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कट्टरपंथी इस्लामिक संगठन ने CAA के ख़िलाफ़ बुलाई हड़ताल: खास वजह से कॉन्ग्रेस व वामपंथियों ने बनाई दूरी

संशोधित नागरिकता क़ानून को लेकर कई जगह विरोध प्रदर्शन चालू है और विपक्षी दल लगातार इसे भुनाने में लगे हैं। केरल में मामला अलग नहीं है और यहाँ भी कई मुस्लिम व दलित संगठनों ने इस क़ानून के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन आयोजित किया है। इसी क्रम में मंगलवार (दिसंबर 17, 2019) को केरल के कुछ संगठनों ने हड़ताल आयोजित किया है, जिसमें संशोधित नागरिकता क़ानून के ख़िलाफ़ सड़क पर उतर कर विरोध दर्ज कराया जाएगा। लेकिन, राजनीतिक दलों को ये लगता है कि इससे जनता के बीच यह सन्देश जाएगा कि इस क़ानून से कुछ समुदायों के ऊपर ही बुरा असर पड़ा है।

राजनीतिक दल इसे राष्ट्रीय विरोध का मुद्दा बनाने पर उतारू हैं और वो जनता को ये विश्वास दिलाना चाहते हैं कि इससे पूरे देश का नुकसान है। केरल के मुख्यमंत्री पिन्नाराई विजयन और नेता प्रतिपक्ष रमेश चेन्नीथाला ने बार-बार कहा है कि ये क़ानून पूरे देश के लिए नुक़सानदेह है। कई राजनीतिक पार्टियों और संगठनों ने मंगलवार को बुलाए गए हड़ताल से दूर रहने का फ़ैसला लिया है। इस हड़ताल को एमके फैजी की सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (SDPI) ने बुलाया है। एसडीपीआई के आतंकियों से कनेक्शन सामने आते रहते हैं और कन्नूर के नारथ इलाक़े में इसके नेताओं के यहाँ पुलिस की रेड में कई ख़तरनाक हथियार मिले थे।

केरल के राजनीतिक दल ख़ुद को एसडीपीआई से दूर दिखाने के लिए इस हड़ताल में हिस्सा नहीं ले रहे हैं। एनआईए ने स्पष्ट कहा था कि एसडीएफआई योग और स्वास्थ्य कैम्पों के नाम पर हथियारों का प्रशिक्षण देता है और देश की सुरक्षा के लिए ख़तरा है। केरल के कुछ उत्तरी जिलों में सीएए के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं।इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग और सुन्नी जमीयतुल उलामा ने भी इस हड़ताल से दूरी बनाने का फ़ैसला लिया है। जमीयतुल ने कहा कि उनकी पार्टी किसी ऐसे संगठन के साथ सड़क पर नहीं उतरेगी, जो क़ानून को अपने हाथ में लेता हो या फिर जो कट्टरवादी हो।

जमीयतुल के नेताओं ने कहा कि हड़ताल शांतिपूर्ण और क़ानून-व्यवस्था बनाए रखते हुए होना चाहिए। उन्होंने कहा कि कुछ छोटे संगठनों ने हड़ताल बुलाई है लेकिन इससे कोई बदलाव नहीं आ जाएगा। जमीयतुल नेता कांथापुरम ने आशंका जताई कि इस हड़ताल से सांप्रदायिक हिंसा की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। उन्होंने आशंका जताई कि इससे व्यापारियों को ख़ासा नुकसान हो सकता है, जो आर्थिक मंदी की वजह से पहले से ही ख़ासे परेशान चल रहे हैं। उन्होंने कहा कि वो पीएम मोदी और गृहमंत्री अमित शाह से मिल कर अपनी बात रखेंगे और बताएँगे कि कैसे इस क़ानून का मुस्लिमों पर बुरा असर पड़ा है। साथ ही उन्होंने कहा कि अगर फिर भी बात नहीं बनती है तो उनकी पार्टी सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाएगी।

वहीं मुस्लिम लीग का मानना है कि सीएए के विरोध को किसी ख़ास समुदाय से जोड़ कर नहीं देखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि सबरीमाला मंदिर में दर्शन चालू है और ऐसे समय में हड़ताल आयोजित कर के जनजीवन अस्त-व्यस्त करने का उनकी पार्टी समर्थन नहीं करती है। इधर राज्य सरकार ने सभी जिलों की पुलिस को स्पष्ट निर्देश दिया है कि क़ानून हाथ में लेने वालों के ख़िलाफ़ कड़ी कार्रवाई की जाए। हड़ताल से 7 दिन पहले ही संगठनों को पुलिस को इसकी सूचना देनी थी लेकिन ऐसा नहीं किया गया। सिर्फ़ सोशल मीडिया में ही सूचना दी गई। जो भी हो, इस हड़ताल को अधिकतर राजनीतिक दलों और संगठनों का समर्थन नहीं मिल रहा है।

ATS ने 9 महिलाओं समेत 12 बांग्लादेशियों को मुंबई से किया गिरफ्तार, MP से भी 1 घुसपैठिए को दबोचा

महाराष्ट्र की राजधानी मुंबई से सटे पालघर से आतंकरोधी दस्ते (ATS) ने सोमवार (दिसंबर 16, 2019) को 12 बांग्लादेशी नागरिकों को गिरफ्तार किया। इनमें 9 महिलाएँ हैं। इन सभी बांग्लादेशी नागरिकों को बोइसर के यशवंत सृष्टि इलाके से गिरफ़्तार किया गया है। अधिकारियों का कहना है कि ये बांग्लादेशी नागरिक बिना किसी वैध दस्तावेज के अवैध रूप से भारत में रह रहे थे। अब मामले में आगे की जाँच जारी है।

इससे पहले रविवार रात एटीएस की चारकोप इकाई ने छापेमारी कर 8 को गिरफ्तार किया था। अधिकारियों के अनुसार गिरफ्तार लोगों ने खुद स्वीकारा कि वे बांग्लादेशी नागरिक हैं। एक अधिकारी के अनुसार पुलिस ने बाांग्लादेशी नागरिकों पर पासपोर्ट नियमों, विदेशी अधिनियम और आईपीसी की धाराओं के तहत मामला दर्ज किया है।

अभी तक प्राप्त जानकारी के अनुसार अवैध रूप से देश में रह रहे इन बांग्लादेशियों के बारे में बताया जा रहा है कि इन्होंने यहाँ अधिकारियों की मिली भगत से पैन कॉर्ड और आधार कार्ड भी बनवा लिया था। इसके अलावा मध्यप्रदेश के खरगोन से भी पुलिस ने एक बांग्लादेशी घुसपैठिए को गिरफ्तार किया है। पुलिस के अनुसार आरोपित करीब 2 साल से खरगोन में अवैध तरीके से रह रहा था। उसकी पहचान आकाश राय के रूप में हुई।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक आकाश ने पूछताछ में बताया है कि वो साल 2009 में भारत आया था। यहाँ आने के बाद कुछ समय वह कोलकाता के हावड़ा में रहा, फिर यूपी गया और फिर वहाँ से 2017 में खरगोन चला गया। हाल-फिलहाल में उसे कसरावद में शरण ले रखी थी। लेकिन मुखबिर की सूचना पर वो पकड़ा गया।

ये गिरफ्तारियॉं ऐसे वक्त में हुई है जब बांग्लादेश ने कहा है कि भारत से उसने अवैध रूप से रह रहे अपने नागरिकों की जानकारी मॉंगी है। बांग्लादेश के विदेश मंत्री एके अब्दुल मोमेन ने रविवार (दिसंबर 15, 2019) को कहा था कि हमने भारत से अवैध रूप से रह रहे बांग्लादेशी नागरिकों की सूची मुहैया कराने का अनुरोध किया है। उन्होंने कहा कि भारत द्वारा सूची मुहैया कराने पर उन नागरिकों को लौटने की मंजूरी दी जाएगी।

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‘हमारे लीडर्स कहाँ हैं? वेणुगोपाल वगैरह को भेजो’: जामिया पर प्रियंका गाँधी की पॉलिटिक्स फुस्स

जामिया मिलिया इस्लामिया में दिल्ली पुलिस की कथित बर्बरता को लेकर प्रियंका गाँधी ने इंडिया गेट पर केंद्र सरकार के ख़िलाफ़ धरना दिया। उनके धरने में न तो भीड़ जुटी और न ही उन्हें जनसमर्थन मिला। इसका असर प्रियंका के चेहरे पर साफ झलक रहा था। हालत यह थी कि वे जब धरने पर बैठने के लिए इंडिया गेट पहुॅंची तो गिनती के ही नेता थे। इसके बाद उनके साथ धरने पर बैठी महिला कॉन्ग्रेस की अध्यक्ष सुष्मिता देव ने आनन-फानन में किसी को फोन लगाया और फटकारने वाले अंदाज़ में पूछा- “हमारे लीडर्स कहाँ हैं?” इसके बाद वो कहती हैं- “आओ भेजिए, वेणुगोपाल वगैरह को भेजिए। आप समझ गए न?”

