी ठीक नहीं है। लोगों को शांतिपूर्वक अपनी राय रखने का पूरा अधिकार है। यह हिंसा और व्यवधान दोनों दुखद है और एक साथी नागरिक होने के नाते उसी के विषय के बारे में है। किसी भी परिस्थिति में, लोकतंत्र से हमारा विश्वास नहीं टूटना चाहिए।”

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जामिया में मिले 750 फ़र्ज़ी आईडी कार्ड: महीनों से रची जा रही थी साज़िश, अचानक नहीं हुई हिंसा

जामिया मिलिया इस्लामिया में चल रहे विरोध-प्रदर्शन के बीच एक बड़ा खुलासा हुआ है। जामिया यूनिवर्सिटी प्रशासन ने ख़ुद जानकारी दी है कि उसके कैम्पस में 750 फेक आईडी कार्ड मिले हैं। कहा गया है कि यूनिवर्सिटी में बड़ी संख्या में बाहरी लोग घुसपैठ कर रहे हैं और 750 फ़र्ज़ी आईडी कार्ड का मिलना सदेह पैदा करता है। जामिया के प्रॉक्टर ने हिंसा के लिए इसी घुसपैठ को जिम्मेदार ठहराया है। जामिया की कुलपति नज़मा अख्तर ने भी इसकी पुष्टि करते हुए बताया कि यूनिवर्सिटी कैम्पस में बाहर से लोग आ रहे हैं और वो फ़र्ज़ी आईडी कार्ड बना कर रह रहे हैं।

कुलपति ने कहा कि यही घुसपैठिए हिंसा फैला कर जामिया के छात्रों को बदनाम भी कर रहे हैं। पिछले 3 महीनों के अंदर 750 फ़र्ज़ी आईडी कार्ड बरामद किए गए हैं। इससे पता चलता है कि जामिया में हो रही हिंसा की साजिश पिछले 3 महीने से रची जा रही थी। हिंसा भड़काने की तैयारी काफ़ी पहले से थी और संशोधित नागरिकता क़ानून के रूप में उन्हें एक नया हथियार मिल गया। अब सवाल यह उठता है कि इतनी बड़ी संख्या में फ़र्ज़ी आई कार्ड मिलने के बाद क्या पुलिस में इसकी शिकायत की गई? अगर शिकायत हुई तो पुलिस की जाँच में क्या निकला?

पुलिस के बयान से भी इसके पीछे बड़ी साज़िश की बू आती है। साउथ ईस्ट दिल्ली के एडिशनल डीसीपी कुमार ज्ञानेश ने कहा कि पुलिस ने जब आँसू गैस के गोले छोड़े, तब उससे बचने के लिए प्रदर्शनकारियों ने भींगे हुए कम्बलों का प्रयोग किया। ये उनके पास बड़ी तादाद में थे। इससे पता चलता है कि वो पूरी तैयारी के साथ आए थे। उन्होंने स्पष्ट कहा कि ये विरोध प्रदर्शन स्वाभाविक नहीं था, बल्कि जो कुछ भी हिंसक वारदातें हुईं उसकी पहले से योजना बनाई गई थी।

फ़िलहाल जामिया नगर में हुई हिंसा के मामले में मंगलवार (दिसंबर 17, 2019) को 10 लोगों को गिरफ़्तार किया है। ऊपर संलग्न किए गए वीडियो में आप देख सकते हैं कि दिल्ली पुलिस के ज्वाइंट कमिश्नर लगातार प्रदर्शनकारी छात्रों से अपील कर रहे हैं कि वे पत्थरबाजी न करें लेकिन उनकी बात नहीं मानी गई। पुलिस ने पूरी तरह संयम का परिचय दिया लेकिन 4 बसों को जलाए जाने और 100 से भी अधिक वाहनों को क्षतिग्रस्त किए जाने के बाद पुलिस को हालात पर काबू पाने के लिए जामिया कैम्पस में प्रवेश करना पड़ा।