इंडिया गेट पर प्रियंका गाँधी के धरने को लेकर जनता में तो उत्साह नहीं ही देखने को मिला। कॉन्ग्रेस नेता व कार्यकर्ता भी नहीं थे। इसलिए, प्रियंका ने फोन लगवा कर कर्नाटक कॉन्ग्रेस के प्रभारी किसी वेणुगोपाल को भेजने को कहवाया। कॉन्ग्रेस के ‘चुनावी वॉर रूम’ में सक्रिय रहने वाले वेणुगोपाल धरना स्थल पर पहुँचे तो ज़रूर लेकिन वे वहाँ पर ऊँघते हुए नज़र आए। यहाँ तक कि ख़ुद कॉन्ग्रेस महासचिव प्रियंका गाँधी भी ऊँघती नज़र आईं। नीचे संलग्न किए गए वीडियो में आप देख सकते हैं कि कैसे भीड़ न होने की वजह से नाराज़ प्रियंका ने फोन करवाया:

जामिया हिंसा पर सियासी रोटी सेंकने पहुॅंची प्रियंका गॉंधी के धरने की तस्वीरें और सुष्मिता देव के फोन कॉल का वीडियो सोशल मीडिया वायरल होते ही कॉन्ग्रेस की किरकिरी हो गई। हालॉंकि इस दौरान मोदी सरकार पर बरसने में प्रियंका ने कोई कमी नहीं की। उन्होंने कहा इस दौरान प्रियंका ने कहा कि ये लोकतंत्र है, तानाशाही नहीं है और छात्र लोकतंत्र का आधार हैं। प्रियंका ने गुंडों के सामने न झुकने की बात कही। प्रियंका ने जामिया में हुई घटना पर प्रधानमंत्री से जवाब माँगा। उन्होंने कहा कि पीएम को डूबती अर्थव्यवस्था पर बोलना चाहिए। उन्होंने कुलदीप सेंगर को लेकर भाजपा पर निशाना साधते हुए कहा कि उनके विधायक ने एक महिला का बलात्कार किया और पीएम मोदी चुप रहे। प्रियंका ने कहा कि युवा इस देश की आत्मा हैं और सरकार ने देश की आत्मा पर प्रहार किया है।

बता दें कि जामिया नगर में संशोधित नागरिकता क़ानून के ख़िलाफ़ चल रहा विरोध प्रदर्शन तब हिंसक हो उठा, जब उपद्रवियों ने शनिवार (दिसंबर 15, 2019) को 4 बसों में आग लगा दी और 100 से भी अधिक वाहनों को क्षतिग्रस्त कर दिया। इसके बाद पुलिस को जामिया कैम्पस में घुस कर स्थिति को नियंत्रित करना पड़ा। आम विधायक अमानतुल्लाह ख़ान भी भीड़ का नेतृत्व करते देखे गए। जहाँ आप सुप्रीमो अरविन्द केजरीवाल ने इस घटना की निंदा की, उप-मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने दिल्ली पुलिस पर ही आग लगाने का इल्जाम लगा दिया।

प्रियंका गाँधी पहुँचीं उन्नाव, UP पुलिस की लाठीतोड़ पिटाई के बाद भागे प्रदर्शनकारी कॉन्ग्रेसी

‘प्रियंका गाँधी की सुरक्षा में घुसपैठ सिर्फ एक ड्रामा, चुनाव लड़ चुकीं महिला कॉन्ग्रेसी नेता-कार्यकर्ता गए थे मिलने’

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कहानी एक अब्दुल की जिसे टीवी एंकर दंगाई बनाता है… उसकी मौत से फायदा किसको?

रविवार शाम तक खबर फैलाई गई थी कि जामिया के तीन छात्र-छात्राएँ ‘पुलिस के हमले’ में मारे गए हैं। डिटेल में खबर फैलाई गई कि नाम क्या है, किस कोर्स में था, कहाँ का था। मुझे सात बजे पता चला, मैं रुका रहा क्योंकि लग रहा था खबर फर्जी होगी। तीन घंटे बाद भी जब मीडिया में इस खबर को सबने नहीं चलाया तो समझ गया कि झूठी होगी। आम आदमी पार्टी के मुखपत्र ‘जनता का रिपोर्टर’ ने छापी। शायद इस उम्मीद में कि सही निकल जाए तब तो मोदी की पुलिस की ऐसी की तैसी हो जाएगी।

दूसरी खबर जो फैलाई गई वो ‘पुलिस ने खुद बस में लगाई आग’। ये काम सिसोदिया ने किया। पीले डब्बे में कुछ ढोते हुए पुलिस का एक जवान तेजी से आता है और एक खड़ी बस की खिड़की से उसे भीतर फेंक देता है। आदमी और डब्बे पर लाल घेरा बना कर बता दिया गया कि ‘पुलिस अपने संरक्षण में बस जला रही है’। विडियो भी जारी हुआ।

हालाँकि विडियो में डब्बा फेंकने से बस में आग कब लगी, ये नहीं दिखा। दूसरी बात, आग लगानी होती है तो तेल छिड़का जाता है, डब्बा समेत खिड़की से फेंका नहीं जाता। तीसरी बात, आज के दौर में जब हर हाथ में फोन है, 50x ज़ूम का कैमरा है, पब्लिक विडियो बना रही है, उस वक्त पुलिस बस में आग लगा देगी? कमाल की थ्योरी है यार!

तीसरी खबर जो फैली, और अभी भी फैल रही है, कि लाइब्रेरी में पुलिस घुस कर मार रही है बच्चों को। मैंने जितने विडियो देखे, सब में तोड़-फोड़ हो रही है, शोर हो रहा है। एक में अंग्रेज़ी में कह रहा है ‘तोड़फोड़ (rioting) मत करो यार’, दूसरे में टेबल के नीचे घुसा एक बच्चा कह रहा है, ‘यार अपना ही नुकसान क्यों कर रहे हो?’ किसी भी विडियो में पुलिस लाइब्रेरी के भीतर नहीं है। मैं इस बात से इनकार नहीं कर रहा कि पुलिस घुसी हो, पर मेरे पास वैसा विडियो नहीं आया।

चौथी खबर, जो कुछ ही मीडिया वाले दिखा रहे हैं, ‘दो लोगों को पुलिस की गोली लगी है’। एक सफदरजंग में है, दूसरा जामिया नगर के होली फ़ैमिली हॉस्पिटल में। पुलिस ने बार-बार अपनी तरफ से गोली चलाने की बात का खंडन किया है और कहा है कि सिर्फ आँसू गैस के गोले दागे गए। पुलिस, वीसी और छात्रों के समूह ने ये बात स्वीकारी है कि हिंसा करने वाले लोग ‘लोकल’ थे।

जब लोकल आदमी यूनिवर्सिटी के बच्चों का विरोध हायजैक कर सकता है, पत्थर फेंक सकता है, आग लगा सकता है, तो फिर कट्टे से फायर करने में उसे कितना समय लगेगा? बच्चों के मरने की खबर किसने फैलाई थी? क्या कोई इंतज़ार में था किसी की मौत का? आप समझ सकते हैं कि एक बच्चे की मौत से इस आंदोलन को कितना माइलेज मिलता। फिर दो सौ रुपए की गोली, किसी बिल्डिंग से चलाना कितना दुरूह कार्य होगा?

बयान कौन दे रहा है? हिजाब ओढ़े लदीदा और आयशा का सच सामने आ चुका है। इन्हें तो बाकायदा तैयार किया गया था। काम होते ही अचानक मीडिया का हर पत्रकार इन्हें मलाला बनाने को क्यों आतुर है? विडियो से सच पकड़ में आता है तो क्रॉप करके दिखाया जाता है। ‘हिन्दुओं से आजादी’ का नारा ‘छात्रों ने नहीं लगाया’ कह कर झूठ बोला जाता है।

जिन्हें सच जानना है, इंटरनेट का इस्तेमाल करें। मैं क्या कह रहा हूँ, वो क्या लिख रहे हैं, वो क्या बोल रही है, इस पर मत जाइए। विडियो दिखा कर पुलिस पर आग लगाने का इल्जाम हो, या लाइब्रेरी तोड़ने का, ये तो देखिए कि आग लगी भी है कि नहीं, पुलिस लाइब्रेरी में है भी कि नहीं?

लोगों के मरने की बातें हों तो ये देखिए कि कहाँ से ऐसी खबर आ रही है। क्या बड़े मीडिया हाउस चला रहे हैं? क्या सारे लोग चला रहे हैं? गोली लगने की बात हो तो ये भी देखिए कि कौन कह रहा है, नकारिए मत, लेकिन और पहलू भी देखिए कि हर तरफ कैमरे के समय में, दिल्ली में, पुलिस छात्रों पर गोली चलाएगी क्या? कश्मीर में पुलिस गोली नहीं चलाती, और दिल्ली में गोली चलाएगी?

फेसबुक के पुरोधाओं की बातों पर तो बिलकुल मत विश्वास कीजिए। चाहे वो मैं ही क्यों न होऊँ। मैं जो कह रहा हूँ, उसमें सिर्फ वन लाइनर इल्जाम हैं, तंज हैं, घृणा है, या फिर उसको सपोर्ट करने वाले तर्क और तथ्य भी हैं? अगर हैं तो क्या इंटरनेट पर ही उसी को सही साबित करने वाली बातें हैं? फिर शेयर कीजिए, या विचार बनाइए।

कहानी अब्दुल की

जबरदस्ती का भावुक हो कर आँख नम करने वाली पोस्ट मैं भी लिख सकता हूँ कि सुबह अब्दुल से दूध लेने गया, तो वो मुझसे पूछने लगा कि भैया मैं क्या करूँ, मेरे पास तो आधार कार्ड भी नहीं। मैं ये लिख सकता हूँ कि रामेश्वर ने कहा कि उसके तीन लाख दोस्तों ने कहा कि नागरिकता कानून बहुत सही है। जबकि सच्चाई यह है ऐसे तमाम अब्दुल या रामेश्वर, जिनकी आँखों में खुशी या गम आपको देखने होते हैं, और वो आपको इसके लिए ‘जज’ करेंगे, आपको ‘दूसरे खेमे’ का मान लेंगे, तो ये दिक्कत रुबीना और पूजा की है, आपकी नहीं।

अब्दुल को दूध दे कर पैसे लेने से मतलब रखना चाहिए और एक जगह से ही आ रही खबरों की जगह प्रधानमंत्री और गृहमंत्री की बातों पर भी ध्यान देना चाहिए कि कानून क्या है। अगर अब्दुल अमानुल्ला की बात ही मानेगा कि मजहब विशेष को तो निकाला जा रहा है, तो जाहिर है कि उसे यही अमानुल्ला कल को मशाल थमा कर सड़क पर उतार देगा। अब्दुल सड़क पर उतर जाएगा क्योंकि उसके पास सही सूचना है ही नहीं।

उसे तो लगेगा कि जब देश से निकाल ही देंगे सारे अब्दुल को, तो सारे अब्दुल इस देश को जला कर ही क्यों न बाहर जाएँ। वहीं अब्दुल का मित्र कृष्ण यह देख कर दुखी हो जाएगा कि उसके मित्र को देश से निकालने की साजिश चल रही है। कृष्ण ने भी ये नहीं देखा कि दूसरे लोग क्या कह रहे हैं। कृष्ण भी अब्दुल के मशाल के कपड़े को पेट्रोल में गीला कर रहा है।

कृष्ण पेट्रोल लिए है, तो मीरा भी आ जाती है। मीरा को लगता है कि कृष्ण आग लगा रहा है, तो वो भी लगाएगी। अब्दुल, कृष्ण और मीरा को सूचना का अभाव दंगाई बना देता है। न वो मशाल देने वाले से पूछते हैं कि सरकार उनके साथ ऐसा क्यों कर रही है, या सरकार के बारे में सरकार से ही पूछ लें, या सरकार का ट्विटर देख लें, न मशाल देने वाले को अब्दुल के परिवार की चिंता है कि इस आगजनी में कल को अब्दुल पकड़ा गया, तो उसकी दुकान का क्या होगा? उसकी बहन रजिया स्कूल की फीस कैसे देगी?

अब्दुल टीवी भी देखता है लेकिन अब्दुल की भी दिक्कत वही है जो कन्हैया की है, वो एक ही तरह के चैनल देखता है, एक ही तरह की बातें पढ़ता है, एक ही तरह के लोगों का पोस्ट शेयर करता है। एक को लगता है कि राम मंदिर उसके सारे कष्टों का निवारण कर देगा, दूसरे को लगता है कि हिन्दू तो बस तलवार तेज कर रहे हैं, और एक दिन तो उन्हें काट ही देंगे।

वो एक ही चैनल देखता है जहाँ उसे बताया जा रहा होता है कि डर का माहौल है, कोलकाता से केरल तक लोग ‘संघर्ष और विरोध’ कर रहे हैं। उसे बताया जाता है कि पढ़े-लिखे लोग भी सड़कों पर हैं। परचून की दुकान वाला अब्दुल सोचने लगता है कि जामिया में तो जुबैदा का बड़ा लड़का पढ़ता था जो कि फलाँ कम्पनी में छत्तीस लाख के पैकेज पर है।

अब चैनल के एंकर में उसे मसीहा दिखने लगता है कि यही सही बात कह रहा है। जबकि एंकर अब्दुलों को 6 साल से तैयार कर रहा है। एंकर बेचारा इस बात से परेशान है कि उसने एक पार्टी के खिलाफ इतना जहर उगला है कि वो चाह कर भी अब सच बोल नहीं सकता, इसलिए वो हर दिन एक सीढ़ी नीचे उतर जाता है। उसे शो भी चलाना है इसलिए अब्दुल को वो कहता है कि ‘आखिर इतने लोग विरोध कर रहे हैं, तो कुछ तो बात होगी।’

अब्दुल परेशान हो जाता है, क्योंकि एक मिनट के मोंटाज में बारह जगहों की भीड़ दिखा कर उसे बता दिया जाता है कि 20 करोड़ लोग डरे हुए हैं। अब्दुल ने 22 रुपए के दूध की थैली बेची है, जो 2004 में साढ़े छः रुपए की आती थी, बीस करोड़ लोगों के बारे में सोचना उसे परेशान कर जाता है। अब अब्दुल नागरिकता कानून और नेशनल सिटिजन रजिस्टर जैसी बातों को भूल चुका होता है। एंकर सफल हो चुका है।

अब अब्दुल पूरी तरह से सहमत है कि उससे कागज माँगे जाएँगे, जो कि उसके पास है ही नहीं। जबकि अब्दुल के पास उसकी बोर्ड परीक्षा का कागज होगा, जमीन का कागज होगा, जमीन के सालाना रसीद का कागज होगा, उसके वार्ड कमिश्नर के रिकॉर्ड में उसकी वोटिंग स्लिप होगी, उसके पास राशन कार्ड होगा… लेकिन एंकर की आवाज ने अब्दुल को कन्विन्स कर दिया है कि उसके पास कुछ नहीं है। एंकर ने उसे इतनी बार ये कह दिया है कि अब्दुल दूसरे अब्दुलों से ये कहते दिखता है कि ‘हमारे पास तो कागज हैं ही नहीं, हम लोग कहाँ जाएँगे’। ‘मैं’ कब ‘हम लोग’ बन गया, अब्दुल को पता ही नहीं चला।

अब्दुल ने अपने कागज की जिम्मेदारी तो ली ही, अब सोसायटी के सारे अब्दुलों के कागज के न होने का भी जिम्मा अब्दुल ने ले लिया है। अब अब्दुल को याद दिलाया जाता है कि बाबरी तोड़ी और उसी को कोर्ट ने जमीन दे दी। अब्दुल को यह नहीं बताया जाता कि बाबरी किस चीज को तोड़ कर तामील हुई थी। अब्दुल को बताया जाता है कि अगस्त में 370 हटा दिया गया।

अब्दुल को पता भी नहीं कि 370 है क्या? वो कश्मीर सुन कर भावुक हो जाता है और अचानक से कश्मीर के लिए चिंतित हो जाता है। फिर अब्दुल को कहा जाता है कि तीन तलाक में भी सरकार बताएगी कि अब्दुल तलाक दे या नहीं। अब्दुल चिंतित हो जाता है और भूल जाता है कि उसका निकाह तक नहीं हुआ है। फिर अब्दुल को कहा जाता है कि तबरेज को मार दिया ‘उन लोगों’ ने। फिर जुनैद और अखलाक की कहानी भी दो-दो लाइन में बता दी जाती है।

अब्दुल भावुक से अब भावावेश की स्थिति में आ जाता है। अंकित सक्सेना, भारत यादव, ध्रुव त्यागी आदि की कहानी अब्दुल ने रायते की बूँदी बेचते वक्त अपने कस्टमर्स से सुनी हुई थी, लेकिन वो उस वक्त भूल जाता है क्योंकि नई कहानियों ने पुरानी को ढकेल कर बाहर कर दिया है।

कृष्ण के साथ होने से उसे बल मिलता है कि वो मजहबी उन्मादी नहीं है, वरना हिन्दू उसके साथ क्यों होता! उसे लगता है कि विरोध-प्रदर्शन तो संवैधानिक अधिकार है, क्योंकि मीरा ने उसे आर्टिकल 14 के बारे में बताया है, या शायद आर्टिकल 19 था वो। जो भी था, अब्दुल जो कर रहा है, वो उसका संवैधानिक अधिकार है, ऐसा अब्दुल मानता है। एंकर ने भी कहा है कि विरोध तो संवैधानिक अधिकार है।