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विरोध के नाम पर कुछ दिन पहले आपने जेएनयू के छात्रों का उत्पात देखा होगा। फिलहाल राजधानी दिल्ली में जामिया मिलिया इस्लामिया के छात्र अपने हिंसक प्रदर्शन से सुर्खियों में हैं। यहॉं प्रदर्शन के दौरान मजहबी और उन्मादी नारे लगाते छात्रों के वीडियो भी सामने आए हैं। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में भी विरोध का ऐसा ही रूप दिखा। ऐसे वक्त में भी भोपाल के माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के छात्रों का विरोध एक मिसाल के तौर पर उभरा है।

अपने ही प्रोफेसरों से प्रताड़ित इन छात्रों के साथ बीते दिनों पुलिस ने भी जोर-जबर्दस्ती की थी। बावजूद सोमवार (दिसंबर 16, 2019) की शाम जब ये भोपाल की सड़कों पर निकले तो कोई शोर-शराबा नहीं हुआ। न सार्वजनिक संपत्तियों को नुकसान पहुॅंचाया गया। न ही आम लोगों को इससे कोई परेशानी हुई। शायद यही कारण है कि लुटियंस मीडिया के लिए इनका विरोध मायने नहीं रखता है।

पुलिस की हिंसात्मक कार्रवाई के विरोध में छात्रों ने मुँह पर काली पट्टी बाँधकर मौन कैंडल मार्च निकाला। शांतिपूर्ण तरीके से मार्च करते हुए विश्वविद्यालय के कुलपति दीपक तिवारी की इस्तीफे की माँग की है। साथ ही प्रोफेसर दिलीप मंडल और मुकेश कुमार को बर्खास्त करने और अपने खिलाफ दर्ज FIR वापस लेने की माँग की। छात्रों ने सोमवार की शाम 6 बजे बोर्ड ऑफिस चौराहे से विश्वविद्यालय तक मौन रैली निकाली। इसमें कई कॉलेजों के छात्र-छात्राओं ने हिस्सा लिया।

नई दुनिया के भोपाल संस्करण में प्रकाशित खबर

कुछ सामाजिक संगठनों का समर्थन भी इन्हें हासिल था। ऐसे ही एक संगठन संस्कृति बचाओ मंच के कार्यकर्ताओं ने भी दिलीप मंडल व मुकेश कुमार को बर्खास्त करने के समर्थन में ज्ञापन सौंपा है। साथ ही छात्रों पर दर्ज एफआईआर वापस लेने की भी माँग की है। संस्कृति बचाओ मंच की तरफ से छात्रों के समर्थन में विश्विद्यालय को ज्ञापन सौंपते हुए मंच के अध्यक्ष उमाशंकर तिवारी ने कहा कि छात्रों पर की जा रही कार्रवाई गलत है। इससे पहले ओबीसी एसटी-एसटी एकता मंच ने दोनों फैकल्टी के समर्थन में विवि प्रशासन को ज्ञापन सौंपा था।

उल्लेखनीय है कि दिलीप मंडल और मुकेश कुमार पर छात्रों के बीच जातिगत भेदभाव कर माहौल खराब करने का आरोप है। छात्रों का आरोप है कि दिलीप मंडल और मुकेश कुमार सोशल मीडिया पर जाति विशेष को लेकर लगातार पोस्ट कर रहे हैं। छात्रों ने इस संबंध में 11 दिसंबर को कुलपति को ज्ञापन सौंपते हुए शिकायत की थी कि दिलीप सी मंडल और मुकेश कुमार जाति के आधार पर छात्रों के साथ भेदभाव करते हैं और जातिगत कटुता बढ़ाने का काम कर रहे हैं। मगर विश्वविद्यालय प्रशासन की तरफ से न तो उनसे संपर्क करने की कोई कोशिश की गई और न ही ज्ञापन से संबंधित कोई जवाब दिया गया। उल्टा प्रशासन ने इनके खिलाफ FIR करवा दी और फिर पुलिस ने भी छात्रों के साथ काफी बर्रबरता से मारपीट की। 

कड़ाके की ठंड, घुप्प अँधेरी रात, 20 किमी घुमाया, कपड़े उतरवाए: दिलीप मंडल का विरोध करने की सजा

पूरा नाम क्या है? जाति जानने के बाद प्रताड़ित करते हैं दिलीप मंडल: माखनलाल यूनिवर्सिटी के छात्र