अब्दुल जो बात नहीं जानता, वो यह है कि अमानुल्ला की पूरी योजना में वो एक पैदल सिपाही है जिसके मरने से उसे राजनैतिक लाभ मिलेगा और उसका घाटा कुछ भी नहीं। अब्दुल मशाल ले कर आगे बढ़ता है, फिर वो देखता है कि संवैधानिक तरीके में तो पत्थर भी फेंका जा सकता है। वो दूसरे हाथ से पत्थर उठा कर जोर से फेंकता है। वो पत्थर किसी पुलिस वाले को लगती है, वो ICU पहुँच जाता है।

पुलिस भी आँसू गैस के गोले दागती है, अब्दुल गुस्सा हो जाता है कि पुलिस संवैधानिक अधिकार पर हमला क्यों कर रही है। अब्दुल बगल खड़ी बस में आग लगा देता है। बहुत शोर होता है। तभी उसके व्हाट्सएप्प ग्रुप में खबर आती है कि कोटा के शाकिर को मार दिया गया है पुलिस के द्वारा। अब्दुल को गुस्सा आता है। वो भीड़ के साथ हमला करने आगे बढ़ता है। उसी भीड़ में कमर से कोई पिस्तौल निकालता है और भागते अब्दुल की पीठ में उतार देता है।

अब्दुल गिर जाता है, उसकी आँखों के सामने स्कूल जाती रजिया का चेहरा घूमता है, उसके माता-पिता की तस्वीर नाचती है, उसकी आँख बंद होने लगती है, लोग उसके ऊपर लात रख कर भाग रहे होते हैं। भीड़ छँटने के बाद अब्दुल मरा हुआ पाया जाता है। उसकी मौत से किसको, क्या फायदा हुआ यह देखने के लिए उसे बहुत लम्बा इंतजार करना पड़ेगा।

इसलिए, अब्दुल मत बनिए। जिस फोन के व्हाट्सएप पर मैसेज आता है, उसी फोन पर बड़े ही आसान शब्दों में कानून के बारे में विडियो और लेख पड़े हुए हैं। आग लगवाने वाले वातानुकूलित स्टूडियो में सूट पहन कर बैठे हुए हैं। उन्होंने दसियों दंगे देखे हैं, करवाए हैं। उनके लिए आपका अस्तित्व भी नहीं क्योंकि वो आपकी मौत की खबर एक टिकर पर चला देगा और सरकार को कोस देगा, फिर भूल जाएगा।

मशाल से अँधेरा भी छँटता है, और घर भी जलाए जा सकते हैं। चुनाव आपका है क्योंकि कमर में पिस्तौल खोंसे वो आदमी आपको जब गोली मारेगा तो आपको पता भी नहीं चलेगा।

इस उन्माद, मजहबी नारों के पीछे साजिश गहरी… क्योंकि CAA से न जयंती का लेना है और न जोया का देना

जामिया में मजहबी नारे ‘नारा-ए-तकबीर’, ‘ला इलाहा इल्लल्लाह’ क्यों लग रहे? विरोध तो सरकार का है न?

दक्षिणेश्वर समूह: इतिहास में गुम आज़ादी का एक पन्ना, क्रांति का एक नायक जिसने आज मौत को गले लगाया

“कुछ अति-उत्साही नौजवानों ने एक दिन सोचा कि चलो एक क्रांतिकारी दल बना लें और हिंसा के ज़रिए आज़ादी पाने की कोशिश करें। कुछ दिन बाद सोचा पैसा कहाँ से आएगा, क्योंकि क्रांतिकारियों को ‘पूड़ी खाने’ के लिए पैसे की आवश्यकता थी। किसी ने सुझाया कि देशवासियों को लूटने से अच्छा है अंग्रेज़ों पर डाका डालें। फिर क्या? 10-20 लोगों ने रात में एक ट्रेन पर धावा बोला, उसमें रखा सरकारी पैसा लूट लिया और भाग खड़े हुए। लेकिन कुछ दिन बाद वे सब पकड़े गए। 4 को फाँसी हुई, बाकी को 4 साल, 10 साल, उम्रकैद की सज़ा।”

कमोबेश इतना ही होता है हमारे स्कूली पाठ्यक्रम में काकोरी का इतिहास। कहीं-कहीं 2-4 अतिरिक्त बेतरतीब तथ्य बिना उनका ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य बताए ठूँस दिए जाते हों तो उससे बहुत कुछ नहीं बदल जाता। न ये बताया जाता है कि आखिर एक डकैती के लिए किसी को भी फाँसी क्यों हुई, न ये कि उन्हीं चारों ठाकुर रौशन सिंह, रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाकुल्ला खान और राजेंद्र लाहिरी को ही फाँसी क्यों हुई। दक्षिणेश्वर केस, सावरकर की किताब, असहयोग आंदोलन जैसे उस एक रात की पृष्ठभूमि में घटित हुए घटनाक्रमों या दूसरे विश्वयुद्ध के बाद नौसैनिक विद्रोह, सावरकर और ऑरोबिन्दो घोष के ‘मास्टर प्लान’ का (या कम-से-कम उसके पीछे के विचार का) अंत में सही साबित होना जैसे इसके प्रभावों के बारे में तो अगर तथाकथित ‘WhatsApp यूनिवर्सिटी’ न होती तो पता ही न चलता।

पूरा इतिहास हज़ार-पाँच सौ शब्दों में नहीं समेट जा सकता, इसलिए बता दूँ कि आज ही के दिन (17 दिसंबर को) 1927 में राजेंद्र लाहिरी को फाँसी दी गई थी। ऐसे में दक्षिणेश्वर केस और दक्षिणेश्वर समूह (जो आज़ादी के आंदोलन का मूक कर दिया गया एक ‘unsung hero’ है) पर करने का इससे बेहतर दिन और क्या हो सकता है।

क्यों पहुँचे लाहिरी कलकत्ता?

‘ब्राह्मण’ नामक शोषक जाति का, अरबों साल से प्रताड़ना का कुचक्र रचने वाला राजेंद्र लाहिरी का परिवार उनके जन्म के समय वर्तमान बांग्लादेश (उस समय बंगाल प्रेसिडेंसी) के पाबना जिले में रहता था। 1901 में उनका जन्म हुआ और 1905 में हुए बंग-भंग (बंगाल को मज़हब के आधार पर हिन्दू-बहुल पश्चिम बंगाल और मुस्लिम-बहुल पूर्वी बंगाल में बाँट देने का अंग्रज़ी शासकों का निर्णय) के विरोध में उनके पिता क्षितीश मोहन लाहिरी और अग्रज जीतेन्द्र नाथ लाहिरी जेल चले गए। लिहाजा माँ बसंत कुमारी (जिनकी स्मृति में मरने के पहले उन्होंने एक पुस्तकालय बनवाया) ने उन्हें 9 साल की उम्र में ही पढ़ाई के लिए मामा के पास बनारस भेज दिया। यहाँ पर उनकी मुलाक़ात अपने दूर के रिश्तेदार शचीन्द्रनाथ सान्याल से हुई, जिनके साथ वे हिंदुस्तान रिपब्लिक एसोसिएशन (HRA) नामक उस क्रांतिकारी संगठन के सदस्य बने, जिसने आगे जाकर काकोरी सॉन्डर्स की हत्या जैसे कारनामों को अंजाम दिया।

लाहिरी को वापिस बंगाल, कलकत्ता के दक्षिणेश्वर में सान्याल (या कुछ वृत्तांतों में बिस्मिल) ने ही भेजा था। बम बनाना सीखने के लिए। ऐसा इसलिए ताकि एक तो वे संयुक्त प्रांत की पुलिस से बचे रहें (किसी प्रकार पुलिस को काकोरी में शामिल क्रांतिकारियों के नाम पता चल गए थे और सरगर्मी से तलाश जारी थी), और बम बनाने का तरीका संगठन के सदस्य को पता रहने से अंतिम ध्येय (अंग्रेज़ों के खिलाफ इतना बड़ा सशस्त्र आंदोलन खड़ा करना, जिससे उनके लिए भारत को कब्ज़े में रखना असम्भव हो जाए) में भी सहायता मिलती।

इन्हीं मंशाओं की पूर्ति के लिए लाहिरी को दक्षिणेश्वर संगठन का हिस्सा बनने कलकत्ता भेजा गया था।

इसके पहले वे HRA के प्रमुखतम बौद्धिकों और विचारकों में थे। पठन-पाठन और बांग्ला साहित्य से अपने लगाव के चलते वे न केवल अपनी माँ के नाम पर एक छोटी सी लाइब्रेरी के संस्थापक हुए, बल्कि BHU के बंगाली साहित्य परिषद के भी अध्यक्ष बने। इसके अलावा शचीन्द्रनाथ सान्याल ने उन्हें ‘बंग वाणी’ पत्रिका का सम्पादक भी बना दिया। यही नहीं, लाहिरी ने क्रांतिकारियों से हस्तलिखित खुले पत्र लिखवाकर उन्हें भी प्रकाशित करना शुरू कर दिया, ताकि बनारस इलाके के हर क्रांतिकारी के विशिष्ट विचार और दृष्टिकोण से पूरा आंदोलन, संगठन और वृहत्तर बनारसी समाज परिचित हों। सान्याल ने उन्हें क्रांतिकारी संगठन अनुशीलन समिति की वाराणसी शाखा का संयोजक ही नहीं बनाया, बल्कि उसके हथियारों के जख़ीरे का भी जिम्मा सौंप दिया।

दक्षिणेश्वर समूह

वर्तमान 24 परगना जिले में दक्षिणेश्वर काली मंदिर के नाम पर बने इस संगठन का इतिहास एक तरह से भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास की प्रतिध्वनि है। हथियारबंद क्रांति में विश्वास करने वाले इसके सदस्य गाँधी के आभामण्डल से प्रभावित होकर अपना रास्ता छोड़ दिए और 1920-22 के अहिंसापूर्ण असहयोग आंदोलन में शरीक हो गए। लेकिन गाँधी के अचानक से अपने चरम पर और अंग्रेजी शासन को चरमरा रहे इस आंदोलन को एक चौरी-चौरा के चलते वापिस खींच लेने से इन्हें ‘सत्याग्रह’ के सत्य का अहसास हो गया था।

1923 में क्रांतिकारी ऑरोबिन्दो घोष के भाई और ‘अग्नियुग’ किताब के लेखक बारीन्द्र घोष इस आंदोलन के ध्वजवाहक बनकर उभरे। इसके बाद ‘जुगान्तर’ नामक संगठन (ऑरोबिन्दो और बारीन्द्र व अन्य द्वारा शुरू किया हुआ दूसरा क्रांतिकारी दल; पहला था ‘अनुशीलन समिति’) ने अंग्रेजी हुकूमत पर दबाव बरकरार रखते हुए डकैतियों से लेकर के कलकत्ता के आततायी कमिश्नर चार्ल्स टेगार्ट की हत्या के दो प्रयासों तक कारनामे किए। टेगार्ट की हत्या के प्रयास में पहचान की गफ़लत में गोपीमोहन साहा ने एर्न्स्ट डे की हत्या कर दी, और एक अन्य ने अंग्रेज अधिकारी मिस्टर ब्रूस को टेगार्ट समझ कर गोली मार दी।

इस दौरान उन्हें टैगोर, बंगाल कॉन्ग्रेस आदि का भी नैतिक समर्थन प्राप्त हुआ। बंगाल प्रदेश कॉन्ग्रेस ने देशबंधु चितरंजन दास की अध्यक्षता के अधिवेशन में गोपीमोहन साहा (जिनमें मार्च, 1924 में फाँसी दे दी गई) के समर्थन में प्रस्ताव पास किया। लेकिन यह प्रस्ताव ऑल इंडिया कॉन्ग्रेस कमेटी में पास नहीं हो पाया ‘महात्मा’ गाँधी की वजह से; बल्कि उन्होंने तो इसके खिलाफ बयान को कॉन्ग्रेस का आधिकारिक बयान बनवाया। उसमें चितरंजन दास और बंगाल कॉन्ग्रेस ने एक संशोधन लाने का प्रयास किया, जो एक छोटे अंतर से गाँधी-गुट से हार गया। अपने आग्रह के जीतने के बावजूद गाँधी जीत अंतर छोटा होने से, अपनी कट्टर अहिंसा का सशक्त विरोध होने-भर से भकुर कर बैठ गए और घोषणा कर दी, “यह मेरी जीत नहीं, हार है।

इन सब से घबरा कर बंगाल सरकार ने अपने लिए विशेष दमनकारी शक्तियाँ केंद्रीय ब्रिटिश शासन से ले लीं, और क्रांतिकारियों को ‘आतंकवादी’ कहने का प्रोपेगेंडा तेज़ कर दिया। साथ ही यह भी बरगलाने लगे कि क्रांतिकारी तो महज़ लोगों को ‘हिंसक’ आंदोलन में ‘रिक्रूट’ करने, और गाँधीवाद से मोहभंग करने के लिए असहयोग आंदोलन में शामिल हुए हैं। 25 अक्टूबर, 1924 को पास हुए बंगाल आपराधिक कानून संशोधन अध्यादेश ने अगले 6 महीने तक बिना अपील या ज्यूरी के ‘आतंकवादियों’ पर मुकदमा चलाने की छूट दे दी। इस कदम की ‘सफलता’ से उत्साहित बंगाल के गवर्नर ने 1925 में इसे 6 महीने के लिए और आगे बढ़ा दिया।

इसी दौरान दक्षिणेश्वर के बाचस्पतिपाड़ा स्थित एक घर में इकठ्ठा हुए कुछ उत्साही क्रांतिकारियों ने ‘दक्षिणेश्वर समूह’ बनाया। इसमें हावड़ा, हुगली, नादिया और चिट्टागोंग (चटगाँव) के क्रांतिकारी शामिल थे। इन्हीं के पास राजेंद्र लाहिरी बम बनाना सीखने पहुँचे थे।

इसी दौरान बम बनाने के प्रयोग के दौरान असावधानीवश एक धमाका हुआ और सरगर्मी से क्रांतिकारियों की तलाश कर रही पुलिस ने 10 नवंबर, 1925 की सुबह राजेंद्र लाहिरी समेत 9 क्रांतिकारियों को पिस्तौल, हथियारों आदि के साथ गिरफ़्तार कर लिया। इनके साथी सूर्य सेन (सूर्यो दा या मास्टर दा) किसी तरह उस समय पुलिस के हाथ आने से बचने में कामयाब हुए। आगे जाकर 1930 में चिट्टगॉन्ग में 18 अप्रैल, 1930 को उन्होंने सरकारी हथियारखाने को लूटने का प्रयास किया और इसके लिए 12 जनवरी, 1934 को फाँसी पर चढ़ा दिए गए।

दक्षिणेश्वर के बाद- मौत नहीं, पुनर्जन्म की ओर

दक्षिणेश्वर के लिए भले ही लाहिरी को केवल 10 साल की सजा हुई, लेकिन उनकी मौत का दरवाज़ा उसी धमाके से खुल गया। उन्हें कलकत्ते की अलीपुर जेल से लखनऊ सेंट्रल जेल शिफ़्ट किया गया, जिसमें उन पर काकोरी के अन्य साथियों के साथ काकोरी का मुकदमा चला। हज़रतगंज स्थित वर्तमान जीपीओ भवन में अदालत लगी, और चोटी के 4 क्रांतिकारियों राजेंद्र लाहिरी, ठाकुर रौशन सिंह, रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाकुल्ला खान को फाँसी की सजा सुनाई गई।

जनविद्रोह के डर से बिस्मिल को गोरखपुर, लाहिरी को गोंडा, अशफाकुल्ला खान को फैज़ाबाद और ठाकुर रौशन सिंह को इलाहाबाद जेल भेज दिया गया। इनकी फाँसी की तारीख 19 दिसंबर, 1927 तय हुई थी, लेकिन जेल प्रशासन ने लाहिरी को 17 को ही मौत के घाट उतारने का निर्णय लिया। अपनी मौत की सुबह लाहिरी व्यायाम कर रहे थे। जेल के एक अधिकारी ने पूछा कि इसकी क्या ज़रूरत है, क्योंकि कुछ ही घंटे बाद उन्हें फाँसी दी जानी है। लाहिरी ने जवाब दिया- हिन्दू हूँ। पुनर्जन्म में विश्वास रखता हूँ। अगले जन्म में भारत माँ की सेवा करने के लिए और तंदरुस्त होकर लौटना चाहता हूँ।

उनकी मौत के बाद उनका पार्थिव शरीर भी अंग्रेज सरकार ने उनके परिवार को वापिस नहीं किया। उस समय के वृत्तांतों के अनुसार मरते समय आज ‘साम्प्रदायिक’ माना जाने वाला “वन्दे मातरम” उनके अंतिम शब्द थे

CAA के ख़िलाफ़ प्रदर्शन के नाम पर दंगा भड़काने की साज़िश: व्हाट्सप्प ग्रुप से हुआ कॉन्ग्रेस नेताओं का पर्दाफाश

नागरिकता संशोधन विधेयक लोकसभा और राजसभा में पास होते ही क़ानून बन गया। इसके ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन हुए लेकिन ये सवाल लाजिमी है कि इस विरोध प्रदर्शन को हिंसक और उग्र बनाने में किसका हाथ है? सबसे बड़ी हिंसा पश्चिम बंगाल में हुई जहाँ घंटों ट्रेनों व यात्रियों को बंधक बनाया गया। जुमे की नमाज के बाद हज़ारों की संख्या में निकली भीड़ ने रेलवे स्टेशनों को तहस-नहस कर दिया। सोशल मीडिया पर अफवाह फैलाई जा रही है कि संशोधित नागरिकता क़ानून मुस्लिमों के ख़िलाफ़ भेदभाव कर रहा है। क्या आपको पता है कि इस क़ानून के विरोध के लिए एक व्हाट्सप्प ग्रुप है, जहाँ सारी रणनीति तैयार की जा रही है?