दिलीप मंडल पढ़ाने की जगह ‘जाति के आधार पर विभाजन’ खड़ा कर रहे हैं: माखनलाल यूनिवर्सिटी में बवाल

रेलवे को ₹250 करोड़ का नुकसान: CAA विरोधी प्रदर्शन के नाम पर दर्जनों स्टेशनों को किया तबाह

संशोधित नागरिकता क़ानून के ख़िलाफ़ हो रहे हिंसक विरोध प्रदर्शन के कारण भारतीय रेलवे को भारी नुकसान हुआ है। रेलवे ने कहा है कि उसे इस विरोध प्रदर्शन के कारण 250 करोड़ रुपए का भारी नुकसान हुआ है। बता दें कि पश्चिम बंगाल के कई इलाक़ों में जुमे की नमाज़ के बाद मस्जिद से निकली हज़ारों की भीड़ ने न सिर्फ़ रेलवे स्टेशनों को तहस-नहस कर दिया बल्कि ट्रेनों का परिचालन ठप्प कर यात्रियों को घंटों बंधक बनाए रखा। कुर्ता-पायजामा-इस्लामी टोपी पहने लोगों ने पत्थर और रॉड का इस्तेमाल कर के ट्रेनों की खिड़कियाँ तोड़ डाली। इस दौरान यात्री डरे-सहमे दुबके रहे। रेलवे के कई कर्मियों को टॉयलेट में छिप कर अपनी जान बचानी पड़ी।

ईस्ट रेलवे ने बताया कि उसे अब तक 8 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ है। कई इलाक़ों में ‘रेल रोको अभियान’ और बंद का आयोजन किया गया, जिससे साउथ-ईस्ट रेलवे को 16 करोड़ रुपयों का नुकसान हुआ है। ईस्टर्न रेलवे ने बताया है कि उसके 15 स्टेशनों को तबाह कर दिया गया। कई स्टेशनों पर कैश बॉक्स को लूट लिया गया। कुल मिला कर अब तक 250 करोड़ रुपयों का नुकसान हुआ है, जिसके और बढ़ने की ही आशंका है। न सिर्फ़ रेलवे बल्कि जामिया में विरोध प्रदर्शनों के बाद दिल्ली में मेट्रो लाइनों की भी सुरक्षा बढ़ा दी गई है। कई मेट्रो स्टेशनों के गेट बंद कर दिए गए।

सबसे ज्यादा हिंसा पश्चिम बंगाल में हुई। उसी तरह पूर्वोत्तर में भी ऐसे कई विरोध प्रदर्शन हुए। असम में उपद्रवियों के ख़िलाफ़ 136 केस दर्ज किए गए हैं और कुल 190 आरोपितों को गिरफ़्तार किया गया है। इनमें से कई ऐसे लोग हैं, जो तरह-तरह के संगठनों से जुड़े हैं। पुलिस ने बताया कि गिरफ़्तार किए गए लोगों में कोई भी लोकतांत्रिक तरीके से विरोध नहीं कर रहा था बल्कि वो हिंसा में संलग्न थे। पुलिस की जवाबी कार्रवाई में 26 प्रदर्शनकारी घायल हुए हैं, 4 लोग मारे गए। पुलिस ने बताया कि उसे सार्वजनिक संपत्ति को बचाने के लिए फायरिंग करनी पड़ी। फ़िलहाल स्थिति नियंत्रण में है।

उधर जामिया में हिंसा के मामले में मंगलवार (दिसंबर 17, 201) को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई होगी। विपक्षी दलों का प्रतिनिधिमंडल राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने मुलाक़ात कर के उनके समक्ष अपनी बात रखेगा। केरल में भी एक कट्टरपंथी संगठन ने हड़ताल की घोषणा की है, जिसका समर्थन करने से वामपंथी दल व कॉन्ग्रेस बच रही है। सोशल मीडिया पर कई सेलेब्रिटीज ने दिल्ली पुलिस पर हिंसा करने का आरोप लगाया और हिंसा फैलाने वालों के समर्थन में बयान दिया।