मैंने एक व्हाट्सप्प ग्रुप “Anti-CAA Protest (Law St)” का हिस्सा बनने की इच्छा जाहिर की तो किसी से कुछ न बताने की शर्त पर मुझे इसमें जोड़ दिया गया। इस ग्रुप का उद्देश्य है क़ानून की पढाई करने वाले छात्रों के लिए व्हाट्सप्प ग्रुप, जिसमें संशोधित नागरिकता क़ानून का विरोध किया जाएगा। नीचे इस ग्रुप का बायो देखिए, जिसमें स्पष्ट कहा गया है कि यहाँ केंद्र सरकार के इस क़ानून का विरोध किया जाएगा और अन्य लोगों को भी जोड़ने की सलाह दी गई है:

एंटी-CAA ग्रुप का बायो

इस ग्रुप में वैसे ही मैसेज आ रहे थे, जिनका इस्तेमाल वामपंथी प्रपंचों के लिए किया जाता है। इस ग्रुप के एडमिन्स पर एक नज़र डालिए। रीतम सिंह इसका पहला एडमिन है, जिसकी फेसबुक प्रोफाइल ये रही:

रीतम सिंह का फेसबुक प्रोफाइल

लेकिन, यहाँ से कुछ साफ़ नहीं होता। हाँ, जैसे ही आप उनके इंस्टाग्राम प्रोफाइल पर जाते हैं, वह कॉन्ग्रेस के झंडे वाला अंगवस्त्र पहने दीखता है और सबकुछ साफ़ हो जाता है। ये देखिए:

रीतम का इंस्टाग्राम प्रोफाइल, कॉन्ग्रेस के झंडे वाले दुपट्टे के साथ

बाद में हमें पता चलता है कि रीतम कॉन्ग्रेस के छात्र संगठन नेशनल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ इंडिया (NSUI) का नेशनल RTI सेल कॉर्डिनेटर है। ये देखिए:

रीतम का एनएसयूआई कनेक्शन

इस ग्रुप का दूसरी एडमिन भी कॉन्ग्रेस से ही जुडी हुई हैं। उनका नाम श्रीमंजित है। ये देखिए:

एडमिन श्रीमंजित भी कॉन्ग्रेस से जुड़ी हैं

इसी तरह इस व्हाट्सप्प ग्रुप के एडमिन्स कॉन्ग्रेस, एनएसयूआई और कॉन्ग्रेस के अन्य संगठनों से जुड़े लोग थे। इनमें से कई ऐसे हैं जो आरे मेट्रो कार शेड प्रोजेक्ट का विरोध कर रहे थे। जब मैंने एडमिन्स के एनएसयूआई से होने की बात कही तो ग्रुप के लोगों ने समझाया कि ये आंदोलन राजनीतिक नहीं है। ये देखिए:

मेरे मैसेज का रीतम ने दिया जवाब

रीतम सिंह का मैसेज काफ़ी कुछ बता रहा था। जिस तरह से उसने असम के विरोध प्रदर्शन की तर्ज पर सबकुछ करने की सलाह दी, उससे उसके इरादे नेक नहीं लग रहे थे। इस पूरे ग्रुप का उद्देश्य ये था कि कॉन्ग्रेस के जुड़ाव को किसी तरह छिपाया जाए और इसे जनता का न्यूट्रल विरोध प्रदर्शन के रूप में पेश किया जाए। साज़िश रची जा रही थी कि 19 दिसंबर को सभी लॉ कॉलेजों में उपद्रव हो और संशोधित नागरिकता क़ानून का विरोध प्रदर्शन किया जाए। कर्नाटक युथ कॉन्ग्रेस का प्रवक्ता आरोन मिर्ज़ा भी इस ग्रुप का सदस्य था। ये देखिए:

कर्नाटक युथ कॉन्ग्रेस से जुड़ा है आरोन मिर्ज़ा

इसी तरह योगेंद्र यादव के ‘स्वराज इंडिया’ से जुड़ा ऋषभ रंजन भी इस ग्रुप का सदस्य है, जो मेट्रो कार शेड प्रोजेक्ट का विरोधी वकील था। इस ग्रुप में रवीश कुमार और अमानतुल्लाह ख़ान जैसों के कांटेक्ट नंबर भी शेयर किए गए हैं, जिन्हें आपात स्थिति में मदद के लिए कहा जा सकता है। ये देखिए:

रवीश और अमानतुल्लाह सहित अन्य ‘खेवनहारों’ के नंबर शेयर किए गए

कुल मिला कर इस ग्रुप का उद्देश्य यही था कि 19 दिसंबर को लॉ कॉलेजों में हिंसा भड़काई जाए। जामिया के छात्रों की तरह उपद्रव किया जाए, उससे भी बड़ा। इस ग्रुप में कॉन्ग्रेस और कई एनएसयूआई के लोग एडमिन के रूप में जुड़े हैं, जो किसी राजनीतिक दल से अपनी पहचान छिपा कर इस कथित आंदोलन को न्यूट्रल साबित करना चाहते हैं।

(यह लेख ऑपइंडिया की संपादक नुपुर शर्मा के विस्तृत अंग्रेजी लेख का संक्षिप्त अनुवाद है।)

BJP ने पैसे देकर कराई हिंसा, बंगाल में मेरी लाश पर लागू होगा CAA और NRC: ममता बनर्जी

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने राज्य में हिंसा के लिए भाजपा को ज़िम्मेदार ठहराया है। बता दें कि पूरे राज्य भर में संशोधित नागरिकता क़ानून के ख़िलाफ़ लगातार विरोध प्रदर्शन चल रहा है। मुस्लिम समुदाय के लोगों ने सड़क पर उतर कर कई हिन्दुओं के घरों को जला डाला। जुमे की नमाज के बाद मस्जिद से निकली हजारों की भीड़ ने कई ट्रेनों में तोड़फोड़ की, रेलवे स्टेशनों को तहस-नहस कर दिया और घंटों यात्रियों को बंधक बनाए रखा। इससे कई ट्रेनों का परिचालन ठप्प हुआ और हजारों-लाखों यात्रियों को परेशानी का सामना करना पड़ा। हावड़ा से लेकर मुर्शिदाबाद तक ये घटनाएँ हुईं।

ममता ने इन वारदातों के लिए भाजपा को जिम्मेदार ठहराते हुए कहा है कि उन्हें हिंसा फैलाने के लिए भाजपा से रुपए मिले थे। उन्होंने आरोप लगाया कि ‘राज्य की बाहरी ताक़तों’ ने मुस्लिम समुदाय का हितैषी होने का दावा करते हुए ये तड़फोड़ मचाई। तृणमूल सुप्रीमो ने दावा किया कि वो इस क़ानून को पश्चिम बंगाल में लागू नहीं होने देंगी। हालाँकि, संसद से पारित हुए क़ानून के सम्बन्ध में राज्य सरकारें ऐसा नहीं कर सकती। फिर भी ममता ने अख़बारों में विज्ञापन देकर इस क़ानून को लागू न करने की बात कही है। राज्यपाल धनखड़ ने इसके लिए मुख्यमंत्री को आड़े हाथों लिया।

ममता ने कहा कि हिंसा फैलाने वाले लोग भाजपा के पिट्ठू हैं। उन्होंने इस एक्ट को ‘काला क़ानून’ बताते हुए कहा कि भले ही उनकी सरकार बर्खास्त हो जाए, वो अपने जीते जी इसे बंगाल में लागू नहीं होने देंगी। ममता ने कहा कि जब तक इसे वापस नहीं लिया जाता, वो लोकतान्त्रिक ढंग से विरोध प्रदर्शन करती रहेंगी। उन्होंने दिल्ली पुलिस पर जामिया के छात्रों के साथ बर्बरता से पेश आने का आरोप लगाया। तृणमूल सुप्रीमो ने कहा कि दूसरों को प्रवचन देने के बदले भाजपा को उन उत्तर-पूर्वी राज्यों की बातें सुननी चाहिए, जहाँ वो सत्ता में है। उन्होंने कहा कि पश्चिम बंगाल में CAA और NRC उनकी लाश पर लागू होगा।

ममता बनर्जी ने सोमवार (दिसंबर 16, 2019) को संशोधित नागरिकता क़ानून के ख़िलाफ़ 3 दिवसीय विरोध प्रदर्शन की शुरुआत की। वो कोलकाता और हावड़ा के विभिन्न हिस्सों में रैलियाँ करेंगी। राज्यपाल जगदीप धनखड़ ने इन रैलियों को असंवैधानिक और भड़काऊ कृत्य करार दिया है। उन्होंने कहा कि स्थिति विकट है और ऐसे में मुख्यमंत्री का कर्तव्य है कि वो शांति-व्यवस्था बहाल करें।

‘राहुल गाँधी की रैली के बाद नदवा में भड़की हिंसा, ओवैसी देश में नए जिन्ना के तौर पर कर रहे हैं काम’

नागरिकता संशोधन कानून के ख़िलाफ़ आज उत्तरप्रदेश की राजधानी लखनऊ स्थित नदवा महाविद्यालय में हुए प्रदर्शन के लिए भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा ने कॉन्ग्रेस को जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष पर आरोप लगाते हुए कहा है कि शनिवार को ही राहुल गाँधी की रीलॉन्चिंग के लिए रैली हुई थी और अगले ही दिन हिंसा भड़क गई। उनके मुताबिक, राहुल गाँधी प्रधानमंत्री के ख़िलाफ़ लोगों को ये कहकर भड़काने की कोशिश कर रहे हैं कि पीएम मोदी हिंदू-मुस्लिम में फर्क करने की कोशिश कर रहे हैं।

भाजपा प्रवक्ता के अनुसार विपक्ष नागरिकता कानून पर हिंदू-मुस्लिम कर विभाजनकारी नीति अपना रहा है, लोगों को गलत जानकारी दी जा रही है। उनके मुताबिक छात्रों को केवल मोहरा बनाया गया है। ताकि राजनैतिक महत्तवकांक्षाओं को पूरा किया जा सके।

संबित पात्रा ने सोमवार को मीडिया से बात करते हुए कहा कि संसद से पारित कानून के खिलाफ जिस तरह से हिंसक प्रदर्शन हो रहा है, उससे पता चलता है कि विपक्ष जिम्मेदार बर्ताव नहीं कर रहा है। उन्होंने कहा कि राजनीतिक दलों ने अपने-अपने ओवैसियों को मुस्लिम वोट बैंक के लिए उतारा है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार इस बातचीत में संबित पात्रा ने ओवैसी को नया जिन्ना के रूप में बताया और विपक्षियों पर निशाना साधते हुए कहा, “ओवैसी देश में नए जिन्ना के तौर पर काम कर रहे हैं। उनकी प्रतिस्पर्धा में अमानतुल्लाह खान हैं, वह दिल्ली का जिन्ना बनना चाहते हैं। ममता बनर्जी ने कुछ दिन पहले ही कहा था कि बंगाल में रहने वाले को बांग्ला बोलनी होगी, लेकिन अब हिंदी में ही पूरा भाषण क्यों दिया। क्या उनकी मंंशा पूरे देश में उपद्रव की है।

संबित पात्रा ने कहा कि हम कल से दिल्‍ली में हिंसा देख रहे हैं और आज लखनऊ में भी प्रदर्शन शुरू हो गया है। नागरिकता संशोधन कानून में किसी भी धर्म, जाति के नागरिक के साथ भेदभाव का प्रावधान नहीं है। किसी के अधिकारों का हनन नहीं है। कुछ सियासी दल पढ़े-लिखे छात्रों को बरगला विरोध प्रदर्शन करा रहे हैं।

याकूब समर्थक आयशा और जिहाद का ऐलान करने वाली लदीदा: पहले से तैयार है जामिया का स्क्रिप्ट?

जामिया मिलिया इस्लामिया के छात्रों का विरोध प्रदर्शन हिंसा और आक्रामकता के दौर से ऐसा गुजरा कि कई बसों में आग लगा दी गई और 100 से अधिक वाहनों को क्षतिग्रस्त कर दिया गया। जामिया कैम्पस में पुलिस को घुसना पड़ा और उपद्रवियों को नियंत्रित किया गया। जामिया के छात्रों ने पुलिस पर बर्बरता से पेश आने का आरोप लगा। पुलिस ने बताया कि उपद्रवियों को खदेड़ने के लिए लाठीचार्ज और आँसू गैस के गोले छोड़ने पड़े। जामिया के कई छात्रों ने वीडियो शेयर कर यह दिखाने का प्रयास किया कि पुलिस उन्हें पीट रही है और क्रूरता से पेश आ रही है।हालाँकि, कई फोटोज में कुछ कॉमन भी था।

एक युवती है, जो जामिया की छात्रा है। वो कई फोटो में दिख रही है। विरोध प्रदर्शन करते हुए। पुलिस की लाठी से साथियों को कथित रूप से बचाते हुए। मोदी और भाजपा के ख़िलाफ़ नारेबाजी करते हुए। मीडिया के गिरोह विशेष ने जिस छात्रा को नायिका बना रखा है, उसका नाम है- आयशा रेना। आयेशा की एक फोटो एनडीटीवी की पूर्व पत्रकार बरखा दत्त के साथ भी वायरल हुई है। आख़िर वो हर फोटो में क्यों दिख रही है और क्या उसे आंदोलन का चेहरा बना कर पेश किए जाने की कोशिश हो रही है, यह सवाल जायज है।

क्या आयशा को एक ‘वीर, बहादुर और साहसी’ युवती की तरह पेश किया जा रहा है, जो हिजाब लपेटे हुए भारत सरकार की ‘दमनकारी नीतियों’ के ख़िलाफ़ एक चेहरा बन कर उभरे और उपद्रवियों को अंतरराष्ट्रीय समर्थन हासिल हों? शक होना लाजिमी है क्योंकि आयशा आतंकवादियों की समर्थक है। याकूब मेमन की समर्थक है। वो भारत को एक फ़ासिस्ट देश मानती है आयशा की नज़र में सरकार नहीं, मोदी नहीं बल्कि ये पूरा का पूरा देश ही फासिस्ट है। याकूब कौन है? ये वही आतंकी है, जिसका 1993 में हुए मुंबई बम धमाकों में हाथ था। यानी, 317 लोगों की हत्या का एक गुनहगार। उसे 30 जुलाई 2015 को फाँसी पर लटका दिया गया।

एक आतंकी को सज़ा-ए-मौत दिया जाना आयशा को पसंद नहीं आया और उसने देश को फासिस्ट बताते हुए कहा कि माफ़ करना याकूब, हम तुम्हें बचा नहीं पाए। एक आतंकवादी, जिसका हाथ सवा 300 लोगों के ख़ून से रंगा हुआ है, उसका समर्थन करने वाली युवती आज मोदी सरकार के ख़िलाफ़ चल रहे विरोध प्रदर्शन का मुख्य चेहरा बन कर उभर रही है, या फिर जबरन उभारी जा रही है।

आयशा, याकूब मेमन की समर्थक है

बरखा दत्त ने तो रेना की तारीफों के पुल बाँधे। उसके अलावा बरखा दत्त ने लदीदा फरज़ाना का भी नाम लिया, जो इस्लाम और कुरान को लेकर वीडियो बनाती है। जामिया मिलिया इस्लामिया की 3 छात्राओं की प्रोफाइल कई मीडिया हाउस ने पहले ही तैयार कर ली थी, जैसे आउटलुक में उसके बारे में कुछ दिन पहले ही काफ़ी कुछ छप गया था। आख़िर यह सब किसके इशारे पर हुआ? मीडिया में कुछ लोग तो हैं ऐसे जो एजेंडा सेट कर रहे हैं, उसके लीडर तय कर रहे हैं और पहले से तैयारी कर के नैरेटिव सेट कर रहे हैं? बरखा दत्त का नाम आते ही स्थिति और भी संदेहास्पद हो जाती है।

ऐसा हम कोई मज़ाक में नहीं कह रहे। ‘आउटलुक’ जैसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थान ने तो जामिया के दंगाइयों की तुलना ‘अरब स्प्रिंग’ से भी कर दी। वो ये भूल गए कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है जबकि अरब में आंदोलन तानाशाही के ख़िलाफ़ हुआ था। लदीदा अरबी की ही छात्र है। वो जामिया में प्रथम वर्ष की छात्रा है। लदीदा 2 सालों से भाषण वगैरह दे रही है। वो तैयार हो रही थी, किसी बड़े आंदोलन के लिए। आंदोलन नहीं, इसे उपद्रव कह लीजिए। तैयार की जा रही थी। कुछ लोग थे, जिन्हें पता था कि ऐसी युवतियों का समय आने पर इस्तेमाल किया जा सकता है और अभी ऐसा ही हो रहा है।

सूडान में ‘आला सलाह’ नामक एक युवती के कुछ वीडियो वायरल हुए थे। वो गाने गाकर विरोध करती थी। ‘आउटलुक’ ने लदीदा की तुलना उससे ही की। मीडिया का एक बड़ा वर्ग दुनियाभर के बड़े प्रदर्शनों की तरह, उन विरोध प्रदर्शन में शामिल नायक-नायिकाओं की तरह, कुछ लोगों को यहाँ भी उसी तर्ज पर उभारना चाहता था और लदीदा का फेसबुक वाल देख कर सब साफ़ हो जाता है। वो बद्र, उहद और कर्बला का जिक्र करती हैं। ये सभी वो लड़ाइयाँ हैं, जो इस्लामी समाज ने शुरुआत में लड़ी थी। वो लड़ाई, जो काफिरों के ख़िलाफ़ लड़ी गई थी। याद रखिए, इस्लाम में हिन्दुओं को भी अरसे से काफिरों के रूप में पहचाना गया है। क्या जामिया का आंदोलन या दंगा भी उसकी ही एक चिंगारी है, जिसे ‘काफिरों के खात्मे’ के लिए शुरू किया गया है।

काफिरों के ख़िलाफ़ जिहाद का ऐलान करती लदीदा

लदीना सोशल मीडिया में जिहाद की बातें करती हुई दिखती हैं। वो ‘ला इलाहा इल्लल्लाह मोहम्मद रसूल अल्लाह’ का नारा लगाते हुए दिखती हैं। इन चीजों से उनकी मंशा साफ़ हो जाती है। लदीदा का जिहाद अहिंसा का पाठ तो नहीं है, इतना स्पष्ट है। ये जो भी है, उसकी बानगी हमें देखने को मिल चुकी है- बंगाल में, जामिया नगर में। लदीदा भारत से नफरत करने वाली युवती है। वो भारत को ‘मिडिल फिंगर’ दिखाती है। कठुआ रेपकांड के बाद उसने भारत को ‘मिडिल फिंगर’ दिखाते हुए इमोजी पोस्ट की थी। देश से नफरत करने वाली इस युवती को मसीहा बना कर उभारने का प्रयास जारी है, उसी देश में।

फिर से थोड़ा पीछे चलिए। शाहीन अब्दुल्लाह का नाम जान लीजिए। ये वही आदमी है, या फिर छात्र कह लीजिए, जो पुलिस से बचते हुए वहीं जाकर छिपता है जहाँ लदीदा और आयशा रहती है। वह पुलिस से मार खाता है, दोनों युवतियाँ उसे बचाती है। एक परफेक्ट फुटेज तैयार हो जाता है। एक पीड़ित छात्र, एक ‘लोकतान्त्रिक छात्र आंदोलन’, दो ‘साहसी’ महिलाएँ और बर्बर ‘भारत देश की पुलिस’। इससे ज्यादा क्या चाहिए किसी आंदोलन को अंतरराष्ट्रीय ख्याति दिला कर सरकार पर दबाव बनाने के लिए? अब्दुल्लाह ‘मकतूब मीडिया’ के लिए पत्रकार का काम करता है।

‘मकदूब मीडिया’ केरल से चलता है। लदीदा भी केरल की ही है। इस तरह से सारी कड़ियाँ जुड़ती हुई चली जाती हैं। आखिर केरल के इस पत्रकार को पुलिस क्यों खदेड़ रही थी? क्या पुलिस के साथ कुछ ऐसी हरकत की गई थी, जिससे पुलिस ने मज़बूरी में शाहीन अब्दुल्लाह को खदेड़ा और फिर वह वहीं जाकर छिपा जहाँ पर लदीदा और आयशा थी? क्या यह सब स्क्रिप्ट पहले से तैयार कर लिया गया था, जिसमें पुलिस को वहाँ पर लाया गया, जहाँ जिहाद का ऐलान करने वाले लोग चाहते थे? उस वीडियो को आप गौर से देखिए। पता चलता है कि वीडियो को किसी हाई क्वालिटी कैमरे से शूट किया गया है, एकदम सटीक एंगल के साथ।

लदीना का वो फोटो देखिए, जिसमें वो दीवार पर खड़ी हुई दिख रही है। सूडान की सलाहा भी कुछ इसी तरह खड़ी हुई थी, कार पर। उससे एक क़दम और आगे जाते हुए लदीदा और अन्य युवतियाँ दीवार पर खड़ी हुई। सूडान के आंदोलन को नक़ल करने की पूरी कोशिश। ‘फर्स्टपोस्ट’ में 8 बजे लदीदा का एक लेख आता है, उसकी बाइलाइन। उसके एक घण्टे बाद ही उसका वीडियो आता है, ‘फर्स्टपोस्ट’ में उसके बारे में ख़बर प्रकाशित होती है। यह 16 नवंबर की शाम की बात है। आप भी कहेंगे- इस साज़िश के सूत्रधारों ने क्या होमवर्क किया था! वाह!

छात्रों का इस्तेमाल कर के मोदी के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन कर अपना उल्लू सीधा किया जा रहा है। ऐसा करने वाले लोग मीडिया के बड़े चेहरे हैं, जो अल्पसंख्यक युवतियों के जरिए मोदी सरकार के ख़िलाफ़ माहौल बनाते हैं। शेहला रशीद भी उसी कड़ी का एक हिस्सा भर थी। अब लदीदा है। आयशा है। कल को किसी और यूनिवर्सिटी में छात्रों को दंगाई बना दिया जाएगा। किसी और देश के आंदोलन को कॉपी किया जाएगा। कोई नया ‘हीरो’ या ‘Shero’ निकल कर आएगा या आएगी। सावधान रहिए, मासूम चेहरों का मास्क बना कर भेड़ियें खेल रहे हैं। काफिरों के ख़िलाफ़ जिहाद का ऐलान करने वाले ‘लोकतंत्र की हत्या’ का नैरेटिव चलाने वालों से जा मिले हैं। आगे ये क्रम और भी हिंसक होगा।

नोट: इस लेख को लिखने में ट्विटर हैंडल Be’Havin!(@WrongDoc·2h) के एक थ्रेड की मदद ली गई है। उनका रिसर्च काबिले तारीफ है।

उन्नाव के हसनगंज में दुष्कर्म पीड़िता ने SP ऑफिस के गेट पर खुद को लगाई आग, 50% जली: हालत नाजुक

उत्तर प्रदेश के उन्नाव में हसनगंज थाना क्षेत्र के एक गाँव में शादी का झाँसा देकर लगातार दुष्कर्म की शिकार युवती ने सोमवार को एसपी आफिस के गेट पर खुद को आग लगा ली। आग का गोला बनी युवती आफिस के भीतर घुसी तो हड़कंप मच गया। दुष्कर्म पीड़िता ने हालात से तंग आकर सोमवार (16 दिसंबर) को एसपी ऑफ़िस के बाहर ख़ुद को आग लगा ली। इस दौरान वो 50 फ़ीसदी तक जल गई। हालाँकि, पुलिसकर्मियों ने जल्द ही पीड़िता के जलते हुए कपड़े फाड़कर उन्हें कम्बल में लपेट लिया। बता दें कि यह मामला हसनगंज का है। पीड़िता को गंभीर हालत में ज़िला अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहाँ उनकी स्थिति को देखते हुए कानपुर रेफर कर दिया गया।  

ख़बर  के अनुसार, पीड़िता ने सोमवार को क़रीब 11:30 बजे एसपी ऑफ़िस के मुख्य गेट पर पहुँची, जहाँ उन्होंने ख़ुद पर पेट्रोल डालकर ख़ुद को आग लगा ली और ऑफ़िस के अंदर घुसने का प्रयास करने लगी। इस दौरान वहाँ मौजूद पुलिसकर्मियों की नज़र पीड़िता पर पड़ी और उन्होंने पीड़िता को पकड़ लिया और कम्बल से ढककर उनकी जान बचाई।

घटना की जानकारी मिलते ही डीएम देवेंद्र कुमार पांडेय और एसपी विक्रांत वीर भी घटना-स्थल पर पहुँचे और पीड़िता से पूरी जानकारी ली। पीड़िता ने आरोप लगाया कि शादी के नाम पर उसके साथ दुष्कर्म किया गया। इस मामले में तीन महीने पहले उन्होंने हसनगंज कोतवाली में शिक़ायत दर्ज कराई थी, लेकिन पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की। वहीं, पीड़िता की माँ ने भी बेटी की बात को दोहराया। दुष्कर्म की घटना के बाद मामले को दबाने के लिए मुख्य आरोपित अवधेश सिंह और उसके साथियों ने पीड़िता के घर पर जाकर उन्हें जान से मारने की धमकी भी दी थी।एसपी विक्रांत वीर ने बताया,

“महिला ने हसनगंज थाने में भारतीय दंड संहिता की धारा 376 (रेप) का मुक़दमा दर्ज कराया था। 10 साल से दोनों के बीच संबंध थे। आरोपित अब शादी से इनकार कर रहा है। इसके बाद ही महिला ने यह मुक़दमा दर्ज कराया है। आग लगाने के कारणों के बारे में अभी महिला ज्यादा कुछ बता नहीं पाई हैं। अभी उनकी स्थिति को देखते हुए कानपुर रेफर किया गया है।”

जानकारी के अनुसार, 30 सितंबर को पीड़िता के घर पर मारपीट करने के मामले में उसने एसपी को प्रार्थना-पत्र दिया था। इसके दो अक्टूबर को शारीरिक शोषण के मुख्य आरोपित अवधेश सिंह, उसके भाई और एक अन्य के ख़िलाफ़ दुष्कर्म और जान से मारने की धमकी देने का मुक़दमा हसनगंज कोतवाली में दर्ज हुआ था। इस पर जानकारी देते हुए इंस्पेक्टर हसनगंज अरुण सिंह ने बताया कि दुष्कर्म के मामले में 13 दिसंबर को अदालत में चार्जशीट दाखिल कर दी गई थी। 

इसके अलावा, उन्होंने बताया आरोपितों ने हाईकोर्ट से अग्रिम ज़मामत ले रखी थी, इसलिए उनकी गिरफ़्तारी नहीं की गई। इस मामले में मुक़दमा दर्ज करने के साथ पुलिस विवेचना पूर्ण कर न्यायालय में आरोप पत्र दाखिल कर चुकी है।

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